Incest Pyaar - 100 Baar - Page 17 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

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अपडेट 102-ा

नफरत और प्यार (ी)


रात के इस आखिरी पहर के ख़तम होने में बस आखिरी घंटा बचा था. सवा 3 बजे का समय था जब इस अत्याधुनिक निजी हॉस्पिटल की पार्किंग में अपनी विदेशी जीप कड़ी करते हुए डॉ धर्मवीर सांगवान अपने तीनो शागिर्द सुपुत्रों के साथ अंदर चल दिए. भुप्पी गुलाटी के सहारे चल रहा था और छोटा सांगवान अपने पिता के पीछे ख़ामोशी से उनके रस्ते का अनुसरण कर रहा था.

"महरा, संजीव के कमरे में ले चलो और उसके बाद किसी को बोल कर साथ वाला कमरा भी खुलवा देना, पूरे सामान के साथ.", ये चश्मे वाला एक गंभीर सा डॉक्टर था जो शायद इस हॉस्पिटल का संचालक या उतना हे जरुरी व्यक्ति था.

"जी सर, आप मेरे साथ चलिए. बाकी काम मैं खुद हे कर लूंगा.", लिफ्ट से पांचो लोग तीसरी मज़िल पर पहुंच गए और कमरा नंबर 302 को खोलते हे सामने बिस्टेर पर कमर टिकाये संजीव पर बड़े सांगवान जी की नजर पड़ी. एक तरफ रिवॉल्वर रखे वह बेखयाली में सिग्रेटी के काश लगा रहा था. पास में हे ब्लैक लेबल शराब की बोतल और एक कांच के गिलास में जाम आधा खली था.

"किस तैयारी में हो बरखुरदार.?", इस jaani-pehchani आवाज को सुनते हे संजीव ने झेंपते हुए सिग्रेटे भुजा दी और बड़े सांगवान साहब ने उसके पास से गुजरने के बाद एक पहिये वाली कांच की खिड़की को सरका दिए. कमरे में तम्बाखू की महक जैसे उन्हें पसंद नहीं आई.

"आप ऐसे यहाँ इस वक़्त?", संजीव सीधा होना छह रहा था और गुलाटी ने आगे बढ़ कर उसकी मदद करने के बाद बीएड का पिछले हिस्सा एक बटन से ऊपर उठा दिए.

"महरा, भुप्पी और परम को साथ वाले कमरे में ले जाओ. इन्हे ख़ास उपचार और आराम की जरुरत है. सिस्टर मरथा के हाथ 2 गिलास भिजवा देना इधर.", उनकी बात का तुरंत पालन हुआ. परमवीर सांगवान शायद वही बैठना चाहता था लेकिन बाप की बात काटने की हिम्मत नहीं थी. गुलाटी ने कमरे में रखा नरम सोफे बिस्टेर के पास खींच लिए और बड़े सांगवान जी के बैठने के बाद खुद संजीव के पास बैठ कर एक सिग्रेटे जलाते हुए अपनी कमीज भी खोल कर एक तरफ रख दी.

"लगता है इस रात में बहुत कुछ हुआ है.", संजीव ने गुलाटी के कंधे पर जख्म देखते हुए कहा. सांगवान जी ने रूई के बड़े टुकड़े पर भूरे रंग की दवा लगाने के बाद ाचे से घाव को साफ़ किआ और फिर इत्मीनान से बैंडेज करने लगे.

"सोच से भी परे था जो हुआ संजीव. एक पल के लिए तोह सबकुछ डाव पर लग चूका था और आज इतने सालो बाद मुझे शंकर की इतनी कमी खली है के खुद हथियार उठाना पड़ा. कही भी एक चूक हो जाती तोह मैं जवाब नहीं दे सकता था.", बात के बीच में हे एक दक्षिण भारतीय सी दिखती नर्स बड़ी तहजीब से लकड़ी के ट्रे में 2 गिलास और बर्फ का डब्बा लिए आ गई. सांगवान जी ने भी धन्यवाद् करते हुए जाते हुए कमरा ाचे से बंद करने को कहा. इधर संजीव ने अपना गिलास प्लास्टिक के डस्टबिन में खाली करने के बाद तीनो के लिए जाम बनाते हुए बर्फ और पानी दाल दिए.

"चाचा यहाँ होते तोह मैं भी अपाहिज सा यहाँ नहीं होता अंकल. पहली बार कोई हमारे घर के बहार तक पहुंच गया और मैं सबसे अनजान यहाँ पड़ा रहा."

"संजीव वह की सुरक्षा सही हाथो में है. लेकिन जरुरी बात सिर्फ ये है की दुश्मन हमारी सही निगरानी में नहीं है. मैं भी तुम्हारे बराबर हे त्रिनेड हु और शायद थोड़ा अनुभवी भी लेकिन हमारी गलती ये है के शंकर की gair-maujdgi में हमसे चूक हुई. वह अकेला कही भी रह कर सबकुछ संभालता है और देख उसके बिना 5 दिन में हे चाचा को छोड़ कर हम 5 लोग जख्मी हो गए.", गुलाटी ने एक जाम सांगवान जी को देते हुए अपनी बात कही. फिर खुद भी एक घूँट पीने के बाद गिलास ट्रे में रख दिए.

"हाँ अंकल. पहले उमेद चाचा के पाँव में गोली लगी और उनके साथ मैं भी यहाँ पहुंच गया. अब आप तीनो भी."

"संजीव बीटा, शंकर परसो वापिस आएगा और इस बार उसके आते हे हमको लिस्ट बनानी पड़ेगी. बहन सिंह जैसे दर्जन भर तोह होंगे हे और मैं अब ये असला तभी वापिस अलमारी में रखूँगा जब सभी नाम काट दिए जाएंगे. भुप्पी 2 हफ्ते से पहले सही से बैठ नहीं सकता, परम के हाथ को भी सही होने में उतना वक़्त लग जायेगा और tumhe-Umed को तोह शायद ज्यादा समय लगे.", सांगवान जी की चिंता बहोत हद्द तक जायज़ थी. गुलाटी भी उनसे सहमत था

"अंकल इस बार मुझे लगता है के शंकर चाचा के साथ आपको दादाजी से भी सलाह कर लेनी चाहिए. चाचा बेजोड़ है अपने काम में लेकिन खुद सोचिये के एक बहन सिंह के साथ मुठभेड़ में 5-6 लोग तोह शहीद हुए होंगे. अगर दर्ज़न भर ऐसे नाम है तोह ये आंकड़ा 55-60 लोगो तक चला जायेगा. शंकर चाचा के साथ हम लोग भी पूरी ताक़त से साथ नहीं दे पाएंगे.", संजीव ने आधा गिलास खली रखते हुए गुलाटी के हाथ से सिग्रेटे थाम ली थी.

"हम्म्म्म.. पंडित जी 12 में से एक को भी नहीं मारेंगे. वह कानून के हितेषी है और वैसे भी मेरे हमउम्र है तोह वह परिवार से बहार निकलते नहीं.", सांगवान जी गहरा चिंतन कर रहे थे.

"उनका तोह एक प्यादा हे हम सब पर भारी है. बेशक वह जान लेना सही नहीं समझते लेकिन जो करते है उसके बाद अपराधी को मौत ज्यादा प्यारी लगती है. वैसे उनके नेटवर्क हमारी सोच से कही ज्यादा बड़ा और जटिल है. बस आप लिस्ट उनके साथ सांझी कीजिये और देखिये वह परिवार में रहते हुए हे कैसे सब साफ़ करते है.", संजीव का इतना भरोसा देख कर गुलाटी खुदको बोलने से रोक न पाया.

"शंकर से ज्यादा कनेक्शन है उनके?"

"वह दखल नहीं देते चाचा के काम में लेकिन उन्हें सब खबर रहती है. चाचा का कनेक्शन आप लोगो के साथ hai,Col पूरी, मिनिस्टर चादरकान्त, राजेश मां, ब्रिग. मान, नेशनल हेल्थ, रूरल डेवलपमेंट, 50 से ज्यादा सरकारी अफसरों, बड़े व्यापारिक घरानो और कॉर्पोरेट के साथ है. बेशक और dur-daraj में भी कनेक्शन होंगे लेकिन दादाजी को सब खबर है या उनकी पहुंच वह तक भी है. कई बार तोह वह खुद हे अनजान बन कर चाचा से हे काम करवा देते है या मुझसे भी.", संजीव ने जो भी कहा सांगवान जी ने उस पर सहमति में गर्दन हिला दिए.

"सच है ये. एक तरह से मेरे साथ भी उनका taal-mel शंकर से कही गहरा है जो मैंने नहीं बताया तुम लोगो को. बस मैं उन्हें परेशां नहीं करना चाहता."

"फिर हमको सबकुछ ध्यान से और ख़ास तरीके से करना होगा. काम ज्यादा लोगो को परेशां किये बिना भी हो सकता है. चाचा, मैं, लकी और मेहुल उनले कर सकते है सबकुछ.", संजीव की बात सुन्न कर सांगवान जी ने ना में गर्दन हिला दी.

"तुम्हारे घर में 2 विवाह है अगले महीने. और मुझे इतनी जल्दी भी नहीं है सबको ख़तम करने की. बस तुम लोग अपन नेटवर्क दुरुस्त रखो और सही लोगो को शामिल करो. सावन तक अभी कुछ और नहीं करना. बहन सिंह नाकारा हो गया है और तुम बस जेलर अमरीक सिंह का पता करो और आराम करो.", सांगवान जी ने जैसे एकदम हे सारा प्लान ठन्डे बास्ते में दाल दिए. जरूर को बड़ी वजह होगी लेकिन उनके जवाब पर किसी को कोई संदेह न था.

"वैसे ये अर्जुन का क्या चक्कर है?", गुलाटी का सवाल एक मुस्कराहट के साथ आया था.

"अंकल वह अब तोह मेरी भी समझ से परे जा रहा है. यही हाल रहा तोह मुझे नहीं लगता के दादा जी उसको यहाँ एक साल से ज्यादा रखेंगे. पहले वह सुदर्शन वाला किस्सा हजम नहीं हुआ था, उसके बाद जो हालत उसने भीम और मोहर सिंह के आदमीओ की करि और आज कुछ देर पहले 4 तजुर्बेकार अप्राधिओं को उसने कोई मौका तक नहीं दिए. वह खुद एक पहेली है जिसके बारे में ज्यादा सोचेंगे तोह शायद हम उसके साथ ठीक से रह नहीं पाएंगे. बेहतर तोह यही रहेगा की हम अर्जुन पर ध्यान हे न दे.", संजीव अपना गिलास ख़तम करके अब आँख मूंदे जैसे खुद को शांत कर रहा था.

"हाँ. होना तोह यही चाहिए. वह हल्का सा सबूत मिलने के बाद उसकी खाल तक निकाल रहा है. ऐसे में उसके साथ सामान्य रहना हे बेहतर है. बाकी तुम आराम करो और मैं घर चलता हु अपनी श्रीमतीजी के उठने से पहले वापिस सोना है.", सांगवान जी खड़े हुए तोह गुलाटी भी बिना कुछ कहे वह से निकल लिए, उनके साथ.

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कौमार्य भेदन का दर्द सेहती मुस्कान दर्द में भी खुश थी. उसके अछूते सरोवर में अर्जुन अपना जरुरत से बड़ा जहाज उतरता हुआ बेहद शांति से उसको हिम्मत दे रहा था. गोरी फांके अब हलके रक्त की वजह से लाल हो चुकी थी और उनके बीच में फसा वह मूल धीमी गति से अंदर जा रहा था.

"आह्ह्ह्हह... तुम बहोत ाचे हो अर्जुन.. उम्.. ऐसे हे अंदर समां जाओ.. आह्ह्ह्ह..", आँखों के कोनो से पानी की धार निकल कर बिस्टेर पर गिर रही थी लेकिन मुस्कान इस रात में बस अपना ख्वाब पूरा करना चाहती थी. इस से पहले जो धक्का अर्जुन ने दिए था वह अभी तक शरीर में दर्द दे रहा था लेकिन आधा लुंड अंदर जाने के बाद वह बस इस दर्द से पार जाना चाहती थी.

"तुम इतनी प्यार हो के दुःख हो रहा है तुम्हारे आंसू देख कर. बस हो गया जो होना था.", उसके ऊपर झुकते हुए अर्जुन ने पहले आंसू अपने होंठो से साफ़ किये फिर गुलाबी होंठो को चूमता वह yon-mardan करने लगा. गोर गरम बदन को आगोश में लिए वह बड़े प्यार से कमर आगे पीछे करता अब मुस्कान को वह सुख दे रहा था जो दोनों की चाहत थी. छूट के नरम होंठ बुरी तरह से उस मॉटे लुंड को जकड़े थे लेकिन yoni-ras और क्रीम की चिकनाहट से लिंग आगे पीछे हो रहा था.

"उम्म्म.. दर्द में जो मजा है यही तोह चाहिए.. आह्हः.. इसको पाने के लिए जाने कबसे तुम्हारा इन्तजार था... आह्हः.", 7 इंच तक लुंड उस गीली संकरी गली में उतारते हे एक पल को दोनों शरीर रुक गए. लाल चूचक अब फूल कर कुप्पा हो चुके थे. उन्हें चूसते हुए अर्जुन मुस्कान को उसके दूसरे चरम तक ले चला. जहा भी उसके मजबूत हाथ पकड़ बनाते, वही से शरीर लाल हो रहा था. पूरे कमरे में अब तेज सिसकिया और आहें गूँज रही थी.

"बड़ा ाचा लग रहा है उम्म्म्म.. फइलल में आह्हः..", मुस्कान को शायद पता नहीं था के अर्जुन लम्बी रेस का वह घोडा है जो अभी आधे हे रस्ते पंहुचा था. शरीर शांत होते हे अर्जुन ने मुस्कान को ऊपर उठा लिए. होंठो को जैसे दोनों चबाने हे लगे और उसके साथ हे कॉमर्स में सरोबार गीला लुंड थोड़ी तेजी से अंदर बहार होने लगा.

"आअह्ह्ह.. डेविल.. उम्.. फ़ास्ट.. आह्हः.. तुम क्या हो? ी ऍम फ्लाइंग.. उम्म्म... ", कसावट के साथ हे मुस्कान की छूट का लचीलापन किसी हद्द तक अन्नू जैसा हे था. जल्द हे वह लगभग पूरा लुंड लेती अर्जुन की बाँहों में उछाल रही थी. हर धक्का उसकी छूट के अंतिम हिस्से तक जा रहा था. सख्त सीने पर रगड़ खाने से गोर नरम चुके लाल होने लगे. छूट का रास बेहटा हुआ लिंग के बाद अंडकोष भिगो रहा था. कुछ समय पहले आपस में चिपके छूट के गोर होंठ अब एक दूसरे से कही दूर इस कामदण्ड पर चिपके फूल रहे थे.

"हाथ बीएड पर रख के घुटनो पर कड़ी हो जाओ.", अर्जुन ने जैसे हे लुंड बहार निकल कर मुस्कान को बिस्टेर पर रखा वह लम्बी सांसें लेने लगी. लुंड पर जैसे शहद उलट दिए था जो उसको चमकते हुए बड़े अंडकोष पर जमा होने लगा. एक बार इस 9 इंची बांस को देख कर मुस्कान की धड़कन बढ़ गई लेकिन हिम्मत करती वह बिस्टेर के किनारे घोड़ी बन हे गई.

"आउच.. इडियट.. आह्हः.. थोड़ा प्यार से करो न.", अर्जुन से भी जैसे गलती हो गई थी. शहद टपकती गुलाबी छूट में एक हे झटके में पूरा लुंड भरते हुए उसने मुस्कान के कूल्हों पर हलकी चपत लगा दी थी. फिर मुस्कुराते हुए वह बड़ी धीमी रफ़्तार से उसके स्वर्गिक जिस्म को सुख देने लगे.

"सॉरी. रुका नहीं गया. वैसे तुम्हे पता है तुम्हारे हिप्स बहोत ज्यादा सुन्दर और उभरे हुए है.", अर्जुन ने लटकते चुचो को थाम कर मुस्कान के पीठ चूम ली. दोनों गोल मटोल गुब्बारे से चुके हथेली में भर के दबाते हुए वह आधे से ज्यादा लुंड बहार निकल कर अंदर पेल रहा था. मुस्कान की आँखे तोह उन्माद में पहले हे लाल हो चुकी थी.

"ुम्माआआअह्ह्ह.. फ़क मन.. आअह्ह्ह.. यू अरे रियली ा बीस्ट.. माँ.. वह करने के बारे में आज सोचना भी नहीं.. ी क्नोव यू लिखे माय हिप्स बूत I'm नॉट रेडी फॉर अनल. आह्हः.. ये इतना बड़ा है की कोई भी इसको वह नै लेगी एक्सेप्ट अन्य एफ्रो गर्ल. होल्ड में आह्ह्ह्ह...", 5 मिनट के अंतराल में हे मुस्कान की छूट ने फिर से संकुचन करते हुए बता दिए था के आज उसका सरोवर पानी बहता हे रहेगा. लेकिन अर्जुन भी उतना हे नशे और जोश में था. सूपड़ा मोटा हो रहा था लेकिन वह पूरे जोश से मुस्कान के दूध दबाते हुए धक्के लगा रहा था. अगले एक मिनट में 50-60 धक्के बहोत थे मुस्कान की पहली बार चूड़ी छूट को रुलाने और अर्जुन का बाँध तोड़ने के लिए. बिस्टेर पर लुढ़कने के बावजूद पूरा लुंड अंदर फंसा हुआ गरम बौछार कर रहा था.

"सॉरी. कण्ट्रोल नहीं हुआ. आह्हः... मुस्कान..", अर्जुन ने शाम को तारा के साथ भी किआ था लेकिन इस वक़्त उसका वीर्य जाने कहा से बन्न कर बहार निकल रहा था जो छूट को गहराई तक भरने के बाद भी katra-katra टपक रहा था.

"अह्ह्ह्ह.. जीसस.. तुम जानवर हो. प्यारे जानवर.. पता नहीं क्या हालत की होगी मेरी. बूब्स तोह जैसे कुछ फील करना हे भूल गए और वागिना भी सुन्न है.. आह्हः... इसको बहार निकालो. किश में.", उसकी बात मानते हुए अर्जुन ने लुंड बहार खींचा और बिस्टेर पर छूट से निकलता वीर्य अपनी चाप बनाने लगा. अर्जुन भी हलकी थकान से पीठ के बल लेट गया. मुस्कान उसकी बाहों में आती सुकून से आँखे बंद करने लगी. एक तरफ एक फ़ीट के व्यास में लाल धब्बा था और दूसरी तरफ आधे फ़ीट का गीलापन. बचे हुए बिस्टेर पर दोनों हे दुनिया से बहखबर सो चुके थे.

मुस्कान टाँगे फैलाये उसके ऊपर लेती उन्माद में बेहोश हे थी. छूट लाल और मोटी हो चुकी थी वही अंदर का छेड़ एक चुदाई से हे खुल कर उसकी बुरी हालत दिखा रहा था. सवा घंटे के मिलान में चुदाई आधे घंटे से अधिक हे चली थी और सुबह 5 बजे हे अर्जुन की आँख खुली. अर्जुन को घर से बहार 3 घंटे हो चुके थे. बाथरूम में फ्रेश होने के बाद वह गरम पानी में ांतसेप्टिक मिला कर बिस्टेर पर आ गया. छूट पर जमी खून और वीर्य की पपड़ी को ध्यान से साफ़ करते हुए नजर मुस्कान के चुचो पर पड़ी.

'ज्यादा हे जोश दिखा दिए. लाल और नीले निशान बन गए. सॉरी मुस्कान.', एक चुके पर हल्का सा चुम्बन करने के बाद उसने बाकी सफाई की. मुस्कान भी कसमसाती हुई आँखे खोल कर अर्जुन को इतने प्यार से देखभाल करते देख मुस्कुराने लगी.

"होता है ये पहली बार. परेशां मत होना और 2-3 दिन बाद प्रॉमिस करती हु के रोने की जगह तुम्हरा पूरा साथ दूंगी. थैंक यू सो मच अर्जुन. ये आज तक का सबसे बेस्ट मोमेंट था मेरी लाइफ में. उमाहहह.. बस अब मुझे बाथरूम में ले चलो.", अर्जुन भी ध्यान से मुस्कान को बाथरूम में छोड़ कर बहार आ गया. बिस्टेर को साफ़ करके नयी चादर बिछा दी. पानी पीने के बाद मुस्कान के बुलाने पर वह वापिस उसको बीएड पर ले आया.

"प्रेग्नेंट भी हो सकती हो. और ज्यादा दर्द है तोह मैं पेनकिलर ले आता हु."

"टेंशन मत लो. पेनकिलर की जरुरत नहीं है और प्रेग्नेंट हो गई तोह ाचा हे होगा. वैसे चांस बहोत काम है ऐसा होने के. 5 डेज से हे मैं क्लीन हु. ये टीशर्ट और शॉर्ट्स दे दो फिर तुम चले जाओ.", अर्जुन ने खुद हे कपडे पहनाये और मुस्कान को फ्रिज से दूध निकल कर पिलाने के बाद चूम कर बहार निकल गया, फिर से जल्द मिलने का वडा करके.

'तुम बहोत प्यारे हो जानेमन. बस ऐसे हे इस मुस्कान को प्यार करते रहना. ी लव यू. उम्माह' हवा में चुम्बन उछलती वह फिर तकिये से लिपट कर हंसती हुई फिर से सो गई और अर्जुन सीढ़ी से उतर कर अपनी अगली मंज़िल की तरफ बढ़ चूका था.

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"तुम सब समझते हो और सबसे ख़ास बात है हर कोण (एंगल) को गहराई से परखना, विचार करना और फिर नतीजे पर पहुंचना. लेकिन हम गाडी रिवर्स गियर में लेते है जिस से तुम समझ में आये के उत्पत्ति (बिरथ) के लिए क्या प्रमुख रसायन है.", आचार्य जी के साथ टहलते हुए आज अर्जुन अकेला नहीं था. एक 20-21 साल की युवती भी नंगे पाँव आचार्य जी के दाए तरफ थी और अर्जुन बाए.

"देखिये जैसे उत्पत्ति की बात है तोह उसके लिए 2 एलिमेंट्स की जरुरत होगी हे. हिमनद (ग्लेशियर) से अगर हिमानी एक नदी (रिवर) के रूप में निकलती है तोह पहले जो एलिमेंट जरूरी है वह है सालो से एकत्रित पानी को जमाये रखने के लिए उतना सार्ड वातावरण और फिर कुछ समय के लिए परिवर्तन जिस से बर्फ पिघल कर नदी का रूप धारण करे. और ये एक लयबद्द प्रक्रिमा के बिना तोह आजीवन चल नहीं सकता.", अर्जुन का ऐसा विश्लेषण सुन्न कर वह युवती थोड़ा ठिठक कर आचार्य जी और अर्जुन को देखने लगी. कही से नहीं लगता था के ये 2 लोग 2 पीढ़ियों के फांसले वाले है.

"हाँ हिमानी बीटा, ये अर्जुन है और अर्जुन तुम्हारे कथन में जो नदी थी ये उस से अलग लेकिन हैं हिमानी हे. इस साल हे ब में प्रवेश ले रही है और मेरी प्यारी एकलौती नाती (Grand-daughter) है. अब आते है तुम्हारे तर्क पर जो कही से भी गलत नहीं है लेकिन उसको बाहरी दुनिया के हिसाब से समझते हुए मैं कुछ पल के लिए नकार देता हु.", अर्जुन और हिमानी ने आँखों के साथ हलकी गर्दन झुकाते हुए एक दूसरे का अभिवादन किआ और फिर से आचार्य जी की बात समझने लगे.

"ठीक है.", अर्जुन ने हामी भरी.

"तुम किस वजह से पैदा हुए?", आचार्य जी का इतना सीधा सवाल सुन्न कर पल भर के लिए अर्जुन स्तब्ध रह गया. अब क्या जवाब दे और हिचकना लाजमी था एक युवती के साथ होने पर.

"वह maa-papa की वजह से.", अर्जुन ने गर्दन झुकाये हे जवाब दिए.

"हाहाहा. मेरे बचे तुम्हारा वजूद है तुम्हारे mata-pita के परस्पर प्रेम से. किसी के भी होने के पीछे जो एक रसायन है वह प्यार है. और दूसरा है नफरत. दोनों हे सिक्के के 2 पहलु है. अब जरा हिमानी बीटा तुम इस दूसरे रसायन की परिभाषा देना.", शास्त्री जी ने कितने सटीक तरीके से अपनी बात कही थी. अर्जुन को एहसास हुआ के वह बेवजह चिंतित था और गलत जवाब दे गया.

"एक परिपूर्ण जीवन में प्यार सबसे जरुरी भाग है लेकिन उसका अभाव भी ज़िन्दगी के मायने बदल कर वह पैदा करता है जिसमे द्वेष, नुक्सान और अशांति का mel-jol रहता है. नफरत. उत्पत्ति का मतलब सिर्फ एक भौतिक रचना भर नहीं है. अर्जुन अगर प्यार की वजह से जन्मा है तोह ऐसे हजारो उदहारण सामने है लेकिन फिर अस्त्र की जरुरत कैसे हुई?.", हिमानी अपनी बात कहती हुई अर्जुन को देखने लगी जो घास को निहारता हुआ सुन्न रहा था.

"सुरक्षा के लिए.", संक्षिप्त सा जवाब अर्जुन ने दिए.

"किस से सुरक्षा?"

"जो हानि पंहुचा सकता हो या फिर भविष्य के लिए तैयार रहने के लिए.", अर्जुन ने थोड़ा और अपनी बात को बढ़ावा दिए.

"वह जो अदृश्य दुश्मन है वह नफरत है जिस से हम khush-hal समय में भी भयभीत रहते है. तुमने अगर कुछ हांसिल किआ है तोह शायद कोई और भी वही चाहता हो लेकिन अब अभाव की वजह से वह साधारण अनजान एक शत्रु बन्न गया, नफरत ने वही पैदा किआ. ज्यादा सरल लहजे और तुम्हारे हे तरीके से मैं बताना चाहती हु अगर नाना जी आपकी भी अनुमति हो.", हिमानी जैसे कुछ बड़ी बात कहना चाह रही थी. विषय गंभीर रुख ले रहा था.

"पूरी अनुमति है.", आचार्य जी ने थैली से बाजरा निकला और अपनी उस जगह आ गए जहा उनके पक्षी मित्रो का जमावड़ा रहता था.

"माँ ऑस्ट्रेलिया थी तोह एक व्यक्ति उनसे एक तरफ़ा प्यार में पड़ गया. गलत रास्ता चयन करते हुए उसने दुराचार किआ और माँ ने समय आने पर मुझे पैदा किआ. अब बताओ के मेरे पैदा होने के पीछे क्या एलिमेंट था.?", हिमानी की ऐसी कड़वी सचाई सुन्न कर अर्जुन की आत्मा तक हिल गई. ये कैसा उदहारण दे दिए था?

"उस व्यक्ति को प्यार था लेकिन आपकी माँ ने शायद नफरत की वजह से ऐसा किआ."

"उस व्यक्ति को आकर्षण और घमंड था जिसने एक बेबस महिला के साथ दुराचार किआ और मेरी नासमझ माँ को जब पता चला तोह उन्होंने आने वाले अंश को आधे प्यार के साथ स्वीकार किआ. कहने का मतलब यही है के एक एंगल अगर प्यार दिखा रहा है तोह जरुरी नहीं के शीशे में वैसा हे प्रतिबिम्ब हो. नफरत अगर प्यार का प्रयायवाची नहीं है तोह वह उसका विलोम भी नहीं है. दोनों हे एक तराजू में बराबर खड़े है. नफरत भी जनम देती है और प्यार भी जनम देता है. कुछ प्रकृति के संतुलन हमारे अधिकार या वश में नहीं होते.", अभी भी जैसे अर्जुन के नादान मैं में ये बात सही से नहीं उतर पाई थी.

"बहुत खूब लेकिन मेरा नन्हा दोस्त शायद अभी भी असमंजस में है. चलो अब हम हमारे तरीके से बात करते है. जो समर्पित है और दयालु है वह खली स्थान को हरा भरा बनाएगा और वह वैसा हे जीवन पनपेगा जिसमे khush-hali होगी. जो क्रूर है, उग्र और दुराचारी है उसका आवरण भी कटीला, हिंसक और शक्ति से भरपूर होगा. सोचा जाये तोह दोनों हे काम एक जैसा करेंगे लेकिन प्यार से जो पैदा हुआ है वह अकेला हे असंख्यों को खुशिया देता है और नफरत से पैदा होने वाला असंख्यों के साथ मिलकर एक को दुःख. निस्चल साफ़ सरिता (रिवर) एक उपजाऊ जमीन पर प्रकृति को समृद्ध करती है भरपूर जीवन से. वह मछलिया, वृक्ष, फसल, खनिज सब जनम लेते है और विकसित होते है. वह जीवनदायिनी महक हमेशा रहती है. ऐसे हे एक दूषित (पोलूटेड) दरिया जहा जायेगा वह उपजाऊ को बंजर, खाने लायक phal-phool को हानिकारक और जेह्रीला कर देता है. उसके समीप उपजने वाले जंगल दुर्गन्ध और विषमता से भरे होंगे. तुम्हे समझना ये है की कैसे सामंजस्य बिठाया जाये.", अब कही अर्जुन के दिमाग में ये विषम पाठ बैठ रहा था.

"जो अंदर और बहार से एक सामान साफ़ है वह प्यार है. जो बहार से एक आकर्षण और अंदर से viprit-sankeern है वह नफरत. दोनों में हे jivan-dayini गुण है लेकिन उनके नतीजे विपरीत है.", अर्जुन ने ज्यादा लम्बी बात न करते हुए एक छोटा सा सार कह दिए.

"आने वाले जीवन में तुम्हारी मुलाक़ात होती रहेगी इन दोनों से. है तोह दोनों हमारे aas-pas हे. तुम अर्जुन से बात करो बिटिया मैं जरा मोहन जी से मिल लू फिर हम घर चलते है.", आचार्य जी इतना कह कर अर्जुन को बाजरा पकड़ा कर अपने दोस्तों की तरफ चले गए. आसमान भी अब थोड़ा उजला और रोशन हो चूका था.

"तोह नाना जी के प्रिय दोस्त तुम्ही हो?", लोहे के बेंच पर बैठ कर अर्जुन ने मोर और चिड़ियों को दाना खिलाना शुरू किआ तोह हिमानी भी बराबर में बैठ गई. उजली किरण सी साफ़ और विशिस्ट थी वह. पूरी आस्तीन की केसरिया टीशर्ट और सफ़ेद ट्रैक पजामा पहने हुए उसके शरीर का ज्यादा जायजा नहीं मिल रहा था लेकिन लम्बाई शायद अपने नाना जी से विरासत में मिली थी और ख़ूबसूरती भी. अर्जुन ने पल भर के लिए ध्यान से देखा और फिर से पक्षियों की तरफ चेहरा कर लिए. उसके हाथ से हे mor-morni दाना ले रहे थे.

"हाँ वह मेरे मार्गदर्शक और बेहद ख़ास व्यक्ति है. सॉरी, सुन्न कर बुरा लगा आपकी माँ के लिए.", अर्जुन झिझक रहा था लेकिन स्वर में आदर की भावना भरपूर थी. थैली से थोड़ा बाजरा उठाते हुए हिमानी ने भी उसका अनुसरण किआ.

"जो हुआ उसमे तुम्हारा तोह कही कोई दोष न था. सॉरी बोलकर बेवजह खुद को किसी भी बात के लिए जिम्मेदार मत समझो. वैसे जितना तुम बताते हो तुम्हारा ज्ञान उस से कही ज्यादा है."

"ये टॉपिक आपके लिए था जिस से आप खुलकर अपनी बात कह सके और अपने मैं को शांत कर सके. जैसे दादा जी चाहते हो की अगर आप यही रहने वाली है तोह किसी भी तरह के विचार मैं को चोट न पहुचाये. सच कहु तोह मेरा कथन पूरी तरह से वास्तविक था और जो आपने और गुरूजी ने कहा वह आत्मा को शांत करने के लिए. प्यार कभी भी नफरत से कमजोर नहीं हो सकता. वह जिस भी चीज को जनम देगा उसमे सामान मात्रा रहेगी jivan-dayini की. नफरत सिर्फ एक अप्रत्यक्ष भावना और विचार है जो हावी हो कर सिमित अवधि के लिए शत्रु बन्न जाता है. ऐसी भावना कभी भी प्यार के तराजू को हिला हे नहीं सकती तोह संतुलन तोह कही दूर की बात है.", अर्जुन ने पलभर में हे हिमानी को निरुत्तर कर दिए था.

"तुम्हे कैसे पता?"

"देखिये यहाँ 2 हे लोग हमेशा मिलते और तर्क करते है. मैं और आचार्य जी, जो एक तरह से मेरे दादा जी हे है. आप आज यहाँ आई तोह वजह यही होगी की कुछ चिंतन और प्रश्न व्यथित करते होंगे. 2 अलग परिभाषा बहोत होती है दिमाग को भटकने के लिए लेकिन सही रास्ता उन दोनों में से एक को समझने पर मिलता है. आपका स्वागत है.", इस बार अर्जुन ने हिमानी का हाथ पकड़ कर अपने प्रिय मोरे के जोड़े के सामने कर दिए तोह बेहिचक वह दोनों इस नए हाथ से खाने लगे.

"ये हमारे दोस्त है और मेरे द्वारा आपका हाथ पकड़ने से इन्हे भी आप पर विश्वास हुआ तोह इन्होने कोई संदेह नहीं किआ. ऐसे हे आचार्य जी ने आपको शामिल किआ. जनम सिर्फ प्यार से हे होता है. आपकी माता जी ने आपमें एक उम्मीद और भविष्य देखा, आपका जनम उनके पूरे प्यार से हुआ जो सिर्फ आपसे जुड़ा था. वह व्यक्ति जिसने दुराचार किआ उसको जब आपने देख हे नहीं है तोह वह कही से भी वास्तविक नहीं. बेहतर तोह यही होगा के आप वही स्नेह और प्यार अपनी माता जी को दे जो उन्होंने आपको दिए. ज़िन्दगी बहोत खूबसूरत है जिसके मायने हम जान बूझ कर नहीं समझते.", अर्जुन जैसे हिमानी के दिल से वह हर जख्म गायब कर रहा था जो जाने कितने सालो से अंतर्मन को दर्द दे रहे थे.

"तुम इतने स्पष्ट कैसे हो सकते हो? नाना जी भी मुझसे ऐसे नहीं बात करते. और किसी लड़की का हाथ उसकी मर्जी के बिना नहीं पकड़ना चाहिए.", हिमानी की नजरे झुकी हुई थी.

"वह आपसे इतना प्यार करते है की आपके जख्म कुरेदने की हिम्मत वह नहीं करेंगे. और हाथ एक पल के लिए हे पकड़ा था जिस से आपको ये एहसास करवा सकू की प्यार के लिए हमको हे कदम उठाना पड़ता है. अब आपका हाथ इन्होने थाम रखा है.", अर्जुन ने मुस्कुरा कर हाथ से कुछ दाने सामने बिखेरे तोह हिमानी देख रही थी की उसके हाथ से अब 3 मोर दाना चुग रहे थे और अर्जुन के हाथ अपना काम कर रहे थे.

"थैंक यू सो मच.", हलकी कम्पन्न सी थी उस खूबसूरत चेहरे से निकली आवाज में.

"आंसू बहार आया तोह दूसरी आँख में लगा लेंस खराब हो सकता है.", अर्जुन उठ कर थोड़ा आगे चलते हुए कबूतरों और चिड़ियों को दाने डालने लगा और पीछे बेंच पर बैठी हिमानी आँख साफ़ करती हैरानी से अर्जुन को देख रही थी.

"वह ऐसा हे है. साफ़ बता देता है और हर चीज को गहराई से समझता है. शायद तुम्हे कुछ नए उत्तर मिल गए होंगे और अपने आप से बहार निकलने का रास्ता भी.", आचार्य जी की आवाज सुनकर हिमानी झट्ट उठ कड़ी हुई. ऊँगली से वह कृत्रिम लेंस हटती वह उनके गले लग कर भावुक हो चुकी थी. ऐसे दृश्य में अर्जुन खुद को दूर रखे हुए बस इन आजाद परिंदो में खुद को व्यस्त रख रहा था.

"He's वइसे एंड सो ट्रू. आपका फैंसला ठीक था के मैं वह अकेली रहकर बस खुद को दुःख दे रही थी. अब बाकी ज़िन्दगी बस मैं आपके हे साथ रहना चाहती हु नाना जी.", आचार्य जी ने जल्द हे हिमानी को शांत कर दिए और पीठ सहलाते हुए वह मुस्कुरा रहे थे.

"जवाब कई बार हम खुद नहीं दे सकते बेटी. उसके लिए एक और रास्ता जरुरी होता है. अर्जुन शायद मुझसे बेहतर तुम्हे समझा सकता था इसलिए मैं तुम्हे यहाँ ले आया. अब बेझिझक तुम अपने नए दोस्तों से मिलो और मैं अर्जुन से 2 बातें कर लेता हु. वैसे वह तुम्हे यूनिवर्सिटी ले जा सकता है अगले हफ्ते, मेरी gair-maujdugi में.", हिमानी अलग हुई तोह उसने कोई जवाब नहीं दिए बस फिर से बेंच पर बैठ कर उन पक्षियों के सामने दाने कर दिए जो उसका हे इन्तजार कर रहे थे. अर्जुन और आचार्य जी अगले 15 मिनट तक उसकी नजरो से कुछ दुरी पर जहां बातें करते दिखे. उसके नाना जी बातों के साथ हे अर्जुन के शरीर पर कही कही हाथ लगा कर जैसे कुछ समझा भी रहे थे.

"चले हिमानी बीटा? आज हम दोनों देरी से पहुंचने वाले है तोह बहाना सोच लो.", आचार्य जी की आवाज पर हिमानी कड़ी होती हुई उनकी तरफ चल पड़ी. अर्जुन भी उनके हे साथ बहार की तरफ चल रहा था.

"हेट्रोक्रोमिअ कोई बीमारी नहीं है वैसे. एक आँख भूरी और एक नीली.", आचार्य जी अपने एक दोस्त से बात कर रहे थे और अर्जुन ने अपनी रानी को चालू करने से पहले हिमानी से इतना कहा तोह वह मुस्कुरा दी.

"लोगो को आदत नहीं है do-rangi आँखों की लेकिन कोशिश करुँगी की अपनों के सामने इन्हे लेंस की जरुरत न पड़े.", हिमानी की बात सुन्न कर अर्जुन हाथ हिला कर अपने घर की तरफ चल दिए.

