Incest वो तो है अलबेला (incest + adultery) - SexBaba
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Incest वो तो है अलबेला (incest + adultery)

hotaks

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Dec 5, 2013
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तेज हवाऐं चल रही थी। शायद तूफ़ान था क्यूंकि ऐसा लग रहा था मानो अभी इन हवाओं के झोके बड़े-बड़े पेंड़ों को उख़ाड़ फेकेगा। बरसात भी इतनी तेजी से हो रही थी की मानो पूरा संसार ना डूबा दे। बादल की गरज ऐसी थी की उसे सुनकर लोग अपने-अपने घरों में दुबक कर बैठे थे।

जहां एक तरफ इस तूफानी और डरावनी रात में लोग अपने घरों में बैठे थे। वहीं दूसरी तरफ एक बच्चा, इस तूफान से लड़ते हुए आगे भागते हुए चले जा रहा था।

बदन पर एक सफेद रंग का शर्ट और एक पैंट पहने हुए ये लड़का इस गति से आगे बढ़ रहा था, मानो उसे इस तूफान से कोई डर ही नही। तेज़ चल रही हवाऐं उसे रोकने की बेइंतहा कोशिश करती। वो लड़का बार-बार ज़मीन पर गीरता लेकिन फीर खड़े हो कर तूफान से लड़ते हुए आगे की तरफ बढ़ चलता।

ऐसे ही तूफान से लड़ कर वो एक बड़े बरगद के पेंड़ के नीचे आकर खड़ा हो गया। वो पूरी तरह से भीग चूका था। तेज तूफान की वज़ह से वो ठीक से खड़ा भी नही हो पा रहा था। शायद बहुत थक गया था। वो एक दफ़ा पीछे मुड़ कर गाँव की तरफ देखा। उसकी आंखे नम हो गयी, शायद आंशू भी छलके होंगे मगर बारीश की बूंदे उसके आशूं के बूंदो में मील रहे थे। वो लड़का कुछ देर तक काली अंधेरी रात में गाँव की तरफ देखता रहा, उसे दूर एक कमरे में हल्का उज़ाल दीख रहा था। उसे ही देखते हुए वो बोला...

"जा रहा हूं माँ!!"

और ये बोलकर वो लड़का अपने हांथ से आंशू पोछते हुए वापस पलटते हुए गाँव के आखिरी छोर के सड़क पर अपने कदम बढ़ा दीये....

तूफान शांत होने लगी थी। बरसात भी अब रीमझीम सी हो गयी थी, पर वो लड़का अभी भी उसी गति से उस कच्ची सड़क पर आगे बढ़ा जा रहा था। तभी उस लड़के की कान में तेज आवाज़ पड़ी....

पलट कर देखा तो उसकी आँखें चौंधिंया गयी। क्यूंकि एक तेज प्रकाश उसके चेहरे पर पड़ी थी। उसने अपना हांथ उठाते हुए अपने चेहरे के सामने कीया और उस प्रकाश को अपनी आँखों पर पड़ने से रोका। वो आवाज़ सुनकर ये समझ गया था की ये ट्रेन की हॉर्न की आवाज़ है। कुछ देर बाद जब ट्रेन का इंजन उसे क्रॉस करते हुए आगे नीकला, तो उस लड़के ने अपना हांथ अपनी आँखों के सामने से हटाया। उसके सामने ट्रेन के डीब्बे थे, शायद ट्रेन सीग्नल ना होने की वजह से रुक गयी थी।

उसने देखा ट्रेन के डीब्बे के अंदर लाइट जल रही थीं॥ वो कुछ सोंचते हुए उस ट्रेन को देखते रहा। तभी ट्रेन ने हॉर्न मारा। शायद अब ट्रेन सिग्नल दे रही थी की, ट्रेन चलने वाली है। ट्रेन जैसे ही अपने पहीये को चलायी, वो लड़का भी अपना पैर चलाया, और भागते हुए ट्रेन पर चढ़ जाता है। और चलती ट्रेन के गेट पर खड़ा होकर एक बार फीर से वो उसी गाँव की तरफ देखने लगता है। और एक बार फीर उसकी आँखों के सामने वही कमरा दीखता है जीसमे से हल्का उज़ाला था। और देखते ही देखते ट्रेन ने रफ्तार बढ़ाई और हल्के उज़ाले वाला कमरा भी उसकी आँखों से ओझल हो गया.....

--------------

कमरे में हल्की रौशनी थी, एक लैम्प जल रहा था। बीस्तर पर दो ज़ीस्म एक दुसरे में समाने की कोशिश में जुटे थे। मादरजात नग्न अवस्था में दोनो उस बीस्तर पर गुत्थम-गुत्थी हुए काम क्रीडा में लीन थे। कमरे में फैली उज़ाले की हल्की रौशनी में भी उस औरत का बदन चांद की तरह चमक रहा था। उसके उपर लेटा वो सख्श उस औरत के ठोस उरोज़ो को अपने हांथों में पकड़ कर बारी बारी से चुसते हुए अपनी कमर के झटके दे रहा था।

उस औरत की सीसकारी पूरे कमरे में गूंज रही थी। वो औरत अब अपनी गोरी टांगे उठाते हुए उस सख्श के कमर के इर्द-गीर्द रखते हुए शिकंजे में कस लेती है। और एक जोर की चींख के साथ वो उस सख्श को काफी तेजी से अपनी आगोश में जकड़ लेती है और वो सख्श भी चींघाड़ते हुए अपनी कमर उठा कर जोर-जोर के तीन से चार झटके मारता है। और हांफते हुए उस औरत के उपर ही नीढ़ाल हो कर गीर जाता है।

"हो गया तेरा, अब जा अपने कमरे में। मैं नही चाहती की कीसी को कुछ पता चले।"

उस औरत की बात सुनकर वो सख्श मुस्कुराते हुए उसके गुलाबी होठों को चूमते हुए, उसके उपर से उठ जाता है और अपने कपड़े पहन कर जैसे ही जाने को होता है। वो बला की खुबसूरत औरत एक बार फीर बोली--

"जरा छुप-छुपा कर जाना, और हां अभय के कमरे की तरफ से मत जाना।"

उस औरत की बात सुनकर, वो सख्श एक बार फीर मुस्कुराते हुए बोला--

"वो अभी बच्चा है भाभी, देख भी लीया तो क्या करेगा? और वैसे भी वो तुमसे इतना डरता है, की कीसी से कुछ बोलने की हीम्मत भी नही करेगा।"

उस सख्श की आवाज़ सुनकर, वो औरत बेड पर उठ कर बैठ जाती है और अपनी अंगीयां (ब्रा) को पहनते हुए बोली...

"ना जाने क्यूँ...कुछ अज़ीब सी बेचैनी हो रही है। मैने अभय के सांथ बहुत गलत कीया।"

"ये सब छोड़ो भाभी, अब तूम सो जाओ।"

कहते हुए वो सख्श उस कमरे से बाहर नीकल जाता है। वो औरत अभी भी बीस्तर पर ब्रा पहने बैठी थी। और कुछ सोंच रही थी, तभी उसके कानो में ट्रेन की हॉर्न सुनायी पड़ती है। वो औरत भागते हुए कमरे की उस खीड़की पर पहुंच कर बाहर झाकती है। उसे दूर गाँव की आखिर छोर पर ट्रेन के डीब्बे में जल रही लाईटें दीखी, जैसे ही ट्रेन धीरे-धीरे चली। मानो उस औरत की धड़कने भी धिरे-धिरे बढ़ने लगी....
 
★ INDEX ★

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वो तो है अलबेला

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अपडेट --(१)

गाँव के बीचो-बीच खड़ी; ठाकुर रतन सिंह की हवेली वाकई काफी शानदार थी। कहते हैं की ठाकुर परम सिंह काफी दयानीधान कीस्म के इंसान थे। दुखीयों की मदद करना उनका पहला कर्तब्य था। यही वज़ह था, की आज भी इस हवेली की वही इज्जत बरकरार थी। ठाकुर परम सिंह तो नही रहें। पर हवेली को तीन अनमोल रत्न दे कर इस दुनीया से वीदा हुएं।

तो चलिए जानते हैं कुछ कीरदारों के बारे में---

(१) मनन सिंह (परम सिंह के बड़े बेटे)--

अपने पिता के तरह ही, अच्छे विचारो और दुसरों की मदद करने वालो में से थे। मगर शायद इस दुनीयां को उनकी अच्छाई नही भाई, और २६ साल की उम्र में ही चल बसे। कहते हैं की, इनके मौत का कारण कोई गम्भीर बीमारी थी। कम वर्ष की आयू में ही विवाह होने की वज़ह से १९ वर्ष की आयू में ही पिता बन गये।

संध्या सिंह (मनन सिंह की पत्नी)--

संध्या का जब विवाह हुआ तब वो मात्र १८ वर्ष की थी। शादी भी इसी शर्त पर संध्या ने की थी की, वो अपनी पढ़ाई नही छोड़ेगी। और शादी के बाद संध्या ने अपनी बी॰ए॰ की डीग्री की उपाधि हांसिल की। कॉलेज़ भी ठाकुर रमन सिंह का ही था। संध्या की ज़ींदगी में भुचाल तब आया जब अचानक ही उसके पति का देहांत हो गया। पति के मौत के बाद हवेली की सारी जीम्मेदारी संध्या ने ही संभाली। क्यूंकी ठाकुर परम सिंह का यही वसीयत था।

अभय सिंह (मनन सिंह का बेटा)--

हसमुख और पिता की तरह ही जीम्मेदार रहने वाला लड़का। अपने पिता को बहुत प्यार करता था, लेकिन शायद नसीब में ज्यादा दीन के लिए पिता का प्यार नही लीख़ा था। और ७ साल की उम्र में ही पीता का साया छीन गया।

(२) रमन सिंह (परम सिंह का दुसरा बेटा)--

मनन सिंह और रमन सिंह दोनो जुड़वा थे। इन दोनो की शादि भी एक सांथ हुई। और दोनो को बच्चे भी। फर्क सीर्फ इतना था की, मनन सिंह का बेटा रमन सिंह के बेटे से १५ दीन बड़ा था। और दुसरा ये की, रमन सिंह को जुड़वा हुए। एक बेटी भी। रमन सिंह बेहद अय्यास कीस्म का आदमी था। और सीर्फ अपने फ़ायदे के बारे में सोंचता था।

ललिता सिंह (रमन सिंह की पत्नी)--

सांवले रंग की बड़े नैन नक्श वाली औरत थी। काफी मज़ाकीया अंदाज़ था इस औरत का और इसके दीमाग में क्या चलता रहता है, कीसी को भी समझ पाना मुश्किल था।

अमन सिंह (रमन सिंह का बेटा) --

अमन सिंह संध्या का काफी दुलारा था। वो अमन को बहुत चाहती थी। गाँव भर में ये बात उठने लगी थी की, संध्या को अपने बेटे से ज्यादा रमन के बेटे की फीक्र रहती है। अब इस बात का जवाब तो कहानि में ही मीलेगा।

नीधि सिंह (मनन की बेटी) --

निधि अपने बाप के रंग-रुप में ढली थी। इसीलिए अपनी माँ की तरह सांवली ना हो कर, गोरी काया की लड़की थी।

(३) प्रेम सिंह (परम सिंह का तीसरा बेटा)--

प्रेम सिंह दीमाग से थोड़ा पैदल था। उसे घर-समाज़ में क्या हो रहा है, कुछ लेना देना नही था। जीस काम में लगा देते उसी काम में लगा रहता।

मालती सिंह (प्रेम सिंह की पत्नी)--

काफी शांत और अच्छे चरीत्र की औरत। कोई बच्चा नही, इसका कारण कुछ पता नही। पर अभय को जी जान से प्यार करती थी। अभय का हसमुख चेहरा उसे बहुत भाता था।

(बाकी के कीरेदार कहानी के सांथ पेश कीये जायेगें)

**************

ट्रेन के गेट पर बैठा वो लड़का, एक टक बाहर की तरफ देखे जा रहा था। आँखों से छलकते आशूं उसके दर्द को बयां कर रहे थे। कहां जा रहा था वो? कीस लिए जा रहा था वो? कुछ नही पता था उसे। अपने चेहरे पर उदासी का चादर ओढ़े कीसी बेज़ान पत्थर की तरह वो ट्रेन की गेट पर गुमसुम सा बैठा था। उसके अगल-बगल कुछ लोग भी बैठे थे। जो उसके गले में लटक रही सोने की महंगी चैन को देख रहे थे। उनकी नज़रों में लालच साफ दीख रही थी। और शायद उस लड़के का सोने का इंतज़ार कर रहे थे। ताकी वो अपना हांथ साफ कर सके।

पर अंदर से टूटा वो परीदां जीसका आज आशियाना भी उज़ड़ गया था। उसकी आँखों से नींद कोषो दूर था। शायद सोंच रहा था की, अपना आशियाना कहां बनाये???

