Mere Khandan Ki Anmol Phuddiyan - Page 5 - SexBaba
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Mere Khandan Ki Anmol Phuddiyan

इकत्तीसवीं क़िस्त

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पूरी लाइफ का ढंग hi बदल कर रह गया था. घर का खुशगवार माहौल सोगवारी में बदल गया था. हमारा प्यार अब भी अनमोल था. पर सिवाए दर्द के अब कुछ और रंग नहीं देखने को मिल रहे थे जीवन में.

किन्ज़ा एपीआई, माहिरा एपीआई, सराह भाभी, नदीम भैया, दादा दादी सब के सब गहरे ग़म में डूबे जी रहे थे. एक मेरे दम से, मेरे अनमोल प्यार के चलते घर में रौनक थी. अम्मी जान के प्रेग्नेंट होने और पापा को यकीन की हद तक शक पद जाने से मई पापा से नज़रें चुराने पर मजबूर हो गया था. अंदाज़ा hi नहीं था, ज़िन्दगी में कभी कोई ऐसा टर्न भी आ सकता है.

दादा जान मुझसे मिले -- बाबू. तुम्हारे होते हुए इस घर में इतना सोग. इतना सन्नाटा. इतनी ख़ामोशी. यार बाबू, ऐसे तो मैं वक़्त से hi पहले hi मौत की आग़ोश में जा सोऊंगा

और मैं दादा जान की बात सुनकर तड़प उठा था. दादा जान से देर तक बातें हुई और मेरे अंदर का असली फिरोज जो बाबू बन चूका था, अंगड़ाई लेकर बेदार होने लगा. सच में मैं बहुत कुछ कर सकता था. बास पे डरपे बदलते हालातों ने मुझे चक्र कर रख दिए था.

दादा जान को तसली देने के बाद मई घर से निकल गया. मैं रवि किनारे चला गया. वहां एक जगा बेथ मैं सोचने लगा. कैसे सब फिरसे पहले जैसा कर डालूं. आसान नहीं था. पापा की जलती नज़रों का सामना कर पाना आसान नहीं था. एक बीटा होकर अपने बाप की प्रॉपर्टी पर हाथ डाला था मैंने. अम्मी जान के साथ बिना कुछ किये hi उन्हें प्रेग्नेंट कर डाला था. अंदाज़ा होता तो मई अपनी मणि अम्मी जान की फुद्दी में उंडेलता hi नहीं.

ऐसी कोई सोच, कोई डर तो अम्मी जान के दिल को भी नहीं था. होता तो वह मुझे रोक देती, या फिर फ़ौरन hi उठ कर मेरी मणि अपनी फुद्दी से निकल देती. या फिर कोई प्रेगनेंसी रोकने वाली टेबलेट खा ली लेती. कुछ भी और कर जाती. लेकिन ये सब होना था. सो हो गया था. अब जब सब हो गया था. तो ऐसे तो बात नहीं बनने वाली थी. ऐसे तो ज़िन्दगी नहीं गुजरने वाली थी. अभी तो अम्मी जान मेरे साथ रिलेशन पर दिल में दर्द लिए जी रही थी. फिर किन्ज़ा एपीआई, माहिरा एपीआई सराह भाभी सब की सब दिल पर रोग लेती हुई जीने पर मजबूर हो जाती

और मेरा हस्ता मुस्कुराता, गुलिस्तां के जैसे महकता हुआ घर कब्रिस्तान बन जाता. नहीं....... मई ये नहीं होने दे सकता था. ये सब जो भी हो रहा था. या हो गया था. गलत था भी तो मुझे कुछ तो ऐसा करना होगा. जिससे सब सेट हो जाए. खोई खुशियां वापिस लौट आएं

मैं देर तक रवि किनारे बैठा फ्रेश एयर खता रहा. गुज़रते पानी के ज़बरदस्त रेल को देखता रहा. बहुत कुछ मंद में आ रहा था. बहुत कुछ हटके इस बार करना पड़ने वाला था मुझे. कुछ ऐसा, जिसे सोच कर hi कोई भी कैंप उठता

पर मुझे अपने अनमोल प्यार से साड़ी खोई खुशियां वापिस लौटानी थी.

मई घर वापिस लौट रहा था. नदीम भाई की कॉल आई.

नदीम -- यार बाबू.. तुम तो ऐसे न थे.. तुम सब को सँभालने की बजाये सबके साथ मिल ग़मगीन लाइफ जीने लगे. कुछ करो बाबू..... अब घर आते हुए मुझे खौफ आने लगा है यार. घर का माहौल पहले जैसा बना दूँ. अब ऐसे माहौल में मैं और नहीं जी सकता यार.. ये अहसान कर दालु मुझपर. सब पर..

और मेरे अंदर एनर्जी लेवल बढ़ने लगा. जैसे शेर खुद को एक्टिव करने के लिए अपने बदन को झंझोड़ता है. मई भी अंदर से खुद को झंझोड़ता हुआ पुराने बाबू को ज़िंदा करने लगा. इस बार के बाबू के इरादे hi और थे.

मई घर लौट आया. पापा फैक्ट्री गए हुए थे. अम्मी जान लॉन में झूले पर लेती आँखों पर बाज़ू धरे हुए थी. उनका फेस ग़म के गहरे रंग में लोथड़ा दूर से hi मैंने जान लिए था

मई अम्मी जान के पास जा पोहंचा

अम्मी जान मेरा आया जान नहीं पायी. नाना के चले जाने से भी बड़ा ग़म पापा की नज़रों में गिरना था. गिरा हुआ तो मैं भी खुद को समझने लगा था. लेकिन अब नहीं. अब मैं सब कुछ बदल देने के लिए खुद को तैयार कर चूका था.

मई अम्मी जान के पास ग्रास पर hi बेथ गया.. अम्मी जान का हाथ थमा और अम्मी जान जो गहरी सोचों में थी. हड़बड़ाती हुई ऑंखें खोल गई. उफ्फ्फ अम्मी जान की आँखों में करब ो अज़िय्यत के गहरे रंग थे. मुझे देख कर भी अम्मी जान के चेहरे की पुराणी चमक लौट कर नहीं आई.

अम्मी जान मुझसे खफा नहीं थी.

अम्मी जान मरे लहजे में बोली -- बाबू!. क्या बात है

मई 2 महीनो के बाद पहली बार पुराने स्टाइल में मुस्कुराता हुआ अम्मी जान का हाथ थाम कर चुम गया तो अम्मी जान के चेहरे पर हैरत भरे तासरत उभर आये

पुराण बाबू देख कर हैरान थी

मई -- अम्मी जान हमारे अनमोल प्यार में बढ़ते हमारे क़दमों को जान कर हमने सब कुछ एक्सपेक्ट नहीं कर लिए था.

अम्मी जान अपने होंटो डेंटन में दबा गई. आँखों में करब कुछ और बढ़ गया. चुप रही

मई -- असल में अम्मी जान. तेज़ी से बदलते हालत ने हमें सोचने समझने के क़ाबिल नहीं छोड़ा था. वर्ण हर मसले का कोई न कोई हल ज़रूर होता है

अम्मी जान के चेहरे पर मेरे अंदाज़ और बात पर कोई ख़ुशी नहीं झलकी

अम्मी जान - तो तुम्हारे पास इस मसले का भी कोई हल है बाबू.

मई -- जी अम्मी जान

मेरे ऐसा बोलने पर भी अम्मी जान खुश नहीं हुई

मई -- क्या आप को ख़ुशी नहीं मिली पुराने बाबू को लौट ते देख कर

अम्मी जान - अब ज़िन्दगी में किसी और रंग की छह नहीं रही बाबू. मुझे अंदाज़ा नहीं था. बायत इस हद तक भी पोहंच सकती है. इस उम्र में प्रेगनेंसी.. वह भी तुम्हारी वजा से

अम्मी जान ऐसा बोलते हुए ज़रूर शर्मा जाती. लेकिन गहरे ग़म ो दुःख ने अम्मी जान की जैसे शर्म तक छीन ली थी. बास पापा की नज़रों को देख सर झुका जाया करती थी

मई -- क्या गलत हुआ अम्मी जान

अम्मी जान सिसक पड़ी -- पूछते हो क्या गलत हुआ.. सही भी क्या हुआ है बाबू. जो हो रहा था, गलत तो वह भी बहुत था. लेकिन दिल पागल समझना hi नहीं चाहता था. दिल तो अब भी बेक़रार हो रहा है तुम्हारे अनमोल प्यार को पाने के लिए. लेकिन माँ बनना, वह भी तुम्हारे बच्चे की. ऐसा मैं खवाब में भी नहीं सोच सकती थी बाबू. अपने hi बेटे के बच्चे की मा--

माँ इन्तेहाई करब से सिसकती हुई आंसू बहाने लगी थी.

मई उनके हाथ को चूमता हुआ बोलै -- जब सब कुछ hi गलत था तो फिर इतने से गलत की भी गुंजाइश को दिल और दिमाग में रखना चाहिए था अम्मी जान

अम्मी जान -- नहीं बाबू.. ये सही नहीं हुआ. ये मई सोच नहीं सकती थी. कर नहीं सकती थी.

मई -- लेकिन अब तो हो चुका अम्मी जान

अम्मी जान रोने लगी -- बहुत गलत हुआ बाबू

मई -- मई सब ठीक कर दूंगा अम्मी जान. अपने बाबू पर भरोसा कीजिये

अम्मी जान -- अब कुछ ठीक नहीं होगा. अब से एक एक सांस घुट घुट लेनी होगी. जिस शोहर के सामने हमेशा सर उठा कर जीती आई हों. अब उसी के सामने सर झुका कर जीना होगा. और ऐसे जिया नहीं जाएगा मुझसे. मुझे लगता है बाबू. अब मैं और ज़यादा नहीं जी पाऊँगी.

मई तड़पता हुआ अम्मी जान को अपने गले से लगा गया.. अम्मी जान मुझसे लिपट गई

मई -- नहीं अम्मी जान. आप मेरी जान हो. प्ल्ज़ ऐसा मत बोलिये. आप को इतने से ग हम में देख कर मई पल पल मर रहा हों. खुदा न करे आप को कुछ हो. फिर मैं ज़िंदा रह कर क्या करूँगा अम्मी जान

अम्मी जान रोटी हुई बोली -- अब बाबू तुमने भी मरने की बातें शुरू कर दी

मई -- चलिए अब नहीं करते हम दोनों ऐसी बातें. बास आप अपने बाबू पर पहले के जैसे भरोसा को ज़िंदा कीजिये

अम्मी जान -- मुमकिन नहीं होगा बाबू. तुम्हारे पापा के नॉलेज में सब आ चूका है. अब तुम कुछ नहीं कर सकते. उन्हें समझाया नहीं जा सकता. मर्द हैं वह. पठान हैं वह. ये भी शुक्र है हम दोनों को तेरे पापा ने शूट नहीं कर दिए. वर्ण वह ऐसे hi पठान हैं. बात का अंदाज़ा होते hi हम दोनों को बिना एक भी पल गंवाए शूट कर देते

मई -- सब पुराणी बातें हो गई अम्मी जान. कहा न. आप सब फिक्रें छोड़ दें. बस्स्स अपने बाबू पर भरोसा कीजिये

अम्मी जान -- खली भरोसे से क्या होगा बाबू. हालत का अपने कण्ट्रोल में आना भी ज़रूरी होता है. यहाँ तो मटर hi ऐसा है. कुछ भी मेरे तुम्हारे हाथ में अब नहीं रहा. और न hi कभी आएगा. हमारे हाथ hi नहीं रहे हैं बाबू

मई -- मई मायूस नहीं हुआ हों अम्मी जान. आप कैसे मायूस हो सकती हैं अम्मी जान

अम्मी जान -- ऐसा है तो बाबू--

अम्मी जान दोनों हाथ मेरे आगे जोड़ गई -- मुझे अब इस के शिव किसी और बात की परवा नहीं रही बाबू.. मेरा वक़ार मुझे वापिस मिल जाए. मैं सर झुका कर, तुम्हारे पापा की नज़रों में गिर कर नहीं जी सकती. रोज़ उलटी सीढ़ी सोचें आने लगती हैं. किसी दिन मैं ख़ामोशी से ऑंखें बंद कर जाउंगी.

अम्मी जान देर तक ऐसी hi बातें करती रही. और मैं तड़प रहा था. कैसे भी करके मैंने अम्मी जान को खुद पर पहले जैसा भरोसा करने पर तैयार कर hi लिए

अम्मी जान -- तब मई समझूंगी. तुम्हारे अनमोल प्यार ने मुझे फिरसे ज़िंदा कर दिए बाबू.. जितनी जल्द हो सके सब सही कर डोज. सब पहले जैसा कर दो.

मई अम्मी जान को छेड़ता हुआ बोलै -- वैसे अम्मी जान मेरे बेटे का नाम भी ज़रूर आप ने सोच रखा होगा

और अम्मी जान इस बार बुरी तरह से शर्मा गई.

बास मैं यही चाहता था. अम्मी जान का शर्माना साबित कर गया. अम्मी जान पुराणी अम्मी जान बनने के लिए राज़ी भी हैं और बहुत खुश भी.

पहले मुझे भी बड़ा अजीब लगा था. अम्मी जान मेरे hi बच्चे की माँ बनने जा रही थी. लेकिन अब मेरी बदलती सोच ने मुझे अनोखी ख़ुशी देनी शुरू कर दी थी. मेरी अम्मी जान मेरे बच्चे की अम्मा बनेंगी.. उफ्फ्फ्फ़ लाइफ तो और भी मस्त हो जाने वाली थी

बास एक बार पापा मेरे काबू में आ जाएँ

मई प्लान पर प्लान सोचने लगा. और एक अछूता और कमीनगी से भरा प्लान मुझे सूझ hi गया था. इधर मैं और अम्मी जान, मतलब माँ बेटे के बच्चे की माँ बनने जा रही थी. माँ बेटे के बीच फिजिकल रिलेशन्स का यकीन पापा को हो गया था.

एक इधर माँ बीटा, और अब दूसरी ऑर्डर दूसरे दो माँ और बीटा

अब दादी को पापा के साथ चक्कर में डालना पड़ेगा. ऐसा हो जाता है तो पापा खुद हमारी नज़रों में चोर बन जाते. फिर कभी भी हमें कुछ कह नहीं सकते थे. अब बास दादी को लाइन पर लाना था. और दादी मर जाती. पर पापा के साथ कुछ ऐसा वैसा करने की सोचती भी नहीं.

बहुत सोच विचार के बाद मैंने दादी को पापा के लिए मुन्तख़ब कर लिए था. बूढी दादी और नाराज़ पापा.. हाहाहा

वहहह मज़ा आने वाला था. पापड़ भी बेलने पड़ने वाले थे.

मई अम्मी जान को दिलासा देता हुआ दादी की तलाश में अंदर जाने लगा. अम्मी जान को मैंने कुछ नहीं बताया था. अम्मी जान को मई सरप्राइज देना चाहता था.
 


बत्तीसवीं क़िस्त

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दादी जान मुझे अपने कमरे में सोचों में खोयी हुई मिली. मैं उनके पास गया. वो मुझे देख कर फीकी सी स्माइल देती हुई बोली

दादी जान -- बैठी बाबू!

मई उनके साथ बेथ गया

दादी जान मुझे हसरत भरी निगाह से देख बोली -- बाबू इस घर की खुशियों को किस की नज़र लग गई

मई - नज़र जिस की भी लगी हो दादी. पर आप की एक नज़र साडी खुशियां वापिस लौटा सकती है

दादी खुश हो गई - मुझे बताव मेरे लाल. मई ऐसा क्या करूँ. जिससे घर की पुराणी और सच्ची अनमोल खुशियां वापिस लौट आएं. मई कुछ भी करने को तैयार हों

मई - मुझे नहीं लगता आप कुछः भी कर करने को तैयार हो जाएंगी

मई "कुछ" पर ज़ोर देता हुआ बोलै तो दादी का मोह खुल गया. फिर बंद करती बोली

दादी जान -- ये क्या बात हुई बाबू... सच में मैं कुछ भी कर जाउंगी. एक साथ कई झटके इस घर की खुशियों को निगल गए. मुझे घुटन होने लगी है बाबू. अब बास बहुत हुआ. कुछ कर सकते हो तो कर गुज़रो. अब देर न करो

मई - चलिए दादी जान हम छत पर चलते हैं

और दादी जान झट मेरे साथ चलने के लिए राज़ी होती हुई उठ कड़ी हुई

कुछ देर में दादी जान मेरे साथ छत पर थी.

मैंने छत वाले दूर को अपनी तरफ से कुण्डी लगा दी

दादी जान - कुण्डी क्यों लगा दी बाबू तुमने

मई - दादी जान, कोई हमें डिस्टर्ब करने न आ जाये

दादी जान मुस्कुरा पड़ी. फिर मेरे गाल पर हाथ फेर बोली - डिस्टर्ब तो कोई तब करेगा न. जब कोई इधर छत पर आएगा. आज कल सब hi तो अलग थलग रहने लगे हैं.

मई - हम्म्म.. ये भी है.

मई कुछ सोचने लगा

दादी जान - किन सोचों में गम हो गए तुम बाबू

मई दादी को देख चहकता हुआ उनके गाल पर किश कर गया

और दादी बहुत दिनों के बाद मेरे चेहरे की पुराणी चहक लौट ते देख पहले चौंकी. फिर खिल उठी. मेरे गाल पर किश करती हुई बोली

दादी जान - ये है मेरे असली और सच्चे बाबू का अंमल प्यार भरा रूप

मई - दादी जान पुराणी बात करूँगा

दादी जान समझ नहीं पाई - पुराणी बात??

मई - हाँ पुराणी बात!

मई दादी जान को अपने गले से लगा कर दादी जान के माथे से अपना माथा लगा गया

दादी जान ने मेरी आँखों में देखा और स्माइल करने लगी. उनकी आँखों में चमक बढ़ गई थी.

