अपडेट 37
मोहनलाल को पता नहीं एकदम गुस्सा आ गया और उसने बगैर कुछ सोचे एक थप्पड़ रुचिका के गाल पर चिपका दिया और वो थप्पड़ काफी जोर का था जिससे रुचिका जाकर सीधे बीएड पर गिर गयी.
मोहनलाल इससे आगे कुछ सोचता ाणोँके हुआ की फ्लाइट लैंड करने वाली है तू उसने रुचिका को उठा दिया. फ्लाइट के लैंड करने के बाद वो बहार आये और गाड़ी में बैठकर घर आ गए. घर आने के बाद उन्होंने खाना खाया और मोहनलाल ऑफिस होकर आ गया और रात को उसने रुचिका के साथ डिनर किया और उसको दवाई देकर उससे सुलाकर खुद भी सो गया.
इनको सोने देते हैं और तब तक हम चलते हैं आदित्य और संध्या के पास
थोड़ी देर और इस तरह करने के बाद अब आदित्य से बर्दाश्त नहीं हो रहा था और उससे लग रहा था की कहीं इससे आगे बढ़ने पर कुछ गलत न हो जाये तू उसने कहा "अब आप सो जाओ और मैं भी जा रहा हु". संध्या ने उसकी तरफ देखा, उसका मन तू कर रहा था की आदित्य इस खेल को चालू रखे, लेकिन नारी लज्जा ने उससे चेताया और उसने कहा "थैंक्स" तब आदित्य ने कहा "आप मुझे भी थैंक्स कहोगी तू कैसे चलेगा, इसलिए No थैंक्स, आपका मुझ पर पूरा अधिकार है, जब आप कहोगी मैं हाज़िर हो जाऊंगा" और इतना कहकर वो कमरे से निकल गया.
संध्या आदित्य के जाने के बाद सोचने लगी की ये क्या हुआ. उसके बेटे ने घुटने पर मलहम लगाई लेकिन उसके हाथों के स्पर्श ने आज उसकी भावनाओं को बुरी तरह से भड़का दिया था. कहने को तू वो उससे मलहम लगवा रही थी लेकिन उसके हाथों का अपने घुटनो और उसके आस पास के हिस्से पर चल रहे हाथों का स्पर्श से उससे ऐसे सुकून मिल रहा था और नशा छ रहा था.
उसकी nas-nas में खून की जगह उन्माद और कामोत्तेजना का संचार हो रहा था. संध्या आज बिलकुल अलग और अजीब किस्म के सुखद अहसास का अनुभव कर रही थी. जिसके बारे में उससे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था,.
संध्या के साथ ऐसा कुछ होगा उसने कभी नहीं सोचा था. आदित्य के लिए उसकी फीलिंग्स अब बदल रही थी. ये कैसी फीलिंग्स थी और क्योँ है उसकी समझ से परे थी और ये सब सोचते हुए वो सो गयी.
सुबह उठकर वो कल रात की बात सोचकर खुश हो रही थी और आज उससे आदित्य के साथ फॉर्म भरने जाना था तू ये सोचते हुए वो बाथरूम में घुसकर जल्दी जल्दी ब्रश करने लगी. ब्रश करने के बाद वहां आईने के सामने कड़ी होकर अपने कपडे उतारने को हुई ही थी की वह अपने चहरे को आईने में देखने लगी. चेहरा क्या था ऐसा लगता था मानो कोई गुलाब का फूल खिल गया हो, एकदम गोल चेहरा, बड़े- बड़े कजरारी आँखें. गहरी आँखों में इतना नशा की उनमे ḍऊबने को जी करें.
नाक और honṭh इतने लाल लाल की lipasṭic लगाए बिना hi ऐसा लगता था की मानो lipisṭic लगायी हो. रेशमी बालों की बिखरी हुई laṭte हमेशा उसके गोर गालों से aṭhakheliyaan कराती थी. बाला की खूबसूरत लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर santuṣhṭi का अभाव था, प्यार की कमी थी जो की उसके पति से बिलकुल भी नहीं मिल पा रही थी. जिसके लिए वह बरसों से तरस रही थी.
उसके मन में एक अजीब सी उदासी छायी थी . वह भी अब अपनी जिंदगी से ख़ुशी के उम्मीद को छोड़ चुकी थी. वह शावर के नीचे आयी और अपने कपडे एक एक कर के निकलने लगी. कपड़ों के बगैर उसका गोरा बदन और भी ज्यादा दमकने लगा जिस की चमक से पूरा बाथरूम रोशन हो गया.