--------*-----

सुबह-सुबह संध्या उठते हुए हवेली के बाहर आकर कुर्सी पर बैठ गयी। उसके बगल में रमन सिंह और ललिता भी बैठी थी। तभी वहां एक ३0 साल की सांवली सी औरत अपने हांथ में एक ट्रे लेकर आती है, और सामने टेबल पर रखते हुए सबको चाय देकर चली जाती है।

संध्या चाय की चुस्की लेते हुए बोली...

संध्या -- "तुम्हे पता है ना रमन, आज अभय का जन्मदिन है। मैं चाहती हूँ की, आज ये हवेली दुल्हन की तरह सजे,, सब को पता चलना चाहिए की आज छोटे ठाकुर का जन्मदिन है।"

रमन भी चाय की चुस्कीया लेते हुए बोला...

रमन -- "तुम चिंता मत करो भाभी, आज का दीन सबको याद रहेगा..."

रमन अभी बोल ही रहा था की, तभी वहां मालती आ गयी

मालती -- "दीदी, अभय को देखा क्या तुमने?"

संध्या -- "सो रहा होगा वो, मालती। इतनी सुबह कहां उठता है वो?"

मालती -- "अपने कमरे में तो नही है वो, मैं देख कर आ रही हूँ। मुझे लगा कल की मार की वज़ह से, डर के मारे आज जल्दी उठ गया होगा।"

मालती की बात सुनते ही, संध्या के गुलाबी गाल गुस्से में लाल हो गये। और एक झटके में कुर्सी पर से उठते हुए गुस्से में चील्लाते हुए बोली...

संध्या -- "बेटा है मेरा वो! कोई दुश्मन नही, जो मैं उसे डरा-धमका कर रखूंगी। हां हो गयी कल मुझसे गलती, गुस्से में मार दी थोड़ा-बहुत तो क्या हो गया?"

संध्या को इस तरह चीखती-चील्लाती देख मालती शीतलता से बोली...

मालती -- "अपने आप को झूंठी दीलासा क्यूँ दे रही हो दीदी? मुझे नही लगता की कल आपने अभय को थोड़ा-बहुत ही मारा था। और वो शायद पहली बार भी नही था।"

अब तो संध्या जल-भून कर राख सी हो गयी, शायद मालती की सच बात उसे तीखी मीर्ची की तरह लगी या शायद खुद की गलती का अहेसास था जो गुस्से की सीमा की चरम पर था

संध्या -- "तू कहना क्या चाहती है.....? म...मै भला उससे क्यूँ नफरत करुंगी? तूझे लगता है की मुझे उसकी फीक्र नही, सीर्फ तूझे ही है क्या?"

गुस्से खलबलायी संध्या चील्लाते हुए बोली...

मालती -- "मुझे क्या पता दीदी? तुम्हारा बेटा है, मारो चाहे काटो, मुझे उससे क्या? मुझे वो अपने कमरे में नही मीला, तो बस यूं ही पुछने चली आयी।"

कहते हुए मालती वहां से चली जाती है। संध्या अपना सर पकड़ कर वही चेयर पर बैठ जाती है। संध्या को इस हालत में देख रमन संध्या के कंधे पर हांथ रखते हुए बोला...

रमन -- "क्या भाभी तुम भी छोटी-छोटी बात को दील..."

रमन अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था की संध्या बीच में ही बोल उठी...

संध्या -- "रमन जाओ यहां से, मुझे कुछ समय के लिए अकेला छोड़ दो।"

संध्या की सख्त आवाज़ सुनकर, रमन को लगा, अभी इस समय यहां से जाना ही ठीक होगा।

संध्या अपने सर पर हांथ रखे बैठी गहरी सोंच में डूबी थी। की तभी उसकी दोनो आँखो पर कीसी के हथेली पड़े और संध्या की आँखे बंद हो गयी। अपनी आँखो पर पड़े हथेली को टटोलते हुए संध्या के चेहरे पर एक मुस्कान की लकीरे उमड़ पड़ती है और खुश होते हुए बोली...

संध्या -- "नाराज़ है ना तू अपनी माँ से? एक बार माफ़ कर दे, आगे से ऐसा कुछ नही करुगीं जीससे तूझे तकलीफ़ हो।"

संध्या की बात सुनते हुए अमन खीलखीला कर हंस पड़ा, और अपनी हथेली संध्या की आँखों पर से हटाते हुए उसके सामने खड़ा हो जाता है। संध्या को लगा था की, ये उसका बेटा अभय है पर ये तो अमन था। चेहरे की मुस्कान ऐसे उड़ी जैसे फुदकती चींड़ीया।

अमन --"अरे ताई माँ, आपको क्या लगा? की मैं अभय हूं?"

अमन की बात सुनकर संध्या अपने गम को छीपाते हुए एक झूठी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए बोली...

संध्या -- "बदमाश कही का, सच में मुझे ऐसा लगा की ये अभय है।"

अभय -- "आपको लगता है ताई माँ, की अभय ऐसा कर सकता है? वो करता तो अब तक दो-चार थप्पड़ खा चुका होता। और वैसे भी, बेचारा कल रात आपके हांथो से मार खाकर, घर से ऐसा भागा, की वापस ही नही लौटा।"

अब चौंकने की बारी संध्या की थी, अमन की बात सुनते ही उसके हांथ-पांव में कंपकपी उठने लगी। वैसे तो धड़कने बढ़ने लगती है, मगर संध्या की मानो धड़कने थमने लगी थी। सुर्ख हो चली आवाज़ और चेहरे पर घबराहट के लक्षण लीए बोल पड़ी...

संध्या --" क...क्या मतलब? क...कहां भाग ग...गया था? क...कब?"

अमन --"कल रात की पीटाई के बाद, जब आप गुस्से में अपने कमरे में चली गयी। वैसे ही वो घर से भाग गया था। मैने रात को दो-तीन बार उठ कर उसके कमरे में भी देखा था पर वो नही था।"

संध्या झट से चेयर पर से उठ खड़ी हुई, और हवेली के अंदर भागी।

संध्या -- "अभय...अभय...अभय!!"

पागलो की तरह संध्या चीखती-चील्लाती अभय के कमरे की तरफ बढ़ी। संध्या की चील्लाहट सुनकर, मालती,ललीता,नीधि और हवेली के नौकर-चाकर भी वहां पहुंच गये। सबने देखा की संध्या पगला सी गयी है। सब हैरान थे, की आखिर क्या हुआ? ललिता ने संध्या को संभालते हुए पूछा...

ललिता --"क...क्या हुआ दीदी?"

संध्या --"अ...अभय...अभय कहां हैं?"

ये सुनकर मालती बोली...

मालती --"वही तो मैं भी पुछने आयी थी तुमसे। क्यूंकी अभय मुझे सुबह से नही दीख रहा है।"

अब संध्या की हालत को लकवा मार गया था। थूक गले के अंदर ही नही जा रहा था। आँखें हैरत से फैली, चेहरे पर बीना कीसी भाव के बेजान नीर्जीव वस्तु की तरह वो धड़ाम से नीचे फर्श पर बैठ गयी। संध्या की हालत पर सब के रंग उड़ गये। ललिता और मालती संध्या को संभालने लगी।

ललिता --"दिदी घबराओ मत, इधर ही कहीं होगा आ जायेगा।"

पर मानो संध्या एक जींदा लाश थी, और उसी स्वर में बीना कीसी भाव के बोली...

संध्या --"चला गया वो, अब नही आयेगा.......!"

----------------*---

इधर ट्रेन एक स्टेशन पर आकर कर रुकती है। वो लड़का स्टेशन पर अपने कदम रखते हुए ट्रेन से नीचे उतर जाता है। स्टेशन पर भारी भीड़ थी, लड़का चकमका जाता है। उसे समझ नही आ रहा था, की कीधर जाये। तभी उसे स्टेशन पर ही एक दुकान दीखी और दुकान के अंदर पानी की बॉटल।

वो उसी दुकान की तरफ बढ़ा, और नज़दीक पहुंच कर दुकानदार से बोला-

"भैया थोड़ा पानी मीलेगा? बहुत प्यास लगी है?"

दुकान दार ने उपर से नीचे उस लड़के को गौर से देखा और बोला...

"चल भाग यहां से, भीखारी कहीं का!"

ये सुनकर उस लड़के को गुस्सा आ गया।

"भीखारी होगा तेरा बाप साले, नही देना है तो मत दे, भीखारी कीसे बोल रहा है?"

"ओ...हो, तेवर तो देखो इसके। भीखारी नही तो क्या राजा लग रहा है क्या? खुद की हालत देख पहले।"

दुकानदार की आवाज़ सुनकर लड़का अपने आप को देखने लगा। तो पाया की उसके कपड़े पूरी तरह से गंदे हो गये थे। लड़का मन मान कर वहां से चलते बना और स्टेशन से बाहर नीकलते हुए एक मार्केट में पहुंचा। लड़का ठीक से चल नही पा रहा था। और बार-बार अपना हांथ अपने पेट पर रख लेता। शायद भूंखा था और थका भी।

वो हीम्मत बांधे यूं ही कुछ दूर तक चलता रहा और फीर एक दुकान के सामने आकर उसके पैर रुक गये। नज़र उठाकर दुकान की तरफ देखा और दरवाज़े के उपर लगे बोर्ड को पढ़ने लगा...

"ताराचन्द ज्वेलर्स"

ये पढ़कर उसे कुछ समझ आया की नही आया वो नही पता। पर दुकान के अंदर बैठे एक ३५ साल के सक्श को देखकर समझ गया की ये सोनार है। लड़का अपने कदम दुकान के अंदर की तरफ बढ़ा दीया...

"अरे छोरे...कहां घूसा चला आ रहा है? चल बाहर चल।"

दुकान के अंदर बैठा सख्श दुत्कारने जैसी आवाज़ में बोला...

लड़के ने अपना हांथ उठाते हुए गले तक ले कर गया, और शर्ट के अंदर हांथ डालते हुए गले में पहनी मोटी सोने की चैन को बाहर नीकालता है। चमचमाती सोने की चमक जौहरी सेठ की आँखें चौंधीयां दी। लड़का सेठ को देखते हुए सोने की चैन को हवा में उछालते हुए उसे कैच कर के बोला...

"ठीक है सेठ जाता हूँ, ये बता की इधर और कोई दूसरी दुकान है क्या? मुझे ये चैन बेचनी है।"

ये सुनकर सेठ का माथा ठनका और मज़ाकीये अंदाज में बोला...

"अ...अरे भायो, मैं तो मज़ाक कर रहा था। इसे अपनी ही दुकान समझ आ जा बैठ।"

लड़का ये सुन कर मुस्कुराते हुए बोला...

"अब आया ना औकात पे।
 
अपडेट २

ताराचंद जौहरी था, उसे खरे सोने की पहचान अच्छी तरह थी। इसलिए, वो उस सोने की चैन को देख कर उसकी आँखें चौंधिया गयी।

"अरे बेटा, मैं तो मज़ाक कर रहा था। बैठ जा, आजा...आजा बैठ।"

वो लड़का मुस्कुराते हुए, नीचे फर्श पर बीछे सफदे रंग के साफ गद्दे पर बैठ जाता है।

ताराचंद --"तुम्हारा नाम क्या है बेटा?"

"मेरा नाम? अभी तक कुछ सोचा नही है। चलो तुम ही कोई अच्छा सा नाम बता दो?"

उस लड़के की करारी बाते सुनकर ताराचंद अचंभीत होते हुए बोला...

ताराचंद --"अरे बेटा...क्यूँ मज़ाक करते हो? तूम्हारे माँ-बाप ने, तुम्हारा नाम कुछ ना कुछ तो रखा ही होगा?"

ताराचंद की बात सुनकर वो लड़का एक बार फीर मुस्कुराते हुए बोला...

"हां याद आया, मेरा नाम अभीनव है। पर तुम मुझे प्यार से अभि बुला सकते हो। अच्छा अब मेरे नाम करण के बारे में छोड़ो, और ये बताओ की इस चैन का कीतना मीलेगा?"

कहते हुए वो लड़का जीसने अपना नाम सेठ को अभीनव बताया था, चैन को सेठ की तरफ बढ़ा दीया। सेठ ने आगे हांथ बढ़ाते हुए सोने की चैन को अपने हांथ में लीया तो उसे काफी वज़न दार लगा।

सेठ ने तराजू नीकालते हुए सोने का वज़न कीया और फीर तराजू को नीचे रखते हुए चश्मे की आड़ से देखते हुए बोला।

सेठ --"वाह...बेटा! ये चैन तो वाकई वज़नदार है। कहीं से चूरा कर तो नही लाये?"

सेठ की बात पर अभि के चेहरे पर एक गहरी मुस्कान फैल गयी।

अभि --"कमाल करता है तू भी? सेठ होकर पुलिस वालों की भाषा बोल रहा है। ला मेरा चैन वापस कर।"

सेठ --"अरे...अरे बेटा! मज़ाक था। सच बोलूं तो...तीन २ लाख तक दे सकता हूँ। पर तुम इतने सारे पैसों का करोगे क्या...?"

अभि --"ऐ गोबर चंद, अपने काम से काम कर तू। लेकिन...बात तो तेरी ठीक है, की इतने सारे पैसों का करुगां क्या? एक बात बता सेठ? यहां रहने के लीए कोई कमरे का इंतज़ाम है क्या?"