मई - दादी जान ऑंखें बंद कर लीजिये

और दादी जान ने मेरा कहा मान लिए. मई दादी को ऐसी बातें करने लगा. कुछ hi देर में दादी की आवाज़ भरी होने लगी. दादी मेरे लहजे और मेरे प्यार के ट्रांस में आने लगी

जिस दिन मैंने दादी को अपने सर पर पिस्तौल तान कर नंगा होने के लिए कहा था. मई वह साड़ी बात दोहरा दादी के सामने दोहरा गया.

मई - अब बताइये. क्यों उस दिन आप ने मेरी जान के बदले खुद को मेरे सामने, अपने पोते के सामने बेलिबास कर डाला था.

दादी भरी लहजे में लेकिन हलके सुर में बोली - अपने बाबू की ज़िन्दगी के लिए मई एक बार तो क्या सौ बार मर मिटने के लिए तैयार हों. उस दिन मुझे सिवाए तुम्हारे कुछ और याद hi नहीं रहा था

मई - और आज??.

दादी : आज भी मुझे मेरे पोते के शिव कुछ याद नहीं है

मई - पोता कुछ भी करने को कहे. आप कर जाओगी

दादी जान - आज़मा कर देख लो

मैंने दादी जान के दिल वाले मुम्मे पर हाथ रख दिए

दादी काँपी ज़रूर. लेकिन ट्रांस में थी

मई - क्या बुरा लगा

दादी दिल की बात बोल सकती थी. झूट नहीं बोल सकती थी इस वक़्त

दादी - बुरा क्यों लगेगा. मेरे पोते का हाथ मेरे दिल पर है.

मई - दिल पर नहीं मुम्मे पर है

और दादी की सांस कुछ और धीमी चलने लगी

मई - कहाँ है मेरा हाथ

और दादी बोल पड़ी - मेरे मुम्मे पर

मई - दूसरे पर भी रख लून

दादी - रख लो

मई - दूसरे मुम्मों के पीछे आप का दिल नहीं है. आप को बुरा तो ज़रूर लगेगा

दादी - नहीं लगेगा. तुम रख लो

मई - मतलब आप को ाचा लगेगा

दादी - हाँ

मई - ये तो गलत है. ाचा कैसे लगेगा

दादी - प्यार है तुमसे बाबू

मई -- कब से

दादी - हमेशा से

मई -- मंटा हों. लेकिन ये वाला प्यार तो और hi है. क्या आप के दिल में कभी पहले ऐसा आया. आप के साथ मेरा ऐसा प्यार सही होगा

दादी -- पहले कभी नहीं आया था. लेकिन उस दिन तेरे सामने कपडे उतरे तो हर तरह की सोचें आने लगी

मई - खुल कर बताएं

और दादी बताने लगी. खुल कर बोलने लगी

दादी की बातों में वही था. हर दिल हर दिमाग में पॉजिटिव नेगेटिव थॉट्स का आना आम बात है. जिसे हम अपने लिए सही नहीं समझते. उसे नज़र अंदाज़ कर देते है. या दिमाग और दिल की गहराइयों में कैद कर लेते हैं

दादी भी इस वक़्त गहराइयों से बोल रही थी. मई कमरे में बेथ कर ऐसी बातें करता तो दादी बात को घुमा जाती. दिल की गहराइयों तक मुझे झाँकने नहीं देती

अब मेरे कण्ट्रोल में थी

मई - मतलब आप इस उम्र में भी मेरे लिए खुद को संभल नहीं पाई

दादी - उम्र का क्या है. उम्र बढ़ती है. पर उमंगें और चाहतें कभी नहीं मरती. बास उसे दिल की गहराइयों में छुपा कर रख लिए जाता है. इस उम्र में हर मेरी उम्र की औरत ऐसा hi करेगी

मई - मतलब आप दिल से राज़ी हैं

दादी -- तेरे लिए तो मैं हमेशा राज़ी hi राज़ी रहूंगी.

मई -- आप खुद को किस दुन्या में फील का रही हैं

दादी जान - वहां हों. जहाँ झरने बाह रहे हैं. झरनों का गिरता पानी नग़मे गुनगुना रहा है. वहां चिडयों का शोर है. लेकिन शोर नहीं वह भी एक नग़मा hi गुनगुना रही है. हवाएं मस्तियाँ करती हुई पास से गुज़रती हुई महसूस हो रही है

मई - अगर मैं अपना अनमोल प्यार आप को दूँ. तब आप कैसा फील करेंगी

दादी जान - तब हर रंग गहरा हो जाएगा. हर सुर का मज़ा बढ़ जाएगा

दादी पूरी तरह से मेरे कण्ट्रोल में थी. और मेरा लुंड फुल हार्ड हो चूका था..

दादी इस उम्र में सिवाए इलास्टिक वाली शलवार के और कुछ पहनती नहीं थी. मई अपना लुंड निकाल कर दादी की शलवार नीचे किये उनकी फुद्दी के साथ अपने लुंड को लगा

मई -- हर रंग गहरा हुआ

दादी जान - हाँ

मई - मज़ा बढ़ा के नहीं

दादी जान -- बढ़ गया

मई -- और बाधाओं

दादी जान - हाँ बढ़ा दो

मई - अंदर डालूंगा तो मज़ा भी बढ़ेगा और चिडयों और झरनों के नग़मों के सुर भी बढ़कर सुकून देने लगेंगे

दादी जान - तो दाल दो

मई - थोड़ा के पूरा

दादी जान - जान डालना hi है तो थोड़े का क्या मतलब. पूरा दाल दो

दादी जान से मैं बेशर्मी वाली बातें किये जा रहा था. वो भी मेरे रंग में रंगी दोहराती जा रही थी

यहाँ रह कर देर करना सही नहीं था.. मई दादी की फुद्दी को गीला कर चूका था. मेरा लुंड उनकी फुद्दी से लगा गीला हो चूका था

दादी जान को दर्द से गुज़ारना पड़ने वाला था. और ये दर्द दिए बिना कोई चारा नहीं था

मई दादी जान की फुद्दी में लुंड धीरे धीरे करके उतरने लगा

और दादी जान की साँसे तेज़ होने लगी

ग़र्ज़ मैंने खड़े खड़े दादी जान को छोड़ डाला. दादी जान की फुद्दी ने पानी छोड़ा तो दादी जान ऑंखें खोल गई

दादी जान की आँखों में सुकून hi सुकून था

मई धक्के मारता हुआ बोलै -- कैसा लग रहा है दादी जान

और दादी जान अब पूरी तरह से मेरे ट्रांस से बहार थी. दादी जान चेहरा फेर शर्माने लगी

मई दादी जान को छोड़ने लगा. बार बार उनकी फुद्दी से पानी निकलने लगा

ऐसे hi अगले 10 दिन तक मैंने दादी जान की फुद्दी और फिर गांड कई बार मार डाली. दादी जान 24 हरष चाहतकी फिरती थी. घर में सब ग़म में डूबे हुए थे और दादी जान फ्रेश फ्रेश और खुश खुश फिर रही थी.

सब दादी जान की ख़ुशी पर हैरान थे.

मई अलबत्ता अपने पुराने मूड में hi रहा. मई पापा को किसी तरह के शक में मुब्तला नहीं कर सकता था.

फिर मैंने दादी जान को माँ वाली बात का राज़दार बना लिए. और दादी जान सुन्न कर लहराती हुई गिरने लगी थी.

उनका मोह खुल गया था. ऑंखें फेल गई थी. आबरू ऊपर को उठ गए थे. चेहरे के हाव भाव बदल गए थे

दादी जान हकलाती हुई बोली - बाबू ये तुम क्या कह रहे हो

मई - यही सच है

और दादी जान गहरी फ़िक्र में डूब गई.

दादी जान - तेरे पापा क्या इसी बात को जान चुके है. क्या तभी वह इतने परेशां और सोचों में गम रहने लगे हैं

मई - हाँ यही बात है

दादी जान - तब.. फिर.. ये तो बहुत गलत हुआ

मई - अब आप hi इसे ठीक कर सकती हैं दादी जान

दादी जान हैरानी से मुझे देख बोली -- मैं ठीक कर सकती हों?.. कैसे??

मई अंदर से कमीनगी लेकिन बहार से खुद को फिक्रमंद साबित करता हुआ बोलै

मई - दादी जान मई और अम्मी जान दोनों माँ बीटा होते हुए इतना सब कुछ कर गुज़रे. पापा ने हमें शूट नहीं किआ. यही बड़ी बात है. अब पापा को लाइन पर लाने के लिए मेरे और अम्मी जान के जैसा hi एक और खेल खेलना पड़ेगा

दादी जान उलझी - मई कुछ समझी नहीं बाबू

मई - मैं और अम्मी जान दोनों माँ बीटा.. आप और पापा दोनों माँ बीटा

और दादी जान इस बार सच मच गिर पड़ी थी. लेकिन वह कड़ी कड़ी बीएड पर गिरी थी.. वह पूरी पसीने में नहाने लगी थी. उनके चेहरे के रंग उड़ते चले जा रहे थे..

ऑंखें चढ़ती चली जा रही थी

मुझे दिल में गहरा दुःख हुआ. लेकिन अब इसके शिव कोई और चारा भी तो नहीं था

मई - दादी जान आप को ये करना होगा

और दादी जान बिना मुझे देखे मरी हुई आवाज़ में बोली -- तूने ये सब.. मेरे साथ सब... मतलब.. अपने मतलब के लिए कियाए

और दादी जान रोने लगी

और मैं दादी जान की बात सुनकर सख्त परेशां हो गया. दादी जान ऐसा भी कुछ सोच सकती हैं. मेरे वहम ो गुमान में भी नहीं था.. मुझे तो लगा था. दादी जान आसानी से न सही, थोड़ी मुश्किल से hi सही, लेकिन मान जाएंगी.

लेकिन दादी जान तो बात hi और कर डाली थी..
 
मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है. असल में साइलेंट रीडर्स hi व्यू को बढ़ाते हैं.. मैंने ये ऐसा इसलिए लिखा था. आप ने मेरे इस थ्रेड पर सारे कमैंट्स नहीं पढ़े हाँ

मोस्टली कमैंट्स ऐसे होते हाँ. जो यहाँ पोस्ट होते हैं. वही यहाँ से कॉपी के बाद हर थ्रेड पर पोस्ट करते फिरते हाँ. ऐसा देख इर्रिटेशन नहीं होगी तो क्या होगा..

न करें कमेंट्स, करें तो हर बार वर्ड्स तो चेंज हों.. और एक कोई सुग्गेस्टिव देता है तो कई रीडर्स एग्री लिख कर दिमाग चांटे लगते हाँ..



भेजा फ्राई होने लगता है 😅
 
हाँ भाई.. चिल hi मार रहा हों.. असल में अपने मेरे इस थ्रेड पर कमैंट्स को पूरी तरह से रीड नहीं किआ है... कहानी शुरू हुई तो आल चरक्टेर्स डिटेल देख कर कोई कुछ नहीं बोलै. बाद में बोलने लगे. भाभी एक साथ सेक्स मत करवाओ हीरो का. भाभी के बात चीत का भी मत लिखो. उसकी चुदाई मत लिखो. सिर्फ बाबू का उसकी अपनी माँ और बहनो के साथ लिखो. फिर लिखने लगे दादी के साथ कोई सन क्रिएट मत करो.

अब कोई समझता नहीं है तो मई क्या करूँ. कहानी को बनाने के लिए भी ओठेर्स चरक्टेर्स को अहमियत देनी पढ़ती है. लेकिन मोस्टली रीडर्स मेरे थ्रेड पर ऐसे हैं. जो चाहते हैं, हर सन hi सेक्स रोमांस लस्ट और माँ बहनो के साथ हो

ऐसे कैसे कर सकता हों मैं.. सो बार बार एक जैसे कमैंट्स देख देख कर इर्रिटेशन होने लगी थी. ..... बाकि सब मस्त है :हैप्पी:
 


तैंतीसवीं क़िस्त

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मई -- दादी जान मई और अम्मी जान दोनों माँ बीटा होते हुए इतना सब कुछ कर गुज़रे हैं. पापा ने हमें शूट नहीं किआ. पापा को लाइन पर लाने के लिए, घर के महुअल को पहला जैसा बनाने के लिए मेरे और अम्मी जान के रिलेशन जैसा hi एक और खेल खेलना पड़ेगा!

दादी जान उलझी -- मई कुछ समझी नहीं बाबू. तुम खुल कर बात क्यों नहीं कर रहे हो.

मई -- दादी jaan!..main और अम्मी जान दोनों माँ बीटा.. आप और पापा दोनों माँ बीटा एक साथ.. ऐसा हुआ तो सब सेट हो जाएगा

और दादी जान इस बार सच मच गिर पड़ी थी. लेकिन वह कड़ी कड़ी बीएड पर गिरी थी.. वह पूरी पसीने में नहाने लगी थी. उनके चेहरे के रंग उड़ते चले जा रहे थे..

ऑंखें चढ़ती चली जा रही थी...

मुझे दिल में गहरा दुःख हुआ. लेकिन अब इसके शिव कोई और चारा भी तो नहीं था

मई - दादी जान आप को ये करना होगा

और दादी जान बिना मुझे देखे मरी हुई दर्द भरी आवाज़ में बोली -- तूने ये सब.. बाबू तुमने ये सब... मेरे साथ सब... मतलब.. अपने मतलब के लिए.. अपनी ग़र्ज़ के लिए कियाए!!...

और दादी जान दुःख से रोने लगी. उनकी आँखों से दो कतरे बाह निकले

और मैं दादी जान की बात सुनकर सख्त परेशां हो गया. दादी जान ऐसा सोच भी कैसे सकती हैं. मेरे वहम ो गुमान में भी नहीं था. दादी बात को और hi अंदाज़ में लेंगी.. मैं ये सोचे हुए थे. दादी जान मुश्किल से hi सही, लेकिन मान जाएंगी..

लेकिन दादी जान तो बात hi और कर डाली थी..

मुझे सख्त बुरा भी लगा था. दादी जान के ये वर्ड्स, ये रोना, सिसकना मेरे वक़ार मेरे अनमोल प्यार पर एक तमाशा भी था. लेकिन मैं खुद को संभल गया

लेकिन दादी जान नहीं समझल पाई. खुद साख्ता सोच के चलते वह सदमे में आ गई थी. रोने लगी

रोटी हुई फिरसे बोली -- बाबू तुम्हे मेरे साथ इतना सब करने की ज़रूरत hi नहीं थी. मई तुमसे कितना प्यार करती थी. लाज शर्म के होते हुए मैं तुमसे लड़ पड़ती. नाराज़ हो जाती. लेकिन तुम्हारे लिए, इस घर की खुशियों के लिए मैं तेरी बात मान लेती. लेकिन तूने मेरा इस्तेमाल किया बाबू.

और पहली बार मेरे अंदर का पठान सर उठाने लगा. मेरे जबड़े भींचने लगे. चेहरे के मुस्कले कस्ते चले गए. मैं दादी को देखता जा रहा था. गहरे दुःख रंज और ताकेएलफ अब गुस्से से मेरा सर गरम होने लगा

दादी जान - बाबू तू फ़िक्र न कर. अब भी मैं तेरा ये काम कर दूंगी.. तेरे लिए मेरा प्यार पहले जैसा hi रहेगा. लेकिन अब तुम मेरे साथ ऐसा वैसा कुछ नहीं कर सकोगे. अब से मई तुझे अपने ऐसे करीब भी नहीं आने दूंगी.. मेरे दिल में तेरी बात एक फँस बनकर अटक गई है बाबू.. खुश हो जाओ.. तेरी और गुलशन की खुशियों के लिए मैं तेरे पापा के साथ वह सब कुछ कर गुज़रूंगी. जो तू अपनी अम्मी जान के साथ कर गुज़रा है..

और मेरे लैब भींच गए. खून निकल आया था मेरे एक लैब से.. इतना प्रेशर डेंटन कर मेरे होंटो पर पड़ा था.

दादी जान ने एक और गलत काम किया --- अब तू जा.. मई कुछ देर अकेली रहना चाहती हों..

दादी जान ने ऑंखें नहीं खोली थी. रोटी हुई आंसू बहती हुई रुक रुक कर अपने दुःख में मुझे ज़लील करती चली गयी.. मैं चाहता तो दादी जान को सफाई दे सकता था. लेकिन फिर मेरे अनमोल प्यार का क्याआ?.

मैं वहां नहीं रुक सकता था.. बड़े गुस्से से दादी जान के कमरे से निकला था.

अपने कमरे में पोहंच मई सोचने लगा. ये दादी जान ने मेरे साथ क्या कर डाला. क्या मई ऐसा था. हाँ था.. पहले था.. फिर बदल भी तो गया था. न बदल गया होता तो कितना कुछ सब के साथ कर गया होता.. सारा भाभी की शलवार पहाड़ कर एक बार उन्हें छोड़ डाला था. लेकिन वह चुदाई तो नहीं थी. वो तो कुछ भी नहीं था.. माहिरा बजी के पुरे जिस्म को 3 बार नंगा देख चूका था. फिर भी उन्हें छोड़ा नहीं था. किन्ज़ा एपीआई को नंगे नहाते हुए देख चूका था. और भी कितना कुछ कर गुज़रा था. ब्रा पंतय तक में ले आया था. चाहता तो अपने अनमोल प्यार के चक्कर में फँस कर, वैसे भी उसे चक्कर में दाल कर उसे छोड़ सकता था.

अम्मी जान के चेहरे हाथ और पैरों के शिव मुझे आज तक कुछ दिखा भी तो नहीं था.. दादी जान को नंगा कर गया था पहले पिस्तौल अपने सर से लगा कर. और अब छोड़ने लगा था.. और तो किसी को नहीं छोड़ा था.. अभी तो दादी जान से मेरी अम्मी जान बारे खुल कर बातें भी नहीं हुई थी. और दादी जान बदगुमानी की इन्तहा पर पोहंचती हुई मेरी और hi इमेज दिल में बना गई थी. मुझे सेल्फिश मान गई थी

दुःख रंज और गुस्से से मैं पागल होने लगा. चैन नहीं मिल रहा था. बाथरूम में घुस गया. बिना कपडे उतरे शावर चला कर नीचे खड़ा हो गया

लेकिन अब चैन कहाँ था. दादी जान ने अपने लफ़्ज़ों के ज़रिये मुझे मेरी औकात बता दी थी.. गर्म लहार बार बार सर के पिछली तरफ उठती और मेरे ग़ुस्से और जूनून को बढ़ने लगती.

