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- Dec 5, 2013
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इक्तालीसवीं क़िस्त
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गार्ड मेरी बातें कर यकीन न कर पता. पर वह देख चूका था. फायरिंग से भी मेरी आँखों में डर या घबराहट जैसा कुछ नहीं था. मेरी बॉडी लैंग्वेज के आगे वह खुद हथुन में हथ्यार रखते हुए भी बच्चे रहे. मई उसकी आँखों में बिना पलकें झपकाए घूरता चला गया
मई --- जाओ.. अंदर से किसी को बुला कर लाओ
कोई कोठी के ऊपरी फ्लोर से मुझे देख रहा था. वह मेरी डेरिंग पर हैरान था. मेरे वर्ड्स वह सुन नहीं पाया था. वहीँ से चिल्लाया और पुछा मेरे बारे में.
मई उसे देख ऊँची आवाज़ में बोलै -- मई वो हों. जो बेज़ा को ठीक कर सकता है. मेरे शिव उसे कोई और ठीक नहीं कर सकता..
और वह झटका खा गया. भागता हुआ कहीं गम हुआ. और फिर गेट के बहार मेरे सामने खड़ा हप्ता हुआ मुझे देकने लगा
मई -- मुझे देखो मत. मेरी आँखों में देख कर समझ सकते हो तो समझ लो. जान लो मुझे.. कोई डॉक्टर नहीं हों मई. फिर भी यकीन कर लो.
मई चुटकी बजता हुआ बोलै -- बेज़ा को मई चुटकी बजाते hi ठीक कर डालूंगा. वह पहले जैसी हो जाएगी.
वह -- आओ मेरे साथ
बेज़ा अब चिल्ला नहीं रही थी. ज़रूर उसे इंजेक्शन देकर या ऐसे hi किसी तरीके से बेहोश कर दिए गया था
मई -- मई बेज़ा का सामना नहीं करना चाहता अभी. अभी नहीं चाहता वह मुझे देखे
वो होंठ भींच दर्द भरे लहजे में बोलै -- बेज़ा सो रही है अब्ब
मई उसके साथ अंदर जा पोहंचा.. पूरी फॅमिली ड्राइंग रूम में आ गई थी.
अमीर अहमत - फॅमिली हेड था. अमीर अहमत और उसकी वाइफ अज़रा अहमत दोनों 60 प्लस थे.
बेज़ा के चार भाई थे. सब एक साथ रहते थे.
एक्रेम अहमत
एल्टन अहमत
सरकन अहमत -- इसके साथ मैं कोठी के अंदर आया था.
सेवकेट अहमत
सब के सब मुझे देखने लगे. सरकन अहमत सब को मेरी बात बता चूका था. बेज़ा की चरों भाभियाँ भी बच्चों समेत आ गई थी.
अमीर अहमत hi दुःख भरे लहजे में बोलै -- हम हर आस खो चुके हाँ. बीटा तुम जो कोई भी हो. कुछ कर सकते हो तो कर गुज़रो. बदले में हमसे जो चाहे ले लो. हमारी बेज़ा हमारी जान है. दौलत के ढेर लगे पड़े हैं हमारे पास. लेकिन सारे सुख बेज़ा के दम से हैं. चाहे तो बदले में साडी दौलत ले लो. हमारी बेज़ा को ज़िन्दगी लौटा दो.
अज़रा अहमत सिसकती हुई बोली -- हम बेज़ा को चाहते हैं. हमारे दिलों की धड़कन हमारी बेटी बेज़ा है. हमें कोई पेड़ की आस भी दिलाये तो हम उसके आगे हाथ जोड़ बैठें. बीटा तुम्हारी आँखों में मुझे हमारे hi जैसे किसी दर्द की परछाई दिख गई है.. दिल पुकार उठा है. ज़रूर तुम कुछ कर सकते हो. ये देखो इस माँ के तेरे आगे हाथ बंधे हैं.. उसकी इकलौती बेटी को ज़िन्दगी लौटा दो
मई हैरान ज़रूर होता.. इतने अमीर लोग जिनके आगे किसी का खड़ा होना आसान नहीं था. मैंने आस दिलाई तो अमरत भूल गई थी. साडी शान ो शौकत को एक साइड रख गए थे.
मई एक एक को देख रहा था. हर आंख बेज़ा के लिए नाम थी. ऐसा hi प्यार तो मेरी फॅमिली में भी था.. आठ ऐसे hi दर्द में तो मैं और सब भी आ गए थे.
