Meri Pakiza Ammijaan Ka Bhrashtikaran - Page 2 - SexBaba
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Meri Pakiza Ammijaan Ka Bhrashtikaran

CHAPTER 10

क्या मेरी माँ पहले hi पाप में गिर चुकी है?

क्या वह अपनी बिगड़ी हुई माँ के रास्ते पर चल रही है?

उस रात घर पहुंचा, साँसें अब भी तेज़ी से चल रही थी उस पागल दौड़ से. दिमाग़ तूफ़ान था, सूरज

के अलाहदा बंगला का हैरत अंगेज़ मंज़र बार बार दोहरा रहा था: दादी उस खुले अंदाज़ में, सूरज

का नंगा जिस्म, उनका निजी चुम्बन, ट्रे पर मन पोर्क.

घर की रोशनियां धीमी थी, सिर्फ किचन और बैठक से हलकी चमक बहार निकल रही, इशारा की कोई अब

भी जाग रहा. मैंने दरवाज़े पर जूते उतारे, सांस सँभालने की कोशिश, बाज़ुओं पर शाखों की

छोटी खरोचें शर्ट के किनारे से पोंछते हुए.

हॉलवे में कदम रखा तो अम्मी किचन से निकली, चेहरे पर रहत और माँ वाली हलकी फ़िक्र का मिला जुला

अंदाज़. वह आरामदेह निघ्टड्रेस में थी, ऊपर गर्माहट के लिए ढीला रोबे बंधा, बाल ढीले

पीछे बंधे, हाथ में डिश टॉवल अब भी पकड़ा जो देर रात की सफाई से बचा था.

"बीटा, आखिर आ गया," उन्होंने कहा, सुर धीमा लेकिन वह रोज़ की फ़िक्र भरा जब मैं उम्मीद से ज़्यादा देर

बहार रहता. पास आयी, धीमी रौशनी में घोर से देखा. "इतनी रात को कहाँ था? सोचा था दादी को

उनकी सैर से लाने या जाबिर से मिलने गया था. सब ठीक? चेहरा लाल लग रहा है."

नाना क़ादिर बैठक में थे, मैं अंदर आया तो किताब थोड़ी नीचे कर के उत्सुक लेकिन be-fikr अंदाज़ से

देखा. "हाँ, beta—Daadi मिली? उन्होंने कहा था किसी दोस्त से मिलने जा रही, लेकिन काफी देर हो गयी."

जवाब देने से पहले नाना का फ़ोन साइड टेबल पर बजा, वह खुशगवार रिंगटोन जो दादी ने विजिट में

सेट की थी ख़ामोशी काट टी हुई. उन्होंने उठाया, स्क्रीन देख कर प्यार भरी छोटी हंसी. "यह, फरिश्ता की बात

—ज़ैनब का hi."

स्पीकर पर किया आदत से ताकि सब सुन लें, सुर गरम और तसल्ली बख्श. "ज़ैनब? Salam—tumhari तरफ सब

ठीक?"

दादी की आवाज़ साफ़ आयी, हलकी और आम, पीछे हलकी सरसराहट जैसे पेड़ों में हवा या पंखा. "व सलाम

, Qadir—haan, यहाँ सब अच्छा. फ़िक्र मत करो. मैं दोस्त के घर हूँ; बातें शुरू हुई और वक़्त का पता

hi नहीं चला. पुराने दिनों की yaadein—jaante हो न. रात यहीं गुज़ार लूंगी और सुबह ताज़ा आ जाउंगी.

शाहिदा और बेटे को कहना जागने मत रहे."

नाना ने सर हिलाया भले देख नहीं सकती, सुर आराम से. "ठीक है, अगर आराम है. कौन सी दोस्त फिर?

सावधान rehna—rickshaw या कुछ चाहिए तो कॉल करना."

"ओह, पुराणी जान पहचान सालों पहले ki—haal में फिर मिली," उन्होंने आसानी से कहा. "मैं ठीक हूँ,

सच. Goodnight—sab को मेरा प्यार देना."

कॉल ख़तम, नाना खुश. अब्बू किचन से देर रात पानी का गिलास ले कर आये, आखरी बात सुन ली.

"हाँ, दादी को आज कल साइरेन पसंद आ गयी. सब से मिलना julna—shayad रेसिपीज या गाओं की गॉसिप नयी औरत

दोस्तों से." नाना क़ादिर ने कहा.

अम्मी गरम मुस्कुरायी. "सच में मीठा है. अम्मी हमेशा लोगों से जुड़ती थी. और किचन में मदद—

खाने में वह एक्स्ट्रा लज़्ज़ा."

अब्बू ने सर हिलाया. "सही. फ़िक्र मत karo—safe और खुश हैं. मोरे पावर तो उन्हें."

हम सब हलकी हंसी, माहौल आसान और मज़ाक़िया, दादी की नयी एनर्जी और सोशल अंदाज़ पर कुछ और

बातें. "अगली बात, सुबह की सैर के लिए पूरा ग्रुप बना लेंगी," नाना ने मज़ाक़ किया. "मुझसे आगे निकल

जाएंगी!"

अंदर से मैं हंसने का नाटक किया, हंसी थोड़ी मजबूर, बाँटेर में शामिल होने के लिए ताकि शक न हो.

"हाँ, वह रूकती नहीं," मैंने कहा, आवाज़ में ज़बरदस्ती जोश दाल कर. लेकिन अंदर सच खाने लगा

जैसे kaanta—mujhe पता था असल में क्या हो रहा, वह "दोस्त" बिलकुल औरत नहीं, वह हरामी सूरज जो दादी

को बिगाड़ रहा था.

अगली सुबह घर के रोज़ के लहजे में गुज़री. अब्बू स्टाल के लिए जल्दी निकले, दरवाज़े पर अम्मी को गुडबाय

चूमा देते हुए रोज़ की आदत से.

मुझे पता था दादी अब भी सूरज के घर thi—kal रात कॉल में "दोस्त" का घर. यह जान करि पेट में

पत्थर सा बैठा, लेकिन जाना नहीं चाहता, और उस मन दुनिया के नज़ारे से दिमाग़ और बिगड़ने का खतरा

नहीं लेना.

अम्मी बैठक में अकेली थी, बड़े दीवान पर पेट के बल लेती हुई, थोड़ी तकिये के नीचे चीन टिका आराम

से, पेअर घुटनों से मुद कर हवा में हिल रहे. गहरी सोच में थी और भौं चढ़ी हुई.

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सामने मैगज़ीन खुली पड़ी थी, लेकिन आँखें उससे आगे देखती, be-fokus, जैसे कहीं दूर खोई हुई. फिर

कड़ी हुई और आईने के पास गयी खुद को देखने, जो सुना उस से हैरान रह गया.

अम्मी: [apne aks se, saans se thodi upar] शाहिदा… खुद को देखो. क्या कर रही हो? क्या बन रही हो?

[Dheere side par mud kar, aankhen jism par—pehle kamar ke curve par, phir upar poore seene par, phir

peeche kamar aur gaand ke gol swell par kurte ke neeche ubhre hue.]

अम्मी: [dheere, vishwaas nahi jaise] गजेंद्र… रेस्टोरेंट के बहार वह शब्द कहे थे… “बड़ा सीना,

पूरी कमर… भरी चीज़ें जो चलना थका देती…” या ,.', अभी क्यों उसकी आवाज़ इतनी साफ़ सुन रही हूँ?

[Ek haath dheere kamar par rakha, ungliyan andar ki gehraai par, phir bahar kamar ke phailao par.]

अम्मी: [dheere] वह खड़ा घूर रहा था, मेरे जिस्म पर इतनी be-sharmi से बात... और मैंने रोका, लेकिन

उसके शब्द अब भी यहाँ. दिमाग़ में अटके हुए.

[Puri tarah aaine ki taraf mud kar, nazar seene par, saanson se upar neeche hote dekh.]

अम्मी: [awaaz kaamp ti] यह पहले कभी नहीं हुआ. कभी नहीं. इतने साल शादी, बीटा पाला, परदह किया

… किसी मर्द ने ऐसे बात नहीं की. किसी ने ऐसे नहीं देखा जैसे गजेंद्र देखता tha—jaise खा जाएगा.

[Haath be-khudi upar, seene ke neeche brush, phir tezi se hata jaise jal gaya.]

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अम्मी: [hil kar] और पहले… बैठक में… जब वह पीछे खड़ा, हाथ बाज़ुओं पर, मुँह गर्दन पर

… महसूस किया उसका हाथ यहाँ... [haath naaf ke neeche rakha, dheere gol ghumate yaad kar] …और

मैंने तुरंत नहीं हटाया. कुछ सेकण्ड्स होने दिया.

[Gaalon par laali, pet mein garmahat phailti mehsoos.]

अम्मी: [aaine mein aankhen badi] एक बात में सही था… मैं कर्तव्य हूँ. जितना कभी माना नहीं.

देखो यह कमर… यह सीना… यह गांड. पूरी, भरी, जैसे उसने कहा. अब देख रही हूँ. समझ रही

क्यों उसकी नज़रें नहीं हैट रही थी.

[Garmahat badhi; saansen gehri. Jaanghein thodi dabayi, rokne ki koshish.]

अम्मी: [awaaz tezi se, khud ko daant te] नहीं. रुको. मैं इज़्ज़तदार औरत हूँ. बीवी. माँ. गजेंद्र

गन्दा, खतरनाक आदमी जो यह सोच दाल रहा, मैं उसे बिगड़ने नहीं दूँगी. वह आग जो बात करता था

… गुनाह है. गजेंद्र की धीरी आवाज़ दिमाग़ में.

[Baazuon se khud ko mazbooti se lapeta, jaise sab andar rakhe.]

अम्मी: [aks se minnat karte] किसी ने सिर्फ शब्दों और नज़रों से ऐसा महसूस नहीं कराया जैसे गजेंद्र

ने. किसी ने जिस्म ऐसा रियेक्ट नहीं कराया. क्यों वह? क्यों अब?

[Aaine se tez mud kar, dupatta kandhon par mazbooti se lapeta, lekin ruk kar aakhri baar peeche dekha.]

अम्मी: [dheemi, tooti si] गजेंद्र… दिमाग़ से निकल जाओ. प्लीज.

मैंने धीरे पास आया, टाइल पर कदम धीमे, फ़िक्र खींच रही थी. "अम्मी? ठीक हो? कहीं दूर खोई

लग रही थी."

वह थोड़ी चौंक कर पालक झपकाई, जैसे दिमाग़ से वापस खींच ली गयी, फिर तेज़ी से तसल्ली बख्श

मुस्कराहट के साथ बैठ गयी जो आँखों की दूरी को पूरी मिटा नहीं सकीय. ड्रेस ठीक की, be-khudi

बाल कान के पीछे डाले.

"ओह, beta—main ठीक, सच," उन्होंने कहा, सुर हल्का लेकिन वह चालाक ताल जो कुछ छुपाने में

इस्तेमाल करती. "बस अगले हफ्ते की soch—groceries, सफाई, तेरी पढ़ाई. माँ का दिमाग़ कभी आराम नहीं

करता, जानते हो. और अम्मी कल रात बहार... सोच रही उनकी मुलाक़ात कैसे रही."

"पक्का?" मैंने धीरे ज़िद की, दीवान के किनारे बैठ कर. "गहरी सोच में लग रही thi—jaise कुछ

परेशां कर रहा."

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उन्होंने हलकी हंसी के साथ ताल दिया, कड़ी होकर कुशिओं ठीक करते हुए. "कुछ सीरियस नहीं, वादा.

बस रोज़ की छोटी फिक्रें. जा, जाबिर के साथ या जो प्लान है एन्जॉय कर."

"ठीक है," मैंने कहा, भले पूरी तरह यक़ीन नहीं, खड़ा होकर जाते हुए. "जाबिर से मिलने जा रहा

hoon—lunch के लिए वापस."

"सावधान रहना," उन्होंने पुकारा जब मैं बहार निकला, आवाज़ गरम लेकिन वह अंदर की be-chaini साथ.

मैं ताज़ी सुबह में बहार निकला, लेन पर चलते हुए गजेंद्र को dekha—pehli बार सामने से, छुप कर

देखे वाक़ियात के इलावा. वह अपने घर से निकल रहा था, नीली शर्ट और ट्रॉउज़र में साफ़ सुथरा.

उसने मुझे देखा और दोस्ताना मुस्कराहट के साथ पास आया, हाथ बढ़ाया. "Hello—tum शाहिदा के

बेटे होंगे. आस पास देखा है. मैं गजेंद्र, नया पडोसी."

मैं एक पल झिझका, उसकी घूरने वाली यादें चमकी, लेकिन शिस्तगी से हाथ मिलाया. "हाँ... hello. मिल

कर अच्छा लगा."

उसने सर हिलाया, पकड़ मज़बूत. "अच्छा ilaqa—shaant, दोस्ताना लोग. तुम्हारा परिवार मेहरबान; तुम्हारी

अम्मी ख़ास कर उस दिन पानी के मामले में वेलकमिंग थी."

"शुक्रिया," मैंने न्यूट्रल रखा.

"आखिर बात कर के अच्छा लगा," वह बात चीत में जारी. "कॉलेज कैसा? छुट्टियां अब भी एन्जॉय कर रहे?"

"ठीक है," मैंने कहा. "पढ़ाई और दोस्त."

वह मुस्कुराया. "अच्छा अच्छा. जवान ladka—energy से भरा. वैसे, तुम्हारी अम्मी शाहिदा घर पर हैं?

फिर शुक्रिया कहना था पडोसी मदद का."

मैं झिझका, शक चुभा. "हाँ... घर पर हैं."

"परफेक्ट," वह आसानी से. "फिर मिलते हैं."

मैं चला गया, जाबिर की तरफ जाने का नाटक, लेकिन सर्किल कर के दीवार के पीछे छुप गया, उत्सुकता

से देखने. गजेंद्र ने हमारे दरवाज़े पर कॉंफिडेंट खटखटाया. जब अम्मी ने खोला, हैरान, वह

खुद अंदर घुस गया बिना पूरी दावत के, पास से गुज़रते "अंदर आ जाऊं एक मिनट? बस छोटी सी बात."

गजेंद्र: [muskurate] अस्सलामु अलैकुम, शाहिदा जी. गुज़रते हुए सोचा पसंदीदा पडोसी का हाल पूछ

लून.

अम्मी: [darwaze mein mazbooti se khadi] व अलैकुम अस्सलाम. गजेंद्र जी, क्या चाहते हो?

गजेंद्र: [dheere cigarette kheench kar, bina intezaar andar kadam] कुछ बड़ा नहीं. बस रेस्टोरेंट के

बहार हमारी छोटी बात के बाद हाल देखना था.

अम्मी: [tez darwaza band, mud kar tez] ऐसे अंदर नहीं घुस सकते! मैंने दावत नहीं दी.

गजेंद्र: [kandhe uchaal kar, aasaan] दरवाज़ा खुला था, तुम वहीँ थी. वेलकम महसूस हुआ. अच्छा

ghar—sab तरतीब से, ताज़ा खुशबू. तुम सच में ख्याल रखती हो.

अम्मी: [baazu jod kar, awaaz thodi upar] यह मेरे शौहर का भी घर है. अब जाइये.

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गजेंद्र: [sofe ki taraf chal kar, peeth par haath ferte] नरम सोफे. दीवारों पर गरम रंग. पर्दे भी

मैच. तुम पर सूट karta—sab शांत और सुन्दर. शाम में यहाँ बैठती होगी अकेली, किसी के इंतज़ार

में कंपनी की.

अम्मी: [aur khafa] रुक जाओ. मैं किसी के इंतज़ार में नहीं बैठती.

गजेंद्र: [muskurahat] हाँ हाँ. लेकिन तुम जैसे aurat—din भर खाना, सफाई, इतनी अच्छी dikhti—thodi टी

अवज्जोह डेसेर्वे करती. तुम्हारा शौहर खुशनसीब. ज़्यादा कहता है कितनी स्तुन्निंग लगती हो कुर्ते में?

अम्मी: [thodi laali, lekin jhatka] यह तुम्हारा मामला नहीं. और मेरे शौहर की बात मत करो.

गजेंद्र: [paas kadam] ठीक. लेकिन किसी को तो कहना पड़ता. तेरी वह आँखें… गहरी, काली. मर्द खो

जाए. और वह मुस्कराहट जो छुपाती हो? खतरनाक.

अम्मी: [nazar hata kar] मैं मुस्कुरा नहीं रही. और यह तारीफें नहीं चाहिए.

गजेंद्र: [dheemi qahqaha] कहती हो, लेकिन साँसें तेज़ी से, गाल गुलाबी. पहले सोच रही थी मुझ पर?

सड़क पर जो कहा उस पर?

अम्मी: [mazboot] नहीं. कोशिश कर रही थी तुम्हे न सोचूँ. और तुम्हे फिर नहीं देखना चाहती,

गजेंद्र जी. कभी.

गजेंद्र: [bhaun utha] कभी नहीं? तेज़ शब्द. लेकिन जिस्म कुछ और कह रहा अभी.

अम्मी: [tez sur] एक पल भी मत सोचो की मुझे तुम पसंद हो या यह सब. नहीं. तुम बद्तमीज़, सुनते

नहीं, हर हद्द क्रॉस करते. मैं shaadi-shuda—shauhar से मोहब्बत. जो भी मेरी आँखों या साँसों

में देख रहे, वह तुम्हारे लिए नहीं.

गजेंद्र: [aur muskurata] खुद को यह बताती रहो. मुझे पता है तुम जैसे औरतों का. दिन भर

परफेक्ट, ढकी, फ़र्ज़ ऐडा... लेकिन कभी अंदर छोटी आग सुलगती. शांत, लेकिन गरम. अभी देख रहा

हूँ.

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अम्मी: कोई आग नहीं. सपने मत देखो.

गजेंद्र: [dheere peeche mud kar] ठीक ठीक. लेकिन यार, पीछे से यह नज़ारा… पतली कमर से

फैलती पूरी कमर. परफेक्ट शेप. और सीना इतनी तेज़ी se—notice करना मुश्किल नहीं.

अम्मी: [saansen saaf tez] गजेंद्र जी… रुक जाओ.

गजेंद्र: [baazuon par dheere haath rakha] महसूस करो साँसें कितनी तेज़ी? गरम, तेज़ी... यह जिस्म

की बात है. मुझे बिलकुल पता है मतलब.

अम्मी: प्लीज…

गजेंद्र: [paas jhuk kar, gardan ke paas saans] खुशबू कितनी अच्छी. जस्मिने और वह narmi—sirf तुम.

[Woh gardan ke side par dheera chuma diya.]

अम्मी: [chhoti si hilkar, dheemi siski, thodi der wahin rahi, saansen tezi se]

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गजेंद्र: [ek haath aage saraka kar, naaf ke neeche rakha, dheere gol ghumaya] यहाँ… वह छोटी

काँप. पेट सख्त है न? यह सच जाग रहा.

अम्मी: [awaaz kaamp ti] मैं… नहीं कर सकती…

गजेंद्र: [dheere] लड़ना नहीं पड़ता.

अम्मी: [achanak aage kadam, mud kar saamne—ankhen gusse mein lekin poori naraz nahi, chehra laal]

बस करो! अभी मेरे घर से निकल जाओ. और कभी वापस मत आना.

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गजेंद्र: [smirk, haath upar] ठीक ठीक. गुस्से में और सुन्दर लगती हो.

[Darbaze par zor ki khatkhatahat. Dono jam gaye. Ammi ki aankhen badi.]

अंदर धीमी आवाज़ें. फिर khatkhatahat—Abbu, उनेक्सपेक्टेद्ली जल्दी घर. अम्मी हैरान, चेहरा सफ़ेद:

घर में दूसरा आदमी, अकेली, अब्बू के bina—bara गुनाह, मन, अगर देखा गया तो बदनामी. दीं

और परदह चिल्ला रहे थे खतरा; ग़ैर महरम अंदर गलत हर लेवल पर.

[Dusri khatkhatahat, zor se.]

अम्मी: [aankhen dheere badi, saans atak] ओह… ओह नहीं…

[Teesri, zid se. Asli ghabrahat aayi.]

अम्मी: [tez dheere, mud kar] गजेंद्र ji—chhupo! अभी!

गजेंद्र: [poori shaant, smirk] रिलैक्स, सुन्दर. कौन?

अम्मी: [kaamp ti awaaz, seene par dhakka] नहीं pata—shayad शौहर! छुपा!

गजेंद्र: [mazaakiya] कहाँ?

अम्मी: [hallway ki taraf ishaara] लांड्री room—wahaan! वह दरवाज़ा! जाओ!

गजेंद्र: [aur muskurate peeche hat te] लांड्री रूम? तुम्हारे कपड़ों से घिरा... अच्छा चॉइस,

शाहिदा जी. बहुत निजी.

अम्मी: [hiss kar] रुको यह! जाओ! मेरी शादी बर्बाद नहीं चाहती तुम्हारी वजह se—please!

गजेंद्र: [dheemi hansi, darwaze ki taraf] ठीक ठीक. तुम्हारे लिए छुप रहा... इस बार.

[Woh tezi se chhote laundry room mein ghus kar darwaza lagbhag band kiya, chhota sa gap chhoda.]

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[Ammi darwaze ki taraf daudi, haathon se hawa hilaa kar cigarette ki halki dhuyen taalne ki koshish.

Kurta theek ki, kaamp ti saans, laundry room ki taraf bechain nazar, phir darwaza khola.]

[Abbu living room mein aaye. Ammi ne peeche tez band kiya.]

अब्बू: [thake muskurate] अस्सलामु अलैकुम, शाहिदा. आज थोड़ा जल्दी आ gaya—bazaar शांत था.

अम्मी: [awaaz thodi zyada khush, zabardasti muskurahat] व अलैकुम अस्सलाम! जल्दी? अच्छा! आओ आओ.

अब्बू: [aage kadam, maathe par halka chuma] ठीक हो? थोड़ी गरम लग रही.

अम्मी: [ghabraayi hansi] हाँ haan—kapde फोल्ड और सफाई कर रही थी. काम से गर्मी लग जाती.

[Abbu sofa par gaye, thake baith kar saans bhari, collar dheela. Theek baith kar gehri saans li, naka

chadhaayi.]

अब्बू: [thodi bhaun] हम्म… अजीब. घर में सिगरेट जैसी खुशबू. कोई आया था?

अम्मी: [shaant, haath hila kar] वह बची खुशबू? पडोसी का लड़का और दोस्त बहार घूम रहे थे—

खिड़की के पास स्मोक. हवा सीधा अंदर आयी. सब खिड़कियां खोल दी थी, लेकिन जानते हो कभी चिपक जाती.

अब्बू: [dheere sar hilate, aankhen malte] आज कल के बच्चे… तमीज नहीं. ठीक, अंदर नहीं थी तो.

अम्मी: [bagal mein baith kar, fikr se] कभी नहीं. तुम बहुत थके लग रहे. दुकानें पर सख्त दिन?

अब्बू: [karwi hansi] सख्त से ज़्यादा. लैंडलॉर्ड सुबह आया. पूरी लाइन खली कर raha—koi बड़ी कंपनी ने

पूरा ब्लॉक लीज किया. सिर्फ एक महीना दिया पैक करने को.

अम्मी: [aankhen badi] एक महीना? मुमकिन नहीं! ऐसा नहीं कर सकता.

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अब्बू: [karwi hansi] कर सकता, और कर रहा. ज़्यादा वक़्त माँगा, लेकिन नहीं माना. बिज़नेस है कहता.

अम्मी: [baazu par dheere haath rakha, sehlaate] हे… इधर आओ, सर टिकाऊ. [Paas kheench kar kandhe

par sar, baal sehlaate] अकेला मत उठाओ. रास्ता निकल आएगा.

अब्बू: [aankhen band, thaki awaaz] कहाँ, शाहिदा? नए जगह डिपाजिट मांगते. रेंट दो गुना. हमारी

सेविंग्स khatam—do महीने के बिल, नयी दूकान नहीं.

अम्मी: [baazu sehlaati tasalli se] श… एक एक कदम. पहले लैंडलॉर्ड से साथ बात करेंगे. शायद मैं

साथ जाऊं तो माने. काम से काम तीन महीने.

अब्बू: [saans] सख्त आदमी. लेकिन... शायद.

अम्मी: और कल कजिन को call—bazaar के आधे मालिकों को जानता. कोई छोटी खली दूकान मिलेगी. या

थोड़ी देर शेयर.

अब्बू: [ruk kar] शेयर से इनकम घटेगी... लेकिन कुछ नहीं से बेहतर.

अम्मी: [maathe par dheere chuma] बिलकुल. और बजट और tight—extra बंद, सदा खाने, बाजार काम.

पहले सख्त वक़्त गुज़ारे, हमेशा मज़बूत निकले.

अब्बू: [dheere] तुम मेरी से ज़्यादा अच्छी. यह फ़िक्र डेसेर्वे नहीं करती.

अम्मी: [garam muskurahat] बकवास. हम टीम. याद है दो साल पहले दूकान में पानी? सोचे

ख़तम. साथ ठीक किया.

अब्बू: [chhoti muskurahat] सच... ,.' मेहरबान था.

[Laundry room se chhoti si thud—aise jaise plastic bottle ya dabba washing machine se giri.]

अब्बू: [tez sar utha kar hallway ki taraf] यह आवाज़ क्या थी?

अम्मी: [natural muskurahat, kandhe par thapki distract karne] ओह वह? बड़ा डिटर्जेंट बोतल ऊपर

रखा था कपडे सॉर्ट करते. आखिर गिर गया. यह पुराणी मशीन बंद भी विबरते karti—jaante हो.

अब्बू: [ek second sun kar, bhaun] थोड़ी भरी लगी. पक्का कुछ और नहीं गिरा?

अम्मी: [dheemi hansi, dheere waapas kheench] पक्का. Be-dhyani से स्टैक किया था. बाद में ठीक कर

लूंगी. आओ, वापस लेट jao—zyada टेंस हो.

अब्बू: [dheere aaraam] शायद सही... आज जुम्पी हूँ.

अम्मी: [baal sehlaati, dheemi awaaz] कोई भी होता. लेकिन ठीक हो जाएगा. कल plan—har जगह लिखेंगे,

हर इंसान से पूछेंगे. रात इस्तीखरा. ,.' दरवाज़ा खोलेगा.

अब्बू: [aankhen band, dheemi] तुम हमेशा मुमकिन बना देती...

अम्मी: [maathe par phir chuma] क्यूंकि है. तुम पर भरोसा. हम पर. अब आराम. चाय बनाती हूँ.

अब्बू: [dheere] शुक्रिया, शाहिदा… तुम बिना पता नहीं क्या करता.

अम्मी: [muskurate, baal sehlaati] कभी पता नहीं करना पड़ेगा.

[Laundry room se poori khamoshi. Ammi darwaze ki taraf pal bhar dekhi, chehra mustaqil, phir poori

narmi Abbu ko tasalli mein.]

मैं घर के एक हिस्से में, अब भी बहार, उत्सुकता खींच रही लांड्री रूम चेक करने. कुर्सी पर

चढ़ कर ऊंची खिड़की से झाँका, हैरान रह गया: गजेंद्र अम्मी के धुले नहीं पैंतीस और कपड़ों

के बीच खड़ा, सुखाने लटके, बेसिन तरतीब से.

वह इधर उधर मुस्कुराते देखा, फिर पैंतीस से भरे बेसिन par—type से सॉर्ट, उनकी तरतीब. एक सफ़ेद

उठायी, नरम कपडे को उँगलियों में महसूस, फिर नका के पास ले कर गहरी सूंघ, आँखें बंद

ख़ुशी से. हैरान देख ता रहा वह गहरा सूंघता, मज़ा लेता.

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राखी, गुलाबी उठायी, वह भी

सूंघी. खुद से: "छूट वाला हिस्सा नमकीन, tangy—jaise दिन भर की उसकी खुशबू. गांड वाला

स्टिन्की, जैसे दिन भर फागी, erotic—woh बड़ी गांड चलती, लचकती."

वह अम्मी और अब्बू सुन raha—Abbu शिकायत दूकान निकालने की. गजेंद्र अँधेरी मुस्कराहट, फ़ोन

निकाल कर चुपके कॉल. "जो कहा था कर लिया?" सुना, नहीं पता किस se—shayad स्टाल का मामला उसी ने

करवाया लिवरेज के लिए?
 
CHAPTER 11

मेरी माँ की इज़्ज़त और पाकिज़ागी पहली

बार टूट गयी है, मुझे यकीन नहीं हो रहा

अगली सुबह घर के रोज़ के लहजे में उत्तरी, मैं धीरे उठा, कल के वाक़ियात अब भी दिमाग़ पर बोझ जैसे अधूरा ख्वाब:

गजेंद्र का घर में be-sharmi से घुसना, लांड्री रूम में उसका हैरत अंगेज़ अंदाज़, अब्बू की दूकान के मसले को खुद

पैदा कर के "बचाने" का ड्रामा. नींद be-chain रही, फ़िक्र और शक में उलझा, लेकिन सुबह नॉर्मलक्य की एक पतली परत लायी

जब घर जाएगा.

नीचे किचन में पहले से रौनक थी.

ताज़ा पराठों की मज़ेदार खुशबू. अम्मी जल्दी उठ गयी थी, धीरे गन गुना रही थी उन में से एक नरम, दुआ भरी धुन

जो कामों को हल्का बना देती, आवाज़ धीमी और तसल्ली बख्श ख़ामोशी में.

जुम्मा था, अम्मी का रोज़ का शॉपिंग din—woh रूटीन जो उन्हें पसंद थी, हफ्ते के लिए घर भरने का सुकून, ताज़ा

सब्ज़ियां, मसाले, और ज़रूरियात.

दादी ज़ैनब वापस नहीं आयी थी, मुझे पता था वह सूरज के पास hi थी.

कल ब्रेकफास्ट पर ज़िक्र किया था, सुबह की नमाज़ के बाद निकलने का प्लान. नाना क़ादिर अपनी सैर पर रोज़ से जल्दी गए थे, ठंडी

हवा के लिए उत्सुक, जबकि दादी Zainab—apne राज़ भरे "दोस्त के पास रात गुज़ारने" से waapas—aayi थी टेबल सजाने में

मदद, एनर्जी काम न हुई देर रात के बावजूद.

पराठे दही और फल के सदा ब्रेकफास्ट के बाद, हफ्ते के वीकेंड प्लान्स पर हलकी बातों के साथ, अम्मी कड़ी हुई अपनी सैर

की तैयारी के लिए. उन्होंने वाइब्रेंट ब्राउन सिल्क ड्रेस चुनी मैचिंग स्कार्फ़ के साथ, कपडा नरम और परदह वाला, क्रीमी

स्कार्फ़ सर और कन्धों पर लचकती हुई.

अम्मी जुम्मे को शॉपिंग पर जा रही थी, शॉपिंग बैग कंधे पर लटकाये, आदति लेन्स से अनारकली बाजार की तरफ. सड़कें

हफ्ते की एनर्जी से bhari—rang बिरंगे दुपट्टों वाली औरतें ताज़ी सब्ज़ियों पर मोल टोल कर रही थी.

आखिर वह बाजार में गहरा पहुंची, अब्बू के कपड़ों के स्टाल की तरफ. यहां लेन्स सनकी, चमकती कपड़ों और कारी

कुर्तिओं की रैक्स से भरी, हवा ग्राहकों की गूँज और कपडे खोलने की सरसराहट से.

अब्बू का स्टाल हाला चल में मुस्तक़िल जगह था, शेल्वेस पर कुर्ते तरतीब से, जब उन्होंने भीड़ में अम्मी को आते देखा,

चेहरा ख़ुशी से चमक utha—kal की फ़िक्र की लकीरों से ज़्यादा रोशन, रहत भरा.

"शाहिदा! मेरी पसंदीदा मेहमान," उन्होंने कहा, सुर गरम और मज़ाक़िया जब शॉपिंग बैग ले कर साइड रखा. "इतनी दूर

गर्मी में आना ज़रूरी nahi—jaanti हो जुम्मा तुम्हारा बिजी बाजार दिन. लेकिन ख़ुशी हुई आयी."

अम्मी को तुरंत कुछ अजीब लगा. कल अब्बू स्टाल निकालने की शिकायत कर रहे the—naye डेवलपमेंट के प्लान पुराने बाजार

हिस्से को साफ़ करने के, आवाज़ बोझ से भरी जब नोटिस और रिज़्क़ के खतरे की बात की.

घर पर बताया था, परिवार की फ़िक्र, be-yaqeeni का बोझ. आज लेकिन वह ज़ोर से मुस्कुराये, पोस्चर आराम से, आँखों या सुर

में वह बोझ का निशाँ नहीं. अम्मी की परेशानी बढ़ी जब वह थोड़ा आगे झुक कर, आवाज़ नीचे की जब वह पास आये.

अम्मी: [muskurate paas aate] अस्सलामु अलैकुम. आज अच्छे मूड में हो. गन गुना भी रहे. कल घर आये जैसे दुनिया

ख़तम हो गयी.

अब्बू: [mud kar, chamakte] व अलैकुम अस्सलाम! हाँ, कल अँधेरा था, लेकिन आज… खुश हूँ सब बदल गया.

अम्मी: [bag neeche rakhte, pareshan] बदल गया? कैसे? कह रहे थे लैंडलॉर्ड ने सिर्फ एक महीना दिया…

अब्बू: [ab bhi zor se muskurate, kurta saaf fold karte] बिलकुल. था. आज सुबह एक आदमी स्टाल पर aaya—achha इंसान, रहमदिल.

दूसरे दुकानदारों से एविक्शन की बात सुनी. मदद की ऑफर.

अम्मी: [bhaun utha kar] मदद कैसे?

अब्बू: [khush, lagbhag josh se] कहा नयी जगह का डिपाजिट और पहले कुछ महीने का रेंट कवर करेगा. स्टॉक शिफ्ट का

खर्चा भी. कहा उसके लिए कुछ नहीं, पडोसी पडोसी का ख्याल रखें.

अम्मी: [palak jhapka kar, stool par dheere baithte] अजनबी ने इतना ऑफर? ऐसे hi?

अब्बू: [halki hansi] पूरा अजनबी नहीं. हमारा नया padosi—kuchh हफ्ते पहले आया.

अम्मी: [dil dhak se, chehra neutral] पडोसी…?

अब्बू: [khush sar hilate] हाँ हाँ. लम्बा आदमी, हमेशा सिगरेट, काली कार. बहुत शिस्त. कहा इलाक़ा पसंद, अच्छे लोग रहें.

अम्मी: [awaaz dheemi] कौन सा पडोसी ख़ुसूसन…?

अब्बू: [ungliyan chataak kar yaad karte] नाम… ग… गए… गज… रुक, गजेंद्र! हाँ, गजेंद्र. नाम भूल गया था.

अम्मी: [dil zor se dhadka, chhoti zabardasti muskurahat] गजेंद्र?

अब्बू: [zor se muskurate] बिलकुल! जानती हो?

अम्मी: [jaldi, khud sambhalte] मैं… लेन में देखा है. होसे लीक होने पर मदद की थी, याद है? तुम दूकान पर थे.

अब्बू: [khush] यह, हाँ! देखा? पहले से मददगार. और अब यह. ,.' ने सही वक़्त भेजा.

अम्मी: [kapdon ke dher ko dekhte, soch daudti—Gajendra ki be-sharm baatein, haath, living room ki garmahat, kal raat aaina]

हाँ… अच्छा किया.

अब्बू: [utsauk dekh kar] चुप हो गयी. सब ठीक?

अम्मी: [wapas, halki muskurahat] हाँ, बस… हैरान. नए से इतना बड़ा एहसान.

अब्बू: [phir khush] दिल अच्छे से बड़े एहसान. वैसे, तुमने ज़्यादा बात की उस से? नाम तेज़ी से पहचाना.

अम्मी: [chaturai se, shaant] ज़्यादा नहीं. बस आते जाते सलाम, और वह होसे वाला वाक़िअ. लगता सब से दोस्ताना.

अब्बू: [taareef se sar hilate] दोस्ताना और सखी. सुबह सौ बार शुक्रिया कहा. कहा रिज़्क़ बचा लिया.

अम्मी: [dheere, ab bhi process karte] बहुत… मेहेरबानी उनकी.

अब्बू: [haath par thapki] देखा? दरवाज़ा खुल गया. अब नयी जगह ढूंढ सकता हूँ बिना परेशानी.

अम्मी: [awaaz mein zabardasti garmahat] सच में.