नहाने से भी सुकून नहीं मिला था. लेकिन बहुत कुछ और मई सोच गया था. ऊपर से खुद को नार्मल शो करवाता हुआ मैं अंदर से बुरी तरह से दाहक रहा था..

उसी दिन से दादी जान ने ग़ैर महसूस तरीके से पापा के सामने अपने जिस्म के जलवे ज़ाहिर करने शुरू कर दिए.. दादी जान सबके सामने मुझसे नोर्मल्ली बातें करती रही. और मैं भी किसी को अपने और दादी जान के बीच खत पैट का अहसास नहीं होने दे पाया

तीसरे दिन मैंने पापा को दादी जान को देखते हुए पाया. दादी जान की गांड में कमीज अटकी हुई थी. और दादी जान अपनी गांड मटका कर पापा के सामने से गुज़री थी

लेकिन अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था. लेकिन अम्मी जान के लिए ये सब ज़रूरी था. दादी जान से ज़लील तो हो hi गया था. अब अम्मी जान और पापा के लिए तो मुझे चुप रहना hi था.. वापिस से सब की लाइफ को रूटीन पर लाना तो था hi. पर शायद अब मैं बदलने वाला था. दादी जान की बातों ने आग hi ऐसी मेरे अंदर दहका दी थी..

लेकिन फिर किस्मत के लिखे खेल ने कुछ और चेहरे मेरे सामने खोल कर रख दिए.. मेरे अनमोल प्यार की धज्जियाँ hi उड़ कर रह गई.

हुआ ये था.. मई अपने कमरे में था.. अम्मी जान सीढ़ियां चढ़ती हुई ऊपर किसी काम से आ रही थी.. आखरी स्टेप पर थी. किन्ज़ा एपीआई अपने कमरे से निकली भागी. चीखी और अम्मी जान को देख रोटी हुई बोली

किन्ज़ा -- अम्मी जान... नैनो को हार्ट अटैक आया है.. अभी अभी कॉल आई है

और मैं किन्ज़ा एपीआई का चीखता चिल्लाना सुन अपने कमरे से भाग कर बहार निकला था.. अम्मी जान तो सीढ़ियों पर कड़ी चक्र गई.. पहले hi बहुत से दुखों में जिए जा रही थी. बेटे के बच्चे की माँ बनने जा रही थी. शोहर की नज़रों में गिर गई थी. अम्मी जान के पापा जान से हार गए थे. अब नानी जान भी मौत की दहलीज़ तक जा पोहंची थी..

अम्मी जान खुद को संभल नहीं पाई.. वही कड़ी कड़ी लहराई और सीढ़ियों से नीचे लुदाहक्ति चली गई.. हम सब चीख पड़े. भाग पड़े.. अम्मी जान नीचे फर्श पर पोहचने से पहले hi बेहोश हो चुकी थी. उनके सर पर चोट लगी थी. खून निकलने लगा था..

मई भाग कर नीचे पोहंचा. सब पोहंच चुके थे. पापा भी पुराणी साड़ी बातें फिलवक्त के लिए भूल कर अम्मी जान के लिए फिक्रमंद दिखाई देने लगे

अम्मी जान को मैंने बहन में उठाया और निकल भागे बहार गाड़ी की तरफ

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ऑपरेशन थिएटर के बहार खड़े हम सब अम्मी जान के लिए बहुत ज़यादा परेशां पड़े थे. उधर नानी की माइनर अटैक आया था. वो तो जल्द संभल गई थी. लेकिन अम्मी जान के सर पर लगी चोट कुछ सीरियस थी..

फिर ऑपरेशन थिएटर का दूर खुला और एक लेडी डॉक्टर बहार आई. आते hi बताया.. अम्मी जान तो ठीक हैं.. लेकिन बाद किस्मती से बच्चा जाया हो गया था.. इस बात की ज़यादा किसी को टेंशन नहीं हुई..

लेकिन मेरी नज़र पापा पर पड़ी और पापा मुझे tanziya(satirical) निगाहों से मुस्कुराते हुए मुझे दिखाई दिए

मई पापा की मुस्कराहट देख, जान और समझ कर सन्नाटे में आ गया

पापा कह रहे थे -- मेरे खेत पर कब्ज़ा करके हल भी चला गए तुम.. बीज भी दाल दिए था तुमने.. लेकिन देखो अब.. हवा के एक hi झोंके ने मेरे खेत की तुम्हारी फसल को बर्बाद कर दिए... नाम निशान तक मिटा डाला..

पहले दादी जान और अब पापा.. पहले का मुझसे नज़रें चुराना, मुझे शर्मिंदा करना क्या काम था. जो अब ऐसा भी अपनी स्माइल और आँखों की स्माइल से कह गए थे..

मई चुप रहा. अपने होंठ भींच गया. कोई और पापा की निगाहों का मतलब नहीं समझ सका था. कोई भी पापा की तन्ज़िया मुस्कराहट जो मेरे लिए खास थी, देख पाया था.

बाद में अम्मी जान से मिलना हुआ

और अम्मी जान को पता चला उनके पेट में मेरा जो बच्चा था.. वो सीढ़ियों पर से गिरने से जाया हो चूका है. अम्मी जान ने सुख की सांस ली थी..

मुझसे अकेली मिली तो बोली -- शुक्र है बाबू.. एक बड़ी मुसीबत से जान छूती. वर्ण मेरा तो दिन रात का सुकून बर्बाद हो गया था. शोहर के होते हुए, उनके नॉलेज में बच्चे को जानना.. तुम सही अंदाज़ा नहीं लगा सकते बाबू.. मैं पल पल कितना मरी हों..

और अम्मी जान ऐसा मिलने वाली बेपनाह ख़ुशी की वजा से कह गई थी. ठीक है मेरे बच्चा न मैं अम्मी जान से चाहता है और न hi अम्मी जान मुझसे.. ये सब अचानक से हुआ था. लेकिन मेरे सामने ऐसे खुशियां का इज़हार तो न करती.. वह भी ऐसे लफ़्ज़ों में.. अब तो पापा सब जान hi चुके थे. फिर दादी भी अपना खेल अब खेल hi रही थी. सब सही हो जाता. अम्मी जान बाद में भी तो एबॉर्शन करवा सकती थी. कोई और चक्कर चलवा सकती थी. लेकिन मेरे दिल पर छुरियां चलने की क्या ज़रूरत थी अम्मी जान को

मेरे फेस एक्सप्रेशंस देख कर अम्मी जान को एकदम से अहसास हुआ. अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करके, मोह से ख़ुशी को लफ़्ज़ों में प्रो कर बयां करते हुए वह गलती कर गई हैं.. हालत पहले जैसे तो नहीं थे. बदल गए थे. और सोच समझ कर बोलना फ़र्ज़ बन चूका था..

अम्मी जान मेरे बदलते रंग देख कर घबरा गई.. लेकिन मैं चुप चाप वहां से निकल पड़ा..

मैं कभी कभी सिगरेट पि लिए करता था. ये पहले की बात है. फिर मैं अंदर का कमीना मर गया और अनमोल प्यार करने वाला बाबू ज़िंदा हो गया था. मैं सिगरेट पीनी छोड़ गया था. आज बड़ी तालाब होने लगी.

मई हॉस्पिटल की कैंटीन गया. वहां सिगरेट्स का पैकेट लिए. एक सुलझा कर हॉस्पिटल के लॉन में एक बेंच पर बेथ गया

दादी जान की बातें, पापा की तन्ज़िया मुस्करात और अब अम्मी जान की ख़ुशी.. मेरा सब कुछ बदल क्र रह गया था. दिल चाहने लगा था. कहीं दूर चला जाऊं

ऐसे में पापा मेरे पास आ बैठे. मई उन्हें देखने लगा. वो सामने बैठे हुए थे

पापा -- मैं समझ सकता हों. तुम इस वक़्त कैसे दुःख से गुज़र रहे होंगे. ऐसे hi दुःख से मैं भी एक बार गुज़रा था. तब गुलशन पहली बार प्रेग्नेंट हुई थी. 4तह महीने वह ऐसे hi गिर पड़ी थी. जैसे आज गिरी है. गिरसे स बच्चा जाया हो गया था.. मुझे गहरा दुःख पोहंचा था.. मैं समझ सकता हों तुम्हाडा दर्द.. अफ़सोस मैं तुमसे हमदर्दी नहीं कर सकता.

पापा उठ कर चले गए. और मई उन्हें जाते हुए गुस्से और अफ़सोस से देखने लगा. जब से अम्मी जान प्रेग्नेंट हुई थी. उस दिन के बाद से आज पहली बार पापा ने मुझसे अकेले में बात करि थी. और जला कर भसम कर गए थे मुझे..

मेरे अंदर का खुड़सर पठान अपनी आई पर आने लगा. मैंने सिगरेट फ़ेंक दिए.

अब सिगरेट पीने को भी दिल नहीं छह रहा था. सब के सब मेरे दुश्मन हो गए थे. जो नहीं हुए थे सराह भाभी, माहिरा और किन्ज़ा एपीआई, दादा जान..

लेकिन अब मेरा सब पर से भरोसा उठ गया था. हवाओं के बदलते रुख के साथ ये सब भी बदलते जा रहे थे. आज दादी जान, पापा और अम्मी जान ने मेरे दिल के टुकड़े टुकड़े कर दिए थे. कल को किन्ज़ा एपीआई, माहिरा एपीआई भी ऐसा कर सकती थी मेरे साथ. सराह भाभी तो बहार की थी.. वह मेरी परवा क्यों करने लगी.

वहां फुफु की फॅमिली भी आई हुई थी. सब के सब परेशान थे.. महीनो से ज़िन्दगी ग़मों से भर्ती जा रही थी. यहाँ हम सब और वहां फुफु और सब भी खुश खुश नहीं जी रहे थे.

अम्मी जान दो दिन बाद ठीक हो गई. घर आ गई थी.. अब अक्सर पापा की निगाहें मुझे मेरा मज़ाक उड़ाती दिखाई देती. सब के सामने वह नार्मल रहते.. दादी जान ने फिरसे अपना काम करना शुरू कर दिए..

पापा की नज़रों का ज़ाविया बदलने लगा.. पापा जो पहले शायद अपनी माँ मेरी दादी जान को ऐसी नज़रों से न देखते. लेकिन घर में आलरेडी एक माँ beta(main और अम्मी जान) फिजिकल हो चुके थे.. इसलिए पापा भी शायद ऐसा सोच कर अपनी नज़रों को संभालना भूल गए.. या जान बूझ कर नज़र अंदाज़ करने लगे

अगले कुछ रोज़ में दादी जान की इशारों में हरकतों में खतरनाकि आने लगी. और पापा दादी जान के करीब होने का मौका तलाश करने लगे. दादी जान तो खुद से ऐसा कर रही थी. और छह रही थी.

अब मई सीरियसली घर छोड़ जाने के बारे में प्लान बनाने लगा था. अब मुझे इस घर में घुटन होने लगी थी. अम्मी जान हॉस्पिटल वाली बात पर मुझसे घर के लॉन में मिल सॉरी बोल गई थी.. और मैं अपने चेहरे से कुछ भी ज़ाहिर न करता हुआ खुद को पुराण बाबू शो करते हुए अम्मी जान को खुश कर गया था.. अम्मी जान ने मेरी आँखों में घोर से देखा था. और मैं उलटी सीढ़ी हरकतें करके अम्मी जान को हँसा गया था.. वह मेरी आँखों से मेरे दिल में नहीं उतर सकीय थी..

उसी दिन अम्मी जान ने कहा था -- बाबू.. ये सच है. तुम्हारा प्यार अनमोल है. जो हुआ. उसपर मुझे अफ़सोस नहीं है. लेकिन वक़्त ने ये साबित कर दिखाया है. ये सब सही नहीं था.. अब से हमारे बीच ऐसा वैसा कुछ नहीं होगा.. बास एक बार तुम्हारे पापा की नज़रों में मेरा वक़ार बहाल हो जाए. इससे ज़यादा की छह मुझे नहीं रहेगी.. तुम भी खुद को संभालना

मई -- अम्मी जान. आप ने खुद मन था.. मेरे प्यार में जिस्म की तालाब नहीं थी. उस रात भी जो कुछ हुआ था. अचानक से हुआ था. और आप hi आउट ऑफ़ कण्ट्रोल हो गई थी.. कुछ हुआ भी नहीं था.. फिर भी बहुत कुछ.. सब कुछ हो गया था..

अम्मी जान सर झुकाये बोली -- मुझे ज़रा भी दुःख या अफ़सोस नहीं है बाबू उस रात पर.. बास इतना अहसास हो गया है मुझे.. वो सब सही नहीं था.. घर की खुशियों को बचने के लिए हमें ऐसा सब बंद करना होगा..

मैंने अम्मी जान को देखा और अम्मी जान बेटियों की माँ बन बोली -- बाबू तुम्हारी बहने कुंवारी हैं.. और इस घर से कुंवारी hi जाएँ तो ाचा है..

मई अम्मी जान का हाथ थम कर बोलै था -- क्या आप को डर लगता है मुझसे

अम्मी जान -- नहीं तुझसे नहीं.. तेरे अनमोल प्यार से डर लगता है. तेरे अनमोल प्यार के आगे मैं खुद बेअख्तियार हो गई थी. माहिरा हो गई. किन्ज़ा कैसे खुद को संभल पाती. सराह नदीम की बीवी होते हुए मुझसे भी बढ़कर ग़ैरत और शर्म वाली होते हुए भी तुम्हे कितना कुछ करने दे गई.. अब ये सब बंद करना होगा.

मई -- वह तो बहुत वक़्त पहले hi बंद हो चूका है अम्मी जान. क्या फिर कभी आपने मुझे देखा. किसी को परेशां करते हुए.

अम्मी जान हिचकिचाई -- baa...buuu तुम्हे बुरी तो नहीं लग रही हाँ न मेरी बातें.. असल में बहुत डर गई हों

मई -- बुरी क्यों लगेंगी अम्मी जान.

और अम्मी जान मुझे घोर से देखने लगी

अम्मी जान -- पता नहीं क्यों बाबू??.. कभी कभी तुम्हारी ऑंखें तुम्हारे लफ़्ज़ों के साथ देती नज़र नहीं आती.. ऐसा लगता है...

मई -- कैसा लगता है??

मई स्माइल से बोलै था. मेरी आँखों की असली चमक लौट आई थी. अब इतना तो मई कर hi सकता था

अम्मी जान ने मेरी मुस्कुराती ऑंखें देखि और सुख की सांस लेती हुई बोली

अम्मी जान -- नहीं... मुझे भी गलत फेहमी हुई होगी. मेरा बाबू तो बहुत पायरा है.

अम्मी जान हॉस्पिटल से घर लौट कर आई तो अगले 2 महीने में दादी जान और पापा करीब आते आते एक हो गए.....

एक महीने बाद दादी जान मुझसे अकेले में मिली -- बाबू.. मैंने तुम्हारा काम कर दिए है.. खुश हो जाओ.. आज से घर की पुराणी खुशियां लौट आएँगी. कल तुम देखोगे. तुम्हारे पापा तुमसे और तुम्हारी अम्मी जान से पहले जैसे बातें करते दिखाई देंगे

मई -- आप का शुक्रिया ऐडा नहीं करूँगा दादी जान. ये घर उतना मेरा नहीं है. जितना आप का है. इस घर की खुशियां वापिस लौटना जितना मुझपर फ़र्ज़ था. उतना hi आप पर भी फ़र्ज़ था और है दादी जान. आप ने मुझपर कोई अहसान नहीं किया. खुद पर और इस घर पर अहसान किया है.. इस घर की गयी खुशियों को वापिस पाने के लिए खुद को पापा के हवाले किये है आप ने.

दादी जान मेरे साथ हुई आखरी चुदाई के बाद आखरी मुलाक़ात में हुई बातों के बाद आज अकेले में मुझसे बातें कर रही थी. उस दिन दादी बोली थी और आज मैं बोल पड़ा था..

इतना बोलना ज़रूरी था. क्यों कह मैं साड़ी तैयारियां पहले से hi कर चूका था. आज का दिन मेरा इस घर में आखरी दिन था.

दादी जान मेरी बात पर उतना नहीं चौंकी. जितना वह मेरे अंदाज़ और लहजे पर चौंकी थी. दादी जान घबरा गयी.

लेकिन मैं दादी जान को एक नज़र देखने के बाद वापिस पलटा और तेज़ क़दम उठता कमरे से निकले लगा. दादी जान को गड़बड़ का पूरा पूरा अहसास हो गया था.. वह मेरे पीछे भागी

दादी जान -- बाअबूउ.. रुको बाबू

और मैं तेज़ी से क़दम उठता घर से hi निकल गया... वह पूरा दिन मैंने घर से बहार मसरूफियत में बिताया. शाम को घर लौटा तो सबसे पहले सामना पापा से hi हुआ.. पापा आज महीनो बाद मुझसे मुस्कुरा कर मिले थे. पहले जैसे अंदाज़ में मिले थे. जैसे बीच में कुछ हुआ hi न हो..

पापा -- बाबू!.. मुझसे अकेले में बात करनी है.. टाइम निकल कर मुझसे मिलो

मई उनकी पुराणी स्माइल पर खुद को पुराण बाबू ज़ाहिर करता हुआ ख़ुशी का इज़हार करता हुआ बोलै

मई -- ठीक है पापा

और पापा मेरी मुस्कराहट पर पल भर के लिए मुझे देखते रह गए थे.. घर की खुशियां लौटने लगी थी. ऐसा वह समझ रहे थे. अपनी hi माँ को छोड़ कर

जीने का ढंग बदलने का इरादा कर गए थे. अब शायद पापा को मेरे अम्मी जान के साथ फिजिकल रिलेशन्स पर भी कोई ऐतराज़ न होता..