मई एक गहरी सांस लेकर छोड़ता हुआ बोलै - बेज़ा के पास ले चलो मुझे
कुछ देर में हम सब बेज़ा वाले कमरे में थे. और मई बेज़ा का मुरझाया सोया हुआ हुसैन देख कर हैरान रह गया. बेज़ा मेरी ज़िन्दगी की सबसे हसीं लड़की थी. हम पठानों में एक से बढ़कर एक हसीं लड़कियां होती हैं. लेकिन बेज़ा के जैसी हसीं मैंने आज तक नहीं देखि थी. पिछले कई महीनो से मैं दुन्या घूम रहा था. लेकिन एक भी चढ़ा मुझे बेज़ा के जैसा नहीं दिखा था
मई -- यकीन कर लो आप सब.. कुछ दिनों में hi बेज़ा ऐसी नहीं रहेगी. जैसे कभी हुआ करती थी. वैसी hi हो जायेगी..
फिर मई बेज़ा के भाइयों को देख बोलै -- जो कहूं. वही करना होगा.. कुछ भी मेरे प्लान में गड़बड़ नहीं होनी चाहिए.. और एक बात खास तौर पर ज़ेहन में रखना.. मई कुछ भी कर गुज़रूँ.. मुझे कोई रोके मत.. एक बात का वडा करता हों. बेज़ा की इज़्ज़त के लिए खतरा नहीं बनूँगा.. हाँ उसकी शर्म का मैं कोई वडा नहीं करूँगा.. पठान हों... पाकिस्तानी हों.. मर्द का बचा हों.. बेज़ा को ठीक करने के लिए न तो मुझे एक भी पैसे की ज़रूरत है न hi आप सब के थैंक्स की. बिना किसी मतलब के लिए मई ये सब कर रहा हों.. कोई अगर मतलब है मुझे तो आप सब के दर्द से मतलब है.. बेज़ा जैसी पायरी लड़की की खो चुकी खुशियों से मुझे मतलब है..
कोई कुछ बोलता.. बेज़ा की माँ बोल पड़ी -- मुझे अपने पांचवें बेटे की हर बात मंज़ूर है.
एक मुद्दत के बाद मेरे होंटो पर पुराणी मुस्कान उभरी. और मैं अज़रा अहमत के दोनों हाथ कर चूमता हुआ बोलै -- कुछ रिश्ते खुद से और अचानक बन जाया करते हैं.. अचानक के बने रिश्ते पुराने रिश्तों पर सबक़त ले जाया करते हैं. आप की मंज़ूरी ने मुझपर यकीन को बढ़ा भी दिए है. और ये यकीन मैं टूटने नहीं दूंगा.. बेज़ा ठीक होगी और हर सूरत ठीक होगी.
अज़रा अहमत की आँखों में नमी उतर आई थी. वह मेरे प्यार भरे लहजे पर खुद को काबू में नहीं रख सकीय और मेरा चेहरा पकड़ माथा चुम गई..
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बेज़ा एक जंगली कॉटेज में थी. जब बेज़ा को होश आया तो उसने खुद को पलंग पर ज़ंजीरों से बंधे हुए पाया. खुद को बंधे हुए पाया तो बेज़ा के चेहरे पर डर खौफ और दहशत के एक्सप्रीसिओं आने लगे. ये बेज़ा की वह हालत थी, जब उसे अपने साथ हुए घिनोने वाके का एक के लम्हा याद ा जाया करता था.
उसी टाइम कमरे का दरवाज़ा खुला और मुझे अंदर धकेलता हुआ 4 मसकमान अंदर दखल हुए.. चरों के हथुन में गन्स थी. बेज़ा डर गई. लेकिन चीखी चिल्लाई नहीं..
एक बोलै -- ये हमारे दुश्मनो की लड़की है. एक बार इसे किडनैप करके हमने तावान भी वसूला और इसके बदन को रोंडा भी. तुम हमारे दुश्मनो के सज्जन हो. और अब तुम hi हमारे दुश्मनो की इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ाओगे.
मई ज़ख्मों से चूर था.
(ड्रामे में रंग भरने के लिए मैंने खुद को ज़ख़्मी करवाया था. कोई मेरी बात मन्ना नहीं चाहता था. लेकिन मैं सिरफिरा भी था. पठान था. अपनी मनवा कर रहा था)
टपक रहे खून के साथ मई कड़क कर बोलै था -- तुम चाहे मेरी जान भी ले लो.. लेकिन मई इस मासूम की इज़्ज़त के साथ नहीं खेलूंगा.