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इस वक़्त घर में काफी chehal-pehal थी और अर्जुन के देरी से आने की वजह से उसको कौशल्या जी की नाराजगी का शिकार होना पड़ा. दूध और लड्डू से जल्द फारिग होने के बाद वह जल्द हे तैयार हो कर पिछले आँगन में आ गया. अपनी माँ से गले लगने के साथ हे अलका दीदी और रुपाली दीदी के साथ नाश्ते पर थोड़ी मस्ती करता हुआ वह स्कूल के लिए निकल हे रहा था के कौशल्या जी ने पुकार लिए.

"आज कही idhar-udhar न भाग जैव. दोपहर के खाने के बाद बिट्टू आएगा तुझे लेने और 2 जोड़ी कपडे लेके उसके साथ चला जैव."

"ओह दादी मैं भुलक्कड़ नहीं हु. पता है मुझे मां के साथ जाना है ननिहाल और कल वापिस आना है. फिर अगले दिन प्रियंका दीदी के साथ पंजाब जाना है और सोमवार को सभी काम करवा के वापिस आना है. बैलबुद्धि हु लेकिन मंदबुद्धि नहीं.", अर्जुन ने कौशल्या जी का गाल हलके से खींचा और बहार दौड़ गया.

"देख ले रेखा तेरे सपूत को. ये छोरा न किसी को कुछ नहीं समझता.", नाटक करती हुई कौशल्या जी झूठा ताना दे रही थी.

"माँ जी, आपका हे लाडला है वह. मेरे पास तोह हफ्ते बाद हे उसके दर्शन होते है.", रेखा जी ने भी अपनी सास के लिए खाना- चाय लगते हुए कहा तोह वह हंसने लगी.

"तेरा अगर दिल हो तोह साथ चली जा. राजेश से भी मिल लिओ इतने साल बाद तोह आया है.", कौशल्या जी ने खाने से पहले ईश्वर को याद करते हुए हाथ जोड़े.

"नहीं माँ जी. राजेश ने मिलना होगा तोह इधर आ जायेगा. वैसे भी वह पास में है तोह इनसे मिलने संडे को आएगा हे. मैं यही ठीक हु.", रेखा जी ने स्पष्ट मन किआ और कौशल्या जी अपनी बहु के ऐसे जवाब पर खुश हो गई थी. वैसे वह मन तोह करती भी नहीं लेकिन रेखा का निर्णय उनका समर्पण बताता था.

"दादी वैसे आप चली जाओ. सुनंदा नानी आपको देखते हे जवान हो जाती है.", ऋतू दीदी इठलाती हुई अपनी दादी के बगल में बैठी तोह कौशल्या जी उसके सर पर हलके से चपत लगते हुए बोली.

"हाँ पता है मुझे तेरी नानी का. साल भर की कसार निकाल दी थी इस बार उसने बातें करते हुए. वैसे कुछ भी कह सुनंदा संधान काम और मेरी बहिन ज्यादा है. और तू थोड़ा उसकी हे याद दिलाती है जब तेरी माँ की शादी से पहले मैंने उसको देखा था.", कौशल्या जी जैसे कुछ याद करने लगी.

"न. कोमल दीदी ज्यादा उनके जैसी है."

"कोमल रेखा जैसी है और तू सुनंदा जैसी. इस उम्र में भी चर्बी ना आने दी तेरी नानी ने और झुर्रियां तोह भगवन ने उसके हिस्से की भी मुझको दे दी."

"दादी, कुछ भी बोलती हो. आज भी आप दादा जी से 15 साल छोटी लगती हो.", ऋतू ने इतना हे कहा था के रामेश्वर जी ने पीछे से आते हे उसका कान मरोड़ दिए.

"मतलब मैं बूढा हो गया हु?"

"ाःह.. आप जो भी कहो लेकिन आप जानते हो के दादी बूढी नहीं हुई.", ऋतू अपनी बात पर कायम रही तोह रामेश्वर जी भी हँसते हुए उसके पास हे बैठ गए.

"हाँ तेरी बात से मैं सहमत हु."

"मुझे रोटी खाने डोज या नहीं? सुबह सवेरे नौटंकी शुरू हो गई.", कौशलया जी की बात सुन्न कर ऋतू हंसती हुई उठ गई और उनके चेहरे पर आई शर्म देख कर रामेश्वर जी मुस्कुराने लगे.

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रुपाली दीदी और संदीप के साथ बातें करते हुए अर्जुन स्कूल पहुंच हे गया. दीदी ने बताया था के आकांक्षा से उनकी बात हुई थी. वह बुधवार तक आएगी और उसके साथ हे दादी और बुआ भी अब उनके घर रहने वाले है. अर्जुन को जान कर ाचा लगा के विनय तनेजा ने ये ाचा फैंसला किआ. तीनो हे स्कूल के भीतर आये तोह रुपाली अपनी सहेलियों के साथ एक तरफ चल दी और अर्जुन गलियारे में हे अन्नू और मेनका के पास रुक गया.

"आज भी छुट्टी पर हो?", अर्जुन ने मेनका के चेहरे और गर्दन पर नजर डालते हुए सवाल किआ. मेनका की हालत कुछ बेहतर थी और उसके साथ हे कड़ी अन्नू तोह पीले कमीज और लाल सलवार में होश उड़ा रही थी. अर्जुन ने अन्नू को भी मुस्कुरा कर ाचे से निहारा.

"हाँ एप्लीकेशन देने आई थी मंडे तक की. वैसे यहाँ से फारिग हो कर तुम्हारे हे घर जा रही हु.", मेनका की बात पर अन्नू ने आँखें बड़ी करते हुए उसको घूरा. अर्जुन भी सब देख रहा था.

"इसके घर चली जाओ ज्यादा ठीक रहेगा. वैसे भी परसो मैडम इंग्लैंड जा रही है.", अर्जुन ने जैसे अन्नू की तरफ देखते हुए कहा तोह अन्नू को हलकी शर्म आ गई. मेनका ने नजरे घुमा कर अपनी सहेली को देखा और अर्जुन की बात मान ली.

"तुम व्यस्त हो?", मेनका का सवाल शायद बहुत कुछ पूछना चाहता था.

"यही से बहार चल सकता हु अगर चाहो तोह. वैसे दोपहर को मैं ननिहाल जा रहा हु और कल शाम तक आऊंगा. संडे और मंडे फिर बहार हु. अगर कुछ जरुरी है तोह मैं साथ हे चलता हु.", अर्जुन ने बेझिझक बता दिए था के वह स्कूल से वापिस बहार जाने को तैयार है.

"कोई जरुरत नहीं है. थोड़ी देर अन्नू के घर बैठने के बाद मैं ऋतू और अलका को लेकर अपने घर हे जाने वाली हु. तुमसे फिर मिल लुंगी. वह बात अलग है के तुम दोनों का कुछ ख़ास इरादा है तोह..", मेनका ने माहौल को ठीक करते हुए बाकी दोनों की खिंचाई कर दी.

"ये बिना कहे हे मुझे पूरा टाइम देता है. मुझे कोई शिकायत नहीं.", अन्नू ज्यादा बात करना नहीं चाहती थी. घंटी की आवाज सुनते हे अर्जुन ने दोनों को एक बार फिर देखा जैसे पूछ रहा हो के मैं अंदर जाऊ या नहीं.

"तुम्हारी मर्जी है.", मेनका ने इतना कहा तोह अर्जुन उन्हें पार करते हुए आगे जाने लगा लेकिन अन्नू ने हाथ थाम लिए.

"जरुरी है?", अन्नू ने हाथ छोड़ते हुए पुछा.

"नहीं कोई जरुरी नहीं है. लेकिन तुम्हारे घर आंटी होंगे, मेनका अपने साथ मेरी बहनो को लेके अपने घर जायेगी और मैं स्कूल ड्रेस में हु. बताओ क्या कहती हो?"

"मैं मंजू को लेके तुम्हारे घर चली जाती हु. तुम दोनों ऑटो से मेरे घर चले जाऊ.", मंजू ने खुद हे रास्ता साफ़ कर दिए और अन्नू फिर से अर्जुन की तरफ देखने लगी.

"चाबी वही गमले के पास रख देना. मैं अन्नू के साथ आधे घंटे में पहुंच जाऊंगा.", अर्जुन उन दोनों को वही छोड़ कर वापिस स्कूल से बहार चल दिए. मेनका भी अन्नू को लिए तेज कदमो से कार की तरफ बढ़ गई. इस बीच किसी ने भी ध्यान नहीं दिए के चारुल जैसे उनसे बात करने की प्रतीक्षा कर रही थी.

"अन्नू.", चारुल ने आवाज दी तोह अन्नू ने मेनका को कार लाने भेज दिए.

"हाँ चारुल."

"कुछ टाइम है तेरे पास बात करने के लिए?"

"हाँ तुम दोपहर को घर हे आ जाना मैं फ्री हु. अभी मेनका के साथ जरुरी जाना है."

"मतलब तुम अभी व्यस्त हो?"

"हाँ. मुश्किल से अर्जुन के साथ टाइम मिला है तोह समझ ले.", अन्नू ने बात कहना हे ठीक समझा.

"अर्जुन के लिए हे बात करनी थी. उसने PE-sports के पीरियड्स बंद करवा लिए है अपने.", चारुल की आँखों में जैसे एक निवेदन था के अन्नू कैसे भी करके अर्जुन से बात करके उसको मनाये.

"चारुल, वह उसकी बहिन ने किआ है. अब गलती तोह तेरी भी है जो तूने नेगेटिव फीडबैक दिए. शुक्र कर की उन्होंने तुझसे सफाई नहीं मांगी. तू क्या करना चाहती है पहले वह ठन्डे दिमाग से सोच और फिर अर्जुन से बात कर. वह समझेगा और तुझे सही जवाब देगा. ऐसा न हो के एक और गलत कदम और फिर सबकुछ बदल जाए. तूने खुद हे बताया था न के अर्जुन की फॅमिली कैसी है?", अन्नू ने एक ाची सहेली होने के नाते सही सलाह दी और चारुल का सर शर्मिंदगी में झुक्क गया.

"परेशां मत हो. जो कहा है वही कर. दिन में घर आ जाना.", मेनका की आवाज सुनकर अन्नू इतना कह कर फुर्ती से निकल चली.

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रोमिला घर के पिछले हिस्से में बगीचे का काम देख रही थी. नाश्ते से फारिग हो कर बाकी सब भी अपनी दिनचर्या में लगे थे और प्रीती तितली इस फुदकती हुई घर के अंदर हे घूम रही थी. अपनी माँ के कमरे में नजर डालते हे वह उस गुलाब के गमले को देखने से खुद को रोक न पाई. आराम से चलती वह खिड़की के पास पहची हे थी की रस्ते में लकड़ी के टेबल पर पड़े चित्र पर नजर अटक गई.

'ये अर्जुन है?', खुद से सवाल करती वह 12क्ष16 इंच के उस कागज़ को देखने लगी जहा कोयले से एक बेहद आकर्षक roop-rekha बनाई गई थी. प्रीती कुछ पल उस चित्र को निहारने के बाद इस बड़ी दराज़ को खोल कर देखने लगी जहा उसकी माँ कच्चे चित्र (Raw-Sketches) रखती थी वैसे हे रंगीन और बड़े चित्र बनाने से पहले. कोई 25-30 मॉटे कागज़ बड़े सलीके से रखे गए.

'ये भी अर्जुन हे है लेकिन कपडे कहा है इसके?', इस चित्र में अर्जुन का पृष्ठ भाग अनावृत (नुदे) था. प्रीती पल भर इस चित्र को भी देखने के बाद सभी कागज़ देखने लगी और उसको हैरानी हुई की 28 में से 7 चित्र सिर्फ अर्जुन के हे बनाये थे उसकी माँ ने. स्पष्ट था के ज्यादातर में अर्जुन का ध्यान कही और था और शरीर अर्धनग्न या purn-nirvastra था, कलाकत्मक तरीके से.

"पसंद नहीं आये?", रोमिला अपनी बेटी को शायद कुछ समय से देख रही थी. प्रीती के चेहरे पर aate-jaate भाव देख कर फिर बात करना हे ठीक समझा.

"नहीं ऐसी बात नहीं है माँ. लेकिन क्या अर्जुन को पता है?", प्रीती ने जाहिर नहीं किआ था के उसको ाचा लगा है या बुरा. यहाँ भी उसको अर्जुन की परवाह थी.

"शायद यही वजह है के वह यहाँ नहीं आया इतने दिनों से. ये स्केच उसने देख लिए था और फिर ज्यादा बात किये बिना वह चला गया. बाकी ड्रॉइंग्स मैंने उसको ध्यान में रखते हुए बनाये. हे इस ओने हैंडसम मॉडल, यू क्नोव तहत?", रोमिला का नजरिया जैसे कुछ और हे था अर्जुन को देखने और उसके चित्र बनाने के लिए.

"आपको ये बताना चाहिए था. वह थोड़ा स्ट्रेंज है माँ. आप उसको कहती की ऐसी तस्वीर चाहिए और आप उन्हें स्केच करेंगी तोह वह खुद तैयार हो जाता. अब उसको लग रहा होगा की इसमें उसकी हे गलती होगी.", प्रीती जानती थी अपने प्यार को.

"Don't वोर्री बीटा. मैं बात करुँगी अर्जुन से. वैसे अगर बता कर फोटो लेती तोह इतने नेचुरल और आर्टिस्टिक पोज़ नहीं आ सकते थे. लेकिन तुम्हारी बात सही है के कही न कही वह नाराज है. और हो सकता है वह कुछ और हे सोच रहा हो. मैं खुद मिलने जाउंगी उस से.", रोमिला ने अपनी बेटी के सर को सहलाते हुए कहा.

"वैसे मामला कुछ और तोह नहीं माँ? बता देना.", प्रीती अपनी माँ से दूर जाती हंसती हुई कहने लगी. रोमिला का गुलाबी चेहरा थोड़ा लाल हो गया उसकी बात का मतलब समझते हे.

"शैतान.. मैं माँ हु तुम्हारी. और वह बचा है.", रोमिला ने झेंपते हुए जवाब दिए और सभी चित्रों को दराज में रखने लगी. प्रीती दरवाजे के पास एक पल के लिए रुकी और फिर से बोली.

"वह लास्ट वाला स्केच देख कर तोह नहीं लगता के अर्जुन बचा है. ह्यूमन एनाटोमी थोड़ी बहोत सभी पढ़ते और समझते है.", इतना कहकर वह घर से बहार हे निकल भागी. रोमिला हंसती हुई आखिरी चित्र को निकाल कर देखने लगी तोह एक पल के लिए आँखें बंद कर ली. जैसे वह उस दृश्य को याद करने लगी हो जब नहर से निकलने के बाद अर्जुन कपडे बदलने लगा था और टोलिया हटते समय उसका लटकता हुआ नाग कैमरा के साथ हे रोमिला के दिल में भी क़ैद हो गया था.

'हे इस एब्नार्मल. यू अरे रियली लकी माय डार्लिंग. ऐसा लवर सबको नहीं मिलता.', फिर एक शर्मीली मुस्कान के साथ उस चित्र को रोमिला ने अलग हे रख दिए एक और फाइल में. मुस्कुराती हुई वह फिर से घर के पिछले हिस्से की और चल दी जहा mitti-khaad का काम चल रहा था.

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अर्जुन 1 बजे हे स्कूल के बहार आ खड़ा हुआ. 10 मिनट बाद हे संदीप और रुपाली दीदी भी अंदर से उसके पास आ गए थे. इधर उधर की बातें करते वह अपने घर की तरफ चल दिए.

"आज फिजिक्स वाली ग्रोवर मैडम ने कहा है की आज से लेकर नेक्स्ट फ्राइडे तक वह 4 चैप्टर्स कम्पलीट करवा देंगी. समर हॉलीडेज से पहले 7 chapter काम से काम कम्पलीट होने चाहिए ऐसा वह कह रही थी.", रुपाली दीदी की बात सुन्न कर अर्जुन ने ऐसे जाहिर किया जैसे उसको झटका लगा हो.

"मेरा तोह बहोत लोस्स हो जायेगा ऐसे तोह दीदी. मैं तोह ट्यूसडे तक स्कूल जा नहीं पाउँगा."

"रहने दे बीरबल, तू न जितना छंटत है मुझे सब पता चल गया है. ऋतू बता रही थी मुझे और तेरी क्लास में मेरी सहेलिया भी है ये याद रखना. पूरी किताब घोट कर बैठा है और बात करता है लोस्स की.", रुपाली दीदी ने जैसे इत्र के कहा तोह अर्जुन उनको हँसते देख खुद भी खुश हो गया. कितनी मासूम और साफ़ थी उसकी ये bua-behan.

"आप कौनसा काम हो. ऋतू दीदी ने भी मुझे बताया की आजकल आप उनके साथ लेट नाईट तक स्टडी कर रही हो. और साथ हे प्रीती के फिजिक्स के नोट्स ख़तम कर चुकी हो 12तह क्लास तक के.", अर्जुन की बात सुन्न कर वह इठलाती हुई उसका हाथ थाम कर चलने लगी.

"ऐसा है न ऋतू को साथ में पढ़ने के लिए किसी की जरुरत नहीं पड़ती लेकिन रात में कमरे का माहौल अलग हे होता है. अलका 2-3 बजे तक पढ़ती है और Tara-Aarti भी अब साथ बैठने लगी है. एक टॉपिक शुरू हो जाये तोह फिर वह इतने ख़तम नहीं होता जितने क्लियर न हो जाये. शाम को 2-3 घंटे प्रीती भी साथ रहती है और वह केमिस्ट्री में बहोत ज्यादा हे तेज है. पता नहीं आर्किटेक्ट बन्न ने का क्या भूत है उसपे, मैं उसकी जगह होती तोह साइंटिस्ट बन्न न पसंद करती.", अर्जुन को ख़ुशी हुई की घर की लड़कीओ का माहौल इतना खुशनुमा और सहयोगी है.

"वैसे आपको परेशानी तोह नहीं होती किसी के साथ?"

"पागल है क्या? अजीब तोह लगता था शुरू में लेकिन अब सही बताऊ तोह ऋतू और कोमल दीदी के बिना तोह मैं अपने होने की कल्पना भी नै कर सकती. तारा और अलका भी काम नहीं है. शुरू में मुझे तारा का रेहान सेहन देख कर लगता था के वह अलग है लेकिन तारा दिल से बहोत बड़ी है और उसने मेरी काफी मदद की सब बदलाव समझने और अपनाने में."

"माँ के साथ भी चिपक के सोती हो.", अर्जुन ने टेढ़ा सा मुँह बनाते हुए कहा और दोनों घर के अंदर आ गए थे.

"हाहाहा. तुझे बुरा लगता है क्या? इस से पहले कभी माँ का प्यार नहीं मिला न मुझे तोह अब रेखा माँ के साथ वह कमी पूरी कर रही हु. सच कहु तोह मैंने बापू और एक खली घर को हे देखा था अपनी पिछली ज़िन्दगी में. ये बिलकुल विपरीत और स्वर्ग सा संसार है जहा मुझसे कोई नफरत नहीं करता, कोई jali-kati बात नहीं सुनाता. वह तोह काकी और गाँव के लोग मुझे कुलटा, अभागन, बेचारी और जाने क्या क्या कहते थे. इतना प्यार यहाँ मिला तोह ऐसा लग रहा है जैसे वह ज़िन्दगी बस एक तपस्या सी थी.", हंसती खेलती रुपाली दीदी की कजरारी आँखों में 2 बूँद पानी नीचे लुढ़कने लगा तोह अर्जुन ने उनको अपने सीने से लगा लिए. वह दोनों अंदर आँगन में खड़े थे जहा कोमल दीदी और ललिता जी ने ये देखा तोह वह दोनों उनके पास दौड़ी चली आई.

"क्या कहा तूने मेरी बची को? कुछ अकाल है या बैलबुद्धि दिखा दी अपनी?", ललिता जी ने रुपाली को अपनी तरफ करते हुए सीने से लगाया तोह वह रट हुए भी मुस्कुरा रही थी. ये देख कर कोमल दीदी कुछ शांत हुई.

"देखा अर्जुन मैंने क्या पाया है?", रुपाली दीदी इतना बोल कर ललिता जी का गाल चूम कर सीढ़ी कोमल दीदी वाले कमरे में चली गई. अर्जुन खुश था के इस घर में इतना प्यार है के वह सबके लिए भरपूर था.

"मुझे तोह कोई प्यार हे नहीं करता. और ये देखो लोग अब मुझे हे जिम्मेवार ठहरा देते है बिना बात समझे.", अर्जुन नाराजगी दिखता ऊपर सीढिया चढ़ कर कमरे में चला गया तोह कोमल दीदी भी अपने भाई के पीछे हे हो ली. ललिता जी उसकी नौटंकी देख कर हंसती हुई काम में लग गई.

ऊपर कमरे में इस वक़्त कोई न था. अलका और ऋतू कुछ वक़्त पहले हे मंजू मेनका के साथ चली गई थी. अर्जुन आराम से अपनी स्कूल की वर्दी उतार कर सिर्फ निक्कर पहने टोलिया ले कर नहाने के लिए निकल रहा था की दरवाजे पर कड़ी कोमल दीदी को देख कर ठिठक गया. वह शायद तबसे हे कड़ी थी जब अर्जुन कमरे के अंदर आ कर कपडे उतार रहा था. नज़र का चस्मा दीदी के हाथ में था और बस वह अर्जुन को हे निहार रही थी. ढीली सफ़ेद कुर्ती और वैसी हे साधारण सूती पजामी में उनका सौन्दर्य किसी भी सुंदरता की देवी को मात दे सकता था. वह ऐसी हे तोह थी. प्राकृतिक सुंदरता और हमेशा saaj-sajja से परे लेकिन सबसे खूबसूरत युवती.

"आज दमयंती सुदामा के द्वार पर.?", अर्जुन की चुहल भरी बात सुन्न कर कोमल दीदी लपक कर उसके सीने से जा लगी.

"क्यों सताते हो ऐसे.?", कोमल दीदी का यु उसके सीने से लग्न एक पल के लिए अर्जुन से बहोत कुछ कह गया. उनका वह प्यारा चेहरा हाथो में थामते हुए अर्जुन ने माथे को चूमते हुए उनकी आँखों में देखा.

"मैं कभी आपको सत्ता सकता हु? और किस बात का डर है आपको?"

"तुम बहोत कुछ छुपाने लगे हो मुझसे. मान लिए की बड़े हो रहे हो लेकिन क्या तुम्हे कभी ऐसा नहीं लगता के अगर तुम्हे कुछ हो गया तोह मैं ज़िंदा कैसे रहूंगी? माँ और ऋतू के साथ हे बाकी सबका क्या होगा?", कोमल दीदी का उसके साथ ऐसे गले लगे रहना और अब आंसू बहाना 2 अलग हालात बयान कर रहे थे. एक तरफ उनका अर्जुन के प्रति अटूट प्रेम तोह दूसरे में वह जैसे गहरे दर्द से झूझ रही थी. अर्जुन ने दीदी को बिस्टेर पर बिठाने के बाद कमरा अंदर से बंद कर लिए. वैसे इसकी जरुरत नहीं थी क्योंकि बहार वाला दरवाजा दीदी खुद हे बंद करके आई थी.

"आपसे कुछ छीप्प नहीं सकता लेकिन सच कहु तोह मैं खुद बताने की हिम्मत नहीं जूता प् रहा था. लेकिन इतना यकीन दिलाता हु आपको की मुझे कुछ नहीं होगा.", अर्जुन कोमल दीदी के घुटनो पर हाथ रखे जमीन पर बैठा था.

"मेनका ने बताया मुझे की क्या हो सकता था तेरे साथ. ऋचा को ज्यादा नै पता था लेकिन तबतक मुझे लग रहा था के तुम कुछ हद्द तक हे शामिल होंगे इस सब में और सुरक्षित होंगे. लेकिन इतनी बड़ी बात हो गई और तुमने कुछ कहना भी जरुरी नहीं समझा.", कोमल दीदी के आंसू रुक नहीं रहे थे और उन्हें देख कर अर्जुन के दिल में भी दर्द होने लगा था.

"वैसा नहीं करता तोह मेनका के साथ हे बहोत साड़ी ज़िन्दगी खतरे में पड़ जाती. पापा, दादा जी, मंजू, संजीव भैया, आप सभी की और मेरी भी. फिर भी मैं माफ़ी मांगता हु आपसे, मेरा मकसद आपको दुःख पहुंचने का नहीं था.", अर्जुन उनके बराबर बैठते हुए उस चाँद से चेहरे को ठीक करने लगा. वह किसी को भी दर्द में नहीं देख सकता था लेकिन कोमल दीदी की आँखों का पानी शायद दिल पर तेजाब सा लगता था उसके. दीदी शांत और मजबूत व्यक्तित्व वाली थी, जिन्हे रोना सिर्फ एक हे सूरत में आता था अगर अर्जुन कष्ट में होता था.

"मैं ये नहीं कह रही की तूने कुछ गलत किआ ारु. लेकिन ज़िन्दगी में ऐसे चक्रव्यूह तू अकेला नहीं भेद सकता. एक गलत क्षण या कदम सबकुछ तबाह कर सकता है. क्या होता अगर बिजेन्दर और उसके दोस्त बीच में नहीं आते? उमेद अंकल वह नहीं पहुंचते तोह? शबनम के लोग अगर एक्सीडेंट में नहीं मारे जाते तोह उमेद अंकल के साथ बिजेन्दर, उसके दोस्त और तुम भी मारे जाते. हर बार किस्मत इतनी मेहरबान नहीं होती.", अर्जुन उन्हें गले लगाए सब सुन्न रहा था लेकिन शबनम का जीकर होते हे उसको झटका लगा.

"ये क्या कह रही है आप? शबनम के कोनसे आदमी आ रहे थे वह? और ये मेनका नहीं बता सकती क्योंकि उसको तोह खुद नहीं पता था."

"उसको दादा जी ने बताया था कल. तू दोपहर में जब घर से गया था तोह मेनका आई थी घर पे. और आज जब मेरी बात हो रही थी तोह उसने बताया के #### शहर से 7-8 लोग तुम सभी को मारने के लिए आ रहे थे उस जगह लेकिन बाईपास से 10 किलोमीटर पहले ट्रक के साथ उनका एक्सीडेंट हो गया. 2 लोग हे ज़िंदा बचे और उन्होंने ये बयान दिए था के शबनम ने 20 लाख दिए थे इस काम के लिए. वेयरहाउस में मौजूद हर शख्स को मार डालने के लिए. तुम खुद सोचो अगर वह हादसा नहीं होता तोह कोई भी ज़िंदा बचता क्या? आइंदा से अगर तुमने ऐसे अनजाने क्षद्यंत्र में घुसने की कोशिश की तोह घर पे तुम्हे मेरी लाश हे मिलेगी.", कोमल दीदी रट हुए एकाएक गुस्से में उबाल पड़ी. अर्जुन कुछ जवाब दे पता उस से पहले हे वह दनदनाती हुई दरवाजा खोल कर बहार निकल गई.

'ये क्या था? हो गई गलती और समझा भी दिए के वह करना जरुरी था लेकिन अपने आप को मारने की बात कहा से आ गई? ज़िंदा हु और ठीक भी. पता नहीं दीदी इतना परेशां क्यों हो गई?', अर्जुन इस उधेद्बुण में हे था के उसकी माँ सामने से आती दिखी. वह हमेशा की तरह शांत और अर्जुन को देख कर मुस्कुरा रही थी.

"जा नाहा ले तब तक मैं तेरे कपडे निकलती हु. अलमारी भी ठीक करने वाली है.", रेखा जी ने आते हे अर्जुन की अलमारी में धुले हुए कपडे रखे और उसको निक्कर में खड़े देख नहाने के लिए कहा.

"माँ ये कोमल दीदी ने आज कुछ galat-salat खा लिए क्या?", अर्जुन खुद हे जैसे सदमे में था.

"वह तुझे अपनी जान से बढ़ कर चाहती है, बड़ी बहिन है तेरी. लड़किया शिवजी के व्रत रखती है पति पाने के लिए लेकिन कोमल शनिदेव की पूजा के साथ हे Surya-vrat रखती है तेरी लम्बी और सेहतमंद ज़िन्दगी के लिए. अगर तुझसे अनजाने में कोई गलती हुई है या कोई ऐसी बात है जिस से कोमल को ठेस पहुंची हो तोह प्यार से मन लेना ठीक रहेगा. नहीं तोह आज वह निर्जला रहने वाली है.", रेखा जी के इतना कहते हे अर्जुन ने ऊपर टीशर्ट पहनी और बिना नहाये हे बहार भाग गया. वह मुस्कुराती हुई बस अपने बचो के इस अटूट प्यार और एक दूसरे के लिए इतना समर्पण को देखती खुश थी. एक बैग में अर्जुन के 2 जोड़ी कपडे, कुरता पायजामा, टोलिया रखती वह बाकि काम भी करने लगी.

"दीदी दरवाजा खोलो.", अर्जुन ने कोमल दीदी के कमरे का बंद दरवाजा peet-te हुए आवाज दी. लेकिन दरवाजा 4-5 बार पीटने के बाद हे खुला वह भी थोड़ा सा.

"क्या है?", दीदी ने झरोखे से इतना हे पुछा लेकिन अर्जुन उतनी हे जगह में उंगलिया फसा कर एक तरफ का हिस्सा खोलता अंदर आ गया. फिर से दरवाजा बंद करने के बाद उसने पीछे से हे दीदी को बाहों में भर लिए.

"I'm रियली सॉरी. आपको बुरा लगा के मैंने वह सब किआ तोह मैं वचन देता हु के आज के बाद ऐसा कोई काम नहीं करूँगा जिस से आपकी आँखों में कभी आंसू आये. बस मुझसे नाराज मत होना कभी.", अर्जुन जिस तरह से कोमल दीदी से लिप्त था उसका धड़कता दिल दीदी भी अपनी पीठ पर महसूस कर रही थी. उन्हें भी पता था के अर्जुन बेशक ऋतू प्रीती या किसी से भी बेइंतेहा मोहब्बत कर सकता है लेकिन जो रिश्ता उन दोनों के बीच था वह अपने आप में सर्वोपरि था.

"मैंने ऐसा नहीं कहा ारु. बस ये कहा है के सामना उस परिस्थिति का कर जो तेरे सामने हो, जिस से तू भाग नहीं सकता. जिस खेल का तू हिस्सा बना वह कही से भी तेरा नहीं था. कुछ बड़े और पुराने खेल ऐसे है जिन्होंने अपनों को भी घर से दूर कर दिए है. तू अगर पापा जैसा हे bann-na चाहता है तोह फिर छोड़ दे किसी को भी प्यार करना क्योंकि तेरी मंज़िल कभी नहीं मिलेगी. दादा जी से कभी सवाल करके देख की वह सबकी नजरो के सामने जैसे दीखते है क्या सचमुच वह उतने हे साधारण और निश्चिन्त है? क्यों नरिंदर चाचा इस घर से 25 साल दूर रहे? कौन है चंद्रो दादी और शबनम के ऐसा करने की वजह क्या है.? मैं नहीं चाहती की तू कभी बेवजह कसूरवार बने ऐसी घटना का जिस से जाने कितने हे लोग जुड़े है.", कोमल दीदी घूम कर फिर से अर्जुन से लिपट गई थी.

"आप जो चाहती है वैसा हे होगा. मैं शायद कुछ ज्यादा हे chhan-been करने की वजह से वह कर गया जो एक तरह से रोका जा सकता था, मेरे बिना हे.", अर्जुन अपने खोजी मैं को अब बंद करना चाहता था.

"जानती हु की दादाजी तुझे एक अलग और ख़ास इंसान बना रहे है लेकिन उसका मकसद अलग है भाई. तू हमेशा से अलग हे था इसलिए वह तेरा इतना ध्यान रखते है. कल अगर तू पापा के नक़्शे कदम पर चला तोह जो होगा वह इतिहास से कही ज्यादा बुरा हो सकता है."

"मैं इतिहास नहीं दोहराऊंगा दीदी. मैंने आपसे वादा किआ है की बिना वजह मैं किसी फसाद में नहीं पडूंगा. लेकिन उस वक़्त हालात कुछ अलग थे और अगर मैं वैसा कुछ न करता तोह फिर वही होता जो मैं कह रहा हु. संजीव भैया भी हॉस्पिटल में है जो शायद हमारे बीच न होते अगर मैं वह नहीं होता.", अर्जुन अपनी दीदी को हिम्मत देते हुए अपनी बात कहने लगा.

"ये सब इसलिए हुआ क्योंकि उन्हें पता था पापा नहीं है और तू उनका वारिस है. संजीव भैया तोह हमेशा तेरा साथ देंगे लेकिन हर जायदाद तबतक बचो को नहीं लेनी चाहिए जबतक बड़े खुद वह तुम्हारे नाम न करे. जिस दिन दादा जी या पापा तुम्हे अपने पास बिठा कर सब बताये तोह तुम उनका साथ देना. ऐसे जोश में और अकेले निकल पड़ना बहादुरी नहीं बेवकूफी कहलाती है. सोच जरा अगर तुझे कुछ हो जाता तोह इस घर में क्या बाकी रहता?", कोमल दीदी की बात बिलकुल ठीक थी. अर्जुन को दादाजी ने जो काम दिए था वह उसको घेरे से बहार रह कर हे करना था. उन्होंने मन किआ था के उसको सामने नहीं आना लेकिन मेनका और सुशीला की खातिर उसने वह जोखिम उठा लिए था.

"कल रात भी घर पर हुम्ला होने वाला था दीदी. मैंने घर के बहार 4 लोगो को बेहोश कर दिए था क्योंकि वह बन्दूक के साथ हमारे घर में घुसने वाले थे.", अर्जुन के ऐसे खुलासे से कोमल दीदी हैरान रह गई. चेहरा साफ़ करने के बाद खुद को थोड़ा दुरुस्त किआ और अर्जुन का हाथ पकड़ कर वह दादा जी वाले कमरे की तरफ चल दी.

कौशल्या देवी बिस्टेर पर बैठी रामायण पढ़ रही थी और कोमल दीदी ने फ़ोन को खिसका कर एक नंबर मिलाया.

"ये नंबर मिला दीजिये जरा. क्सक्सक्सक्सक्स क्सक्सक्स क्सक्सक्सक्स.", कुछ देर शांति चाय रही और कौशल्या जी भी वह बड़ा ग्रन्थ बंद करती इन दोनों भाई बहिन को देखने लगी.

"हाँ पापा. आपको यहाँ की खबर है?", लाइन पर दूसरी तरफ शंकर जी थे जो कोमल दीदी द्वारा पापा कहते हे अर्जुन समझ गया.

"आपने जाने से पहले शायद किसी को भी समझाया नहीं होगा.", दूसरी तरफ से जैसे जानकारी ली गई लेकिन दीदी तोह खुद हे सवाल कर रही थी. फिर शंकर जी ने कुछ पुछा तोह दीदी ने इस बार सीधा बताना हे ठीक समझा.

"मुन्ना ने कल रात 4 लोगो को घर पे हुम्ला करने से रोका. सबके पास हथियार थे.", ऐसी स्पष्ट बात सुनते हे कौशल्या जी के रोंगटे खड़े हो गए और दीदी ने फ़ोन अर्जुन की तरफ बढ़ा दिए.

"Hello, नमस्ते पापा.", अर्जुन ने सामने की आवाज सुनाई देने से पहले हे अभिवादन किआ.

"तोह मेरा बीटा अब बड़ा हो गया है? जरा विस्तार से बताओगे के कल रात क्या हुआ? मैं यहाँ व्यस्त था तोह किसी से बात नहीं हो पाई मेरी.", शंकर जी ने सीधा मुद्दे की बात की अपने बेटे को एक छुपी हुई शाबाशी देने के साथ.

"कल रात मैं जल्दी सो गया था छत्त पर लेकिन फिर याद आया के गेट के टाला नहीं लगाया है तोह 1 या डेढ़ बजे मैं बहार टाला लगाने गया था. बहार चौकीदार अंकल को देख कर मैं कुछ देर उनसे बातें कर रहा था के एक गाडी हमारी तरफ आते हुए रुक गई.", इसके बाद अर्जुन ने पूरी बात बिना laag-lapet के वैसे हे बताई जैसे घटना घाटी थी. पुलिस की गाडी के आने तक. कौशल्या जी के साथ हे इस वक़्त रामेश्वर जी और छोल साहब भी कमरे में बैठे थे जिनके बारे में शायद अर्जुन को पता नहीं चला.

"तोह तुमने उन्हें ज़िंदा छोड़ दिए?"

"पापा, मेरा फ़र्ज़ था उन्हें रोकना और उचित सजा देना. बाकी तोह आपको पुलिस से पता चल हे जायेगा के वह लोग कौन थे. जरुरी बात ये है की रात 10 बजे वाला सेक्टर का नका पार करके वह यहाँ तक कैसे आ गए और मार्किट वाली पीसीआर की गाडी भी तोह अपनी जगह नहीं थी.", अर्जुन कितना कुछ समझता है ये बात रामेश्वर जी भली भाँती जानते थे लेकिन शंकर जी हैरान थे की उनका लड़का हर पहलु पर गौर करता है.

"अभी तुम संडे तक घर हे रहना. संजीव को मैं फ़ोन करके भेजता हु वह."

"भैया नहीं आ सकते अभी घर. और मुझे जमीन के काम से आज नाना जी के पास जाना है. कल सुबह वह भूमि पूजन भी है. लेकिन आप बताइये मैं वही करूँगा.", अर्जुन ने जैसे हे संजीव के घर न आने की बात कही तोह शंकर जी ने गहरी सांस ली.

"वह कौन कौन बैठा है इस वक़्त?"

"दादा जी, दादी, छोटे दादू और कोमल दीदी है मेरे पास.", अर्जुन ने सभी तरफ देख कर नाम बता दिए.

"दरवाजा बंद कर दो और लाउडस्पीकर पर करो फ़ोन को.", बीटल का ये आधुनिक लैंडलाइन फ़ोन था और इसमें स्पीकर पे बात करने की सुविधा थी. अर्जुन ने हैंडल एक तरफ रखते हुए 'लस' का लाल बटन दबा कर डब्बा बिस्टेर पर रख दिए. अंदर की तरफ से दोनों दरवाजे बंद करने से पहले आवाज सुनाई दी.

"माँ, आप और कोमल एक बार मुझे बात करने दो.", शंकर जी की आवाज सुन्न कर न चाहते हुए भी कौशल्या जी कोमल को साथ ले कर बहार निकल गयी. इसके बाद रामेश्वर जी ने बात करनी शुरू की.

"शंकर."

"हाँ पापा. ये अर्जुन कह रहा है के संजीव घर नहीं आ सकता. वह पर चल क्या रहा है? माँ से बात हर रोज हो रही है लेकिन मुझे खबर तोह वह लेती रहती है लेकिन उधर का कुछ नहीं बताया."

"मुझे लगा के उमेद या धर्मवीर जी से तुम्हारी बात हुई होगी, इसलिए घर से तुम्हे कोई सन्देश नहीं दिए. वह शीला देवी के मामले में तुम ठीक थे बीटा. अब तुम्हे कुछ नहीं पता तोह मैं इतना कहूंगा की यहाँ तुम्हारे जाने के बाद बहुत कुछ हो गया है.", रामेश्वर जी अभी भी सीढ़ी बात नहीं कर रहे थे.