लेकिन नहीं जानते थे.. अब कुछ भी हो जाता. पहले जैसा कुछ नहीं होने वाला था...

मैं अपने कमरे में चला गया.. फ्रेश होकर कपडे चेंज करके बहार सबके साथ आ बैठा. और कुछ भी शो किये बिना बातें करने लगा.. अम्मी जान चहक रही थी. ज़रूर पापा ने अम्मी जान से कुछ बातें की होंगी. बार बार मुझे देख स्माइल करती जा रही थी अम्मी जान

और दादी जान कुछ फिक्रमंद सी थी. वह भी बार बार मुझे देखती जा रही थी. एक बार मैंने दादी जान को देखा. उन्हें ने आंख से इशारा किआ... "बाबू अकेले में मिलो मुझसे.."

और मई मुस्कुरा पड़ा था.

आज एक मुद्दत के बाद सब है है बातें किये जा रहे थे. दादा जान सब को खुश देख बहुत खुश हो रहे थे.

सब डिनर की तैयारी में लग गए. और मई अपने कमरे में घुस दूर को अंदर से लॉक करता ज़रूरी सामान समेटने लगा. मोस्टली सामान मैं आलरेडी अपने एक दोस्त के पास शिफ्ट कर चूका था. वह भी कुछ नहीं जनता था मेरे इरादे के बारे में..

डिनर से पहले मैं चुपके से घर से निकल पड़ा. एक बैग के शिव मेरे पास कुछ नहीं था..

अपने दोस्त के पास पोहंचा.. उससे अपना सामान लिया.. फिर रेलवे स्टेशन जा पोहंचा....

मैं कराची जा रहा था. जहाँ मुझे तलाश कर पाना भूसे के ढेर में से सुई को तलाश करने जैसा था.
 




छत्तीसवीं क़िस्त

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लॉन्ग गपे की वजा से उपदटेस की नंबरिंग में, मैं गलती कर बैठा था. अकॉर्डिंग तो लास्ट फ्यू उपदटेस इस अपडेट का नंबर 34 बनता है. लेकिन स्टोरी के हिसाब से ये अपडेट 36तह है.

इसलिए अपडेट को 36 का नंबर देते हुए लिख रहा हों. बीच में दो उपदटेस का गपे मत समझिये था..

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वाया 3रद पर्सन



मंज़र डाइनिंग रूम का था. एक एक करके सब वहां आते जा रहे थे. सबसे पहले आने वळून में फिरोज उर्फ़ बाबू के papa(hashmat खान) hi आ कर अपनी चेयर संभल गए थे. एक लम्बी मुद्दत के बाद उनके चेहरे पर कोई सलवट नहीं थी. दुःख, ग़म, रंज, गुस्से का कोई एक भी रंग नहीं था. सारे रंग दादी jaan(rehana खान) के हशमत खान के साथ फिजिकल रिलेशन से उतर गए थे. वहां कई नए रंगों के साथ पुराने सारे रंग बिखरे दिखाई दे रहे थे.

कोण था जो आज खुश नहीं था. हशमत खान अपनी बीवी गुलशन खान के साथ हस्ते मुस्कुराते हुए बातें कर रहे थे. गुलशन खान खोया हुआ वक़ार फिरसे प् कर जी उठी थी. खिल उठी थी. चहक उठी थी.

गुलशन खान आज अपनी बहु फराह खान के साथ किचन संभाले हुए थी. (बी मिस्टेक फराह को सराह लिखता रहा हों.. अब से फराह hi लिखा जाएगा).. गुलशन के पुराने सरे रंग वापिस से चेहरे पर बिखरे देख फराह भी खिल उठी थी. महीनो बाद वापिस से घर का रौनकें वापिस लौट कर आई थी.. वह भी किचन में पुराणी फराह बानी तेज़ी से हाथ चला और हिला रही थी.

गुलशन के होंटो पर मीठी मुस्कान थी. उस दिन की बाबू की बातें उसके अंदर गूँज रही थी. जिस दिन वह लॉन के झूले में उदास लेती हुई थी. ज़िन्दगी फीकी hi नहीं, कड़वी भी हो गई थी.

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बाबू --- मई सब ठीक कर दूंगा अम्मी जान. अपने बाबू पर भरोसा कीजिये!..




गुलशन खान -- अब कुछ ठीक नहीं होगा बाबू. अब से एक एक सांस घुट घुट लेनी होगी. जिस शोहर के सामने हमेशा सर उठा कर जीती आई हों. अब उसी के सामने सर झुका कर जीना होगा. और ऐसे जिया नहीं जाएगा मुझसे. मुझे लगता है बाबू. अब मैं और ज़यादा नहीं जी पाऊँगी.

बाबू तड़पता हुआ गुलशन खान को अपने गले से लगा गया.. गुलशन भी उससे लिपट गई थी.

बाबू -- नहीं अम्मी जान. आप मेरी जान हो. प्ल्ज़ ऐसा मत बोलिये. आप को दुःख में देख कर मई पल पल मर रहा हों. खुदा न करे आप को कुछ हो. फिर मैं ज़िंदा रह कर क्या करूँगा अम्मी जान



गुलशन खान रोटी हुई बोली -- बाबू!.. तुमने भी मरने की बातें शुरू कर दी



बाबू -- चलिए अब नहीं करते हम दोनों ऐसी बातें. बास आप अपने बाबू पर पहले के जैसे भरोसा को ज़िंदा कीजिये

गुलशन खान -- मुमकिन नहीं होगा बाबू. तुम्हारे पापा के नॉलेज में सब आ चूका है. अब तुम कुछ नहीं कर सकते. उन्हें समझाया नहीं जा सकता. मर्द हैं वह. पठान हैं वह. ये भी शुक्र है हम दोनों को तेरे पापा ने शूट नहीं कर दिए. वर्ण वह ऐसे hi पठान हैं.

बाबू -- सब बातें पुराणी हो गई अम्मी जान. कहा न. आप सब फिक्रें छोड़ दें. बस्स्स अपने बाबू पर भरोसा कीजिये

गुलशन खान -- खली भरोसे से क्या होगा बाबू. हालत का अपने कण्ट्रोल में आना भी ज़रूरी होता है. यहाँ तो मटर hi ऐसा है. कुछ भी मेरे तुम्हारे हाथ में अब नहीं रहा. और न hi कभी आएगा. हमारे हाथ hi नहीं रहे हैं बाबू.


बाबू -- मई मायूस नहीं हुआ हों अम्मी जान. आप कैसे मायूस हो सकती हैं अम्मी जान

गुलशन खान -- ऐसा है तो बाबू--

गुलशन खान ने दोनों हाथ बाबू के आगे जोड़ दिए -- मुझे अब इस के शिव किसी और बात की परवा नहीं रही बाबू.. मेरा वक़ार मुझे वापिस मिल जाए. मैं सर झुका कर, तुम्हारे पापा की नज़रों में गिर कर नहीं जी सकती. रोज़ उलटी सीढ़ी सोचें आने लगती हैं. किसी दिन मैं ख़ामोशी से ऑंखें बंद कर जाउंगी.



गुलशन और बाबू दोनों देर तक ऐसी hi बातें करते रहे थे.. बाबू गुलशन को भरोसे क़ायम रखने के लिए फ़्रोके करता रहा था.

गुलशन खान -- तुम ऐसा कर गए.. तब मई समझूंगी. तुम्हारे अनमोल प्यार ने मुझे फिरसे ज़िंदा कर दिए बाबू.. जी कदर जल्द हो सके सब सही कर डोज. सब पहले जैसा कर दो.

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गुलशन ख्यालों में बाबू को देखती मुस्कुराती हुई बोली -- तुमने अपना क़ौल सच कर दिखाया बाबू... ी लव यू बाबू.. तुम इतने प्यारे क्यों हो.. आज तुम्हे भी मैं सरप्राइज देने वाली हों. आज तुम्हारी फवौरीते फिरनी मैं खुद अपने हथुन से बना कर तुम्हे खिलाऊंगी.. बहुत वक़्त से तुमने फिरनी नहीं खाई है न. आज तेरी पायरी अम्मी जान अपने हथुन से अपने बाबू को फिरनी खिलाएगी.

फराह सब देखती जा रही थी. वह भी तोह बहुत खुश थी. एक बार के बाद बाबू के साथ उसे मज़े लूटने का मौका नहीं मिला था. वह बास इंतज़ार hi करती रह गई थी. फिर खुशहाली एक दम से रूठ गई. साडी रौनकें चली गई थी. लेकिन अब सब साड़ी रौनकें लौट रही थी.

फराह चमचा हिलती हुई अपने दिल में में बाबू की तस्वीर देख बोली

फराह -- अब तो फ्रंट बैक door(phuddi-gaand) तुम्हारे के लिए एकदम से बेचैन होने लगे हैं. जल्दी आ जाओ बाबू.. अब और देर मत करना. मेरे दोनों रास्तों से गुज़र कर मेरे दिल में समां जाओ.. वही तुम्हारा असली ठिकाना है.. मेरे दिल में सिवाए तुम्हारे कोई और नहीं है. नदीम भी नहीं. ये बात तुम से बेहतर और कोण जान सकता है. अम्मी जान तुम्हारी फवौरीते फिरनी बना रही हैं.. लेकिन मैं पूरी की पूरी तुम्हारी हों.. और हमेशा रहूंगी.. इससे बढ़कर तुम्हे देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है.. कुछ है तो मेरी साड़ी मोहब्बतें, साड़ी चाहतें, साड़ी शिद्दतें तुम्हारे लिए हैं.. मेरी साड़ी वफ़ाएं तक मई तुम्हारे नाम कर चुकी हों.

गुलशन और फराह दोनों किचन में खाना बनती हुई अपनी अपनी सोचें में मस्त बिजी रही.

बहार डिनर के वक़्त से पहले बैठे हशमत खान डिनर का वेट नहीं कर रहे थे. बास आज उनका दिल खुश था.. पुराणी साड़ी गार्ड उतर गई थी.

वह भी बाबू को याद करते जा रहे थे. बचपन का बाबू, बड़ा होता हुआ बाबू, जवान होता हुआ बाबू.. एक फिल्म की तरह उसकी आँखों में चल रहा था..

फिर एक सन याद आने पर हशमत खान के होंटो पर मुस्कान उभर आई.. किन्ज़ा के रिश्ते के लिए आये लड़कों वळून के चले जाने के बाद बाबू ने सब पर अपनी समझदारी और फॅमिली पुरे लव की कुछ ऐसी छाप छोड़ी थी. सब जहाँ दम बखुद रह गए थे. वहीँ बाबू के लिए ख़ुशी से पागल हो गए थे.

हशमत खान बाबू को गले से लगा कर बोलै था

सेन्टेन्सेस फॉर्म --- पेज 5

हशमत -- मुझे पता hi नहीं चला. मेरा फिरोज इतना बड़ा हो गया है. इतना बड़ा कह आज मुझे अपना क़द अपने बेटे से भी छोटा महसूस होने लगा है!!.




बाबू - न डैड.. प्ल्ज़ ऐसा मत बोलिये. आप के दम क़दम से मैं हों. आप की परछाई हों. मेरी रगों का आप को खून दौड़ रहा है. मेरी ऐसी सोचें आपकी तरबियत आप के बेपनाह प्यार की वजा हाँ.

हशमत ----- कुछ भी कहो. आज मेरा सीना फखर से चौड़ा कर दिया तुमने यार. सर ऊँचा कर दिए. बातों में मैंने ये भी जाना. papa(dada जान) के जैसे ग्रेट इंसान का बीटा होते हुए भी मई क्यों नहीं उनके जैसा बन पाया.




प्रेजेंट

हशमत खान आज पुराणी बातें याद करने लगा तो एक बार फिरसे उसका सीना फखर से फूलने लगा.

दिल में बोले -- आज मैं अपने पुराने कुछ महीनो के ऐटिटूड की माफ़ी मांग लूंगा. कुछ भी तो गलत नहीं किआ बाबू तुमने. मई गलत तुम्हे, गुलशन से मोह फेर गया था. मई गलत था बाबू.. तुम सही थे.. तुम्हारे प्यार को मैंने गलत समझा. तुम्हारा अनमोल प्यार कभी गलत हो hi नहीं सकता था. गलती कर बैठा था. लेकिन आज मैं अपनी गलती सुधारूंगा.. बास तुम जल्दी से मुझसे तन्हाई में मिलो..

हशमत खान अपनी कलाई पर बंधी वाच पर टाइम देखने लगे. अपनी hi माँ को छोड़ लेने के बाद उनकी सोचें बदल गई थी.. ऐसा न होआ होता तो कहाँ हशमत खान के अंदर ऐसी सोचें आणि वाली थी.

माहिरा खान आज खास एक मॉडर्न टाइप ड्रेस महीनो बाद पहन कर डाइनिंग टेबल पर आई और अपने पापा हशमत खान को सलाम करती अपनी चेयर पर बेथ गई

माहिरा खान भी बाबू को सोचे जा रही थी.

माहिरा खान दिल में -- नाना जान की डेथ की वजा से मैंने तुम्हे परेशां करना सही नहीं समझा था बाबू. मेरा दिल भी दुखी था और आज भी है नाना जान की डेथ पर. नाना जान के चले से एक खाला पैदा हो गया है. लेकिन बाबू तुम्हारा अनमोल प्यार हर खाला को पुर करने की सलाहियत रखता है. महीनो से मेरा दिल, मेरी रूह और मेरा जिस्म तुम्हारे अनमोल प्यार के लिए तरस रहा है. टूट रहा है, तड़प रहा है.. आओ कह मुझे खूब कस्सके अपनी आग़ोश में भर लो.. मेरी साड़ी पसलियां तोड़ डालो... कह आज कुछ ऐसा hi दिल छह रहा है.. आज मुझे कोई माफ़ी मत देना तुम बाबू.. आज मैं भी खुद को रोक नहीं पाउंगी.. आ जाओ बाबू. जल्दी से आ जाओ.. और किसी को भी टाइम न देकर सारा टाइम मुझे दो.. घर पर मौका न बन पड़े तो चलो कहीं चले चलते हैं.. किसी वीराने में.. किसी होटल में.. आह्हः आज सब कुछ कर डालो बाबू.. कसम से जिस्म बड़ा टूट रहा है. अंग अंग शोर मचा मचा कर अब तो मुझे पागल करने लगे हैं.. देखो आज महीनो बाद तुम्हारे लिए मैं कैसे तैयार होक आई हों.. पर तुम कहाँ हो.. देखो सब तुम्हारा वेट कर रहे हैं...

माहिरा खान वाल क्लॉक को देखने लगी..

दादा jaan(riyasat खान) और दादी jaan(rehana खान) दोनों डाइनिंग रूम में आये और एक साथ अपनी अपनी चेयर्स पर बेथ गए. रहना खान की नज़र वाल क्लॉक पर गयी.. जबसे बाबू से अकेले में आखरी मुलाक़ात हुई थी, फिरोज खान बाबू के आखरी वर्ड्स उसे झंझोड़ कर रख गए थे. उसके दिल में डर बेथ गया था, उससे कोई बहुत बड़ी गड़बड़ हो चुकी है. वर्ण आज से पहले कभी भी फिरोज खान ने उससे ऐसे अंदाज़ में बात करते हुए ऐसे वर्ड्स इस्तेमाल नहीं किये थे.

रियासत खान के साथ बैठी ऊपर से रिलैक्स ज़ाहिर करती अंदर से दर्री हुई थी. उसके दिल को सुकून नहीं था. जैसे जैसे सुई टिक टिक करती घूमती जा रही थी. उसके दिल की धड़कनो में बेतरतीबी बढ़ती जा रही थी.

फिर उसकी नज़रें डाइनिंग रूम के दरवाज़े की तरफ उठी. किन्ज़ा आती दिखाई दी.

किन्ज़ा भी आज नई ड्रेस पहने होंटो पर मुस्कान और गालों पर गाली बिखेरती सब को hello कहती अपनी चेयर के तरफ जाने लगी

हशमत खान -- बाबू नहीं आया अभी तक.. वह इतनी लेट तो नहीं होता.. आते हुए उसे भी लेती आती!.

किन्ज़ा एपीआई चेयर पर बेथ चुकी थी. अपने पापा को देख सब को देख, बाबू की खली चेयर को देख बोली -- बाबू?..... मई गई थी बाबू के कमरे में.. लेकिन वह अपने कमरे में नहीं मिला मुझे. मई समझी वह यहाँ आ चूका है.. लेकिन यहाँ भी नहीं है... क्या कहीं बहार किसी काम से गया हुआ है??.

किन्ज़ा नोर्मल्ली सब को देख आखरी वर्ड्स बोली थी

अब सब थोड़े से चौंके.. कुछ भी और किसी के मैं में नहीं आया था. लेकिन रहना खान के दिल की धड़कने कुछ ज़यादा hi शोर मचने लगी. वो समझ नहीं पा रही थी. क्यों आज उसका दिल बार बार उसके काबू से बहार होता जा रहा है..

दर्री हुई थी. और भी ज़यादा डर गई.. खुद पर काबू पति आम से लहजे में बोली

रहना खान -- बाथरूम में देखना था न.. हो सकता है वही हो.. जाओ फिरसे पता करके आओ

माहिरा खान उठती हुई बोली -- मई देखती हों. बाबू! आज लेट क्यों हो गया है??

हशमत खान खुश था. किसी गड़बड़ का अंदाज़ा नहीं हुआ उसे भी

हशमत खान -- हाँ!...... jaaaaaaoo...pata कर आओ.

गुलशन हथुन में बर्तन लिए आई और टेबल पर रख बोली -- जाओ देर न करो. आज बाबू के लिए मैंने कुछ खास बनाया है

हशमत खान के होंटो की स्माइल गहरी हो गई -- भई!.. आज हमारे लिए भी कुछ खास बनाया है हमारी बेगम साहिबा ने

और गुलशन मुस्कुरा कर बोली -- आज बास बाबू के लिए स्पेशल है. बाकि सब के लिए वही डेली वाला hi सब है..

