Mere Khandan Ki Anmol Phuddiyan - SexBaba
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Mere Khandan Ki Anmol Phuddiyan

hotaks

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डिस्क्लेमर:-

कहानी एक तसव्वुरति कहानी है. कहानी के किसी लफ्ज़ या कहानी में किसी भी जगा का शामिल होना, किसी के किसी की ज़िन्दगी से मैच होना महज़ एक इत्तेफ़ाक़ होगा.. बराये मेहेरबानी कहानी को जस्ट कहानी समझ कर पढ़ें..

नवाज़िश होगी 🙏


राइटर:
 


मेरा नाम फिरोज खान है. उम्र 20 यरस

मई कुछ ऐसा दीखता हों.


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मेरी हाइट 5फट 8" है. मेरा रंग साफ़ और पेर्सनलिटी जानदार है. मेरे डिक का साइज 8" और मोटाई 3" से कुछ hi काम है. पता नहीं मेरा hi लुंड इतना बड़ा है या खंडन में सभी के इतने बड़े हाँ. लेकिन मेरा लुंड खूब था. बड़ा नाज़ था मुझे मेरे लुंड पर.

मेरे डैड हशमत खान. उम्र 50 साल. डैड का एक छोटा सा टेक्सटाइल का कारखाना है.

गुलशन खान मेरी अम्मी जान उम्र 49 साल


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बड़ी hi हसीं है अम्मी जान. अभी भी जवान हाँ. मतलब अम्मी जान का जिस्म कहीं से भी ढीला नहीं पड़ा है. खुद पर बहुत धयान देती हाँ अम्मी जान. है मुख बड़ा hi प्यार करने वाली औरत.

नदीम खान मेरे बड़े भाई उम्र 25 साल पापा के साथ कारखाने में जाते हाँ.

फराह खान उम्र 24 साल मेरी भाभी हाँ. रंग गोरा और कमल की हसीं हाँ भाभी जान. इतनी हसीं की नज़र हटाने को दिल नहीं करता


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किन्ज़ा खान मेरी बड़ी आपि उम्र 23 साल मेडिकल स्टूडेंट.


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माहिरा खान मेरी दूसरी आपि उम्र 22 साल ..


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इनके इरादे कुछ हटके हाँ. वैसे तो ये मॉडलिंग का भी शौक रखती हाँ. लेकिन खंडन में इसे कोई इजाज़त देने से रहा. इसलिए ये बेऔतिकीओं बन रही हाँ. ता की मॉडल न भी बन सकें तो काम से काम उससे बढ़कर कोई हसीं खंडन में न दिख सके.

फिर मेरा नंबर आता है. वो ऊपर लिख चूका हों

नयमत खान मेरे तय हाँ. हमारे hi खैर में रहते हाँ. इनके साथ हमारे सिरसिस चल रहे हाँ. हमारे इनके घर आना जाना बरसों से बंद है. इनका जब ज़िक्र होगा तब इनका और इनके घर वळून का तफ्सील के साथ तारुफ़ करवाऊंगा.

ओह्ह्ह मैंने तो अपने दादा अब्बू और दादी अम्मी का ज़िक्र किआ hi नहीं

रियासत खान उम्र 74 साल.. लेकिन अभी भी बहुत फिर हाँ. पता नहीं इस उम्र में दादी को छोड़ते हाँ कह नहीं. लेकिन चलते फिरते देख लगता है.. जैसा घोड़े हाँ अभी.. दादा जी वैसे भी जवानी में पहलवानी किया करते थे. अब भी इलाके में अपनी उम्र के लोगो में खूब महफ़िल रहा करती है इनकी.. वहां दादा जान को खूब वैल्यू दी जाती है

अब आते हाँ दादी अम्मी की तरफ

रहना खान उम्र 72 साल... ये भी अभी तक बिना किसी सहारे से भाग भी सकती हाँ.. दादा की तरह दादी ने भी खूब खुद को संभल रखा है.


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देखने में 50 और 55 के बीच की दिखाई देती हाँ..

सुल्ताना खान मेरी फूफी हाँ. हमारे hi खंजर में रहती हाँ. इनकी उम्र 45 साल है. बड़ी मीठी ज़ुबान है फूफी जान की.. जिस से भी बात करती हाँ. उसे अपना बना लेती हाँ..


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ज़ुबैर खान मेरे फुफड़ इनकी उम्र फूफी सुल्ताना से काफी ज़यादा है. फूफी 45 की हाँ तो ज़ुबैर खान 55 के.. इन्हे 1 हार्ट अटैक ा चूका है. बहार के खाने के शौक़ीन थे कभी. उसी के चलते दिल का रोग पाल बैठे.. वैसे दिखने में हट्टे काटते हाँ. दवा चल रही है इनकी रेगुलर.. इनका एक बड़ा सुपर स्टोर है खंजर में.. सेल बहुत अछि है

हिना खान उम्र 22 साल बेहद हसीं हाँ हिना आपि..


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फर हाँ बिलाल खान उम्र 20 साल

सजल खान उम्र 19 साल ..


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हाय किसका नाम ले दिए मैंने.. यौन तो हमारे खंडन में सब hi एक से बढ़कर हसीं सूरत हाँ. लेकिन सजल.. उफ़ इसकी अदाएं बड़ी hi कातिल हाँ. बोलने का अंदाज़ बड़ा hi मोह लेने है..

कहानी में दूसरे किरदारों का तारुफ़ कहानी के हिसाब से करूँगा...

 


पहली क़िस्त

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एपीआई किन्ज़ा को देखने दूर के रिश्तेदार आये थे. बातों बातों में नीम रज़ामंदी का इज़हार कर दिया गया.. लेकिन फैसला लेने में जल्द बाज़ी नहीं करि गयी.. सोचने का वक़्त चाहिए थे. पहली hi बार में रिश्ता पक्का नहीं किया जा सकता था.

लेकिन हमें ऐसा लग रहा था. जैसे हमारे घर के सरे अफ़राद दिल से रिश्ते के लिए मान गए हाँ.. मैंने आपि किन्ज़ा का चेहरा देखा था. मुझे एपीआई नार्मल लगी. जब मेहमान चले गए. और एपीआई सर दर्द का बहाना करके अपने कमरे में गई तो मई एपीआई के पीछे उनके कमरे में चला गया..

मई अपने बारे में बता दूँ. खंडन में लड़कों में मई सबसे बढ़कर चाहा जाने वाला लड़का था. मेरे बाद फूफी सुल्ताना की बेटी सजल थी. अगर किसी का मूड ऑफ भी होता और मई उसके पास चला जाता तो कभी मुझे डांटा नहीं जाता था. मुझे कभी नज़र अंदाज़ भी नहीं किया जाता था.

एहि सोच मई किन्ज़ा एपीआई के कमरे में चला गया. मेरा इरादा था. मई एपीआई से थोड़ी से छेड़ छड़ थोड़ी सी मस्ती करूँगा. आखिर उन्हें देखने लड़के वाले आये थे. मई किन्ज़ा एपीआई के कमरे में बिना दूर नॉक किये दूर खोल कर घुस गया. किन्ज़ा एपीआई बीएड पर उलटी लेती हुई थी. मई भी उनके करीब जा कर उल्टा लेट गया. एक हाथ किन्ज़ा एपीआई की पीठ पर रख कर अपना चेहरा किन्ज़ा एपीआई के करीब कर दिए


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किन्ज़ा एपीआई ने जो सर उठा कर मुझे देखा. मई चौंक गया. किन्ज़ा एपीआई की ऑंखें नाम थी.

मई - एपीआई ये क्या. इतनी ख़ुशी के मोके पर आप दुखी हाँ. शायद रोने जा रही थी आप

किन्ज़ा एपीआई जल्दी से अपनी ऑंखें साफ़ करती हुई बोली - नहीं बाबू मुझे क्यों कोई दुःख होगा. ऑंखें तो ऐसे hi नाम हो गई हाँ मेरी

मई एपीआई को घोर से देखने लगा..

मई एपीआई का हाथ पकड़ अपने सर पर रखता हुआ बोलै - खाएं मेरे सर के कसम

एपीआई झटके में उठ बैठी. मई भी सीधा हो बैठा.. एपीआई को मेरी कसम दिलाने पर गुसा आया था. लेकिन मुझे कुछ खरी खोटी सुनाने से पहले hi खुद पर काबू प् गई

किन्ज़ा - बाबू .. ये तुम कसम जैसा मेरे साथ न किया करो. मुझे तुम्हारी ये आदत अछि नहीं लगती. बिना कसम दिए भी तुम हर बात जान सकते हो. तुमसे भला कुछ कैसे छुपा सकती हों मई. कितने प्यारे हो तुम मुझे

मई - ऐसी बात है तो फिर अपने दिल की बात मुझसे क्यों छुपा रही हाँ आप

किन्ज़ा एपीआई नज़रें चुरा कर बोली - मई कहाँ छुपा रही हों कुछ बाबू.

मई - सच सच बताएं एपीआई. क्या मसला है. आज सारा दिन आप खुश रही हाँ. महमानो के जाने तक आप नार्मल रही. उनके जाते hi आप कमरे में आ गई.

मई कुछ कुछ समझता हुआ बोलै - कहीं आप रिश्ते को लेके तो टेंशन में नहीं हाँ

किन्ज़ा एपीआई फीके अंदाज़ में है पड़ी - मई भला क्यों टेंशन में आऊँगी. अम्मी अब्बू सब hi तो मुझसे कितना प्यार करते हाँ. मेरी ज़िन्दगी का फैसला कैसे वो गलत कर सकते हाँ. नहीं बाबू ये बात नहीं है. बालकः बात तो कुछ भी नहीं है. बस ऐसे hi ऑंखें थोड़ी सी भीग गई.. अरे हाँ.... याद आया.. वो तय तै और सब नहीं हाँ न. बस उनको सोच के दुखी हो गई थी.

मई एकदम से - आप को लड़का पसंद नहीं आया न

किन्ज़ा - हाँ मुझे लड़का पसंद नहीं----

इतना बोल किन्ज़ा एपीआई रुक गई. फिर जल्दी से बोली - नहीं.. इतना हैंडसम तो है वह. मुझे भला क्यों पसंद नहीं आएगा. सब को पसंद है. मुझे भी पसंद है

मई - नहीं.. अब आप झूट बोल रही हाँ

किन्ज़ा - नहीं बाबू. मई झूट नहीं बोल रही हों

मई - तो आप ये शादी नहीं करना चाहती हाँ..

किन्ज़ा - मत कहो ऐसा बाबू.. मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है

मई -- एपीआई... पता है... मेरा दिल क्या करता है

किन्ज़ा - क्या करता है

मई - मेरा दिल करता है. आप उससे शादी करें.. जिससे आप प्यार करती हाँ

किन्ज़ा एपीआई बेखयाली में बोल पड़ी - नहीं कर सकती न

फिर घबरा कर मुझे देखने लगी. अब मेरे होंटो पर स्माइल थी.. और किन्ज़ा एपीआई घबरा कर कभी मुझे और कभी दरवाज़े को देख रही थी. वहां खड़े कसी ने सुन तो नहीं लिया..

फिर किन्ज़ा एपीआई धीरे से लेकिन घबराई हुई आवाज़ में बोली - तुझे कैसे पता चला. मई किसी को पसंद करती हों

मई - आप उसके बिना जी भी नहीं सकती.. मई ये भी जनता हों

किन्ज़ा एपीआई हैरान रह गई - तुम इतना कुछ जानते हो. लेकिन कैसे

मई ऐसे ी फ़ेंक रहा था. बास दीदी की आँखों में आंसू देख, उनके दिल की हालत जान अंदाज़ा लगा लिया था. जवानी में ऐसा hi तो कुछ होता है

मई - वो सब छोड़ें. आप ये बताएं.. अगर मई आप का ये रिश्ता न होने दूँ.. और जहाँ आप का दिल अटका है. वहां हो जाये तो

किन्ज़ा एपीआई बेयक़ीनी से मुझे देख रही थी.

मई - मुझे जानती हाँ न आप एपीआई

किन्ज़ा बेबसी से बोली - तेरे बस की बात नहीं है बाबू

मई - ये सब मुझपर छोड़ दें. और ये बताएं. अगर मई ये सब कर दिखाओं तो आप मुझे क्या इनाम देंगी.

किन्ज़ा एपीआई को यकीन था. मई ऐसा कुछ नहीं कर सकता. भला मई इतना बड़ा कहाँ हुआ था. रिश्तों में मामलों में टांग डाटा पिरता. भला मुझे इतनी वैल्यू देता hi कोण.. सब मुझे नासमझ और नतजूर्बा कार समझते

किन्ज़ा एपीआई कुछ सोच कर - अगर तू ऐसा कर गया न. तो तू जो मुझसे मांगेगा मई दूंगी

मई एपीआई के दोनों हाथ थाम कर एपीआई की आँखों में देखता हुआ बोलै - फिर चाहे आपके लिए वो कर पाना मुमकिन न भी हो तब भी..

किन्ज़ा - हाँ.. तू मुझसे कुछ भी मांग सकता है.

मई - कुछ भी

किन्ज़ा - हाँ कुछ भी..

मैंने हाथ बढ़ा दिए .. एपीआई मेरी आँखों में देख स्माइल करती हुई अपना हाथ दे गई

किन्ज़ा - हाँ कुछ भी

मई - तो फिर दोने

किन्ज़ा - दोने


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किन्ज़ा एपीआई फस गई थी. मैंने उनसे क्या मांगने वाला हों वो खवाब में भी नहीं सोच सकती तह.. किन्ज़ा एपीआई नहीं जानती थी. लेकिन मई उनके जिस्म का एक एक हिस्सा देख चूका था.. मैं खंडन में चुदाई का सोच भी नहीं सकता था. दूसरे जवान हुए लड़कों की तरह मुझे भी अलिफ़ से ले के ये तक साडी जानकारी थी. लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ. मई अपने hi खंडन की गोरी चिट्टी फुड़दियों को छोड़ने की दिल hi दिल में थान बैठा..

किन्ज़ा एपीआई भी एक थी. और मई जल्द से जल्द किन्ज़ा एपीआई के हसीं और दिलफरेब जिस्म की साडी सैर कर लेना चाहता था..

मई खुश खुश किन्ज़ा एपीआई के कमरे से निकल कर अपने कमरे में जा पोहंचा.. कमरे का दूर अंदर से लॉक करता मई अपना लैपटॉप उठा कर बीएड पर ा बैठा. फिर किन्ज़ा एपीआई की नहाते समय की नंगी वीडियो निकल कर देखता हुआ अपने लुंड को निकाल कर हिलने लगा... कितना मज़ा आता है अपनी hi बड़ी बहन को नंगा देख कर लुंड हिलने में.

आठ किन्ज़ा एपीआई आप कितनी हसीं हाँ.. आप के चाहने वाले से भी पहले मई आपकी फुद्दी पाडांगा.. ufffffffffff मेरा लुंड झटके पर झटके मारने लगा....

 


दूसरी क़िस्त

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किन्ज़ा एपीआई को लैपटॉप की स्क्रीन पर नंगा देख कर मई अपना लुंड हिलने लगा. मेरे पुरे जिस्म में सुरूर की इन्तहा थी. अपनी hi सगी बहन के नंगे जिस्म को देख कर लुंड हिलना.... uffffffffff.. दिल में आया अपने लुंड को स्क्रीन पर जहाँ एपीआई का मोह हाँ, मुम्मे हाँ.. वहां लगा दूँ...

लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया.. थोड़ी देर एपीआई के नंगे जिस्म को देख अपने लुंड को हिला कर मैंने लैपटॉप बंद कर दिया. फिर उठ कर बाथरूम में जा घुसा.

शपोवेर के नीचे नंगा होकर नहाते हुए मई बड़बड़ाया - ये लुंड तो अब एपीआई की छूट में hi घुस कर रहेगा. ऐसे इसे हिला हिला कर कमज़ोर नहीं बनाऊंगा. ऐसे तो कोई भी मेरी दीवानी नहीं बन पायेगी. मेरा ये तगड़ा लुंड hi सबको मेरा दीवाना बनाएगा.

मई शावर के थानेद के नीचे अपने लुंड को ठंडा करने लगा. एहि मेरी बड़ी खूबी थी. मई जो इरादा कर लेता था. किसी भी हाल में फिर उसपर पूरा उतरा करता था. किन्ज़ा एपीआई के बाथरूम में हिडन सीएएम लगाना जाए शेर लेन के मुतरादिफ़ था. लेकिन मई वो भी कर गुज़रा था. उसका नतीजा ये हुआ मेरे लैपटॉप में किन्ज़ा एपीआई की नंगी वीडियो मौजूद थी.

अब अपने लुंड को हिला कर मणि न निकलने का इरादा किया तो भी मई कामयाब हो गया था. लुंड में तरंग थी. लुंड मूड में था. फिर भी मई पुरसुकून था. ये एहि मेरा स्टैमिना बढ़ा गया था. मेरी कॉलेज की लड़कियों के साथ दोस्ती थी. और दोनों मेरे लुंड की बड़ी फैन थी. मई दोनों को खूब दबा दबा कर छोड़ा करता था.

मई फस्क नॉन मेडिकल का स्टूडेंट हों. हम सब लाहौर में रहते हाँ.

नहाने के बाद मई कमरे में आया. ट्रॉउज़र शर्ट पहन कर मई कमरे से निकल गया.

शाम होने में कुछ देर थी. मई बहार लॉन में आया तो सब वही बैठे हुए थे. मई उनके पास जा बैठा.

किन्ज़ा एपीआई के रिश्ते बारे hi बातें हो रही थी. जिस लड़के से किन्ज़ा एपीआई की बात चली थी. उसका नाम नोमान था.

किन्ज़ा सब को सुन रही थी. किसी के पूछने पर सरसरी का जवाब दे रही थी. अब भी वो सब को "हाँ" ... "ाचा लड़का है" इतना बोल प् रही थी. इससे ज़यादा कुछ नहीं. एक तो उसे बड़ी शर्म ा रही थी. दूसरे वो अंदर से दुखी भी थी.

अम्मी जान मेरे पीछे से एक हाथ दाल मुझ खुद के साथ लगाती हुई बोली

अम्मी जान - फिरोज तुम्हे कैसा लगा नोमान

सब मुझे देखने लगे

मैंने किन्ज़ा एपीआई को देखा. वो भी सवालिया नज़रों से मुझे देखने लगी

मई - मई क्या कह सकता हों अम्मी जान. आप सब मुझसे बहुत प्यार करते हाँ. इतना कह खंडन में किसी से नहीं करते. मई अब जवान हो चूका हों. लेकिन इसके बावजूद भी मुझे िम्मातुरे hi समझा जायेगा. यहाँ आप सब बड़े हाँ. खंडन में सब फैसले वही करते हाँ. अब तक के उनके सभी फैसले सही सबत हुए हाँ. ऐसा आप सब जानते हाँ. लेकिन ज़रूरी तो नहीं. हम जो फैसला कर लें. वही सही हो. हो सकता है.. जो फैसला आपने किसी की ज़िन्दगी के लिए किया हो. उसे hi वो फैसला पसंद न हो.

अम्मी जान और सब मुझे हैरानी से देखने लगे.. मैंने ऐसी बातें पहले कभी करि थी.

अम्मी जान - बाबू ये तुम hi हो. या मेरी ऑंखें धोका खा रही हाँ. मेरा बाबू इतना बड़ा कबसे हो गया. मुझे पता hi नहीं चला. कितनी अछि बातें करने लगा है मेरा बाबू.

अम्मी जान ने फ़ौरन hi मेरे गाल पर किश कर दी. मैंने किन्ज़ा एपीआई को देखा. उनकी आँखों में दुन्या भर की हैरानी थी. मैंने एक एक को देखा. दादा जान पर नज़र पड़ी. वो भी मुझे स्माइल से देख रहे थे.

दादा - आज मुझे लगा मैं बरसों बाद अपने सामने अपना जवानी वाला रूप देख रहा हों. फिरोज बीटा मैं भी जवानी में तुम्हारे जितना जब था तो बड़ों के सामने ऐसे लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करना सीख गया था. लेकिन आज से पहले तुम्हारे ये अल्फ़ाज़ कहाँ थे बीटा.

मई - दादा जान. आप से पहले कोई ऐसा मौका hi नहीं आया था. लेकिन इस के बाद भी एक बात और है

दादा जान दादी जान और सब अब मुझे बड़े शौक से देख रहे थे

दादा जान घर में बड़े थे. घर के हेड थे. जब वो बोल रहे थे. तो किसी और को बोलने की जुर्रत नहीं थी. दादी जान को भी नहीं.