मसकमान है पड़े -- मासूम.. हाहाहा.. इसकी इज़्ज़त तो पहले hi लूटी जा चुकी है. इस बार हम इसे नहीं इसकी फॅमिली को तड़पना चाहते हैं. सारे सुख उनसे छीन लेना चाहते हैं.. तुम्हारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है. हर हाल में इस लड़की की इज़्ज़त लूटनी होगी तुम्हे.. नहीं तो
मई -- नहीं तो क्याआ.. क्या कर लोगे तुम..
वह हँसा -- नहीं तो तुम्हे जान से मारने से पहले, तुम्हारी आँखों के सामने, तुम्हारी गफ की इज़्ज़त की धज्जियाँ उदा दी जाएंगी
और मैं बेज़ा को देखने लगा. बेज़ा की आँखों में अब बेपनाह कहुआफ के साये लहराने लगे थे.
मई -- मई बेज़ा की इज़्ज़त से नहीं खेल सकता. चाहे तुम लोग किसी भी हद से गुज़र जाओ..
चरों मुझपर टूट पड़े.. मुझे फिरसे कूटने लगे.. मेरे हाथ पीछे बंधे हुए थे.. मई मार खा सकता था. मार नहीं सकता था..
मुझे कुछ देर और पीटा गया. फिर मेरे हाथ खोल कर मुझे नीम बेहोशी की हालत में कमरे से निकल गए.. बहार से दरवाज़े को टाला लगा दिए गया था.
और भी बेज़ा मुझे खौफ से देखती जा रही थी. अपनी कोठी में नहीं थी. अनजान जगह थी. ये सब न सोच कर वह मुझसे डर रही थी. एक बार फिरसे वह लूटना नहीं चाहती थी..
मई टूटे कमज़ोर लहजे में बोलै -- दर्रो नहीं बेज़ा.. मई तुम्हारे भाइयों का दोस्त भी हों और इज़्ज़तों का मुहाफ़िज़ भी.. मर जाऊँगा.. लेकीन तुम्हारी इज़्ज़त से नहीं खेलूंगा.. किसी और को भी नहीं खेलने दूंगा
लेकिन बेज़ा जल्द समझने वाली नहीं थी. खौफ उसके ज़ेहन की गहराइयों में बैठा हुआ था... मई बेहोश नहीं हुआ. बेहोशी का ड्रामा करने लगा.. फिर मुझे नींद आ गई. देखा तो बेज़ा वैसे hi बंधी हुई मुझे देख देख दरर्ति जा रही थी..
3 दिन तक यही खेल खेला गया.. बेज़ा ऐसी हालत में खा नहीं सकती थी. डॉक्टर्स की एक टीम हिरे की गई थी.. जो बेज़ा को बेहोश करने के बाद एनर्जी पोहंचाया करती थी. और बेज़ा इस बात से अनजान थी. मेरा भी ट्रीटमेंट जारी रही. ये सब बेज़ा से ख़ुफ़िया रखा गया था..
इन तीन दिनों में मई कई बार बेज़ा के सामने मार खा चूका था. लेकिन अपने इरादों पर अटल रहा.. मस्कमेन कोठी के hi गार्ड्स थे. और पुश्तों से बेज़ा फॅमिली के नमक खुवार थे. पुरे दिल से मेरा साथ दे रहे थे..
अब बेज़ा नरम पड़ती जा रही थी.. 5 पांचवें दिन एक और खेल खेला गया. मैं गार्ड्स को डर लड़ा.. फेक बुलेट्स से सब को मार दिए.. वह भी खूब मरने का ड्रामा करते हुए तड़पने लगे. और मैंने देखा था बेज़ा की आँखों में ख़ुशी भरी चमक की एक लहार उभर कर गायब हो गई थी
मई बेज़ा को खोल कर वहां से निकल भगा.. बेज़ा मेरा पूरा साथ दे रही थी. बास कुछ बोल नहीं रही थी...