हशमत है पड़ा.. फिर बाबू के लिए उसका असल प्यार उसकी आँखों में और आवाज़ में नज़र आने लगा -- कोई बात नहीं.. बाबू पहले.. हमारे लिए फिर कभी सही

माहिरा उठ कर जाने लगी

फराह जो किचन में थी... एक बर्तन उठाने जा रही थी.. पास hi रखा उसका ीफोने विबरते करने लगा

फराह ने ऐसे hi नज़र दौड़ाई.. सोचा बाद में देख लेगी.. फिर कुछ सोच कर ीफोने उठाया और लॉक खोल गई. जैसे hi उसकी नज़र आने वाले संस पर पड़ी..

अननोन नंबर था.... फर्स्ट लाइन पढ़ कर ीफोने वापिस रखने वाली थी.. आँखों के करीब करके देखने लगी

लिखा था



मैं इक दिन ज़रूर लौट के ाऊंगाआआआ........ बाबू

.

.

.

.

.

.

जो इन माय रूम एंड लुक अंडर पिलो!




पहले वह समझी किसी ने पोएट्री संस सेंड किआ है उसे.. लेकिन बाबू का नाम पढ़ कर दोस्त देखे तो स्क्रॉल करती एन्ड पर गई तो पढ़ का उसका दिल धक् से रह गया.

उधर माहिरा डाइनिंग रूम से अभी निकल hi रही थी.. फराह जो बाबू से सच्चा दिल की गहराइयों से प्यार करने लगी थी. उसे कुछ गलत होने एक अहसास हुआ

ीफोने हाथ में थामे किचन से बहार को भाग निकली --- बाहाबूउऊउउउ

और सब फराह के मोह से "बाअबूउ" सुनकर चौंकते हुए उसे भागते देख शॉकेड रह गए

और रहना खान के चेहरे का रंग उड़ गया.. फराह के बाबू कहने में दर्द, तड़प मोहब्बत क्लेअर्ल्य पहचान गई थी. चेयर पर बैठी रहना खान के हाथ पेअर फूलने लगे

फराह कुछ भी बोले बिना डाइनिंग रूम से निकली और तेज़ी के साथ भगति हुई सीढ़ियां चढ़ती फर्स्ट फ्लोर पर जाने लगी

बाकी क्यों पीछे रहते.. समझ गए कोई बड़ी गड़बड़ है. सब भी भाग पड़े. कुछ समझ नहीं सके थे. लेकिन बाबू के लिए सब hi कॉन्ससियस थे.

माहिरा फराह के बाद उसके पीछे भागी. पीछे किन्ज़ा भागी.. उसके पीछे गुलशन भागी.. उसकी तो जैसे सांस hi अटक गई थी.. उसी अटकी सांस के साथ भागती हुई बाबू के कमरे में जा घुसी

हशमत खान और बाबू का भाई नदीम खान, सब भागते हुए बाबू के कमरे में घुस गए.. रियासत खान तेज़ी से चलते हुए वह पोहचे थे

फराह ने झट पिलो उठाया और लेटर उठा कर पढ़ने लगी...

माहिरा और किन्ज़ा भी लेटर देख परेशां हो गई थी.

फिर फराह के सर के साथ सर जोड़ कर लेटर पढ़ने लगी. तीनो के रंग उड़ने लगे. ऑंखें फैलने लगी. आँखों से आंसू नहीं बहे.. गहरे शॉकेड से जैसे आंसू कहीं पीछे hi ब्लॉक हो गए थे.. कुछ देर पहले चेहरे जैसे चमक रहे थे. अब उतने hi मुर्दा होने लगे थे.

वही गुलशन के बदन ने ठंडा ठंडा पसीना छोड़ना शुरू कर दिए था. उसकी अटकी सांस अभी तक बहाल नहीं हो सकीय थी. वह गहरे शॉक और बेपनाह डर के साथ फराह और माहिरा और किन्ज़ा को देखती जा रही थी.

रहना खान भी डाइनिंग रूम में अपनी चेयर पर बैठी नहीं रह सकीय थी. मरे मरे क़दमों से वही आ पोहंची थी.. अंदर का माहौल देख, लेटर पढ़ती फराह, माहिरा और किन्ज़ा को देख दूर को एक हाथ से थाम कर रह गई.. गहरे शॉक से उसका रंग भी उड़ गया था. मोह खुल गया था. ऑंखें फेल गई थी.

दादा रियासत खान घम्बिर एक्सप्रेशन के साथ फराह माहिरा और किन्ज़ा को देखते जा रहे थे. वह समझ गए. कोई बहुत बड़ी गड़बड़ हो चुकी है.. कुछ देर पहले वह क्या सोच रहे थे.. अब कैसे सब कुछ बदल गया था

वही हशमत खान का भी रंग उदा हुआ था. उसके दिल ने फ़ौरन hi उसे बता दिए था. उसके पिछले कुछ महीनो के ऐटिटूड ने उसके घर की खुशियों को सारा का सारा छीन hi नहीं लिए है. उससे उसके बेटे को भी छीन लिए है.

नदीम कुछ पल खड़ा तीनो को लेटर में गम देखता रहा... फिर झपट कर लेटर अपने हाथ में थाम देखने लगा

पहली hi लाइन पढ़ने के बाद उसने दादा रियासत खान को देखा. वो पथरीले तासरात के साथ नदीम को देखने लगे

नदीम खान के अपने पापा हशमत खान फिर अपनी अम्मी जान गुलशन खान को देखा. जिसकी आँखों से आंसू फुल स्पीड से बहने शुरू हो गए थे

नदीम ऊँची आवाज़ में लेटर पढ़ने लगा. ता कह सब सुन लें

बाबू ने अपने दादा जान रियासत खान को मुखातिब करते हुए लेटर लिखा था

नदीम पढ़ रहा था -- प्यारे दादा जान.. जब आप ये लेटर पढ़ रहे होंगे.. मैं यहाँ से बहुत दूर जा चूका होंगे.. (गुलशन खान के सीने को जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिए था.. एक hi जुमला उसकी जान निकाल गया था) आप को और सब को परेशां करने के लिए, जुदाई का दुःख देने के लिए दिल की गहराइयों से माफ़ी चाहता हों. ये लेटर लिखते हुए मेरे हाथ कैंप रहे हैं.. आप सब से दूर जाने पर खुश तो मैं भी नहीं हों.. बहुत दर्द दिल में लेकर यहाँ से जा रहा हों.. लेकिन क्या करूँ दादा जान. बात hi ऐसी हुई, मुझे यहाँ से जाना पड़ा, और ये लेटर लिखना पड़ा..

(इन वर्ड्स पर गुलशन को कोई परवा नहीं हुई.. लेकिन हशमत खान और रहना खान को लगा, बाबू उनकी पोल खोलने वाला है.. दोनों के उड़े रंग और भी ज़यादा उड़ने लगे)

नदीम ने एक नज़र शॉकेड कड़ी अपनी बीवी फराह माहिरा और किन्ज़ा को देखा.. अपनी अम्मी जान, दादी जान, दादा जान और हशमत को देखा.. फिर आगे पढ़ने लगा

नदीम -- दादा जान.. कुछ महीनो से मुझे ऐसा लगने लगा था. मेरे अंदर कुछ खास ाबिलिटीज़ हैं. मैं वह कुछ कर सकता हों. जो शायद hi मेरी फॅमिली में कोई और कर सके. मैं खुद को डिस्कवर करना चाहता हों. अपने पैरों पर अपने दम से खड़ा होना चाहता हों.. आप सब का अनमोल प्यार मेरे पैरों की बेड़ियाँ बन जाता...... बता कर जाता, तो जाने नहीं दिए जाता... न hi मैं आप सब के अनमोल प्यार की बेड़ियों के साथ जा सकता था. इसलिए ज़िन्दगी में पहली बार गुस्ताख़ बनता हुआ चुप चाप बिना बताये घर से चला गाला. दादा जान आप ने मुझपर ऐतमाद का इज़हार hi नहीं किआ था. आप ने और सब ने मन था. मई आप के जैसा हों. आप के बेटों पोतों में सबसे अलग हों.. यहाँ रह कर मैं पूरी तरह से खुद को साबित नहीं कर सकता था दादा जान.. इसलिए दुन्या में घूम फिर कर खुद को साबित करने निकल पड़ा. दादा जान मैं एक दिन लौट कर ज़रूर आऊंगा. कब??... नहीं जनता!. लेकिन वडा करता हों, लौट कर ज़रूर आऊंगा..

हमारा प्यार अनमोल है. हम सब एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते.. आप सब चाहेंगे.. मई अभी के अभी लौट आऊं. तो ऐसा अब्ब पॉसिबल नहीं रहा.. क्यों कह मैं आप सब की पोहंच से बहुत दूर जा चूका हों.. जल्द से जल्द लौट आऊं??.. ऐसा अब सब की वजा से मुमकिन है.. मेरे लिए दुआ करें.. मई जल्द से जल्द खुद को डिस्कवर कर लून. वो बन जाऊं. जो मई बनना चाहता हों.. तब मई लौट आऊंगा. मेरी वापसी आप सब की दुआओं की क़ुबूलियत से मशरूत है.

सब के नंबर्स पर एक एक संस मेरी तरफ से जल्द मसल होगा.. वेट करियेगा.. बास इतना होई

आप का अपना फिरोज खान

फिरोज ने "बाबू" न लिख कर सब को चौंका भी दिए था. खली फिरोज खान लिखा था. जिस पर गुलशन को एक सदमा और पोहंचा था

लेटर एन्ड हुआ तो नदीम जिसकी ऑंखें नाम हो चुकी थी. वह लेटर वही छोड़ बहार को बहार को भाग निकला --- मेरे भाआई मैं तुझे खुद से दूर नहीं जाने दूंगा..

कोई और नदीम के पीछे नहीं भगा था. सबसे ज़यादा हालत बुरी गुलशन की थी. उसके चेहरे का रंग hi नहीं वाइट पद गया था. उसका बदन बर्फ की तरह ठंडा पड़ता जा रहा था. उसके होश गम होते जा रहे थे.

ऐसी hi हालत में गुलशन ने अपने शोहर हशमत को देखा.. और ज़िन्दगी में पहली बार हशमत खान का सर अपनी बीवी के आगे झुक गया.

दादा रियासत खान सबसे ज़यादा खुद में था. उसकी नज़र सब पर थी. लेटर में सब सिर्फ एक धोका है. बात कुछ और है. वह समझ गया था. उसे बाबू के लेटर लिखने के अंदाज़ और लफ़्ज़ों पर एक ख़ुशी भी मिली थी.. बाबू ने किसी को ब्लामे नहीं किआ था. सबसे दूर हो जाने की वजा hi अलग बता दी थी.

दिल में बोलै -- मई नहीं जनता बाबू!.. किस बिना पर तुमने ऐसा क़दम उठा लिया.. अब जब तुम ये क़दम उठा hi चुके हो तो जो लेटर में लिख कर गए हो. उसे सच कर के दिखाना.. यहाँ मई और सब तेरे लिए बहुत तड़पेंगे, रोयेंगे. तुम्हे इंतज़ार की आग में जलेंगे.

रियासत खान ये सब सोच भी रहा था. और एक एक को अपनी पठानी निगाह से देख भी रहा था. गुलशन खान का हशमत खान को देखना, और हशमत खान का शर्मिंदगी से सर झुक सर देख समझ गया. हशमत खान और गुलशन खान बाबू के जाने की वजा जानते हैं

फिर उसकी नज़र अपनी बीवी रहना खान पर पड़ी. और चौंका नहीं.. वहां कड़ी फराह माहिरा और किन्ज़ा को देखा और जांचा.. नदीम को सोचा

फिरसे गुलशन और अपनी बीवी को देखने लगा. हशमत खान पर निगाह डाली. उसी पल हशमत खान का झुका सर उठा. हशमत खान की निगाह अपने बाप की निगाह से मिली तो अपने बाप की आँखों में देख इस बार हशमत खान लरज़ उठा. उसे अपने बाप की जंचती निगाह का बखूबी पता था. हशमत खान गहरे दुःख और रंज में था.. लेकिन अपने बाप से निगाह मिलते hi उसका सर गुलशन के आगे जितना झुका था. उससे भी ज़यादा झुक गया. जल्दी से बाबू के कमरे से जाने लगा

रियासत खान भी वही नहीं रुका और कमरे से जाने लगा. कमरे के दूर को एक हाथ से थामे सदमे की हालत में कड़ी अपनी बीवी रहना खान को देखा. तभी बाबू के जाने के सदमे, अपनी गलती और पछतावे की आग में जलती रहना खान ने अपने शोहर को देखा.

और देखते hi घबरा गई... रियासत खान बास उसे घूरता hi रहा. बोलै कुछ नहीं.. और रहना खान को लगा, उसका शोहर कुछ बोल कर जितना ब्लामे करता, खामोश रह कर बढ़कर कह गया था

रियासत खान कमरे से निकला. फिर मुद कर बोलै -- माहिरा बेटी, लेटर को संभल लो. इसे खोने नहीं देने.. इसकी 2क्ष4 साइज की उतनी hi फ्लेक्सेन प्रिंट करवाओ.. जितने इस घर में कमरे हैं... हर कमरे में एक एक फ्लेक्स फ्रेम करवा कर लटकवाना तुम्हारे ज़िम्मे मैं लगता हों..

रहना खान के रहे सही रंग भी उड़ने लगे.. रियासत खान चले गए.. गुलशन भी मरे हुए क़दमों से वहां से जाने लगी

माहिरा, किन्ज़ा और फराह अपनी हालत को भूल गुलशन की हालत को देख भागी और उसे थाम गई. बाबू का दुःख उनकी भी जान ले गया था. लेकिन गुलशन की हालत सबसे बदतर थी.

गुलशन को थमा गया. तो अपने मुर्दा हो रहे एक हाथ से पकड़ को छुड़वा गई

माहिरा सिसक पड़ी -- अम्मी जान प्ल्ज़. खुद को सम्भालिये

गुलशन खान ने माहिरा खान को देखा. और माहिरा फराह और किन्ज़ा तीनो गुलशन की आँखों की वीरानी देख चीख पड़ी

तीनो एक साथ -- अम्म्मीईईई jaaaaaaaaaaaaaannn

लेकिन गुलशन होश में नहीं थी. वह ऐसे hi तीनो को खुद से अलग करती मरी चाल चलती कमरे से निकलने लगी

रहना खान गुलशन खान की हालत देख कर उसकी ऑर्डर लपकी थी.. लेकिन गुलशन खान ने किसी को करीब नहीं आने दिए

चलती हुई खुद से सीढ़ियां उतरने लगी. सब उसके आगे पीछे और साइड चल पड़ी

गुलशन डाइनिंग रूम में जा पोहंची.. सीढ़ी टेबल पर वहां जा झुकी. जहाँ बाबू के लिए बनाई फिरनी से भरा बर्तन ढाका पड़ा था.. गुलशन के हथुन पैरों से जान निकलती जा रही थी

फराह, किन्ज़ा और माहिरा जो बाबू के सदमे से रो नहीं सकीय थी. गुलशन की लाइव हालत देख कर रोने लगी.. आंसू बहने लगे

चीखने लगी.. रियासत खान और हशमत को बुलाने लगी.. वो भी भागते हुए आये. गुलशन की बिगड़ती मेन्टल हेल्थ देख सब डर गए..

गुलशन खान बेजान होते हाथ को बढ़ा कर फिरनी के बर्तन का ढक्कन उठाने लगी. लेकिन उससे उठाया नहीं गया.. सब रोनी लगी.. माहिरा ने जल्दी से खुद ढक्कन उठा कर साइड कर दिए

गुलशन ने माहिरा को नहीं देखा.. साइड रखे चमच को उठाने के लिए हाथ बढ़ा गई.. लेकिन हाथ वहां तक पोहच पाना भी मुश्किल होने लगा था. गुलशन टेबल पर झुकी एक हाथ टेबल पर रखे खुद को बैलेंस किये हुए थी. देखने वाले देख रहे थे. गुलशन के लिए खुद को संभल पाना मुश्किल से मुश्किल होता जा रहा है

किन्ज़ा चीखी -- अम्मम्मीईईई jaaaaaaaaaaaaaaaannnn.. एमी जान आप को क्या हो रहा है

फराह -- अम्मी जान का बदन बहुत ठंडा पड़ता जा रहा है

ये सुनकर रियासत और हशमत खान घबरा गए

रियासत ने हशमत खान को देखा. और बिना गुस्सा किये बोलै -- बीटा चला गया. क्या अब अपनी बीवी को यहीं मरते हुए देखने चाहते हो तुम.. एम्बुलेंस को कॉल करो

और हशमत खान होश में आता हुआ मोबाइल निकल कर बहार को भगा

गुलशन खान ने चमच उठा कर फिरनी के बर्तन में डाला और हिलने लगी..

सब रोने लगे.. सब समझ गए.. गुलशन फिरनी में चमच क्यों हिला रही है.. घर में कोई भी फिरनी का इतना बड़ा शैदाई नहीं था. जितना बाबू था

एक दो बार hi गुलशन फिरनी में चमच हिला सकीय थी.. फिर उसी फिरनी वाले बर्तन पर धप से गिर पड़ी.. उसका फेस गर्म फिरनी से लगने hi वाला था... माहिरा और फराह किन्ज़ा जो गुलशन को थामे हुए थी. पकड़ गई

लेकिन गुलशन होश खो चुकी थी. उसकी साँसे इन्तेहाई धीमी चलने लगी. बदन इन्तेहाई ठंडा पड़ने लगा..