अभि की बात सुनकर वो सेठ अपना चश्मा उतारते हुए उस अभि को असंमजस भरी नीगाहों से देखते हुए बोला...

सेठ --"जान पड़ता है की, तुम्हारे सांथ जरुर कुछ बुरा हुआ है। पर मैं आगे कुछ पूछूंगा नही। मन करे तो कभी बताना जरुर। रही बात रहने की जगह की, तो तुम मेरे घर में रह सकते हो। बड़ा घर है मेरा, पर रहने वाले सीर्फ दो, मैं और मेरी जोरु।"

सेठ की बात सुनकर, अभि कुछ सोंचते हुए बोला...

अभि --"वो तो ठीक है गोबर चंद। पर भाड़ा १ हज़ार से ज्यादा ना दे सकूं।"

अभि की बात बार सेठ हसं पड़ा, और हसंते हुए बोला...

सेठ --"अरे छोरे...मैनें तो भाड़े की बात छेंड़ी ही नही। तुम अभी बेसहारे हो, तो बस इसांनीयत के नाते मैं तुम्हारी मदद कर रहा था। मुझे भाड़ा नही चाहिए।"

अभि --"इसे मदद नही एहसान कहते है सेठ, और एहसान के तले दबा हुआ इंसान एक कर्ज़ के तले दबे हुए इसांन से ज्यादा कर्ज़दार होता है। कर्ज़ा तो उतार सकते है एहसान नही। तो मुझे एहसान की ज़िदंगी नही ऐशो-आराम की ज़िंदगी चाहिए। हज़ार रुपये नक्की है तो बोल सेठ? वरना कहीं और चलूं।"

सेठ के कान खड़े हो गये, शायद सोंच में पड़ गया था, की इतनी कम उम्र में ये लड़का ऐसी बाते कैसे बोल सकता है?

सेठ --"क्या बात है छोरे? क्या खुद्दारी है तेरे अंदर! एक दीन ज़रुर ज़माने में सीतारा बन कर चमकेगा।"

सेठ की बात पर अभि ने एक बार फीर अपने चेहरे पर मुस्कान की छवि लीए बोला...

अभि --"मुझे अंधेरे में चमकने वाला वो सीतारा नही बनना, जो सीर्फ आँखों को सूकून दे, सेठ। बल्कि मुझे तो दीन में चमकने वाला वो सूरज बनना है, जो चमके तो धरती पर उज़ाला कर दे, अगर भड़के तो मीट्टी को भी राख का ढेर कर दे।"

सेठ तो बस अपनी आँखे हैरतगेंज, आश्चर्यता से फैलाए अभि के शब्द भेदी बाड़ों की बोली को बस सुनता ही रह गया...

-------------**

गाँव के बीचो-बीच खड़ी ठाकुर परम सिंह की आलीशान हवेली में अफरा-तफरा मची थी। पुलिस की ज़िप आकर खड़ी थी। हवेली के बैठके(हॉल) में । संध्या सिंह जोर से चींखती चील्लाती हुई बोली...

संध्या --"मुझे मेरा बेटा चाहिए....! चाहे पूरी दुनीया भर में ही क्यूँ ना ढ़ूढ़ना पड़ जाये तुम लोग को? जीतना पैसा चाहिए ले जाओ....!! पर मेरे बच्चे को ढूंढ लाओ...मेरे बच्चे को ढूंढ लाओ...मेरे बच्च्च्च्चे...."।

कहते हुए संध्या जोर-जोर से रोने लगी। सुबह से दोपहर हो गयी थी, पर संध्या की चींखे रुकने का नाम ही नही ले रही थी। गाँव के लोग भी ये खबर सुनकर चौंके हुए थे। और चारो दिशाओं मे अभय के खोज़ खबर में लगे थे। ललिता और मालति को, संध्या को संभाल पाना मुश्किल हो रहा था। संध्या को रह-रह कर सदमे आ रहे थें। कभी वो इस कदर शांत हो जाती मानो जिंदा लाश हो, पर फीर अचानक इस तरह चींखते और चील्लाते हुए सामन को तोड़ने फोड़ने लगती मानो जैसे पागल सी हो गयी हो।

रह-रह कर सदमे आना, संध्या का पछतावा था? या अपने बेटे से बीछड़ने का गम? या फीर कुछ और? कुछ भी कह पाना इस समय कठीन था। अभय ने आखिर घर क्यूँ छोड़ा? अपनी माँ का आंचल क्यूँ छोड़ा? इस बात का जवाब सिर्फ अभय के पास था। जो इस आलीशान हवेली को लात मार के चला गया था, कीसी अनजान डगर पर, बीना कीसी मक्सद के और बीना कीसी मंज़ील के।

अक्सर हमारे घरो में, कहा जाता है की, घर में बड़ो का साया होना काफी ज़रुरी है। क्यूंकी उन्ही के नक्शे कदम से बच्चो को उनको उनकी ज़िंदगी का मक्सद और मंज़िल ढुंढने की राह मीलती है। मगर आज अभय अपनी मज़िल की तलाश में एक ऐसी राह पर नीकल पड़ा था, जो शायद उसके लिए अनजाना था, पर शुक्र है, की वो अकेला नही था कम से कम उसके सांथ उसकी परछांयी तो थी।

कहते हैं बड़ो की डाट-फटकार बच्चो की भलाई के लिए होता है। शायद हो भी सकता है, पर मेरे दोस्त जो प्यार कर सकता है। वो डाट-फटकार नही। प्यार से रिश्ते बनते है। डाट-फटकार से रिश्ते बीछड़ते है, जैसे आज एक बेटा अपनी माँ से और माँ एक बेटे से बीछड़े थे। रीश्तो में प्यार कलम में भरी वो स्याही है, जब तक रहेगी कीताब के पन्नो पर लीखेगी। स्याही खत्म तो पन्ने कोरे रह जायेगें। उसी तरह रीश्तो में प्यार खत्म, तो कीताब के पन्नो की तरह ज़िंदगी के पन्ने भी कोरे ही रह जाते हैं।

खैर, हवेली की दीवारों में अभी भी संध्या की चींखे गूंज रही थी की तभी, एक आदमी भागते हुए हवेली के अंदर आया और जोर से चील्लाया...

"ठ...ठाकुर साहब!!"

आवाज़ काभी भारी-भरकम थी, इसलिए हवेली में मौजूद सभी लोगों का ध्यान उस तरफ केंद्रीत कर ली थी। सबसे पहली नज़र उस इंसान पर ठाकुर रमन की पड़ी। रमन ने देखा वो आदमी काफी तेजी से हांफ रहा था, चेहरे पर घबराहट के लक्षणं और पसीने में तार-तार था।

रमन --"क्या हुआ रे दीनू? क्यूँ गला फाड़ रहा है?"

दीनू नाम का वो सख्श अपने गमझे से माथे के पसीनो को पोछते हुए घबराहट भरी लहज़े में बोला...

दीनू --"मालीक...वो, वो गाँव के बाहर वाले जंगल में। ए...एक ब...बच्चे की ल...लाश मीली है।"

रमन --"ल...लाश क...कैसी लाश?"

उस आदमी की आवाज़ ने, संध्या के अंदर शरीर के अंदरुनी हिस्सो में खून का प्रवाह ही रोक दीया था मानो। संध्या अपनी आँखे फाड़े उस आदमी को ही देख रही थी...

दीनू --"वो...वो मालिक, आप खुद ही देख लें। ब...बाहर ही है।"

दीनू का इतना कहना था की, रमन, ललिता, मालती सब लोग भागते हुए हवेली के बाहर की तरफ बढ़े। अगर कोई वही खड़ा था तो वो थी संध्या। अपनी हथेली को महलते हुए, ना जाने चेहरे पर कीस प्रकार के भाव अर्जीत कीये थी, शारिरीक रवैया भी अजीबो-गरीब थी उसकी। कीसी पागल की भाती शारीरीक प्रक्रीया कर रही थी। शायद वो उस बात से डर रही थी, जो इस समय उसके दीमाग में चल रहा था।

शायद संध्या को उस बात की मंजूरी भी मील गयी, जब उसने बाहर रोने-धोने की आवाज़ सुनी। संध्या बर्दाश्त ना कर सकी और अचेत अवस्था में फर्श पर धड़ाम से नीचे गीर पड़ती है....

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अपडेट 3

अभि ताराचंद सेठ के घर में खड़ा,एक तक ताराचंद को देखते हुए बोला...

अभि --"सेठ तेरा घर कुछ छोटा नही लग रहा है??

अभि की बात सुनकर ताराचंद खुद से ही मन ही मन बोला। वाह!! बात तो ऐसे कर रहा है, जैसे बहुत बड़ी हवेली में रह कर आया हो |'

सोचते हुए सेठ ने अभि से बोला...

सेठ --"हां घर तो छोटा है, मगर इस घर में रहने वाले भी तो दो ही लोग है|"

सेठ की बात सुनते हुए अभि पास में रखे चेयर पर बैठते हुए बोला...

अभि --"हम्म्म..... सही है सेठ, की तेरे कोई बच्चे नहीं है, चल अच्छा वो सब छोड़ तू गोबर I ये बता ययहां पास में स्कूल किधर है??"

सेठ --"स्कूल....!! है ना यही थोड़ी ही दूर पर है l लगता है पढ़ने लिखने का विचार बना रहे हो बेटे??"

सेठ की बात सुनकर, अभि कुछ देर तक सोचते हुए बोला...

अभि --"एक ज्ञान ही तो है जो इंसान का कभी साथ नही छोड़ता, उसे अंधकार से बचाता हैं और उजाले की तरफ ले कर जाता है l आज मेरे साथ कोई नही है, बिलकुल अकेला हूं l और इस अकेलेपन के सफर में कहां जाना है? क्या करना है? कुछ नही पता है, मेरे स्कूल के गुरु जी कहा करते थे, की जब भी कभी जिंदगी में ऐसा समय आए की तुम ये समझ ना पाओ की तुम्हे क्या करना है? कहा जाना है? जिंदगी का मक़सद क्या है? तो एक बात हमेशा याद रखना उस परिस्थिति में अपने कदम ज्ञान की दिशा की तरफ बढ़ा देना, तुम्हे तुम्हारे हर सवालों का ज़वाब मील जायेगा l गुरु जी की कही बात कभी मन से नही ली, पर आज मेरी परिस्थिति कुछ ऐसी ही है सेठ l कुछ समझ में नहीं आ रहा है की क्या करूं? इसी लिए मैं अपने गुरु जी के कहे हुए मार्ग पर चलूंगा, शायद मुझे मेरी मंजिल मील जाए l""

.... सेठ अभि की बात बहुत ही ध्यान पूर्वक सुन रहा था l शायद वो कुछ सोच भी रहा था, पर क्या...? वो पता नही l

उस दीन अभि सेठ की पत्नी से मिला तो सेठ ने अपनी पत्नी को बोला की, अब से ये लड़का इसी घर में रहेगा l सेठ की पत्नी भी मान गई, और रात का खाना सब मिलकर खाएं l फिर उसके बाद अभि अपने कमरे में चला गया l रात के 11 बज रहे थे, अभि की आंखों में नींद नही थी, वो खिड़की के पास एक चेयर पर बैठा खिड़की से बाहर की तरफ देखते हुए कुछ सोंच रहा था l रह रह कर उसके चेहरे पर कभी मुस्कान के लकीरें उमड़ पड़ती तो फिर अचानक ही वो लकीरें अदृश्य भी हो जाती l ना जाने अभी क्या सोच रहा था, पर उस गहरी सोंच के कुंए में डूबा, उसकी आंखों से छलक पड़े एक आंसू के कतरे ने उसके दिल में छुपे वो दर्द को बयां कर गई, जो शायद अभि अपनी जुबां से बयां ना कर पाता।

उसके सर से छीन हुआ छत, वो तो उसने हंसील कर लिया था, मगर मां का छिने हुए आंचल में, अब फिर शायद ही उसे पनाह मिल सके!!

यूं ही खिड़की से बाहर देखते और अपने गम में खाया अभि कब चेयर पर बैठे बैठ ही सो गया उसे ख़ुद ही ख़बर ना हुईं.....

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इधर हवेली मे जब संध्या की आंख खुलती है तो, वो अपने आप को, खुद के बिस्तर पर पाती हैं। आंखों के सामने मालती, ललिता, निधी और गांव की तीन से चार औरतें खड़ी थी।

"नही..... ऐसा नहीं हो सकता, वो मुझे अकेला छोड़ कर नही जा सकता। कहां है वो?? अभय... अभय...अभय...??"

पगलो की तरह चिल्लाते हुए संध्या अपने कमरे से बाहर निकल कर जल बिन मछ्ली के जैसे तड़पने लगती है। संध्या के पीछे पीछे मालती5, ललिता और निधी रोते हुए भागती है....

