अपडेट 40
रुचिका ने मोहनलाल को बहुत कुछ सुना दिया था और वो जाकर बीएड पर लेत गयी और शून्य में ताकने लगी, कभी बीच बीच में उसके रोने और सुबकने की आवाजे आती रही. कभी वो उठकर बैठ जाती और फिर थोड़ी देर बाद लेत जाती और मोहनलाल ये सब देखता रहा लेकिन उसकी अब हिम्मत नहीं थी की वो अभी रुचिका को कुछ भी कहे. जब वो सो गयी और काफी देर तक बीएड पर हलचल न हुई तू वो आकर सोफे पर बैठ गया.
मोहनलाल सोफे पर बैठ कर सोचने लगा की उसने ऐसी कौन सी हरकत की है जिसकी वजह रुचिका के मन में ये सब उलटे ख्याल आ रहे हैं. वो पिछले दो दिन को बड़ी बारीकी से खंगालता रहा लेकिन उससे कनिह भी कोई सुराग नहीं मिला जिससे उससे लगता की उसने कोई गलती की है, हाँ ये जरूर था की गेम के वक़्त उसने रुचिका के शरीर के हर अंग को फील किया था और उसमे होंठों और उरोजों को चूमा और छठा था, लेकिन वो तू गेम की वजह से था और उसमे जयादा रुचिका के उकसाने पर किया था. उसके दिमाग़ ने कहा 'चाहते तू तुम भी थे' मन ने कहा 'चाहना और करने में ज़मीन आसमान का फरक है'. ऐसे hi सोचते हुए कब उसकी आँख लग गयी, पता hi नहीं लगा.
सुबह जब उसकी आँख खुली तू उसने देखा की रुचिका अभी भी बीएड पर लेती हुई थी और उसकी आँखे बंद थी नींद में होने के कारन उसके कपडे अस्त व्यस्त हो चुके थे. उसकी सदी ऊपर होकर घुटनो तक पहुँच गयी थी और वो एक तरफ करवट लेकर सो रही थी. उसकी नंगी चिकनी टाँगे देखकर मोहनलाल के दिल में हलचल होने लगी लेकिन रात की बात याद आते hi वो छुपकर के बाथरूम में चला गया और फ्रेश होकर और ब्रश करके वापिस कमरे में आ गया.
कुछ देर तक इंतज़ार करता रहा की रुचिका उठ जाएगी लेकिन वो तस से मास नहीं हुई. मोहनलाल को चाय पीने की तालाब हो रही थी तू उसने रिसेप्शन पर चाय के लिए बोल दिया और दूर बेल्ल बजने पर उसने पहले रुचिका पर एक चादर दाल दी ताकि कोई उसको इस अवस्था में न देख सके और फिर दूर खोलकर वेटर को अंदर आने पर वो चाय रखकर चला गया. उसके जाने के बाद उसने सोचा की अब जो होगा देखा जायेगा लेकिन रुचिका को उठा लेता हु. वो रुचिका को उठाते के मकसद से उससे आवाज देने लगा लेकिन वो तस से मास नहीं हुई.
मोहनलाल हिम्मत करके रुचिका के पास गया और उससे उठाने के लिए उसके माथे पर जैसे hi हाथ रखा तू उसको बहुत अच्चम्भा हुआ क्योँकि उसका माथा बहुत गरम था. वो रुचिका को हाथ से उसका माथा और गाल सहलाकर उठाते की कोशिश करने लगा लेकिन वो नहीं उठी. उसने रुचिका के कंधे पकड़ते हुए उससे थोड़ा सा ऊपर उठा कर उठाते की कोशिश की लेकिन वो सफल न हुआ तू उससे कमर के बल लिटा दिया, बुखार की वजह से उसकी सांसे तेज चल रही थी जिससे उसके बड़े सुडौल बूब्स ऊपर निचे हो रहे थे जैसे hi मोहनलाल की नजर उसके बूब्स पर गई उसकी नजरे वहीँ टिक गई, लेकिन वो उसके बुखार की वजह से परेशान हो गया था.