सबकी चीखें निकल गई.. और रियासत खान ने एक नज़र अपनी बीवी रहना खान को देखा.. फिर बहार जाने लगा.. ज़ोर से बोलै था

रियासत खान -- हशमत khaaaaaaaaaannn.. देर करोगे तो बेटे के बाद बीवी से भी हाथ धो बैठोगे. मर रही है गुलशन बेटी.. उसकी साँसे थमती जा रही हैं.. अब एम्बुलेंस को भूल जाओ.. गाड़ी निकालो.. अभी के अभी गुलशन को सबसे करीबी हॉस्पिटल ले कर चलो.. मैं नदीम को फ़ोन करता हों.....

 




सेंतीसवीं क़िस्त

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मंज़र हॉस्पिटल के कॉरिडोर का था. एक साइड ऑपरेशन थिएटर था.. अंदर गुलशन खान ज़िन्दगी और मौत की जुंग लड़ रही थी. पूरी हॉस्पिटल टीम उन्हें बचानी की सर तोड़ कोशिश कर रही थी.

गुलशन अगले एक घंटे में न सम्भली तो ब्रेन हेमरेज का खतरा बन सकता था.. गुलशन बाबू के जाने का सदमा सहन नहीं कर पाई थी..

बहार सब को कंडीशन बता दी गई थी. और सब सुनकर लड़खड़ा कर गिर पड़े थे.. किन्ज़ा, माहिरा और फराह रोये जा रही थी.. हशमत खान की वहशत से पहेली हुई थी. उसे अंदाज़ा hi नहीं था.. हालत एकदम से ऐसे हो जाएंगे. पता होता तो खुद को पहले hi संभल जाता. पर अब तो सब हो चूका था..

नदीम भी वही पोहंच गया था. बाबू के जाने का सदमा काम नहीं था. अब गुलशन खान मौत की दहलीज़ की ऑर्डर बढ़ रही थी. बाबू को बताना भी ज़रूरी हो गया था. वो कहना चाहता था. देखो तुम्हारे जाने का सुनकर अम्मी जान कैसे मौत के करीब होती जा रही हैं. लौट आओ बाबू... अम्मी जान को बचा लो.. तुम hi हो. कोई और नहीं बचा सकता अम्मी जान को.. इस पल अम्मी जान को तुम्हारी सबसे ज़यादा ज़रूरत है..

कॉरिडोर के एक साइड से कुछ भागते क़दमों की आवाज़ सुनाई दी. सबने देखा तो आने वाले बाबू की फुफु विथ व्होले फॅमिली भगति हुई आ रही थी. बाकियों को भी कॉल करके बता दिए गया था

किन्ज़ा अपनी फुफु सुल्ताना खान को आते देख भागी और उससे लिपट कर फूट फूट कर रोटी हुई बोली

किन्ज़ा -- phuphu...(hichkiyon में रोटी हुई) फुफु अम्मी जान को बचा लें. वो मर रही हैं..

और सुल्ताना खान किन्ज़ा से लिपटी लरज़ उठी.. उसका रंग उड़ गया. फराह हिना से और सजल खान माहिरा से लिपट कर किन्ज़ा के वर्ड्स सुन गई थी. सुनकर दोनों के भी होश उड़ गए थे. तीनो चीख पड़ी. तीनो सब पूछने लगी..

और रट किन्ज़ा बोली --- फुफु!!.. बाबू चला गया.. हम सब को छोड़ कर चला गया..

और सुल्ताना जो गुलशन खान को मौत के मोह में सुनकर लरज़ उठी थी.. बाबू के जाने की बात सुनकर लड़खड़ा गई.. उसके पैरों में जान hi नहीं रही थी.. वही बेथ गई दीवार के साथ पीठ लगा कर

और किन्ज़ा भी उसके साथ बैठी रोटी हुई लेटर में लिखा सुल्ताना खान को सुनती चली गई.. फूफा ज़ुबैर खान और बीटा बिलाल खान भी सब सुनकर सन्नाटे में आ गए थे. इतना कुछ... वो भी इतनी अचानक से हो गया था..

रियासत खान एक साइड चुप खड़े सब को देख रहे थे.

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गुलशन खान बच गई थी. ब्रेन हेमरेज का खतरा ताल गया था. लेकिन वह ज़िंदा लाश बनकर रह गई थी. उसे रूम में शिफ्ट क्र दिए गया था.. वो न किसी को देख रही थी. न किसी को सुन रही थी. सब उसकी ऐसी हालत देख कर रोये जा रहे थे. गुलशन खान के मायके से भी सब आ गए थे.. नानी भी गुलशन की बीमारी और बाबू की अचानक रवानगी का सुनकर अपनी बीमारी भूल गई. वहां से भी सब गुलशन के पास आ गए थे..

लेकिन गुलशांन को जैसे अब किसी और की परवा hi नहीं रही थी.. लेटर सबने बरी बरी पढ़ा था घर जा कर...

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एक वीक गुलशन हॉस्पिटल रही.. वह न कुछ बोलती थी. न कोई रिस्पांस देती थी. बास खिलाये जाने पर मोह खोल देती थी.. उसकी ऑंखें वीरान हो गई थी.

गुलशन हाउस एक बार फिरसे कब्रिस्तान में तब्दील हो गया था.. गुलशन की फॅमिली कुछ दिन रह कर चली गई. हर कुछ दिनों में वो बार बार आने वाले थे.

बाबू को कई सारे एक साथ मिलकर तलाश कर रहे थे. लेकिन बाबू कहीं नहीं मिल रहा था. उसकी कोई इन्फो तक कहीं से नहीं मिल रही थी.

हशमत खान का सर जैसे हमेशा के लिए झुक गया था. अपनी माँ को छोड़ कर खुश हो गया था. लेकिन साडी ख़ुशी धरी की धरी रह गई थी. फिर से दोनों माँ बेटे एक नहीं हुए थे. दादी अब कैसे अपने बेटे हशमत खान के साथ ऐसा कुछ भी कर सकती थी. जिस पोते के लिए सब किआ था. वही चला गया था.

हशमत ने फिरसे ऐसी कोई बात नहीं सोची.. गुलशन से कई बार वह माफ़ी मांग चूका था. लेकिन गुलशन ने कोई रिस्पांस नहीं दिए था..

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फराह गुलशन के कमरे में गई. दूर को अंदर से लॉक करने लगी. बीएड के साथ टेक लगाए बैठी गुलशन ने खली खली नज़रों से उसे देखा.. फराह चलती हुई शूज उतर कर बीएड पर hi नहीं चढ़ी.. गुलशन की गॉड में बैठती हुई गुलशन के चेहरे को थाम गई.

एक रंग सा गुलशन के चेहरे पर पल भर के लिए उभरा.. फिरसे गुलशन पहले जैसी हो गई. फराह ने गुलशन के गाल पर अपने होंठ रखे और बाबू स्टाइल में ज़ोर की सांस खेंचने लगी..

गुलशन जो इतने दिनों से बेजान लाश बन जी रही थी. हिल गई.. उसकी आँखों में जैसे ज़िन्दगी लौटने लगी.

फराह बाबू के जैसे स्टाइल में मदहोशी भरे धीमे लहजे में बोली

फराह -- अम्मी जान!.. आप का बाबू आप के सामने है और आप बाबू की जुदाई में दिल को रोग लगा बैठी हैं..

फराह ने एक ज़ोर की सांस फिरसे खेंचि.. गुलशन के चिकने गाल की महक अपने अंदर उतरने लगी. फिर दूसरे गाल पर होंठ रख वैसे hi करने लगी.. आधा घंटा फराह ने ऐसे बार बार किआ.. जब फराह बीएड से उतरी और गुलशन को देखा तो गुलशन की आँखों में कुछ पुराने रंग अंगड़ाइयां लेते उसे दिखे

फराह जाती हुई बाबू स्टाइल में बोली -- अम्मी जान.. आप बाबू की जुदाई में ज़िंदा लाश बनकर जीना चाहती हैं. या फिर बाबू के अनमोल प्यार को फिरसे पाने के लिए खुद को ज़िंदा रख कर उसके इंतज़ार में जीना चाहती हैं..

फराह इतना बोल क्र कमरे का दरवाज़ा खोल कर चली गई. और गुलशन के अंदर धमाके होने लगे थे फराह की बात सुनकर.. उसकी ऑंखें फैलने लगी.. सांस तेज़ होने लगी.. चेहरे के मसल्स खींचने लगे

फिर गुलशन एकदम से इतनी दिनों बाद खुल कर रोटी हुई अपना सर घुटनो में देती हुई फूट फूट कर रोने लगी

गुलशन -- क्यों चले गए तुम मुझसे इतनी दूर... बाबू!.... तुम ऐसे ज़ालिम तो नहीं थे.. अपनी अम्मी जान को ज़िंदा दर्गोर क्यों कर गए.. क्या नहीं जानते थे तुम.. तुम्हारे बिना एक भी सांस लेना मेरे लिए दो भर है.. फिर क्यों किया तुमने ऐसे.. क्यों गए तुम मुझसे दूर..

गुलशन ज़ोर से रोइ तो सब उसका रोना सुनकर ख़ुशी से भागे और उसके कमरे में आ गए.. फराह की ऑंखें भी नाम हो गई थी.. जैसा उसने सोचा था. वही हुआ था. गुलशन को वापिस से ज़िन्दगी की तरफ लाने में वह कामयाब हो गई थी..

किन्ज़ा माहिरा दोनों अपनी अम्मी जान से लिपट कर फूट फूट कर रोने लगी...

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हशमत खान को खबर मिली तो वह भी ख़ुशी से झूम उठा.. नदीम को बताया तो वो भी ख़ुशी से चिल्ला उठा था. दोनों घर आये और गुलशन को सही हालत में देख कर खिल उठे.. लेकिन हशमत खान के होश एक बात सोच कर उड़ गए. अब गुलशन उससे ज़रूर कुछ कहेगी..

और रात गुलशन हशमत खान से बोल पड़ी -- मेरे और मेरे बेटे के बीच कुछ नहीं हुआ था हशमत खान.

पहली बार गुलशन के मोह से अपना नाम सुनकर हशमत खान के होश उड़ गए

गुलशन -- आज तक मेरे हाथ पेअर और चेहरे के शिव बाबू ने जिस्म का कोई हिस्सा बेलिबास नहीं देखा था. बाबू नहीं, मई hi उसके लिए खुद को संभल नहीं पाई थी.. न बाबू ने मेरे जिस्म के वह हिस्से देखे, जो एक शोहर hi बीवी के देख सकता है. न hi मैंने बाबू का कुछ ऐसा देखा तो बरसों से आप का देखती ा रही हों.. बिना कुछ देखे, दिखाए, थोड़े से बहकने पर, ऊपर ऊपर से hi केले का रस निकला और पता नहीं कैसे केले का रास बहता हुए वहां जा पोहंचा.. जहाँ पोहचने के बाद एक नयी ज़िन्दगी साँसे लेना शुरू कर देती है.

हशमत खान गुलशन खान के मोह से ऐसी hi किसी बात का सोच कर बहुत दिनों से डर रहा था. अब गुलशन खुल कर बोलने लगी थी. कई बार माफ़ी मांग चूका था. लेकिन अब गुलशन बोली तो वह फिरसे माफ़ी मांगना भूल गया

गुलशन ने हशमत खान की आँखों में देखा और बोली -- हशमत खान मुझे डाइवोर्स चाहिए!. अब अगर मेरा बाबू लौट कर आया तो मैं खुल कर आप की आँखों के साँमे उसके साथ सब कुछ खुल कर करुँगी.. शर्म वाली गुलशन अपने शोहर की नज़रों के सामने पूरी नंगी होती हुई बेशरम और बगैरत तो बन hi चुकी है.. किसी और बात से अब कैसा दररना.. डाइवोर्स या फिर पिस्तौल की एक गोली... फैसला अभी के अभी होगा..

और गुलशन खान तन कर हशमत खान के सामने कड़ी हो गयी.. गुलशन की आँखों में इरादे की पुख्तगी और दीवानगी देख कर हशमत खान जैसा पठान लरज़ कर रह गया. पसीने पसीने चेहरे और फटी फटी आँखों के साथ गुलशन खान को देखने लगा..

पठान तो गुलशन खान भी थी. पठानी खून उसकी रगों में भी दौड़ रहा था. और पहली बार हशमत खान अपनी बीवी गुलशन एक सिरफिरी दीवानी पठान बनते देख बुरी तरह से नर्वस होने लगा...

 
अड़तीसवीं क़िस्त

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हशमत खान को अंदाज़ा भी नहीं था, गुलशन ऐसा भी बोल सकती है. ये भी अंदाज़ा नहीं था, ऐसे दिन भी उसे देखने पद जाएंगे. पहले अपनी बीवी और बेटे के मिलान का पता चला. फिर अपनी hi अम्मी के साथ फिजिकल होने का मौका मिलना. बाबू जैसे अनमोल प्यार करने वाले बेटे पर उसे गुस्सा आएगा. बेगानगी का अहसास दिल में जनम लेगा. फिर वही बीटा उसे छोड़ कर चला जायेगा. उसकी अपनी बीवी उससे डाइवोर्स की बात करेगी. उसे खुद से शूट करने के लिए बोलेगी. ये कहेगी, अब के बाबू लौट कर आया तो खुलम खुला बेटे के साथ हमबिस्तरी करेगी.

हशमत खान खुद को पहाड़ समझता था. लेकिन गुलशन की बात ने पहाड़ को लरज़ने शुरू कर दिए. ज़लज़लों की ज़िद पर आया हशमत खान के चेहरे का रंग उड़ने लगा

गुलशन ने उसे घोर से देखा. फिर घूमी और दीवार पर बाबू लेटर की प्रिंटेड फ्लेक्स के सामने जा कड़ी हुई.

गुलशन -- बाबू कह कर गया है.. मैं एक दिन लौट कर आऊंगा.. ज़रूर आऊंगा!.. हशमत खान आज तुम्हारे पास मौका है. मुझे जान से मार दो. नहीं तो फिर आप को वो सब कुछ देखना पड़ेगा. जो एक पठान कभी नहीं देख सकता. पठान??... कभी आप पठान हुआ करते थे.. मेरी प्रेगनंग्य की वजा बाबू, जान कर भी आप ने मुझे और मेरे बेटे बाबू को गोलियों से नहीं भून डाला. मतलब आप के अंदर का पठान दम तोड़ चूका है.. लेकिन मेरा "बाबू" खुद को असली पठान साबित करते हुए मुझे अपनी अम्मी जान को छोड़ कर चला गया.. साडी गलती मेरी थी. एक बार की गलती के बाद मैं गलती पर गलती करती चली गयी. और वह मुझपर एक भी इलज़ाम न धरती हुए चुप चाप चला गया.. कितना अज़ीम है मेरा बाबू.. बाबू ज़रूर एक दिन लौट कर आएगा. और तब मैं हर बात की परवा भूल कर बास उसी की होना चाहूंगी... जानती हों, वो लौट कर आएगा तो पठान बनकर लौटेगा... पुराण कुछ भी करने की नहीं सोचेगा. लेकिन मई भी पठान हों हशमत खान.. पठानी खून मेरी रगों में भी दौड़ रहा है.. अब मेरी मंज़िल सिर्फ बाबू को पाना है.. और एक बात हशमत खान!.. मुझे आप से भी कभी मोहब्बत नहीं हुई. एक वफादार बीवी बनकर हमेशा आप से वफ़ा करती रही. लेकिन बाबू से मैं दिल की तुमर तर गहराइयों के साथ मोहब्बत करने लगी हों..

गुलशन की नज़रें प्रिंटेड लेटर पर थी. लेटर पर कई बार पहले भी उसकी नज़रें पद चुकी थी. लेकिन तब लेटर देख सदमे की शिद्दत में बेपनाह इज़ाफ़ा हो जाया करता था. इस बार की बात अलग थी.

गुलशन खान लेटर को देखती, एक लम्बी सांस लेती हुई मुद कर हशमत खान को देखने लगी. हशमत खान पर नज़र पड़ते hi उसका मोह खुला, लड़खड़ा जाती. लेकिन फिर गुलशन खान ने खुद पर काबू प् लिए. और हशमत खान को देखती उसके करीब जा कड़ी हुई

हशमत खान की आँखों से आंसू बहे जा रहे थे. वो पूरी तरह से टूट चूका था

गुलशन खान -- कहा था न मैंने.. आप के अंदर का पठान दम तोड़ चूका है. पठान चेतन हुआ करते हैं. और चाटने रोया नहीं करती.

हशमत खान ने आंसू बहती आँखों से गुलशन खान को देखा. और गुलशन खान एक नज़र उसपर दाल कमरे से निकल गई. वो बाबू के कमरे में आज की रात सोना चाहती थी.

टूट चुके हशमत खान को कुछ दिन पहले बाबू की ऑर्डर से मिले संस की लाइन्स याद आने लगी

बाबू -- हॉस्पिटल लॉन के बेंच पर बेथ आप ने कहा था. आप को मेरे दुःख का पूरा पूरा अहसास है. तब मुझे अंदाज़ा नहीं हो पाया था. मेरे दुःख की हद कितनी है. लेकिन फिर मैंने खुद को अंदर से टटोला तो अंदाज़ा हुआ. जैसे हालातों से मैं गुज़र रहा हों. उनकी वजा से मिलने वाला दर्द तो कुछ भी नहीं है.. असल दर्द तो मेरा बहैसियत होना है.. 20 साल का होने वाला हों. और आज तक किसी के टुकड़ों पर पल रहा हों.. तब मेरे अंदर दर्द की एक लहार उठी.. और ये दर्द हर दर्द से बढ़ कर था.. और इस दर्द का इलाज करने के लिए ज़रूरी था.. मई खुद के दम पर अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊं.. बास फिर मैं निकल पड़ा.. आज तक जितना भी आप ने मुझपर खर्च किआ है. एक एक पाई का हिसाब कर के रखियेगा..

मैं सब लौटा दूंगा... वह भी सूद समेत..

हशमत खान तो उसी दिन टूट गया था.. आज गुलशन खान की बातें सुनकर आखरी हिचकियाँ ले रहा अंदर का पठान अपनी हिचकियाँ पूरी करते हुए मर गया था.

