Incest Porn Kahani Rishta - Page 9 - SexBaba
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Incest Porn Kahani Rishta

आपका कहानी में इतनी जयादा दिलचस्पी और उसके हर पहलु को बताना एक अच्छे पाठक, विश्लेषक और समीक्षक के गुणों को दर्शाता है जो आप में कूट कूट कर भरे हुए हैं.

मैं आपसे अभी इस बारे में बहस न करते हुए बस इतना hi कंहूगी की और भी बहुत सरे संकेत हैं जो आगे चल कर पता लगेंगे. अभी बता देने से सारा मज़ा ख़तम हो जायेगा.

आपकी इस बात से मैं बिलकुल सहमत हु की पहले अतितावलोकन दर्शाया जाये बल्कि ये मुलभुत कहानी थी, लेकिन पाठको के दबाव में थोड़ा बदलना पड़ा.

अभी जिस विषय पर बात चल रही है उससे समाप्त करके वापिस अतितावलोकन पर कहानी चलेगी.

आप जैसे जागरूक पाठकों की आलोचना भी अच्छी लगाती है क्योंकि उसमे कनिह न कनिह प्रेरणा छुपी होती है

धन्यवाद
 
अपडेट 38

वो माँ की खूबसूरती में इस कदर खोया हुआ था की नाश्ते में काम और माँ की सुंदरता में जयादा खोया हुआ था और बार बार तिरछी निगहाओं से माँ को टाइट सूट में उसके कटाव और कसाव का आनंद ले रहा था. उसकी माँ जब उसको जूस देने के लिए उसकी और झुकी तू उससे माँ की चूचियों के दर्शन उसकी कमीज का गाला डीप होने की वजह से काफी अंदर तक हुए तू उसके खून में उबाल आ गया और उसका मन विचलित होने लगा की तभी उसके दोस्त का फ़ोन आ गया और उसने माँ को कहा 'आप जल्दी से तैयार हो जाओ चलना है'

उसके बाद आदित्य वंहा से निकल कर अपनी बाइक निकल कर बहार इंतज़ार कर रहा था की उसकी माँ सामने से आ रही थी तू आदित्य तू जैसे खो hi गया क्योँकि आज उसकी माँ किसी नवयौवना से काम नहीं लग रही थी और कोई नहीं कह सकता था की वो दो जवान बच्चो की माँ है. वो तू खुद एक नवयुवती लग रही थी. अगर न बताये तू कोई नहीं कह सकता था की आदित्य संध्या का बीटा है. अगर बता भी दे तू लोग या तू सच नहीं मानेंगे या मजाक hi उड़ाएंगे लेकिन कोई विश्वास नहीं करेगा. उसकी माँ आयी और बाइक पर आदित्य के कंधे पर हाथ रखकर पीछे बैठ गयी. आदित्य की तू हालत ख़राब होने लगी थी, लेकिन खुद को संयमित किया और बाइक को आगे बढ़ा दिया. बाइक चलते हुए आदित्य ने बात करना शुरू किया

आदित्य : आपको क्या कह कर परिचय करवाऊं

संध्या: कुछ भी कह सकते हो

आदित्य: माँ कहकर

संध्या: नहीं नहीं

आदित्य: तभी तू पूछ रहा हु

संध्या : जैसा पिछली बार करवाया था न की मेरी रिश्तेदार है

आदित्य: आपकी उम्र क्या बताऊँ

संध्या: जो ठीक लगे

आदित्य: आपकी असली उम्र बता देता हु

संध्या: नहीं नहीं

आदित्य: फिर बताओ

संध्या: 25 से जयादा न बताना

आदित्य: अभी तू आप बीस की hi लग रही हो

संध्या: (मुस्कराते हुए) माँ के साथ छेड़छाड़ कर रहा है

आदित्य: नहीं वो तू मैं अपनी रिश्तेदार के साथ कर रहा हु. अच्छा ये बताओ की पड़ही क्योँ छोड़नी पड़ी

संध्या: ये भी पूछा जायेगा

आदित्य: जब आप बाँटोगी की आप की उम्र 25 साल है तू दंसवी इस उम्र में क्योँ तू हर कोई पूछेगा

संध्या: तू 22 साल बता देना

आदित्य: तब भी पढाई क्योँ छोड़नी पड़ी

संध्या: मुझे तू कुछ समझ नहीं आ रहा

आदित्य: ये कह देते हैं की शादी हो गयी थी तू पढाई छोड़नी पड़ी.

संध्या: नहीं नहीं शादी नहीं बतानी

आदित्य: क्योँ नहीं बतानी

संध्या: अगर बताया की शादी हुई थी तू बहुत सरे सवाल खड़े हो जायेंगे.

आदित्य: कैसे सवाल

संध्या: शादी कब हुई. पति क्या करता है? बच्चे हैं की नहीं? हैं तू कितने हैं और कितने बड़े हैं? अब पढाई की क्या जरुरत ाँ पड़ी? पति के साथ क्योँ नहीं आयी? तुम्हारे साथ क्योँ आयी? पति ने तुम्हारे साथ रहने की इज़्ज़त कैसे दे दी?

आदित्य: ये सब तू मैंने सोचा hi नहीं

संध्या: अभी तू शुरुआत है और भी बहुत सारे प्रश्न हैं और अगर उनका जवाब देती रही तू पढाई नहीं कर पाऊँगी. इसलिए उचित होगा की मैं अपने आप को कुंवारी बताऊँ उससे बहुत सरे प्रश्न ख़तम हो जायेंगे.

आदित्य: फिर भी आपने पढाई क्योँ छोड़ी?

संध्या: कह देंगे की गाँव में स्कूल सिर्फ सांतवी तक था तू आगे कैसे पढ़ती

आदित्य: अब क्योँ पढ़ना चाहती हो

संध्या: तुमने मुझे आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया है

आदित्य: अच्छा एक बात बताओ की जब आपकी उम्र काम लिखवाई जाएगी तू आप को ठीक लगेगा की जब आपको 'तुम' या 'तू' कहकर बुलाया जायेगा

संध्या: जब मैंने सोच लिया है की मुझे दंसवी करनी है तू इन् सब बातों को सोचकर क्योँ परेशान होना

आदित्य: वो तू ठीक है लेकिन मेरे लिए तू मुश्किल हो गयी न की आप मेरी माँ हैं और मेरा दोस्त जो वंहा पर टीचर है आपको तुम बुलाएगा तू मुझे अच्छा नहीं लगेगा.

संध्या: देखो इस में बुरा मैंने की कोई बात नहीं है क्योंकि वो टीचर है तू तुम hi बुलाएगा और तुम्हे भी उससे कुछ बताने की जरुरत नहीं है और हाँ अब से तुम भी मुझे तुम कहकर hi बुलाओगे न की आप

आदित्य: मुझसे ये करना मुश्किल हो जायेगा

संध्या: अब से भूल जाओ की मैं तुम्हारी माँ हु, मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी रिश्तेदार हु

आदित्य: मैं ये तू बिलकुल नहीं भूल सकता की आप मेरी माँ हैं

संध्या: अच्छा ठीक है, घर पर माँ और बहार सिर्फ और सिर्फ रिश्तेदार, वैसे गर्लफ्रेंड भी कह सकते हो और हाँ मुझे आप नहीं बल्कि तुम hi कह कर बुलाओगे.

आदित्य: मेरे लिए ये मुश्किल हो जायेगा.

संध्या: वैसे तू कहते हो की मेरे लिए सब कुछ कर सकते हो और कल रात को तू कह रहे थे की मेरा तुम पर पूरा अधिकार है और अब इतना भी नहीं कर सकते

आदित्य: अच्छा कोशिश करूँगा.

संध्या: (थोड़ा आदित्य की तरफ झुककर उसके कान में) कोशिश नहीं बल्कि करना hi है

आदित्य: (उसको अपनी पीठ पर माँ की चूचियों का एहसास हुआ तू वो सब भूल गया) ठीक है करूँगा

संध्या कुछ और कहती वो दोनों उस जगह पंहुच गए तू वो अपने दोस्त से मिला और जब उसने संध्या को देखा तू देखता रह गया तू आदित्य ने उससे टोका और वो सब ऑफिस में चले गए और आदित्य ने अपने दोस्त जिसका नाम आनंद था से संध्या के बारे में बात की.

आनंद ने जब संध्या की जनम तिथि पूछी तू पता लगा की उसकी उम्र परीक्षा के हिसाब से जयादा है तू आदित्य ने पूछा की क्या हो सकता है. तब आनंद ने बताया की दो तरीके हैं या तू इसकी उम्र काम लिखी जाये नहीं तू 6 महीने बाद फॉर्म भरे जायेंगे उसके लिए उम्र का कोई मतलब नहीं है और ये एलिजिबल है.

आदित्य ने जब संध्या से बात की तू उसने कहा की अभी अगर परीक्षा में बैठने हो तू उसके लिए क्या करना होगा तू उसके जवाब देने से पहले आनंद ने कहा की वो सब कर लेगा लेकिन पहले उन्हें डीडे करना था. संध्या तू किसी भी कीमत पर जल्दी से जल्दी दंसवी करने के लिए आतुर थी, इसलिए बिना कुछ सोच विचार किये. उसने आनंद से कहा की इस बार hi फॉर्म भरवा दो.

आनंद ने उसका फॉर्म भरवा दिया और उसने फोटो के लिए कहा तू उनके पास नहीं था तू आनंद ने कहा की पास में दुकान है तू वंहा जाकर आप फोटो खिंचवा कर ले आएं तू काम ख़तम हो जायेगा.

आदित्य संध्या को लेकर बहार आया तू वो संध्या से कहने लगा की इस हिसाब से तू वो उससे छोटी हो जाएगी तू संध्या ने हँसते हुए कहा की अच्छा है न उससे तुम्हे मुझे तुम कहने में आसानी होगी.

आदित्य: आप समझ नहीं रही हैं इसके बाद आप की नयी पहचान हो जाएगी और फिर आप मेरी माँ नहीं हो सकती क्योँकि माँ कभी भी बेटे से छोटी नहीं हो सकती.

संध्या: अच्छा है न मैं फिर सच में hi तुम्हारी गर्लफ्रेंड लगूंगी और फिर मुझे तुम कहने में हिचकिचाना नहीं पड़ेगा

आदित्य: आप को सिर्फ एक बात समझ आ रही है लेकिन अगर आप मेरी मनो तू 6 महीने बाद अपनी असली उम्र से फॉर्म भरना आपके लिए फायदेमंद रहेगा

संध्या: अब मैंने फैसला कर लिया है की फॉर्म इसी बार hi बहुरंगी और उसके लिए हर कीमत चुकाने को तैयार हु.

आदित्य: आप समझाना क्योँ नहीं चाहती की आपका ये फैसला आपके सब रिश्तों को बदलकर रख देगा

संध्या: किन रिश्तों की बात कर रहे हो

आदित्य: पापा और आपका, बीटा और बेटी दोनों hi आपसे बड़े कैसे? आपके इस फैसले से आपके सरे रिश्ते एक hi झटके में ख़तम हो जायेंगे, इसलिए कह रहा हु की आप मेरी बात मान लो और दंसवी करने में इतनी जल्दीबाजी न दिखाए

संध्या: तुम शायद सही कह रहे हो, लेकिन एक बात बताओ की मेरा रिश्ता जिन सबसे तुमने कहा है वो मेरी उम्र से सम्बन्ध रखता है या मुझसे. अगर मेरा रिश्ता इतना कमजोर है की मेरी उम्र गलत लिखने से टूट जाता है तू अच्छा है की इतना कमजोर रिश्ता टूट hi जाये और अगर तुम्हे भी मेरे फैसले से ऐतराज है तू तुम भी मुझे अकेला छोड़ सकते हो. मैं तू वैसे भी अकेली हो चुकी हु, पति पहले hi अलग रहता है और अब पता नहीं कब वापिस आएंगे और उसका भी कुछ भरोसा नहीं है. बेटी भी काफी समय से अलग है और मुझे छोड़ कर चली गयी है, रह गए तुम तू थोड़े टाइम बाद तुम भी मुझे अकेला छोड़ कर चले जाओगे. मैं तू अकेली hi रह गयी न. ये रिश्ते मेरे लिए अब बेमानी हो गए हैं और मुझे अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करनी hi है तू उससे क्या फरक पड़ता है की मेरी पहचान पुराणी हो या नयी, वैसे भी मेरे बारे में न तू कोई जनता है और जो जानते हैं वो सब के सब दूर हो गए या होने वाले हैं.

आदित्य तू अपनी माँ के दिल का हाल सुनकर hi हिल कर रह गया और उससे अपनी माँ की बातों में सचाई नजर आने लगी और उससे समझ आया की उसकी माँ के दिल में कितना दर्द छुपा हुआ है और उससे लगने लगा की माँ के दर्द को काम किया जाना चाहिए, लेकिन कैसे?

आदित्य: अगर आप अपनी पहचान बदल लेती हो जैसा की आप छह रही हैं तू फिर ये बताओ की माकन आपके नाम है और जो भी बैंक बैलेंस है उससे कैसे लेंगी.

संध्या: तुम सही कह रहे हो. बैंक अकाउंट 20 दिन बाद सारा पैसा निकल कर बंद कर दूंगी और नै पहचान से नया अकाउंट खोल लुंगी. रही बात माकन की तू या तू उससे तुम्हारे नाम कर देती हु या उससे भी बेच दूंगी.

आदित्य: आपने लगता है की सब पहले से hi सोच रखा है

संध्या: मैंने बताया न की अब मुझे सिर्फ दंसवी hi नहीं बल्कि आगे की पढाई करके अपने ऊपर निर्भर होना है और मैं अब ये सब हर हालत में कर के रहूगी. तुम्हे मेरा साथ देना हो तू ठीक नहीं तू अब मैं अकेले hi सब करुँगी.

आदित्य: (उसका हाथ अपने हाथ में लेकर) आपने ये कैसे सोच लिया, कोई आपका साथ दे या नहीं लेकिन मैं आपका साथ कभी नहीं छोडूंगा

संध्या: (स्माइल करते हुए) यंहा पर जयादा हाथ न पकड़ो नहीं तू लोग यही कहेगे की अपनी गर्लफ्रेंड को लेकर जा रहा है

आदित्य: अब तू लगता है की आपको गर्लफ्रेंड बनाना hi पड़ेगा क्योँकि माँ तू आप ने न बनने का फैसला कर hi लिया है.