अब्बू: [phir utsauk] सोच में लग रही. पक्का कुछ नहीं?

अम्मी: [tasalli muskurahat] बिलकुल नहीं. बस तुम्हारे लिए खुश. हमारे लिए.

उसी पल, जैसे वक़्त साथ दे रहा हो, बात शुरू हुए कुछ मिनट hi, गजेंद्र कुर्तिओं की रैक के पीछे से निकला, आसान

कॉंफिडेंट मुस्कराहट के साथ जैसे कपडे देख रहा था. अब्बू का चेहरा और चमका, उत्सुकता से इशारा करते हुए जैसे

मसाला आया.

अब्बू: [turant dekh kar, khushi se bada muskurahat] अस्सलामु अलैकुम, गजेंद्र भाई! अरे वह, क्या ख़ुशी का इत्तिफ़ाक़!

आओ आओ यहाँ!

गजेंद्र: [muskurate, dheere cigarette kheench] व अलैकुम अस्सलाम. बाजार घूम रहा था, तुम्हारा स्टाल देखा, सोचा

रुक कर हाल पूछ लून अपने पसंदीदा कपडे बेचने वाले का.

अब्बू: [graahak tezi se nipataya, khush khush rukhsat, counter se daud kar] पसंदीदा? तुम मेरे हीरो हो, गजेंद्र भाई!

दोस्त और राज़दार! [khali haath mazbooti se pakda, garam shake aur thodi der pakde izzat mein] अब भी शुक्रिया कैसे ऐडा

करून सुबह के लिए. कन्धों से इतना बोझ उतार दिया.

गजेंद्र: [sharmaati muskurahat, dhuya side] अरे भाई, कुछ बड़ा नहीं. पडोसी पडोसी का ख्याल rakhein—bas.

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अब्बू: [aankhen chamak] कुछ बड़ा नहीं? पूरा बिज़नेस बचा लिया! परिवार का पेट! लोग सिर्फ मीठी बातें करते, लेकिन

tum—amal किया. [josh se Ammi ki taraf] शाहिदा, पास aao—hamare नए पडोसी गजेंद्र जी को याद है न? वह जो बगल

में आये. गजेंद्र भाई, यह मेरी बीवी शाहिदा.

अम्मी: [dil seeney mein dhadka, hairaan, jism thoda mud kar nazar neeche, haath saamne jode] अस्सलामु अलैकुम…

गजेंद्र: [nazrein thodi der tikaa kar, sur narm garam] व अलैकुम अस्सलाम, शाहिदा जी. कुछ बार मुलाक़ात हो चुकी, है

न? [seene par mudhi nazar, halki jaan kar muskurahat] और समझता hoon—achhi '. ख़वातीन ग़ैर मर्दों से हाथ

नहीं मिलाती. तुम्हारी रिवायत की इज़्ज़त. बिलकुल बुरा नहीं माना.

अम्मी: [aankhen thodi utha kar pal bhar mili, maathe par halki bhaun, phir tezi se neeche]

अब्बू: [poori tarah be-khabar, ab bhi chamakte shukr se] अभी चाय मंगवाता hoon—bazaar की सबसे अच्छी. गजेंद्र भाई,

आज से जो भी chahiye—shirt, kurta—ghar ले जाओ. यह स्टाल उतना तुम्हारा जितना मेरा.

गजेंद्र: [qahqaha, cigarette se raakh jhaadte] इतना दूर नहीं जाना. बस मदद कर के ख़ुशी हुई. और अगर और कुछ

chahiye—behtar जगह ढूंढना, स्टॉक शिफ्ट, लैंडलॉर्ड से baat—main हूँ.

अब्बू: [haath jod kar] सुनो इससे, शाहिदा! इतनी सखावत. सुबह कहा था, फिर कहता hoon—umeed वापस दी. सब ख़तम

होने को था.

गजेंद्र: [Ammi par pal bhar nazar, phir Abbu par aasaan muskurahat] तुम्हारी मदद सदा है, भाई. जब तक तुम्हारे घर

की सबसे अच्छी चीज़ एन्जॉय कर sakoon—woh नरम, गरम, पूरी तसल्ली जो सिर्फ तुम्हारा घर deta—sab परफेक्ट रखूँगा. कोई

मसला, मैं संभल लूँगा.

अब्बू: [zor se hanste, kandhe par thapki] बिलकुल बिलकुल! हमारा दरवाज़ा हमेशा खुला! घर की tasalli—chai, खाना, बैठ

baat—tumhari कभी. अब जैसे भाई हो!

अम्मी: [gaal jal rahe, poori tarah chhupa matlab samajh—woh “narm, garam, poori tasalli” asal mein unka jism. Chehra thoda

side, honth patle, dil tezi se]

गजेंद्र: [halki smirk, dheera kheench] बस यह सुन्ना था. फिर कुछ भी, कभी भी गईं सकते हो. दिन हो या रात.

अब्बू: [utsuk sar hilate] अल्हम्दुलिल्लाह! और क्या मांग सकता इंसान? शाहिदा, कितना अच्छा? इतना अच्छा पडोसी.

अम्मी: [dheemi, control] हाँ… अच्छा.

अब्बू: [Gajendra ki taraf] बताओ bhai—meri परेशानी इतनी जल्दी कैसे सुनी?

गजेंद्र: [aasani se] बाजार में बात तेज़ी से फैलती. दूसरे दूकानदार ने ज़िक्र किया. Socha—achha आदमी क्यों परेशां

हो जब मदद कर सकता हूँ?

अब्बू: [sar hilate taareef] दिल सोना. सोना.

गजेंद्र: [Ammi par phir pal bhar nazar] जो ठीक लगे करता हूँ. और जैसे कहा… तुम्हारे घर का इनाम मोटिवेशन से

ज़्यादा.

अब्बू: [zor se muskurate] जब चाहे चाय या khaana—aa जाना. शाहिदा लेन की सबसे अच्छी बिरयानी बनती.

अम्मी: [zabardasti chhoti shist muskurahat, Gajendra ki nazar se bach kar]

गजेंद्र: [dheemi, makhmali awaaz] पक्का करती होगी. तुम्हारे घर के सब ख़ास चीज़ों का मज़ा लेने को be-sabr.

अब्बू: [phir hanste] देखा? पहले से विजिट प्लान! यही अच्छे पडोसी.

[Gajendra shist sar hilata, aakhri kheench leta, Abbu ke saath nayi stall jagahon par baat jaari jabki Ammi chup, be-zaroorat

kapde theek karti, dil ab bhi dhadakta teenon ke beech hawa mein latke chhupe matlab se.]

उसने साफ़ कह दिया था की वह कोई अफेयर नहीं चाहती, न कोई na-chaahi तवज्जोह, लेकिन वह मानता hi नहीं था. यह आदमी मेरी

अम्मी का पीछा कर रहा था लगता था, हर थोड़ी देर बाद "इत्तिफ़ाक़" से रास्ते में आ जाता, जो बिलकुल जानबूझकर लगे. मुझे

बिलकुल पसंद नहीं था वह अम्मी को ऐसे ध्यान दे रहा tha—zid भरा, तेज़, उन्हें असहज करने वाला अपनी लम्बी नज़रों

और छुपे तारीफों से.

लेकिन आज, स्टाल के मसले में मदद करने के बाद, अम्मी को शांत रहना पड़ा और शिस्त रहना, अपना गुस्सा पी कर अमन

बनाये रखने के लिए. उनमें थोड़ी झिझक थी, मुस्कराहट शिस्त लेकिन मजबूर.

अब्बू सिर्फ मददगार, रिश्ता दार पडोसी देख रहे the—ek मेहरबान अजनबी जो मुसीबत में आया और रिज़्क़ बचा लिया.

वह गजेंद्र की तारीफ़ कर रहे थे "बरकत, असली जेंटलमैन," अंधे उस स्टाकिंग, इशारों, छुपे छुआनो से.

अम्मी ने

पूरी बात नहीं बताई, अब्बू को बोझ नहीं देना चाहती थी या झगड़ा खड़ा कर के स्टाल की सुरक्षा खतरे में नहीं डालना

जो अब गजेंद्र की "मदद" पर थी. अब्बू जल्दी भरोसा कर लेते थे, सिर्फ अच्छे नतीजे पर ध्यान.

दोपहर बाद में, स्टाल पर अब्बू के साथ, गजेंद्र ने बहाना बनाया ईद गुज़र गयी कुछ हफ्ते पहले और नए पडोसी

होने के नाते त्यौहार मिस किया, तो परिवार को गिफ्ट्स देना चाहता है.

"मुझे बुरा लग रहा इतनी देर से आने का," उन्होंने आसानी से कहा, सुर सखी. "उसका हर्जाना कर doon—ghar के लिए मिठाई,

लड़के के लिए खिलोने. शाहिदा भाभी, मेरे साथ चलो दूकान; पास hi अच्छी है. तुम मदद करोगी चुनने में."

अब्बू ने तुरंत क़ुबूल किया, खुश हो कर. "कमाल का आईडिया, भाई! जाओ, शाहिदा. बहुत मेहेरबानी गजेंद्र जी."

अम्मी अंदर से भौं चढ़ा रही थी, साफ़ साज़िश पर नज़र सनकी, लेकिन अब्बू के सामने be-aawaazi के लिए शांत रही,

ज़बरदस्ती शिस्त सर हिला कर. "अगर ज़िद है... लेकिन गिफ्ट्स की सच में ज़रुरत नहीं."

"मेरा मज़ा है," गजेंद्र ने गरम ज़िद की. "Chalo—zyada देर नहीं लगेगी."

मैं उस शाम अम्मी और गजेंद्र के बिलकुल पास पास फॉलो कर रहा था, चुपके से, शक मुझे देखने पर मजबूर

कर रहा. अब्बू खुश खुश रुखसत कर रहे थे, be-khabar.

उस रात वह उन्हें अलग अलग जगह ले gaya—pehle मशहूर मिठाई की दूकान से ताज़ा गुलाब जामुन और बर्फी के डब्बे,

फिर खिलोने के स्टाल से मेरे लिए क्रिकेट सेट, सब के साथ अम्मी से मोहल्ले और परिवार की हलकी बातें. मैं हर जगह

फॉलो करता रहा, भीड़ में या दुकानदारों के पीछे छुप कर, मेरी नीली जम्पर शाम की परछाइयों में घुल

कर बाजार की रोशनियां जलते हुए.

गजेंद्र: [dheere cigarette kheench kar, nazar daal kar] तुम्हारा शौहर भरोसा करने वाला आदमी है. इतनी देर तक

अपनी सुन्दर बीवी को मेरे साथ शॉपिंग भेज दिया. स्टाल मदद के बाद सच में मुझे संत समझता है.

अम्मी: [sur narm aur nap tul] वह तुम्हारे अच्छे काम को देख रहा. इसलिए भरोसा. मज़ाक़ मत उड़ाओ, गजेंद्र जी.

सिर्फ गिफ्ट के लिए यहाँ हैं.

गजेंद्र: [muskurate] ठीक. लेकिन ऐसे सड़क की रौशनी में साथ चलना... अच्छा लग रहा. शांत. लगभग रोमांटिक.

अम्मी: [sur shist] सिर्फ घर की सैर. रोमांटिक कुछ नहीं. लोग देख लें तो बातें बनाएंगे.

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गजेंद्र: [kandhe uchaal kar] बातें बना लें. मैं तो तुम्हारी बात करना चाहता. आज रात तुमने सुन्दर चीज़ें चुनी

—क्रीम प्लेट्स गोल्ड रिम वाली. एलिगेंट चॉइस. तुम्हारी स्टाइल से match—bahar सदा, अंदर अमीर.

अम्मी: [chhoti shist sar hilai] टेबल पर अच्छी लगेगी. बच्चे भी पसंद करेंगे.

गजेंद्र: [sur neeche] प्लेट्स की hi बात नहीं कर रहा. तुम जानती हो. तुम्हारे बारे में सोचना बंद नहीं कर प् रहा,

शाहिदा जी. तुम कैसे चलती हो, गुस्से में भी कितनी धीमी बात... छोड़ नहीं प् रहा.

अम्मी: [gehri saans] बार बार कहते हो. लेकिन सपना देख रहे हो, गजेंद्र जी. मैं shaadi-shuda. खुश. यह शॉपिंग

भी कभी ज़्यादा लगती. शौहर ने इजाज़त दी तुम्हारी मेहेरबानी की वजह से, लेकिन ऐसी बातें उन्हें पसंद नहीं आएँगी.

गजेंद्र: [qahqaha] वह यहाँ नहीं. और तुम अब भी मेरे बगल में चल रही. कुछ तो कहती है.

अम्मी: [shist se] कहती है मैं शिस्त रहने की कोशिश कर रही. सिर्फ इतना.

गजेंद्र: [halki chhed] शिस्त... कल जब लांड्री रूम में छुपाया. अच्छी परदह वाली औरत घर में आदमी

छुपाये. सोचने पर मजबूर करता कितनी गहरी यह शिस्त.

अम्मी: [kadama rok kar ek pal] मैं ने शादी और परिवार की इज़्ज़त बचने को छुपाया. कुछ ेन्सॉरगे करने को

नहीं. मत मोरो इससे.

गजेंद्र: [dheere sar hilate] ठीक, मोरना बंद. मौसम की बात करें. ठंडी रात, है न? सैर के लिए अच्छी.

अम्मी: [rahat se topic badalne par] हाँ… गरम दिन के बाद हवा अच्छी.

गजेंद्र: [kuchh shaant kadmon ke baad] जानते हो, मैं बहुत जगह रहा. ज़्यादा देर नहीं टिकता. लेकिन यह लेन...

अलग. तुम्हारी वजह से.

अम्मी: [dheere] लेन आम है. गलत वजह से मत रुको.

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गजेंद्र: [streetlight ke neeche ruk kar, mud kar] गलत वजह? तुम जैसे औरत चाहना सालों में सबसे ईमानदार

वजह.

अम्मी: [dheere chalti rahi] ईमानदार हो या न, मुमकिन नहीं. मैं शौहर या दीं से धोखा नहीं दूँगी.

गजेंद्र: [aasani se paas] आज रात धोखे की बात नहीं. सिर्फ मान लो हम दोनों में कुछ है.

अम्मी: [shaant lekin mazboot] हम दोनों में सिर्फ यह बैग और घर का रास्ता है.

गजेंद्र: [dheemi hansi] ज़िद करने वाली. पसंद है. लेकिन कल की बात फिर... जब लांड्री रूम में धक्का दिया,

तुम्हारी चीज़ों के साथ कुछ मिनट अकेला मिला.

अम्मी: [sakht] गजेंद्र जी…

गजेंद्र: [sur neeche, be-sharm] तुम्हारी धूलि नहीं पैंतीस ऊपर थी. नरम कॉटन. उठायी, सामने वाला hissa—teri

छूट waala—chehre पर लगाया. नमकीन, garam—teri निजी खुशबू. सोचा कितनी मीठी और गीली होगी वहां.

फिर अम्मी और गजेंद्र पास के होटल में कॉफ़ी पीने गए, मुझे नहीं पता अम्मी इतनी शिस्त क्यों थी. लगता था यह

आदमी अब्बू की मदद कर रहा था सिर्फ अम्मी के पास आने के लिए, मेरी पाक अम्मी के.

जाबिर ने बीच में कॉल किया. "यार, मेरी गर्लफ्रेंड रानी घर पर है! जल्दी aa—hum तीनों वीडियो गेम्स खेलें. मिलना

zaroori—woh कमाल की है."

"अवेसमे लगता," मैंने टेक्स्ट किया, "लेकिन परिवार के काम में फंसा. कल आता hoon—waada, बिना मेरे शुरू मत

करना."

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गजेंद्र: शाहिदा जी, जैसे कह रहा था कल जब तुम ने लांड्री में छुपाया धुले कपड़ों के बीच, मैंने तेरी सब

गन्दी पैंतीस सूंघी,

अम्मी: [chalna rok kar, chehra safed ghairat se] कैसे कर सकते हो? यह घिनौना से बहार.

गजेंद्र: [be-asar, aankhen chamak] क्या करता शाहिदा? पीछे वाला हिस्सा भी soongha—aur तेज़, पसीना भरा, दिन

की थोड़ी गन्दगी. वह खां, गांड वाली बू और गर्माहट मिला कर. तेरी सुन्दर गांड दिन भर कपडे में क़ैद...

गहरा सूंघा. दिन भर उस पंतय में फागी थी क्या?

अम्मी: [awaaz kaamp ti, lekin shist control] यह सबसे घिनौना सवाल. तुमने मेरा घर, प्राइवेसी... सब मुक़द्दस

चीज़ उल्लंघन किया. आखरी warning—aisi बात कभी मत करना. मेरी चीज़ों या सोच के पास कभी मत आना.

गजेंद्र: [halki kandhe uchaal] सिर्फ बता रहा जो महसूस किया. मर्द जो औरत चाहता है उसका सब chahta—saaf हिस्से और

गंदे. मुझे ख़ास कर तेरी गन्दी जगह पसंद, पीछे वाली, सामने वाली नहीं, समझ रही हो?

अम्मी: [tezi se chal di, sur shaant lekin mazboot] तुम्हे मेरा कोई हिस्सा कभी नहीं मिलेगा. न साफ़, न गन्दा. शौहर

की मदद मेहेरबानी थी, लेकिन मुझ पर या जिस्म पर हक़ नहीं देती.

गजेंद्र: [paas paas, sur narm] पता है. लेकिन तेरी बू पूरा दिन साथ रही. और चाहने लगा.

फिर बाद में, मैं डिटेक्टिव जैसे देख रहा था. जल्दी hi रेस्टोरेंट से निकले और कहीं चल दिए जहाँ मुझे नहीं पता.

उस रात छुपी जगह से देखता रहा, शांत लेन की परछाइयों में घुटने तक कर, नीली जम्पर ठंडी हवा में

लपेट कर बाजार की रौनक से दूर.

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अम्मी: [kadama dheeme karte, dheemi roshni waali gali mein bechain idhar udhar dekhte] गजेंद्र जी… मुझे कहाँ

ले जा रहे? यह घर का रास्ता नहीं. यह जगह नहीं जानती.

गजेंद्र: [sur shaant tasalli] रिलैक्स, शाहिदा जी. सिर्फ दुकानों के पीछे छोटा शॉर्टकट. कोई लोग नहीं, शोर नहीं. मिनट

में मैं लेन पर. रात को इस तरफ surakshit—bharosa करो.

अम्मी: [jhijhak, peeche mudi roshni ki taraf] ठीक... लेकिन तेज़ी से चलें.

[Woh gali mein pahunche jahaan thodi chaudi, sadak se poori chhupi. Gajendra ruk kar deewar se tika. Ammi ek kadam

door ruki.]

अम्मी: [cigarette notice karte] पास इतना मत पियो. बू तेज़ है.

गजेंद्र: [aakhri dheera kheench, muskurate phenka] तुम्हारे लिए कुछ भी. देखा? गयी.

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गजेंद्र: [thoda paas, nazrein dheere ghumaa kar] यहाँ ऐसे खड़े... चांदनी में और सुन्दर लग रही. स्किन चमक

रही. और gardan—itni मुलायम, एलिगेंट. सोचता रहता हूँ होंठों के नीचे कितनी नरम होगी.

अम्मी: [sur narm, kaanp rok te] गजेंद्र जी… ऐसी बात नहीं करनी.

गजेंद्र: [dheemi, garam] क्यों नहीं? तुम्हारे होंठ हमेशा perfect—poore, नरम, जैसे चखने के इंतज़ार में.

और कुरता सीने पर खींचता सांस के साथ... वह ब्रेअस्ट्स इतने पूरे, भरे, ऊपर नीचे. परफेक्ट मुट्ठी.

अम्मी: [saansen tezi, nazar neeche] प्लीज…

गजेंद्र: [aur paas] और kamar—itni पतली फिर फैलती पूरी स्त्री कमर में. तेरी गांड... गोल, नरम, भरी. चलते वक़्त

नेचुरल हिलती. हर कदम हाथ बढ़ाने को कहती गरम कितनी.

अम्मी: [gaal gehre laal, dheemi] ज़्यादा कहते हो… ठीक नहीं.

गजेंद्र: [narmi muskurahat] सिर्फ शब्द, शाहिदा जी. लेकिन जिस्म सुन रहा. साँसें तेज़ी अब. अंदर वह छोटी गर्माहट..

. आँखों में देख रहा. देसिरद महसूस हो रही, है न? इतने आरसे बाद कोई हर सुन्दर इंच नोटिस कर रहा.

अम्मी: [nigal kar, garmahat rok te] मैं… जानती हूँ तुम मुझे ज़्यादा चाहते हो. लेकिन यह नहीं हो सकता.

गजेंद्र: [dheemi qahqaha] नहीं सकता? या दर लग रहा कितना तुम भी चाहती हो? Dekh—andhere में मेरे साथ कड़ी

, दिल तेज़ी से. मैं रोड पर ज़िद कर सकती थी, लेकिन मेरे पीछे आयी.

अम्मी: [dheemi] पीछे इसलिए आयी क्यूंकि सुरक्षित कहा. सिर्फ इतना. और भरोसा किया लेकिन अब शक्की लग रहे हो.

गजेंद्र: [thoda paas] सुरक्षित... और शांत. बात के लिए परफेक्ट. Batao—aakhri बार कब किसी मर्द ने कहा तेरी फिगर

परफेक्ट? तेरी ब्रेअस्ट्स कितनी इंविटिंग, कमर पकड़ने के ख्वाब?

अम्मी: [thodi kaamp] कोई ऐसे बात नहीं करता. और नहीं करनी चाहिए.

गजेंद्र: [dheere] लेकिन सुन्ना पसंद है. आँखें नरम पड़ती जब कहता हूँ. जिस्म थोड़ा पास झुकता.

अम्मी: [side dekhte] देर हो रही. घर जाना चाहिए. बच्चे सोचेंगे.

गजेंद्र: [tasalli] वक़्त की फ़िक्र मत. कार से घर छोड़ दूंगा. गली के एन्ड पर पार्क है. पांच मिनट, दरवाज़े तक.

अकेली अँधेरे में नहीं.

अम्मी: [jhijhak] कार... ठीक. लेकिन सिर्फ घर. सीधा.

गजेंद्र: [muskurate] सीधा घर. वादा. लेकिन यह पल... एक बात और. तेरी peeche—woh पूरी नरम gaand—har बार

आगे चलती देख ता रहता. जैसे छेड़ रही. गरम, भरी, हाथों के लिए परफेक्ट.

अम्मी: [saans atak] गजेंद्र जी… रुक जाओ. असहज कर रहे.

गजेंद्र: [narm sur] असहज... या जोश? गाल जल रहे. यहाँ से गर्माहट महसूस हो रही. इतनी अच्छी '. औरत.

अम्मी: [dheemi] दोनों, शायद. लेकिन गलत जीत रहा. सच में जाना चाहिए.

गजेंद्र: [dheere paas, ungliyan gaal par] जाने से पहले एक छोटा चुम्बन. उन मीठी होंठों का मज़ा जो ख़्वाबों

में.

[Ammi dheere chehra mod di, naraz nahi—sirf jhijhak, honth thode khule, taarif ab bhi kaanon mein.]

गजेंद्र: [gaal ke paas dheere] मोड़ मत. सेफ हो. सिर्फ हम. महसूस करो कितना चाहता हूँ... कितना चाहि जा रही हो.

अम्मी: [lagbhag dheere] यह खतरनाक...

गजेंद्र: [ungliyon se narmi se waapas muda] खतरनाक कभी अच्छा लगता.

[Woh honth dabaye—pehle halka test. Ammi ek dhadkan sakht, phir narm, honth thode khul gaye.]

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गजेंद्र: [thoda peeche, dheere] देखा? परफेक्ट...

अम्मी: [saans phooli, palak jhapakti] हम... रुकना चाहिए...

गजेंद्र: [phir pakda, ab gehra] श… थोड़ा और. स्वर्ग जैसे मज़ा.

[Woh pal bhar jhijhki phir poori wapas ki, honth bhookhe jaise, haath seene par halke.]

अम्मी: [phir alag, dheemi kaamp] यह गलत... कोई देख...

गजेंद्र: [turant phir chuma, shabd kaat te, beech mein dheere] कोई नहीं... सिर्फ हम... अच्छा महसूस करने

दो...

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वह फिर हार मानी, अब जज़्बाती चुम्बन, जिस्म पास. उसके हाथ धीरे ऊपर, कुर्ते पर पूरे ब्रेअस्ट्स पकडे,

अंगूठे कपडे पर हलके. वह मुँह में सिसकी लेकिन पास दबायी.

हाथ नीचे सरके, कमर के चउरवे पर, फिर पीछे गांड को मज़बूती से pakda—narm भरी मॉस दबाया,

खींच कर पास. अम्मी की सांस तेज़ अटक, चुम्बन और तेज़, उँगलियाँ शर्ट में गुथी जैसे अँधेरा उनकी धीमी तेज़ी की

आवाज़ें छुपा रहा.

मैं हैरान था अम्मी को गजेंद्र से चूमते dekh—honth हलकी स्त्रीतलीघट में मिलते, तेज़ी का पल, उसके हाथ कमर

पर खींचते.

वह सच में उन्हें बार बार तारीफ़ की थी जब तक कमज़ोर न पद गयी, शब्द आसान और ज़िद भरे: "शाहिदा, तुम

कमाल ho—itni सुन्दर, मज़बूत. कोई तुम्हे जैसे मैं नहीं देखता; शौहर खुशनसीब लेकिन पूरी क़द्र नहीं करता."

मुझे कुछ सूझ नहीं raha—poori हैरत, जिस्म जैम, दिमाग़ खाली मंज़र खुलते हुए. फिर अम्मी तेज़ अलग हुई, दांत

ते आँखों में गुस्सा चमका.

"क्या कर रहे हो?" वह हिसस की, सुर धीमी लेकिन तेज़. "मुझे धोका diya—kaha सिर्फ परिवार के गिफ्ट्स. यह चुम्बन?

बार बार मन किया!"

गजेंद्र शांत रहा, be-sharmi be-asar मुस्कुराते. "शाहिदा, chalo—tumne भी महसूस किया. बातों में वह

चिंगारी, पास झुकना. तुम भी चाहती थी जितना मैं."

अम्मी तंग आ गयी, चेहरा गुस्से से लाल. "चाहती थी? वहां है. यह haraam—har लेवल पर गलत. मेरा दीं, शादी

—दूर रहो!"

वह जाने मुद्दि, लेकिन वह धीरे पुकारा. "तुम मान जाओगी."

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अम्मी ने मुद कर जवाब दिया. "कभी नहीं. एक बात: मेरे परिवार से दूर रहो." फिर चली गयी, तेज़ी से रात में.

गजेंद्र की नज़रें उसकी बड़ी गांड पर अटकी रही जैसे दूर जा रही, हर ज़िद भरे कदम में हिलती. "जल्दी," खुद से

अँधेरी मुस्कराहट के साथ. "यह जिस्म जल्दी मेरा होगा." अम्मी चलती रही, सर ऊंचा, उससे अनसुन्ना करते.
 
CHAPTER 11

मेरी माँ की पाकिज़ागी बिलकुल मिट गयी है,

मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा

उस शाम घर पहुंचा जब आखरी दिन की रौशनी ख़तम हो रही थी, आसमान गहरा नीला हो गया था जिस से

लेन की स्ट्रीट लैम्प्स एक एक कर के जल उठी.

घर गरम और खुशामदीद था, खिड़कियों से हलकी रौशनी, डिनर की खुशबू अब bhi—Daadi की मज़ेदार

तीखी करी और ताज़ा माखन वाली रोटी जो हम सब ने थोड़ी देर पहले एन्जॉय की थी.

दादी ज़ैनब और नाना क़ादिर घर पर थे, अपने दिन के बाद आराम से बैठे. दादी किचन में थी, आखरी

बर्तनों की सफाई कर रही थी अपनी रोज़ की तेज़ी से, धीरे पुराने गाओं की धुन गन गुना रही जो हॉलवे तक आती थी.

नाना बैठक में अपनी पसंदीदा आर्मचेयर में थे, शाम की आखरी चाय पी रहे, नेवसपपेर साइड टेबल पर साफ़

मुकदा.

"अस्सलामु अलैकुम, सब को," अम्मी ने धीरे पुकारा अंदर आते, दरवाज़े पर सैंडल्स उतार कर स्कार्फ़ हुक पर

लटकाई. बैग्स नीचे राखी रहत की सांस के साथ, कंधे घुमा कर दर्द हल्का करते. "वापस आ gayi—bazaar

आज जुम्मे की तरह भरा था."

"व अलैकुम अस्सलाम, बीटा," दादी ने किचन से गरम जवाब दिया, हाथ टॉवल से पोंछते हुए बहार आयी तेज़ी

से गले लगाने. "थकी लग rahi—baaitho थोड़ी देर उनपैकिंग से पहले. शॉपिंग कैसी रही? सब अच्छे दामों मिली

या दूकानदार फिर ओवरचार्ज करने लगे?"

अम्मी छोटी मुस्कराहट मानी, भले आँखों तक नहीं पहुंची जब बैग्स से चीज़ें निकालने लगी. "बिजी थी,

अम्मी, लेकिन संभल लिया. ताज़ी भिंडी और टमाटर अच्छे दाम par—sabzi वाले को याद था, थोड़ा डिस्काउंट दिया

. और मसाले... थोड़ा मोल लिया, लेकिन क्वालिटी अच्छी."

नाना आर्मचेयर से ऊपर देखा, चाय का कप नीचे रखते खुशामदीद सर हिलाते. "घर आयी, शाहिदा."

बात हलकी और आसान थी, लम्बी दिन के बाद रोज़ की तरह, नाना ने अपनी सैर की छोटी कहानी सुनाई और दादी ने अपनी

चालाक कमेंटरी डाली. मुझे किचन में दादी के साथ अकेला पल मिला जब आखरी प्लेट्स साफ़ कर रहे थे,

बाकी बैठक में गाओं की ख़बरों पर बातें कर रहे.

"दादी," मैंने कहा, सुर आम और उत्सुक रखते हुए प्लेट्स का स्टैक उन्हें देते सूखाने, "कल रात सच में

कहाँ थी? फ़ोन पर कहा दोस्त के पास रात गुज़ार रही, लेकिन आज इतनी देर से आयी, और बाजार में ढूँढा तो

नहीं मिली."

दादी पल भर रुकी, टॉवल पर हाथ धीमे, प्लेट पोंछते हुए, फिर गरम तसल्ली वाली मुस्कराहट के साथ

मुद कर. "अरे मेरे प्यारे बीटा, इसकी फ़िक्र मत kar—kuchh ऐसा वैसा नहीं. कुछ पुराने मेल दोस्त मिले, बातें

शुरू हुई और वक़्त निकल गया. अँधेरे में जल्दी घर आने से बेहतर रात वहीँ गुज़ार ली ताकि बातें पूरी हो

सकें."

मुझे पता था झूठ बोल रही thi—details बहुत साफ़, बहुत कनविनिएंट, ख़ास कर सूरज के बंगला में देखे

के बाद. मेल दोस्त के पास रात गुज़ारना?

यह उन क़द्रों से मैच नहीं करता जो उन्होंने सालों से हमें सिखाई. लेकिन वह सूरज की तारीफ़ जारी राखी,

आवाज़ में असली जोश के साथ प्लेट्स स्टैक करते हुए.

"और वह सूरज kasai—sach में कमाल का इंसान, बीटा. हमेशा ताज़ा गोश्त, और रेसिपीज के लिए बेस्ट कट का

मश्वरा. इतना मददगार, इतना रहमदिल. इस बड़े शहर में ऐसा रिलाएबल और दोस्ताना इंसान मिलना पुराने गाओं

जैसे लगता, जब सब एक दूसरे को जानते और ख्याल रखते थे."

"हाँ," मैंने कहा, शक से बचने को साथ सर हिलाते, भले शब्द खाली लगे. "जैसा देखा वह अच्छा लगता.

ख़ुशी हुई अच्छी कंपनी मिली सैरों और कामों के लिए."

उस रात बाद में, अम्मी को आराम नहीं आ रहा था. घर शांत हो गया था, हॉलवे की रोशनियां धीमी, सब

अपने कमरों में जैसे घडी रात बारह से आगे निकल गयी. अम्मी और अब्बू के बैडरूम में सीलिंग फैन मुस्तक़िल

चलता, हवा हिलता जनुअरी की बची गर्माहट में कमरा ठीक रखते.

अम्मी फिर आईने के सामने खुद को देखने लगी, गजेंद्र के जिस्म पर कहे शब्द दोहराने लगी. लगता था

गजेंद्र के सोच समझ कर कहे शब्द उनके जिस्म को जगा रहे थे. वह सोच रही थी क्या गजेंद्र उनके जिस्म और

कर्व्स की इबादत करता है.

अब्बू अटैच्ड बाथरूम में नहा रहे थे, पानी की आवाज़ मुस्तक़िल रोज़ की, दिन ख़तम होने का इशारा. अम्मी

मेकअप टेबल पर मिरर के सामने बैठी, हलकी लैंप की रौशनी चेहरे पर नरम परछाइयां, अक्स को देखती

उँगलियाँ हेयरब्रश के किनारे पर बिना देखे.

गहरी सोच में खोई लग रही, माथा थोड़ा संको, होंठ जोड़े जैसे अंदर की लड़ाई नींद दूर कर रही थी.

अब्बू नहाने के दौरान वह धीरे खुद से बात कर रही थी, खुद को डांटने वाली अंदर की बात जो दिल की पाकि

और मज़बूती दिखाती भले पछतावे से लड़ रही हो.

"शाहिदा, आज क्या सोच कर किया यह?" धीरे मुरम्मत की, आवाज़ सांस से थोड़ी ऊपर, दर्द और विश्वास नहीं से

भरी अपने काम पर. "उस aadmi—Gajendra—ko ऐसे चूमने दिया, रात में, खुली जगह पर. अजनबी, शौहर नहीं,

होंठों को छुआ. गलत, इतना गहरा galat—shaadi के खिलाफ गुनाह, ज़िन्दगी भर के दीं के खिलाफ. हमेशा

वफादार, परदह, इज़्ज़त को सबसे क़ीमती तोहफा जैसे बचाया.

"कैसे एक पल की मीठी बातों, ज़िद भरी तारीफ़ ने

डगमगा दिया? या ,.' माफ़ करना; गन्दी महसूस हो रही, जैसे हुसैन से, परिवार से, अपने उसूलों से धोखा

किया. गजेंद्र के शब्द ज़हर थे शहद में लपेट कर, और मैंने एक पल के लिए अंदर आने दिया. अब नहीं—

मज़बूत रहना, पाक. इसे दिल से निकाल दो पहले बढे."

अब्बू कुछ मिनट बाद शावर से निकले. उन्होंने तुरंत उनकी परेशां शकल देखि, कमरे में सर्किल चलती हुई.

"शाहिदा, जान," उन्होंने नरमी से कहा, "आज रात इतनी परेशां लग रही. क्या बात है? शॉपिंग से आयी तब से चुप,

डिनर पर भी, अब yeh—dekhti जैसे पूरी दुनिया का बोझ. बताओ please—hum सब बाँट ते हैं, याद है? हमारे

बीच राज़ नहीं."

अब्बू: [watch side rakhte] देर से आयी. गजेंद्र भाई ने सेफ छोड़ा? गिफ्ट शॉपिंग अच्छी रही?*

अम्मी: [sur door, dupatta fold karte] हाँ… ठीक.

अब्बू: [khada hokar paas, peeche se narmi se baazu lapet, gardan par halka chuma] थकी लग रही. बिस्तर पर आओ.

आज रात पकड़ के रखूँगा.

[Woh mud kar honthon par chumne jhuke—aadati pyar bhara chumban. Ammi shuru mein aadat se jawaab di, lekin

honth milte hi dimagh mein Gajendra ka gehra jazbaati chumban aa gaya—cigarette ka maza, tezi, haath jism

dabate. Gandi, ajeeb mehsoos hui, tez alag hui, haath ke peeche se muh ponchhte hue.]

अब्बू: [ruk kar, hairaan] शाहिदा? क्या हुआ? ऐसे पीछे हटी जैसे जला दिया.

अम्मी: [mud kar, maatha malte] कुछ नहीं. सर दर्द.

अब्बू: [fikr se] सर दर्द? डिनर पर नहीं कहा. बाम लाता हूँ.

अम्मी: [sur sakht] बाम नहीं चाहिए.