हवेली के बाहर अभी भी गांव वालों की भीड़ लगी थी, मगर जैसे ही संध्या की चीखने और चिल्लाने की आवाजें उन सब के कानों में गूंजती है, सब उठ कर खड़े हो जाते है।

संध्या जैसे ही जोर जोर से रोते - बिलखते हवेली से बाहर निकलती है, तब तक पीछे से मालती उसे पकड़ लेती है।

संध्या --"छोड़ मुझे....!! मैं कहती हूं छोड़ दे मालती, देख वो जा रहा है, मुझे उसे एक बार रोकने दे। नही तो वो चला जायेगा।

संध्या की मानसिक स्थिति हिल चुकी थी, और इसका अंदाजा उसके रवैए से ही लग रहा था, वो मालती से खुद को छुड़ाने का प्रयास करने लगी की तभी....

"वो जा चुका हैं... अब नही आयेगा, इस हवेली से ही नही, बल्कि इस संसार से भी दूर चला गया है।"

मालती भी जोर - जोर से चिल्लाते हुऐ बोली। और धड़ाम से ज़मीन पर घुटनों के बल बैठती हुईं रोने लगती है।।

मालती के शब्द संध्या के हलक से निकल रही चिंखो को घुटन में कैद कर देती है। संध्या के हलक से शब्द तो क्या थूंक भी अंदर नही गटक पा रही थी। संध्या किसी मूर्ति की तरह स्तब्ध बेजान एक निर्जीव वस्तु की तरह खड़ी, नीचे ज़मीन पर बैठी रो रही मालती को एक टक देखते रही। और उसके मुंह से इतने ही शब्द निकल पाएं...

"नही... इस तरह वो मुझे छोड़ कर नही जा सकता..."

और कहते हुए किसी आधुनिक यंत्र की तरह हवेली के अंदर की तरफ कदम बढ़ा दी।

गांव के सभी लोग संध्या की हालत पर तरस खाने के अलावा और कुछ नही कर पा रहेंथे।।

"तुझको का लगता है हरिया? का सच मे ऊ लाश छोटे ठाकुर की थी??"

हवेली से लौट रहे गांव के दो लोग रास्ते पर चलते हुए एक दूसरे से बात कर रहे थे। उस आदमी की बात सुनकर हरिया बोला...

ह्वरिया --" वैसे उस लड़के का चेहरा पूरी तरह से ख़राब हो गया था, कुछ कह पाना मुुश्किल है। लेकिन हवेली से छोटे ठाकुर का इस तरह से गायब हो जाना, इसी बात का संकेत हो सकता है कि जरूर ये लाश छोटे ठाकुर की है।"

हरिया की बात सुनकर साथ में चल रहा वो शख्स बोल पड़ा...

"मेरी लुगाई बता रही थी की, ठाकुराई छोटे मालिक से ज्यादा अपने भतीजे अमन को चाहती थी।"

हरिया --"ठीक कह रहा है तू मंगरू, मैं भी एक बार किसी काम से हवेली गया था तो देखा कि ठकुराइन छोटे मालिक को डंडे से पीट रही थीं, और वो ठाकुर रमन का बच्चा अमनवा वहीं खड़े हंस रहा था। सच बताऊं तो इस तरह से ठकुराइन पिटाई कर रहीं थी की मेरा दिल भर आया, मैं तो हैरान था की आखिर एक मां अपने बेटे को ऐसे कैसे जानवरों की तरह पीट सकती है??"

मंगरू --" चलो अच्छा ही हुआ, अब तो सारी संपत्ति का एक अकेला मालिक वो अमनवा ही बन गया। वैसे था बहुत ही प्यारा लड़का, ठाकुर हो कर भी गांव के सब लोगों को इज्जत देता था।"

आपस मे बात करते-करते वो दोनो अपने घर की तरफ चल पड़े।

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सुबह सुबह अभी ताराचंद की दुकान पर पहुंच गया, और उसके सामने उस सफेद गद्दे पर बठते हुऐ बोला...

अभि --"कैसे हो गोबरचंद??"

ताराचंद शायद हिसाब किताब मे व्यस्त था, इस लिए जैसे ही उसने अभि की आवाज़ सुनी, नजरें उठा कर अभी की तरफ़ देखते हुऐ बोला..

सेठ --"तुम क्यूं मुझे गोबर बुलाता हैं? काका बोल लिया कर, मुझे भी अच्छा लगेगा।"

सेठ की बात सुनकर अभी गुस्से में झल्लाते हुऐ बोला।

अभि --"देख गोबर, अपना काम कर, मेरे साथ रिश्ता -विस्ता जोड़ने की कोशिश भी मत करना। मुझे रिश्तों से नफ़रत है... समझा??

अभि का गुस्सा भरा अंदाज देखकर ताराचंद की हवाईया नीकल पड़ी, हिसाब की क़िताब एक तरफ़ रखते हुए मजाकिया अंदाज में बोला...

सेठ --" अरे... तुम तो गुस्सा हो गए, मैं तो सिर्फ मज़ककर रहा था बेटा। अच्छा ये बता खाना -पीना खाया की नही, और हां... आज तो तुम स्कूल में दाखिला लेने जाने वाले थे ना??"

अभि --"इसी लिए तो आया था तेरे पास गोबर चंद, मुझे कुछ रुपए चाहिए। अपने लिए कपड़े और कताबें खरीदनी है।"

सेठ तिजोर खोलते हुऐ उसमे से कुछ रूपए निकलते हुऐ अभी की तरफ़ बढ़ा देता है। अभी पैसा लेते हुए बोला...

अभी --"हिसाब अच्छे से करना, मेरे डेढ़ लाख रुपए में से ये 2 हज़रलिया है मैंने, लिख लेना।"

और ये कहते हुए अभी दुकान से बाहर नीकल जाता है.... ताराचंद की नज़रे अभी भी अभि को जाते हुए देख रही थी......

अभी ने उस दिन 6वी कक्षा में दाखिला लिया, और अपने लिए कपड़े, कताबे इत्यादि ख़रीद कर घर लौटा तो, ताराचंद की पत्नी हॉल में ही बैठी मिली। ताराचंद की पत्नी का नाम रेखा था, सांवले रंग की भरे बदन वाली एक कामुक औरत थी। अभी को देख कर वो सोफे पर से उठते हुए बोली...

रेखा --"अरे... अभिनव बेटा तू आ गया, हो गया स्कूल में दाखिला??"

अभि, रेखा की बात सुनकर बोला...

अभी --"हां हो गया, कल से स्कूल जाऊंगा।"

रेखा --"अरे वाह! ये तो बहुत अच्छी बात है। तू हाथ -मुंह धो ले मैं तेरे लिए खाना ले कर आती हूं...."

ये कहते हुए रेखा कीचन की तरफ़ चली जाती है....
 
अपडेट 4

__वो तो है अलबेला__


अभि कल से स्कूल जाने की तैयारी मे था। वो अपने कमरे में बैठा स्कूल की कताबों को देखते हुऐ कुछ सोचने लगा...

"मैं कह रही हूं ना, की तू स्कूल जा।"

"आज रहने ने दे ना मां, तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही हैं, बड़ी जोर से मेरा सर दुख रहा है, और आज अमन भी तो नहीं गया है स्कूल।"

"अमन की तो सच में तबियत ख़राब है, मैं देख कर आ रही हूं। वो तेरी तरह बदमाश और झूंठा नही है। चुप चाप से स्कूल जा, नही तो पिटाई करना शुरू करूं।"

"नहीं मां, तू मार मत, मैं जा रहा हूं स्कूल। तू मरती है तो मुझे अच्छा नहीं लगता,, एक बात पूंछू मां??"

"हां पूंछ, मगर ढंग की बात पूंछना।"

"तू मुझसे ज्यादा अमन को चाहती है ना?"

"मैं बोली थी ना तुझसे, ढंग का सवाल पूछना। मगर तेरे खोपड़ी में कोई बात घुसती नहीं है, अब इससे पहले की मेरी खोपड़ी घूमे, तू जा जल्दी स्कूल।"

..।l. अभि बेटा आकार खाना खा ले।"

ये आवाज सुनते ही, अभि अपने सपनो की दुनियां से वापस वर्तमान में आ जाता है। उसे रेखा ने आवास लगाई थी , खाना खाने के लिए ।

अभि अपने किताबों को स्कूल बैग में डालते हुए, अपने कमरे से बाहर निकल कर हाल के आ जाता है खाना खाने के लिए । अभि टेबल पर बैठा चुप चाप खाना खा रहा था और रेखा , उसे प्यार से खाना परोस रही था । अभि ने एक नजर रेखा की तरफ देखा और चुप चाप खाना खाने लगा ।

रेखा --"आज मैने तेरे लिए आलू के पराठे बनाए है, कैसे हैं। बता ना?"

अभि पराठा खाते हुऐ बोला....

अभि --" हम्मम.....वाकई काफी बढ़िया बना हैं। मेरी मां भी मेरे लिए पराठा बनाया करती थी, मुझे उनके हाथों का पराठा बहुत पसंद था, पर फिर धीरे-धीरे उन हाथों से पराठा बननबने हों गया, जो हाथ मुझे नवाला खिलाने के लिए उठते थे , वही हाथ मेरे धीरे -धीरे मुझ पर उठने लगे।"

रेखा वहीं खड़ी अभि की बात सुन रही थी, वो कुछ समझ नहीं पा रही थी । इसलिये वो आश्चर्य भारी आवाज में बोल पड़ी...

रेखा --" तू क्या कह रहा है मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है अभि।"

ये सुन कर अभी अपने चेहरे पर एक झूठी मुस्कान लेट हुए बोलो....

अभि --"कुछ बातें ना समझ में आए , वही बेहतर होता है आंटी। नहीं तो दिल में किसी कांटे की तरह ऐसे चुभता है की , उसकी चुभन जिंदगी भर असर करती रहती है।"

अभी की बातें रेखा के लिए समझ पाना बहुत मुश्किल था। तभी उसने देखा की अभि का चेहरा काफी उदासी में मुरझा सा गया है। वो अभी से इन सब सवालों का जवाब जानने की कोशिश पहले दिन ही की था, मगर अभी भड़क गया था। इसी लिए वो अभी को और परेशान नहीं करना चाहती थी। मगर वो अभी का उदास चेहरा देख कर साफ तौर पर समझ चुकी थी की सरूर अभी किसी बात से दुखी है। इसलिए रेखा ने बात को घुमाते हुए बोली...

रेखा --"अरे तू भी ना, ना जाने कौन सी बातें ले कर बैठ गया है, छोड़ती वो सब और चुप बाप खाना खा। मैं पूछूंगी तो नही, क्यूंकि मुझे पता है तू बताएगा नही, तो फिर उन बाटोंपा मिट्टी डाल दे बेटा, जो हो गया से हो गया , अब उन बातो को याद कर के तकलीफ क्यूं सहनी??"

अभि ने रेखा की बात तो सुनी जरूर मगर कुछ बोला नहीं, और चुप छापने अपना पराठा खाने लगा....

क्या बता बेचारा, वो बातें, या वो यादें, जो हर पल याद आते ही अभि के दिल को अंदर ही अंदर रुला देती थी। क्या कहे वो किसी से? वो तो खुद अपने आप से कुछ नहीं कह पा रहा था। हर पल, है घड़ी बस यही अपने आप से कहेता रहता था की, जरूर ये कोई सपना है। पर अब तो उसे भी लगने लगा था की , शायद सपने भी अपनी मां से इतना प्यार करते है की , वो किसी को ऐसा सपना नही दिखते, जिन सपनो में मां बुरी हो। अभि की आंखे नाम थी, उसकी आंखों के समंदर में हजारों सवाल उस किनारे पर बैठे, लहरों से जवाब मांगने के इंतजार में थे , जिस किनारे पर वो लहरें कभी आती ही नहीं....

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"ये क्या बात हुई मुखिया जी, किं ठाकुराइन ने हमे हमारा खेत देने से इंकार कर रही है। हम खाएंगे क्या? एक हमारा खेत ही तो था। जिसके सहारे हम सब गांव वाले अपना पेट पालते है। अब्बागर ठाकुराइन ने वो भी ले लिया तो , हम क्या करेंगे ?"

गांव में बैठी पंचायत के बीच एक 45 सालबका आदमी खड़ा होकर बोल रहा था। पंचायत में भीड़ काफी ज्यादा थी। सब लोग की नज़रे मुखिया जी पर ही अटकी था।

"और ये मुखिया क्या बोलेगा? मुखिया थोड़ी ना तुम लोग को कर्ज दिया है, चना खिला के!! अरे कर्ज तो तुम लोग ने ठाकुरानी से लिया था। तो फैसला भी ठाकुराणी ही करेंगी ना। चना खिला के!!

और ठाकुराइन ने फैसला कर लिया है। की अब वो जमीन उनकी हुई, जिनपर वो एक कॉलेज बनवाना चाहती है....समझे तुम लोग....चना खिलाने ।"

"पर मुनीम जी, ठाकुराइन ने तो हम्बाब गांव वालोंसे ऐसा कुछ नही कहा था"

"तुम लोगो को ये सब बात बताना जरूरी नहीं, समझे!!"

