Incest Katha Chodampur Ki - Page 21 - SexBaba
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Incest Katha Chodampur Ki

पापा का माथा ठनका.. ये सभ्य की छुछियां तो नहीं हैं... पापा तुरंत पहचान गए अरे भाई पहचाने कैसे न... शादी कितने साल हो गए और इतने सैलून में शायद hi कोई ऐसी रात रही होगी जब इन हाथों में पत्नी की बड़ी बड़ी छुछियां न आई हो... तो पहचानते कैसे नहीं...

पापा का दिमाग चलने लगा अगर ये सभ्य नहीं है तो शालू hi हो सकती है.... अरे ये क्या हो गया... उसकी सांसो से ये तो पक्का है की वो सोइ नहीं है...

क्या सोचेगी वो मेरे बारे में अब अगर कहीं अपनी जीजी को बता दिया तो मेरा घर टूट जायेगा..

पापा का लुंड ये सब सोचते हुए मुरझा गया... पापा को समझ नहीं आ रहा था की अब क्या करें जैसे थे वैसे hi रुक गए हाथ वहीं छुच्छी पर रुका हुआ था...

अपडेट 121

एक अजीब धर्मसंकट में फंसे हुए कर्मा के पापा के दिमाग में हर तरह के ख्याल आ रहे थे की अगर ऐसा हुआ तो क्या होगा वैसा हुआ तो क्या होगा...

जहाँ मन में एक तरफ दर था की उनकी पत्नी या घर में किसी को पता चल गया तो वो कैसे कभी किसी से नज़रें मिला पाएंगे...

वहीं मौसी के बदन का मखमली एहसास उन्हें ये सब छोड़कर इस पल का लुत्फ़ उठाने के लिए गुमराह कर रहा था... और थे तो पापा मर्द hi हाथ आई इतनी मस्त गदराई औरत को जो नंगी होकर बाहों में पड़ी है उसे कैसे जाने दे... उनकी उत्तेजना उनके दर पर हावी होने लगी और उसी कारन से उनके हाथ मौसी की छूछीयो पर कसने लगे... मौसी की नरम छूछीयो का एहसास होते hi पापा का लुंड दोबारा कड़क होने लगा और वो हौले से मौसी की छुच्छी को दबाने लगे...

मौसी तो बेचारी फांसी हुई थी कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करें क्या न करें.. सोच तो लिए था की जीजाजी को थोड़ी देर ये समझने देती हूँ की मैं जीजी हूँ और मौका मिलते hi उठ जाउंगी... पर एक एक पल बिताना मुश्किल होता जा रहा था... ऊपर से जीजाजी का हाथ जो उनकी नंगी छूछीयो और दूसरा पेट पर घूम रहा था वो न चाहते हुए भी मौसी को उत्तेजित कर रहा था....

वहीं पीछे कर्मा के पापा ने अपनी साली के मांसल गदराये चिकने बदन का मज़ा लेना शुरू किआ hi था की उनकी आँखों के सामने एक बार फिर से अपनी पत्नी का चेहरा आ गया जिसके आते hi कई सरे खाया फिर से उनके दिमाग में घुस गए एक बार फिर से उनका हाथ जहाँ था वहीं रुक गया...

एक कश्मकश मन में चलने लगी... मैं ये सही नहीं कर रहा, मेरी पत्नी मुझसे इतना प्यार करती है सम्मान करती है, एक बिलकुल आदर्श पत्नी है मैं उसी की सगी बहन के साथ ये सब...?

जहाँ कर्मा के पापा अपनी पत्नी के बारे में सोच कर खुद को कुछ भी गलत करने से रोक रहे थे वहीं उनसे कुछ hi दूरी पर उनकी वही आदर्श पत्नी पूरी नंगी होकर अपने सेज बेटे का मुसल जैसा लुंड अपनी छूट में लेकर चुद रही थी...

कर्मा और उसकी माँ दोनों एक तरफ करवट लिए हुए थे

आगे माँ पीछे बीटा आगे माँ की छूट जिसमे पीछे से बेटे का लुंड अंदर बहार हो रहा था...





माँ बेटे पूरे परिवार के बीच चुदाई के ऐसे खेल में मगन थे जो ज़माने के लिए सबसे बड़े पाप में से था... पर दोनों माँ बेटे हवस की ऐसी नदी में बहराहे थे जिसके बहाव के आगे सरे सही गलत के पत्थर तेज़ बहाव से या तो कटजाते हैं या साथ बहने लगते हैं...

कर्मा का लुंड माँ की छूट से लगातार माध्यम गति से अंदर बहार हो रहा था कर्मा ने अपने धक्कों को और तगड़ा करने के लिए माँ के ऊपर के हिस्से को थोड़ा सा आगे खिसका दिया और खुद थोड़ा सा नीचे सरक कर धक्के लगाने लगा जिससे जगह बन गयी और अब वो लम्बे लम्बे धक्के लगाकर अपनी माँ की रसीली गरम छूट का मज़ा ले रहा था... माँ भी पहले पति और अब बेटे के लम्बे लुंड से छोड़कर जैसे जन्नत की सैर कर रही थी... वो भी अपने पति के होते हुए...

जहाँ हर तरफ वासना और उत्तेजना का खेल चल रहा था वहां कोई कैसे सो सकता था अपने माँ और पापा की मस्ती भरी चुदाई देख कर अनुज चादर ओढ़ कर लेट तो गया था पर नींद आँखों से कोसों दूर थी... मन में कई सवाल घूम रहे थे की जब वो गया था माँ पापा की चुदाई देखने तो भैया और मौसी यहीं थे पर जब आया तो नहीं थे... वो लोग कहाँ गए होंगे क्या वो लोग भी मेरी तरह माँ पापा की चुदाई देख रहे थे... वैसे क्या मस्त लगती हैं माँ छुड़वाते हुए.. माँ का नंगा बदन बड़ी बड़ी छुछियां...

ये hi सोचते हुए एक तरफ करवट लेकर अनुज अपने लुंड को बहार निकल कर सहला रहा था काफी देर तक सहलाने के बाद भी रहत न मिलने पर उसने दूसरी तरफ करवट ले ली.. और अब उसका चेहरा कर्मा और बाकि सब की तरफ हो गया... चादर को चेहरे से थोड़ा सा हटा के देखा तो बगल में चादर में कोई महसूस हुआ...

उसने सोचा लगता है मौसी और भैया बापिस आ गए... और सो रहे हैं...

पर वो क्या जनता था की उस चादर में उसकी माँ चुद रही है वो भी उसके सेज भाई से...

कुछ देर सोने की कोशिश करने के बाद भी अनुज को नींद नहीं आ रही थी आखिर उसको कुछ ख्याल आया और उसने तुरंत hi अपना हाथ अपनी चादर से निकला और बगल वाली चादर की तरफ ले जाने लगा

और कुछ hi पल में उसने अपना हाथ बगल वाली चादर में घुसा दिया... और थोड़ा इधर उधर करने के बाद उसका हाथ एक कोमल गुदगुदी और नरम सी चीज़ पर पड़ा जिसे पहचानने में उसे देर न लगी की ये छुच्छी है... अनुज खुश हो गया की जैसा उसने सोचा था की मौसी की छुच्छी से कुछ मज़े लिए जाएं वैसा hi हुआ और तो और मौसी की छुच्छी नंगी मिल गयी उसे... और यही सोचकर वो हलके हलके हाथ से उसे दबाने लगा और साथ hi दुसरे हाथ से अपने लुंड को मुठिए रहा था...

इधर एक हाथ छुच्छी पर पड़ने के बाद पहले तो माँ को लगा की कर्मा hi उनकी छुच्छी को दबा रहा है... पर जैसे hi एहसास हुआ की कर्मा के दोनों हाथ तो मेरे चूतड़ों पर हैं...

तो माँ को एक झटका लगा... और फिर वो हाथ धीरे धीरे से उनकी छुच्छी को दबाने भी लगा.. माँ को कुछ पल बाद यकीन हो गया की हो न हो ये हाथ उनके पति का तो नहीं है तो ये अनुज... माँ को जैसे hi ये एहसास हुआ उन्हें एक और झटका लगा... एक पल को तो उन्हें लगा पीछे हो जॉन पर पीछे से तो कर्मा ने कसके पकड़ रखा था और दनादन लुंड छूट में पेल रहा था...

माँ के मन में ढेरों सवाल घूमने लगे.. आखिर अनुज ये क्या कर रहा है इससे पहले तो कभी उसने मेरी चुकी को इस तरह से नहीं छुआ कहीं उसे मेरे और कर्मा के बारे में पता तो नहीं चल गया... ये तो अनर्थ हो जायेगा.. कहीं वो किसी को बता न दे... क्या करूँ अभी कुछ किसी को बोल भी नहीं सकती अगर कोई जाग गया और मुझे इस हालत में कर्मा के साथ देख लिए तो.. मुझे शांत hi रहना होगा... माँ ने खुद को शांत रखने की hi सोची और इंतज़ार करने लगी साथ hi कर्मा से चुड़ते हुए उसके लुंड का आनंद तो छूट में मिल hi रहा था...

उधर अनुज पूरी छुच्छी को अचे से छू कर देख रहा था क्यूंकि पिछले कई दिनों से वो और कर्मा मिल कर मौसी की छूछीयो को चूसते थे तो उसे किसी भी प्रकार का दर नहीं था.. और उसे बहुत ख़ुशी हुई ये महसूस कर के छुच्छी के आस पास कोई कपडा नहीं है... उसने निश्चित करने के लिए दूसरी छुच्छी और ऊपर छाती और कंधे तक हाथ ले जाकर देखा और जैसे hi ये एहसास हुआ की मौसी ऊपर से नंगी हैं.. उसक लुंड ठुमके मरने लगा वो मन hi मन खुश हो गया... तभी उसका हाथ गर्दन से होते हुए मौसी के कान से टकरा गया जिसे उसने अपनी उँगलियों से महसूस किआ और उसे कुछ अजीब लगा... उसने दोबारा दे पूरे कान को छूओ कर देखा... उसका खून तेज़ी से दौड़ने लगा उसके मन में एक ख्याल घर करने लगा... अनुज ने फ़ौरन अपना हाथ कान से हटाया और बापिस छुच्छी पर रख दिया... और टटोलने लगा जैसे कुछ जांचना छह रहा हो और जैसे hi उसका शक धीरे धीरे यकीन में बदला उसके हाथ पत्थर जैसे होकर वहीं जैम गए...

दरअसल जब अनुज का हाथ कान पर लगा तो उसे आशा थी की उसके हाथ में मौसी के छोटे छोटे कान के झुमके आएंगे पर ऐसा नहीं हुआ कान बिलकुल खली था... और उसे अचे से याद था की सोने से पहले जी उसने मौसी के कानो में उन झुमको लो देखा था... साथ hi वो ये बात भी जनता था की उसकी माँ हमेशा सोने से पहले अपने कान और नाक में पहनी हुई चीज़ों को निकल देती थी क्यूंकि उसे पहन कर सोना ाचा नहीं लगता था...

तो सरे सामूकरणो को मिला कर उसे यकीन होने लगा की ये मौसी नहीं बल्कि उसकी माँ है.. और यकीन करने के लिए उसने बापिस छुच्छी पर हाथ रख कर टटोल कर ध्यान से महसूस कर के देखा और क्यूंकि वो पिछले कई दिनों से मौसी की छुच्छी को चूस रहा था और दबा रहा था उसे ये छुच्छी ज़्यादा गोल पर उससे थोड़ी काम फैली हुई पर कड़क महसूस हुई... जिससे उसे यकीन हो गया की ये छुच्छी उसकी मौसी की नहीं बल्कि उसकी माँ की है जो ऊपर से बिलकुल नंगी होकर उसके बगल में लेती hai...Y

ये सोचते hi अनुज का तो बुरा हाल हो गया.. घबराहट और उत्तेजना दोनों से hi उसके दिल की धड़कन बेहद तेज हो गयी... न जाने कब से वो अपनी माँ की नंगी छूछीयो को महसूस करना चाहता था और आज वो उसके हाथ में थी पर घबरा रहा था की कहीं माँ गुस्सा हो गयी तो और पापा को बता दिया तो मुझे तो बहुत मार भी पड़ेगी और साथ hi घर छोड़ना पड़ेगा... वो अलग... घबराहट के साथ साथ उत्तेजना भी थी की अपनी माँ की नंगी चुकी उसके हाथ में है ये सोचते hi उसका हाथ माँ की चुकी पर कास गया जिससे उत्तेजित होकर उसके लुंड ने एक बूँद वीर्य की टोपे पर बहा दी...

जहाँ एक तरफ अनुज आगे बढूं या न बढूं क्या करूँ इस सोच में फंसा हुआ था वहीं उसके पापा का भी हाल उसी तरह था एक तरफ था मौसी का मखमली नंगा बदन वहीं फुसरी तरफ घर टूटने का दर...

पापा भी नए नए समीकरण बनाने लगे.. तभी उनके मन में ख्याल आया की ये तो साफ़ ज़ाहिर है की शालू जाग रही है और जागते हुए भी यदि उसने मुझे अभी तक नहीं रोका इसका क्या कारन हो सकता है... कहीं वो भी तो ये नहीं चाहती कहीं पति के जाने की वजह से वो उत्तेजित हो गयी हो... या फिर कहीं वो इसलिए तो चुप नहीं की उसे ऐसा लग रहा हो की मैं उसे उसकी जीजी समझ रहा हूँ... अगर ऐसा है तो आगे बढ़ने में क्या हर्ज़ है अगर कुछ हुआ भी तो बोलडूँगा की मैं उसे उसकी जीजी समझ रहा था...

दिमाग की स्वीकृति मिलते hi पापा के हाथ फिर से मौसी की छूछीयो पर चलने लगे... वही लुंड एक बार फिर से कड़क हो गया और पीछे से मौसी के चूतड़ों में चुभने लगा... मौसी जो अब तक थोड़ी शांत हो पाई थी उन्हें लगने hi लगा था की जीजाजी सो गए हैं और वो सही मौका देखकर उठने hi वाली थी की

फिर से जीजाजी के हाथ उनकी छूछीयों पर चलने लगे और मौसी को एक बार फिर से उत्तेजित करने लगे...

पापा तो इस बार पूरे जोश में थे क्यूंकि बचने का उन्होंने एक उपाय सोच hi रखा था तो पापा अब्ब अपने दोनों हाथों से मौसी की बड़ी बड़ी छूछीयों को दबाकर मज़े ले रहे थे साथ hi उनका लुंड बिलकुल कड़क होकर मौसी के चूतड़ों को भेद रहा था जो मौसी को महसूस हो रहा था.. ये वही लुंड था जो अभी थोड़ी पहले उनकी बहन की छूट की प्यास बुझा रहा था और मौसी साफ़ साफ़ देख चुकी थी के ये लुंड छूट की प्यास कितने अचे से बुझा रहा था... मौसी की छूट गीली होकर उत्तेजना रुपी रास को बहा रही थी....

पापा कुछ ज़्यादा hi जोश में आते जा रहे थे और अब उन्होंने दिमाग की जगह शायद लुंड से सोचना शुरू कर दिया था जिस कारन कुछ देर तक अपनी साली की भरी भरकम छूछीयो को गूंथने से मन नहीं भरा तो पापा ने एक बड़ा कदम उठाते हुए मौसी की कमर में हाथ डालकर उन्हें थोड़ा सा अपनी तरफ घुमा लिए और मौसी की बगल के नीचे से सर निकलकर अपना चेहरा आगे लेजाकर अपने होंठों को मौसी की एक छुच्छी पर रख दिया और होंठों पर नरम सुखद एहसास पहली बार पते hi पापा के लुंड ने कुछ बूंदे छोड़ दी और पापा बहुत गरमा गए और मौसी की नरम नरम छुच्छी को चूसने लगे एक हाथ से दूसरी को मसलते और एक को चूसते...

मौसी के शरीर में तो जैसे करंट सा दौड़ गया.. एक पल को उनका मन हुआ की उठ कर भाग जाएं पर दर से शरीर ने साथ नहीं दिया वहीं चूसै के कारन उनकी छूट में छींटे रेंगने लगे...

मौसी तड़पने लगी... पापा को तो जैसे जन्नत मिल गयी.. और वो मौसी की छूछीयो के रास को पीने में पूरी तरह खो गए... वहीं उनके बगल में उनके बेटे का लुंड उनकी पत्नी की छूट में खो रहा था... कर्मा लुंड को टोपे तक बहार लता और फिर अपने जन्मद्वार में बापिस जड़ तक घुसा देता..

माँ का हाल बुरा था एक तरफ छूट में बेटे का मुसल जैसा लुंड अंदर बहार हो कर जन्नत की सैर करवा रहा था तो दूसरी तरफ दुसरे बेटे के हाथ छूछीयो पर परेशां भी कर रहे थे और उत्तेजित भी कर रहे थे...

वहीं अनुज को समझ नहीं आ रहा था क्या करे खुश होकर माँ की बड़ी बड़ी नंगी छूछीयों का लुत्फ़ उठाये या छोड़ दे क्यूंकि माँ के गुस्सा होने का दर भी था...

पर अनुज की उम्र के लड़के दिमाग से काम और लुंड के टोपे से ज़्यादा सोचते हैं... और यही हाल अनुज का था दर तो था पर ऐसा मौका इतनी गदराई हुई औरत की बड़ी बड़ी पर नरम छुछियां नंगी हाथ में हो और वो गदराई घोड़ी कोई और नहीं खुद की सगी माँ हो कौन ऐसा मौका छोड़ना चाहेगा... अनुज नेभी वही किआ और माँ की छुच्छी को धीरे धीरे दबाना शुरू कर दिया...

माँ को ये महसूस हुआ तो वो उत्तेजित भी हुई और साथ hi सोचने लगी की ये सब क्या हो रहा है... और क्या किस जाये अभी...

अनुज अब दर भूल कर एक हाथ से लुंड को मुठियाते हुए एक हाथ से माँ की छूछीयो को बदल बदल कर मसल रहा था...

माँ बेचारी दोनों बेटों के बीच फांसी हुई थी... हालाँकि माँ के बदन को तो ाचा लग रहा था चुड़ते हुए छूछीयो को दबाये जाना उनके आनंद को और बढ़ा रहा था... पर मन कह रहा था ये सही नहीं है...

अनुज ने कुछ देर छूछीयो को दबाया पर इंसान लालची होता है हमेशा थोड़ा और थोड़ा और चाहिए होता है यही अनुज के साथ हो रहा था...

माँ की नंगी छूछीयो मसलने को मिलने के बाद अब अनुज को कुछ और चाहिए था... उसने कुछ और की तलाश में वो रिस्क लिए जिसका नतीजा क्या हो सकता है उसने सोचा तक नहीं और अपने चेहरे को निकलकर अपना मुँह माँ की एक छुच्छी पर टिका दिया...

और अपने चेहरे पर माँ की नरम छूछीयो को महसूस करने लगा...

माँ को जैसे hi अपनी छूछीयो पर अनुज का मुँह महसूस हुआ उनके मुँह से सिसकी निकलने को हुई जिसे उन्होंने रोक लिए.. एक पल को तो उन्होंने सोचा की अनुज को दूर करें पर कुछ गलत न हो जाने के दर ने उन्हें रोक दिया..

वहीं अनुज कुछ देर इसी तरह रुका रहा और माँ की तरफ से कोई प्रतिक्रिया या वकीसी भी तरह का विरोध न पाकर उसकी हिम्मत बढ़ गयी और उसने मुँह खोल कर एक छुच्छी को मुँह में भर लिए और दूसरी को हाथ से दबाने लगा...

माँ मज़े और घबराहट दोनों से hi तड़प उठी एक बेटे का लुंड छूट में अंदर बहार हो रहा था जबकि दूसरा बीटा चुकी को चूस रहा था वो भी पति और सगी बहन के बगल में होते हुए... एक पल को माँ सोचने लगी क्या होगा मेरे परिवार का... पर छूट में लुंड और छुच्छी चूसै एक साथ हो रही हो तो कुछ भी सोचना आसान बात नहीं..

और वही माँ के साथ हो रहा था दिमाग कह रहा था जो हो रहा है गलत है पर शरीर को जो मज़ा मिल रहा था वो झुडलाया नहीं जा सकता था तो माँ ने अभी दिमाग को थोड़ी देर के लिए रोका और शरीर के मज़े पर ध्यान दिया... और अपने दोनों बेटो की सेवा का आनंद लेने लगी... न कर्मा को पता था की अनुज माँ के दूध चूस रहा है न hi अनुज को पता था की उसका बड़ा भाई उनकी माँ छोड़ रहा है...

अनुज तो जैसे जन्नत में था जिसके सपने न जाने कब से देखता था वो छुछियां आज उसके मुँह में थी और वो उनका रास पि रहा था एक हाथ से दूसरी छुच्छी को दबा रहा था वहीं दूसरा हाथ अपने लुंड पर चल रहा था... अनुज ने जोश में आकर अपनी चादर को अपने ऊपर से हटा कर फेंक दिया था.. वहीं माँ का ऊपर का हिस्सा छुछियां और ऊपर का हिस्सा चादर से बहार आ गया tha...baki पीछे का हिस्सा चादर में था जिसके अंदर चुदाई का तूफ़ान आया हुआ tha...aur एक माँ बेटे के प्रेम का अनोखा दृश्य चल रहा था...

जहाँ कर्मा की माँ अपने दोनों बेटों की सेवा से तृप्त हो रही थी वहीं पापा अभी भी मौसी की छूछीयो को चूसने में लगे हुए थे... और साथ hi कमर हिलाकर मौसी की जांघ पर अपने लुंड को घिस रहे थे... पीछे से...

मौसी बेचारी बस जो हो रहा था होने दे रही थी साथ hi उनकी छूट पानी बहा रही थी एक मन कर रहा था जीजाजी कास के उनके बदन को मसल दें... छूछीयो का रास तो पि hi लिए है अब पूरे शरीर की प्यास बुझा दें वहीं उनका दिमाग उन्हें रोक रहा था...

छूछीयो को चूसते हुए पापा भी जोश में आ गए और आगे बढ़ते हुए उन्होंने अपना हाथ मौसी के पेट पर फिरते हुए उनका पेटीकोट जहाँ बंधा था उस पर फिरने लगे.. मौसी की तो जैसे साँसे अटक गयी उन्हें समझ नहीं आ रहा था अब क्या करें... इसी उधेड़बुन में उनका हाथ चादर से आगे निकल गया और उन्होंने कर्मा की पीठ पर चादर के ऊपर से hi हाथ रख diya...kyunki कर्मा की पीठ उनकी तरफ थी... अपनी पीठ पर हाथ पड़ते hi कर्मा सहम गया और रुक गया उसके धक्के भी बाहर हलके हो गए...