अब्बू: [narmi se] ठीक... लेकिन चेहरा लाल. घर आने से ajeeb—dinner पर चुप, खाया भी काम. कुछ गलत?

अम्मी: [dheere circle chalti] गलत? नहीं. सब परफेक्ट.

अब्बू: [dekhte] परफेक्ट नहीं लग रही. माथा तेज़ मॉल रही. Batao—kya परेशां कर रहा?

अम्मी: [tezi se chalti, gussa badhta] परेशां? हाँ परेशां! पूरा दिन दौड़, बाजार की भीड़, बैग्स utha—ghar

आयी और यह? तेरी फ़िक्र भरी शकल जैसे मैंने कुछ गलत किया!

अब्बू: [dheere] गलत नहीं. सिर्फ केयर करता हूँ.

अम्मी: [ruk kar, tez] केयर? हमेशा क़ुएस्तिओन्स से केयर! जैसे मैं बच्ची जो चेक की ज़रुरत.

अब्बू: [shaant] ऐसा मतलब नहीं. अपसेट लग रही.

अम्मी: [mud kar, gussa tez] अपसेट? दमन राइट अपसेट! पूरा दिन भाग दौड़, और घर आकर यह? तेरी फ़िक्र जैसे

मैंने गुनाह किया!

अब्बू: [narmi se, swear se hairaan] शाहिदा… ज़बान.

अम्मी: [be-sharmi se] अब ज़बान? अपने बैडरूम में दमन नहीं कह सकती? मुझे नाज़ुक गुड़िया समझता जैसे

बुरा दिन नहीं हो सकता बिना तेरे पूछ ताछ के!

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अब्बू: [dheere, hairaan] पूछ ताछ नहीं. मदद करना चाहता.

अम्मी: [tez awaaz, circle mein] मदद? मुझे देख कर जैसे बड़ा राज़ छुपा रही? दूर रहो! आज रात मदद

nahi—sukoon चाहिए!

अब्बू: [ab bhi shaant, hairaan] सुकून? ठीक... जगह देता हूँ.

अम्मी: [jhatka] जगह? सोचता यह ठीक कर देगा? कभी कभी इतने be-samajh!

अब्बू: [dheere, dard se] समझ नहीं आ रहा... लेकिन ज़िद नहीं करूँगा. मेरी biwi—tum पर भी भरोसा.

अम्मी: [tez mud kar, sarcasm] मुझ पर भरोसा? यह अच्छा. सब पर bharosa—mujh पर, बच्चों पर, पडोसी पर,

रैंडम आदमी जो पैसे और मुस्कराहट के साथ आये. भरोसा जैसे मुफ्त.

अब्बू: [ab bhi shaant, pareshan] शाहिदा, भरोसा अच्छी चीज़. परिवार को जोड़ता. गजेंद्र भाई ने सिर्फ मदद की.

अम्मी: [thandi hansi, chalti] मदद? आँखें खोलो! वह तुम्हारे लिए nahi—kuchh चाहता है. ऐसे आदमी हमेशा

कुछ चाहते. और तुम प्लेट पर सब सज कर देते.

अब्बू: [maatha sankoa] कुछ चाहता? जैसे क्या? शुक्रिया? काफी कहा.

अम्मी: [tez, be-izzat] सोचता सिर्फ इतना? कभी कभी इतना स्टुपिड! वूल्व्स हर तरफ, तुम्हारी चीज़ के भूके, और तुम

बाहें खोल कर बुलाते.

अब्बू: [dard lekin mustaqil] वूल्व्स? स्टाल? वह बचाया. उसे क्रिमिनल बना रही.

अम्मी: [lagbhag gurraate] उससे बुरा. प्रिडेटर्स बन्दूक से नहीं lete—muskurate, मदद करते, इंतज़ार. जब ले

लें जो चाहते, तुम्हे पता भी नहीं चलेगा. सिर्फ खड़े रह जाओगे सोचते सब कैसे निकल गया.

अब्बू: [pareshan lekin mazboot] निकल गया? जैसे स्टाल? बचाया. यह शक बंद karo—padosi, सखी और शिस्त.

अम्मी: [be-izzat, dheemi zeher] अपने नए "दोस्त" की हिफाज़त जारी रखो. देर से समझ aayega—jab वुल्फ घूम कर

मार चुके, जब तुम ने बुलाया उससे.

अब्बू: [tez tone se hairaan] वुल्फ फिर? शाहिदा, शांत हो.

अम्मी: [tez, shabd kaat te] ठीक, जो चाहे मानो. एक दिन बुलाया प्रिडेटर असली चेहरा दिखायेगा, फिर समझ

आएगा वार्निंग क्यों. लेकिन तब देर हो jaayegi—jo सेफ समझते थे वह ख़तम.

अब्बू: [ruk kar, dard] शाहिदा, डरा रही. कौन सा प्रिडेटर? गजेंद्र भाई ने सिर्फ मदद की.

अम्मी: [karwi hansi] मदद? इतने सीधे. आँखें बंद रखो जब वुल्फ घूम रहा. वार्निंग से तंग आ गयी जो

सुनता नहीं.

अब्बू: [dheere, dard] सुन रहा. लेकिन सिर्फ गुस्से में मददगार आदमी पर.

अम्मी: [aakhri jhatka, frustration se tooti] फिर कुछ मत सुनो. मैं ख़तम.

[Ammi achanak dheemi pad gayi, gussa thakan aur gunah mein badla. Bistar par dharam se baithi, sar haathon mein,

gehri soch—andheri gali ka chumban yaad jal raha, dhokhe ki sharm, Gajendra ki bhookh aur darr.]

कुछ मिनट बाद

अम्मी: [dheere, tooti awaaz] मैं… माफ़ी. ऐसे बात नहीं करनी थी. शब्द निकल आये.

अब्बू: [paas aaya, narmi se baazu lapeta] ठीक है. जो खा रही, निकाल दो. गुस्सा नहीं.

अम्मी: [paas tikti, dheere] आज रात... खोई हुई महसूस हो रही. जैसे na-maaf करने वाला गुनाह किया, जिस्म में बड़ा

गुनाह. माफ़ करना इतनी सख्त थी.

अब्बू: [peeth sehlaate] पहले hi माफ़. सब के बुरे पल होते. सो jao—kal बात करना चाहे तो.

उसके बाद अब्बू सो गए, साँसें शांत, एक बाज़ू तकिये पर. अम्मी थोड़ी देर बैठी रही, फ़िक्र में, अँधेरे में

खुद को डांटती मुरम्मत.

"अहमक़ औरत... कमज़ोर और अहमक़. एक चुम्बन के लिए सब खतरे में कैसे डाला? पाक कर खुद को; यह डिफाइन न

करने दो."

आखिर बाथरूम गयी, ठंडी टाइल्स पाऊँ के नीचे. टीथ ब्रश करते घोर से अक्स में देखती, धीरे मुरम्मत

"गन्दा muh—us गुनाह से मैला." टॉयलेट खोला, ज़ोर से थूका कई बार, बार बार रिंस जैसे याद धो डाले.

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उन्होंने टीथ चार बार ब्रश किये, मिंट पेस्ट से तेज़ रगड़, एक पाक होने का सिंबॉलिक रिचुअल गजेंद्र के साथ छोटे

डेग के बावजूद पाकि और इज़्ज़त वापस लेने ka—phir साफ़ महसूस करने का, अपने बुनयादी उसूलों को पकड़ने का.

मेरी फीलिंग्स उलझी और बयां करना mushkil—pariwar के उसूलों से धोखा, अम्मी की साफ़ अंदर की लड़ाई का दुःख,

गजेंद्र की मैनीपुलेशन पर जलती नफरत, और गहरी परेशानी की ट्रस्टेड लोग इतनी जल्दी ऐसे पहलु कैसे छुपा सकते.

वह अब्बू के पास जा कर बिस्तर पर सो गयी

अगली रात अचानक अब्बू को बुखार चढ़ aaya—tez तेज़ी से, कहीं से नहीं, जिस्म थरथराता, कमज़ोरी इतनी की बिस्तर से उठ

न सकें, शायद बाजार की धुल, थकन, या खाया कुछ.

गजेंद्र फिर अजीब तरह हमारे साथ था, दरवाज़े पर आया जब अब्बू की हालत बिगड़ी, "परिवार का हाल पूछने"

के बहाने और तुरंत कार में हॉस्पिटल ले जाने की ऑफर.

अम्मी फ़िक्र में थी, पसंदीदा सिल्क ड्रेस pehni—phoolon वाली, हलके पस्टेल शेड्स में स्विर्लिंग पैटर्न्स, फिगर को

लचक से लपेट टी, रेड स्कार्फ़ परदह के लिए. सीना और गांड बड़े लगे, सिल्क उनकी नेचुरल कर्व्स को उभार रही थी

ग्रेसफुल लेकिन नोटिसबले तरीके से.

मुझे अम्मी को सेक्सुअलिज़े पसंद नहीं लेकिन sach—sundar और फ़िक्र भरी लग रही थी, अब्बू की चीज़ें जमा करते हुए.

शक होने लगा क्या गजेंद्र ने अब्बू को बीमार किया ताकि मौका मिले अम्मी को अलाहदा कर उनके इख़लाक़ बिगाड़ने का

—लेकिन सोच दफा की क्यूंकि पक्का नहीं, सबूत नहीं, सिर्फ बढ़ते इत्तिफ़ाक़ों से अँधेरी पैरानोया.

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अम्मी: [dheere, Abbu ka haath sehlaate] डॉक्टर ने कहा इन्फेक्शन है, शायद थकन से. आराम और एंटीबायोटिक्स, कुछ

दिन में घर.

अब्बू: [kamzor muskurahat] सब को डरा दिया. माफ़ी.

अम्मी: [sar hilate] माफ़ी मत मांगो. बस ठीक हो जाओ.

अब्बू: [dheemi awaaz] जानते हो… गजेंद्र भाई ने इतनी तेज़ी से पहुँचाया. जब पैदल नहीं चल सका तो कार तक

उठाया. एडमिशन फीस, tests—sab अपफ्रंट पाय किया.

अम्मी: [aankhen thodi badi, hairaan] उसने… सब पाय किया?

अब्बू: [dheere sar hilate] हाँ. केशियर ने एडवांस माँगा, पास काफी नहीं था. वह आगे बढ़ा और सब सेटल. कहा

"फॅमिली emergency—paise की फ़िक्र मत."

अम्मी: [neeche dekhte, dheemi] मुझे… नहीं पता था.

अब्बू: [narmi se] देखा, शाहिदा? मैंने कहा tha—bura नहीं. असली बरकत छुपी हुई. ,.' ने सही वक़्त भेजा.

अम्मी: [ruk kar, mukhtalif, phir chup, haath thoda mazboot dabaya]

[Kuchh minute baad, Gajendra aur main ward mein aaye. Main paani phal ka bag uthaaye. Gajendra hospital shop se

chhota bouquet laaya.]

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गजेंद्र: [garam muskurahat] अस्सलामु अलैकुम. हमारा मरीज़ कैसा?

अब्बू: [chamakte] व अलैकुम अस्सलाम, गजेंद्र भाई! बहुत बेहतर. डॉक्टर कहता जल्दी घर.

गजेंद्र: [ammi phir abbu dekhte] अच्छी खबर. डरा दिया, लेकिन मज़बूत ho—jaldi ठीक.

अब्बू: [shukrguzaar] सब तुम्हारी वजह से. उठाया, तेज़ी ड्राइव, बिल्स पाय… शुक्रिया कैसे ऐडा करून.

गजेंद्र: [haal kar] अरे bhai—shukriya नहीं. पडोसी परिवार. बस ख़ुशी तेज़ी पहुंचाए.

अम्मी: [chup, nazar Abbu ke haath par, mushkil se boli]

[Main aage, bag neeche rakha bistar ke dusri taraf baitha.]

मैं: [muskurate] अब्बू, पहले से बेहतर लग रहे. डॉक्टर ने बहार bataya—serious नहीं. आराम करो, जल्दी बॉसिंग

वापस.

अब्बू: [kamzor qahqaha] बॉसिंग? मैं तो जेंटल हूँ.

मैं: [muskurate] हाँ अब्बू. फल laaye—kela, सेब. जब मैं करे खाना.

अब्बू: [hum teeno dekhte] Dekho—poori टीम. गजेंद्र भाई, पूरा दिन रहना ज़रूरी नहीं था.

गजेंद्र: [foot stool par baithte] रहना चाहता था. स्टेबल जाने तक नहीं जा सकता.

मैं: [sar hilate] हाँ, हीरो आज. जैसे कुछ वैघ नहीं करते उठाया.

अम्मी: [chup, zabardasti chhota sar hilaya kuchh nahi kaha]

अब्बू: [Gajendra ki taraf] सच bhai—bills… निकलते hi वापस करूँगा.

गजेंद्र: [mazboot lekin meherbaan] रपय का सोचना भी मत. हेल्थ पहले.

मैं: [Abbu ki taraf] आराम करो अब्बू. यहाँ हैं. पूरी तरह ठीक हो जाएंगे.

अब्बू: [aankhen nam] सब के साथ... पहले से बेहतर महसूस.

[Ammi zyadatar chup, nazar Abbu par, Gajendra ki nayi "meherbaani" ka bojh aur pehle se bhari.]

बाद में, टेस्ट रिजल्ट्स के इंतज़ार में हॉस्पिटल रूम में, मैंने अम्मी को कहा कोक चिप्स वेंडिंग से लाता हूँ

—स्ट्रेस में मेरी पसंदीदा late-night कम्फर्ट.

फिर गजेंद्र ने अब्बू को गुडबाय कहा आराम करने, सुर फ़िक्र भरा. "जल्दी ठीक हो हुसैन bhai—sab संभल

लूँगा."

अम्मी की तरफ आसानी से, "शाहिदा को सेफ घर छोड़ doonga—der की फ़िक्र मत."

यह रिक्वेस्ट अम्मी को असहज किया, चेहरे पर हल्का gussa—aankhon में चमक, होंठ पतले पल bhar—lekin अब्बू

रोज़ त्रुस्तिंग शुक्रगुज़ार, बिना झिझक क़ुबूल. "अच्छा आईडिया bhai—sab शुक्रिया. शाहिदा, तू भी आराम कर; रात यहाँ

ठीक हूँ."

अम्मी फँसी thi—Abbu के पास रहना चाहती लेकिन इंकार नहीं कर सकती सवाल उठाये बिना. अब्बू को गुडबाय,

माथे पर प्यार से चूमा, फ़िक्र भरी धीमी आवाज़. "आराम कर jaan—kuchh बदले तो कॉल. ी लव यू."

फिर be-dili से गजेंद्र के साथ निकली, कदम नाप टूल.

मैं चुपके फॉलो किया, मिनट बाद निकल कर, शांत हॉस्पिटल ग्राउंड्स से रात की सड़कों में.

वह हॉस्पिटल कॉरिडोर के बहार पल भर खड़े, इलाक़ा खाली धीमी रौशनी 11 बजे, देर में लोग नहीं, दूर कार या

नर्स की आवाज़ गूंजती.

अम्मी चुप लेकिन बहुत शिस्त andaaz—shayad थकन, अब्बू की फ़िक्र, या हाल के वाक़ियात का बोझ.

चलते हुए उसने हाथ छूने दिया पल भर, छोटा इशारा जो दीं में गुनाह, ग़ैर महरम मर्द औरत के बीच

जिस्मानी लाइन जो कभी क्रॉस नहीं करनी.

शायद जानती थी यह आदमी ज़ाहिर में इतना मददगार fikrmand—hospital ड्राइव, स्टाल "bachaaya"—sochne लगी क्या

सच में उसकी फ़िक्र करता है, या अब्बू के बिना वल्नेरेबिलिटी का फायदा उठा रहा?

अम्मी: [bagal chalti shist se, sur dheemi nap tul] शुक्रिया गजेंद्र जी... आज सब के लिए. लेकिन ज़्यादा दूर नहीं जाना.

देर है, उनके पास रहना चाहिए.

गजेंद्र: [raftaar dheemi, dheemi roshni waali corner mein ruk kar jahaan oonchi deewarein sadak se nazar rokti,

koi nahi] देर? हॉस्पिटल shaant—jaldi नहीं. यहाँ पल भर खड़े हो जाएँ. देखा? इतना बुरा नहीं. पहुँचाया, बिल्स

पाय बिना सोच. अच्छा आदमी पडोसी के लिए करता जो कर सकता.

अम्मी: [shist baithi, god mein haath jode, nazar neeche] हाँ... बहुत मेहेरबानी की. ज़्यादा से ज़्यादा. ,.' बरकत

दे.

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गजेंद्र: [paas baitha, zaroori se zyada, sur garam tasalli] बरकत? तुम बरकत वाली, शाहिदा जी. तुम जैसे औरत—

वफादार बीवी, फिक्रमंद maa—duniya की मदद डेसेर्वे. पहले कितनी परेशां थी देखा. इसलिए आगे बढ़ा. कोई

अकेला नहीं दुखी होना चाहिए.

अम्मी: [shist sar hilate, sur mein thodi sakhti] सच... हम घबराये हुए थे. लेकिन इतना पाय नहीं करना था. जल्दी

वापस कर देंगे. शौहर डेब्ट नहीं चाहते.

गजेंद्र: [aasani se taal] डेब्ट? भूल जाओ. तुम्हारी फ़िक्र से किया. घर संभालती, सब का khayal—shauhar

खुशनसीब जो क़द्र करता, लेकिन कभी औरत को एक्स्ट्रा सपोर्ट चाहिए.

अम्मी: [pal chup, gehri soch—shabd shak paida, sach fikr ya khel? Sur shist, sakhti thodi dheemi] सपोर्ट आज कल

नादिर. सही... बरकत. लेकिन सावधान रहना चाहिए किस से क़ुबूल.

गजेंद्र: [thoda paas] सावधान? सिर्फ अच्छे इरादे दिखाए. जैसे aaj—tezi ड्राइव, डॉक्टर्स संभाले. अंदर

तुम्हारे वक़्त शौहर के लिए धीरे दुआ की. इतनी फ़िक्र.

अम्मी: [pal bhar upar dekhi, aur shist] दुआ? सोचा समझ... काम लोग ऐसे करते अजनबी के लिए.

गजेंद्र: [muskurate, sur narm] अजनबी? अब ज़्यादा. देख यहाँ इतने दिन के बाद भी इतनी संभाली. बरकत वाली

मज़बूती... और सुंदरता. आँखें इतनी गहरी, ज़िन्दगी देखि लेकिन नरमी बाक़ी.

अम्मी: [halki laali, shist] सुंदरता? इस उम्र में? ज़्यादा तारीफ़, गजेंद्र जी. दूसरे दिन वाली मत शुरू करो.

गजेंद्र: [nazar neeche] तारीफ़? सच. मुस्कराहट अँधेरी कॉरिडोर रोशन. होंठ... पूरे, सेक्सी. राज़ धीरे

बोलने या और के लिए बने.

अम्मी: [pareshan, ruk kar, kya kahe nahi, sakhti lagbhag gayab] सेक्सी? गजेंद्र जी...

गजेंद्र: [aasani se jaari] और फिगर, ड्रेस कैसे फिट. वह कर्व्स... कमर अंदर फिर बहार पूरी कमर. लेकिन

सीना... पूरे भरे ब्रेअस्ट्स. थोड़ा क्लीवेज दिखा, बहार झांकता. इंविटिंग, ध्यान मांगते.

अम्मी: [aankhen badi, tezi scarf upar kheench cleavage poori dhak, sur shist lekin sakhti dheere] प्लीज... यह

ठीक नहीं. स्कार्फ़ रश में सरक गया.

गजेंद्र: [dheemi qahqaha] सरक? या छेड़? जिस्म art—woh ब्रेअस्ट्स गोल, स्त्रियात्मक. तकिये जैसे नरम लगे. स्किन.

.. मुलायम, गरम. मर्द के ख़्वाबों की बरकत.

अम्मी: [shist, sur aur narm] किसी को छेड़ नहीं, shaadi-shuda. ख्वाब अलग... हकीकत अलग. दूसरी बात करें.

जैसे... तुम्हारा परिवार? कभी ज़िक्र नहीं.

गजेंद्र: [peeche tika, nazar ab bhi] परिवार? अब सिर्फ मैं. माँ बाप गए, बीवी नहीं. इसलिए मदद करता ताकि

अकेला न लगे. तुम jaise—maujoodgi दुनिया बेहतर. लचक, आवाज़... दुपट्टा ठीक करने का तरीका भी. बिना

कोशिश सेक्सी.

अम्मी: [phir pareshan, shist] बिना कोशिश? कोशिश परदह की.

गजेंद्र: [sar hilate] परदह और मैग्नेटिक. गांड bhi—poori, चलते हलकी हिलती. मर्द प्रोटेक्ट करने... और ज़्यादा

चाहता.

अम्मी: [chehra thoda chhupaya] गजेंद्र जी... जिस्म पर बस. Batao—hospital बिल्स की मदद सच में सिर्फ

मेहेरबानी?

गजेंद्र: [ab gambheer] मेहेरबानी हाँ. लेकिन देखता कितना करती सब के लिए. तुम जैसे बरकत वाली पैसे की

फ़िक्र नहीं करनी. बोझ उठा लून.

अम्मी: [chup, shist] सखावत. कभी ज़्यादा.

गजेंद्र: [muskurate] क्यूंकि लायक हो. दुपट्टे के नीचे baal—lambe, सिल्की. हर जगह नेचुरल अल्लुरी की बरकत.

अम्मी: [baal chhoo kar be-khudi] अल्लुरी? सिर्फ बाल. अंदर वापस जाना चाहिए. नर्स चेक कर सकती.

गजेंद्र: [saath khada, paas] एक मिनट और. हाथ... पतली उँगलियाँ... होंठ. मेरे होंठों पर सोचो. छुअन

से शिफा, शाहिदा जी.

अम्मी: [shist khadi, abhi peeche nahi hati] शिफा?

फिर पास के धीमी रौशनी वाले स्टोर रूम mein—shayad सप्लाइज या मेंटेनेंस, दरवाज़ा थोड़ा khula—usne

नरमी लेकिन मज़बूती से अंदर खींचा, बाज़ू पर हाथ अंदर ले जाते दरवाज़ा धीरे बंद क्लिक के साथ.

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जगह बॉक्सेस शेल्वेस से भरी, सिर्फ छोटा बल्ब. उसने पहले बिना कहे चूमा शुरू, होंठ तेज़ी से दबाये, हाथ

खींच पास.

अम्मी शुरू में परेशां मन, सीने पर हाथ धक्का. "Ruko—kya कर रहे? रुको प्लीज, नहीं."

लेकिन तुरंत मन धीमा, वापस चूमने लगी, होंठ जवाब देते भले आँखों में लड़ाई, जज़्बात टाइड जैसे

खींच रहे.

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मेरी ज़िन्दगी उस पल टूट gayi—darwaze के छोटे क्रैक से देख, यह na-mumkin नज़ारा सब कुछ तोड़ दिया जो

परिवार, अम्मी के बारे में जानता था.

इतना na-mumkin, ख्वाब जैसे जागने का intezaar—unka रेहम ग़ालिब, शायद अंदर से मानती थी यह आदमी

अच्छा वार्निंग के बावजूद, या शुक्र मन अट्रैक्शन से मिल kar—lekin जानता था दिल से बिगड़ी नहीं; यह गहरा

डगमगाहट, इंसानी कमज़ोरी वल्नेरेबिलिटी के पल में.

क्यों चुम रही थी? हैरत दिमाग़ में वजहें घूमती: ज़िद "मदद" से इंडेब्टेड महसूस, तारीफ़ स्ट्रेस्ड

ज़िन्दगी में खली जगह भर, रूटीन सालों बाद अटेंशन का थ्रिल, फ़िक्र को मोहब्बत samajh—lekin जानता था

कोर में बिगड़ी नहीं; गहरा लैप्स, इंसानी कमज़ोरी पल में.

फिर चुम्बन रोक, साँसें भरी धीरे "कर शाहिदा, होंठ इस्तेमाल कर"

अम्मी पक्की नहीं, थोड़ा पीछे वाइड आईज. "मतलब? मैं... नहीं कर sakti—yahan भी नहीं होना था."

उसने नरमी से ुर्गायै, कन्धों पर हाथ. "घुटने tek—bharosa, ठीक नेचुरल लगेगा."

झिझकी, आवाज़ कांप. "ज़्यादा hai—please, मत मांगो."

फिर घुटने टेकने कहा, सुर ुर्गाने वाला. "Chalo—sab के बाद, सिर्फ यह."

"मत कराओ," धीरे, लड़ाई साफ़. "Galat—pariwar, शौहर."

उसने धीरे गिल्ट दिया. "सब kiya—stall, आज हॉस्पिटल? कनेक्शन महसूस karti—mana मत."

फिर अम्मी धीरे घुटने टेकि, सख्त फ्लोर पर, सर अब ट्रॉउज़र जिपर जितना ऊंचा, ऊपर देखती गहरी भौं,

परेशानी पछतावा लड़ते चेहरे पर.

नहीं पता अम्मी में क्या ghusa—pal की गन्दगी से पोस्सेस्सेड? जज़्बात मिला jula—gunah डिजायर से टकराता, नतीजे

का डर शब्दों के खींच से, अब्बू की वफादारी मन थ्रिल से, शुक्र अँधेरा में मोर.

उसने ट्रॉउज़र खोलने कहा. "Chalo—khaas बनाये."

"मत karaao—please, परिवार सोचो," मिन्नत धीरे, हाथ कांप.

उसने छुअन से तसल्ली. "असली mehsoos—maan लो. यह हम, निजी."

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अम्मी ने ट्रॉउज़र उतारना शुरू बेल्ट से, उँगलियाँ लड़खड़ाती डिस्बेलिएफ में उसकी बिजनेस देख, धीरे सांस, हैरत

और कुछ मिला.

"सां क्यों?" पूछा, धीमी आवाज़.

अम्मी घिनौने सवालों से बचती. "मत— बस... नहीं."

धीरे कहा, "कुछ महसूस... बयां नहीं कर सकती."

उसने ज़िद. "सच में क्या?"

"मैं... ऐसी पोजीशन में कभी नहीं," माना, छोटी आवाज़.

उसने तसल्ली. "Theek—jab तैयार तैयार. धीरे करेंगे."

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मैं भाग गया क्यूंकि जो होने वाला विटनेस नहीं करना था, क्रैक से दौड़, कोर्रिडोर्स से, दिल ज़ोर se—gussa और कुछ

बयां न कर सकू, शायद गहरा दुःख या परिवार टूटने का डर.

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CHAPTER 12

गजेंद्र का व्यवहार मुझे इतना एफेक्ट कर गया की मैंने

अपने सबसे अचे दोस्त जाबिर को भी धोखा दे दिया.

अगली सुबह जाबिर के घर गया, जैसे वादा किया था, दिमाग़ अब भी हॉस्पिटल के मंज़र से घूम रहा था

लेकिन खुद को मजबूर किया जैसे कुछ हुआ hi नहीं, अंदर सब टूटा हुआ महसूस करते हुए भी बहार नार्मल

रहने की कोशिश.

रास्ता रोज़ से लम्बा लगा, हर कदम भरी, मोहल्ले की आदति गलियां धुंधलाती हुई जब

सोच बार बार अम्मी पर lautti—unke होंठ गजेंद्र के, पहले धक्का फिर हार, वह धोखा जो मैं उनके

बारे में मानता था.

जेबों में मुठी बंद की, खुद से कहा मुस्कुराना, हंसना, वही पुराण दोस्त रहना जो जाबिर उम्मीद करता. उसे

अंदर का तूफ़ान नहीं दिखाना; सवाल पूछेगा, और मैं जवाब नहीं दे सकता जो खुद समझ नहीं प् रहा. गहरी

साँसें ली, कंधे पीछे किये, दरवाज़े पर हमारी आदति दो तेज़ी खटखटाहट di—saans सँभालते इंतज़ार किया.

उसने तुरंत दरवाज़ा खोला, मुस्कुराता जैसे दुनिया में सब ठीक, पसंदीदा पुराणी नीली T-shirt और शॉर्ट्स में,

बाल सुबह के गेम से बिगड़े हुए.

"यार, आखिर! इतनी देर kyun—dusre शहर से पैदल आ रहा था?" कहा, तेज़ी से bro-hug में खींचा और पीठ ज़ोर

से थपथपाई जैसे हमेशा एक्ससिटेमेंट में करता. "अंदर आ, खड़ा मत रह. रानी यहाँ है! तुझसे मिलने को

इंतज़ार. रानी, यह वह लड़का है जिसके बारे में bataya—GTA में हमेशा मुझे बचने वाला, खुद लीजेंड!"

उसके पीछे रानी कड़ी थी, और मेरी नज़रें तुरंत उस पर गयी, रोकने से पहले hi. पहली बार देख रहा था जब से

जाबिर ने हफ्ते पहले इंट्रोडस करने का वादा किया था, और वह उससे भी ज़्यादा सुन्दर thi—lambe काले बाल नरम

लहरों में कन्धों पर, बड़ी ज़िंदा आँखें उत्सुकता और थोड़ी शर्म से चमकती, पूरे होंठ गरम

खुशामदीद मुस्कराहट में, परफेक्ट दांत दिखाते.

सिंपल ग्रे शलवार कमीज और ब्राउन स्कार्फ़ पहनी थी, पतली कमर और हलकी कर्व्स को बिना ज़्यादा कोशिश के उभार

रही थी. बिना कोशिश के सुन्दर, नेचुरल ब्यूटी जो बार बार देखने को कहती, और एक पल के लिए दिमाग़ का तूफ़ान

शांत हुआ.

"Hi," वह धीरे बोली, आवाज़ हलकी दोस्ताना, हाथ बढ़ाते हुए सर थोड़ा झुका. "जाबिर तुम्हारे बारे में रुक कर

नहीं bolta—kehta है गेम्स में असली प्रो, हमेशा उससे हार से बचाता. आखिर मिल कर अच्छा लगा."

मैंने हाथ मिलाया, छोटी सी बिजली महसूस हुई, हाथ मुलायम गरम. "मुझे भी अच्छा लगा, रानी," मैंने कहा,

सब के बावजूद सच्ची मुस्कराहट. "जाबिर दिन भर तेरा हाइप कर रहा tha—kehta सबसे कूल इंसान, अब देख कर

समझ आया. तुम... सच में बहुत अच्छी लग रही हो."

जाबिर हंस पड़ा, दरवाज़ा ड्रामेटिक तरीके से बंद किया. "देखा? कहा था स्मूथ होगा. चलो लिविंग room—GTA

बिग स्क्रीन पर लोडेड. रानी प्रैक्टिस कर रही; बिगिनर के लिए अच्छी है. नई होने की वजह से इजी मत जाना, वह

संभल लेगी."

हम बैठ गए, तीनों कासुअल बातों में डूब गए. जाबिर मुझे रानी के बारे में और बताता रहा.

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लिविंग रूम में सेटल हुए, टीवी स्क्रीन गेम के लोडिंग मेनू से चमक रहा, कंट्रोलर्स हाथ में. कमरा कोजी—

जाबिर का रोज़ का सेटअप, दीवारों पर गेम्स के पोस्टर्स, छोटी टेबल पर स्नैक्स (चिप्स, सोडास, कल की बची पिज़्ज़ा), ऊपर

फैन हवा हिलता ठंडा रखता.

रेस शुरू की, क्रॅशेस पर हँसते, जीत पर चीयर, मेरी नज़रें रानी से milti—loading स्क्रीन में वह ऊपर देखती,

नज़र उत्सुक चमक से दिल एक धड़कन मिस; कंट्रोलर लेने झुकती, बाल चेहरे पर गिरते वह शर्मीली मुस्कराहट

से पीछे डालती गाल डिंपल; जीत पर छोटा फिस्ट पंप, आँखें चमकती मेरी से मिलती, चुप "देखा?" जैसे.

यह दिखाता था मैं उसकी तरफ अत्त्रक्ट kaise—hansi नरम सच्ची, अचानक उभरती; मुश्किल टर्न में होंठ काटना

; परफ्यूम की हलकी फूलों की खुशबू जब पास झुकती कंट्रोलर ट्रिक दिखने.

लेकिन मज़ा के नीचे जलन पेट में जैसे चाक़ू. जाबिर के पास रानी थी, सुन्दर, वह उसकी तरफ देखती जैसे वह उसकी

दुनिया का केंद्र. मुझे गर्लफ्रेंड नहीं, कभी नहीं, और उनके मज़ाक़, वह खेल में चीट पर उसका कन्धा धकेलती

देख दर्द तेज़.

क्यों वह? जाबिर से हमेशा दोस्त, सब baant—raaz, गेम्स, khwaab—lekin यह... उसके पास वह, मेरे पास सिर्फ परिवार

के राज़ खा रहे, धोखा बाद धोखा.

बाद में, लम्बी रेसेस मिशंस के बाद, जाबिर उबास लेने लगा, आँखें भारी. "यार, थक gaya—kal रात सख्त थी.

देर तक लेवल्स ग्राइंड," धीरे बोलै, सोफे पर गिरता, कंट्रोलर हाथ से गिरता स्नोरिंग शुरू. "तुम दोनों... बिना मेरे

जारी रखो... सेव मत हारना..."

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रानी धीरे हंस कर मुँह छुपाया. "एक डैम सो गया. गेमिंग के बाद ऐसा hi hota—tez क्रैश. माफ़ी."

फिर हम बात करने लगे, मैं और रानी, टीवी विक्ट्री स्क्रीन पर पैसेड, कमरा शांत सिर्फ जाबिर की धीमी साँसों के

इलावा.

बात आसानी से shuru—college, पसंदीदा मूवीज, जाबिर से फॅमिली इवेंट में कैसे मिली साल पहले. "शुरू में कितना

ावक्वार्ड था," वह प्यार भरी मुस्कराहट से बोली, सोये उस पर नज़र. "फ़ोन गिरता रहता मुझे इम्प्रेस करने गेम

ट्रिक से. लेकिन मीठा hai—hamesha हसाता."

मैंने सर हिलाया, मुस्कुराते. "बिल्कु जाबिर jaise—zyada कोशिश लेकिन कामयाब. खुशनसीब है तुझ जैसे मिली."

वह थोड़ी लाली, नीचे देखती. "शुक्रिया. और तू? कोई गर्लफ्रेंड? जाबिर कहता हमेशा single—games में बेस्ट होने

में बिजी, शायद?"

मैंने कंधे उछाले, ज़बरदस्ती ग्रीन. "अभी कोई नहीं. शायद ज़्यादा पिकय, या सही इंसान नहीं मिला. जानती है न."

दिमाग़ में हॉस्पिटल का अँधेरा उभरा, अम्मी गजेंद्र के साथ, मुझे बुरा बनाने लगा. खुद से बोलै यह साला

दोस्त इतनी सुन्दर लड़की paayi—kyun वह? वह डेसेर्वे नहीं, जब वह रानी जैसे पायी और मैं घर के धोखे झेल रहा.

फैसला किया उसकी चीज़ टास्ते करून; लालच बढ़ा, पेट में घास जैसे.

जाबिर से अब फ़िक्र nahi—dosti तोड़ने को तैयार, अच्छा करने की परवाह नहीं क्यूंकि अम्मी और दादी ने बुरा किया, तो मैं

भी अम्मी के बुरा रास्ते फॉलो करून. गजेंद्र जैसे लालची बन कर जाबिर से चीन लून.

क्यूंकि अम्मी के गजेंद्र से बुरा करने से गुस्सा था, तो जाबिर के साथ wahi—tarazu बराबर, दुनिया जो दर्द दी उस पर

बदला. जाबिर डेसेर्वे nahi—loyal, मेहरबान, हर चीज़ में भाई, हमेशा saath—lekin परिवार के धोखे ने मेरे

टूटे सोच में जस्टिफाई किया. क्यों उसके पास ख़ुशी जब मेरी टूट रही?

मैं रानी को बहार ले गया, इडियट जाबिर को सोफे पर सोते छोड़. "थोड़ी हवा लेते hain—yahaan घुटन है," मैंने कहा,

खड़ा होकर हाथ बढ़ाया.

उसने जाबिर पर देखा, फिर मुस्कुरायी. "Theek—kyun नहीं? वह घंटों नहीं उठेगा. ताज़ी हवा अच्छी लगेगी."