ऐसे hi नोकझोंक करते हुए वो फोटो खिंचवा कर आ गए और फॉर्म भरकर वापिस जाने लगे तू संध्या ने कहा 'आज कनिह घुमा दो और हाँ मुझे कुछ सूट भी सिलवाना हैं'

आदित्य: सिले सिलए ले लो न

संध्या: वो महंगे पड़ते हैं

आदित्य: आप दो ले लो बाकि सिल्वा लेना

संध्या ने उसकी बात मान ली और वैसे hi किया उसके बाद वो दोनों कुछ खाने के लिए एक रेस्टोरेंट में गए और वंहा पर बैठे hi थे की एक बहुत hi सुन्दर और प्यारी सी लड़की जिसने टॉप और टाइट फिटिंग जीन्स पहनी हुई थी वंहा पर आयी और उन दोनों को देखकर वो आदित्य के पास आयी

लड़की: (आदित्य को देखते हुए) Hi, आदित्य कैसे हो

आदित्य: (उसको देखकर) Hi, Shruti(uss लड़की का नाम) यंहा कैसे

श्रुति: मैं तू कुछ पैक करने आयी थी, तुम्हे देखा तू सोचा की मिल लू

आदित्य: अच्छा हु, ये मेरी रिश्तेदार हैं और इन्हे कुछ खिलने लाया था

श्रुति: मुझे तू तुम कभी लाये hi नहीं और तुम दुसरो के साथ घूमने आ जाते हो.

फिर उसने संध्या की तरफ हाथ बढ़ाया और कहा 'Hello, ी ऍम श्रुति क्लासमेट ऑफ़ आदित्य, हाउ अरे यू'

बेचारी संध्या क्या जवाब देती उससे तू समझ hi नहीं आया की क्या बोलै उसने

आदित्य ने बात को सँभालते हुए 'ये श्रुति है, मेरे साथ पढ़ती है और ये संध्या है मेरी रिश्तेदार'

श्रुति: रिलेटिव और गर्लफ्रेंड. नाउ ी अंडरस्टैंड व्हाई यू didn't ैकपेनी में एनीवेयर, बिकॉज़ ऑफ़ योर सुच ा ब्यूटीफुल गर्लफ्रेंड.

आदित्य: No, no नॉट ात आल, अस यू क्नोव तहत ी don't हैवे टाइम फॉर सुच थिंग्स. वेल यू अरे माय गुड फ्रेंड अस वेल

श्रुति: फ्रेंड, व्हेन वोउल्ड यू एक्सेप्ट में अस गर्लफ्रेंड

आदित्य हंसने लगा तू श्रुति उससे बोली 'मुझे अब समझ आयी की तुम मेरे साथ क्योँ नहीं जाते. तुम्हारी गर्लफ्रेंड है जिससे तुमने सब से छुपाया हुआ है और अकेले अकेले उसके साथ घूमते हो, चिंता न करो मैं किसी से नहीं कंहूगी'

आदित्य: ये मेरी गर्लफ्रेंड नहीं है

श्रुति: मुझे सब समझ आता है, वैसे एक बात है तुम्हारी गर्लफ्रेंड बहुत hi सुन्दर है, इससे बचा कर रखना नहीं तू पता लगेगा की तुम रिश्तेदार कहते रहे और कोई और इससे उड़ाकर ले गया.

उसकी बात सुनकर सब हंसने लगे और आदित्य के कहने पर सबने जूस पिया और श्रुति अपना पैकेट लेकर चली गयी तू वो दोनों एक दूसरे को देखकर हंसने लगे और शरारत करते हुए खाना खाया और वंहा से बहार आकर उन दोनों ने बुक्स और दूसरी जरुरी चीजों की शॉपिंग की और घर की तरफ जाने लगे.

रस्ते में संध्या जो उससे अब सत्कार बैठी थी उसने आदित्य से कहा की 'गोलगप्पे खाने हैं' आदित्य उसकी बात मानकर आगे गया लेकिन पता लगा की आज कोई भी गोलगप्पे वाला नहीं आएगा.

तब वो घर जाने लगे तू संध्या को ये बात आज फिर चुभ गयी की उससे अंग्रेजी नहीं आती तू वो थोड़ा और खिसककर आदित्य को कास लिया तू आदित्य अपनी माँ की चूचियों को फील करके आनंदित होने लगा. संध्या ने उसके कान में कहा 'मुझे जल्दी से जल्दी अंग्रेजी सीखा दो न'

आदित्य ने उससे कहा 'आप चिंता न करो, मैं आज से hi आपको सिखाऊंगा'

फिर वो घर पंहुचे तू आदित्य ने उससे कहा की वो किसी काम से बहार जा रहा है और दो तीन घंटे में आ जायेगा. संध्या उसकी बात सुनकर उद्दस होने लगी और कहने लगी 'मैंने तू सोचा था की आज मैं तुम्हारे साथ बहुत साडी बाटे करुँगी'

आदित्य ने उसके कन्धों को पकड़ कर कहा 'मैं जल्दी आऊंगा और बहुत साडी बाटे करेंगे' संध्या को पता नहीं क्या हुआ की उसने आदित्य को गले लगा लिया और उसको अपनी बांहों के घेरे में कास लिया तू आदित्य की हालत ख़राब होने लगी तू वो जल्दी से बोलै 'मैं जल्दी आऊंगा' और चला गया.

उसके जाते hi वो कुछ सोच रही थी की उसका फ़ोन बज उठा और जब उसने फ़ोन उठाया तू वो काफी देर तक फ़ोन पर बात करती रही और कोई आधा घंटे बाद इस फ़ोन से हटी तू उसके चेरे पर चिंता की लकीरे गहरी होने लगी.
 
अपडेट 39

उसके जाते hi वो कुछ सोच रही थी की उसका फ़ोन बज उठा और जब उसने फ़ोन उठाया तू वो काफी देर तक फ़ोन पर बात करती रही और कोई आधा घंटे बाद इन फ़ोन से जाती तू उसके चेरे पर चिंता की लकीरे गहरी होने लगी.

वो अपनी सोचो में hi डूबी रही और उससे वक़्त का पता hi नहीं चला और दूर बेल्ल बजी तू उसने देखा की आदित्य आया हुआ था और उसके लिए कुछ इंग्लिश सीखने की बुक्स और Ice-cream लाया था.

संध्या ने उससे कहा की वो डिनर तैयार कर देती है

माँ ने आज अपने खाने से आदित्य को दीवाना बना दिया था. रोज़ से ज्यादा खाना खाया था उसने. पुलाव और छोले तो वैसे भी आदित्य का फवौरीते खाना था. लेकिन आज तक ऐसा स्वादिष्ट खाना उसने नहीं खाया था. और खाने के आखिर में उसकी लायी हुई ice-cream. आदित्य ने सोचा अब ऐसा मजा मिला है की क्या बताऊँ, वो बहुत खुश था.

आदित्य ने खाने की तारीफ़ की“ माँ आज से मई तुम्हारा गुलाम हो गया. मैं आज बर्तन धोने में तुम्हारी मदद करूँगा.”

माँ: पहले तू माँ नहीं, संध्या और दूसरा इसकी कोई जरूरत नहीं आदित्य.

आदित्य : नहीं माँ मुझे मदद करनी है.

माँ : ठीक है. बर्तन मई धो दूंगी, तुम बस कपडे से पोछ देना लेकिन मुझे माँ नहीं संध्या बुलाओगे.

आदित्य: घर में तू माँ hi कहुगा

माँ मुस्कुरा देती है और बर्तनो की साफ़ सफाई में जुट गयी. आदित्य बगल में खड़े होकर कपडे से धोये हुए बर्तन सूखा रहा था. उसकी माँ ने बर्तन धोने के लिए चुन्नी को उत्तर कर एक तरफ रख दिया था.

अचानक आदित्य की नजर माँ की कमीज पर पड़ी. बर्तन धोने में पानी से कमीज भीग गयी थी. पारदर्शी हो गयी थी, आर पार देख सकता था आदित्य. बड़े बड़े खरबूजे जैसे मम्मी साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे थे, उनके उप्पर रूपये जितने आकर के निप्पल भी दिखाई देने लगे. हर चीज़ तो दिख रही थी. ऐसा लग रहा था की कपडे इतने पतले हो गए की फुक मारकर फायदा जा सकता है.

माँ को इसकी थोड़ी सी भी खबर नहीं. सारे बर्तन धो लेने के बाद वो आदित्य की तरफ मुड़ी तो उसको अपनी तरफ hi देखता पाया. लेकिन उसने आदित्य की नजरो का पीछा किया तो पाया की वो उसके मम्मो को घर रहा था. माँ ने झट से अपने हाथो से अपने मम्मो को छुपाने की बेकार कोशिश करने लगी.

आदित्य अचानक होश में आया. रेंज हाथ पकडे जाने पर मारे शर्म के उसका चेहरा लाल हो गया था. वो वह से ऐसे भागते हुए अपने कमरे में घुसा जैसे पीछे बहुत लगा हो.

संध्या को जब इसका आभास हुआ तू उससे भी शर्म आने लगी, लेकिन अब क्या कर सकती थी, जो होना था वो हो चूका था और वो अपने कमरे में जाकर कपडे लेकर बाथरूम में चली गयी और एक निघ्त्य पहनकर आयी और आदित्य के कमरे में नॉक करके उससे बुलाया. आदित्य बहार आया तू वो अपनी नज़रे चुरा रहा था, संध्या ने उससे कहा 'मुझे अंग्रेजी नहीं सीखनी क्या'

आदित्य: हाँ हाँ क्योँ नहीं

संध्या: मेरे कमरे में चलते हैं और मुझे मलहम भी लगा देना

आदित्य: ठीक है चलो आपके कमरे में चलते हैं.

दोनों संध्या के कमरे में आ गए तू

संध्या: क्या ऐसा हो सकता है की तुम मलहम भी लगते रहो और मुझे साथ में अंग्रेजी भी सीखते रहो

आदित्य: मुझे तू कोई परेशानी नहीं है, आप देखो की आप ये दोनों काम इक्कठे कर सकती हो की नहीं

संध्या: (संध्या बीएड पर बैठ गयी और बैठने से पहले अपनी निघ्त्य को घुटनो के ऊपर तक उठाकर) मैं कर लुंगी

आदित्य तू अपनी माँ को ऐसा करता देखकर उत्तेजित हो गया और नज़र चुराते हर मलहम ले आया और अपने हाथ पर थोड़ी सी मलहम निकलकर संध्या के घुटने की मालिश शुरू कर दी. संध्या की जांघो को देखकर उससे कुछ कुछ होने लगा लेकिन संध्या की आवाज सुनकर आनंद के गोते से बहार आता हुआ 'हाँ तू अंग्रेजी सीखने का पहला उसूल है की जो भी सोचो अंग्रेजी में सोचो, मैं आप से कुछ इशारे से पूछूंगा की ये काया है तू आपने मुझे बताना है'

संध्या : ठीक है

आदित्य: इसको अंग्रेजी में बोलो

संध्या: पता नहीं

आदित्य: ऑलराइट, अब बताओ की वो क्या है

संध्या: दरवाजा

आदित्य: नहीं दूर

संध्या: Okay

आदित्य: अब ठीक है

संध्या: No, ऑलराइट

उसकी बात सुनकर वो दोनों hi हंसने लगे और इधर आदित्य कुछ कुछ अंग्रेजी के वर्ड्स सीखता रहा और घुटने पर इस तरह से मालिश कर रहा तह जिससे संध्या की उत्तेजना को बढ़ावा मिले, ताकि उसके मुंह से सिसकारियां संकर आदित्य को मजा आ रहा था और वो उसकी खूबसूरती में खोया हुआ था. काफी देर के बाद दोनों को नींद आने लगी तू आदित्य अपने कमरे में चला गया और अब्वो दोनों सोने की तयारी कर रहे थे.

चलो इनको सोने दो और हम चलते है मोहनलाल के पास.

मोहनलाल सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन उससे रेहरहकर होटल वाले दृश्य नज़र आने लगे

मोहनलाल को पता नहीं एकदम गुस्सा आ गया और उसने बगैर कुछ सोचे एक थप्पड़ रुचिका के गाल पर चिपका दिया और वो थप्पड़ काफी जोर का था जिससे रुचिका जाकर सीधे बीएड पर गिर गयी.

रुचिका जब बीएड पर गिरी तू उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की उसके पापा कभी जिंदगी में उससे थप्पड़ भी मार सकते हैं और वो भी इतनी जोट से मारा था की उसके चेहरे पर मोहनलाल की उंगलियां तक चाप गयी थी. वो जार जार कर रोये जा रही थी.

मोहनलाल गुस्से में तू था लेकिन जैसे hi उसने रुचिका को रोटी देखा तू उससे होश आया की उसने ये क्या कर दिया, जिस बेटी को कभी डांटा तक नहीं उससे थप्पड़ मार दिया और अब उसका दिल दुखी था.

मोहनलाल ने बहुत सोचा की अब क्या करूँ और इससे कैसे मनौ लेकिन उससे कुछ समझ नहीं आ रहा था. फिर भी बड़ी हिम्मत करके वो रुचिका के पास गया और उसके सर पर हाथ रखा और अभी कुछ कहता उससे पहले hi रुचिका ने उसका हाथ झटक दिया. उसने एक बार फिर से उसके सर पर हाथ रखा तू रुचिका ने पलट कर कहा 'मारो और मारो, आप इसके आलावा कर hi क्या सकते हैं'

मोहनलाल 'बीटा, ी ऍम सॉरी'

रुचिका ने रट रट हँसाना शुरू किया 'वह बीटा! क्या बात है, कभी बीवी और कभी बीटा!'

मोहनलाल 'सॉरी, बीटा गुस्से में हो गया'

रुचिका ' बस इतना hi गुस्सा आया की एक थप्पड़ बस और गुस्सा करो और एक थप्पड़ hi क्योँ, जान hi ले लो न एक बार में, किस्सा hi ख़तम करो'

मोहनलाल 'सॉरी बीटा अब नहीं होगा'

रुचिका 'बीटा! जिस बेटी को बचपन से लेकर आज तक एक दन्त भी न पड़ी हो उससे सीधा जोरदार थप्पड़'

मोहनलाल 'बीटा, वो तुमने बात hi ऐसी कही की मुझे गुस्सा आ गया'

रुचिका सुबकते हुए 'मैंने ऐसा क्या कह दिया जो आपको इतना गुस्सा आ गया'

मोहनलाल 'तुम अपने कपडे मेरे सामने hi बदल लोगी'

रुचिका 'पत्नी और पति एक सिक्के के दो पहली होते हैं, कह कहकर मेरे दिमाग में अच्छे से बैठा दिया और उस पर अमल करने चली तू मैं गलत क्योँ, जब मैं पत्नी हु तू पति से क्या शर्म'

मोहनलाल 'तुम मेरी पत्नी नहीं बेटी हो'

रुचिका अब खिलखिलाने लगी और चेरे पर गुस्से वाले भाव लेकर 'बेटी तू मैं हु नहीं, होती तू थप्पड़ कभी नहीं मरते, क्योँकि तुम अपनी बेटी की कोई तकलीफ बर्दाश्त नहीं कर सकते. पत्नी हु यही समझ कर थप्पड़ मार दिया न की कैसी बद्तमीज़ बीवी है जिसको शर्म नहीं है अपने पति से कैसे बात की जाती है. आप क्या समझते हैं की मैं बेवकूफ हु जो आपकी बातों को समझती नहीं, पहले तू बोलते हो की मेरी बीवी को मॉडर्न होना चाहिए और जब मॉडर्न बनने की कोशिश की तू उससे अपने पैरों की जुटी बनाकर रखना चाहते हो. ऊपर से ये भी की बीटा, बीटा बोलकर बाप बनने का नाटक कर के उससे बेहला लेना चाहते हो'

मोहनलाल तू उसकी बात सुनकर hi हतप्रभ रह गया और उससे समझ नहीं आ रहा था की क्या करे और क्या न करैं और वो क्या जवाब दे. फिर भी उसने हिम्मत की और कहा 'रुचिका तुम मेरी जान से ज्यादा प्यारी बेटी हो'

रुचिका उसकी बात पूरी होने से पहले hi 'Ha....ha....ha.... जान से जयादा प्यारी, इससे बड़ा क्या झूठ होगा की उस जान से जयादा प्यारी बेटी को इतनी जोर से थप्पड़, वह!'