"चाचा से मेरी कल दिन में हे बात हुई थी लेकिन उन्होंने भी सिर्फ हॉस्पिटल और कृष्णा की हे बातें की. शीला देवी ने क्या किआ?"

"शीला देवी का परिवार साफ़ करना पड़ गया. मोहर सिंह के साथ कुछ 7-8 लोग और भी उस घटना में मारे गए. उमेद के भी गोली लगी और संजीव की भी जान जैसे तैसे बची. लेकिन दोनों हे अब बेहतर है और ठीक है. कल रात वाला वाक़ेया तोह मुझे भी अभी थोड़ी देर पहले हे पता लगा है जब मैं धर्मवीर से मिलने गया. बहन सिंह ने योजनाबद्ध तरीके से भूपिंदर, धर्मवीर जी के घर और हमारे घर पर हुम्ला करने की साजिश की. भूपिंदर का बीटा उसके संरक्षण में था जिसको सही सलामत फ़िलहाल निर्मल सिंह की कस्टडी में रखा है. भूपिंदर के घर पे हुम्ला होने से भूपिंदर, उसकी बेटी और परमवीर घायल हुए लेकिन हमलावर सभी मारे गए. धर्मवीर के घर 5 लोग गए थे जिन्हे उनके लोगो ने संभल लिए था और यहाँ जो 4 आये थे वह सभी इमरजेंसी में है अर्जुन की बदौलत.", रामेश्वर जी को इतना बोलते देख अर्जुन ने पानी का गिलास उनकी तरफ बढ़ा दिए. एक घूँट भरने के बाद वह शंकर की आवाज सुन्न ने लगे.

"इसको घर से जाने मत देना बहार और अगर जमीन का काम जरुरी है तोह ये आना जाना करेगा सरकारी गाडी में. रात में फ़िलहाल सतीश चाचा को बोलिये के वह कैंट से गोविन्द और मुनीर को बुला ले. Sushila-Shabnam और जो भी बाकी है उनका काम मैं आते हे करूँगा.", शंकर की आवाज में जो पीड़ा और गुस्सा था वह तीनो को समझ आ गया था.

"शंकर, तुम जैसा चाहते हो वैसा हे होगा. सुशीला को अर्जुन ने बदल दिए है और चंद्रो देवी को खुद भाई साहब ने बचाया. चारो परिवार अभी सही हालत में है और हमको वह लोग परेशां नहीं कर सकते. बहन सिंह ने जो किआ उसमे जेलर अमरीक सिंह, शो राजपाल और बहन सिंह के कुछ मददगार शामिल थे. सभी अब निगरानी में है और हालत अब फिर से अनुकूल है. तुम्हे कोई नहीं रोकेगा कुछ करने से लेकिन पहले बात जरूर करना.", छोल पूरी ने जिस तरह से बात कही उस से कुछ हद्द तक शंकर का गुस्सा काम जरूर हो गया.

"सुशीला ने गलती मानी? शबनम का क्या किआ है?"

"अर्जुन ने उन दोनों की जान बचाई है. सुशीला ने गाँव के सामने गलती मानी है और वह फिर से बड़ी भाभी की बहु बन्न कर वापिस जाने वाली है. फ़िलहाल महीना लगेगा उसको ठीक होने में और शबनम खास जगह है क्योंकि मुझे लगा तुम ज्यादा ाचे से पूछताछ कर सकते हो. चूक हुई है थोड़ी बहोत लेकिन दोनों हादसों में अर्जुन ने बढ़िया काम किआ है लेकिन इसको दूर रखना हे बेहतर है. तुम बोल देना धर्मवीर भाई को के वैसे हे सुरक्षाकर्मी अब मैं रखने को तैयार हु. 2-4 जितने भी दिल करे. उनके चरों बच्चों ने कल रात ाचा काम किआ है जैसा पता लगा."

"आप तैयार है?"

"अब तोह जरुरी है. अर्जुन की आँख हर रात सही समय पर खुले जरुरी नहीं. उनकी हमेशा खुली रहती है. और इसको मैंने हे लेके जा रहा हु राजेश के पास लेकिन कल ये खुद चला जायेगा भूमि पूजन के लिए."

"ठीक है. मैं चाचा से बात करता हु. बाकी किसी को कुछ बताने की जरुरत नहीं. कल दोपहर की फ्लाइट है मेरी तोह परसो पहुंच जाऊंगा मैं. कृष्णा का भी ऑपरेशन ठीक हो गया है कल रात तोह 15 दिन बाद वह दोनों भी आ जायेंगे. रखता हु.", शंकर के फ़ोन रखते हे अब अर्जुन अपने दादा जी को देख रहा था और वह उसको.

"बरखुरदार, कपडे बदल लो और कोमल को कहना के 2 चाय बना दे. चलो लगे हाथ तुम्हारे नाना से भी मिल आते है.", एक फ़ोन से हे सारा प्रोग्राम पल में बदल गया था. अर्जुन भी उनकी बात मानते हुए दरवाजा खोल कर बहार निकल चला और रामेश्वर जी कोई और नंबर मिलाने लगे.

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क्रमश
 
अपडेट 102-बी

नफरत और प्यार (ी)


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जारी

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अर्जुन ने जो भी बात हुई वह सब कोमल दीदी को बता दी थी. सब सुन्न कर वह कुछ सोचने लगी और फिर उसको गले लगा कर अपने दिल की बात कही.

"आज रात मैं ऊपर सोने वाली हु.", अर्जुन बात समझते हे उनके मदभरे होंठो को चूम कर अपनी ख़ुशी जाहिर करने लगा.

"लेकिन आइंदा जिसके भी साथ करो उसको बता देना की जहा भी लिपस्टिक के निशान बनाये वह याद से साफ़ करे.", अर्जुन शर्मिंदा होता हुआ बहार जाने लगा तोह दीदी ने हाथ पकड़ लिए.

"दीदी, वह अन्नू के साथ था मैं. उसके बारे में बाद में बता दूंगा आपको और इसलिए हे मैं घर आने के बाद नहाने जा रहा था लेकिन ये सब हो गया."

"माँ ऊपर आई थी तोह उनकी नजरो में भी आया हे होगा. थोड़ा ध्यान रखा कर.", और दीदी उस से पहले हे दरवाजा खोल कर रसोईघर में चली गई. अगले आधे घंटे बाद अर्जुन अपन दादा जी और छोल साहब के साथ ननिहाल के लिए निकल चला. इस बार गाडी तेजपाल मां की थी और साथ में प्रीती भी. अर्जुन मां के बराबर बैठा बहार वाले शीशे से पिछली सीट पर बैठी प्रीती और उसके उड़ते बाल देख रहा था. दोनों ऐसे हे ख़ामोशी से एक दूसरे को देखते मुस्कुरा रहे थे और बाकी तीन लोग अपनी बातों में लगे रहे.

"बिट्टू बीटा पहले दूकान पर चलते है. काम होने के बाद घर बैठेंगे.", तेजपाल जी ड्यूटी पर नहीं थे तोह रामेश्वर जी का संवाद भी घरेलु हो गया. #### शहर की सीमा से अंदर आते हे अनाज मंडी थी जहा कुन्दनलाल जी और सोहनलाल जी इस वक़्त काम देखते थे. जल्द हे गाडी अपनी मंज़िल के सामने आ रुकी लेकिन रामेश्वर जी की तरफ का दरवाजा उनके समधी कुन्दनलाल जी ने खुद खोला.

"स्वागत है पंडित जी. नमस्कार सतीश भाई. धनभाग जो आज आप एक साथ हमारे गरीबखाने पधारे.", वह दोनों से हे गले लग कर बड़े जोश से मिले और उसके बाद प्रीती और अर्जुन से भी.

"गरीबखाने पर पनीर के मसाले वाले पकोड़े और चाय खींच लाइ भाई. सुना है यहाँ के मालिक बड़े दिलदार है.", रामेश्वर जी का याराना कही ज्यादा हे था इनके साथ और कुछ वैसा हे छोल साहब का.

"हाहाहा. सही कहा भाई साहब, ये गरीबखाना बोलकर हमको खली न तर्क दे. वैसे कुंदन भाई मेरा दिल तोह पुदीने की शिकंजी पीने का है, बूंदी वाली.", छोल साहब ने अपनी फरमाइश भी बता दी और सभी इस अनाज मंडी की सबसे बड़ी दूकान के अंदर आ गए. Preeti-Arjun जहा सोफे पर बैठे वही पंडित जी और छोल साहब जूते खोल कर सीधा जमीन पर लगे सफ़ेद गड्डो पर सोहनलाल जी से हाथ मिलते हुए चौकड़ी मार कर.

"पंडत भाई जुरमाना लगेगा इस बार. फ़ौज का आदमी छुट्टी होने के बावजूद न आया और आया तोह सुरक्षा के लिए थानेदार साथ लेके आया.", सोहनलाल जी की बात सुन्न कर एक बार फिर ठहाका लग गया.

"सोहन भैया बात ऐसी है के court-marshal वाले की इज़्ज़त्त न होती और खासतौर पे यारो में तोह बिलकुल नहीं.", छोल साहब ने गल्ले के बराबर पड़ी 'ट्रेक्टर' चाप ताश की गद्दी उठाई और इधर कुन्दनलाल जी ने दोनों बचो के लिए जूस और बड़ो के लिए chai-pakode और शिकंजी लाने के लिए मनोज को भेजा, जो अपने भांजे से गले लग कर मिलने के बाद haal-chal ले रहा था. तेजपाल जी आते हे पटवारी को बुलाने चले गए थे.

"लो पंडित जी काटो आप. आज बाजी कुंदन और सतीश के करने के बाद हे उठना है.", यहाँ तोह आते हे ताश का दौर शुरू हो गया था. अर्जुन और प्रीती दोनों हे हैरानी से देख रहे थे की उनके दादा जी ताश भी खेलते है और हमेशा तहजीब से रहने वाला और हलकी फुल्का हे मजाक करने वाले व्यक्ति यहाँ बिलकुल हे विपरीत नजर आ रहे थे.

"तुम दोनों के दोस्त नहीं है क्या?", इस आवाज को सुन्न कर अर्जुन खड़ा हो गया. 40 के लगभग का ये व्यक्ति आकर्षक होने के साथ हे हंसमुख और लम्बा था. आँखें बता रही थी की उम्र होने पर भी चंचलता बहोत थी.

"राजेश मां.", अर्जुन इतना कहता हे उनके गले लग गया. उन्होंने भी झट्ट अपने प्यारे भांजे को बाहों में ले लिए.

"तू तोह जमा देवपुरुष हो गया भांजे. अपने नाना से लम्बा और पिता से चौड़ा. वैसे ाचा लगा तुझे देख कर और ये खूबसूरत कन्या है तेरी होने वाली अद्धांगिनी प्रीती.", राजेश मां ने प्रीती के सर पे भी लाड से हाथ फिरते हुए कहा तोह वह शर्म से कुछ बोल न सकीय.

"आप न सही में जासूस हे हो. मम्मी ठीक कहती है के राजेश मां सबसे दूर रहते हुए भी हर बात और इंसान पर नजर रखते है.", अर्जुन बचपने से अभी तक उनके गले लगा खड़ा था.

"इतना भी कोई जेम्स बांड नहीं हु मैं. इसकी आँखें वैसी हे है और तेरी भी. हाँ बस आखिरी बार तुझे देखा था तब तू 2 फुट का था. प्रीती बीटा, जूस लो.", लड़का 4 गिलास जूस लेकर आया तोह राजेश मां ने अपने हाथ से एक गिलास प्रीती को दिए और फिर सोफे के सामने हे कुर्सी पर बैठते हुए एक गिलास अर्जुन को. वह दोनों भी वही बैठ गए थे. इधर तेजपाल जी भी अपने साथ एक अधेड़ से व्यक्ति और कुछ कागज लेकर उनके पास आ गए. दोनों मां अब प्रीती से बात कर रहे थे और अर्जुन पटवारी के साथ मिलकर सब समझते हुए फाइल पर हस्ताक्षर करने लगा. 10 मिनट में हे वह फारिग हुआ तोह अब राजेश मां नयी फाइल ले कर आ गए.

"इसमें तुम दोनों के सिग्न होंगे.", राजेश मां की बात सुन्न कर प्रीती भी हैरान हो गई.

"ऐसा पहले नहीं था और ये फाइल बस आधा घंटा पहले हे तैयार हुई है. जीजा जी का फ़ोन आया था अमेरिका से और जैसा उन्होंने कहा मैंने वही किआ. जमीन अर्जुन की है, काम मेरा है लेकिन अपना पैसा अर्जुन 21 की उम्र से पहले निकल नहीं सकता और उसके बाद प्रीती के हस्ताक्षर भी लगेंगे चेक पर. कहने का मतलब ये है के तुम दोनों बराबर पार्टनर हो आधे हिस्से के और अकाउंट भी साँझा रहेगा.", तेजपाल जी ने भी अपने भाई की बात पर सर हिलाते हुए सहमति जाता दी.

"ाची बात है. वैसे भी मुझे खुद नहीं पता के कहा कहा मुझे फसाया हुआ है दादा जी और नाना जी ने. काम से काम इस बार प्रीती के सर पे थोड़ा बोझ तोह आया.", अर्जुन ने हँसते हुए बताई जगह पर हस्ताक्षर किये और 2 जगह पर अंगूठा भी लगाया. प्रीती ने भी अर्जुन का अनुसरण करते हुए काम पूरा किआ. फिर राजेश मां ने वह फाइल दूकान पर काम करने वाले लड़के को देते हुए उसकी एक प्रत्कृति बनवा कर लाने को कहा.

"पापा, आपने घर नहीं आना क्या? अर्जुननननन..", ये स्वाति थी जो स्कूटी से दूकान पर आई थी लेकिन वह अर्जुन को देखते हे सबकुछ भूल कर उसके सीने से जा लगी.

"तू यहाँ आया है और एक फ़ोन तक नहीं किआ.? कोई बात नहीं इस बार देख मैं तेरी कैसे खबर लेती हु और maa-daadi को भी बोलूंगी की ये ज्यादा बड़ा हो गया है जो इस से घर भी नहीं आया जाता.", स्वाति के ऐसे कहने पर राजेश मां के साथ हे प्रीती के चेहरे पर भी हंसी आ गई. जवाब तेजपाल जी ने दिए.

"ओह मेरी राकेट, पहले अपनी मेहमान से तोह मिल ले. ये प्रीती है और प्रीती ये है मेरी लाड़ली स्वाति और अर्जुन की शैतान बहिन. इन दोनों को घर ले जा हम भी साढ़े 6-7 बजे तक आ जायेंगे. थोड़ा दूकान का काम करने के बाद जमीन पर जा के आना है इतने तू इसको जो सजा देनी है वह दे लेकिन प्रीती का ध्यान रखना.", राजेश मां ने तोह जेब से मोटरसाइकिल की चाबी निकल कर अर्जुन के सामने कर दी.

"ले भाई तेरी रानी. जरुरत थी इसलिए ले आया था नहीं तोह इसकी चाबी घर पे कोई दे नहीं रहा था मुझे.", हँसते हुए अर्जुन ने उस काली बुलेट की चाबी पकड़ ली और दादा जी को बोल कर Swati-Preeti के साथ हे बहार निकल आया.

"ऐसा है तेरी सजा यही से शुरू. स्कूटी पे प्रीती मेरे साथ चलेगी और तू पीछे पीछे आएगा हमारा बॉडीगार्ड बन कर. और प्रीती देखना आज मैं तुम्हे हमारा शहर घूमती हु, तुमने तोह **** शहर घुमाया नहीं, जहा मैं तुम्हारी मेहमान हु.", स्वाति ने दोनों को हे लपेटे में ले लिए था.

"पहले पता नहीं था लेकिन अब देखना मैं रोज तुमसे मिलूंगी. अर्जुन ने इतना बताया था के तुम तीन बहने यूनिवर्सिटी में पढ़ती हो लेकिन मिलवाया नहीं. मैं 4-6 स्टेडियम जाती हे हु तोह कभी कभी वह की जगह तुम्हारे साथ मस्ती कर लुंगी.", प्रीती पीछे बैठी तोह अर्जुन ने भी उस चमचमाती रानी-2 को स्टार्ट किआ. वह दोनों तोह अपनी जहा भर की बातें करती चलने लगी और उनको देखता अर्जुन बड़े आराम से इस शांत शहर की सड़को पर बस मोटरसाइकिल के मजे लेने लगा. दोनों दोपहिया उनकी गली में पहुंचे हे थे की स्वाति ने स्कूटी रोक दी. सरोज जी घर के बहार कड़ी सब्जी की रेहड़ी से सामान ले रही थी.

"बुआ, देख लो जरा ख़ास मेहमान को.", वह फिर भी रेहड़ी के दूसरी तरफ थी लेकिन अर्जुन मोटरसाइकिल ठीक गेट के सामने कड़ी करती सीधा अपनी मौसी के गले लगते हुए मिला. सरोज मौसी भी पहले हैरान होने के बाद खुश हो गई.

"ये मेरा बीटा है लेकिन जो तेरे पीछे बैठी है न वह भी मेहमान नहीं है.", प्रीती शर्माती सी स्कूटी से उतर कर उनसे अर्जुन की तरह हे मिली.

"क्या बात है. मतलब हमारे शहर में हम हे अनजान है. प्रीती को आप पहले से हे जानती है?"

"जैसी मंजू वैसी प्रीती. और मेरे लिए तोह तू भी वही है.", मौसी दोनों को अपने साथ ले जाना चाहती थी लेकिन फिर अर्जुन ने बाद में मिलने का कहा तोह उन्हें जाने दिया. अर्जुन ने 6 बजे आने का कहा और मुस्कुराता हुआ नानी के घर की तरफ बढ़ गया. साढ़े 3 तोह अभी हो चुके थे. घर पर हमेशा की तरह उसका स्वागत तिलक के साथ तीनो नानी ने किआ. पूजा मामी उनके शहर में हे थी समय और संगीता के साथ. यहाँ संगीता, अनीता और ममता मामी थी जो अर्जुन को देख कर मुस्कुराती हुई उस से गले लग कर मिली थी. जल्द हे सबका ध्यान प्रीती पर आ गया और अर्जुन टाइगर के साथ खेलता घर के अंदर आ गया.

"दादी, देखो खाना ये लोग खा कर हे आये है फिर भी आपने इन्हे नाश्ता करवाना हे है लेकिन प्रीती मेरे साथ मार्किट जाएगी. माँ ये हमारी मेहमान है तोह खातिरदारी करना जरुरी है न?", स्वाति छोटी बची की तरह इठलाती हुई अपनी दादी और माँ से जैसे फरमाइश कर रही थी.

"हाँ हाँ जहा लेके जाना है ले जा. कर ले मस्ती लेकिन ये अर्जुन कोई बैग नहीं लेके आया?", सुनंदा जी ने एक बार फिर अपने नाती को सीने से लगते हुए पुछा. हर बार अर्जुन अपनी नानी की ख़ूबसूरती में खो जाता था और आज भी वह उन्हें हे देख रहा था.

"नानी, मैं आज तोह यहाँ शाम तक हे हु लेकिन कल सुबह मैं वापिस आऊंगा तोह आराम से शाम तक आपके साथ रहूँगा."

"ाची बात है. जैसा ठीक लगे वैसा करो और अनीता, शरबत बना दे बेटी बचो के लिए. मैं जरा दीदी और ममता के साथ मंदिर जा रही हु कल की पूजा के लिए सामग्री भी बनवानी है और कुछ ख़ास लोगो को निमंत्रण भी देना है.", थोड़ी हे देर में हलके jal-paan के बाद ममता मामी के साथ बड़ी नानी और सुनंदा जी चली गई. स्वाति भी जेब भर के पैसे लेकर प्रीती को मार्किट घूमने के लिए तैयार हो गई थी.

"ओह हीरो, देख अगर तूने चलना है तोह आजा. तुझे भी शॉपिंग करवा दूंगी.", स्वाति के ऐसा कहने पर अर्जुन ने हँसते हुए मन कर दिए.

"आज का समय प्रीती को देदो, कल हम दोनों चलेंगे और शॉपिंग मैं करवाऊंगा.", अर्जुन आँगन में लगे नलके पर मुँह धोने के बाद अब चारपाई पर बैठ कर तोलिये से चेहरा साफ़ कर रहा था. प्रीती ने इजाजत ली तोह स्वाति ने खुद हे हाथ पकड़ कर साथ ले जाते हुए कहा.

"इतना पूछने की जरुरत नहीं है. वह रोटदु आलसी है. हम समय ख़राब नहीं करते ऐसे लोगो के लिए.", स्वाति के नखरे में जो नाराजगी थी वह सिर्फ अर्जुन समझता था. आज ननिहाल आने पर पहली बार अर्जुन ने इतना खली सा माहौल देखा. फिर कल होने वाले कार्यक्रम की याद आते हे समझ गया के इतना बड़ा काम है तोह सभी व्यस्त तोह होंगे हे.

"आपका कमरा ठीक कर दिए है, थोड़ी देर आराम कर लीजिये. माँ जी को आने में 2 घंटे लगेंगे.", संगीता मामी का इस तरह सम्बोधित करना पलभर के लिए हैरानी वाला था लेकिन फिर दूसरा रिश्ता याद आते हे अर्जुन मुस्कुरा उठा.

"आप आराम नहीं करेंगी साथ में?"

"अनीता है आपके कमरे में. छोटी माँ और बिंदिया घर में है तोह मैं यही ठीक हु. वैसे कहना नहीं चाहिए लेकिन धन्यवाद.", संगीता 27 की उम्र में भी एक युवती सी हे थी लेकिन पिछली बार की तुलना में चेहरे पर एक ख़ास चमक बता रही थी की स्त्रीत्व उभरने लगा है.

"जान सकता हु धन्यवाद की वजह?"

"प्यार करना सफल रहा.", इतना कह कर संगीता अपनी सास के कमरे की तरफ चली गई और अर्जुन सर खुजाता हुआ ऊपर वाली सीढिया चढ़ता उस आखिरी कमरे में आ गया जो पिछली बार उसको दिया गया था. दरवाजा खोलते हे अनीता मामी बिस्टेर से उठ कर एक तरफ कड़ी हो गई. थोड़ी देर पहले वह एक नीली साड़ी में थी जब अर्जुन आया था लेकिन अब एक gulabi-safed सलवार कमीज पहने सर पर गुलाबी चुन्नी लिए वह महक रही थी. भीगे खुले केश बता रहे थे की वह बस अभी नाहा कर तैयार हुई है.

"मामी कड़ी क्यों हो गई आप?", अर्जुन अपनी छोटी मामी को कुछ पल निहारने के बाद बोलै. सवा पांच फ़ीट कद की अनीता का शरीर भी एक जवान मेहनती लड़की सा हे था. माध्यम से उभार, पतली कमर और अधिक से अधिक 32-33 के नितम्ब. ऐसे शरीर पर जहा बहोत पहले हे म्हणत होनी चाइये थी वह सिर्फ एक बार संसर्ग सुख मिला था वह भी अर्जुन से.

"यहाँ तोह मामी मत कहिये. दीदी भी तोह आपको अकेले में अलग रिश्ते से बुलाती है.", अनीता मामी की नजरे अभी भी झुकी हुई थी. अर्जुन कदम उनकी तरफ बढ़ने लगा तोह फिर से अनीता मामी ने टोक दिए.

"दरवाजा.", और उनकी बात पूरी करते हुए अर्जुन ने दोनों किवाड़ बंद करते हुए चिटकनी लगा दी. जल्द हे वह अपने से दुगने वजनी और एक फ़ीट ऊँचे प्रेमी की बाहों में थी.

"आपको ख़ुशी नहीं मिली आपकी दीदी की तरह?"

"मेरा समय उस वक़्त सही नहीं था, ये बाद में पता चला और शायद तरीका भी.", अर्जुन के बदन की गर्मी से अनीता का भी जिस्म जैसे पिघलने लगा था. चौड़े सीने पर खुद हे चुम्बन करती वह बता रही थी की उन्हें अर्जुन की कितनी प्रतीक्षा थी.

"वैसे इस एकांत के पीछे भी कोई कहानी है क्या?", अर्जुन ने खड़े हुए हे अनीता मामी का 50 किलो वजनी शरीर फूल की तरह उठाते हुए उन्हें बिस्टेर पर लिटा दिए.

"किस्मत से मिला है. काम बहोत है और सभी उसमे व्यस्त है. मैं रात को भी आ जाउंगी.", अर्जुन के हाथो ने उन माध्यम से सेबो को कपडे के ऊपर से हथेली में पकड़ा तोह निप्पल कड़े थे और अंदर कोई ब्रा नहीं थी. हलके हलके उन्हें मसलता वह अनीता मामी के होंठ चूसने लगा. गोरी गर्दन पर जीभ फिरते हुए उसने वह छोटी छोटी पानी की बूंदे भी चूस ली जो बालो से होते हुए इधर आ गई थी.

"रात मैं नहीं रुकूंगा. लेकिन कल सुबह से शाम तक आपके आसपास रहूँगा.", ढीली कमीज को ऊपर करते हुए अर्जुन ने वह नरम गोरा पेट चूमा तोह अनीता मामी के हाथ अर्जुन की पीठ और सर को सहलाने लगे. आँखें बंद किये वह हलकी आहें भर रही थी. अर्जुन के इतना करने भर से हे उनकी गुलाबो ने 2 बूँद शबनम की टपका दी थी.

"आठ.. फिर जितना समय दे सकते हो दो. दीदी का भी दिल था लेकिन फ़िलहाल जो जरुरी है वह ठीक है.", उनकी बात सुनते हुए अर्जुन ने कमीज और ऊपर की तोह मामी ने खुद हे पीठ हलकी ऊपर उठा दी. कपडा दोनों गोर चुचो से ऊपर होता गले तक आ गया. हलके भूरे पतले निप्पल वैसे हे थे जैसे 16-17 साल की युवती के अछूते चूचक. जीभ से एक को सेहलत हुए दूसरे को अर्जुन ने मुठी में भर लिए.

"आप पर ठीक से म्हणत करने की देर है फिर ये भी इन हाथो में नहीं आएंगे.", अनीता मामी तोह मजे में बस शरीर हिला रही थी और अर्जुन का हर स्पर्श उनकी उत्तेजना बढ़ा रहा था. सलवार के ऊपर से उनकी जांघो के बीच हाथ रखा तोह वह भी पंतय नदारद थी और नरम छूट के होंठ उसके हाथ पर साफ़ महसूस हो रहे थे. हलके दबाव से उनकी योनि को रगड़ते हुए अर्जुन ने अब दूसरा सतांन चूसना शुरू किआ. पहले वाले का निप्पल 2-3 मिनट की चूसै से हे हल्का फूल गया था. लार से भीगा वह तीखा चूचक अब ज्यादा आकर्षक लग रहा था.

"आअह्ह्ह.. अभी से कैसे तुम इतना कुछ जानते हो.. आठ.. प्लीज ये तड़प ख़तम कर दो अर्जुन.. ", उनकी याचना और छूट का रोना देख कर अर्जुन ने तुरंत हे अपनी टीशर्ट और जीन्स निकाल कर एक तरफ रख दी. मामी ने उसको कुछ करते न देखा तोह आँखे खोली और फिर तुरंत बंद कर ली. लेकिन अर्जुन उन्हें थोड़ा खोलना चाहता था.

"मामी, अकेले हे करना है तोह मैं बाथरूम में जा कर हाथ से हिला लेता हु.", अर्जुन के स्वर में गंभीरता देख अनीता जल्दी से सीढ़ी बैठ गई. कमीज और सलवार खोल कर वह अर्जुन को देखने लगी.

"ओह मेरी नासमझ मामी, मेरा मतलब कपडे उतरने से नहीं था. हम जो कर रहे है वह प्यार है और इसमें दोनों को साथ रहना चाहिए. अगर ज्यादा शर्म आ रही है तोह ये लो लाइट बंद कर दी.", बंद कमरे में जलती छोटी तुबेलिघ्त बंद करते हुए अर्जुन अपनी मामी को बाहो में लेके लेट गया.

"ज्यादा पता नहीं. पिछली बार अँधेरा भी था और दीदी का भड़काया हुआ जोश भी. लेकिन अब शिकयत का मौका नहीं दूंगी.", मामी ने अर्जुन के ढीले निक्कर में हाथ डालते हुए वह मजबूत डंडा थाम लिए. होंठ चूमती हुई वह धीरे धीरे लुंड को भी सेहला रही थी. अर्जुन भी निचले हाथ से उन्हें आगोश में लिए ऊपर वाले हाथ से उनकी एक मखमली टांग अपने ऊपर करते हुए कूल्हों की तरफ से हे वह नाजुक छूट सहलाने लगा. अनीता मामी ने खुद हे घुटना ज्यादा मोड़ते हुए छूट को और ाचे से खोल लिए.

"मामी आप न अभी तक एक 12 क्लास की लड़की जैसी हो.", ऊँगली हलकी सी अंदर डालते हुए वह छूट का गीलापन परख रहा था. भरपूर चिकनाहट आ गई थी.

"एक तोह मामी मत कहो अभी और दूसरा जब मैं सामने से खुद तुम्हे सौंप चुकी हु तोह म्हणत करके ये शरीर भर क्यों नहीं देते.?", सख्त सीने में खुद हे वह अपने नाजुक चुके रगड़ती सिसक भी रही थी. अब अर्जुन लगभग पूरी ऊँगली अंदर बहार कर रहा था. अनीता मामी की छूट बुरी तरह से गरम हो कर रास बहा रही थी. मौका ठीक समझते हे अर्जुन ने उन्हें सीधा लिटाते हुए अपनी निक्कर उतार दी.

"मैंने ये कैसे लिए था?", बेशक वह कुछ देर से उस मॉटे लुंड को सेहला रही थी लेकिन निक्कर उतारते हे स्प्रिंग सा उछलता वह अर्जुन की नाभि से 2 इंच ऊपर जा लगा तोह मामी हैरत से उसका आकर देखने लगी. वह साफ़ रंग का उनकी कलाई से मोटा और अर्जुन के बाकी के शरीर की तरह हे खासा उभरा और सख्त दिख रहा था. सूपड़ा लाल और किसी देसी टमाटर सा मोटा.

"आप फिर से लेने वाली है तोह जवाब मिल हे जायेगा. ये अपनी जगह पहचानता है.", उनकी नरम टाँगे दोनों तरफ फैला कर घुटने मोड़ते हुए अर्जुन उनके ऊपर झुक गया. सुर्ख लाल होंठो को पीते हुए उसने सीधे हाथ से अपना लुंड मामी की रस छोड़ती छूट के मुहाने पर लगते हुए ऊपर नीचे रगड़ा और नरम फैंको को फैलते हुए सूपड़ा उस छोटे से छेड़ पर टिका दिए. अनीता मामी की धड़कन बहार तक सुनाई दे रही थी. होंठो को कास के मुँह में भरते हुए अर्जुन ने अपनी कमर नीचे को धकेली और मामी की चीख उसके मुँह में हे दबी रह गई. लुंड कच्छ से एक तिहाई अंदर बैठ गया. छूट बुरी तरह चौड़ी होती हुई लुंड से किसी जोंक की तरह चिपक गई थी.

"आह्हः.. बड़े जालिम हो.. मर्डर गई माँ.. ये पहले जैसा नहीं है.. बेशक लम्बा था लेकिन आह्ह्ह्ह.. कितना मोटा है ये.", आँखे भीग गई थी जीने अर्जुन चूमते हुए साफ़ कर रहा था. एक हाथ कोहनी के भार टिका कर दूसरे से वह उनका stann-mardan करने लगा. 5 मिनट बाद हे मामी ने हिम्मत से खुद को संभल लिए. अर्जुन उतने हे लुंड को थोड़ा आगे पीछे हिलाते हुए जगह बनाने लगा. अगले धक्के से पहले उसने मामी के दोनों गोर पत् जकड लिए थे.

"मायआ.... फट गई मेरी.. आअह्ह्ह..", मामी दर्द के बावजूद बहोत हलकी आवाज में चीख रही थी. 7 इंच लुंड ने उस लगभग कुंवारी छूट को राउंड दिए था. माखन में चाकू की तरह अर्जुन का लुंड उस नाजुक छूट में जा फसा था. बिना सम्भलने का मौका दिए अर्जुन ने इस बार दोनों चुके थामते हुए 3-4 इंच लुंड अंदर चलना शुरू कर दिए. हर धक्के के साथ वह चीखे बदलने लगी थी. चुके और छूट लाल होने लगे लेकिन अब अनीता मामी की छोटी सी गांड भी खुद उछलती हुई लुंड को लेने लगी थी.

"मामी, अब ाचा लग रहा है न. आप न बहोत ज्यादा हे नाजुक और छोटी हो. ऐसी छूट सबकी नहीं होती.. आठ..", अर्जुन को भी पूरी म्हणत करनी पड़ रही थी उनकी चुदाई करने में. पहले तोह अप्राकृतिक चिकनाई की वजह से सील तोड़ी थी लेकिन इस बार तोह बस चुतरस का हे सहारा लिए था.

"सबका लुंड भी तोह इतना बड़ा नहीं होता.. आठ.. उम्म्म्म.. मेरी छोटी है ये पता है मुझे उम्म्म.. लेकिन ये बहस के खूंटे जितना मोटा डंडा बड़ी में जायेगा तोह उसको भी फाड़ देगा. आठ.", अर्जुन उनकी टाँगे उठाये अंतिम छोर तक लुंड ठूस रहा था. इतनी देर की चुदाई में भी छूट जरा भी ढीली महसूस न हुई थी.

"आपने और किसी देखि है? आह्हः.. और किसी मर्द का भी देखा है क्या?", फिर से दोनों चुचो को दबाते हुए एक चूचक मुँह में लेके वह चूसने लगा तोह अनीता को जैसे अब चुचो में हल्का दर्द होने लगा था. लेकिन छूट के मजे के सामने ये दर्द कुछ नहीं था.

"हम्म.. आठ.. परसो रात को राजेश जेठ जी ममता दीदी के खेत में हल चला रहे थे.. आठ.. दीदी की तोह कही ज्यादा हे मोटी और लम्बी दिखाई दी.. उम्म्म.. जेठी जी का बड़े आराम से अंदर जा रहा था और 10 मिनट बाद जब वह फारिग हुए toh...aahhhh. देखा के वह सही अकार का था, इंसान की तरह.. उम्म्म. तुम्हारा किसी घोड़े जैसा है.. उम्.. आह्ह्ह्हह...", इधर अनीता मामी निढाल हो कर थोड़ी ढीली हुई तोह छूट में एकाएक बढे गीलेपन ने बता दिए के उसका ाचा खासा पानी निकला है. अर्जुन ने झट्ट लुंड बहार निकल लिए. मामी को पलट कर खुद हे घोड़ी की मुद्रा में करते हुए वह फिर से पूरा उस गीली सुरंग में समां गया.

"आह्ह्ह्ह.. माँ.. बेदर्दी हो जो ऐसे चुदाई कर रहे हो.. आठ.. पेट में लगता है अर्जुन थोड़ा आराम से.", टपकती छूट में पूरा धक्का मारने से भी लुंड समूचा अंदर नहीं जा रहा था. एक नरम दिवार पे ठोकर लगते समाया भी एक इंच लुंड बहार रह जथा.

"मामी छूट हे इतनी छोटी है आपकी. ये अभी तक थोड़ा सा बहार है. लेकिन जल्द हे सारा अंदर लेने लगोगी बस एक बार माँ बन्न जाओ आप.", पीछे से हाथ बढ़ा कर अर्जुन तूफानी गति से चुदाई करने लगा और अब जैसे अनीता मामी का धैर्य भी जवाब दे गया. छूट फिर से भीग गई थी लेकिन अर्जुन निरंतर उन्हें पेलता गहरे धक्के देने लगा.

"पलट जाओ.", उसको धयान आया के सही मुद्रा में अंदर छोड़ना है. लुंड सामने से अंदर डालते हे बस 2 मिनट और चुदाई करते हुए दोनों साथ में झड़ने लगे. सुपडे के फूलने से दर्द कुछ ज्यादा हे हुआ लेकिन छूट में गरम वीर्य की सिकाई होते हे मामी निढाल हो गई. लुंड अंदर हे फसाये अर्जुन ने 2 टैक्ये गांड के नीचे रखते हुए उसको ऊँचा उठा दिए जिस से वीर्य कुछ ज्यादा हे समय अंदर रह सके.

"मामी, थोड़ी देर अपनी कमर और कूल्हे ऐसे हे रखना.", खड़े होने के बाद उसने कपडा पानी से गीला करते हुए अपना लुंड साफ़ किआ और निक्कर पहन ली. पसीने में भीगी अनीता मामी के होंठो पर पानी की बोतल लगते हुए वह उनका सूखा गाला भी ठीक करने लगा. अलमारी में बॉडी लोशन रखा था जो उसको पहले से पता था. थोड़ी देर तक ाचे से उनके नरम शरीर की मालिश करते हुए वह उनके बराबर लेट गया.

"मेरी शादी तुमसे क्यों नहीं हुई?"

"मामी, मेरी तोह अभी तक नहीं हुई और आपकी बहोत पहले हो चुकी है. और अभी भी 6 साल पड़े है मेरी शादी में. इतने साल तोह आपको थोड़ी खुशिया दे हे दूंगा.", अब अनीता मामी में उसकी तरफ पलट कर होंठो चूसने लगी. उनको अर्जुन का ये स्वाभाव और ऐसा प्यार करना पसंद आ गया था.

"कल अगर मेरे लिए समय न मिले तोह दीदी के लिए निकल लेना. वह भी खुश हो जाएँगी."

"आप दोनों को एक साथ करू?", अर्जुन ने जाने ये कैसे कह दिए.

"धत्त. ऐसे थोड़ी न होता है.", मामी शर्मा गई थी सिर्फ उसकी बात सुनकर हे.

"देखो आप इतनी देर में 4 बार हुई और अगर संगीता मामी साथ होंगी तोह दोनों 2-2 बार फारिग हो जाओगी और हम एक हे समय पर तीनो प्यार कर सकते है.", अर्जुन ने जैसे अब मैं हे बना लिए था. उसकी बात सुन्न कर अनीता मामी थोड़ी देर तक उसके सीने से लगी सोचती रही. वीर्य छूट से बेहटा हुआ पत् पर आने लगा तोह उसी गीले कपडे से साफ़ करती वह बोली.

"दीदी से पूछती हु. ना तोह नहीं करेंगी लेकिन दोनों तुम्हारे सामने नंगी कैसे होंगे?"

"आप दोनों ने कही एक दूसरे को नहीं देखा?"

"बहोत बार लेकिन वह अलग बात है. कपडे बदलते या कभी saaf-safaai के बाद यहाँ ऊपर वाले नलके पर साथ नहाते हुए भी लेकिन तुम मर्द हो. ऐसे में मुश्किल होगा."