मोहनलाल अभी रुचिका के बूब्स घर hi रहा था की उसे कल की घटना याद आई जब रुचिका के बूब्स उसकी पीठ से रगड़ खा रहे थे aahhh....kitna मजा आरहा था क्या एहसास था उन मांसल गोलों की छुअन का रोंगटे खड़े हो गए थे उनके टच से और लिंग भी कैसे टाइट हो गया था वो भी तब जो वो कपड़ो में कैद थे अगर खुले होते तो....
'Chiii....main भी ये क्या सोचने लगा' मोहनलाल ने सर झटका और आगे बढ़ कर रुचिका के माथे पर गले पर हाथ रख कर देखा सच में रुचिका आग की भट्टी बानी हुई थी वो बुखार से तप रही थी तू उसने रिसेप्शन पर फ़ोन करके डॉक्टर को बुलाया.
मोहनलाल ने सूरज को भी फ़ोन करके बताया की रुचिका की हालत ख़राब है तू वो दिया के साथ उसके कमरे में आ गया और उसने दीपक को भी बता दिया था तू वो भी अवनि के साथ वंही आ गया.
अभी उन सब में कोई बात होती तू एक लेडी डॉक्टर वंहा पर आयी और उसने गेट्स से बहार जाने की रिक्वेस्ट की तू सरे गेट्स बहार आ गए. रुचिका को चेक करने लगी. दिया और अवनि भी डॉक्टर के साथ अंदर रह गयी. रुचिका की हालत देखते hi दोनों के छक्के छूट गए थे. रुचिका को बहुत तेज़ बुखार था और वो बुरी तरह से तप रही थी. डॉक्टर ने उससे चेक करने के बाद एक इंजेक्शन लगाया और कुछ देर इंतज़ार करने के लिए कहा. तभी वंहा पड़े एक लिफाफे में से कुछ दवाईयां झाँख रही थी तू डॉक्टर ने उसको उठाकर देखा की उसमे से एक पत्ते में से एक होली गायब थी, जिससे देखकर उससे हंसी भी आ गयी लेकिन चिंता भी होने लगी.
उसने कहा की रुचिका को जल्दी से हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा और देर होने पर इसकी जान को खतरा हो सकता है. दिया जल्दी से बहार गयी और हफ्ते हुए साडी बात बताई तू मोहनलाल ने डॉक्टर से पूछा तू उसने बताया की जल्दी से जल्दी हॉस्पिटल पंहुचना जरुरी है और एम्बुलेंस आने में देर हो सकती है.
सूरज ने बात सुनते hi जल्दी से ड्राइवर को गाड़ी एंट्रेंस पर लगाने के लिए कहा.
रुचिका बिलकुल पागलो की तरह हाथ पेअर पटक रही थी उसकी आंखे बंद थी और उसका सारा शरीर पसीने से भीगा हुआ था और सांसे बहुत तेज चल रही थी वो पता नहीं क्या बड़बड़ा रही थी जो समझ नहीं आरहा था लगता था जैसे उसे कोई दौरा पड़ा हो
"ऐसे खड़े खड़े क्या देख रहे हो तुम दोनों देखो न बेचारी कितनी तड़प रही है, कुछ करो" दिया रुआंसे स्वर में बोली
जब तक मैं रुचिका को निचे लेकर आता हु इसे अभी हॉस्पिटल लेकर चलना होगा" मोहनलाल ने सूरज से कहा और खुद रुचिका की तरफ लपका मोहनलाल की बात सुनकर दिया भी फुर्ती से निचे की तरफ भागी.
मोहनलाल रुचिका को हिला हिला कर उठाने की कोशिश करने लगा लेकिन वो तस से मास न हुई. मोहनलाल ने तब रुचिका को गॉड में उठाया और निचे ले आया जहाँ अब गाड़ी आ चुकी थी. मोहनलाल रुचिका को गॉड में लिए हुए hi गाड़ी में बैठ गया. साथ में सूरज और दिया भी बैठ गए और दीपक को बाद में अवनि के साथ आने के लिए बोल दिया.