इस अनजान आवाज़ ने गांव वालोंका ध्यान केंद्रित किया, और जैसे ही अपनी अपनी नज़रे घुमा कर देखें, तो पाया की ठाकुर रमन सिंह खड़ा था। ठाकुर को देखते ही सब गांव वाले अपने अपने हाथ जोड़ते हुए गिड़गिड़ाने लगे...

"ऐसा जानकारी मालिक, भूखे मार जायेंगे। हमारे बच्चे का क्या होगा? क्या खिलाएंगे हम उन्हे? जरा सोचिए मालिक।??"

"तू चिंता बनकर सोहन,, हम्बकिसी के साथ अन्याय नहीं होने देंगे। हमने तुम सब के बारे में पहले से ही सोच रखा था।"

ठाकुर के में से ये शब्द सुनकर, गांवनवालोंके चहरेवपर एक आशा की किरण उभरने लगीं थी की तभी ....

" आज से तुम सब लोग, हमारे खेतो, बाग बगीचे और स्कूलों काम करोगे। मैं तुमसे वादा करता हूं,की दो वक्त की रोटी हर दिन तुम सब के थाली में पड़ोसी हुई मिलेगी।"

गांव वालो ये सुन कर सन्न्न रह गए, उन्हे लगा था की , ठाकुर रत्न सिंह उन्हे इनकी जमीन लौटने आया है, मगर ये तो कुछ और ही था। ठाकुर की बात सुनकर विहान गुस्से में तिलबिला पड़ा l और अपने सर बंधी पगड़ी को अपने गांठने खोलकर एक झटके में नीचे फेंकते हुए बोला....

सोहन --"शाबाश! ठाकुर, दो वक्त के रोटी बदले हमसे गुलामिंकरवान चाहते हो, मगर याद रखना ठाकुर, सोहन ना आज तक कभी किसी की गुलामी की हैं.... ना आगे करेगा।"

सोहन की बात सुनकर, ठाकुर रत्न सिंह हंसते हुए बोला....

"और भाई, मैं तो बस गांव की भलाई के बारे में सोच रहा था, भला हम्बक्यू गुलाम पालने लगे? जैसी तुंबलोगी की मर्जी, अगर तुम लोग को अपनी जमीन चाहिए, तो लाओ ब्याज सहित मुद्दल पैसा, और छुड़वा lo apni zameen।

"पर हां, सिर्फ तीन महीने, सिर्फ तीन महीने के समय देता हूं...उसके बाद जमीन हमारी। चलता हूं मुखिया जी...राम राम"

ये बोलकर ठाकुर रमन, अपनी गाड़ी में बैठकर वहां से चला जाता हैं....गांव वाले अभि भी अपना हाथ जोड़े खड़े थे, फर्क सिर्फ इतना था की, अब उन सब की आंखे भी बेबसी और लाचारी के वजह से नाम थी.....
 
अपडेट.....५

गांव के लोग काफ़ी दुखी थे, उन्हे ये अंदाजा भी ना था की ठाकुराइन ऐसा भी कर सकती है!!

इधर हवेली में , संध्या अपने कमरे में गुम सूम si बैठी थीं, सरीर में जान तो थी, पर देखबकर ऐसा लग रहा था मानो कोई निर्जीव सी वस्तु है, आपने बेटे के गम में सदमा खाई हुई संध्या, बेड पर बैठी हुई अपने हाथों में अपने बेटे की तस्वीर लिए उसे एकटक निहार जा रही थी।

संध्या की आंखों से लगातार आंसू छलकते जा रहे थे, वो इस तरह से अपने बेटे की तस्वीर देख रही थीं मानो उसका बेटा उसके सामने ही बैठा हो। संध्या अभय की तस्वीर देखते - देखते अचानक ही अभय के तस्वीर को अपने सीने से लगाकर जोर जोर से रोने लगती है। संध्या की रोने की आवाज उसके कमरे से बाहर तक जा रही थी । जिसे सुनकर मालती, ललिता भागते हुए उसके कमरे में आ गईं। और बेड पर बैठते हुऐ, संध्या को सम्हालने लगती हैं।

हालत तो मालती और ललिता की भी ठीक नहीं थी, अभय के जाने के बाद सब को ये हवेली सुनी सुनी सी लग रही थी,

मालती ने संध्या के आंसुओ को पोछते हुऐ, समझते हुए बोली....

मालती --"मैं आपकी हालत समझ सकती हूं दीदी, मगर अब जो चला गया वो भला लौट कर कैसे आएगा? ज़िद छोड़ दो दीदी, और चलो कुछ खा लो।

मालती की बात का संध्या पर कुछ असर न हुआ, वो तो बस अभय का तस्वीर सीने से लगाए बस रोए जा रही थीं। मालती से भी बर्दाश्त नहीं हुआ और उसकी आंखो से भी पानी छलक पड़ते हैं। लेकिन फिर भी मालती और ललिता ने संध्या को बहुत समझने की कोशिश की, पर संध्या तो सिर्फ़ सुन रही थीं, और जवाब में उसके पास सिर्फ़ आंसू थे और कुछ नहीं।।

तभी एक हांथ संध्या के कंधे पर पड़ा और साथ ही साथ एक आवाज भी....

"चुप हो जाओ बड़ी मां, तुम ऐसे मत रोया करो, मुझे अच्छा नहीं लगता, क्या मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूं, क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करती??"

आवाज कानों में जाते ही, संध्या अपने भीगी पलकें उठाती हैं, तो पाई सामने अमन खड़ा था जो इस वक्त उसके कंधो पर हांथ रखे उसे दिलासा दे रहा था। अमन को देखते ही संध्या, जोर जोर से रोते हुऐ उसे अपनी बाहों में भर लेती हैं....

संध्या --"अब तो बस तू ही सहारा हैं, वो तो मुझसे नाराज़ हो कर ना जाने कहां चला गया हैं!!?"

अमन --"तो फ़िर चुप हो जाओ, और चलो खान खा लो, नहीं तो मैं भी नहीं खाऊंगा, तुम्हे पता हैं मैं भी कल से भूंखा हूं।"

अमन की बात सुनकर , संध्या एक बार फिर अमन को अपने सीने से लगा लेती हैं। उसके बाद ललिता दो थाली मे खाना लेकर आती हैं, संध्या से एक भी निवाला अंदर नहीं जा रहा था , पर अमन का चेहरा देखते हुऐ वो खाना खाने लगती हैं....

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अभि स्कूल क्लास में बैठा था, 6 ट्वी कक्षा में दाखिला ले कर वो बहुत खुश था, वो अपनी पुरानी जिंदगी को पीछे छोड़कर वर्तमान में जीना चाहता था, वो उन हर रिश्तों को भूल जाना चाहता था, जिन रिश्तों मे अब उसका अपनापन रहा ही नही।

अभि अब हर दिन निरंतर स्कूल आने जाने लगा था, धीरे -- धीरे वो रेखा से भी घुल मिल गया था। मगर वो गांव की उस हवेली को नहीं भूला पा रहा था, जिसे भागते वक्त उसने देखा था। अभि पढ़ने लिखने में वाकई काफी तेज़ तर्रार था,। अभि काफी होशियार भी था, सोने की चैन बेचकर जो पैसा उसे मिला था, काफी सोच समझ कर खर्चा करता था। अभि को पता था की एक दीन ये पैसे भी खत्म हो जाएंगे, फिर उसके लिए काफी मुश्किलात होने लगेंगी। पर अभी इन सब के बारे में अभी नहीं सोचना चाहता था।

इधर हवेली में भी संध्या अमन का मुंह देख कर जीने लगी थीं, पर हर रात अभय की यादों में आंसू जरूर बहाती थी, ये शायद उसका रूटीन बन गया था। रमन सिंह ने गांव वालो की ज़मीन हड़प, अपनी भाभी संध्या की स्वीकृति लेकर एक डिग्री कॉलेज की स्थापना करना चाहता था। पर वो अभी इस बारे में संध्या से बात नहीं करना चाहता था।

गांव वालों की हर रोज़ मीटिंग होती थीं, इस बारे में की ठाकुराइन से जाकर इस बारे में पूछे की उसने ऐसा क्यूं किया? क्यूं उनकी ज़मीन हड़प ली उसने? पर गांव वाले भी ये समय सही नहीं समझा।

दीन बीतता गया, संध्या भी अब नॉर्मल होने लगी थीं, वो अमन को हद से ज्यादा प्यार करने लगी थीं। हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी ख्वाहिश अमन की यूं ही पूरी हो जाती। और वही अभय अपनी जिंदगी को ख्वाहिशों के हिसाब से नहीं जरूरत के हिसाब से जीना पड़ रहा था।

देखते ही देखते महीने सालों में व्यतीत होने लगे,, और जल्द ही अभि 10 वी कक्षा में आ गया था। अभि इन चार सालों में अपने आप को सही मार्गदर्शन दिया, मगर अब उसके सामने एक मुसीबत आन पड़ी थीं, उसके पैसे खत्म होने को आए थे। और ये बात रेखा और सेठ को भी पता था।

एक दिन सब लोग सुबह सुबह नाश्ता कर रहे थे, उस दिन संडे था तो अभि को स्कूल नहीं जाना था। वो चुप चाप डाइनिंग टेबल पर बैठा नाश्ता कर रहा था, और पैसों के बारे में सोच रहा था। ये देखकर सेठ ने कहा।।

सेठ --"अभि बेटा, क्या सोच रहे हो?

सेठ की बात सुनकर, अभि अपनी गहरी सोच से बाहर निकलते हुऐ बोला।

अभि --"कुछ नहीं सेठ जी, बस सोच रहा हूं की, अब आगे की पढ़ाई का खर्चा कैसे संभालूंगा? पैसे भी खत्म होने को आए हैं।"

अभि की बात पर, नाश्ता परोस रही रेखा बोल पड़ी...

रेखा --" इन चार सालों में हम तो तुझे अपना समझने लगें हैं, तेरे आने से मेरी जिंदगी भी औलाद ना होने होने का गम भी दूर हो गया। पर शायद तू ही हम लोग को अपना नहीं समझता। कितनी बार हम लोगों ने तुझे पैसे देने की कोशिश की पर तू अपनी ज़िद मे पैसे लेने से मना करता गया।"

रेखा की बात गौर से सुनते हुऐ अभी बोला...।

अभि --"ऐसी बात नहीं हैं आंटी, पैसे न लेने की वजह मेरी ज़िद नहीं हैं, ये तो वो सच हैं जिसे मैं मान चुका हूं की जिंदगी में जो करना हैं खुद के दम पर करो। और वैसे भी आप दोनो ने मेरा इतना खयाल रखा हैं इन चार सालों में, जो शायद मुझे ना मिलता तो यूं हीं आज कहीं अकेला रह जाता। पर देखो ना यहां मुझे अकेलापन महसूस ही नहीं होता।"

रेखा --"बातों में तूझसे भला कौन जीत सकता हैं? ठीक हैं तुझे पैसे नहीं लेने हैं तो मत ले, पर इस तरह से जब तू परेशान होकर सोच में डूब जाता हैं ना, तो वो मुझसे नहीं देखा जाता हैं।"

अपनी औरत की बात सुनकर पास में बैठा नाश्ता करते हुऐ सेठ ने बोला।

सेठ --"अरे रेखा तू भी ना बेवजह ही परेशान होने लगती हैं। ये तो अच्छी बात हैं, जो अपनी परेशानी की हल ढूढने के लिऐ सोचता हैं वही हर मुसीबत से लड़ सकता हैं। और अभि की तो यही खासियत हैं, जिस उम्र में बच्चो की सोच पर दायरे लगे होते हैं, उस उम्र में अभी ने वो दायरे को पार कर लिया हैं। फिर भी अभि मेरे पास एक तरकीब हैं, जिससे तेरी परेशानी टल सकती हैं, पर थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।"

सेठ की बात सुनकर अभि बिना देरी करते हुऐ बोला....