"जोर नहीं दे रहा मामी. अगर वह मान जाएँगी तोह एक साथ प्यार करेंगे नहीं तोह फिर ऐसे हे. अब आप कपडे पहन कर थोड़ी देर आराम करो मैं नीचे चलता हु. स्वाति और प्रीती भी आ सकती है.", अर्जुन ने खुद हे मामी को कपडे पहनाये और अपनी हालत भी सही करने के बाद वह दरवाजा ढालते हुए बहार निकल गया.

'भगवन प्यार करने वाला भी मिला तोह ऐसा. पुर्जा पुर्जा टॉड कर रख दिए. आह्ह्ह्ह.. लेकिन प्यार हो तोह ऐसा हे हो जो हर हिस्से पर नाम लिख दे.. उम्म्म किस्मत इतनी बुरी भी नहीं है मेरी.', खुद से बातें करती अनीता मामी इस एक चुदाई से हे तृप्त हो गई थी. आँखें अपने आप हे बंद हो गई थी. एक घंटे के लगभग दोनों ने मिलान किआ था लेकिन अर्जुन के तोह जिस्म पर कोई शिकन तक न दिखाई दी.

बहार निकलते हे अर्जुन को संगीता मामी सामने वाले हिस्से से ट्रे में गिलास लेके नीचे जाती दिखी. वह रसोई जो थी. अर्जुन भी इस तरफ से निचे चल दिए. दोनों एक हे समय पर आँगन में आये और दूसरी तरफ से सुमित्रा नानी भी बिंदिया के साथ चलती आँगन में रखे तख़्त पर आ बैठी.

"छोटी नानी, आपकी तबियत ठीक है न?", अर्जुन उनके बराबर बैठा तोह बिंदिया ने एक अदा से अर्जुन को देखा जैसे उसके भी दिल कोई इत्छा थी.

"बीटा वैसे तोह सब ठीक है लेकिन कुछ दिन से घुटने में सूजन है इसलिए बस बिंदिया से मालिश करवा के आई हु. तू सुना तेरा स्कूल कैसा चल रहा है? रेखा ध्यान तोह रखती है न तेरा नहीं तोह मैं उसके कान खींचूंगी.", सुमिता जी ने लाड से अर्जुन का सर पुचकारा और फिर ट्रे से दूध का बड़ा गिलास उठा कर उसकी तरफ बढ़ा दिए.

"हाँ नानी, माँ तोह बहोत ध्यान रखती है और स्कूल भी ाचा चल रहा है. वैसे घुटने की सूजन का एक इलाज मैं बताऊ.?", अर्जुन ने अपनी मामी को भी बैठने का इशारा दिए तोह वह सामने हे कुर्सी पर बैठ गई. ननिहाल का परिवार वैसे भी खुले माहौल वाला था जहा बहु को बेटी सा हे रखते थे. घूंगट तोह शायद हे कोई लेता था बड़ी नानी के सिवा.

"बता जरा तेरा भी नुस्खा सुन्न लू. डॉक्टर ने तोह ये मलहम दे दी और 6 गोलियां."

"दादी, इस उम्र में ये संकेत है के खुराक में कमी है. फ़िलहाल तोह सूजन काम करने के लिए फिटकरी दाल कर गरम पानी से सेक करो और फिर कपडे से धक् लो लेकिन अब अपनी डाइट भी ाची करो. अब आपको कैल्शियम की भी ज्यादा जरुरत पड़ेगी."

"ाची बात है. संगीता जैसे मेरा लाडला कहता है वैसे हे करना. काम से काम ये तोह ध्यान दे रहा है नहीं तोह इसके नाना को बस अपने खेत दीखते है, जिसको ब्याह के लाये वह याद हे नहीं.", सुमित्रा जी की बात पर सभी हंसने लगे. फिर maami,naani और बिंदिया छाए पीने लगी और अर्जुन बादाम वाला दूध. थोड़ी हेर देर में प्रीती और स्वाति दोनों हाथो में कई सरे बैग लेकर अंदर आयी लेकिन स्वाति उसका हाथ पकड़ कर दूसरी तरफ से अपने कमरे में ले गई. अर्जुन को भी ाचा लगा के प्रीती यहाँ आ कर उसकी बहिन के साथ खुश है.

"अनीता नहीं दिख रही?", उनके पीछे हे ममता मामी और सुनंदा नानी भी चली आई. दोनों के हाथ में कुछ सामान था जो बिंदिया ने आगे बढ़ कर ले लिए. "थोड़ा सामान गाडी में भी है वह प्रकाश निकल रहा है तू उसके साथ ले आ. संगीता बेटी पानी पीला दे. इस उमस ने बुरा हाल कर दिए.", सुनंदा जी की बात सुन्न कर मामी जल्द कड़ी हो गई. सुनंदा जी साड़ी के पल्लू से अपना चेहरा पांच रही थी और कुछ वैसा हे हाल ममता मामी का था और उनकी तरफ देखते हे अर्जुन को उनसे ज्यादा हे पसीने आ गए. सफ़ीद झीने ब्लाउज के अंदर से नानी के कैसे हुए उभार और दूसरी तरफ ममता मामी के तोह जैसे ब्लाउज से बहार हे निकलने वाले थे. झेंपता हुआ वह गिलास को देखने लगा.

"अनीता.. ओह अनीता.", सुमित्रा जी ने आवाज लगाई तोह दरवाजा खोल कर अनीता मामी बड़ी सावधानी से सीढिया उतरती उनकी हे तरफ आने लगी. अब फिर से वह नीली साड़ी में थी लेकिन लाख सँभालने के बावजूद उनके चेहरे पर आती दर्द की लकीरे और टांगो के बीच का फरक सुनंदा जी से चिप्प न सका जो अनीता को हे देख रही थी. सुमित्रा जी की उस तरफ पीठ थी लेकिन ये दृश्य ममता ने भी देख लिए था.

"हिम्मत वाली है अनीता.", ममता मामी के मुँह से अनजाने हे ये निकल गया लेकिन झटका लगा अपनी मंझली सास की आवाज सुन्न कर.

"कुछ पाने के लिए कई बार बड़े फेंसलो के साथ बड़े काम भी करने पड़ते है. हिम्मत दिखाना बुरी बात नहीं." लेकिन अर्जुन तोह जैसे मामी की बात से हे पानी पानी हो गया था. नानी की आवाज तोह उसको सुनाई हे न दी थी. समय baat-chit में हे निकल गया और रामेश्वर जी के आने पर अर्जुन सरोज मौसी को लाने चला गया. घंटा भर पारिवारिक बातें होती रही और बीच बीच में हंसी मजाक भी. Chai-paani के बाद साढ़े 7 बजे जब वह लोग निकलने लगे तोह राजेश मां ने नयी बात छेड़ दी.

"अंकल जी कल कोई ड्राइवर भी भेज देना अगर हो सके तोह नहीं तोह अर्जुन का गिफ्ट मुझे या भैया को लेके आना पड़ेगा."

"अब ऐसा क्या ट्रक देने वाले हो जो ड्राइवर की जरुरत पड़ेगी?", रामेश्वर जी भी हँसते हुए कहने लगे. वह अर्जुन के ननिहाल वालो से कभी सवाल नहीं करते थे, खासकर जब बात अर्जुन की होती थी.

"पापा ने 2 उपहार लिए है कल के लिए. एक मेरा और दूसरा अर्जुन का."

"राजेश तुम कॉलेज से बहार आ कर अब खुद का कॉलेज शुरू करने वाले हो लेकिन लगता नहीं के तुम्हारा वह समय पीछे रह चूका है.", रामेश्वर जी मुस्कुरा रहे थे लेकिन तंज भी कस दिए था.

"राजेश का इस सब से कोई लेना देना नहीं है समधी जी. ये उपहार मैंने पसंद किआ है और आप मन नहीं करेंगे.", सुनंदा जी के इतना कहने पर छोल साहब भी मुस्कुराते हुए उनके सुर में सुर मिलाने लगे.

"हाँ अब ये अपनी प्यारी भाभी का कहा कैसे ताल सकते है. समधी होने से पहले तोह ये आपके देवर हे है, बेशक उम्र में कुंदन जी से बड़े हो लेकिन रिश्ता बराबर का बनाया इन्होने.", सुनंदा जी जहा शर्म से नजरे फेर रही थी वही कुंदन जी और सोहनलाल जी हंस रहे थे इनकी चुहल देख कर.

"बताओ भाभी आप अर्जुन को क्या देने लगी? घर में उसकी जगह भी होनी चाहिए."

"फ़िलहाल तोह बस दे रही हु, चाबी आप तभी देंगे जब आपको लगे अर्जुन उसके लायक हो गया है. इन्होने 2 इलो बुक करवाई है जो कल आ जाएँगी, अर्जुन को ध्यान में रखते हुए आटोमेटिक.", सुनंदा जी ने उपहार का भेद खोला तोह इतनी देर से चुप खड़ा अर्जुन ख़ुशी से बोल उठा.

"नानी रॉयल ब्लू कलर में.", उसको जैसे ये गाडी पसंद थी लेकिन वह अपनी रानी के साथ बहुत खुश था.

"हाँ बीटा मुझे पता है मेरे बचे को क्या पसंद है. नीला हे मंगवाया है और तुझे ज्यादा दिक्कत न हो इसलिए आटोमेटिक.", सुनंदा जी ने अपने लाडले के सर पे हाथ फिरते हुए उसकी हाँ में हाँ मिले.

"माँ, ये तोह गलत बात है. इसके लिए ब्लैक थी और मेरे लिए ब्लू.", राजेश मां ने बचो जैसे मुँह बनाते हुए कहा तोह ममता मामी ने चूंटी काट दी.

"तेरे मां पूरे नौटंकी है अर्जुन. पहले दोनों हे ब्लैक मंगवा रहे थे लेकिन माँ जी ने तुम्हारे लिए आटोमेटिक के साथ हे ब्लू कलर लेने का कहा. देख लेना इनकी नार्मल वाली होगी.", मामी के ऐसे खुलासे से सभी हंसने लगे.

"अब जितना हक़ मेरा है उतना हे आपका. मैं समझ सकता हु ऐसे उपहार के पीछे आपकी मंशा इसकी सुरक्षा को लेकर हे है जो जायज़ भी है. लेकिन घर में पहले हे 3-3 गाड़ियां है.", रामेश्वर जी के इतना कहते हे अर्जुन उन्हें हैरानी से देखने लगा.

"और तीनो हे बहार रहती है. एक पापा के पास, एक ताऊजी के पास और अब बड़ी वाली संजीव भैया लेके गए है.", रामेश्वर जी ने मुस्कुराते हुए उसका सर सहलाया और छोल साहब की तरफ देखा.

"वैसे आज हे भाई साहब अर्जुन के लिए गाडी बुक करवा के आये है. 21 को शादी भी है और भाई साहब रहते भी अर्जुन के साथ है इसलिए आज हे ये फोर्ड बुक करवाई है जो 15 तारीख हो आ जाएगी.", जेब से एक परचा निकल कर उन्होंने सामने कर दिए. अर्जुन हैरान था के कहा तोह उसको कार सीखने तक के लिए मन किआ गया था और आज एक हे बार में 2-2 कार.

"ाची बात है न छोटे दादू. अब प्यार मिल रहा है तोह दोनों तरफ से हे मिलने दो. जगह काम रही तोह एक आपके पास कड़ी कर दूंगा.", अर्जुन की बात सुन्न कर छोल साहब उसका हाथ थाम कर हंसने लगे. ऐसे हे बातें करते वह लोग बहार आये तोह प्रीती के हाथ में इतना सामान देख कर छोल साहब के साथ रामेश्वर जी भी हैरान थे.

"ऐसे मत देखो आप लोग. बिटिया को अब आदत डालनी पड़ेगी इस प्यार की और हर बार पिछले से ज्यादा हे देके विदा करेंगे. कार इसलिए भी दे रहे है.", सुनंदा जी तोह कोई मौका नहीं छोड़ रही थी. हँसते मुस्कुराते सभी ने एक दूसरे से विदा ली और एक बार फिर कार अपनी मंजिल पर निकल चली. इस बार अर्जुन बैठे हुए बस मुस्कुरा रहा था. इतना प्यार शायद बड़े से बड़े नसीबवाले को भी नहीं मिलता होगा जितना उसको हर पल में हर किसी से मिल रहा था. हाँ थोड़ी मुफ्त की नफरत मिली थी लेकिन वह भी तोह प्यार में हे बदल गई थी. आसमान में अँधेरा गहराने लगा था.
 
आप सभी लोगो का दिल से शुक्रिया, इतने स्नेह और समर्थन के लिए. अगर ये मंच नहीं मिलता तोह शायद मई अभी तक इसका आधा भी नहीं लिख पता. लेकिन इसको पूरा करना हे फ़िलहाल मेरे सपना है जो आप लोगो के साथ देने से धीरे धीरे साकार हो रहा है.

चुनोतिया आएँगी जाएँगी लेकिन आप सभी ऐसे हे साथ रहना. देख कर ाचा लगता है की सभी कही न कही शामिल रहते है और हौंसला देते है.

सफ ने जो ये मंच और साथ दिए है वह अपने आप में बेजोड़ है. सभी मॉडरेटर्स का भी सलाम और उन लेखकों को भी जिन्होंने प्रेरित किआ.

हंसी मजाक के साथ ऐसे हे परस्पर प्यार बनाये रखिये और आज रात मैं इस ख़ुशी में अपडेट देकर सबको थोड़ा खुश करने की कोशिश करूँगा.
 
ये जो भी अपडेट अपडेट बोल रहे है इनमे से किसी ने भी रिव्यु नहीं दिए न तोह फिर देखना ?

अपडेट रात 11 बजे पोस्ट कर दिया जायेगा
 
अपडेट 103

ये कैसी मोहब्बत्त


घर के बहार हे ये काली मेरसेदेज़ देख कर रामेश्वर जी ने एक गहरी सांस ली. तेजपाल जी तोह सभी को उतार कर बहार से हे वापिस चले गए लेकिन छोल साहब ने अपने बड़े भाई साहब के कंधे पर हाथ रखा तोह रामेश्वर जी दरवाजे की तरफ बढ़ चले. प्रीती और अर्जुन के हाथो में सामान था जो अर्जुन उसके साथ उनके घर रखवाने चला गया.

"सांगवान इस समय?", बगीचा पार करते हुए दोनों अंदर आ रहे थे तोह एक तरफ राजकुमार जी की कार भी कड़ी थी लेकिन जैसे उनके लिए वह ज्यादा मायने नहीं रखती थी. दोनों हे आँगन से बैठक में आने लगे तोह अंदर से हंसने की आवाजे और बातें सुनाई दे रही थी.

"उनका भी तोह आपसे मेरे जैसा हे रिश्ता है.", छोल साहब ने उनके पोलिसिअ मैं को शांत किआ और दोनों ने अंदर आने पर माहौल देखा तोह मुस्कुरा दिए. छोल साहब की बात 16 आने सच थी. यहाँ तोह ाची खासी महफ़िल लगी हुई थी. सफ़ेद पजामा और नीला कुरता पहने सांगवान जी तोह आज बिलकुल अपने व्यक्तित्व से अलग नजर आ रहे थे. गले में चैन, हाथ पर चमड़े वाली घडी और पाँव में जूती. उनकी धर्मपत्नी जी दीवान पर कौशल्या जी के बराबर बैठी हंसी मजाक कर रही थी और यहाँ पर तोह परमवीर सांगवान, मधु, राजकुमार जी और रेणुका भी बैठे थे.

"देख लो भाभी, रिटायरमेंट के मजे भाई साहब उठा रहे है. घंटा भर तोह हमको आये हो गया लेकिन साहब तोह फौजी भाई साहब को लिए शहर नाप रहे.", मजाक करते हुए सांगवान जी दोनों से गले लग कर मिले और यशोदा (सांगवान जी की धर्मपत्नी) जी ने हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किआ. परम ने भी चरणस्पर्श करने चाहे लेकिन उस से भी वह गले लग कर हे मिले.

"जो ये बात कह रहा है जरा उस से ये तोह पूछो के आखिरी बार वह कब यशोदा के साथ घर से निकला था. मान लिए के इनके हाथो का जादू आज भी कायम है लेकिन भाई अपनी गलती के इल्जाम हम पर तोह मत लगाओ.", रामेश्वर जी उनके बराबर हे लम्बे सोफे पर बैठे और छोटे सोफे पर सामने छोल साहब.

"ाजजी छोडो आप. जानती हु मैं आपको भी. दिनभर इधर उधर की बातें करवा लो लेकिन काम का कुछ नहीं. देवर जी पहला शगुन लेके आये है और परम शादी के कार्ड के डिज़ाइन. सोमवार से भी बांटने शुरू करोगे तोह शादी के दिन तक काम ख़तम नहीं होगा.", कौशल्या जी की बात सुन्न कर रामेश्वर जी सकपका गए.

"हाँ तोह आप कुछ कह रहे थे मेरे और यशोदा के बारे में?", सांगवान जी ने नहले पर दहला थोक दिए था.

"ताऊ जी आप चिंता मत कीजिये. हमने विचार बना लिए है इतनी देर में बस आपका हे इन्तजार था. मधु ने ये 2 कार्ड पसंद किये है, शादी में एक तरफ से बरात आएगी और एक तरफ जाएगी. जहा तक मेहमानो और रिश्तेदारों की बात है तोह विवाह के लिए 'डायमंड' पैलेस ठीक रहेगा. 1500 लोग तोह वह आराम से मैनेज हो हे सकते है ऊपर से सतीश अंकल का होटल और हमारा फार्महाउस वह पड़ोस में हे है तोह घर के लोग और ख़ास रिश्तेदार रुक सकते है. कैटरिंग का काम '7 सीज' दिल्ली वाले और अपने दिलबाग जी देख लेंगे. माधुरी बिटिया और होने वाली बहु के लिए kapde-gehne Madhu/Radhika के साथ रेखा भाभी और कोमल बिटिया चली जाएँगी. बाकी मैं और शंकर दिल्ली जाने वाले है तोह बड़ी गाडी में वह से भी सामान ले हे आएंगे. आप ताई जी के साथ निमंत्रण देने का काम सम्भालो.", छोटा सांगवान तोह एक पारिवारिक जिम्मेदार इंसान भी था. जो कभी उसके व्यक्तित्व से जाहिर नहीं होता था.

"बिलकुल ठीक बात कही परम ने. और आपकी पिछली कोठी भी इतनी हे बड़ी है लेकिन कमरे 5 हे है वह पर. फिर भी मैं कल हे उसको दुरुस्त करवाना शुरू करता हु. 10 दिन में वह भी तैयार हो हे जाएगी. 20 लोग तोह वह भी आराम से रह लेंगे और खली जगह होने से gaadi-samaan वह रखा जा सकता है. हलवाई भी वही लगवा देंगे, 2 गली दूर हे तोह है.", छोल साहब ने भी अपना पक्ष रख दिए. रामेश्वर जी ख़ामोशी से सुन्न रहे थे और इधर कोमल दीदी के साथ अलका और ऋतू बड़ी ट्रे लिए जूस, चाय और meetha-namkeen लेकर आ गई सबको देने के बाद खाने का सामान बड़ी कांच की टेबल पर रखते हुए कोमल दीदी तोह चली गई लेकिन अलका अपने दादा जी की बगल में जा पसरी और ऋतू सोफे की हठी पर सांगवान जी के गले में बाहें दाल कर.

"मेरी बच्चियों की शॉपिंग हर रोज होगी और इसके लिए driver-gaadi अब शादी तक यही रहने वाले है परसो से.", सांगवान जी ने ऋतू को लाड जताते हुए माथे को चूम कर कहा तोह रामेश्वर जी होश में आये.

"बचा क्या है? मतलब तुम लोग इतना कुछ पहले से हे तये किये बैठे हो? घर में तोह शादी का जीकर तक नहीं हुआ था. अभी संजीव की होने वाली बीवी को तोह किसी ने देखा तक नहीं सिवाए धर्मवीर, मेरे और शंकर के. सगाई भी होनी है और उनसे भी पूछना है के वह इस दिन पर सहमत होंगे या नहीं."

"सब हो चूका है जी. राधिका की माँ से मैंने बात कर ली थी और सतीश भाईसाहब के साथ यशोदा, मैं और धरम भाई जी 15 दिन पहले हे जा आये थे. उनका भी आज फ़ोन आ गया थे के परिवार तैयार है और सीधा शादी हे करनी है.", कहा तोह रामेश्वर जी सब पर नजर रखते थे और यहाँ उन्हें हे ये मालूम न था.

"तुमने बताया नहीं मुझे इस बारे में?"

"जेठ जी, बताया तोह आपने भी नहीं था. वह तोह शंकर है जो बात छुपता नहीं जीजी से और इन्होने बिचोले के साथ मुझे भी ले लिए.", बिचोला तोह सांगवान जी हे थे और रामेश्वर जी उन्हें देखने लगे.

"भाई अब मुझे ऐसे मत देखिये. मैंने भी घर हे जाना होता है, हालत आप जैसी हे है. ऋतू बेटी अपनी माँ और दीदी को बोलो के थोड़ी देर में खाना लगवा दे फिर निकलना भी है.", धर्मवीर जी के इतना कहते हे दोनों बहने उठ कर चल दी. वह भी खुश थी की घर में एकदम हे माहौल इतना खुशनुमा हो गया है. इधर नाहा धो कर अर्जुन जैसे हे अंदर आया तोह परिवार को ऐसे देख वह भी हैरान हो गया. सामने बैठे लम्बे चौड़े बुजुर्ग और दादी के बराबर बैठी इन सभ्य सी उनकी हमउम्र को देख शिष्टाचार से पाँव छु कर वह अपनी दादी के बगल में बैठ गया.

"भाई हम भी तुम्हारे चाचा लगते है.", परम की आवाज पर अर्जुन उठ कर छोटे सांगवान के भी पाँव छूने लगा तोह उन्होंने बस खड़े हो कर हाथ मिलते हुए कन्धा थपथपा दिए. हाथ पर ाची खासी पट्टी बंधी थी.

"सॉरी आप दिखाई नहीं दिए न वह बुआ बैठी थी.", अर्जुन की आवाज सुन्न कर दाहरवीर जी ने उसको अपने पास बुलाया.

"इतने से थे तुम जब हमने तुम्हे देखा था."

"आप हैं डॉ धर्मवीर सिंह सांगवान, दादा जी के पुराने दोस्त. यहाँ घर पर मिलने के बाद भी आप दादाजी के साथ मेरे स्कूल आये थे जब मैं 4तह क्लास में था.", अर्जुन के इतना बताते हे उन्होंने इस अपने सामान लम्बे और कही चौड़े लड़के को बाहों में भर लिए.

"मेरे बचे तू तोह सब याद रखता है. ये सब तुझे वैसे हे भुलक्कड़ कहते रहते है."

"सब तोह नहीं याद रहता लेकिन जो परिवार के साथ हैं वह याद रह जाते है.", अर्जुन का मतलब समझ कर वह मुस्कुरा दिए.

"चलो तुमसे तोह फिर फुर्सत में बात करेंगे लेकिन अब तुम्हारे संजीव भैया और माधुरी दीदी की शादी को महीना भी नहीं बचा. बहोत काम करना पड़ेगा तुम्हे अब क्योंकि घर के जिम्मेदार बेटे आखिरी तुम्ही हो.", अर्जुन भी इतना सुनते हे खुश हो गया. फिर अगले एक घंटे तक लम्बी बातें चलती रही. Bade-bujurg अपने में लगे रहे और mahilaye-jawaan अपने में. फिर भोजन से फारिग होते होते आज 10 से ऊपर का समय हो गया था.

"आप बस अपना ध्यान रखिये और मेहमानो की लिस्ट बनवा लीजिये. राजकुमार के ससुराल भी जाना पड़ेगा क्योंकि भात तोह संजीव और माधुरी के मां हे न्यौतेंगे. फिर अपने गाँव भी आपको खुद हे जाना होगा कृष्णेश्वर भाई का भी आपके साथ होना जरुरी है. भाभी तोह अपने मायके जाने को तैयार नहीं है.", खाने के बाद अब रामेश्वर जी, सांगवान जी और छोल साहब के साथ अर्जुन बैठा उनकी बातें सुन्न रहा था. परमवीर अंदर था अपनी भाभियों और बहनो के साथ साथ माँ और ताई के साथ.

"हाँ वह भी जरुरी है. बीच में Bijender/Babita का विवाह भी है तोह वह भी थोड़ा बहोत देखना पड़ेगा. शंकर आ जायेगा तोह काम थोड़ा जल्दी ख़तम होगा. वैसे परम ज्यादा समझदार है और मैं तोह हैरान हु की वह इतना सब किये बैठा है.", रामेश्वर जी के इतना कहते हे छोल साहब ने अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिए.

"भाभी को मैं ले जाऊंगा उनके गाँव. आपके बाकी सम्बन्धियों को भी निमंत्रण देने का काम हम बाँट लेंगे. दोनों घर के बीच ये मेरा खली प्लाट लगे हाथ समतल करवा देता हु जिस से aane-jaane वालो से किसी को परेशानी नहीं होगी. होटल में 30 कमरे है उनकी बुकिंग अगले हफ्ते से बंद कर देते है फिर जिन्हे घर नहीं रखना उनका बंदोबस्त वही कर देंगे. पहली शादी है तोह मेहमान सम्भावना से कही ज्यादा हे होने वाले है. आपने प्रमुख काम तोह बस सुरक्षा का हे करना है और उसमे भी मैं साथ हे दूंगा सांगवान भाई साहब की तरह.", छोल साहब उन्हें आश्वस्त कर रहे थे.

"बात बिलकुल ठीक है सतीश की. माधुरी की ससुराल से बेशक 150-200 लोग होंगे लेकिन राधिका एकलौती है और उनका घराना आपके हे सामान है तोह 500 से हजार लोग भी हो सकते है सिर्फ उनकी तरफ से. निर्मल फ़िलहाल व्यस्त है उस लिस्ट में जो हमने दी है तोह िग कपूर को बुला लो मेरे फार्महाउस पर, चंदू और पत्रं की भी जरुरत पड़ेगी. अर्जुन बीटा कुछ दिन हे स्कूल बाकी है न तुम्हारे तोह हफ्ते बाद तुम्हे हर वक़्त तैयार रहना है. गाडी सीखने मंगलवार से ड्राइवर आ जायेगा और तुम्हारे जिम्मे ज्यादा काम रहने वाले है.", सांगवान जी ने अर्जुन को भी बाँधने का इंतजाम कर दिए था लगे हाथ.

"जी मैं हमेशा यही रहूँगा."

"धर्मवीर भाई, मैं संजीव और राधिका का विवाह इसलिए थोड़ा लटका रहा था. माधुरी के ससुराल वाले लोग कही इस भगदड़ का बुरा ना मान जाये. उन्हें ये न लगे की हम लड़के की शादी को ज्यादा तवज्जो दे रहे है.", रामेश्वर जी ने अपनी शंका सामने की.

"गौरव से मेरी बात हो चुकी है. वह पढ़े लिखे लोग है और उन्हें तोह इस बात की ज्यादा ख़ुशी है हम जहा लड़की दे रहे है वही लड़की लेके भी आ रहे है. विवाह में len-den तोह पहले हे सख्ती से मन है तोह ये समझ लीजिये के सबकुछ परिवार में हो रहा है. आपके जैसे हे मुझे भी चिंता थी लेकिन उन दोनों परिवारों से पूरी बात करने के बाद हे आज मैं शगुन लेके यहाँ आया हु.", सांगवान जी की पूरी बात सुन्न कर अब पंडित जी थोड़े निश्चिन्त हुए.

"इस सबके बीच और भी बहोत से काम होंगे."

"छोडो भाई साहब. आप अकेले नहीं हो और सभी काम वैसे हे पूरे होंगे.", छोल साहब ने इतना कहा और यशोदा जी अंदर आते हुए चलने का कहने लगी. सभी बहार तक छोड़ने आये तोह हलकी फुलकी बातें करने के बाद वह लोग चले गए और छोल साहब भी सुबह जल्दी मिलने का बोल कर अपने घर हो लिए.

"मुझको तोह ये भी नहीं पता के किसकी शादी किसके साथ हो रही है. न गौरव देखा न राधिका लेकिन बताओ वह दोनों हे हमारे परिवार में आने वाले है.", अर्जुन अपने दादा जी के साथ अंदर जाते हुए शिकायत कर रहा था.

"तेरे वाला हे हाल मेरा है बीटा. और देखना काम भी हमको हे ज्यादा करना पड़ेगा.", अंदर आये तोह कोमल दीदी और प्रियंका दीदी बैठक को साफ़ करके जा चुकी थी. आज सभी अपने समय से अधिक वक़्त तक काम कर रहे थे. कौशल्या जी बिस्टेर पर लेती थी और राजकुमार जी उनके पाँव दबा रहे थे. परिवार में एक वही थे जिनकी न ज्यादा बात होती थी और न वह खुद ज्यादा हिस्सा लेते थे किसी भी काम में. लेकिन maa-baap के साथ उनका प्यार गहरा था. अर्जुन सबसे विदा लेकर अंदर वाले आँगन में आया तोह आरती दीदी टेबल साफ़ कर रही थी, अलका दीदी के साथ तारा बरतन धो रही थी और ऋतू दीदी पानी की बोतल भरके फ्रिज में लगा रही थी. चूल्हा और स्लैब रुपाली दीदी के हवाले थी.

"आज पहली बार काम करते हुए देख रहा हु आप सबको. वैसे जल्द हे ऐसा रोज होने वाला है और वह भी शादी के 3-4 दिन बाद तक.", अर्जुन रसोई में खड़ा पानी पी रहा था और साथ हे मुस्कुरा भी रहा था.

"हंस ले बच्चू हमारी हालत देख कर. सोमवार से एक कामवाली परमानेंट और उसके साथ हे 2 saaf-safai के लिए पूरे महीने तक घर में होंगी. तू तेरी सोच अब, साड़ी मटरगश्ती बंद होने के साथ हे जो हालत बनेगी तेरी. ड्राइवर, कुली, पोस्टमैन और न जाने क्या क्या बनेगा.", ऋतू दीदी ने उसको हे लपेटे में ले लिए था.

"तारा को गाडी चलनी आती है, अलका दीदी को शॉपिंग का पता है और Preeti-Manju भी शहर ाचे से जानती है. मुझे नहीं लगता के ये सब लोग मुझे कोई काम करने देंगे.", अर्जुन के इतना कहते हे तारा और अलका उसको घूरने लगी.

"हमने शादी एन्जॉय करनी है, काम तुम करोगे.", अलका दीदी की बात सुन्न कर अर्जुन तोह सीधा अपनी माँ के कमरे में हो लिए.

"बहोत चालाक हो गया है ये, देखा कैसे सफाई से सबको फंसा रहा था.", अलका की बात पर बाकी सब भी हंसने लगी.

"वैसे मैं तैयार हु उसके साथ काम करने के लिए. वह अकेला सब कैसे करेगा?", तारा ने गीले कांच के बर्तन कपडे से सूखते हुए कहा.

"तुझे क्या लगता है के हम उसको अकेले हे करने देंगी सब काम? उसको सताने में जो मजा आता है न वह ाचा लगता है.", अलका की बात पर तारा की तेज हंसी छोट गई

"उसने अगर सताया न.. हाहाहाहा.", और वह कपडा हाथ में लिए हे वह से दौड़ती ऊपर भाग गई.

"रुक तारा की बची. मैं बताती हु तुझे.", अलका के गाल और कान लाल हो गए थे और वह भी तुरंत वह से निकल चली. ाचा था के रुपाली भी अर्जुन के जाते हे माँ के कमरे में जा चुकी थी. कोमल दीदी ने फिर बाकी सबको भी आराम करने का बोलै और सबके लिए doodh-coffee बना कर मधु बुआ, रेणुका, तारा, अलका, ऋतू और आरती को देने के बाद अपने कमरे में आ गई. रुपाली आज माँ के साथ सो रही थी अगले दिन स्कूल की छुट्टी होने से और अर्जुन ऊपर जा चूका था.

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ननिहाल में भी आज थोड़ी चहल पहल रही थी कल होने वाले मंगल कार्य की वजह से. सभी उत्साहित थे और अपने अपने काम करके सोने हे लगे थे. रात के 11 बजे सभी अपने कमरों में थे या सोने की जगह पर लेकिन कुछ को छोड़ कर सही जाग हे रहे थे. पूजा मामी भी अपनी दोनों बेटियों के साथ आ गई थी और अब तेजपाल जी के साथ अपने shayan-kaksh में आराम कर रही थी. तेजपाल जी ने तोह थके होने का बहाना करके आँखें बंद कर ली थी क्योंकि यही आ कर उन्हें ठीक से सोने को मिलता था.

"अर्जुन कल आएगा न?", कंचन रात के ढील कपड़ो में स्वाति के साथ बिस्टेर पर लेती बातें कर रही थी. समय दीदी सो चुकी थी और वह एक किनारे पर थी.

"आएगा क्यों नहीं? उसने हे तोह पूजा शुरू करनी है. वैसे तू कुछ अलग सोच रही है क्या?", स्वाति भी इस समय पाजामे और ढीली टीशर्ट में थी.

"यार सोच तोह पता नहीं क्या क्या रखा है लेकिन तू जानती है के हम दोनों उसको ऐसे माहौल में नहीं झेल सकती. वैसे मस्ती तोह कर हे सकते है अगर मौका सही मिले तोह.", कंचन की आँखों में ख़ास चमक थी.

"मस्ती भरी न पड़ जाये. सभी होंगे और अर्जुन पर हमसे पहले हे बहुत लोगो की नजर है. बाकी देखते है क्योंकि एक मौका तोह हमारे पास पहले हे है. मार्किट में उसको लेके मैं आ जाउंगी उसके बाद तेरा काम.", स्वाति ने कंचन की तरफ करवट ली और उसने सहमति जाता दी. लाइट बंद करके अब वह धीमी आवाज में khusar-phusar कर रही थी. लेकिन स्वाति की माँ के कमरे में नजारा अलग हे था.

"आह्हः.. जोर से करो.. हाँ ऐसे हे आह्हः..", पूजा के कहने पर ममता ने आधी खिड़की खुली छोड़ी थी जहा से वह अंदर का नजारा देख रही थी. ममता बीएड पर घोड़ी बानी हुई थी और राजेश अपनी बीवी के मॉटे चुके मसलता हुआ गहरे धक्के लगा रहा था. ममता का शरीर भी किसी मायने में पूजा से काम न था और साथ हे ज्यादा कसाव लिए पूरा मादक.

"5 दिन से रात और सुबह म्हणत करवा रही हो.. आह्हः.. इतनी आग जमा थी तोह पहले बुला लेती.. आह्हः. लेकिन लगता है मैं ठंडा हो जाऊंगा तुमसे पहले.", राजेश के गहरे धक्के भी जैसे आग भड़का हे रहे थे.

"पता नहीं क्या हो रहा है 2 साल से.. आठ.. पहले इतनी आग नहीं थी अंदर.. उम्म्म.. प्लीज आज थोड़ा ज्यादा der..aahh..", और इधर राजेश अपनी बीवी के गहरे कुंड में मलाई भरने भी लग गया था

"आठ.. जानेमन ये तुम्हारी जो उम्र हो रही है इसमें ऐसी आग लगती है एक बार.. लेकिन मेरा भी ख़याल करो. दिन में 2 बार म्हणत करने के बाद कितने काम और भी रहते है मुझे. लेकिन काम ख़तम होते हे तुम्हे तसल्ली से हनीमून पर फारिग करूँगा.", राजेश अपना पजामा पहन कर बिस्टेर पर लुढ़क गया और ममता घोड़ी बने हुए हे एक बार अपने पति को देखने के बाद उठ कड़ी हुई. चेहरे पर नाराजगी थी लेकिन राजेश की बात कही से गलत नहीं थी. नहाने का बोल कर वह नंगे जिस्म पर बस एक गाउन पहन ने के बाद लाइट बंद करती बहार निकल आई. वैसे बाथरूम अंदर भी था लेकिन शायद वह अभी सोना नहीं चाहती थी और राजेश को ज्यादा परेशां भी नहीं.

"चल मेरे साथ ऊपर. देख ली तेरी फिल्म और अब अनीता की कहानी सुनते है.", पूजा ने अपनी देवरानी का हाथ पकड़ा और वैसी हे हालत में उसको लेकर ऊपर छत्त की तरफ बढ़ गई. यहाँ संगीता सभी काम निबटा कर अब अनीता का सर दबा रही थी, हलके हाथो से.

"फिर से बुखार दे गया क्या वह इसको?", एक खाली बिस्टेर पर बैठते हुए पूजा ने कहा तोह अनीता भी उठ कड़ी हुई, लेकिन एक सिसकी निकल गई मुँह से.

"दे हे गया जो ऐसे सिसक रही है अनीता.", ममता ने हँसते हुए और खिंचाई की.

"बुखार नहीं है दीदी लेकिन हालत वैसी हे है. आप समझ नहीं सकती क्योंकि हुआ तोह मेरे साथ है.", अनीता ने इतना कहा और संगीता उसके बराबर बैठ कर जांघो को दबाने लगी.

"ऐसा क्या लगा है उसके जो तेरी हालत खराब कर दी.?", पता तोह ममता को भी था लेकिन वह बस पिछली बार दूर से हे देखा था.

"दीदी ये मेरी कलाई से भी मोटा और इतना लम्बा अगर आपके अंदर जाए तोह आप भी बराबर लेती सिसकती मिलोगी. ऊपर से पौने घंटा हल चलते हुए तबियत से सत्यानाश किआ. लेकिन जो भी कहु उसने किआ बड़े प्यार और आराम से. अगर हवस दिखता तोह मैं मर्डर हे जाती."

"पौने घंटा? और सचमुच इतना मोटा और बड़ा है उसका? है तोह बचे जैसी शकल वाला.", ममता की छूट में वीर्य था लेकिन वह तोह फिर से गीली होने लगी थी.

"लम्बाई तोह इसने जितनी बताई उतनी हे होगी लेकिन मोटाई शायद बढ़ गई है. वैसे सच कहु ममता उसने मेरी भी चीखे निकलवा दी थी. आधा घंटा उसके साथ करने के बाद वह घर पर मैं 3 रात तक सही से बैठ न पाई थी. इन्हे तोह मैंने 15 दिन पास भी न आने दिए.", पूजा की बात सुन्न कर अब ममता अपनी जेठानी को देखने लगी.

"तू भी? और ऐसे खिलाडी तोह जीजा जी भी नहीं है, रेखा ने बताया था न के शंकर जी बिस्टेर में ाचे है लेकिन अंग तोह उनका भी साढ़े 6 इंच का है और चुदाई 15 मिनट ाचे से कर लेते है. फिर ये लड़का कोन्स अमृत पी कर जन्मा है.?"