थोड़ी hi देर में रुचिका हॉस्पिटल के िक में बंद थी और डॉक्टर उसका check-up कर रहे थे जबकि सरे लोग बहार खड़े हुए थे
"हे भगवन क्या हो गया मेरी प्यारी बहिन जैसी सहेली को" दिया चिंता में बोली. तभी दीपक और अवनि भी आ गए और अवनि ने कहा 'चिंता न करो कुछ नहीं होगा' और दोनों गले लग गयी. तभी एक नर्स ने उन सबसे कहा 'आप सब बैठ जाइये' उसकी बात मानकर वो सब वंहा पड़ी चेयर्स पर बैठ गए. मोहनलाल तू अपने में hi खोया था और भगवन से मन रहा था की किसी भी तरीके से उसकी जान रुचिका ठीक हो जाये.
लगभग आधा घंटा हो गया था डॉक्टर्स को check-up करते हुए सभी लोग अभी भी बरामदे में बैठे हुए थे और सभी को बहुत चिंता हो रही थी खास तौर पर दिया को क्योंकि वो रुचिका को बहुत जयादा दिल के करीब मैंने लगी थी एक दो बार उसकी नजरे मोहनलाल से मिली तो उसने उसे ऐसे देखा जैसे इस सब का जिम्मेदार वही है अगर वो रुचिका की बात मान लेता तू शायद ये सब नहीं देखना पड़ता
तभी डॉक्टर्स बहार निकले तो सभी लपक कर उनके पास पहुंचे
"क्या हुआ डॉक्टर सब ठीक तो है न" मोहनलाल ने जल्दी से पूछा
"सब ठीक है जी आपकी बीवी बिलकुल ठीक है शायद उसे हीट ज्यादा हो गई थी इसलिए दौरा पड़ा लेकिन अब सब ठीक है और जल्दी hi उससे छुट्टी भी दे देंगे हॉस्पिटल से आप चिंता न करो" एक डॉक्टर बोलै, जो उन् सब का हेड लग रहा था
"हे भगवन तेरा लाख लाख धन्यवाद्" दिया ऊपर देखते हुए बोली
"आप मेरे साथ आइये कुछ दवाइया लानी हैं मैं लिख देता हु" डॉक्टर ने मोहनलाल से कहा और अपने केबिन की तरफ बढ़ गया मोहनलाल भी उसके पीछे हो लिया.
'ये पेशेंट तुम्हारी बीवी है न' डॉक्टर ने पूछा
मोहनलाल 'हाँ'
'देखो ये बात पूछनी तू नहीं चाहिए, लेकिन सही इलाज करने के लिए कुछ बातें डॉक्टर के लिए जानना बहुत जरुरी है'
मोहनलाल 'पूछिए'
डॉक्टर 'आप ये बताइये आप दोनों की सेक्स लाइफ कितनी एक्टिव है, मतलब हफ्ते में कितनी बार सेक्स करते हो'
मोहनलाल 'जी, मैं समझा नहीं'
डॉक्टर 'देखो उसने अपने अंदर सेक्स पावर बढ़ने के लिए दवाई खाई है और उस दवाई का उल्टा असर हुआ है और अब बात ये है की दवाई के असर को ख़तम करने के लिए, अभी तू हम लोगो ने दवाई दे दी है, लेकिन जल्दी hi इसका असर फिर दिखेगा और असर इतना जयादा है की उसके दिल पर असर पद रहा है और उसकी कभी भी जान जा सकती है'
मोहनलाल 'नहीं नहीं ये नहीं हो सकता'
डॉक्टर 'अब दो तरीके हैं, या तू हम उसके शरीर से दवाई को फ्लश आउट करें, उसमे खतरा ये हैं की इस दौरान अगर दिल का दौरा पद गया तू उसको बचने में मुश्किल हो जाएगी और दूसरा आसान तरीका है की जल्दी से जल्दी उसको नेचुरल तरीके से रिलैक्स किया जाये. आप दोनों ये काम बहुत आसानी से कर सकते हैं, बस ये धयान रहे की उसका रिलैक्स होना बहुत जरुरी है, नहीं तू मैं कुछ नहीं कर पौंग'
"ji...ji हाँ" मोहनलाल ने जवाब दिया