ऐसे hi अगले 6 दिन तक और जंगल में भटकते रहने के बाद मैंने बेज़ा का ऐतमाद तस्लीम कर लिए.. बेज़ा के दिल से मेरे लिए डर निकल गया.. बेज़ा की जुबां नहीं खुली.. जैसे मई घर पर अम्मी जान, भाभी माहिरा एपीआई, किन्ज़ा एपीआई और दादी जान के माथे के साथ माथे जोड़ एक्सपेरिमेंट किआ करता था. बेज़ा के साथ करने लगा... बेज़ा मुझसे बिदकती थी. पहले खौफ ज़ादा हो जाया करती थी. लेकिन वह देख रही थी. मई एक एक क़दम उसकी न सिर्र्फ इज़्ज़त कर रहा हों. उसकी इज़्ज़त बचने के लिए मारा मारा फिर रहा हों
बास फिर बेज़ा की जुबां खुल गई.. जंगल में बेज़ा मुझसे लिपट कर ऐसी रोइ.. मुझे भी रुला गई... अपनी इज़्ज़त लूटने की पूरी दास्ताँ एक एक अहसास के साथ बयां कर गई. हर एक लम्हा वह कैसे मरी... सब खुल कर बोलती चली गई
मैंने भी बेज़ा को नहीं टोका.. बोलने दिए.. सब बोल देने से, खुल कर रो लेने से बेज़ा के अंदर का सारा ग़ुबार निकल गया...
इन कुछ दिनों में मैं बेज़ा को लिटा कर कई बार उसके ऊपर चढ़ गया था.. बेज़ा के जिस्म के सारे नशेब ो फ़राज़ का मुझे पता चल गया था.. और बेज़ा अब पूरी तरह से वापिस लौट चुकी थी.. मेरे अनमोल प्यार की वजा से मैंने उसे यकीन करवा दिए था.. जिस्म मेला होता है न रूह.. कुत्तों ने मोह मारा.. और कुत्ते तो कुत्ते होते हैं.... बेज़ा मुझसे लिपट कर बोली थी
बेज़ा -- बाबू!.. तुम मुझे छोड़ तो नहीं डोज न.. मई तुम्हारे बिना अब एक भी सांस नहीं लेना चाहती. तुमने मुझे ज़िंदा किआ है. अब तुम्ही मेरे आखरी सांस तक के हमसफ़र रहोगे.
बेज़ा की इस बात पर मई परेशां हो गया था. ये बात मई भूल गया था.. ऐसा कोई लम्हा भी आ सकता है. मई जनता था. लेकिन मई भूल कैसे गया था.. मेरे प्यार की बारिश की कुछ बूँदें प् कर hi सब कुछ भूल जाया करते थे मुझसे प्यार करने वाले.. बेज़ा भी मुझे नहीं भूल सकती थी... हज़ल भी तो मुझसे प्यार करने लगी थी. और शायद बेज़ा से ज़यादा मुझसे प्यार हज़ल करती थी. मैंने तो अभी तक उसके प्यार को भी एक्सेप्ट नहीं किआ था..
बेज़ा मुझे चुप देख रो पड़ी - मुझे ज़िन्दगी दी है बाबू तो पूरी दो.. मेरे मसाले जा चुके जिस्म के कदरदान तुम्ही बन सकते हो. वर्ण मुझे हमेशा मेरे जिस्म से घिन आती रहेगी.. तुम्हारा प्यार मुझे मिला तो, सच कहती हों, मई जी उठूंगी.. तुम न मिले मुझे तो मेरे कुचले हुए जिस्म में ज़िन्दगी का कोई मतलब नहीं बनता...
बेज़ा ज़िन्दगी की तरफ लौट आई थी. लेकिन इज़्ज़त तो लुटवा hi चुकी थी. और ये बात कभी भी ज़ेहन के गोशों से निकल नहीं सकती थी.
बेज़ा ने मुझे परेशां कर डाला था.. मई उसे क्या जवाब देता.. लेकिन जवाब तो देना hi था
मई --- बेज़ा अभी सब को पहले तुम्हारे ज़िन्दगी की तरफ लौट आने की खुश खबरि देते हैं
बेज़ा मेरे ऊपर चढ़ आई थी -- बाबू!..
बाबू नाम मई बेज़ा को पहले hi दिन अपनी अनमोल लव स्टोरी ऑफ़ होम सुना चूका था.. उसके मंद की गहराइयों में ये नाम उतर चूका था.. अब बेज़ा मुझे बाबू hi कहती थी..
प्यार करने वळून के मोह से बाबू सुन्न्ना मुझे बहुत भला लगता था
बेज़ा -- ज़िन्दगी की तरफ तो मई तभी लौटूंगी जब तुम मुझे एक्सेप्ट कर लोगे. सच कहती हों. मुझे कभी भी प्यार नहीं हुआ था.. अब तुमसे हुआ है.. क्या मई..