बहार स्त्रीतलीघटः के नीचे धीरे चलते लेन में, बात जारी. वह क्यूट thi—hansi बब्बली सच्ची, आँखें शर्मीली

जब ज़्यादा देखता, लाली मेरे ध्यान से गाल पर, बाल कान पीछे डालती. फ़्लर्ट शुरू किया, तारीफें आसानी से. "तेरी

मुस्कराहट सबसे sundar—poori सड़क रोशन. सच, कंटगीयस."

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वह धीरे हंस कर नीचे देखती. "Ruko—laali चढ़ा रहे. तुम मीठे हो. जाबिर कभी ऐसा नहीं कहता."

मैंने मुस्कुराया. "कहता होना चाहिए. रोज़ सुनने लायक हो."

नहीं पता मुझे क्या hua—ammi के गजेंद्र से गन्दगी देख कर पोस्सेस्सेड महसूस, तो मैंने भी जाबिर के खिलाफ

वही किया. रानी को फ़क करना चाहता; कभी सेक्स नहीं किया, जाबिर ने भी नहीं, रानी ने भी, लेकिन ख्वाहिश आग जैसे.

चलते हुए बात में उसकी गांड देखता raha—achhi गांड, मज़बूत हर कदम में हिलती, और सीना, टॉप के नीचे

पूरा बाउंस.

मैं: [bagal chalte, sur dheemi aasaan, haath jebon mein] अच्छी रात, है न? जाबिर एक डैम सो गया. खुशनसीब—

लम्बी दिन के बाद पथ्थर जैसे सोता. शायद खर्राटे पड़ोसियों को उठा दें.

रानी: [dheemi hansi, sharmili, dupatte ka kinaara theek karte] हाँ… ऐसा hi. लम्बी बात के बाद थक गया. बहार

चलने के लिए शुक्रिया, कभी ताज़ी हवा पसंद. तुम मेहरबान हो.

मैं: [side muskurate, raftaar usse milate dheemi] शुक्रिया की ज़रुरत नहीं. तेरे साथ चलना पसंद. बात करना

आसान. और… उसने बताया से ज़्यादा सुन्दर. स्त्रीतलीघट में आँखें... छोटे तारे जैसे.

रानी: [laali, zameen dekhti] ऐसा मत कहो. ठीक नहीं. जाबिर को पसंद नहीं आएगा.

मैं: [halki chhed] क्यों नहीं? सच है. जाबिर मेरा दोस्त, लेकिन सच बोलेन… मैं बेहतर बॉयफ्रेंड हूँ और अच्छा

बन सकता हूँ, क्यों नहीं जाबिर छोड़ कर मेरे साथ आ जाए.

रानी: [hairaan hansi, muh dupatte se chhupate] बेहतर बॉयफ्रेंड? हेहेहे! तुम be-sharm हो! जाबिर मुझे अच्छा है.

मेहरबान, फिक्रमंद…

मैं: [kandhe uchaale, khelte] अच्छा, हाँ. लेकिन मैं बेहतर. वह मिस करता जो मैं notice—jaise हंसी में

आँखें चमकती, नर्वस में भी ग्रेसफुल चलना. दुपट्टा शर्मा कर ठीक करने का तरीका… क्यूट.

रानी: [sharmili muskurahat, dheemi] फिर छेड़ रहे. रुको.

मैं: [thoda paas, sur neeche] सिर्फ हकीकत. ज़्यादा पाबंद हो मान नहीं सकती, लेकिन सुन्ना पसंद. जब मन करती

हो तब भी मुस्कराहट में दीखता.

रानी: [pal bhar upar dekhti, phir hata] ऐसी बातों की आदत नहीं. अजीब लगता.

मैं: [sur aur neeche] अजीब अच्छा भी हो सकता. Bata—kabhi… जानती हो… किसी के साथ? सच में साथ? वह क़ुरबत

महसूस? जैसे सेक्स.

रानी: [aankhen badi, hairaan, chalna roka] क्या?! नहीं! ऐसा सवाल कैसे? यह... बोलना भी हराम. हमारे दीं में

मन और तुम जानते हो.

मैं: [muskurate] बस उत्सुक. इतनी मासूम. सोचता यह परदह के नीचे क्या. कोई देख नहीं रहा तो ख्वाब में क्या.

रानी: [ghabraayi, tezi chalti] ज़्यादा बोल्ड हो रहे. मैं अच्छी लड़की. ऐसी बातें नहीं करती. और जाबिर… अगर उसे पता

चला तुम क्या कह रहे…

मैं: [raftaar milaate] अगर जाबिर को पता चला मैं क्या कर रहा… गुस्सा होगा? अभी जाबिर की फ़िक्र नहीं. तेरी फ़िक्र.

जब तू सोचती मैं नहीं देख रहा तब कैसे देखती.

रानी: [hairaan] फ़िक्र नहीं? वह तेरा दोस्त! मुझसे दोस्त के तौर पर मिलवाया.

मैं: [shaant, haath baazu par dheere rok] दोस्ती ख़तम जब दोस्त से बेहतर चीज़ मिल जाये. और तू, रानी… बेहतर

है. दोस्ती से ज़्यादा लायक.

रानी: [aankhen badi, haath dheere peeche] ज़्यादा लायक? तू अच्छा दोस्त भी नहीं. ऐसा कैसे कह सकता? जाबिर तुझ पर

भरोसा करता.

मैं: [halki smirk] भरोसे की फ़िक्र नहीं. अच्छे दोस्त सब बांटते, है न? सबसे अच्छी चीज़ क्यों नहीं? जाबिर के पास

तू अब, लेकिन मैं देखता वह डेसेर्वे नहीं. तू जैसे ladki—meethi, सुन्दर, untouched—kisi के साथ जो सच क़द्र करे.

जो हर छोटी डिटेल देखे, जैसे नर्वस में होंठ का चउरवे.

रानी: [hairaan, peeche hat] क़द्र? तू ऐसा बोल रहा जैसे… उससे छीन लेगा!

मैं: [dheemi awaaz] छीन? या शुरू से जो मेरा होना था ले लून. दोस्त आते जाते. तू जैसे औरत… ज़िन्दगी में

एक बार. एक रात के लिए दोस्ती छोड़ दूँ.

रानी: [hairaan hansi, nervous] पागल हो. पूरी be-sharmi. जाबिर भरोसा करता, और तू यह बोल रहा?

मैं: [phir paas] भरोसा कभी अँधा. हम इंट्रोडस किया उसने, है न? शायद अंदर से जानता मैं तुझे बेहतर

ट्रीट करून. वह महसूस कराऊँ जो वह कभी नहीं कर सकता. छुअन जो वह सोचने से डरता.

रानी: [chhoti awaaz, hairaan] महसूस? छुअन? रुको… यह गलत.

मैं: [muskurate] गलत एक्ससिटिंग लगता, है न? दिल तेज़ी से. गर्दन में dikhta—pulse जम्प. पाबन्दी हाँ… लेकिन

अंदर आग. महसूस हो रही.

रानी: [nervous hansi, hairaan] तुम नामुमकिन. वापस चलना चाहिए, जाबिर शायद अब उठ गया, वह ज़्यादा देर नहीं

सोता.

मैं: [dheere] एक मिनट और. बस एक. उस पेड़ तक चल.

उसी वक़्त, कार धीरे गुज़री, और लगा जाबिर की माँ नफीसा व्हील पर, लेकिन पक्का nahi—parchaaiyan धोका दे रही, या मेरी

पैरानोया बढ़ रही.

हम शांत पार्क कार्नर में पेड़ के नीचे रुके, पत्तियों की सरसराहट रात की हवा में. सडके जारी, तारीफें

पहले से स्मूथ. "रानी, पहली बार देख रहा लेकिन स्तुन्निंग— आँखें, हंसी, पूरी मौजूदगी. रुक नहीं सकता देखने.

सुन्दर ऐसे की खींच ले."

वह गहरी लाली, होंठ काट. "सच? जाबिर भी कहता, लेकिन... शुक्रिया. तुम भी चार्मिंग. आज रात उम्मीद नहीं थी."

आईडिया आया गजेंद्र अम्मी पर जो फ़्लर्ट इस्तेमाल किया उसी ko—agar वह पाक वफादार अम्मी को गुनाह में गिरा सका तो

मैं रानी को फ़क कर सकता.

जाबिर से अब फ़िक्र nahi—fuck हिम. उसकी जिस्म की तारीफ़ शुरू कितनी सेक्सी. "तेरी फिगर kamaal—curves सही जगह, इतनी सेक्सी,

परफेक्ट. चलना हिप्नोटिक."

वह हैरान लेकिन सख्त नहीं, नर्वस हंसी. "हे, ऐसा mat—Jabir तेरा दोस्त. लेकिन... शुक्रिया शायद. दिल तेज़ी से

धड़क रहा."

मैं पास झुक कर चूमा. उसने कहा, "Ruko—Jabir का क्या?" धीरे धक्का, हाथ सीने पर थोड़ी देर, ज़ोर से नहीं.

फिर बात. "वह सो raha—sirf बात," मैंने धीरे. "तू सुन्दर; रोक नहीं सकता. तेरे पास कुछ mehsoos—sach."

फिर झुका, आखिर उसने पहला चुम्बन दिया, शुरू में झिझक, होंठ नरम, फिर गहरा जैसे पिघल गयी. मैं

चुम्बन जारी, हाथ कमर पर, गर्माहट महसूस. आखिर उसने मेरा सर पकड़ा और हम दोनों जज़्बाती चुमेय,

जिस्म पास, धीमी सांस.

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दोस्त की गर्लफ्रेंड को चूमते अच्छा laga—Jabir की फ़िक्र नहीं, धोखा बदले में थ्रिल, लेकिन ट्विस्टेड ख़ुशी उसकी चीज़

लेने में.

धीरे कहा, "घर चल कर aur—chupke. तेरे और क़रीब होना चाहता."

घर पहुंचे, इडियट जाबिर सोफे पर सो रहा, हलके खर्राटे, be-khabar. दिमाग़ में उसकी buraai—sust हरामी,

डेसेर्वे नहीं, ज़्यादा भरोसा, फ़क हिम जो मेरे चाहता पाया.

फिर डिम कमरे में चुम्बन शुरू, पास खींचा. उसकी ट्रॉउज़र शलवार उतरने कहा. "तुझे dekhoon—please.

महसूस करना चाहता."

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वह झिझकी लेकिन धीरे उतारी, टॉप और अंडरवियर में शर्मीली कड़ी. हैरान था रानी सलूट जैसे ेअगर, आँखें

डिजायर से मिलती, जिस्म छुअन पर जवाब. अच्छा लगा दोस्त की लड़की फ़क करने जा raha—taaqat नशा, बदला मीठा.

गहरा चुम्बन शुरू, जिस्म पास. हूडि उतरना चाहता, उसने मन क्यूंकि मेरे सीने देख कर ठीक नहीं लगता.

"Rakh—mysterious लगता," धीरे, शर्मीली लेकिन चाहती आवाज़.

मैं: [dheemi awaaz, kandhon par haath] रानी… वह चुम्बन कमाल. और चाहता. तुझे चाहता. पूरी तू. यहाँ,

अभी.

रानी: [mud kar wide eyes, thoda peeche] क्या? नहीं… नहीं कर सकते. वह चुम्बन गलती थी. नहीं होना चाहिए था.

मैं: [phir paas] गलती? ठीक लगा. चलो रानी. तुझसे प्यार करून. तूने भी महसूस kiya—jism कैसे पास दबा.

रानी: [kaamp ti awaaz, seene par halka dhakka] प्यार? नहीं नहीं. मेरी... मेरी छूट सिर्फ जाबिर के लिए. वह मेरा प्यार.

उससे शादी, खुद को उसके लिए बचाना. यह हराम.

मैं: [minnat, kamar par haath] प्लीज, रानी. सिर्फ एक बार. बहुत ज़रुरत. तू पागल कर रही. जाबिर को पता नहीं.

हमारा राज़.

रानी: [mazboot sar hilate] नहीं. मैं ऐसी लड़की नहीं. पहले कभी नहीं किया. सिर्फ शादी के लिए.

मैं: [ghutne thoda tek kar upar dekhte] मिन्नत कर रहा. महसूस कर कितना सख्त करता तू. सिर्फ अंदर... धीरे.

पछताओगी नहीं.

रानी: [deewar peeche, regret] पछतावा? चुम्बन से hi रिग्रेट. रुको. मन कर रही.

मैं: [khada, majboor] ठीक... अगर वहां नहीं, तो... पीछे. तेरी गांड. वहां पाक hai—no ओने तौचेड.

रानी: [hairaan, horror se aankhen badi] पीछे? क्या? नहीं! घिनौना! हराम! कैसे बोल सकता? उन्नातुराल, गुनाह.

सिर्फ जानवर ऐसा करते.

मैं: [tasalli, dheemi] श, सुन. प्यार से तो हराम नहीं. बहुत लोग करते. जाबिर के लिए वर्जिन बची रहेगी. अच्छा

महसूस karaonga—oil, धीरे. पसंद आएगा, वादा.

रानी: [zor se sar hilate] पसंद? दर्द, गन्दगी! दीं में सख्त मन, गांड चुदाई बारे गुनाह. मैं जानवर नहीं.

जाबिर कभी नहीं मांगता.

मैं: [dheere dabav] लेकिन जाबिर यहाँ नहीं, सो रहा. और कोनसेन्सुअल तो गुनाह नहीं. Soch—qurbat महसूस बिना

पाकि खोने. फ़िक्र करता हूँ, रानी. दिखा दूँ.

रानी: [awaaz upar, ghabrahat] नहीं! रुको नहीं तो चिल्लाऊंगी! जाबिर उठ जाएगा, सबको पता! और चची नफीसा जल्दी

आ सकती.

मैं: [jaldi, haath upar] श, मत चिल्ला. फाॅर्स नहीं. Soch—Jabir सोया, अकेला. तेज़, धीरे. कोई नुक्सान नहीं.

चुम्बन अच्छा लगा... यह और बेहतर. भरोसा.

रानी: [jhijhak, saansen tez] भरोसा? यह पागलपन... डर लग रहा. गलत.

मैं: [dheere, paas] डर ठीक. दर्द हुआ तो रुक जाऊंगा. लेकिन थ्रिल soch—sirf हमारा. तू इतनी सुन्दर, रानी. ख़ास

महसूस कराऊँ.

रानी: [lambi ruk, phir dheere minnat] पक्का नहीं... लेकिन... ठीक... सिर्फ एक बार. और धीरे. दर्द हुआ तो रुक.

मैं: [narmi muskurahat] वादा. पछताओगी नहीं.

फिर उसको पकड़ा मुदाय, वह दीवार से टिक गयी, हाथ सपोर्ट के लिए दीवार पर, पीठ मेरी तरफ. खुशबू

achhi—vanilla और फूल, स्किन गरम मुलायम. अनल हेसितांतली क़ुबूल. "पक्का नहीं... जाबिर से धोखा जैसे. कभी

नहीं किया."

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मैंने कहा अनल धोखा नहीं. "अलग hai—dusre तरीके से काउंट नहीं. सिर्फ एक्स्प्लोर, किसी को पता नहीं. भरोसा."

ज़बान उसकी गांड पर राखी, लीक shuru—pehli बार लड़की की गांड चाटना, नमकीन निजी मज़ा, जिस्म पहले सख्त फिर

ढीला, वह धीमी मोअन, "ाःह... सावधान... ऊऊऊह्ह..."

टेबल पर जाबिर का हेयर जेल देखा, लिया. "यह काम karega—ter स्किन जैसे स्लिक," गन्दा बोलै.

उसने कहा ऐसे मत बोल. "धीरे प्लीज. मेरे लिए नया."

जेल गांड पर लगाया, ठंडा स्लिपरी. उसकी गांड टाइट, छोटी शुरू में रुकावट.

ऊँगली से लूसे किया, धीरे अंदर, जिस्म सख्त फिर ढीला. मोअन शुरू, "ाःह... ऊऊऊह्ह... धीरे... ाःह... ऐसे..."

फिर तैयार होने कहा. "Chalo—thoda ज़्यादा फ़ैल."

वह झिझकी. "Ruko—dheere... थोड़ा दर्द... ऊऊऊह्ह..."

अंदर पुश, रुकावट टूटी. सर अंदर, टाइट गरम. उसने निकालने चिल्लाया. "Nikaal—zyada! ाःह... रुक!"

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दिमाग़ में बुरा नाम, धीरे "ले, सलूट." मुझे लगता नहीं ज़ालिम, ताक़त दौड़ रही.

और अंदर, पूरा, गर्माहट घेरती. उसकी गांड गरम, टाइट पकड़.

बात जारी गाइड करते: "ज़्यादा fail—gehra जाने दे. थोड़ा पीछे push—haan, ऐसे."

वह मोअन. "ऊऊऊह्ह... ठीक... ाःह... ऐसे? फुल महसूस..."

"Haan—perfect. अच्छा कर रही. Relax—achha महसूस होने दे."

जल्दी से दोस्त की गर्लफ्रेंड की गांड छोड़ा, स्टेडी थ्रस्ट, जिस्म दीवार से टकराता.

वह ज़ोर मोअन, "ाःह... ऊऊऊह्ह... तेज़ी... प्लीज... ाःह..."

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वह जल्दी ख़तम मांग, "Please—jaldi ख़तम... जाबिर उठ सकता... ऊऊऊह्ह... जल्दी..."

तो तेज़ी छोड़ा ताकि जाबिर न उठे क्यूंकि वह आवाज़ कर रही, पेस तेज़, स्किन की थप धीमी गूँज.

आखिर कहा दूध गांड में दाल रहा. "आ raha—andar."

उसने मन किया लेकिन मैं पूरा भर दिया, रिलीज़ तेज़ गरम.

वह ज़ोर मोअन, "ाःह... ऊऊऊह्ह... तेज़ी... प्लीज... ाःह..."

वह जल्दी ख़तम मांग, "Please—jaldi ख़तम... जाबिर उठ सकता... ऊऊऊह्ह... जल्दी..."

तो तेज़ी छोड़ा ताकि जाबिर न उठे क्यूंकि वह आवाज़ कर रही, पेस तेज़, स्किन की थप धीमी गूँज.

आखिर कहा दूध गांड में दाल रहा. "आ raha—andar."

उसने मन किया लेकिन मैं पूरा भर दिया, रिलीज़ तेज़ गरम.

उसकी गांड mein—tightness मुझे पकड़, गर्माहट हर इंच घेरती, मन थ्रिल ओवरव्हेल्मिंग, लेकिन सबसे बुरा हुआ:

किसी ने उसका नाम पुकारा. आगे देखा तो जाबिर खड़ा हैरान, आँखें बड़ी.

रानी ने हाथ मुँह पर हॉरर से, सांस अटक. मेरा डिक अब भी उसकी गांड mein—main सच में हैरान, जैम गया.

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CHAPTER 12

मुझे लगता है मेरी माँ किसी चीज़ से पोस्सेस्सेड हो गयी है,

वह बहुत अजीब बेहवे कर रही है.

"J-Jabir?" रानी हकलाते हुए बोली, उसकी आवाज़ उस स्तनद ख़ामोशी को तोड़ रही थी. वह पीछे

हटने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मैं अभी भी उसकी गांड के अंदर था, और अचानक

मूवमेंट से चीज़ें और भी ावक्वार्ड हो गयी.

जाबिर का चेहरा बिलकुल क्रोम्पले हो गया,

आँखों में आंसू भर आये, दोनों हाथों से सर पकड़ लिया, उँगलियाँ स्कैल्प में धंस

रही थी जैसे वह उस इमेज को दिमाग से मिटा देना चाहता हो. "No… no, यह नहीं हो सकता,"

वह मटर किया, आवाज़ सबस से चोकड़.

वह एक कदम पीछे लड़ा, सर zor-zor से हिलाते हुए. "कैसे कर सकते हो तुम? दोनों… मेरा

दोस्त… मेरी रानी…" शब्द दिल टूटने वाली व्हिस्पर में निकल रहे थे, फिर वह मुद गया और

वेयरहाउस से बहार भगा जैसे कोई भूत सवार हो, उसकी चीखें रात में गूँज रही थी

— "उह नू, क्यों? मेरे साथ क्यों?" — अंधेरी गली में दौड़ते हुए चीखें बदलती जा

रही थी.

रानी तुरंत पैनिक हो गयी. एक तेज़ चीख के साथ उसने मुझे पीछे धकेला, मेरे डिक को

उसकी गांड से बहार निकाला — एक गीली, पोप्पिंग आवाज़ आयी जिसने मेरा पेट मरोड़ दिया. वह

घूम गयी, आँखें हॉरर से वाइल्ड, हाथ जल्दी से खुद को कवर करने लगे और स्कर्ट नीचे

खींच ली. "ओह गॉड, नहीं! जाबिर ने हमें देख लिया! हमने क्या कर दिया?" वह चिल्लाई,

आवाज़ काँप रही थी.

वह छोटे सर्किल में पेस करने लगी, सांसें ह्य्पेर्बेंटिलटिंग बर्स्टस में आ रही थी,

गालों पे आंसू बह रहे थे. "वह मुझसे हमेशा के लिए नफरत करेगा! मैं… यकीन नहीं

कर सकती की यह हो गया. मैंने तुम्हे क्यों जाने दिया? यह सब तेरी गलती है!" उसने इलज़ाम

भरी ऊँगली मुझ पर दिखाई, लेकिन गुस्सा जल्दी डेस्पेयर में बदल गया, बॉडी कांपते हुए वह

करते के सहारे गिर पड़ी और futo-futkar रोने लगी.

में (आवाज़ टूट रही, आंसू बह रहे, दुपट्टा पकडे बिस्तर पर बैठी): ज़ैद… जाबिर ने हमें

देख लिया. उसने तुझे मेरी गांड के अंदर देखा. वह बस… टूट गया. छोटे बच्चे की तरह

रोने लगा और दरवाज़े से भाग गया. मैं इस ज़िन्दगी के साथ कैसे जियूँगी? मैं कभी उसकी

आँखों में कैसे देख पाऊँगी?

में: रानी, पैनिक मत कर. वह स्टुपिड जाबिर वह चीज़ नहीं जिसकी तुझे फ़िक्र करनी चाहिए. अभी

वह अपसेट है, लेकिन ठंडा हो जायेगा. जब वह वापस आएगा हम उससे बात कर लेंगे.

रानी (सर हिलाते हुए, तबाह होकर): बात? क्या लगता है शब्दों से यह ठीक हो जायेगा? तू उसका

बेस्ट फ्रेंड था — उसका भाई! और तूने मुझे सडके किया, यहीं छोड़ा जब वह कुछ इंच दूर

सो रहा था. तू ाचा दोस्त नहीं है ज़ैद. तू गद्दार है. और मैं… मैंने तुझे जाने दिया.

मुझसे नफरत है की मैं मोअन कर रही थी, चाहती थी… लेकिन तूने मुझे एज के पार धकेल

दिया.

में: तू भी उतना hi चाहती थी. अब इनोसेंट विक्टिम मत बन. तू पीछे पुश कर रही थी, हर इंच

अंदर ले रही थी. मेरा नाम लेके मोअन कर रही थी. तूने भी जाबिर के साथ धोका किया, उसने

तुझ पर भरोसा किया था.

रानी (आवाज़ पहात रही): इससे यह सही नहीं हो जाता! मैं अंदर से tukde-tukde हो रही हूँ. मेरा

दिल जाबिर के लिए चीख रहा है, लेकिन मेरा बॉडी… उह no! अभी भी तुझे फील कर रहा है.

मैं बहुत शर्मिंदा हूँ.

में: शर्मिंदा? तो शायद तुझे मुझे इतनी गहरी अपनी गांड में नहीं जाने देना चाहिए था.

मैं वहां खड़ा था, स्तनद, पंत अभी भी अंकलेस पर, खुद को एक्सपोज्ड और फुलिश फील कर

रहा था. नीचे देखा तो नोटिस किया — उसके थोड़ी सी पूप पार्टिकल्स मेरे डिक पे चिपकी हुई,

पूरी लेंथ पर समयरेड, थीं ब्रोनिश रेसिडुए से कवर.

यह नज़ारा देखकर थोड़ा गैग आया; यह एक सख्त याद दिला रहा था की यह एक्ट कितना रॉ और

गन्दा था, मैंने गेंटलेनेस्स का वादा किया था फिर भी उसकी गांड में सहित था. आयल उसके पॉटी

के साथ मिक्स होकर स्टिकी मेस बन गया था जो हलकी लाइट में चमक रहा था.

में: वैसे तो… देख, छोटा सरप्राइज. तूने मेरे डिक पर थोड़ा सहित कर दिया. इतना मेस एक्सपेक्ट

नहीं किया था.

रानी (चेहरा तुरंत लाल, हाथ मुँह पर, मोर्टिफिएड): एव्व, यह… यह घिनोना है! ऐसे ज़ोर से

मत बोल! मैंने तुझे वारं किया था ज़ैद! मैंने बोलै था मेरा बैखोले इसके लिए नहीं — बोलै

था केयरफुल रहना, ज़्यादा आयल लगा, स्लो जा… मैंने गिड़गिड़ाइ थी! लेकिन तूने इग्नोर कर दिया,

जानवर की तरह थ्रस्ट करता रहा. अब मैं यहाँ बैठी फिल्थी फील कर रही हूँ.

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में: फिल्थी तो सही बोलै. सिर्फ थोड़ा मेस नहीं, बदबू भी बहुत तेज़ थी. तेरा पूप स्मेल ने

तुरंत मेरी नाक पे अटैक कर दिया. लिखे दमन रानी… तेरी गांड ने मेरे ऊपर पूरा लेट लूसे

कर दिया.

रानी (आवाज़ में शर्म और गुस्सा, ताज़ा आंसू): बस कर! ऐसे शेम मत कर मुझे! क्या तुझे

मज़ा आ रहा? क्या मेरी गलती है की तूने मेरी बात नहीं सुनी और गांड में ज़बरदस्ती घुसा?

मैं पहले hi ऐम्बर्रास्मेंट से मर रही हूँ, और अब तू मेरे मुँह पे रगड़ रहा है —

लिटेराल्ल्य! मैं खुद से इतनी गन्दी फील कर रही हूँ और तू स्मेल का ज़िक्र करके मुझे डर्टी

एनिमल जैसा बता रहा है!

में (ठन्डे स्माइल के साथ): शायद यही है तू. एक गन्दी छोटी मुस्लिम सलूट जो अपनी गांड

कण्ट्रोल नहीं कर सकती और मेरे डिक पे सहित कर देती है. पूरा टाइम व्होरे की तरह मोअन

करती रही, और ख़तम होने पर मुझपे सहित कर दिया. बहुत क्लासी.

रानी (तेज़ कड़ी हुई, टाँगे काँप रही, आंसुओं के बीच आँखें जल रही): फिर कभी मुझे

ऐसा मत बोलना! तूने शुरू किया — तूने मुझे सडके किया, उसे किया, जाबिर के साथ धोका

किया! यहाँ सलूट मैं नहीं — तू मॉन्स्टर है. मैं तेरे साथ इस रूम में एक सेकंड भी नहीं

रह सकती. मुझे उसको ढूंढ़ना है… उससे माफ़ी मांगनी है, चाहे वह कभी माफ़ न करे.

तू कभी मुझसे या जाबिर से बात मत करना!

हम दोनों ने फ्लोर पर जाबिर की शर्ट देखि — शायद पहले हमें ढूंढ़ने आया था तो उतार

के छोड़ गया. पैनिक में वह एकमात्र चीज़ थी जो हैंडी थी. रानी ने पहले पकड़ा, बंच

करके अपनी अनुस पे zor-zor से पोछने लगी, चेहरा शर्म से जल रहा था. "मैं यकीन नहीं

कर सकती की मैं उसकी शर्ट से यह कर रही हूँ," वह दांत पीसते हुए मटर किया. हो गया तो

बिना बोले मुझे फ़ेंक दी.

मैंने ली, ग्रिम्स करते हुए, और रानी के सहित को अपने डिक से पोछा. कपडा मेस तो शोएक कर

लिया लेकिन हल्का स्टाइन और लिंगरिंग बदबू छोड़ गया जो पेट मरोड़ रही थी. यह अल्टीमेट

डेसक्रातिओं लग रहा था — दोस्त की शर्ट से उसके धोके का सबूत साफ़ करना.

रानी ने एक और शब्द नहीं बोलै. कपडे जितना हो सका ठीक किये, हाथ काँप रहे थे, फिर वह

भागी, वेयरहाउस से दूसरी डायरेक्शन में दौड़ पड़ी. उसके कदम थोड़ी देर गूंजे फिर रात

में गायब, मुझे अकेला छोड़कर मेरे किये के बोझ के साथ.

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मैंने dheere-dheere पंत ऊपर चढ़ाई, जिपर की आवाज़ खली स्पेस में उन्नातुरालय लाउड लगी.

वेयरहाउस से दूर जाते हुए ठंडी रात की हवा चेहरे पे स्लैप मारी, लेकिन दिमाग का फोग क्लियर

नहीं हुआ. मैंने जाबिर के साथ दोस्ती बर्बाद कर दी — कम्प्लीटली, इररेपरबलय.

हम बचपन से भाई जैसे थे, सीक्रेट्स, ड्रीम्स शेयर करते थे, और अब… यह. उसका आंसुओं

भरा चेहरा मुझे हौंट कर रहा था, गट में नाइफ घूमता हुआ. मैं उसके सामने कैसे

जाऊँगा? वह कभी माफ़ करेगा? शायद नहीं. और रानी… वह भी मुझे ब्लामे करेगी, कट ऑफ

कर देगी. मैं डेसेर्वे करता हूँ.

लेकिन मुझे परवाह नहीं, मुझे उसकी गांड की विर्जिनिटी लेने में मज़ा आया.

लेकिन dheeme-dheeme अँधेरी सड़कों पे चलते हुए, मम्मी शाहिदा का गजेंद्र को किश करते

हुए याद वापस आया, फ्रेश पैन का वेव लाते हुए. उसी दिन हॉस्पिटल स्टोररूम में देखा था

— उसके लिप्स उसके अगेंस्ट, हाथ चेस्ट पे, जब पापा हुसैन वार्ड में नीचे सो रहे थे.

क्यों? क्यूंकि गजेंद्र ने मेडिकल बिल्स में मदद की, स्ट्रिंग्स पुल्ल करके पापा को ट्रीटमेंट

दिलवाया? या उसने पापा के कपडे के दूकान को ग्रीद्य लैंडलॉर्ड से बचाया?

गजेंद्र के पास इन्फ्लुएंस था, लेकिन क्या यह उसके धोके को जस्टिफाई करता है? मुझे नहीं पता

वहां क्या कर रहे थे — किसिंग, या ज़्यादा? यह अनसर्टेनिटी मुझे खा रही थी, चेस्ट दर्द कर

रही थी. मम्मी हमेशा फॅमिली की पिलर रही, देवौत और फैथ्फुल. या मैंने सोचा था.

मेरी ज़िन्दगी में क्या हो रहा है? सब कुछ थ्रेड बी थ्रेड ुनरवेल हो रहा था. पहले मेरी

रंडी दादी ज़ैनब सूरज के साथ, फिर मम्मी गजेंद्र के साथ, और अब यह Jabir-Rani का

मेस.

जैसे दुनिया अपने एक्सिस पे टिल्ट हो गयी हो और सिर्फ मैं चाओस देख रहा हूँ. साईडवॉक पे एक

कंकर मारा, गटर में जाते हुए देखा. रात के 11 बजे सड़कें शांत, दूर कहीं कार

हॉर्न, चाँद ने पीला ग्लो डाला. नैरोबी की रात की हवा ह्यूमिड थी, स्किन पे चिपकती हुई जैसे

बुरा सपना जो नहीं जा रहा.

मॉडेस्ट हाउसेस की लाइन से गुज़रते हुए, कुछ नज़र आया — एक फिगर डोरस्टेप पे खड़ा, जो

पहचान का नहीं था. मैं स्लो हुआ, हलकी रौशनी में आँखें सिकोड़ी. यह थी आउंट नफीसा,

जाबिर की मम्मी, एक घर के दरवाज़े के फ्रेम पे कड़ी जो डेफिनिटेली उसका नहीं था.

सिल्की ब्राउन ड्रेस पहनी थी, लेपर्ड स्कार्फ़ थोड़ा टेढ़ा, और वह… किसी को किश कर रही थी. कोई

और नहीं — हमारे ट्यूशन टीचर मर. रवि, वह 54 साल का बैल्डिंग आदमी, मोती चश्मा और

हमेशा फ्रौं वाला. उसके हाथ उसकी कमर पे, खींच रहा था, लिप्स पैशनेट एम्ब्रॉस

में लॉक्ड, जिससे मेरा पेट मरोड़ गया.

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यकीन नहीं हुआ. दूर से देखता रहा. आँखें रगड़ी, सोचा रात के स्ट्रेस से हल्लुकिनाशन है,

लेकिन नहीं — वह वहां थे, एक दुसरे में खोये हुए. वह यह क्यों करेगी? आउंट नफीसा के

हस्बैंड अंकल करीम दुबई में काम करते हैं, हर महीने पैसे भेजते हैं फॅमिली के लिए

अच्छा आदमी, फैथ्फुल जैसा मैं जानता था.

और यहाँ वह मर. रवि के साथ धोका दे रही थी, सबसे बुरा चॉइस. किश गहरा हुआ; उसने सर

टेढ़ा किया, उँगलियाँ उसके बालों में, और वह कुछ सॉफ्ट मर्मर किया जिसपे वह हसी — एक

आवाज़ जो रात के सीरियसनेस में बिलकुल आउट ऑफ़ प्लेस थी.

मैं सोचने लगा यह सब मेरे साथ क्यों हो रहा है, क्यों मैं पहले स्टम्ब्ले करता हूँ.

दादी ज़ैनब सूरज के साथ (वह बेवक़ूफ़ मीट शॉप वाला), मम्मी गजेंद्र के साथ

(***** पडोसी), और अब आउंट नफीसा मर. रवि के साथ (***** ट्यूशन टीचर). जैसे श्राप हो —

मैं अपनी दुनिया के बिखरते हुए देख रहा हूँ. सबसे बुरा? सब अपने मज़हब के बहार वाले

मर्दों के साथ चीटिंग कर रहे थे.

., में यह सबसे बड़ा धोका है, गुनाह जो सिर्फ जिस्म नहीं रूह को भी मैला करता है. जीना

पहले hi हराम, ऊपर से मज़हब चेंज कर चीटिंग? जैसे अपने ईमान पे थूकना. वह क्यों

नहीं फॉलो कर पाए?

दादी ज़ैनब जो हमें पीएटी की कहानिया सुनती थी, मम्मी जो 5 वक़्त ,,., पढ़ती थी, आउंट

नफीसा जो रमदान में कम्युनिटी इफ्तार ओर्गनइजे करती थी. मैं समझ नहीं प् रहा. कमज़ोर

थे? शैतान ने लालच दिया? या ईमान हमेशा से नकली था?

वह किश जारी रखे, दुनिया से be-khabar, बॉडी उसके अगेंस्ट जैसे घंटो से वहां हो. और

शायद थी — अंकल करीम बहार, जाबिर शायद घर पे दिल टूटा हुआ, मर. रवि की बीवी गाओं गयी

पेरेंट्स से मिलने, घर खली.

वहां वह इतने टाइम क्या कर रहे थे? बात? ज़्यादा तो ज़रूर — इंटिमेट चीज़ें, गुनाह

बढ़ते जा रहे जैसे अनपेड डेब्ट. यह सोचकर मैं काँप उठा.

फिर से जाबिर के लिए बहुत बुरा लगा. पहले मैंने उसकी गर्लफ्रेंड की गांड मारी थी, सबसे

इंटिमेट तरीके से उसके साथ धोका किया, और अब उसकी माँ भी चीटिंग कर रही थी. जैसे

यूनिवर्स उसपे और इंदिरेक्ट्ली मुझपे बोझ दाल रहा हो. हम सब गुनाह जमा कर रहे थे,

लेयर अपॉन लेयर, और मैं सोच रहा था की रिडेम्पशन पॉसिबल भी है क्या.

किश करने के बाद आउंट नफीसा चली गयी, मर. रवि से कुछ बोलै, फिर दूर चली गयी. उसकी

गांड सच में बहुत सेक्सी थी, मर. रवि उसकी गांड को देखता रहा जब वह चल रही थी.

वह एक लास्कीवीओस आदमी था.