उसे ये तो समझ आ गया की ये मौसी hi है पर अभी वो क्या करे क्यों की वो माँ के साथ अधूरा खेल नहीं छोड़ना चाहता था..... कुछ देर तक इंतज़ार किआ तो मौसी का हाथ यूँ hi उसकी पीठ पर टिका रहा और फिर अचानक से हैट गया.. कर्मा ने रहत की सांस ली और बापिस अपनी माँ की छूट छोड़ने में लग गया... साथ hi उसे मौसी का भी ख्याल था की शायद मौसी माँ पापा की चुदाई देखकर गरम हो गयी थी और इसीलिए उससे अपनी छूछीयो को चुसवा कर अपनी गर्मी शांत करवाना चाहती हैं...

उधर मौसी का हाथ इसलिए पीछे हैट गया क्यूंकि पापा का हाथ कुछ आगे बढ़ गया था और वो पेटीकोट के नाड़े वाली जगह उँगलियों को घूमते हुए उसे नीचे खिसकने की कोशिश कर रहे थे... अपनी साली को पूरा नंगा करने के ख्याल से hi उनके शरीर में सनसनी हो रही थी...

मौसी ने अपना हाथ बापिस लेकर पेटीकोट को कमर के पास से एक तरफ पकड़ लिया जिससे पापा का मिशन पेटीकोट उतरो जन्नत पाओ कामयाब न हो सके...

जब पेटीकोट नीचे नहीं खिसका ज़ोर देने पर भी तो पापा ने दूसरा रास्ता अपनाने की सोची और अपनी उँगलियों को जहाँ नाडा बंधा होता है वहां ले गए और हलके हलके से उसमे उँगलियों को फंसकर उसे खोलने की कोशिश करने लगे... मौसी झटपटाने लगी...

सिर्फ मौसी hi नहीं झटपटा रही थी एक तरफ अनुज अपनी माँ की चुकी को चूसकर इतना उत्तेजित हो गया की कब उसका रास उसकी गोलियों से बहकर उसके लुंड में आ गया पता hi नहीं चला... और उसकी शक्ति इतनी ज़्यादा थी की अनुज का पूरा शरीर अकड़ने सा लगा और हो भी क्यों न पहली बार अपनी माँ की नंगी छूछीयो को चूसते हुए शिखर तक पहुंचा था... मुँह छूछीयो से हैट गया हाथ लुंड पर और कास गया आँखें बंद हो गयी और फिर एक बार उसका मुँह खुला और लुंड ने पिचकारी मारनी शुरू कर दी जैसे hi पहली धार निकली तो न जाने अनुज के दिमाग में अचानक से क्या सूझा की उसने खुद को थोड़ा सा ऊपर खिसका कर अपने लुंड के टोपे का निशाना अंदाज़े से अपनी माँ की चूचियों की और कर दिया... पहले तो अनुज का मुँह छूछीयो से हटने पर माँ को थोड़ा अजीब लगा था.. माँ ये सोच hi रही थी की अनुज ने चूसना बंद क्यों कर दिया क्यूंकि उन्हें भी कहीं न कहीं मज़ा आ रहा था.. की तभी माँ को छूछीयो पर एक गरम सा एहसास हुआ और फिर एक और इस बार गरम द्रव्य चूचियों से गलती तक गिरा... माँ जैसी रोज़ छोड़ने वाली औरत को समझते देर न लगी की ये क्या है...

ये कुछ और नहीं बल्कि उनके छोटे बेटे का लुंड रास था जिसे वो अपनी माँ की नंगी छूछीयो पर बरसा रहा था एक के बाद एक धार माँ की चूचियों से लेकर चेहरे तक को भीगा रही थी





और फिर कुछ पल बाद ये सिलसिला थम गया पर तब तक माँ की छुछियां और चेहरा अनुज के रास से भीग चूका था... जब अनुज का झड़ना बंद हुआ तो वप लम्बी सांसे लेता हुआ सीधा होकर लेट गया और अब जो ख्याल उत्तेजना वश उसने परे रख दिए थे बापिस मन में कौंधने लगे और अब तो दर और था की जो अभी उसने किआ उसके बाद माँ न जाने क्या करेगी अब... तो अनुज ने तो डरके जल्दी से चादर उठाई और अपना मुँह धक् कर सोने की कोशिश करने लगा...

वहीं माँ तो अपने छोटे बेटे के रास से भीग क्र बेहद उत्तेजित हो गयी ये सोचकर की पति के होते हुए वो एक बेटे से चुद रही है दुसरे का वीर्य उसके चेहरे और छूछीयो पर भरा हुआ है और वो भी पति के बगल में होते हुए भी माँ ये सोचकर कर इतनी उत्तेजित हो गयी की वो खुद भी झड़ने लगी उनका शरीर कंपनी लगा साथ hi उनकी छूट सिकुड़ने लगी और कर्मा के लुंड के इर्द गिर्द कास गयी जिसका नतीजा ये हुआ की कर्मा जो इतनी देर से माँ की चुदाई में लगा हुआ था वो भी इसे संभल नहीं पाया और लुंड को. माँ की छूट में जड़ तक घुसा के रुक गया और अपने लुंड रास से अपनी माँ की छूट को सींचने लगा..

कुछ पल बाद जब कर्मा एयर माँ दोनों hi अपने अपने स्खलन से के शिखर से नीचे उतरे तो माँ को थोड़ा होश आया और वो जल्दी से चादर हटाकर उठी और टटोल कर पैरों में पड़ा हुआ पेटीकोट उठाया और नंगी hi बाथरूम की तरफ भाग गयी...

कर्मा ने भी अपनी सांसे शांत की, उसे माँ उठकर जाती हुई महसूस हुई वो बेहद खुश था अपनी माँ को छोड़ने का मौआ मिलने पर और उसी ख़ुशी में मुस्कुराते हुए लेट कर सोच hi रहा था की तभी अचानक से उसे मौसी का ख्याल आया..

अब तक जहाँ उधर माँ बेटों का खेल चल रहा था कर्मा के पापा अपने मिशन में लगे हुए थे और करीब करीब कामयाब भी हो गए थे मौसी के पेटीकोट के नदी की गांठ बस खुल hi गयी थी... मौसी की सांस अटकी हुई थी की अब कैसे रोकेंगी वो खुद को नंगा होने से अपने जीजाजी के हाथों से...

पापा ने नाड़े को खोल कर ढीला किआ और फिर उसमे हाथ फंसा कर नीचे खिसकने लगे जैसे hi पेटीकोट छूट के नीचे पहुंचा की अचानक से मौसी चादर के बहार निकल गयी...

पापा के हाथ से और चादर से मौसी दोनों से hi बहार निकल गयी... पापा फिर सोच में पद गए की शायद वो ज़्यादा आगे बढ़ गए इसलिए बहार खिसक गयी एक बार फिर पापा के दिमाग में वही चलने लगा की क्या शालू जो अभीहुआ वो अपनी जीजी को बता देगी?

अगर ऐसा हुआ तो न जाने क्या होगा... मैं कैसे नज़रें मिला पाउँगा किसी से... कहीं कुछ देर के सुख के लिए मैंने कोई बहुत बड़ी गलती तो नहीं करदी...

पापा इतनी गहरी सोच में पद गया की उनकी हिम्मत नहीं हुई की चादर के बहार देखें की मौसी कहाँ हैं और वैसे hi चादर के अंदर सोते रहे...

अब पापा को तो लग रहा था की मौसी उनकी हरकतों की वजह से चादर से बहार निकल गयी पर बात कुछ और hi थी जैसे hi कर्मा को मौसी का ख्याल आया था वैसे hi वो पलटा और चादर में हाथ डालकर मौसी को अपनी तरफ खींच लिए था नहीं तो मौसी ने तो खुद को हालत के हवाले कर hi दिया था...

कर्मा ने खुद पीछे खिसक कर अनुज की तरफ हो गया साथ hi मौसी को अपनी चादर में छुपा लिए जिसमे अब तक वो और उसकी माँ चोदामपट्टी कर थे...

मौसी बेचारी कुछ समझ पति तब तक वो बाप की बाँहों की जगह बेटे से चिपकी हुई थी... जब उन्हें कुछ समझ आया तो मौसी ने रहत की सांस ली... और शुक्र मानाने लगी कर्मा का की उसने सही समय पर बचा लिए...

पर इन सब में वो ये भूल hi गयी की वो ऊपर से बिलकुल नंगी है और साथ hi उनका पेटीकोट भी जांघों में अटका हुआ है इधर कर्मा ने मौसी को खुद से चिपका लिए और चिपकते hi उसे एक नया एहसास हुआ की मौसी तो नंगी हैं पूरी.. लगता है मौसी ज़्यादा hi गरम हो गयी माँ पापा की चुदाई dekhkar...ye सोचकर कर्मा मौसी की छूछीयो को दोनों हाथों से भींचने लगा....

कर्मा तो मनो फूले नहीं समां रहा था अभी एक बहन को छोड़ा था और अब दूसरी नंगी बाँहों में थी... कर्मा का लुंड फिर से सर उठाने लगा जिसे ये सोचकर की अबधेरे में किसे पता चल रहा है कर्मा ने पजामा सही से नहीं पहना था और लुंड बहार hi था... जो एक बार फिर से अपनी पूरी औकात पारा गया था और चिपकने की वजह से कर्मा का नंगा लुंड मौसी के नंगे चूतड़ों की दरार में घुस गया और जिसका स्पर्श पते hi मौसी के शरीर में करंट दौड़ गया और उन्हें अपनी स्थिति का आभास हुआ की उनका पाटिकट रो उनके घुटनो में है...

एक पल को उन्होंने सोचा की जल्दी से पेटीकोट फिर से पहन ले पर चूतड़ों पर कड़क लुंड का एहसास उनके इरादों को कमज़ोर कर रहा था साथ hi अपनी जीजी जीजाजी की चुदाई देखने से जीजाजी की वो साडी हरकतों से मौसी बहुत उत्तेजित हो गयी थी.. और अब वो सुकून चाहती थी तो जो हाथ पेटीकोट ऊपर करने के लिए नीचे गया था वो कहीं और रुक गया और फिर कर्मा को एहसास हुआ की मौसी थोड़ा ह दल रही हैं जिसे समझते कर्मा को देर नहीं लगी की मौसी छूट में उंगलिया कर रही हैं.

कर्मा और जोश में आकर उनकी छूछीयों को मसलने लगा साथ hi अपने लुंड को उनकी चूतड़ों की दरार में घिस रहा था...

मौसी को एहि चाहिए था वो किसी तरह से खुद की छूट को शांत करना चाहती रही और तिहरा हुम्ला उनकी पूरी मदद कर रहा था और अंत मैं हुआ भी कुछ ऐसा hi कुछ देर बाद hi मौसी भरभरा के अपनी उँगलियों पर झड़ने लगी कर्मा को भी ये साफ़ महसूस हुआ पर मौसी के झड़ने के कुछ पल बाद hi मौसी ने अपने पेटीकोट को ऊपर खिसका के बंधा और फिर कर्मा को हैरान करते हुए उसकी चादर से बहार निकल गयी और अपनी अलग चादर लेकर उसे ओढ़ लिए और सोने लगी...

कर्मा कुछ करता उससे पहले hi उसे कदमो की आहात सुनाई दी तो वो भी सर अंदर करके चुपचाप लेट गता कर्मा की माँ ने आकर देखा बीच में थोड़ी सी जगह खली है तो वहीं घुस गयी और बगल में चादर ओढ़ कर जो लेता था उसकी चादर में घिस गयी... थोड़ा आगे खिसक कर जब लेती और बदन एक दुसरे से स्पर्श हुआ तो पता चला माँ अपनी बहन यानि मौसी की चादर में घुस गयी हैं...

मौसी को भी अपनी बहन का बदन महसूस हुआ अपने बदन पर माँ ने हाथ बढाकर मौसी को बड़े होने के नाते खुद से चिपकाया तो थोड़ी हैरानी हुई की उनकी छोटी बहन ऊपर से नंगी है... माँ के हाथ मौसी की नंगी छूछीयो पर पद गए...

माँ को थोड़ा अजीब लगा पर ज़्यादा न सोच कर वो मौसी की अपने से ऐसे hi चिपकाये हुए सोने लगी मौसी भी थक गयी थी तो अपनी बड़ी बहन की बाहों में उन्हें आराम मिल रहा था तो दोनों hi बहनें एक साथ सो गयी वहीं बाकि लोग भी अपने अपने दिमाग में उधेड़बुन करते हुए सो गए... यही सोचते हुए की आने वाली सुबह क्या रंग दिखाएगी. .

इसके आगे अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्...
 
माँ को थोड़ा अजीब लगा पर ज़्यादा न सोच कर वो मौसी की अपने से ऐसे hi चिपकाये हुए सोने लगी मौसी भी थक गयी थी तो अपनी बड़ी बहन की बाहों में उन्हें आराम मिल रहा था तो दोनों hi बहनें एक साथ सो गयी वहीं बाकि लोग भी अपने अपने दिमाग में उधेड़बुन करते हुए सो गए... यही सोचते हुए की आने वाली सुबह क्या रंग दिखाएगी. .

अपडेट 122

सुबह सबसे पहले हमेशा की तरह माँ की आँख खुली धीरे धीरे उन्होंने अपनी आँखों को खोला और देखा फिर समझा की कहाँ पर हैं फिर रात की साडी बातें याद आई और थोड़ा सोचते हुए अपने बगल में लेती हुई ऊपर से नंगी बहन को देखा और कुछ सोचते हुए प्यार से उनके सर पर हाथ फिरने लगी और हाथ फिरते हुए अनायास hi नीचे सरकते हुए पहले चेहरे पर और फिर नीचे गर्दन से होते हुए कब मौसी की भरी भरकम छूछीयो पर पहुँच गया माँ भी नहीं जान सकीय जैसे hi माँ की ये आभास हुआ की उनका हाथ कहाँ है उन्होंने अचानक से अपना हाथ खींच लिए और फिर आस पास देखते हुए उत्सुकता वाश एक बार फिर से अपने हाथ से मौसी की छुच्छी को चुकार देखा और फिर अपना सर झटककर मौसी के कंधे को हिलाते हुए उन्हें जगाने लगी...

मौसी माँ के उठाने से जाग गयी और कुछ बोलने hi वाली थी की माँ ने उनके मुँह पर हाथ रख कर चुप कराया और फिर उठने का इशारा किआ मौसी को जब अपनी स्थिति का एहसास हुआ तो उन्होंने झट से चादर को अपने शरीर पर लपेट लिए और उठकर कड़ी हो गयी...

माँ ने नीचे देखा तो मौसी का ब्लाउज वहीं पड़ा हुआ था जिसे माँ ने जल्दी से उठाया और फिर अंदर चलने का इशारा किआ और दोनों भाग कर अंदर चली गयी मौसी के कमरे में..
कमरे में पहुंच कर माँ ने मौसी से पुछा..

माँ- शालू ऐसे बिना ब्लाउज के सो रही थी तू बेशरम कहीं की... अगर तेरे जीजा देख लेते तो पकड़ लेते..

माँ ने मज़ाक करते हुए कहा...

मौसी को माँ की बात सुनकर रात की बात जो उनके और पापा के बीच जो कुछ हुआ वो याद आ गया जिसे सोचकर मौसी थोड़ा घबरा गयी पर फिर स्थिति को सँभालते हुए माँ के हाथ से अपना ब्लाउज ले लिए और बोली- क्या जीजी तुम भी न और वो तो बस ऐसे hi मन कर गया सोने का बिना ब्लाउज के तो सो गयी चादर के अंदर hi..

मौसी ने ब्लाउज पहनते हुए कहा..

माँ ने मौसी की तरफ देखा और प्यार से बोली- मैं समझती हूँ की अकेली औरत के लिए कभी कभी एक रात गुज़ारना भी कितना मुश्किल हो जाता है शायद मैं गुज़र भी न पौन, पर ये तो सोचती की अगर तेरे जीजाजी तुझे ऐसी हालत में देखते तो क्या करते..

मौसी मन hi मन सोचने लगी की क्या बताऊँ जीजी ये हालत मेरी जीजाजी ने hi की है,

फिर शरमाते हुए बोली- धत्त्त जीजी...

माँ- हाय देखो तो कैसे शर्मा रही है.. चल जीजाजी का नहीं तो बच्चे देख लेते अपनी मौसी को इस हालत में to..waise भी तेरे दूध कितने सुन्दर हैं..

माँ ने मौसी की एक चुकी पर हाथ रखते हुए कहा... माँ के ऐसा करने से मौसी थोड़ा सिहर गयी फिर बोली- मेरे से कहीं अचे तो तुम्हारे हैं जीजी... बच्चे तो बच्चे hi हैं देख भी लें तो क्या दिक्कत है..

माँ- हाय देखो तो कैसे बोल रही है बच्चे अब बड़े हो गए हैं... दूध पीते बच्चे नहीं रहे वो..

माँ ने मुझे और रात में जो अनुज ने किआ उसे याद करके बोलै...

मौसी ये सब सुनकर कुछ सोचने लगी उनके हाथ ब्लाउज पर जैसे थे वैसे hi रुक गए...

माँ- अरे क्या हुआ क्या सोच रही है,

मौसी -जीजी?

माँ- क्या हुआ कोई बात है क्या?

मौसी- हाँ जीजी, पर समझ नहीं आ रहा कैसे कहूं पता नहीं सही है की गलत

माँ- तुझे कभी मुझसे कुछ भी बोलने में झिझक हुई है जो अब झिझक रही है... अब बता .

मौसी- वो जीजी जबसे कर्मा के मौसा गए हैं..

माँ- उनकी याद आ रही है?

मौसी- याद तो आ रही है पर बात कुछ और है..

माँ थोड़ा गंभीर होते हुए बिस्तर पर बैठ गयी और मौसी को भी हाथ पकड़ के बिठा लिए और बोली अब बता मौसी का ब्लाउज ऐसे hi आधा खुला हुआ था अब भी..

मौसी- जिस दिन कर्मा के मौसा गए उस दिन में थोड़ी उदास थी... तो रात को सोते समय..

माँ- हाँ सोते समय क्या?

मौसी- सोते समय मुझे उदास देखकर कर्मा और अनुज दोनों hi मेरा मन बहलाने के लिए मेरे पास सोने के लिए कहने लगे..

maa-phir

माँ कुछ सोचते हुए सुन रही थी..

mausi-to मैं भी मान गयी वैसे भी दोनों का साथ मुझे बहुत ाचा लगता है.. इसी तरह बातें शुरू हो गयी हम तीनो के बीच.. बचपन की बातें होने लगी की जब वो दोनों दूधपीते बच्चे थे तब से मेरी गॉड में खेलते थे..

माँ- ाचा फिर..

माँ की धड़कनें न जाने क्यों बढ़ रही थी मौसी की बात सुनकर..

मौसी- फिर बात होने लगी की क्या मैंने उन्हें कभी दूध पिलाया था तो मेरे मुँह से उदासी में निकल गया की मेरी किस्मत ऐसी कहाँ की कोई बच्चा मेरा दूध पिए...

तो कर्मा बोलै की मौसी क्या तुम हमें अपना बच्चा नहीं मानती तो मैंने बोलै बिलकुल मानती हूँ तुम मेरे बच्चे hi हो.. कभी काम नहीं समझा... फिर...

माँ- फिर क्या शालू,

माँ ने थोड़ा बेसब्री से पुछा ..

मौसी ने एक लम्बी सांस ली और बोली- फिर कर्मा ने बोलै की ऐसा मत बोलना की तुम्हारी किस्मत ऐसी नहीं है.. और ये कहकर उसने मेरे ब्लाउज के हुक खोलने शुरू कर दिए मैं चौंक गयी उसे रोकने की कोशिश की पर वो रुका hi नहीं और फिर सरे हुक खोलकर ब्लाउज को एक तरफ़ा कर सरका कर मेरे एक निप्पल को मुँह में भर के चूसने लगा..

माँ की आँखें ये सुनकर बड़ी हो गयी पर वो मौसी को देखती रही..

मौसी- मैं पहले तो मन कर रही थी पर कुछ पल बाद मुझे भी ाचा लगने लगा तो मेरे लिए और मुश्किल हो गया और फिर तभी दुसरे निप्पल को अनुज चूसने लगा और उसके साथ hi मेरा सारा विरोध ख़त्म हो गया और मुझे मज़ा आने लगा...

माँ तो हैरानी से बस मौसी की तरफ देखे जा रही थी माँ की साँसे भी थोड़ी बढ़ गयी थी...

मौसी- और फिर तबसे हर रात दोनों मेरे दूध चूसते हुए hi सोते हैं... और कल रात भी वही हुआ था.

माँ मौसी की बात सुनकर उनकी तरफ हैरानी से देख रही थी.. पर कुछ बोली नहीं..

माँ मन hi मन रात में जो अनुज ने किआ उसे मौसी वाली बात से जोड़कर देखने लगी और फिर उन्होंने मन hi मन दो और दो जोड़े तो उन्हें कुछ समझ आया और वो समझ गयी की रात को जो कुछ भी अनुज ने किआ वो क्यों किआ अनुज ने माँ को मौसी समझ लिए था तो माँ के मन में जो चिंता थी वो भी दूर हो गयी..

माँ को चुप देख कर मौसी थोड़ा सा परेशां सी हुई और फिर माँ का हाथ पकड़ कर बोली- क्या हुआ जीजी कुछ बोलो क्या सही किआ मैंने या गलत..

माँ ने गहरी सांस ली और फिर अपने हाथ को आगे बढाकर मौसी के हाथ पर रख दिया और बोली- शालू मैं कर्मा की बात से सहमत हूँ की वो तेरे भी बच्चे हैं और तेरा उनपर उतना hi हक़ है जितना मेरा... तो अगर तुझे अपने बच्चों के कुछ करने से ख़ुशी मिलती है, और तुझे ाचा भी लगता है तो इसमें गलत क्या है..

mausi-kya सच में जीजी?

माँ- और क्या, हाँ बहार वाले ज़रूर ये कह सकते है. की इतने बड़े बच्चों को दूध पिलाना गलत है पर बहार न तू बता रही है और बच्चे भी इतने समझदार हैं की क्या बताना है क्या नहीं ये उन्हें पता है...