मोहनलाल 'बीटा गलती हो गयी, प्लीज सॉरी बीटा'

रुचिका गुस्से में 'बस अब से मुझे आप बेटी नहीं कहेगे, आपने बेटी कहने का हक़ खो दिया है'

मोहनलाल 'बेटी तू बेटी hi रहेगी न

रुचिका 'बहुत खूब, बेटी अब कभी मुझे बेटी न कहना, बेटी को बीवी बनाकर मज़े लूटना चाहते थे, मुझे क्या बेवकूफ समझा है'

मोहनलाल 'मैंने तू कभी ऐसा नहीं सोचा'

रुचिका 'मैं आपकी बीवी हु इस टूर तक और उसके बाद हमारा कोई रिश्ता नहीं समझे'

मोहनलाल 'मुझे नहीं पता था की तुम मुझे इतना गलत समझती हो, ठीक है मैं इस कमरे से चला जाता हु, तुम ख़ुशी से रहो' ये कहकर वो दरवाजे की तरफ गया और दरवाजा खोला hi था की

रुचिका 'बहुत अच्छे, आप इस कमरे से बहार जाओगे और मुझे हवालात की सैर करवाओगे क्योँकि मैं आपकी लीगल वाइफ नहीं. जब तक ये टूर ख़तम नहीं हो जाता आप सिर्फ और सिर्फ मेरे पति हो और अलग रहने की तू सोचना भी नहीं और मुझे मरने की अब सोचना भी मत'

रुचिका ये भी समझती थी की मोहनलाल खुद को रुचिका का दोषी मान रहा था. वो इन सब मामलो में थोड़ा जज्बाती था. रुचिका ने मोहनलाल से कहा 'अगर आपको इसके बाद भी जाना है तो, जा सकते हो, लेकिन आपके जाते hi मैं भी इस कमरे को छोड़ दूंगी और पता नहीं कान्हा जाउंगी'

रुचिका नहीं चाहती थी की मोहनलाल उससे एक पल के लिए भी दूर जाए. मोहनलाल की आँखों में अनिश्चितता साफ़ झलक रही थी.

मोहनलाल ने दरवाजा तुरंत अंदर से बंद कर लिया. वो वही दरवाजे से पीठ टिकाये लम्बी लम्बी साँसे ले रहा था. उसकी हालत पतली हो चली थी. काफी देर वंही खड़ा रहा और सोचता रहा की कैसे एक थप्पड़ ने उसकी जिंदगी hi बदल दी.

रुचिका ने मोहनलाल को बहुत कुछ सुना दिया था और वो जाकर बीएड पर लेत गयी और शून्य में ताकने लगी, कभी बीच बीच में उसके रोने और सुबकने की आवाजे आती रही. कभी वो उठकर बैठ जाती और फिर थोड़ी देर बाद लेत जाती और मोहनलाल ये सब देखता रहा लेकिन उसकी अब हिम्मत नहीं थी की वो अभी रुचिका को कुछ भी कहे. जब वो सो गयी और काफी देर तक बीएड पर हलचल न हुई तू वो आकर सोफे पर बैठ गया.
 
अपडेट 40

रुचिका ने मोहनलाल को बहुत कुछ सुना दिया था और वो जाकर बीएड पर लेत गयी और शून्य में ताकने लगी, कभी बीच बीच में उसके रोने और सुबकने की आवाजे आती रही. कभी वो उठकर बैठ जाती और फिर थोड़ी देर बाद लेत जाती और मोहनलाल ये सब देखता रहा लेकिन उसकी अब हिम्मत नहीं थी की वो अभी रुचिका को कुछ भी कहे. जब वो सो गयी और काफी देर तक बीएड पर हलचल न हुई तू वो आकर सोफे पर बैठ गया.

मोहनलाल सोफे पर बैठ कर सोचने लगा की उसने ऐसी कौन सी हरकत की है जिसकी वजह रुचिका के मन में ये सब उलटे ख्याल आ रहे हैं. वो पिछले दो दिन को बड़ी बारीकी से खंगालता रहा लेकिन उससे कनिह भी कोई सुराग नहीं मिला जिससे उससे लगता की उसने कोई गलती की है, हाँ ये जरूर था की गेम के वक़्त उसने रुचिका के शरीर के हर अंग को फील किया था और उसमे होंठों और उरोजों को चूमा और छठा था, लेकिन वो तू गेम की वजह से था और उसमे जयादा रुचिका के उकसाने पर किया था. उसके दिमाग़ ने कहा 'चाहते तू तुम भी थे' मन ने कहा 'चाहना और करने में ज़मीन आसमान का फरक है'. ऐसे hi सोचते हुए कब उसकी आँख लग गयी, पता hi नहीं लगा.

सुबह जब उसकी आँख खुली तू उसने देखा की रुचिका अभी भी बीएड पर लेती हुई थी और उसकी आँखे बंद थी नींद में होने के कारन उसके कपडे अस्त व्यस्त हो चुके थे. उसकी सदी ऊपर होकर घुटनो तक पहुँच गयी थी और वो एक तरफ करवट लेकर सो रही थी. उसकी नंगी चिकनी टाँगे देखकर मोहनलाल के दिल में हलचल होने लगी लेकिन रात की बात याद आते hi वो छुपकर के बाथरूम में चला गया और फ्रेश होकर और ब्रश करके वापिस कमरे में आ गया.

कुछ देर तक इंतज़ार करता रहा की रुचिका उठ जाएगी लेकिन वो तस से मास नहीं हुई. मोहनलाल को चाय पीने की तालाब हो रही थी तू उसने रिसेप्शन पर चाय के लिए बोल दिया और दूर बेल्ल बजने पर उसने पहले रुचिका पर एक चादर दाल दी ताकि कोई उसको इस अवस्था में न देख सके और फिर दूर खोलकर वेटर को अंदर आने पर वो चाय रखकर चला गया. उसके जाने के बाद उसने सोचा की अब जो होगा देखा जायेगा लेकिन रुचिका को उठा लेता हु. वो रुचिका को उठाते के मकसद से उससे आवाज देने लगा लेकिन वो तस से मास नहीं हुई.

मोहनलाल हिम्मत करके रुचिका के पास गया और उससे उठाने के लिए उसके माथे पर जैसे hi हाथ रखा तू उसको बहुत अच्चम्भा हुआ क्योँकि उसका माथा बहुत गरम था. वो रुचिका को हाथ से उसका माथा और गाल सहलाकर उठाते की कोशिश करने लगा लेकिन वो नहीं उठी. उसने रुचिका के कंधे पकड़ते हुए उससे थोड़ा सा ऊपर उठा कर उठाते की कोशिश की लेकिन वो सफल न हुआ तू उससे कमर के बल लिटा दिया, बुखार की वजह से उसकी सांसे तेज चल रही थी जिससे उसके बड़े सुडौल बूब्स ऊपर निचे हो रहे थे जैसे hi मोहनलाल की नजर उसके बूब्स पर गई उसकी नजरे वहीँ टिक गई, लेकिन वो उसके बुखार की वजह से परेशान हो गया था.

मोहनलाल अभी रुचिका के बूब्स घर hi रहा था की उसे कल की घटना याद आई जब रुचिका के बूब्स उसकी पीठ से रगड़ खा रहे थे aahhh....kitna मजा आरहा था क्या एहसास था उन मांसल गोलों की छुअन का रोंगटे खड़े हो गए थे उनके टच से और लिंग भी कैसे टाइट हो गया था वो भी तब जो वो कपड़ो में कैद थे अगर खुले होते तो....

'Chiii....main भी ये क्या सोचने लगा' मोहनलाल ने सर झटका और आगे बढ़ कर रुचिका के माथे पर गले पर हाथ रख कर देखा सच में रुचिका आग की भट्टी बानी हुई थी वो बुखार से तप रही थी तू उसने रिसेप्शन पर फ़ोन करके डॉक्टर को बुलाया.

मोहनलाल ने सूरज को भी फ़ोन करके बताया की रुचिका की हालत ख़राब है तू वो दिया के साथ उसके कमरे में आ गया और उसने दीपक को भी बता दिया था तू वो भी अवनि के साथ वंही आ गया.

अभी उन सब में कोई बात होती तू एक लेडी डॉक्टर वंहा पर आयी और उसने गेट्स से बहार जाने की रिक्वेस्ट की तू सरे गेट्स बहार आ गए. रुचिका को चेक करने लगी. दिया और अवनि भी डॉक्टर के साथ अंदर रह गयी. रुचिका की हालत देखते hi दोनों के छक्के छूट गए थे. रुचिका को बहुत तेज़ बुखार था और वो बुरी तरह से तप रही थी. डॉक्टर ने उससे चेक करने के बाद एक इंजेक्शन लगाया और कुछ देर इंतज़ार करने के लिए कहा. तभी वंहा पड़े एक लिफाफे में से कुछ दवाईयां झाँख रही थी तू डॉक्टर ने उसको उठाकर देखा की उसमे से एक पत्ते में से एक होली गायब थी, जिससे देखकर उससे हंसी भी आ गयी लेकिन चिंता भी होने लगी.

उसने कहा की रुचिका को जल्दी से हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा और देर होने पर इसकी जान को खतरा हो सकता है. दिया जल्दी से बहार गयी और हफ्ते हुए साडी बात बताई तू मोहनलाल ने डॉक्टर से पूछा तू उसने बताया की जल्दी से जल्दी हॉस्पिटल पंहुचना जरुरी है और एम्बुलेंस आने में देर हो सकती है.

सूरज ने बात सुनते hi जल्दी से ड्राइवर को गाड़ी एंट्रेंस पर लगाने के लिए कहा.

रुचिका बिलकुल पागलो की तरह हाथ पेअर पटक रही थी उसकी आंखे बंद थी और उसका सारा शरीर पसीने से भीगा हुआ था और सांसे बहुत तेज चल रही थी वो पता नहीं क्या बड़बड़ा रही थी जो समझ नहीं आरहा था लगता था जैसे उसे कोई दौरा पड़ा हो

"ऐसे खड़े खड़े क्या देख रहे हो तुम दोनों देखो न बेचारी कितनी तड़प रही है, कुछ करो" दिया रुआंसे स्वर में बोली

जब तक मैं रुचिका को निचे लेकर आता हु इसे अभी हॉस्पिटल लेकर चलना होगा" मोहनलाल ने सूरज से कहा और खुद रुचिका की तरफ लपका मोहनलाल की बात सुनकर दिया भी फुर्ती से निचे की तरफ भागी.

मोहनलाल रुचिका को हिला हिला कर उठाने की कोशिश करने लगा लेकिन वो तस से मास न हुई. मोहनलाल ने तब रुचिका को गॉड में उठाया और निचे ले आया जहाँ अब गाड़ी आ चुकी थी. मोहनलाल रुचिका को गॉड में लिए हुए hi गाड़ी में बैठ गया. साथ में सूरज और दिया भी बैठ गए और दीपक को बाद में अवनि के साथ आने के लिए बोल दिया.

थोड़ी hi देर में रुचिका हॉस्पिटल के िक में बंद थी और डॉक्टर उसका check-up कर रहे थे जबकि सरे लोग बहार खड़े हुए थे

"हे भगवन क्या हो गया मेरी प्यारी बहिन जैसी सहेली को" दिया चिंता में बोली. तभी दीपक और अवनि भी आ गए और अवनि ने कहा 'चिंता न करो कुछ नहीं होगा' और दोनों गले लग गयी. तभी एक नर्स ने उन सबसे कहा 'आप सब बैठ जाइये' उसकी बात मानकर वो सब वंहा पड़ी चेयर्स पर बैठ गए. मोहनलाल तू अपने में hi खोया था और भगवन से मन रहा था की किसी भी तरीके से उसकी जान रुचिका ठीक हो जाये.

लगभग आधा घंटा हो गया था डॉक्टर्स को check-up करते हुए सभी लोग अभी भी बरामदे में बैठे हुए थे और सभी को बहुत चिंता हो रही थी खास तौर पर दिया को क्योंकि वो रुचिका को बहुत जयादा दिल के करीब मैंने लगी थी एक दो बार उसकी नजरे मोहनलाल से मिली तो उसने उसे ऐसे देखा जैसे इस सब का जिम्मेदार वही है अगर वो रुचिका की बात मान लेता तू शायद ये सब नहीं देखना पड़ता

तभी डॉक्टर्स बहार निकले तो सभी लपक कर उनके पास पहुंचे

"क्या हुआ डॉक्टर सब ठीक तो है न" मोहनलाल ने जल्दी से पूछा

"सब ठीक है जी आपकी बीवी बिलकुल ठीक है शायद उसे हीट ज्यादा हो गई थी इसलिए दौरा पड़ा लेकिन अब सब ठीक है और जल्दी hi उससे छुट्टी भी दे देंगे हॉस्पिटल से आप चिंता न करो" एक डॉक्टर बोलै, जो उन् सब का हेड लग रहा था

"हे भगवन तेरा लाख लाख धन्यवाद्" दिया ऊपर देखते हुए बोली

"आप मेरे साथ आइये कुछ दवाइया लानी हैं मैं लिख देता हु" डॉक्टर ने मोहनलाल से कहा और अपने केबिन की तरफ बढ़ गया मोहनलाल भी उसके पीछे हो लिया.