मैं मुद गया, मेरे पेअर ऑटोपिलोट पे घर की तरफ ले जा रहे थे. वाक एंडलेस लग रही

थी, दिमाग इमेजेज और सवालों का तूफ़ान था. जब मैं अपने मॉडेस्ट कंपाउंड पहुंचा,

फ़ोन पे क्लॉक 11:15 पं दिखा रहा था. घर अँधेरा था, सिर्फ लिविंग रूम की विंडो

में हलकी रौशनी.

कुछ ने मुझे कौटिओउस रहने को कहा — जैसे रात अभी ख़तम नहीं हुई थी रेवेलेशन्स से.

मैं सेक्रेटली एप्रोच किया, फेंस के साथ शादौस में चिपकता हुआ, क्रीकी गेट अवॉयड

करके. साइड से गया और पार्टिकल्ल्य ओपन कर्टेन से झाँका.

वहां थी मम्मी शाहिदा, अभी हॉस्पिटल से आयी हुई. वह थकी हुई लग रही थी, आबय

कन्धों पे लूसेली डाली हुई, चेहरा ड्रान और पीला. मुझे हैरत हुई — हम दोनों ऑलमोस्ट

शामे टाइम घर पहुंचे, वह हॉस्पिटल वार्ड से जहाँ पापा सो रहे थे, मैं अपने

दिशास्त्रॉस एनकाउंटर से. वह वॉर्न सोफे पे बैठ गयी, सर हाथों में लिए, क्लेअर्ल्य स्ट्रेस्ड.

क्यों? पापा की बीमारी ट्रीटमेंट्स के बावजूद लिंगरिंग थी जो गजेंद्र ने अर्रंगे करवाए

थे. लेकिन उससे ज़्यादा, मुझे शक था की यह गिल्ट था जो स्टोररूम में गजेंद्र के साथ

जो भी हुआ उसका. जो किश मैंने देखा — या उससे ज़्यादा? उसकी शोल्डर्स डीप सिघ के साथ उठी,

आँखें दूर, खोया हुआ.

मैंने डीडे किया अंदर जॉन, दूर धीरे से खोला. "अस्सलामु अलैकुम, मम्मी," मैंने कहा,

नार्मल साउंड करने की कोशिश में, लेकिन आवाज़ थोड़ी क्रैक हो गयी. "व अलैकुम अस्सलाम,

बीटा," उन्होंने जवाब दिया, फोर्स्ड स्माइल जो आँखों तक नहीं पहुंचा. वह सीढ़ी हुई, वैल

स्मूथ किया. "तू लेट आया है. कहाँ था?"

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"बस दोस्तों के साथ बहार," मैंने स्मूथली झूठ बोलै, अपने मेस में नहीं जाना चाहता

था. उनके सामने बैठ गया, उनके चेहरे पे वोर्री की लाइन्स नोटिस की. "पापा कैसे हैं? कुछ

बेहतर?" वह धीरे से सर हिलायी, नज़र idhar-udhar. "अल्हम्दुलिल्लाह, स्टेबल हैं. डॉक्टर्स

बोल रहे हैं नई मेडिकेशन हेल्प कर रही है, थैंक्स तो… वेल, जो हेल्प मिली. तू को क्या स्मेल

आ रहा है? हलकी सी पूप की बदबू?"

थोड़ी देर ख़ामोशी, ुणस्पोकेन वर्ड्स से भरी. मुझे पता था यह रानी के पूप की स्मेल थी

जो अभी भी मेरे हाथों पे थी, मैंने पहले हाथ अचे से नहीं धोये थे जब मैं अपना

डिक पकड़ रहा था जो रानी के सहित से कोटेड था.

"उठ… उह no no, शायद वह कबूतर हैं जो उस पेड़ के पास doo-doo करते हैं," मैंने बोलै,

हाथ पॉकेट में दाल कर उनकी नज़रों से बचने के लिए. "लेकिन मम्मी आप थकी हुई लग

रही हो. रेस्ट कर लो?" "जल्दी कर लुंगी," उन्होंने मर्मर किया. "तेरा इवनिंग कैसा था? तू…

थोड़ा ऑफ लग रहा है."

मैंने शोल्डर शृंग किया. "बस उसुअल. कुछ ख़ास नहीं." हम थोड़ी देर खामोश बैठ गए,

हवा ुंसाईड चीज़ों से थिक. मैंने नहीं पुछा वह इतनी डीप थॉट में क्यों थी — मुझे

पता था, या काम से काम शक था.

गजेंद्र के साथ किश, सीक्रेसी. यह हमारे बीच पर्दा

जैसे लटका था. आखिर मैं खड़ा हुआ. "मैं अपने रूम जा रहा हूँ. गूडनिघत, मम्मी."

"गूडनिघत, बीटा. अच्छे से सो." उनकी आवाज़ सॉफ्ट थी, ऑलमोस्ट विस्फुल.

लेकिन मैं अपने रूम नहीं गया. बल्कि हॉलवे के शादौस में स्लिप हो गया, किचन एरिया के

half-open दूर के पीछे छुप गया, क्यूरोसिटी — या डर — मुझे वहां रोक रहा था.

मम्मी ने टेबल पे गिलास से पानी पिया, मूवमेंट्स मैकेनिकल, जैसे ऑटोपिलोट पे. फिर एक

आवाज़ — सॉफ्ट, वेट स्मैकिंग नॉइज़, जैसे लिप्स मिल रहे हों — किचन से आयी. किसिंग नोइसेस,

उन्मीलताकाबले. मेरा दिल तेज़ धड़का. मम्मी ने भी सुना; सर स्नेप किया, आँखें नैरो. गिलास

करेफुल्ली रखा और धीरे से किचन की तरफ चली, स्टेप्स कौटिओउस, जैसे वाइल्ड एनिमल के पास

जा रही हो.

किचन दूर कर्टेन से पार्टिकल्ल्य हिडन था, थोड़ा सा व्यू दे रहा था. मेरे वांटेगे से पूरा

नहीं दिखा, तो मैं बैक एंट्रेंस से गया (जो यार्ड से आता है), और मेष स्क्रीन से अंदर

झाँका. जो देखा उसने मुझे कोर तक शॉक कर दिया: सूरज और दादी ज़ैनब, एम्ब्रॉस में

लॉक्ड, पैशनेट किसिंग डिम लाइट ऑफ़ सिंगल बल्ब के नीचे.

सूरज के हाथ उसकी बड़ी गांड पे रोअम कर रहे थे, उसे क्लोज खींच रहे, जबकि दादी के

फिंगर्स उसके सर को पकडे थे, आँखें क्लोज्ड, ब्लिस में लग रही थी. दादा ाड़जसेन्ट रूम

में सो रहे थे, ओब्लिवियस, उनकी खर्राटें हलकी सुनाई दे रही थी.

माँ और मैं आने से पहले क्या हुआ था? दादी ज़ैनब और सूरज काफी टाइम से कर रहे होंगे —

शायद सूरज डिनर के बाद स्नीक इन हुआ, दादा के अर्ली बेडटाइम का फायदा उठा कर. शायद

चाय पि, लास्ट वीक के ब्लोजॉब के बारे में बात की, और फिर… चीज़ें एस्कलटे हो गयी.

किस्सेस हीटिड, हाथ वन्डरिंग, गुनाह घर के दिल में किये गए.

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मम्मी भी देख रही थी, अपनी साइड से, हाथ मुँह पे शॉक में. मैं उनका प्रोफाइल देख सकता

था — आँखें वाइड, चेहरा पीला जब उन्हें एहसास हुआ की उनकी अपनी माँ किसी और मर्द को किश

कर रही है. उन्हें कैसा लगा होगा? बेटरएड शायद, लेकिन साथ hi डॉनिंग रेअलिज़तिओन: उनका

खुद का बाद बिहेवियर, गजेंद्र के साथ िल्लीकित किश, अपनी माँ से शुरू हुआ. दादी ज़ैनब ने

एक्साम्प्ले सेट किया था, क्नोविन्ग्ली या ूँकनेविंग्ली. अगर एल्डर इतना दूर पथ से भटक सकती है,

तो बेटी के लिए क्या उम्मीद?

मम्मी हमेशा दादी को िडोलीज़े करती थी, स्ट्रेंथ का ेपिटोमे, 5 वक़्त ,,.,. लेकिन अब यह —

दादा के साथ चीटिंग सूरज से, जो हमारे मज़हब के बहार का आदमी था. यह सब कुछ

एक्सप्लेन करता था: मम्मी की वल्नेरेबिलिटी, गजेंद्र के साथ स्लिप. एप्पल ट्री से दूर नहीं

गिरता, जैसे कहते हैं.

दादी की हिडन देसिरेस ट्रिकल डाउन होकर फॅमिली के वेल को पाइजन कर रही थी. मम्मी वहां

फ्रोजेन कड़ी थी, ह्य्पोक्रिसी प्रोसेस कर रही — वह औरत जो पीएटी पे लेक्चर देती थी अब हराम

में ेन्तंगलेड.

अंदर, दादी थोड़ा पीछे हटी, सांस भरी. "सूरज, अब तुम्हे जाना चाहिए," उन्होंने ुरगेंटली

व्हिस्पर किया, दरवाज़े की तरफ देखते हुए. "कहीं किसी को पता चल गया तो. यह… यह ऐसे

कंटिन्यू नहीं हो सकता."

सूरज मुस्कुराया, आँखें मिस्चियवौसल्य चमकती हुई. "लेकिन ज़ैनब

जी, हम केयरफुल रहे हैं. बस एक और किश? तुम जानती हो मुझे तुम्हारा टच कितना चरावे है.

यह स्टोलेन मोमेंट्स hi मुझे ज़िंदा रखते हैं."

उन्होंने सर हिलाया, लेकिन रेसोल्वे वीक लग रहा था. "नहीं, बहुत रिस्की है. मेरा हस्बैंड सो

रहा है, लेकिन अगर मेरी बेटी घर आ गयी? या मेरा पोता? हम फाटे को टेम्प्ट नहीं कर सकते.

यह गलत है सूरज — हर तरीके से हराम.

तुम मुस्सलमान भी नहीं हो; लोग क्या कहेंगे?"

उसने उनका चेहरा जेंटली पकड़ा. "प्यार मज़हब की परवाह नहीं करता, ज़ैनब. हमने इन पास्ट

मोनथस इतना शेयर किया — लाइफ की बातें, तुम्हारी लोनेलिनेस्स हस्बैंड के साथ. मैं तुम्हे

फिर से अलाइव फील करवाता हूँ. इंकार मत करो."

उन्होंने सिघ किया, आँखें सॉफ्ट. "मुझे पता है, लेकिन गिल्ट मुझे खा रही है. मैंने अपने

फॅमिली को दीं स्ट्रिक्टली फॉलो करने के लिए पला, और यहाँ मैं… सब कुछ बेतरय कर रही

हूँ. जाओ प्लीज. कल बात करेंगे."

"बस एक लास्ट एम्ब्रॉस," उसने इंसिस्ट किया, उसे फिर से डीप किश के लिए खींच लिया. उन्होंने एक

सेकंड रेसिस्ट किया, फिर मेल्ट हो गयी. मम्मी ने यह एक्सचेंज सुना, सिलेंटली पीछे हटी,

चेहरा तुर्मोइल का मास्क. वह अपने बैडरूम में स्लिप हो गयी, दूर सोफ़्त्ल्य बंद किया, शायद

शॉक प्रोसेस करने के लिए अकेली.

बाद में मैं हिडिंग स्पॉट से निकला, दिमाग रीलिंग. सिटींग रूम में गया जहाँ मम्मी अब

अकेली सोफे पे बैठी थी, सिल्क पिंक निघ्टड्रेस में, फ़ोन हाथ में, फुरियस्ली टेस्टिंग. उनकी

ब्रो फुररोवेद, लिप्स पुरसेद इन फ्रौं — मुझे पता था गजेंद्र था. कौन और? वह खुद से

लौ मर्मर कर रही थी, इतना लौ की मुझे सुनने के लिए स्ट्रेन करना पड़ा:

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वह बहुत सोच रही थी, आँखें दूर, फिंगर्स स्क्रीन पे होवर करते हुए. चोइसस पोंदर

कर रही थी — स्टोररूम का किश, कैसे एस्कलटे हुआ. रिग्रेट? या गिल्ट के साथ थ्रिल? उन्होंने

खुद से व्हिस्पर में बोलै:

"हे भगवन, मुझे माफ़ कर… मेरा मुँह अभी भी गजेंद्र के

हराम लुंड की बदबू से भरा है.

वह मोटा, वेइन्स वाला ***** शाफ़्ट ने मेरे लिप्स को वाइड

स्ट्रेच किया, थ्रोट भर दिया जब तक मैं गैग की, और मैंने हर फिल्थी सेकंड एन्जॉय किया.

जब मेरा बेचारा हस्बैंड हुसैन नेक्स्ट वार्ड में मर रहा था, मैं स्टोरेज रूम में

घुटनो पे थी, शमलेस सलूट की तरह चूसती रही, उसका गरम, स्टिकी स्पर्म स्वालो किया

जैसे लास्ट मील हो.

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या रब्ब, कौनसा ईविल जीन मुझमे घुस गया? यह लस्ट का स्पिरिट उसके छुम के साथ मेरे गले

से नीचे गया — अब मेरा पेट जल रहा है, वेइन्स में आग फैला रहा.

मेरा जिस्म अब मेरा नहीं;

मेरे निप्पल्स अचे कर रहे, मेरी छूट थ्रोब कर रही और बिना परमिशन ड्रिप कर रही, और

मेरे फिंगर्स bar-bar आबय के नीचे जाके वललें क्लीट पे रगड़ रहे. मैं रुक नहीं सकती.

रुकना नहीं चाहती.

क्यों उसके साथ, शाहिदा? क्यों इस non-Musslim पडोसी का गन्दा लुंड, मेरी बीमार हस्बैंड के

जेंटल टच के बजाये? ईविल स्पिरिट व्हिस्पर कर रहा है की मैं हमेशा से हिडन व्होरे थी,

बिलकुल जैसे मेरी अम्मी ज़ैनब सूरज थे बुचर के अगेंस्ट मोअन कर रही थी.

मैंने उसकी

जीभ उसके मुँह में देखि, हिप्स ग्राइंडिंग, और मुझे वही हीट फील हुआ. सलोत्तय बिहेवियर. यह

मुझमे भी है. मैं उससे बेहतर नहीं.

मैं डूमड हूँ, ख़तम, बर्बाद. गजेंद्र के सीड स्वालो करने के बाद वापस नहीं जा

सकती — उसका हराम एसेंस अब मेरे अंदर है, जीन को फीड कर रहा, मुझे और चरावे करवा

रहा. उसके रफ़ हैंड्स और, उस bitter-salty टास्ते जो जुबां पे एक्सप्लोडे करता है.

हर सेकंड

खुद को शेम कर रही: पियस शाहिदा, जो वैल पहनती है, 5 वक़्त ,,., पढ़ती, रोज़ा रखती

… फिर भी मैं सिर्फ cock-hungry ह्य्पोक्रिटे हूँ जिसने हॉस्पिटल क्लोसेट में शादी के वोस बेतरय

किये.

यह क्रेविंग नहीं मारेगी. हर धड़कन के साथ स्ट्रांग होती जा रही. स्पिरिट अंदर है रहा, बोल

रहा मैं इसके लिए पैदा हुई — फोर्बिडन मर्दों के लिए टाँगे फ़ैलाने, फॅमिली सुफ्फेर करते हुए

स्ट्रेंज डिस्कस पे चोक करने के लिए. मैं अब अच्छी मुस्लिम वाइफ नहीं. मैं सिर्फ गुनाह का वेसल

हूँ, टूटी हुई औरत जिसकी ड्रिप्पिंग छूट और फिल्थी थॉट्स पे कण्ट्रोल नहीं.

मैं लॉस्ट हूँ. ईविल स्पिरिट जीत गया. गजेंद्र के छुम ने मुझे मार्क किया, क्लेम किया, और अब सिर्फ

एक hi चीज़ सोच रही हूँ — उसके पास वापस क्रॉल करना, बेग करना की फिर से मुझे फइलल करे

जब जीन चीयर करे. मुझसे नफरत है… लेकिन हंगर शेम से ज़्यादा लाउड है.

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उन्होंने लिप बाईट किया, दिन के इवेंट्स रीप्ले करते हुए — गजेंद्र की बिल्स में मदद, उसके स्ट्रांग

आर्म्स अराउंड हेर, फोर्बिडन एक्ससिटेमेंट. "लेकिन उसने हमें बचाया," उन्होंने मर्मर किया. "मेरे

हस्बैंड की दूकान, हॉस्पिटल… क्या मैं ुंगरतेफुल हूँ?

नहीं, यह गुनाह है. पुरे गुनाह." और

सोच: अगर हस्बैंड को पता चल गया तो? मेरे बारे में, मेरे बेटे के बारे में? फॅमिली हॉनर?

वह ओल्ड मेस्सगेस स्क्रॉल करती रही, चेहरा फ्लश होते हुए मेमोरीज से, फिर फिर से स्टीलिंग हरसेल्फ़.

सेंड प्रेस करने से पहले, घर में नॉक गूंजा — शार्प, इन्सिस्टेंट. मम्मी जम्प की, फ़ोन

फ्लोर पे गिर गया. "इतनी रात को कौन?" उन्होंने व्हिस्पर किया, आँखों में पैनिक. कड़ी हुई, कपडे

स्मूथ किये, दूर पे गयी, पहले पीफोले से देखा.

उनकी गैप सुनाई दी. ड्रेड और कुछ और — रेसिग्नेशन? — के मिक्स से उन्होंने लॉक खोला. वहां

गजेंद्र खड़ा था, टालल फ्रेम नाईट के अगेंस्ट सिल्होउएत्ते, फेस पे डेटर्मीनेड लुक. "शाहिदा,"

उसने सोफ़्त्ल्य कहा, आगे बढ़ते हुए. "हमें बात करनी है."

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मम्मी हेसिटते की, घर के अंदर देखा, लेकिन दूर नहीं बंद किया. "गजेंद्र, यहाँ क्या कर

रहे हो? लेट हो गया है. मेरा फॅमिली…" उसने फ्रेम पे हाथ रखा, लेअन इन किया. "मैं दूर नहीं

रह सका. आज स्टोररूम में जो हुआ… वह किश. उसमे कुछ था. हम दोनों के लिए."

उन्होंने सर हिलाया, लेकिन आवाज़ में कन्विक्शन नहीं थी. "नहीं, यह मिस्टेक थी. तुमने हमारी

मदद की, मैं ग्रेटफुल थी, बस इतना. प्लीज, जाओ." वह नहीं हिला. "ग्रेटफुल? इसलिए तूने किश बैक

किया? क्यों तेरे हाथों ने मुझे क्लोज़र खींच लिया?

शाहिदा, तेरा हस्बैंड बीमार है, लेकिन तू

एक औरत है जिसके नीड्स हैं. मैंने तेरी आँखों में लोनेलिनेस्स देखि है. उसमे भी मदद

करने दे मुझे."
 
CHAPTER 13

मेरी माँ ने आखिरकार अपनी इज़्ज़त खो दी और पाप

में गिर गयी.

जब दरवाज़ा धीमे से खुला, माँ के हाथ के नीचे जो थोड़ा सा काँप रहा था, तो

गजेंद्र वहां खड़ा दिखा — पोर्च की हलकी रौशनी में उसका चौड़ा जिस्म दरवाज़े को

पूरा भर रहा था, जैसे कोई बिन बुलाया तूफ़ान का बदल.

वह सदा शर्ट और पंत में था, लेकिन उसकी मौजूदगी में एक ताकत थी, उसकी काली

आँखें माँ की आँखों से जुड़ गयी, इतनी गहरी नज़र की बीच का हवा भारी हो गयी.

माँ, शाहिदा, एक पल के लिए ठिठक गयी, हाथ अभी भी नॉब पर, आबय रात के कपडे

के ऊपर ढीली लती हुई जैसे वह सोने की तैयारी कर रही थी. घर में सन्नाटा था, सिर्फ

बहार शहर की दूर की गूंज और दादा जी के कमरे से हलकी खर्राटें सुनाई दे रही थी.

मैं हॉलवे के अँधेरे में से देख रहा था, दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था, दर और

एक अजीब सी बेचैनी मुझे वही खड़ा रखे हुए थी.

यह आदमी, यह बाहरी जो हमारी ज़िन्दगी में "मदद" के नाम पर घुस आया था — अब्बू

के बिल और दूकान के लिए — अब इस घडी घर के दरवाज़े पर खड़ा था. "शाहिदा," उसने

धीमे से कहा, आवाज़ में हल्का सा हुक्म सा, "हम ऐसे नहीं छोड़ सकते. आज के बाद

नहीं."

माँ ने पीछे मुद कर घर की तरफ देखा, आँखें बैडरूम की तरफ दौड़ती हुई, चेहरे

पर फ़िक्र की लकिन और गहरी हो गयी. वह बेचैन थी — दरवाज़े पर उँगलियाँ काँप रही

थी, वज़न एक पेअर से दुसरे पर बदल रही थी.

लेकिन कुछ और भी था — गर्दन पर लाली चढ़ रही थी, सांसें थोड़ी तेज़. वह गरम

हो रही थी, अंदर एक प्यास जग रही थी जो बुझ नहीं रही थी, गुनाह से लड़ते हुए भी. स्टोर

रूम का वह चुम्बन कुछ हराम आग जला चूका था, और अब वह यहाँ था तो वह आग

धीमे से सुलग रही थी.

"गजेंद्र, प्लीज," वह फिसफिसाई, आवाज़ में मिन्नत थी लेकिन पूरी दिल से नहीं, "देर हो गयी

है. मेरा बीटा घर पर है, मेरे वालिदैन... यह ठीक नहीं. तुम्हे जाना चाहिए." लेकिन

उसने दरवाज़ा बंद नहीं किया, पीछे नहीं हटी.

उसकी नज़र उसके होंठों पर थमी रही,

शायद उस नमकीन टास्ते को याद कर रही थी — उसके बड़े लुंड का जो उसने पहले फिसफिसाया

था.

वह चाहती थी की वह उसे शर्मिंदा करे, उसकी हड्डों को पार करे, गलत होने के

बावजूद उस सबमिशन का नशा दे. बेचैनी hi उसकी चाहत को और तेज़ कर रही थी, एक

उलझा हुआ चक्कर जो टूट नहीं रहा था.

मुझे यह मेरी माँ नहीं लग रही थी. वह औरत जो मुझे दीं की कहानियां सुनती थी, जो

हमेशा पर्दा करती थी और इबादत करती थी — यह वह नहीं हो सकती थी. जैसे कोई अँधेरा

उस पर छ गया हो, जो उसके अख़लाक़ और ख्वाहिशों को बदल रहा हो.

क्यों ऐसा लगा? क्यूंकि जो शाहिदा मैं जानता था वह दरवाज़ा ज़ोर से बंद करती, मदद के

लिए चिल्लाती या ,.' का नाम ले कर उससे रोक देती. लेकिन यहाँ वह उसे अंदर आने दे रही

थी, जिस्म की भाषा एक भूक दिखा रही थी जो हमारे ईमान से टकराती थी.

जैसे शैतान ने उसके कान में फिसफिसाया हो — अब्बू की बीमारी से तन्हाई, गजेंद्र की मदद

की शुक्रिया, सब को इस हराम आग में बदल दिया.

मेरी रीढ़ की हड्डी में ठण्ड दौड़ गयी,

सोच कर की क्या वही चीज़ दादी को सूरज के साथ, आंटी नफीसा को मर. रवि के साथ भी लग

गयी है — हमारे घर पर एक बाला, जो दीं को अंदर से खा रही है.

गजेंद्र बिना पूरा दावत के अंदर आ गया, दरवाज़ा धीमे से बंद किया. "शाहिदा, तुम

जानती हो मैं क्यों आया हूँ," उसने कहा, आवाज़ नरम लेकिन सख्त, हाथ बढ़ाया और उसकी

बांह छुई. वह काँपी लेकिन पीछे नहीं हटी.

"स्टोर रूम में वह चुम्बन — वह सिर्फ

शुक्रिया नहीं था. मैंने महसूस किया, तुमने कैसे जवाब दिया. तुम्हारा जिस्म झूठ नहीं

बोलता."

माँ ने ज़ोर से निगला, आँखें ज़मीन पर झुक गयी.

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"यह गलती थी," वह धीमे से बोली, लेकिन आवाज़ में यक़ीन नहीं था. "मेरा शोहर हॉस्पिटल

में है, ज़िन्दगी से लड़ रहा है. मैं कैसे…?" गजेंद्र और क़रीब आया, उसकी मौजूदगी

उसे घेर रही थी.

"क्यूंकि तुम इंसान हो, शाहिदा. तुमने सब कुछ अकेली उठाया है — बिल,

दूकान, घर. मैंने मदद की क्यूंकि मुझे परवाह है. लेकिन हमारे बीच कुछ और है.

बताओ, वह बिस्तर कहाँ है जहाँ तुम अपने शोहर के साथ सोती हो? मुझे दिखाओ."

माँ का सर झटके से ऊपर उठा, आँखें शॉक से फैल गयी. "क्या? नहीं, गजेंद्र, यह…

यह हद्द पार करना है. मैं नहीं कर सकती. प्लीज, जाओ." उसने मन किया, आवाज़ अब सख्त,

लेकिन वह पीछे नहीं हटा.

उसने उसका हाथ पकड़ा, पकड़ मज़बूत लेकिन पहले नरम.

"दिखाओ, शाहिदा. तुम मुझे सच के हक़दार हो. जो मैंने हुसैन के लिए किया — तुम्हारे

लिए." वह पीछे खींचने की कोशिश कर रही थी, सर हिला रही थी.

"नहीं, यह मेरा घर है, मेरा शादी का बिस्तर. यह मुक़द्दस है." लेकिन वह ज़िद पर ऐडा

रहा, आवाज़ धीमी फिसफिसाहट में. "मुक़द्दस? जैसे आज तुमने मुझे चूमा और मेरा लुंड

चूसा? जैसे तुम्हारे मुँह में अभी भी मेरा टास्ते है?"

उसने उसे धीरे लेकिन ज़िद से हॉलवे की तरफ खिंचा, और वह मन करती रही लेकिन कदम

उसके साथ चल पड़े, एक मजबूर नाच. माँ वह हद्द पार कर रही थी जो कभी नहीं पार की

— अपने बैडरूम में किसी और मर्द के साथ, वह भी ग़ैर-'.. यह मेरी माँ बिलकुल नहीं

थी; कुछ उसे कण्ट्रोल कर रहा था, उसके फैसलों के खिलाफ उसे नचा रहा था. अब यह

पोस्सेस्सिओं सच लग रही थी, स्ट्रेस और लालच से पैदा शैतानी असर, जो उसे सब कुछ धोका

देने पर मजबूर कर रहा था.

जब वह बैडरूम की तरफ जा रहे थे, गजेंद्र ने अचानक पीछे से उसे जकड लिया, बांह

कमर पर लपेट कर, उसे अपने सीने से चिपका लिया. माँ ने हलकी सी सांस ली, जिस्म पहले सख्त

हुआ. "गजेंद्र, रुक जाओ," वह फिसफिसाई, लेकिन हाथ उसकी बाँहों पर थे, धकेल नहीं रहे

थे. उसने उसकी गर्दन में मुँह रगड़ा, उसकी खुशबू ली — जस्मिने साबुन और हॉस्पिटल की हलकी

एंटीसेप्टिक की महक.

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"तुम कितनी अच्छी लग रही हो, शाहिदा. कितनी नरम, कितनी सच्ची." उसके हाथ हिलने लगे,

कमर से नीचे, फिर उसकी बड़ी गांड को रात के पतले कपडे के ऊपर से पकड़ा. उसने धीरे

से मालिश की, गोल गोल गोलियों को दबाया, उँगलियाँ थोड़ी सी धँसायी.

"यह गांड… तुम्हारी

सबसे पसंदीदा चीज़ है मेरी. इतनी भरी, इतनी दावत देने वाली. मैंने कभी _

गांड नहीं पकड़ी — यह जैसे हराम फल, इसलिए और मीठा."

माँ की सांस रुक गयी, होंठों से हलकी कराह निकली खुद के बावजूद. "आअह्ह्ह… गजेंद्र, ऐसा

मत कहो. यह गलत है." लेकिन उसका जिस्म धोका दे रहा था, थोड़ा सा उसकी तरफ झुक गया,

बेचैनी प्यास में बदल रही थी.

वह मालिश जारी रखे, हाथों से गोलियां घूमता, दबाता, वह कर्तव्य जो हमेशा परदे में

छुपी रहती थी. "क्यों लड़ रही हो, शाहिदा? तुम्हारा जिस्म यह चाहता है. कपडे के अंदर से

गर्मी महसूस हो रही है." वह फिर करहि, इस बार ज़ोर से, "ओह्ह्ह… प्लीज, हम नहीं कर सकते.

" लेकिन उसका विरोध काम हो रहा था, कमर हलके से उसके हाथों के साथ हिल रही थी.

गजेंद्र धीमे से हांसे, सांस उसके कान में गरम. "देखो? तुम कराह रही हो. मुझे

बैडरूम ले चलो — इस प्यास को पूरा बुझाओ." उसने उसे आगे बढ़ाया, जकड में उसे ले जाते

हुए बैडरूम के दरवाज़े की तरफ. उसने उसे घुमाया और चुम्बन शुरू कर दिया जबकि हाथ

उसकी बड़ी गांड पकड़ रहा था.

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अंदर जाते hi, कमरा सिर्फ बेडसाइड लैंप की रौशनी में, गजेंद्र ने उसे छोड़ा और सामने किया.

बिस्तर पीछे था, saaf-suthra, वह क्विल्ट जो अब्बू ने एनिवर्सरी पर लाया था. "अब, शाहिदा," उसने

कहा, आँखें चाहत से गहरी, "रात का कपडा उतरो. मुझे तुम्हे देखने दो." माँ ठिठकी,

हाथ सीने पर कपडे पकडे हुए.

"नहीं, मैं नहीं कर सकती. यह बहुत ज़्यादा है. मेरे घर

वालों का सोचो." वह और क़रीब आया, आवाज़ में हुक्म और बहकावे मिला हुआ. "तुम कर सकती

हो, और करोगी. तुमने मुझे अंदर आने दिया — अब रुकना मत.

मेरे लिए उतरो, जैसे स्टोर रूम

में चाहती थी." उसने सर हिलाया, लेकिन उँगलियाँ कांपती हुई हेम पर पहुँच गयी. "गजेंद्र,

प्लीज… मैं shadi-shuda औरत हूँ." "और एक चाहत भरी औरत," उसने जवाब दिया. "धीरे

धीरे करो. दिखाओ जो हुसैन मिस कर रहा है."

एक गहरी, कांपती सांस के साथ माँ ने उतरना शुरू किया. पहले हेम उठाया, काफ दिखे —

चमकती और मज़बूत घर के काम से. फिर घुटने, जांघें, कपडा स्किन के साथ sar-saraata

हुआ ऊपर चढ़ा. कमर पर रुक गयी, हरी पंतय झलक रही थी, लास वाली, उसकी आम parda-dari

के खिलाफ.

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"देखो? तुम टेम्पटेशन के लिए तैयार हो," गजेंद्र ने मज़ाक किया. बहुत लाल होकर वह आगे

बढ़ी, पेट तक उठाया, नरम पेट दिखा, फिर ऊपर हरी ब्रा तक — कप भरे हुए बूब्स को दबाये

हुए. आखिर में कपडा सर से निकाला, बाल बिखर गए, रात का कपडा पैरों के पास गिर गया.

वह सिर्फ ब्रा और पंतय में कड़ी थी, उसकी नज़र के नीचे नंगी सी.

उसके बूब्स बहुत बड़े थे, ब्रा के किनारे से थोड़ा बहार झुकते हुए, हरी लास उनकी भरी

भरकम को और उभार रही थी — शायद D-cup, हर सांस के साथ उछाल रहे थे.

उसके बड़े गांड, अब सिर्फ पतली पंतय में, एक नज़ारा थे: गोल और सख्त, थोड़ा हिलते हुए जब वह

हिली, गांड के गोलियां कमर के साथ पूरे तरह मिलते हुए, वह तबीई कर्तव्य जो आबय में

छुपी रहती थी. गजेंद्र की आँखें भूक से घूम रही थी. "खूबसूरत, शाहिदा. यह

बूब्स… कितने भरी, कितने पके. और यह गांड, ,.' ने तुम्हे बरी रेहमत दी है."

पहली बार, हॉलवे के क्रैक दरवाज़े से यह सब देख कर मेरा लुंड सख्त हो गया. पंत में

एक na-chahiye सी खिचाव, खड़ा हो गया. वह भी तब नहीं रोकी जब उसने चुम्बन शुरू किया.

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मैं शर्मिंदा था — गहरी, जलता हुआ खुद से नफरत. यह मेरी माँ थी, ,.' के लिए, हमारे

घर में शर्मिंदा और बहकाया जा रही थी.

मेरा जिस्म क्यों रियेक्ट कर रहा था? जैसे मुझ

पर भी वही असर हो, कोई अँधेरी ताक़त जो na-chahiye चाहत जगा रही थी. क्या यह हराम

का नशा था? या वही शैतान? मैं बेचैन हुआ, उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन आँखें

वही थमी रही.

"अब बिस्तर पर चढ़ो," गजेंद्र ने हुक्म दिया, आवाज़ भारी. माँ धीरे से मानी, बिस्तर

पर चढ़ी और पीठ के बल लेट गयी, टांगें बंद, बांह सीने पर, आखरी पर्दा की कोशिश

में.

वह दो दिलों में थी — चेहरे पर बेचैनी, लेकिन आँखों में वही गरम चमक,

जांघें एक दुसरे से दबायी हुई जैसे प्यास को रोक रही हो. वह अभी भी चुप थी, छत को

घूर रही थी, शायद दिल hi दिल में दुआ मांग रही थी. मैं चाहता था वह रुक जाये,

चीखे, कुछ भी करे इस पागलपन को ख़तम करने के लिए

यह सब देख कर मेरा दिल टूट रहा था, लेकिन मैं वहां से हरकत नहीं कर प् रहा था.

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"क्यों इतनी चुप हो, शाहिदा?" गजेंद्र ने पुछा, बिस्तर के किनारे बैठते हुए. "क्या मुझे

अंदर बुलाने का अफ़सोस हो रहा है?" वह थोड़ा सा सर घुमाई.

"मैं… डर रही हूँ. यह

मैं नहीं हूँ. लेकिन तुम्हारे बारे में सोचने से रुक नहीं प् रही." उसने मुस्कुराया,

पूरा बिस्तर पर चढ़ गया, उसके ऊपर झुक कर. "अच्छा. डर को भुला दूँ तुम्हे."

उसने धीरे लेकिन मज़बूत तरीके से उसकी टांगें खोली, घुटनों पर हाथ रखे, टांगें

अलग की ताकि हरी पंतय का गीला हिस्सा साफ़ दिखे.

"गजेंद्र, रुक जाओ," वह फिसफिसाई. "कोई रुकना

नहीं," उसने कहा. "पूरी तुम्हे देखना है." उसने पंतय की कमर में उँगलियाँ डाली और

धीरे धीरे नीचे खींची — कमर से, जाँघों से, घुटनों से गुज़रते हुए, आखिर में

एक टांग से लटक कर गिर गयी.

मैं ने आँखें बंद कर ली — माँ की छूट देखने के लिए तैयार नहीं था, यह मेरी

मासूमियत पर सबसे बड़ा हमला था. लेकिन वही अजीब सी बेचैनी ने आँखें खोल दी. मुझे

देखना था, पूरा धोका देखना था. और वह खूबसूरत थी, हराम तरीके से: साफ़ काटी

हुई काली बाल, गुलाबी और सूजी हुई होंठ, छूट से गीला चमक रहा था, क्लीट मोती की तरह

झलक रही थी.

"बेहद खूबसूरत," गजेंद्र ने धीमे से कहा. "तुम्हारी छूट एक हुनर है, शाहिदा." वह

लाल हो गयी. "ऐसे मत देखो." उसने सर झुकाया, जीभ निकाल कर उसकी छूट छाती — नीचे

से शुरू करके क्लीट तक एक धीमी, लम्बी चाट. माँ के जिस्म में करंट दौड़ गया, पीठ

बिस्तर से उठ गयी.

"आअह्ह्ह! ओह्ह्ह गाजीन्द्रा एआइइइइ ूआइइइइइ" वह करहि, हाथों ने

चादर पकड़ ली. उसने फिर छाता, क्लीट के ird-gird गोल गोल जीभ घुमाई, फिर धीरे से चूसा.