"Hummm.......dekho दोस्त मुझे ये कहना तो नहीं चाहिए था लेकिन डॉक्टर हु तो मरीज के बारे में सब बताना तो पड़ेगा आज इसे जो दौरा पड़ा है वो इसके जिस्म में हीट बढ़ने से hi पड़ा है उसका इलाज सिर्फ और सिर्फ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने से hi हो पायेगा वर्ण इसकी ये बीमारी भड़क भी सकती है, हाँ कुछ दवाईयां लिख रहा हु जिससे इसका असर काम हो jaye"Doctor ने बताया
"जी...." मोहनलाल सिर्फ इतना hi कह पाया और डॉक्टर से दवाइयों की स्लिप लेकर बहार आगया
"क्या हुआ डॉक्टर ने कुछ और कहा क्या" सूरज और दिया ने पूछा
"na....nahii...aa...aur कुछ नहीं कहा, आप सब रुको मैं दवाइया लेकर आता हु" मोहनलाल ने कहा और बहार निकल गया लेकिन मोहनलाल के हकलाने से दिया को यकीं हो गया की जरूर डॉक्टर ने कुछ और भी कहा है और उसने सोच लिया की कैसे भी करके वो ये बात जान लेगी, लेकिन कैसे, तभी उससे लेडी डॉक्टर याद आयी और वो अवनि को लेकर उसके केबिन की तरफ चल पड़ी.
मोहनलाल मेडिकल स्टोर से दवाइया लेकर वापस आगया था लेकिन उसके मैं में यही चल रहा था की कुछ भी हो चाहे कोई कुछ भी कहे लेकिन अब वो अपने और रुचिका के बिच में रिश्ते की आड़ नहीं आने देगा वो रुचिका को ऐसे घुट घुट कर मरते नहीं देख सकता अब वो रुचिका के जिस्म की आग बुझा कर रहेगा बस एक बार हॉस्पिटल से उसकी छुट्टी हो जाये मौका मिलते hi वो रुचिका से बात करेगा इस बारे में अभी मोहनलाल ये सब सोच hi रहा था की उसके कान में सूरज की आवाज आई
"भाई साहब, दवाईयां ले आये, क्या कहा डॉक्टर ने'
मोहनलाल 'कुछ खास नहीं बस यही की उसको जिस्म की गर्मी की वजह से दौरा पड़ा है'
तभी वंहा पर दिया और अवनि भी आ गए और दोनों hi लेडी डॉक्टर से मिलकर आयी थी तू दोनों के चेरों पर बहुत hi कुटिल मुस्कान थी और वो दोनों एक साथ , 'भाई साहब ये ठीक नहीं है की आप हमारी प्यारी सी बहिन जैसी सहेली का ख्याल नहीं रख रहे. डॉक्टर ने हमें सब बता दिया है, अब आप से गुजारिश है की बाकि सब बाद में बस उस प्यारी सी गुड़िया का ख्याल रखिये.
मोहनलाल 'Okay'
फिर वो सब डॉक्टर के पास गए तू उसने कहा 'अगर आप चाहो तू पेशेंट को ले जा सकते हैं, बस मेरी कही हुई बात का खास ख्याल रखना है'
मोहनलाल ने कहा 'आप चिंता न करें, मैं ख्याल रखूँगा'
मोहनलाल ने कह तू दिया, लेकिन कैसे, ये उसकी समझ से परे था.
फिर रुचिका को डिस्चार्ज करके वो रुचिका को लेकर वापस होटल आ गए थे. रुचिका की हालत अब ठीक थी लेकिन चेहरा मुरझाया हुआ था दिया रुचिका से गले लग कर मिली थी और उसके चेहरे की मुस्कान जैसे रुचिका को दिलासा दे रही थी की अब तू चिंता मत कर. फिर दिया और अवनि ने मोहनलाल से बहार जाने के लिए कहा तू वो जाना नहीं चाहता था, लेकिन उन दोनों के ज़िद करने पर
"ोकककक...." मोहनलाल ने हताशा में कहा उसकी इच्छा नहीं थी रुचिका को इस हाल में छोड़ कर जाने की लेकिन वो दोनों भी सही कह राइ थी की अकेले में वे रुचिका से बात कर लेंगी.