'ये पेशेंट तुम्हारी बीवी है न' डॉक्टर ने पूछा

मोहनलाल 'हाँ'

'देखो ये बात पूछनी तू नहीं चाहिए, लेकिन सही इलाज करने के लिए कुछ बातें डॉक्टर के लिए जानना बहुत जरुरी है'

मोहनलाल 'पूछिए'

डॉक्टर 'आप ये बताइये आप दोनों की सेक्स लाइफ कितनी एक्टिव है, मतलब हफ्ते में कितनी बार सेक्स करते हो'

मोहनलाल 'जी, मैं समझा नहीं'

डॉक्टर 'देखो उसने अपने अंदर सेक्स पावर बढ़ने के लिए दवाई खाई है और उस दवाई का उल्टा असर हुआ है और अब बात ये है की दवाई के असर को ख़तम करने के लिए, अभी तू हम लोगो ने दवाई दे दी है, लेकिन जल्दी hi इसका असर फिर दिखेगा और असर इतना जयादा है की उसके दिल पर असर पद रहा है और उसकी कभी भी जान जा सकती है'

मोहनलाल 'नहीं नहीं ये नहीं हो सकता'

डॉक्टर 'अब दो तरीके हैं, या तू हम उसके शरीर से दवाई को फ्लश आउट करें, उसमे खतरा ये हैं की इस दौरान अगर दिल का दौरा पद गया तू उसको बचने में मुश्किल हो जाएगी और दूसरा आसान तरीका है की जल्दी से जल्दी उसको नेचुरल तरीके से रिलैक्स किया जाये. आप दोनों ये काम बहुत आसानी से कर सकते हैं, बस ये धयान रहे की उसका रिलैक्स होना बहुत जरुरी है, नहीं तू मैं कुछ नहीं कर पौंग'

"ji...ji हाँ" मोहनलाल ने जवाब दिया

"Hummm.......dekho दोस्त मुझे ये कहना तो नहीं चाहिए था लेकिन डॉक्टर हु तो मरीज के बारे में सब बताना तो पड़ेगा आज इसे जो दौरा पड़ा है वो इसके जिस्म में हीट बढ़ने से hi पड़ा है उसका इलाज सिर्फ और सिर्फ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने से hi हो पायेगा वर्ण इसकी ये बीमारी भड़क भी सकती है, हाँ कुछ दवाईयां लिख रहा हु जिससे इसका असर काम हो jaye"Doctor ने बताया

"जी...." मोहनलाल सिर्फ इतना hi कह पाया और डॉक्टर से दवाइयों की स्लिप लेकर बहार आगया

"क्या हुआ डॉक्टर ने कुछ और कहा क्या" सूरज और दिया ने पूछा

"na....nahii...aa...aur कुछ नहीं कहा, आप सब रुको मैं दवाइया लेकर आता हु" मोहनलाल ने कहा और बहार निकल गया लेकिन मोहनलाल के हकलाने से दिया को यकीं हो गया की जरूर डॉक्टर ने कुछ और भी कहा है और उसने सोच लिया की कैसे भी करके वो ये बात जान लेगी, लेकिन कैसे, तभी उससे लेडी डॉक्टर याद आयी और वो अवनि को लेकर उसके केबिन की तरफ चल पड़ी.

मोहनलाल मेडिकल स्टोर से दवाइया लेकर वापस आगया था लेकिन उसके मैं में यही चल रहा था की कुछ भी हो चाहे कोई कुछ भी कहे लेकिन अब वो अपने और रुचिका के बिच में रिश्ते की आड़ नहीं आने देगा वो रुचिका को ऐसे घुट घुट कर मरते नहीं देख सकता अब वो रुचिका के जिस्म की आग बुझा कर रहेगा बस एक बार हॉस्पिटल से उसकी छुट्टी हो जाये मौका मिलते hi वो रुचिका से बात करेगा इस बारे में अभी मोहनलाल ये सब सोच hi रहा था की उसके कान में सूरज की आवाज आई

"भाई साहब, दवाईयां ले आये, क्या कहा डॉक्टर ने'

मोहनलाल 'कुछ खास नहीं बस यही की उसको जिस्म की गर्मी की वजह से दौरा पड़ा है'

तभी वंहा पर दिया और अवनि भी आ गए और दोनों hi लेडी डॉक्टर से मिलकर आयी थी तू दोनों के चेरों पर बहुत hi कुटिल मुस्कान थी और वो दोनों एक साथ , 'भाई साहब ये ठीक नहीं है की आप हमारी प्यारी सी बहिन जैसी सहेली का ख्याल नहीं रख रहे. डॉक्टर ने हमें सब बता दिया है, अब आप से गुजारिश है की बाकि सब बाद में बस उस प्यारी सी गुड़िया का ख्याल रखिये.

मोहनलाल 'Okay'

फिर वो सब डॉक्टर के पास गए तू उसने कहा 'अगर आप चाहो तू पेशेंट को ले जा सकते हैं, बस मेरी कही हुई बात का खास ख्याल रखना है'

मोहनलाल ने कहा 'आप चिंता न करें, मैं ख्याल रखूँगा'

मोहनलाल ने कह तू दिया, लेकिन कैसे, ये उसकी समझ से परे था.

फिर रुचिका को डिस्चार्ज करके वो रुचिका को लेकर वापस होटल आ गए थे. रुचिका की हालत अब ठीक थी लेकिन चेहरा मुरझाया हुआ था दिया रुचिका से गले लग कर मिली थी और उसके चेहरे की मुस्कान जैसे रुचिका को दिलासा दे रही थी की अब तू चिंता मत कर. फिर दिया और अवनि ने मोहनलाल से बहार जाने के लिए कहा तू वो जाना नहीं चाहता था, लेकिन उन दोनों के ज़िद करने पर

"ोकककक...." मोहनलाल ने हताशा में कहा उसकी इच्छा नहीं थी रुचिका को इस हाल में छोड़ कर जाने की लेकिन वो दोनों भी सही कह राइ थी की अकेले में वे रुचिका से बात कर लेंगी.

मोहनलाल सूरज और दीपक के साथ बहार आ गया, वे दोनों उससे दिलासा दे रहे थे, लेकिन मोहनलाल उनकी बात पर ध्यान न देकर लगातार आने वाले वक़्त के बारे में सोचे जा रहा था की वो कैसे रुचिका से इस बारे में बात करे, वो तू उसको पहले से hi गलत समझे बैठी है.

काफी देर के बाद दिया ने फ़ोन करके सबको कमरे में बुलवाया तू रुचिका नाहा धो कर बैठी थी और नाश्ता वंही पर मंगवाया हुआ था. सब भूके थे तू कुछ कुछ खा लिया और नाश्ते के बाद वेटर आकर टेबल साफ़ कर गया. उसके बाद उन सब ने मोहनलाल और रुचिका को वंहा छोड़कर और उन्हें गुड लक बोलै और वंहा से चले गए.

उनके जाने के बाद मोहनलाल रुचिका के पास गया और उसके सर पर हाथ रखा तू रुचिका बिना कुछ सोचे मोहनलाल से चिमट गयी और कहा 'सॉरी, मुझे माफ़ कर दो, मैं पता नहीं आपको क्या क्या कह गयी'

मोहनलाल बीएड पर उसके साथ बैठ गया और उसको कहा 'सॉरी, मैंने कहा था न सॉरी और थैंक्स अपने आप को नहीं कहा जाता'

रुचिका 'मैं और आप तू अलग अलग हैं न' और वो सुबकने लगी

मोहनलाल ने उसको अपने आगोश में लेते हुए 'तुम मुझसे अलग कैसे हो सकती हो, तुम तू मेरा दूसरा पहलु हो'

रुचिका 'लेकिन आप तू कह रहे थे की मैं आपकी बेटी हु'

मोहनलाल 'बेटी भी हो, लेकिन इस वक़्त सिर्फ और सिर्फ मेरी बीवी हो, समझी' और मोहनलाल उसके कंधे को सहलाने लगा.

पहले तो मोहनलाल समझ नहीं पाया की क्या रुचिका को सब सच बताना ठीक होगा लेकिन फिर उसने सोचा की आगे उसे जो भी करना है वो रुचिका की मदद के बगैर नहीं हो सकता इसलिए रुचिका को सब सच बताना hi ठीक होगा और उसने डॉक्टर से हुई साडी बाटे रुचिका को बता दी. रुचिका को वो साडी बातें पहले hi डॉक्टर ने बता दी थी, लेकिन मोहनलाल के मुंह से सुनकर उससे एक अलग hi मज़ा आ रहा था.

मोहनलाल की बात सुनकर रुचिका भी कुछ देर सोचती रही फिर बोली "तो अब आपने क्या फैसला किया है, अब तू आप मुझे सच में बीवी मानेगा या नहीं"

"मैं तुम्हारी हालत देख कर परेशां हु रुचिका, लेकिन मैं तुम्हारे साथ ये सब कैसे कर पाउँगा" मोहनलाल झिझकते हुए बोलै

रुचिका "क्यों क्या मैं लड़की नहीं हु या फिर आप मर्द नहीं हैं जो आप मेरे साथ कुछ कर नहीं पाएंगे" रुचिका मन में खुश होते हुए बोली वो समझ गई थी की अब मोहनलाल अब उससे बीवी समझ रहा है बस थोड़ा झिझक रहा है

मोहनलाल और कुछ सोचता उसके दिमाग़ में बस एक hi बात थी की उससे रुचिका को बचाना है और ये करने के लिए सब जायज है. ये सोचते hi उसने रुचिका को अपनी बांहों में ले लिया और उसके सुडौल और कटीले बदन के घर्षण से उसका ध्यान भांग हो जाता और उसके बालो से उठती सुगंध मोहनलाल के रोम रोम में फ़ैल गयी और इस नशे में “ी लव यू, रुचिका. यू मैं थे वर्ल्ड तो में.” मोहनलाल उसके कानो के पास हलके से बोलै.
 
अपडेट 41

मोहनलाल और कुछ सोचता उसके दिमाग़ में बस एक hi बात थी की उससे रुचिका को बचाना है और ये करने के लिए सब जायज है. ये सोचते hi उसने रुचिका को अपनी बांहों में ले लिया और उसके सुडौल और कटीले बदन के घर्षण से उसका ध्यान भांग हो जाता और उसके बालो से उठती सुगंध मोहनलाल के रोम रोम में फ़ैल गयी और इस नशे में “ी लव you,Ruchika. यू मैं थे वर्ल्ड तो में.” मोहनलाल उसके कानो के पास हलके से बोलै.

रुचिका 'आप सच नहीं बोल रहे'

मोहनलाल उसकी बात सुनकर उसके चेहरे को देखकर 'क्योँ ऐसा क्यों लग रहा है तुम्हे'

रुचिका 'वो आपने मुझे इतनी जोर से थप्पड़ मारा था न, विश्वास नहीं हो रहा की आप मुझे प्यार करते हो'

मोहनलाल सोच में पद गया की क्या जवाब दे. उसने अपने ऊपर काबू रखते हुए बड़े hi प्यार से उसके कंधे को सेहला कर 'सब कुछ भूल जाओ और बस इतना याद रखो की ी लव यू और इस पल का आनंद लो'

रुचिका 'ी लव यू तू'

मोहनलाल 'सच्ची, लेकिन तुम्हे मुझसे प्यार कब हुआ'

रुचिका 'मुझे प्यार तू बहुत टाइम पहले से hi होना शुरू हो गया था, जब मेरी सहेली मुझे छेड़ा करती थी, लेकिन जब यंहा पर आने में पति पत्नी बनना पड़ा और लोगों की बातें सुनसुन कर मुझे आप से प्यार का एहसास कुछ जयादा hi गहरा होने लगा. जब सात फेरे वाली गेम में आप के साथ फेरे ले रही थी तू ऐसा लग रहा था जैसे की मेरी आपसे सही में शादी हो रही हो. उसके बाद मैं आपकी गॉड में बैठी थी तू मेरे मन में ये फीलिंग आने लगी की मैं सच में अपने पति की गोदी में एक नेवली वेद की तरह बैठी हु. आखरी गेम में जब आपने मेरे होठों को छुआ और मेरे सीने को चूमा तू मैंने खुद को आपका मान लिया'

मोहनलाल 'लेकिन तुम्हारे मन में ये सब कैसे आया जब की तुम जानती हो की तुम मेरी बेटी हो'

रुचिका 'मुझे मालूम था आप ऐसा hi कुछ कहेगे, इसलिए मैंने अपने आप को तैयार कर लिया था क्योँकि मैं बेटी होने से पहले एक लड़की हु और आप के साथ रहकर मेरी भावनाएं भड़कने लगी थी और शांत होने का नाम नहीं ले रही थी'

मोहनलाल 'तुमने वो गोलियां क्योँ खायी थी'

रुचिका 'मुझे अवनि ने बताया था की गोली खाने से भावनाएं भड़कने में मदद मिलती हैं और उससे हिम्मत भी बढ़ जाती हैं और मैं नहीं चाहती थी की मैं किसी पल कमजोर पद जॉन और मुझ पर मेरे लड़की होने से जयादा आपकी बेटी होने का विचार हावी हो जाये, इसलिए मैंने एक की बजाये दो गोलियां खा ली थी ताकि आपके और मेरे बिच बाप बेटी का रिश्ता न आ पाएं. लेकिन आप तू पापा hi बने हुए थे तू मैंने जब कपडे उतरने के लिए कहा तू आपने मुझे थप्पड़ मारा और मेरे प्यार को ठुकरा दिया'

मोहनलाल 'सॉरी मुझे पता नहीं था की मेरी रुचिका मुझसे कितना प्यार करती है, ी ऍम सॉरी की मैंने तुम्हे हर्ट किया. लेकिन एक बात बताओ तुमने ये नहीं सोचा की इससे तुम्हारी जान पर बन आएगी'

रुचिका 'मुझे बस एक hi बात सूझ रही थी की मुझे आपका प्यार पाना है, लेकिन आपने थप्पड़ मार कर मेरे अरमानो पर पानी फेर दिया और मैं आपके थप्पड़ मरने से इतना बिफर गयी की मैं अपने होशो हवस खो बैठी और मेरा मन कर रहा था की आपको उस वक़्त पकड़ कर वो सब कर लू, लेकिन पता नहीं आप इतने अच्छे हो की मेरे इतना कुछ कहने के बावजूद भी आपने मुझे एक शब्द नहीं कहा और चुपचाप खड़े रहे, जो मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था. मैं बीएड पर लेत जाती, फिर परेशान होकर उठ जाती और कई बार ऐसा करने के बाद पता नहीं क्या हुआ मुझे फिर होश hi नहीं रहा, बस होश आया तू हॉस्पिटल में. वंहा मुझे लेडी डॉक्टर ने सब बता दिया और मेरे मन में आपके लिए प्यार और बढ़ गया'

मोहनलाल ने मन में सोचा की ये लड़की तू मेरे प्यार में पागल हो चुकी है और उससे सही गलत का कुछ भी समझ नहीं आ रहा. उसने मन में सोचा 'किआ सही है किआ ग़लत ये बाद में देखा जाएगा, लेकिन इस वक़्त तू मुझे इसकी जिंदगी बचानी है और उसके लिए मैं कुछ भी कर सकता हु, ये मेरी बहुत प्यारी जान है, मैं इससे मरता हुआ नहीं देख सकता' मोहनलाल ने उससे कंधे से पकड़ कर अपनी तरफ घूमते हुए कहा 'कितना प्यार करती हो मुझसे'

रुचिका ने बैठे बैठे अपनी बाहों को खोलकर मोहनलाल को गले लगा लिया और कहा 'मेरे प्यार की को मैं माप नहीं सकती लेकिन दिल की गहराईयों से प्यार करती हु'

रुचिका ने जैसे hi उससे अपने गले लगाया तो उस ने भी रुचिका को अपने सीने से लगा लिया तू रुचिका ने मोहनलाल की पीठ पर हाथ फर्र्ना शुरू कर दिया. मोहनलाल उसके इस तरह करने से सोचने लगा की उससे रुचिका का इस तरह करना अब उतना अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन वो अपने चेहरे पर भी सब प्रदर्शित नहीं होने देना चाहता था. थोर्रि देर तक दोनों गले मिलने के बाद अलग हुए.