"ओह्ह्ह… हे भगवन," वह सांस रोकते हुए बोली, कमर आपने आप उठ रही थी. उसने और

गहराई, जीभ छूट के अंदर डाली, उसका रास चखा. "इतना मीठा रास, जैसे हराम के छत्ते

का शहद." माँ ज़ोर से करहि, "उहाहहह… गजेंद्र, बहुत हो गया."

उसने नहीं रोका, बल्कि एक ऊँगली अंदर डाली, फिर दो, उँगलियाँ मोड़ कर अंदर की दीवार को रगड़ा,

वह सेंसिटिव जगह को छेड़ा.

"महसूस है? अब तुम्हे चीखना है." उसने ज़ोर से रगड़ा,

andar-bahar, अंगूठा क्लीट पर गोल गोल. माँ की कराहें तेज़ होती गयी, "आअह्ह्ह! ओह्ह्ह हाँ… और

गहरा." उसका जिस्म तड़प रहा था, टांगें काँप रही थी, सुख की लहरें बढ़ रही थी.

फिर वह सीधा हुआ, पंत की ज़िप खोली और अपना लुंड निकला — मोटा, नासा वाला, चाहत से सख्त.

उसने लुंड को उसकी छूट पर रगड़ा, सर गीले होंठों के बीच से गुज़रता हुआ. "मेरे लिए तैयार

हो?" "गजेंद्र, हम नहीं करना चाहिए…"

लेकिन उसने धक्का नहीं दिया. एक धक्के में अंदर

घुस गया, धीरे धीरे. माँ चीखी, "आअह्ह्ह! गाजीन्द्र रुक जाओ रुक जाओ ऊह्ह्हह्ह" — लेकिन

दर्द में नहीं, सुख में.

वह विरोध नहीं कर रही थी; मैं जानता था वह चाहती थी, कमर उसकी तरफ उठ रही थी. छूट

का रास लुंड को राह दिखा रहा था, उससे पूरा अंदर ले रही थी जब तक वह पूरा अंदर नहीं

घुस गया, उसके बॉल्स उसकी गांड से टकरा गए. "इतनी टाइट, शाहिदा. जैसे मेरे लिए बानी हो."

उसने andar-bahar शुरू किया, पहले धीरे, फिर रदम बनाया. "महसूस है? हुसैन ने

तुम्हे कभी इतना नहीं भरा होगा." माँ करहि, "ओह्ह्ह… बहुत अच्छा लग रहा है, लेकिन यह

करना गलत है."

उसने उसे शर्मिंदा किया, और गहरा धक्का मारा. "गलत? अब तुम मेरी रंडी हो न? बीमारी

वाले शोहर को धोका दे रही हो." बिस्तर हिलने लगा, हर ज़ोर के धक्के से चीखता हुआ. माँ की

कराहें लम्बी होती गयी, "आअह्ह्ह… ओह गजेंद्र, आअह्ह्ह आअह्ह्ह प्लीएससी… लेकिन यह गलत है,

आअह्ह्ह!" उसने और ज़ोर से छोड़ा, हैडबोर्ड दीवार से टकरा रहा था. "ले लो, _ रंडी.

यह hi तो तुम चाहती थी."

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एक डैम माँ का फ़ोन बजा — रात के इस वक़्त सिर्फ अब्बू का हो सकता था. माँ की आँखें दर से

फैल गयी. "गए… गजेंद्र प्लीज रुक जाओ… यह हुसैन है, मेरा शोहर कॉल कर रहा है." उसने

हाथ हिलाया, धीमे करने का इशारा किया. लेकिन गजेंद्र ने शैतानी मुस्कराहट दी, रुकने

के बजाये धीमे लेकिन गहरे धक्के मरने लगे.

"उठाओ. उसे सुनने दो." माँ ने हिचकिचाहट

के साथ फ़ोन उठाया, सांस फूलते हुए बोली. "Hello? हुसैन… आअह्ह्ह एआइइइइ. हाँ जान, मैं

घर पर हूँ." गजेंद्र ने छोड़ना जारी रखा, लुंड andar-bahar होता रहा.

मैं यकीन नहीं कर प् रहा था — माँ अब्बू को धोका दे रही थी, झूठ बोल रही थी जब दूसरा

मर्द उसके अंदर था. "कैसा महसूस कर रहे हो? दवाई का असर है?" उसने पुछा, आवाज़ में

कराह रोकने की कोशिश. "आअह्ह्ह… सॉरी, बस… खींच रही हूँ, ओह्ह्ह… दिन भर थक गयी." अब्बू

ने शायद कराहों के बारे में पुछा.

"नहीं कुछ नहीं… आअह्ह्ह, बस मुस्कले में खिचाव,

उहाहहह… ठीक हो जाउंगी." उसने होंठ काट लिए, आँखें पीछे मुद गयी जब गजेंद्र ने

गहरा धक्का मारा. "मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ… शब् बखैर." फ़ोन फ़ेंक दिया.

गजेंद्र ने बहार निकला, उसे पलट कर डोग्गिस्टीले में किया. "अब घुटनो पर." माँ ने मान लिया,

गांड ऊपर, छूट खुली हुई. उसने लुंड पूरा अंदर डाला, झुक कर उसकी पीठ पर चुम्बन किया.

माँ (कराहते हुए, गजेंद्र के गहरे धक्के के साथ, वैल थोड़ा टेढ़ा, टांगें बिस्तर पर

खुली): ओह्ह्ह… गजेंद्र प्लीज… यह बहुत गलत है… अह्ह्ह…

गजेंद्र (मुस्कुराते हुए, कमर पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से धक्के मरते हुए): चुप कर, शाहिदा

, तुम्हारी पाकीज़ा छोटी रंडी. तुम्हारी टाइट _ छूट मेरे लुंड को ऐसे पकड़ रही है

जैसे ***** के लिए बानी हो. और गहरा ले, तुम जानती हो तुम अपने खुदा को धोका दे कर यह

पसंद कर रही हो.

माँ (सांस रुकते हुए, आँखें बंद, गुनाह और सुख में): नहीं… ममम… मैं नहीं कर सकती

… यह हराम है… ओह खुदा माफ़ करना… अहह…

गजेंद्र (लुंड को धीरे बहार निकलता हुआ, उसका गीला लुंड छूट से निकल कर रास की डोर बना

रहा): देखो, अब बहार निकाल रहा हूँ. यह देखो — तुम्हारा रास मेरे लुंड पर. लेकिन अरे,

यह क्या? (झुक कर, गांड के छेद को धीरे से खोलता हुआ) तुम्हारी छोटी सी गांड मुझे आँख

मार रही है. इतनी गुलाबी और सिकुड़ी, वैल के पीछे छुपी.

माँ (आवाज़ कांपती, टांगें बंद करने की कोशिश लेकिन कमज़ोर): गजेंद्र रुक जाओ! वहां

मत देखो… प्लीज, यह गन्दा है… अहह… मेरा मज़हब इसकी इजाज़त नहीं देता… मैं दीनदार

_ औरत हूँ, रोज़ पांच वक़्त ,,., पढ़ती हूँ… यह मेरे ईमान के बिलकुल खिलाफ

है…

मैं वहां खड़ा देख रहा था, बहुत शर्मिंदा महसूस कर रहा था.

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गजेंद्र (धीमे से हँसते हुए, चेहरा गांड के छेद से कुछ इंच दूर): ः, ईमान? तुम्हारी

दीनदार? तुम घुटनो पर रंडी की तरह बैठी हो, शाहिदा. और क़रीब आता हूँ — (लम्बी सांस

ले कर सूंघता है) ममम, तुम्हारी गन्दी गांड की बू ले रहा हूँ. गुनाह की बू है न? यही से

तुम्हारी टट्टी निकलती है, तुम्हारी पाकीज़ा रंडी. सुबह टॉयलेट पर बैठ कर यहीं से सब कुछ बहार

करती होगी.

माँ (जिस्म काँप रहा, शर्म से सिसकारी): ओह्ह्ह… नहीं, मत सूँघो… बहुत शर्म आ रही है…

मेरा शोहर ने भी कभी वहां नहीं देखा, उसने तो छोड़ा भी नहीं… ममम… प्लीज गजेंद्र,

रेहम करो… यह मुझे बहुत शर्मिंदा कर रहा है…

गजेंद्र (फिर गहरी सांस ले कर, नाक लगभग स्किन से लगते हुए): रेहम? एक धोकेबाज़ वैली के

लिए? तुम्हारी गांड की खुशबू आ रही है, शाहिदा — मिटटी जैसी, गन्दी, बिलकुल तुम्हारी छुपी

ख्वाहिशों की तरह. यही से तुम अपना हलाल खाना निकालती हो. सोचो अगर तुम्हारा इमाम जान जाये

की उसकी नेक बहिन एक काफिर को अपनी टट्टी वाली जगह सूंघने दे रही है.

माँ (कराहते हुए, आँखों में शर्म के आंसू): अह्ह्ह… या ,.'… यह बेइज़्ज़ती है… मैं

बहुत शर्मिंदा हूँ… रुक जाओ, यह एक औरत के लिए ठीक नहीं… ओह्ह… मेरा ईमान… मैंने कभी

इतना गन्दा काम नहीं किया…

गजेंद्र (ज़ोर से सूंघते हुए, आवाज़ निकाल कर): बहुत अच्छी बू आ रही है तुम्हारी गांड से,

बीमार शोहर के पीछे टांगें फैला कर. स्निफ्फ स्निफ्फ — अहह, यह खट्टी खट्टी बू तुम्हारी टट्टी

वाली जगह से. यह तुम्हारा सबसे गन्दा हिस्सा है, शाहिदा, जहाँ से सब गन्दगी निकलती है. आबय

के नीचे तुम बस एक झूठी टॉयलेट हो.

माँ (आवाज़ टूट रही, कमर आपने आप हिल रही): ममम… बस करो… यह मुझे बर्बाद कर रहा है

… प्लीज मेरी इज़्ज़त सोचो… अहह… मेरे बच्चे भी मुझसे मुंह मोड़ लेंगे अगर जान जायेंगे…

बस ख़तम करो और चले जाओ.

गजेंद्र (आखरी लम्बी सांस ले कर, फिर थोड़ा पीछे हटा कर उसका लाल चेहरा देखता): इज़्ज़त?

तुमने वह तब खो दी जब मेरा माल निगला था. ममम, एक और गहरा सूंघ — हाँ, यही वह जगह

है जहाँ से रोज़ टट्टी निकलती है. तुम बस एक टट्टी करने वाली, ,,., पढ़ने वाली मुनाफ़िक़ हो,

शाहिदा. कैसा लग रहा है जान कर की एक पडोसी जैसे मैं तुम्हारी सबसे गन्दी बू का मालिक बन

गया?

माँ (सिसकते हुए, एक हाथ से चेहरा छुपाते हुए): अहह… नहीं… प्लीज रुक जाओ… मैं यह शर्म

बर्दाश्त नहीं कर सकती… ओह खुदा…

माँ करहि, "ओह्ह्ह… संभल के." फिर उसने लुंड को फिर से छूट पर लगाया और ज़ोर से अंदर दाल

दिया. उसने be-rukawat छोड़ा, कमर गांड पर थपड मर रही थी, गांड के गोलियां हर धक्के

से हिल रही थी. उसके बूब्स झूल रहे थे, ब्रा के अंदर निप्पल्स सख्त. "आअह्ह्ह! ज़ोर से… उहाहहह,

बहुत अच्छा लग रहा है." "ले लो, शाहिदा. तुम्हारी गांड कितनी खूबसूरत हिल रही है."

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मेरी ज़िन्दगी सच में टूट गयी यह देख कर — घर बिखर रहा था, ईमान छूट रहा था.

अब गजेंद्र बिस्तर पर लेता था, लुंड खड़ा. "आओ, मेरे ऊपर चढ़ो, मेरी खूबसूरत." माँ, अब

भूखी आँखों से मुस्कुराती हुई, उस पर चढ़ गयी. "नहीं करना चाहिए, लेकिन… मुझे ज़रुरत

है."

उसने खुद लुंड को पकड़ा, छूट के मुँह पर लगाया और धीरे बैठ गयी. "ओह्ह्ह… इतना भरा

हुआ." उसने चढ़ना शुरू किया, तेज़ तेज़, कमर घूमती हुई, ऊपर नीचे. "हाँ, ऐसे hi… आअह्ह्ह,

तुम बहुत बड़े हो." "ज़ोर से चढ़ो, शाहिदा. अपनी चाहत दिखाओ."

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फिर गजेंद्र करहा, "मैं झड़ने वाला हूँ." माँ घबरा गयी, "अंदर नहीं! प्लीज." लेकिन उसने

नीचे से तेज़ धक्के मरते रहे. आखिर में माँ उठी, लुंड बहार निकाला. वह खुश होकर

झाड़ गया, "ाःह… हाँ!" सब उसके पेट पर गिर गया. दोनों गिर पड़े, चुम्बन करने लगे — गहरा,

जोशीला, जीभ एक दुसरे में, हाथ पसीने वाली खाल पर.

रात की हवा उनके जिस्म को ठंडा कर रही थी जब वह जकड़े हुए लेते थे, सांसें मिल रही थी.

माँ ने ऊँगली से उसके सीने पर लकीर खींची, पहले की बेचैनी अब सुकून में बदल गयी थी.

"गजेंद्र, हमने क्या कर दिया?" वह फिसफिसाई, लेकिन हलकी मुस्कराहट के साथ. उसने उसे और क़रीब

खींच कर माथा चूमा. "हमने कुछ सच्चा पाया है, शाहिदा. अफ़सोस मत करो." उनके होंठ

फिर मिले, इस बार धीमे, हराम रिश्ते का मज़ा लेते हुए.

मैं पलट गया, यह मंज़र दिमाग में जलता हुआ, सोचता हुआ की क्या हमारा घर कभी ठीक हो

पायेगा.

लेकिन कुछ मिनट बाद उनके चुम्बन फिर गहरे हो गए, हाथ धीमे धीमे घूमने लगे.

"अब तुम और मीठी लग रही हो," गजेंद्र ने गर्दन पर फिसफिसाया, हल्का सा काट ते हुए. माँ धीमे

से हनासी — वह आवाज़ इतनी अजनबी थी की मेरा पेट और मोर गया. "रुको, फिर शुरू कर डोज." लेकिन

वह पीछे नहीं हटी, उँगलियाँ उसके बालों में फिर रही थी.

"शायद यही चाहती हूँ," उसने मज़ाक

किया, उसे पीठ के बल पलटा, जिस्म एक दुसरे से चिपक गए. चुम्बन गरम हो गया, जीभ एक दुसरे

को चख रही थी, छोटी कराहें निकल रही थी. "शाहिदा, तुम नशीली हो," उसने चुम्बन के बीच

कहा. "एक ऐसी दवा जो छोड़ नहीं सकता." वह सांस ले कर बोली, "और तुम मेरी कमज़ोरी हो… लेकिन इस

वक़्त यह बहुत सही लग रहा है."

वह थोड़ी देर के लिए अलग हुए, एक दुसरे की आँखों में देखते हुए. "बताओ," गजेंद्र ने कहा,

हाथ उसकी जांघ पर फेरते हुए, "जब मैंने पहली बार मदद की थी तब क्या तुमने यह सोचा था?"

माँ ने हिचकिचाहट के बाद कहा, "नहीं… लेकिन बिल, दूकान — तुम्हारी मदद ने मुझे खींच

लिया. और अब…"

वह चुप हो गयी, उसे फिर से खींच कर चुम्बन किया, होंठ नरम और ज़िद भरे. कमरा उनके प्यार

की आवाज़ों से भर गया — धीमे छोटे चुम्बन, फिसफिसाहते लफ्ज़. "मेरी खूबसूरत _

बेग़ैरत," उसने कहा, जिससे वह लाल हो गयी. "ऐसा मत कहो," वह हलके से रोकी, लेकिन और गहरा

चुम्बन किया.

जैसे जैसे वह आगे बढे, माँ का हाथ उसके जिस्म पर नीचे गया, उसकी मसल्स को छूटे हुए.

"तुम बहुत मज़बूत हो… बिलकुल अलग…" वह रुक गयी, गुनाह का एहसास आया, लेकिन गजेंद्र ने

चुम्बन से चुप करा दिया. "तुलना मत करो. अब सिर्फ हम हैं."

उनके गले और क़रीब आये, जिस्म जैसे चुम्बक की तरह जुड़ गए. मैं और नहीं देख सका, लेकिन

आवाज़ें मेरे कानों में गूंजती रही — उनकी हनासी और सांसें मिलती हुई, चादर का

sar-sarahat जब वह हिलते थे. "एक और चुम्बन," माँ ने खेलते हुए कहा, लेकिन वह एक नहीं,

कई हो गए, एक सिलसिला जो उनके रिश्ते को और मज़बूत कर रहा था.
 
शुक्रिया दोस्तों, मैं सच में बहुत खुश हूँ आपके रिलीज देख कर क्यूंकि ये सबूत है की आप लोग स्टोरी को पसंद कर रहे हो. अगला अपडेट बहुत ज़्यादा इंटरेस्टिंग होने वाला है, कुछ नयी नराशंस हैं जो आपका दिमाग हिला देंगे!
 
CHAPTER 14

क्या मेरी माँ कभी वापस अपनी पाक और दीनदार माँ बन

पायेगी, या वह कभी नहीं बदलेगी??

गजेंद्र के पीछे दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ के बाद घर में एक अजीब सन्नाटा छ गया,

सिर्फ दूर से रात के ट्रैफिक की हलकी गूँज सुनाई दे रही थी.

मैं हॉलवे के अँधेरे में छुप गया, दिमाग में उलझन और दर का तूफ़ान उठ रहा था.

अभी ड्राइंग रूम में क्या हो रहा था? क्या माँ ने उसे सिर्फ बात करने के लिए अंदर आने दिया,

या फिर वही पुराण सिलसिला शुरू हो गया?

उसका थोड़ा सा हटना, गजेंद्र की आँखों में वह

जूनून — सब कुछ पेट में उबाल की तरह महसूस हो रहा था. मैं और जासूसी नहीं कर सका;

रात के यह राज़ पहले hi मुझे काफी ज़ख़्मी कर चुके थे.

चुपके से मैं अपने कमरे में चला गया, दरवाज़ा धीरे से बंद किया जो मेरी तन्हाई को और

गहरा कर गया. कमरा छोटा और jaana-pehchaana था, दीवारों पर फुटबॉल सितारों के पुराने

पोस्टर किनारे से उतर रहे थे, एक अकेली बल्ब से हलकी गरम रौशनी मेरे बिगड़े बिस्तर पर पद रही

थी.

मैं गद्दी पर गिर पड़ा, स्प्रिंग चीख उठी, और छत को देखता रहा जहाँ दरारें मकड़ी के

जाल की तरह फैली हुई थी — जैसे मेरी ज़िन्दगी के टूटे टुकड़े. थकन मुझे खींच रही थी, लेकिन

नींद बहुत दूर थी. इसके बजाये एक अनजान जज़्बा उठा — वह पुराण तनाव जो जिस्म में बढ़ता

था, जिसकी ज़रुरत निकालनी पड़ती थी.

यह रात के भयानक मंज़रों से नहीं था; वह तो मुझे सुन्न और घिन भरा छोड़ गए थे.

मैंने लड़ने की कोशिश की, मुठी बंद की, सांस पर ध्यान दिया, दिल hi दिल में दुआ पढ़ी ताकि इस

वस्वसे को दूर कर सकूँ.

“मैं यह नहीं कर सकता,” मैंने बुदबुदाया, करवट बदली, कुछ और

सोचने की कोशिश की — पढाई, फुटबॉल, आने वाला ईद का जश्न.

लेकिन हार मान ली; दिमाग जाबिर की गर्लफ्रेंड रानी के पास चला गया, और गोदाम में हम दोनों

के गुनाह भरे काम की याद. उसका झुकना, जिस्म का ढीला पड़ना, वह धीमी कराह जो वह दबा

रही थी — सब कुछ वापस आ गया, वह शर्मनाक आग जगा दी.

जिस तरह मैंने उसकी गांड मारी थी. उसकी टट्टी मेरे लुंड पर लगी हुई जब मैं उसकी गांड में

धक्के मार रहा था.

मैंने हाथ पंत के अंदर डाला, पहले धीरे धीरे हिलाया जब रानी का लाल चेहरा, उसकी मन

करने की आवाज़ जो बाद में मंज़ूरी में बदल गयी, सोच रहा था.

लेकिन असल में वह नहीं

थी जो यह सब करवा रही थी; अंदर से यह माँ और गजेंद्र की वजह से उठा था. धोका, उलझन —

यह सब अँधेरा जज़्बा बन कर निकला, दर्द को इस गंदे तरीके से महसूस करने का.

जितनी तेज़ हिलाया, उतनी hi गुनाह की लहार आयी. मैं कैसा बीटा हूँ? माँ के धोके की सोच कर मुठ

मार रहा हूँ? मैं सबसे बुरा बीटा लग रहा था, गन्दा और शर्मिंदा, जैसे कोई लानत मुझे

मिला हो जो रिश्तों को गन्दा बना देती हो.

मैंने बहुत ज़ोर से मुठ मारी, बिलकुल शर्म नहीं रही. जल्दी साफ़ किया, चेहरा तकिये में

छुपाया, और माफ़ी की दुआएं मांगी.

आखिर नींद ने मुझे अपने हाथों में ले लिया, tooti-phooti और डरावने सपनों वाली.

सुबह की रौशनी पतली पर्दों से अंदर आयी, माँ को नींद से जगाया. वह बिस्तर में हिलती हुई उठी,

चादर उसके चरों तरफ उलझी हुई थी जैसे तूफ़ान का सबूत.

कमरे में हवा गरम और भरी थी, सेक्स की बू — पसीना, जज़्बा, और वह घने रिश्ते की

खुशबू जो रात भर जिस्म के साथ थी. यह बू तकियों, चादर और दीवारों में घुल गयी थी,

कमरा जैसे लूट गया हो. माँ ने नाक सिकोड़ी, गन्दगी की लहार उठी.

क्यों? क्यूंकि यह उसका shadi-shuda बिस्तर नहीं था जहाँ अब्बू के साथ प्यार और हलाल रिश्ते में

वक़्त गुज़रता था; यह रात थी जब वह टेम्पटेशन के आगे झुक गयी, जिस्म गजेंद्र को दिया जो

उसके वादे, ईमान और घर के खिलाफ था.

वह गन्दी महसूस कर रही थी, जैसे गुनाह उसकी खाल

में घुस गया हो, नज़र नहीं आता लेकिन हमेशा के लिए निशाँ छोड़ गया.

सुबह किसी और मर्द के साथ उठना और अजीब था — पेट में एक घबराहट. गजेंद्र वहां लेता

था, हलकी सांस के साथ खर्राटे ले रहा था, छाती चादर के नीचे ऊपर नीचे हो रही थी,

चेहरा सुकून में था.

वह उम्र में 50 के आखिर में था, namak-mirch बाल, मज़बूत जिस्म,

लेकिन नींद में वह कमज़ोर लग रहा था.

माँ ने उससे देर तक देखा, दिल में पछतावा और थोड़ी सी मोहब्बत का मिला जुला एहसास. यह कैसे

हुआ? सिर्फ बात करने आया था, फिर चुम्बन, फिर ज़्यादा, हॉस्पिटल का जूनून घर तक आ पहुंचा.

उसने नीचे देखा — अभी भी वह गुलाबी स्कार्फ़ सर पर ढीला, कल का हरा ब्रा और पंतय, अब उलझा

हुआ और जगह से हटा हुआ. लास उसकी खाल में गढ़ रहा था, याद दिलाता था की कितनी जल्दी उन्होंने

कपडे उतरे थे, जूनून ने होशियारी को हरा दिया. उसका भरा हुआ जिस्म, ब्रा से उभरे सीने और

कमर, चादर के नीचे भी नंगा सा महसूस हो रहा था.

बिस्तर के किनारे बैठ कर माँ ने सर झुकाया, हाथों को जोड़ कर दुआ मांगी. “ो गॉड, मुझे

पाक कर,” वह ज़ोर से बोली. “मेरा दिल और जिस्म इस गुनाह से साफ़ कर. माफ़ कर मुझे रास्ते से

भटकने के लिए. मुझे शैतान की आवाज़ के खिलाफ मज़बूत बना.”

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लेकिन जब मैं अपने कमरे में लेता था, बाद में जब वह मुझे देखने आयी और मैं सोता हुआ

बन रहा था, वह दुआएं सही नहीं लग रही थी. माँ हमेशा दीनदार थी, हमें ,,., पद्धति थी,

हलाल हराम की याद दिलाती थी.

फिर भी रात भर जीना करने के बाद दुआ मांग रही थी? यह नकली लग रहा था, जैसे ज़ख्म पर

बैंडऐड लगा रही हो जो खुद बार बार खोलती हो. क्यों पाकि मांग रही थी जब काम इंदुलगने के

थे? यह मुझे और उलझा रहा था, मेरी माँ जो मैं पूजता था और अब जो औरत मैं देख रहा था

— दोनों में गहरा फासला बन गया.

दुआ के बाद माँ चुपके बिस्तर से उठी, गजेंद्र को न जगाने के लिए. बाथरूम गयी, ठन्डे टाइल्स ने

नंगे पैरों को झटका दिया. शावर खोला, गरम पानी झरने लगा, भाप से छोटा कमरा भर गया.

अकेले में गहरे ख्याल उभर रहे थे जैसे पानी के साथ नाली में घूम रहे थे.

“मैं क्या कर रही हूँ?” वह चुपके सोच रही थी, जिस्म को ज़ोर ज़ोर से रगड़ रही थी जैसे गजेंद्र

का छूना मिटा सके. “मेरा शोहर हुसैन बीमार है, ज़िन्दगी से लड़ रहा है, और मैं यहाँ… किसी

और मर्द के साथ. किस लिए? शुक्रिया? तन्हाई? गजेंद्र ने बिल, दूकान की मदद की — हाँ, लेकिन यह

कीमत बहुत ज़्यादा है. यह हराम है, मेरी रूह बर्बाद कर रहा है.

फिर भी… उसकी मेहेरबानी, उसकी ताकत… जो हुसैन अभी नहीं दे सकता, वह कमी भर देता है.” गुनाह

और बहाना मिला हुआ था, आंसू पानी में मिल रहे थे.

“मुझे रुकना चाहिए. मेरे बेटे के लिए,

मेरे maa-baap के लिए, मेरे दीं के लिए. लेकिन कैसे? वह ज़िद पे है, और मेरा एक हिस्सा… कमज़ोर

हो जाता है.” वह पानी के नीचे देर तक कड़ी रही, साफ़ जवाब की तलाश में जो आसानी से नहीं मिला.

बहार निकली, ताज़ा लेकिन अभी भी परेशां. कपडे बदले और सोच समझ कर चुनी — या ऐसा लग रहा

था. एक लाल रेशम साटन ड्रेस पहनी, बिना आस्तीन, जिस्म से चिपकी हुई, सीने और कमर को और उभार

देती हुई.

सुबह के घर के लिए यह ड्रेस बहुत टाइट और थोड़ी चुनौती वाली थी, घुटने के ऊपर रूकती

हुई, रौशनी में चमक रही थी.

बाद में मैंने देखा तो हैरान हुआ — यह ड्रेस क्यों? माँ रोज़ के काम के लिए आबय या सलवार

कमीज पसंद करती थी. क्या यह आराम के लिए थी? या रात के जज़्बे का असर, औरतपन की याद?

फिर वह किचन में गयी, जैसे कुछ हुआ hi नहीं. बर्तनों की खनक, मसाला की सिसकारी — बिरयानी

या चपाती जो भी बना रही थी. प्याज काटना, चाय चलना — सब कुछ पुराण अंदाज़. यह नार्मल पैन

मुझे और उलझा रहा था; कैसे वह सब ठीक दिखा रही थी?

जीरा और लहसुन की खुशबू गुनाह की

बू छुपा रही थी, लेकिन मुझे पता था. यह सिर्फ ढोंग था, गुनाह को दबाने की कोशिश.

माँ पहले मुझे देखने आयी, दरवाज़े पर हलकी थपकी दी. मैं सोता हुआ बना, आँखें बंद, सांस

एक सामान, उसका सामना नहीं करना चाहता था.

वह थोड़ी देर कड़ी रही, हाथ से मेरा माथा

सहलाया. “सू जा बीटा,” वह धीमे से बोली, फिर दरवाज़ा बंद किया. Daada-daadi के कमरे में भी

गयी — धीरे से अंदर, दादा पर चादर ठीक की, दादी जो हिल गयी लेकिन जाएगी नहीं.

“उह मैं किस्मत वाली हूँ, सब अभी सो रहे हैं,” वह सोच रही थी, रहत की सांस ली. उसने सोचा

किसी को पता नहीं — देर रात का आना, धीमी आवाज़ें, बंद दरवाज़े के पीछे जूनून. घर अपने

राज़ छुपा रहा था, या वह उम्मीद करती थी.

किचन वापस आयी, नाश्ता बनाया — ताज़ा पराठे, अंडा, चाय. फिर हैरत की बात — एक प्लेट और बनायीं,

ध्यान से लपेटी. यह गजेंद्र के लिए? मेरा दिल डूब गया जब मैं दरवाज़ा थोड़ा खोल कर देखा.

मुझे पता था माँ पड़ोसियों की मदद करती थी — रमजान में खाना बांटती थी, बूढ़ों की खबर

रखती थी — लेकिन यह अलग था, यह प्यार वाला अंदाज़ था. क्या कल सपना था? एक हिस्सा अभी भी इंकार

कर रहा था, लेकिन हर चीज़ बहुत साफ़ थी — दरवाज़े की खत खत, उसका अंदर आना, उसका रुकना.

माँ बैडरूम में वापस गयी, गजेंद्र जाग रहा था. “यह खा लो जाने से पहले, मैं नहीं चाहती

तुम यहाँ रुको, मेरी माँ और मेरा बीटा यहाँ हैं,” वह धीमे से बोली, प्लेट साइड टेबल पर राखी.

गजेंद्र उठा, आँखें रगड़ी, चेहरे पर मुस्कराहट फैली.

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“शाहिदा, तुम मेरे लिए बहुत अच्छी हो. कल रात… लाजवाब थी.” उसने उसे खींच कर छोटा सा

चुम्बन दिया, हाथ कमर पर रुक गया. “नाश्ते के लिए और सब के लिए शुक्रिया.” माँ शर्मा गयी,

धीरे से अलग हुई. “जल्दी करो, पीछे के दरवाज़े से जाओ. कोई नहीं देख सकता.”

बाद में जब गजेंद्र पीछे के दरवाज़े से निकल गया, माँ मुझे नाश्ता लायी. मैं बहार बैठा

था, पोर्च की सीढ़ियों पर, सड़क देख रहा था जहाँ ज़िन्दगी नार्मल चल रही थी — बच्चे खेल रहे

, ठेले वाले चिल्लाते हुए. वह ट्रे ले कर आयी, लाल ड्रेस हिल रही थी.

“बीटा, यह लो — गरम है तो

खा लो,” उसकी आवाज़ गरम थी लेकिन थोड़ी घबराहट वाली. हाथ थोड़ा कांप रहे थे जब ट्रे राखी,

आँखें इधर उधर, लम्बी नज़र नहीं मिलायी.

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“शुक्रिया, माँ,” मैंने कहा, पराठा का टुकड़ा मुँह में डाला ताकि नार्मल लगे. “अब्बू का कल रात

क्या हाल था? हॉस्पिटल से कोई खबर?” वह मेरे पास बैठ गयी, ड्रेस ठीक की. “वह ठीक है,

डॉक्टर उम्मीद कर रहे हैं.

मैं देर तक थी, लेकिन… आराम के लिए घर आयी.” शब्द सोच समझ कर

थे, लेकिन ऊँगली में अंगूठी घूमना, दरवाज़े की तरफ देखना — सब कुछ बता रहा था. वह

कुछ बहुत बड़ा छुपा रही थी, गुनाह अंदर उबाल रहा था.

“अच्छा है. तुम थकी हुई लग रही हो. सब ठीक?” मैंने धीरे से पुछा, उसकी हरकत देख रहा था.

“हाँ, बस वही फिक्रें. बिल वगैरह. लेकिन गजेंद्र — अंकल गजेंद्र — ने बहुत मदद की है.

वैसे, कल रात कोई आवाज़ सुनी? हवा तेज़ थी.” सवाल आम था, लेकिन आवाज़ थोड़ी पहात गयी, तसल्ली की

तलाश में.

“नहीं, मैं तो गहरी नींद में था,” मैंने झूठ बोलै, मुस्कराहट दी. “यह पराठा बहुत टेस्टी

है, हमेशा की तरह.”

वह थोड़ा रिलैक्स हुई, कंधे पर हाथ रखा. “खा लो बीटा. और अब्बू की सेहत के लिए दुआ करना.”

हमने छोटी छोटी बातें की — मेरी पढाई, पडोसी की नयी गाडी — लेकिन उसकी हंसी नकली थी,

आँखें अँधेरी.

यह नार्मल पैन सिर्फ चेहरा था, किनारे से टूट रहा था.

उस दिन बाद में माँ के बारे में उलझन मुझे खा रही थी. मैं कभी उसका यह चेहरा नहीं

देखा था — छुपाना, यह ड्रेस, किसी और मर्द के लिए नाश्ता. जैसे एक रात में वह अजनबी बन

गयी हो. मुझे जवाब चाहिए थे, कुछ समझने का तरीका.

तब मुझे कुणाल याद आया, मोहल्ले का वह अजीब आदमी जो कहता था उससे राज़ दीखते हैं. वह

छोटी दूकान चलता था जहाँ jadi-bootiyan और चीज़ें बेचता था, लेकिन असली काम था उसका

क्रिस्टल बॉल वाला फलित. लोग कहते थे वह भविष्य देख सकता है, छुपे राज़ खोल सकता है.

बेचैन होकर मैं वहां चला, बाजार की भीड़ में से गुज़रता हुआ जहाँ खाने की खुशबू और

धुंए मिल रहे थे. कुणाल की दूकान अँधेरी थी, अगरबत्ती की बू भरी हुई.

उसने मुझे जानते

हुए सर हिलाया, लम्बी दादी और पगड़ी से राज़ भरा चेहरा. “यह, छोटे भाई. दिल की परेशानी? या

घर की?” उसने कुशिओं की तरफ इशारा किया.

मैं: (अँधेरे कमरे में दाखिल होते हुए, अगरबत्ती की बू भरी) Hello? क्या यह कुणाल फलित वाले

का घर है? मैंने सुना आप वह चीज़ें देख सकते हैं जो दुसरे नहीं देख पाते.

कुणाल: (टेबल से ऊपर देखते हुए, टैरो कार्ड और चमकता क्रिस्टल बॉल के सामने, पगड़ी के नीचे

मुस्कराहट) यह, स्वागत है, छोटे खोजकर! हाँ, मैं हूँ कुणाल, जो तक़दीर के परदे में

झांकता हूँ. आओ, मेरे सामने बैठो. आज रूहें बेचैन हैं — क्या बात लाये हो मेरे छोटे

से घर? दिल की तकलीफ शायद?

मैं: (जरा हिचकिचाते हुए बैठते हुए, हाथों से खेलते हुए) हाँ, कुछ ऐसा hi. दिमाग बहुत

उलझा हुआ है. एक चीज़ बार बार सोचता हूँ, अंदर से खा रही है.

कुणाल: (आगे झुकते हुए, धीमी आवाज़ में) दिमाग एक बड़ी भुलभुलैया है, मेरे दोस्त. बताओ,

कौनसे साये तुम्हारे ख्यालों में घूम रहे हैं? दिल खोल कर बोलो — तारे सुनते हैं, लेकिन

फैसला नहीं करते.

मैं: (गहरी सांस ले कर, आवाज़ धीमी) मेरी माँ के बारे में. उनका नाम शाहिदा है. वह… एक

मर्द के साथ थी, नाम गजेंद्र. हमारा पडोसी. मतलब, उसने… उसके साथ रिश्ता बनाया. मैं

यकीन नहीं कर प् रहा. सब कुछ सर पर चढ़ रहा है.

कुणाल: (आँखें फैल कर, मोमबत्ती गिरते गिरते) क्या? तुम्हारी माँ — शाहिदा, एक _ औरत?