लम्बे कद kaaṭhi की संध्या बिना कपड़ों के और भी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी. उसके बदन पर केवल गुलाबी रंग की painṭi थी. बदन के पोर पोर से ऐसा लग रहा था की मानो मदन रास ṭापक रहा हो. गुलाबी रंग की कसी हुई बड़ी बड़ी चूचियां बड़ी hi मादक लग रही थी. चूचियों का आकार एकदम गोल गोल ऐसा लग रहा था की जैसे रास से भरा हुआ खरबूजा हो.
गुदाज बदन का हर एक अंग अलग आभा और kaṭav लिए हुए था. बल खाती कमर पूरे बदन को एक अजीब और मादक तरीके से ṭहहराव दिए हुए था. पूरे बदन पर अत्यधिक चर्बी का कहीं भी नामोनिशान नहीं था. पूरा शरीर sugaṭhit तरीके से ऐसा लग रहा था मानो की भगवन ने अपने हाथों से बनाया हो. गुदाज बाँहें, जिनमे सामने के लिए हर एक मर्द तरसता रहता हो. गुदाज बदन जिसे पाने का सपना हर एक मर्द अपने दिल के कोने में बसाई रखता हो. मांसल जांघें इतनी चिकनी की उंगली रखते hi उंगली फिसल जाये. गोरा रंग तो इतना जैसे की भगवन ने सुंदरता के सारे बीजों को एक साथ पत्थर पर पीसकर उसका सारा रास संध्या के बदन में ḍाल दिया हो. और कहीं भी हलके से हाथ रख देने पर भी वहां का रंग एकदम लाल लाल हो जाता था.
एक तरह से संध्या को खूबसूरती की मिसाल भी कह सकते थे. संध्या शावर को चालू किये बिना hi उसके नीचे कड़ी होकर के अपने बदन को ऊपर से नीचे तक निहारने लगी. उसे खुद ही कुछ समझ में नहीं आ रहा था. इस तरह की अपनी किस्मत पर उसे बहुत ही ज्यादा क्रोध आ रहा था. वह मन hi मन सोचती थी की इतनी खूबसूरत होने के बावजूद उसका हर एक अंग इतना खूबसूरत होने के बावजूद भी वह अपने पति को वो सुख न दे पायी और न hi न hi कभी उस सुख को प्राप्त कर पायी.
जबसे आदित्य पैदा हुआ था तब से लेकर आज तक उसका अपने पति के साथ सम्भोग बस गिनती का hi हुआ था. भगवन ने उसे खूबसूरती देने में कहीं कोई भी कसार बाकी नहीं राखी थी. लेकिन शायद भगवन को भी इसको खूबसूरती कुछ जयादा दे दी इसलिए उसने उसकी किस्मत में पति से विमुख होना और प्यार के लिए तरसना लिख दिया था.
उसको याद आया की वो शुरू से hi बहुत खूबसूरत थी और उसका पति उससे बहुत प्यार करता था और बेटी के पैदा होने के बाद उन्हें कैसे गाँव से भागना पड़ा था. यंहा आने के बाद रूपया पैसे के लिए उसके पति को बहुत म्हणत करनी पड़ती थी और उससे दर था की कोई उसकी खूबसूरती का फायदा न उठा ले, इसलिए वो अपने आप को जयादा तर छुपा कर रखती थी और सारा दिन घर में hi रहती थी और किसी से भी जब तक बहुत जयादा जरुरी न हो नहीं मिलती थी.
आदित्य के पैदा होने के बाद उससे कोई प्रॉब्लम हो गयी जिसकी वजह से उससे सम्भोग के वक़्त बहुत दर्द होता था, उसके पति ने कई बार उस से डॉक्टर से इलाज करवाने के लिए कहा लेकिन बच्चे छोटे थे और उसने अपनी नासमझी की वजह से की इलाज के वक़्त कुछ हो गया तू बच्चो का ख्याल कौन करेगा.
ये ठीक है की वो सम्भोग नहीं कर पति थी, इसका मतलब ये नहीं था की उसका मन सेक्स करने का नहीं करता था, वो तू कई बार सेक्स की वजह से तड़पती रहती थी. फिर कुछ वक़्त के बाद उसका पति बहार जाने लगा और जयादातर बहार hi रहता था. ये नहीं है की वो अपना इलाज नहीं चाहती थी, बल्कि उसके मन में ये दर था की अगर इलाज हो गया और उसका पति बहार hi रहा तू जब वो जयादा दुखी हो जाएगी. उसका मानना ये था की उसका पति इलाज के बाद जब यंहा आएगा तू सेक्स करेगा और उसके जाने के बाद उसका क्या होगा. उसके संस्कार इस बात की इज्जाजत नहीं देते थे की वो अपने पति के आलावा किसी और से सम्बन्ध बनाये. ये बाते सोचकर वो सोचती थी की जैसे चल रहा है चलने देते हैं. एक बार उसका पति जबरदस्ती डॉक्टर के पास ले गया तू जो डॉक्टर ने उससे अकेले में जो बताया वो ये था की उससे लगातार प्यार और हमदर्दी की जरुरत है. कोई जरुरत नहीं थी की एकदम से सेक्स करें. उस डॉक्टर के हिसाब से उसका वागिना सुख गया है वो कई कारन से हो सकता है. उसका इलाज तीन महीने लगातार दवाई के साथ साथ उसका पति उससे प्यार और हमदर्दी दिखाए. अब इस बेचारी ने न तू ये बात डॉक्टर को बताई और न hi अपने पति को क्योँकि उसका पति तू काम छोड़कर आने से रहा तू दवाई खाने का क्या फायदा.