रुचिका 'आप क्या सोच रहे हैं'

मोहनलाल ने मन में सोचा की इस को क्या जवाब दू लेकिन प्रत्यक्ष में 'सोच रहा हु की कब रुचिका एक डैम से बड़ी हो गयी है'

रुचिका 'बड़ी तू मैं पहले hi गयी थी, लेकिन आप मेरी तरफ ध्यान hi नहीं देते थे'

मोहनलाल 'ह्म्म्मम्म' और उस की तरफ मुस्कुरा कर देखा.

रुचिका 'आप ध्यान से देखोगे तू hi पता चलेगा'

मोहनलाल ने एक झटके से अपनी गर्दन घुमा कर रुचिका की तरफ देखा तू वो उससे hi देख रही थी जब मोहनलाल ने उस की आँखों में देखा और इस तरह से देखा जैसे पूछ रहा हो की देख लू तो उस ने भी अपनी पलकें दो बार झपका कर उससे इस बात का यक़ीन करने का सबूत दिया.

मोहनलाल “तू तू तुम ये कह रही हो की मैं तुम्हे अच्छे से देखु'

'कुछ देर के लिए भूल जाएं की आप मेरे पापा हैं और मैं आप का बेटी' रुचिका ने उन का हाथ पकड़ते हुए कहा.

मोहनलाल 'लेकिन….'

रुचिका 'लेकिन वेकिन कुछ नहीं' और उसने अपने हाथ से मोहनलाल के हाथ को सहलाना शुरू कर दिया.

मोहनलाल ने सोचा की ऐसा क्या करूँ, वो अपनी सोचो में गम था की तभी उससे एक आईडिया सुझा और उसने रुचिका से कहा 'शेक लोगी, मेरा दिल कर रहा है की मैं अपनी जान के साथ शेक का आनंद लू, अगर इच्छा हो तू मंगाए'

रुचिका 'नेकी और पूछ पूछ, लेकिन मुझे तू आइसक्रीम शेक चाहिए और साथ में चेररिएस और कुछ ड्राई फ्रूट्स'

मोहनलाल ने उसके हाथ की उँगलियों में अपनी उंगलियां कास कर कहा 'क्या बात है मेरी जान तू बहुत अच्छे मूड में है'

रुचिका 'आप खुश हैं तू मेरा मूड क्योँ नहीं अच्छा होगा'

मोहनलाल ने उससे बीएड पर बैठे रहने का कह कर फ़ोन पर आर्डर किया तू रुचिका उससे बड़े प्यार से देख रही थी और मन hi मन आने वाले पालो के बारे में सोच सोच कर खुश हो रही थी. लेकिन उसके मन में एक भय भी था. वो अभी सोच hi रही थी की मोहनलाल आर्डर करने के बाद बाथरूम चला गया और वंहा पर देर लगने के कारन रुचिका बेचैन होने लगी तू उसने आवाज दी की 'अब आ जाओ न, कितनी देर लगाओगे'

मोहनलाल जब बहार आया तभी दूर बेल्ल बजी और वेटर आर्डर रखकर चला गया.

उसके जाने के बाद मोहनलाल रुचिका के पास गया और कहने लगा 'आ जाओ सोफे पर बैठनेगे'

रुचिका ने अपनी बांहे फैलाकर आँखों से इशारा करके मोहनलाल को उससे उठाने के लिए कहा तू मोहनलाल रुचिका पर झुककर धीरे से अपने हाथ की उँगलियों को रुचिका की कमर से टच किया. मोहनलाल के हाथ की उँगलियाँ जैसे hi रुचिका की कमर से टच हुई तू वो गर्दन गुमा कर मोहनलाल की तरफ हो गयी और गहरी गहरी साँसे लेने लगी जिससे उसके बूब्स ऊपर नीचे होने लगे. मोहनलाल उस की तरफ नहीं देख रहा था जबकि रुचिका लगातार उसको देखे जा रही थी.

मोहनलाल ने अपना दूसरा हाथ उसके सर के नीचे से उसके कंधे पर ले गया और जिस हाथ से कमर को छू रहा था उस हाथ को उसकी टांगों के पास ले जाकर हाथ को टांगों के नीचे से निकलकर उससे उठाने के लिए झुका तू उसका मुंह रुचिका के बूब्स के इतना करीब आ गया की उसकी साँसे रुचिका को अपने जिस्म पर महसूस हो रही थी जिससे उससे नशा चढ़ने लगा.

मोहनलाल ने उससे अपने हाथों में उठा लिया तू रुचिका ने अपनी बांहे मोहनलाल के गले में दाल दी जिससे उसके बूब्स मोहनलाल की छथि में दबने लगे तू रुचिका को सरूर आने लगा. उसका मन कर रहा था की वो अपने बूब्स को मोहनलाल की चाहती से रगड़ दे, लेकिन शर्म से उसने ऐसा नहीं किया.

मोहनलाल उसको लेकर सोफे के पास आकर उससे सोफे पर बैठने लगा तू उसने अपनी बांहों का जो घेरा गले माँ था अपने हाथों को मोहनलाल की पीठ पर लेजाकर उन्हें आपस में ाचे से अपनी उँगलियों का लॉक करके उससे कास लिया और उससे अलग नहीं होने का इशारा किया. रुचिका के पेअर तू सोफे पर थे और उसका शरीर मोहनलाल के ऊपर लढा हुआ था.

मोहनलाल ने उससे अपने ऊपर से अलग करना चाहा तू वो और जयादा चिपक गयी तू मोहनलाल ने उसके चेहरे को एक हाथ से ऊपर उठाकर उसकी आँखों में झांककर उससे इशारे में सोफे पर बैठने के लिए कहा लेकिन उसने अपना सर हिलाकर इंकार कर दिया. मोहनलाल ने उससे फिर से बांहों में उठाकर खुद सोफे पर बैठ गया और उसको अपनी गॉड में hi बैठा लिया.

इस वक़्त रुचिका ने एक सूट पहना हुआ था जो वो मोहनलाल के साथ खरीद कर लायी थी. वो सूट लॉन्ग स्लीवलेस था जिसमे पेट के नीचे जाकर स्लिट था जिससे सूट के दोनों स्लिट दांये बांये हो जाते थे और पेट का निचला हिस्सा दिखने लगता था और नीचे पलाज़्ज़ो (जो पाजामे जैसा होता है और उसमे एड़ियों की तरफ काफी खुला होता है) पहना हुआ था. जब उसको मोहनलाल ने अपनी गॉड में बैठा लिया तू उसके पेअर सोफे के ऊपर थे और बैठने से उसके गले से कमीज थोड़ी नीचे हो गयी जिससे उसके दूधिया बूब्स का काफी सारा हिस्सा उजागर हो गया.

मोहनलाल ने उससे कहा 'क्योँ सोफे पर नहीं बैठना' तू रुचिका ने कुटिल मुस्कान से जवाब दिया 'जब सोफे से भी अच्छी जगह मिल रही हो तू सोफे पर क्योँ बैठना'

उसकी बात सुनकर मोहनलाल को भी हंसी आने लगी, लेकिन अपनी हंसी को रोकते हुए उसने रुचिका से शेक पीने के लिए कहा तू उसने कहा की 'आज तू आप hi मुझे पिलाओगे'. तब मोहनलाल ने हाथ बढ़ा कर शेक लेना चाहा तू वो टेबल पर दूर था तू उसने रुचिका से लेने के लिए कहा तू उसने मन कर दिया. मोहनलाल ने अपने आप को थोड़ा सा सोफे से उठाया तू रुचिका नीचे की तरफ झुकाने लगी तू उसको एक हाथ से पीठ से पकड़ कर अपनी तरफ घुमा लिया जिससे वो मोहनलाल से बिलकुल चिपट गयी और मोहनलाल ने हाथ बढाकर पहले टेबल को अपनी तरफ खींचा, फिर उस पर राखी ट्रे को अपनी तरफ करके शेक का गिलास उठा लिया. लेकिन इस सब में रुचिका को मोहनलाल के शरीर के हिरशन से उसको सरूर आने लगा और दिल की धड़कन बढ़ने लगी.

मोहनलाल ने शेक उठाकर उससे रुचिका के मुंह की तरफ ले गया तू रुचिका ने पहले तू मोहनलाल को लेने के लिए कहा लेकिन मोहनलाल के जिद करने पर उसने एक सिप लिया और उसमे जो ice-cream तैर रही थी उससे भी अपनी जीभ से चाट लिया और गिलास को मोहनलाल की तरफ बढ़ा दिया तू मोहनलाल ने भी एक सिप लिया और फिर रुचिका की तरफ बढ़ाया तू उसने गिलास को घुमक्कड़ उस तरफ से सिप लिया जंहा से मोहनलाल ने सिप किया तू मोहनलाल मुस्करा दिया. ऐसे hi करते करते गिलास में से शेक ख़तम हो गया तू रुचिका ने बोलै की आपके लिए तू बचा hi नहीं है.

मोहनलाल ने अपने एक हाथ से रुचिका के चेहरे को पकड़ा और उसकी आँखों में देखते हुए अपने चेहरे को उसके चेहरे के नजदीक ले जाते हुए उसके होठों के पास अपने होंठों को रखकर उसके मुंह से बाह रहा शेक चाटने लगा तू उसके होंठों के स्पर्श से रुचिका के दिलो दिमाग में झनझनात उत्तपन होने लगी और उसके अरमान भड़कने लगे. मोहनलाल ने मन में सोचा की यही मौका है उसकी भावनाओं को और चिंगारी देने का ताकि उसकी उत्तेजना अपने चरम पर पंहुचे. इस सोच से मोहनलाल ने अपने होंठों को बहुत hi धीमी गति से उसके होठों के आस पास फिरने लगा जिससे उसको झुरझुरी होने लगी और वो मोहनलाल के और नजदीक आने लगी.

मोहनलाल ने अपना दूसरा हाथ उसकी टांगों के नीचे से निकल कर कमर पर ले जाकर हलके से रख दिया तू रुचिका के लिए ये दोहरा प्रहार था. इस प्रहार को गति देने के लिए अब मोहनलाल धीरे धीरे पहले अपना हाथ की एक ऊँगली उसकी कमर पर घूमने लगा जिससे उसकी झुरझुरी बढ़ने लगी. उधर वो अपने होठों को उसके होठों से दूर ले जाने लगा लेकिन गालों से होठों को नहीं हटाया, ऐसा लग रहा था जैसे की वो धीरे धीरे अपने होंठों को उसके गलो पर रगड़ रहा हो. जब वो अपने होठों को उसके होठों से दूर ले जा रहा था तू रुचिका का मन कर रहा था की मोहनलाल उसके होठों को अपने होठों में कैद कर ले, लेकिन मोहनलाल तू उसको तड़पना चाहता था इसलिए जब भी रुचिका अपने होठों को उसके होठों से चुआने की कोशिश करती वो उससे नाकामयाब कर देता जिससे उसकी उत्तेजना और बढ़ जाती.

इस उत्तेजना को और आग देने के लिए मोहनलाल ने जिस उंगली से उसको चढ़ रहा था उससे कुछ पल के लिए शांत कर दिया तू ऐसा लग रहा था की रुचिका इससे परेशान हो गयी और अपनी कमर को खुद hi हिलने लगी लेकिन मोहनलाल ने अपने हाथ को उसकी कमर पर सिथिर कर लिया. जब देखा की रुचिका अपने मनसूबे में कामयाब नहीं हो पायी और उसने कमर हिलना बंद कर दिया तू मोहनलाल ने दूसरी उंगली को उसकी कमर पर फेरना शुरू कर दिया तू रुचिका के मुंह से सिसकारी निकली तू इसको और जयादा आग देने के लिए उसकी कमर पर अब उस उंगली के नाख़ून से धीरे धीरे कुरेदने लगा जो रुचिका के लिए गुदगुदी पैदा करने वाला था और उसने अपने हाथ को मोहनलाल के सर के पीछे लेजाकर उसके सर को अपने चेहरे पर दबाने लगी.

मोहनलाल ने अपने होठों को थोड़ा पीछे ले जाना चाहा तू रुचिका के हाथ का दबाव सर पर बढ़ने लगा ताकि मोहनलाल अपने चेहरे को पीछे न ले जा पाए तू मोहनलाल ने उसके गलों पर हल्का सा काट लिया जिससे एक झटके में वो अपना चेहरा पीछे ले गयी हुए फिर उसी क्षण आगे होकर उसने भी मोहनलाल के होठों पर अपने होठों को रखकर उसके होठों पर जीभ फिरते हुए उसके होठों के पास काट लिया और चेहरे को पीछे लेजाकर हंसने लगी और ऐसा लग रहा था की जैसे उसने काटने का बदला ले लिया हो.

मोहनलाल चाहता तू उसका बदला ले सकता था, लेकिन इस वक़्त उसके दिमाग़ में बस एक hi बात बैठी हुई थी की रुचिका को रिलैक्स करवाना है. मोहनलाल ने अपने हाथ जो उसकी कमर पर रखा हुआ था उसने अपनी साडी उँगलियों को रुचिका की कमर पर फरने लगा तू रुचिका को इससे सिरहन होने लगी और उसने अपने एक हाथ की उंगलियां मोहनलाल के घुटने पे रख ली और फिर धीरे धीरे वो उनको फेरने लगी जिससे मोहनलाल की भी उत्तेजना बढ़ने लगी. लेकिन मोहनलाल ने उसके ऐसा करने पर भी अपना हाथ उस की कमर से नहीं हटाया और धीरे धीरे उस की कमर को सहलाने लगा.

धीरे धीरे मोहनलाल की हिम्मत भड़ती गयी और जैसे जैसे उसकी हिम्मत में इज़ाफ़ा होता गया उसका हाथ वैसे वैसे उस की कमर से अपने हाथ को नीचे उसके नितम्बों के पास ले जाने लगा. जब उसका हाथ उस की सलवार के जोड़ से टकराया तो उसने अपने हाथ को और नीचे ले जाना ठीक नहीं समझा और वंही रुक गया और कमीज के ऊपर से सहलाने लगा.