"हम दोनों तोह कुंवारी उसके नीचे आई लेकिन आप हे सोचो अगर पूजा दीदी उसकी तारीफ कर रही है तोह वह ख़ास हे है. बाकी सवेरे आएगा वह और आप कहो तोह मैं नजारा करवा दूंगी. शायद कल मुझे प्यार करने को मिले.", संगीता इतनी देर से सुन्न रही थी लेकिन अब उसने भी शामिल होना ठीक समझा.

"देखना हे पड़ेगा अगर इतना हे ख़ास है तोह. लेकिन करोगी कहा?"

"खेत वाले कमरे पे. छोटे पापा तोह कल सबके साथ हे रहने वाले है और साइट पर खाने पीने का कार्यक्रम दोपहर तक चलेगा. इस बीच निकल लेंगे समय.", संगीता ने पहले हे सब तये कर लिए था.

"सही कहा लेकिन अगर घर में करो तोह ज्यादा बेहतर है. यहाँ भी सिर्फ हम लोग हे होंगे.", पूजा मामी जैसे कुछ और हे चाह रही थी.

"घर पे मुश्किल है. तीन तीन लड़किया होंगी यहाँ पर और aane-jaane वालो का क्या पता. सड़क पार वाले खेत में फ़िलहाल चारा उगाया हुआ है और वह कोई नहीं होगा. कमरा भी ाचा है और जगह भी. आपने अगर आना हो तोह बहार वाली तरफ गाडी कड़ी करके आराम से आ सकती हो.", अनीता लेट गई थी और संगीता सब समझा रही थी.

"पता नहीं क्योंकि तुम्हारे जेठ जी के साथ वह भी रहना होगा लेकिन पूजा दीदी आ सकती है.", ममता मामी ने अपनी शंका बताई.

"8 से 9 बजे तक वह पर हवन होगा. उसके बाद राजेश जेठ जी को तोह फुर्सत मिलने नहीं वाली अपने दिल्ली वाले दोस्तों और मेहमानो से. तीनो पापा उसके बाद वही होंगे और हम बहुओं का वह कोई काम नहीं होगा. पापा लोग भी गरीबो का खाना और फिर मंडी में सबको दावत देने में व्यस्त रहेंगे तोह ऐसे में आप समय निकल हे सकती हो. अगर आपका दिल नहीं तोह कोई बात नहीं मैं और अनीता 2 घंटे तोह उसके साथ बिता हे लेंगे."

"तुम दोनों एक साथ?", इस बार पूजा हैरानी से बोली.

"हाँ, अर्जुन की फरमाइश है के वह दोनों को एक साथ प्यार करना चाहता है. वैसे भी अकेले उसको झेलना बस का नहीं है और अनीता से मुझे भी दिक्कत नहीं होगी.", संगीता ने जितने खुलेपन से ये स्वीकारा था उसमे वासना की जगह विश्वास और समर्पण अधिक था.

"ये तोह अब देखना हे पड़ेगा. कैसे भी करके ऐसा नजारा मैं नहीं छोड़ने वाली. पूजा गाडी तैयार रखना जैसे हे हम साइट से फारिग हो.", सब तये हो चूका था जैसे. ममता की इत्छा भी बलवती हो गई थी अर्जुन गुणगान सुन्न कर. फिर कुछ देर बातें करने के बाद ममता नीचे चली गई और बाकी तीनो वही सोने लगी.

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रोज की तुलना में आज सब काम निपटाते हुए देरी हो गई थी. काम से फारिग हो कर कोमल दीदी नहाने के बाद रात के ढीले कपडे पहन कर जब ऊपर आई तोह साढ़े 12 बज चुके थे. मौसम में अब दिन वाली उमस की जगह खुली हवा और हल्कापन था. कही कही बादल तारो को धक् रहे थे लेकिन हवा में जो ताज़गी थी उस से थकान दूर हो रही थी. खुली छत्त के बीच में 2 गद्दे बिछाये अर्जुन आराम से आँखे बंद किये लेता था और शायद सोने से पहले छत्त पर पानी का ाचा छिड़काव करके फर्श का सेक भी वह निकल चूका था.

'मेरी वजह से आज तुमने इन्तजार भी किआ और फिर ऐसे सोना भी पड़ा. कोई बात नहीं इसकी भरपाई मैं जल्द हे कर दूंगी, चाहे मेरी जान को मैं दिन में हे प्यार न करू.', हलकी आवाज में बुदबुदाती हुई कोमल दीदी अर्जुन की बगल में हे तकिये पर लेट गई. आँखों में जैसे नींद न थी और इस वजह से आसमान को निहारती वह अपनी हे सोचो में खोई थी.

"आपका इन्तजार मैं उम्र भर भी करू तोह वह ज्यादा न होगा. देख रही हो आप वह बदल भटकना बंद नहीं करते, चाहे उनमे पानी हो या न हो. कुछ वैसा हे मैं हु. बिना आपके खली और आवारा. जब आप साथ होती हो तोह मैं पूरा हो जाता हु एक दिशा के साथ.", अर्जुन उनकी तरफ करवट लेकर चेहरे को देखने लगा. कोमल दीदी ने भी एक प्यार मुस्कान से उसकी आँखों में झाँका तोह वह सिर्फ उनके लिए अर्जुन का बेशुमार प्यार था.

"मैंने तुम्हे उठा दिए?"

"सोया हे कब था? आपकी आहात के साथ कदमो को जिन्न रहा था. फिर कुछ पल ये प्यार महक लेता हुआ दिल को समझने लगा की देखो इन्तजार के बाद आप आ हे गई.", कोमल भी करवट लेती अपने छोटे भाई की तरफ पलट गई. वह नरम बदन अपने प्रेमी के आगोश में आ चूका था. ढीली टीशर्ट के हल्का सा ऊपर होने पर अब अर्जुन का हाथ उनकी मखमली कमर को सेहला रहा था.

"नाराज तोह नहीं है न?", उनकी बात का जवाब अर्जुन ने अपने अंदाज में देते हुए उनके मलाई से होंठ मुँह में भर लिए. इसका एहसास होते हे कोमल दीदी का ऊपर वाला पाँव अर्जुन पर आ गया. उस से कस कर lipat-ti वह भी अर्जुन के मुँह में अपनी जीभ डालते हुए उसको अपना स्वाद देने लगी. सांस लेने की चिंता छोड़ दोनों हे बिछड़े प्रेमियों से एक दूसरे को सहलाते हुए मुखरास का adaan-pradaan करने लगे.

अर्जुन का हाथ कमर से सरक कर इलास्टिक वाले पाजामे से उनके मांसल उभरे हुए नितम्ब को दबाने लगा. सचमुच वह किसी काल्पनिक सुंदरी सी थी जो त्वचा छूने भर से अर्जुन उनको पाने के लिए बेचैन हो जाता था.

"आह्हः.. हहहहह.. Din-ba-din तुम ज्यादा उतावले होने लगे हो.", झूठे नखरे से कोमल दीदी ने होंठ अलग होने के बाद कहा. उन्हें भी अर्जुन का यु पूरे हक़ से उनके नितम्ब मसलना पसंद आया था. और साथ हे इस हलकी मस्ती से हे जो अकड़न उनके सीने में उभर आई थी वह और उत्तेजित कर रही थी.

"आप खुद हे सोचो के हमने कितने पल ऐसे साथ में बिताये है? सिर्फ 4 बार वह भी 3 रात में. कैसे न मैं बेचैन राहु? अगर आप मुझे स्वीकार न करती तोह बेशक मैं दिल को समझा लेता और खुद को संभल लेता लेकिन अब हर वक़्त जैसे मैं आपका हे इन्तजार करता हु.", अर्जुन ने उन्हें पूरी तरह खुद से लगते हुए हलके से होंठो को चूमा और निचले हाथ के जोर से उन्हें पलट कर अपने सीने पर ले आया. अर्जुन की कमर के दोनों तरफ अपनी नरम जाँघे किये वह भी आराम से उसके ऊपर लेट गई.

"कही ऐसी बेताबी में तू औरो में मुझे तोह नहीं ढूंढ़ता?", अब अर्जुन के सीने पर उनके दोनों विशाल और मुलायम उभर अपनी सख्ती दिखा रहे थे. अर्जुन के बड़े पंजे उनकी पजामी के अंदर कूल्हों की दोनों फांके मसलते हुए योनि को भी उसके मॉटे लिंग पर दबा रहे थे.

"जानती हो तोह ऐसा सवाल क्यों करती हो आप?"

"फिर बता जरा के कौन मेरे करीब या मेरे जैसा मिला तुझे?", दीदी के ऐसे सवाल पर अर्जुन कुछ पल ख़ामोशी से उन्हें देखता रहा. जैसे वह न उन्हें शर्मिंदा करना चाहता था और न झूट बोलना चाहता था.

"बोल न ारु. तेरे मेरे बीच में भगवान् नहीं आ सकते तोह ये बातें कहा मायने रखती है. बस मैं सुन्न न चाहती हु और मेरा दिल रखने के लिए तू इतना तोह कर हे सकता है.", अपने नाजुक आधार उसके होंठो पर रखती वह फिर उसकी गर्दन चूम कर उसके चेहरे को वापिस देखने लगी.

"आपके आसपास. तारा के साथ जुड़ाव है, वह खूबसूरत भी है और पसंद भी. वैसा हे कुछ माधुरी दीदी के साथ है. उनकी ख़ास बात है खुलकर साथ देना लेकिन अगर बात यही हो रही है के कोई आपके बराबर या आसपास है तोह वह दोनों नहीं है.", अर्जुन ने हाथ कूल्हों से हटा कर दीदी की ढीली टीशर्ट उतरने की कोशिश की और कोमल दीदी ने खुद हे वह निकल कर एक तरफ रख दी. अब वह उन्हें अपने पेट पर बैठाये उनके दोनों बेजोड़ गुम्बद से गोल उभारो को हाथो से थामे सहलाने लगा.

"कौन करीब या बेहतर है?", दीदी सिसकियाँ रोके अर्जुन को देख रही थी. निप्पल सहलाने से उनके पेट से छूट तक कई तरंगे उठने लगी.

"करीब तोह 5 है. अलका दीदी, अन्नू, आकांक्षा, मंजू और मुस्कान. उन सब में एक समानता है के वह दर्द की परवाह नहीं करती, प्यार भी ऐसा जिसमे सिर्फ उन्हें मेरी परवाह रहती है, बेशक साथ रहने का दिल हमेशा करता है लेकिन कभी खुद से कुछ माँगा हे नहीं. खूबसूरत भी है, प्यार भी करती है और फिर भी उन चारो में एक का नाम लेना हो तोह वह अलका दीदी. लेकिन फिर भी मैं यही कहूंगा की किसी के भी दिल की तुलना करना गलत है क्योंकि वह मेरे साथ आत्मा से जुडी है.", अर्जुन अब हलके हलके दोनों स्टैनो का मर्दन करने लगा और कोमल दीदी भी अपने गुदाज कूल्हे पेट से कमर की तरफ करती उसके लिगं पर अपना यौवन घिस रही थी. चुटकी में निप्पल मसले जाने से उत्तेजना चरम पर आ चुकी थी.

"आह्हः.. अन्नू को देखना होगा.. उम्म्म.. और ऋतू का क्या?"

"वह मेरा दिल है और आप मेरी आत्मा.", अर्जुन ने अपनी कमर उठाते हुए दीदी को गॉड में ले लिए. अब वह कामदण्ड ाचे से उनके कूल्हों के बीच फंसा अपनी सख्ती और गर्मी का पूरा एहसास दीदी को करवा रहा था.

"ऐसे प्यार करने में बेवकूफ.. आह्हः.. ऋतू के साथ तू कैसा महसूस करता है?", अर्जुन ने दोनों खरबूजे से बड़े और गोल चुचो को ाचे से पकड़ते हुए बारी बारी से चूमा. इस पल में वह किसी और के साथ होता तोह आधा सफर तये कर चूका होता. लेकिन यहाँ वह अपने जीवन की ख़ास प्रेमिका के साथ था.

"उनके साथ आप जैसा हे हाल रहता है. न अलग होने का दिल और न प्यार करते हुए रुकने का. आप दोनों का हे असर एक ऐसे नशे सा है जिस से बहार आना मेरे वश में नहीं. ऋतू दीदी और आप दोनों में से मैं कभी भी एक को नहीं चुनन पाउँगा लेकिन आपका हक़ हम दोनों पर हे ज्यादा है.", अर्जुन उन्हें अपने चौड़े सीने से लगते हुए चूमने लगा. दीदी ने भी अब अर्जुन को सतना बंद करते हुए प्यार उड़ेलना हे ठीक समझा. शरीर दोनों के हे गरम हो चुके थे.

"आज इतना प्यार कर के काम से काम तू हफ्ते तक खुद को ठीक रख सके.", दीदी उसकी गॉड से उतर कर एक तरफ हो गई. इलास्टिक वाली सलवार ने उस अलौकिक बदन का साथ छोड़ा तोह बिना समय गवाए अर्जुन उनकी जाँघे फैलते हुए योनि पर झुक गया. इसकी भी जैसे उन्हें उम्मीद नहीं थी. चिकने रबर सी साफ़ और महकती छूट को चूमते हुए जल्द हे अर्जुन अंदर जीभ चलने लगा. शहद का हर कटरा चूसता वह उनकी सुडोल मुलायम जाँघे ाचे से थामे था.

"आह्हः... मा... ारु... मैं हो gaiii...aahhh.", कोमल दीदी का शरीर 3-4 मिनट की चुसाई में हे झटके खाने लगा लेकिन अर्जुन उनका मैदान साफ़ करने के बाद हे ऊपर उठा.

"आज रात आप मेरी है तोह आपको भी हफ्ते तक परेशान नहीं होने दूंगा.", पजामा तुरंत निकल कर वह उनके ऊपर चा गया. मॉटे चुचो पर उभरे निप्पल भूखे बचे की तरह चूसता वह उन्हें दबा भी रहा था. दीदी जैसे आज पहली बार अर्जुन के जोश को देख कर हैरान थी. वैसे भी अर्जुन हमेशा उनके साथ पूरे प्यार से हे मिलान करता था लेकिन जैसे वह आज कर रहा था, दीदी अकेली उसको शायद हे संभल सकती थी.

"उम्म्म.. मैं तेरी हे hu..aahhh...... आराम से.. आह्ह्ह्हह.. जल्दी कर ारु फिर सोना भी है.", समय का याद दिलाना भी अब बेकार हे था. कोमल दीदी ने वह फडकता हुआ अंग खुदसे हे छूट के मुहाने लगाया और उसकी कमर नीचे दबाने लगी.

"आह्ह्ह्ह.. धीरे धीरे.. ऐसे हे.. उम्म्म.", जल्द हे दोनों के होंठ चिपक गए. 3 इंच तक लुंड छूट को फैलते हुए उनकी गीली और नाजुक योनि में पेवस्त हुआ तोह अर्जुन ने कमर रोक ली. वह उन्हें नींद में भी दर्द नहीं दे सकता था. चूमने के साथ हे वह अब प्यार से उनके सतांन सहलाते हुए लुंड अंदर करने लगा.

माखन सी चिकनाहट उसका काम थोड़ा आसान कर रही थी लेकिन ये यौवन हर रोज उसके नीचे नहीं आता था. 6 इंच के बाद हे दीदी का जिस्म ऐंठ गया. और अब अर्जुन भी अपनी कमर हिलता उन्हें वह सुख देने लगा जो खुद उसको भी सिर्फ ऋतू दीदी या इनसे मिलता था. गीले गुलाबरास में पतवार चलते हुए दोनों एक दूसरे से बुरी तरह लिपटे थे. कोमल दीदी की योनि ख़ास थी जो थोड़ा अभ्यस्त होते हे उसका समूचा लिंग अंदर लेने लग जाती थी.

"करवट लो आप.. आह्हः.", कोमल दीदी के पीछे से चिपक कर अर्जुन ने उनके भाई गोल नितम्बो के बीच से उस गुलाबी द्वार को फैलते हुए अपना जरुरत से कही अधिक फूला हुआ अंग अंदर जड़ तक भर दिए. दीदी को अब अर्जुन का लुंड ज्यादा हे बड़ा और खुद की छूट कुंवारी सी लगनी लगी थी. भरपूर रगड़ लगते हुए वह 9 इंच का कामदण्ड उनके गर्भ पर ठोकर मारता तोह नरम कूल्हों में भी कम्पन्न होने लगती.

"इन्हे आराम से दबा भाई. तेरे हे है लेकिन अभी से हालत खराब कर देगा तोह कोई सवाल कर सकता है.. आह्हः.. मसल या पी ..आह्हः लेकिन आराम से.", इतनी तंग छूट में धक्के लगते हुए अर्जुन जैसे कामांध हे हो गया था. मॉटे दूध कास के दबाते हुए वह बुरी तरह चिपका हुआ था. दीदी के ध्यान दिलाते हे वह रफ़्तार धीमी करते हुए प्यार से अपना चप्पू उस गहरी झील में चलने लगा. स्टैनो का आकर्षण हे था जो वह बेसबर हो जाता था. दीदी भी निहाल होती पानी बहा रही थी.

"आपके सामने सब भूल जाता हु. आठ.. पता नहीं ऐसा क्यों होता है. सच में किसी अप्सरा से ऊपर हो आप.", गोल निप्पल हलके से रगड़ते हुए वह उनके नरम कूल्हों का भरपूर लुत्फ़ ले रहा था. थोड़ी हेर देर बाद दोनों फिर से पुराणी मुद्रा में आ गए. उनके ऊपर लेता वह मुँह में भरते हुए मॉटे दूध को पीने लगा. लिंग पूर्ववत्त हे योनि को ढीला करने की नाकाम कोशिश में लगा था.

"आह्हः.. ारु.. उम्म्म्म... ऐसे हे.. आह्हः.. सच कहु तोह मैं भी तुझसे दूर नहीं रहना चाहती .. उम्म्म.. लेकिन ये जरुरी है.. आठ.. इन्हे पी लेकिन आराम से.", दीदी की बात मानते हुए अर्जुन ने भी kaam-kalash का वह गुलाबी दाना मुलायम मांस के साथ हे मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिए. धीमी रफ़्तार में पूरा लुंड छूट की हद्द तक अंदर जाता और सुपडे तक बहार निकलता. लयबद्ध तरीके से निचला हिस्सा काम कर रहा था और ऊपर एक दूसरे को दोनों हर जगह चूम और मसल रहे थे. दीदी ने अपनी टाँगे उठा कर अर्जुन की कमर पर कस ली. 20 मिनट की इस लम्बी चुदाई में अर्जुन झड़ने से कोसो दूर था और दीदी ने तीसरी बार कॉमर्स उड़ेल दिए था. इस बार तोह गद्दे तक उनका जोश बेहटा हुआ आ गया था.

"आप आराम कर लो थोड़ा.", उनकी हालत देख कर अर्जुन अलग हो गया. उसका शरीर भी पसीने में नहाया था और विकराल लुंड चुतरस की वजह से चाँद की रौशनी में ाचा खासा चमक रहा था. लेकिन दीदी ने साँसे दुरुस्त करते हे टीशर्ट पजामा पहना और 1 मिनट में वापिस आने का बोल कर नीचे चली गई. ऐसा तोह वह किसी भी हाल में नहीं करती. अर्जुन बिना कुछ कहे अपने लिंग को पानी से धोने के बाद निर्वस्त्र हे लेट गया. आँखें बंद करता वह बस ये सोच रहा था के कही कोई गलती तोह नहीं हो गयी अनजाने में.

जल्द हे जवाब मिल गया लेकिन जोरदार. दीदी हाथ में उसका विकराल लिंग पकडे चूम रही थी. नरम होंठो को वह महसूस करते हे अर्जुन की सिसकारी निकल गई. मजे में आँखें बंद किये वह खुश भी था और हैरान भी. शायद दीदी अब और नहीं झेल सकती थी इसलिए उसको मुँह से हे फारिग करना चाहती थी. अंदाजे से हाथ बढ़ाते हुए दीदी के उरोज पकड़ने लगा तोह आँखे खोलनी पड़ी. वह मुलायम सख्त उभार कोमल दीदी के नहीं थे लेकिन उनका महत्व उनसे काम भी न था.

"दीदी आप?", ऋतू दीदी को अपने लिंग पर झुके देख अर्जुन ने इतना हे कहा और ऋतू दीदी किसी बिल्ली इस झपट कर उसके ऊपर आ गई. उनकी बेताबी जैसे अर्जुन से भी अधिक थी. बदन से ऊपरी कपडा हटती वह उसके सीने से चिपक गई. उनके स्टैनो का भी कोई जवाब न था. नारियल से गोल और ठोस इतने की अर्जुन के सीने में निप्पल की चुभन बहोत थी उनकी हालत बताने के लिए. ऋतू दीदी का चुम्बन अर्जुन को एक बार फिर उस सफर पे ले चला जो कुछ समय पहले व्यथित हो गया था. गोल कूल्हों को निर्वस्त्र लिंग पर रगड़ती वह अपना पूरा ऊपरी धड़ उसके सीने से रगड़ती हुई ख़ास ऊष्मा पैदा कर रही थी. लिंग तोह जैसे इतना ताव सेहन नहीं कर प् रहा था.

"सरप्राइज जल्दी मिल गया तुम्हे.", ऋतू दीदी की नटखट सी मुस्कान देख कर अर्जुन को अब समझ आया के वह क्या कह रही थी पंजाब से आने के बाद. मतलब एक हे रात में कोमल दीदी और ऋतू दीदी के साथ प्यार करने का अवसर. अर्जुन भी ख़ुशी में उन्हें पलट कर अपने नीचे ले आया. वह तंग सलवार खींच कर लम्बी गोरी टाँगे निर्वस्त्र करके उनके खूबसूरत पंजे चूमता हुआ अर्जुन इस रात को लम्बा करना चाहता था. ऋतू दीदी तोह उसकी ज़िन्दगी थी और उनके साथ कोई जल्दबाजी वह भला कैसे कर सकता था. हर चुम्बन एक एक इंच आगे बढ़ता उनकी मखमली चिकनी जांघो के जोड़ तक आ पंहुचा.

"आप दोनों से खूबसूरत कोई हो नहीं सकता और आपको प्यार करना जैसे वह सपना है जो हर रात मैं देखता हु.", हलके से उनकी गुलाबी चकिनी योनि को चूमते हुए वह नाभि में जीभ घूमने लगा. ऋतू का बेदाग़ जिस्म गद्दे पर मचलने लगा. नरम गोल नाभि में हरकत करती गीली जीभ जैसे कामुकता का बटन दबा रही थी. उसको पर करते हे तन्न कर खड़े गुलाबी निप्पल वैसे हे थे जैसे कोमल दीदी के लेकिन उनसे थोड़े पतले और तीखे. प्यार से दोनों को चूसते हुए अब वह पूरा हे उनके ऊपर चा गया था.

"ारु.. आज ऐसे प्यार कर जैसे तू सपने में देखता है.", दीदी की बात कुछ अलग हे कह रही थी. अर्जुन ने काख के नीचे से दोनों हाथ निकलते हुए उनका धड़ और चेहरा ऊपर उठाते हुए वह मादक चुम्बन शुरू किआ जिसकी सीमा उसने भी नहीं सोची थी. सर इधर उधर होने पर भी होंठ कसके जुड़े रहे. ये नरम द्वन्द उस मदद तक चला आया जहा ऋतू अब अर्जुन के होंठो का खून पीने लगी थी. इतना पागलपन था दोनों का जो दर्द में भी मजा ले रहे थे. मदहोशी के आलम में हे अर्जुन ने अपना लिंग उन गुलाब की पत्तियों सी फांको पर टिकाया और धकेल दिए. पल भर के लिए शरीर रुके लेकिन फिर एक ताल में एक साथ हिलने लगे.

यु चाहे आशिक़ी ज़माने भर की सरफिरे लाख करते है,

मोहब्बत उन्हें दोजख में भी नसीब नहीं होती जो जिस्म पे मरते है.

अंजाम जानकर भी जलकर खाख क्यों होता है परवाना शमा पे,

इश्क़ की डोर से बांधने वाले कहा दर्द की परवाह करते है.....

सबकुछ भुला कर अर्जुन बेलगाम सा ऋतू में समाये जा रहा था और उस से कही ज्यादा जोश में ऋतू हर धक्के को आराम से झेलती हुई अपनी लम्बी टाँगे उसकी कमर से लपेटे निरंतर चूम रही थी. मदहोशी के आलम में दोनों हे कब गद्दे से उठ कर खड़े हो गए उनको होश न रहा. अर्जुन वैसे हे किसी फूल की तरह ऋतू को बाहों में उठाये मिलान जारी रखे थे. उसके गर्दन पकडे ऋतू भी वैसा हे प्यार वापिस दे रही थी. भगवन भी जाने क्या सोचता होगा जब भी इनका मिलान होने लगता था. रात के इस पहर में तेज अँधेरी (विंड) जहा वृक्षों को हिलने लगी थी, आसमान को अशांत करने लगी थी वही इनका प्यार इस लोक से परे जा चूका था. पीठ का मांस भेद कर दोनों तरफ तीखे नाखून अर्जुन की खाल में समां चुके थे.

"आह्ह्ह्ह.. अर्जुननननन.. ", लुंड फटने की कगार पर था और ऋतू ने पूरे शरीर की ताक़त अपनी जांघो के बीच लगते हुए जैसे अर्जुन का लिंग हे काटने की चेष्ता कर दी थी. कॉमर्स पानी की तरह कतरे कतरे जमीन तक गिरने लगा और वह निढाल हो कर उसकी बाहों में झूल गई. जमीन पर कितना हे वीर्य टपका था वह अँधेरे में पता लगाना मुश्किल था लेकिन अर्जुन हिम्मत करके बस गद्दे तक हे पहुंच पाया था. गद्दे के बीचो बीच वह जैसे बेहोश लिटा हुआ था वैसे हे ऋतू को जकड़े जिसकी हालत अर्जुन से अलग न थी. दोनों के अंग अभी तक जुड़े थे. तेज हवा भी अब कुछ शांत हो चुकी थी लेकिन उनकी हालत में कोई सुधर न हुआ. सुबह 4 बजे कोमल दीदी दबे पाँव उनके पास आई तोह उठाने की हिम्मत उनमे भी नहीं थी.

कुछ सोच कर उन्होंने बोतल से थोड़ा पानी ऋतू के जिस्म पर टपकाया और वापिस चली गई खुली बोतल को दोनों के पास गद्दे पर उलट कर. अर्जुन की आँख पहले खुली. गद्दे पर पानी गिर रहा था और उसके ऊपर दीदी ऐसी हालत में थी. बोतल पाँव के पास खली पड़ी थी और इस वजह से हे उसकी आँख खुली थी.

"दीदी, आप ठीक है?", अर्जुन ने पीठ सहलाते हुए कहा. ऋतू दीदी की पीठ भी गीली महसूस हुई और उसके हिलने से उन्होंने भी अपनी उनींदी सी आँखें खोल ली. लेकिन अलग होने की कोई कोशिश नहीं की.

"सोने दे न ारु, बड़ा ाचा लग रहा है. अभी तोह नींद आई थी.", फिर से उसके सीने पर सर रखती वह सोने लगी तोह अर्जुन ने गहरी सांस ली.

"दीदी, हमारी हालत तोह देखो जरा.", अर्जुन ने टटोलते हुए कूल्हों के बीच हाथ डाला तोह अभी उसका लिंग खड़ा हो कर उस ख़ास जगह को चूम रहा था. वह मखमली हिस्सा कॉमर्स की पपड़ी से अकड़ा हुआ था. ऋतू दीदी की नींद भी टूट चुकी थी.

"कुछ ज्यादा हे कर गए शायद तेरे सपने की वजह से. हम किश कर रहे थे उसके बाद तोह कुछ याद हे नहीं.", वह पलट कर उसकी बाजू पर सर रख कर लेट गई. अर्जुन के बराबर हे उसका पजामा भीगा हुआ पड़ा था. उसकी मदद से अर्जुन ने सूखी योनि को आराम से साफ़ किआ तोह दीदी को इसमें भी मस्ती छेड़ने लगी.

"प्लीज अब कुछ मत करना दीदी. याद तोह मुझे भी कुछ नहीं लेकिन इतना जरूर है के रात जो भी हुआ उसके बाद हम दोनों होश में नहीं थे. आप कपडे पहनो और नीचे चलो. सो जाना थोड़ी देर और मैं नाहा कर निकलता हु फिर नानी के घर के लिए.", अर्जुन के इतने प्यार से कहने पर जैसे तैसे 2 कपडे पहन कर ऋतू दीदी कड़ी हुई और अर्जुन भी सिर्फ पजामा पहन कर उनके साथ हे नीचे चल दिए. दीदी अपने कमरे में गई और अर्जुन अंदर वाले आँगन के बाथरूम में. लाइट जला कर नहाते हुए आईने पर नजर पड़ते हे वह मुस्कुराने लगा. ऊपर वाला होंठ सूज चूका था. सीने पर लम्बे नाखून के निशाँ और पीठ तोह दोनों तरफ से जख्मी थी.

'मरवा दिए कोमल दीदी ने तोह मुझे. ऋतू दीदी ने जो हालत की है अब कपडे भी किसी के सामने नहीं उतार सकता.', लुंड को साफ़ करते हुए देखा तोह वह अभी भी सख्त था लेकिन खाल हलकी सी छील गई थी. नारियल का तेल लगाने के बाद वह ध्यान से पूरे शरीर को साफ़ करने के बाद कंधे पर टोलिया लिए ऊपर चला गया. जाते हुए वह देख गया था के कोमल दीदी रसोईघर में आ चुकी थी.

"पहले दूध और ये लड्डू खा ले ारु और ये पैसे रख ले रात में ताऊजी ने दिए थे तेरे लिए.", कोमल दीदी भी नहाने के बाद फिर से गुलाब सी महक रही थी. अर्जुन ने बड़े हे आराम से उनके होंठो को चूम लिए.

"आप ठीक हो न?", अर्जुन ने वह नोटों की गद्दी एक तरफ रखते हुए दीदी का हाथ थाम लिए.

"तुम्हे दोनों का प्यार एक साथ नहीं दे सकते थे इसलिए वो किआ. सॉरी.", दीदी तोह हमेशा हे उसके दिल को ाचे से समझती थी. यहाँ अर्जुन के खुश होने पर भी वह माफ़ी मांग रही थी.

"ये प्यार तोह जीवनभर हे साथ रहेगा. लेकिन एक बार मुझे लगा के ज्यादा हो गया. बस आपका दिल नहीं दुखाना चाहता था.", अर्जुन ने उनके प्यारे चेहरे को देखते हुए बात जारी राखी.

"पता है ारु, ये मैंने ऋतू से कहा था के वो और मैं मिलकर हे पूरी होती है. इसलिए एक बार अर्जुन को दोनों का एहसास होना जरुरी है. मेरे लिए ये मुश्किल था लेकिन ऋतू तैयार थी. वह तोह इस से आगे बढ़ना चाहती थी लेकिन ऐसा अभी मुमकिन नहीं है. और मुझे कल रात हरेक पल में सिर्फ बेपनाह प्यार मिला तोह मैं नाराज कैसे हो सकती हु? हाँ ऋतू की हालत खराब है और तेरी भी शायद.", दीदी ने अपना कप उठा कर घूँट लिए तोह अर्जुन ने भी दूध पीया.

"मालूम है मुझे की वह मुमकिन नहीं लेकिन अपनी आत्मा और दिल से मिलवाने के लिए आपका शुक्रिया. ये ज़िन्दगी का वह पल था जहा मैं संभालना नहीं चाहता था क्योंकि आप दोनों के साथ मुझे जरुरत हे नहीं पड़ी. ी लव यू."

"फॉर थे फर्स्ट टाइम ी फेल्ट तहत I'm कम्पलीट नाउ. आईटी इस नॉट लिखे तहत ी दीद नॉट एंजोयेड आवर प्रीवियस मोमेंट्स बूत लास्ट नाईट एंड थिस मॉर्निंग, एवरीथिंग टर्न्ड ब्यूटीफुल. फॉर ा व्हिले ी वास् तेरे विथ यू एंड ऋतू. आईटी वास् अमेजिंग बीइंग part ऑफ़ तहत मोमेंट. Let's सी व्हाट फ्यूचर है सेव्ड फॉर उस. एंड ी लव यू तू.", दीदी ने गाल पर हलके से होंठ रखे और उठ कड़ी हुई. 5 बज गए थे और रेखा जी कभी भी इधर आ सकती थी. वैसे रात सब देरी से सोये थे तोह आज कुछ लेट होना जायज था.

"माँ, मैं जल्द आ जाऊंगा. आप अपना ध्यान रखना.", अर्जुन खुद हे कमरे में चला आया. रेखा जी उठ गई थी और कपडे ठीक करके बहार हे आने लगी थी. अपने बेटे के ऐसे गले लगने से उनका दिल भी शांत हो गया था.

"ध्यान से जाना और सबसे ाचे से मिलना. वह बहोत लोग होंगे और राजेश ने तुम्हे अकेले इसलिए बुलाया है के वह सबसे मिलवा सके. आते हुए खुद हे सबके लिए प्रशाद लेते आना. आज से तुम्हारे खुद के काम की शुरुवात हे हो रही है एक तरीके से.", उन्होंने अर्जुन को कास के सीने से लगाया और माथ चूम कर विदा किआ. अर्जुन बहार आया तोह दीदी ने रानी पर कपडा मार कर उसको चमका दिए था.

"इस बार मेरी कार में सबसे पहले आप बैठने वाली हो.", और इतना बोल कर वह सुनसान रस्ते पर निकल चला. ननिहाल जाने से पहले आचार्य जी से भी तोह मिलना हे था.

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मौसम खुशगवार हो गया था. 5-6 मिनट बाद हे वह पार्क के बहार रुक चूका था. सफ़ेद कमीज और आसमानी रंग की जीन्स पहने वह रोजाना से अलग हे लग रहा था.

"आओ भाई. लगता है एक छोटी मुलाकात के लिए हे रुके हो और फिर आगे कही जाना है.", आचार्य जी भी जैसे अभी पहुंचे थे. वह आज अकेले थे.

"जी बस आपका चेहरा देखने आया था. शुभ काम से ननिहाल चला था #### शहर. आपको देखने के बाद दिन हमेशा ाचा रहता है.", अर्जुन चरण स्पर्श करके मिला तोह उन्होंने भी उसको सीने से लगाया और ध्यान से रानी के साथ हे उसको देखने लगे.

"आओ चलो जरा मेरे साथ.", बिना कुछ कहे वह खुद चाबी लेकर अर्जुन के साथ अपने घर की तरफ चल दिए. रानी को वह उस से भी बेहतर चलते थे, ये अर्जुन जानता था. 3-4 मिनट बाद हे वह उनकी कोठी के बहार खड़े थे. घंटी का बड़ा बटन दबाते हे एक सफ़ेद लैब्राडोर उछलता हुआ गेट की तरफ आया. वह खुश और उत्साहित था लेकिन उसके पीछे हे हिमानी लकड़ी का बड़ा दरवाजा खोलती हुई गलियारा लांघती गेट तक आ कड़ी हुई.

"बिटिया गैराज में जहा हेलमेट टंगे है वह दूसरी कतार में पहला laal-kaale रंग वाला ले आओ.", हिमानी ने अर्जुन को भी सर हिलाते हे अभिवादन किआ और तुरंत वापिस चली गई. आचार्य जी का भी घर कही ज्यादा हे बड़ा था. पाम के 5-6 बड़े पेड़, चौकोर 200-250 गज का साफ़ कटी घास का लॉन, विदेशी तरीके से बना हुआ कांच और लकड़ी के मिश्रण वाला रहने का हिस्सा और शटर लगा बड़ा गैराज. उन्होंने जाली वाले गेट को खोला तोह वह कुत्ता उनकी कमर पर पाँव रख के खड़ा हो गया.

"इसका नाम जॉय है. जॉय ये अर्जुन है. शेक हैंड.", उन्होंने परिचय कराया और उस समझदार जीव ने अगला दया पंजा अर्जुन के सामने कर दिए.

"Hello जॉय. बहुत प्यारा है और समझदार भी.", अर्जुन खुश हो गया था इस नए दोस्त से मिल कर.

"वैसे तुम्हारे दादाजी को 15-16 साल पहले स्पेशल अवार्ड मिला था कैनाइन ट्रेनिंग का. बॉम्बे तक चर्चे है उनके. जोजो वैसे भी एक समझदार घरेलु नेसल है लेकिन वह जिन्हे ट्रैन करते है वह हर किसी के बस का काम नहीं.", अभी वह बात कर हे रहे थे की हिमानी एक चमचमाता हुआ काफी आकर्षक हेलमेट लिए उनके पास आ गई. देखने से हे वह बहोत कीमती और ख़ास लग रहा था.

"ये आप मुझे दे रहे है? ये शायद बहोत ख़ास है आपके लिए लेकिन मैं तोह कोई भी हेलमेट ले सकता हु. वैसे भी मैं संभल कर चलता हु."

"बीटा ज़िन्दगी का एक पल ज़माने भर की दौलत देके भी नहीं खरीदा जा सकता. शहर में जैसे मर्जी चलो लेकिन हाईवे पर कोई जोखिम नहीं. ये ख़ास है और ऐसे मेरे पास 50 और है लेकिन ये तुम्हारे लिए है. आइंदा ऐसी छोटी मोती गलती नहीं करनी बहार जाते हुए. हाँ ये शीशा इस बटन को दबाये रखने से ऊपर हो जाता है और इधर से ये चस्मा सामने आ जाता है. गिरने पर भी बचाव करता है. चलो पहनो और मुझे वापिस छोड़ दो.", वह सब समझा भी रहे थे और करके दिखा भी रहे थे. सचमुच हेलमेट ख़ास हे था.

"इन्हे कलेक्शन क्यों नहीं दिखते अपना नाना जी?"

"बीटा ये बड़े लोग है. अपने दादा जी के घर आने के लिए भी इनसे गुजारिश करनी पड़ेगी.", आचार्य जी द्वारा इतना मान देने पर वह उनके गले लग गया. और फिर ाचे से हेलमेट पहन कर इस बार वह मोटरसाइकिल चलते हुए उन्हें पार्क छोड़ कर अपने गंतव्य पर बढ़ गया.

शायद ये हेलमेट हे था जो अर्जुन पहली बार निश्चिन्त सा बिना रफ़्तार देखे ख़ुशी से रानी को दौड़ा रहा था. न चेहरे पर हवा लग रही थी और न ध्यान भटक रहा था. 90-100 की रफ़्तार पे चलता वह 60 किलोमीटर का सफर 40 मिनट में पूरा करके ननिहाल आ पंहुचा था. दिल में आचार्य जी के लिए इज़्ज़त्त कही ज्यादा हे बढ़ चुकी थी. वह उसको अपना पारिवारिक सदस्य मानते थे और अर्जुन ने कभी सामने से ऐसा कदम लिए हे नहीं था. अब उसको ध्यान था के वह अपनी तरफ से शादी का पहला निमंत्रण किसे देने वाला है.