मौसी माँ की बात सुनकर खुश हो गयी...

मौसी- हाय जीजी मेरे सर से बोझ उतर गया मुझे लग रहा था की मैं कुछ गलत तो नहीं कर रही..

माँ- अरे गलत कैसा अगर तुझे ख़ुशी मिलती है ाचा लगता है तो...

और रही बात बच्चों की तो तेरे ये दूध इतने सुन्दर हैं की बच्चे क्या तेरे जीजाजी भी एक बार देख लें तो बिना चूसे न छोड़ें..

माँ ने मज़ाक करते हुए.. मौसी के दूध पर हाथ रखते हुए कहा..

मौसी- धत्तत्त.

मौसी ने माँ को गले से लगा लिए और प्यार से उनके गाल को चूम लिए...

मौसी- मेरी प्यारी जीजी..

माँ ने भी मौसी को बाहों में भर लिए फिर दोनों अलग हुए तो माँ बोली- चल अब काम निपटा लेते हैं, जल्दी जल्दी से आज बहुत काम हैं...

मौसी- हाँ जीजी.. बस चलते हैं..

मौसी ने अपने ब्लाउज के हुक को बंद करते हुए कहा...

माँ- अरे खुले hi रहने दे सब को ाचा hi लगेगा...

मौसी- जीजी अब बस भी करो..

माँ- बस क्या तेरी बात सुनकर अब तो मेरी भी इच्छा होने लगी है बच्चों को अपने दूध पिलाने की बचपन की तरह hi...

माँ ने मज़ाक करते हुए कहा...

मौसी- तो पिलादो न जीजी तुम्हारे तो मेरे से भी अचे हैं...

इस बार मज़ाक में मौसी ने माँ के दूध को ब्लाउज के ऊपर से hi दबा दिया...

फिर दोनों ने अपडे कपडे पहने और काम में लग गए..

जहाँ दोनों बहनों की प्यार भरी बातें चल रही थी वहीं घर के तीनो मर्द सो रहे थे फिर कुछ काम वाम निपटा कर चाय चूल्हे पर रखकर माँ ने सबको उठा दिया... और नित्य कर्म निपटा कर सब चाय के लिए आँगन में इकठे हो गए, अनुज थोड़ा रात की बात सोचकर मन hi मन घबरा रहा था की माँ कहीं गुस्सा न करें रात जो उसने किआ उसे लेकर पर माँ को साधारण देख उसने चैन की सांस ली माँ ऐसे व्यवहार कर रही थी जैसे कुछ हुआ hi न हो तो अनुज को मन hi मन शांति हुई और साथ hi कुछ नए विचार मन में आने लगे..

सबने नाश्ता किआ फिर कुछ ज़रूरी काम थे वो निपटने लगे... क्यूंकि आज निकलना था कालक गाओं के लिए...

वैसे तो साडी तैयारियां पहले hi कर के राखी थी पर फिर भी आखिरी वक़्त पर इतने काम आ जाते हैं... कर्मा आखिरी वक़्त पर बहार के कुछ काम निपटा रहा था, पापा भी बहार थे कुछ काम से hi हालाँकि सुबह वो मौसी से नज़रें नहीं मिला प् रहे थे पर मौसी को सामान्य देख उनकी परेशानी कुछ काम हुई थी तो फिर वो ख़ुशी ख़ुशी काम पर लग गए..

कर्मा जब बापिस लौटा तो जग्गू का परिवार भी उसके घर आ चूका था सिवाए भग्गू के, वैसे भी उससे किसी को उम्मीद भी नहीं थी..

खैर साडी चीज़ें आखिरी वक़्त पर जांची गयी.. कर्मा की हिदायत अनुसार किसी ने ज़्यादा सामान नहीं लिए सिर्फ ज़रुरत का सामान और एक एक जोड़ी कपडे थे तब भी कुल मिलकर तीन पिट्ठू थैले हो गए थे जिन्हे तीनो लड़को को धोना था...

थोड़ी देर में पापा गाडी लेकर आ गए थे किसी की वो हमें छोड़कर आने वाले थे... इसलिए किसी जानकार की गाड़ी लेकर आये थे...

कुछ देर बाद राजन चाचा ममता चची और पल्ली भी घर आ गए... माँ ने ममता चाची को पापा के खाने का ध्यान रखने लिए बोलै तो चची ने गुस्सा करते हुए माँ को प्यार भरी फटकार लगाई की उन्हें ये बोलने की ज़रूरत भी क्यों पड़ी... बीच में प्रेमा भाभी भी बोल पड़ी मैं भी बुलाऊंगी चाचा को खाने पर बाउजी और मैं hi रह जायेंगे अकेले अब तो चाचा जी आएंगे तो ाचा लगेगा...

ममता चची उनसे भी आगे निकली और उनसे बोल दिया की वो दोनों भी उनके घर आ जाएं.. और उनके साथ hi खाना खाएं...

जहाँ औरतों की मंडली अलग बातों में लगी हुई थी वहीं पापा, राजन चाचा, और राजपाल ताऊ( जग्गू के पापा) तीनो लड़को को समझा रहे थे की सतर्क रहना है नै जगह होगी तो खतरा मोल नहीं लेना कोई शैतानी नहीं करनी, औरतों का ध्यान रखना है.. और यदि ज़्यादा खतरा महसूस हो तो बापिस आ जाएं कोई दूसरा तरीका ढूंढ लेंगे...

तीनो हाँ में हाँ मिलकर अचे बच्चों की तरह सर हिला रहे the..khair मर्दों के बार बार कहने पर औरतें किसी तरह बहार निकली और फिर सब गाड़ी में बैठ गयी.. मंजू तै ने अपनी बहु को घर का और अपना ध्यान रखने को कहा पर उससे भी बड़ी बात ये कहकर उन्होंने भाभी को गले से लगाया जिसे देखकर सब के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी और भाभी की आँखों में आंसू और वो अपनी सास के गले लगके रोने लगी...

तै ने उन्हें पूछकर कर किसी तरह चुप कराया फिर पल्ली ने भाभी को पकड़ा तभी आस पास जे और लोग भी आ गए रज्जो चची और नीतू लड़ो... वगेरा सब थे सब ऐसे देखने आये थे जैसे हमारी बिदाई हो रही हो .. खैर इसी तरह हम सब लोग गाड़ी में बैठे..

पापा और राजन चाचा आगे ... राजन चाचा जीप चलने वाले थे... फिर बीच वाली सीट पर तीनो औरतें माँ, मौसी और मंजू तै, साथ hi सबसे पीछे वाली पर सामान और हम तीन लड़के.

पीछे खड़े लोगों की और हाथ हिलाते हुए हम गाओं से निकल पड़े...

करीब 4-5 घंटे बाद बीच में कई बार रुकने के बाद और कई जगह पूछताछ करने के बाद हम एक जगह पहुंचे...

हैरानी की बात ये थी की कालक गाओं का बिलकुल सही पता किसी के पास नहीं था... फिर भी पूछताछ करते हुए हम एक जगह तक पहुंचे जहाँ रास्ता ख़तम हो रहा था और सामने जंगल था इसके आगे गाडी नहीं जा सकती थी...

सब लोग उतरे किसी ने बताया था की ये जंगल पर करके hi कालक गाओं है...

तो फिर सब गाड़ी से उतरे और जंगल की तरफ देखने लगे काफी घाना जंगल था..






मौसी ने कहा बड़ा डरावना जंगल है... पर सुन्दर भी है...

खैर थोड़ी देर ऐसे hi बात करके मंजू तै ने बोलै चलो फिर शाम होने को है अँधेरा होने से पहले पहुंच जाये तोह ाचा है..

सबने उनकी बात पर सहमति दिखाई...

खैर सब चलने को हुए तो माँ पापा थोड़ा अलग हुए और कुछ बात करने लगे तो मंजू तै ने दूर से hi मज़ाक करते हुए कहा...

की लैला मजनू की बातें हो गयी हो तो चलें?

तै की बात सुनकर सब हंसने लगे साथ hi माँ पापा शर्मा गए..

पर पापा ने जवाब में कहा- मेरी लैला तो तुम हो भौजी...

मंजू तै- धत्तत्तत बेशरम कहीं के..

हम सरे बच्चे उनकी नोकझोक देखकर हंस रहे थे खैर हमने अपना सामान उतरा और चाचा ने जीप घुमाई और फिर भरी मन से पापा और चाचा को सबने विदा किआ साथ hi वो समझा गए की कुछ भी गलत हो तो तुरंत बापिस चले आना...

खैर उनके जाने के बाद हमने जंगल की और देखा और फिर एक दुसरे की तरफ देखकर थोड़ी हिम्मत बढ़ाते हुए आगे बढ़ गए...

जंगल में घुसते hi एक अजीब सा एहसास होने लगा...

हम तीनो लड़के आगे और औरतें पीछे पीछे चल रही थी..

कुछ दूर hi चले थे की मौसी अचानक से चीख पड़ी जिसे सुनकर सब घबरा गए देखा तो मौसी के पास से एक खरगोश भागता हुआ गया है..

मंजू तै- अरे शालू खरगोश से दर गयी...

mausi-kya करूँ जीजी अचानक से कूद पड़ा सामने वैसे भी डरावना जंगल है..

कर्मा- अनुज और जग्गू तुम लोग पीछे रहो औरतों को बीच में रखो मैं आगे रहता हूँ... और सतर्क रहना और कुछ भी हो आवाज़ करना...

अनुज और जग्गू भी कर्मा की बात से सहमत हो गए और पीछे चले गए औरतें एक दुसरे का हाथ थामे मेरे पीछे चल रही थी....

करीब आधे घंटे सब आगे बढ़ाते रहे एक दर लग रहा था की कहीं भटक तो नहीं गए पर फिर भी चलते रहे... और कुछ खास नहीं हुआ रस्ते में बस जंगल की सुंदरता को देखकर आगे बढ़ रहे थे...






आधे घंटे चलने के बाद अचानक hi कर्मा के पेअर एक जगह रुक गए और उसके पीछे सब लोग भी रुक गए...

माँ- क्या हुआ कर्मा, रुक क्यों गया बीटा...

कर्मा ने सामने ऊपर की तरफ इशारा किया और बोलै- उधर देखो कुछ अजीब नहीं है ये..

सबने उधर देखा तो सब थोड़ा हैरान हुए सामने देखने लगे...

सामने थोड़ा सा ऊपर देखा तो रस्ते के ऊपर कुछ अजीब सी दिखने वाली चिड़ियों का झुण्ड था जो एक hi जगह गोला बनाकर घूमे जा रहा था...

चिड़िया भी ऐसी थी जो पहले कभी नहीं देखि थी...

मंजू तै- ये कौनसी चिड़िया है भाई हमने तो पहले कभी नहीं देखि....

माँ- हाँ जीजी देखे तो हमने भी नहीं है..

मौसी- और ये इतनी नीचे घूम कैसे एक hi जगह रही हैं गोला बनाकर बड़ा hi अजीब जंगल है ये..

कर्मा- अजीब तो है खैर आगे बढ़ाते हैं पर सब लोग सावधान रहना...

सब लोग फिर आगे बढ़ने लगे... थोड़ी देर बाद रास्ता और संकरा हो गया और पेड़ और घने हो गए या कहूं की अब रास्ता था hi नहीं पेड़ों के बीच से जाना था कहीं बीच में झाड़ियों को हटते हुए तो कहीं काटों भरे पेड़ों से बच कर सब धीरे संभल के आगे बढ़ रहे थे...

एक जगह पहुंचे तो देखा काफी घनी झाड़ियां थी तो कर्मा अनुज और जग्गू ने मिलकर डाँडो से उन झाड़ियों को कटा और निकलने के लिए जगह बनाई... वो झाड़ियां पार करते hi ऐसा लगा की जंगल और सुन्दर हो गया है... थोड़ा आगे चले तो एक जगह से धुआं उड़ता दिखाई दिया... हमें लगा की शायद कोई इंसान होगा या इंसानी बस्ती तभी तो धुआं आ रहा है..

सब लोग जल्दी जल्दी दुआएं की तरफ बढ़ने लगे... करीब पहुंचे तो देखा की वैसी hi झाड़ियां और थी और उसके पार से धुआं आ रहा है... लड़कों ने मिलकर एक बार फिर से झाड़ियों को कटा और फिर औरतों को पार करवाया...

सामने एक बेहद पुराण और शायद उनकी ज़िन्दगी में उनके द्वारा देखा गया सबसे बड़ा पेड़ था.....

पेड़ का तना hi इतना चौड़ा था मनो उसके अंदर एक कमरा बन सके साथ hi उसकी पत्तियां और शाखायें इतनी फैली थी जहाँ वो लोग खड़े थे वहां तक आ रही थी...

अनुज- ओह्ह्ह्ह कितना बड़ा पेड़ है ये...

मंजू तै- लग तो पीपल का रहा है..

माँ- हाँ पीपल hi है... इतना बड़ा पेड़ और किसी का हो hi नहीं सकता...

कर्मा- धुआं भी पेड़ के पीछे से hi आ रहा है चलो चलकर देखते हैं कोई है की नहीं ..

सब हाँ में हाँ मिलकर चलने लगे..

( आगे की कहानी कर्मा की ज़ुबानी)

सब पेड़ के पास पहुंचे और तने से घूम कर दूसरी तरफ गए तो देखा एक परछाई दिखाई दी ऐसा लग रहा था कोई बड़ी सी शाल ओढ़कर बैठा है आग के पास उसकी पीठ हमारी तरफ थी उसके बगल में एक डंडे या बड़ी सी छड़ी जैसा कुछ पड़ा हुआ था...

थोड़ा अजीब था इतने घने जंगल के बीच अकेले किसी का यूँ मिलना खैर हम सबने एक दुसरे की और देखा सब के चेहरे पर थोड़ी हैरानी और परेशानी थी फिर मैंने दो कदम आगे बढ़ाये और उसे पुकार..

में- सुनिए... भाई साब..

उस आदमी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो मैंने सब की तरफ देखते हुए दोबारा पुकारा...

इस बार वो कुछ हिला और उठने लगा शाल उसके शरीर से नीचे गिर गया...

और फिर जब हम सबकी नज़रें उस गिरे हुए शाल से ऊपर उठी तो आँखें फटी की फटी रह गयी...

सामने जो खड़ा था समझ नहीं आ रहा था इंसान था या राक्षस..

8 फुट लम्बा, चौड़ा इतना की मैं अनुज और जग्गू तीनो उसमे समां जाएं फिर भी पूरे न हो पाएं..

रंग ऐसा की देख के अँधेरा भी दर jaye...rukPoora बदन कैसा हुआ एक एक मांसपेशी नज़र आ रही थी....






हम सब की तो उसको देखकर hi फैट गयी... खैर हमने एक दुसरे को देखा और फिर से मैंने हिम्मत करके पुछा- भाई साब नमस्ते... क्या आपको कालक गाओं जाने का रास्ता पता है?

उसने मेरी तरफ देखा पर कोई जवाब नहीं दिए

हम लोग थोड़ा घबराने लगे वो साला टकटकी लगाए हमारी तरफ hi देखे जा रहा था…

मैंने थूक गटकते हुए फिर से बोलै भाई साब क्या आप जानते हैं?

उसने मुझे हाथ से रुकने का इशारा किआ हम सब चुप हो गए… वो बापिस बैठ गया और हाथ में जो कपडा था उसे जलने लगा मैंने ध्यान से देखा तो वो एक ब्लाउज था जिसे वो जला रहा था, मैंने आग में पड़े हुए कपड़ो को देखा तो कुछ कुछ समझ आ रहा था की और भी ब्लाउज और पेटीकोट hi जल रहे थे… मुझे थोड़ा अजीब लगा की ये औरतों के कपडे क्यों जला रहा है इस तरह से अकेले में और साला कितना खतरनाक है कुछ बोलता भी नहीं है…


ब्लाउज जलने के बाद वो खड़ा हुआ और एक बार मेरी तरफ देखा और फिर हाथ से पीछे चलने का इशारा किआ और आगे चलने लगा…

हम सब घबराये से सोच रहे थे की जाएं या न जाएं इसके साथ पर अब कोई दूसरा रास्ता तो था नहीं तो चल दिए उसके hi पीछे… सब खुसर पुसार करते हुए चल रहे थे.


अनुज- कितना तगड़ा आदमी है ये मुझे तो एक हाथ से उठा कर कितनी दूर फ़ेंक देगा…

मंजू तै- अरे जाने आदमी है भी या नहीं हमें तो राक्षस लगत है…

मंजू तै की बात सुनकर न चाहते हुए भी हंसी आ गयी और जिसकी आवाज़ शायद उसने भी सुनली और पलट कर वैसे hi चेहरे से देखा हमारी हंसी गायब हो गयी…

चलते चलते एक ऐसे जगह पहुंचे जहाँ रास्ता बंद था एक तरफ झाड़ियां एक तरफ पठार और सामने एक अजीब सी दीवार थी जो की पेड़ों के तनो को बांध कर बनाई हुई थी…

वो दानव रुपी आदमी बगल में पड़े एक पत्थर पर ज़ोर लगाने लगा मैंने सोचा साला पागल तो नहीं है बेकार में पठार को धकेल रहा है, सही में राक्षस hi है… तभी उसने ज़ोर लगते हुए एक पत्थर को लुढ़का दिए और पत्थर के लुढ़कते hi एक चर्रर्र की आवाज़ हुई और वो लकड़ी की दीवार हिलने लगी… हम सब लोग एक एक कदम पीछे हो गए दर के और फिर वो दीवार पीछे की तरफ खिसकती हुई चली गयी और उसके हटती hi एक कुएं जैसा गाढा सामने आ गया…

मैंने थोड़ा आगे बढ़ कर देखा तो वो कुआँ नहीं था एक खुफिया रास्ता था सुरंग जैसा जिसमे नीचे जाने की सीढ़ियां बानी हुई थी… वो दानव उन सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे बाकि सब मेरी तरफ देख रहे थे मैंने भी सबको आगे चलने का इशारा किआ और हम सब आगे बढ़ चले काळा दानव के पीछे…

आगे जाकर अँधेरा होता जा रहा था और एक समय पर गुप्प अँधेरा हो गया मैं उसके पैरों की आवाज़ का पीछा करते हुए रस्ते को टटोलते हुए आगे बढ़ रहा था मेरा हाथ माँ ने पकड़ रखा था और ऐसे hi हम सब ने एक दुसरे का हाथ पकड़ रखा था…

कुछ देर यूँ hi चलने के बाद अचानक से hi हम लोगो की आँखों में एक रौशनी पड़ी जिससे हमारी आँखें चौंधिया गई… और हम उस रस्ते से बहार आ गए कुछ देर में जब आँखें रौशनी की अभ्यस्त हुई तो आस पास नज़र दौड़ा कर देखा तो सामने एक लकड़ी का बड़ा सा दरवाज़ा था और उसके इर्द गिर्द थी कागि ऊँची कच्ची दीवार… दरवाज़े के पास जाकर वो आदमी रुक गया और पलट कर देखने लगा… उसने एक इशारे से हम तीनो लड़को को एक तरफ किआ और औरतों को वैसे hi रहने दिया… फिर उनके करीब बढ़ने लगा हमारे दिल की धड़कन बढ़ने लगी… मन में ख्याल आने लगे की कहीं ये कोई नुकसान तो नहीं पहुचायेगा …

माँ मौसी और तै तीनि अगल बगल कड़ी थी माँ बीच में थी… वो जाकर तीनो के सामने खड़ा हो गया और ध्यान से देखने लगा मैंने देखा तो उसकी नज़र उनकी छूछीयों पर थी कभी माँ की तो कभी तै की तो कभी मौसी की छूछीयो पर नज़र फेर रहा था…

मुझे दर भी लगने लगा साथ hi मैं कुछ करने के तरीके भी सोचने लगा.

माँ तै और मौसी की हालत दर के मरे ख़राब थी और जिस तरीके से वो उन्हें घूर रहा था बेचारी सांस रोके कड़ी ही थी…

कुछ देर यूँ hi सामने खड़े होने के बाद उसने कदम बढ़ाये और अब उन तीनो के पीछे जाकर खड़ा हो गया.. बेचारी तीनो इतनी दरी हुई थी की पीछे मुड़कर भी नहीं देख रही थी पर उस कला दानव की नज़रें अब तीनो के साड़ी में उभरे हुए चूतड़ों पर घूम रही थी… मुझे कुछ सही नहीं लग रहा था पर अभी कुछ कर भी नहीं सकता था… पर मैं मन hi मन कुछ गलत होने पर क्या करना है उसकी तयारी कर रहा था.

ऐसे hi कुछ देर तक चूतड़ों को घूरने के बाद वो कला दानव फिर से चला और इस बार फिर से दरवाज़े की तरफ जाकर खड़ा हो गया और फिर दरवाज़े में लगी हुई कुछ कीलों को घूमने लगा… फिर पीछे हैट गया कुछ पल बाद वो विशाल दरवाज़ा खुलने लगा..

धीरे धीरे दोनों कपाट पूरे खुल गए सामने देखा तो फूलों का एक पर्दा जैसा लटका हुआ था वो अंदर बढ़ा साथ hi हम भी और जैसे hi हम सब अंदर हुए वो दरवाज़ा बंद हो गया… एक बार हमने दरवाज़े को देखा और फिर एक दुसरे को और कुछ हिम्मत करके आगे बढे आगे चलकर काळा दानव ने फूलों के परदे को हटाया और हमें आगे बढ़ने का इशारा किआ हम परदे से निकल कर बहार आये तो देखा सामने एक रास्ता जा रहा था और उसके दोनों तरफ कच्चे घर बने हुए थे.. हर तरफ पेड़ hi पेड़ थे… हरियाली hi हरियाली थी…. देखने में गाओं बेहद सूंदर लग रहा था…


अनुज- क्या सुन्दर गाओं है न..

Jaggu-haan यार ऐसा गाओं तो आजतक नहीं देखा.

मंजू तै- वो सब छोडो अब आगे क्या करना है ये सोचो…

में- अब वो तो ये राक्षस hi बताएगा..