मोहनलाल के हाथ के साथ साथ उसके होठों ने भी अपना काम चालू रखा और उसके गालों से उसके होठों ने ठोढ़ी के निचले हिस्से को छुआ तू रुचिका हिल कर रह गयी और उसने हाथ से मोहनलाल के घुटने को बहुत जोर से कास लिया जिससे उससे पता लगा की रुचिका का जोश बढ़ता जा रहा है और मोहनलाल को इसी जोश का फायदा उठाना था. उसने अपने होठों को उसके चेहरे पर गलों और गर्दन को मिलाने वाली लाइन पर ठोढ़ी से कान की तरफ धीरे धीरे होठों को ठोढ़ी से कान की तरफ ले जाने लगा लेकिन इतने धीरे की रुचिका की प्यास बढ़ती जाये. उसके मुंह से सिसकारियां फूटने लगी और उसकी सिसकारियों को बढ़ावा देने के लिए मोहनलाल ने अपना हाथ जो रुचिका की कमर पर था उसको भी सलवार के जोड़ के आसपास फिरता रहा और उसके खून की गति को बढ़ता गया जिससे उसकी साँसें बहुत तेज हो गयी थी और उसकी गरम गरम साँसे मोहनलाल अपने चेहरे पर महसूस कर रहा था. रुचिका भी जोश में उसके सर और घुटने पर अपने हाथ का दबाव बढ़ा रही थी.

रुचिका की कमर पे हाथ फिरते फिरते मोहनलाल का लिंग भी सख्त होना शुरू हो गया था जो रुचिका की कमर से लग रहा था. शायद इस बात का रुचिका को भी अंदाज़ा हो गया था इस लिए वो थोड़ा सा पीछे हो गई. मोहनलाल ने अपने आप को उसी पोजीशन में रखा. वो पीछे तो हो गई लेकिन उसकी गोदी से नहीं उठी और न hi अब उसकी तरफ देख रही थी. वो शरण रही थी. फिर थोड़ी देर बाद पीछे होकर फिर से आगे हो गई और मोहनलाल के सीने में मुंह छुपाने लगी तू मोहनलाल ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए उसके बालों में उँगलियों को चलना शुरू कर दिया जिससे रुचिका के दिल की धड़कन बढ़ने लगी और वो अपने हाथों को मोहनलाल की छथि पर लेजाकर उससे सहलाने लगी तू मोहनलाल ने उसके चेहरे पर आये बालों को पीछे करके उसके गलों को चूमा तू उसकी साँसों की गति फिर बढ़ने लग गयी तू मोहनलाल ने उसके गलों से अपने होठों को थोड़ा सा गर्दन की तरफ ले गया तू उसके मुंह से बड़ी hi अजीब सी आवाजे निकलने लगी और उसकी उत्तेजना को और भड़काने के लिए अपनी जीभ निकलकर उसकी गर्दन पर जैसे hi चलायी तू रुचिका से बर्दाश्त करना मुश्किल होने लगा और उसने अपने आप बदन को पूरा का पूरा मोहनलाल के बदन से रगड़ने लगी.

मोहनलाल के शरीर से उसके शरीर के हिरशन ने मोहनलाल के लिंग को फिर से सख्त करना शुरू कर दिया और इसका आभास रुचिका को हो गया लेकिन इस बार वो पीछे नहीं हुई बल्कि और जयादा मोहनलाल से चिपक गयी क्योँकि उसको ऐसा लग रहा था की जैसे उसकी योनि में अब चीटियां चलने लगी हो और बो लम्बी लम्बी साँसे लेने लगी और अपने हाथों को मोहनलाल के कन्धों को जोर से ऐसे पकड़ लिया की मोहनलाल उससे अलग न हो, उसके बूब्स मोहनलाल को उसस्के गले लगाने से रुचिका के दोनों बूब्स मोहनलाल के सीने में घूसस्ते हुए महसूस हुए. रुचिका आसानी से मोहनलाल की बाँहों में समां गई उस का जिस्म बोहत lachak-daar था और उसका हाथ उसकी lachak-daar कमर पर सलवार के जोड़ के पास घूम रहा था की तभी रुचिका की कमीज मोहनलाल के गले लगने से एक तरफ हो गयी तू उसका पेट थोड़ा सा नग्न हो गया और जैसे hi उसके नंगे शरीर पर मोहनलाल की उँगलियों का स्पर्श हुआ तू उसका शरीर झटके खाने लगा. रुचिका को लगने लगा की उसकी योनि में कुछ चल रहा है.

मोहनलाल ने उसको बांहों में भरकर दो तरफा अटैक करना शूरा कर दिया. वो नीचे अपने हाथ की उँगलियों को उसके नंगे हिस्से पर सलवार के जोड़ के साथ साथ अपने हाथ को कमर से धीरे धीरे पेट की तरफ लता और जैसे hi पेट की तरफ आने लगता तू वो मोहनलाल से इस तरह चिमटने लगती की अपने आप को उँगलियों के स्पर्श की वजह से पैदा हुई सिहरन से बच सके, लेकिन जैसे hi चिमटती तू मोहनलाल का सख्त लिंग पेंट के अंदर से hi उसके पेट को स्पर्श करने लगता तू उस एहसास से बचने के लिए वो पीछे जाना चाहती तू मोहनलाल की उँगलियों का दबाव उससे ऐसा करने से रोकता. फिर भी जैसे hi थोड़ा सा पीछे होने के लिए जगह बनती तू मोहनलाल की उंगलियां कमर से पेट पर आने की कोशिश कर रही थी और जैसे hi उसके नग्न पेट को छुआ तू उसका शरीर हिचकोले कहने लगा और वो अब मोहनलाल से आगे पीछे होने की बजाये ऊपर नीचे होने लगी.

मोहनलाल ने अपने होंठों को अपनी hi बेटी की गर्दन पर रख दिए और आहिस्ता आहिस्ता चूमते चूमते रुचिका के कानो तक आ गया और कान के पास पंहुच कर जैसे hi कान के निचले हिस्से को अपनी जीभ की नोक से छुआ तू रुचिका के लिए बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल हो गया और वो मोहनलाल के शरीर पर पहले से hi ऊपर नीचे हो रही थी तू मोहनलाल के लिंग का एहसास उससे पेट और योनि प्रदेश पर होने लगा था और फिर कानो के निचले हिस्से पर मोहनलाल की जीभ की चुहान से वो उत्तेजने के चरम पर पंहुच गयी और उसकी योनि से रिसाव होना शुरू हो गया और रुचिका आनद के सागर में गोते कहते हुए मोहनलाल के होठों को अपने होठों की कैद में लेकर अपने शरीर को उसके शरीर से रगड़ते हुए शांत होकर उसको बुरी तरह से चिमट गयी तू मोहनलाल ने भी उसको अपनी बांहों में कसकर उससे सुकून देने लगा.
 
अपडेट 42

मोहनलाल ने अपने होंठों को अपनी hi बेटी की गर्दन पर रख दिए और आहिस्ता आहिस्ता चूमते चूमते रुचिका के कानो तक आ गया और कान के पास पंहुच कर जैसे hi कान के निचले हिस्से को अपनी जीभ की नोक से छुआ तू रुचिका के लिए बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल हो गया और वो मोहनलाल के शरीर पर पहले से hi ऊपर नीचे हो रही थी तू मोहनलाल के लिंग का एहसास उससे पेट और योनि प्रदेश पर होने लगा था और फिर कानो के निचले हिस्से पर मोहनलाल की जीभ की चुहान से वो उत्तेजने के चरम पर पंहुच गयी और उसकी योनि से रिसाव होना शुरू हो गया और रुचिका आनद के सागर में गोते कहते हुए मोहनलाल के होठों को अपने होठों की कैद में लेकर अपने शरीर को उसके शरीर से रगड़ते हुए शांत होकर उसको बुरी तरह से चिमट गयी तू मोहनलाल ने भी उसको अपनी बांहों में कसकर उससे सुकून देने लगा.

काफी देर तक रुचिका मोहनलाल से लिपटी रही और उसके होठों ने मोहनलाल के होठों को जकड़ा हुआ था. जब वो थोड़ा संभाली तू उसने अपने होठों को मोहनलाल के होठों से आज़ाद किया और अपने आप को मोहनलाल से अलग करने की सोची. अभी तक जो कुछ भी हुआ था, अब उससे शर्म आने लगी थी. वो मोहनलाल के शरीर से अलग होने लगी तू मोहनलाल ने उससे अपने आगोश में लेकर उससे अच्छे से भींचते हुए उसकी कमर को अपने हाथों से सहलाने लगा.

रुचिका की हिम्मत नहीं हो रही थी की वो मोहनलाल से आँख मिला सके. जब मोहनलाल की पकड़ थोड़ी सी ढीली हुई तू रुचिका ने उसके सीने पर हाथ रखकर आँखे नीचे करके फिर से उठाने की कोशिश की और जैसे hi थोड़ा ऊपर हुई तू मोहनलाल ने उसको फिर से पकड़ कर अपनी बांहों में भरकर जकड लिया और अपने हाथों को उसकी पीठ पर ऊपर की तरफ ले जाने लगा तू रुचिका की हालत ख़राब होने लगी क्योँकि उसकी योनि से इतना रिसाव हुआ था की पैंटी तू पैंटी, सलवार भी गीली हो गयी थी. रुचिका को गीलेपन के एहसास से बहुत परेशानी हो रही थी, इसलिए उसने धीरे से अपना चेहरा उसके सीने में छुपाये हुए बस इतना hi कहा 'बाथरूम जाना है'

मोहनलाल समझ तू गया था लेकिन वो उसकी कामाग्नि को अभी भड़काए रखना चाहता था, इसलिए उसने उससे छोड़ने की बजाये और जयादा कसकर 'नहीं अभी नहीं' और अपने हाथों को और ऊपर लेजाकर उसके कन्धों को पकड़ लिया तू उसके बाजु जो रुचिका की बाजुओं के नीचे से जा रहे थे वो उसके बूब्स को भी दबा रहे थे तू रुचिका की भावनाएं फिर से भड़कने लगी, लेकिन अपने ऊपर नियंत्रण करते हुए 'प्लीज बाथरूम जाना है' मोहनलाल ने फिर से ना करके कहा तू रुचिका ने बड़ी मासूमियत वाली शकल बनाकर 'बस दो मिनट में आ जाउंगी' तू मोहनलाल ने कहा 'ठीक है'.

इतना कहने पर रुचिका मोहनलाल के ऊपर से उठी तू देखा की उसकी सलवार इतनी गीला हो गयी थी की उसका गीलेपन मोहनलाल की पेंट पर भी असर दाल गया था, जिससे देखकर उससे शर्म आने लगी. वो जैसे hi कड़ी होकर जाने लगी तू मोहनलाल ने उसका बांया हाथ पकड़ कर एक झटके में उससे अपने ऊपर गिरा दिया तू रुचिका को समझ hi नहीं आया की क्या हुआ, लेकिन मोहनलाल ने उसके गलों को चुम कर कहा 'कान्हा छोड़कर जा रही है मेरी जान' रुचिका ने भी अपने होठों को मोहनलाल के गलों से रगड़ते हुए 'आपको छोड़कर कनिह नहीं जा रही, बस फ्रेश होकर आ रही हु' और वो फिर से मोहनलाल से अलग होने लगी तू मोहलाल के हाथ उसके नंगे बाजुओं पर फिसलते हुए अलग हो गए और रुचिका बाथरूम में चली गयी, लेकिन इस सब में उसकी साँसें बहुत तेज़ चल रही थी.

रुचिका के बाथरूम जाते hi मोहन लाल ने किसी को फ़ोन किया और काफी देर बात करता रहा. बात करने के बाद वह काफी संतुष्ट लग रहा था और सोच रहा था की अब तक जो हुआ है वो सब ठीक था या गलत?

बाथरूम में जाने के बाद सबसे पहले अपनी उखड़ी हुई साँसों को नियंत्रित करने लगी और जैसे hi उसने सामने लगे आईने में देखा तू अपनी हालत देखकर उससे शर्म आने लगी की ये उसने क्या कर डाला. उसकी लिपस्टिक फैली हुई थी, कपडे मुचड़े हुए थे, गाल कुछ जयादा hi लाल हो गए थे. उसने सबसे पहले अपनी सलवार उतरी और फिर पैंटी और उसको देखकर कुछ जयादा hi शर्म आने लगी लेकिन उसके मन में एक आनंद का भी एहसास था. वो वंहा पर एक ऊँची चौकी पर बैठ गयी और अपनी योनि को पानी से साफ़ करने लगी तू उससे बहुत अच्छा लगने लगा. वो बार बार और पानी डालती और पानी डालने से योनि की सेंसिटिव स्किन पर पड़ते hi उससे एक गुदगुदी का अनुभव होता जिससे उसका मन आनंदित हो जाता. उससे इतना मज़ा आने लगा की उसने अब पानी के साथ साथ अपनी ऊँगली से भी अपनी योनि को कुरेदने लगी. वो जैसे जैसे अपनी योनि को कुरेदने लगी तू उसकी उत्तेजना और बढ़ने लगी तू वो उंगली को गोल गोल घूमने लगी तू उससे और मज़ा आने लगा.

रुचिका की साँसे फिर से उखाड़ने लगी लेकिन उसको इतना मज़ा आ रहा था की उसका मन कर रहा था की और करे और करती जाये क्यूंकि ऐसा करने से उसका आनंद बढ़ता जा रहा था. रुचिका अपने एक हाथ से अपनी योनि के दोनों लबों को फैलाकर अंदर की तरफ अपनी उँगलियों को चलकर अपने आप को सुकून देने लगी और अपने दूसरे हाथ को अपने बूब पैर ले जाकर सहलाने लगी. धीरे धीरे मस्ती मस्ती बढ़ने लगी और जैसे जैसे मस्ती बढाती गई उसके हाथ की उँगलियों ने योनि के लबों मैं घूमने की गति बढ़ गई और ऊँगली ने भागन्स को जैसे hi चूहा तो उसकी उत्तेजना चरम पैर पहुँच गई. जैसे hi वह चरण पैर पहुँचाने वाली थी अपने बूब को सहलाने की बजाये उससे अब जोर जोर से मसलने लगी. फ़ी वह वक़्त भी आया जब उसकी उत्तेजना अपने चार्म को पार कर गयी और उसकी योनि से कॉमर्स की नदी बहाने लगी और रुचिका आनंद के सागर में भाटी चली गयी और उससे ऐसा लग रहा था की जैसे अब उसमे जान hi नहीं बची है.