अभि --"बोलो ना सेठ, मेहनत की तुम मुझ पर छोड़ दो और तरकीब बताओ।"

सेठ --"बाजार में ही मेरे दोस्त कि, साइबर कैफे हैं। वो मुझसे बोल रहा था कि कोई लड़का हो तो बताना कुछ 4 से 5 घंटे के लिऐ हर दीन साइबर पर बैठने के लिऐ। बोल रहा था की 7 हज़ार महीने तक देगा।"

ये सुनकर अभि की परेशानी छू मंतर हों गई, और झट से बोल पड़ा।

अभि --" हां तो ठीक हैं ना, 4 बजे स्कूल से छूटने के बाद मैं साइबर हर रोज चला जाऊंगा, और 8 बजे तक काम करूंगा वहा पर। सेठ जी तुम उनसे बोल दो की, लड़का मिल गया हैं, और बात कर के मुझे जल्दी बताना।"

सेठ --" अरे बात क्या करनी? तू आज शाम को दुकान पर आ जाना, सीधा उसके पास ही चलेंगे।"

अभि --" ये सही रहेगा सेठ जी।"

और फिर जल्द ही दोनो नाश्ता कर चुके थे, सेठ तो दुकान के लिऐ निकल गया, रेखा घर के कामों में लग गई... और अभि घूमने के लिऐ बाहर निकल गया।

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इधर हवेली में भी सब नाश्ते की टेबल पर बैठे थे, अमन के सामने पड़ी प्लेट मे देसी घी के पराठे पड़े थे। जिसे वो बहुत चाम से खा रहा था। और मालती अमन को ही गौर से देख रही थीं, की संध्या कितने प्यार से अमन को अपने हाथों से खिला रही थीं।

अमन --"बस करो ना बड़ी मां, अब नहीं खाया जाता, मेरा पेट भर गया हैं।"

कहते हुऐ अमन, अपने भर चुके पेट को सहलाए जा रहा था।

संध्या --"बस बेटा, ये आखिरी पराठा, हैं। खा ले।"

अमन ने किसी तरह वो पराठा खाया, मालती अभि भी उन दोनो को ही देख रही थीं कि तभी उसे पुरानी बात याद आई। जब एक दिन इसी तरह से सब नाश्ता कर रहे थे, अभय भी नाश्ता करते हुऐ गपागप ४ पराठे खा चुका था और पांचवा पराठा खाने के लिऐ मांग रहा था , तब संध्या पराठा देते हुऐ बोली थी की, कितना खायेगा इंसान हैं या हैवान जो पेट नहीं भर रहा हैं तेरा।

वो दृश्य और आज के दृश्य से मालती किस बात का अनुमान लगा रही थीं ये तो नहीं पता, पर तभी संध्या की नज़रे भी मालती पर पड़ती हैं तो पाती हैं की, मालती उसे और अमन को ही देख रही थीं।

मालती को इस तरह दिखते हुऐ संध्या बोल पड़ी...

संध्या --"तू ऐसे क्या देख रही हैं मालती? नज़र लगाएगी क्या मेरे बेटे को?"

संध्या की बात मालती के दिल मे चुभ सी गई,और फिर अचानक ही बोल पड़ी।

मालती --"नहीं दीदी बस पुरानी बातें याद आ गई थीं, अभय की।"

और कहते हुऐ मालती अपने कमरे में चली जाती है। संध्या मालती को जाते हुऐ वही खड़ी देखती रहती है......
 
अपडेट --- ६

_वो__तो__है__अल_बेला_

मालती के जाते ही, संध्या भी अपने कमरे में चली गई। संध्या गुम सूम सी अपने बेड पर बैठी थीं, उसे अजीब सी बेचैनी हो रही थीं। वो मालती की कही हुई बात पर गौर करने लगी। वो उस दीन को याद करने लगी जब उसने अभय की जम कर पिटाई कर रही थीं। उस दीन हवेली के नौकर भी अभय की पिटाई देख कर सहम गए थे। बात कुछ यूं थीं की, रमन हवेली में लहू लुहान हो कर अपना सर पकड़े पहुंचा। संध्या उस समय हवेली के हॉल में ही बैठी थीं। संध्या ने जब देखा की रमन के सर से खून बह रहा है, और रमन अपने सर को हाथों से पकड़ा है, तो संध्या घबरा गई। और सोफे पर से उठते हुऐ बोली...

संध्या --" ये...ये क्या हुआ तुम्हे? सर पर चोट कैसे लग गई?

बोलते हुऐ संध्या ने नौकर को आवाज लगाई और डॉक्टर को बुलाने के लिऐ बोली....

संध्या की बात सुनकर रमन कुछ नहीं बोला, बस अपने खून से सने हांथ को सर पर रखे कराह रहा था। रमन को यूं ख़ामोश दर्द में करहता देख, संध्या गुस्से में बोली....

संध्या --"मैं कुछ पूंछ रही हूं तुमसे? कैसे हुआ ये?

"अरे ये क्या बताएंगे बड़ी ठाकुराइन, मैं बताता हूं..."

इस अनजानी आवाज़ ने सांध्य का ध्यान खींचा, तो पाई सामने मुनीम खड़ा था। मुनीम को देख कर रमन गुस्से में चिल्लाया....

रमन --"मुनीम जी, आप जाओ यहां से, कुछ नहीं हुआ है भाभी। ये बस मेरी गलती की वजह से ही अनजाने में लग गया।"

"नहीं बड़ी ठाकुराइन, झूंठ बोल रहे है छोटे मालिक। ये तो आपके...."

रमन --"मुनीम जी... मैने कहा ना आप जाओ।

रमन ने मुनीम की बात बीच में ही काटते हुऐ बोला। मगर इस बार सांध्या ने जोर देते हुऐ कहा....

संध्या --"मुनीम जी, बात क्या है... साफ - साफ बताओ मुझे?"

संध्या की बात सुनकर, मुनीम बिना देरी के बोल पड़ा....

मुनीम --"वो... बड़ी ठाकुराइन, छोटे मालिक का सर अभय बाबा ने पत्थर मार कर फोड़ दीया।"

ये सुनकर संध्या गुस्से में लाल हो गई.…

संध्या --"अभय ने!! पर वो ऐसा क्यूं करेगा?"

मुनीम --"अब क्या बताऊं बड़ी ठाकुराइन, छोटे मालिक और मै बाग की तरफ़ जा रहे थे, तो देखा अभय बाबा गांव के नीच जाति के बच्चों के साथ खेल-कूद कर रहे थे। पता नहीं कौन थे चमार थे, केवट था या पता नहीं कौन से जाति के थे वो बच्चे। यही देख कर छोटे मालिक ने अभय को डाट दिया, ये कहते हुऐ की अपनी बराबरी के जाति वालों के बच्चों के साथ खेलो, हवेली का नाम मत खराब करो। ये सुन कर अभय बाबा, छोटे मालिक से जुबान लड़ाते हुए बोले,, ये सब मेरे दोस्त है, और दोस्ती जात पात नहीं देखती, अगर इनसे दोस्ती करके इनके साथ खेलने में हवेली का नाम खराब होता है तो हो जाए, मुझे कुछ फरक नहीं पड़ता।"

संध्या --"फिर क्या हुआ?"

मुनीम --"फिर क्या बड़ी मालकिन, छोटे मालिक ने अभय बाबा से कहा की, अगर भाभी को पता चला तो तेरी खैर नहीं, तो इस पर अभय बाबा ने कहा, अरे वो तो बकलोल है, दिमाग नाम का चीज़ तो है ही नहीं मेरी मां में, वो क्या बोलेगी, ज्यादा से ज्यादा दो चार थप्पड़ मरेगी और क्या, पर तेरा सर तो मै अभी फोडूंगा। और कहते हुऐ अभय बाबा ने जमीन पर पड़ा पत्थर उठा कर छोटे मालिक को दे मारा, और वहां से भाग गए।"

मुनीम की बात सुनकर तो मानो सांध्य का पारा चरम पर था, गुस्से मे आपने दांत की किटकिती बजाते हुऐ बोली...

सांध्य --"बच्चा समझ कर, मैं उसे हर बार नज़र अंदाज़ करते गई। पर अब तो उसके अंदर बड़े छोटे की कद्र भी खत्म होती जा रही है। आज रमन का सर फोड़ा है, और मेरे बारे में भी बुरा भला बोलने लगा है, हद से ज्यादा ही बिगड़ता जा रहा है, आने दो उसे आज बताती हूं की, मैं कितनी बड़ी बकलोल हूं..."

.... भाभी, भाभी... कहां हो तुम, अंदर हों क्या?

इस आवाज़ ने, सांध्य को भूत काल की यादों से वर्तमान की धरती पर ला पटका, अपनी नम हो चुकी आंखो के कोने से छलक पड़े आंसू के कतरों को अपनी गोरी हथेली से पोछते हुऐ, सुर्ख पड़ चुकी आवाज़ में बोली...

सांध्य --"हां, अंदर ही हूं।"

बोलते हुऐ वो दरवाज़े की तरफ़ देखने लगी... कमरे में रमन दाखिल हुआ, और संध्या के करीब आते हुऐ बेड पर उसके बगल में बैठते हुऐ बोला।

रमन --"भाभी, मैने सोचा है की, गांव में पिता जी के नाम से एक डिग्री कॉलेज बनवा जाए, अब देखो ना यहां से शहर काफी दूर है, आस - पास के कई गांव के विद्यार्थी को दूर शहरों में जाकर पढ़ाई करनी पड़ती है। अगर हमने अपना डिग्री कॉलेज बनवा कर मान्यता हंसील कर ली, तो विद्यार्थियों को पढ़ाई में आसानी हो जाएंगी।"

रमन की बात सुनते हुऐ, सांध्य बोली.....

संध्या --"ये तो बहुत अच्छी बात है, तुम्हारे बड़े भैया की भी यही ख्वाहिश थीं, वो अभय के नाम पर डिग्री कॉलेज बनाना चाहते थे, पर अब तो अभय यहां रहा ही नहीं, बनवा दो अभय के नाम से ही... वो नहीं तो उसका नाम तो रहेगा।"

रमन --"ओ... हो भाभी, तो पहले ही बताना चाहिए था, मैने तो मान्यता लेने वाले फॉर्म पर पिता जी के नाम से भर कर अप्लाई कर दिया। ठीक हैं मैं मुनीम से कह कर चेंज करवाने की कोशिश करूंगा।"

रमन की बात सुनकर संध्या ने कहा...

संध्या --"नहीं ठीक है, रहने दो। पिता जी का नाम भी ठीक है।"

रमन --"ठीक है भाभी, जैसा तुम कहो।"

और ये कह कर रमन जाने लगा तभी... सन्ध्या ने रमन को रोकते हुऐ....

संध्या --"अ... रमन।"

रमन रुकते हुऐ, संध्या की तरफ़ पलटते हुऐ...

रमन --"हां भाभी।"

संध्या --"एक बात पूंछू??"

संध्या की ठहरी और गहरी आवाज़ में ये बात सुनकर रमन एक पल के लिऐ सोच की उलझन में उलझते 5हुऐ, उलझे हुऐ स्वर मे बोला...

रमन --"क्या अभय को मेरे और तुम्हारे रिश्ते के बारे में पता था, या फिर कुछ शक था?"

ये सुन कर रमन को ताजुब और हैरानी दोनो एक साथ हुई, ताजुब इस बात की, की इतने सालों बाद इस बारे में क्यूं? और हैरानी इस बात की, की अमन को उनके रिश्ते के बारे में पता था या नहीं इस सवाल पर।

रमन --"मुझे नहीं लगता भाभी, जब घर वालो और गांव वालो को पता नहीं चला तो, वो तो 9 साल का बच्चा था भाभी, उसे भला कैसे पता चलेगा? पर आज इतने सालों बाद क्यूं?"

संध्या अपनी गहरी और करुण्डता भरे लहज़े में बोली...

संध्या --" ना जाने क्यूं, हमेशा एक बेचैनी सी होती रहती है, ऐसा लगता है की मेरा दिल भटक रहा है किसी के लिऐ, मुझे पता है की किस के लिऐ भटकता है, मैं खुद से ही अंदर अंदर लड़ती रहती हूं, रात भर रोती रहती हूं, सोचती हूं की वो कहीं से तो आ जाए, ताकी मैं उसे बता सकूं की मैं उससे कितना प्यार करती हूं, माना की मैने बहुत गलतियां की हैं, मैंने उसे जानवरों की तरह पीटा, पर ये सब सिर्फ़ गुस्से में आकर। मुझसे गलती हो गई, मैं ये ख़ुद को नहीं समझा पा रही हूं, उसे कैसे समझाती। मैं थक गई हूं, जिंदगी बेरंग सी लगने लगी हैं। हर पल उसे भुलाने की कोशिश करती हूं, पर फिर दिल कहता है की, उसे भुला दी तो जिंदगी में तेरे क्या बचेगा? हे भगवान क्या करूं? कहां जाऊं? कोई तो राह दिखा दे?"

कहते हुऐ सन्ध्या एक बार फिर रोने लगती है...!

"अब रो कर कुछ हासिल नहीं होगा दीदी,"

नज़र उठा कर देखी तो सामने मालती खड़ी थीं, रुवांसी आंखो से मालती की तरफ़ देखते हुऐ थोड़ी चेहरे बेबसी की मुस्कान लाती हुई संध्या मालती से बोली...

संध्या --"एक मां को जब, उसके ही बेटे के लिऐ कोई ताना मारे तो उस मां पर क्या बीतती है, वो एक मां ही समझ सकती है।"

संध्या की बात मालती समझ गई थीं की सन्ध्या का इशारा आज सुबह नाश्ता करते हुऐ उसकी कही हुई बात की तरफ़ थीं।

मालती --"अच्छा! तो दीदी आप ताना मारने का बदला ताना मार कर ही ले रही है।"

संध्या को बात भी मालती की बात समझते देरी नहीं लगी, और झट से छटपटाते हुऐ बोली...

संध्या --"नहीं... नहीं, भगवान के लिऐ तू ऐसा ना समझ की, मैं तुझे कोई ताना मार रही हूं। तेरी बात एकदम ठीक थीं, मैने कभी तो अभय को ज्यादा खाना खाने पर ताना मारी थीं, मेरी मति मारी गई थीं, बुद्धि भ्रष्ट हो गई थीं, इस लिऐ ऐसे शब्द मुंह से निकल रहे थे।"

चुप चाप खड़ी संध्या की बात सुनते हुऐ मालती भावुक हो चली आवाज़ मे बोली...