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बिंदिया घर की सफाई करके अब बहार आँगन धो कर हाथ मुँह धो रही थी. अर्जुन के अंदर आते हे उसने मुस्कुरा कर अभिवादन किआ. समय सवा 6 हो चला था.

"कैसी हो बिंदिया? इतनी सवेरे हे काम पर लगी हो?"

"ाची हु. आप बताओ सब ठीक? आज ख़ास दिन है तोह घर का साफ़ होना भी जरुरी है. अंदर सिर्फ आपकी नानी और नाना जी उठे है. संगीता मेमसाब के साथ मंजू दीदी रसोई में है.", अर्जुन तुरंत मोटरसाइकिल कड़ी करता एक तरफ वाले गलियारे से अंदर चला गया. मंजू कब आई यहाँ?

सामने तुलसी पूजा करने के बाद बड़ी नानी तख़्त पर बैठी थी और सुनंदा नानी तैयार हो कर कमरे से बहार आई तोह अपने नाती को देखते हे उस से लिपट गई.

"मेरा बचा तोह समय का बड़ा पाबंद है. ज्यादा दिक्कत तोह नहीं हुई तुम्हे?", ये महक अर्जुन को पागल कर देती थी. ठीक वैसी हे थी जैसी दीदी और माँ से आती थी. वह तुरंत अलग होते हुए उन्हें सब बताने लगा. सुमित्रा नानी भी दिया जगाने के बाद वही आ गई. तीनो से प्यार भरी बातें करते हुए जब नजर सीढ़ियों से चाय की ट्रे लेके आती मंजू पर पड़ी तोह अर्जुन की बची खुची सांसें भी ृक्क गई. पंजाबी सलवार कमीज वो भी लाल रंग का और गले में पतली चैन के साथ हे अर्जुन का पहनाया मंगलसूत्र.

'ये सब आज हे होना था.', अर्जुन खुद से इतना हे कह पाया और मंजू अर्जुन को देखते हे सकपका गई लेकिन सुनंदा जी ने हाथ से ट्रे लेते हुए खुद हे छोटे स्टूल पर राखी.

"मंजू कल रात हे आई थी और इतनी सवेरे हे सरोज ने इसको यहाँ भेज दिए काम करवाने के लिए. अब अपनी दोहती से काम करवा के पाप लुंगी क्या, तू हे समझा जरा इसको. तेरे हे पास रहती है न ये.", नानी की बात सुन्न कर अर्जुन की बोलती हे बंद हो गई.

"वह माँ ने कहा था के अर्जुन नाश्ता उधर करेगा. आप की इजाजत हो तोह नानी.", मंजू ने खुद हे बात संभाली.

"हाँ लेकिन 8 बजे इसको लेके bhoomi-poojan पर आ जाना. फ़िलहाल तोह यहाँ मेरे लादले के लिए किसी के पास टाइम होगा नहीं. जाने डेढ़ घंटे में ये बाकी सब क्या करेंगे. उठना हे नहीं हुआ है अभी.", सुनंदा जी ने संगीता मामी को सबको जगाने के लिए भेजा जो अपने तीनो ससुर को चाय देने के बाद इधर आ कड़ी हुई थी.

"मंजू एक मिनट रुक जरा.", सुनंदा जी कुछ सोच कर उठी और कमरे में चली गई. 2 मिनट बाद हे वह वापिस आई तोह एक प्लास्टिक का बैग उनके हाथ में था.

"पूजा में आने से पहले ये पहन लेना बीटा. मंजू सरोज को बोल देना के नाश्ते से फारिग हो कर वह इधर आ जाये. कोई जिगरवाला भी तोह होना चाहिए न मेरे साथ.", उन्होंने हँसते हुए कहा और अर्जुन पाँव छु कर मंजू के साथ हे बहार चल दिए.

"सुनंदा कुछ भी कह मंजू न इसके साथ हे ाची लगती है.", अंजना जी ने बात तोह कह दी लेकिन बात बड़ी थी.

"दीदी, हैं तोह उसके हे साथ लेकिन कबतक ये नहीं पता. ध्यान हो तोह मंजू के ब्याह की फोटो तक नहीं है किसी के पास और मेहमान भी सारे जाली थे.", सुनंदा जी ने जो भी कहा था वह जैसे इनके बीच या सिर्फ सख्त दिलो तक हे सिमित था.

"हाँ, मीरा होना भी कही काम किस्मत का काम है. दलीप और शंकर एक दूसरे का बोझ उतारते रहेंगे क्योंकि उन दोनों के बाप ने कही बड़ा हे काम कर दिए एक दूसरे के लिए. और बचे तोह प्यार करना हे जानते है. क्या मंजू और क्या प्रीती.", अंजना जी जैसी दिखती थी उस से कही वह जानती थी.

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"माँ आपको सुनंदा नानी बुला रही है.", मंजू घर आने तक एक लफ्ज़ अर्जुन से न बोली थी. और आते हे जो कहा तोह सरोज जी कमरे से तैयार हो कर आँगन में कड़ी हुई. वह सलवार कमीज में भी बेहद आकर्षक दिख रही थी. अर्जुन उन्हें देख रहा था और वह उसको गले लगा कर अब मंजू से बात कर रही थी.

"मेरा बीटा आया है और तू मुझे भागने लगी है? ाचे से देख तोह लेने दे पहले.", इतना सुनते हे मंजू पाँव पटकती ऊपर अपने कमरे में चली गई.

"देख ले तेरी पसंद. तुझे माँ का प्यार दू तोह भी सेहन नहीं उसको. चल ध्यान रखना उसका और दोनों समय से आ जाना.", अर्जुन ने अलग होने से पहले जल्दी से उनका एक उभर दबा दिए और होंठ चूम कर ऊपर भाग गया.

"शैतान. उसको बोल दे के दरवाजा लगा लेगी और नाश्ता बना के रखा है मैंने.", खिलखिलाती हुई वह खुद हे एक तरफ से घर बंद करके गलियारे से बहार निकल गई. अर्जुन निश्चिन्त हो कर ऊपर मंजू के कमरे में आया तोह वह अटेची से सामान निकाल कर एक तरफ रख रही थी. पीठ दरवाजे की तरफ करके.

"मेरी बीवी न हर दिन ज्यादा हे हॉट हो रही है.", अर्जुन ने पीछे से मंजू को बाहों में भरते हुए उसकी गर्दन पर होंठ टिका दिए. मंजू ने आँखें बंद करते हुए लम्बी सांस ली.

"याद भी है बीवी को कब बहार लेके गए हो? कब ढंग से प्यार किया.? मैं न आती तोह तुमने तोह बताना भी जरुरी नहीं समझा था.", मंजू का मूढ़ उखड़ा हुआ था.

"तुम्हारा पूरा हक़ है कुछ भी कहने का. लेकिन मुझे लगा के तुम वह घर पर ाचा महसूस करोगी.", अर्जुन आहिस्ता से उन उभारो को सूट के ऊपर से दबाते हुए मंजू की लम्बी गर्दन पर होंठ फिर रहा था.

"अब जिम्मेवारी लेनी शुरू करो थोड़ी. कल प्रीती को भी यही बहाने करोगे तोह नहीं चलेगा. मेरे साथ हर बात ठीक है लेकिन खुद हे सोचो के कैसा लगता होगा साड़ी रात अकेले बिस्टेर पर करवाते लेना? बहार Ritu-Alka के साथ जाना ख़ुशी दे सकता है लेकिन तुम्हारा बस 5 मिनट साथ होना दिन पूरा कर देता है. ये बचा भी ऐसे हे पल जायेगा जिसका न कोई बाप और न कोई नाम.", मंजू जैसे कुछ सोच कर बैठी थी. अर्जुन ने सचमुच भुला हे दिए था क्योंकि अपनी जिम्मेवारी तोह वह परिवार को दे चूका था अनजाने में.

"सॉरी. गलती हो गई मंजू लेकिन तुम्हे तोह हालात पता हे है. बहोत कुछ हो गया इस बीच."

"इसलिए कह रही हु की मेरे साथ सब चल जायेगा लेकिन अगर प्रीती को थोड़ा सा भी परेशां किआ तोह फिर गाल सेक दूंगी.", अर्जुन उसका ये प्यार देख कर गदगद हो गया. घूमते हुए मंजू के पतले होंठ चूम कर उसने जवाब दिए.

"ये Manju-Arjun शर्मा की बेटी है और इसकी माँ से मैं मरते दम तक प्यार करता रहूँगा. वह मंजूबाला की मर्जी है के वह मुझे प्यार दे या छोड़ कर भाग जाये.", अर्जुन ने अब जैसे जवाब देने का भी मौका न दिए. सलवार का नाडा खींच कर उसने होंठ पीते हुए हे कमीज भी ऊपर उठा दी. मंजू के सँभालने से पहले हे उसका वह लम्बा दिलकश बदन अंगवस्त्रो में अर्जुन की बाहो में था.

"अब नाश्ता ाचे से करूँगा. सासु माँ बोल कर गई है के ाचे से मंजू का ध्यान रखना.", अर्जुन के ऐसा कहते हे मंजू हंसने लगी.

"मेरे भोले बलमा, तुम न सचमुच पागल हो. प्रीती सही कहती थी की तुम ऐसे कहने से हे पागल हो जाओगे."

"ाचा तोह मिलीभगत थी ये. उस बिल्ली को बाद में बताता हु पहले इस bagad-billi के नाखून उतार दू.", अर्जुन ने वह लाल ब्रा हटते हुए दोनों चुके जकड लिए. मंजू के बदन पर निखार देखते बनता था. जल्द हे दोनों बर्फ से पिघलते एक दूसरे में समां गए. आधे घंटे बाद जब एक दूसरे से अलग हो कर देखने लगे तोह मुस्कान चेहरे पर थी. थिरकते चुके लाल और छूट से सफ़ेद वीर्य बहार निकल रहा था.

"अगली बार जल्द हे तुम्हे तुम्हारा गिफ्ट मिल जायेगा. मैंने सोचा है के हिप्स 36 या 38 तोह होने हे चाहिए. आराम से लेटो मैं खाना लेके आई.", मंजू ने गीले लुंड पर एक किश किआ और ढीला पजामा और टीशर्ट पहन कर बहार निकल गई. अर्जुन को अपनी हे किस्मत से रश्क हो रहा था. मंजू उस से बेपनाह प्यार करती थी और आज हालत ये थी की वह उसके बराबर साथ देने के बाद भी अगले दौर के लिए कही ना नहीं कहती थी. सबसे बड़ी बात की वह उसके बचे की माँ बन्न रही थी. इतना याद करते हे अर्जुन की आँखों में गीलापन आ गया.

'ये गलत है. मंजू को साथ रखना हे होगा.', खुद से एक वादा करता वह जैसे एक छोटी सी बगावत करने को तैयार हो गया था. जिसका नतीजा शायद समय बताने वाला था.
 
मिले सितारे लाख

बने सितारे ख़ाक

लकड़ी ने जलना था

बची सिर्फ राख
 
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अपडेट 104

Milna-Bichadna


अर्जुन समय से 10 मिनट पहले हे कॉलेज की जमीन पर मंजू के साथ पहुँच गया था. यहाँ का माहौल इतनी सवेरे हे gehma-gehmi वाला देख वह मंजू को साथ लिए हे इस बड़े पंडाल में आ गया जहा एक पुजारी के साथ सोहनलाल जी और कुन्दनलाल जी वेदी बनवा रहे थे. परिवार के सभी लोग यही बैठे थे और साथ हे कुछ विशिष्ट मेहमान भी.

"आओ भाई, सही टाइम पर आ गए.", अर्जुन को स्नेह से मिलने के साथ राजेश मां ने उसको परिचय 3-4 लोगो से करवाया और साथ हे पूजा मामी हाथ पकड़ कर उसको इन 3 लोगो के पास ले आई. एक आकर्षक रोबीले व्यक्ति थे कोई 60-62 उम्र के और साथ हे 40 के आसपास का ये गोरा लम्बा आदमी. महिला भी 35-36 की हे लग रही थी.

"पापा, ये है अर्जुन अपनी रेखा का बीटा और अर्जुन ये है मेरे पापा, भैया और भाभी.", अर्जुन ने मामी के भैया भाभी को हाथ जोड़ कर नमस्कार किआ और उनके पिता के चरण स्पर्श किये. मामी की भाभी बड़े ध्यान से अर्जुन को देख रही थी. सफ़ेद कैसा हुआ खाड़ी का कुरता और पयजामा, गले में सोने की अलग सी जंजीर और घुंगराले कुंडली वाले आकर्षक बाल. पंडाल में अर्जुन के बराबर लम्बाई सिर्फ कुन्दनलाल जी के हे थी, शायद वह भी एक इंच काम हे थे अपने नाती से.

"ाचा लगा तुम्हे देख कर बीटा. बड़े हो गए हो और अब जल्दी हे राजेश के साथ बिज़नेस भी करने वाले हो. कुछ खास प्लान्स है आगे के लिए?", गौर साहब का बात करने का तरीका नरम और ख़ास हे था.

"जी अभी तोह ये सब सिर्फ मां जी हे देखने वाले है. मेरी ज़िन्दगी के सभी फैंसले मेरे दादाजी करते है. पढाई पूरी होने के बाद हे कुछ सोच पाउँगा. वैसे आपके बारे में मामी जी से बहोत सुना है.", अर्जुन ने nape-tule शब्दों में हे उनकी प्रशंशा कर दी.

"बिज़नेस के लिए ख़ास खून होता है जो सबके पास नहीं होता. वैसे भी तुम अभी कोरे बचे हे हो जाने क्या सोच कर राजेश ने इतने बड़े प्रोजेक्ट में तुम्हे भागीदार बनाया. हम तोह सामने से पूरा पैसा लगाने को त्यार थे. ऐसी छोटी मोती बिल्डिंग्स तोह 4-6 महीने का खेल है गौर डेवेलपर्स के liye.",Ye महानुभाव शायद बाप की शोहरत के नशे में ज्यादा हे डूबे रहते थे. पूजा मामी के भाई का ऐसा कहना इन सबको बुरा लगा लेकिन अर्जुन बस मुस्कुराता हुआ चुप रहा.

"हाँ देखा है मैंने तुम्हारा ख़ास खून और कितने बड़े बिल्डर हो तुम सुरेश. अंकल जी की म्हणत को अपना कहना कहा की महारथ है? वैसे जो जमीन तुम खरीदना चाहते हो न बिपास वाली, उसका मालिक हे तुम्हारे सामने खड़ा है.", राजेश मां जैसे किसी की परवाह नहीं करते थे. कौन बड़ा है कौन अमीर या ताक़तवर. और उनके इस तनज़्ज़ को सुनते हे पूजा के पिता जी ने विनम्रता से अर्जुन से बात की.

"देखो सुरेश थोड़ा अलग है और हमेशा काम में रहने की वजह से काम हे बातचीत करता है. इसकी बात का बुरा नहीं maan-na."

"बुरा तब लगेगा न जब बात गलत कही हो. इन्होने ठीक कहा है के मुझे तोह तजुर्बा है नहीं और वैसे भी मैं इस सबके लिए ठीक भी नहीं हु. आज्ञा चाहता हु आपसे, हवन का समय हो गया है.", अर्जुन ने तीनो को हाथ जोड़ कर नमस्कार किआ और हवन की वेदी के पास चला गया.

"भैया थोड़ा सोच कर बात किआ करो आप. मेरी परवाह नहीं तोह पिताजी की इज़्ज़त्त का ख़याल कीजिये. शंकर जीजा जी तक बात गई या उनके पिता तक तोह फिर से पापा को शर्मिंदा होना पड़ेगा.", पूजा मामी ने इतना कहा और अपनी छोटी भाभी को लेकर वह भी अपनी जगह आ बैठी. कुछ हे देर में मंत्रोचारण के साथ हवन शुरू हो गया. घर के सभी लोग आहुति दे रहे थे और अर्जुन की बाई तरफ मंजू बैठी थी, जिसको ये स्थान खुद अर्जुन ने दिए था जैसे राजेश मां के साथ ममता मामी और कुन्दनलाल जी के साथ सुनंदा जी. आधे घंटे बाद सभी ने बारी बारी से अग्नि में आहुति देकर हवन कार्य को संपन्न किआ. अब तक कोई 500 लोग तोह एकत्रित हो हे गए थे.

"मुबारक हो राजेश बीटा, मुबारक हो कुंदन जी.", ये कोई मंत्री जी थे और उनके साथ 3-4 काली वर्दी वाले कमांडो. फूलो का गुलदस्ता देने के बाद उन्होंने दोनों से हाथ मिलाया. गौर साहब ने भी उनसे मुलाकात की और ऐसे हे अगले आधे घंटे में राजेश मां अर्जुन को 15-20 लोगो से मिलवा चुके थे. घर के बड़े एक तरफ खाने का इंतजाम देख रहे थे और हवन के अलग कोई 4 बड़े पंडाल लगाए गए थे जहा कुर्सी और बड़ी मेज लगी थी.

"मां आपसे कुछ बात करनी थी.?", अर्जुन ने संकोचवश ये कहा. वैसे वह काफी देर से अपने मां के फारिग होने का इन्तजार कर रहा था लेकिन मौका अब कही मिला.

"हाँ, बेहिचक कहो क्या बात है? तुम मेरे दोस्त हो, ये याद रखना.", राजेश मां खुद हे उसका हाथ पकड़ कर एक तरफ ले आये. कूलर का शोर और लोगो की बातचीत से दूर वह एक कोने में खड़े थे.

"मैं क्या कह रहा था के जैसे प्रीती को आपने शामिल किआ क्या वह मेरी जगह मंजू हो सकती है?", अर्जुन जो कहना चाह रहा था वह मां समझ गए. उन्होंने कोई संदेह या सवाल नहीं किआ इतनी बड़ी बात सुन्न कर.

"पहले हे ऐसा हो चूका है. तुमने शायद कल फाइल को ाचे से स्टडी नहीं किआ था. प्रीती ने पढ़ा था तुम्हारे अंगूठा लगाने के बाद. तुम दोनों 50% के हिस्सेदार हो लेकिन एक्टिव बोर्ड मेंबर मंजूबाला है तुम दोनों की जगह. ये क्लॉज़ भी जीजा जी ने हे आड़ करवाया था. ये समझ लो की तुम्हारी सैलरी मंजू को और प्रॉफिट प्रीती और तुम्हे मिलेगा. आगे तुम कुछ और भी करना चाहो तोह कर सकते है, जगह के मालिक तुम्ही हो.", राजेश मां ने हँसते हुए बात कही और अर्जुन के चेहरे पर एक संतुष्टि थी की उसके पिता जी कही ज्यादा हे सोच कर चलते है.

"नहीं बस इतना बहोत है मां जी. थैंक यू सो मच."

"वैसे एक बात तोह बता दे दोस्त की तरह.", मां जी के चेहरे पर शरारत थी.

"पूछिए."

"चल छोड़ यार. फिर कभी बात करेंगे. वैसे दोनों का ाचा ख़याल रखना.", मां इतना कह कर उनको बुलाने आई ममता मामी के साथ चले गए. अर्जुन भी हँसता हुआ इधर उधर टहल कर हर तरफ देखने लगा. लोग नाश्ता कर रहे थे, कही झुण्ड में ठहाके तोह कही हुक्का भी चल रहा था.

"अर्जुन बीटा.", सुनंदा नानी की आवाज सुन्न कर वह उनकी तरफ चल दिए. 5-7 महिलाये उनके साथ बातें कर रही थी. कुछ उनकी हमउम्र और कुछ बहु जैसी.

"ये अपनी रेखा का बीटा है अर्जुन और अर्जुन ये है तुम्हारी ममता मामी की माँ और ये पूजा मामी की. उर्वशी से तोह तुम मिल चुके हो और ये तुम्हारी सरोज मौसी की छोटी बहिन है.", अर्जुन ने सभी को नमस्कार किआ और सरोज मौसी भी मंजू के साथ उनके पास आ गई. एक लड़का जो कैटरिंग की तरफ से था सबके लिए nimbu-paani लेके आया था उनके हे साथ.

"देख ले गुड्डो, ऐसा लड़का पहले देखा है क्या पहले?", मौसी ने अपनी बहिन से कहा तोह उन्होंने भी ना में सर हिला दिए. ममता मामी की माता जी तोह अर्जुन के सर पर हाथ फिरने के बाद आँख से काजल निकाल कर उसके कान पर लगाती हुई बोली.

"सच कहा सरोज, रेखा तोह अपनी माँ पर गई लेकिन ये तोह उनसे भी अलग और प्यारा है. भगवन नजर न लगने दे किसी की."

"माँ जी, इसको नजर कैसे लग सकती है. शंकर जी का लाडला है तोह नजर वैसे हे कोसो दूर रहती है.", ममता मामी की इस चुटकी ने सबके चेहरे पर हंसी ला दी.

"वैसे हवन तोह ये मंजू के साथ कर रहा था.", पूजा मामी की माँ भी कुछ अलग न थी. Mooh-fatt और ऐश्वर्या से लबरेज. जहाँ भर के गहने पहने वह गर्मी में भी चहक रही थी.

"मंजू मेरी भागीदार है आंटी जी और मेरे से बड़ी है तोह एक तरह से वही मेरा ध्यान रखती है.", अर्जुन द्वारा इतना खुलकर कहना कैयो को हैरान कर गया. सिवाए सुनंदा जी और सरोज मौसी के. एक पल तोह मंजू भी हैरत से उसको देख रही थी.

"हाँ तोह रेखा और सरोज में जब कुछ फरक नहीं तोह फिर इन दोनों में कैसे हो सकता है. दोनों मेरे बचे है और मंजू अर्जुन का ध्यान रखती है तोह ये परिवार को मजबूत हे करता है.", सुनंदा जी ने मंजू को अपने साथ लगते हुए जवाब दिए. लेकिन पूजा मामी की माँ के चेहरे पर कुछ और हे रंग थे.

"वैसे बेटी तोह उर्वशी की भी समझदार है."

"हाँ. ाची लड़की है और हमको भी पसंद है. अर्जुन की होने वाली बीवी से भी मिलवाउंगी तुम्हे मैं, वह रेखा से भी प्यारी है.", सुनंदा जी तोह पहले भी उनका मुँह बंद करवा चुकी थी और फिर से याद दिला दिए था के उनके बचो से वह दूर हे रहे.

"माँ जी आप लोग खाना खा लीजिये फिर ड्राइवर आप लोगो को घर ले जायेगा. मंजू तुम भी माजी और भाभी का ख्याल रखो थोड़ी देर.", संगीता मामी ने आते हे सबसे कहा तोह सुनंदा जी ने भी सहमति जताई.

"हाँ बेटी, मैं भूल हे गई थी की किसी ने भी नाश्ता नहीं लिए है. वैसे मनोज और कैलाश कहा है? खेत पर तोह देवर जी भी नहीं गए.", सुनंदा जी की बात पर संगीता मामी इधर उधर देखने लगी.

"अभी यही थे वह भी. उनके साथ वह नारायण जी का बीटा था, शायद महफ़िल..", संगीता मामी ने बात अधूरी छोड़ दी.

"करने दो मनमानी आज. एक छुट्टी मिली है न दोनों को तोह जश्न मनाये बिना तोह रहेंगे नहीं. राजेश और बिट्टू ने मन करने के बाद भी जाम चलवा दिए तोह छोटे भाइयों का तोह लाज़मी हक़ है. लेकिन एक बार फसल पर नजर मार आना किसी के साथ. चारा देखने की तोह जरुरत नहीं लेकिन बाग़ वाला हिस्सा और जीरी पर मजदूर लगे है.", सुनंदा जी तोह वैसे भी शराब के लिए किसी को नहीं रोकती थी. सब मर्जी के मालिक जो थे. फिर कंचन, समय और स्वाति भी उनकी तरफ चली आई जो अपनी 4-5 सहेलियों के साथ हे थी.

"अर्जुन, तुम चल सकते हो?", संगीता मामी के इतना कहते हे अर्जुन ने हाँ कर दी.

"ोये तुम भाग नहीं सकते. प्रॉमिस किआ था न कल.", स्वाति तुनक कर बोली तोह मंजू हंसती हुई वह से चली गई अर्जुन को ऐसी हालत में छोड़ कर.

"बाबा, मैं यही हु. अपनी फ्रेंड्स के साथ ब्रेकफास्ट करो और थोड़ा घूमो फिरो मैं बस खेत का चक्कर लगा कर वापिस आया.", अर्जुन ने लाचारी दिखते हुए कहा.

"मुझसे बुरा कोई नई होगा अगर इस बार ज्यादा दिमाग चलाया तोह.", ये कंचन थी जो ऊँगली दिखा कर अर्जुन को सावधान कर रही थी.

"हाँ मेरी माँ. जब तुम लोग कहोगे मैं तभी वापिस जाऊंगा. यहाँ से सब काम ख़तम होने के बाद तुम दोनों के साथ शॉपिंग और फिर ice-cream."

"ठीक है. वैसे भी हम अभी बिजी है. ले जाओ चाची इसको, आलसी कही का.", स्वाति ने तुनक कर कहा और अर्जुन हँसता हुआ संगीता मामी के साथ पंडाल से बहार चल दिए. मोटरसाइकिल के नीम के पेड़ के नीचे कड़ी थी.

"आज आप कुछ ज्यादा हे सुन्दर लग रही हो.", मैदान से सड़क पर मोटरसाइकिल ले जाते हुए अर्जुन ने गोल शीशा ठीक करते हुए संगीता मामी का दिलकश मासूम सा चेहरा देखते हुए कहा. मेहरून रंग का ये ख़ास salwar-kameej और जाली वाली चुन्नी उन पर खूब फैब रही थी. युवती जैसी तोह वह वाइज हे थी और ऐसे चुस्त आकर्षक कपड़ो में सौन्दर्य निखार का आ रहा था.

"बस भी करो. इतनी सुन्दर भी नहीं लग रही हु. वह सब तुम्हे हे देख रही थी. चाहे वह पूजा दीदी की भाभी हो या फिर समय की सहेलियां. ाचे लग रहे हो.", मामी की बात पर अर्जुन सामने देखने लगा.

"अनीता मामी नहीं दिखी कही भी?"

"हवन में तुमने ध्यान नहीं दिए. तुम्हारे पीछे वही बैठी थी सुमित्रा माँ के साथ. थोड़ी देर पहले हे वह घर चली गई थी काम से.", बातें करते हुए दोनों अब खेत की सीढ़ी सड़क पर आये तोह अर्जुन मोटरसाइकिल धीमी करने लगा.

"यहाँ नहीं. आगे लो थोड़ा, उधर ये कच्ची सड़क आएगी. हाँ ये वाली. इस पर सीधा.", बाग़ और बड़े खेत तोह पीछे रह गए थे. अब अर्जुन 10 की रफ़्तार पर इस समतल कच्ची सड़क पर मोटरसाइकिल चला रहा था. 7-8 फ़ीट चौड़ी ये सड़क दोनों तरफ से 5 फ़ीट ऊँचे हरे चारे से घिरी थी. बीच बीच में छायादार पेड़ भी थे.

"इधर आने का रास्ता दूसरी तरफ से भी है न?"

"हाँ है तोह लेकिन वह पैदल के लिए है. और फ़िलहाल वह पानी होगा, जीरी की वजह से.", मामी ने समझाया. अर्जुन पहले भी उस पगडण्डी वाले रस्ते पर आया था. कुछ आगे चलते हे मामी ने पीठ पर थपकी देते हुए रुकने को कहा. एक साफ़ हिस्से में पानी की मोटर और खुली टंकी बानी थी. ईंटो का कमरा जहा तीन की चादर थी और 5-6 छायादार पेड़ जो कमरे के ऊपर भी छाए थे. कुलमिला कर ये एक बढ़िया जगह थी. छोटे नाना के 2 कमरे तोह अर्जुन देख चूका था लेकिन यहाँ वह भी पहली बार आया था.

"छोटे नाना तोह दूसरी तरफ रहते है. ये कमरा और मोटर.?"

"ये अपने हे खेत है और कमरा अभी तैयार किआ है कुछ दिन पहले. इधर कूलर भी है है और बीएड भी. तुम्हारे मां ने दारु पीने का सही ठिकाना बनाया है आने वाली बरसात के बहाने.", मोटरसाइकिल एक ओट में कड़ी करवाने के बाद मामी उसको लेके आगे चलने लगी तोह अर्जुन ने देखा यहाँ भी एक क्यारी तैयार की गई थी. शायद मूली, टमाटर जैसी सब्जियां. मामी ने दरवाजा हलके से थपकाया तोह वह अपने आप हे खुल गया. अनीता मामी बिस्टेर पर जैसे गहरी नींद में थी. कूलर की वजह से ाची ठंडक थी लेकिन आवाज भी ाची खासी कर रहा था. साधारण सा डबल बीएड जो 2 तख़्त जोड़ कर बनाया गया था, एक तरफ 2 निवार वाली कुर्सियां और लकड़ी का काम चलौ छोटा टेबल रखा था. दिवार पर बहार की तरफ से कोई प्लास्टर न था लेकिन अंदर समतल सीमेंट के प्लास्टर पर सफ़ेद रंग किआ हुआ था. लोहे की 4 रोड वाली 2 खिड़की खुली थी जो हवा की निकासी के लिए जरुरी भी थी.

"छोटी मामी यहाँ पहले से हे है." अर्जुन ने दरवाजा बंद करती संगीता मामी से पुछा.

"हाँ तोह आपकी इत्छा मतलब हमारी भी इत्छा हुई. अनीता घंटा भर पहले यहाँ आई थी घर से.", दरवाजा बंद होते हे कमरे में माहौल शांत हो गया था. दोनों कुछ पल चुप्प रहे और अनीता वैसे हे सो रही थी. सिर्फ कूलर की आवाज थी जो सुनाई पड़ रही थी. इस ख़ामोशी को संगीता मामी ने हे तोडा.

"आप सहज नहीं है क्या? मैं बहार इन्तजार करती हु फिर.", वह इतना बोल कर पलटी और अर्जुन ने दोनों हाथ उनकी कमर पर लपेट लिए.

"बात ऐसी है के यहाँ घर से दूर हमने कुछ किआ तोह कुछ गड़बड़ न हो जाये. आपको दिक्कत नहीं होनी चाहिए.", अर्जुन वैसे हे उनकी पतली कमर पर हाथ लपेटे उनके पीछे खड़ा था.

"अगर ऐसा होता तोह मैं यहाँ नहीं आती. उस तरफ शायद फिर भी कोई देख सकता था लेकिन यहाँ मजदूर भी बिना पूछे नहीं आते.", मामी की आँखें बंद हो गई थी अपने गले पर अर्जुन के तपते होंठ लगते हे. हलकी फुलकी सी संगीता एक बछड़ी (काफ) की तरह इस लम्बे चौड़े शेर के शिकंजे में भी आनंद ले रही थी. अर्जुन के बड़े पंजे रेंगते हुए उन अनारो तक आ पहुंचे जहा सिर्फ उसका हे हाथ लगा था. अनीता और संगीता मामी हे ऐसी milan-saathi थी अर्जुन की जो उसके मुक़ाबले इतनी दुबली लगती थी. साधारण इंसान के लिए वह एक जायज संगिनी थी.

"फिर हमको देर नहीं करनी चाहिए. नानी या मां वह से फारिग होने के बाद जरूर मेरे बारे में पूछ सकते है.", ख़ास अवसर पर पहने इस सलवार कमीज को खराब करना भी सही नहीं था. कमर से कमीज के किनारे पकड़ते हुए अर्जुन ने जरा भी देरी न की. संगीता मामी का सुत्वा बेदाग शरीर ऊपर से बस उस काली ब्रा में क़ैद था. सपाट नरम पेट सहलाते हुए अर्जुन उनकी चिकनी पीठ को चूमता नीचे झुका और दांतो से हे ब्रा के हक्क खोलते हुए वह नाजुक अनार बेपर्दा कर दिए.

"आह्हः.. ये कैसे किआ.?", ब्रा ढीली हो कर सामने लटकी थी लेकिन हाथ बड़े आराम से उन दोनों 32-बी अकार के स्टैनो को हथेली में दबोचे गूंथ रहे थे. दोनों वैसे हे खड़े थे और अर्जुन के झुकने की वजह से पजामी का कपडा कूल्हों में घुसने लगा था उस मॉटे लुंड के दबाव से.

"सिर्फ ब्रा हे खोली है अभी. कपडे साफ़ रखने होंगे न.", अर्जुन ने भी सफ़ेद कुरता उतारने के बाद मामी को अपनी तरफ घुमा लिए. शर्म से वह आँखे झुकाये बस उसके इशारे पर हे चल रही थी. लम्बी पलके देख कर अर्जुन कुछ पल उन्हें हे देखता रहा. हाथो ने सलवार का नाडा ढीला किआ और संगीता मामी उसके सीने से लिपट गई. काली कच्ची में क़ैद उनके गोल सुडोल नितम्ब ाचे उभरे हुए थे अनीता के मुक़ाबले. सुघड़ कूल्हों को दोनों हाथो से मसलता अर्जुन उनके शरीर का हर बिंदु जागृत कर रहा था.

"बीएड पर चलिए. ऐसे खड़े खड़े करना ठीक रहेगा?", संगीता मामी का मैं भी पूरी तरह से अर्जुन को प्यार करना चाहता था. उनकी बात मानते हुए उसने खुद हे मामी को इस तरफ लिटा दिए. अनीता मामी की बगल में थोड़ी दुरी पर. नंग्नता का एहसास इतना था की टाँगे जोड़े वह आँखे भी मूँद कर लेती थी. उनके जिस्म से आती इत्र की महक और चमकता बदन देख कर अर्जुन ने भी फुर्ती से वह काली पंतय निकलते हुए पूर्ण निर्वस्त्र कर दिए.

"आपने यहाँ कुछ ख़ास काम किआ है?", छूट तोह सुडोल जांघो में चुप्प गई थी लेकिन उभर और पूरा जिस्म उसके सामने हे था. पेडू बालविहीन था जैसे आज हे इस हिस्से को चमकाया गया हो. अनीता मामी के कल हलके रोये थे जैसे उन्होंने कुछ दिन पहले वह सफाई की थी लेकिन यहाँ तोह त्वचा बाकी के हिस्से सी चिकनी और साफ़ थी

"सुबह होते हे क्रीम से हटा लिए थे.", उनका जवाब अर्जुन के चेहरे पर मुस्कान ले आया. पाजामे को उतार कर कुर्सी पर रखने के बाद अंडरवियर भी वही दाल दिए. पहला हु लिंग अब पूरे उठान पर था. जड़ पे बानी एक नीली रबर सी लकीर ऋतू दीदी के प्यार का जोर दिखा रही थी लेकिन अर्जुन को परवाह नहीं थी. दोनों नाजुक पाँव पकड़ कर मोड़ते हुए अर्जुन ने उस साफ़ छूट पर मुँह लगाया और संगीता मामी ने सोई हुई अनीता की ब्याह जोर से पकड़ ली. अर्जुन ाचे से उस लकीर को चूम रहा था और जीभ की नोक दरार से निकलता खट्टा रस चख रही थी.

"आठ.. गन्दा है वह.. आठ.. क्या कर रहे हो उम्म्म..", दूसरा हाथ अर्जुन का सर नीचे दबाने लगा जिसका मतलब था के मामी के शब्द और शरीर विपरीत बात कह रहे थे. उन्हें भी ये छूट चुसाई जादू सी लग रही थी. ाचे से गीला करने के बाद अर्जुन उनके ऊपर चा गया. कच्ची कैरी (आम) से उनके चुके मसलता वह उनके होंठो की लाली उतरने लगा. सूपड़ा अपनी नयी सहेली के साथ chooma-chaati करता आग भड़का रहा था.

"प्यार में गन्दा क्या होता है? और जब आपने इतने प्यार से सफाई की है तोह मेरा भी फर्ज है के वह भी प्यार जातौ. वैसे आप भी छोटी मामी जैसी हे हो, ये हलके से बड़े है और यहाँ थोड़ा सा अतिरिक्त उभर है.", अर्जुन एक चुके के साथ हे दूसरे हाथ से ठोस कूल्हे को भी पकड़ कर दबा रहा था.

"आह्हः.. कर दो बड़े जितना चाहो.. उम्म्म.. तुम्हारे मां ने तोह म्हणत की नहीं अब जमीन तुम्हारी है तोह हल तुम्ही चलाओ. आह्हः.. आराम से बाबा.. ये दुखते है.. आदत नहीं है इन्हे.", निप्पल ऊँगली की भरपूर रगड़ से अकड़ चुके थे जिन्हे अर्जुन चूम भी रहा था. दोनों हे एक दूसरे में लगे थे और इधर अनीता मामी सिर्फ ब्रा में लेती उनकी तरफ करवट लिए दोनों का मिलान देख रही थी.

"क्रीम या ऐसे हे?", अर्जुन ने उनके ऊपर लेते हुए हे हाथ से लुंड को छूट की पतली नाजुक फांको पर रगड़ते हुए पुछा.

"लगा लो, दीदी झेल नहीं पाएंगी. मोटा ज्यादा हो गया है पहले से.", अनीता की आवाज सुन्न कर दोनों ने उधर देखा तोह संगीता मामी शर्म से मुँह फेर कर लम्बी सांसें लेने लगी और अर्जुन ने उनके हाथ से क्रीम लेने की जगह होंठो पर चुम्बन कर दिए.

"आप हे तैयार करो. देखता हु कितना प्यार है आप दोनों में.", अनीता मामी ने जरा संकोच न किआ इस बार. कड़ी होती हुई वह उन दोनों की कमर के पास आ गई. 'पोंड्स' की वह सफ़ेद डिब्बी खोल कर ढेर साडी क्रीम वह अर्जुन के लम्बे मॉटे लुंड पर अपने नाजुक हाथो से मसलने लगी और अर्जुन भी ऊँगली क्रीम से भरते हुए उस तंग दरार में लगाने लगा. अनीता मामी और अर्जुन इस बीच एक दूसरे के होंठो को बड़े इत्मीनान से चूस रहे थे और संगीता मामी ऊँगली चुदाई से आहे भर रही थी. जल्द हे 2 उंगलिअ उस कासी हुई छूट को ढीला करने लगी और इधर अर्जुन दूसरे हाथ से अनीता मामी की फूली हुई छूट को भी रगड़ने लगा. ये तीनो का हे bahu-prem का पहला अवसर था लेकिन कोई भी संकोच नहीं दिखा रहा था.

"दीदी को करो.", एक बार कस के लुंड को दबाने के बाद अनीता ने हाथ हटा लिए. अर्जुन छूट के मुहाने सूपड़ा लगा रहा था और अनीता मामी संगीता के ऊपर झुक गई. ये कैसा दृश्य था? अनीता मामी बेहिचक संगीता के होंठो को चूसती एक सतांन को मसल रही थी. इतनी कामुकता देख कर अर्जुन ने भी कमर को ाचा झटका दिए और कासी हुई छूट को चौडाता आधा लुंड चिकनाहट से अंदर जा फंसा. संगीता मामी का शरीर बुरी तरह कांप रहा था लेकिन अनीता ने कोई ढील न दी. छोटी मामी के ऐसे ऊपर झुके होने का फायदा लेते हुए अर्जुन उनकी पीठ चूमता आधे लुंड से हे संगीता मामी की छूट ढीली करने लगा. 2 जोड़ी आँखें ये नजारा जाने कब से देख रही थी.