सिसक पड़ी -- क्या इस कुचली हुई बेज़ा का आम सा प्यार तुम्हारे जैसा अनमोल प्यार का मालिक बाबू के लिए क़ाबिल इ क़ुबूल हो सकता है. अगर हाँ तो इस बेज़ा को ज़िन्दगी दे दो बाबू.. मुझे दुन्या में किसी और चीज़ की अब कोई ज़रूरत रही है न छह.. मेरी ज़िन्दगी सिर्फ तुम हो.. सिर्फ तुम.. मेरी हर ख़ुशी हर सुख दुःख तुम्ही से शुरू होकर तुम्ही पे ख़तम होता है... मुझे यहाँ से ले चलो बाबू.. कहाँ मर्ज़ी ले चलो.. रूखी सूखी खा लुंगी. लेकिन तुमसे दूर नहीं रहूंगी..
और बेज़ा ने मेरी परेशानी बढ़ा दी
मई -- बेज़ा तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रही हो.. मेरी ज़िन्दगी में तुम hi नहीं हो. और भी--
मेरी बात पूरी होने से पहले hi बेज़ा मेरे होंटो पर हाथ मुझे चुप करवाती हुई बोली
बेज़ा -- मर्द चार शादियां कर सकता है. तुम अपनी साडी ज़िन्दगी अपनी मर्ज़ी से जीना. बास मुझे मत छोड़ना
और मई बेज़ा की बात सुनकर हक्का बक्का रह गया.. अपनी सल्तनत की शहज़ादी थी बेज़ा.. और ऐसी बात बोल गई थी
बेज़ा -- ऐसे हैरान मत होवो बाबू.. कसम ले लो.. चाहे कोई सी भी.. मुझे बास बाबू चाहिए.. इसके शिव कुछ नहीं चाहिए.. बाबू के लिए मई सारा जग छोड़ सकती हों. बाबू ने बेज़ा को ज़िन्दगी दी है. बेज़ा बाबू के लिए कुछ भी कर जायेगी.. बाबू की हर ख़ुशी को अपनी ख़ुशी मान कर जियेगा. और हमेशा खुश रहेगी. बिन बाबू बेज़ा कभी खुश नहीं रह सकती अब..
और मैं बेज़ा को लेके उसके अपणु में आ गया. सब बेज़ा को पहली जैसी देख कर ख़ुशी से रो पड़े थे. और बेज़ा भी अपणु में पांच एक एक से लिपट कर खूब रोइ...
बेज़ा ने वही सबके सामने दिल की बात बोल दी.. और कमल हो गया. सब ने खुल कर कह दिए.. बेज़ा और मेरा रिश्ता पुरे दिल से उन्हें मंज़ूर है..
मई -- लेकिन मुझे मंज़ूर नहीं है
मई ऐसा बोलै तो बेज़ा को झटका लगा वह लगा hi. सब को भी लगा. सब शॉकेड हुए मुझे देखने लगे
मई -- आप सब मेरे बारे में कुछ नहीं जानते हो. मई घर छोड़ कर निकला हुआ लड़का हों. कसम खा कर, एक वडा करके निकला था.. ज़िन्दगी में कुछ बनकर लौटूंगा.. और ज़रूर लाटुंगा. बेज़ा से शादी से मुझे इंकार इसलिए नहीं है. बेज़ा से मुझे खार नहीं है. बेज़ा बेस्ट लीफर पार्टनर है.. लेकिन मई जब तक अपनी ज़िन्दगी के मकसद को नहीं प् लेता.. बेज़ा तो किसी भी लड़की से शादी के बारे में सोच भी नहीं सकता..