उससे ये भी लगाने लगा था की उसका पति उससे अपने साथ ले जाने में ख़ुशी नहीं महसूस करता था बल्कि उससे ये एक मज़बूरी लगती थी क्योँकि वो तू एक अनपढ़ थी और उससे बड़ी बड़ी पार्टियों में जाना पड़ता था. उससे अब लगने लगा की जिसका भी उसने ख्याल रखा है वो उसका साथ छोड़ गया. पहले पति, उसके बाद उसकी जान से ज्यादा प्यारी बेटी भी उससे दूर हो गयी और अब बीटा भी उससे दूर होने वाला है. इसलिए उससे अपने आप को संभालना था और इसके लिए उससे म्हणत करनी थी और फिर से औरत से लड़की बनना पद रहा था.
संध्या अपनी किस्मत और अपने जीवन से जरा सी भी खुश नहीं थी. वह मन में उदासी लिए अपने दोनों हाथ को आगे ले जाकर के नरम नरम उँगलियों के सहारे अपनी नंगी चूचियों को सेहले कर देख रही थी जो की एक बड़े ही मादक तरीके की गोलाई लिए हुए तानकर कड़ी थी. इस उम्र में भी संध्या की बड़ी बड़ी चूचियां laṭakane की बजाय तन कर कड़ी थी, जिसका कसाव और गोलाई देख कर लडकियां भी आश्चर्य से दांतों टेल उंगलियां दबा ले. संध्या खुद hi दोनों चूचियों को अपने हथेली में भर कर हलके से दबाई लेकिन उसकी बड़ी बड़ी चूचियां उसकी हथेली में सिर्फ आधी hi आ रही थी.
कुछ सेकंड तक वह अपनी हथेलियों को चूचियों पर रखे रही उसके बाद haṭaa ली. उसके बदन पर अब जो सिर्फ पेंटी थी उसकी वह धीरे धीरे panṭy को नीचे की तरफ सरकाने लगी.
संध्या तो औपचारिक रूप से hi अपनी पैंटी को नीचे सरका रही थी लेकिन बाथरूम का नजारा बड़ा hi मादक और कामुक था.
अगले ही पल संध्या ने ghuṭanon के नीचे तक अपनी penṭee को सरका दिया, उसके बाद पैरों का सहारा लेकर के painṭi को अपनी चिकनी लम्बी ṭांगों से बाहर निकलकर सम्पूर्णṇ रूप से एकदम नंगी हो गयी. इस समय बाथरूम की चारदीवारी के अंदर वह पूरी तरह से नंगी थी. उसके बदन पर कपडे का एक रेशा तक नहीं था. बाथरूम के अंदर नग्नावस्था मैं वह स्वर्ग से उतरी हुई कोई अप्सरा लग रही थी. जाँघों के बीच painṭi के अंदर छुपी हुई बेशकीमती खजाने को वह आजाद कर दिया था.
संध्या ने अपने बेशकीमती रसीली बुर को एकदम जातां से रखा हुआ था तभी तो इसे उम्र में भी उसकी बुर की गुलाबी पंखुड़ियां बाहर को नहीं निकली थी, बुर पर मात्र एक हलकी सी लकीर hi नजर आती थी जो की इस उम्र में नजर आना नामुमकिन था, संध्या की बुर पर बस एक पतली सी गहरी लकीर hi नजर आती थी और उसके ird-gird बाल के रेशे का नाम भी नहीं था वह पूरी तरह से अपनी बुर को हमेशा चिकनी hi रखती थी क्योंकि बुर पर बाल मोहनलाल को बिलकुल भी पसंद नहीं थे.
संध्या के नितम्बों की तारीफ जीतनी की जाये उतनी काम थी. नितम्बों का उभार कुछ ज्यादा hi था . देखने वाले की नजर जब भी संध्या के मदमस्त उभरे हुए पिछवाड़े पर अगर किसी की नज़र पड़े तो वह देखता hi रह जाये. उसके नितम्बों पर अभी भी जवानी के दिनों वाला hi कसाव बरकरार था.