किसी और मर्द के साथ? हे भगवन, यह… हैरत की बात है! मेरे ख्यालों में बहुत रास्ते देखे

हैं, लेकिन उस जैसी दीनदार औरत का यह रास्ता? और बताओ, बीटा. यह कैसे हुआ? रूहें कहती हैं यह

आग हराम वाली है.

मैं: सब गन्दा है. वह हमेशा सही थी, वैल, रोज़ ,,.,. लेकिन अब… गजेंद्र के साथ? मुझे नहीं

पता कैसे शुरू हुआ, लेकिन सच है. मुझे बस समझना है क्यों.

कुणाल: (सर हिलाते हुए, अभी भी हैरान) एक _ माँ का यह जज़्बा? पूरा आलम हिल गया होगा! तुम

मुझसे क्या चाहते हो, छोटे? उसकी वजह का राज़? या इस रिश्ते का भविष्य?

मैं: पहले यह की मुझे कैसे पता? मैंने एक बार सुना, फिर वह चीज़ें देखि जो नहीं देखनी चाहिए

थी. फ़ोन पे सन्देश, चुपके निकलना. बहुत ज़्यादा हो गया.

कुणाल: (हलके से हँसते हुए, आँखों में शरारत, मूड हल्का करने की कोशिश) यह, दिल के chhup-chhup

के रास्ते! चोरी चोरी की आवाज़ें और नज़रें — जैसे पुराने क़िस्से. लेकिन अफ़सोस, एक नेक और इज़्ज़त वाली

औरत जैसे शाहिदा, पडोसी के साथ बिस्तर गरम कर रही है? टस्क टस्क, इमाम बेहोश हो जायेंगे! वैसे भी

तक़दीर सबको घुमा देती है.

मैं: (गुस्से से) मेरे लिए मज़ाक नहीं है. यह मेरी माँ की बात है. वह घर की बुनियाद होनी चाहिए,

यह नहीं. मैं है नहीं सकता.

कुणाल: (सीरियस होते हुए, माफ़ी मांगते हुए) माफ़ करना, खोजकर. मेरा मज़ाक अँधेरे से बचने का

जरिया है जो रोज़ देखता हूँ. तुम सही हो — यह बड़ी बात है. चलो गहरायी में जाते हैं. तुमने

उसकी असलियत की बात की. क्या मतलब? उसके अंदर का सच, जो परदे के पीछे छुपा है?

मैं: बिलकुल. मुझे अपनी माँ की असलियत जानना है. अब वह कौन है? वही औरत है जो मैं जानता था,

या कुछ हमेशा के लिए बदल गया?

कुणाल: (चेहरा सीरियस, हाथों को क्रिस्टल बॉल के ऊपर रखते हुए) ठीक है. परदे हटेगा. (हाथ बॉल के

ऊपर घूमते हुए, धीमे मंतर पढ़ते हुए) ऐ पुराने दर्शन के गोले, शाहिदा की रूह के तार दिखा!

ढूंढ छांटा दे, सच चमका दे! (क्रिस्टल बॉल हलकी नीली रौशनी से चमकने लगी, अंदर तारे घूम

रहे थे)

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मैं: (आगे झुकते हुए, आँखें बड़ी) वह, सच में चमक रहा है…

कुणाल: (गहरी आवाज़ में, आँखें आधी बंद जैसे ट्रांस में) देखो… उसकी शुरुआत दिखती है. शाहिदा

गुनहगार नहीं पैदा हुई, वह बुरी औरत नहीं. नहीं, वह नेक रास्ते पर चली, ईमान के बगीचे की काली.

वफादार बीवी, प्यारी माँ, पांच वक़्त की ,,., जैसे आसमान में अगरबत्ती. Subah-e-Mecca जैसी पाक.

मैं: यह वही माँ है जो मुझे याद है. फिर क्या हुआ?

कुणाल: (जादू वाली आवाज़ में जारी) बदलाव… धीरे धीरे आया. एक कमज़ोरी का लम्हा. हॉस्पिटल का दौरा

शायद? शोहर के आस पास बिमारी का साया. और वहां… गजेंद्र आता है. पहला गुनाह — छुपा हुआ

चुम्बन. वह… घुटनो पर बैठ कर उसका मुँह लिया. वही मोड़ था, जहाँ उसकी रक्षा टूटी.

मैं: (हैरान होकर पीछे हटा) रुको, क्या? तुम्हे ब्लोजॉब का कैसे पता? मैंने तो बताया नहीं! यह

बिलकुल वही था जो पहले हॉस्पिटल में हुआ… क्या तुम मेरे दिमाग पढ़ रहे हो?

कुणाल: (राज़ भरी मुस्कराहट के साथ, नीली रौशनी तेज़) क्रिस्टल सब देखता है, छोटे. वह वह राज़

भी कहता है जो तुम छुपाते हो. डरना मत — रूहें निष्पक्ष हैं. आगे बताऊँ?

मैं: (हक्कलाते हुए, दिल तेज़ धड़क रहा) H-haan… बोलो. लेकिन यह बहुत अजीब है.

कुणाल: (ट्रांस में वापस, आवाज़ गूंजती हुई) अब गहरायी… ओर्ब साफ़ दिखा रहा है. हाँ! शाहिदा पर

एक रूह का साया है — लस्ट की रूह, जो पाक को गन्दा बनती है.

मैं: साया? कैसे? जैसे कोई जिन या कुछ?

कुणाल: (गंभीर होकर, बॉल नीली धड़कन के साथ) सिर्फ जिन नहीं, यह हवास की रूह है. यह कमज़ोर दिल

वालों पर हमला करती है, नेक औरतों को हवास का बर्तन बनती है. यह वस्वसे कहती है, हराम के

जज़्बे को भड़कती है. तुम्हारी माँ लड़ रही है, लेकिन हर गुनाह के साथ यह मज़बूत होती जा रही है.

मैं: लेकिन यह उसके अंदर कैसे आयी? क्या पहले से थी?

कुणाल: (पास आते हुए, आँखों में रौशनी चमक रही) आह, वह शुरुआत... वह पहली बार हुई थी जब

उसने गजेंद्र को मुँह में लिया, पति के साथ धोका दिया. उस पल में रूह ने मौका पकड़ लिया. गुनाह

दरवाज़ा खोलता hai—zina, हराम मोहब्बत. रूह को गन्दा करता है, और वह और ज़्यादा मांगती जाती है,

जैसे प्यास जो कभी बुझती नहीं.

मैं: यह बहुत बुरा है. तो इसलिए की उसने धोका दिया और गुनाह किया, यह रूह उसमें घुस गयी? लेकिन

वह _ hai—kya उसका ईमान उसकी हिफाज़त नहीं करता?

कुणाल: (सिसकारी लेते हुए, जादू थोड़ा टूट गया) ईमान तो ढाल है, लेकिन ढाल भी फ़िटने में टूट सकती

है. यह रूह गन्दगी पर पलटी है, नेकपन को riya-kari बना देती है. अब batao—tum उसके लिए क्या चाहते

हो? वापस नार्मल होने को?

मैं: हाँ! मैं अपनी माँ को कैसे वापस नार्मल कर सकता हूँ? इस रूह को निकालने का कोई तरीक़ा होगा.

कुणाल: (सर धीरे से हिलाते हुए, नीली रौशनी काम हुई) अफ़सोस, तालिब, जब यह अंदर घुस जाती है तो आसानी

से नहीं जाती. तुम्हारी माँ कभी पूरी तरह अपने पुराने रूप में नहीं लौटेगी. यह रूह छाया की तरह

चिपक जाती है; वह इसे हमेशा साथ रखेगी, रोज़ उसके फिस्फीस्फाहट से लड़ेगी.

मैं: हमेशा? ऐसा नहीं हो सकता. मुझे इस रूह के बारे में और बताओ. यह है क्या चीज़? कहाँ से

आती है?

कुणाल: (पीछे झुक कर, थोड़ी से धारी पकड़ते हुए) यह एक पुराणी ताक़त है, इंसानी ख़्वाहिशाटों

के बर्बाद से जन्मी. कुछ इसे फ़िटने का जीन कहते हैं, कुछ जिस्म का लानत. यह धोके के कामों से

घुस जाती है, हर हराम मिलने से बढ़ती है. मालिक को be-qarar बना देती है, गुनाहों की तरफ

खींचती है, जैसे जाल जो और कैसा जाता है.

मैं: तो माँ इसे कैसे रोके? या इसे रोकने का कोई तरीक़ा है? कोई रसम होगी शायद.

कुणाल: (आवाज़ गंभीर हो गयी) इलाज... यह मौत लाता है, दोस्त. रूह को निकालने के लिए उसे किसी दुसरे

पटरे में भेजना पड़ता है, जो उसके क़रीब हो. शायद... तुम्हारे अब्बू में. लेकिन खतरा hai—woh

उन्हें हमेशा बीमार बना देगी, उनकी जान की ताक़त खाती रहेगी.

मैं: क्या? अब्बू में भेज दो? वह तो उन्हें मर डालेगी! बिलकुल नहीं, मैं यह नहीं कर सकता. यह इलाज

nahi—mashkil से भी बुरा है.

कुणाल: (समझदारी से सर हिलाते हुए) मैं तुम्हारी आँखों में खौफ देखता हूँ. बहुत लोग ऐसे

रास्ते ठुकरा देते हैं. सोचो, तालिब. रूहों को तवाज़ुन चाहिए; एक रूह की आज़ादी दूसरी की क़ैद के

बदले.

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मैं: मैं... मैं बाद में आऊंगा. मुझे सोचने का वक़्त चाहिए. लेकिन अगर मैं फैसला कर लून,

तो क्या यह मेरे हाथ में है? क्या मैं उसके लिए चुन सकता हूँ?

कुणाल: (धीमे से हँसते हुए) नहीं, छोटे. यह फैसला तुम्हारे हाथ में नहीं, शाहिदा के हाथ

में है. उसे रूह से मुक़ाबला करना होगा, उसकी तस्लीम करनी होगी, और तभी ट्रांसफर चुन सकती है.

तुम राह दिखा सकते हो, लेकिन पर्दा उसके लिए उठाना होगा.

मैं: लेकिन अगर वह नहीं चाहेगी? वह इतना बदल चुकी है. हम उसे बात कर सकते हैं, सब कुछ

समझा सकते हैं. शायद ज़्यादा ,,., पढ़ें, या किसी इमाम से मिलें?

कुणाल: (सर झुकाते हुए) ,,., ताक़तवर है, लेकिन यह रूह सिर्फ लफ़्ज़ों पर हंसती है. यह इनकरीयत पर

पलटी है. अगर वह अपने गुनाह क़ुबूल कर ले, शायद इसे थोड़ा कमज़ोर कर सके. लेकिन ट्रांसफर hi वह

एक सच्चा भगाने का तरीक़ा है जो मेरी रूहानी तस्वीरों में दिखा. बताओ, क्या तुमने उससे इस

रिश्ते के बारे में बात की?

मैं: नहीं, मैं कैसे कर सकता हूँ? यह बहुत ावक्वार्ड है. वह इंकार कर देगी. लेकिन अब यह रूह

जान्ने से बात बदल गयी. शायद मैं बिना बताये हिंट दे सकता हूँ.

कुणाल: (होशियारी से मुस्कुराते हुए) अहमियत की समझ. घर का रिश्ता नाज़ुक है; धीरे चलना. रूह

तुम्हारी दखल को महसूस कर सकती है और उसे गजेंद्र की गॉड में और ज़ोर से धकेल सकती है.

मैं: यही तो दर लग रहा है. एक बात aur—kya मेरी माँ अब रंडी बन गयी है? इस वजह से?

कुणाल: (सोच कर रुक कर) नहीं, असल में नहीं. शाहिदा असलियत में रंडी नहीं है. वह एक औरत है जो

फास गयी है. लेकिन उसमें अस्मोड़ी की रूह बस्ता hai—isse पुराने नाम से लस्ट की रूह कहते हैं. यह उस

पर मास्क की तरह पहनी है, उसे ऐसा बेहवे करवाती है, लेकिन उसकी असली रूह नीचे लड़ रही है.

मैं: अस्मोड़ी? कभी सुना नहीं. तो वह पूरी तरह गम नहीं हुई? बिना अब्बू को नुक्सान पहुंचाए

उम्मीद है?

कुणाल: (कांच का गोले थोड़ा चमका) उम्मीद इसी रौशनी की तरह झिलमिलाती है. अस्मोड़ी रुकने वाली नहीं,

लेकिन mohabbat—ghar की mohabbat—kabhi कभी इसे भूखा रख सकती है. उसे पाकपन से घेर लो,

उसको उसकी जड़ों की याद दिलाओ. लेकिन खतरा है, तालिब; दखल करना खतरा बुलावा है. जब तारे फिर

मिलेंगे तब आओ. अभी शान्ति से जाओ.

मैं: शुक्रिया, कुणाल. यह मुझे सोचने के लिए बहुत कुछ दे गया. अगर हाल और ख़राब हुए तो

मैं वापस आऊंगा.

"ी सी... एक औरत जो हुई है. जीन से नहीं, बल्कि randi-pan की रूह से, जैसे तुम कहते हो. फ़िटने की फिसफिसाहट,

उसे मन चीज़ों की तरफ खींच रही है. यह छोटी छोटी शुरुआत करती hai—chumban, छुअन—

लेकिन अगर न रोका जाए तो बढ़ती जाती है. तुम्हारी माँ लड़ रही है, लेकिन खींच बहुत मज़बूत है.

ख्याल रखना, देखना भी इसे तुममें भी खिलाती है."

यह पढ़ने ने मुझे ठंडा कर दिया. जब मैं घर जा रहा था, दोपहर की धुप तप रही थी, लेकिन

मेरे ख्याल तूफ़ान भरे थे.

कुणाल के शब्द गूँज रहे थे: रंडी रूह का कब्ज़ा? यह सच लग रहा था, और टुकड़े जोड़ रहा tha—maa के

बदलाव, ड्रेस, गजेंद्र. क्या यह हकीकत है, या कमज़ोरी की मजाज़? और देखने की warning—kya यह

मेरी ख़्वाहिशाटों को समझाती है?

मैं jaane-pehchane नज़रों से guzra—masjid जहाँ हम ,,.,

पढ़ते थे, पार्क जहाँ जाबिर और मैं गुज़रते the—lekin सब गन्दा लग रहा था. हमारे घर में

क्यों? क्या अब्बू की बिमारी ने गुनाह के दरवाज़े खोल दिए?

तब कुछ खेंच रहा tha—ek अंदाज़ा, या शायद कुणाल का जादू बाकी था. सीधे घर की जगह मैं

मर. रवि के मकान की तरफ मुद गया, यह जान्ने को मजबूर की आंटी नफीसा वहां है या नहीं.

शाम

के साये लम्बे होते जा रहे थे जब मैं पीछे की गलियों में झुक कर छुपा, काँटों वाले अकासिया

मेरे बाज़ू चीरते थे, मिटटी मेरे क़दमों तालों में उठ रही थी. मैं ख़राब फिल्म का जासूस जैसा

लग रहा था, दिल तेज़ धड़क रहा tha—utsaah और दर के साथ.

उसके साढ़े बंगला के किनारे पर पहुँच कर मैं झाडी के पीछे से dekha—aur हैरत से यह

इत्तेफ़ाक़ हुआ. नफीसा दरवाज़े पर कड़ी थी, धीमे से दस्तक दे रही थी, इधर उधर घबरा कर देखती

हुई. उस पर सादगी भरा कला आबय था, लेकिन उसकी हरकत राज़दारी चीख रही थी.

उन्होंने यह प्लान किया

होगा; जैसे वह अपना वज़न बदल रही थी, घडी देखती thi—yeh कोई आम मिलना नहीं था.

और उसी पल मैंने सोचा की नफीसा में भी वही रूह बस्ता है, बिलकुल जैसे कुणाल ने माँ के लिए बताया

था. यह उसके अंकल करीम के साथ धोके को समझाता था, मज़हब के बहार के आदमी के साथ मिलने

को.

नफीसा इधर उधर देखती रही, रास्ते को ताकि करती रही, होंठ काट रही थी घबराहट में. "जल्दी

करो, रवि," वह धीमे से बोली. आखिर दरवाज़ा खुला, मर. रवि संभल कर बहार झाँका.

"तुम इतने देर क्यों लगे?" नफीसा ने फ़ुफ़काते हुए कहा, जल्दी से अंदर घुस गयी.

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"लोग मुझे यहाँ खड़ा देख लेते तो? क्या तुम चाहते हो पूरा मोहल्ला बात करे?" रवि ने दरवाज़ा

बंद किया, धीमे से हँसता हुआ उसे गले लगाया.

"माफ़ करो, मेरी जान. मैं नहाने में था, तुम्हारे लिए तैयार हो रहा था. तुम जानती हो मैं

कितना इंतज़ार करता हूँ इन लम्हों का." उसके हाथ उसकी पीठ पर घूमे, उसे और करीब खींचते हुए.

वह थोड़ी पिघली, लेकिन धीमे से दांती. "इंतज़ार? तुमने तो मुझे दिल का दौरा दिला दिया. अगर जाबिर

जल्दी घर आ जाता? या कोई पडोसी देख लेता? हुम्हे ज़्यादा संभालना पड़ेगा, रवि. यह खेल नहीं है."

फिर वह घर में गए, उसने दरवाज़ा बंद किया.

उसने उसके माथे पर चूमा, फिर होंठों पर, चुम्बन गहरा हुआ. "मैं जानता हूँ, नफीसा. लेकिन

जब तुम्हारे साथ होता हूँ, दुनिया गायब हो जाती है. तुम्हारा शौहर दूर, मेरी बीवी गाओं में—

यह हमारा वक़्त है."

जब वह चुम्बन कर रहे थे, उसकी उँगलियाँ उसके आबए के बटन खोलने लगी, धीरे से उतार कर

नीचे का भूरा पंतय और ब्रा दिखा दिया. वह मदद की, कपडा उतारा, जिस्म एक दुसरे से डाब गए, हाथ

घूम रहे the—uske हाथ उसकी झूलों पर, उसके हाथ उसकी शर्ट पकडे.

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मैं और देखना नहीं चाहता था; यह मंज़र गन्दी और जानकारी वाली एहसासात जगा रहा था. कुणाल ने

वार्निंग दी थी: जितना ज़्यादा देखूँगा, उतना शर्मिंदा नहीं रहूँगा, गुनाह को आम समझूंगा, शायद

खुद hi उसमें घुस जाऊंगा.

जैसे आग को खुराक dena—voyeurism का शुरूआती चिंगारी मोरल को खा जाने वाले तूफ़ान में बदलती

है. देखना हद्द को मिटा देता है, मन को नार्मल बना देता है, देखने वाले को रूह में शामिल

कर देता है. मैं पीछे हटा, लेकिन जानकारी ने मुझे घर के दुसरे तरफ खींच लिया, जहाँ पर्दा

थोड़ा खुला था.

झाँक कर देखा तो फिर हैरत हुई: जाबिर की माँ नफीसा अब नंगी बिस्तर पर, मर. रवि पर सवार. वह ऊपर

नीचे हो रही थी, छातियां हर धक्के के साथ उछाल रही थी, उसका लुंड उसकी छूट में गहरा जा

रहा था.

कमरे में उनकी आहें गूँज रही thi—uski ख़ुशी की सांसें, उसकी कोशिश की सिसकियाँ. वह आगे झुकी,

उसे भूखे अंदाज़ में चूमा, कमर गोल घुमा रही थी, एहसास को खींच रही थी. पसीना उनकी

खाल पर चमक रहा था, बिस्तर ज़ोर से चिल्लाता था.

नफीसा पर गुस्सा उमड़ आया, हालांकि वह रिश्तेदार नहीं थी. वह कैसे कर सकती है? अपने घर, अपने

ईमान के साथ धोका, इस बूढ़े उस्ताद के साथ? यह पर्सनल लगा, जाबिर के दर्द से जुड़ा. और चीज़ें

खुल रही thi—woh गन्दी बातें फिसफिसाती थी,

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"ज़्यादा गहरा, रवि, महसूस कराओ," जबकि वह उसकी गांड दबाता, उसकी रफ़्तार को गाइड करता. मुझे

जाबिर पर तरस आया; पहले उसकी गर्लफ्रेंड रानी को गांड में छोड़ा, अब उसकी माँ नफीसा, असली रंडी, पूरी

तरह लस्ट के हवाले. कुणाल ने कहा था अगर रूह पूरी तरह क़ब्ज़ा कर ले तो औरत नफीसा जैसी हो जाती

hai—be-qaid, बिना पछताए सुख तलाश करती.

तब मैंने चुपके से क़सम खायी: मैं अपनी माँ पर ऐसा कभी नहीं होने दूंगा. पूरी तरह नहीं. जो

भी उसमें बस्ता है, मैं उससे लडूंगा. मैं चल पड़ा, और देख नहीं सका, रात पूरी तरह गिर चुकी

थी, तारे आसमान पर चमक रहे थे.

घर जाते हुए कदम दिलाने लगा; जाना नहीं चाहता था

क्यूंकि अब घर रंडीखाना लगता था. क्यों? दादी का सूरज के साथ रसोई में चुम्बन, माँ का कल रात

गजेंद्र के साथ zina—ghar की पाकि जगह गुनाहों से मैली हो गयी.

हमारा घर पहले पवित्र था, माँ की मौजूदगी से नेकपन का आशियाना, अब गांड की बू आती है, हर

कोने में सेक्स की ख़याली बू लटकती है.

मुझे पता था माँ देर से आएगी, अभी भी हॉस्पिटल में अब्बू की देखभाल कर रही होगी. एक अँधेरी

गली से शॉर्टकट लेते हुए मैं हमारे दरवाज़े पर pahuncha—jaise उम्मीद थी, ताला लगा था. जैसे hi

चाबी निकाल रहा था, सामने गजेंद्र के घर की तरफ dekha—aur हैरत से जैम गया.

माँ वहां थी उसके साथ दरवाज़े पर, हाथ उसके बाज़ू पर, कुछ कहते हुए धीमे से सर हिलती हुई.

उस पर रेशम जैसी नीली ड्रेस थी जो जिस्म को शानदार अंदाज़ में लपेट रही थी, हल्का नीला स्कार्फ़

कन्धों पर. उसने उसे अंदर बुलाया, हाथ उसकी पीठ के नीचे रखा, दरवाज़ा बंद हुआ.

मुझे नहीं पता वह क्या करने वाला tha—baat? और कुछ? शायद उसी बिस्तर पर छोड़ेगा? और क्यों माँ

हमेशा मन करने के बाद भी उसके इशारे क़ुबूल करती है?

सुबह पाकपन की दुआ मांगी थी, रोकने

की क़सम खायी, फिर भी जैसे पतंगा आग की तरफ खींच ली गयी. यह तकरार मुझे खा रही थी,

मैं अँधेरे में खड़ा रहा, चाबी हाथ में भूल गया.

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CHAPTER 15

गजेंद्र मेरी माँ को रंडी बनाने की ट्रेनिंग दे रहा है, लेकिन

मैं इससे होने नहीं दूंगा.

मैं हॉलवे के अँधेरे में और छुप नहीं सकता था; सब कुछ का बोझ मुझे पीछे के दरवाज़े

से बहार धकेल रहा था. मैं चुपके से यार्ड से गुज़र कर गली में निकल आया. मुझे पता था

गजेंद्र कहाँ रहता है — मोहल्ले के शांत हिस्से में उसका बड़ा बंगला, हमारे घर से ज़्यादा

दूर नहीं, saaf-suthra बगीचा और ऊँची दीवारें जो उसके धन्दों से आयी दौलत चिल्लाती थी.

कुछ कह रहा था की वह वही जायेंगे; माँ घर पर नहीं रुकेगी जब daadi-dada सो रहे होंगे पास

में. मुझे खुद देखना था, यह खौफनाक सपना सच है या नहीं.

उसके घर के पास चुपके पहुंचना अपनी hi ज़िन्दगी में चोर बनने जैसा लग रहा था. मैं अँधेरे

में चिपका रहा, सड़क के बिजली के खम्बे से दूर, जिनके लम्बे तेज़ उजाले सड़क पर मुझे इलज़ाम

लगा रहे थे.

दरवाज़ा बंद था, लेकिन साइड का रास्ता एक छोटी दीवार तक ले गया जिसे मैं चुपके से पार कर सकता

था, दिल कान में धड़क रहा था जैसे ढोल. बगीचे में धीरे से उतरा, फिर लिविंग रूम की खिड़की

की तरफ बढ़ा. पर्दा थोड़ा खुला था, अंदर की गरम रौशनी से एक छोटा सा नज़ारा मिल रहा था.

जब मैंने झाँका, सांस रुक गयी. वहां थे: माँ और गजेंद्र, उसके महंगे चमड़े के सोफे सेट पर

बैठे, वह aish-o-araam वाला सामान जो अब्बू कभी हमारे छोटे घर के लिए खरीद नहीं सकते.

माँ उसके बगल में छोटी और कमज़ोर लग रही थी, आबय पहने हुए लेकिन वैल ढीला, काले बालों की

कुछ लातें बहार निकल आयी थी.

गजेंद्र, साफ़ शर्ट और पंत में, पास झुका हुआ, हाथ उनके बीच

के कुशिओं पर रख कर, जैसे यह सब आम बात हो.

हमारे _ तहज़ीब में यह आम नहीं — यह सब कुछ का गहरा धोका था जो हम पाक समझते

थे. एक shaadi-shuda औरत जैसे माँ को किसी दुसरे मर्द के घर में अकेली नहीं होना चाहिए, वह भी

इतनी रात को. ऐसी तन्हाई शैतान को दावत देती है, और घर की इज़्ज़त को खतरे में डालती है.

माँ ने हमेशा मुझे यह सिखाया था — इज़्ज़त, hadd-bandiyan, दीं की हिफाज़त. फिर भी यहाँ वह सब

तोड़ रही थी, उसके घर में मौजूदगी हमारे ईमान के खिलाफ एक चुप्पी चीख थी.

सिर्फ काम की बात नहीं थी; यह छुपाना था, शादी के हलाल दायरे से बहार निकलना, वह भी जब अब्बू

हॉस्पिटल में बीमारी से लड़ रहे थे, उनकी ज़िन्दगी महंगे इलाज के तारों पर लटकी हुई थी जिसमे

गजेंद्र ने कुछ मदद की थी. कैसे कर सकती थी वह? यह मुनाफ़िक़ात मेरे सीने में जल रही थी,

गुस्से और दुःख का mila-jula दर्द.

खिड़की के पास से उनकी आवाज़ें हलकी सुनाई दे रही थी, गिलास के पार से, थोड़ी धुंधली लेकिन समझ आती

हुई. गजेंद्र अपनी वह नरम, कैल करने वाली आवाज़ में बात कर रहा था, जो वह धन्दों में

इस्तेमाल करता था.

“शाहिदा, मेरी बात सुनो,” उसने धीरे से कहा, हाथ उसके हाथ की तरफ बढ़ता हुआ. “तुम कुछ गलत

नहीं कर रही. जो हमारे बीच है… यह धोका नहीं. तुम्हारा शौहर बीमारी में है, और तुम इतने

दिन अकेली बोझ उठा रही हो. मैंने बिल, दूकान की मदद की — क्यूंकि मुझे तुम्हारी फ़िक्र है, मजबूरी

से नहीं. यह रिश्ता… यह फिटरी है. दो लोग मुश्किल दुनिया में सुकून ढूंढ रहे हैं.”

माँ सोफे पर बेचैन हुई, नज़रें नीचे, आबय के किनारे से खेलती हुई. “गजेंद्र, मैं आज रात तुम्हे

यह ख़तम करने आयी हूँ,” उसने इक़रार किया, आवाज़ मज़बूत लेकिन कांप रही. “मैं यह जारी नहीं

रख सकती. यह हराम है — हर तरह से गलत.

मेरा खंडन, मेरा दीं… मैं यह चेहरे से चेहरे

मिलकर कहने आयी हूँ की यह ख़तम. अब कोई मुलाक़ात नहीं, कोई… कुछ भी नहीं.”

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गजेंद्र: (दरवाज़ा खोल कर उसके कमरे में ले जाता हुआ, उसकी कमर पर हाथ रख कर) अंदर आओ

शाहिदा. दरवाज़े पर कड़ी मत रहो जैसे डर्टी हुई बिल्ली. हमें कल रात की बात करनी है.

माँ: (अंदर धीरे से कदम रखते हुए, आबय sar-sarati हुई, idhar-udhar देखती हुई) गजेंद्र, तुम

मुझे यहाँ क्यों लाये? यह तुम्हारा घर है… यह ठीक नहीं. अगर कोई देख लेगा? मुझे तुमसे बात भी

नहीं करनी चाहिए कल के बाद… जो हुआ उसके बाद.

गजेंद्र: (दरवाज़ा बंद कर के, मुस्कुराते हुए उस पर टिक कर) ठीक? यह बात तुमसे सुन्ना अजीब है. मैं

तुम्हे इसलिए लाया क्यूंकि तुमने सुबह मैसेज किया था, सब कुछ साफ़ करने की बात कर रही थी.

बैठो, आराम से. या डर्टी हो की फिर से मुझ पर टूट पड़ोगी?

माँ: (सोफे के किनारे पर बैठती हुई, हाथ गॉड में जकड कर, आवाज़ मज़बूत लेकिन कांप रही) नहीं,

मेरी बात सुनो. कल रात… तुम्हारे साथ वह जिस्मानी रिश्ता मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी गलती थी. मैं

कमज़ोर थी, मेरा शौहर हॉस्पिटल में है, और मैंने शैतान को जीतने दिया. यह कभी दोबारा नहीं हो

सकता.

गजेंद्र: (हंस कर, उसके बहुत पास बैठ कर, टांग उसकी टांग को छूती हुई) सबसे बड़ी गलती? अरे बस

करो शाहिदा. तुम तोह भूतनी की तरह कराह रही थी, और ज़्यादा मांग रही थी. ‘ज़ोर से, गजेंद्र, मुझे

भर दो’ — याद है? तुमने हर पल मज़ा लिया, तुम दीनदारों वाली मुनाफ़िक़.

माँ: (चुप हो गयी, ज़मीन को घूरती हुई, गाल शर्म से लाल, यादें लौट आयी)

गजेंद्र: (आगे बढ़ते हुए, मज़ाक उडाता हुआ) देखा? जुबां काट गयी? या सच चुभ रहा है? तुमने कल

रात तीन बार मज़ा लिया! और साथ में कहती रही की यह गलत है. यह गलती नहीं; यह तुम्हारा इक़रार

है की वैल के नीचे तुम कितनी छिनाल हो.

माँ: (लम्बी ख़ामोशी के बाद, सर उठा कर, आवाज़ कांप रही) लेकिन… मेरा मज़हब, गजेंद्र. ., सफाई,

हाय सिखाता है. जो हमने किया वह हराम है — जीना, बदकारी. या ,.', मैंने अपने ईमान को धोका दिया,

अपने खंडन को. अब मैं मस्जिद में कैसे मुँह दिखाउंगी?

गजेंद्र: (आँखें घूमते हुए, हाथ हवा में हिलाते हुए) मज़हब? मुझे छोड़ दो. तुम पहली

_ औरत नहीं जो एक मातुरे ***** मर्द के लिए टांगें फैलाती है. यह सिर्फ जिस्मानी बात है,

शाहिदा. तुम्हारा खुदा ने कल रात तुम्हे सजा नहीं दी, न? शायद वह देख कर सोच रहा हो, ‘आखिर

यह थोड़ी ज़िन्दगी जी रही है.’

माँ: (सांसें तेज़, zor-zor से हांफने लगी, सीना आबय के अंदर upar-neeche हो रहा, गुस्सा और na-chahi

हुई चाहत का मिलाप)

गजेंद्र: (उसकी हांफ देख कर, और पास झुक कर, गर्दन पर सांस डालते हुए) देखो तुम्हे, फिर से गरम

हो रही हो. हाफ रही हो जैसे गरम कुटिया. कहती हो गलती थी, लेकिन जिस्म सच बोल रहा है. चाहो तो साबित

कर दूँ?

माँ: (उसे थोड़ा पीछे धकेल कर, आँखें गुस्से से चमकती हुई) बस करो! पास मत आओ. मैं ऐसी

औरत नहीं, गजेंद्र. मुझे छूना या चुम्बन नहीं करने डौगी. मैं यहाँ तौबा करने आयी हूँ, कहने

आयी हूँ की हम अब नहीं मिल सकते. यह अभी ख़तम!

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गजेंद्र: (रुक कर, फिर नरम आवाज़ में इलज़ाम लगते हुए, चेहरा गंभीर) तौबा? ठीक है, कर लो. लेकिन

सोचो, तुम्हारा शौहर हॉस्पिटल में अकेला पड़ा है. आज उससे कौन मिलने गया? मैं — सुबह फल देकर आया

था. और तुम? इतने सालों में पहली बार ज़िंदा महसूस करने वाली चीज़ पर अफ़सोस कर रही हो. अगर मुझे

छोड़ डौगी, तो बिल कौन भरेगा, काम कौन करेगा? सिर्फ मुझे नहीं, तुम अपना सहारा छोड़ रही हो.

माँ: (फिर चुप, उसके शब्दों का बोझ महसूस करते हुए, जानती थी की वह सही कह रहा है मदद के बारे

में, हांफना धीमा हुआ लेकिन इरादा टूट रहा था)

गजेंद्र: (उसकी ख़ामोशी का फ़ायदा उठा कर, धीरे से उसका थोड़ी चीन पकड़ कर चेहरा ऊपर किया, पहले

धीमे से होंठ रखे, फिर ज़ोर से, दूसरा हाथ कमर पर)

माँ: (चुम्बन में धीमी कराह के साथ, जिस्म जवाब दे रहा था जबकि वह विरोध करती रही) ममम…

नहीं गजेंद्र… रुक जाओ… अहह… यह गलत है… प्लीज…

गजेंद्र: (चुम्बन गहरा करते हुए, जीभ होंठों पर, साँसों के बीच फिसफिसाते हुए) श, बस महसूस

करो. तुम जानती हो तुम्हे यह चाहिए. कल रात गलती नहीं थी — यह शुरुआत थी. तुम्हारा मज़हब इंतज़ार

कर सकता है; यह नहीं.

माँ: (फिर कराह कर, हाथ कमज़ोर से उसके सीने पर धकेल रही लेकिन रोक नहीं प् रही, गुनाह और चाहत

के बीच फँसी) ओह्ह्ह… मैं नहीं कर सकती… या रब्ब माफ़ करना… और नहीं…

गजेंद्र: (थोड़ा पीछे हटा कर आँखों में देख कर, मुस्कुराते हुए) देखा? तुम पहले से गीली हो

न? इक़रार करो शाहिदा — तुम वैसी hi औरत हो. अब चलो, सोफे पर एक और ‘गलती’ कर लेते हैं.

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मैं यह सब देख कर गुस्से से आग बबूला हो रहा था — कैसे वह अब्बू का धोका दे सकती थी? लेकिन

फिर एक अजीब समझ उभरी: यह माँ नहीं थी. यह वह औरत नहीं जो मैं जानता था, वह दीनदार

माँ जो कभी ,,., नहीं छोड़ती. शायद वह jinn-zada हो गयी हो, कोई अँधेरी ताक़त ने उस पर

क़ब्ज़ा कर लिया हो.

मुझे कुणाल याद आया, वह अजीब बूढ़ा जो अपने घर के पास रहता था, जो रूहों और लानतों की

बातें करता था जब मैंने उससे खंडन की परेशानी बताई थी. मैं ने फ़ोन निकला, झाड़ियों

के पीछे और नीचे झुक कर, जल्दी से उसका नंबर लगाया.

“कुणाल चाचा? मैं हूँ,” मैंने फिसफिसाते हुए कहा जब उसने जवाब दिया, उसकी आवाज़ उम्र से भरी हुई.

“यह, छोटा. देर रात का फ़ोन — ज़रूर मुश्किल है. अब क्या साया साथ है?”

मैंने खिड़की की तरफ देखा, वह अभी भी एक दुसरे में लिपटे हुए. “माँ… वह उस मर्द गजेंद्र के

साथ है. चुम्बन कर रही है, और शायद और भी होगा. वह ख़तम करने आयी थी, लेकिन अब हार

रही है. जैसे वह खुद नहीं है.”