दादा जान - पहले मेरे पास कर बैठो..

दादा जान भाभी सराह खान से बोले - बेटी तुम उधर जाओ.. भाभी और मई दोनों उठ खड़े हुए. भाभी अम्मी जान के पास मेरी चेयर पर बेथ गई. फिर मई दादा जान के करीब भाभी वाली चेयर पर बेथ गया.

दादा जान मुझे देख बोले - तो कहो न फिर.. मुझे जानना है. वह कुछ और क्या है

मई - दादा जान. मई कभी आप के सामने न बोलता. नहीं ये हिम्मत भी आप की बख्शी हुई है. आप का hi खून मेरी रगों में दौड़ रहा है.

दादा जान - बोलते रहो.. मई सुन रहा हों

मई - दादा जान. जब आप का ज़माना था. तब आप को लगा आप के बड़े वक़्त की चल को समझते हुए फैसले नहीं कर प् रहे हाँ. तब आप ने पहली बार बोलना शुरू किया. वहां आप ने कुछ ऐसे अंदाज़ में अपने ख़यालात, खंडन के लिए प्यार मोहब्बत और परवा को शो ऑफ क्या.. सब आप को जवान होते हुए भी बड़ा मानने पर मजबूर हो गए. अगर वो ऐसा न करते थे तो खंडन में जितनी तब्दीलियां आप के फैसलों के चलते आई थी. वो न आ पाई होती. एहि देख लीजिये.. आप के hi फैसलों का ये रिजल्ट सामने आया है. आज हम लाहौर जैसे शहर में एक अच्छी और अलग ज़िन्दगी जी रहे हाँ..

दादा जान की ऑंखें और भी शौक से खुलती चली गयी.

दादा जान - बरखुरदार बोलते रहो.. आज बड़ा मज़ा आ रहा है तुम्हारी बातें सुनकर.

मई - दादा जान आप ने आज तक जो भी फैसले किये. वो सरे वक़्त के हिसाब से थे. अपनी उम्र के थे जब आप. आप ने अपनी बहनो अपने भाइयों और खंडन में दूसरों की ज़िन्दगियों के अहम् फैसले खूब सोच समझ कर किये. जहाँ आप की कोई बात किसी की समझ में नहीं आई. वहां आप ने सब को दलायल से समझाया.. बड़ों से सलाह मश्वरा किया. फिर देखते hi देखते आप के फैसलों को सराहा जाने लगा. फिर आप ने शादी की. आप के बच्चे हुए. वो जवान हुए तो ज़माने एक बार फिरसे अपनी चल बदल चूका था. आप ने पुराने ख्यालों को बदल कर तय जान, डैड और फुफु की शादियां करि. और सब के सब आपके इन्ही फैसलों के चलते आज एक खुश हाल ज़िनदगी जी रहे हाँ.

हम दुन्या में आये. हमारा बचपन से शुरू हुआ सफर हमें जवानी तक ले आया. आज फिरसे वक़्त बदल चूका है. और इस बार कुछ ऐसी स्पीड के साथ बदला है. देखने वाले हैरत में गम हाँ. आप के ज़माने में, डैड के ज़माने में आप जैसे बड़े जो भी फैसले किये करते थे. जिस किसी की भी ज़िन्दगी के फैसले किया करते थे. वो सर झुका कर तस्लीम कर लिया करते थे. वो सब आप को ऐसी इज़्ज़त और मर्तबा दिया करते थे. उम्र भर आप के फैसलों की लाज रखना अपना फ़र्ज़ समझा करते थे. और कभी कभी किसी को आप के किसी फैसले से गिला भी नहीं हुआ. सब ने एक खुश हाल ज़िन्दगी गुज़री.

इतना बोल मैंने एक नज़र सब को देखा. किन्ज़ा एपीआई के रिश्ते की बात चल रही थी. तो शर्म से ऑंखें नहीं उठा प् रही थी. लेकिन इस वक़्त वो इतनी हैरानी के साथ मुझे देख रही थी. जिसे लफ़्ज़ों में बयां नहीं किया जा सकता था. मैंने अम्मी जान को देखा. उनका सीना जैसे फखर से फूल चूका था.

आह्हः अम्मी जान.. आप का ये सीना आपके गोर चित्ते और रास भरे मुम्मों से पहले भी बड़ा बहार को निकला हुआ है. और बहार निकलने की क्या ज़रूरत है. उफ्फ्फ अम्मी जान के ये मुम्मे आज तक में मेरे होने वाले थे. जिन्हे बरसों से डैड पीते आ रहे थे. जिनके साथ डैड खेलते आ रहे हाँ. जल्द hi मेरे होने वाले थे..

अम्मी जान की आँखों में मुझे आज ऐसी ख़ुशी दिखी. जो आज से पहले मुझे कभी दिखाई नहीं दी थी. ऐसा hi कुछ हाल दादी जान का भी था.. माहिरा एपीआई भी वही मौजूद थी.

जब रिश्ते की बात चली थी. तब फुफु वही थी. बाद में चली गई थी. वो होती तो मुझे अपने भरी सीने के साथ लगा कर खूब हस्ती.. मुझे प्यार करती. खंडन में एक वही थी. जो खुल कर मुझे सीने से लगा कर मेरा मोह चूमा करती थी. वर्ण माँ मुझे खुल कर सीने से नहीं लगाया करती थी. माँ बड़ी शर्म वाली थी.

दादा जान की भी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था

दादा जान - जनता हों फिरोज बीटा आज का ज़माना बुलेट ट्रैन की स्पीड से दौड़ रहा है. इतनी hi स्पीड से अपनी चल बदलता जा रहा है. तुम अपनी बात आगे बढ़ाओ.. मुझे तुम्हारे ख़यालात जान कर बहुत ख़ुशी मिल रही है. लेकिन मई अभी किसी नतीजे पर नहीं पोहंचा. बस तुम जल्दी से अपनी बात पूरी करो..

मई - आप ने देखा दादा जान. आज के ज़माने में लड़के लड़कियां अपनी अपनी पसंद की शादियां कर रहे हाँ. अपने खंडन वळून से रज़ामंदी नहीं मिलती तो भाग जाती हाँ

दादा जान किन्ज़ा एपीआई और माहिरा एपीआई को एक नज़र देख कर बड़े फखर के साथ बोले

दादा जान - मुझे मेरी परवरिश पर पूरा पूरा भरोसा है. मेरी बेटियां कभी ऐसा सोच भी नहीं सकती. तुमने भी देखा. हमने किन्ज़ा बेटी का रिश्ता पक्का नहीं किया है. इसकी रज़ामंदी के बिना ये शादी हो भी नहीं सकती. लेकिन किन्ज़ा बेटी को इस रिश्ते पर कोई ऐतराज़ नहीं है.

मई - ऐसा मई भी समझता हों दादा जान

मैंने किन्ज़ा एपीआई को देखा था. उसे लगा मई उसके दिल का भेद खोल दूंगा. वो खुद में सिमट रही थी. मैंने बात राखी तो उसने सुख की सांस ली

मई - दादा जान. वक़्त जब स्पीड के साथ अपनी चलें बदल रहा है तो हम कोई भी फैसला जल्दबाज़ी में नहीं कर सकते

दादा जान - भई . मुझे भी कोई जल्दी नहीं. तुम्हारी अब तक की साडी बातें सुनकर मुझे बहुत ाचा लगा. लेकिन तुम अगर ये समझ रहे हो. मई वक़्त की चल के साथ चल मिला कर नहीं प् रहा हों तो फिरोज बीटा तुम गलत हो.

मई - मैं भी कभी ये नहीं सोच सकता. मेरे दादा जान कभी गलत हो सकते हाँ. मई बास ये चाहता हों. किन्ज़ा एपीआई या माहिरा एपीआई की शादी में मेरी पूरी पूरी मर्ज़ी शामिल होनी चाहिए..

दादा जान - वो तो पहले से hi है. मई इसी लिए तो इतनी देर से सबसे सलाह मश्वरा कर रहा हों. किसी के दिल में कोई भी बात हो तो वो मुझसे कह सकता है

मई - मई अगर खुल कर बात करूँ दादा जान तोह

दादा जान - क्या तुम अब तक खुल के बात नहीं कर रहे थे

मई - नहीं दादा जान

दादा जान - हैरत है. ज़िन्दगी में पहली बार इतना खुल कर बोले हो. फिर भी कह रहे हो. खुल कर नहीं बात की

मई किन्ज़ा एपीआई को देखने लगा. अब वो खुद में कुछ सिमटी. आँखों में इशारा किया. देखो मेरा भेद दादा जान को मत बताना. वर्ण मई शर्म से मर जाउंगी

मई किन्ज़ा एपीआई को देख मुस्कुराया. वो थोड़ी सी घबराई.

मई दादा जान को देख बोलै - दादा जान आप ने अपनी पूरी उम्र अपणु के लिए गुज़र दी. उनके अचे के लिए सब कुछ कर डाला. आप के होते हुए डैड चुप hi रहते हाँ. वो आप के हर फैसले पर सर झुका दिए करते हाँ

दादा जान - बेटे क्या तुम मेरे हर फैसले पर सर नहीं झुकाओगे

मई - नहीं दादा जान

दादा जान हैरान रह गए... अम्मी जान जो मुझे प्यार से देख रही थी.. बड़े सख्त लहजे में बोली

अम्मी जान - फिरोज!.. तुम्हे शर्म आणि चाहिए.. अब्बू जी के साथ ऐसा बोलते हुए

दादा जान - गुलशन बेटी तुम बीच में न बोलो.. हाँ तो फिरोज बेटे.. तुम क्यों मेरे फैसले पर सर नहीं झुका सकते. क्या मई अपने बच्चों के लिए कोई गलत फैसले ले सकता हों

मई - नहीं. मैंने ये तो नहीं कहा

दादा जान - तुम्हारी बात का मतलब तो एहि निकलता है न

मई - ये भी सही बात है

दादा जान - तो फिर

मई - दादा जान.. आप के बाद डैड हाँ. बड़े भैया हाँ. फिर मई हों. डैड कुछ भी करें. बड़े भैया कुछ भी सोचें मेरी बहनो की ज़िन्दगियों को लेकर के. लेकिन मई खुद से अपनी बहनो के लाइफ पार्टनर बारे खोज करूँगा.. मई परखूँगा. आया कह वह वाकई में मेरी बहनो को वैसी खुशियां दे सकते हाँ. जैसी मेरी बहने डेसेर्वे करती है. फिर मेरे दिल ने जो फैसला किया. वो मैं आप को बता दूंगा.. फिर हम आगे की बात करेंगे.. इसलिए मई किन्ज़ा एपीआई के नोमान भाई को एक प्रेसेंट भी वैल्यू नहीं दूंगा....

दादा जान मुझे घूरने लगे.

दादा जान - क्या मैंने नोमान को देखा और परखा. वो तुम्हारी नज़र में कोई वैल्यू नहीं रखता..

मई - जब आप जवान थे. आप के बड़ों ने जो फैसले लिए थे. तब क्या आपकी नज़र में उनके फैसलों की कोई वैल्यू नहीं थी. अगर थी तो फिर आप ने अपनी सोच को सामने क्यों रखा.. अगर तब आप सही थे तो आज मई सही हों. तब आप को लगता था. कुछ बातें आप के बड़ों की नज़रों से ओझल रह सकती हाँ. तो आज मई--- सॉरी दादा जान. मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए.. लेकिन मई कहूंगा.. मेरा भी हक़ बनता है.. मई किसी भी मामले में खुद को घुसा कर उसे अपने हिसाब से देख और समझ सकता हों. जहाँ मुझे लगेगा. अनजाने में कुछ गलत हो रहा है. मई उस गलत को रोकने की कोशिश करूँगा

अम्मी जान बहुत ज़यादा घुसे में आई मुझे घूर रही थी..

दादा जान और दादी जान भी मुझे घूर रही थी. भाभी किन्ज़ा एपीआई और माहिरा एपीआई हैरतों के समंदर में डूबी मुझे देख रही थी. किन्ज़ा एपीआई की ज़िन्दगी का सवाल था. और उसे मेरा इतना खुल कर बोलना जैसा पैग़ाम दे गया. मई उसके लिए सब कुछ कर जाऊँगा. वो मुझे बड़े प्यार फखर से देखने लगी.

दादा जान कुछ देर मुझे घूरते रहे. मेरी बातों को तोलते रहे.. फिर एकदम से ज़ोर ज़ोर से हसने लगे. दादा जान को यौन हस्ते देख सबकी सांस में सांस आई. वर्ण सब ने समझ लिया था. फिरोज से गुस्ताखी हो गई है. और दादा जान सख्त नाराज़ हो गए हाँ

दादा जान झटके में उठे और मुझे पकड़ कर खड़ा करते हुए बड़े जोश के साथ अपने सीने से लगा गए. दादा जान बड़े जोश के साथ मेरी पीठ को थपथपा रहे थे..

दादा जान - शाबाश फिरोज बीटा.. मुझे तुमसे इतनी उम्मीद नहीं थी. जितना तुम बोल गए. और क्या खूब बोले हो फिरोज बीटा.. मई ऐसा hi था अपने ज़माने में.. आज मई एक दूसरे रियासत खान को देख रहे हो. मई बड़े फखर से कहता हों. मेरे बेटों में अगर कोई मेरे जैसा नहीं बन पाए. मेरा कोई पोता मेरे जैसा नहीं बन पाया. लेकिन तुम.. फिरोज बीटा.. तुममे मई खुद को देख रहा हों. ऐसा hi था मई. जैसे तुम हो. अपने भाइयों की अचे फ्यूचर के लिए अपनी बहनो की खुश हाल ज़िन्दगी के लिए अपने खंडन के सुख दुःख के लिए मई बड़ों के आगे सीना तान कर खड़ा हो गया था. और मई बड़ी ख़ुशी के साथ कह रहा हों. तुम अपणु के लिए वो सब कुछ कर जाओगे.. जो मई कर गया था.. मई तुम्हे खुले दिल के साथ खुश आमदीद कहता हों बीटा. सही कहा तुमने.. ज़माना बड़ी स्पीड के साथ अपनी चलें बदल रहा है. भले hi मई अपनी पूरी सूझ बूझ के साथ अपनी पोतियों की ज़िन्दगी के फैसले कर रहा हों. लेकिन मुझसे भी चूक हो सकती है. मई ठहरा पुराने ज़माने का

मई - नहीं दादा जान .. आप हर ज़माने के सिकंदर हाँ

दादा जान अपनी मूछूँ को ताओ देते हुए चहक कर बोले - वो तो मई हों

सब ज़ोर से है पड़े.. माहौल बदल गया था. अब किसी चेहरे पर मेरे लिए घुसे नहीं था

दादा जान - सिकंदर भी एक ज़माने तक हुकमरान रहा. साडी दुन्या को फ़तेह करने की छह दिल में लिए दुन्या से चला गया. मई भी बीटा हर फैसला सही कर जाऊँगा. मेरी भी अपनी सोच में हमेशा hi खरा उतरूंगा.. ऐसा सोचना गलत है. और बीटा. मुझे मेरी सोच पर हमेशा मान तो रहा है. मई मग़रूर कभी नहीं रहा. k**da से डरता हों. बड़े बोल नहीं बोलता मई कभी भी..

दादा जान सब को देख बोले - आज से फिरोज को घर का मुहाफ़िज़ समझा जाएगा. किसी भी ज़रूरी मामले में इसकी सलाह ली जाएगी. यौन समझ लेना मुझसे बात कर रहे हो तुम.. फिरोज से कोई मामला न सुलझ सके. फिर मेरे पास आना..

फिर मुझे देख बोले - फ्रोज़ मियां.. सच कहूं तो मई भी थक गया हों. अब तुमने मेरी जगा समझल ली है. अब मई खूब रेस्ट करूँगा

दादा जान हस्ते हुए बोले.. बाद में खूब माहौल मस्ती भरा रहा.. किन्ज़ा एपीआई की आँखों में चमक आई. जैसे वो अपना हमसफ़र प् चुकी हों..

अम्मी जान ने मुझे फिरसे करीब बिठा लिया था.. और मुझे प्यार करती रही थी.. मेरी बालाएं लेती रही थी..

फिर शाम हो गई. डिनर की तैयारी होने लगी. मई किन्ज़ा एपीआई का हाथ थाम उसे उसके कमरे में ले गया.. दरवाज़ा बंद करने के बाद मैंने एपीआई को गले से लगा लिया.

एपीआई इतनी खुश थी.. मेरी आँखों में देख मुस्कुराने लगी.

मई - देखा.. मैंने कहा था न.. मई आप की ख़ुशी के लिए, आप के खवाबो के लिए कुछ भी कर जाऊँगा

किन्ज़ा एपीआई ने थोड़ी शर्म को हटते हुए मेरे गाल पर हाथ फेर दिए.. किश करना बचपन में हुआ करता था. अब भी हम गले से लगे थे. लेकिन किन्ज़ा एपीआई का एक हाथ मेरे सीने पर था. एपीआई के मुम्मे मेरे सीने से दूर थे. मुम्मों की आंच आ रही थी. लेकिन आग महसूस नहीं हो रही थी. हाँ मस्त खुशबु ज़रूर आ रही थी..

किन्ज़ा एपीआई मेरे गाल पर हाथ फेरती हुई बोली - सच बाबू. मुझे लगा hi नहीं था. मेरा बाबू इतना बड़ा भी हो गया है. मई तो उसे बच्चा hi समझती रही थी.

मई - तो सबत हो गया मई अब बचा नहीं रहा

किन्ज़ा एपीआई हस्ती हुई - हाँ अब तो तुम घर के बड़े बन गए हो

मई - तो अब... क्या अब भी दिल में डर जैसा कुछ है..

किन्ज़ा एपीआई ने शर्म से पलकें झुका कर कहा - डर तो रहेगा. अभी कहाँ.. अभी तो मंज़िल बहुत दूर ह

मई एपीआई के जिस्म को सोचता हुआ - हाँ मंज़िल तो अभी दूर है. लेकिन मई जल्द से जल्द मंज़िल पर पोहंच कर रहूँगा

किन्ज़ा एपीआई अपने राज दुलारे को सोच गई. और ज़यादा शर्मा गई.

मैंने एपीआई के चेहरे को देखा. उनकी झुकी पलकों को देखा. फिर जुर्रत का मुज़ाहिरा करता हुआ एकदम से किन्ज़ा एपीआई के गाल पर अपने होंठ रख कर गाल को चुम लिए..

किन्ज़ा एपीआई मेरे सीने पर दबाओ दाल मुझसे अलग हो गई. और मुझे देखने लगी. शर्म से उनकी पलकें कांपने लगी थी. मई आगे बढ़ा

मई - क्या मेरा इतना भी हक़ नहीं बनता

किन्ज़ा एपीआई नज़रें नीची करती बोली - बाबू अब तुम बड़े हो गए हो

मई - तो क्या हुआ. हमारा प्यार भी तो बढ़ गया है

किन्ज़ा - लेकिन.....

किन्ज़ा एपीआई शर्म से सर और नीचे करती बड़ी हसीं लग रही थी

किन्ज़ा - लेकिन हम उम्र की जिस मंज़िल पर पोहंच गए हाँ. वहां फैसले ज़रूरी हो जाते हाँ.

उफ्फफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ .. मई पहले से जनता था. मुझे बड़े पापड़ बेलने पड़ेंगे. हमारा खंडन शरीफ खंडन था. बच्चे बड़े होते hi फैसले बना जाया करते थे. लेकिन मई सरे फैसले समेत लेना चाहता था. देर से सही लेकिन एक दिन मई अपने चटनी और मज़ेदार इरादों में कामयाब ज़रूर होने वाला था..

अपने इरादों को कामयाबी से हमकिनार करने के लिए ज़रूरी था. मुझे धीरे धीरे से hi सही लेकिन हर मिलने वाले मोके का फायदा उठा कर दूरियां काम करनी थी. और मैं करने लगा

मई करीब जा कर एपीआई के दोनों हाथ थाम गया

मई - एपीआई मेरी आँखों में देखें

किन्ज़ा एपीआई ने सर उठा कर मेरी आँखों में देखा. वहां मेरे लिए प्यार hi प्यार और भरोसा था. शर्म hi शर्म थी.