रुचिका बहुत देर तक उस चौकी पैर बैठी रही और अपनी पीठ को दीवार से टेक लगा ली. जब वो थोड़ा संभाली तू उसका ध्यान अपनी योनि की तरफ गया जंहा पर उसका कॉमर्स बह चूका था और कहीं कहीं सूखने से उसके निशान पद गए थे. उसने पानी से मॉल मॉल कर धोया और धो कर साफ़ किया तू उससे थोड़ा आराम मिला. अब समस्या ये थी की उसकी सलवार और पैंटी ख़राब हो चुकी थी और वो सोच रही थी की बहार कैसे जाये. फिर उससे याद आया की उसका एक सूट बाथरूम में टेंगा हुआ था तू उसने उसकी सलवार उतरी और पहनने के लिए जैसे hi तंग डालने लगी तू उससे चाकर आने लगा तू वो फिर से चौकी पैर बैठ गई और बैठे बैठे hi सलवार पहनने लगी और पहनने के बाद थोड़ी देर के लिए वंही बैठी रही. जब उसे लगा की अब उठ सकती है तू हिम्मत करके कड़ी हो गई और वाश बेसिन पैर जाकर अपने चेहरे को साफ़ किया. तौलिये से पहुँचने के बाद भी उसे अपना चेहरा मुरझाया हुआ लग रहा था तो उसने एक बार फिर से अपने चेहरे को धोया और साफ़ करने के बाद उसने बहार जाने की सोची लेकिन उसकी हिम्मत जवाब दे गयी और वह चौकी पैर फिर बैठ गयी.

चौकी पैर बैठकर वह सोच रही थी क्या जो हुआ ठीक हुआ. उसके मन में विचार आ रहा था की क्या उससे अपने पापा के साथ ऐसा करना चाहिए था. अब जब बहार जाएगी तू उसके पापा उसके साथ कैसा बर्ताव करेंगे और क्या अब वह उनका साथ वो सब कर पायेगी. ये सोचते सोचते वो कड़ी हो गयी और बड़ी हिम्मत करके बाथरूम से बहार आ गयी.

जब वो बाथरूम से बहार आयी तू उसने मोहनलाल की तरफ देखा लेकिन वो उसकी तरफ ध्यान न देकर अपनी सोचो में गम था. रुचिका ने रहत की सांस ली और बीएड की तरफ जाकर वंहा पर बैठ गयी

मोहनलाल ने जब नज़र उठाई तू देखा की रुचिका बीएड पर उदास सी बैठी हुई है तू उसने पूछा 'क्या हुआ तबियत तो ठीक है न'

रुचिका 'शरीर में बहुत कमजोरी लग रही है'

मोहनलाल 'हॉस्पिटल से आयी हो तू कमजोरी तो आणि hi थी. अब तुम दवाई खाओ और आराम कर लो'

रुचिका 'लेकिन...'

मोहनलाल 'लेकिन वेकिन कुछ नहीं, बस दवाई खाओ और सो जाओ'
 
अपडेट 43

मोहनलाल 'हॉस्पिटल से आयी हो तू कमजोरी तो आणि hi थी. अब तुम दवाई खाओ और आराम कर लो'

रुचिका 'लेकिन...'

मोहनलाल 'लेकिन वेकिन कुछ नहीं, बस दवाई खाओ और सो जाओ'

रुचिका कुछ कहना चाहती थी, लेकिन उसकी हिम्मत साथ नहीं दे रही थी इसलिए उसने चुपचाप दवाई खाई और बीएड पैर लेट गई. लेटने के बाद उसने मोहनलाल से कहा 'आप भी आ जाइये न' मोहनलाल ने कहा 'तुम आराम करो मैं ऐसे hi ठीक हूँ'

रुचिका ने मोहनलाल से लेटने की ज़िद की जिससे वो ताल नहीं पाया और रुचिका के बगल में लेट गया. रुचिका ने करवट बदली और मोहन लाल की तरफ हो गई और मोहनलाल से कहने लगी 'मुझे आपकी बाजु पैर लेटना है'

मोहनलाल ने अपने हाथ को रुचिका के सर निचे से निकलकर उससे अपने कंधे पर ले लिया तू रुचिका ने अपना एक हाथ मोहनलाल की छाती पर रख लिया और मोहनलाल की तरफ करवट ले ली, जिससे रुचिका का बूब मोहनलाल की छाती में डाब गया.

मोहनलाल भी थोड़ा सा उसकी तरफ मुद गया और अपना दूसरा हाथ उसके सर पर रख कर उसके सर में अपने हाथ की उँगलियों से धीरे धीरे सहलाने लगा जिससे रुचिका को बहुत अच्छा लग रहा था. मोहनलाल का जो हाथ उसके सर के नीचे था उससे वो रुचिका की पीठ पर ले गया और उसकी पीठ को हलके हलके सहलाने लगा, जिससे रुचिका थोड़ी देर में गहरी नींद में चली गयी. रुचिका एक तरह से मोहनलाल से गले लग कर सो रही थी और उसका ऊपर का शरीर पूरा का पूरा मोहनलाल के आगोश में था. रुचिका का सीना, मोहनलाल की छाती में और वो उसके बूब्स को बड़े अच्छे से फील कर रहा था और जैसे hi वो सांस लेती थी उसके बूब्स ऊपर नीचे होकर मोहनलाल की छाती से रगड़ खा कर उसकी भावनाओं को जागृत कर रहे थी.

रुचिका की गरम गरम साँसे मोहनलाल के चेहरे पर पद रही थी जो उसकी सोई हुई इच्छाओं को जगाने का काम कर रही थी. उसका नरम नरम पेट मोहनलाल के पेट से ऐसे चिपका हुआ था जैसे की दो शरीरों में कोई फरक hi न हो. रुचिका का मुलायम और चिकनी बांह उसकी बाजु से होते हुए उसकी पीठ तक पंहुच रही थी और उसकी बांह की चिकनाहट मोहनलाल की उत्तेजना में वृद्धि करने का कारन थी और उसका मासूम सा चेहरा अपनी तरफ लालायित कर रहा था की मुझे चुम लो. इन सब बातों से मोहनलाल का रकत परवाह बढ़ना कोई बड़ी बात नहीं थी और जैसे जैसे रक्त परवाह बढ़ रहा था तू उसके मन में बहुत सरे विचार आ रहे थे और वो बहुत कुछ करना चाहता था, लेकिन वो रुचिका को परेशान भी नहीं करना चाहता था.

अब ये दो विपरीत बातें एक साथ तू संभव नहीं थी, इसलिए वो बिना हिले डुले बस रुचिका के साथ लेता रहा. वो उससे देखना चाहता था, लेकिन संभव नहीं था, क्योँकि देखने के लिए हिलना डुलना पड़ता. वो इस वक़्त सिर्फ और सिर्फ रुचिका को महसूस कर रहा था और आँखें बंद करके मन में महसूस करने की सोचकर उसने अपनी आँखें बंद कर ली. उसने जैसे hi आँखे बंद की तो उसे रुचिका दिखाई देने लगी. कभी वो रुचिका को बेटी के रूप में देखता और कभी उसे पत्नी दिखाई देने लगती. जब वो रुचिका को इन् दो रूपों में देखता तो उससे समझ नहीं आ रहा था की वह उसकी बेटी है hi या बीवी है. इसमें कोई दो राइ नहीं थी की वो उसे बहुत प्यार करता था लेकिन उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था की वो उसे बेटी के रूप में ज्यादा प्यार करता है या बीवी के रूप में. कभी उसे लगता की वह उसे बेटी ज्यादा मंटा है और कभी यह लगता की अब वह उसे बेटी से ज्यादा अपनी बीवी मैंने लगा है. जैसे hi वह यह सोचता की रुचिका उसकी बीवी की तरह है तो उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कारने लगती की वह उस नादाँ का नाजायज फायदा उठा रहा है. दूसरे hi पल उसके मन में आता की मैं क्या करून ये लड़की तू मेरे पीछे hi पद गयी है. उसकी अंतरात्मा हंस देती और उससे कहती की 'इच्छा खुद की और इलज़ाम उस नादान पर. वो नासमझ है, लेकिन तुम नहीं, तुम्हे सब पता है. पता होते हुए तुम जान बुझ कर उसके सामने ऐसे मौके पैदा करते हो जिसमे वो बेचारी फंसती जाये और इतना hi नहीं, उससे इस तरह फंसा रहे हो जैसे की ये सब तुम उसके कहने पर कर रहे हो'

मोहनलाल ये सब सोच सोच कर थक गया था, वैसे भी कल रात भी ढंग से नहीं सो पाया था और आज भी हॉस्पिटल से आने के बाद आराम नहीं किया था तू वो भी नींद के आगोश में पंहुच गया.

रात को एक बार रुचिका की नींद खुली तू उसने देखा की वो अपने पापा के आगोश में थी. वो अपने दांये करवट अपने पापा के कंधे पर थी, उसका चेहरा पापा की गर्दन के पास उनके सीने पर था. उसकी एक टांग अपने पापा के ऊपर थी जिससे देखकर उससे शर्म आने लगी और उसने वो टांग बहुत hi धीरे से अपने पापा के ऊपर से हटाकर नीचे की और उठाने की कोशिश करने लगी लेकिन कामयाब न हो पायी क्योँकि उसकी पीठ पर पापा का जो हाथ था उसने उससे एक तरह से जकड रखा था और वो अपने पापा की छाती से लगी हुई थी.

उसने सोचा की 'क्या करूँ, अगर जोर लगाती हु तू पापा उठ सकते, जो ठीक नहीं है, एक बार फिर से कोशिश करके देखती हु' और उसने अपने हाथ को पीठ पर ले जाकर अपने पापा के हाथ को हटाने की कोशिश की तू हाथ तू नहीं हटा, लेकिन उसके पापा जो सीधे लेते हुए थे, अपनी बांयी तरफ हो गए और उसके पापा का दांया हाथ उन दोनों के पेट के बीच आ गया. रुचिका को बहुत जोर की प्यास लगी हुई थी और उससे पानी पीने के बहुत तीव्र इच्छा हो रही थी. अब पानी या तू उसकी साइड टेबल पर था या उसके पापा की साइड टेबल पर. अब अगर वो अपनी साइड टेबल से पानी लेती है hi तो उसे अपने पापा का हाथ अपनी पीठ से हटाना पड़ेगा. वो अपने पापा के हाथ को हटाने की कोशिश कर चुकी थी और वो कामयाब नहीं हुई थी, और अब दुबारा कोशिश करती तू पूरी सम्भावना थी की उसके पापा उठ जाएँ, जो वो नहीं चाहती थी.

उसने सोचा की पापा की साइड टेबल से पानी का गिलास उठा कर पि लेती हु. यह करने के लिए उसने अपने आप को थोड़ा सा ऊपर उठाया और पापा के ऊपर से होकर साइड टेबल पर रखे गिलास को उठा लिया. गिलास तो उठा लिया लेकिन यह सब करने में उसके बूब्स पापा के चेहरे पैर पहुँच गए और बूब्स के बिच की घाटी पर पापा का मुंह आ गया. उसके पापा का हाथ जो पेट पैर था उसके ऊपर उठने से उसका हाथ रगड़ खता हुआ उसकी नाभि और नाभि से निचे उसके योनि प्रदेश पैर पहुँच गया और उसकी योनि के लबो को चुने लगा. उसके पापा का जो हाथ उसकी पीठ पर था वो रगड़ खता हुआ उसके नितम्बों प् पंहुच गया. इन् सब बातों ने मिलकर रुचिका को एकदम से उत्तेजित कर दिया और उसकी साँसें धोकनी की तरह चलने लगी जिससे उसके बूब्स ऊपर नीचे होने लगे और ऐसा लग रहा था की वो अपने बूब्स को बरी बरी से मोहनलाल से चुसवा रही हो और मजे में दबाव सांस के साथ काम जयादा हो रहा हो. इस क्रिया ने रुचिका की कामाग्नि में घी का काम करना शुरू कर दिया.

रुचिका ने जल्दी से पानी पिया और गिलास को वापिस वंही टेबल पर रखकर नीचे होने की सोची तू कई सरे काम एक साथ हुए. पहला जब वो नीचे होने लगी तू उसके सूट मोहनलाल से रगड़ खाने लगा जिससे रुचिका के बूब्स का बहुत सारा हिस्सा नंगा हो गया. दूसरा नीचे होने से जो हाथ पीठ से नितम्ब पर पंहुच गया था उसकी ऊँगली कमीज में फंस गयी और रुचिका के नीचे होने से वो उंगली में फंसा होने की वजह से ऊपर होने लगा और रुचिका की पीठ को नंगा करने लगा. तीसरा सामने वाला हाथ जो योनि प्रदेश पर था वो रुचिका के नीचे होने से टांगों के बीच से निकलकर पीछे की तरफ जाने लगा और जाते जाते हाथ की उंगलयां योनि के लबो को अच्छी तरह से रगड़ती हुई पीछे की तरफ जाने लगी. रुचिका की इन् सबसे हालत ख़राब होने लगी और वो इतनी उत्तेजित हो गयी की योनि ने कॉमर्स की कुछ बुँदे उगल दी.
 
यू लिकेड आईटी एंड एंजोयेड गिवेस में सटिस्फैक्शन एंड एनर्जी तो व्रिठे बेटर एंड बेटर. बूत यू शुड अंडरस्टैंड ओने थिंग तहत राइटिंग गुड स्टोरी ओने नीड्स तो थिंक ा लोट एंड एडिट मान्य ा टाइम्स व्हिच रेक्विरेस लॉट्स ऑफ़ पेशेंस एंड एनर्जी तो दो सो. सो बेयर विथ में अस मान्य टाइम्स ा पर्टिकुलर अपडेट नीड्स मोरे टाइम थान सम ऑफ़ थे इतर उपदटेस.

ी शुड पर्सनली थैंक यू फॉर प्रोवाइडिंग सुच ा ब्यूटीफुल रिव्यु फॉर एव्री अपडेट विथाउट फ़ैल व्हिच प्रोविडेंस विवसत्य फॉर दोंग बेटर थान एअरलिएर.

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वेल, आईटी इस नॉट फादर डॉटर स्टोरी. बोथ पेयर्स हैवे थेइर स्पेसिफिक रोल्स एंड वोउल्ड फंड इक्वल स्पेस अस आल थे चरक्टेर्स अरे इन लीड रोले. It's ओनली फॉर थे टाइम बीइंग थे स्टोरी इस इन फ्लैशबैक एंड मोहनलाल एंड रुचिका फाइंडिंग मोरे स्पेस.

हैवे पेशेंस एंड यू वोउल्ड हैवे थे देसिरद फन.