मैंने इतना बोलै hi था की वो हमारे सामने आ गया और फिर से अपना पीछे चलने को इशारा करके आगे चलने लगा…

हम फिरसे उसकी पूँछ बन लिए साथ hi दोनों तरफ जो घर बने उन्हें देख रहे थे… मिटटी से बने हुए घर थे जिनपर अचे से रंगाई करके उन्हें खूबसूरती से सजाया गया था… कुछ घरों के बहार ौराएँ काम कर रही थी और हमें जाते हुए थोड़ा अजीब नज़रों से देख रही थी… वहीं औरतों का पहनावा भी थोड़ा अलग सा था ऊपर ब्लाउज था और नीचे साड़ी या लुंगी जैसा कुछ पहना था जिसका पल्लू नहीं था पेट का हिस्सा खुल्ला था…. आदमी और लड़को ने कुरता धोती पहन rakhtha...Hum दोनों तरफ झांकते हुए आगे बढे जा रहे थे और लोगो को देख रहे थे..






थोड़ी और आगे बढे तो अनुज ने इशारे से सबको एक तरफ देखने को कहा हमने देखा तो एक तालाब था बेहद hi sundar…par उसी तालाब के किनारे एक बड़े से सांड की मूर्ति बानी हुई थी जिसके ऊपर एक लड़की या औरत बैठी हुई थी बिलकुल नंगी.. मैंने सोचा साला नंगी मूर्ति क्यों राखी है धक् hi देते या कपडे hi पहना देते.

थोड़ी देर और चलने के बाद हम ऐसी जगह पहुँच गए जहाँ रास्ता ख़तम होता था और सामने एक बड़ा सा आलिशान महल जैसा मकान था… जिसका एक बड़ा सा दरवाज़ा था…






जिसके दोनों तरफ उसी काळा दानव जैसे दो और दानव खड़े थे और पहरेदारी कर रहे थे…

मैंने मन में सोचा साला इनके यहाँ दानव बनाने की मशीन है क्या

खैर काळा दानव ने पहरेदार की तरफ कुछ इशारा किआ और फिर एक पहरेदार ने दरवाज़ा खोल दिया… उसके बाद कला दानव आगे बढ़ा और हमें पीछे आने का इशारा किआ अंदर आते वक़्त दोनों पहरेदारों ने तीनो औरतों के उभारों को आँखों में अचे से उतार लिए .

कला दानव हमें महल के अंदर ले गया जहाँ एक चौड़े से गलियारे से गुजरने के बाद एक खुले हुए दरवाज़े के परदे हटाकर उसने हमें अंदर जाने का इशारा किआ हम अंदर आ गए साथ hi वो भी और एक तरफ सर झुककर खड़ा हो गया…

मैं नज़र घुमाकर देखने लगा महल सवह में काफी आलीशान था… और जिस बड़े से कमरे में या जो भी ये था वो हमें लेकर आया था वो भी बहुत आलीशान था चरों तरफ रंग बिरंगे बड़े बड़े परदे पूरे कमरे में कालीन बिछा हुआ था पर एक बात अजीब थी के चरों तरफ कालीन पर hi गद्दे पड़े हुए थे और हर गद्दे पर गोल गोल बड़े बड़े तकिये बिलकुल जैसे फिल्मों में मुजरा देखने के लिए जैसे गद्दों पर बैठ कर देखते थे बिलकुल वैसे hi कमरे को सजाया था..

सोचा यहाँ कौन मुजरा करता होगा ये कला दानव…

सोचकर मुस्कुराने laga…Hum सब कामखियों से एक दुसरे को देखकर समझने की कोशिश कर रहे the…ki क्या हो रहा है पर समझ किसी को कुछ नहीं आ रहा था.

तभी उसी कमरे में एक दूसरा दरवाज़ा था वो खुलने लगा और तभी जो कला दानव हमें लेकर आया था वो अपने घुटनो पर बैठ गया… वैसे तो साला घुटनो पर बैठकर भी खड़ा जैसा hi लग रहा था लम्बा hi इतना था,

हम सबकी नज़र पहले दानव पर गयी और फिर दरवाज़े पर और फिर धीरे से दरवाज़ा खुला…


इसके बाद क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.
 
तभी उसी कमरे में एक दूसरा दरवाज़ा था वो खुलने लगा और तभी जो कला दानव हमें लेकर आया था वो अपने घुटनो पर बैठ गया… वैसे तो साला घुटनो पर बैठकर भी खड़ा जैसा hi लग रहा था लम्बा hi इतना था,

हम सबकी नज़र पहले दानव पर गयी और फिर दरवाज़े पर और फिर धीरे से दरवाज़ा खुला…

अपडेट 123

ये साला कौन हो सकता है जिसके सामने इस काळा दानव ने भी घुटने तक दिए, मतलब जो आ रहा है वो इससे भी तगड़ा होगा… ाचा फसे कर्मा…

इतने सस्पेंस के बाद दरवाज़ा खुला और फिर परदे अचानक से दोनों तरफ फेंके गए और उसमे से एक साया निकला जब मेरी नज़र उस पर गयी तो मैं तो बिलकुल चौंक गया…

साला सोचा पहाड़ निकली चुहिया… मैंने कोई तगड़ा आदमी सोचा था पर ये तो औरत निकली

सामने एक पुराने समय में जैसे कपडे पहने जाते थे वैसे कपडे पहने हुए एक औरत थी जिसकी उम्र मेरी माँ जितनी hi लग रही होगी.. पर जिस अंदाज़ से वो चलकर आई बिलकुल रानियों जैसे.






हम सब लोग सवाल भरी नज़रों से उसे देख रहे थे वो सामने आकर जैसे hi रुकी मुझे कुछ सूझा और मैंने उसे झुककर प्रणाम किआ, और मुझे देखकर बाकि सबने भी उसे प्रणाम किआ..

वो ऐसे hi सीढ़ी कड़ी रहकर हम सबके चेहरे पर देखती रही और फिर कुछ पल बाद मुस्कुराई और फिर हमारे प्रणाम को स्वीकार किआ और फिर एक पल के मौन के बाद बोली- ओह्ह्ह मेहमान आये हैं… पुत्र कालजंग कोई तकलीफ तो नहीं हुई हमारे मेहमानो को…

उसने उस काले दानव को देखते हुए कहा जो अपने एक घुटने को झुकाये बैठा हुआ था.. बिलकुल दास की तरह…

मैं चौंक गया की ये इसे पुत्र क्यों बोल रही है कहीं से कहीं तक ये इसका बीटा नहीं लग रहा.. साला क्या सन है समझ नहीं आ रहा. और इस साले का नाम कालजंग है, लगता भी साला काल hi है.

कला दानव उर्फ़ कालजंग वैसे hi सर झुकाये हुए नीचे देखते हुए hi बोलै- नहीं बड़ी माता.. कोई तकलीफ नहीं होने दी.

औरत- बहुत बढ़िया अब तुम जाओ और हमारे मेहमानो के लिए खाने पीने का प्रबंध करो… तब तक हम अपने मेहमानो से अचे से परिचित हो जाते हैं.

उस औरत ने हम सबकी तरफ देखते हुए कहा.

कालजंग उठ कर चला गया.

औरत ने एक कदम हमारी तरफ बढ़ाया और बोली- तो अब बताएं कौन हैं आप लोग और किस कारणवश मुझे आपकी उपस्थिति का सौभाग्य प्राप्त हुआ.


मैंने मन में सोच hi रहा था ये तो कितनी सभ्यता और प्रेम से बात कर रही है हम बेकार hi दर रहे the.maine गले को साफ़ करते हुए सबसे परिचय कराया और साथ hi अपने आने की वजह भी बताई बाबा के मिलने से लेकर यहाँ तक सब कुछ.

वो मेरी बात सुनकर थोड़ा मुस्कुराई. और फिर खुश होते हुए बोली- बहुत ाचा.. और मुझे तो बहुत ख़ुशी होगी की मैं किसी भी तरह से आप लोगो के काम आ सकूँ…

और इसके साथ hi वो बढ़ कर मेरी तरफ आई और फिर मेरे सर पर हाथ फिराया जैसे आशीर्वाद दे रही हो, फिर मेरे बाद जग्गू और अनुज के साथ भी अइसही किआ, उसके बाद मौसी के पास गयी और उन्हें तो अपने गले से लगा लिए और बोली- आपसे मिलकर बहुत ख़ुशी बहन.

और उसके बाद उसने मौसी को छोड़ दिए

हम सब उनकी तरफ hi देख रहे थे मौसी के चेहरे पर थोड़े से परेशानी भरे भाव थे उससे गले मिलने के बाद.

उसके बाद उसने तै को गले से लगाया जब उन्हें छोड़ा तो तै थोड़ा झिझक सी रही थी.. और अंत में माँ के साथ भी वैसा hi किआ जब माँ को छोड़ा तो माँ भी थोड़ी सोच में दिखी…

मुझे भी कुछ समझ नहीं आया की ऐसा क्यों है… जब सबसे मिल ली तो बोली.

औरत- अरे मैं भी कितनी भुलक्कड़ हूँ आप सब से तो मिल ली पर अपना परिचय तो दिया hi नहीं..

मैं ब्रांडमाती हूँ, कालक गाओं की मुखिया और. यहाँ सब लोग मुझे प्रेम से बड़ी माँ कहकर पुकारते हैं….

हम सब उसकी इतनी आदर सत्कार भरी बातें सुनकर थोड़ा सा चैन में आ गशये थे और मन में जो दर था काम हो गया… हमने सोचा हम बेफिज़ूल में hi दर रहे थे ये तो इतनी अछि हैं…

औरत- अरे आप सब बैठिये न खड़े क्यों हैं…

हम सब उन्ही मुजरे वाले गद्दों पर बैठ गए साथ hi वो भी एक ऊंचे से गद्दे पर बैठ गयी… बिलकुल रानियों जैसा अंदाज़ था उसका…

खैर बैठने के बाद समझ नहीं आ रहा था क्या बात करें तो मेरे मन में प्रश्न आया मैंने सोचा ये hi पूछ लेते हैं.


में- बड़ी माँ क्या मैं कुछ पूछ सकता हूँ अगर आपकी आज्ञा हो तो?

ब्रांडमाती( बड़ी माँ)- बिलकुल पुत्र निसंकोच पूछो..

में- बड़ी माँ इस गाओं का नाम थोड़ा अलग नहीं है कालक, इसका क्या मतलब है या इसके पीछे कोई कहानी है…

बड़ी माँ ने मेरी तरफ एक बार देखा और फिर ऊपर देखकर कुछ याद करने लगी.

बड़ी माँ- ाचा प्रश्न है पुत्र. इसके पीछे एक लम्बी कहानी है.

में- अगर आपकी आज्ञा हो तो क्या हम जान सकते हैं.

बड़ी माँ- अभी से करीब 400 वर्ष पहले, यहाँ से 20 मील दूर एक छोटा सा राज्य हुआ करता था, कुशालपुर, जिसमे करीब 60-70 गाओं आते थे आस पास के, छोटा मगर बेहद सुखी और श्रमसाध्य राज्य था, लोगो के पास किसी चीज़ की कमी नहीं थी.

कुशल पुर के राजा थे कुशल सिंह जिन्होंने इस राज्य की स्थापना की थी. सब बहुत ख़ुशी ख़ुशी रहते थे राजा प्रजा का पूरा ख्याल रखते थे..

परन्तु राजा कुशल सिंह के जीवन में भी एक परेशानी थी एक खली पैन था और वो थी संतान की कमी, उन्होंने और उनकी पत्नी ने बहुत से प्रयत्न किये पर संतान प्राप्ति न हो सकीय…

उनकी पत्नी रानी लोकमती खुद को इस कमी के लिए कोसती रहती, अकेले में कूदती रहती हालाँकि राजा कुशल सिंह ने उनसे ऐसा कभी कुछ नहीं कहा…

उन्ही दिनों में रानी लोकमती को अपनी दासियों से कुछ तांत्रिकों के बारे में पता चला जो की उनकी मदद कर सकते थे.

रानी लोकमती ने उनसे मिलने की इच्छा जताई और दासी से उन तांत्रिक को बुलाने के लिए कहा..

रानी की आज्ञा पाकर दासी ने तांत्रिकों को बुलावा भेज दिया और तीन दिन बाद hi तीन तांत्रिकों उनके महल में आये राजा को इस बारे में अभी तक कुछ नहीं पता था.

खैर तीनो तांत्रिक रानी से मिले रानी ने उन्हें अपनी व्यथा सुनाई जिसे सुनकर तीनो तांत्रिकों ने कुछ आपस में बात करके रानी को एक उपाय बताया जिसमे उन्हें कुछ काली शक्तियों को प्रसन्न की होगा उसके बाद उनकी इच्छा पूरी हो जाएगी परन्तु ये कार्य इतना आसान नहीं होगा इसके लिए बहुत सी शर्तों को मन्ना पड़ेगा..

रानी जो संतान सुख के लिए प्यासी थी वो बिना कुछ सुने hi मान गयी.

तांत्रिकों ने बताया की रानी को पास hi के जंगल में अकेले रहकर 13 महीने तक उनकी बताई विधि अनुसार.. काली शक्तियों को प्रसन्न करना होगा उसके बाद hi उनकी इच्जा प्राप्ति होगी..

रानी ने ये बात राजा कुशल सिंह को बताई पर कुशल सिंह को रानी की चिंता थी तो उन्होंने रानी से मन कर दिए. रानी ज़िद्द करने लगी तो राजा ने कहा की जंगल मैं अकेले उन्हें कैसे रहने दे सकते हैं. लालः खतरे होते हैं वहां कहीं कुछ हो गया तो.

पर रानी तो संतान सुख में अंधी हो चुकी थी वो ज़िद्द पर अड़ गयी.

पर राजा ने भी साफ़ मन कर दिया ये कहते हुए की वो ये जोखिम नहीं उठा सकता संतान छह में वो पत्नी को नहीं खोना चाहते थे और ये बात उन्होंने रानी से भी साफ़ साफ़ खड़ी..


पर संतान छह में अंधी हो चुकी रानी को संतान के अलावा और कुछ नहीं दिख रहा था, राजा के मन करने के बाद भी रानी ने ज़िद्द नहीं छोड़ी और गुस्सा होकर बैठ गयी… पर राजा फिर भी नहीं मने तो रानी ने ज़िद्द करते हुए अण्णन जल त्याग दिया…

और भूखी रहने लगी कुशल सिंह ने काफी मानाने की कोशिश की बाकि के परिवार वालों ने भी बहुत आग्रह किआ पर रानी लोकमती नहीं मानी.. अंत में जाकर राजा को हारकर लोकमती को अनुमति देनी पड़ी…

और रानी फिर तांत्रिक के बताये अनुसार जंगल में काली शक्तियों की पूजा करने के लिए चली गयी… वो भी ऐसे गुप्त स्थान पर जिसका पता न राजा को था और न hi किसी और को.

खैर रानी लोकमती जंगल में चली गयी और राजा उनके इंतज़ार में रहने लगे.. 13 महीने बाद रानी लौटी राजा ने बड़ी उत्सुकता और धूम धाम से उनका स्वागत kia…par कुशल सिंह ने जब रानी को 13 महीने बाद देखा तो बिलकुल हैरान से रह गए वो बिलकुल hi बदल गयी थी… राजा को लगा था जंगल की ज़िन्दगी में वो कमज़ोर और बदसूरत लगने लगी होंगी पर यहाँ तो उसके उलट था लोकमती पहले से भी ज़्यादा सुन्दर लगमे लगी थी. बहुत बदली बदली सी नज़र आ रही थी रानी लोकमती, चेहरा खिला हुआ शरीर भरा हुआ आँखों में एक अलग सी chamak.aisa लग रहा था लोकमती की तो काया hi पलट हो गयी है…

पूरे राज्य में भयवा स्वागत समारोह हुए.

रानी बापिस अपने महल और कुशल सिंह के पास लौटी, कुछ दिन बाद दिनचर्या साधारण हुई, और 9 महीने बाद महल में किलकारी गूंजी जिससे पूरे राज्य में ख़ुशी की लहार दौड़ गयी.

कुशल सिंह के यहाँ चाँद सी सुन्दर पुत्री ने जन्म लिए… जिसके मुख को देखकर hi राजा अपने सरे दुःख भूल गए इतनी सुन्दर कन्या शायद hi किसी ने देखि थी.

राजा ने बड़े बड़े विद्वान पंडितों को बुलाया पर सब कुछ देखने के बाद भी कोई भी पंडित विद्वान कन्या के बारे में कुछ नहीं बता पाया. साथ hi देखकर बापिस भी लौट गए. ये कहकर की ये काली शक्ति की उपज है हम इसका कुछ नहीं कर सकते.

खैर राजा रानी थोड़े उदास तो हुए पर रानी और आसपास के परिजनों के समझने पर कन्या का नाम रखा गया कन्या लीला कुंवारी खैर इसी के साथ ख़ुशी ख़ुशी राजा रानी कन्या की देखभाल करने लगे और कन्या लीला कुंवारी बड़ी होने लगी..

पर जब लीला कुंवारी 13 वर्ष की हुई तो अचानक से रानी लोकमती महल से गायब हो गयी. राजा ने खूब ढूंढने की कोशिश की पर रानी का कोई अत पता नहीं चला… लीला कुंवारी और राजा बहुत दुखी हुए पर एक दुसरे का सहारा बनकर वो समय व्यतीत करने लगे.

लीला के 18 वर्ष के होने पर राजा ने भेंट के रूप में लीला के लिए एक गाओं का निर्माण करवाया जिसका नाम कन्या लीला पुर रखा गया… जिसे देखकर लीला को बहुत ख़ुशी हुई क्यूंकि वो 18 वर्ष की हो चुकी थी तो लीला के लिए बहुत से रिश्ते आने लगे… आस पास के राजा और ज़मींदारों के बेटों की तो जैसे पंक्ति लग गयी… और इनमे से hi किसी एक को लीला ने पसंद किआ और उसके साथ विवाह करके चली गयी.

राजा कुशल सिंह भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाकर बेहद खुश हुए और अपना सब कुछ लीला के नाम कर दिया… और संत बन गए.

वहीं लीला अपने ससुराल जाकर और अपने पति का प्यार पाकर खुश थी पर धीरे धीरे दिन बीतते गए लीला के पति का प्यार काम होता गया.

लीला ने अपने पति को खुश करने के लिए अपने पिता की और से मिली साडी संपत्ति अपने पति के नाम कर दी.. जिससे उसका पति कुछ दिन तो खुश रहा पर फिर से वो उसके साथ बेरुखी से पेश आने लगा. इसी दौरान लीला ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया.. पति की बेरुखी को भूलकर लीला ने अपना ध्यान अपने पुत्र की देखभाल में लगा लिए और उसी को अपना जीवन समझ कर व्यतीत करने लगी.


पर जब उसका पुत्र 3 वर्ष का हुआ तो उसके साथ एक बड़ी असहनीय घटना घटित हुई, उसके पिता सामान ससुर ने उसके साथ जबरदस्ती सम्भन्ध बनाने की कोशिश की, लीला ने किसी तरह से खुद को बचाकर ये बात अपने पति को बताई तो अपने पिता को रोकने की वजाये उसके पति ने पिता का साथ दिए और जब लीला ने इसका विरोध किआ तो उन्होंने उसके पुत्र को मरने की धमकी दी और मजबूर होकर लीला को उनकी शर्त को मन्ना पड़ा और अपनी देह अपने ससुर को सौंपनी पड़ी.

उसे एक कक्ष में बंद करके रखा जाता जहाँ जब कभी उसके ससुर का या पति का मन करता उसके साथ सम्भन्ध बनाते, उसके शरीर को नोचते मसलते… और हद तो तब हो गयी जब वो लोग अपने साथ साथ अन्य लोगो के सामने भी लीला को परोसने लगे.

लीला एक दिन मौका देख कर किसी तरह से अपने पुत्र के साथ वहां से भाग निकली पर भागने में वो बुरी तरह से घायल हो गयी… पर किसी तरह से जान बचाकर वो अपने बच्चे को सीने से चिपकाये हुए वहां से दूर निकल गयी और एक जगह पर जाकर थक कर गिर गयी… उसका बच्चा वहां पड़ा पड़ा रो रहा था पर उसकी आँखें कमज़ोरी से बंद होती जा रही थी..

आखिरी में उसकी बंद होती आँखों में एक धुंधला सा साया दिखा और फिर वो बेहोश हो गयी..

जब लीला को होश आया तो वो अपने बच्चे को पुकारते हुए चीखकर उठी.. उसने उठ कर आस पास देखा तो वो एक कुटिया में थी. जहाँ थोड़ी देर बाद hi एक औरत आई जिसे देखकर लीला को एक और झटका लगा. वो औरत और कोई नहीं बल्कि उसकी अचानक गायब हुई माँ लोकमती थी. अपनी माँ को देखकर लीला कई भावों में डूब गयी और सुबक सुबक कर अपनी माँ के गले से लगे हुए रोने लगी. फिर लीला ने अपनी माँ को अपनी आप बीती बनाई जिसे सुनकर उसकी माँ आग बबूला हो गयी. और लीला के पति और ससुर से बदला लेने की सोचने लगी. पर लीला ने समझाया की वो लोग बहुत ताकत वॉर हैं हम उनका कुछ नहीं बिगड़ सकते.

इस बात पर लोकमती मुस्कुराई और अपनी बच्ची को गले लगते हुए बोली की पुत्री अब उन्हें हम अपनी ताकत दिखाएंगे… और इसके बाद लोकमती ने कुछ तांत्रिको के साथ मिलकर लीला को काली शक्तियों के बारे में सिखाया, और कुछ Hi समय में लीला अपनी माँ से भी अछि तरह शक्तियों का इस्तेमाल सीख गयी…


फिर दोनों माँ बेटी ने मिलकर लीला के पति और ससुर से प्रतिशोध लिए अपनी शक्तियों के प्रयोग से, धीरे धीरे उनका परिवार बर्बाद होने लगा एक के बाद एक मौत होने लगी और अंत में पूरे परिवार का नामो निशान मिट गया.

तब जाकर लीला के मन को शांति मिली फिर लीला ने अपनी माँ की मदद से उसी गाओं में जो उसके पिता ने उसके लिए बनाया था उसमे एक महल बनाया और साथ hi कुछ शक्तियों से उसको घेर दिया जिससे कोई बहरी खतरा उसके अंदर न आ सके. और लीला अपने पुत्र और अपनी माँ के साथ जीवन व्यतीत करने लगी पर साथ में hi वो ऐसी औरतों को भी ढूंढ कर लेट रहे जिनके साथ कुछ अन्याय हुआ हो और उसे गाओं में जगह दे देते पर गाओं में रहने की एक शर्त थी की गाओं में किसी भी शादीशुदा मर्द या यु कहें की पिता का जाना निषेद था. सिर्फ औरतें पुत्र और पुत्री hi रह सकते थे यदि कोई पुत्र बड़ा होकर शादी करना चाहता तो उसे हमेशा के लिए hi गाओं छोड़कर जाना पड़ता.. तो उन्ही लीला के नाम पर ये गाओं है कालक यानि कन्या लीला कुंवारी, और मैं उन्ही की वंसज हूँ…. और उनके द्वारा बनाये हुए इस गाओं को आगे बढ़ा रही हूँ. लीला कुंवारी काली शक्तियों की उस समय की सबसे ज्ञानी तांत्रिको में से एक बानी और उन्होंने कई असाधारण वस्तुओं का निर्माण किआ जिनमे अलौकिक शक्तियां होती हैं. और हम सब उन्ही की चलाई हुई प्रथा को आगे बढ़ा रहे हैं.