मई - क्या दिख रहा है आप को मेरी आँखों में

किन्ज़ा - प्यार.. अपनापन.. भरोसा.. यकीन.. एक महफ़ीज़ की परछाई

मई - और

किन्ज़ा - और तुम बताओ. मुझे जो दिखा. वो मैंने बता दिए

मई - क्या दादा जान से हुई बातों में मैंने ये नहीं कहा था. ज़माना अपनी चल बदल रहा है

किन्ज़ा - कहा था

मई - क्या मैंने ये नहीं कहा था. मई अपनी बहनो की खुश हाल ज़िन्दगी के लिए उनकी ज़िन्दगी में आने वाले हमसफर की पूरी पूरी परख करूँगा

किन्ज़ा - कहा था

मई - क्या दादा जान ने मेरी बात पर यकीन कर लिया

किन्ज़ा - हाँ कर लिया

मई - और आप ने

किन्ज़ा - मैंने.. मेरे दिल ने भी यकीन कर लिया. बाबू तुम घंटों की कितने बड़े बन गए हो

मई - और पायरा कितना बन गया हों

किन्ज़ा - इतना के लफ़्ज़ों में बयां मुमकिन नहीं

मई - तो फिर मई इतना प्यारा हों कर आप के दिल में वहीँ हों या और भी अंडर तक जा समाया हों

किन्ज़ा - बहुत.. बहुत गहराई तक जा समाये हो तुम बाबू.. तुमने मेरे लिए इतना कुछ कर दिखाया.. मेरे लिए तुम ऐसे हो गए हो. कोई अब तुम जैसा नहीं रहा

मई - मई अगर और भी खास बनना चहुँ. आप के दिल में और भी गहराई तक उतरना चहुँ. इतना प्यार दूँ आप को. आप अपनी आखरी सांस तक कभी फरामोश न कर पाएं

किन्ज़ा - ये सुनने में खवाब जैसा है बाबू. लेकिन सच में तुम्हारा प्यार आखरी सांस तक मुझे हर सांस के साथ खुशियां hi खुशियां देता रहेगा

मई - और अगर खुशियों को गहरा बना दिया जाए.. तोह

किन्ज़ा - ये तो और भी अच्छी बात हो जाएगी बाबू

मई - तो क्यों न हम बदले वक़्त के साथ थोड़ा खुद को बदल दें. मोडरें ज़माने में जी रहे खंडन कितने क्लोज हाँ एक दूसरे के.. लेकिन हम.. इतना प्यार करते हुए भी एक दूसरे से खुल कर गले नहीं मिल सकते. अपनी बेपनाह ख़ुशी का इज़हार भी दूर रह कर करते हाँ. एपीआई मई और तरह से जीना चाहता हों. मई खुल कर जीना चाहता हों. आप को सब को इतना प्यार देना चाहता हों. कोई न दे पाया हो. इतनी खुशियां देना चाहता हों. कोई भाई कोई बीटा अपनी बहनो को अपनी माँ को न दे सका हो

किन्ज़ा - बाबू तुम्हारी बातें बहुत खूबसूरत होती जा रही हाँ

मई - हम अपने प्यार को अनमोल और लम्हों को हसीं से हसीं तर बना सकते हाँ एपीआई. अगर आप चाहें तो

किन्ज़ा एपीआई थोड़ी शर्म थोड़ी उदास होती हुई बोली - बाबू.. इतना सब हमारे खंडन में नहीं है बाबू.. हमारे खंडन में भाई बहन अगर जवान हो जाएँ तो खुल कर जी सकते. जितने तुम मेरे पास आ जाते हो. कोई भाई अपनी बहनो के पास नहीं आता है..

मई - क्या मेरा इतना पास आना आप को बुरा लगता है

किन्ज़ा - नहीं.. बुरा क्यों लगेगा

मई - क्या मेरा आप के गाल को चूमना गुनाह है

किन्ज़ा - मैंने ऐसा तो कुछ नहीं कहा

मई - क्या आप के दिल को बुरा लगा

किन्ज़ा - नहीं.. बुरा तो नहीं लगे

मई - तो अच्छा भी नहीं लगा होगा

किन्ज़ा - नहीं ऐसा नहीं है बाबू

मई - तो अच्छा लगा

किन्ज़ा एपीआई को फिरसे ढेर साडी श्रम आ रही.. वो बोली नहीं. लेकिन सर हाँ में हिला गई

मई - तो अगर मई ऐसा प्यार आप से बार बार चहुँ तो

किन्ज़ा एपीआई ने नज़र उठा कर मेरी आँखों में देखा. फिर शर्म से पलकें झुका गई

किन्ज़ा - बाबू. तुम क्यों ऐसा सोचते हो.. किसी ने देख लिया तो पता नहीं क्या सोचेगा

मई - कोई नहीं देख पायेगा... और फिर कोई बुरा क्यों सोचेगा.. सब को पता है. हममे कितना प्यार है

किन्ज़ा - वो तो है. लेकिन मई डर्टी हों

मई - किस बात से

किन्ज़ा - कोई मेरे किरदार पर ऊँगली न उठा दे

मई - क्या मेरे होते हुए भी आप को डर लगता है

किन्ज़ा - तुम समझ नहीं रहे हो बाबू

मई - वो सब बाद में.. आप ये बताएं. अगर कोई देखने वाला न हो. तब क्या मई आप के गालों को चुम सकता हों

किन्ज़ा एपीआई की सांस चढ़ गई.. उनके हाथ कंपनी लगे. मई धीरे धीरे किन्ज़ा एपीआई के करीब और करीब होता जा रहा था

थोड़ी देर बाद किन्ज़ा एपीआई बिना सर उठाये बोली - मई नहीं रोकूंगी. लेकिन जिस दिन बात बिगड़ गई. तुम्हारी कसम मई जान हार जाउंगी..

मई खिल उठा. मैंने एक मार्का सर अंजाम दे दिया.. मैंने दरवाज़े को बंद देख झटसे एपीआई को गले से लगा कर दोनों गलों को बरी बरी चुम लिया..

मैंने बड़ी फुर्ती के साथ ऐसा किया था. किन्ज़ा एपीआई मुझे रोक नहीं पाई. अपने गलों पर मेरे होंटो की गर्मी और नमी उतरने से न रोक पाई. वो मुझे ढेरों श्रम के साथ देखने लगी...

फिर सर झुका कर शर्मीली स्माइल के साथ बोली - बाबू.. तुम कितने बेशरम हो गए हो..

मई हसने लगा.. फिर किन्ज़ा एपीआई को बीएड पर बिठा कर उनके दोनों हाथ थाम लिए..

आज के लिए इतना hi काफी था.. एक hi बार में नहीं खुल सकता था मैं. वर्ण एपीआई के दिल में खटक पद जाती....

कुछ देर और बातें करने के बाद एपीआई का मूड पहले जैसा बना कर मई एपीआई के कमरे से निकल पड़ा...

 


तीसरी क़िस्त

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भाभी एक नौकरानी के साथ किचन में डिनर के साथ तयारी में लगी हुई थी. बाकि हम सब ड्राइंग रूम बैठे बातें कर रहे थे. आदिम भाई और डैड भी लौट आये थे.

अम्मी जान बड़े फखर के साथ नदीम भाई और डैड को मेरी शाम से पहले की बातें बता रही थी. डैड और नदीम भाई हैरानी से अम्मी जान की बातें सुन रहे थे. बार बार उनके मोह हैरत से खुले जा रहे थे. अम्मी जान खामोश हुई. तो डैड और नदीम भाई सोफों पर से खड़े हो गए. मई समझ गया. मई भी उठ खड़ा हुआ

डैड बाहें पहला कर बोले बोले - आ जाओ यार. सीने से लग जाओ. आज मुझे ऐसी ख़ुशी मिली है. जिसे लफ़्ज़ों में बयां कर पाने की सलाहियत मुझमे नहीं है. बास सीने से लगा कर तुम्हारा माथा चुम कर hi मैं अपनी ख़ुशी का इज़हार कर सकता हों.

मई बड़ी ख़ुशी के साथ कदम आगे बढ़ा कर डैड के चौड़े सीने में जा समाया. डैड बड़ी मोहब्बत और बड़े जोश के साथ मुझे खुद में भेंचने लगे.

डैड - मुझे पता hi नहीं चला. मेरा फिरोज इतना बड़ा हो गया है. इतना बड़ा कह मुझे अपना क़द अपने बेटे से भी छोटा महसूस होने लगा है

मई - न डैड.. प्ल्ज़ ऐसा मत बोलिये. मई आप के दम क़दम से हों. आप की परछाई हों. मेरी रगों का आप को खून दौड़ रहा है. मेरी ऐसी सोचें आपकी तरबियत आप के बेपनाह प्यार की वजा हाँ.

डैड - कुछ भी कहो. आज मेरा सीना फखर से चौड़ा कर दिया तुमने यार. सर ऊँचा कर दिए. बातों में मैंने ये भी जाना. पापा के जैसे ग्रेट इंसान का बीटा होता हुए भी मई क्यों नहीं उनके जैसा बन पाया.

मई - नहीं डैड. आप तो मेरे लिए आइडियल हाँ. डैड जान के बाद आप hi सब कुछ हाँ हमारे

डैड - कुछ भी कहो. पर यार तेरा पापा जी के जैसी सोच जान कर मुझे बहुत ख़ुशी महसूस हो रही है. और ये सोच कर मेरे दिल में इतना सुकून उतर गया है. तुम अपनी बहनो से इतना प्यार करते हो. उनके बेहतर मुस्तक़बिल की फ़िक्र तुम्हे हमसे भी बढ़कर है

मई - डैड... प्ल्ज़ डैड.. मुझे यौन शर्मिंदा न करें

डैड - शर्मिंदा... अरे नहीं यार.. देखो पहले भी मई तुमसे दोस्त बनकर बात करता था. लेकिन धयान दो आज मेरे लफ़्ज़ों में कितना चेंज आ गया है. बीटा जवान हो जाये. उसकी ज़िम्मेदारियाँ बाँट ले. वो दोस्त भी बन जाता है और साथी भी.. आज से तुम मेरे बेटे होने के साथ साथ मेरे दोस्त मेरे साथी भी हो..

फिर डैड मेरे माथे को चूमते हुए अम्मी जान से बोलो

डैड - कल हम सब दरबार जाएंगे. वहां लंगर तक़सीम करेंगे.

अम्मी जान - मैं भी कुछ ऐसा hi सोच रही थी

अम्मी जान के साथ साथ सब खिल उठे

मई डैड से मिल नदीम भाई से मिला. वो भी मुझसे बड़ी मोहब्बत के साथ मिले

नदीम - मुझसे छोटे होकर बनने जा रहे हो. भूल है तुम्हारी.. ख़बरदार जो मुझसे ज़यादा नाम बनाने की कोशिश भी करि तुमने तो

सब है पड़े

नदीम - शर्म तो नहीं आयी होगी तुम्हे ज़रा सी भी.. अरे ऐसा कुछ दिल में था. तो मुझसे कह देते. मई सबसे बोल देता..

सब - हाहाहा

किन्ज़ा एपीआई का चेहरा शर्म से गुलाबी होने लगा था. फिर भी है रही थी.. हेहेहे

मैंने भी नदीम भाई को दन्त दिखा दिए

नदीम भाई ने एक बाज़ो मेरी गर्दन के गिर्द लपेट कर मुझे सोफे पर धक्का दिया.. खुद मुझपर झुकता हुआ मुझे मुक्का बना कर दिखता हुआ बोलै

नदीम - ख़बरदार आगे से कोई नंबर लेने की मत सोचना.. अब तक तुमने जितने नंबर बना लिए हाँ. पहले मुझे उतने नंबर बना लेने दो.. अरे पढाई के बाद डैड के साथ कारखाने में जा कर मैंने समझ लिया. मैं तीर मार दिखाया है. लेकिन तुमने.. तुमने तो फर्स्ट इनिंग की फर्स्ट बॉल पर hi बॉल को ग्राउंड से बहार फ़ेंक दिया... मुझसे छोटे थे तुम.. कुछ तो लिहाज़ किया होता मेरा यार

सब है रहे थे. माहौल में ऐसी रौनक काम hi देखने को मिलती है. वर्ण हम सब में बहुत प्यार था. फिर नदीम भाई मुझे खड़ा करते हुए एक बार फिरसे गले से लगा गए.. मेरी पीठ थपकते हुए बोले

नदीम - दादा जान और डैड के होते हुए मैंने ज़रूरत hi महसूस नहीं की थी यार. वर्ण एक भाई होने के नाते, बड़ा भाई होने के नाते, घर का फारद होने के नाते, शादी शुदा होकर भी मेरा राइट बाटना था. मई दादा जान से अपनी लाड़ली बहन के फ्यूचर को लेकर के फ़िक्र का इज़हार करता.. दादा जान का हर फैसला सर आँखों पर यार.. लेकिन तुमने जो कहा ... वो एक कवि हक़ीक़त है.. वक़्त हर पल अपनी चल बदलता है. और वक़्त की चल को न समझते हुए फैसले कर जाना.. अपणु की ज़िन्दगियों के साथ खेलना है. मेरी भी ऑंखें खुल गई हाँ.. तुम करो अपना इत्मिहां.. मई भी करूँगा.. मुझसे किसी भी तरह की मदद की ज़रूरत हो. दिन हो या रात.. किसी भी वक़्त मुझे आवाज़ दे सकते हो.. आज से हम दोनों भाई अपनी बहनो के लिए अपना सब कुछः दो पर लगा देंगे..

मैंने किन्ज़ा एपीआई को देखा. उनकी आँखों में आंसू उतर आये थे. अम्मी जान को देखा. वो हमारा प्यार फिर बातें सुन कर जज़्बाती हो गई थी. दादा जान का सीना, डैड का सीना आज कुछ ज़यादा hi चौड़ा दिखाई दे रहा था. आखिर उनके दो शेर जवान घर में थे. दोनों अपनी घर की इज़्ज़तों अपनी बहनो के लिए प्यार और फ़िक्र का इज़हार कर रहे थे. दादी जान भी आँखों में आंसू लिए हमें रख रही थी

माहिरा एपीआई जो सबसे ज़यादा रिलैक्स रहने वाली लड़की थी. काम hi ऐसे मोके उनकी ज़िन्दगी में देखने को मिले होंगे. जब वो जज़्बात में बहती हुई आंसू बहाने लग पड़ी हो.. वो भी आंसू में आये आंसू साफ़ करती सिसक पड़ी थी

हम दोनों भाई एक दूसरे के गले बार बार लग रहे थे.

फिर भाभी की एंट्री हुई ड्राइंग रूम में.. वो अंदर के माहौल से अनजान थी. उनकी खनकती हुई आवाज़ सुनाई दी

भाभी - खाना लगा दिए गया है टेबल पर.. आज सब आ जाएँ

फिर भाभी की नज़र रोटी आँखों पर पड़ी. वो घबरा कर अंदर घुसती हुई परेशां होकर बोली

भाभी - क्या हुआ.. क्या हुआ. ये सब रो क्यों रहे हाँ

माहिरा एपीआई नाम आवाज़ में बोली - प्यार की बरसात कुछ ज़यादा hi बरसने लगी.. अजब बरसात थी. हमारी आँखों में घुसती चली गई.

भाभी समझदार थी. सब समझ गई. वो करीब आती हुई मेरे सर के बालों पर हाथ फेरती हुई बोली

भाभी - हमारा फिरोज सबको जितना हसता है. उतना रुला भी देता है. मुझे पता नहीं था

नदीम - तुम्हे आये हुए ज़यादा वक़्त नहीं गुज़रा फराह.. ये फिरोज ऐसा hi है. बहुत प्यार करते हाँ हम सब इससे.. लेकिन जितना प्यार ये हम सब से करता है.. हमारा प्यार कोई हैसियत नहीं रखता. इसका प्यार अनमोल है सराह. बड़ा hi अनमोल. पहले पता नहीं चल पाया था कभी.. लेकिन आज पता चला है. पता चलने पर दिल हमारी खुशियों को बर्दाश्त नहीं कर पाए. इतनी ख़ुशी देखि भी तो नहीं थी कभी हमारे दिलों में

अम्मी जान आवाज़ में रोटी हुई हम दोनों भाइयों को एक साथ अपनी आग़ोश में भर्ती हुई बोली

ामी जान - माँ सड़के मेरे दिल के जिगर गोशो.. मैंने हमेशा सब में प्यार बनता. लेकिन जितना प्यार मुझे आज देखने को मिल गया.. मज़ीद की छह नहीं पति मई.. तुम दोनों भाई सदा ऐसे hi एक होकर जियो.. एहि मेरी तमन्नाह है

मेरी ऑंखें भी नाम हो चुकी थी. मई अम्मी जान का एक हाथ थम कर चूमता हुआ बोलै

मई - अम्मी जान जब तक फिरोज के सीने में एक भी सांस है. फिरोज की हर सांस अपणु के लिए निकलेगी. जिस दिन कोई सांस बिना आप सब की चाहत के निकलेगी. उस दिन मई--

अम्मी जान ने झट से मेरे होंठ अपना हाथ रख कर बंद कर दिए

अम्मी जान - इसके बाद न बोलना. मई माँ हों. ऐसी बात नहीं सुन सकती.. देने वाला मेरी उम्र भी तुम दोनों को दे दे.

माहिरा एपीआई माहौल का रंग बदल के खातिर अम्मी जान को पीछे से हुग करती हुई बोली

माहिरा - और हमारा क्याआ. क्या हमें लम्बी उम्र जीने की छह नहीं है

अम्मी जान और हम सब है पड़े.. मई हँसा तो माहिरा ने मुझे ऑंखें दिखा दी

माहिरा - ो हीरो.. सब को रुला कर खुद को है रहे हो..

किन्ज़ा दादा जान दादी जान डैड सब करीब आ गए. हम सब एक दूसरे को घेर कर खड़े हो गए. भाभी ने मुझे देखा. मैंने भाभी को आंख मार दी

भाभी - ोये.. कनखजूरे.. मुझे आंख मरता है

किन्ज़ा एपीआई भाभी के इधर उधर देखती हुई बोली - कहाँ.... कहाँ लगी है आंख.. भाभी कहीं चोट तो नहीं लगी. अरे कोई एम्बुलेंस को कॉल करे.. हाय हमारी नाज़ुक सी भाभी आंख लगने से ज़ख़्मी हो गई हाँ

सब ज़ोर ज़ोर से है पड़े.. ऐसे hi हस्ते हुए सब दिंनिंग रूम में जा पोहंचे. आज वहां का नज़ारा अलग था. सब हस्ते हुए बातें करते हुए डिनर खाने लगे.

जब भाभी मेरी सेक्स पार्टनर बानी. तब भाभी से मेरी बहुत सी बातें हुई थी. बहुत कुछ मुझे भाभी से जान्ने को मिला. कहानी में आसानी के लिए मई अभी से लिख रहा हों.

रात देर तक बातें होती रही. फिर सब अपने अपने कमरों में चले गए. नदीम भाई और भाभी भी अपने कमरे में चले गए. कमरे में घुसते hi भैया ने भाभी को पीछे से हुग कर लिया.

भाभी कसमसाती हुई धीरे से बोली - दूर तो लॉक कर लें पहले.

नदीम - रहने दो. आअज मेरा दिल बहुत खुश है. तुम भी आज मुझे खुश कर दो.

भाभी - मई तो पूरी की पूरी तुम्हारी हों. फिर खुश करने की बात कहाँ से आ गई. तुम जो चाहो प् लेते हो. क्या मैंने कभी मन किया है. कभी आप को इंकार किया है.

नदीम - इंकार नहीं किया. तुम बहुत अछि हो. लेकिन मई चाहता हों. आज तुम और भी अच्छी हो जाओ.

भाभी - हेहेहे.. वही सब तो हम आज भी करेंगे. जो बंद कमरे में हस्बैंड वाइफ होते हुए हम कई बार कर चुके हाँ

नदीम भाई साइड से भाभी का गाल चूमते हुए बोले - आज मुझे सामने से नहीं पीछे से करना है

नदीम भाई की बात सुनकर भाभी लरज़ गई. वो भाई से अलग होकर नदीम भाई को देखने लगी. फिर शर्म से सर झुका कर बोली..