उसने शावर चालू कर दिया और उसके नीचे कड़ी होकर नहाना शुरू कर दिया . वह आहिस्ते आहिस्ते खुशबूदार साबुन को अपने पूरे बदन पर रगड़ रगड़ कर लगा रही थी. वह साबुन लगाए जा रही थी और उसके बदन पर पानी का फव्वारा गिरता जा रहा था.
थोड़ी देर में वह नाहा चुकी थी और अपने नंगे बदन पर से पानी की बूंदों को साफ़ करके अपने बदन पर ṭोवेल लपेṭ लिया. अपने नंगे बदन पर ṭोवेल lapeṭane के बाद वह बाथरूम से निकल कर कमरे में आयी. कमरे में आते hi उसने अलमारी खोली जिसमे उसकी rang-birngi साड़ियां भरी हुई थी. लेकिन उसने कोई भी साडी न निकाल कर उसने बाजार से लाया हुआ नया सूट निकला और उसी रंग की ब्रा पेंटी भी निकल ली. उसके बाद वह आईने के सामने कड़ी होकर के अपने बदन पर lapeṭe हुए टॉवल को भी निकलकर बिस्तर पर फेंक दिया और एक बार फिर से उसकी नंगे पैन की खूबसूरती से पूरा कमरा जगमगा uṭha. सबसे पहले वाहन ब्रा uṭha करके उसे पहनने लगी और अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को ब्रा में छुपा लिया, फिर उसने panṭy पहनकर अपने बेष कीमती खजाने को भी छुपा लिया. धीरे धीरे करके उसने अपने बदन पर सारे विस्तार धराṇ कर लिए. इस वक्त अगर कोई संध्या को देख ले तो उसके मुंह से वह वह निकल जाए. जीतनी खूबसूरत वो निरवस्त्र होने के बाद नजर आती थी उससे भी कहीं ज्यादा खूबसूरत कपडे पहनने के बाद दिखती थी. लम्बे काले घने रेशमी बाल भीगे होने की वजह से उसका सूट भीग गया था जिसकी वजह से उसके अंदर पहनी हुई ब्रा नजर आ रही थी. जो की बड़ा ही मनमोहक लग रही थी.
संध्या अपने गीले बालों को सुखाकर उसे सवारने लगी. थोड़ी ही देर में संध्या पूरी तरह से तैयार हो चुकी थी, वह तैयार होने के बाद बेहद खूबसूरत लग रही थी अगर ऐसे में दूसरा कोई भी इंसान देख ले तो उसके मन में संध्या को पाने की लालसा जाग जाये.
संध्या तैयार होने के बाद जैसे hi कमरे का दरवाजा
खोलकर बाहर की तरफ जाने लगी की सामने से आदित्य अपने कमरे से बाहर आ रहा था और वहां अपनी माँ को देखकर 'गुड मॉर्निंग, अब कैसा है आपका दर्द'
संध्या 'तुम्हारी मालिश से बहुत आराम है' वो कह भी रही थी, लेकिन रात की बात सोचकर मन hi मन खुश भी हो रही थी और शर्मा भी रही थी, इसलिए वो नजरे चुराते हुए किचन में चली गयी.
थोड़ी देर बाद वह नाश्ता तैयार करके, नाश्ते को टेबल पर लगाकर आदित्य का इंतज़ार कर रही थी, संध्या ने देखा की वो तैयार होकर के आया और कुर्सी पर baiṭhakar नाश्ता करने लगा.
ब्रेड पर मक्खन लगाकर वह खाते समय तिरछी नजर से संध्या पर जरूर नजरें फेर ले रहा था लेकिन बोल कुछ भी नहीं रहा था. आज उससे उसकी माँ उससे माँ न होकर एक लड़की लग रही थी और उसमे एक अलग hi तरह का एहसास जनम ले रहा था.
वो माँ की खूबसूरती में इस कदर खोया हुआ था की नाश्ते में काम उससे माँ की सुंदरता में खोया हुआ था और बार बार तिरछी निगहाओं से माँ को टाइट सूट में उसके कटाव और कसाव का आनंद ले रहा था. उसकी माँ जब उसको जूस देने के लिए उसकी और झुकी तू उससे माँ की चूचियों के दर्शन उसकी कमीज का गाला डीप होने की वजह से काफी अंदर तक हुए तू उसके खून में उबाल आ गया और उसका मन विचलित होने लगा की तभी उसके दोस्त का फ़ोन आ गया और उसने माँ को कहा 'आप जल्दी से तैयार हो जाओ चलना है'