बड़ी माँ- तो ये है इस गाओं का पूरा इतिहास.

हम सब लोग उनकी कहानी को सुनकर हतप्रभ थे और एक दुसरे को देख रहे थे…

में- बड़ी माँ अगर यहाँ कोई ब्याह hi नहीं करता और जो करता है उसे गाओं छोड़ना पड़ता है तो एक के बाद दूसरी पीड़ी कैसे आई.?

बड़ी माँ मेरी बात सुनकर मुस्कुराई.

बड़ी माँ- चंचल मन, अधीर मन सब जान्ने को उत्सुक मन, बड़ा hi चंचल मन है रे तेरा… ाचा है पर थोड़ा ठहर, सांस ले, समय के पास हर सवाल का जवाब है, हर टेल की कुंजी है… जो मैं न बताऊँ वो समय बतादेगा.

मुझे कुछ बात समझ आ गयी वहीं माँ ने भी मुझे आँखें दिखाकर चुप रहने का इशारा दिया..

हम बैठे hi थे की तभी परदे एक बार और हेट और एक और साया अंदर आया जब उसपर नज़र गयी तो आँखें खुली की खुली hi रह gayi…aur गाला सूख गया…

सामने एक लड़की कड़ी थी, और लड़की थी या पारी समझ नहीं आ रहा था इतनी खूबसूरत, हाय शायद खूबसूरत शब्द भी उसके लिए बहुत छोटा पद जायेगा, ऐसा खूबसूरत सुन्दर चेहरा मैंने पहले नहीं देखा था ऐसा रूप. जिसे देखकर स्वर्ग की अप्सराएं शर्मा जाएं…






दूध सा गोरा रंग, कांच जैसा बदन… उसकी वेशभूषा से कोई राजकुमारी hi लग रही थी..…

सिर्फ मैं hi नहीं बाकि सब लोग भी उसकी सुंदरता को देखकर हैरान थे साथ hi उसको अजीब नज़रों से घूरे जा रहा था.


इसके आगे क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट.
 
दूध सा गोरा रंग, कांच जैसा बदन… उसकी वेशभूषा से कोई राजकुमारी hi लग रही थी..…

सिर्फ मैं hi नहीं बाकि सब लोग भी उसकी सुंदरता को देखकर हैरान थे साथ hi उसको अजीब नज़रों से घूरे जा रहा था.



अपडेट 124


वो लड़की आकर बड़ी माँ के बगल में कड़ी हो गयी…

बड़ी माँ ने उसे अपने पास बिठा लिए और बोली- ये है मेरी प्यारी बेटी चित्रावती.. और बेटी ये लोग हमारे मेहमान हैं.

उस लड़की ने हमारी तरफ देखा और बोली..

चित्रावती:-

जो तुम हो मेहमान,

क्यों मुझे देख हो हैरान,

नज़रें गड़े हो ललाट पर,

क्या मेरे चेहरे पर है कोई निशान?

हम सब और हैरानी से एक दुसरे की तरफ देखने लगे… की ये क्या बाला है भाई.

बड़ी माँ- मेरी बेटी को कविता का बहुत शौक़ है, अधिकतर वो कविता में बात करना hi पसंद करती है..

मुझे उसका ये अंदाज़ पसंद आया क्यूंकि मुझे भी कविताओं का शौक़ था… तो मैंने उसकी बात का जवाब दिए..

में- हाँ हम हैं तुम्हारे मेहमान,

मन के सच्चे पर थोड़े से नादाँ,

सूनसान जंगल में एक बड़ा सा इंसान,

ये सब देख हैं अभी तक परेशां.

मेरी बात पूरी होने पर चित्रावती खिलखिलाकर हंसने लगी…

अपनी बेटी को हँसता देख बड़ी माँ के चेहरे पर भी ख़ुशी आ गयी तो उन्हें खुश देख मेरी पार्टी के लोग भी खुश हो गए.

चित्रावती:- तुम्हारे अंदाज़ से तुम हमको भये हो?

कौनसी जगह से आये हो?

में- खुशकिस्मत हूँ जो आपको अंदाज़ मेरा भय है,

मेहमान आपका दूर के गाओं चोदामपुर से आया है.

चित्रावती बहुत खुश हो गयी.. पर तभी बीच में बड़ी माँ बोल पड़ी- बीटा मेहमानो के भोजन का इंतेज़ाम करवाओ.

चित्रावती मेरी तरफ देखकर हंसकर अंदर चली गयी..

थोड़ी देर बाद हमें एक बड़े से हॉल नुमा कमरे में ले जाया गया वहां नीचे एक शानदार कालीन बिछा था और वहीं छोटे छोटे बैठने वाले पतले रखे थे 8… 6 एक तरफ और 2 सामने की तरफ,

बड़ी माँ ने हमें पटलों पर बैठने को कहा,

और वो और चित्रावती सामने वाले पटलों पर बैठ गयी.. हम लोग भी बैठ गए…

तभी बड़ी माँ ने ताली बजाकर बोलै- आरम्भ किया जाये.

और हॉल के दूसरी तरफ का एक पर्दा हटा और उसमे से कई साये चलके आये जब हमारी नज़र उनपर पड़ी तो हम सब के सब चौंक गए और जैसे थे वैसे hi रुक सामने से कुछ औरतें हाथों में एक एक बर्तन लेकर अंदर आ रही थी पर हैरानी की बात ये थी की वो साडी औरतें पूरी की पूरी नंगी थी, जिसे देखकर हम सब हैरान भी थे और कुछ को शर्म भी आ रही थी..








हम सब ने हैरानी से बड़ी माँ की और देखा तो उन्होंने जैसे हमारे मन को पढ़ लिए और बहुत आराम से बोली- भोजन कर लो हर प्रश्न का जवाब मिलेगा.. खैर नंगी औरतें भोजन परोसें तो भोजन पर ध्यान किसका जायेगा…

मैंने साडी औरतों पर बरी बरी नज़र डाली तो एक चीज़ पाई की साडी औरतें काम से काम 32 वर्ष से ऊपर की थी और उनका भरा हुआ गदराया बदन देखकर लग रहा था की हो न हो बच्चों की माँ भी होंगी… बड़ी बड़ी छुछियां फैला हुए बड़े गोल मटोल चूतड़ अह्ह्ह…

मेरा लुंड तो पंत में सर उठाने लगा और मैंने अनुज और जग्गू पर नज़र डाली तो उनका भी यही हाल था, दोनों hi अपने अपने उभर को छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे वहीं तीनो औरतें माँ मौसी और तै शर्म से नज़रें झुकाये बैठी थी..

वो साडी औरतें एक एक करके हम सब के सामने आ गयीं. यानि हर किसी के सामने एक औरत… मेरे स्ने भी एक औरत आकर कड़ी हो गयी और फिर झुककर हाथों में जो बर्तन था उसे लेकर मेरे पैरों के पास बैठ गयी और बर्तन को पैरों के पास रख दिया… मैंने नज़रें घुमा कर देखा तो बाकि सब के सामने भी एक एक औरत यही कर रही थी चित्रावती और बड़ी माँ के सामने भी…

फिर औरत ने मेरे पैरों को पकड़ा और बड़े आराम से उस बर्तन में रख दिया फिर एहसास हुआ की उसमे थोड़ा गुनगुना पानी है… आह्हः पैरों को तुरंत hi आराम मिलने लगा. बाकि सब को भी इस सेवा का लुत्फ़ मिल रहा था माँ तो आँखें बंद करके आराम से गरम पानी का मज़ा ले रही थी, अजीब तो लग रहा था इतनी साडी औरतों को यूँ नंगे होकर हमारी सेवा करता देख पर अनजान देश था जो भी हो रहा था चाहे उँचाहे स्वीकार तो करना hi था..

कुछ देर बाद पैरों को बर्तन से हटा दिया गया और औरतें अपने अपने बर्तन उठा कर बहार चली गयी और चाँद मिनट बाद फिर से लौटी एक दुसरे बर्तन के साथ और एक बार फिर से सामने आ कर बैठ गयी इस बार साडी औरतों के कन्धों पर एक एक कपड़ा भी था छोटा सा तौलिया नुमा.. बैठ कर इस बार नंगी औरतों ने हमारे हाथों को पकड़ा और उस बर्तन में डाला फिर अपने हाथों का इस्तेमाल करते हुए हमारे हाथों को घिसकर साफ़ करने लगी…

घिसने की वजह से उनकी बड़ी बड़ी नंगी छुछियां हिल रही थी जो हमारा ध्यान. भटका रही थी…

खैर हाथ साफ़ हुए तो औरतों ने अपने कंधे वाला कपडा उठाया और हमारे हाथों को अचे से पौंछकर सूखा दिया और फिर से अपने अपने बर्तन उठा कर चल दी… जाते हुए मेरी नज़र उनके मटकते चूतड़ों पर hi थी और तब तक रही जब तक वो परदे के दूसरी तरफ न चली गयी हो..

मैंने बापिस अपनी नज़र घुमाई तो नज़रें चित्रावती से टकराई और वो मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी मुझे लगा की मेरी चोरी पकड़ी गयी और मैंने शर्म से अपना सर झुका लिए...

थोड़ी देर बाद औरतें फिर से आई इस बार उनके हाथों में भोजन की थालियां थी… जिसे उन्होंने सबके सामने रखा… और बगल में हटकर कड़ी हो गयी..

बड़ी माँ ने अपने सामने भोजन की थाली को रखा और फिर हाथ जोड़कर कुछ मन hi मन प्रार्थना करने कागि ये hi चित्रावती ने किआ अब हमें तो पता नहीं था क्या करना है, पर मेहमान थे जो वो लोग करेंगे हमें भी करना hi था तो हमने भी मन hi मन प्रार्थना की.

बड़ी माँ ने खाना शुरू करने से पहले सबको देखा और मुस्कुरा कर कहा- अब सब लोग भोजन ग्रहण करें पर एक बात का ध्यान रखें की यहाँ नियम है भोजन के समय बोलना या बात करना मन है इससे भोजन का उपमान होता है.

हमें भला इससे क्या परेशानी हो सकती थी… इतनी दूर चलने के बाद भूख तो लगी थी तो जैसे hi बड़ी माँ ने खाना शुरू किआ हम लोग भी खाने पर टूट पड़े… खाना था भी बड़ा स्वादिष्ट तो और मज़ा आ रहा था वैसे भी नियम था कोई खाने के बीच नहीं बोलेगा तो सारा ध्यान खाने पर था हाँ बीच में नंगी औरतों पर भी ज़रूर जा रहा था..

जब सबने खाना खा लिए तो नंगी औरतों ने झूठी थालियां उठाई और अपने चूतड़ों को मटकते हुए चली गयी..

इसके बाद बड़ी माँ ने हम सबकी तरफ देखा और मुस्कुरा कर पुछा- भोजन कैसा लगा..

हम सबने ख़ुशी से जवाब दिया बहुत स्वादिष्ट था बड़ी माँ…

बड़ी माँ- मुझे ख़ुशी है की आपको पसंद आया. अब आप सभी दूर से सफर करके आये हैं तो थक गए होंगे… तो अब आराम कीजिये परन्तु उससे पहले क्यूंकि आप सब यहाँ हैं तो मैं चाहती हूँ आप सभी यहाँ की वेशभूषा hi धारण करें.

बड़ी माँ ने ताली बजे तो उन्ही औरतों में से 4 नंगी औरतें फिर से आई और बड़ी माँ ने उन्हें आदेश दिया- सभी के लिए वस्त्रों का प्रबंध किया जाये. साथ hi सभी जोड़ियों को उनके विश्राम के लिए कक्ष दिखाए जाएं…

फिर बड़ी माँ ने हमारी और देखा और बोली- अब आप लोग विश्राम करें बाकि की बातें कल भोर में hongi..aap लोगो को किसी भी प्रकार की समस्या न हो इसलिए एक एक सेविका आपके कक्ष में hi rahegi.ye आपकी हर प्रकार से सेवा करेंगी बस बात नहीं करेंगी सेविकाओं का मेहमानो से बोलना प्रतिबंधित है. शुभ रात्रि.

चित्रावती- जंगल यात्री… शुभ रात्रि..

हम सबने भी उनकी हर बात में हाँ में हाँ मिले और शुभ रात्रि बोलै.. और बड़ी माँ और चित्रावती चली गयी

उसके बाद वो नंगी औरतें हमें अपने साथ ले जाने lagi.hum लोग एक गलियारे से होकर गुजर रहे थे . मैं माँ के बगल में चलने लगा

में- क्या लग रहा है माँ तुम्हे कैसे लोग लगे.

माँ- कुछ समझ नहीं आ रहा इतनी सेवा का मतलब इसके पीछे कोई न कोई मतलब तो ज़रूर है..

में- मुझे भी यही लगता है पर कर भी तो नहीं सकते कुछ….

माँ- हाँ अभी जैसा हो रहा है होने दो पर सावधान रहना है कोई भी गलती नहीं करनी है.

हम सब एक आंगन में पहुंचे जिसके चरों तरफ दरवाज़े थे और कमरे बने हुए थे.. एक नंगी औरत ने मुझे और माँ को एक कमरे में चलने का इशारा किया क्यूंकि मैं और माँ अगल बगल खड़े होकर बात कर रहे थे तो उसे लगा हम दोनों की जोड़ी है और मैंने और माँ ने भी ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और बात करते हुए एक कमरे में घुस गए…

वहीं दूसरी आरती ने जग्गू और तै को अपने साथ चलने का इशारा किआ वो लोग उनके साथ चले गए तो बचे अनुज और मौसी और वो लोग भी तीसरी औरत के साथ चले गए…

अंदर जाकर देखा तो एक शानदार कमरा था बीचों बीच एक बड़ा सा बीएड पड़ा हुआ था… किसी फिल्म में दिखने जैसा… बीएड पर hi कुछ कपडे रखे हुए थे जिनकी तरफ नंगी औरत ने इशारा किआ.. हमने कपडे उठा कर देखे तो एक साड़ी और ब्लाउज था और एक धोती थी जैसी गाओं में आदमी लोग पहनते हैं वैसी पर ये थोड़ी महँगी और अचे कपडे की थी.. पर कपड़ो में कोई भी अंदर का कपडा नहीं था न चड्डी न बनियान.. और मेरे लिए सिर्फ एक धोती उसमे दिखाऊंगा क्या और छिपाऊँगा क्या.

माँ ने मेरी तरफ सवाल भरी नज़रों से देखा मैंने बोलै- अब जो है यही है माँ कुछ दिन सहलो.. माँ ने नंगी औरत से पुछा कपडे कहाँ बदलें. तो उसने कमरे के अंदर hi बानी लकड़ी की एक दीवार की तरफ इशारा किआ और माँ कपडे लेकर उधर चली गयी.

मैं माँ के जाने के बाद उस नंगी औरत को देखने लगा बड़े बड़े सुडोल चुके, सपाट गदराया हुआ पेट कमर पड़ी सिलवटें गहरी नाभि, नीचे चिकनी छूट आह्हः क्या नज़ारा था… मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ और मेरा हाथ खुद बा खुद उसकी एक छुच्छी पर चला गया और मैंने हाथ उसकी चुकी पर रखा और उसके चेहरे की और देखा तो कुछ ज़्यादा प्रतिक्रिया नहीं थी मेरा हौसला बड़ा वैसे भी इतनी मस्त मालो को नंगा देखकर मैं बहुत तड़प रहा था तो मैंने सोचा जो होगा देखा जायेगा और आगे बढ़कर उस नंगी औरत से चिपक गया और मेरे होंठ सीधा उसकी चुकी पर पड़े और मेरे हाथ उसके मसल पेट से होते हुए उसके गदराये सुडोल चूतड़ों पर पहुंच गए ..








मैं उन मांस के नरम गोलों को अपने हाथों में भरकर मसलने लगा Hi उसकी एक छुच्छी के रास को पि रहा था… उसकी आँखें बंद हो गयी और हाथ मेरी पीठ पर रेंगने लगे पर चेहरे पर इसके अलावा कोई और भाव नहीं आया .. मैं और वो मस्त hi थे की पीछे से चिल्लाने की आवाज़ आई- कर्मा, ये क्या कर रहा है बताऊँ अभी तुझे?

मैं झट से उस औरत से दूर हो गया.. और माँ की तरफ देखा जो की लाल पारदर्शी साड़ी और ब्लाउज में क़हर ध रही थी .साड़ी के बीच से झांकता उनका पेट नाभि आह्हः मुँह में पानी आ गया साथ hi हालाँकि ब्लाउज पारदर्शी नहीं था पर ये साफ़ पता चल रहा था की अंदर माँ ने कुछ नहीं पहना..








खैर माँ गुस्से से मेरे पास आई और बोली- तुझे बोलै था न गलती नहीं करनी कोई.. जा कपडे पहन कर आए..

मैं दांत सुनकर जल्दी से कपडे उठाकर या कहूं धोती उठाकर भगा लकड़ी की दीवार की तरफ…

इसके बाद क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्

 
खैर माँ गुस्से से मेरे पास आई और बोली- तुझे बोलै था न गलती नहीं करनी कोई.. जा कपडे पैन कर आए..

मैं दांत सुनकर जल्दी से कपडे उठाकर या कहूं धोती उठाकर भगा लकड़ी की दीवार की तरफ…


अपडेट 125

जल्दी से अपने कपडे उतरे और वो धोती लपेट ली साला पूरे बदन पर बस एक कपडा था वो भी धोती न अंदर कच्चा न कुछ और रहना था इन नंगी औरतों के बीच क्या मुसीबत थी…

खैर जब बापिस पहुंचा तो देखा माँ बीएड पर लेती हुई थी और वो नंगी औरत माँ के पेअर दबा रही थी…

मैं भी जाकर बीएड पर बैठ गया और माँ से बोलै- वाह पूरी सेवा करवाई जा रही है…

माँ- क्या बताऊँ कर्मा कितना आराम मिल रहा है… और मैंने इसको नहीं कहा ये खुद hi दबाने लगी.. एक तो कुछ बोलती भी नहीं है अजीब हैं यहाँ के नियम..

में- कहाँ अजीब हैं इतने मस्त तो हैं..

माँ- हाँ तुझे तो अचे लगेंगे hi नंगी नंगी औरतें जो देखने को मिल रही हैं..

में- सिर्फ देखने को नहीं माँ

ये कहकर मैंने हाथ बढ़ाया और नंगी औरत के चूतड़ों को सहलाने लगा… पर माँ ने देख लिए

Maa-karma हाथ हटा मार खायेगा अभी.

में- ओफ्फो माँ मेरी हालत ख़राब हो रही है इतनी साडी नंगी औरतों को देखकर रहा नहीं जा रहा…

माँ- बोलै न नहीं तो नहीं.

उधर जहाँ कर्मा और माँ की बहस चल रही थी एक दुसरे कक्ष में हाल थोड़ा सा खुशनुमा था…

मौसी ने कपडे बदल लिए थे और साड़ी ब्लाउज में बैठी थी पर अनुज पिछले 10 मिनट से दीवार के पीछे hi था..

मौसी- अरे अनुज क्या हुआ बीटा कितनी देर लगाएगा .

अनुज- क्या करूँ मौसी ये धोती बांध hi नहीं रही…

मौसी हँसते हुए अरे इधर आ मैं बांध देती हूँ…

Anuj-nahi मौसी..

Mausi-kyun क्या हुआ…

अनुज- इसके अलावा कुछ नहीं है अंदर से नंगा हूँ मैं..

मौसी को ये सुनकर थोड़ी शर्म भी ै और कुछ हुआ भी.

मौसी- अरे तो क्या हुआ आजा बच्चा है तू.

अनुज- नहीं मुझे शर्म आ रही है…

मौसी को अचानक से कुछ सूझा

मौसी- ाचा एक काम करते हैं तुझे मुझसे शर्म आ रही है न..

Anuj-haan

मौसी- तो मैं इसे भेजती हूँ ये मदद कर देगी तेरी और इससे क्या शर्माना ये तो पहले से पूरी नंगी है..

अनुज ने कुछ सोचते हुए हाँ कहाँ.

मौसी ने सेविका को कहा.. उसने हाँ में सर हिलाया और देवर के पीछे चली गयी मौसी उसके मटकते चूतड़ों को देख रही थी.

कुछ देर बाद hi मौसी को अनुज की एक हलकी सी आह सुनाई दी… मौसी दर गयी की ये आवाज़ कैसी कहीं उसने अनुज को कुछ कर तो नहीं दिया…

मौसी उठ कर दीवार की और लपकी और जैसी hi दीवार के दूसरी और झाँका तो चौंक गयी… सामने का नज़ारा hi कुछ ऐसा था सामने अनुज पूरा नंगा खड़ा हुआ था और सेविका जो की पहले से hi पूरी नंगी थी अपने घुटनो पर बैठकर अनुज का लुंड चूस रही थी…

मौसी की तो ये देखकर आँखें बड़ी हो गयी… उनकी नज़र अनुज के लुंड पर टिक गयी जो उस नंगी सेविका के मुँह में अंदर बहार हो रहा था…

कुछ पल तो मौसी उसी स्थिति में जड़वत देखती रही उनके शरीर में भी कुछ कुछ होने लगा, उनकी छूट भी थोड़ा सा कुलबुलाई और गीली होने लगी… लुंड को देखते गए मुँह में पानी सा आने लगा पर तभी जैसे मौसी होश में आई और कड़क आवाज़ में बोली- अनुज ये सब क्या हो रहा है?

अनुज अचानक से चौंक गया और जल्दी से सेविका से दूर हो गया.

मौसी- ाचा अब ये करते हुए शर्म नहीं आ रही तुझे.?

अनुज बेचारा क्या hi बोलता नज़र झुकाये खड़ा रहा… मौसी की नज़रें कभी अनुज के चेहरे पर तो कभी उसके लुंड पर घूम रही थी.