भाभी - नदीम तुम क्यों वही पर अटके हो. सो असल चीज़ है. जहाँ जाने का रास्ता है. वहां की काम और दूसरे रस्ते की तुम ज़यादा सोचते हो. मुझे वहां से ाचा नहीं लगता

नदीम भाई आगे बढ़कर भाभी को गले से लगा कर होंटो पर हल्का सा किश करते हुए बोले

नदीम - यार मन जाओ.. तुम पूरी की पूरी मेरी हो. आगे से भी और पीछे से भी. मेरा कितना दिल करता है पीछे के रस्ते करने का.. लेकिन तुम हो की मानती hi नहीं हो.. प्ल्ज़ मान जाओ. देखो आज घर में सब खुश हाँ. आज तुम मुझे भी खुश कर दो.

भाभी की सांस तेज़ चलने लगी थी. सेक्स का मूड बनने लगा था. जिस्म में सनसनी सी दौड़ने लगी थी. नदीम भाई की गर्म साँसें और जिस्म की गर्मी भाभी के जिस्म में ट्रांसफर होने लगी थी.

नदीम भाई मूड में आते हुए भाभी को वही खड़े खड़े किश करने लगे. तभी भाभी को होश आया. भाभी ने नदीम भाई को खुद से अलग किआ. नदीम भाई उसे हैरानी से देखने लगे. भाभी झिझकती हुई दूर की तरफ इशारा कर गई..

नदीम भाई एक भुलक्कड़ की तरह है पड़े. फिर दूर बंद करने के बाद भाभी के साथ मस्ती करने लगे. किश करने लगे. भाभी के जिस्म पर इधर उधर हाथ फेरने लगी. भाभी की फुद्दी में भी आग बढ़ने लगी.. दोनों बीएड पर पोहंचे.. और कुछ hi पलों में बेलिबास हो गए.. फिर दोनों की चुदाई हुई.. भाभी को खूब करने के बाद, भाभी की फुद्दी की ठुकाई करने के बाद जब भाभी झड़ने वाली हुई. नदीम भाई ने भाभी को पलट दिया.. पीछे से फुद्दी में घुसा कर भाभी की चुदाई करने लगे. भाभी मस्त होती जा रही थी...

तभी नदीम भाई ने लोहा देख कर अपना लुंड भाभी की फिद्दी से निकल दिए.. झुक कर भाभी की गांड के साथ मोह लगा दिया... भाभी उछाल पड़ी. एक तो फूडी का मज़ा जाता रहा था. दूसरा नदीम भाई उनकी गांड चाटने लगे थे..

भाभी हिलने लगी

भाभी - नहीं नदीम.. प्ल्ज़ वहां से मोह हटा लो.. देखो मुझे ाचा नहीं लग रहा. बड़ा अजीब लग रहा है..

नदीम भाई गांड से मोह हटा कर - आज हो hi जाने दो

भाभी मछली - नहीं नदीम.. प्ल्ज़ आगे hi दाल कर करो न

नदीम भाई ने भाभी की नहीं सुनी.. असल में भाभी गांड के टाइट सुराख़ की वजा से डर्टी थी.. गांड फटने के दर्द से घबराती थी.

नदीम भाई जुटे रहे.. अपनी ज़ुबान से भाभी की गांड के सुराख़ को नरम करते रहे. फर जैसे hi भाई ने अपने लुंड को भाभी की गांड पर सेट करना चाहा.. भाभी पूरा ज़ोर लगा कर भाई के नीचे से निकल कर सीढ़ी हो गई...

नदीम भाई का आज बड़ा दिल था.. उन्हें ाचा नहीं लगा

नदीम भाई ठोस सख्त लहजे में - चलो आराम से लेट जाओ. कहा न.. आज करने का मैं है तो आज मई करके hi रहूँगा.. 4 महीने हो गए हमारी शादी को.. लेकिन तुम हो के ाचा नहीं लगता.. अजीब लगता है.. किस ज़माने में जी रही हो तुम फराह.. आज का ज़माना कहाँ जा पोहंचा. आज तो कितना खुल कर लोग सेक्स करते हाँ.. और तुम हो की मुझे इतना भी नहीं करने देती.. क्या मई दुन्या में इकलौता ऐसा शोहर हों. तुम पीछे से करने जा रहा है.. सरे hi करते हाँ

भाभी नदीम भाई का सख्त लहजे सुन दरी भी और दुखी भी हुई

भाभी - सब नहीं करते हाँ नदीम

नदीम - तुम्हे कैसे पता. तुम क्या जानो

भाभी - मई जानती हों नदीम. हमारे खंडन में लड़कियां पीछे से नहीं करवाती हाँ. प्ल्ज़ तुम भी न करो.. मान जाओ न

नदीम - साडी दुन्या में हम पठान बदनाम हाँ.. सब hi ये जानते हाँ. पठान का बचा आएगी से काम और पीछे से ज़यादा करता है..

भाभी लावजब हो गई. ऐसी hi बातें वो भी बहुत सी सुन चुकी थी.

नदीम भाई ने भाभी को पकड़ और उल्टा लिटाने लगा.. भाभी डर्टी हुई बिदक कर दूर होकर बेथ गई. भाभी के चेहरे पर पसीने की बूँदें चमकने लगी थी

नदीम भाई को गुसा आने वाला था. वो भाभी का डरा हुआ चेहरा देख कर ठंडा हो गया..

नदीम भाई पाचकरते हुए - आ जाओ.. मान जाओ... ज़यादा दर्द नहीं दूंगा मैं..

भाभी - नदीम.. मुझे समझती हों मेरी स्किन दूसरी लड़कियों से अलग है.. अपनी कौसिन्स से और सहेलियों से सुना था. आगे से ज़यादा दर्द नहीं होता. लेकिन पहली रत मुझे ऐसा लगा. मेरी जान निकल जाएगी. आगे के रस्ते में और पीछे के रस्ते में बहुत फ़र्क़ है नदीम.. मई आगे से बर्दाश्त नहीं कर पाई थी.. पीछे से तो मई सच में मर जाउंगी नदीम.. प्ल्ज़ नदीम मेरी बात समझने की कोशिश करो. देखो मुझे कैसे पसीना आने लगा है. मेरा दिल सोच सोच के डूबने लगा है. अगर तुमने सच में कर लिए.. तो पक्का है मुझे हार्ट अटैक आ जाएगा

नदीम भाई ढीले पड़ते हुए - यार तुम इतनी बुज़दिल क्यों हो

भाभी बोल पड़ी - तुम्हारे कोई करता न.. तो मई देखती.. कितना दर्द होता है.. याद है एक बार तुमने बताये बिना hi घुसाने की कोशिश करि थी. दो दिन मई बेथ नहीं सकीय थी. दर्द से मेरी जान जाने वाली हो गई थी

भाभी की बात सुन नदीम भाई है पड़े.. हाहाहा.. पागल.. और क्या कहा तुमने. मेरे कोई करता..

फिर नदीम भाई मूड में आते हुए बोले - चल तू तरय कर. मई देखता हों. कितना दर्द होता है

भाभी पहले तो नासमझी से नदीम भाई को देखने लगी. पर जब बात उनकी समझ में ै तो वो मोह पर हाथ रख कर हसने लगी..

नदीम - है लो.. जितना हसना है. कल तक का टाइम है तुम्हारे पसस. फिर मई नींद की गोली खिला कर सोते में hi पीछे से दाल दूंगा..

भाभी दर गई - नहीं नहीं नदीम... प्ल्ज़ ऐसा कभी मत करना.. मई नींद में hi नहीं मरना चाहती...

नदीम भाई ने अपने माथे पर हाथ मारा..

नदीम - सरे मूड का कबाड़ा कर देती हो.. फिर भी मैंने जो कहा वो फाइनल है

नदीम भाई भाभी को खेंच कर सीधा लिटाने लगे. भाभी लेट गई.. नदीम भाभी की फुद्दी में लुंड घुसा कर भाभी को छोड़ने लगे..

दोनों जब चुदाई के बाद लेते.. तो भाभी बोली - नदीम मुझे कुछ दिन चाहिए सोचने के लिए

नदीम - नहीं.. मई तुम्हे कुछ दिन नहीं दे सकता.

भाभी - प्ल्ज़ नदीम. एक तो तुम अपनी मर्ज़ी कर रहे हो.. मेरी मर्ज़ी की कोई परवा नहीं है तुम्हे. इतना भी नहीं कर सकते. मुझे कुछ दिन भी नहीं दे सकते

नदीम भाई भाभी को देखते हुए - कितने दिन चाहिए तुम्हे

भाभी सोचने लगी.. कितने दिनों का कहे.. फिर सोचने लगी. जितने दिन भी दिमांग करेगी.. वो काम hi होंगे..

फिर कुछ सोचती हुई बोली - मुझे दो महीने का वक़्त चाहिए नदीम

नदीम भाई उठ बैठे - no...never.. मई इतना वक़्त तुम्हे नहीं दे सकता

भाभी मिन्नत करती हुई - प्ल्ज़ नदीम.. ये मेरे लिए ऐसा है.. मुझे बहुत दर लग रहा है.. इससे काम वक़्त में मई खुद को त्यार नहीं कर पाऊँगी

नदीम - ये सब तुम्हारे अंदर का डर है

भाभी - तभी तो ज़यादा वक़्त मांग रही हों

नदीम - डर को निकालो अपने अंदर से.. वर्ण मई जनता हों. एक hi बार में सारा घुसा देने से लड़की को कुछ नहीं होता

भाभी नदीम भाई को घूरती हुई बोली - तुम्हे कैसे पता. क्या मेरे शिव भी कोई है.. ज़रूर कोई है.. ज़रूर तुमने उस चुड़ैल के पीछे से घुसाया होगा. तभी इतना नॉलेज है तुम्हे

नदीम भाई अपना माथा पीटने लगे - ोू मैडम.. आज के ज़माने में क्या कुछ नहीं है. इंटरनेट भरा है. दोस्तों इतने हाँ.. जैसे तुम अपनी सहेलियों से बातें करती हों. अपने सीक्रेट उनको बताती हो.. ऐसे hi हम सब दोस्त भी एक दूसरे से बातें करते रहते हाँ

भाभी दिल पर हाथ रख कर बोली - क्या... क्या तुमने हमारा ये रिश्ता अपने दोस्तों को बताया है.. क्या ये बताया है. हम कैसे सब

नदीम - तुम इतनी स्टुपिड हो तो nahi..jaisi आअज बन रही हो.. अर्र्रे मई पागल हों क्या.. अरे दुन्या भर एक किस्से होते हाँ हमारे पास.. आज तुम ज़यादा थक गई हो.. सो जाओ.. और हाँ सुनो.. ज़यादा से ज़यादा एक हफ्ता है तुम्हारे पसस... आज से ठीक सातवें रात आगे से नहीं पूरी रात पीछे से होगा... उस रात मई भी खुद को डबल ताकतवर बना कर कमरे में आऊँगा

नदीम भाई स्माइल से भाभी को देखते हुए बोले

बस्स्स उसके बाद भाभी की नींद हराम हो गई. भाभी को नींद नहीं आई.. गांड फटने से होने वाला दर्द भाभी एडवांस में hi फील करके काँप रही थी. भाभी साइको नहीं थी.. असल में भाभी की एक दोस्त ने अपनी गांड फटने का हाल कुछ ऐसे दर्दनाक तरीके से बताया था. भाभी ने जैसे कसम खा ली थी.. कुछ भी हो जाए.. वो कभी गांड में लुंड नहीं लेगी.....

वही डर अभी तक भाभी का पीछा नहीं छोड़ रहा था. वर्ण भाभी की गांड की सील भैया पहले hi हफ्ता खोल चुके होते..

अगर ऐसा हो जाता तो आज मेरे और भाभी के बीच जिस्मानी ताल्लुक़ात भी शायद न बन पाए होते. भाभी की इसी गांड परेशानी ने hi मुझे भाभी के करीब कर दिया.. फिर क्या था.. मुझे तो बास मोके की तलाश थी.. अपनी hi खंडन में किसी की चुदाई करने की.. मैंने सोचा था. पहले किन्ज़ा एपीआई को छोडूंगा. लेकिन भाभी नंबर ले गई थी...

भाभी खंडन में मेरी पहली सेक्स पार्टनर बानी..... पहले जो गांड में लुंड लेने से डरा करती थी.. मेरे नदीम भैया से भी बड़े लुंड को मज़े मज़े से अपनी गांड में लेने लगी..

 




चौथी क़िस्त

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अगली सुबह के रंग निराले थे. हर चेहरा हमेशा से बढ़कर चमक रहा था. लेकिन सराह भाभी का चेहरा नहीं. नदीम भैया ने सराह भाभी को अल्टीमेटम दे दिया था.. सराह भाभी के पास ज़यादा से ज़यादा भी 7 दिन थे. और 7 दिन बहुत होते हाँ. लेकिन सराह भाभी को ऐसा लग रहा था. जैसे 7 दिन पालक झपकते hi गुज़र जाएंगे. और फिर सतें दिन की रात उनकी गांड का कड़बा हो जायेगा.. उस रात गांड के फटने से होने वाले दर्द की वजा वो बच नहीं पाएंगी. ऐसा डर उनके दिल में बेथ गया था..

भाभी दिल की कमज़ोर नहीं थी. लेकिन गांड का दर्द.. नदीम भाई ने जब दूसरी बार बहुत ज़यादा फाॅर्स किया था सराह भाभी को. सराह भाभी बाथरूम में घुस कर अपनी एक गुंली गांड में घुसा कर चेक करने लगी थी.. हिसाब लगा रही थी. ऊँगली सही से घुस पति है कह नहीं. लेकिन भाभी की ऊँगली भाभी की गांड में घुसी तो भाभी को दर्द और जलन का अहसास हुआ.

भाभी दिल में सिसकी - नदीम.. मेरी ऊँगली भी नहीं जा रही.. और तुम अपना वह घुसना चाहते हो. कैसे घुस पायेगा तुम्हारा इतना लम्बा और मोटा.. क्या करूँ.. कैसे समझों नदीम अपनी ऐसे इरादे से बाज़ आ जाए.. तब से सराह भाभी और भी ज़यादा डरने लगी थी. बार बार नदीम भाई को मन कर देती थी. नहीं गांड में नहीं फुद्दी में दाल कर छोड़ो.. मुझमे इतनी हिम्मत नहीं मैं गांड में ले सकूँ

भैया और भाभी ऐसे नहीं थे. वो खुले लफ़्ज़ों का इस्तेमाल नहीं किया करते थे. लेकिन मैंने बहुत कुछ बदल कर रख दिया था.

भाभी के चेहरे पर डर और परेशानी की छाप थी. जिसे देख अम्मी जान बोली

अम्मी जान - सारा बेटी नदीम से कोई झगड़ा हुआ है क्याआ

मई भी वही था. सर उठा कर चौंकता हुआ भाभी को देखने लगा.. भाभी जैसे होश में आ गई.. अपने चेहरे और आँखों में चमक, होंटो पर हलकी मुस्कान लाती हुई बोली

भाभी - नहीं अम्मी जान. ऐसी तो कोई बात नहीं है

अम्मी जान - फिर तुम्हारे चेहरे का रंग क्यों उतरा हुआ है

भाभी - नहीं तो.. मई ठीक हों अम्मी जान.

अम्मी जान ने ज़यादा फाॅर्स नहीं किया.. लेकिन मई भाभी का चेहरा घोर से देख रहा था. अम्मी जान ने चेहरा घुमा लिया.. अम्मी जान के चेहरे के घूमते hi भाभी का चेहरा फिरसे पहले जैसा हो गया. तभी भाभी ने सर उठा कर मुझे देखा. मई भाभी को घोर से देख रहा था. भाभी कंफ्यूज हुई. फिर अपने होंटो पर स्माइल लती हुई मुझे बहुएं उचका इशारे से बोली.... क्या बात है.. मुझे ऐसे क्यों घूर रही हो

मई उठता हुआ - चलें भाभी.. आज ज़रा पास के पार्क का एक चक्कर हो जाए

भाभी समझदार थी. समझ गई. मई उनसे उनकी परेशां पर बात करना चाहता हों

भाभी - नहीं.. तुम्हे कॉलेज जाना है न.. तुम कॉलेज जाने की तयारी करो

मई - कोई नहीं.. मई एक पीरियड मिस कर दूंगा..

भाभी - ावें इ.. पीरियड क्यों मिस करोगे तुम..

अम्मी जान हम दोनों को देखने लगी. भाभी अब रिलैक्स मूड में आ चुकी थी. वो मुझे बड़ों की तरह लताड़ने लगी..

मई - रोज़ hi सरे पीरियड अटेंड करता हों. एक दिन मिस कर दूंगा तो खास फर्क नहीं पड़ेगा..

भाभी - फर्क क्यों नहीं पड़ेगा.. चुप चाप कॉलेज जाने की तयारी करो... शाबाश. अचे बचे पढाई में ग़फ़लत नहीं bart'te...

मई मुस्कुराने लगा.. फिर इशारे से कहा.. मई भी कुत्ते की दम हों.. पीछा तो मई भी नहीं छोडूंगा.. भाभी फिरसे परेशां हो गई. मई हस्ता हुआ कमरे में गया और कॉलेज के लिए तयारी में लग गया...

कॉलेज का यहाँ खास कुछ लिखने लायक नहीं है. ज़रूरी हुआ तो लिखूंगा..

उस दिन भाभी ने मुझे मौका नहीं दिया बात करने का. वो किसी न बहाने मुझे गोली कराती रही.. और मई फुड़दियों के लिए पागल इंसस्टी समझ गया. कोई ऐसी बात है. जो भाभी मुझे नहीं बताना चाहती.. एक बार किन्ज़ा एपीआई ने भाभी को सोचों में गम देखा तो पॉऊच लिया. भाभी ने है कर किन्ज़ा एपीआई को "कुछ नहीं.. तुम्हे वहम हुआ है" ऐसा बोलै दिया

उसी शाम किन्ज़ा एपीआई मेरे कमरे में आई.. कॉलेज से आने के बाद हम ने बहुत बातें की थी. किन्ज़ा एपीआई कमरे का दूर नॉक करके आई थी..

मई - जी.. कहिये.. मुझसे कुछ काम है क्या आप को..

मई ऐसे बोलै.. जैसे मई दुन्या का सबसे बिजी पर्सन हों

किन्ज़ा एपीआई मुझे घूर कर देखती हुई मेरा कण पकड़ गई

मई - आठ एपीआई... मेरा कान.. उफ्फफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ आआआआईईईई मर गया

किन्ज़ा एपीआई को हसी आई.. लेकिन होंठ दबा कर पि गई - फिर बनवाती गुसा करती हुई बोली

किन्ज़ा - क्या मई बिना किसी काम के तुम्हारे कमरे में नहीं आ सकती.

मई किन्ज़ा एपीआई के गाल को देखता हुआ - हाँ आ सकती हाँ.. लेकिन वह क्या है न.. कल से मेरे होंठ कुछ बेचैन से हाँ

किन्ज़ा एपीआई ने मेरा कण जो पहले पकड़ कर हल्का सा खेंचा हुआ था.. मरोर दिए.. फिर मेरे कण के करीब मोह करती दन्त पीस कर बोली

किन्ज़ा - बाबू.... शर्म तो जैसे तुम बेच आये हो.. ऐसे अल्फ़ाज़ मोह से निकल कर मुझे ये अहसास मत कराओ.. तेरे साथ इतना खुल कर मैंने कोई गलती की है

मई भी धीरे से बोलै - क्याआ गलती नहीं हुई है

किन्ज़ा एपीआई ने मेरा कण फिरसे मरोर दिया - बड़ी बातें करना सीख गए हो तुम. बात को घुमा कर करना सीख गए हो. मत भूलो मैं भी तुम्हारी एपीआई हों

मई - मैंने कब कहा... अगर कण को उखाड़ना hi है.. तो उखाड़ डालिये.. ये थोड़ा थोड़ा करके मुझे दर्द न दें

किन्ज़ा - बड़ी परवा है तुझे तेरे दर्द की... और मेरी शर्म की कोई परवा नहीं है तुझे

मई राज़दारी से बोलै - एपीआई थोड़ी सी बेशरम बन जाइये..

किन्ज़ा एपीआई की ऑंखें पूरी खुल गई. फिर मुझे बीएड पर गिरती मेरे सीने पर हाथ रख मुझपर झुटकी मेरे सर के बाल पकड़ कर मुझे बीएड से उठा कर फिरसे बीएड पर पटख गई.

किन्ज़ा - ऐसे hi तुझे मई फर्श पर मारूंगा.. फिर तेरे सर की जगा कीमा बना दिखेगा...