बेज़ा होंठ डनोटों में भींच गई
उसका एक भाई बोलै -- बेज़ा के नाम एक आइलैंड है. बेज़ा की अपनी इतनी दौलत है... सात पुश्तें बेथ कर भी खाएं. तो भी ख़तम न हो
मई मुस्कुराया फिर चटनी लहजे में बोलै -- मैं पठान हों.. खुद्दार पठान.. याद है मैंने कहा था. मई बेज़ा को ठीक करूँगा.. बदले में न तो मुझे एक ढेला चाहिए और न hi थैंक्स.. सो बेज़ा अब ठीक हो चुकी है. मेरा काम ख़तम हुआ
और बेज़ा तड़प कर सबके सामने मुझसे लिपट कर आंसू बहती हुई बोली
बेज़ा -- बाबू... मुझसे दूर जाने की बात मत करना.. जाना hi चाहते हो तो एक वडा करके जाओ.. अपने मकसद को पाने के बाद मेरे पास आओगे.. और मुझे लेकर जाओगे.. मुझसे शादी करोगे. भले hi बाद में या पहले जितनी और जिस किसी के साथ भी कर लो.. तुम्हारी हाँ मुझे ज़िन्दगी दे सकती है. और तुम्हारी नाह अभी मुझसे मेरी साड़ी साँसे छीन लेगी
मई बेज़ा को ठीक कर गया था. बेज़ा बुरी लड़की नहीं थी.. बहुत अच्छी बहुत प्यारी लड़की थी. बेज़ा की ज़िन्दगी के साथ जुडी थी कई और ज़िंदगियाँ
मई -- तो फिर सुन लो बेज़ा... मेरी ज़िन्दगी में तुमसे पहले हज़ल है.. वो दीवानी महीनो से मेरे पीछे पीछे है. और मैंने एक बार भी उसे मुस्कुरा कर नहीं दिए... कई बार उसकी जान लेने की कोशिश की.. तुम हो बेज़ा.. जिसने बाबू को ज़िंदा किआ है..... तुम न मिलती, तो शायद बाबू भी दफ़न hi रहता.. मई तुम्हे कभी नहीं छोडूंगा.. मुझे दौलत से प्यार नहीं है. लेकिन अब मेरी ज़िन्दगी का मकसद बन चूका है.. अपने मकसद को पा लूँ. फिर तुम्हे भी अपना लूंगा
एक भाई बोलै -- उसके हम तुम्हारे काम आ सकते है
मई नासमझी से उसे देखने लगी
वो फिरसे बोलै -- हमारे और बेज़ा के दुश्मन तुम्हारे भी दुश्मन हुए. क्यों कह तुम बेज़ा को फ्यूचर में अपनी वाइफ डिक्लेअर कर चुके हो.
मई -- हाँ सही कहा आपने
वह -- दुश्मनो से लड़ाई.. फिर जो माल मिले.. उसे माल इ ग़नीमत कहते है.. ऐसा माल जायज़ होता है.....
मई अब सब समझ गया -- कहाँ मिलेगा वह दुश्मन..
और सबके होंटो पर मुस्कराहट फेल गयी.. लेकिन बेज़ा फ़िक्र में डूब गई
बेज़ा -- बाबू की ज़िन्दगी को खतरा हो सकता है
बेज़ा का बाप बोलै -- बाबू की आँखों में पहले अच्छे से देख लो. फिर अपनी बात को दोहराना बेज़ा बेटी
और बेज़ा मेरी आँखों में देखने लगी.. फिर उसे सब कुछ समझ में आता चला गया.. अब वह ये भी जान चुकी थी.. उसे ठीक करने के लिए कैसा ड्रामा रचा गया था. और ड्रामे में रंग भरने के लिए मैंने कैसे असली मार खाई थी. सारे के सारे घाव असली थे..
बेज़ा -- बाबू को कुछ नहीं होगा.. ठीक है. बाबू का पूरा पूरा साथ दिए जाए
टर्की से दूर hi आइलैंड था.. जहाँ वह गैंगस्टर गैंग रहता था. जहाँ बेज़ा की इज़्ज़त से खेलने वाले कुछ दुश्मन लीडर रहते थे. कुछ को तो बहुत वक़्त पहले hi मार दिए गया था..
एक टीम बनाई जाने लगी. उस टीम का लीडर मैं था. माइकल भी फाइटर था.. हज़ल अब बेज़ा के साथ रहने लगी थी. और बेज़ा पगली हज़ल को अपनी छोटी बहन मान कोठी की शहज़ादी बना गई थी. हज़ल तो लावारिस लड़की थी. खिल उठी. पूरी कोठी में भगति नज़र आती.. कोठी की खुशियां और रौनकें लौट आई थी.
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टोटल 10 महीने और लगे थे.. दुश्मन आइलैंड पर चढ़ाई करके दुश्मन को तबाह करने में.. वहां मुझे दौलत के ढेर मिले.. हर शकल में दौलत मिली थी.. डॉलर, पोंड्स, कई दूसरे कन्ट्रीज की करेंसी.. सोने की ईंटें, हीरे कई कीमती मोती..
मई भी एकदम से बिल्लीवारे बन गया था.. मेरे साथ अमीर बन गया था माइकल भी.. हज़ल तो मेरी बन चुकी थी.. और वह खिल उठी थी.. उसके गोर गालों की लाली मेरे नाम से हर पल बढ़ती hi चली जा रही थी...
अब मेरे घर लौटने का टाइम आ गया था.