और मौसी ने आगे बढाकर तंगी हुई धोती उठाई अनुज का हाथ पकड़ा और बहार ले आई… और बीएड के सामने ला कर खड़ा कर दिया…

मौसी- अब खड़ा रह यूँ hi मैं पहनती हूँ धोती

और मौसी उसे धोती पहनने लगी… अनुज का खड़ा लुंड धोती पहनने में दिक्कत करने लगा… मौसी बेचारी के लिए तो और मुश्किल था न जाने कितनी मुश्किल से वो अपने ध्यान को धोती बांधने पर लगा रही थी जो की बार बार अनुज के लुंड पर जा रहा था खैर किसी तरह से मौसी ने धोती बांध दी और अनुज को बोली चल अब सो चल कर.

अनुज मुँह बनाये हुए बीएड पर जाकर लेट गया.

जहाँ यहाँ अनुज का मुँह बना हुआ था… वहीं बगल के कक्षा में थोड़ा चिंतित वातावरण था.

तै कपडे बदल कर बिस्तर पर तक लगाकर लेती हुई थी.. वहीं जग्गू दीवार के पीछे खड़े खड़े कुछ सोच रहा था… उसने धोती तो पहन ली थी पर वो बहार जाने में कटरा रहा था वजह थी उसका खड़ा लुंड जो धोती में साफ़ दिख रहा था…

अपनी माँ के होते हुए वो ऐसी स्थिति में पहली बार आया था, कर्मा और अनुज तब भी खुले हुए थे पर जग्गू तो अब भी झिझक रहा था..

इतने में उसे एक आवाज़ सुनाई दी..

मंजू तै- अरे बचुआ का हुआ, कितनी देर लगा रहा है,

Jaggu-aaya मम्मी,

बेचारा जग्गू ने किसी तरह लुंड को नीचे की तरफ किआ और बहार आए गया पर जैसे hi वो चला लुंड बापिस सीधा खड़ा हो गया…

बहार आते hi तै ने उसे देखा और बोली- का हुआ रे इतनी देर लगा रहा था.

बात ख़त्म करते hi तै की नज़र जग्गू की उभरी हुई धोती पर पड़ी और जैसे hi उन्हें समझ आया की ये क्यों उठी हुई है वो थोड़ा सा चौंकी साथ hi शर्मा गयी.. और नज़र दूसरी तरफ कर ली.. उन्हें मन hi मन अजीब लगने लगा की उनके बेटे का लुंड खड़ा क्यों है .. पर फिर उनकी नज़र नंगी सेविका पर पड़ी जो उनके बिस्तर के किनारे बैठ कर उनके पेअर दबाने लगी और तै को समझ आ गया की बेचारे की क्या गलती है.. जब सामने नंगी औरत घूमेगी तो लुंड तो खड़ा होगा hi.

ये सब सोचने के बाद भी अपने hi बेटे का लुंड खड़ा देखकर कुछ अजीब सी हलचल मन में मच रही थी. बार बार उनका मन करने लगा धोती के उभर को देखने का..

जग्गू बिस्तर पर आकर बैठ गया.. नज़रें झुककर..

उसकी हालत देखकर तै ने सोचा माहौल को हल्का रखना पड़ेगा नहीं तो न जाने बचुआ मन hi मन शर्माता रहेगा… साधारण hi रहना होगा जैसे कुछ हुआ hi न हो…

मंजू तै- अरे बच्चा लेट जा आराम से तू भी थक गया होगा.

जग्गू- हाँ हाँ मम्मी लेट रहा हूँ…

मंजू तै- आ जा

जग्गू लेता तो न चाहकर भी उसकी नज़र नंगी सेविका पर जाने लगी जो की उसकी माँ के पेअर दबा रही थी और उसका पूरा शरीर आगे पीछे हो रहा था… छुछियां ऊपर नीचे हो कर उसे मोहित कर रही थी ऊपर से लुंड फटने को हो रहा था.

किसी तरह से अपने जज़्बात को दबाये जग्गू लेट गया..

वहीं मंजू तै अपने पैरों को दबाये जाने पर अह्ह्ह्हह अह्ह्ह की आराम भरी आवाज़ें निकल रही थी. जिसे सुनकर जग्गू के मन में अजीब से ख्याल आ रहे थे, जैसे की उसकी मम्मी चुड़ते हुए भी क्या ऐसी hi आवाज़ निकलती होंगी.. न चाहते हुए भी वो ये साडी बातें दिमाग से हटा नहीं प् रहा था…

वहीं उसकी मम्मी थी जो उसकी मुश्किलें और बढ़ा रही थी वो पेअर डब्बाने में इतना खोटी जा रही थी की अपनी साड़ी को घुटनो तक सरका दिया.. और सेविका से अचे से पैरों की मालिश करने को बोली..

अपने मम्मी के मांसल घुटनो को देखकर जग्गू के मन में और ख्याल आने लगे की उसकी मम्मी की जांघें कैसी होंगी, वो बिना कपड़ो के कैसी लगेंगी.. उनके दूध कैसे होंगे… क्या सेविका जैसी लगेंगी या उससे ज़्यादा कामुक…

पर उसने खुद को समझाया नहीं उसकी मम्मी ज़्यादा कामुक हैं उनका शरीर ज़्यादा भरा हुआ है उनके चूतड़ इससे ज़्यादा बड़े हैं..

अचानक से उसने अपने सर को झटका की क्या सोच रहा है वो.. पर फिर से वो hi ख्याल उसके मन में आने लगे…

इधर तै ने कुछ देर अपनी टैंगो को डाब बया फिर सेविका को हटा दिया और नीचे खिसक कर लेट गयी .. साथ hi जग्गू को बोली- बच्चा तू भी पेअर डाब वाले… थक गया होगा..

जग्गू- ुह्ह्ह्ह नहीं मम्मी ठीक है ऐसे hi.

मंजू तै- अरे नखरे मत कर… अरे बहन जी थोड़ा बालक का भी दबा दीजिये न थक गया होगा.

जग्गू- रहने दो न मम्मी..

मंजू तै- चुप चाप लेट जा और मालिश करवले काम से काम . कल पता नहीं क्या करना पड़े…

जग्गू को आखिरकार बात माननी पड़ी और नंगी सेविका आकर उसके पैरों के पास बैठ गयी और.. उसके पैरों की मालिश करने लगी..

सेविका के नंगे हाथ पैरों पर पड़ते hi जग्गू के शरीर में करंट दौड़ गया वहीं सेविका के हिलने की वजह से उसकी छुछियां जो आगे पीछे हो रही थी उन्हें देखकर जग्गू का लुंड फुदकने लगा..

मंजू तै भी उसी वक़्त करवट लेकर अपने बेटे की तरफ मुँह करके लेट गयी और लेटते hi उनकी नज़र सबसे पहले अपने बेटे की धोती में बने तम्बू पर पड़ी और उनके बदन में एक सिहरन फ़ैल गयी.. उनकी नज़र वहीं ठहर गयी उसी बीच जग्गू के लुंड ने एक ठुमका मारा तो तै जैसे होश में आईं और फिर उन्होंने जग्गू क्र चेहरे की और देखा तो पाया उसकी नज़रें नंगी सेविका की छूछीयो पर तिकी हुई थी..

मंजू तै को मन hi मन अपने फैसले पर पछतावा होने laga..Ki बेचारे को मैंने और मुसीबत में दाल दिया.. जवान खून इस उम्र में कहाँ शांत रह पता है ऊपर से ये माहौल क्या करूँ अब वहीं उनकी खुद की छूट ये सब देखकर गीली हो रही थी.. जो उन्हें और परेशान कर रही थी. ये मुझे न जाने क्या हो रहा है मेरी छूट अपने बेटे के बारे में सोच कर क्यों गीली हो रही है.

तै जहाँ मन की उधेड़बुन में व्यस्त थी उनकी आँखें तब भी लगातार बेटे की धोती में बने तम्बू पर hi थी.. तभी मालिश करते हुए सेविका जब हाथ ऊपर की और ले तो जग्गू की धोती का एक सिरा उसके हाथ में उलझ गया हुए जैसे hi हाथ नीचे ले गयी धोती साथ में खींचती चली गयी और अचानक से जग्गू के लुंड पर से हैट गयी… बेटे का नंगा लुंड देखकर तो जैसे तै की साँसे अटक गयी.

अपने सेज बेटे का खड़ा लम्बा लुंड मोटा टोपा टोपे के बीचों बीच एक लुंड रास की बूँद उभर आई थी तै का मन हुआ एक पल को की आगे बढ़ कर उसे चाट ले फिर खुद को डांटा की अपने hi बेटे के बारे में ये क्या सोच रही हूँ मैं और न चाहते हुए भी नज़रें हटा ली.. और चेहरा दूसरी और घुमा लिए..

वहीं जग्गू को जैसे hi एहसास हुआ की उसका लुंड नंगा है उसने उसे जल्दी से धक् लिए और फिर जल्दी से अपनी मम्मी को देखा तो पाया वो दूसरी तरफ देख रही थी जग्गू ने चैन की सांस ली की ाचा हुआ मम्मी ने नहीं देखा.. तभी देखते हुए उसकी नज़र थोड़ा नीचे पड़ी जहाँ ब्लाउज में कासी हुई उसकी मम्मी की बड़ी बड़ी छुछियां ऊपर नीचे हो रही थी आज बिना ब्रा के उसे और अचे से मम्मी की छूछीयो का एहसास हो रहा था.

उसके नीचे नंगी कमर और पेट उसमे पड़ी सिलवटें जिन्हे देखकर जग्गू का लुंड पहले से भी ज़्यादा कड़क होगया.

उसे एहसास हुआ की नंगी सेविका से कहीं ज़्यादा उत्तेजित तो वो अपनी माँ के भरे हुए मांसल कामुक बदन को देखकर हो रहा था.

इन्ही खयालो में डूबा हुआ था की तै ने अपना चेहरा घुमा कर फिर से जग्गू की और देखा और सब्स्र पहले नज़र धोती पर hi गयी पर तै को निराहा मिली क्यूंकि उनके बेटे का लुंड धक् चूका था फिर उन्होंने उसके चेहरे की और देखा तो उसे अपनी तरफ देखता पाया जब ध्यान से देखा और नज़र का पीछा किआ तो पाया उसकी नज़र उनकी छूछीयों पर है.. ये एहसास होते hi तै की छूट अंदर hi अंदर कुल बुलाई की मेरा सागा बेटा मुझे किसी और नज़र से देख रहा है.

क्या उसके मन में मेरे लिए वो hi ख्याल आ रहे हैं जो इस नंगी सेविका के लिए होंगे क्या उसका लुंड मुझे देखकर खड़ा हो रहा है? क्या वो मुझे अपनी सगी माँ के साथ वो सब इतना सोचते hi तै के शरीर में सनसनी होने लगी.. और छूट गीली होने लगी…

फिर भी तै ने किसी तरह खुद को संभाला और बोली- जग्गू बीटा सो जा अब…

जग्गू हडबडा हुआ होश में आते हुए बोलै- हाँ मम्मी सोते हैं

और ये कहकर उसने सेविका को भी मन कर दिया और लेट गया… अजीब सी मन में उधेड़बुन के साथ और खड़े लुंड के साथ… सेविका भी उठी और घूम कर बीएड के दूसरी तरफ आकर बीएड से नीचे पड़ी छटाई पर जाकर लेट गयी… तै ने उसे नीचे लेते देखा तो तुरंत रोक दिया और उसे बीएड पर लेटने को बोलै..

यही तो होती है गाओं के भोले भले लोगो की बात किसी को छोटा नहीं समझते और जो भी है मिल बाँट कर कहते हैं उसी का प्रमाण मंजू तै ने दिया..

आओ बहन ऊपर लेटो तुम.

सेविका ने बात सुनी और मुस्कुरा कर कड़ी हो गयी…

मंजू तै- जग्गू बचुआ इधर खिसक बहन के लिए जगह बना .

तै ने जग्गू को अपनी और खिसकने का इशारा करते हुए कहा जग्गू ने भी तुरंत खिसक कर सेविका के लिए जगह बनाई… सेविका भी जग्गू के बगल में आकर लेट गयी.. अब एक तरफ से तो जग्गू के मज़े हो गए की दो दो मस्त गदराई औरतों के बीच लेता था और मुश्किल ये की खुद को काबू में कैसे करे ..

वहीं जग्गू के खिसकने से वो तै के करीब आ गया था जिससे तै की सांसें बढ़ गयी …

जग्गू से खड़े लुंड की तड़पन बर्दाश्त करना अब मुश्किल हो गया तो उसने करवट लेने की सोची और सेविका की और करवट लेकर लेट गया और जग्गू की आँखों के सामने उसकी बड़ी बड़ी नंगी छुछियां आ गयी… जिन्हे देखकर जग्गू के मुँह में पानी आ गया…

वहीं सेविका तो शायद इसी इंतज़ार में थी जैसे उसने तुरंत hi छाती आगे कर के अपनी छूछीयो को जग्गू के मुँह दे सत्ता दिया जग्गू का मुँह खुद बा खुद खुल गया और उसके मुँह में छुच्छी चली गयी बस फिर क्या था जग्गू ने कुछ नहीं सोचा और उसकी चुकी को चूसने लगा साथ hi सेविका का एक हाथ नीचे पहुँच गया और उसने जग्गू के लुंड को धोती से निकल लिए और हाथ से मुठियाने लगी…

जिससे जग्गू के मुँह में छुच्छी होने के बाद भी एक दबी हुई सिसकी निकल गयी, जिसे तै ने सुना जो दूसरी तरफ करवट लेकर सो रही थी.. और उन्हें कुछ गड़बड़ लगी चुपके से सर को घुमाकर और देखने की कोशिश की तो नज़र आया की जग्गू का सर सेविका के सीने पर हौले हौले हिल रहा है और. सेविका की आँखें बंद हैं…

तै को समझते देर न लगी और एक साथ कई भाव तै के दिमाग में घूमने लगे, वो उत्तेजित भी होने लगी साथ hi एक जलन का भाव आया की उनका बीटा उसकी छुच्छी को छोड़ सेविका के दूध क्यों पि रहा है, ये सोचकर उत्तेजित भी हुई की उनका बीटा उनके होते हुए हिम्मत करके दूसरी स्त्री के साथ वो सब कर रहा है जो अक्सर छुप के किआ जाता है… माँ के सामने तो बिलकुल नहीं…

तै का दिमाग घूमने लगा वो कुछ करना भी चाहती थी पर क्या ये उन्हें समझ नहीं आ रहा था…

जब उन्हें कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने एक आखिरी जो उन्हें समझ आया दांव खेला और बापिस सर आगे घुमा कर बोली- जग्ग्गु बीटा बहन को दिक्कत हो रही होगी तू और इधर आ जा, मेरी तरफ करवट ले कर सो जा…

तै की आवाज़ सुनकर जग्गू ने हड़बड़ा कर अपने मुँह को सेविका की छूछीयो से हटाया और घूम गया तै ने हाथ पीछे लेजाकर उसे खुदके पास खिसकने का इशारा किआ साथ hi उसका हाथ लेकर अपने मांसल पेट पर रख लिए और प्यार से बोली सो जा अब.

तै मन hi मन मुस्कुरा रही थी ये सोचकर की उन्होंने अपने बेटे को अपने पास कर लिए उससे दूर.

पर क्या जिसे वो अपनी जीत समाज रही थी वो सच में जीत थी …जग्गू की हालत और बुरी हो गयी अपनी माँ के नंगे पेट का एहसास होते hi जग्गू के बदन में झुरझुरी होने लगी….

उसका लुंड फटने को होने लगा उसने नज़र थोड़ी नीचे की तो देखा उसकी माँ की बलखाई पीठ के नीचे बड़ी सी गांड दोनों चूतड़ एक दुसरे के ऊपर ऐसे रखे थे जैसे किसी ने दो तरबूज एक के ऊपर एक रख दिए हों…. जग्गू ने अपनी कमर को थोड़ा पीछे कर रखा था जिससे उसका लुंड उसकी मम्मी को न छुए.. पर समय के साथ जग्गू पर मम्मी के बदन का नशा चढ़ता जा रहा था उसका हाथ तै के चिकने मसल पेट पर खुद बा खुद फिसलने लगा ये तै ने भी महसूस किआ पर कुछ नहीं बोली… जग्गू हर पल बढ़ते जोश के साथ अपनी मम्मी के पेट को सहला कर मज़े ले रहा था सही गलत का बोध अब वो भूलता जा रहा था और ऐसा hi कुछ मंजू तै के साथ हो रहा था

अपने पेट पर अपने बेटे के हाथ को चलता पाकर तै की उत्तेजना बढाती जा रही थी और अब तो जग्गू सिर्फ सहला नहीं रहा था बल्कि उनके मसल पेट को मसल भी रहा था जिससे तै का मुँह तो खुलता पर उससे आवाज़ नहीं निकल रही थी और फिर न जाने कैसे जग्गू ने हिम्मत की और अपनी मम्मी से पीछे से बिलकुल चिपक गया… जिसका नतीजा बड़ा hi रोचक हुआ जग्गू का खड़ा लुंड तै के बड़े बड़े दोनों चूतड़ों के बीच साड़ी के ऊपर से hi फंस गया जग्गू की धोती तो खुल कर उसके नीचे पड़ी हुई थी.

अपने बेटे के लुंड की चुभन को अपने चूतड़ों पर महसूस करते hi तै की सांस अटक गयी एक पल को उनका मन हुआ पलट कर उस के लुंड को हाथ में पमाद लें और उसे सहलाएं पर वहीं उनका दिमाग कह रहा था की ये गलत है, मुझे जग्गू को रोकना चाहिए… वो बच्चा है पर मैं बहक नहीं सकती..

तै इसी दुविधा में जड़वत लेती हुई थी, वहीं जग्गू जब चिपक गया तो उसे थोड़ी सी घबराहट हुई थी अपनी मम्मी की प्रतिक्रिया को लेकर पर जब कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो उसे लगा शायद मम्मी सो गयी है.

और इसी से जग्गू की हिम्मत को पर मिल गए और वो हौले हौले से अपनी कमर को आगे पीछे करके अपने लुंड को अपनी मम्मी के दोनों चूतड़ों की दरार में घिसने लगा.

तै को अपने बेटे का लुंड अपनी गांड की दरार में घिसता हुआ बहुत अच्छे से महसूस हो रहा था क्यूंकि बीच में सिर्फ साड़ी थी न hi पेटीकोट और न hi कच्ची….

तो तै को ऐसा लग रहा था जैसे उनके बेटे का लुंड सीधा उनकी नंगी गांड पर hi ठोकर मार रहा है बिना पेटीकोट के तो ये दूरी और काम हो गयी थी…

जग्गू तो अब हवस के नशे में सब भूल चूका था और अपनी मम्मी के पेट को मसलते हुए पीछे से अपनी कमर को हिला हिलाकर अपने लुंड को अपनी मम्मी के चूतड़ों में घिस रहा था उसे बहुत अलग सा अनुभव महसूस हो रहा था ऐसा अनुभव तो अपनी भाभी पल्ली या ममता चची को छोड़ कर भी महसूस नहीं हुआ जो अपनी मम्मी के चूतड़ों में लुंड के घिसने मात्रा से हो रहा था.

वही मंजू तै का बुरा हाल था उनकी छूट रह रह कर पानी बहा रही थी उनका दिमाग उन्हें धिक्कार रहा था की वो ये सब होने दे रही है पर उनके मन में हिम्मत नहीं थी की वो अपने बेटे को रोक सकें… और चुपचाप से सोने का नाटक कर रही थी.

उधर जग्गू हवस की ऐसी राह पर निकल चूका था जहाँ से बापिस लौटना अब उसके लिए असंभव था, ऐसा अहसास उसे कभी नहीं हुआ जैसा अपनी मम्मी के चूतड़ों में अपने नंगे लुंड को घिसने में हो रहा था और इसी जोश के चलते उसके हाथ जो उसकी मम्मी के मांसल पेट पर थे सरकते हुए ऊपर उनकी छूछीयों पर पहुँच गए और वो ब्लाउज के ऊपर से hi अपनी मम्मी की पापीती से बड़ी चूचियों को मसलने लगा और जैसे hi जग्गू को ये एहसास हुआ की उसके हाथ में उसकी मम्मी की छुछियां हैं उसके शरीर में एक करंट दौड़ गया और वो खुद को संभल न सका, उसका शरीर पीछे से पूरी तरह से उसकी मम्मी से चिपक गया… उसकी आँखें बंद हो गयी. और उसका लुंड ने रास उगलना शुरू कर दिया जो की उसकी मम्मी के चूतड़ों के ऊपर की साड़ी को भीगने लगा…

तै को भी पहला झटका तब लगा जब जग्गू के हाथ उनकी छूछीयों पर आ गए, उनकी तो जैसे जान hi अटक गयी जब वो उनकी छूछीयों को मसलने लगा और फिर वो दर गयी जब वो पीछे से पूरी तरह से उनसे चिपक गया उसका लुंड उनकी गांड की दरार में ऐसे घुस गया जैसे साड़ी में छेड़ करके अंदर घुस जायेगा… और फिर उन्हें अपनी साड़ी पर कुछ गरम गरम और गीला गीला एहसास हुआ, और फिर जब उन्हें समझ आया ये क्या है तो वो तो थरथरा उठी की अपने बेटे का लुंड रास वो अपनी गांड पर महसूस कर रही हैं…

जग्गू पीछे से तब तक अपनी मम्मी से चिपका रहा जब तक की उसके लुंड ने अपने रास की एक एक बूँद न उढेल दी .. उसके बाद जब उसकी साँसे थोड़ी शांत हुई तो वो अलग हुआ और उसे ये एहसास हुआ की उसने ये क्या कर दिया है, अपनी hi मम्मी के साथ ये सब ये सोचकर वो पछताने लगा, उसे दर था की कहीं उसकी मम्मी जाग तो नहीं गयी पर जागने पर कुछ प्रतिक्रिया ज़रूर करती और ऐसी हरकत के लिए उसे डांटती मरती.. पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किआ मतलब मम्मी सो रही है. ये सोचकर जग्गू ने चैन की सांस ली, पर जग्गू एक और चीज़ से हैरान था की झड़ने के बाद भी जग्गू का लुंड ज्यूँ कतयूं वैसा hi खड़ा था

तो इस बार जग्गू ने थोड़ा सोचा की हर बार रिस्क लेना सही नहीं है एक नज़र उसने अपनी मम्मी की गांड पर डाली.. साड़ी गीली होकर चूतड़ों से चिपक गयी थी जग्गू सोचने लगा न जाने सुबह मम्मी को पता चलेगा या नहीं. इसके बाद जग्गू दूसरी तरफ पलटा तो हैरान रह गया, सेविका की आँखें खुली हुई थी और वो उसे hi देखकर कुछ अलग ढंग से मुस्कुरा रही थी, जग्गू को लगा था की वो सो गयी थी पर उसे जगता देख जग्गू कुछ सकपका गया पर फिर साधारण होते हुए जग्गू ने सेविका को कुछ इशारा किआ…

वहीं बगल वाले कक्ष में अनुज जब मुँह बना कर लेट गया तो मौसी भी उसके बगल में बिस्तर पर आकर लेट गयी, और सेविका एक बार फिर से आकर मौसी के पैरों के पास बैठकर उनकी साड़ी को घुटनो तक उठाकर उनके पैरों को दबाने लगी…

मौसी ने एक नज़र अनुज को देखा जो की दूसरी तरफ मुँह करके लेता हुआ था, मौसी ने सोचा की बेचारे को मैंने गलत hi दांत दिया, है तो बच्चा hi जवान खून है इतने सरे नंगे बदन को देखकर कैसे काबू करेगा, जब मुझे hi जबसे यहाँ आई हूँ अजीब सा एहसास हो रहा है वो तो फिर भी बच्चा है… कैसे शांत करेगा खुद को… मैंने बेकार में hi दांत दिया फिर कुछ सोचा और बोली:- अनुज बीटा अनुज?