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अपडेट 44

रुचिका ने जल्दी से पानी पिया और गिलास को वापिस वंही टेबल पर रखकर नीचे होने की सोची तू कई सरे काम एक साथ हुए. पहला जब वो नीचे होने लगी तू उसके सूट मोहनलाल से रगड़ खाने लगा जिससे रुचिका के बूब्स का बहुत सारा हिस्सा नंगा हो गया. दूसरा नीचे होने से जो हाथ पीठ से नितम्ब पर पंहुच गया था उसकी ऊँगली कमीज में फंस गयी और रुचिका के नीचे होने से वो उंगली में फंसा होने की वजह से ऊपर होने लगा और रुचिका की पीठ को नंगा करने लगा. तीसरा सामने वाला हाथ जो योनि प्रदेश पर था वो रुचिका के नीचे होने से टांगों के बीच से निकलकर पीछे की तरफ जाने लगा और जाते जाते हाथ की उंगलयां योनि के लबो को अच्छी तरह से रगड़ती हुई पीछे की तरफ जाने लगी. रुचिका की इन् सबसे हालत ख़राब होने लगी और वो इतनी उत्तेजित हो गयी की योनि ने कॉमर्स की कुछ बुँदे उगल दी.

रुचिका की सांस बहुत तेज़ चल रही थी और अपनी योनि पर पापा के हाथ के एहसास ने hi उसके रक्त परवाह को इतना बढ़ा दिया था की उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी और वो अपने आप hi आगे पीछे होकर उसके हाथ को अपनी योनि पर रगड़ने लगी. उसको इसमें बहुत hi जयादा आनंद आने लगा और कई बार तू ऐसा हुआ की आगे पीछे होने से उसके पापा के हाथ का अंगूठा उसकी योनि के लबो में सलवार के ऊपर से hi अंदर हो जाता जिससे उसकी कामाग्नि इतनी बढ़ गयी की एक बार फिर से चरमोत्कर्ष पर पंहुच कर उसकी योनि ने कॉमर्स छोड़ दिया तू वो अपने पापा से लिपट गयी और थोड़ी देर में उससे फिर से नींद आ गयी.

सुबह जब मोहनलाल की आँख खुली तू देखा की उसका एक हाथ रुचिका की टैंगो के बीच है और दूसरा उसके सर से होता हुआ उसकी पीठ पर है तू उसने धीरे से अपने हाथ को उसकी टांगों से निकलने लगा तू उसकी उँगलियों ने रुचिका के योनि प्रदेश को कुरेदा तू वह इतना उत्तेजित हो गया की उसका लिंग एकदम से तन गया और रुचिका के पेट पर ठोककर मरने वाला था तू मोहनलाल तिरछा होकर उसके पेट से दूर हो गया. अब मोहनलाल का दूसरा हाथ जो रुचिका की पीठ पर था उससे फील हुआ को उसकी उँगलियों ने रुचिका की नंगी त्वचा को छुआ तू उसकी उत्तेजना में उबाल आया लेकिन वो अभी रुचिका के साथ चाहते हुए भी कुछ भी नहीं करना चाहता था. उसने अपनी बाजु को थोड़ा सा बीएड से उठाकर दूसरे हाथ से तकिये को उसके सर के नीचे किया और फिर धीरे धीरे अपनी बाजु को उसकी गर्दन के नीचे ले गया. रुचिका की गर्दन और बीएड के बीच थोड़ा सा गैप बन गया था क्योँकि उसके सर के नीचे अब तकिया आ गया था तू मोहनलाल ने बहुत hi आराम से अपनी बाजु को निकल लिया और रुचिका पर एक चादर दाल दी और खुद बाथरूम में चला गया.

बाथरूम में जाकर वो फ्रेश हुआ और नहाकर बाथरोब पहनकर बहार आ गया. रुचिका अभी गहरी नींद में थी तू उसने अपने कपडे बदल लिए और तैयार हो गया. उसके बाद खुद hi वंहा पर केतली में पानी गरम करके चाय बनाई और पीने लगा और रुचिका के बारे में सोचने लगा तू कभी उसके मुख पर ख़ुशी की झलक होती और कभी वो चिंता में दुब जाता.

कुछ देर के बाद रुचिका की नींद खुली तू उसने देखा की वो अकेली सो रही है तू एक झटके से उठकर बैठ गयी और जब सामने मोहनलाल को बैठे देखा तू उसकी जान में जान आयी. वो उठकर आयी और मोहनलाल को 'गुड मॉर्निंग' विश किया और पूछा की 'आप कब उठ गए' तू उसने बताया की वो काफी देर से उठा हुआ है और तैयार भी हो चूका है. रुचिका ने उससे कहा 'आप मुझे भी उठा देते'

मोहनलाल 'तुम थकी हुई थी और अभी कमजोरी भी है तू मैंने तुम्हे डिस्टर्ब नहीं किया, चलो अब जल्दी से तैयार हो जाओ, डॉक्टर के पास जाना है और वापिस आकर पैकिंग भी करनी है'

रुचिका 'क्या पैकिंग करनी है?'

मोहनलाल 'हाँ हमें आज hi निकलना है'

रुचिका उसकी बात सुनकर थोड़ा सा उदास हो गयी और वो बिना कुछ कहे बैग में से कपडे निकलकर बाथरूम में चली गयी. वो अपने पापा की बात सुनकर बहुत भावुक हो गयी थी और उससे लगने लगा की उसका सपना अब ख़तम होने वाला है. वो ब्रश करके जब नहाने के लिए कपडे उत्तर दिए तू उससे अपनी योनि के आसपास कुछ कुछ सूखा हुआ लग रहा था तू उससे रात वाली बात याद आने लगी और वो उसको याद करके खुश भी हो रही थी और शर्मा भी रही थी. फिर वो दुबारा उदास हो गयी ये सोच कर की उससे अब वापिस जाना है और फिर से पुराणी जिंदगी में लौटना है.

वो नहाकर अपने कपडे पहनकर बहार आ गयी और अब थोड़ी सी खिली हुई थी उसका चेहरा कल की तरह मुरझाया हुआ नहीं था लेकिन उदासी साफ़ साफ़ झलक रही थी.

मोहनलाल ने रुचिका को देखकर पूछा की 'ब्रेकफास्ट करने चले' तू रुचिका ने वंही मंगवाने के लिए कहा.

दोनों ने ब्रेकफास्ट किया लेकिन कुछ जयादा बातचीत नहीं हो रही थी और ब्रेकफास्ट करने के बाद वो दोनों हॉस्पिटल चले गए और रुचिका के टेस्ट्स हुए और दो घंटे बाद आने के लिए कहा गया. वे दोनों एक मॉल में गए और मोहनलाल ने रुचिका से कहा की जो मन हो ले लो, लेकिन रुचिका तू इतना परेशान हो चुकी थी की उसका किसी भी चीज़ में मन नहीं लग रहा था. रुचिका ने कहा 'मुझे कुछ नहीं चाहिए' तू मोहनलाल उससे एक गारमेंट्स की दुकान पर ले गया और कहा 'जो पसंद हो ले लो' लेकिन उसने कुछ नहीं लिया तू मोहनलाल ने कुछ सूट, साड़ियां और कुछ पेंट शर्ट भी लिए और कई अलग अलग तरह के पैकेट बनवाये जो रुचिका को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था और उसके बाद वो वंहा से हॉस्पिटल चले गए.

रुचिका की टेस्ट रिपोर्ट रिपोर्ट आ गई थी डॉक्टर ने उन्हें अपने केबिन में बुलाकर बताया की 'अब वह खतरे से बहार है लेकिन मैं आप दोनों से एक बात करूँगा आप दोनों जवान है और सेठमाण्ड हैं आप दोनों को कहीं किसी भी सप्लीमेंट की जरुरत नहीं है. मुझे कहना तो नहीं चाहिए लेकिन डॉक्टर होने के नाते कहना पद रहा है की आप दोनों एक दूसरे को खुश रखें और मिल कर रहें. आप दोनों को ये भी बता दू की नियमित शारीरिक सम्बन्ध से जंहा ख़ुशी मिलती है वंही कई बीमारियों से छुटकारा भी पाया जा सकता है, इसलिए आप दोनों इससे अपने जीवन का एक अहम् हिस्सा बनाये लेकिन बिना किसी सप्लीमेंट के, नहीं तू जान पर बन जाएगी.' वो दोनों डॉक्टर को सिर्फ 'जी' कहकर उसका बिल चूका कर वापिस होटल आ गए.

वो दोनों होटल आये और वेटर को बोलकर पैकेट्स रूम में भिजवा दिए और लंच करने के लिए दिंनिंग हॉल में आये जंहा पर सूरज, दिया, दीपक और अवनि उनका इंतज़ार कर रहे थे. सबने लंच किया और लंच के दौरान दिया और अवनि ने रुचिका को खूब छेड़ा. लंच के बाद सब को एक हॉल में बुलाया गया जंहा पर सबका थैंक्स किया गया और फीडबैक लिया गया.

वापिस रूम में आकर पैकिंग की और जाने के लिए तैयार हुए hi थे की सूरज और दीपक भी अपनी पत्नियों के साथ वहीं आ गए. सबने वंहा पर जूस पिया और मोहनलाल ने जाने से पहले दिया और अवनि को एक एक पैकेट पकड़ाया तू उन्होंने कहा की ये क्या है तू मोहनलाल ने कहा की 'चुप करके रख लो' तू दिया ने कहा 'भाई साहब आप हर बार दांत देते हैं'. मोहनलाल ने कहा 'प्यार से hi डांटता हु' जिससे सुनकर सब हंस दिए. फिर वो सब गले मिले और ागी मिलाने का वादा करके मोहनलाल और रुचिका टैक्सी से स्टेशन पंहुच गए और ट्रैन का इंतज़ार करने लगे, लेकिन दोनों hi चुप थे. ट्रैन आयी तू इस बार भी उनकी बुकिंग एक कूप में थी और उन्होंने अपने आप को कूप में एडजस्ट कर लिया और दरवाज़ा अंदर से लॉक कर लिया. थोड़ी देर बाद तट आया और टिकट चेक करके चला गया.

उन दोनों में पिछले कई घंटो से कोई बात नहीं हो रही थी, दोनों hi अपनी सोचो में गम थे, रात होने लगी थी और डिनर भी आ गया.

मोहनलाल से रुचिका की उदासी देखि नहीं जा रही थी तू उसने एक ग्राही में सब्जी लेकर रुचिका की तरफ बढ़ाया तू उसने मोहनलाल की तरफ देखा तू उसने आँखों के इशारे से उससे लेने के लिए कहा तू उसने ले लिया लेकिन उसकी आँखों में नमी आ गयी. रुचिका ने भी वैसा hi किया और फिर दोनों एक दूसरे को खिलते रहे और डिनर के दौरान भी उन्होंने एक शब्द नहीं बोलै सिर्फ आँखों से hi बात करते रहे. उन्होंने कॉफ़ी भी पि लेकिन कोई बात नहीं.

थोड़ी देर बाद मोहनलाल ने रुचिका से कहा 'तैयार हो जाओ, हमारा स्टेशन 10 मिनट में आने वाला है' तू रुचिका ने कहा 'जी' और चुप हो गयी.

मोहनलाल ने फिर रुचिका से कहा 'देखो अब हमारा टूर खत्तम होनर वाला है तू स्टेशन से निकलकर तुम सिर्फ और सिर्फ मेरी बेटी होगी और मैं तुम्हारा पापा'

रुचिका 'ठीक है, जैसा आप कहो लेकिन इन् यादों का मैं क्या करूँ'

मोहनलाल 'इन् यादों को एक सपना समझकर भूलना होगा'

रुचिका 'कहना आसान है लेकिन करना बहुत मुश्किल'

मोहनलाल 'अब आसान हो या मुश्किल, करना तू पड़ेगा hi न'

रुचिका 'हर मर्द यही कहता है क्योंकि मर्द के लिए भूलना आसान होता है, लेकिन महिला के लिए नहीं'

मोहनलाल 'बीटा इस बहस में पड़ने की क्या जरुरत है'

रुचिका 'नहीं अभी बीटा नहीं, बिलकुल भी नहीं, अभी हमारा टूर खत्तम नहीं हुआ है'

मोहनलाल 'अब क्या रह गया 5-7 मिनट में हम पंहुच hi जायेंगे'

रुचिका '5-7 मिनट हैं न, वही बहुत है, काम से काम अपनी पत्नी से बिछड़ने से पहले एक हुग तू बनता hi है न' और रुचिका ने अपनी बांहे खोल दी.

मोहनलाल उसकी बात को ताल नहीं सका और उसने भी बांहे खोलकर रुचिका को अपनी बांहों में ले लिया तू रुचिका को ऐसा लगा जैसे की सरे जंहा की दौलत उससे मिल गयी हो. रुचिका ने मोहनलाल को इतनी जोर से कास लिया की ऐसा लगा जैसे की रुचिका के बूब्स मोहनलाल की छाती में एक तरह से कुचले गए हो. उसने अपने हाथ उसकी

पीठ पर लेजाकर इस तरह कास लिया जैसे वो कभी छोड़ेगी hi नहीं. उसके इस तरह करने से मोहनलाल जिसने मन में अपनी इच्छाओं को दबाया हुआ था उन्होंने बगावत कर दी और मोहनलाल को भी अपने हाथों को रुचिका की पीठ पर ले जाना पड़ा और वो उसकी पीठ को सहलाने लगा.

उसके इस तरह करने से रुचिका को नशा चने लगा और उसने अपने होठों को मोहनलाल की गर्दन पर रखकर उन्हें हलके हलके चूमने लगी और अपने हाथों से मोहनलाल को अपनी तरफ खींचते हुए अपने हाथों को उसकी पीठ पर ऊपर नीचे करने लगी और मोहनलाल की भावनाएं इतनी भड़क गयी की उसका रक्त संचार उसके लिंग की तरफ बढ़ने लगा और उसकी सलामी रुचिका के पेट पर पड़ने लगी. रुचिका को जैसे hi इसका एहसास हुआ तू उसने दो काम एक साथ किये एक तू उसके होठों ने गर्दन पर जोर से काट लिया और दूसरा उसके हाथ जो पीठ पर थे, उन हाथों के नाखूनों ने मोहनलाल की पीठ को घायल करने में कोई कसार नहीं छोड़ी, वो तू मोहनलाल की स्किन बहुत hi सख्त है और मोहनलाल में सहने की क्षमता भी काफी है तू उससे कुछ नहीं हुआ लेकिन उसने भी रुचिका को कसकर अपने गाल उसके गालों से रगड़ डेल. तभी दरवाजे पर नॉक हुआ तू वो दोनों अलग हुए तू वेटर ने बताया की स्टेशन आने वाला है तू मोहनलाल ने उससे अच्छी खासी टिप दी और उसके जाने के बाद मोहनलाल ने रुचिका को एक बार फिर से गले लगाकर उसके माथे को चूमते हुए 'गुड टूर' और रुचिका ने उससे थैंक्स कहा.

उसके बाद वो स्टेटों पर पंहुचकर टैक्सी से घर आ गए. टैक्सी में दोनों बहुत hi करीब बैठे थे और उनकी टंगे आपस में रगड़ खा रही थी. घर पंहुचकर रुचिका अपनी माँ से मिलकर और अपने को थका हुआ बोलकर अपने रूम में चली गयी और मोहनलाल संध्या के साथ अपने रूम में आ गया.
 
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