मई - आज बाबू कहाँ गया एपीआई

किन्ज़ा - अभी तो मेरे सामने है. लेकिन तुम ऐसी hi बातें करते रहोगे न.. तो कहीं दिखाई नहीं देगा

मई - हाहाहा

किन्ज़ा एपीआई मोह बना कर नक़ल करती हुई - हेहेहे.. बड़े दन्त निकल रहे हाँ तेरे

मई दरवाज़े को देख होंटो पर ज़ुबान फेर किन्ज़ा एपीआई के गाल को देखने लगा

मई - एक बार.. सिर्फ एक बार.. कसम से एपीआई बड़ी तालाब हो रही है

किन्ज़ा - तू तो नशे बन गया है

मई किन्ज़ा एपीआई की आँखों में झूमती आँखों से देखता हुआ बोलै - नशे की किस्में होती है एपीआई.. क्या आप को कोई डाउट है.. आप के गलों में काम नशा है..

किन्ज़ा - मई क्यों ऐसी बेशर्मी वाली बात कहूं.. और ये तू इतना खुल कर क्यों बोल रहा है

मई - क्या ये बातें इललीगल हाँ

किन्ज़ा - और नहीं तो क्या

मई - कमल करती हाँ आप एपीआई जान

किन्ज़ा - जान मत कहो मुझे.. मुझे ऐसा लगता है. जैसे बूढी हों

मई - अरे वाह्ह्ह्ह.. जब आप का ओह्ह्ह आप को जान जणू कहता होगा.. आप हवाओं में उड़ने लगती होंगी. वो कहे वो ख़ुशी मिलती है आपको.. मई कहूं तो बूढी.... ये न इंसाफ़ी है. मेरे साथ इंसाफ किया जा----

मई थोड़ा लॉडली bola...kinza एपीआई ने झट से मेरा मोह बंद कर दिया.. फिर हस्ती हुई बोली

किन्ज़ा - बाबू तुम कितने काम वक़्त में कितने ज़यादा बदलते जा रहे हो

मई - क्या मई इतना ज़यादा बदला हुआ और ऐसा बदला हुआ पायरा नहीं लग रहा आप को.

किन्ज़ा एपीआई फ़िक्र जताती हुई बोली - बाबू कभी कभी दिल में डर सा बैठने लगता है. तुम जानते हो न.. हम लड़कियों की 6तह सेंस बड़ी तेज़ होती है

मई किन्ज़ा एपीआई की ऐसी बात सुनकर चौंक गया. कहीं मुझे लेके एपीआई के दिल में गहराई में डर तो नहीं बेथ गया... शायद ऐसा hi था

मई अपनी घबराहट पर काबू पता हुआ - कैसा डर ??

किन्ज़ा एपीआई - पता नहीं.. मई समझ नहीं प् रही हो.. लेकिन कुछ अजीब सा कहीं मेरे दिल में गहराई में है.. या मेरे दिमाग में सबसे निचले खाने के कहीं है. अभी मई समझ नहीं प् रही हों

मई - लेकिन मई समझ गया हों

किन्ज़ा एपीआई हैरत भरी नज़रों से मुझे देखने लगी - तुम कैसे समझ सकते हो.. मेरे दिल की गहराई में या मेरे दिल के तहखाने में क्या है.. जब मई नहीं जान पाई हों.. तुम कैसे जा सकते हो

अब मई और किन्ज़ा एपीआई सीधे हो बैठे थे..

कोई आता तो हम उसे नार्मल hi दीखते

मई - कमाल है एपीआई.. जिसे आप दिल में तलाश कर रही हाँ. दिमाग के तहखाने में ढूंढ रही हाँ.. वो तो आप के चेहरे पर दिखाई दे रहा है

किन्ज़ा एपीआई बेखयाली में अपने चेहरे पर हाथ फेरने लगी - क्या दिखाई दे रहा है मेरे चेहरे पर...

फिर बीएड से उठी और ड्रेसिंग टेबल के सामने जा कड़ी हुई.. और घोर से अपने चेहरे को आईने में देखने लगी.. मई भी बीएड से उठा और जा कर ड्रेसिंग टेबल पर जा बैठा. किन्ज़ा एपीआई खुद को आईने में देखती हुई मुझे देख कर बोली

किन्ज़ा - मुझे तो कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा बाबू अपने चेहरे में..

फिर चौंक कर मुझे देखती हुई बोली - ू समझ गई.. तुम खरमस्ति कर रहे हो न मेरे साथ... ऐसे hi हवा में तीर चला कर मुझसे जानना चाहते हो.. तुम समझते हो मैं तुमसे कुछ छुपा रही. ऐसा hi बात है न

मई एपीआई का हाथ थाम कर - मेरे भोली एपीआई जान.. जितनी आप हसीं हाँ

किन्ज़ा एपीआई के होंटो पर मुस्कान आ गई अपने लिए हसीं लफ्ज़ सुन कर

मई - कितनी बड़ी गलत फहफि है आप को.....

मई एकदम से पुराणी बात गोल करता हुआ किन्ज़ा एपीआई के साथ मस्ती पर उतर आया.. मई ड्रेसिंग टेबल पर से उतरा और दो कदम चलता हुआ किन्ज़ा एपीआई के पीछे हो गया.. एपीआई भी घूम कर मेरी तरफ देखने लगी.. वो सस्पेंस में आ गई थी.. गलत फहफि वाली बात सुन वो जानना चाहती थी.. किस बात पर मई ऐसा बोल रहा हों

मुझे खामोश देख कर वो बोली - किस बात पर गलत फहमी बाबू

मई नक् टेढ़ी करता हुआ - एहि कह आप हसीं हाँ..

किन्ज़ा एपीआई - kyaaaaaaaaaaaa ??

मई - हाँ.... एहि आप को गलत फहमी है आप हसीं हाँ.. अभी आईने में खुद को देख आप खुद को झूटी तलाशियाँ दे रही थी ना... अरे जाओ.. आप कहीं से हसीं दिखती हो भला.

इतना बोल मई भाग पड़ा.. किन्ज़ा एपीआई चीखती हुई मेरे पीछे भागी

किन्ज़ा - रुक फिरोज के बच्चे.. मई तुझे अभी बताती हों.. मई कितनी हसीं हों.. कितनी बाद सूरत हों

मई दरवाज़ा खोल बहार भाग पड़ा. मई आगे आगे और किन्ज़ा एपीआई मेरे पीछे पीछे.. ऐसे सन बचपन में बना करते थे.. बरसों बाद कोई सन बना था.. मई पूरा पूरा मज़ा लेने लगा

मई हस्ता हुआ भाग रहा था.. किन्ज़ा एपीआई चीखती हुई मेरे पीछे भागी आ रही थी.. सब अपने अपने कमरों से निकल पड़े.. सब हमें भागते देख हैरान रह गए

माहिरा - अरे क्या हुआ.. फिरोज तू क्यों भाग रहा है

मई - एपीआई मुझे बचाओ... एक चुड़ैल मुझे खाने के लिए आ रही है

माहिरा - kyaaaaaaaaaaa.. चुड़ैल.. हाहाहा.....

सब समझ गए.. हम बचपन की याद ताज़ा कर रहे हाँ.. सब हसने लगे.. भाभी मुझे दिखी.. मई उसके पास से भागता हुआ एक पल के लिए रुका

मई - किन्ज़ा एपीआई से कह दीजियेगा भाभी.... वो इतनी भी हसीं नहीं हैं.. आईने कभी कभी झूट भी बोल दिया करते हाँ

भाभी सब समझती हुई ज़ोर ज़ोर से हसने लगी

माहिरा दूर से hi - भाभी क्या बात करि फिरोज ने जो आप हसने लगी

भाभी भी उदासी और परेशानी भूल मज़े लेने पर उतर आई

भाभी - फिरोज को शक है किन्ज़ा की खूबसूरती पर. फिरोज का कहना है.. किन्ज़ा मेकअप के सहारे हसीं दिखाई देती है. असल में वो है नहीं

माहिरा पेट पकड़ कर हसने लगी.. मई भागता हुआ लॉन में आ पोहंचा.. किन्ज़ा एपीआई भी कहाँ पीछे रहने वाली थी.. वो भी वहीँ आ गई.. हम दोनों के पीछे बाकि सरे..

सरे के सरे इस भाग दौड़ से लुत्फ़ उठाने लगे.. लॉन में एक साइड झूला लगा हुआ था.. मई झूले के पार जा खड़ा हुआ

किन्ज़ा एपीआई हांप रही थी.. अपनी साँसों पर काबू पति वो दूसरी साइड रुक कर बोली

किन्ज़ा - बहुत लिहाज़ कर लिया मैंने तेरा बाबू.. आज तेरी खैर नहीं

मई - क्यों आप एपीआई से कॅशे बन गई हाँ.. क्या मुझे हलाल करने का सोचे बैठी हाँ

किन्ज़ा एपीआई दन्त कचकचाते हुए - हाँ.. और आज मई तेरा कच्चा गोश्त दांतो से नोच कर खा जाउंगी.. बड़ा परेशां करने लगा है तू.. मई हसीं नहीं हों.. हाँ.. एहि कहा न तूने.. मुझे गलत फहमी है कह मई हसीं हों....

माहिरा ने सीटी मार दी... अम्मी जान दादी जान के साथ साथ भाभी जान भी हसने लगी.. दादा जान दूर एक चेयर पर बेथ कर मज़े उठाने लगे

किन्ज़ा एपीआई घूम कर मेरी तरफ आने लगी. जितने कदम वो चलती.. उतने hi कदम मई दूसरी साइड घूम जाता.. फिर किन्ज़ा एपीआई रुक गई. मुझे घूरने लगी

तभी भाभी बोली - ठहरा

मई और किन्ज़ा एपीआई उसे देखने लगे

भाभी करीब आने लगी. अम्मी जान दादी जान और माहिरा भी करीब आने लगी

भाभी - मेरे पास एक सलूशन है

हम दोनों एक साथ - कैसा सलूशन

भाभी मस्ती भरी नज़रों से हम दोनों को देख सब को देखती हुई बोली

भाभी - अगर तो किन्ज़ा ने फिरोज तुम्हे पकड़ लिया. तो सबत हो जाएगा. किन्ज़ा हक़ीक़त में हसीं है.. अगर किन्ज़ा फिरोज को पकड़ने में नाकाम रह तो सबत हो जायेगा

किन्ज़ा - कह मई हसीं नहीं हों.. मई फलत फहमी का शिकार हों.. एहि कहना चाहती हाँ न आप

भाभी - अरे.. तुम तो काफी समझदार निकली.. ज़रूर तुम सबत hi कर दिखाओगी.. तुम हसीं भी हो

सब हसने लगे...

अम्मी जान भी खेल में शामिल होने लगी - बचपन में जो कह फिरोज बहुत फुर्तीला था. लेकिन किन्ज़ा भी काम नहीं थी

माहिरा - अम्मी जान वो बचपन था.. तब किन्ज़ा सारा दिन भगति रहती थी. अब तो काम चोर भी हो गई है.. और हद हराम भी..

किन्ज़ा एपीआई ने माहिरा को घूरा

दादी जान - कुछ शर्म कर. किन्ज़ा तुझसे बड़ी है

माहिरा तुर्की बा तुर्की बोली - खेल में कोई बड़ा छोटा नहीं होता दादी जान.. बचपन के दिन भूल गई क्या आप..

किन्ज़ा - आप सब पीछे हो जाइये.. आज फैसले का दिन है.. और मई सबत कर दिखाऊँगी.. मई हसीं hi नहीं हों.. मई बिजली भी हों

मई - बिजली नहीं.. बिल्ली

सब - हाहाहा

किन्ज़ा एपीआई ने मुझे ऐसे घूरा. जैसे सच मच खा जायेगी

फिर शुरू हुई हमारी भाग दौड़. मई भागता हुआ दादा जान के पास जा पोहंचा.. गेट पर खड़े नौकर हमें देख रहे थे. ये जद्दी पुष्टि नौकर थे.. इसलिए हमें कोई शर्म झिजक नहीं थी

किन्ज़ा एपीआई मेरे पीछे पीछे थे

दादा जान के करीब पोहंचा तो धीरे से बोलै - तुम हरो मुझे ाचा नहीं लगेगा.. लेकिन बहनो से हार कर उनकी मोहब्बत मिला करती है.. इसलिए तुम भी थोड़ी देर परेशां करना.. फिर हर जाना

मैंने सर हिला दिए... अगले 10 मिनट मैंने खूब किन्ज़ा एपीआई को भगाया.. बेचारी का जोड़ जोड़ हिल कर रह गया. फिर मई भाभी के करीब से गुज़रता हुआ बिलवाजा लड़खड़ा कर गिर पड़ा

भाभी - अरे अरे किन्ज़ा तुम्हारे करीब है..

मई घबरा कर उठने की कोशिश करने लगा.. बास तभी किन्ज़ा किसी माहिर खिलाडी की तरह उछाल कर मेरे ऊपर ा गई.. मई हैरान हुआ.. लेकिन यहाँ तो सच में किन्ज़ा एपीआई ने मैदान मार लिया था.. कमल की फुर्ती दिखाई थी किन्ज़ा आपि ने...

हम ग्रास पर थे.. किन्ज़ा एपीआई मुझे काबू किये मेरे बराबर बैठी थी... मई लेता था.. किन्ज़ा एपीआई का एक हाथ मेरे सीने पर था.. और उनकी सांस बहुत तेज़ चल रही थी.. वो अपनी साँसें दुरुस्त करती मेरे सीने पर हाथ का दबाओ बढ़ाये हुए थी...

भाभी - तो सबत हो गया. किन्ज़ा विनर hi नहीं हसीं भी है

किन्ज़ा एपीआई ने भाभी को घूरा

भाभी - ो सॉरी सॉरी.. मई अपने अल्फ़ाज़ सही ढंग से ऐडा नहीं कर सकीय.. किन्ज़ा हसीं hi नहीं दुन्या की सबसे हसीं तरीन लड़की है.. न किन्ज़ा से पहले दुन्या में कोई इसके जैसी हसीं लड़की पैदा हुई.. न hi कभी होगी...

किन्ज़ा एपीआई के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई.. माहिरा एपीआई मेरे करीब आ कर बोली

माहिरा - चल उठ बाबू.. मई भी हसीं नहीं है.. तू ऐसा बोल.. फिर मई तेरे पीछे भागुंगी.. तू जीता तो मई समझूंगी.. मई गलत फहमी का शिकार हों.. मई जीती तो मई भी दुन्या की सबसे हसीं लड़की बन जाउंगी...

अम्मी जान दादी जान दोनों हसने लगी..

मई - सॉरी तो से मैडम जी.. जब दुन्या में एक hi हसीं सूरत है.. तो क्यों उसके मुकाबले पर आना.. आप ऐसा करू.. अगले जनम का इंतज़ार कीजिये..

फिर मई किन्ज़ा एपीआई को देख कर बोलै - अब तो आप खुश हाँ न

किन्ज़ा एपीआई की साँसें अब कुछ बेहतर थी

किन्ज़ा - खुश के बच्चे.. ये जो तुम्हारी वजा से मेरा जोड़ जोड़ दुखें लगा है. इसका क्याआआआ

और इस बार दूर बैठे दादा जान भी सुनकर ज़ोर ज़ोर से हसने लगे.. पास खड़े कैसे काम हस्ते.. वो सब भी हसने लगे. फिर मई हँसा.. किन्ज़ा एपीआई ने एक नज़र मुझे घूर कर देखा. फिर ग्रास पर थोड़े फैसले पर लम्बी लेट कर मेरे सीने पर अपना सर रख कर ऑंखें बंद कर गई...

मई हैरान नहीं हुआ. एक तो सब मौजूद थे.. दूसरे उसने मेरे सीने पर सर रखा था. और ऐसा करना.. मतलब सच्चे प्यार की इन्तहा का साबुत था. अम्मी जान आँखों hi आँखों में मेरी और किन्ज़ा एपीआई की बालाएं लेने लगी..

माहिरा - ये किन्ज़ा आज कुछ ज़यादा hi नंबर नहीं बना रही

किन्ज़ा एपीआई ने ऑंखें खोल मोह से ज़ुबान निकल कर माहिरा एपीआई को देखा दी

भाभी अम्मी जान से बोली - अम्मी जान.. मुझे इस घर में आये महीनो हो गए.. इतना सारा प्यार पहले कहाँ था

अम्मी जान जज़्बाती होती हुई बोली - मैंने भी बरसों से तलाश कर रही थी बेटी.. मुझे भी आज hi देखने को मिला है

दादी - जब से हमारा फिरोज खुल कर सामने आया है न.. नए रूप में आया है न.. प्यार की शिद्दत फिरस देखने को मिल रही है... फिरोज बीटा.. तुम पहले क्यों नहीं बदल गए.. कल से जितना सुकून दिल में उतरा हुआ है. बरसों से उतरता रहता तो और भी ाचा होता

मेरे दिल में एक बात आई.. मई खुल तो रहा hi था. लेकिन धीरे धीरे. और मैंने पहल से hi सोच रखा था. हर मिलने वाले मोके पर भरपूर फायदा उठाऊंगा मैं

मई - दादी जान.. सच कहूं

दादी - सच के शिव भी कुछ है

मई - हाँ होता है न.. खुल कर बात न करने वळून के दिलों में डर और वस्वसे होते हाँ

अम्मी जान - ये भी बड़ी सलझी हुई बात कही बीटा तुमने

किन्ज़ा एपीआई ऐसे hi मेरे सीने पर सर रख कर लेती रही.. आज वो भी हिम्मत दिखा गई थी

मई - हम हमेशा चेयर्स पर बैठते हाँ.. कभी अंदर सोफों पर बैठते हाँ.. मेरा दिल कहता है. हम जैसे अब करीब हाँ. ऐसे hi यहाँ नीचे ज़मीन पर बैठेंगे तो हमारे दिलों को और भी सुकून मिलेगा

भाभी - मेरा भी दिल कर रहा था बैठते को. ाचा किया जो तुमने बोल दिए

किन्ज़ा एपीआई मेरे राइट साइड लेती थी.. भाभी लेफ्ट साइड आ कर मेरे करीब बेथ गई.. माहिरा भी भाभी के साथ आ बैठी.. अम्मी जान और दादी जान मेरे सर की तरफ आ बैठी..

अम्मी जान - सही कहा बीटा तुमने.. ऐसे एक साथ बैठने में ज़यादा सुकून है

दादा जान - फिरोज बीटा.. मई आ रहा हों. मेरे आने तक कुछ न बोलना..

दादा जान तेज़ी से चलते हुए करीब आ गए. उन्हें करीब आते देख हम सब उठने लगे..

दादा जान - नहीं सब बैठे रहो.. कोई खड़ा नहीं होगा

फिर दादा जान किन्ज़ा एपीआई के पेट के बराबर बेथ गए.. किन्ज़ा एपीआई का एक हाथ पकड़ कर दोनों मुठियों में भर सहलाने लगे

मई दूर था. फिरोज की बातें सुन नहीं पाया. लेकिन मेरा दिल कहता है. ज़रूर कुछ खास कहने वाला है फिरोज बीटा. कुछ ऐसा. जिसे मेरे इल्म में आना भी ज़रूरी है..

किन्ज़ा एपीआई और सब मुझे सवालिया नज़रों से देखने लगे.

दादा जान - फिरोज बीटा तुम कुछ कहो.. उससे पहले मई एक बात कहूं..

सब दादा जान को देखने लगा

दादा जान - जब से इस कोठी में आया हों न.. आज यहाँ सब के साथ लॉन में बैठते में जो मज़ा आ रहा है, जो सुकून मिल रहा है. वो आज तक नहीं आया...

सब चेहरे दादा जान की बात पर एग्री नज़र आये.

 
पांचवी क़िस्त

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दादा जान ये तो समझ गए थे. मई कुछ बात करने वाला हों. लेकिन दादा जान का ये कहना कहना कह वो बात सुन्नी उनके लिए भी ज़रूरी थी. ये गलत बात थी. मई खंडन की फ्रेमलेस के साथ थोड़ा सा खुलने का सोच बैठा था. ऐसे में दादा जान रंग में भांग डालने ा गए थे. दादा जान ने आ कर मुझे मोके पे चुका नहीं लगाने दिया था. बल्कि मई तो नॉक आउट हो गया था.

सब कुछ देखने लगे. और मई सोचने लगा. अब ऐसी कोनसी बात करूँ. जो नयी भी हो और अलग भी. आखिर दादा जान के तजुर्बे को भी नहीं झुटला सकते थे.