मोहनलाल सूरज और दीपक के साथ बहार आ गया, वे दोनों उससे दिलासा दे रहे थे, लेकिन मोहनलाल उनकी बात पर ध्यान न देकर लगातार आने वाले वक़्त के बारे में सोचे जा रहा था की वो कैसे रुचिका से इस बारे में बात करे, वो तू उसको पहले से hi गलत समझे बैठी है.
काफी देर के बाद दिया ने फ़ोन करके सबको कमरे में बुलवाया तू रुचिका नाहा धो कर बैठी थी और नाश्ता वंही पर मंगवाया हुआ था. सब भूके थे तू कुछ कुछ खा लिया और नाश्ते के बाद वेटर आकर टेबल साफ़ कर गया. उसके बाद उन सब ने मोहनलाल और रुचिका को वंहा छोड़कर और उन्हें गुड लक बोलै और वंहा से चले गए.
उनके जाने के बाद मोहनलाल रुचिका के पास गया और उसके सर पर हाथ रखा तू रुचिका बिना कुछ सोचे मोहनलाल से चिमट गयी और कहा 'सॉरी, मुझे माफ़ कर दो, मैं पता नहीं आपको क्या क्या कह गयी'
मोहनलाल बीएड पर उसके साथ बैठ गया और उसको कहा 'सॉरी, मैंने कहा था न सॉरी और थैंक्स अपने आप को नहीं कहा जाता'
रुचिका 'मैं और आप तू अलग अलग हैं न' और वो सुबकने लगी
मोहनलाल ने उसको अपने आगोश में लेते हुए 'तुम मुझसे अलग कैसे हो सकती हो, तुम तू मेरा दूसरा पहलु हो'
रुचिका 'लेकिन आप तू कह रहे थे की मैं आपकी बेटी हु'
मोहनलाल 'बेटी भी हो, लेकिन इस वक़्त सिर्फ और सिर्फ मेरी बीवी हो, समझी' और मोहनलाल उसके कंधे को सहलाने लगा.
पहले तो मोहनलाल समझ नहीं पाया की क्या रुचिका को सब सच बताना ठीक होगा लेकिन फिर उसने सोचा की आगे उसे जो भी करना है वो रुचिका की मदद के बगैर नहीं हो सकता इसलिए रुचिका को सब सच बताना hi ठीक होगा और उसने डॉक्टर से हुई साडी बाटे रुचिका को बता दी. रुचिका को वो साडी बातें पहले hi डॉक्टर ने बता दी थी, लेकिन मोहनलाल के मुंह से सुनकर उससे एक अलग hi मज़ा आ रहा था.
मोहनलाल की बात सुनकर रुचिका भी कुछ देर सोचती रही फिर बोली "तो अब आपने क्या फैसला किया है, अब तू आप मुझे सच में बीवी मानेगा या नहीं"
"मैं तुम्हारी हालत देख कर परेशां हु रुचिका, लेकिन मैं तुम्हारे साथ ये सब कैसे कर पाउँगा" मोहनलाल झिझकते हुए बोलै
रुचिका "क्यों क्या मैं लड़की नहीं हु या फिर आप मर्द नहीं हैं जो आप मेरे साथ कुछ कर नहीं पाएंगे" रुचिका मन में खुश होते हुए बोली वो समझ गई थी की अब मोहनलाल अब उससे बीवी समझ रहा है बस थोड़ा झिझक रहा है
मोहनलाल और कुछ सोचता उसके दिमाग़ में बस एक hi बात थी की उससे रुचिका को बचाना है और ये करने के लिए सब जायज है. ये सोचते hi उसने रुचिका को अपनी बांहों में ले लिया और उसके सुडौल और कटीले बदन के घर्षण से उसका ध्यान भांग हो जाता और उसके बालो से उठती सुगंध मोहनलाल के रोम रोम में फ़ैल गयी और इस नशे में “ी लव यू, रुचिका. यू मैं थे वर्ल्ड तो में.” मोहनलाल उसके कानो के पास हलके से बोलै.