मालती --"भगवान ने मुझे मां बनने का सौभाग्य तो नहीं दीया, पर हां इतना तो पता है दीदी की, बुद्धि हीन मां हो चाहे मति मारी गई मां हो, पागल मां हो चाहे शैतान की ही मां क्यूं ना हो... अपने बच्चे को हर स्थिति में सिर्फ प्यार ही करती है।"

कहते हुऐ मालती वापस उस कमरे से चली जाति है... और इधर मालती की सत्य बातें संध्या को अंदर ही अंदर एक बदचलन मां की उपाधि के तख्ते पर बिठा गई थीं, जो संध्या बर्दाश्त नहीं कर पाई।।

और जोर - जोर से उस कमरे में इस तरह चिल्लाने लगी जैसे पागल खाने में पागल व्यक्ति...

..... हां.... हां मैं एक गिरी हुई औरत हूं, यही सुनना चाहती है ना तू, लेकिन एक बात सुन ले तू भी, मेरे बेटे से मुझसे से ज्यादा कोई प्यार नहीं करता...

""अब क्या फ़ायदा दीदी, अब तो प्यार करने वाला रहा ही नहीं... फिर किसको सुना रही हो?"

चिल्लाती हुई संध्या की बात सुनकर , मालती भी चिल्लाकर कमरे से बाहर निकलते हुई बोली और फिर वो भी नम आंखों के साथ अपने कमरे की तरफ़ चल पड़ती है.....

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अपडेट 7

आज अभि का पहला दिन था उसके काम पर, जो काफी अच्छा गुजरा था। अब उसके साथ, पढ़ाई के साथ साथ काम भी था। वो मान ही मान काफी खुश था। जॉब मिलने पर उसे इस तरह का अहसास हो रहा थानों उसे उसकी दुनिया मिल गई हो। वो हंसी खुशी अपने स्कूल बैग को पीछे टांगे , घर की तरफ चल पड़ा। अभि अब 10वी कक्षा का छात्र था, और 15 साल का हो गया था। इस उम्र में ही अच्छी खासी लंबाई का माली बन गया था, शायद अपने दादा परम सिंह की कद - काठी मिली थी उसको।

उसके चेहरे पर हमेशा एक अजीब सी चमक रहती थी, एक आकर्षक चेहरा था उसका, जो भी देखता था उसे अभी के ऊपर ऐतबार होने में समय नहीं लगता था। अभि आज महलों से निकल कर अपने पैरो पर खड़ा हो गया था। 15 साल की उम्र में पढ़ाई के साथ साथ काम भी करने लगा था। अब तो वो सपने देखना भी शुरू कर दिया था। ना जाने क्या सोचते हुए वो मंद मंद मुस्कुराते हुए बाजार की गलियों में आगे बढ़ा चला जा रहा था की तभी एक आवाज ने उसके पैर को थमने पर मजबूर कर दिया, और वो रुक गया , और उस तरफ देखने लगा, जिस तरफ से उसे वो आवाज आई थी।

उसने जब उस तरफ देखा, तो एक औरत टोकरी में चूड़ियां भर कर बेंच रही थीं। अभि इस औरत के नजदीक गया और टोकरी में झांकने लगा। उसे us टोकरी रंग बिरंगी चिड़िया दिखी।

"क्या हुआ बेटा? चूड़ियां चाहिए क्या?"

वो औरत अभि को इस तरह से चूड़ियों को देखते , देख बोल पड़ी। अभि उस औरत की बात सुनकर हल्के से मुस्कुरा कर बोला --

अभि --"चाहिए तो था आंटी, पर मुझे लगता है की अभि वो समय नहीं आया है। जब समय आएगा , वादा करता हु , आप के इधर से ही ले जाऊंगा ये चूड़ियां।"

"ठीक है बेटा।"

वो औरत जवाब देते हुए , अपनी टोकरी उठाती है, अभि ने उसकी मदद की फिर वो औरत वहा से चली जाति है।

अभि काफी खुश हो जाता है, अब ये खुशी काम पाने की थी या किसी और चीज की , वो बताना थोड़ा मुश्किल था। वो जल्द ही घर पहुंच गया। वो गाना गुनगुनाते हुए घर के अंदर दाखिल हुआ और फिर अपने कमरे में चला गया। रेखा ने अभि को इस तरह , आज पहेली बार डेकिल रही थी, इस तरह से गुनगुनाते हुए उछल कर अपने रूम में जाते हुए। अभि को खुश देख, रेखा को भी काफी खुशी हुई, और वो भी मंद मंद मुस्कुराते हुए किचन की तरफ बढ़ चली।

अभि अपने कमरे में अपने कपड़े बदल रहा था। और वो अभी भी अपने होठों से गीत गुनगुना रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो अभि किसी के प्रेम में पड़ गया हो। यूं गुनगुनाते हुए मंद मंद मुस्कुराना , तो अक्सर वो ही लोग करते है , जिन्हे प्रेम के जाल ने कैद कर लिया हो। अभि अपने कपड़े बदल कर , बेड पर लेट जाता है। और ऊपर चाट की तरफ चल रहे पंखे को देखते हुए कुछ बोल पड़ा...

अभि --"जन्मदिन मुबारक हो मेरी रानी, घबराना मत, बहुत जल्दी आऊंगा, मेरा इंतजार करना। पता है नाराज़ होगी तुम, यूं बिना बताए, बिना तुमसे मिले जो चला आया। पर आकर तुम्हे अपनी सारी दास्तान सुनाऊंगा। बस थोड़े दिन और, फिर हम साथ होंगे..."

खुद से ही आशिकों की तरह बाते करते हुए , अभी ना जाने कहा खो सा गया...

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एक तरफ जहां अभय हवेली के ऐसे आराम छोड़कर, दर दर की तोखरे खा रहा होगा। वही दूसरी तरफ , अब हवेली का एक ही राजकुमार था, वो था अमन जिसे काफी प्यार और दुलार मिल रहा था। और यही प्यार और दुलार के चलते वो एकदम बिगड़ गया था। गांव वालो से प्यार से तो कभी वो बात हो नही करता था, अपने ठाकुर होने का घमंड दिखाने में वो हमेशा आगे रहेता था। अमन भी 10 वी में पढ़ता था। स्कूल भी खुद की थी, इसलिए हमेशा रुवाब में रहता था। स्कूल के चपरासी से लेकर अध्यापक तक किसी का भी इज्जत नहीं करता था। आस पास के गांव से पड़ने आने वाले कुछ ठाकुरों के घर के बच्चो के साथ, वो अपनी दोस्ती बना कर रखा था, और गांव के आम लड़के , जो पढ़ने आते , उन पर वो लोग अपना शिकंजा कशते थे।

उस दिन भी अमन स्कूल के ग्राउंड में क्रिकेट खेल रहा था। दो गोल बनी थीं। एक ठाकुरों की, और दूसरी गांव के आम लडको की। स्कूल का ग्राउंड खचखच दर्शको से भरा था। गांव के जवान , बुजुर्ग, महिला, और छोटे - छोटे बच्चे सब क्रिकेट का आनंद ले रहे थे।

अगर आप ये सोच रहे है की , ये स्कूल के तरफ से मैच हो रहा था, तो आप गलत सोच रहे हैं। दरअसल सिलसिला तब से शुरू हुआ था , जब ठाकुर परम सिंह अपनी जवानी के दिन में क्रिकेट खेलते थे। वो हर साल ठाकुरों और गांव के आम लोगो के बीच क्रिकेट का मैच करवाते थे , और जितने वालो को अच्छा खासा इनाम अर्जित किया जाता था। ठाकुर परम सिंह जाति - पाती में कभी भेदभाव नहीं देखते थे। और अगर कभी गांव वाले मैच जीतते थे तो दिल खोल कर दान करते थे। क्रिकेट का मैच भी उनके दान करने का एक अलग नजरिया था।

पूरा ग्राउंड शोर - शराबे में मस्त था। वही गांव के ठाकुरों के बैठने के लिए काफी अच्छी व्यवस्था बनाई गई थी। जहां, ठाकुर रमन सिंह, सन्ध्या सिंह, मालती सिंह, ललिता सिंह और उसकी बेटी खूबसूरत बेटी बैठी थीं। पास में ही गांव के सरपंच और उनका परिवार भी बैठा था।

सरपंच के परिवार में उसकी पत्नी , उर्मिला चौधरी,और बेटी पूनम चौधरी बैठी थी। पूनम और रमन की बेटी दोनों ही खूबसूरत थी। पर ये दोनो को एक लड़की टक्कर दे रही थी। और उस लड़की से इन दोनो की बहुत खुन्नस थी। वो लड़की ना ही किसी ठाकुरों के घराने से थी नही किसी चौधरी या उच्च जाति से। वो तो उसी गांव के एक मामूली किसान मंगलू की बेटी थीं। जो बचपन में अपने हीरो अभि के साथ खूब खेलती थीं।

पर आज वो 15 साल की हो गई थी। और उसी ग्राउंड में गांव की औरतों के बीच बैठी क्रिकेट के इस खेल का लुफ्त उठाने आई थीं। गहरे हरे रंग की सूट सलवार में वो किसी परी की तरह लग रही थी। उसके गुलाबी होठ किसी होठ लाली की मुस्ताद नही थी, वो अपने आप में ही प्राकृतिक लालिमा लिए चमक रही थी। उसके सुराही दार लंबी गोरी गर्दन तो उसके नीचे सुसोभित प्राकृतिक ठोस और मांसल खूबसूरत वक्ष स्थल जो लोगो और उसके कपड़े का आकर्षक केंद्र बनती थीं। परी कहो या कयामत, पर सच तो ये था की वो एक मूर्त थी मोहिनी और कामुकता की। 15 साल की उम्र में ही उसके शरीर के अंगो का विकास इस तरह से हुआ था की , लोगो का उसके प्रति देखने का नजरिया ही बदल गया था।

और ये चिंता मंगलू उसके बाप को कुछ ज्यादा ही हो रही थी। स्कूल में ठाकुरों के बच्चे अपनी किस्मत आजमाने में बाज नही आते थे, पर ठाकुर अमन सिंह से नजारे बचा कर। ठाकुर अमन सिंह उस लड़की के बहुत बड़े आशिक थे। इस लिए तो बचपन में उस लड़की को अभय के साथ खेलता देख इनकी गांड़ ताल के खेतो की मिट्टी की तरह काली हो जाया करती थी। और किसी न किसी बहाने से ये महाशय अभय को फंसा कर उसकी मां संध्या सिंह से पिटवा देते थे। और संध्या सिंह का भी अमन लाडला ही हुआ करता था तो वो बात भी आग में घी का काम कर जाता था।

पर कहते है ना, जिसके दिल मे जो बस गया फिर किसी और का आना पहाड़ को एक जगह से हटा कर दूसरी जगह करने जैसा था। उसी तरह अभय उस परी के दिल में अपना एक खूबसूरत आशियाना बना चुका था। जो आज अभय के जाने के बाद भी , ये महाशय उस लड़की के दिल में अपना आशियाना तो छोड़ो एक घास-फूस की कुटिया भी नही बना पाए। पर छोरा है बड़ा जिद्दी, अभि भी प्रयास में लगा है। चलो देखते है, अभय की गैर मौजूदगी में क्या ये महाशय कामयाब होते है ? या फिर____? आप लोग ही बताइए अपने कॉमेंट ke माध्यम से।

कहना जारी रहेगी दोस्त, और वादा करता हु पूरी भी करूंगा। क्युकी इस तरह की कहानी लिखना मुझे खुद एक्साइट करता है। पर यारों थोड़ा सा बिजी शेड्यूल चल रहा है, बस कुछ दिनों के लिए ऑफिस में।

So please try to understand,kuchh dino tak update me problems hongi. But yep once everything is good will surely update as fast as you all guys demand.
 