'ये देख जरा, हमसे छोटी है दोनों और इतना बड़ा कितनी दिलेरी से ले रही है. खोल कर रख दी है पूरी और अनीता ने आखिर कर हे दिखाया.', खिडके के चाय वाले हिस्से से पूजा और ममता ये दृश्य देख रही थी. अंदर संगीता के ऊपर अब अनीता लेती थी और जमीन पर खड़ा अर्जुन घुटने मोड संगीता की चुदाई करते हुए अनीता के गुलाबी छूट भी सेहला रहा था. 5-6 मिनट में हे छूट गीली होने पर कॉमर्स से भीगा लुंड अब कूल्हे ऊपर उठाये अनीता की छूट पर जा भिड़ा. बड़ी नजाकत से अर्जुन ने थोड़ा थोड़ा करते हुए आधा लुंड अंदर भर दिए था. दोनों बहने अब खुलकर एक दूसरी को चूम रही थी और साथ हे उनके हाथ चुचो को मसल रहे थे.

"आपकी फिल्मे किसी का भी दिमाग खराब कर सकती है. लेकिन सचमुच जरा देखो तोह कैसे चौड़ी हो गई है दोनों की. खून हे निकलना बाकी है बस. और ये अर्जुन की पीठ पर नाखून के निशाँ शायद बहोत कुछ कह रहे है. ाची ज़िन्दगी जी रहा है लड़का.", ममता मामी का दिल तोह कर रहा था के वह खुद जा कर उन दोनों की जगह लेट जाए पर पत्नीव्रता का रूप वह ऐसे नंगा नहीं करना चाहती थी.

"इसलिए हे फिल्म दिखाई थी दोनों को. वह घोडा अकेले क्या हाल कर सकता है ये पता है न. थोड़ा खुल कर रहेंगी तोह अर्जुन की कमी भी नहीं खलेगी और दोनों मिलकर बरी बरी से उसको झेल सकती है. लेकिन मेरा बड़ा दिल कर रहा है यार. आज अनीता यहाँ नहीं होती तोह मैं सीधा जा कर लेट जाती संगीता के साथ. अर्जुन भी खुश हो जाता अपनी पसंद का पिछवाड़ा देखते हे.", पूजा मामी ने साड़ी के ऊपर से हे छूट को रगड़ना शुरू कर दिए था. अंदर अर्जुन अब अनीता मामी को घोड़ी बनाये कास के धक्के लगा रहा था. उनके अनार थामे जैसे कमर चला रहा था अनीता की चीखे बहार तक आ रही थी, कूलर के बावजूद.

"आअह्ह्ह्ह.. आराम se..aahhh मैं गई didiiiii..aahhh..", अनीता झुक कर औंधे मुँह बिस्टेर पर गिरी और अर्जुन उनसे अलग हो कर बिस्टेर पर लेट गया.

"मामी आप ऊपर आ जाओ.", संगीता मामी को बेशरम तोह इस बंद कमरे में बना हे दिए था. अब वह बिना न नुकुर किये अनीता को आराम करने देती हुई अर्जुन के ऊपर आ गई. होंठो को चूमते हुए अर्जुन ने वह नरम कूल्हे ऊपर उठाये और संकरी छूट में लुंड धीरे धीरे अंदर सरकने लगा.

"आह्हः.. माहहह.. आराम से अर्जुन.. तुम्हारा पूरा नहीं जाता मेरे andar..aahh.", बहार कड़ी दोनों अब ाचे से देख पा रही क्योंकि ये हिस्सा बिलकुल उनके सामने था. गुलाबी फांके फ़ैल कर बुरी तरह लुंड से लिपटी थी और एक इंच का आखिरी हिस्सा अभी भी बहार हे था. अर्जुन अपने हाथो से हे उन्हें ऊपर निचे हिलने लगा और कुछ हे देर बाद खुद संगीता मामी अर्जुन को चूमती हुई 8 इंच लुंड मस्ती में झेलने लगी. हर बार नीचे होने पर कॉमर्स के कतरे छूट से बहार निकल कर अंडकोष की तरफ आ जाते. लुंड की खाल पर अब हलकी सफेदी आने लगी थी, शायद संगीता मामी का ये स्खलन कुछ ज्यादा हे बड़ा था. निढाल हो कर वह 6-7 मिनट में हे उसके सीने पर गिर गयी. लुंड बहार निकलने के बाद छूट का अठन्नी जितना खुला मुँह बहोत था Pooja-Mamta को बताने के लिए की वह हथियार उम्मीद से कही ज्यादा घातक है.

"अब आपके अंदर हे फारिग होऊंगा.", बिस्टेर पर आराम से लेती अनीता मामी को अपने नीचे दबाते हुए अर्जुन चुचो को मसलता हुआ अब लम्बे धक्के लगाने लगा. 35-40 मिनट में उसने दोनों का हे बुरा हाल कर दिए था. कूलर के बावजूद पसीने की बुँदे तीनो पर दिखाई दे रही थी. कल तक किसी कुंवारी से बंद दोनों छूट आज बुरी तरह फ़ैल कर मिलान का वर्णन चीख चीख कर कर रही थी.

"आह्हः.. मर्डर गई.. मायआ.. ारामममम से आह्हः.. "

"आह्हः.. मामी.... आअह्ह्ह उम्मम्मम.", मामी के होंठो चूमता वह उनकी दोनों टंगे ऊपर उठाये छूट की गहराई में खाली होने लगा. जाने कितना वीर्य बनता था उसका शरीर. ऋतू दीदी ने भी उसको ाचे से निचोड़ा था और फिर मंजू ने भी. लेकिन अनीता मामी की छूट को भी अर्जुन ने निराश न किआ और 30 सेकंड तक शरीर वह हलके झटके लेता रहा. अनीता मामी की गांड के नीचे तकिया लगा कर वह दोनों के बीच हे लेट गया. इतनी म्हणत के बाद तीनो हे थकान से चूर थे. अनीता मामी की छूट जितना ले सकती थी उतना वीर्य रखने के बाद बाकी बहार निकलने लगी. 2-3 मिनट बाद अनीता ने बिस्टेर का सहारा लेते हुए खड़े हो कर छूट को साफ़ किआ तोह ाचा खासा वीर्य जमीन पर उलट गया. और फिर वह वापिस अर्जुन से लिपट कर लेट गई.

"देखा क्या हालत बनाई उसने दोनों की? सच में ममता ऐसे घोड़े को न ये दोनों नहीं झेल सकती लेकिन तू और मैं मिलके इसको बराबर टक्कर दे सकती है. और उसको भी ज्यादा मजा आएगी गदराये शरीर मसल कर, तेरी तोह वैसे भी पीछे से कुंवारी है.", पूजा हँसते हुए पगडण्डी से होती हुई दूसरी तरफ चलने लगी ममता के साथ.

"उसने आपके पीछे भी किआ है?"

"हाँ तभी तोह तीन दिन बैठ नहीं पाई थी. तेरी तोह मेरे से ाची है."

"दिमाग खराब नहीं है मेरा. मैं उसका सामने भी नहीं लेने वाली. इसका लेने के बाद राजेश का पता भी नहीं चलने वाला. आप ढीला करवाओ खुदको मैंने तोह बस देखना था और इतने से मैं खुश हु. उन दोनों की भी मज़बूरी है इसलिए करना पड़ रहा है उन्हें. माँ बन्न ने का सुख क्या नहीं करवा देता.", कार तक आते आते दोनों की पंतय पूरी गीली हो चुकी थी लेकिन पूजा जहा बिंदास थी वही ममता शैलंटा का नक़ाब हटा हे नहीं रही थी.

"कसम खा के बोल के तेरा दिल नहीं मचला सब देख कर? तू उसके साथ कुछ नहीं करना चाहती?", पूजा ने कार में बैठते हुए पुछा तोह ममता भी बराबर बैठ गई थी. कुछ पल वह बस चुपचाप सामने देखती रही.

"पता है अर्जुन बहोत मासूम है और वह ये सब उनकी ख़ुशी के लिए कर रहा है. मेरा उसके साथ सम्बन्ध बनाना ठीक नहीं होगा बेशक वह एक समझदार और िज्जात्त करने वाला लड़का है लेकिन वासना में मैं उसके साथ ऐसा कुछ नहीं करना चाहती."

"अगर वह खुद तेरे साथ करे तोह?"

"आप सुन्न नहीं सकेंगी जो मैं कहूँगी?", ममता मामी का स्वर अजीब हो चला था.

"बोल."

"स्वाति ने उसके साथ यही सब करना चाहा था लेकिन अर्जुन ने उसको बर्बाद नहीं किआ. यही सब कंचन ने भी दोहराया जो मैंने उन दोनों की बातों में सुना लेकिन नतीजा स्वाति वाला हे रहा. खुद हे सोचो की 2 जवान कमसिन लड़किया खुद सामने से चल कर उसके पास गई लेकिन अर्जुन ने उन्हें रुस्वा किये बिना एक समझदार इंसान की तरह खुश करते हुए बस उनका ध्यान रखा. ऐसे प्यारे लड़के के साथ मैं कैसे ये कर सकती हु? और कही ऐसा हो भी जाता है और मेरी बेटी को ये पता चला तोह जानती हो उसके दिल में अर्जुन की क्या छवि बनेगी? मेरी क्या िज्जात्त रह जाएगी? दिल मेरा तभी कर गया था जब मैंने उसको अंदर से नहीं जाना था. वह है हे इतना प्यारा के बस हाँ कहने भर से मैं कपडे उतार दू लेकिन स्वाति के साथ जो समझदारी उसने दिखाई उसके बाद मैं बस यही चाहती हु के वह मेरी बेटी को ऐसे हे बचाये रखे. बहार वाले अजनबी लड़को से ाचा है के वह उसकी ज़िन्दगी में रहते हुए ऐसे हे ऊपर से उसको खुश करता रहे.", पूजा मामी के चेहरे पर कई रंग आ जा रहे थे ये सुन्न कर.

"वह अगर उनका ऐसे ध्यान रखता है तोह खुदको भी तोह कष्ट दे हे रहा होगा. क्या उसकी जरुरत नहीं होगी कुछ? और चलो उसने खुदको रोक लिए स्वाति या कंचन के साथ आगे बढ़ने से, क्या वह दोनों इतने पर हे रुक जाएँगी? भूल मत ममता के लड़की हर बार अगला कदम लेती हे है एक बार बंधन से बहार निकलने के बाद. वह भी मौके बना हे रही होंगी और अर्जुन के शहर में सही मौका मिलते हे वह हमारी नजरो से दूर ऐसा जरूर करेंगी. अर्जुन भी पीछे नहीं हटेगा अगर वह उनकी परवाह करता है.", पूजा ने इतना कहने के बाद कोई और बात नहीं की और गाडी चलती दूसरे रस्ते से घर की तरफ जाती सड़क पर हो ली. ममता जितनी सफाई दे चुकी थी वह सब पूजा ने पल में हे निरस्त कर दी थी. मुख्या मार्ग पर आते हे ममता ने हे जुबान खोली.

"सही कहती हो आप. अर्जुन पीछे नहीं हटेगा अगर इन्होने ऐसा कुछ किआ. बचो पर सख्ताई करने से मामला हाथ से बहार निकल सकता है. फ़िलहाल वह यहाँ से चला जायेगा तोह उसके बाद सोचते है.", ममता इतना बोल कर बहार देखने लगी.

"उर्वशी ने बोलै के वह अर्जुन के साथ रात बिताना चाहती है.", पूजा मामी ने मुस्कुराते हुए गाडी चलते हुए हे कहा.

"वह पागल है क्या?"

"सुरेश उसकी जवानी संभल नहीं पता और मेरी चुदाई मैंने उर्वशी को बता दी थी, ड्रिंक के समय. वह तोह पहले हे कोई ऐसा मर्द ढून्ढ रही है जो विश्वास के काबिल हो. लेकिन उसको सिर्फ एक हवस मिटने वाला चाहिए इसलिए मैंने ना कह दिए. बेशक मैं अर्जुन के लिए लाख bura-bhala कहु लेकिन मुझे प्यार भी है उस लड़के से. तुझे पता है मैं उसकी गुलाम हु, असली वाली गुलाम.", पूजा ने बंद कमरे के सच्चाई सामने रख दी.

"गुलाम? कैसे?"

"वह भाई के कहने पर मैं उसके साथ कुछ गलत करने जा रही थी जिस से यहाँ हमारे घर में उसका नाम खराब हो जाये और पंडित जी के परिवार पर इसका असर पड़े. लेकिन जानती है अर्जुन ने पता होते हुए भी मेरी चाल को झेला. सेक्स ड्रग को बर्दाश्त किआ और मेरे सामने हे मेरा कच्चा चिटठा खोल कर रख दिए, बंद कमरे में पूरी िज्जात्त के साथ. उस दिन अर्जुन ने जो मेरी आत्मा को प्यार दिए मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती. कहा तोह मैं बेवजह उस मासूम को बर्बाद करने चली थी और कहा उसने हे मुझे इस परिवार में नंगा होने से बचने के साथ मुझे प्यार किआ. बस उस दिन मैंने खुदको हमेशा के लिए उसके हवाले कर दिए. रात मैंने झूट कहा था के तेरे जेठ जी को 15 दिन बाद मैंने हाथ लगाने दिए. मैं अब उनके साथ नहीं सोती और वैसे भी वह अब हमेशा थके रहते है तोह मुझे कोई परेशानी नहीं.", ममता ने कभी पूजा को गलती मानते नहीं देखा था. और आज तोह वह सब घमंड छोड़ कर एक दीवानी सी बात कर रही थी.

"तोह तू अर्जुन के साथ फिर से करेगी?"

"हाँ लेकिन जब वह कहेगा तब. उनके यहाँ शादी है जल्द हे तोह अर्जुन पक्का ध्यान रखेगा मेरी जरुरत का. तेरा भी अगर तू चाहे तोह.", गाडी आँगन में सही से कड़ी करती वह दोनों हे अंदर चली गई..

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एक घंटा सोने के बाद अर्जुन की आँख खुली तोह वह कुछ बेहतर महसूस कर रहा था. पजामा पहन कर वो बहार हौदी पर आया. हाथो मुँह धोने के बाद अब कुछ ताजगी आई थी शरीर में. संगीता मामी को उठाते हुए अब वह तैयार भी हो गया था.

"मामी उठिये और कपडे पहन लीजिये. डेढ़ बज गया है और घर पर कोई भी पूछ सकता है. अनीता मामी को भी उठा लीजिये, साथ जाने से कोई कुछ नहीं पूछेगा.", संगीता की छूट में दर्द था लेकिन वह उठ गई और अनीता को भी जगा दिए. कुछ देर तक दोनों हे बाल संवारती अर्जुन को देख रही थी. शरीर अभी भी बेपर्दा हे थे.

"हमको बेशरम कर हे दिए तुमने.", अनीता मामी ने चेहरा भी दुरुस्त करने के बाद पंतय और ब्रा पहन ली.

"ाचा है न मामी. ये बेशर्मी हम तीनो में है तोह बेहतर है. आप दोनों को नहीं लगता के अब आप ज्यादा ाचे से एक दूसरे का ध्यान रख सकेंगी? वैसे सचमुच आप दोनों एक जैसी है और सुन्दर भी."

"सुन्दर? जरा देखो इनकी हालत क्या की है तुमने. हाथ लगाने भर से चीख निकल रही है.", संगीता मामी के चूचक जमुनी हो चले थे. क्रीम लगाने के बाद काली bra-panty पहन कर वह भी कपडे सीधे करने लगी.

"जब बचा दूध पीयेगा तब देखना. वैसे मैं भी तोह बचा हे हु आपके लिए.", अर्जुन मस्ती से बोलै तोह मामी शर्मा गई.

"बचे का इतना बड़ा है के पूरा नहीं लिए जाता. जाने और कोई कैसे लेगी.", अनीता मामी भी तैयार हो चुकी थी और चूड़ियां दाल रही थी अपनी कलाई में.

"जब ये मॉटे हो जायेंगे तोह देखना आगे और पीछे दोनों तरफ से पूरा लेने लगोगी आप.", सलवार के ऊपर से हे अर्जुन ने वह कसाव लिए कुल्हा मसल दिए.

"आउच.. दीदी देख रही हो आप? ज़माने भर की गन्दी बातें सीखने वाले है ये साहब. इतने नेक विचार."

"कोई बात नहीं, अर्जुन का हक़ है. और मैं वादा करती हु की माँ बनते हे खुद वह करुँगी जो ये चाहता है. अब चल तू हमारे हे साथ, तीनो साथ होंगे तोह ठीक रहेगा.", संगीता मामी ने बड़े प्यार से अर्जुन के होंठो को चूमा और बहार निकल गई.

"देखा?"

"लो देखो.", अनीता मामी तोह गॉड में बैठ कर मस्ती में होंठ हे चूसने लगी थी. खुद हे हाथ अपने चुचो पर रखवाती वह फिर से गरम होने लगी.

"चलो मामी, नहीं तोह काम खराब हो जायेगा. मेरा ये अब खड़ा नहीं होने वाला.", अर्जुन ने तुरंत उन्हें अलग किआ तोह वह हंसती हुई उसके साथ हे चल दी. दरवाजा बंद करने के बाद दोनों मामी अर्जुन के पीछे बैठ कर घर के लिए चल दी. उनका मिलान सोच से कही ज्यादा मस्ती भरा और प्यारा था. .

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"तू सच में पागल है ऋतू. ऐसे कौन प्यार करता है यार? हालत देखि थी तेरी और नाखून में खून.", दोपहर में यहाँ सभी खाने से फारिग हो कर अपने काम कर रहे थे और ऊपर अलका ऋतू बंद कमरे में बिस्टेर पर बैठी थी. ऋतू आज सो कर 9 बजे उठी थी लेकिन अलका ने उसकी हालत देख कर उसके पास किसी को आने नहीं दिए था.

"याद हे नहीं यार क्या हुआ था रात में. जब कुछ समझ आया तोह सुबह होने वाली थी और मैं नीचे आ कर सो गई. अर्जुन का हाल भी मेरे हे जैसा था. वैसे सच कहु तोह जो भी हुआ वह जरुरत से ज्यादा हे वाइल्ड था. नेल्स में उसका खून और स्किन तक फांसी हुई मिली. मेरी वागिना भी दर्द कर रही है, आइस रख कर बैठना पड़ रहा है.", ऋतू ने पजामा हल्का से उठा कर अंदर रखा प्लास्टिक दिखाया जिसमे बर्फ थी.

"बाप रे. तुम दोनों पागल हो क्या? लेकिन उसने तोह तेरे साथ पहले भी किआ है फिर इतना बुरा हाल?"

"पता नहीं रात को उसने क्या किआ. और सचमुच वह अपनी लिमिट से भी बड़ा था उस टाइम. बूब्स तोह इतने सेंसिटिव हो गए है के ये टीशर्ट भी जान ले रही है. या तोह वह फिर से मेरी हालत बुरी कर दे नहीं तोह हफ्ते तक तोह मैं उसके पास भी नहीं जाने वाली. और उसकी क्या हालत होगी? सोया भी नहीं तह और इतनी जल्दी चला भी गया.", ऋतू परेशां होने लगी थी सोच सोच कर.

"वह अलग है और उसको कुछ नहीं हुआ. परेशां मत हो मेरी जान और ये बता तूने प्रकाशन ली न?"

"हाँ ले ली और अब फिर से नाहा लेती हु. तू बस अर्जुन के आने के बाद एक बार चेक कर लेना.", ऋतू जैसे तैसे उठ कर बाथरूम में चली गई, शायद ठंडा पानी कुछ आराम पंहुचा दे.

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दोपहर में खाने से फारिग हो कर अर्जुन अब ऊपर वाले कमरे में आराम कर रहा था. तीनो नाना भी खाने के बाद बहार चले गए थे सम्बन्धिओ के साथ और दोनों छोटी मामी भी आराम कर रही थी. पूजा और ममता मामी से भी कुछ खास बात नहीं हुई थी इस बीच लेकिन सरोज मौसी ने जरूर अर्जुन को घर आने का निमंत्रण दिए था. थकान की वजह बता कर अब वह यहाँ बिस्टेर पर आँखें बंद किये लेता था.

"सो रहे हो तोह बाद में औ?", ये समय थी जो अंदर आने के बाद अर्जुन को ऐसे देख वापिस जाने लगी थी.

"नहीं बस वैसे हे लेता था दीदी. आ जाइये, बात तोह कर हे सकते है.", अर्जुन ने उन्हें निराश नहीं किआ. इस वक़्त वह सुबह वाली tadak-bhadak से अलग एक चुस्त जीन्स और कार्टून प्रिंट वाली टीशर्ट में थी.

"मैं बस कुछ कहने आई थी.", समय ने खड़े हुए हे कहा.

"आपको पूछने की क्या जरुरत पड़ी? जो कहना चाहती है वह आराम से कहिये."

"अभी 3 बजे है और तुम थोड़ी देर आराम कर लो फिर डेढ़ घंटे बाद मेरे साथ दरगाह चलना. अकेले मुझे भी जाने को नहीं मिलेगा लेकिन तुम साथ चलोगे तोह कोई मन भी नहीं करेगा.", समय दीदी ने बात कहते हुए नजरे झुका ली थी. जैसे उन्होंने कुछ बड़ी हे मांग कर दी हो.

"आपको तोह पता हे है मैं धार्मिक जगह नहीं जाता लेकिन अगर आपकी आस्था की हे बात है तोह मैं साथ चलूँगा. उस से पहले मैं Swati-Kanchan के साथ मार्किट घूम आता हु.", अर्जुन ने खड़े हो कर तैयार होने हे ठीक समझा. समय भी ख़ुशी ख़ुशी बहार चली गई. थोड़ी देर बाद हे अर्जुन अपनी दोनों लाड़ली बहनो के साथ बहार चला गया. समय काम था और चाहत पूरी न होने के बावजूद स्वाति कंचन खुश थी की अर्जुन ने उन्हें वक़्त दिए और ढेर साडी खरीदी करवाई. कभी कभी उम्मीद से अलग होने वाले काम भी सुकून दे हे देते है.

"थैंक यू सो मच भाई. लव यू.", घर आते हे दोनों ने उसके गाल चूमे, Mamta-Pooja मामी के सामने और हंसती हुई अपने बैग लेकर कमरे में चली गई.

"क्या बात है, आज तोह तुमने सबको खुशिया देने का जिम्मा लिए हुआ है.", पूजा मामी ने संतरे के जूस का गिलास देते हुए अर्जुन से कहा और वह भी दोनों मामी के पास बैठ गया.

"दुनिया खुशियों से हे तोह चलती है मामी जी. मेरी बहने खुश तोह मैं भी. हाँ इस बार आपके साथ वक़्त न बिता सका लेकिन जल्द हे ये कमी भी दूर कर दूंगा."

"पूजा दीदी हे नजर आती है तुम्हे बस.?"

"मेरी प्यारी मामी आपको कैसे भूल सकता हु. आपने जल्द हे वह आना है क्योंकि माँ के साथ भी तोह कोई होना चाहिए न. फिर आपको भी साथ लेके चलूँगा शोपपकिंग करवाने.", अर्जुन ने स्नेह से ममता मामी का हाथ थाम कर कहा तोह उन्होंने भी उसके सर पर दुलार दिए.

"चलो फिर तुम भाग जाओगे.", समय क्या खूब लग रही थी इस हलके पीले सलवार कमीज में. सर पर दुपट्टा जो सीने को भी सही से छुपाये था और पूरी ब्याह की कमीज, चुस्त सलवार और पाँव में जूती. सच हे था के वह जितनी अल्हड़ पाश्चात्य वेशभूषा में लगती थी उस से लाख गुना ज्यादा वह अब दिख रही थी. पूजा मामी भी अपनी बेटी की ख़ूबसूरती निहारती बैठी रही. उन्हें शायद आज पहली बार अपनी बेटी के इस रूप का नजारा हुआ था.

"चलिए दीदी. वैसे दोनों मां नजर नहीं आ रहे.", अर्जुन ने खड़े होते हुए कहा तोह पूजा मामी की तन्द्रा भांग हुई.

"शोरूम गए थे कार लेने और तुम्हारी वाली तोह वही से चली जाएगी क्योंकि तुम्हारे नाना चाहते है के अर्जुन खुद चला कर वह कार यहाँ लेके आएगा.", पूजा मामी कड़ी होने के बाद समय के पास आई और अपनी गोल बिंदी उतार कर उसके माथे पर लगा दी. साथ हे कान के पीछे कला टीका, नजर का. दोनों बहार चल दिए.

"समय जरा भी तुम दोनों पर नहीं गई. सुन्दर तोह तुम भी हो लेकिन आज देखा के उसके सामने शायद पूरी फीकी लगने लगी थी तुम.", ममता की बात पर पूजा हंसने लगी.

"सच कहा तुमने. मेरी बेटी बड़ी कब हो गई पता भी नहीं चला और इतनी सुन्दर है ये भी आज देखा. वैसे गई मेरे पर हे है, हाँ नहीं तोह.", दोनों हंसने लगी और उधर अर्जुन कुछ सोच कर काली वाली बुलेट लेके समय के साथ चल दिए.

"ये क्यों लेके आये? तुम्हे तोह इस से ज्यादा लाल वाली पसंद है न."

"आपको नजर न लगे और वैसे भी आप काले रंग पर बैठी ज्यादा सुन्दर लग रही हो. रास्ता बताते रहना.", अर्जुन शीशे में वह चेहरा देखता हुआ खुश हो रहा था. दोनों की नजरे बार बार लड़ रही थी. हाय और मुस्कान समय के चेहरे से जाने का नाम नहीं ले रही थी. कमर पर हाथ रख के वह बस खुद को छुपाने लगी. ये खामोश पल भी 10 मिनट में ख़तम हो गए.

"मैं इधर हे इन्तजार करता हु.", दरगाह वाली जगह आते हे अर्जुन ने मोटरसाइकिल स्टैंड पर लगते हुए कहा.

"अंदर मछलियों को दाना दे सकते हो. दरगाह मत आना लेकिन जगह देख हे सकते हो, ाचा लगेगा तुम्हे.", अर्जुन हामी भरता उनके साथ अंदर आया और कुछ सोच कर सर के ऊपर रुमाल बाँध लिए. छोटी सी दूकान से फूल, अगरबत्ती, प्रशाद लेने के साथ हे एक पैकेट मछलियों के लिए दाना भी ले कर दोनों अंदर आ गए. हरे रंग की वह इमारत कोई 200 मीटर दूर थी द्वार से. संगेमरमर का ये चौड़ा रास्ता तीन तरफ जाता था. सीधा दरगाह को, बाए बड़े सरोवर पर जहा किनारे किनारे घने पेड़ लगे थे और दाए तरफ भी फलो के वृक्षों से सजा बड़ा बगीचा. बचे खेल रहे थे, बड़े टहल रहे थे या प्रतीक्षा कर रहे थे अपनों की जो दरगाह को गए थे.

"उस तरफ सरोवर है और सीढ़ियों पर बैठ कर तुम आराम से समय व्यतीत कर सकते हो. मुझे 10 मिनट लगेंगे.", समय दीदी ने समझाया लेकिन अर्जुन नंगे पाँव उनके साथ हे आगे चलता रहा. भीनी भीनी सुगंध आने लगी थी जैसे जैसे वह करीब पहुंचे. समय से आने की वजह से वह भीड़ नहीं थी जो अमूमन प्रसिद्ध जगह होती है लेकिन फिर भी log-bag कतार से अंदर जा रहे थे. द्वार के पास आते हे दीदी ने उसका हाथ थाम लिए.

"मैं आपको यहाँ तक लेके आया हु और अब आगे आप अपना ध्यान वही लगाए जहा होना चाहिए.", अर्जुन की बात सुन्न कर दीदी ने चेहरे को देखा तोह वह सिर्फ मुस्कान थी.

"ाची बात है, लेकिन देख लेना एक दिन अंदर भी आना पड़ेगा.", दीदी माथे तक दुपट्टा करती अंदर चली गयी और अर्जुन उस और जहा उसके अनजान दोस्त पानी में थे. हर तरफ एक अलग सी ऊर्जा और शान्ति थी. बहार से बिलकुल विपरीत समां. इधर सरोवर किनारे आते हे अर्जुन खुश हो गया. ऐसा हे सरोवर उसने एक बार गुरुद्वारे साहिब में देखा था लेकिन यहाँ पर मछलियों की तादाद बेशुमार थी. रंग बिरंगी, छोटी बड़ी और हर तरह की. ज्यादातर किनारे किनारे चाय में घूम रही थी.

"चलो अब तुम सबके खाने का समय हो गया.", चौकड़ी लगता वह उस चौड़ी सीढ़ी पर बैठ कर थोड़ा थोड़ा चारा फेंकने लगा और अब हलचल तेज हो गई थी.

"नास्तिक तोह नहीं दीखते तुम.", ये आवाज बराबर से हे आई थी और पक्के रंग का ये व्यक्ति kaale-hare कपडे पहने हाथ से आता टॉड कर अंदर दाल रहा था. अलग हे चमक और शान्ति थी चेहरे पर. कानो में चांदी के कुण्डल और गले में 3 माला.

"आस्था के लिए किसी स्वरुप को पूजना मुझे ठीक नहीं लगता. भगवन हर तरफ है तोह किसी ख़ास जगह बेमतलब दर्शन मुझे ठीक नहीं लगता.", अर्जुन ने पानी में हाथ डाला और चारा फ़ैलाने लगा. ये मछलियाँ निडर थी जो aas-pas हे रही.

"हिम्मत मिलती है लोगो को इस से क्योंकि उन्हें एक स्वरुप और स्थान पता लगता है. साधारण मैं ऐसा हे होता है बीटा. वह सरल तरीके से चलता है. हाँ तुम्हारी भी बात अपनी जगह ठीक है. Khuda-bhagwan या रब्ब तोह हर जगह है. वैसे तुम अपनों का साथ देने भर के लिए तोह अंदर जा हे सकते थे.", एक छोटा सा प्लास्टिक सरोवर में देख कर इस व्यक्ति ने डंडे पर लगे हक्क की मदद से वह कुशलता से निकल लिए.

"साथ हे तोह हु लेकिन जो उन्हें करना है वह अकेले हे सही रहेगा. वैसे ये जगह है बड़ी खूसूरत और शांत."

"यही तोह खासियत होती है ऐसी जगह की. परेशान इंसान जहा आ कर सुकून प् सके और ज़िन्दगी की मुश्किलों का सामना करने के लिए हिम्मत मिले.", अर्जुन को ाचा लगा ये सुन्न कर की इस व्यक्ति ने कोई वैसा प्रवचन नहीं दिए जैसी उम्मीद थी.

"सही कहा आपने. लेकिन मैं ये हिम्मत और सुकून अपने परिवार में रह कर हर पल पाटा हु. मेरी माँ के पास."

"हम तुम कौन है सही गलत बताने वाले. संसार भरा है कीचड से, तू चल फकीरा अपनी राह. अंधे का सुख धन और लालच, तेरी दौलत तेरी माँ.", इतना बोलकर वह व्यक्ति उठ कर आगे चला गया और एक देसी काले रंग का श्वान (डॉग) उसके पीछे पीछे. जाने कहा से चिलम हाथो में आ गई थी जिसको दियासलाई से जलाते वह धुआं उड़ाते घने वृक्षों के बीच गायब हो गया.

"बड़े किस्मत वाले हो यार तुम तोह. यहाँ लोग दरगाह के साथ साथ मलंग बाबा से भी भेंट करने की इत्छा लिए आते है लेकिन हजारो में से कोई एक हे होता है जिन्हे वह कभी समय देते है. और वह तोह तुम्हारी बगल में बैठे तुमसे गप्पे लड़ा रहे थे.", समय चलती हुई पीछे आ कड़ी हुई तोह अर्जुन ने उनको पास बैठने का कहा.

"दरगाह पर मलंग बाबा?", अर्जुन ने वैसे हे पूछते हुए चारा समय के हाथो में दाल दिए. वह भी आराम से मछलियों को चारा खिलने लगी.

"यहाँ सिर्फ दरगाह हे नहीं है. उधर राइट साइड में बगीचे से आगे मंदिर भी है, बहोत पुराण. सोमवार को अगर मैं यहाँ होती हु तोह दादी के साथ आती हु. मलंग बाबा जब मूड में होते है तोह माहौल बना देते है अपनी आवाज में लेकिन मूड हो तभी नहीं तोह वह बस अपने में हे लगे रहते है. दादा जी के सर पर हाथ रख दिए था उन्होंने और फिर सब तुम्हारे सामने है."

"कितनी उम्र होगी? कोई 45-50 साल और नाना जी तोह शुरू से हे अमीर है.", अर्जुन समय के मुँह से सब सुन्न न चाहता था.

"10-11 साल से तोह मैं उन्हें ऐसे देख रही हु. दादी यहाँ तबसे आ रही है जब बुआ की शादी नहीं हुई थी और यहाँ दरगाह भी छोटी सी थी और मंदिर की जगह एक बरगद का पेड़ जिसके नीचे शिवलिंग था. बाबा तबसे इधर है. दादा जी अमीर तोह है लेकिन समृद्धि सब बाद में आई. वो छोडो और ये बताओ के तुमसे क्या बातें कर रहे थे."

"कुछ नहीं बस यही कह रहे थे के इतनी सुन्दर लड़की को अकेले छोड़ आये.", अर्जुन के हंसने पर समय झूटी नाराजगी दिखते हुए हल्का मुक्का मरती हुई चेहरा दूसरी तरफ करके बैठ गई.

"सचमुच सुन्दर हो तोह झूठ क्यों कहु. और बस वैसे हे इधर उधर की बातें कर रहे थे. वैसे तुमने क्या मन्नत मांगी?"

"मैं कुछ मांगती नहीं कभी बस दिल करता है इधर आने का और आज यहाँ तुम्हारे साथ आना चाहती थी. और तुम्हे तुम्हारा प्रॉमिस याद है?", समय ने अब हाथ थाम लिए था लेकिन देख पानी में रही थी.

"कौनसा प्रॉमिस?"

"ठीक है कोई प्रॉमिस नहीं किआ था. चलो यहाँ से.", गुस्से में तुरंत हे उठ कर समय बहार की तरफ चल दी और अर्जुन हँसते हुए उसको जाते देखने लगा. लेकिन फिर पीछे चल पड़ा. समय मोटरसाइकिल से कुछ दुरी पर मुँह फुलाए कड़ी थी.

"बैठिये.", अर्जुन ने ज्यादा कुछ न कहते हुए मोटरसाइकिल स्टार्ट करके सामने ला कड़ी की और समय चुपचाप बैठ गई, दुरी बनाते हुए. अभी थोड़ी हे आगे बढे थे की अर्जुन ने बात शुरू की.

"मैंने प्रॉमिस इसलिए नहीं किआ था के आपने मुस्कान वाले मामले में मदद की थी. आप मुझसे प्यार करती है इसलिए मैंने वादा किआ था और नेक्स्ट संडे हम दोनों हॉस्टल में मिलेंगे.", गुस्सा तोह रेत की तरह चेहरे से पल में हे फिसल गया था समय के चेहरे से. ख़ुशी के मारे वह बिना किसी की परवाह किये दोनों हाथ अर्जुन की कमर में दाल कर पीठ से लिपट गई.

"उमाह.. तुमने मेरी जान हे निकाल दी थी. लेकिन हम हॉस्टल नहीं कही और चलेंगे.", समय चहक रही थी और अर्जुन भी इस शाम के साथ उसका प्यार दिल तक महसूस करने लगा था.

"कहा चलेंगे? हॉस्टल में मैंने साल भर के लिए रूम ले लिए है. इंटरनेशनल हॉस्टल में हे, मुस्कान से निचले फ्लोर पर."

"वह फिर कभी लेकिन इस बार हम मेरी पसंद की जगह चलेंगे."

"ये जगह है कहा पर?"

"मेरे घर. और टेंशन मत लेना किसी की. पापा और माँ सैटरडे को हे देहरादून जा रहे है, माँ का बर्थडे हैं संडे को. Swati-Kanchan ने भी प्लान बनाया हुआ है अपनी फ्रेंड के जाने का जहा वह सुबह से शाम तक रहने वाली है. और मैंने तुम्हे अपना कमरा भी दिखाना है.", समय विस्तार से सब बताने लगी तोह अर्जुन ने सवाल नहीं किआ. बात सही थी की घर से बहार दोनों मिलते तोह बात खराब होने की सम्भावना थी. और हॉस्टल का कमरा किसी और वजह से लिए था वो भी मुस्कान ने शबनम के नाम से अर्जुन के लिए.

"फिर ठीक है. अब यहाँ बस सबसे मिलने के बाद मैं घर निकलता हु.", दोनों वापिस आये तोह अंदर आँगन में इस समय सभी लोग थे और अर्जुन ने काले रंग की चमचमाती इलो कार बहार देख ली थी.

"पहले हे बता देता हु आप सबको. कोई भी कुछ नहीं देगा और मैं लेकर जा भी नहीं सकता. मामी बस दूध पीला दीजिये फिर मैं निकलता हु. घर पहुंचते पहुंचते 7 बज जायेंगे.", अर्जुन राजेश मां के साथ हे बैठ गया. पूजा मामी ने तोह उसकी बात सुन्न कर अलग हे मुस्कान दी जो सिर्फ अर्जुन को समझ आई थी.

"ठीक है लेकिन जो सगुन है वह हमने पहले हे भिजवा दिए था गाडी के साथ. लेकिन ये तुम्हे लेना हे होगा.", कुन्दनलाल जी ने शगुन का लिफाफा अर्जुन को पकड़ते हुए कहा. साथ हे बरी बरी से सबने यही किआ. उसके हाथो में अब 10 लिफाफे थे. सरोज मौसी भी एक छोटा सा बैग लिए आ गई थी.

"ाचा हुआ तुम यही हो अभी. मंजू को साथ लेके जा सकते हो?", सरोज मौसी के साथ हे मंजू भी वही आ गई थी. आँगन में पूरा परिवार मौजूद था और अर्जुन फिर भी मंजू को हे देखने में लगा था.

"हाँ मौसी ले जाऊंगा और मंजू का दिल करे तोह हमारे हे घर रुक जाएगी."

"नहीं, मेनका दीदी वह अकेली है तोह घर हे जाना है. कल से मेरी प्रैक्टिस स्टार्ट है ट्रायल्स के लिए और घर के काम भी दीदी अकेली कर रही होंगी.", मंजू ने 2 टूक जवाब दिए और समय के साथ बैठ कर बातें करने लगी.