उसने गहरी सांस ली, जैसे यह उम्मीद थी. “Jinn-zada है बीटा. छिनाल रूह का — लस्ट का जीन, जो कमज़ोर

रूहों पर चढ़ता है. पहली ग़लत हरकत में घुस गया होगा, शायद पहली ब्लोजॉब या कोई ग़लीज़

काम में. अब वह हराम चीज़ों की भूख बढ़ता है, इरादे को कमज़ोर करता है. पुराणी कहानियों

में देखा है; यह गुनाह और चाहत पर पलटा है.”

मेरी आँखें फैल गयी. “Jinn-zada? इसलिए… वह लड़ रही है लेकिन असल में नहीं. मैं क्या करून?”

“कुछ मत करो,” उसने सख्ती से कहा. “दखल मत दो. रूह टकराव से मज़बूत होती है — तुम पर

भी चढ़ सकती है या और बुरा कर सकती है. होने दो; सिर्फ वह खुद सच्ची तौबा से या किसी अमल

से निकाल सकती है. अभी रोको तो यह और गहरा हो जायेगा.” “क्यों? मैं कैसे सिर्फ देखता रहूं!”

“क्यूंकि बीटा, jinn-zada आसान नहीं. यह उसके जज़्बात से जुड़ा है — अब्बू की बीमारी से तन्हाई, उस मर्द

का एहसान. ज़बरदस्ती रोकोगे तो कुछ नहीं रुकेगा; अंदर से लड़ना पड़ेगा. खुद को बचा के रखो,

उसके लिए दुआ करो.”

गुस्से में भी उसकी बात सही लगी, मैंने शुक्रिया कहा और फ़ोन बंद कर दिया. खिड़की पर वापस

देखा तो मंज़र बदल चूका था. माँ सोफे से कड़ी हुई थी, थोड़ा चल रही थी, पीठ उसकी तरफ.

“गजेंद्र, मैं यह और नहीं कर सकती,” उसकी आवाज़ टूट रही थी. “हर बार हारने पर गुनाह मुझे

खा जाता है. मैं बीवी हूँ, माँ हूँ — अपने खंडन को कैसे मुँह दिखाउंगी? यह रिश्ता मुझे

tukde-tukde कर रहा है. मैं ख़तम करने आयी थी, जारी नहीं रखने.”

वह भी खड़ा हुआ, पीछे आया, हाथ उसके कन्धों पर धीरे से रखे. “शाहिदा मेरी जान, मैं

तुम्हारा दुःख समझता हूँ. लेकिन सोचो — तुम्हारी nek-dili अब भी चमक रही है.

तुम यहाँ हो

क्यूंकि तुम्हारा एक हिस्सा, वह मज़बूत और reham-dil औरत जो मैं जानता हूँ, जानती है की यह बुरा

नहीं. यह इंसानी है. तुमने सब कुछ हुसैन के लिए क़ुर्बान किया. लेकिन तुम्हारी खिदमत कौन करता

है? मुझे इजाज़त दो.”

वह थोड़ा पीछे उस पर झुक गयी, इरादा कमज़ोर होता हुआ.

“लेकिन यह गलत है… हराम. मुझे लगता है मैं दो लोग हूँ — एक अच्छी, एक… गुमराह.” “यह लड़ाई

है, लेकिन तुम्हारी अच्छे ख़तम नहीं हुई; वह थक गयी है. मुझे उससे ज़िंदा करने दो,” उसने फिसफिसाया,

हाथ उसकी बाहों पर नीचे मसाज करते हुए. धीरे से हाथ सीने पर गए, आबय के ऊपर से उसके

सीने को पकड़ते हुए. माँ ने सांस रोकी. “गजेंद्र, रुक जाओ… हमें नहीं करना चाहिए.”

“क्यों रुकना जो तुम चाहती हो, शाहिदा? तुम्हारा जिस्म सच बोल रहा है — देखो कैसे जवाब दे रहा

है. तुम्हे यह सुकून चाहिए, यह तवज्जोह. इंकार करने से दर्द और बढ़ेगा.”

वह फिर विरोध करती रही, “प्लीज, नहीं… मेरे दीं को सोचो, मेरे ईमान को, मेरे खंडन को” लेकिन

आवाज़ धीमी थी, जिस्म थोड़ा उसके हाथों में झुक रहा था. वह मसाज जारी रखे, धीरे लेकिन

ज़िद के साथ, दिलासा देते हुए. “तुम्हे यह चाहिए क्यूंकि तुम मज़ा हक़दार हो, सिर्फ फ़र्ज़ नहीं. एक बार

छोड़ दो.”

हुनर से उसने उसकी नीली रेशम की आबय उतरी — कन्धों से फिसलकर ज़मीन पर गिरी, नीचे सदा

लेकिन शानदार लिबास दिखा. मैं हैरान था की वह ज़्यादा विरोध क्यों नहीं कर रही; वह कड़ी रही,

इजाज़त देती हुई, आँखें आधी बंद, अंदर का संघर्ष साफ़.

जब आबय नीचे गिरी, मैं चौंक गया — पीली पंतय और ब्रा में, चमकीला रंग जो उसकी हाय के

खिलाफ था. यह घरेलु अंदरूनी कपडे थे, जो वह कभी खुले में नहीं पहनती — क्या उसने यह उसके

लिए चुना था?

“सुन्दर हो, शाहिदा,” उसने पीछे हटा कर देखा. “देखा? यह तुम हो — वह ज़िंदा औरत जो छुपी

थी.” वह नीचे हाथ से छुपाने लगी. “गजेंद्र, यह पागलपन है. वापस पहना दो… मैं खुद

को समझ नहीं प् रही. एक पल भागना चाहती हूँ, दुसरे में… रुक जाती हूँ. मैं ऐसी क्यों हूँ?

गुनाह, चाहत — सब उलझा रहा है.”

वह उसे फिर खींच कर पास लाया. “क्यूंकि तुमने अपनी ज़रूरतों को बहुत देर दबाया है. मैं

ज़बरदस्ती नहीं कर रहा; तुम खुद चुन रही हो. याद करो मैंने तुम्हारे खंडन की कितनी मदद

की? क्या मैं तुम्हारे भरोसे के क़ाबिल नहीं? हमारा इंकार na-shukri होगी, न?”

माँ और शिकायत करती रही, आवाज़ टूट रही. “मैं शिकायत इसलिए करती हूँ क्यूंकि मैं जानती हूँ

यह गुनाह है. मैं समझ नहीं प् रही की मैं चली क्यों नहीं जाती. दिमाग चीख रहा है रुक जाओ,

लेकिन जिस्म… धोका दे रहा है. मैं कैसी माँ हूँ जो शौहर ज़िन्दगी लड़ रहा है और मैं चुपके

से यहाँ?”

“बिलकुल — एक माँ जो इंसान है, शाहिदा. कोई कामिल नहीं. मुझे दिखाने दो की यह ठीक है.” उसके

इलज़ाम काम कर गए; वह चुप हो गयी, विरोध नहीं किया जब उसने गर्दन पर चुम्बन किया.

कुणाल की बात अब बिलकुल सही लग रही थी — वह छिनाल रूह उसकी कमज़ोरियों को बढ़ा रही थी, अच्छे

को चाहत की लहरों के सामने कमज़ोर कर रही थी.

गजेंद्र ने धीमे से कहा, “चलो, मुझे भी उतारो — दिखाओ की तुम यह चाहती हो.” माँ, जैसे

बेहोशी में, उसकी पंत की तरफ हाथ बढ़ाया, धीरे से खोलने लगी. वह खुद नहीं थी; हरकतें

यांत्रिक लेकिन उत्साही, आँखों में वह jinn-zada पैन साफ़.

यह देख कर, शर्म से, मेरा जिस्म भी रियेक्ट कर रहा था — मेरा लुंड सख्त हो रहा था गुस्से के

बावजूद. मैं बुरा बीटा था, अपनी माँ के गिरने पर उत्तेजित, यह हराम चाहत मेरे अँधेरे जज़्बात

को खींच रही थी. पंत के अंदर धड़क रहा था, खौफ और na-chahi हुई चाहत का मिलाप मुझे

बेचैन कर रहा था.

वह फिर चुम्बन करने लगा, गहरा, होंठ उसके होंठों पर दावा करते हुए. माँ ने मन नहीं

किया; जवाब दिया, हाथ उसके चेहरे पर. वह सिर्फ सफ़ेद अंदरूनी कपडे और शर्ट में था, उभार

साफ़. उसके हाथ उसकी बड़ी गांड पर गए, मज़बूत गाल मसलते हुए, अपना हक़ जताते हुए.

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उस वक़्त माँ सबसे बुरी औरत और माँ थी — हॉस्पिटल में अब्बू बीमारी से लड़ रहे थे, तुबे और

मशीन उन्हें ज़िंदा रखे हुए, और वह दुसरे मर्द के साथ जोश से चुम्बन कर रही थी.

उसका धोका गहरा था, अपने वादे छोड़ कर इस जोश के लिए, हम सब को अँधेरे में छोड़ कर.

अचानक वह पीछे हटी. “रुको गजेंद्र… मुझे अपने घर वालों को मैसेज करना है.

उन्हें कहना है की मैं आज रात घर नहीं आउंगी — हॉस्पिटल में रहूंगी अब्बू के साथ.”

उसने सर हिला दिया, मज़े लेते हुए. “कर लो.”

माँ ने कभी ऐसा झूठ नहीं बोलै था; वह हमारे घर की सच्चाई की बुनियाद थी, हमेशा

साफ़, मुझे सच सिखाती थी. लेकिन जीन ने उसको बदल दिया, झूठ को आसान बना दिया, यह इस

बात का निशाँ था की वह कितना गिर चुकी थी. उसने फ़ोन उठाया, जल्दी से लिखा: “अब्बू के साथ

हॉस्पिटल में रह रही हूँ. फ़िक्र मत करना. प्यार, माँ.”

मेरा फ़ोन जेब में बजा — मैसेज मिला, मैं हैरान देख रहा था. एक खुला झूठ, ठंडा

और साफ़. गजेंद्र हंस पड़ा.

“देखा? तुम भी ज़रुरत पड़ने पर सच मोड़ सकती हो. तुम किसी से काम नहीं.”

माँ चुप रही, फ़ोन जेब में दाल दिया बिना जवाब दिए. क्यों शिकायत नहीं की? रूह ने उसकी

शिकायतों को चुप कर दिया, उसकी तस्लीम पर पल रही थी.

बाद में मंज़र और तेज़ हो गया. माँ उसके सामने सोफे पर घुटनों के बल बैठी, हाथ से

उसकी अंदरूनी पंत नीचे की. वह उसके लुंड को मुँह में लेने लगी, पहले धीरे से होंठ चरों

तरफ लपेट कर, फिर तेज़ रफ़्तार से.

वह धीरे चूसती रही, जीभ सर पर घुमा रही, हर बार और गहरा ले लेती. गाल अंदर धंस

रहे थे जब वह चूस रही थी, आँखें बंद, ध्यान से, थूक उसकी लम्बाई पर चमक रही.

एक हाथ से नीचे से सेहला रही थी, थोड़ा मुद कर, दूसरा हाथ उसके अंडे को प्यार से पकडे

हुए. यह सब तफ्सील से, घरेलु — बीच बीच में नीचे से चाट कर फिर पूरा अंदर लेती,

हल्का गैग करती लेकिन रूकती नहीं.

शायद इसका मतलब था की छिनाल रूह दोबारा उस पर क़ब्ज़ा मज़बूत कर रही थी, जैसे कुणाल ने

कहा था पहली ब्लोजॉब में घुस गया था. अब दोहरा कर उसका क़ब्ज़ा और मज़बूत हो रहा था,

उसे और बेकाबू बना रहा था.

माँ: (सिर्फ पीली ब्रा और पंतय में गजेंद्र के सामने घुटनों के बल बैठी, हाथ जाँघों

पर कांप रहे, नज़रें शर्म से नीचे) गजेंद्र, प्लीज… मैं यह फिर नहीं कर सकती. यह

इतना गुनाह है. मेरा शौहर हॉस्पिटल में ज़िन्दगी लड़ रहा है… मैं उसका कैसे धोका दे

सकती हूँ?

गजेंद्र: (उसके ऊपर खड़ा, पंत की ज़िप खोलते हुए और अपना सख्त होता लुंड बहार निकालते हुए,

उसके परदे वाले चेहरे की तरफ मुस्कुराते हुए) अरे आओ न शाहिदा, तुम पियस छोटी रंडी.

पिछली बार हॉस्पिटल के स्टोर रूम में तुमने एक शिकायत भी नहीं की — घुटनो पर बैठ गयी

जैसे अच्छी छिनाल और मुझे पूरा चूस लिया. अब खोलो अपना यह मुस्लिम मुँह और पूजा करो इस

***** लुंड की. यह hi तो तुम चाहती हो, है न?

माँ: (सर हिलाते हुए, आवाज़ कांप रही) नहीं, नहीं… पिछली बार गलती थी, एक पल की कमज़ोरी.

तुरंत पछतायी थी. प्लीज मुझे मत करवाओ… यह मेरे हर ईमान के खिलाफ है. मैं माँ

हूँ, बीवी हूँ… ऐ ,.' मुझे माफ़ कर…

गजेंद्र: (उसके वैल को धीरे लेकिन मज़बूती से पकड़ते हुए, उसका चेहरा अपने धड़कते लुंड

के करीब लाते हुए) पछतावा? बकवास. तुमने हर बूँद निगल ली थी जैसे गन्दी छुम पीने वाली

वैली कुटिया. किसी को बेवक़ूफ़ नहीं बना रही, शाहिदा. अब अच्छी लड़की बनो और चूसना शुरू करो,

या मैं हॉस्पिटल में तेरे बीमार शोहर को बता दूँ की उसकी वफादार बीवी "विजिट" के वक़्त असल

में क्या करती है?

माँ: (हलके से होंठ खोलते हुए, सिर्फ अगला हिस्सा मुँह में लेते हुए, हलके से चूसती हुई बिना गहरा

लिए, गाल शर्म से लाल) ममम… मुझे यह बुरी बातें मत कहो… यह बहुत अपमानजनक है…

अहह… प्लीज गजेंद्र, थोड़ा इज़्ज़त करो…

गजेंद्र: (बुरी तरह हँसते हुए, थोड़ा धक्का देकर मुँह में और अंदर धकेल ते हुए) एक

धोकेबाज़ छिनाल के लिए? तुम घुटनो पर बैठी हो सिर्फ अंदर के कपड़ों में, शाहिदा, पडोसी का

लुंड चूस रही हो जब तेरा शोहर मशीन से जुड़ा है. कैसी पियस मुस्लिम करती है यह? चूसती

रहो, तुम बेकार रंडी — जुबां ज़्यादा उसे करो, सर के चरों तरफ घुमाओ जैसे तुम यह बेबस

कुटिया हो.

माँ: (थोड़ा और चूसती हुई, हाथ अनिच्छा से उठाकर लुंड की जड़ रगड़ती हुई, लेकिन पूरा नहीं लेती,

मुँह में बोलती हुई) मममफ… और बुरी बातें मत करो… यह पहले से hi बहुत शर्मिंदा कर

रहा है… मेरे परिवार का सोचो… ओह्ह…

गजेंद्र: (धीमे से कराहते हुए, उसे घिन से देखते हुए) शर्मिंदा? अच्छा है, यही मक़सद है.

ज़्यादा ज़ोर से रगड़ो शाहिदा — लुंड को रगड़ो जब चूस रही हो. सोचो तुम्हारे बच्चे अपनी मम्मी

को ऐसे देख लें — पीली ब्रा में लटकते चूचे, पंतय अपने hi रास से भीगी हुई. और तुम्हारा

बेचारा शोहर? वह मर जायेगा यह जान कर की उसकी ईमान वाली बीवी असल में लुंड की भूखी

नकली है. अब गहरा लो, पूरा मुँह में लो वर्ण मैं ज़बरदस्ती दाल दूंगा.

माँ: (खुद के खिलाफ जाते हुए भी मान लेती, ज़्यादा मुँह में लेती और तेज़ रगड़ती, आँखें

आंसुओं से भरी) ममम… अहह… तुम इतने ज़ालिम क्यों हो? मैं अच्छी माँ बनना चाहती हूँ… अच्छी

बीवी… यह मैं नहीं हूँ…

गजेंद्र: (धीमे धक्के देते हुए, हाथ उसके सर पर) ज़ालिम? मैं तो सच बोल रहा हूँ. तुम

कभी अच्छी माँ या बीवी नहीं बनोगी शाहिदा — इसके बाद नहीं. अब धीरे चूसो, नीचे वाले हिस्से

को जुबां से छेड़ो. हाँ, ऐसे hi. बताओ, तुम्हारे मज़हब में काफिर के लुंड चूसने के बारे

में कुछ कहा है? या इसलिए तुम ,,., के पीछे छुपती हो, गन्दी छोटी गुनहगार?

माँ: (हुक्म के मुताबिक़ धीमे करती, जुबां जैसे कहा उसी तरह चलती, चूसने के बीच विरोध

करती) ममम… मेरा मज़हब पवित्रता सिखाता है… शर्म… ओह्ह… मैं रोज़ा रखती हूँ, ,,.,

पढ़ती हूँ… यह शैतान का काम है… प्लीज मेरे मज़हब का ज़िक्र मत करो…

गजेंद्र: (मुस्कुराते हुए, थोड़ा तेज़ धक्के देते हुए) पवित्रता? है! अब तेज़ करो, सर को झटके दो

जैसे उस्ताद हो. सोचो तुम्हारी दादी ज़ैनब ने भी शायद कसाई के साथ यही किया होगा — रंडी के

खून की बात, सही? और तुम्हारा बीटा? शायद उससे शक है की उसकी माँ रंडी है. गेहरो, गाला तक

लो, दिखाओ कितना नीचे गिर चुकी हो.

माँ: (तेज़ झटके देती, हल्का गाला तक लेते हुए खांसती, हाथ अभी भी रगड़ रहा, आंसू बह रहे)

गह… ममम… नहीं, उन्हें इसमें मत घसीटो… यह बहुत ज़्यादा है… अहह… तुम्हे मुझे ऐसे नंगा

करने में मज़ा क्यों आता है?

गजेंद्र: (ख़ुशी से कराहते हुए, झड़ने के करीब) क्यूंकि तुम इसके लायक हो, िमानहीं कुटिया.

हाथ बदलो — अब बाए हाथ से रगड़ो, चूसने में ज़्यादा ज़ोर लगाओ. हाँ… हॉस्पिटल के विजिट के

बारे में बात करो; क्या मुझे चूस कर तुम्हे ज़िंदा महसूस होता है जब वह मर रहा है?

माँ: (हुक्म के मुताबिक़ हाथ बदलती, चूसने में ज़ोर लगाती, आवाज़ डब्बी और मिन्नत भरी)

मममफ… विजिट उसके लिए होते हैं… सहारा देने के लिए… ओह्ह… यह मुझे गुनहगार महसूस करता

है… गन्दा…

गजेंद्र: (तेज़ सांस लेते हुए, उसे और मज़बूती से पकड़ते हुए) गुनहगार? होना चाहिए. मैं

झड़ने वाला हूँ शाहिदा — चूसती रहो ओह्ह्ह आअह्ह्ह्ह मत हटना. अब तुम मेरी पर्सनल मुस्लिम

माल निकालने वाली हो.

माँ: (आँखें दर से फैली, पीछे हटने की कोशिश लेकिन हाथ ने रोका, खांसती हुई जब गरम

झाड़न मुँह में डालता है) मममफ! नहीं… गह… (ज़ोर से पीछे खींचती, उसका माल ज़मीन पर

गिरता, खांसती और सांस लेती) ऐ भगवन… तुमने यह क्यों किया? मैं गाला तक खांसी… हर जगह

बिखर गया… यह घिन आता है…

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गजेंद्र: (हाँफते हुए, ज़मीन पर बिखेरे माल को संतुष्ट मुस्कराहट से देखते हुए) यह तो

परफेक्ट था, तुम बेशर्म छिनाल. देखो खुद को — अंदर के कपड़ों में घुटनो पर, थोड़ी सी माल

थोड़ी सी दादी पर टपक रही. तुमने चैंपियन की तरह लिया शाहिदा. इतनी अच्छी छोटी रंडी, चाहे

थोड़ा बर्बाद किया. अगली बार सब निगल लेना, मेरी पियस पसंदीदा.

मैंने उसके मुँह में लेने के तरीके में उसके साथ कुछ भूत का निशाँ देखा: पहले विरोध

के बावजूद उतावलापन, जिस्म का हरकत में आना जैसे कोई बाहरी ताकत चला रही हो, जैसे माहिर

हो. क्यों? क्यूंकि असली माँ शर्म से पीछे हैट जाती; यह वाली इसे चाहती थी, रूह ने ख्वाहिश को

बढ़ा दिया.

वह करहा, फिर बोलै, "पेट के बल लेट जाओ शाहिदा. मुझे तुम्हारा स्वाद लेने दो."

वह मान गयी, सोफे पर पेट के बल लेट गयी, अभी भी ब्रा में. उसने धीरे से उसकी पंतय उतरी, ब्रा

के अलावा पूरा नंगा कर दिया. माँ की छूट और गांड पर हलके बाल थे — प्राकृतिक तराश, शेव

नहीं, काले घुंगराले बाल उन जगहों को फ्रेम कर रहे थे.

गजेंद्र मुस्कुराया. "थोड़ा बाल वहां — जंगली, जैसे तुम्हारे अंदर वाली असली शख्सियत मॉडेस्ट

चेहरे के नीचे. मुझे पसंद है; दिखाता है तुम असली हो."

माँ शर्मा गयी. "मत… यह शर्म की बात है."

उसने गांड के दोनों तरफ धीरे से खोला, छूट के होंठ गुलाबी और गीले, और टाइट गांड का छेद

दिखा. "ममम, बिलकुल जैसे कल रात. मुझे तुम्हारी छूट बहुत पसंद आयी — टाइट, गीली, परफेक्ट.

याद है तुम दो बार झड़ी थी?"

माँ ने जवाब नहीं दिया, शर्मा कर, चेहरा तकिये में दबा लिया.

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वह झुका, छूट चाटना शुरू किया — लम्बी धीमी जुबां के झटके छूट के सोर पर, अंदर दाल

कर उसका रास चखते हुए. माँ पहले धीमे से करहि,

"अहह… गजेंद्र," जिस्म टेढ़ा होता हुआ. चेहरे पर सुख की लहार — आँखें झपकती, होंठ खुले,

गाल लाल. वह माहिर तरीके से चाट रहा था, क्लीट के चरों तरफ गोलाई, हलके से चूसता, फिर

जुबां गहरी डालता, हाथों से टांगें अलग पकडे हुए.

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वह मिन्नत करती, "रुको… यह बहुत ज़्यादा है… प्लीज," लेकिन कमर उसकी तरफ हिल रही थी, शब्दों

के खिलाफ.

फिर वह बदला, जुबां गांड के छेद पर ले गया. मैं हैरान — उसने जुबां गांड के छेद पर

राखी, गोल गोल गीले चक्कर कटे हुए. माँ सांस रोकी, "क्या… नहीं!" लेकिन मुँह वहां क्यों? वहां

तो टट्टी निकलने का छेद है, नापाक, फिर भी वह मज़े से कर रहा था, जैसे हर हिस्से का स्वाद ले

रहा हो.

यह बाद में हुआ, उसने हुक्म दिया, “अब मुझ पर सवार हो जा, शाहिदा. दिखा मुझे कितना चाहती

है तू यह.”

अम्मा ने विरोध किया, उठ कर बैठी. “नहीं कर सकती… यह बहुत बेशर्मी है. मैं ऐसी औरत नहीं

हूँ. कोई देख लेगा तो? और मेरा जिस्म… बच्चे के बाद अब वह पहले जैसा नहीं रहा.”

वह बिस्तर पर लेट गया जहाँ वह दोनों चले गए थे, प्रोत्साहित करते हुए. “बात मत बना — तू

बहुत खूबसूरत है. आ, अब तू कण्ट्रोल ले. बहुत मज़ा आएगा.”

अम्मा झिझकी, फिर ब्रा उतरा, उसके भरे हुए चूचे आज़ाद हो गए, चूचियां सख्त हो चुकी थी.

मैं चाहता था अम्मा रुक जाये, लेकिन वह रुक नहीं सकीय — वह जादू बहुत मज़बूत था. “नहीं

करना चाहिए… लेकिन मुझे ज़रुरत है,” वह धीमे से बोली और उसके ऊपर चढ़ गयी.

गजेंद्र: (बिस्तर पर लेट कर, हाथ उसकी कमर पर जब वह उस पर सवार है, उसका मोटा लुंड उसकी

गीली छूट के अंदर गहरा धंसा हुआ) ममम, यही है, शाहिदा. अब मुझ पर सवार हो जा जैसे वह

छिनाल बन गयी है तू. तेरा यह नेक _ जिस्म मेरे ***** लुंड के चरों तरफ कितना अच्छा

लपेट रहा है.

अम्मा: (सिर्फ ब्रा में नंगी, धीरे धीरे ऊपर नीचे होने लगी, चेहरा शर्म और जोश से लाल,

पीछे हाथ ले जा कर ब्रा खोल दी और गिरने दी, पूरे भरपूर चूचे खुल गए) आह्हः… ओह्ह्ह

… गजेंद्र, यह कितना गुनाह है… तूने मुझे इतनी बुरी औरत बना दिया… ओह्ह्ह…

गजेंद्र: (उसके नंगे चूचूं को देख कर आँखें फैली, मुस्कुराते हुए हाथ बढ़ा कर उन्हें

ज़ोर से दबाया) देख यह बड़े बड़े _ चूचे, शाहिदा. इतने बड़े और उछलते हुए, जैसे

कोई और मर्द उन्हें दूध निकालने को तड़पा रहा हो जो तेरा शौहर नहीं. तुझे शर्म आणि चाहिए,

ऐसे रंडी की तरह दिखा रही है.

अम्मा: (कराह और विरोध के बीच चीखते हुए, जिस्म उसका धोका दे रहा, और ज़ोर से नीचे धकेल

रही) आअह्ह्ह! नहीं… ऐसा मत बोल… ओह्ह्ह… लेकिन कितने सेंसिटिव लग रहे हैं… ममम…

गजेंद्र: (शरारती मुस्कराहट के साथ, चूचियों की चूचियां मसलते हुए) यह चूचे बिलकुल

परफेक्ट हैं, पता है? सख्त लेकिन नरम, वह काले निप्पल मेरे लिए सख्त हो रहे हैं. तेरा

शौहर ने शायद कभी इन्हे ऐसे क़दर नहीं की, क्या? कितना बर्बाद किया एक वफादार बीवी पर — अब

यह मेरे हैं शर्म देने और मज़े लेने के लिए.

अम्मा: (ज़ोर से कराह करते हुए, कमर धीरे गोल गोल घुमा रही) ओह्ह्ह… या ,.'… तूने मुझे

बिगाड़ दिया, गजेंद्र… मैं नेक औरत थी, शर्मीली और पाक… आह्हः… अब देख मुझे, ऐसे तेरे

ऊपर सवार… प्लीज, तू हिलना मत… मुझे खुद कण्ट्रोल करने दे… मैं खुद हिलूंगी…

गजेंद्र: (हंस कर, ऊपर धक्का मरने की कोशिश लेकिन रुक गया जब उसने थोड़ा दबा दिया) आज इतनी

धीमी क्यों, शाहिदा? कल तू मेरे लुंड पर जानवर की तरह उछाल रही थी, और ज़्यादा मांग

रही थी. वह बेशरम छिनाल कहाँ गयी?

अम्मा: (सांसें तेज़, धीमी धीमी तैसे करते हुए ऊपर नीचे) आह्हः… क्योंकि… ओह्ह्ह… मेरा

शौहर हॉस्पिटल में है… आज और ज़्यादा गलत लग रहा है… ममम… और पहले बार से दर्द हो

रहा है… लेकिन रुक नहीं सकती… प्लीज, मुझे धीरे जाने दे…

गजेंद्र: (सर हिला कर, हाथ उसके जिस्म पर फिरते हुए) कुंवारी की तरह धीमी? पहली बार जब

तुझे आबय में देखा था, पड़ोस में चुपके ,,., पढ़ते हुए, कभी सोचा नहीं था तू ऐसी

लुंड की भूखी छिनाल बन जाएगी. कौन जानता था परदे के नीचे एक औरत छुपी थी जो अपने

बीमार शौहर से धोका देने को तड़प रही थी?

अम्मा: (सिसकारी लेते हुए, खुद को रोक नहीं प् रही, तेज़ होने लगी, छूट उसके चरों तरफ कास रही)

ओह्ह्ह… इसके बारे में मत बोल… आह्हः… मुझे मेरी पहली वाली याद मत दिला… यह बहुत

शर्मिंदगी है… ममम…

गजेंद्र: (धीरे ऊपर धक्का मरते हुए उसके तेज़ रदम से मैच करते, मज़ाक उड़ाते हुए

तारीफ) अब बात बानी, तेज़ कर — अच्छी लड़की, शाहिदा. तू कितनी गन्दी मुनाफ़िक़ है, लेकिन तेरी छूट

कितनी टाइट और गीली है, जैसे गुनाह के लिए बानी हो. और देख यह चूचे हर उछाल के साथ

हिल रहे हैं… कितने जादुई, जैसे शर्म के लटके.

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अम्मा: (तेज़ सवार होने लगी, चूचे ज़ोर ज़ोर से उछाल रहे, बेकाबू कराह रही) आअह्ह्ह! ओह्ह्ह…

मुझे ऐसे मत देखो… प्लीज गजेंद्र… आँखें फेर ले… ममम…

गजेंद्र: (घूर कर, हाथ उसके उछलते चूचूं को पकड़ कर) क्यों, शाहिदा? दर लग रहा है

की मैं असली तुझे देख लून? वह शर्मीली _ माँ जो हर पल एक दुसरे मर्द के साथ मज़े

ले रही है?

अम्मा: (चेहरा लाल, शर्म से आँखें चुराता, लेकिन कमर और ज़ोर से नीचे मार रही) ओह्ह्ह…

हाँ… बहुत शर्म की बात है… आह्हः… मैं ऐसे नहीं दिखने वाली… नंगी, अपने शौहर के इलावा

मर्द के साथ… या रब्ब, मुझे माफ़ कर…

गजेंद्र: (हंस कर, जिस्म की तारीफ करते हुए रूह को शर्मिंदा) लेकिन कैसे न देखूं? तेरे

कर्व्स तो खुदा की दें हैं — यह गांड मेरे ऊपर थप थप कर रही, तेरी छूट कितनी लालची.

तू पैदाइशी रंडी है, शाहिदा, चाहे तेरा मज़हब कुछ भी कहे. सोच तेरी फॅमिली तुझे आज देख

ले, पसीने और जोश में डूबी हुई.

अम्मा: (गहरी कराह लेते हुए, रदम में खोयी) आह्हः… ऐसे शब्द मत बोल… ओह्ह्ह… दिल को चोट

लगती है… लेकिन कितना अच्छा लग रहा है…

(अचानक, साइड टेबल पर उसका फ़ोन बजने लगा, कॉलर ईद पर “शौहर” — अब्बू हॉस्पिटल से कॉल कर

रहे थे)

अम्मा: (थोड़ा धीमा होकर, फ़ोन की तरफ देखते हुए घबरा कर) ओह नहीं… मेरा शौहर है…

आह्हः… मैं उठाउंगी… शायद उसे मेरी ज़रुरत हो…

गजेंद्र: (उसकी कमर पकड़ कर ज़ोर से, रुकने न देते हुए) मत उठा, शाहिदा. सवार होती रह.

उस बुड्ढे को हॉस्पिटल के बिस्तर पर अकेला मरने दे. अभी तू मेरी है.

अम्मा: (विरोध करते हुए, लेकिन धीरे धीरे उसके लुंड पर हिलती रही) नहीं… ओह्ह्ह… मैं ऐसा

नहीं कर सकती… वह बीमार है… आह्हः… प्लीज, उठाने दे… क्या पता ज़रूरी हो?

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गजेंद्र: (सख्त आवाज़ में हुक्म देते हुए, ज़ोर से ऊपर धक्के मरने लगा) मैंने कहा नहीं!

अब तू उसकी वफादार बीवी नहीं — मेरी छिनाल है. ठीक से सवार हो, वर्ण चीख इतनी ज़ोर से

निकालूंगा की अगर तूने उठाया तो वह सुन लेगा.

अम्मा: (सांस रुकते हुए जब वह अंदर हिल रहा, फ़ोन अभी भी बज रहा) आअह्ह्ह! ठीक है…

ओह्ह्ह… नहीं उठाउंगी… ममम… लेकिन यह कितना ज़ालिमाना है… या ,.'…

गजेंद्र: (be-rukawat ऊपर धक्के मरते हुए, और शर्मिंदा करते) अच्छा फैसला, शाहिदा.

महसूस कर रहा है? मेरा लुंड तुझे अपना बना रहा है जब तेरा शौहर बेकार कॉल कर रहा

है. तू गुनाह को उस पर तरजीह दे रही है — कितनी नेक _ माँ है तू.

अम्मा: (ज़ोर से कराह करते हुए, जोश गुनाह पर जीत गया, तेज़ सवार शुरू, फ़ोन बैकग्राउंड

में बजता रहा) ओह्ह्ह… आह्हः… अभी भी बज रहा है… लेकिन… ममम… अब रुक नहीं सकती… तूने

मुझे इतना कमज़ोर कर दिया…

गजेंद्र: (जीत के मुस्कुराते हुए, हाथ से गांड पर हल्का थप्पड़) बिल्कु सही, उछलती रह. तेरी

छूट अब और गीली हो गयी — मान ले, उसको इग्नोर करने का मज़ा तुझे और जोश दे रहा है. तेरा

इमाम यह हराम सवारी देख कर क्या कहेगा?

अम्मा: (कराहों के बीच सिसकारी लेते हुए, आंसू और जोश के) आअह्ह्ह… वह मुझे गुनहगार

कहेगा… ओह्ह्ह… लेकिन रुकना मत… नहीं, मतलब… ममम… यह मुझे अंदर से बर्बाद कर रहा

है…

(फ़ोन आखिर रुक गया, वॉयसमेल चला गया, लेकिन गजेंद्र धक्के मरते रहा, शर्म को

लम्बा खींच कर)

गजेंद्र: (मज़ाक उड़ाते हुए तारीफ करते) देखा? वह हार गया, जैसे तू अपनी पाकिज़ागी हार

गयी. तेरे चूचे गुनाह के साथ हिलते हुए और भी अच्छे लग रहे हैं — चलती रह, मेरी

छोटी '. बग़ावती.

उसने लुंड अंदर डालने से पहले झुक कर चुम्बन किया, धीमे से बोली, “नरम रहना… मुझे

दर लग रहा है.” वह प्रोत्साहित किया, “तू hi कण्ट्रोल में है — महसूस कर कितना सख्त हूँ

तेरे लिए.”

उसका लुंड बड़ा था — मोटा और नसें भरा, धड़क रहा था जब उसने हाथ में लिया. धीरे

से अपनी गीली छेद पर लगाया, सर डाब गया. अंदर जाते hi वह चीखी, “अहह! कितना बड़ा है!”

इंच इंच नीचे बैठी.

बात चलती रही: “आज तेरा लुंड इतना बड़ा क्यों है?” वह सांस लेते हुए बोली, एडजस्ट करने में

मुश्किल. गजेंद्र ने मज़ाक में शर्मिंदा किया, “शाहिदा, ‘लुंड’ ऐसे बोल रही है? इतना गन्दा

शब्द एक शरीफ औरत से? लेकिन मुझे पसंद है — असली तुझे दिखता है.”

पूरा अंदर गया गीले स्लिप के साथ, उसकी छूट उसके चरों तरफ खिंच गयी. वह रुक गयी,

एडजस्ट किया, फिर खुद हिलने लगी — पहले धीमे गोल गोल, फिर रदम में उछलने लगी,

चूचे हिल रहे, कमरे में कराहें भर गयी.

उस पल वह पूरा कब्ज़ा हो चूका था, जिस्म रदम में खोया, रात गहरे गुनाहों में बढ़ती

गयी. मैं वहां खड़ा था और मुट्ठ मारने लगा.

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“बहुत बहुत धन्यवाद दोस्तों, आपके रिलीज सच में मुझे आगे बढ़ते रहने का जोश देते हैं. अगला अपडेट बहुत जल्द आ रहा है, बने रहिये. आने वाला chapter इतना इरोटिक है की सिर्फ पढ़कर hi आपको पसीना आ जायेगा.”
 
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