अपडेट 8

ग्राउंड खचाखच भरा था, आस पड़ोस के गांव भी क्रिकेट का वो शानदार खेल देखने आए थे।ये कोई ऐसा वैसा खेल नही था। ये खेल ठाकुरों और गांव के आम लोगो के बीच का खेल था।

खेल में 15 से 17 साल के युवा लडको ने भाग लिया था। कहा एक तरफ ठाकुर अमन सिंह अपने टीम का कप्तान था। तो वही दूसरी तरफ भी अमन के हमउम्र का ही एक लड़का कप्तान था, नाम था अजय। खेल शुरू हुई, दोनो कप्तान ग्राउंड पर आए और निर्धारक द्वारा सिक्का उछाला गया और निर्दय का फैसला अमन के खाते में गया।

अमन ने पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया। अजय की ने अपनी टीम का क्षेत्र रक्षण अच्छी तरह से लगाया। मैच स्टार्ट हुए, बल्लेबाजी के लिए पहले अमन और सरपंच का लड़का सुनील आया। शोरगुल के साथ मैच आरंभ हुआ ।

अमन की टीम बल्लेबाजी में मजबूत साबित हो रही थी, अमन एकतरफ से काफी अच्छी बल्लेबाजी करते हुए अच्छे रन बटोर रही थी। वही अमन किंशनदार बल्लेबाजी पर लोगो की तालिया बरस रही थी, और सबसे ज्यादा taliyo की गूंज संध्या सिंह की तरफ से पद रहे थे, देख कर ऐसा लग रहा था मानो संध्या के हाथ ही नही रुक रहे थे। चेहरे पर की खुशी साफ दिख रही थी। तालिया को पिटती हुई जोर जोर से चिल्ला कर वो अमन का हौसला अफजाई भी कर रही थीं। गांव के औरतों की नज़रे तो एक पल के लिए मैच से हटकर संध्या पर ही अटक गई।

मैच देख रही गांव की औरतों के झुंड में से एक औरत बोली।

"जरा देखो तो ठाकुराइन को, देखवकर लगता नही की बेटे के मौत का गम है। कितनी खिलखिला कर हंसते हुए तालिया बजा रही है।"

पहेली औरत की बात सुनकर , दूसरी औरत बोली...

"अरे शांति, जैसे तुझे कुछ पता ही न हो, अभय बाबा तो नाम के बेटे थे ठाकुराइन के, पूरा प्यार तो ठाकुराइन इस अमन पर ही लुटती थी, अच्छा हुआ अभय बाबा को भगवान का दरबार मिल गया। इस हवेली में तो तब तक ही सब कुछ सही था जब तक बड़े मालिक जिंदा थे।"

शांति --"सही कह रही है तू निम्मो,, अच्छे और भले इंसान को भगवान जल्दी ही बुला लेता है। अब देखो ना , अभय बाबा ये जाति पति की दीवार तोड़ कर हमारे बच्चो के साथ खेलने आया करते थे। और एक ये अमन है, इतनी कम उम्र में ही जाति पति का कांटा दिल और दिमाग में बो कर बैठा है।"

गांव की औरते यूं ही आपस में बाते कर रही थी, और इधर अमन 100 रन के करीब था। सिर्फ एक रन से दूर था। अगला ओवर अजय का था, तो इस समय बॉल उसके हाथ में था। अजय ने अपने सभी साथी खिलाड़ियों को एकत्रित किया था और उनसे कुछ तो बाते कर रहा था, या ये भी कह सकते हो की कप्तान होने के नाते अपने खिलाड़ी को कुछ समझा रहा था। तभी अमन अपने अहंकार में चूर अजय के गोल से होते हुए, बैटिंग छोर की तरफ जा रहा था , तभी वो अजय को देखते हुए बोला...

अमन --"बेटा अभी जा जाकर सिख, ये क्रिकेट का मैच है। तुम्हारे बस का खेल नही है।"

अमन की बात सुनकर अजय ने बाउल उछलते और कैच करते हुए उसकी तरफ बढ़ा और अमन के नजदीक आकर बोला...

अजय --"क्यूं? मुझसे दर लग रहा है क्या तुझे?"

अजय की तू तड़क वाली बात सुनकर, अमन को गुस्सा आ गया, और क्रिकेट पिच पर ही अजय का कूलर पकड़ लिया। में का ये रवैया देख कर सब के सब असमंजस में पड़ गए , गांव के बैठे हुए लोग भी अपने अपने स्थान से खड़े हो गए, संध्या के साथ साथ बाकी बैठे उच्च जाति के लोग भी हक्का बक्का गए की ये अमन क्या कर रहा , झगड़ा क्यूं कर रहा है?

लेकिन तब तक मैच के निर्धारक वहा पहुंच कर अमन को अजय से दूर ले जाते है। अजय को गुस्सा नही आया बल्कि वो अभी भी अपने बॉल को उछलते और कैच करते अमन की तरफ देखकर मुस्कुरा रहा था।

मैच शुरू हुई, पहेली परी का अंतिम ओवर था जो अजय फेंक रहा था। अजय ने पहला बॉल डाला और अमन ने बल्ला घुमाते हुए एक शानदार शॉट मारा और गेंद ग्राउंड के बाहर, और इसी के साथ अमन का 100 रन पूरा हुआ। अमन अपनी मेहनत का काम पर अहंकार का कुछ ज्यादा ही प्रदर्शन कर रहा था। और एक तरफ अमन के 100 रन पूरा करने की खुशी संध्या से मानो पच ही नही रही थी। खड़ी होकर इस तरह तालिया पीट रही थी , मानो हथेली ही न टूट जाए। गांव वाले भी अमन के अच्छे खेल पर उसके लिए तालिया से सम्मान जाता रहे थे।

पहेली परी का अंत हो चुका था 15 ओवर के मैच में 170 रन का लक्ष्य मिला था अजय की टीम को।

परी की शुरुआत में अजय और उसका एक साथी खिलाड़ी आए। पर नसीब ने धोखा दिया और पहले ओवर की पहली गेंद पर ही अमन ने अजय की खिल्ली उड़ा दी। गांव वालो का चेहरा उदास हो गया। क्युकी अजय ही 3k matra Aisa खिलाड़ी था जो इतने विशाल लक्ष्य को हासिल कर सकता था। अजय के जाते ही अजय के टीम के अन्य खिलाड़ी में आत्मविश्वास की कमी ने अपना पैर पसार दिया। और देखते ही देखते एक एक करके उनके विकेट गिरते चले गए।

मात्र 8 ओवर के मैच में ही अजय की टीम ऑल आउट हो गई और बेहद ही बुरी तरह से मैच से पराजित हुए। अजय के चेहरे पर पराजय की वो लकीरें साफ उमड़ी हुई दिख रही थी। वो काफी हताश था, जो गांव वाले उसके चेहरे को देख कर ही पता लगा चुके थे। अजय गुमसुम सा अपने चेहरे को अपनी हथेलियों में छुपाए नीचे मुंह कर कर बैठा था। अजय की ऐसी स्थिति देख कर गांव वालो का भी दिल भर आया। क्योंकि अजय ने मैच को जीतने के लिए काफी अभ्यास किया था। पर नतीजन वो एक ओवर भी क्रीच पर खड़ा ना हो सका जिसका सामना उसे मैच की पराजय से करना पड़ा।

कोई कुछ नही बोल रहा था। अजय का तकलीफ हर कोई समझ सकता था। मैच का समापन हो चुका था। अमन को उसकी अच्छे प्रदर्शन के लिए पुरस्कृत किया गया। वो भी गांव की ठाकुराइन संध्या के हाथों। एक चमचमाती बाइक की चाभी संध्या के खूबसूरत हाथो से अमन को पुरस्कृत किया गया। में को पुरस्कृत करते हुए संध्या के मुख से निकला...

संध्या --"शाबाश...

अमन ने खुशी खुशी बाइक चाभी को लेते हुए अपने हाथ को ऊपर उठाते हुए अपने पुरस्कार की घोड़ा की ।

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शाम के 6 बाज रहे थे। अभि घर के कमरे के अंदर से बाहर निकलते हुए हॉल में आकर बैठ गया और tv देखने लगा। तभी वह रेखा भी आ जाति है। रेखा भी अभि के बगल के बैठते हुऐ बोली...

रेखा --" क्या बात है अभि? आज तुम कुछ ज्यादा ही खुश लग रहे हो।"

रेखा की बात सुनकर अभि उसकी तरफ मुस्कुराते हुए देख कर बोला...

अभि --"हा आंटी, आपको पता है, आज मेरे स्कूल यह के एम एल ए आए थे और उन्होंने ये घोड़ा की है की जो भी स्टूडेंट इस वर्ष अच्छे मार्क्स से पास होगा वो उस स्टूडेंट की आगे की पढ़ाई का पूरा खर्चा सम्हालेंगे।"

रेखा --"अरे वाह! ये तो सच में बहुत अच्छी खबर है, और मुझे पता है की मेरा अभि ही इस साल अच्छे नंबर से पास होगा।"

अभि --"अच्छे मार्क्स के बारे में किसको पता आंटी, पर गुरु जी कहते थे , की आज के ऊपर ध्यान दोगे तो तुम्हारा कल बेहतर होगा। और कल के बारे में सोचो कर बैठोगे तो तुम्हारा कुछ नही होगा। तो मुझे नही पता की मैं कितने मार्क्स लाऊंगा , बस पता हैब्तो इतना की अगर आज मैंने जमकर पढ़ाई की तो कल मेरा बेहतर होगा। और तो और अब तो मुझे काम भी मील गया है। बस ऊपर walanisintarah मेहनत करने का मौका देते रहे बस।"

रेखा --"तू सच में सबसे अलग है अभि, तू अलबेला है अलबेला।"

रेखा की बात सुनकर अभि मुस्कुराते हुए बोला...

अभि --"जो जिंदगी से खेला है वही तो अलबेला है। ऐसा मेरे पापा कहते थे। अच्छा आंटी मैं बाजार की तरफ जा रहा ही कुछ लाना है तो बोल दी, आते वक्त लेते आऊंगा।"

रेखा ने अभि को एक गहरी नज़र से देखते हुए बोली...

रेखा --"चाहिए तो था पर तू la nahi पाएगा!"

अभि --"क्यूं? ज्यादा भरी है क्या?"

ये सुनकर रेखा मुस्कुराते हुए.....

रेखा --"उम्म्म, भारी तो नही है, पर तेरी उम्र के हिसाब से भरी ही है समझ ले।"

ये सुन कर अभि भी थोड़ा मुस्कुरा पड़ा, शायद उसके दिमाग ने भी कुछ समझा ।

रेखा --" क्या हुआ ? तू मुस्कुरा क्यूं रहा है?"

अभि कुछ नही बोलता बस मुस्कुराते हुए घर से बाहर नकल जाता है। रेखा के भी चेहरे पर इस वक्त मुस्कान की लकीरें उमड़ी पड़ी थी, और जैसे ही अभि उसकी आंखो से ओझल हुआ।

रेखा --" बदमाश कही का, सब समझता है बस भोला बना बैठा है। मेरा लल्ला।"

कहते है ना , जब किस्मत मेहरबान होती है तो लोगो के हाथो से अच्छे काम ही होते है, वो उस समय सिर्फ अच्छी बाते सोचता है और उसके साथ अच्छा ही होता है। वही हुआ हमारे अभि के साथ भी। पूरी लगन के साथ पढ़ाई और काम दोनो किया उसने , 10 वि का एग्जाम्स दे कर काफी अच्छे मार्क्स से पास हुआ । और इधर एम एल ए के घोड़ा अनुसार, अभय को पुरस्कृत करते हुए आगे की पढ़ाई का पूरा खर्चा देने का वादा भी निभाया। सरस्वती ध्यान सागर के ट्रस्ट द्वारा अभि को आगे की पढ़ाई के लिए एक अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिल गया।

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इधर गांव में रमन ने जोर शोरो से कॉलेज की नीव खड़ी कर दी थी। देख कर ही लग रहा था की काफी भव्य कॉलेज का निर्माण हो होने वाला था। वैसे भी रमन ने डिग्री कॉलेज की मान्यता लेने की सोची थी तो कॉलेज भी उसी के अनुसार भी तो होगी।

जहा एक तरफ संध्या का प्यार अमन के लिए दिन दुगनी रात चुगनी हो रही थी तो, वही अमन एक तरफ अहंकार की आंधी में उड़ रहा था। अब अमन भी 11 वि में प्रवेश कर चुका था।

संध्या अब अमन को ही अपना बेटा मां कर जीने लगी थी। अब तो मालती के ताने भी उसे सिर्फ हवा ही लगते थे। जिसकी वजह से मालती भी अपने आज में जीने लगी थी। और वो भी अभय की यादों से दूर होती जा रही थी। अभय अब उस हवेली के लिए बस एक नाम बनकर रह गया था। जो कभी कभी ही यादों में आता था। शायद संध्या को लग चुका था की अब रोने गाने से कुछ फर्क पड़ने वाला तो है नही, अभय अब तो वापस आने से रहा । इसीलिए वो भी उसकी यादों से तौबा कर चुकी थी।

और होता भी यही है, कब तक कोई किसी को याद करता रहेगा, कब तक कोई किसी के लिए आसूं बहायेगा? समय के साथ तो लस्सी भी पत्थर को काट देती है, तो संध्या का तो सिर्फ जख्मी दिल था, जिस मरहम बना अमन का प्यार, और बस अभय की यादें किसी गुमनामी के अंधेरे में भटक कर रह गया।

अभय की यादें गुमनामी में भटक रहा था, मगर अभय नही। शायद इन बहन के लौड़ों को नही पता था। खैर वो तो वक्त ही बताएगा की गुमनामी में कौन जीने वाला है , अभय या हवेली के चमकते सितारे। क्योंकि अभय को तो रात के अंधेरे में चमकता सितारा नही, दिन में चमक रहे सूर्य की भाटी जीने में मजा आता है।

दोस्तो इस पार्ट में इतना ही, i know ki update thoda slow aur Chhota hai, but samay ke saath saath vo bhi thik ho jayega , tab tak pls understadnd....
 
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