अनुज ने पहले कोई जवाब नहीं दिया..

मौसी- अनुज सो गया क्या?

अनुज मौसी को बहुत प्यार करता था और बहुत मंटा था तो उसने उन्हें ज़्यादा भाव दिखाना ठीक नहीं समझा और पलट कर बोलै..

अनुज- हाँ मौसी.

मौसी- गुस्सा हो गया मौसी से?

अनुज- नहीं तो तुम्हारी दन्त से भी कोई गुस्सा होऊंगा तुम इतना प्यार करती हो तो दांत भी सकती हो वैसे भी मेरी गलती थी.

मौसी- नहीं बीटा गलती तेरी नहीं है जिस जगह और हालात में हम हैं.. उसमे तू क्या कोई भी बहक सकता है.

अनुज- सच में तुम नुझ्से गुस्सा नहीं हो मौसी?

मौसी- हॉट मैं अपने बच्चे से गुस्सा रह सकती हूँ क्या?

अनुज खुश हो गया..

मौसी( कुछ सोचते हुए):- आज दूध नहीं पियेगा?

अनुज ने आँखें बड़ी करके सेविका की तरफ इशारा किआ और मौसी को चुप रहने को कहा..

मौसी ने कुछ नहीं कहा बस अपने ब्लाउज के बटन को खोलने लगी.. अनुज उन्हें हैरानी भरी निगाहों से देख रहा था और कुछ hi पल में उनका ब्लाउज पूरा खुल चूका था अनुज की आँखें फटी हुई थी

मौसी- अब देखता hi रहेगा या आएगा भी.

अनुज को तो बस सेविका का दर था और जब मौसी की तरफ से हाँ हो गयी तो अनुज को फिर किसका दर और वो मौसी के करीब खिसक कर चिपक गया.. मौसी ने भी दोनों पतों को अलग कर दिया और उनकी बड़ी बड़ी छुछियां नंगी होकर बहार आ गयी जो की रौशनी में चमक रही थी अनुज ने एक पल भी न दानवते हुए अपने मुँह को मौसी की छुच्छी पर लगा दिया और चूसने लगा…

मौसी की नज़र सेविका पर पड़ी जो उनके पेअर दबाते हुए अनुज को उनका दूध चूसते हुए देख रही तौर फिर दोनों की नज़रें मिली तो मौसी ने मुस्कुरा कर अपनी सफाई में बोलै- क्या करूँ बहन इसको बिना दूध पिए नींद नहीं आती बचपन की आदत है और अब तो मेरी भी हो गयी है इसको पिलाते पिलाते.

सेविका बस मुस्कुराई और फिर से अनुज को दूध चूसते हुए देखने लगी.

इधर अनुज को मौसी का दूध पीने में बहुत मज़ा आ रहा था पर एक चीज़ उसे परेशां कर रही थी… वो था उसका लुंड जो रह रह कर कुलबुला रहा था और फूलता जा रहा था… टोपे में रह रह कर खुजली हो रही थी जिसकारण अनुज अपनी कमर को बार बार हिला रहा था और उसका लुंड बार बार मौसी की जांघ में टक्कर मार रहा था..

हालाँकि अनुज उसे शांत करना चाहता था पर मौसी की वजह से दर रहा था..

जब बार बार जांघ में चुभन होने पर मौसी ने ध्यान दिया तो उन्हें भी अनुज की परेशानी का एहसास हुआ, मौसी कुछ सोचने लगी की कैसे अनुज को इस तकलीफ से छुटकारा दिलाया जाये…

उधर अनुज उनकी छूछीयों की चूस चूस कर उन्हें गरम कर रहा था, जिसका सीधा असर उनकी छूट पर हो रहा था जो की नाम हो रही थी… और इसी से उत्तेजित होकर मौसी ने कुछ सोचा जो की शायद वो सामान्य परिस्थितियों में कभी नहीं सोचती..

मौसी- सुनो बहन एक मदद करोगी?

मौसी ने सेविका से कहा, जिस पर सेविका ने उनकी तरफ देखकर सर हिलाया…

मौसी ने अनुज के लुंड की तरफ इशारा करके कहा की इसको थोड़ा शांत कार्डो बेचारा बच्चा तकलीफ में है.

ये बात जब अनुज के कानो में पड़ी तो वो चौंक गया उसे तो यकीन hi नहीं हुआ की सच में मौसी ऐसा बोल रही है..

पर अब तक अपने पिछले अनुभवों खासकर चुदाई के अनुभवों से इतना तो वो सीख चूका था की हवस और उत्तेजना में बहे हुए इंसान के लिए कुछ भी गलत सही नहीं होता… और उसने ये देखने के लिए की मौसी के दिमाग में क्या है बिना रुके उनकी छुच्छी को चूसता रहा…

मौसी की बात सुनकर सेविका उठकर अनुज के पैरों के पास बैठ गयी और अनुज का पेअर पकड़ कर उसे सीधा लिटा दिया जिससे अनुज का लुंड छत की और हो गया.. पर अनुज ने मौसी की छुच्छी को मुँह से नहीं निकल दिया…

सेविका ने अनुज के लुंड से धोती हटाई और अनुज का खड़ा दमकता कठोर लुंड नंगा हो गया जिसे देखकर सेविका के साथ साथ मौसी की आँखें भी बड़ी हो गयी… सेविका थोड़ी आगे हुई और बिना किसी हिचकिचाहट के उसने अनुज के लुंड के टोपे को मुँह में भर लिए… जिसे देखकर मौसी के मुँह से आअह्ह्ह्हह निकल गयी वहीं लुंड पर गरम मुँह का एहसास पाकर अनुज ने भी एक पल को मौसी की चुकी से मुँह हटा लिए और उसके मुँह से आह्हः निकल गयी.

वहीं मौसी हैरान थी क्यूंकि उन्हें लगा था की सेविका अपने हाथ का इस्तेमाल करके अनुज के लुंड को शांत करेगी पर ये तो उनसे एक कदम आगे निकली… उधर अनुज ने बापिस अपना मुँह मौसी की चुकी में लगा लिए.. और मन hi मन खुश होने लगा की साला क्या किस्मत है एक मस्त औरत जिसे पहली बार मिला वो लुंड चूस रही है और मैं मौसी की छूछीयो को चूस रहा हूँ…

सेविका भी पूरी शिद्दत से लुंड को चूस चाट रही थी जिसे देखकर मौसी को जलन उत्तेजना जैसे कई भाव आ रहे थे.. लम्बा और कड़क लुंड देखकर मौसी उत्तेजित हो रही थी साथ hi एक नंगी औरत उनके भतीजे का लुंड चूस रही थी ये देखकर और गरम हो रही थी साथ hi जलन ये की उसकी जगह मैं क्यों नहीं हूँ.. काश अनुज का कड़क लुम्बा गरम लुंड अभी मेरे मुँह में होता .पर उनका अंतर्मन उन्हें रोक भी रहा था की ये गलत है…

पर बेचारी मौसी की आँखें उसी पर जमी हुई थी… साथ hi अनुज एक छुच्छी को चूसते हुए दूसरी को मसल रहा था जिससे उनकी प्यास और बढ़ रही थी.

वहीं उनके बगल वाले कमरे में मैं उदास होकर लेता हुआ था बगल में माँ लेटकर अपने पेअर दबाव रही थी सेविका से… मेरा लुंड तन कर छत की और मुँह करके खड़ा हुआ था जो की धोती के बहार से साफ़ दिख रहा था…

कुछ देर बाद माँ ने सेविका को रोका और बोली- बहन अब तुम भी आराम करो और सो जाओ.

तो सेविका उतर कर बीएड के बगल में पड़ी चादर पर लेटने लगी तो माँ ने रोका और कहा वहां नहीं इधर बीएड पर सो जाओ… और माँ ने और खिसककर सेविका के लिए जगह बनाई और मेरी तरफ हो गयी..

अब माँ बीच में थी मैं एक तरफ और सेविका दूसरी तरफ..

जब सोने के लिए लेट गए तो मैंने कुछ सोचा और पीछे से माँ से चिपक गया… मेरा लुंड साड़ी के ऊपर से hi माँ के गदराये चूतड़ों की दरार में फंस गया मैंने अपना हाथ माँ के पेट पर रख लिए और मसलने लगा…

माँ मुझे पीछे धकेलने लगी और फिर चेहरा घुमा कर फुसफुसाते हुए बोली- क्या कर रहा है कर्मा ये घर नहीं है ये देखलेगी तो गड़बड़ हो जाएगी..

में- पर मेरी हालत भी तो देखो माँ. लुंड कितना अकड़ गया है दर्द कर रहा है.

माँ- तो हाथ से शांत कर ले न ..

में- मेरा हाथ से शांत नहीं होता माँ या तो मुँह से या छूट या गांड से… ये तो तुम्हे भी पता है.

Maa-par यहाँ कुछ नहीं हो सकता,

Me-maa ऐसे तो नींद भी नहीं आएगी. कैसे सो पाउँगा मैं. न तो खुद कुछ करने दे रही हो और न hi उसके साथ..

माँ- ाचा रुक एक काम कर मैं सो रही हूँ तू मेरी जगह आजा और अगर ये मानती है तो जो चाहे कर ले..

में- पर मेरा मन तो तुम्हारे साथ था माँ.

Maa-Karma.

माँ ने गुस्से से बोलै और मैं झट से उठा और माँ भी उठी और हम दोनों ने अपनी अपनी जगह बदल ली अब मैं बीच में था और माँ और सेविका मेरे एक एक तरफ.. माँ ने दूसरी तरफ मुँह कर लिए और सोने की कोशिश करने लगी…

एक बार मैंने माँ पर नज़र डाली साड़ी में उनकी बड़ी सी गांड देखकर मेरे लुंड ने एक बार ठुमका मारा पर मुझे पता था माँ कुछ करने नहीं देगी तो फिर अपना ध्यान सेविका पर लगाया. वैसे बदन तो उसका भी बेहद मस्त था गांड भी बड़ी और कासी हुई मैंने अपनी धोती को उतर फेंका बीएड के नीचे और नंगी सेविका से बिलकुल नंगा होकर पीछे से चिपक गया.

मेरा लुंड उसके चूतड़ों के बीच मेरे हाथ उसकी चुकी पर मेरा सर उसके कंधे पर… इस अचानक हमले से भी वो ज़रा भी नहीं हिचकिचाई बल्कि अपना एक हाथ ऊपर लेकर मेरे चेहरे पर बड़े प्यार से फिराया और वहीं दूसरा नीचे ले गयी और अपने चूतड़ों से पीछे लेजाकर मेरे लुंड को पकड़ लिया और दो तीन बार हाथ से सहलाया मुझे बड़ा आराम मिला उसका हाथ लुंड पर पाकर.

फिर उसने अचानक से मेरे लुंड का टोपा अपनी छूट के मुँह पर लगाया और अपनी गांड पीछे को धकेली जिससे मर्द लुंड का टोपा उसकी छूट में समां गया..

आह्हः मुझे जो सुकून मिला उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल था… मैंने उसे बाँहों में कास लिए और फिर दो तीन करारे धक्के मरकर अपना पूरा लुंड उसकी छूट में घुसा दिया.

मुझे और सुकून मिला वहीं सेविका का मुँह भी खुला पर कोई आवाज़ नहीं निकली… लुंड छूट में जाते hi मैं तो अपने होश खो बैठा और फिर सेविका की कासी हुई गरम छूट के मज़े लेने लगा… वहीं बीएड की दूसरी तरफ माँ सो रही थी या सोने की कोशिश कर रही थी… नहीं पता था..

मैं तो बस धक्के पर धक्के लगाकर सेविका की छूट की दीवारों को हिला रहा था. मैंने सेविका को छोड़ते हुए hi जकड़ा और जकड के अपने ऊपर कर लिए और अपने ऊपर बिठा कर नीचे से धक्के लगाकर उसे छोड़ने लगा…






छोड़ते हुए मैं उसकी दोनों टैंगो को पकड़ कर नीचे से झटके मर रहा था और मरते हुए hi मेरी नज़र साइड में पड़ी तो देखा की माँ जो पहले हमसे दूसरी तरफ मुँह करके लेती हुई थी उनका मुँह अब हमारी तरफ था साथ hi उनकी साड़ी जांघो तक उठी हुई थी साथ hi उनका एक हाथ उनकी साड़ी के बीच में चल रहा था जबकि उनकी आँखें कभी बंद होती तो कभी हमारी चुदाई पर होती…

तभी मेरी और माँ की नज़र मिली तो मैंने इशारे से पुछा क्या हुआ… ये सब सेविका नहीं देख सकती थी क्यूंकि उसका चेहरा मेरे पैरों की तरफ था ..

माँ ने जवाब में ना में सर हिला दिया… मैंने लगातार सेविका को छोड़ना जारी रखा माँ ने मुझे इशारे से सेविका पर ध्यान देने को कहा जो की मैंने वैसे hi किआ… कुछ देर यूँ hi छोड़ने के बाद सेविका मेरे लुंड से उठी और उठने के बाद घूम कर मेरा लुंड चूसने लगी.. ये सेविका बोलती ज़रूर न हो पर चुदाई के गुणों में माहिर थी.

और उसी हुनर को वो मेरे लुंड पर दिखा कर मुझे मज़ा दे रही थी. आअह्ह्ह क्या जीभ चला रही थी वो मेरे लुंड के टोपे पर. मज़ा आ रहा था की तभी उसने मेरे लुंड को एक बार गले तक भरा और फिर बहार निकल दिया और घोड़ी बन गयी पर इस बार उसका मुँह माँ की तरफ था..

माँ ने उसको घूमता देख जल्दी से आँखें बंद की और वैसे hi सोने का नाटक करने लगी सीढ़ी पीठ के बल साड़ी जांघों के ऊपर साँसे तेज़ तेज़ चलती हुई, उधर सेविका भी थोड़ा आगे जाकर घोड़ी बानी थी जिससे उसका चेहरा माँ की जांघों तक पहुँच रहा था मैंने भी जल्दी से उसके पीछे जगह ली और एक बार और अपने लुंड को उसकी छूट में दाग दिया और मशीन एक बार फिर से चलने लगी

मैं और सेविका चुदाई के मज़े ले रहे थे तो बेचारी माँ फांसी हुई थी अब तो सेविका ठीक सामने थी तो अब तो उंगली करना तो दूर आँखें खोलना भी मुश्किल था. सेविका ने माँ की मुश्किल को और बढ़ा दिया और अपना चेहरा झुककर माँ की नंगी जांघ पर टिका दिया और माँ की जांघ का तकिया बना लिए..

माँ पैरों पर उसका चेहरा महसूस करके और तड़पने लगी साथ hi चुदाई की थप थप थप की आवाज़ और मेरी आह्हः की जो सेविका की गरम छूट मरने पर मेरे मुँह से निकल रही थी माँ को और गरम कर रही थी.. माँ छूट को शांत करना चाहती थी पर यहाँ हो कुछ और hi रहा था..

सेविका भी एक के बाद एक ऐसी हरकतें करके माँ को और गरम कर रही थी जहाँ उसने चेहरा रखा था माँ की जांघ पर वह उसने माँ की जांघ को चूमना शुरू कर दिया जिससे माँ का शांत रहना और मुश्किल हो गया मेरे द्वारा मरे गए हर धक्के पर वो माँ की जांघ पर थोड़ा और आगे बढ़कर चूम लेती.. माँ का मुँह अब रह रह कर खुलकर बंद हो रहा था आँखें बंद हो चुकी थी… मुठी कासी हुई थी पूरा बदन तड़प रहा था…

इसी तरह कुछ hi पलों बाद सेविका का चेहरा जांघ के ऊपर के हिस्से तक पहुँच गया माँ की तड़प भी अपनी चरम पर थी सेविका का चेहरा माँ की छूट के बिलकुल करीब पहुंच गया था… मैं इस सब से अनजान सेविका की छूट का आनंद उठा रहा था.

तभी अचानक से मेरे कानो में माँ की एक तेज़ आअह्ह्ह्हह की सिसकी की आवाज़ आई और मैंने हैरानी से देखा माँ की तरफ तो मेरी आँखें बड़ी हो गयी.. माँ की साड़ी कमर पर थी दोनों टांगें फैली हुई थी और दोनों टैंगो के बीच सेविका का सर था और उसका मुँह माँ की छूट से चिपका हुआ था माँ के हाथ सेविका के सर पर थे और उसके सर को अपनी छूट पर दबा रहे थे

ऐसा नज़ारा तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, की मेरी माँ की छूट पर किसी और औरत का मुँह होगा थोड़ा ध्यान देने पर पाया की वो अपनी जीभ माँ की छूट पर चला रही थी और माँ आह्ह्ह्हह अह्ह्ह्ह कर रही थी… ये सब देखकर मेरा भी जोश बढ़ गया और मैं ताबड़तोड़ धक्के लगाने लगा… सेविका की छूट में.

उधर जहाँ एक सेविका एक कमरे में माँ और बेटे के बीच में एक कड़ी बानी हुई थी वहीं एक दुसरे कक्षा में एक और सेविका थी जो बीएड के साइड में कड़ी होकर बीएड पर हाथ रखकर झुकी हुई थी और जग्गू उसके पीछे से उसकी छूट में लुंड पेल रहा था…






तै बीएड के दुसरे कोने पर लेती हुई सोने का नाटक कर रही थी पर अंदर hi अंदर उनकी छूट में चींटियां रेंग रही थी… वहीं उनका बीटा उनको सोया हुआ समझकर सेविका की छूट से अपने लुंड को शांत कर तहा था… एक बार अपनी मम्मी की गांड पर झड़ने के बाद जग्गू दोबारा रिस्क नहीं लेना चाहता था…

इसलिए उसने सेविका को उठाया और फिर बिस्तर से नीचे लाकर छोड़ने लगा जिससे उसकी मम्मी की नींद भी न टूटे और वो चुदाई भी कर सके काफी देर चुदाई के बाद अब जग्गू एक बार फिर से झड़ने की कगार पर था और एक दो बार तगड़े झटको के बाद जग्गू ने लुंड निकला और न जाने उसे क्या सूजा की वो जल्दी से बीएड पर चढ़ा और जैसे hi झड़ने वाला था उसने लुंड का निशाना एक बार फिर से मम्मी की गांड पर कर दिया और धार के धार मम्मी की गांड पर मरने लगा… मंजू तै की पहले से भीगी साड़ी और गीली हो गयी जिसका एहसास तै को भी हुआ पाए बेचारी कुछ कर भी नहीं सकती थी इसलिए चुप चाप जैसे थी वैसे hi लेती रही वहीं जग्गू झड़ने के बाद चैन की सांस लेकर लेट गया और सोने लगा… सेविका भी जगह पर आकर लेट गयी पर तै जी की नींद अब भी गायब तहज और उनके दिमाग में भी कुछ चल रहा था.


तो क्या होना है और क्या चल रहा है तै के दिमाग में जानें अगली अपडेट में.

दोस्तों कैसी लगी अपडेट प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं.. धन्यवाद् बहुत बहुत.

आपके कमैंट्स का इंतज़ार है.
 
खुशखबरी !! खुशखबरी !! खुशखबरी

:celebconf:

मेहरबान, कदरदान, साहिबान, सभी लंड और चूत हो जाएं सावधान।

आपके अपने चोदमपुर के कलाकार, बनने वाले हैं चमनपुरा के मेहमान।

जी हाँ !! 😍

XFourm पर चल रही सुपरहिट INCEST कहानी
सपना या हकीकत जो कि हमारे अपने जाने पहचाने DREAMBOY40 साहब द्वारा लिखी गयी है । तो हमारे चोदमपुर के कुछ खास कलाकार जा रहे हैं चमनपुरा मेहमान बनकर और लेने मेहमान नवाजी का पूरा आनंद। तो आप लोग भी अपना अपना सामान बांध लें और चलें हमारे साथ इस रोम रोम खड़ा करने वाले सफर पर।






बहुत जल्द ही CHODAMPUR CHAMANPURA SPECIAL UPDATES आने वाले है ।

इस इवेंट को सफल बनाने में आपका सहयोग बहुत जरुरी है । क्योकि ऐसा कोई इवेंट अब तक XFOURM के इतिहास में नही हुआ है ।

तो ज्यादा से ज्यादा प्रतिक्रिया देकर इस इवेंट को सफल बनाने में सहयोग दे ।

निवेदक : DREAMBOY40 TharkiPo
 
आप सभी को पूरे चोदमपुर परिवार की ओर से क्रिसमस की बहुत बहुत शुभकामनाएं, आशा है खुशियों के संता🎅 थैला भरकर आपके लिए खुशियों के तोहफे लाएं और आपके जीवन में खुशियां फैलाएं।

🎄Merry Christmas🎄
 
मंजू तै की पहले से भीगी साड़ी और गीली हो गयी जिसका एहसास तै को भी हुआ पाए बेचारी कुछ कर भी नहीं सकती थी इसलिए चुप चाप जैसे थी वैसे hi लेती रही वहीं जग्गू झड़ने के बाद चैन की सांस लेकर लेट गया और सोने लगा… सेविका भी जगह पर आकर लेट गयी पर तै जी की नींद अब भी गायब तहज और उनके दिमाग में भी कुछ चल रहा था.