"पंजाब से आने के बाद तुम मसरूफ होने वाले हो. ाचे से जिम्मेवारी निभाना और कुछ भी परेशानी हो तोह मुझसे बात करना. बाकी तुम समझदार हो.", कुन्दनलाल जी ने स्नेह से अर्जुन को समझते हुए हिदायते दी और ऐसे हे सभी ने अपना प्यार जताया. घर से निकलते हुए 6 से थोड़ा ऊपर वक़्त हो गया था. मंजू दोनों पाँव एक तरफ किये अर्जुन के पीछे बैठी और आचार्य जी द्वारा दिए हेलमेट पहन कर अर्जुन सबको हाथ हिलने के बाद निकल लिए अपने घर की तरफ.

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"परमवीर, ये मत भूलो के ये एक पोलिसवाले है. मैं खुद हे जब काम कर रहा हु तोह तुम्हे इस सब से दूर रहना चाहिए.", क्रिमब्रांच के खास कमरे में ये जेलर अमरीक सिंह कुर्सी पर बैठा था और छोटे सांगवान ने तैश में उसके गाल लाल कर दिए थे. अब दिग द्वारा रोकने पर वह एक तरफ खड़ा गुस्से में जेलर को घूर रहा था.

"आप जानते है न इसने क्या किआ है? फिर भी आप इसको बचा रहे है?"

"देखो इसको ससपेंड करने के बाद मैं खुद हे यहाँ क़ैद किये हुए हु. पूछताछ चल रही है और बाकी लोगो भी मेरी हिरासत में हे है. तुम उनके साथ जो भी करो लेकिन राजपाल (शो) और इसको तुम छूना भी मैट. एक गलत कदम और फिर जो तुम्हारे साथ है वही खिलाफ हो जायेंगे.", निर्मल सिंह की आवाज शांत लेकिन चेतावनी भरी थी.

"कर लो अपनी मर्जी आप भी. शंकर खुद जब इसकी गर्दन अलग करेगा तब मैं वही मौजूद रहूँगा और आप भी. फिर हम ये बात यही से शुरू करेंगे.", छोटे सांगवान को जैसे कही न कही निर्मल सिंह की बात चुभ गई थी.

"मेरा ये मतलब नहीं था परमवीर. तुम्हारे पिता जी और रामेश्वर जी जैसा छह रहे है वैसा हे हो रहा है. इनसे अभी बहुत कुछ पूछना है जो बड़े खतरे को ताल सकता है. शंकर इसमें शामिल हुआ तोह मुझे कदम पीछे लेने हे पड़ेंगे लेकिन हम वह नहीं जान पाएंगे जो ज्यादा जरुरी है.", दिग के स्वर इतनी जल्दी बदल जायेंगे ये सांगवान ने भी नहीं सोचा था. बात ठीक थी की ये मामला उनके पिता और पंडित जी देख रहे थे.

"लेकिन बहन सिंह का कोई आदमी बहार नजर आया तोह फिर बात शंकर हे करेगा.", परम इतना कह कर फिर से उस जेलर को घूरने लगा जिसके होंठ से खून आ रहा था.

"वैसे तुम्हारी बात सही है. कल शंकर के आते हे अमरीक को मैं उसके हे हवाले कर देता हु. यहाँ मैं ज्यादा दिन तक इसकी सेवा नहीं कर पाउँगा. तुम शंकर को सूचित कर देना के कल आते हे यहाँ आ जाये और इसको ठिकाने लगा दे.", रुमाल से चेहरा साफ़ करते हुए दिग ने पानी की बोतल मुँह से लगा ली.

"नहीं नहीं. मेरा इसमें कोई लेना देना नहीं है. सर आप एक पोलिसवाले के साथ ऐसा कैसे कर सकते है? दसप दुष्यंत के कहने पर हे बहन सिंह का साथ मज़बूरी में देना पड़ा. सर आप जानते है के मेरा रिकॉर्ड क्लीन है लेकिन दसप साहब के दबाव में हे राजपाल और मुझे ये करना पड़ा. प्लीज शंकर को इसमें शामिल मत कीजिये. मैं स्टेटमैंट देने को तैयार हु.", अमरीक सिंह रट्टू तोते का सब बोलने लगा और इसके साथ हे बहार से कागज पेन लिए रामेश्वर जी अंदर आ गए. साथ हे राजपाल को भी 2 पोलिसवाले पकडे हुए थे. वीडियो कैमरा सामने लगा कर दोनों के बयान लेते हुए हे क्राइम ब्रांच की एक टीम दसप को लेने निकल गई.

"लो भाई परम, ये बाद और गुड वाला एक और सफल परिक्षण कामयाब रहा. अब देखते है के दुष्यंत मालिक क्या चाहता है.", निर्मल सिंह ने हँसते हुए छोटे सांगवान से हाथ मिलाया लेकिन रामेश्वर जी अभी भी कुछ सोच रहे थे. तीनो बहार हॉल में आये तोह धर्मवीर जी टेलीफोन पर किसी से बात कर रहे थे. फारिग होते हे वह रामेश्वर जी के पास आ गए.

"पंडित जी, क्या सोच रहे हो? उन्होंने नाम नहीं बताया क्या?"

"दुष्यंत मालिक."

"हहहह.. कीड़ा सांप बन्न हे गया. कोई बात नहीं हम देखते है इसको भी. आज वह निर्मल की जगह होता अगर आदत ाची होती तोह. रिटायरमेंट के वक़्त भी अकाल काम नहीं कर रही उसकी.", बड़े सांगवान जी चश्मे का शीशा साफ़ करते हुए बहार खली मैदान देखने लगे. जैसे बहुत पुराण कुछ याद आ गया हो.

"मोहर सिंह के भाई का जिगरी. पता नहीं कैसे अभी तक ये बचा रहा.", रामेश्वर जी भी अतीत के पैन पढ़ रहे थे.

"देखिये पंडित जी, अब सबूत भी है और वह पकड़ में भी आ जायेगा.", निर्मल सिंह भी साधारण कमीज पतलून में हे थे और चेहरे पर निश्चय लिए थोड़े मजबूत दिख रहे थे.

"निर्मल भाई, वह सोनू rape-murder केस भी खुलवा हे लो जरा. परम सबूत बनाओ बेटे और मेहुल को कहना के जांच किसी जूनियर डॉक्टर से करवाना. खेल खेलने वाले को भी उसकी हे बाजी दिखने का वक़्त आ गया.", धर्मवीर जी ने जो बात कही थी वह सिर्फ रामेश्वर जी समझ पाए थे.

"यही ठीक रहेगा.", रामेश्वर जी ने भी सहमति दे दी और निर्मल सिंह भी समझ गया के दुष्यंत की रिटायरमेंट पार्टी रंगीन होने वाली है. बहन सिंह का साथ देने पर सिर्फ नौकरी जाती लेकिन एक 21 साल की लड़की के rape-murder बेहद संगीन जुर्म था. अतीत में कई बार बक्श दिए गया व्यक्ति अगर नहीं सुधर रहा है और अब वह बदला लेने के लिए परिवार को मौत देने पर आमादा हो तोह रामेश्वर जी हलके में नहीं लेने वाले.

"गवाह भी हाजिर हो जायेंगे पंडित जी. वैसे भी बहोत ठु ठु हुई थी उस केस में पुलिस की. नारी संगठन ने तोह पुलिस के हे खिलाफ याचिका दायर कर दी थी. सांगवान जी का सही फैंसला है. चलिए मैं आप लोगो को छोड़ देता हु.", निर्मल सिंह के कहने पर दोनों लोग बहार चले आये. गाडी के पास खड़े होते हे पुलिस की टीम मुँह पर कपडा पहनाये दुष्यंत को लेकर अंदर चली गई थी.

"चलो सिंह साहब आप इसकी खातिरदारी करो हम चलते है. वैसे जल्द हे इस सब से फारिग हो जाइये, शादी के कार्यक्रम आपकी प्रतीक्षा करेंगे.", रामेश्वर जी ने कार में बैठने से पहले हाथ मिलाया तोह निर्मल सिंह ने भी मुस्कुराते हुए हामी भरी.

"जी आपके पास रहने का हर अवसर मेरे लिए बहुमूल्य है. 2 लोग बाकी है, बस उसके बाद मैं 2 हफ्ते की लीव ले रहा हु."

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मंजू को छोड़ने के बाद कुछ वक़्त मेनका से बातें करके अर्जुन अपने घर आ गया. बगीचे से आगे ये लम्बी कार काले रंग का लबादा ओढ़े कड़ी थी जिसको देख कर वह मुस्कुरा दिए. अभी कार देखने के चाव छोड़ कर सबसे पहले अपनी दादी के पास आ गया.

"ये प्रशाद और शगुन दादी. आज बड़े दिन बाद थकान हुई है.", बिस्टेर पर पसारता हुआ वह मधु बुआ की गॉड में सर रखते हुए दादी को पूरे दिन का बखान करने लगा. कौशल्या जी भी खुश थी और उसकी बातें सुन्न रही थी. रामेश्वर जी के आते हे अर्जुन नहाने के बाद आराम करने का बोल कर पिछले आँगन में आ गया.

"माँ मेरे कपडे रख दो बाथरूम में. नहाने के बाद थोड़ा आराम करूँगा.", जूते खोल कर वह खड़ा हुआ कपडे निकलने के लिए लेकिन याद आ गया था के ऐसा करना गाला होगा. बेटे की आवाज सुन्न कर रेखा जी उसके कपडे लिए पास आ गई.

"आज तोह तू बहोत थक गया होगा? जल्दी खाना खा के सो जाना फिर कल अपनी दीदी को लेके भी जाना है.", उन्होंने अपने बेटे को सीने से लगाया तोह अर्जुन की थकान पल में हे दूर हो गई.

"पार्टी कब देगा तू?", अलका दीदी की आवाज सुन्न कर अर्जुन अलग हुआ और उनके साथ ऋतू दीदी और प्रीती को देखने लगा.

"हाँ पार्टी तोह बनती है. इतनी बड़ी कार वह भी अर्जुन की खुदकी.", प्रीती ने नाम से हे पुकारा तोह अर्जुन ने सहमति दे दी.

"जब आप लोग कहो लेकिन गाडी पर से कवर तभी उतरेगा जब मैं चलना सीख जाऊंगा.", अर्जुन ने पार्टी देने की बात कही तोह तारा और रुपाली भी वही आ गई.

"कवर तोह मैं कल हे उतार लुंगी. मुझे चलनी आती है और तुझे सीखा भी दूंगी. लेकिन पार्टी घर पे नहीं लेंगे हम.", तारा ने कमर पर हाथ रख कर तुनक कर कहा.

"ख़बरदार किसी ने अर्जुन से पहले हाथ भी लगाया तोह. उसने जब ये कहा की वह सीखने के बाद हे कवर उतरना चाहता है तोह तुम्हे उसकी बात मान नई चाहिए. पार्टी दे रहा है न वह.", मधु बुआ के गुस्से के सामने सबकी हालत खराब हो गई थी. तारा की मस्ती पल में हे छु हो गई थी.

"ओह मेरी प्यारी बुआ, इन सबका हक़ है उस गाडी पे. जिसको चलनी है वह चलाये बस आप न गुस्सा मत करो. ये सब खुश रहती है तभी तोह घर घर जैसा लगता है. और आप भी हंसती हुई ज्यादा ाची लगती हो, गुस्से में नहीं.", अर्जुन बुआ का गाल चूम कर बाथरूम में भाग गया. मधु बुआ रेखा जी की तरफ देखने लगी.

"तुम्हारा भतीजा है तोह मैं बीच में नहीं पड़ने वाली.", रेखा जी ने हँसते हुए कहा तोह बुआ भी हंसने लगी.

"अरे भाभी वह बैलबुद्धि हे है. सबसे प्यार करता है लेकिन इतनी समझ भी नहीं है के उपहार के साथ ऐसा नहीं किआ जाता. और इस तारा को भी क्या कहु, इसके लिए वह मुझे हे सुना के चला गया.", तारा अपनी माँ से आ कर लिपट गई.

"मस्ती में कहा था माँ. अलका कह रही थी की ऐसा कहने पर अर्जुन का जवाब सुन्न न है बस. लेकिन वह तोह कभी झूटी नाराजगी भी नहीं दिखता. ऐसे कैसे मैं वह गाडी चला सकती हु?"

"बुआ वैसे आजकल वह आपका ज्यादा लाडला हो गया है. मुझे भी दांत दिए आपने.", ऋतू झूठा नखरा दिखा रही थी.

"ओह तुम सभी न कितनी बड़ी नौटंकी हो सब खबर है मुझे. चलो थोड़ा काम करवा लो अब और आरती तैयारी कर ली जाने की?", मधु बुआ ने ऊपर जाते हुए आरती से जाने के लिए पुछा.

"हांजी बुआ. हो गई है तैयारी. दादा जी ने कहा है की सरकारी गाडी जा रही है तोह सुबह 7 बजे हम निकल जायेंगे. और परसो वही ड्राइवर शाम को हमे वापिस ले आएगा.", आरती के जवाब से बुआ संतुष्ट हो कर ऊपर चली गई.

"चल प्रीती तेरी मम्मी का दिमाग खाते है थोड़ा. यहाँ हमारी कोई कदर हे नहीं है.", अलका की बात सुन्न कर ऋतू ने ब्याह पकड़ ली.

"चुपचाप रसोई में जाओ मैडम. कोमल दीदी और प्रियंका दीदी के पास. प्रीती को मैं छोड़ कर आ रही हु, घंटे तक आ जाउंगी.", ऋतू दीदी आँख मार कर तुरंत बहार निकल गई.

"चल तारा, यही किस्मत है अपनी तोह.", अलका ने तारा का हाथ पकड़ा तोह रुपाली भी उनके साथ रसोईघर में चली गई. ललिता जी आज बहार गयी हुई थी राजकुमार जी के साथ. और लड़कियां आपस में हस्ती बातें काम कर हे लेती थी. इधर अर्जुन नाहा धो कर साफ़ पजामा टीशर्ट पहने सीधा अपनी माँ के कमरे में चला गया. रेखा जी ने भी उसको आराम करने दिए और सर की मालिश करते हुए जल्द हे सुला दिए. यही तोह कहा था बाबा मलंग ने, अर्जुन की असली दौलत रेखा जी हे थी जहा वह ज़माने भर को भूल कर निश्चिंत सो जाता था. 8 बजे हे उसके सोने से माहौल शांत पड़ गया था.

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"तू कल चले जौना पुत्तर थे अर्जुन तनु मिलान वि नयी आया? डोवा विच कोई नाराजगी तह नहीं होइ?", अन्नू की माताजी 2 बड़े बैग में अपनी बेटी के साथ सामान सही से रखवा रही थी. अन्नू का आखिरी दिन था आज अपने घर में. कल अर्जुन ने इत्मीनान से दिल भर के प्यार किआ था लेकिन आज के लिए बताया भी था के वह आ नहीं पायेगा.

"बेबे मैं कल मिली स ओसनु. घर दे काम तोह अज्ज बहार गया होया है नहीं तह पक्का आना स उसने. लेकिन मेरी जाए बाद वि ओह तुहानू मिलान ांडा रहेगा. तुहाडे नाल गल्लां करना तेह लूडो खेलना ज्यादा पसंद है. बाकी वेखो जे सवेरे आवे तह.", अन्नू का भी दिल था के जाने से पहले बस एक बार अर्जुन आ जाये तोह दिल की तड़प थोड़ी काम हो.

"मुंडा सच्ची भोत प्यारा हैगा. कड़े ओप्रा नै करदा तेह मेरे नाल किचन वच वि लगया रेह्न्दा है. तेरा प्रायः कड़े ेंज ध्यान नै रखड़ा स लेकिन अर्जुन आप हे चा बना डंडा है मेरे वास्ते. सच्ची तू चली जाएगी ताः घर सुन्ना हो जाना कुड़िये. तेरे बहाने तह मैं वि खुश रेहँदी आ लेकिन हुन्न लगदा है बुढ़ापा चंगा नई होना.", बात करते हुए रात गहरा रही थी.

"तुस्सी वि न हर वेले ेहियो गल्ला करदे हो. मैं सदा वास्ते नहीं चली, आया करना मैं हर 6 महीने वच. डिग्री करना मेरा सपना है बेबे और तुस्सी हूँ ेहड़ा करोगे तह पीड़ होगी. डैडी ने तुहाडे कॉल, गवांद वि चंगा है सद्दा तेह ओह पागल वि मिलदा रहुगा. नंबर मैं लिख दिता डायरी तेह, कर लिया कार्यो गल्लां अर्जुन नाल.", अन्नू अपनी माता जी के गले लगी तोह सरदार जी भी अंदर आ गए.

"पुत्तर जी सादे 9 हो गए. बाकी पैकिंग सवेरे कर लिओ या सौं तोह पहला. फ्लाइट शाम दी है लेकिन लगदा आज रोटी नहीं मिलनी. मेहमान वि आये होये ने.", सरदार जी बात सुन्न कर अन्नू के माता जी चेहरा ठीक करती तुरंत उनके साथ बहार चली आई.

"अन्नू खाना तैयार हुन्दे मैं बुला लवंगी. तू आराम कर सारा दिन बहोत कम् कित्ता अज्ज.", जाने से पहले उन्होंने कहा. चारुल के परिवार वाले आज यहाँ रात्रिभोज पर आये हुए थे. संधू जी yada-kada शराब पी लेते थे और आज वैसा हे दिन था. उनकी श्रीमती जी भी अन्नू की माता जी से गले लग कर मिली और फिर उनके साथ हे रसोई में चली गई.

"Parul-Charul, तुस्सी बीटा जी अंदर चले जाओ अन्नू कॉल.", ये सब अभी आये थे. और पहले हॉल में हे बैठे थे लेकिन सरदार जी के कहने पर दोनों बहने अन्नू के कमरे में चली गई. पारुल हमेशा की तरह खुश थी और चारुल सहज.

"वाह मैडम, फाइनली लंदन जा रही हो?", पारुल की आवाज सुन्न कर अन्नू मुस्कुरा उठी. वह बाथरूम से बहार हे आई थी कपडे बदल कर. चेहरा गीला था जो नरम तोलिये से साफ़ करने के बाद वह दोनों सहेलियों से गले लग कर मिली.

"तू भी चल साथ. वैसे चारुल तोह शुरू से हे बहार जाना चाहती थी."

"मैं तोह कभी अपने मिया जी के साथ गयी तोह गयी लेकिन चारुल अपनी ज़िन्दगी के फैंसले लेने के लिए आजाद है.", पारुल पंजाबी सलवार कमीज में पूरी सरदारनी लग रही थी और चारुल ने एक काले टॉप के साथ सफ़ेद माखन जीन्स पहन राखी थी. शरीर के ख़ास उभार ाचे से नजर आ रहे थे.

"यार जैसा यहाँ है वैसा हे वह होगा. फिर क्या करना इंग्लैंड जा कर. लेकिन अन्नू ने अपनी डिग्री करनी है तोह उसका जाना सही है. वैसे याद बड़ी आएगी तेरी.", चारुल ने अन्नू का हाथ थाम कर कहा.

"कोई न डार्लिंग याहू ज़िंदाबाद. और कौनसा सदा के लिए जा रही हु. बस पारुल की शादी मिस हो जाएगी."

"चारुल की भी हो जानी है तीन साल में तोह.", पारुल ने हँसते हुए आँख मारी और इधर अन्नू के माता जी ट्रे में 4 गिलास लिए अंदर आ गयी.

"मम्मी, 3 तिगाड़ा जैसा कुछ नहीं होता.", गिलास देख कर अन्नू ने कहा तोह माता जी हंसने लगी.

"पुत्तर जी मैं पढ़ी लिखी हु. चार बन्दे तोह चार गिलास हे लाऊंगी."

"आपको कहा था न और किसी को नहीं बुलाना.", अन्नू ने नाराजगी से कहा लेकिन माता जी ट्रे रख कर बहार चली गयी.

"कोई बात नहीं, तेरा गुस्सा कम् कर ले जरा. कोई आया है तोह जरुरी हे होगा. प्यार और परवाह करने वाले लोग जितने ज्यादा हो उतना ाचा है.", पारुल ने अन्नू के पत् पर हाथ रखते हुए समझाया.

"वह बात नहीं है यार. तुझे भी पता है के मैं इस कमरे में सभी को अल्लोव नहीं करती.", अन्नू बात कहते हुए भी दरवाजे पर देख रही थी. कोई नहीं था.

"अर्जुन को तोह पूरी फ्रीडम है. शायद इतनी तोह आंटी को भी नहीं दी होगी कही tu-ne.", चारुल ने यहाँ भी अर्जुन को घुसा हे दिए. अन्नू ने ख़ास तवज्जो नहीं दी इस बात को लेकिन पारुल ने ये मौका लपक लिए.

"ये बात तोह आज हे पता लगी की इस कमरे में अर्जुन आया हुआ है. वैसे इसमें 2 राये नहीं की तू जब उसके साथ होती है तोह एक अलग हे चमक रहती है तेरे चेहरे पर. न पहले कभी वह देखि थी न अब दिख रही है.", पारुल की बात वाजिब थी. अर्जुन के आने से हे तोह वह महकता गुलाब लगने लगती थी.

"हाँ और इसलिए तोह मैं अन्नू के लिए ख़ास हु.", कमरे के अंदर आते हे अर्जुन धम्म से बिस्टेर पर बैठ गया. तीनो चेहरे हैरत से उसको देख रहे थे. रात के इस वक़्त और वह ऐसे जैसे आसमान से टपका हो, अर्जुन उनके सामने था. अन्नू को यकीन नहीं आ रहा था लेकिन उसकी नरम लम्बी उंगलिया अपनी उंगलिओं में लेते हुए अर्जुन बाकी दोनों को देखने लगा.

"तुम यहाँ, इस वक़्त, ऐसे अचानक कैसे?", अन्नू की धड़कन बढ़ गई थी. दरवाजा खुल्ला था और ये लड़का उनके कमरे में.

"आंटी ने फ़ोन किआ तोह मैं आ गया. वैसे भी घर पे सबने खाना खा लिए था तोह अकेले मेरा भी दिल नहीं था. कोल्ड कॉफ़ी मैंने हे बनाई है ये और अंकल तोह बैठे है अपने पटिआला पीने.", अन्नू कस के उसके सीने से लग गई लेकिन फिर माहौल देख कर एक तरफ हो कर सही से बैठ गई.

"माँ ने कब फ़ोन किआ?"

"15 मिनट पहले और कोच सर की भी आवाज आ रही थी साथ हे अंकल जी की भी. कह रहे थे के 'Parul-Charul तुस्सी बीटा अंदर चले जाओ.' और मैं एक मिनट में हे आ गया.", अर्जुन ने अब पारुल से हाथ मिलाया और फिर चारुल से भी.

"वैसे कोल्ड कॉफ़ी भी खराब हो जाती है.", अर्जुन ने याद दिलाया तोह दोनों बहनो ने गिलास उठा लिए लेकिन अन्नू उठ कर बहार चली गयी. उनकी माता जी अपनी सहेली के साथ सब्जी काट रही थी बातें करते हुए, चूल्हे पर कुकर चढ़ा था और स्लैब देख कर लग रहा था के बहुत काम हो रहा है. सरदार जी की टेबल पर सलाद, नमकीन के साथ जाम लगे थे जिसका मतलब था के अभी आधा पौने घंटा तोह सब व्यस्त रहने वाले है. संधू जी को नमस्कार करने के बाद वह आंटी जी से भी मिल कर अंदर आ गई. अपनी माँ के चेहरे की मुस्कान देख कर वह भी खुश थी.

"अर्जुन, अब तोह तुम्हे भी अन्नू के बगैर रहना पड़ेगा.", पारुल मजे ले रही थी

"आप दोनों हो तोह सही. वैसे अन्नू हमेशा साथ है और मेरे घर से इंटरनेशनल कॉल भी हो जाती है तोह जब दिल करेगा बात कर लेंगे.", अर्जुन ने बीएड के किनारे रखे खाली फूलदान में कमीज के अंदर से निकाल कर 2 लाल गुलाब रखे और खड़ा हो कर बाथरूम में चला गया. दरवाजे पर कड़ी अन्नू मुस्कुरा रही थी. बाथरूम से बहार आते हे अर्जुन ने अन्नू को देखा और अन्नू ने उसके हाथ में वह कांच का फूलदान जिसमे पानी के अंदर दोनों लम्बी डांडिया डूबी थी, बहार सुर्ख गुलाब.

"थैंक यू.", अन्नू ने वह हाथ से लेते हुए बिस्टेर की इस तरफ रखा और बैठते हे कॉफ़ी का गिलास उठा लिए.

"सही कह रही थी तू पारुल. देख जरा मैडम की चमक, कहा तोह थोड़ी देर पहले ये गोरी थी अब गुलाबी हो गई है.", चारुल भी माहौल में शामिल हो गई थी.

"वैसे कॉफ़ी ाची बनाई है तुमने.", पारुल ने तारीफ की एक घूँट लेते हुए.

"थैंक यू. ये सब इनकी मेहरबानी है जो रसोई के भी काम सीखने पड़ रहे है.", अर्जुन ने गिलास निचे रखते हुए फिर से हाथ थाम लिए और अन्नू भी थोड़ा सरक कर अर्जुन से सत् कर बैठ गई.

"वैसे ये तोह बताओ के तुम दोनों घर में हे मिलने कैसे लगे?", पारुल भी देख रही थी और चारुल भी.

"माँ को अर्जुन पसंद है और उन्हें पता है के ये मेरा दोस्त है. पापा के साथ भी बॉन्डिंग है इसकी. वह ड्रिंक नहीं कर रहे होते तोह ये वही बैठा होता. मेरा नंबर 3रद है इस घर में अर्जुन की प्रायोरिटी के हिसाब से.", अन्नू ने जैसे समझाया तोह चारुल ने भी हाँ में सर हिलाया.

"Mummy-papa को पटना जरुरी है नहीं तोह गेट से बहार.", अर्जुन ने हँसते हुए कहा और अन्नू को प्यार से अपने साथ साइड से लगा लिए.

"चालू हो तुम पक्के. मैं तोह शरीफ समझती थी.", पारुल ने मस्ती करते कहा.

"रहने दो भाभी, आपसे तोह कुछ छुपाया भी नहीं मैंने. सगाई पर हे बता दिए था मैंने आपको. लेकिन ये सचमुच ख़ास है.", अन्नू की तरफ देखते हुए अर्जुन ने पारुल को भाभी कह कर बुलाया तोह पारुल ने भी हँसते हुए हाथ पर हाथ मारा. अर्जुन कुछ देर वैसे हे हंसी मजाक करता रहा और फिर उठ कर बहार चला गया.

"बड़ा ाचा लड़का है ये अन्नू. कमी हरेक में होती है लेकिन ये कुछ छुपता नहीं है. साफ़ बोलना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है लेकिन ये लड़का न अपनी कमिया खुद बता देता है."

"ये जरा इसको समझा. ये पागल न इंट्रोवर्ट होती जा रही है. और जो दिल में है उसको कभी सामने नहीं कहती.", अन्नू ने उठ कर अपनी अलमारी खोली और कपडे निकलने लगी. अर्जुन आ गया था तोह पजामा टीशर्ट बदलना अब जरुरी था. दोनों को 5 मिनट का बोल कर वह बाथरूम में चली गयी.

"देख ले चारुल, मैं न कहती थी की अन्नू भी समझदार है और अब तेरी बारी है. दिल की बात को कहना कोई जुर्म नहीं है. उस लड़के के गाल पर थप्पड़ तूने मारा लेकिन वह सामने से तेरे साथ हाथ मिलता है और बात भी ाचे से करता है. अन्नू के जाने के बाद तुझे मौका नहीं मिलेगा और मैं तोह वैसे भी इस सबमे नहीं पड़ने वाली.", पारुल ने कलाई पर बंधा धागा ठीक करते हुए अपनी बहिन को समझया.

"यार ये इतना आसान नहीं. मेरी फीलिंग्स अलग है और मुझे कोई अट्रैक्शन या वह प्यार वाली फीलिंग नहीं है उसके साथ. बस अलग सा है जो कभी ठीक लगता है कभी बुरा.", चारुल नासमझ होने का दिखावा अपनी जुड़वाँ के साथ कर रही थी.

"चल मेरे साथ भी झूठ बोल ले. मैं कौनसा तेरी परवाह करती हु. लेकिन वह अजीब सा लग्न भी तू आज हे जाहिर कर सकती है.", पारुल कही ज्यादा हे समझती थी इंसान और प्यार को.

"लीव आईटी. अगर पॉसिबल हुआ तोह बात कर लुंगी नहीं तोह वह मेरे लिए कोई इतना मायने नहीं रखता. अन्नू उसके साथ है, और भी जाने कितनी लड़कियों के साथ सम्बन्ध है उसके तोह ऐसा लड़का मैं कभी सेलेक्ट नहीं करने वाली. मेरे से प्यार करने वाला किसी और को कभी देखेगा नहीं.", चारुल का यु झूठा इतराना देख पारुल ने फीकी हंसी दी.

"अन्नू के बॉयफ्रेंड पर नजर तू रखे, दूसरी लड़कियों के साथ उसका होना देख जलन तुझे हो, मेरा हाथ पकड़ना भी तुझे शक्क करने को मजबूर करे और फिर तू ऐसा इंसान चाहती है जो सिर्फ तेरे से प्यार करे? विकास के साथ पूरे 4 साल बिताये मैंने लेकिन हम दोनों के बीच अटूट प्यार के बावजूद मैं ये नहीं कह सकती की वह किसी और से कभी प्यार नहीं करेगा. हर चीज तेरे स्पोर्ट जैसी नहीं होती की तूने एक खेल पसंद किआ और वह खेल की तरह ज़िन्दगी बन्न जाये. बदलाव कुदरत का नियम है और जो बेहतर है वह हमेशा चाहने वालो से घिरा रहेगा.", पारुल ने अपनी बात ख़तम की तोह चारुल अब नजरे झुकाये थी. इधर अन्नू बाथरूम से नीली कमीज और सफ़ेद पंजाबी सलवार पहने बहार आई तोह पारुल मुस्कुराने लगी.

"तोह मैचिंग कर हे ली उसकी सफ़ेद शर्ट और नीली जीन्स के साथ. सच कहु तोह तू सबसे खूबसूरत लड़की है जितना मैंने देखा है उनमे से. कैमरा तैयार रख, सही मौका है आज.", पारुल के इतना कहते हे चारुल ने भी अन्नू को देखा और फिर अन्नू ने दराज से 'कोडक' का कैमरा निकाल कर उसमे बत्त्र्य दाल दी.

"तननननाआ. रेडी.", अन्नू ने चहकते हुए कहा और इधर Charul-Parul की मम्मी खाने के लिए बुलाने आ गयी. दोनों बहनो ने हाथ धोने के बाद अन्नू के साथ हे हॉल में कदम रखा तोह अर्जुन वह पहले हे खाने का सामान सजा चूका था. कांच के बर्तन में रायता, छोले, भरवा बैंगन, पुलाव, palak-paneer, सलाद, पापड़, चटनी के साथ हे 8 लोगो के लिए plate-katori-chammach तक व्यवस्थित था.

"पुत्तर जी ने अकेले सब कर दिए और तुम तीनो अब नजर आ रही हो.", सरदारजी ने तीनो लड़कियों से अर्जुन की तारीफ के साथ हे उनकी शिकायत भी कर दी.

"अंकल जी अन्नू ने कल चले जाना है तोह बातें भी जरुरी है. और मुझे आंटी के साथ काम करना ाचा लगता है. सर अपना गिलास भी अब दे दीजिये, खाना तैयार है.", संधू जी शायद एक और जाम लेते लेकिन जैसे प्यार से अर्जुन ने गिलास माँगा तोह उन्होंने भी हँसते हुए आगे बढ़ा दिए.

"यह सच्ची मेरा बिबा पुत्तर है. अंदर गर्मी दे विच वि आप हे चटनी तैयार कित्ती, सलाद वि कटेया और सारा खाना सोहने तरीके नाल सजाया है. चल पुत्तर हूँ हाथ मुँह धो ले मैं टोलिया फडनी है.", अन्नू के माता जी के कहने पर अर्जुन ने रसोई में लगी टूंटी पर हे हाथ धोये और छोटे तोलिये से हाथ साफ़ करने के बाद सबके बैठने पर हे आखिर में कुर्सी ली. संयोग से अन्नू के बराबर वाली कुर्सी हे मिली. सामने चारुल, पारुल, आंटी जी के बाद संधू साहब. इस तरह हे इधर सभी बैठे थे.

"वैसे ाचा लगा तुमसे स्टेडियम के बहार परिवार में मिल कर. और ये देख कर भी के मेरे जिगरी दोस्त के परिवार में तुम्हारी भी खास एहमियत है.", संधू जी ने बात शुरू की थी अर्जुन को देख कर.

"दोस्त है अन्नू का लेकिन आता मुझसे मिलने है. कुछ हे दिनों में इतना जुड़ गई हु इस से भाई साहब की बता नहीं सकती.", अन्नू की माता जी ने अर्जुन से पहले जवाब दिए.

"सही बात कही भगवान. पुत्तर जी के परिवार से तोह पुराणी पहचान है लेकिन जबसे ये आने लगा है तोह घर का माहौल हमेशा खुश रहता है. अर्जुन यार तुझसे जलन भी होने लगती है, मेरी जननी न तेरे सामने मुझे भूल जाती है. हाहाहाहा.", सरदारजी जिंदादिल और मजाकिया इंसान थे और इसलिए अर्जुन को भी उनके यहाँ ाचा लगता था.

"बात ऐसी है अंकल जी की मुझे न आंटी जी बहोत पसंद है. 2-3 बार परांठे खाये है मैंने तोह अब अपने आप हे इधर चला आता हु जब वक़्त मिलता है. अन्नू को तोह मैंने कभी रसोई में देखा नहीं तोह इस से बात करनी अब बंद सी है.", अर्जुन ने भी मजाक में साथ दिए और अन्नू ने टेबल के निचे से उसको कोहनी मारी.

"हाहाहा.. यार ये चीज मैं बड़ी मिस करता हु. अर्जुन को सिर्फ मैंने खेल में डूबा हे देखा है लेकिन यहाँ वाला रूप इसका ज्यादा पसंद आया.", संधू जी भी खाने के साथ बातों का मजा ले रहे थे.

"कुछ भी कहो आंटी जी चटनी इस रियली अवेसमे. आपने कमाल की बनाई है.", चारुल ने 2 चम्मच चटनी और डालते हुए कहा.

"बीटा जी आप तोह कभी रसोई गए नहीं हो. वैसे चटनी अर्जुन ने बनाई है और मैंने भी इस तरह की चटनी बनाना आज इस से सीख लिए है.", चारुल के साथ पारुल भी अर्जुन को देखने लगी लेकिन अन्नू की मुस्कान जैसे बता रही थी की मेरे बॉयफ्रेंड ने शाम नाम कर ली है.

कुछ वक़्त hansi-majaak के बीच हे खाना हो गया तोह अर्जुन सबसे पहले उठ खड़ा हुआ.

"अब इजाजत दीजिये अंकल जी. दादा जी को एक घंटे का बोल कर आया था और अब तोह 11 बज गए."

"पुत्तर जी 10 मिनट देरी के लिए तोह पंडित जी कुछ नहीं कहने वाले. ज्यादा है तोह जैसे पहले तुम्हरी आंटी ने इजाजत ली थी वैसे हे अब फ़ोन कर देंगी. सबके साथ हे उठना अब.", अंकल जी बात मान कर अर्जुन बैठ गया और 5 मिनट बाद हे सब फारिग हो गए. इस बार Parul-Charul बर्तन उठा कर टेबल खली कर रही थी और अन्नू ने अर्जुन को रेतुर्न गिफ्ट देने का बोल कर अपने कमरे में आने का कहा. और वह भी पीछे चला गया.

"थैंक यू सो मच.", अन्नू ने कमरे में आते हे अर्जुन को जकड लिए. ये कशिश भरा चुम्बन ऐसा था जैसे अन्नू इस पल में दुनिया भी छोड़ दे तोह कोई शिकवा न हो. एक मिनट बाद होंठ जुड़ा हुए तोह अर्जुन खुद हे अन्नू को जकड़े खड़ा था. फिर से उन लाल अधरों का रस पीते हुए अब अन्नू के जन्नत से कूल्हों को मसलता उसमे डूबने लगा.

"बस्सस... फिर रुका नहीं जायेगा.", अन्नू ने हालत समझते हुए निर्णय लिए और कैमरा चालू करके दराज पर सही से रखने के बाद अर्जुन को अपने साथ लगा लिए. लगातार 5 बार सफ़ेद चमक से पता लगा था के अन्नू ने उतनी हे तस्वीर उन दोनों की क़ैद की थी. इनमे से 2 में वह उसके गाल और होंठ चूम रही थी. एक बार ाचे से गले मिलने के बाद अन्नू ने उसका चेहरा ठीक किआ और एक चमकदार कागज में बंद किताब जैसा उपहार उसको देते हुए साथ हे बहार आ गयी. सब लोग मीठा खा रहे थे लेकिन जो इन दोनों ने खाया था उसके सामने जैसे ये कुछ भी न था.

"जल्द आऊंगा आपसे मिलने आंटी जी. चलता हु अंकल. गूडनिघत सर. ाचा आंटी जी. अर्जुन ने चारो बड़ो के पाँव छूने के बाद Charul-Parul को भी bye कहा तोह आंटी के कहने पर अन्नू बहार तक अर्जुन को छोड़ने आई.

"याद आएगी.", अन्नू की आँखों में अपने आप हे पानी आ गया था.

"मैं तुमसे अलग तोह नहीं हु. ऐसे विदा करोगी?", अर्जुन ने दरवाजे पर ृक्क कर अन्नू के चेहरे पर हाथ रखते हुए पुछा. ना में गर्दन हिलाते हुए अन्नू ने आँखें साफ़ की और अर्जुन ने दुनिया भूलते हुए यही खड़े हुए अन्नू के हिलते होंठो पर एक छोटा सा चुम्बन कर दिए.

"ी लव यू अन्नू. हमेशा ऐसी हे रहना और हम हर वीकेंड बात करेंगे."

"ी लव यू तू. इन्तजार रहेगा तुम्हारी ईमेल का.", अन्नू उसको जाते देखने लगी और तब तक वह कड़ी रही जबतक वह गली के आखिर में पहुंचने के बाद एक बार फिर हाथ हिला न गया.

"पता नहीं था के इतना गहरा प्यार है.", पारुल भी बहार आ गई थी और देख रही थी अन्नू को गली में खड़े. देख तोह उसने चुम्बन भी लिए था और उसको ाचा लगा था दोनों को एक दूसरे की इतनी परवाह करना.

"मुझे भी कहा पता था. लेकिन सच कहु तोह ज़िन्दगी क्या है ये पता लग गया.", अन्नू के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी और पारुल के साथ वह अंदर चली आई. यहाँ अभी तक सारे लोग गप्पे लड़ा रहे थे और गुलाबजामुन का डब्बा आधा खली हो चूका था.
 
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