हशमत खान नाम आँखों से वही खड़े बाबू के लेटर को देखने लगा.. कुछ और तो सही से दिखाई नहीं दिए. ऑंखें आंसुओं से धुंदलाई जा रही थी. लेकिन एक जुमला दूर से भी उसे क्लेअर्ल्य दिखाई दे रहा था.. जिसे हाईलाइट करके लिखा गया था.

मैं एक दिन लौट के AAUNGA.....ZARUR ाऔँगा..!!.

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माहिरा खान और किन्ज़ा दोनों के अंदर की हर ख़ुशी बाबू के जाने से मर चुकी थी. 24 हरष सीरियस रहने लगी थी. सुल्ताना फुफु रोज़ कई कई घंटे इधर hi बिताया करती थी. सब भी बार बार चक्कर लगते रहते थे. खुद भी बाबू के जाने से दुखी थे. लेकिन बाबू फॅमिली से बढ़कर दुखी कोई और कैसे हो सकता था.

रात 11 बजे का टाइम था. माहिरा के कमरे के दरवाज़ा बिना नॉक किये hi खुला और फराह अंदर दखल होती हुई दूर को अंदर से लॉक कर गई. माहिरा बीएड पर चित लेती छत्त को तकती जा रही थी.. दूर खुलने फिर बंद होने और लॉक होने पर भी वह धयान नहीं दे सकीय थी.

फराह ने माहिरा की ऐसी हालत देखि तो उसका दिल रोने लगा. वो माहिरा के पास बीएड पर जा पोहंची. और उसके बराबर लेट टी हुई सिस्का पड़ी

माहिरा चौंकी और फराह को देख दूर को देखने लगी

माहिरा - भाभी आप कब आई

फराह -- आई hi कब हों.. मई भी तो तुम्हारी तरह न यहाँ हों. न hi कहीं और हों.

फराह की आवाज़ में दर्द और कसक माहिरा के जैसी थी. माहिरा का दिल रोने लगा. आँखों में बाबू के लिए आंसू आ गए.

फराह से लिपट कर रो पड़ी -- भाभी बाबू ने ऐसा क्यों किआ. क्यों हम से दूर चला गया.. क्यों इतना दर्द दे गया..

भाभी -- बाबू गया है तो लौट कर भी आएगा

माहिरा सिसकती हुई -- पता नहीं कब आएगा

भाभी -- अभी!

रोटी माहिरा हैरान होती फराह को देखने लगी

और फराह माहिरा को सीढ़ी करती उसके ऊपर आई और उसके गाल पर बाबू स्टाइल में होंठ लम्बी सांस खेंचने लगी

और माहिरा फराह में बाबू स्टाइल प् कर शॉकेड रह गई.. और फराह बाबू के जैसे धीमे मदहोशी भरे लहजे में बोली

फराह -- मई दिल में हों. फिर ये रोना कैसा.... क्या मैंने वडा नहीं किआ है. मई एक दिन ज़रूर लौट के आऊंगा.. ज़रूर आऊंगा.. जितना आप मुझसे प्यार करती हो माहिरा एपीआई. उतना hi प्यार मैं भी तो आप से करता हों. क्या मेरा अनमोल प्यार आप को इतनी ताकत भी नहीं दे सकता. थोड़े से दिनों की जुदाई भी आप बर्दाश्त नहीं कर सकती. क्या ऐसे hi आप टूट जाओगी... ऐसा है तो फिर जब मई लौट कर आऊंगा तो आप को सब को टूटा हुआ देख कर वापिस लौट जाऊँगा.

फराह के लफ़्ज़ों ने माहिरा के अंदर धमाके करने शुरू कर दिए.. माहिरा की ऑंखें पहले हैरत फैलने, फिर गिलटी से फैलने झुकने लगी..

फराह अपनी काम करती रही.. माहिरा के गालों पर बार बार होंठ रखती हुई माथे पर माथा रख बोल पड़ी

फराह -- माहिरा एपीआई.. आप दुखी हैं.. मेरे जाने से सब hi दुखी हैं. मैं भी तो सब के बिना दुखी हों.. उधर आप खुश रहेंगी. जहाँ मई हों. वहां मई सुखी रहूँगा. भूल गई हो आप.. मई अपने पैरों पर खुद के दम पर खड़ा होने गया हों. क्या ये बात है. क्या आप अपने बाबू को पापा के सहारे पैरों पर खड़ा होते देखना चाहती हैं. क्या बाबू को आप क़ाबिल नहीं समझती हाँ. वो खुद को साबित कर दिखाए.

और माहिरा रोटी सिसकती हुई बोली -- मुझे मेरे बाबू पर खुद से भी बढ़कर भरोसा और यकीन है. वो ज़रूर अपने दम पर कामयाब होने की अहलियत रखता है. मेरे बाबू जैसा कोई नहीं है.

फराह -- तब क्या मेरे लौट कर आने तक आप सिसक सिसक कर जियेंगी. मेरे आने तक आप का चेहरा कुमला जाएगा. क्या देख कर मुझे दुःख नहीं होगा. मई चाहता हों. जब मई लौट कर आऊं तो मुझे आप के चेहरे की पुराणी चमक और रौनक पुराणी अब ो ताब के साथ चाहिए..

और माहिरा को फराह ने ऐसी hi बातों के ज़रिये दहला कर रख दिए. माहिरा वापिस लौटने लगी.

माहिरा फराह को बाबू समझ कर बाबू से वेड करने लगी

और फराह ख़ुशी से रोने लगी. बाबू के जैसी तासीर नहीं थी उसके एक्सपेरिमेंट और लफ़्ज़ों में. लेकिन काम बन गया था. दोनों रोने लगी. दोनों लिपट पड़ी

फिर फराह बोली -- तुम भी शर्म वाली हो माहिरा और मई भी.. दिल के दर्द को काम करने के लिए कभी कभी अंदर की आग को निकलना पड़ता है. लेकिन नदीम बाबू के ग़म में रहने की वजा से मेरे करीब आना भूल गया है. चलो आज से हम एक नया रिश्ता बनती हैं..

माहिरा कुछ समझती. फराह उठी और माहिरा के सामने थोड़ी सी शर्म ज़ाहिर करती नंगी होने लगी.

और लेती माहिरा पहली बार फराह को अपने सामने बेलिबास होते देख सुरप्रीसेड हुई उठ बैठी. उसका मोह और ऑंखें पूरी खुल गए थे.

फराह नंगी हुई और माहिरा के कपडे पकड़ गई. माहिरा शर्म से दोहरी होने लगी. फराह के जिस्म को तिरछी निगाह से देखने लगी. माहिरा को बाबू के साथ बिताये सारे लम्हे याद आने लगे. लास्ट का तो बाबू ने इन्तहा कर डाली थी. उसके मुम्मे भी चूमे छाते और चूसे थे. उसके पुरे जिस्म और फुद्दी तक को चुम चाट और चुअस कर उसे ज़माने भर की ख़ुशी दे डाली थी

फराह उसे भी बेलिबास करने लगी. माहिरा के अंदर शर्म काम थी. वो पहले hi लेस्बियन थी. लेकिन फराह के साथ उसे बड़ी शर्म आने लगी. उसके गाल गुलाबी होने लगे

लेकिन उसका अपना भी दिल चाहने लगा था. क्यों??.. इसलिए कह कुछ देर फराह बाबू बन उसके सामने थी. और माहिरा को फराह के रूप में बाबू नज़र आने लगा

उसका जिस्म फिरसे टूटने लगा. बाबू के साथ महीनो कुछ नहीं कर पाई थी. लास्ट जिस दिन बाबू गया था. कितना दिल था उसका.. बाबू उसे अपनी आग़ोश में लेके उसकी साड़ी पसलियां तोड़ दे. लेकिन सब कुछ बाबू के चले जाने से धरा का धरा रह गया था..

अब फिरसे उसका बदन टूटने लगा. एकदम से उसका दिल फराह से लिपट जाने को चाहा. और वो फराह को बाबू समझ कर उससे लिपट गई. मुम्मों से मुम्मे टकराये..

और फराह ने भी अपनी नंगी गोरी बाहें माहिरा के गिर्द कस दीं... दोनों एक दूसरे की आँखों में देख एक दूसरी को कस्सणे लगी..

फराह -- बाबू एक दिन ज़रूर लौट के आएगा..

माहिरा -- हाँ भाभी!!.. हमारा बाबू एक दिन ज़रूर लौट के आएगा..

और फराह ने अपने होंठ माहिरा के होंठ के करीब करने शुरू कर दिए. माहिरा के होंठ फड़फड़ने लगे. खुद से hi उसके होंठ भी फराह के होंटो से चिपकने के लिए बेताब होने लगे.
 
उन्तालीसवीं क़िस्त

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फराह और माहिरा का लेस्बियन सेक्स खूब चला. फराह को तो मज़ा इसलिए ज़यादा आया. ये उसकी लाइफ का फर्स्ट चांस था. माहिरा को फराह से भी ज़यादा मज़ा इसलिए मिला. फराह के एक एक लम्स में वह बाबू को फील कर रही थी. दोनी माहिरा झड़ी तो उसके दिल में बाबू के लिए फुद्दी रास के ज़रिये बहता हुआ उसे सुकून दे गया. फराह भी खिल उठी थी. बाबू की जुदाई का दर्द तो जाने वाला नहीं था. लेकिन उसे उसकी मेहनत का फल मिल गया था. फराह की ऑंखें बार बार भीगती जा रही थी.

फराह दिल में -- तुम होते तो देखते बाबू.. तुम्हारी मोहब्बत में मैं बेशरम hi नहीं बन गई हों. तुम्हारे जुदाई में तड़प रहे दिलों के दर्द को भी काम कर डाला है.. मई और सब तड़पेंगे तुम्हारे इंतज़ार की आग में. लेकिन मेरे होते हुए मई किसी को कुछ होने नहीं दूंगा. साड़ी रौनकें तो तुम्हारे दम से hi लौट सकती हैं. लेकिन महुअल पर तारी सौगवारी मैं ख़तम करके रहूंगी.

उसी रात फराह किन्ज़ा के पास गई. उसके साथ छेड़ छड़ मस्ती बाबू स्टाइल में उसके गालों को चूमना, लम्बी साँसे लेना सब करती हुई किन्ज़ा को सुरप्रीसेड कर गई. और किन्ज़ा को बाबू की पूरी पूरी झलक फराह में दिखाई देने लगी. किन्ज़ा के साथ भी फराह ने लेस्बियन सेक्स करने की कोशिश की थी. लेकिन किन्ज़ा नहीं मणि. और बिना कपडे उतरे थोड़ी सी मस्ती ज़रूर वह फरह के साथ कर गई. इतने से hi किन्ज़ा के दर्द में खासी कमी आ गई थी.. बाबू के लिए वह खुद को न सिर्फ ज़िंदा रखेंगी. उसके इंतज़ार में जलेंगी तो ज़रूर. लेकिन अपनी सेहत का पूरा पूरा धयान रखेंगी.

किन्ज़ा पढाई में पूरी तरह से बिजी हो गई. अब जब उसका दिल बाबू के लिए उदास होता तो फराह उसकी उदासी बाबू स्टाइल में दूर कर दिए करती.

ऐसे hi दिन गुज़रते हुए महीनो में बदल गए.. तीसरे महीने फराह तब वोमिटिंग करने लगी. जब सब ड्राइंग रूम में बैठे बातें किये जा रहे थे. सुल्ताना फुफु भी वही थी.. फराह को उल्टियां करते देख सब के चेहरे जैसे खिल उठे.. फराह भाग कर बाथरूम में चली गई थी. और सब उसके पीछे भागे थे.

छोटा बाबू या बाबी आने वाला था. ये जान सब चेहरे खिल उठे. फराह शर्म से सुर्ख पड़ते चेहरे को झुकाये मुस्कराये जा रही थी. ख़ुशी से उसकी आँखों में नमी भी आने लागि

गुलशन ने फराह को गले से लगा कर चुम लिए था. गुलशन सिसकती हुई बोली

गुलशन -- बाबू के जाने के बाद आज बहुत बड़ी ख़ुशी सुनाई है तुमने फराह बेटी..

दादी रहना खान जो पल पल कर मरती रही थी. ये न्यूज़ जान कर उसके चेहरे पर भी रौनक आ गई. सुल्ताना फुफु ने फ़ौरन hi अपनी बेटियों को ये खबर सुनाई दी.

नदीम घर से बहार था. उसे खबर दी गई. वो सुनकर ख़ुशी से पागल हो उठा.. और घर के लिए भाग निकला..

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गुलशन रात अपने कमरे में बीएड पर बैठी फराह की प्रेगनेंसी को सोच कर खुश हुई जा रही थी. उसके चेहरे पर मिलने वाली ख़ुशी की चमक पूरी अब ो ताब के साथ मौजूद थी.

देर तक वह ऐसी चमक के साथ बैठी फराह के बच्चे को सोचे जा रही थी. अचानक के उसके चेहरे के रंग उड़ने लगे.

उसे अपनी प्रेगनेंसी और बाबू के साथ की बातें याद आने लगी. उसके प्रेग्नेंट होने के बाद हालत hi बदल कर रह गए थे. नौबत यहाँ तक आ पोहंची थी. बाबू को घर छोड़ कर निकलना पड़ा. अपने मोह से निकले एक एक वर्ड उसे याद आने लगे. अंदर तक हिल गई. उसे अपनी कही वह बात भी याद आई. जब उसने कहा था. बाबू कभी कभी तुम्हारी ऑंखें तुम्हारे लफ़्ज़ों की चुगली खाती लगती हैं..

गुलशन सिसक पड़ी -- शक पद hi गया तो मैं इतनी बड़ी गलती कैसे कर गई मैं.. अपने चाँद जैसे बेटे को चोट पर चोट देती रही. वो है कर टालता रहा. अपने दिल पर ज़ख़्म पर ज़ख़्म खता रहा.. मुझे माफ़ कर देना बाबू.. मैंने तुम्हारा दिल दुखाया. अपनी घर के लिए तुम्हे सब रोक देने के लिए भी मई बोल गई.. ये बोल गई. अब और नहीं. अब बास. मेरे साथ या अपनी बहनो के साथ फराह के साथ कभी कच ऐसा वैसा मत करना.. आह्हः मई तीर पर तीर तुम्हारे दिल में उतरती रही. और तुम चुप चाप सहते रहे..

देर तक सिसकती आंसू बहती रही.. फिर कुछ याद आने पर चुआनकी.. और मोबाइल उठा कर डेट देखने लगी.. तभी उसके चेहरे के रंग उड़ने लगे..

गुलशन -- नहीं... ये नहीं हो सकता.. मई ऐसा नहीं होने दूंगा.... ओह्ह.. मैं मेरे बेटे के एक बच्चे को ज़रूर जनम दूंगी... मेरी फर्टिलिटी मैं खोने नहीं दूंगी.. बाबू के आने तक मैं खुद पर पूरा पूरा धयान दूंगी. अपना ट्रीटमेंट दूंगी.. आठ फिरसे एक गलती.. कितने दिन हो गए.. मुझे डेट नहीं आई.. कहीं मेरी फर्टिलिटी का एन्ड तो नहीं होने वाला.. नहीं नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए. कुछ साल और.. बाबू के लिए. उसके बेटे के लिए

गुलशन के अंदर एनर्जी दौड़ गई थी. वह एक नंबर डायल करने लगी.. और अपनी पहचान की डॉक्टर से फ़ोन पर बात करने लगी.. गुलशन के इरादे अटल थे. वह हर सूरत अपनी फर्टिलिटी को बाबू के आने के बाद तक भी 2 3 साल तक बहाल रखना चाहती थी...

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वक़्त के साथ साथ फराह का पेट फूलने लगा. और घर भर में मेला लगा रहने लगा. फराह के मायके से आये दिन कोई न कोई आने लगता.. फराह की माँ और बहने, सुल्ताना फुफु उसकी बेटियां सब की सब फराह और उसके बच्चे के लिए रेगुलर आ रही थी.

अब सब का फुल फोकस बाबू को याद करने के साथ साथ फराह और नदीम के बच्चे के लिए था.. रियासत खान और हशमत खान नदीम खान तीनो भी फराह के बच्चे के मामले में लापरवाही नहीं कर सकते थे.

नदीम भी खुश था. वो फराह का पूरा पूरा धयान रख रहा था. वो चाहता था. बाबू जब आये तो अपने भतीजे को देख कर खिल उठे..

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बाबू को गए 4 महीने बीत चुके थे. फराह ने एक चाँद से बेटे को जनम दिया था.. उसे छोटे बाबू का नाम दिए गया.. सब चाहते थे. बाबू राब्ता करे और अपने भतीजे का नाम रखे.. लेकिन बाबू ने कोई राब्ता नहीं किआ..

सब सोचने लगे, बाबू के भतीजे का नाम क्या रखा जाए.. "छोटा बाबू" तो उसे सब कहने लगे थे. लेकिन आइडेंटिटी के लिए सरकारी रिकॉर्ड के लिए नाम चाहिए थे. और बाबू के बिना कोई रखना नहीं चाहता था.

आखिर महीने बाद नाम का चुनाव फराह पर डाल दी गया. बाबू के जाने के बाद उसी ने सब को बाबू के ग़म को काम किआ था. बाबू के लिए सेहतमंद रहना सिखाया था..

फराह ने अपने बेटे का नाम फरज़ान खान रखा गया.. जिसके मैनिंग्स थे. स्मार्ट, इंटेलीजेंट..

सब को ये नाम बहुत पसंद आया.. अब बाबू के लिए इंतज़ार की शिद्दत में इज़ाफ़ा हो गया था.. कहीं से भी बाबू के न मिलने पर दुःख की लहार हर दिल में दौड़ जाया करती थी. लेकिन सब को यकीन था. बाबू कहाँ कहीं भी है.. फिट फात है..

फराह ने एक दिन कहा था -- मेरा दिल कहता है. बाबू जहाँ कहीं भी है.. उसे हमारी पल पल की खबर है. और "अपने" फरज़ान के बारे में भी वो सब जनता है.