अपडेट 126

तै जहाँ जग्गू की हरकतों से गरम होकर अपनी उत्तेजना को दबाये हुए सोने की कोशिश कर रही थी… वहीं बगल के कमरे में कोई ऐसा था जिसकी उत्तेजना बढाती जा रही थी और छुपाई नहीं जा रही थी और वो कोई और नहीं अनुज था जो की सेविका की लुंड चूसै और साथ hi मौसी की चुकी चूसने से बेहद गरम हो चूका था..

वहीं मौसी की उत्तेजना भी काम नहीं थी अनुज को अपनी छुच्छी छुड़वाते हुए मौसी ने गरम होकर अपने खुले हुए ब्लाउज को पूरी तरह से निकल कर अलग कर दिया था और ऊपर से बिलकुल नंगी होकर लेती थी वहीं अनुज और सेविका तो पहले से hi पूरे नंगे थे…

अनुज से कुछ देर बाद जब सहन नहीं हुआ तो वो उठा और सेविका को जो उसके पैरों के पास बैठी थी खींच कर अपने पास कर के अपने और मौसी के बीच में लिटा लिए और फिर उसके पीछे से चिपककते हुए अपने फटने को आतुर लुंड को सेविका की रसीली गीली गरम छूट के छेड़ पर रख दिया, अनुज ने ये सब ितमा जल्दी किआ की किसी को कुछ करने का मौका hi नहीं दिया, हालाँकि जितनी गरम मौसी थी वो उसे वैसे भी रोकती नहीं..

अनुज ने लुंड के टोपे को सेविका की छूट के द्वार पर रखा और फिर सेविका को पकड़ कर एक धक्का लगाया और लुंड को सेविका की कासी हुई छूट में पेल दिया जिससे सेविका का मुँह कुछ पल के लिए खुला का खुला रह गया साथ hi मौसी के मुँह से एक हलकी सी आह निकल गयी ऐसा नज़ारा देखकर, आँखों के बिलकुल सामने एक छूट में लुंड को जाता देख मौसी की तो हालत hi ख़राब हो गयी.

उधर अनुज सेविका की छूट पर अपनी गर्मी निकलने लगा.. अनुज ने सेविका की एक तंग उठाकर ऊपर कर ली और सटासट उसे छोड़ने लगा… मौसी ऐसे नज़ारे को देखकर अपनी hi जगह पर तड़प रही थी और चूँकि अनुज और मौसी दोनों के बीच में सेविका थी तो वो भी उत्तेजित हो कर अनुज के लम्बे लुंड से छुड़ाते हुए जोश में आकर अपने हाथ को बढाकर मौसी के नंगे पेट पर रख लिए था और अनुज से छुड़वाते हुए मौसी के नंगे पेट पर हाथ फिरने लगी..

और कुछ पल या कहें की उसकी छूट में कुछ गहरे धक्के बाद hi कब सेविका का हाथ मौसी की भरी भरकम छूछीयो तक पहुँच गया किसी को खबर hi नहीं हुई.

मौसी को तो तब पता चला जब हर अनुज के झटके के साथ सेविका मौसी की छुच्छी को सहलाने लगी… मौसी जो पहले से उत्तेजित थी और गरम हो गयी एक औरत का हाथ अपनी छूछीयो पर पा कर, मौसी पीठ पर लेती हुई अनुज और सेविका की चुदाई देख रही थी साथ hi अपने हाथ से कभी अपनी छुच्छी दबती तो कभी रह रह कर छूट को साड़ी के ऊपर से सहलाती…

इसी उत्तेजना में मौसी अनुज और सेविका की और और खिसक कर लेट गयी और अब उनका सर सेविका की छाती और पेट के बिलकुल पास पहुँच गया जिसका फायदा उठाकर मौसी ने वो किआ जिसका अमूमन उन्हें खुद नहीं था.. उन्होंने अपने सर को एक तरफ करके आगे किआ और सेविका की हर झटके के साथ झूलती हुई छुच्छी को मुँह में भर लिए और चूसने लगी….






मौसी अपनी इस हरकत से खुद हैरान थी वहीं अनुज ने जब ये देखा तो और जोश में आ गया और सेविका की छूट में और तगड़े धक्के मरने लगा…

मौसी सेविका की चुकी को चूसते हुए खुद को शांत करने लगी और साड़ी के ऊपर से hi अपनी छूट राहडने लगी वहीं अनुज ने भी सेविका के बगल से होते हुए एक हाथ निकलकर आगे बढ़ाया और मौसी की भरी भरकम छुच्छी को पकड़कर दबाने लगा..

मौसी तो आँखें बंद कर के इस पल का आनंद ले रही थी.. मुँह में एक बड़ी और कोमल छुच्छी…

खुद की चुकी को मसलता हुआ भांजा और सामने होती हुई जबरदस्त चुदाई…

मौसी हैरान भी थी अनुज को चुदाई करते देख की उसने ये सब कहाँ से सीखा और क्या वो इससे पहले भी चुदाई कर चूका है… उधर सेविका ने हाथ आगे बढाकर साड़ी के ऊपर से मौसी को छूट पर हाथ रख दिया और रगड़ने लगी…

मौसी का पूरा बदन तड़पने लगा अनुज भी मौसी को इस हाल में देख जोश में आ रहा था. और उसी जोश के साथ मौसी की एक छुच्छी को मसलते हुए सेविका को छोड़ रहा था, मौसी अपनी छूट पर हाथ महसूस करके सिहर रही थी.. सेविका का हाथ साड़ी के ऊपर से hi उनकी छूट को कुरेद रहा था और मौसी की उत्तेजना बढाती जा रही थी और फिर एक पल ऐसा आया जब मौसी और सह नहीं पायी और सेविका की उँगलियों पर झड़ने लगी.. मौसी के मुँह से एक आअह्ह्ह्हह की सिसकी निकली और मौसी का बदन एकाद्गय और वो झड़ने लगी.. मौसी को झाड़ता देखकर अनुज तो मनो पागल हो गया और बहुत तेज़ी से सेविका को छोड़ने लगा…

मौसी जब झड़ने के बाद थोड़ा शांत हुई तो अब उन्हें शर्म आने लगी की कैसे वो अपने भांजे और एक अनजान औरत के सामने खुद पर काबू न रख सकीय मौसी शर्म से अनुज और सेविका से दूर हो कर लेट गयी और पास मैं पड़े अपने ब्लाउज को भी उठाकर पहन लिए.. और फिर लेट कर अनुज और सेविका की चुदाई देखने लगी जो की अपने शीर्ष पर थी..






और कुछ पल बाद ऐसा hi हुआ अनुज के झटके बहुत तेज़ हो गए और फिर अनुज ने अचानक से सेविका की छूट से लुंड निकला और उसकी चूचियों के ऊपर निशाना साधा और एक के बाद एक धार छोड़ने लगा और सेविका की चुकी को अपने रास से भीगने लगा.. मौसी का सारा ध्यान उन्ही पर था… उनके भांजे के लुंड से रास की धार निकल कर सेविका की छूछीयो को भीगा रही थी… मौसी सोचने लगी की ये धार उनकी छूछीयों पर गिरेगी तो कैसा लगेगा जब उनकी छूछीयों को लुंड रास से भिगाया जायेगा…

तभी ये नज़ारा ख़त्म हुआ और अनुज ने झड़ना बंद किआ उधर और मौसी के बगल में चुपचाप आकर लेट गया…

वहीं सेविका भी वैसे hi छूछीयो को गीला hi रखकर लेट गयी और सोने लगी..

मौसी भी मचह्ते हुए आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगी…

यहाँ जहाँ सोने की तयारी थी वहीं बगल के कक्षा में नींद का कोई अटपटा नहीं था… और एक अलग hi वासना का खेल चल रहा था…

मैं अभी भी सेविका को घोड़ी बनाकर पीछे से छोड़ रहा था फ़र्क़ सिर्फ इतना था की सेविका के सामने माँ थी जिन्होंने अभी अभी अपनी साड़ी और ब्लाउज को उतर दिया था और पूरी नंगी होकर सेविका के सामने आकर बैठी थी.. और सेविका को ये अनुरोध भी किया की इस बारे में वो किसी को भी न बताये सेविका ने भी हाँ में सर हिलाकर माँ को तसल्ली दी..

अब माँ जो कब से अपनी उत्तेजना को दबाये बैठी थी पूरा खुल गयी वहीं मैं भी एक अनजान औरत के साथ अपनी माँ को नंगी देखकर और उत्तेजित हो गया…. माँ भी कभी सेविका की चुकी को सहलाती तो कभी उसके चेहरे को पकड़ कर मुझे और तेज़ी से छोड़ने के लिए उकसा रही थी…. और जिसका असर मुझ पर हो भी रहा था.. और मैं और तगड़े धक्कों से सेविका की छूट को कूट रहा था…






और इसका परिणाम ये हुआ की सेविका कुछ hi झटको के बाद मेरे लुंड पर झड़ने लगी… उसके मुँह से पहली बार मैंने आवाज़ सुनी हालाँकि बोली नहीं पर आह्ह्ह्हह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह की सिसकियाँ ज़रूर ले रही थी

झड़ने के बाद वो आगे होकर गिर गयी और लम्बी लम्बी सांसे लेने लगी.. मेरा लुंड उसकी छूट से निकल गया… माँ की नज़र भी मेरे खड़े और सेविका के छूट रास में भीगे हुए लुंड पर पड़ी तो उन्हें भी एक नशा सा होने लगा…

फिर उन्होंने मुझे लेटने का इशारा किआ और मैं अपनी पीठ के बल लेट गया मेरा लुंड सीधा छत पर निशाना बना रहा था माँ ने सेविका को पकड़ कर उठाया और मेरे लुंड पर बिठा दिया सेविका का चेहरा मरी तरफ था. सेविका भी ख़ुशी से एक बार फिर से मेरे लुंड की सवारी करने लगी वहीं मेरी नंगी माँ सेविका के चूतड़ों को फैलते हुए अपने बेटे के लुंड को सेविका की छूट में आता जाता देख आहें भरने लगी…

हैरानी की बायत ये थी की इतना सब होने के बाद भी हम लोग कुछ बोल नहीं रहे थे… बोलने को मन सेविका को थी पर हम भी उस नियम का पालन कर रहे थे या यूँ कहें की ज़रुरत hi नहीं पद रही थी हमारे होंठों की जगह हमारी हवस और वासना बोल रही थी पूरा बदन बोल रहा था…

माँ हमारे बगल में बैठकर सेविका के दोनों चूतड़ों को फैलाये हुए मेरे लुंड को आते जाते हुए बहुत ध्यान से देख रही थी.. शायद ये पहली बार था जब वो अपने बेटे को करीब से किसी और की चुदाई करते देख रही थी.






और ये उन्हें बहुत ाचा लग रहा था. माँ के झुके होने की वजह से उनके बड़े बड़े चूतड़ मेरे बगल में थे.. और सेविका को छोड़ते हुए जैसे hi मेरा ध्यान माँ के चूतड़ों पर गया मैं खुद को रोक नहीं पाया और मैंने अपना हाथ बढाकर माँ के चूतड़ों पर रख दिया और उन्हें सहलाने लगा… इसका एहसास माँ को भी हुआ पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी उनका ध्यान अब भी मेरे लुंड और सेविका की छूट पर था. मैं अपने हाथ को माँ के चूतड़ों पर घूमने लगा और उन गदराये हुए मॉस के पटेलों को मसलने लगा. माँ के मुँह से सिसकियाँ निकलने लगी..

सेविका मेरे लुंड पर उछाल उछाल कर मेरे पूरे लुंड को अपनी छूट की सैर करवा रही थी.. मैंने माँ के चूतड़ों को मसलते हुए hi मौका देखकर अपने हाथ को उनकी छूट पर टिका दिया और उँगलियों से उनकी छूट को हल्का हल्का कुरेदने लगा.. माँ की छूट बेहद गीली थी… वहीं मेरी उँगलियों की वजह से उनका शरीर भी कंपनी लगा…

मुझे बहुत मज़ा आ रहा था एक अनजान औरत को छोड़ते हुए अपनी माँ के कामुक बदन से खेलने में… सेविका भी हम माँ बेटी की मस्ती को देखकर मुस्कुरा कर मेरे लुंड पर उछाल रही थी..

मैंने माँ की छूट को कुरेदते हुए एक उंगली माँ की छूट में घुसाने की जैसे hi कोशिश की माँ उठ गयी मेरी उंगली से दूर हो गयी और एक बार मेरी तरफ देखा फिर सेविका की और और बोली बहन अपना वादा याद रखना और किसी को इस बारे में मत बताना… क्यूंकि अब मुझसे सहा नहीं जाता और ये कहकर माँ बिस्तर पर hi कड़ी हुई और मेरे सर के दोनों तरफ पेअर कर लिए और मेरे चेहरे पर अपने बड़े बड़े गोल मटोल चूतड़ों को रख दिया….

मेरा तो पूरा चेहरा माँ के चूतड़ों से डाब गया माँ की छूट मेरे मुँह के ऊपर आ गयी जिसे देखकर hi मेरी जीभ खुद बा खुद बहार निकल गयी और मैं माँ की छूट पर जीभ फिरने लगा…

मेरी जीभ छूट पर पड़ते hi माँ के मुँह से अह्ह्ह्हह्हह बेटाःह्ह्ह्हह्ह की सिसकी निकल गयी…


उधर सेविका मेरे लुंड पर उछलती हुई माँ बेटे के इस नए तरह के प्यार को देख कर मुस्कुरा रही थी..

मैं अपने मुँह को घुमा घुमा कर अपनी जीभ को माँ की छूट से लेकर उनके रसीले गांड के छेड़ तक चाट रहा था.

माँ मेरे ऊपर बैठे हुए अपने चूतड़ों को मेरे मुँह पर घुमा रही थी… सेविका भी माँ बेटे के इस हवस भरे खेल को देखकर उत्तेजित हो रही थी और आगे बढ़कर वो थोड़ा सा झुकी और माँ की बड़ी बड़ी छूछीयों को बरी बरी से चूसने लगी…






मुझे बहुत मज़ा आ रहा था अपनी माँ के साथ किसी और के होते हुए ये सब करने में… अकेले में करने का अलग मज़ा है पर कोई देख रहा हो तो एक अलग hi उत्तेजना होती है…

मैं तो दो मस्त गदराई हुई औरतों के बीच जन्नत में था जिसमे से एक मेरी माँ थी…

मैं माँ की छूट के होंठों को अपनी जीभ से छेड़ते हुए उनके डेन को मुँह में भर कर चूस रहा था साथ hi एक उंगली को माँ के सबसे कैसे हुए और गंदे छेड़ गांड में घुसा दिया… जिससे माँ और जोश में आने लगी…

एक तो पहले hi एक अनजान औरत के सामने ये सब वो भी अपने सेज बेटे के साथ करने से माँ बहुत उत्तेजित हो गयी थी ऊपर से तिहरा हुम्ला छूछीयो पर सेविका का मुँह, छूट में मेरी जीभ और गांड में मेरी उंगली से माँ तो जैसे उत्तेजना के चरम पर पहुँच गई थी… और मुझे उनकी छूट भी कस्ती हुई महसूस हुई साथ hi उनका बदन भी अकड़ता हुआ सा महसूस हुआ मुझे लगा माँ झड़ने वाली हैं.

पर तभी मुझे हैरान करते हुए माँ अचानक से मेरे मुँह से उठ गयी और मेरी जीभ और उंगली उनके छूट और गांड से निकल गयी.. उठाते hi माँ ने एक काम हैरानी वाला और किआ और सेविका जो मेरे लुंड पर उछाल रही थी उसे भी धकेल कर एक तरफ गिरा दिया और वो मेरे लुंड से हैट गयी…

वो भी माँ की तरफ हैरानी से देखने लगी साथ hi मैं भी की अचानक से ये माँ को क्या हुआ पर अगले hi पल माँ ने जो किआ वो और भी हैरान करने वाला था माँ बहुत जल्दी से घूमी और मेरी कमर के दोनों तरफ पेअर किये और बैठते हुए मेरे लुंड को पकड़ा और और अपनी छूट के द्वार पर लगाया और फिर बिना किसी देरी के नीचे हो गयी और मेरा लुंड माँ की छूट में घुस गया..

माँ के मुँह से आह्हः बीटा ओह्ह्ह्हह निकला और मेरे मुँह से अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह माआ..

माँ की इस हरकत से मैं हैरान रह गया और फिर समझ आया की छूट की प्यास एक औरत से क्या क्या करवा सकती है, उसी छूट की प्यास की वजह से मेरी खुद की सगी माँ एक अनजान औरत के सामने अपने बेटे का लुंड अपनी छूट में ले कर बैठी है.. सेविका बगल में बैठी हुई हम दोनों खासकर माँ को देख अपनी छूट सहलाते हुए मुस्कुरा रही थी..


माँ कुछ पल यूँ hi लुंड पर बैठी रही और फिर आगे होकर सेविका का हाथ पकड़ा और उसे मेरे मुँह पर बैठने का इशारा किआ सेविका तुरंत अपनी छूट को मेरे मुँह पर रख कर बैठ गयी…

मैं भी ख़ुशी से उसकी छूट और गांड को चाटने लगा. माँ भी आगे को झुक गयी और मेरी जांघ पर हल्का सा मारकर मुझे इशारा की जिसे मैं समझ गया और उनकी जांघों को पकड़ कर नीचे से धक्के लगाकर अपनी सगी माँ को छोड़ने लगा..

सेविका मुझसे छूट और गांड चतवते हुए आगे को झुकी और अपने दोनों हाथों को माँ के चूतड़ों पर रखकर उन्हें सहलाने लगी साथ मेरे लुंड को माँ की छूट में आते जाते हुए ध्यान से देखने लगी..






वो देख रही थी की कैसे एक बेटे का लुंड उसकी सगी माँ की छूट की गहराइयों तो को नाप रहा है.. कैसे एक बीटा आज बापिस अपने जन्मस्थान में जा रहा है.

सेविका हमारी चुदाई देखकर बेहद उत्तेजित हो गई थी और ये बात उसकी छूट बाह बाह कर मुझे बता रही थी… उसकी छूट का नमकीन पानी मुझे बेहद ाचा लग रहा था..

मैं और माँ भी काम उत्तेजित नहीं थे और सब कुछ भूल कर एक दुसरे की चुदाई में लगे हुए थे…

माँ- हाँ बेरटाह्ह आईसीईई hiiiiiiiiiii बेटाःह्ह्ह्हह्ह माहारररर अपनीईई माआआअह्ह्ह की छूट कोऊ… दिखा दे इस्सस औरतट को की तू असलीई मादरचोड़द्द ही अह्ह्ह.

माँ उत्तेजित होकर ये सब बोल रही थी मेरे मुँह पर छूट थी तो मैं कुछ नहीं बोलसकता था पर माँ की बातें मुझे बेहद उकसा रही थी

माँ- अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह अह्ह्ह अह्ह्ह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह छोड़ड़ड़ कर्मा बेटाःह्ह्ह्हह्ह अपनी माह को, घुस जाहहहह जिस छुट से निकला हैई उसी में बापिस. अह्ह्ह्हह्ह्ह्हह मर गईइइइइइ..

बस माँ इतना कहने के साथ hi भरभरा के मेरे लुंड पर झड़ने लगी… जिसके साथ hi मेरा लुंड भी माँ की छूट में मुझे फूलता हुआ महसूस हुआ.. माँ का झड़ना ख़त्म होते hi मैंने माँ और सेविका दोनों को अपने ऊपर से हटाया और खड़े होकर सेविका का मुँह पकड़ा और अपने लुंड को उसके मुँह में घुसा दिया और दो तीन झटके मरते hi मेरा लुंड रास की धार उसके मुँह में छोड़ने लगा… जिसे वो गटकने लगी… मैं आअह्ह्ह्हह आह्ह्ह्हह करके अपने झड़ने का आनंद ले रहा था… फिर उसने मेरे लुंड से रास की कुछ आखिरी बूंदे भी खींचली और उसे अपने मुँह में भरकर रख लिए… और फिर जब मैंने अपने लुंड को उसके मुँह से निकल लिए तो वो अपने मुँह में भरे हुए रास को माँ को दिखाया जैसे दिखा रही हो… की देखो अपने बेटे के लुंड से निकले हुए रास को और माँ को दिखते हुए hi वो उसे सारा जातक गयी माँ भी मुस्कुराते हुए उसे देखकर अपनी छुच्छी को सहला रही थी…

खैर जब सब समाप्त हुआ तो मैं लेट गया मेरे एक तरफ माँ और दूसरी तरफ सेविका दोनों पूरी नंगी hi मुझसे चिपक कर सोने लगी.. और मैं अपनी किस्मत पर खुश होते हुए दोनों को चिपकाये हुए सोने लगा…


खैर अगली सुबह हुई तो क्यूंकि सब चोदामपुर वासी रात को किसी कारणवश देर से सोये थे तो अब भी सो hi रहे थे..

वहीं उनसे बहुत दूर कुछ चोदामपुर वासी ऐसे भी थे जो जागे हुए थे और सफर में थे…

एक बस में बैठे हुयी ममता चची, राजन चाचा और पल्ली एक सफर की और निकल पड़े थे दरअसल ममता चची के भाई कमलनाथ के बेटे रमन की शादी थी तो उनका पूरा परिवार जानीपुर शहर जा रहा था शादी को अटेंड करने पर अचानक से राजन चाचा और चची की नज़रें आपस में मिली और उन्हें बीती रात की साडी घटनाएं एक बार फिर से याद आने लगी… वो घटनाएं शायद जिसकी वजह से उनकी पूरी जिंगदी में एक नया मोड़ ले लिए था.

तो क्या हुआ था बीती रात में ये सब जानने के लिए देखें ऊगली अपडेट और जिस नए सफर पर ये परिवार गया है वहां क्या होता है क्या क्या नए नए कारनामे होते हैं ये जानने के लिए पढ़ें सपना या हकीकत.

अपने कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.
 
आप सभी को चोदमपुर की ओर से नए साल की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

आशा है की इस साल आपका प्यार और साथ हमें और कई गुना बढ़कर मिलेगा साथ ही ये साल आपके जीवन का सबसे हसीन साल हो ऐसी परमपिता से प्रार्थना है।

Happy New Year

2022
 
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