सोचने पर कुछ नहीं सूझा तो दादी जान बोली - फिरोज बीटा किन सोचों में गम हो गए थे. देखो तो हम सब तुम्हे सुनने को कितने बेताब हाँ

माहिरा - और देखो.. कल जो हम सब कुछ न कुछ तुझे सुनाया करते थे. आज कैसे चुप बैठे तुझे सुनने को बेताब हाँ

भाभी - और लात साब हाँ कह अपनी वैल्यू को समझते हुए कुछ ज़यादा hi शोखे हो गए हाँ

अम्मी जान - क्यों मेरे बेटे को लताड़ रही हो तुम दोनों.. मेरा बीटा समझदार है. सोच समझ कर hi बोलेगा

किन्ज़ा - हाँ कल से ये कुछ ज़यादा hi समझदार हो गया है. हमारा कोई प्रोफ भी इसके जितना ज़हीन नहीं होगा

माहिरा और भाभी हेहेहे करके हसने लगी. किन्ज़ा एपीआई भी है पड़ी

मई दादा जान को देखता हुआ बोलै - दादा जान कल से मई खुल कर बोल रहा हों. और आप सब को मेरा खुल कर बोलना पसंद आ रहा है

दादा जान - भई तुम्हारे मोह से अब तक जितनी भी बातें सुनी हाँ. वो साडी दिल को छू गई हाँ.. इसीलिए तुम्हारा बोलना बुरा नहीं लगा. बालकः बहुत ाचा लगा.

मई - दादा जान.. तो फिर मई थोड़ा सा और खुलके बोलता हों. आप ने यहाँ आ कर रंग में भांग दाल दी है

अम्मी जान - फिरोज तुम सोच समझ कर बोल रहे हो न

अम्मी जान को लगा मई गुस्ताखी पर उतर आया हों

दादा जान मुझे देखते हुए - गुलशन बेटी.. ज़रा अपने चंदे के टुकड़े के चेहरे के एक्सप्रेशन तो देखो.. देखो तो ये किस मूड में दिख रहा है

अम्मी जान ने मुझे देखा.. किन्ज़ा एपीआई जो लेती थी. उठ कर मेरा चेहरा ताकने लगी.

अम्मी जान - अरे ये फिरोज तो उसे मुस्कुरा रहा है जैसे

किन्ज़ा एपीआई मेरा कण मरोरती हुई - जैसे बचपन में मुस्कुराया करता था. ज़रूर ये शरारत के मूड में है.. क्यों ऐसी hi बात है न

मई - एपीआई आप मेरे सीने पर से सर न उठायें.. पता है आज कितना सुकून मेरे दिल में उतर गया है आप के सर मेरे सीने पर रखने से..

किन्ज़ा - एक बहन के लिए उसके भाई सीने hi इकलौती ऐसी जगा होती है. जहाँ वो खुद को सबसे महफूज़ समझती है. उसे ऐसा लगता है.. जैसे गरम हवा का कोई झोंका उसे छू भी नहीं सकता.

दादी जान - सदा खुश रहो मेरी बच्ची.. ऐसा hi है. एक भाई का सीना हमेशा बहन की हिफाज़त के लिए होता है. अपना सुख दुःख सर रख कर बाँटने के लिए होता है

भाभी नाटक करती हुई - हाय मई भी अपने भाई के पास जाउंगी

सब है पड़े

भाभी - और नहीं तो क्या... मई अपने भाई से इतनी दूर हों.. इस किन्ज़ा को देख मुझे इससे जेएलओसी फील होने लगी है

किन्ज़ा एपीआई ने फिरसे सर उठा कर भाभी को ज़ुबान दिखा दी

दादा जान - तुम्हारे इस शरारती मूड का मेरे आने से या रंग में भांग डालने का क्या मतलब बनता है

मई - वो बात ये है दादा जान. मई सोच रहा है. आप जैसे मर्दों के बीच रह कर मई मर्द बन जाऊं.. और

मई बरी बरी सबको देखने लगा.. किन्ज़ा एपीआई को सस्पेंस बर्दाश्त नहीं पाया..

किन्ज़ा - बाबू तुम बीच में न रुका करो.. एक तो मई बात करते हुए तुम्हारा चेहरा नहीं देख सकती.. कितनी बेचैनी होने लगती है मुझे तुम्हारी बात के अधूरा रह जाने पर..

भाभी - मई बताओं.. फिरोज की अधूरी बात मई पूरी करूँ

सब भाभी को देखने लगा

मई - okay... प्रेमिशन ग्रांटेड!

भाभी - फिरोज तुमने कहा. दादा जान जैसे मर्दों के बीच तुम मर्द बन कर रहा करोगे. उससे तुम्हारी बात का पूरा मलतब एक hi बनता है.. और तुम्हारी ये ऑंखें जो हाँ.. इनके अंदर जो चमक है, रंग हाँ.. अब मई कुछ कुछ समझने लगी हों

अम्मी जान हैरानी से बोली - कमल है.. फिरोज मेरा बीटा है.. मई नहीं समझ पाई इसकी बात को. इनकी आँखों की ज़ुबान को...

दादी जान - हम दोनों पीछे बैठी हाँ न.. फिरोज की आँखों में नहीं देख सकती. और फिर हम आज कल के बच्चों जितनी तेज़ दिमाग कहाँ हाँ भला.

भाभी - अब्सोल्युटिलती राइट दादी जान.. फिरोज की पूरी बात का मतलब है. फिरोज आज से मर्दों के बीच मर्दों की तरह रहेगा और हम औरतों के बीच औरतों की तरह

भाभी मेरी आँखों में अपनी बात के सही होने का जवाब देखने लगी.. मई मुस्कुरा पड़ा

भाभी ने याहूऊ का नैरा मारा.. और दादा जान माहिरा एपीआई खुल कर हसने लगी. किन्ज़ा एपीआई सर उठा कर मुझे हैरत से देखने लगी. और दादी जान अम्मी जान दोनों मोह पर रख कर न qabil-e-yakeen नज़रों से मुझे देखने लगी

दादा जान - हाहाहा.. मई तो समझ रहा था.. मेरा पोता शेर बनेगा.. लेकिन ये तो

दादी जान - हम औरतों के बीच रह कर हम जैसा बन जाएगा.

माहिरा - फिर तो मैं सही ब्यूटिशियन का कोर्स कर रही हों.. मई फिरोज का अच्छे से मेकअप करके फिरोज को अपनी तीसरी बहन बना दूंगी...

भाभी ने झट माहिया एपीआई का मोह चुम डाला...

भाभी - सच में ऐसा हो जाए.. तो कमल हो जाएगा.. ठहरो मई मोबाइल लेके अति हों. उसने एक अप्प इनस्टॉल करती हों. फिर फिरोज का चेहरा लड़कियों जैसा बना कर देखती हों. फिरोज कैसा दिखेगा...

अम्मी जान - नहीं नहीं.. मेरे फिरोज की ऐसी कोई फोटो मत बनाना...

दादी जान - मई भी मन कर रही हों.. ख़बरदार सराह बेटी जो ऐसा सोचा भी तो

दादा जान - हाहाहा...... क्याआ खूब रौनक लगाए हो फिरोज बीटा तुम भी.. कितना हसना पद रहा है कल से मुझे...

मई - मई मज़ाक नहीं कर रहा दादा जान. भाभी अगर चाहती हाँ. तो क्या परेशानी है.. मई अंदर घर वळून के सामने बेटी बन जाया करूँगा.. और बहार आप सब के सामने फिरोज खान सोन ऑफ़ हसहमत खान बिन रियासत खान बन जाया करूँगा.. यौन आप की नक् और मूंछ भी सलामत रहेगी और भाभी माहिरा एपीआई और किन्ज़ा एपीआई को अपनी एक राज़दार सहेली भी मिल जाएगी..

मई फिर दादा जान को आंख मारता हुआ बोलै - आंख मार कर मई दिल के भेद नहीं जान सकता हों दादा जान. फ़िरोज़ा एपीआई बनकर शायद ये सब मेरे सामने अपना दिल खोल कर रख दें..

दादा जान जैसे मेरी बात की तह तक पोहंच गए.. वो मुझे घूर कर देखने लगे. फिर कुछ सोचते हुए बोले..

दादा जान - तुम कल से मुझे हैरान पर हैरान कर रहे हो बीटा.. तुम्हारी मज़ाक में कही ये बात कितनी गहरी है. मई समझ सकता हों

अम्मी जान दादी जान और सब दादा जान की बात पर मुझे घूर कर देखने लगे. मैंने भाभी जान को देख कर आंख मार दी

माहिरा - आय बदमाश. ... ये तुम कुछ ज़यादा hi ऑंखें नहीं मारने लगे हो

मई दादा जान को देखता हुआ - क्यों दादा जान.. क्या जवानी में आप ने दादी के शिव किसी को आंख नहीं मरी थी

दादा जान घबरा कर उठ बैठे.

दादा जान - मई चलता हों...... तुम करो बातें

दादा जान सच में वहां से जाने लगे. सब दादा जान के जाने के बाद है पड़े

अम्मी जान और दादी जान ने मेरा एक एक कान पकड़ लिया

दादी जान - बदमाश.. कुछ ज़यादा hi नहीं तुम खुलते जा रहे हो

अम्मी जान - पता नहीं अब्बू जी को इसकी गुस्ताखी वाली बातें भी क्यों अच्छी लगने लगी हाँ

मई - आप को मेरे लफ्ज़ समझ में आते हाँ. लेकिन दादा जान मेरी बात का मतलब समझ जाते हाँ अम्मी जान

अम्मी जान - एक तो मई तुम्हारी तरह ज़हीन नहीं होती.. सीढ़ी बात करते नहीं हो.. घुमा कर बात करते हो... मेरे सर से गुज़र जाती है..

मई भाभी को देख - क्यों भाभी जी.. आप को समझ में आई मेरी कोई बात

भाभी उठती हुई - मई अंदर जा रही हों.. डिनर की तयारी करनी है. बहुत देर हो गयी

किन्ज़ा और अम्मी जान hi मेरे पास रह गई.. बाकि सरे उठ कर चले गए..

अम्मी जान - फिरोज बीटा... देखो मेरी एक बात को पल्ले से बांध लो.. तेज़ रफ्तारी अंधी गली होआ करती है मेरे बच्चे.. तुम्हारा कल से ये बदला रूप मुझे भ तो बहुत रहा है.. लेकिन अंजना सा डर भी लगने लगा है.. देखो रफ़्तार अच्छी चीज़ है.. लेकिन सबसे अच्छी चीज़ होती है.. पूरा पूरा कण्ट्रोल.. देखो तुम खुल रहे हो.. सब तुम्हारा साथ दे रहे हाँ.. लेकिन अक्सर ऐसा देखने सुनने को मिलता रहता है...

भलाई करने के चक्कर में ऐसी गलतियां सरज़द हो जाती हाँ.. जिनका मड़वा मुमकिन नहीं रहता..

मई अपना सर अम्मी जान की गॉड में रखता हुआ बोलै

मई - अम्मी जान.. सच कहूं तो मई खुद भी मंटा हों.. मेरी रफ़्तार कुछ ज़यादा hi तेज़ है... फिर मई अम्मी जान का हाथ थम कर चूमता हुआ बोलै

मई - आप सब की दुआएं मेरे साथ हाँ.. आप सब का प्यार मेरे साथ है.. लेकिन फिर भी आप सब मुझसे प्यार में और आगे बढ़ जाएँ. मेरे लिए दुआएं पहले से भी ज़यादा करें.. पता है अम्मी जान.. जब ीमहिहं होते हाँ तो हर स्टूडेंट की पढाई पर धयान की रफ़्तार बढ़ जाया करती है... यहाँ भी अगर रफ़्तार की बात करि जाए तो फिर यहाँ भी रफ़्तार एक अंधी गली बन जाती है... लेकिन उस स्टूडेंट की पढाई से मोहब्बत और उसके अपणु की दुआएं उसके ींहितान में रूप करवाती हैं.. बास आप सब एहि समझ लीजिये. मई भी इम्तिहान की तैयारी कर रहा हों. और मुझे आप सब के प्यार की दुआओं की पहले से ज़यादा ज़रूरत है

अम्मी जान इस बार मेरा हाथ पकड़ कर अपने होंटो से लगा कर चुम गई

अम्मी जान - एक माँ की दुआएं हर लम्हा उसके बच्चों की भलाई और सुख के लिए होती हैं. मेरी साडी दुआएं भी तुम्हारे लिए मेरे सभी बच्चों के लिए हाँ..

किन्ज़ा एपीआई ने मेरे पेट पर चुटकी काट दी

मई - ोीीी

अम्मी जान - हाहाहा

किन्ज़ा - अम्मी जान... ये बड़ी बड़ी बातें करना पता नहीं कहाँ से सीख गया है

अम्मी जान - मेरे सरे बचे से एक दूसरे से बढ़कर हाँ. तुम भी कोनसी काम ज़हीन हो. माहिरा क्या काम है

किन्ज़ा - मई ज़हीन हों तो फिर इसके जैसी मुझे क्यों नहीं करनी आई.. ये तो एक hi दिन में जाने कहाँ से सीख कर ा गया है

मई क्या कहता.. मुझे ये साडी बातें मेरा लुंड सीखा रहा था. मैं मुठ नहीं लगता था. लुंड के अंदर माल स्टॉक कर रहा था.. उसी वजा से मेरा दिमाग तेज़ चलने लगा था. आखिर कुछ भी था.. खंडन की हर फुद्दी में घुसना तो मेरे लुंड ने hi था... मेरा तो ऐसे hi नाम होने वाला था. सरे मज़े मेरे लुंड के होने वाले थे..

मई - आप सोचती कहाँ हो.. आप तो सोचने के लिए फुर्सत hi नहीं मिलती होगी..

किन्ज़ा एपीआई मेरी बात का मतलब समझती हुई फिरसे मेरे पेट पर चुटकी काट गई... कुछ देर और बातें होती रही.. फिर हम वहां से उठ कर अंदर जाने लगे....
 




छाती क़िस्त

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मैंने घर की फिलम्स के साथ अपनी हिसाब से खुलना चाहता था. डैड जान ने आ कर मुझे मौका छीन लिया था. लेकिन खैर.. मोके तो बार बार मिलते रहने थे. मैंने फैसला किया मई माहौल खुद से बनाऊंगा. फुद्दी मारने के लिए मुझे खुद बढ़िया से फीलिंग सेट करनी होगी. घर की फ्रेमलेस के साथ ऐसे घुलना मिलता होगा. उनके साथ कुछ इस हिसाब से खुलना होगा. फिर जज मैं उनके साथ दूसरे हिसाब से आगे बढूं तो छह कर भी मुझे रोक न पाएं..

मेरे प्यार में इतनी आगे बढ़ जाएँ. मुझे संभायें. बाबू ये सही नहीं है. ये न कहें.. बहु तुम गलत कर रहे हो. गुनाह कर रहे हो. नहीं हम कुछ नहीं करना चाहती.. मुझे सब से ऐसा प्यार करना होगा, इतनी शिद्दत के साथ प्यार करना होगा. सब मेरा प्यार पाने के लिए मेरे साथ आगे और आगे निकल जाने की आरज़ू प् बैठें.. मेरे लिए मचलने लगें.

मई सब से बातें भी कर रहा था. घर के माहौल को समझता हुआ प्लान भी बना रहा था और सबसे बातें भी कर रहा था. कोई सोच भी नहीं सकता था. मेरे दिल में सबके लिए कैसे खयालयत और जज़्बात जनम ले चुके हाँ. जब किसी को अंदाज़ा हो. तब तक मई और वो सब बहुत आगे निकल चुके हों. होश में होकर भी होश में रहना भूल चुके हों. तब मुझे मेरे मकसद में कामयाबी मिलती.

एक बात और थी. पहले सिर्फ मेरे दिमाग में सबके जिस्मो को पाने की छह ज़यादा थी. लेकिन अब तब मैंने खुल कर बोलना शुरू किया था. अपने दिल में सबके लिए प्यार और ज़िम्मेदारी, रेस्पेक्ट का इज़हार करना शुरू किया था. तब से मेरे अंदर बहुत ज़यादा चेंज मई महसूस करने लगा था. मेरी ज़ुबान क्या खुली मेरे अंदर से एक नया फिरोज बहार निकल कर सामने आने लगा. और मुझे ये नया फिरोज बहुत पसंद आ रहा था. ऐसे फिरोज के सामने आने से जहाँ मुझे मेरे मकसद में कामयाबी के चान्सेस ज़यादा नज़र आ रहे थे. वहीँ मुझे एक तरह की ख़ुशी और सुकून का भी अहसास हो रहा है. मेरा खंडन की फुड़दियों में घुसने का अंदाज़ बदलने लगा. सब को फ्यूचर में कैसे ट्रीट करना है. अलग तरह से मेरे अंदर प्लान बनने लगे.

डिनर के बाद फिरसे सब बेथ कर बातें करते रहे. फिर अपने अपने कमरे में जाने लगे. कल से मई किन्ज़ा एपीआई या माहिरा एपीआई घर आने के बाद से ज़यादा पढाई पर धयान नहीं दे प् रहे थे. माहौल कुछ ऐसा बदला था. हम एक दूसरे के करीब करीब रहने लगे थे.

हमारी कोठी व्विप कोठी या बहुत hi शानदार कोठी नहीं है. आप उसे अच्छी कोठी कह सकते हाँ.14 मार्ले के एरिया पर गिरी कोठी इलाके में बानी चाँद खास गिनी चुनी कोठियों में से एक थी. हम वहां पिछले 15 साल से रहे थे. दादा जान की वजा से हमारी हमारे इलाके में खूब रेस्पेक्ट थी.

डिनर के बाद सब अपने अपने कमरों में गए तो मई भी अपने कमरे में चला गया. बीएड पर लेट कर मई कुछ देर सोचता रहा.. प्लान बनता रहा. अम्मी जान ने कहा था. मई बहुत तेज़ रफ्तारी से आगे बढ़ रहा है. अम्मी जान की बात भी सही थी. अब भला मई स्पीड से कैसे न आगे बढ़ता. जिस स्पीड के साथ मई आगे बढ़ रहा था. इसी स्पीड को सोचता हों तो भी इतना समझ में आता था. आसानी से मुझे घर में किसी की भी फुद्दी नहीं मिलेगी. अभी से स्पीड पकडूँगा तो कुछ महीनो में किसी एक को त्यार कर पाऊँगा..

एहि सोच मैंने अपनी स्पीड काम न करने का फैसला लिया. फिरसे सोचने लगा. अब किस साइड रुख करूँ. फिर कुछ सोच कर मई बीएड से उतर कमरे से निकल गया.

हमारी कोठी 2 मंज़िला थी. ग्राउंड फ्लोर पर 5 कमरे थे. दादा दादी अम्मी जान और डैड ग्राउंड फ्लूट पर रहते थे.. मई किन्ज़ा एपीआई माहिरा एपीआई और भैया भाभी हम सब ऊपर रहते थे. नीचे 2 कमरे एक्स्ट्रा बने हुए थे. जो खास महमानो के लिए बनाये गए थे. ऊपर भी दो कमरे खली थे. हमारा खंडन बहुत बड़ा था. अक्सर मेहमान ा जाया करते थे. और हम महमानो का खुले दिल के साथ वेलकम किया करते थे. लेकिन शहरी ज़िन्दगी गुजरने का अलग ढंग हुआ करता है. इसलिए मेहमान hi हमें बे वक़्त तंग नहीं किया करते थे. नीचे एक स्टडी रूम भी था. कभी किसी का मैं होता तो वो स्टडी रूम में बानी छोटी सी लाइब्रेरी से कोई न कोई बुक उठा कर वहीँ बेथ जाया करता था.

मई अपने कमरे से निकल कर गौरण्ड फ्लोर पर ा गया. अम्मी जान और डैड के कमरे के सामने खड़े होकर मैंने तो अंदर से सुन गन ली. कहीं दोनों हमारे सो जाने का फायदा उठा कर चुदाई तो नहीं करने लग पड़े. लेकिन मुझे ऐसा कुछ अहसास नहीं हुआ.. तब मैंने दूर नॉक कर दिया..

शायद अम्मी जान और डैड दोनों बातें कर रहे थे. जग रहे थे. फ़ौरन hi डैड की आवाज़ सुनाई दी

डैड - कोण है ?