फराह ने अपने बेटे को बाबू के लिए "अपने" कहने के बाद सब को बरी बरी देखा था. और फराह के ऐसा कहने पर हर चेहरा खिल उठा था.

नदीम फराह के हथु से फरज़ान को गॉड में लिए चूमता हुआ बोलै -- हाँ!.. फरज़ान बाबू का बीटा है. मेरा बाद में है.. पहले बाबू का बीटा है.

और फराह की ऑंखें चमक उठी थी.. सब के चेहरे और भी ज़यादा खिल उठे थे.

गुलशन अपना ट्रीटमेंट रेगुलर करवा रही थी. पठान थी.. और पठानी औरतों की फर्टिलिटी जाते जाते भी कई साल ले जाया करती है. गुलशन खान को यकीन था.. अगले 5 7 साल तक वह माँ बनने की सलाहियत से मालामाल रहेगी..

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मई फिरोज खान उर्फ़ बाबू अपनी आप बीती की तरफ लौट आया हों.. मुझे घर से निकले 14 महीने बीत चुके थे. 3 महीने कराची में रहने के बाद गर्दिश इ हालत मुझे तुर्किये ले गई थी.

कुछ महीनो में hi मैं तुर्किश लैंग्वेज पूरी तरह से समझने और बोलने लगा था. डेली शराब और सिगरेट्स पर सिगरेट्स मेरी रूटीन में शामिल हो चुके थे.

मई अपने एक दोस्त माइकल के साथ बहरी जहाज़ पर था. रेलिंग के पास खड़ा समंदर का नज़ारा करता हुआ मैं सिगरेटर के कॅश लगा रहा था. माइकल मेरे पास hi खड़ा मुझसे बातें कर रहा था.

माइकल -- फिरोज!.. हज़ल बहुत अच्छी लड़की है. तुम उसे अपना क्यों नहीं लेते

मैंने माइकल को घूरा.. वह बिना मुझसे दर्रे अपनी बात जारी रखते हुए बोलै

माइकल -- पागल हो चुकी है वह तुम्हारे प्यार में. मर जाएगी तुम्हारे बिना..

मैं बड़ी बेदर्दी से बोलै -- तो मर जाए.. मुझे उससे कुछ भी लेना नहीं है.. वह मरे या जिए.. मुझे घंटा फर्क नहीं पड़ता.

और फिर मेरे कान झुनझुना उठे एक आवाज़ सुनकर -- मैं क्यों मरुँ.. मरे जिसे मरना है.. मैं तो आखरी सांस तक तुम्हारे क़दमों में लेना चाहती हों..

और मैं सिगरेट का कॅश लगाना भूल कर एक झटके से मुदा और हज़ल मेरे सामने दूर कड़ी तमाम तर चाहतों, शिद्दतों के साथ मुझे देख स्माइल करती नज़र आई..

मैंने माइकल को घूरा -- तुमने उसे बताया न hi.. हम आइलैंड सैर करने जा रहे हैं.. तभी ये यहाँ नज़र आ रही थी.

माइकल बिना मुझसे दर्रे या झिझके बोलै -- मई हज़ल को मायूस कर सकता हों. न hi इंकार.. तुमसे दूर भी मई उसे नहीं देखना चाहता.

मई माइकल को ग़ुस्से से घूरता हुआ सिगरेट समंदर में फ़ेंक तेज़ी से वापिस मुदा और हज़ल को पकड़ने के लिए भाग पड़ा. वह भी भागने के लिए रेडी थी. मुझे भागने के लिए मुड़ते देख वह भी भागी..

हज़ल भगति चिल्लाई -- 11 मुल्कों की पुलिस आज तक मुझे नहीं पकड़ पाई. तुम कैसे पकड़ सकते हो... आ जाओ मेरे पीछे पीछे और मुझे पकड़ लो..

हज़ल की बात पर माइकल ज़ोर से हसने लगा. मेरा गर्म दिमाग और भी ज़यादा गरम होता हुआ घूमने लगा.. मुझे हज़ल पर बेपनाह गुस्सा आने लगा था. उसे पकड़ कर उठा कर मई समंदर में फ़ेंक देना चाहता था. कम्बखत पीछे hi पद गई थी. हाथ भी नहीं आती थी. वर्ण उसका गाला hi दबा देता मैं.

मई हज़ल के पीछे तेज़ी से भगा. हमें आगे पीछे भागते देख पससंजर्स कोई प्रेमी जोड़ा समझे थे.. कुछ है पड़े थे. कुछ जुमले कसने लगे थे.

मेरे दिमाग से रही सही ठंडक भी भक से उड़ने लगी.. अब हज़ल मेरे हाथ आये तो सही... एक बाअरर...

 




चालीसवीं क़िस्त

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लेकिन हज़ल मेरे हाथ नहीं आई.. कहीं छुप गई थी.. मई ग़ुस्से में आया पुरे जहाज़ पर उसे तलाश करता रहा... और माइकल मेरे साथ हज़ल को तलाश करता रहा.. हस्ता रहा. मई उसे घूरता रहा

मई -- वह कमीनी न मिली तो मई तुझे उठा कर समंदर में फ़ेंक दूंगा

माइकल अपने होंठ भींच हसी दबाता हुआ बोलै -- हाथ वह नहीं आती तुम्हारे.. समंदर में तुम मुझे फेंकोगे

मई -- तुम्ही ने उसे बताया था

माइकल -- हाँ.. तो??.. क्या बिगड़ जाएगा तुम्हारा यार.. अकेली है दुन्या में. बेसहारा है वह.. प्यार करती है तुमसे..

मई -- बास बंद करो अब तुम अपनी ये बकवास.. मुझे सख्त उलझन होती है ऐसी बातों से.

माइकल कंधे उचका कर बोलै तह -- कमल है.. दुन्या हसीं लड़कियों के पीछे कमली झल्ली हुई फिरती है. टर्की की सबसे हसीं लड़की तुम्हारे पीछे है और तुम हो के उसे लिफ्ट hi नहीं करवाते.. भई किस मिटटी के बने हुए हो तुम..

मई बास माइकल को घूर कर रह गया था.. क्या बताता उसे.. कसूर न माइकल का था न hi हज़ल का. कसूर तो मेरा भी नहीं था. कसूर तो हालत का था..

मई चुप रहा.. सिगरेटर निकल कर सुलगा कर होंटो में दबाता हुआ समंदरी लहरों को घूरने लगा

माइकल इस बार अलग hi टोन में बोलै -- दोस्तों के सामने सीने खोल देना चाहिए. बोझ हल्का हो जाता है. मई समझ सकता हों. ज़रूर तुम्हारे साथ कुछ ऐसा हुआ है---

मई - छोडो इस टॉपिक को. ये बताओ आइलैंड कितनी देर में पोहंचेंगे

माइकल ने लम्बी सांस लेके छोड़ी और बोलै -- दो घंटे में!.

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आइलैंड बहुत खूबसूरत था. आइलैंड पर पोहंचे तब तक मुझे हज़ल कहीं नहीं दिखी थी. मैंने कई बार मुद कर हज़ल को चेक किआ था. लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं दी मुझे..

एक रेस्टोरेंट में खाना खाया.. फिर सैर करने निकल पड़े.. शाम हुई तो वापिस पैदल होटल की ऑर्डर लौटने लगे.. मैं हज़ल को भूल चूका था.

एक रोड से गुज़रे तो दोनों साइड्स की आलीशान कोठियां देख आँखों को भला लगा.. लाइटिंग कमल की थी. एक आलीशान कोठी के पास से गुज़ारे तो अंदर से किसी लड़की के ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ें सुनाई दी.

सुनकर मैं और माइकल चौंके.. कोठी की ऑर्डर देखने लगी. ये वाली कोठी तो इस आइलैंड की सबसे आलीशान कोठी थी.. कई गनमैन गेट के बहार खड़े गुज़रते लोगो को घूर रहे थे. लड़की के चीखने पर दर्द का अहसास मुझे गार्ड्स की आँखों में देखने से हुआ. मई हैरान हुआ... माजरा क्या है

गार्ड्स हमें घूरते हुए बोले -- रुको नाहीइ... चलते जाओ

और मेरी सटकने लगी. मई भला किसी के ऐसे लहजे को कैसे सुन सकता था. एक तो मैं पठान था दूसरा मैं घर से निकलने के बाद कुछ और hi बन गया था.

मई पलटने लगा तो गार्ड्स ने गन मेरी ऑर्डर सीढ़ी कर ली -- कहा न चलते जाओ.. वर्ण बिना पूछे भून दिए जाओगे

और मैं गुस्से से पागल होने लगा.. मई मुड़ता माइकल ने मुझे पीछे से बहन में कस लिए

माइकल -- नाहीइ फिरोज खान.. तुझे मेरी कसम

मई -- ये कुत्ते मुझे जानते नहीं हैं.. एक एक को मार डालूंगा.. समझ क्या रखा इन कुत्तों ने मुझे

एक गार्ड गुस्से से करीब आने लगा

तभी कहीं से हज़ल भगति हुई सामने आ गई. जल्दी से बोली --- ये कुछ जनता नहीं है न.. यहाँ पहली बार आया है. आप प्ल्ज़ नाराज़ न हों..

मई हज़ल को देख और भी ज़यादा गुस्सा में आ गया था. लेकिन हज़ल की बात "ये कुछ जनता नहीं है न??." मई हैरान रह गया था. हज़ल सब जानती थी..

गुस्से में होने पर भी मैं वहां से चल पड़ा. हज़ल मुझे अपने करीब एक आंख नहीं भाटी थी. लेकिन लड़की की दर्द भरी हिस्टरयाई चीखें सुन कर हज़ल और गार्ड पर आया गुस्सा पीने लगा

हज़ल और माइकल मुझे खुश दिखाई दिए.. वर्ण मैं ऐसे मूड में आ जाने के बाद खून बहाये बिना पीछे नहीं हटा करता था

मई हज़ल को देख पहली बार उससे नरमी से बोलै -- क्या नहीं जनता हों मैं??>.

और हज़ल ख़ुशी से नाच उठी -- तुमने.. फिरोज तुमने.. तुमने मुझे प्यार से बात करि.. आज मैं बहुत खुश हों

और मुझे फिरसे गुस्सा आने लगा.. मई दांत पीस बोलै -- प्यार!.. माय फुट.. ये नरमी है.. लेकिन लगता है तुझे नरमी हज़म नहीं होगी..

हज़ल बिना किसी परवा के मेरे बराबर चलती हुई बोली -- तुम्हारे नरमी और गर्मी, गुस्सा सब मेरे लिए पया---

मुझे देख के बोलती हज़ल का मोह खुला रह गया.. "प्यार" प्याआ पर hi एन्ड हो गया

मई है पड़ा -- यही हाल तेरे प्यार का होने वाला है.. पया की मौत कन्फर्म है

और हज़ल तो थी hi अनोखी और कमीनी बेपरवा किसम की लड़की -- खैर.. मौत न मेरे नसीब में और न hi मेरे प्यार के नसीब में..

मई -- तुम वह बको जो बकना ज़रूरी है तुम्हारे लिए. ये लड़की??.. तुम क्या जानती हो इसके बारे में

और माइकल में हज़ल को गहरी नज़र से देखने लगा. हज़ल साद सा फेस बना के बोली

हज़ल -- बहुत पायरी लड़की हुआ करती थी बेज़ा.

हज़ल मुझे बेज़ा के बारे में बताने लगी.

बेज़ा 28 साल की थी.. 7 साल पहले उसे किडनैप कर लिए गया था.. तावान लेकर भी बेज़ा के साथ कइयों ने मिलकर घिनोना काम किआ था.. बाद में बेज़ा को बेहोश बुरी हालत में वापिस कर दिए गया था. तभी से बेज़ा का ज़ेहनी तवाज़न बिगड़ गया था. ऐसी हलय बेज़ा की कभी कभी hi हुआ करती थी. वह हमेशा के लिए खामोश हो गई थी. सब सुनती समझती थी. कोई खिलता तो खा लेती थी. बास चुप रहती थी. बड़ी उमंगों और अरमानो भरी लड़की थी.. बहुत नेकदिल और मसीहा टाइप लड़की थी.. हर वक़्त हस्ती खिलखिलाती रहती थी. नेचर से बहुत प्यार था बेज़ा को. खुद उसके अंदर के सारे मौसम छीन कर ख़िज़ाँ का मौसम हमेशा के लिए उतार दिए गया था..... महीने में एक 2 बार उसे दौरा पड़ा करता था.. दुन्या भर के मुल्कों में ले जा उसका ट्रीटमेंट करवा चुके थे. पैसा पानी की तरह बहा चुके थे... लेकिन कुछ हासिल नहीं हो सका था.. 4 भाइयों की इकलौती लाड़ली बहन थी... गनसगतेरस कुछ मारे गए थे. भाग निकले थे.. और अब एक आइलैंड खरीद कर खुले आम गैंग को चला रहे थे..

मुझे बेज़ा के बारे में सब जान कर बड़ा दुःख हुआ.. कोठी से हम कुछ दूर निकल आये थे. मेरे अंदर का गहरी नींद सो रहा बाबू नजाने क्यों बेज़ा के दर्द पर दर्द में आने लगा था. अंगड़ाई लेकर बेदार होने लगा था..

चलता चलता मई रुका.. और पीछे मुद कोठी को देखने लगा

माइकल -- अब पीछे मुद क्या देख रहे हो

हज़ल -- चलो फिरोज.. यहाँ से चलो.. पहले भी पता नहीं कैसे गार्ड्स ने फायर नहीं किआ

और मैं हज़ल को साइड करता हुआ इरादा कर चूका था -- बेज़ा वापिस ज़िन्दगी की तरफ लौट कर आएगी हज़ल.. "बाबू" के होते हुए बेज़ा ऐसी ज़िन्दगी जिए.. हो नहीं सकता.. बाबू जाग उठा है.. बाबू ज़िंदा हो गया है हज़ल.. माइकल.. बाबू लौट आया है बेज़ा का दर्द जान कर.. बाबू जो किसी अपने बेगाने को कभी दर्द में देख कभी सुखी नहीं रह सकता.. बाबू जिसे सिवाए प्यार के कभी कुछ सूझता hi नहीं था.. खुद के दिल पर हज़ारों ज़ख़्म ले कर जी रहा ये बाबू बेज़ा को ज़रूर ठीक करेगा...

मई तेज़ तेज़ क़दम उठता वापिस कोठी की तरफ बढ़ने लगा.. मेरे पीछे माइकल और हज़ल भी चीखते चिल्लाते भागे

दोनों मुझे रोकने लगे.. बाबू कोण है. ये नहीं पूछा दोनों ने.. ज़रूर ये शॉकिंग नाम था दोनों के लिए.. मेरी ऐसी बातें भी पहली बार सुनी थी दोनों ने. फिर भी कोई तब्सरा किये बिना मुझे वापिस ले जाने लगे

मई रुका और इस बार और भी नरमी से हज़ल से बोलै -- हज़ल.. खुश हो जाओ... बाबू ज़िंदा हो गया है... जाओ तुम दोनों होटल मैं जल्द होटल लौट आऊंगा.. और सुनो.. अब से मैं तुमसे भी कभी नफरत नहीं करूँगा.. कभी गुसा नहीं करूँगा.. फिरोज खान गुस्से में ा सकता है.. चीड़ सकता है. लेकिन बाबू.. बाबू, समझ लो.. बाबू प्यार का मुजस्समा है.. झरना है प्यार है.. जिसके गिरने पानी में जो भी भीग जाएगा.. हमेशा के लिए उसकी थकन उतर जायेगी. कहीं और उसे नहाने में सुकून भी नहीं मिलेगा..

हज़ल का मोह हैरत ख़ुशी और सरप्राइज से खुल गया था. माइकल की हालत भी अजीब होने लगी थी

हज़ल ख़ुशी से रोने लगी

मई माइकल से -- माइकल हज़ल को ले जाओ. और अब मेरे पीछे मत आना.. बास जोआओ

और माइकल की ख़ुशी से भेजी आवाज़ मुझे अपने पीछे सुनाई दी -- चलो हज़ल.. फिरोज लौट आएगा

हज़ल रोटी हुई बोली -- लेकिन वह खतरे की ऑर्डर बढ़ रहा है

माइकल -- तुम भी जानती हो. फिरोज को कुछ नहीं होगा.. शेरोन का शेर है फिरोज खान..

उधर सामने कोठी के खड़े गार्ड्स भी मुझे वापिस पलट ते देख गन्स सीढ़ी किये कड़े तेवरों से देखने लगे

फिर एक ने फायर कर दिए. फायर मेरे पैरों में किया था. और मैं बिना रुका बिना किसी बात की परवा किये शान से चलता हुआ आगे बढ़ने लगा

फिर फायर पर फायर होने लगे. कोई भी फायर ऊपर नहीं किआ गया था.. अब मुझे गार्ड्स की आँखों में हैरत की परछाई दूर से hi दिखाई देने लगी थी

तभी अंदर से किसी ने फायरिंग की वजा से जानी... और बता दिए गया -- एक सिरफिरा मिला है..

सिरफिरा तो मई था hi.. जहाँ बंदूकों का शोर हो. वहां पठान डर जाए.. ऐसा कैसे हो सकता था..

मई गॉर्डस के सामने तन कर खड़ा हो गया -- जाओ कोठी को मालिक को बुला कर ालो. उससे कहो.. मैं वह हों, जो बेज़ा को ठीक कर सकता है. बेज़ा को उसकी पुराणी ज़िन्दगी लौटा कर दे सकता है. बेज़ा पहले के जैसे हसे बोलेगी.. चहचायेगी. नाचेगी जाएगी.. सब कुछ वह करेगी.. जो कभी बेज़ा किया करती थी... बेरहम वक़्त के दिए सारे बदनुमा रंग मैं उसके वजूद से, ज़ेहन की गहराइयों से निचोड़ डालूंगा.. उसके अंदर बहार नए पुराने खुश रंग भर दूंगा..

 
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