मई - मई हों डैड! बाबू

ज़रूर अंदर अम्मी जान और डैड हैरान रह गए थे मुझे इस वक़्त दूर पर जा कर.. बिना ज़रूरी काम के या इमरजेंसी के हम नीचे आ कर उन्हें डिक्टरब नहीं किया करते थे.

दूर खुल गया. डैड मुझे हैरत से देखने लगा.. मई मुस्कुराता हुआ अंदर घुसने लगा

डैड - अरे अरे... भाई तुम्हारा कमरा नहीं है ये.. अपने कमरे में जाओ.

मई धीरे से है पड़ा - जनता हों डैड.. लेकिन क्याआआआआ घर का हर कमरा मेरा कमरा नहीं है. जब आप सब के दिलों में मई रह सकता हों.. तो फिर हर कमरे में घुस कर कमरे वाले से लिपट कर सो भी सकता हों

डैड पीछे मुद अम्मी जान को देखते हुए बोले - गुलशन! या तो ये सच में हमारा फिरोज नहीं है. किसी ने हमारे फिरोज का चेहरा अपना लिया है. या फिर ज़रूर इसके अंदर... वो क्या कहते हाँ इंडियन फिल्मो में.... हैं कोई परायी आत्मा इसके अंदर घुस गई है

मुझे कमरे में आता देख अम्मी जान बीएड पर बेथ गई थी. डैड की बात सुन कर अम्मी जान के होंटो पर मीठी मुस्कान उभर ै

मई अम्मी जान के पास जा बैठा था.. अम्मी जान ने मेरे चेहरे को चुम मेरा माथा चुम लिया

अम्मी जान - आप कुछ भी कहें.. कुछ भी समझें. मुझे तो मेरा ये वाला फिरोज बहुत भा रहा है

मैंने स्माइल कर दी.. डैड भी बीएड पर बैठते हुए - वो सब तो ठीक है.. ये इस वक़्त हमारे कमरे में

डैड हैरान थे

मई दोनों को देख बीएड पर चढ़ा और बीएड के बीच जा लेता

दोनों और ज़यादा हैरान हुए.. मुझे वहां लेट ते देख एक दूसरे को हैरानी से देखने लगे

मई - ऐसे क्या देख रहे हाँ आप... मई बरसों से अकेला सो सो कर बोर हो गया हों.. मेरे कमरे में मुझे प्रीविकी तो मिल जाती है. लेकिन जो सुकून आप दोनों के साथ लिपट कर सोने में मिला करता था. वो मुझसे छूट गया है. आज खुद को रोक नहीं पाया. फिरसे दिल में तमन्नाह जाएगी. एक बार फिरसे वो वक़्त क्यों नहीं लौट सकता. जब मई आप दोनों के बीच सोया करता था.. आ जाइये... अम्मी जान आप मेरी राइट और डैड आप लेफ्ट साइड.. बहुत साल आप दोनों मुझे कमरे से भगा कर सो लिए.. आज मई फिरसे आप दोनों के बीच आ गया हों.. मैं हुआ तो रोज़ सोया करूँगा.. न हुआ तो मेरा कमरा तो फर है hi

डैड - हाहाहा

अम्मी जान का चेहरा शर्म से कुछ दाल हुआ. बीटा जवान हो गया था.. आधी रात को अपने माँ बाप के कमरे में घुस कर साथ सोने की बात कर रहा था.

डैड - गुलशन अभी फिरोज के आने से पहले हम क्या बातें कर रहे थे.. एहि न.. फिरोज में अजब तब्दीली आ रही है.. लेकिन ये नहीं सोचा था.. तब्दीली इस हद तक आएगी

अम्मी जान - फिरोज बीटा. तुममे आज हमारे साथ सोने की क्यों सोची

मई - क्या बैठे बैठे बातें करेंगे आप दोनों.... आइये लेट जाइये.. या मई ये समझूँ... आप को मुझसे शर्म आ रही है

डैड - अरे इसमें शर्म की क्या बात है

अम्मी जान कश्मकश में रही

मई - अम्मी जान कश्मकश में.. लगता है मुझे जाना चाहिए..

अम्मी जान जल्दी से - नहीं.. नहीं.. वो तो मई कुछ और सोच रही थी बीटा.. तुमसे क्यों मई जाने के लिए कहूँगी.

मई - तो फिर आइये लेट जाइये.. आप हर दूसरे तीसरे दिन कहती रहती हाँ. बच्चे जितने भी बड़े हो जाएँ.. एक माँ के लिए वो ऐसे hi होते हाँ.. जैसे अभी भी उसकी गॉड के बच्चे हाँ. अम्मी जान.. मई गॉड का बचा रहूं के न रहूं.. लेकिन खुद को हर वक़्त आपकी गॉड में आप की आग़ोश में पाना चाहता हों.

डैड ने देर नहीं करि और मेरे लेफ्ट साइड ा कर लेट गए. डैड मुझे स्माइल से देख रहे थे. वर्ण होना तो ये चाहिए था. मैंने डैड की एक रात रंगीन संगीन बना डाली थी..

अम्मी जान की शर्म भी जायज़ थी. उम्र की इस स्टेज पर, जब सरे बच्चे जवान हो गए थे. एक बेटे की शादी हो गई थी. एक बहु घर आ गई थी. फिर भी अलग कमरे में अपने शोहर से लिपट कर सोती हाँ.. ऐसी बात हर दूसरे घर में आम है. लेकिन जब बीटा कमरे में घुस जाता है. तब माँ को कुछ ज़यादा hi ऐसे ख्याल आने लगते हाँ.

फिर अम्मी जान भी मेरे राइट साइड आ कर लेट गई..

मई - no झिझक.. चलिए आप दोनों मेरे दोनों गाल बरी बरी से गीले करिये.. मुझे बचपन की पुराणी साडी रातें याद करनी है.. मुझे बचपन का वो सारा प्यार फिरसे पाना है. फिरसे मुझे उतना hi सुकून महसूस करना है.. समझ लें ये मेरे डीजल का काम करेगा...

डैड - हाहाहा.. गुलशन देख रही हो.. ये फिरोज अब हमें परेशां करने पर उतर आया है... इसे क्या पता.. हम इस की हरकतों पर तंग नहीं आएंगे.. हमारा तो प्यार बढ़ेगा

अम्मी जान का चेहरा जो कह शर्म से रंग बदल चूका था. लेकिन यहाँ और झिझकती या शर्म करती तो गलत होता..

अम्मी जान ने मेरे गाल पर किश कर दी - एक माँ का दिल तो हर पल अपने बच्चों से प्यार करने को मचलता रहता है. एक माँ को क्यों परेशानी होगी भला. उसका कोई भी बच्चा जब भी उसके पास आये. उसे कोई परेशानी कैसे हो सकती है. हमारा फिरोज तो फिर भी स्पेशल है

डैड - सही कहा गुलशन तुमने

डैड नहीं जानते थे. उनका जो माल था. अब उसके बेटे की नज़र उनके माल पर आ अटकी थी. अम्मी जान नहीं जानती थी. उनका फिरोज जहाँ से निकला है. वहीँ जाने की सोचे बैठा है. नहीं जानती थी. उनके जीगढ़ कर टुकड़ा एक माँ के जिस्म के जिस हिस्से को कभी देख नहीं सकता. फिरोज एक था. लेकिन माँ के जिस्म के उन हिस्सों को देखना hi नहीं चाहता था. उन हिस्सों में बने सुराखों के अंदर घुसता हुआ अंदर तक समां जाना चाहता है... इसी मकसद के चलते वो करीब से करीब तर होने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहता. बड़ा चालक हो गया है उनका बीटा

लेकिन बरसों बाद अम्मी जान और डैड के बीच लेट कर मई प्रेजेंट में नहीं रह सका. माँ ठंडी छान होती है. डैड और अम्मी जान के बीच आ कर लेटने से, इतने करीब से दोनों के लम्स को पाने से मुझे सच में बचपन की एक एक रात यद् आने लगी. मई प्यार वो शिद्दत जिससे अनजान बन गया था. वो शिद्दत मई एक बार फिरसे महसूस करने लगा.. मेरे दिल से सरे उलटे सीधे ख्याल निकल कर मेरे दिल को धोते चले गए..

दिल का धुलने से इकठा होने वाला पानी मेरी आँखों के रस्ते गर्म पानी बनकर मेरी आँखों से बहता हुआ मेरे कानो में इकठा होने लगा. अम्मी जान और डैड दोनों मुझसे बचपन की ढेर साडी बातें किये जा रहे थे. और मई हाल से माज़ी में ट्रेवल करता आंसू बहाने लगा...

दोनों भी शायद बचपन की यादों में जा खोये थे. फिर अम्मी जान की आवाज़ सुनाई दी

अम्मी जान - फिरोज बीटा.. तुम रो क्यों रहे हो

डैड भी मुझे देखते हुए - ेंण.. अरे फिरोज बीटा.. तुम्हारी आँखों में आंसू..

मई भीगी ऑंखें खोल कर दोनों को बरी बरी देख दोनों के हाथ पकड़ कर अपने सीने पर रखता हुआ बोलै -- ये वो पानी है अम्मी जान.... डैड.. जो बरसों से आँखों के पीछे जमा पड़ा था. आप दोनों के प्यार की शिद्दत प् कर सारा जमा हुआ पानी पिघल कर आँखों के रस्ते बहार निकल पड़ा.. ाचा है.. निकल जाए.. निकल जायेगा तो ऑंखें भी साफ़ हो जाएगी.. एहि पानी दिल को भी धो डालेगा. और दिल में जो सुकून इतने बरसों नहीं उतर सका था. वो भी गहराई तक उतरता चला जाएगा.. ये सुकून पाने के लिए तो मई चल कर यहाँ आया हों. एक बीटा इस सुकून से दूर होकर दुन्या के सार्ड ो गरम में गम होकर रह जाता है. मिलने वाली ज़िम्मेदारियों के जंजाल में फँस कर रह जाता है.. मई कुछ भी करूँ. ज़िन्दगी में कुछ भी बन जाऊं.. बास मुझे आप दोनों का ऐसा प्यार हमेशा पाना है. मई बचा नहीं रहा. जवान हो गया है.. मुझे ऐसा कुछ नहीं सुन्ना है अम्मी जान.. डैड.. मुझे दुन्या से अलग जीना है. जब आप दोनों का प्यार मेरे लिए है.. तो क्यों उम्र के फर्क को सोचते हुए हम वह प्यार समेत कर रखें.. नहीं मई ऐसा नहीं होने दूंगा.. बचपन में जब भी मौका मिला करता था. आप दोनों मुझे खुद से अलग नहीं करते थे. आज फिरसे मई आप दोनों के बीच हों.. आप भी भूल जाइये.. मई जवान हों.. बस एहि सोचिये.. आप हाँ तो मई हों.. पापा आप का खून मेरी रगों में दौड़ रहा और अम्मी जान आप का दूध पापा के खून के साथ साथ मेरी पूरी बॉडी में ट्रेवल कर रहा है. हम बड़े हुए हाँ तो क्या हुआ... हम जो आपके बच्चे हाँ आप के hi जिस्म के अलग हुए हिस्से हाँ.. इस उम्र में आप को अगर झिझक आती है.. तो अजीब लगेगा... अपने hi अंग से झिझकना गलत है अम्मी जान... डैड मई बास एहि शो करवाने आया हों... मई न पहले कभी आप दोनों से अलग था.. न hi कभी होने वाला हों..

मेरी आँखों से आंसू थे कह थमने का नाम hi नहीं ले रहे थे.. फिर अम्मी जान तड़प कर सिसकती हुई मेरे सर को थाम अपने सीने में छुपा गयी.. अम्मी जान रो रही थी.. अम्मी जान के भी आंसू निकल पड़े थे. मई डैड को देख नहीं सकता था. लेकिन अंदाज़ा था उनकी भी ऑंखें नाम हो गई होंगी.. वो पत्थर के तो नहीं थे.... इंसान था. और प्यार तो पत्थर को भी रेज़ा रेज़ा होने पर मजबूर कर देने की सलाहियत रखता है...

मई फील्डिंग सेट करा रहा था.. लेकिन कुदरती तौर पर फील्डिंग आटोमेटिक कुछ ज़यादा hi फैंटास्टिक तरीके से सेट होती जा रही थी.. मई सच्चा बनकर सबके सामने खुल कर आना था. और मेरे जज़्बात मेरे इरादों से भी बढ़कर शिद्दत के साथ अपनी सच्ची का इज़हार कर रहे थे. मेरे दिल में कुछ भी था.. लेकिन प्यार सभी के लिए मेरे दिल में सच्चा था.. इन्तहा गहराई तक था..

देर तक अम्मी जान मेरे सर को अपने गर्म नरम मुम्मों के साथ लगाए सिसकती रही..

 
कहानी को स्लो दिखाना ज़रूरी है.. कहानी में फुल फॅमिली ड्रामा दिखाना इस लिए ज़रूरी है. हर फॅमिली एक सी नहीं होती.. हर फॅमिली में कहानी एक सी नहीं होती. हर घर की फुड़ियाँ आसानी से नहीं मिला करती.. इतना सब दिखने का एक hi मतलब है भाई.. फिरोज को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. बहुत दिमाग इस्तेमाल करना पड़ेगा..



कहानी अभी शुरू हुई है.. इसलिए डिटेलिंग लिखी जा रही है.. जल्द hi इसे स्पीड मिलेगी..

बुर कुल मिला कर कहानी में दूसरी कहानियों की तरह सेक्स काम... रोमांस फॅमिली ड्रामा ट्रेजेडी जबज़ट ज़यादा होंगे. एक रियल फॅमिली में लोग कैसे रहते हाँ. ये दिखाना चाहता हों..



सेक्स के साथ सच्चा प्यार और सच्चे जज़्बात इस कहानी की खास बात होंगे
 
सातवीं क़िस्त

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पहले दो साल तक मेरे मोह में रहने वाले अम्मी जान के निप्पल अब फिरसे मेरे मोह में आने वाले थे. लेकिन कब.. मैं नहीं जनता था. लेकिन मई इरादों का पक्का था. जो थान लेता था. वो करके रहता था. और अम्मी जान की चुदाई को सोचते हुए एक बार भी मेरे दिल में नहीं आया कह मई अम्मी जान को छोड़ नहीं पाऊँगा.

इरादे फौलादी हों तो कभी नाकामी का मोह नहीं देखना पड़ता. हाँ मंज़िल ज़रूर दूर दिखाई देती है. लेकिन सहलाल हुसूल नहीं होती. मैंने इन दो दिनों में जो खुलना शुरू किया तो कमल होने लगा था. मेरे अंदर से एक नया फिरोज निकल कर आया था. और ये नया फिरोज मुझे भी बहुत पसंद आ रहा था. पहले मई अपनी हवस के चलते छोड़ने की फ़िराक़ में था. लेकिन जब मैंने खुल कर प्यार देना शुरू किया तो मेरे अंदर से जैसी हवस मुझे मिटटी दिखाई दी.

किन्ज़ा एपीआई का जो नंगा बदन मैंने बाथरूम में नहाते वक़्त कैप्चर किया था. अब उसे देख मेरे अंदर उबाल नहीं आता था. मई एक दूसरी नज़र से किन्ज़ा एपीआई के नंगे बदन को सोचने लगा था.

मेरा घर जो कह दूसरे लोगो की तरह ज़यादा परहेज़ी ज़िन्दगी जीने वाला नहीं था. लेकिन शर्म हाय का दमन सब hi थामे जी रही थी. बाद में ये कन्फर्म भी हो गया था. एक माहिरा एपीआई की सोच कुछ मोडरें टाइप की थी. कई बार उसके दिल में आया था. अपनी फुद्दी की आग किसी के नीचे लेट कर बुझा ले. लेकिन हाय वाली थी. ऐसी सोचें अपने अंदर से झटक दिए करती थी. माहिरा एपीआई की एक सहेली थी. उसका नाम और डिटेल बाद में लिखूंगा. माहिरा एपीआई के अपनी उस सहेली के साथ लेस्बियन रिलेशन थे. और भी हमारी hi तरह अछि फॅमिली से बिलोंग करती थी. जवानी के तक़ाज़े उसे भी हद फलांगने पर उकसाते रहते थे. लेकिन उसने कभी किसी ऐसे लड़के से दोस्ती नहीं करेगी. जिस के साथ वो बुराई के रस्ते पर चल निकले. वो अपनी शर्म अपनी शादी तक बचा कर रखना चाहती थी. ऐसे hi अपने शोहर को अपनी खालिस जवानी सौंपना चाहती थी..

लेकिन बेचारी की जवानी मेरे नाम हुई. उसकी फुद्दी और गांड की दोनों सील्स माहिरा एपीआई को छोड़ लेने के बाद मैंने पहली. वो माहिरा एपीआई की तरह मेरी फैन हो गई. और मैं..

तब तक दुन्या बनाने वाले ने मुझे मोहब्बत के देवता के जैसा बना दिए था. कुछ ऐसा कह मेरी बहने और साडी साडी सेक्स पार्टनर्स अपने अपने लाइफ पार्टनर की हो जाने के बाद भी मेरे साथ जिस्मानी ताल्लुक़ात ख़तम नहीं करना चाहती थी. क्यूंकि प्यार असल में होता क्या है.. वह मैंने बताया भी था और दिखाया भी था..

मई सब को छोड़ कर शायद हवसी बन जाता. लेकिन उस रात अम्मी जान और डैड के साथ लिपट सोने से मुझे ऐसा सुकून मिला. ज़यादा देर तक बातें न कर सका. ऐसा सुकून मेरी राग राग में उतरने लगा. मई नशे में होता हुआ अम्मी जान से लिपट का नींद की वादियों में जा पोहंचा.. वही डैड मुझसे लिपट कर सो गए थे.

उस रात बचपन को मैंने अम्मी जान और डैड ने पूरी तरह से महसूस किया था. पुराने वक़्त की साडी यादें और खुशबुएँ उस रात अम्मी जान के कमरे में बिखरने के बाद हमारे वजूद में उतर गई थी.. उस रात के बाद मैंने अपने अंदर वाज़ेह तब्दीली महसूस की. मेरी सोचों में इस्तेहकाम पैदा हो गया था. पहले से ज़यादा मज़बूती आ गई थी. मेरे इरादे तो पहले की तरह hi थे. लेकिन अब मेरे अंदर से जल्दबाज़ी और हवस इ जिस्म जैसे मिट कर रह गई थी.

हाँ पर नए प्यार के नए रंग को जान कर मई नयी तरंग में आ गया था. के नए और अनोखे जज़्बे के साथ मैंने अपनी खंडन की फुड़दियों में घुसने का इरादा बना लिया था. और इस बार मेरे इरादों में पुखति पहले से भी बढ़ गयी थी. और मुझे मेरे इरादों को मंज़िल तक पोहचने के लिए लाहे अमल भी मिल गया था..

प्यार.. बेइंतेहा प्यार. नशा सच्चे प्यार का नशा.. भरोसा.. इतना भरोसा... मेरे शिव कोई किसी और पर न कर सके.. मई कहूं दिन.. सब कहें दिन.. मई कहूं रत.. सब कहें रात..

अगली सुबह मेर आंख खुली तो मैंने पाया अम्मी जान और जान दोनों का एक एक हाथ मेरे सीने पर था.

तभी अम्मी जान की आवाज़ मेरे कानो में पड़ी - बाबू तुम उठ गए. मैं राइट साइड रखा.. अम्मी जान का चेहरा मेरे चेहरे के बहुत करीब था. अम्मी जान की ऑंखें मेरी आँखों के सामने थी. और अम्मी जान मुझे चमकती हुई आँखों के साथ देख रही थी. मेरे होंटो पर मुस्कराहट उतर आई

अम्मी जान ने मेरे गाल को चुम लिया.

मई - अम्मी जान आप क्या साडी रात जगती रही हाँ

अम्मी जान ने एक बार फिरसे मेरे गाल को गीला किया और बोली - नहीं बाबू.. रत तुम्हारे सोते hi मई और तेरे डैड दो चार बातें करते hi गहरी नींद जा सोये.. हमें बहुत मीठी नींद आई बाबू..

मैंने भी अम्मी जान का मोह चुम लिया... लेकिन मेरे होंठ अम्मी जान के गाल के नीचे होंठ के करीब जा चिपके... मैंने खुद को नार्मल hi रखा.. कंफ्यूज होता तो बात और रुख अख्तियार कर लेती

मई - मुझे भी बहुत मीठी नींद आई अम्मी जान.. इतनी मीठी कह बचपन में भी कभी नहीं आई..

अम्मी जान ने अपने होंटो के करीब मेरे होंठ प् कर ज़यादा महसूस नहीं किया था. मैं में मेल न हो तो कुछ भी बुरा नहीं.. बाद में क्या होगा जब रियल में मेरे होंठ अम्मी जान के होंटो पर होंगे.. बाद की बाद में सोचते हाँ..

अम्मी जान - तोह फिर अब तुम उठोगे या फिरसे सोने का इरादा है

मई - दिल तो नहीं भरा.. लेकिन सुबह हो चुकी है. इसलिए उठना पड़ेगा.. रातें तो अब आती hi रहेंगी.. क्यों अम्मी जान.. अब मई कभी भी आ सकता हों न आप के कमरे में. और ऐसे hi सो सकता हों न

डैड भी हमारी बातें सुन उठ गए... अपनी ऑंखें मसलते हुए बोले - इतनी मीठी और मज़े की नींद कोण मिस करने चाहेगा यार.. और तुम्हे इजाज़त लेने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई.. तुम कभी भी हमारे पास आ सकते हो

मई थोड़ा सा नॉटी होता हुआ बोलै - लेकिन एक कपल के कमरे में बार बार आना अच्छा नहीं होता.

डैड है पड़े.. अम्मी जान शर्मा गई.. बास इतना hi बोली - बेशरम..

डैड और भी जोरसे है पड़े.

ये मेरी अम्मी जान और डैड के साथ पहली ऐसी दोस्ताना बात थी.. वर्ण मई पहले इतनी हिम्मत खुद में नहीं पता था.. परवरिश और अहतराम मानेह रहा उम्र भर.. खंडन में बेटे ऐसी बातें करते भी नहीं थे.. लेकिन मई अलग बन रहा था. और बन के रहने वाला था.

मई - डैड आप की मरस तो शर्मा गई

अम्मी जान की शर्मा से भीगी आवाज़ सुनाई दी - फिरोज.. मत करो ऐसी बातें.. ये अछि बात नहीं है.

मई - क्यों डैड.. क्या लफ़्ज़ों के मुनासिब इस्तेमाल के साथ प्यार का ऐसा रंग गलत है

डैड - खैर से मुझे तो बुरा नहीं लगेगा.. तुम्हारी अम्मी जान का मई कुछ कह नहीं सकता. कुछ कर नहीं सकता. आबू जी का ज़माना और था. हमारी जवानी का ज़माना और था. तुम्हारा ज़माना और है. मई सारा दिन घर से बहार रहता हों. कई तरह के लोगो से मिलता हों. और समझता हों ऐसी बातें आज कल हर घर में आम. लेकिन तुम्हारी अम्मी जान ज़रा और ख़यालात की मालिक हाँ बीटा. तुम खुल रहे हो तो खुद hi संभल भी लेना..

गुज़रा कल हम सब नज़र नियाज़ के लिए डीडे किया था. लेकिन डैड के बिजी होने की वजा से जा नहीं पाए थे.. सो आज के दिन का प्लान बना. फुफु को भी सब बता दिए गया था.. अगली सुबह वो आने वाले थे.

मई अम्मी जान के कमरे से निकल कर अपने कमरे में गया. फ़्रेशः होने लगा

******************

फुफु सुल्ताना उनकी दोनों बेटियां हिना खान और सजल अली हमारे घर पर थे.. ज़ुबैर अंकल और बिलाल खान नहीं आ पाए थे.

सब ब्रेकफास्ट के बाद ड्राइंग रूम में बैठे हुए और फुफु इस प्रोग्राम की वजा जान रही थी. हिना और सजल अम्मी जान भाभी जान और सब से सुनती मुझे हैरानी से देख रही थी. और मई उन दोनों को और फुफु को मुस्कुरा कर देख रहा था.

जब सब डिटेल सबने सुन ली.. फुफु जान उठ कर कड़ी हो.. और अपनी बाहें पहला कर बोली

फुफु - मई पहले से जानती थी. मेरा बाबू एक दिन ज़रूर कुछ बड़ा करके दिखायेगा. मेरे प्यार और मेरी परवरिश ने इसी खूब चमकाया है.

माहिरा - फुफु आप फ्री में अपने नंबर क्यों बढ़ा रही हाँ

हिना - क्यों जी.. ये बाबू पहले कहाँ इतना तेज़ था.. ये सब मम्मी की वजा से है. वर्ण कहाँ इस टेढ़ी नक् वाले का दिमाग इतना ाचा चल सकता था.

सजल मुझे टुकर टुकर देख रही थी... वह मेर बातें सुन ज़यादा हैरान थी. मई फुफु के गले जा लगा. उसकी नज़रें मुझपर hi चिपकी हुई थी. मैंने ज़ुबान निकल कर दिखा दी. वो उछाल पड़ी और मुझे घूर कर देखने लगी. सजल ऐसी hi थी. उसे छेड़ने का अलग hi मज़ा मिलता था

फुफु वाहिद थी खंडन में. जो मुझे कसके गले से लगाया करती थी. सब के सामने खुल कर प्यार किया करती थी

फुफु मुझे अपने सीने से लगाए मेरे दोनों गालों को चूमने लगी

मई मुस्कुरा कर देखने लगा

फुफु फिर से मेरे मेरे दोनों गलों पर मोहरे मोहब्बत लगाती हुई बोली

फुफु - अब्बू जी की परछाई दिखती थी मुझे तेरे अंदर बाबू. इसलिए तो मई तुमसे इतना प्यार करती हों. मेरा दिल कहता था एक दिन मेरा बाबू अब्बू जी के जैसे बड़ा नाम कमायेगा.

साजन बैठी खूंखार बिल्ली जे जैसे मुझे घूर रही थी.. वो तुनक कर बोली

सजल - मम्मी जी ये गीदर से मेरे भैया का मुकाबला न करें आप.. ये उल्लू कहाँ और मेरे बिलाल भैया कहाँ..

हिना फिरसे बोल पड़ी - उफ्फ्फ्फ़.. मई भी गाढ़ी हों.. हर बहन को अपने भाई को पहले और इस फिरोज जैसे ऐरे गैर को बाद में सोचना चाहिए.. नहीं मम्मी जी.. आप को फिरोज की मैं घडत बातें सुना कर ावें hi गुमराह कर रही हाँ सब.. बिलाल फिरोज से कहीं बढ़कर है

सजल ख़ुशी से उठ कर हिना के गले में बाहें दाल कर उसके गालों को चुम गयी

सजल - हाय एपीआई आप ने कितना सच कहा.

सजल फिर मुझे घूरती हुई बोली - अगर इस शोखे को खुद पर इतना hi गुमान है तो मेरे भैया से कुश्ती करके दिखाए..

सजल अपनी बात के पूरा होने के बाद सब को दाद तालाब नज़रों से देखने लगी. हिना ने उसकी तरफदारी की

मई मुस्कुरा पड़ा

दादी जान - हमारे बाबू के आगे बिलाल क्या बेचता है

सजल - नैनो आप का ये बाबू ढोल का पोल है. बातों से hi नहीं कोई बड़ा बना करता.. आप अपने बाबू और मेरे भैया का जोड़ करवा दें. दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा..

सेहत में बिलाल खान मुझसे बढ़कर था. उसके बारे सुना था.. वो लड़ भी ाचा लेता है. उसकी 2 4 बार लड़ाई भी हो चुकी थी. लेकिन गलती कभी उसकी नहीं हुआ करती थी. उकसाये जाने पर, गलत बात बर्दाश्त न कर पाने पर वो लड़ जाया करता था. इसीलिए ये हिंसा और सजल ऐसा बोल रही थी

अम्मी जान - तुम दो अपने भाई की साइड हो. लेकिन तुम्हारी मम्मी हमारी साइड है. तुम्हारी मम्मी और हम सब मिला कर डबल से भी डबल हो जाते हाँ मेरी गुड़िया रानी.. और जिस खिलाडी के हिमायती ज़यादा हों. मैदान में जीत उसी की हुआ करती है

सजल अम्मी जान की बात सुनकर फुफु को घूरने लगी.. फुफु अभी तक मेरे गले में बाहें डाले हुए थी..

मई - फुफु आज सबत कर hi दें.. आप इन बतख से भी ज़यादा मुझसे प्यार करती हाँ

सजल "बतख" कहे जाने पर उछाल कर दोनों बाज़ो कमर पर रखती हुई फुंकार कर बोली

सजल - ोये अफ्रीका के मेंढक ये बतख किसको कहा तुमने..

मई - तुम्हे.. और किसे कहूंगी... अपने सर को देखो. किसी और का सर तुम्हारे जैसा है क्याआआ..

सजल एक हाथ अपने सर पर रख गई.. सब उसे ऐसा करते देख ज़ोर ज़ोर से हसने लगे.. और सजल फूलन देवी बनती हुई मेरे करीब आई और मेरे सर के बाल पकड़ कर मुझे फुफु से खेंच लिया.. आँखों में बच्चों वाला गुसा लाती हुई मुझसे बोली..

सजल - मेरा बालों का स्टाइल मुझे बहुत पायरा है समझे तुम.. आइंदा मेरे बालों के स्टाइल को देख कोई उलटी सीढ़ी मिसाल दी न तो

मई - तो क्या कर लोगी तुम बतख कहीं की

सजल ने मुझे घूंसा मार दिए - कहा न मुझे बतख मत कहो

किन्ज़ा - हाहाहा.. तुमने खुद को कह दिए.. चलो बाबू अब तुम इसे बतख न कहना

सजल तेज़ी से घूमी और किन्ज़ा एपीआई को उसी घूरती आँखों से देखने लगी. फिर एक ऊँगली किन्ज़ा एपीआई की ऑर्डर उठा कर वारं करती हुई बोली

सजल - मुझसे पन्गा नहीं लेना एपीआई.. वर्ण

किन्ज़ा एपीआई भी सजल के जैसे मूड में आ गयी - वर्ण... क्या कर लेगी तू.. ित्तु सी होकर मुझे धमकी देती है..

दादा जान डैड और नदीम भैया चुप चाप नज़ारा करते है रहे थे

सजल - वर्ण.. मई वह करुँगी.. जो आप खवाब में भी नहीं सोच सकती..

किन्ज़ा एपीआई भी मैदान के सिपाही की तरह कमर पर हाथ रखती हुई बोली

किन्ज़ा - ओहो..... बतख ने उड़ना भी सीख लिया

सजल - हाँ.. ये बतख उड़ती हुई आपके सर पर ऐसा ताज सजा सकती ह. जिसे पहन आप उम्र भर के लिए कैद हो जाएँगी

माहिरा सजल से बोली - अब बोल भी चुका.. कितनी देर से ड्रामा किये जा रही हो

सजल अब अलग hi मूड में आती हुई बोली - किन्ज़ा एपीआई ने मुझसे पन्गा लिया न. तो मई इसे उम्र भर के लिए अपनी घुलम बना लुंगी.. मई एपीआई की शादी बिलाल भाई से करवा दूंगी..

किन्ज़ा एपीआई - kyaaaaaaaaaaaaa ??

सब ज़ोर ज़ोर से हसने लगे..

सजल अपनी कह कर भागी.. और किन्ज़ा एपीआई उसके पीछे पीछे.. सजल ड्राइंग रूम से निकली और घर में थोड़ी देर घूमती हुई वापिस से ड्राइंग रूम में आती हुई मेरे पीछे हो गई.

सजल हंप्टी हुई बोली - बाबू... मुझे एपीआई चुड़ैल से बचाओ

माहिरा - इसका कोई भी पता नहीं चलता. जिसकी वजा से झगड़ा किया इसने.. उसी से हेल्प मांग रही है..

सब फिरसे हसने लगे...

किन्ज़ा एपीआई - बस्स्स.. एहि तुम हार गई..

सजल - मई हारी नहीं समझी आप... ये बाबू बड़ा कमीना है.. लेकिन मुझे भी बहुत प्यार है इससे

किन्ज़ा एपीआई नॉटी मूड में अति हुई - तो फिर ऐसा क्यों न करें.. मई बिलाल से शादी कर लेती हों.. और तुम बाबू से कर लेना

सजल का मोह देखने वाला था. एक रंग आने लगा.. एक रंग जाने लगा... उसकी शादी की उम्र नहीं थी.. शादी की बात पर वो ऐसी घबराई.. उसकी आँखों में आंसू आ गए.. वह फुफु के गले लग कर बोली

सजल - मम्मी.. मुझे अभी शादी नहीं करनी.. प्ल्ज़ एपीआई से कह दें.. ऐसा मज़ाक बंद करें..

सजल का रोना ऐसी बात थी. साडी मस्ती हवा हो जाया करती थी. जितना सब मुझसे प्यार करते थे.. उतना hi सजल से भी किया जाता था..

फुफु उसे पाचकरति हुई किन्ज़ा एपीआई को घूर कर बोली - रुला दिए न मेरी बेटी को. अब तो मई तुम्हारे शादी बिलाल से करुँगी.. और सजल की शादी उसकी मर्ज़ी.. वो कहेगी तो तुम्हे घुलम भी बना दूंगी..

फिर सजल से बोली - अब खुश

सजल जल्द hi संभालती हुई - नहीं.. मुम्ममय मुझे एपीआई को घुलम नहीं बनाना.. एपीआई बहुत अछि हाँ..

ऐसी hi मस्ती भरी बातों के बाद हम्म सब निकल पड़े.. वो दिन काफी बिजी रहा.. भाभी से बात करने का वक़्त नहीं मिल पाया.. नदीम भाई भी घर पर थे. इसलिए भी भाभी हाथ नहीं आ सकीय..

अगले दिन मौसम बड़ा सुहाना था.. सुबह से hi बादलों ने आसमान को ढांप रखा था. लग रहा था बारिश होगी.. साड़ियां ख़तम हो चुकी थी.. मौसम न सार्ड था न hi गरम.. ऐसे में अगर बारिश हो जाती. तो नहाने का मज़ा आ जाता.

मई कॉलेज से जल्दी लौट आया.. लंच करने के बाद थोड़ी देर की रेस्ट के बाद मई भाभी को तलाश करने लगा. पर भाभी मुझे घर में कहीं नहीं दिखी. अपने कमरे में भी नहीं थी.. मई ढूंढ़ता हुआ लॉन में जा पोहंचा.. वहां देखा तो भाभी झोले पर नीम दराज़ थी..

मई भी भाभी को अकेला hi पाना चाहता था. ाचा हुआ भाभी मुझे लॉन में मिल गई थी. धुप नहीं थी. हलकी तेज़ हवा चल रही थी. भाभी मस्त हवा के मज़े लेती ऑंखें बंद किये लेती थी. भाभी के चेहरे पर मुझे पहले से बढ़कर परेशानी दिखी..

मई - घर में कोई तो ऐसा होना चाहिए.. जिससे अपनी परेशानी शेयर करनी चाहिए..


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भाभी झट से ऑंखें खोल उठ बैठी.. फिर ज़बरदस्ती अपने होंटो पर स्माइल लाती हुई बोली

भाभी - क्या तुम चेहरा शनास हो ?


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मई भाभी के करीब बैठता हुआ बोलै - नहीं.. लेकिन अपणु के लिए दिल में प्यार हो, धरे सारा दर्द हो.. तो चेहरे पढ़ने ा जाते हाँ

भाभी अब खुद को नार्मल कर चुकी थी. मुस्कुरा कर बोली - बातें करना तो तुम अचे से सीख गए हो फिरोज. लेकिन अभी तुम्हारी उम्र नहीं है चेहरे पढ़ने की.. इस के लिए तुम्हे एक उम्र डरकर है..

मई भाभी का हाथ थमता हुआ बोलै - नहीं भाभी जी.. आप मुझे ताल नहीं सकती

भाभी - मई क्यों तालोंगी tumhe..mujhe ज़रूरत hi क्या है. सच में मुझे कोई परेशानी नहीं है फिरोज

मई - मेरी आँखों में देख कर बात कीजिये

भाभी - हेहेहे.. तुम मेरे मजनू थोड़ी न हो. जो आँखों में देखने के लिए कह रहे हो

मई - तो बना लो न मुझे मजनू.. इससे एक फायदा होगा.. आप दिल का दर्द अपने दिलदार को बाँट सकेंगी

भाभी सीरियस होती हुई बोली - छोडो इस टॉपिक को. हमारे बीच ऐसी बातें मुनासिब नहीं.. हमारा जो रिश्ता है. हमें उसका पास करना चाहिए...

भाभी ऊपर आसमान को देखती हुई बोली - आज बादलों ने आसमान को पूरा hi कवर कर रखा है.

मई भाभी के चेहरे को देखता हुआ बोलै - हाँ ग़म के बादलों ने हमारे घर के एक चाँद को पूरी तरह से कवर कर रखा है

भाभी मुझे घूरती हुई बोली - देखो फिरोज.. तुम जैसा समझ रहे हो. ऐसा कुछ नहीं है. हाँ तुम ऐसी hi बात बार बार करते रहोगे तो ज़रूर मई अपसेट हो जाऊँगी.

मई - आप अपसेट हाँ भाभी.. मुझे बताइये.. ऐसी क्या परेशानी है.. जिसने आप की जान हलकान कर राखी है. आप को चैन नहीं है भाभी.. आप इतने सुहाने मौसम में भी पुरसुकून नहीं है. कुछ तो ऐसी बात है.. जिसने आप को परेशान कर रखा है. मुझे अपना मान कर, अपना भाई अपना दोस्त मान कर बताइये.. मई बड़ा बनना नहीं चाहिए हों भाभी. चाहता हों तो बास इतना कह मेरे अपणु के चेहरे पर कभी ग़म की परछाई भी न आये

भाभी के होंटो पर मुस्कराहट आ गयी..

भाभी - फिरोज तुमसे इन तीन दिनों में मैंने जितना करीब महसूस किया है. इतना पहले कभी नहीं किया था.. तुमने कहा तुम अपणु के लिए कुछ भी कर जाओगे. सच कहती हों तुम्हारी आँखों में मोहब्बत की गहरी छात झलकती है.. मेरे लिए इज़्ज़त और फ़िक्र मुझे ढेरों ख़ुशी देने लगी है.. लेकिन मई जो कह रही हों वो भी सच है.. मुझे कोई परेशानी नहीं है..

मई - नहीं.. कोई तो परेशानी है आप को

भाभी - देखो फिरोज मुझे अब तुम तंग कर रहे हो. बच्चों की तरह ज़िद पर क्यों उतर आये हो..

मई - मई ज़िद छोड़ देता हों. आप को कोई भी परेशानी नहीं है अगर तो मुझे आप के चेहरे पर खुशियों की चमक दिखाई क्यों नहीं दे रही

भाभी हैरान होकर बोली - क्या मेरे चेहरे पर तुम्हे ख़ुशी और चमक दिखाई नहीं दे रही

मई - नहीं....

भाभी हस्ती हुई - फिर तो तुम्हे दिखाई दे गई भी... भला वहम का भी कोई इलाज होता है....

मैंने भाभी के साथ बहुत सर फोड़ा.. लेकिन भाभी ने मेरी एक नहीं सुनी.. अपनी hi बात पर अदि रही... लेकिन मई भी ज़िद्दी था.. हारना तो जैसे मैंने सीखा hi नहीं था.. कोई नहीं... अभी नहीं तो कभी hi सही...

4 बजे के करीब बारिश होने लगी... हम उस वक़्त कोठी के अंदर थे.. किन्ज़ा एपीआई और माहिरा एपीआई दोनों भाग कर छत पर जाने लगी.

माहिरा चीखी - भाभी चलिए.. देखो इस मौसम की पहली बारिश है. पता नहीं कितनी देर तक रहेगी.. इसलिए जल्दी जल्दी आइये और पहली बारिश के मज़े लीजिये.

मई वहां पहले नहीं था. लेकिन अपने कमरे का दरवाज़ा मई खोल चूका था

भाभी - नहीं तुम जाओ.. पहली बारिश में नहाना मुझे बीमार कर देता है. जब मौसम पूरी तरह से गरम हो जायेगा तब मई नहाउंगी..

मैंने भाभी का चेहरा देखा.. वही उतरा हुआ रंग....

माहिरा एपीआई ने एक बार और कहा.. भाभी इंकार करती अपने कमरे में जाने लगी.. माहिरा के साथ किन्ज़ा एपीआई मिल गई थी. दोनों ऊपर जाने लगी.. मई थोड़ी देर बाद अपने कमरे से निकला और भाभी के कमरे की तरफ बढ़ गया..
 
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