थोड़ी ही देर में सुगंधा और बिंदिया में काफी अच्छी दोस्ती हो गई दोनों एक दूसरे से हंसी मजाक करते हुए खाना बनाने में लग गए थे सब्जी कट चुकी थी, बिंदिया गर्म तवे पर रोटी पका रही थी और उसकी नजर बार-बार सुगंधा के दोनों गोलियों पर चले जा रही थी जो की साड़ी में उसकी झलक बराबर मिल रही थी और बिंदिया के इस नजर का एहसास सुगंधा को भी हो रहा था,,, अंगीठी की गर्मी के कारण सुगंधा के बदन में भी थोड़ी गर्मी महसूस होने लगी थी उसे अब राहत महसूस हो रही थी नहीं तो सच में अगर यह झुग्गी ना मिलती तो मां बेटे दोनों बीमार हो जाते,,, तख्ते पर बैठकर अंकित दोनों की बातचीत सुन रहा था और दोनों को देख रहा था,,, अंकित की नजर बिंदिया पर थी शुरू शुरू में तो वह भी दिया पर ध्यान नहीं दे पाया था लेकिन अब उसे गौर से देख रहा था और उसे एहसास हो रहा था कि झुग्गी में भी चांद खिल सकता है,,,, अंकित को एहसास हो रहा था की बिंदिया भी देखने में खूबसूरत तकरीबन उसकी उम्र 35 से 40 के बीच की ही थी उसके बताएं अनुसार दो संतान की मां होने के बावजूद भी बदन का कसाव अभी बरकरार था।
और शायद इसलिए कि उसकी जवानी का रस शायद उसका पति पूरी तरह से निचोड़ नहीं पा रहा था क्योंकि उसने ही बताई थी कि वह शराबी है और कोई काम का नहीं है इसलिए उसे काम करना पड़ रहा है और दिनभर जो इस तरह से वह घर चलाने के लिए काम करती है यही सब का नतीजा है की जवानी अभी भी बरकरार थी लंबी कद काठी तीखे नैन नक्श, छाती की शोभा बढ़ा रहे दो संतरे ब्लाउजके कसाव पता चल रहा था कि दोनों संतरे रस से भरे हुए थे,,, रंग हल्का सा दबा हुआ था लेकिन बला की खूबसूरत दिखाई दे रही थी। वह अभी बिंदिया की खूबसूरती को अपनी आंखों से देख ही रहा था कि तभी भी बिंदिया सुगंधा से बोली।
एक बात कहूं दीदी,,,।
हां बोलो,,,,।
आप बहुत खूबसूरत हो,,,।
(उसकी बात सुनकर सुगंधा मुस्कुरा कर उसे एक टक देखने लगी तो फिर से अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली।)
नहीं दीदी मैं सच कह रही हूं तुम बहुत गोरी हो मैं यहां से तुम्हारे जैसी खूबसूरत औरत नहीं देखी।
तुम भी तो खूबसूरत हो,,,।
तुम्हारी जितनी थोड़ी हूं,,,, (बिंदिया शरमाते हुए बोली)
मैं भी सच कह रही हूं तुम मुझसे भी ज्यादा खूबसूरत हो क्योंकि तुम्हारा दिल बहुत खूबसूरत है वरना, कौन इस तरह से सहारा देता है।
इसमें कोई बड़ी बात नहीं है दीदी हम गांव देहाती लोग घर पर आए लोगों को भगवान की तरह समझते हैं और इस समय तुम मेरे लिए भगवान की तरह इसलिए तो मैं तुम्हारी सेवा कर रही हूं।
तुम्हारे विचार कितने अच्छे हैं,,,, वैसे तो मैं टीचर हूं लेकिन जिंदगी का सबक तुमसे सीख रही हूं।
तुम टीचर हो दीदी सच में लोगों को पढ़ाती हो,,,।
हां,,,,,, हम लोग शहर में रहते हैं यहां गर्मियों की छुट्टी में घूमने के लिए आए थे।
(सुगंधा की बात सुनकर बिंदिया अंकित की तरफ देखने लगी वह मुस्कुरा रहा था तो बिंदिया बोली)
वैसे तो दीदी तुम दोनों जन की जोड़ी अच्छी लग रही है। लेकिन,,,, (बिंदिया के मन में दोनों की उम्र को लेकर सवाल उठ रहा था लेकिन फिर भी वह अपनी बात को बदलते हुए बोली) दीदी मुझे एक बात समझ में नहीं आ रही है। तुम्हारे बच्चे तो होंगे ही,,,।
हां मेरे दो बच्चे हैं और वह भी जवान एक लड़की एक लड़का,,।
वही तो,,,, बच्चे और पति के होने के बावजूद भी तुम घूमने के लिए इतनी दूर आ गई क्या तुम्हारे पति को मालूम नहीं है।
बिल्कुल भी नहीं,,,, (बिंदिया की बात सुनकर सुगंधा के जन्मदिन में भी हलचल होने लगी थी वह समझ रही थी की बिंदिया क्या जानना चाहती है,, और एक अंजान औरत होने के नाते सुगंधा को इस बात का डर बिल्कुल भी नहीं था कि अगर इसे कुछ भी पता चलेगा तो वह किसी को बचाने वाली है क्योंकि यहां वैसे भी सुगंधा को कोई नहीं जानता था इसलिए अपनी बात को नमक मिर्च लगाते हुए वह बोली) मैं अपने घर पर यह कह कर आई हूं कि स्कूल से शिक्षकों लोग का घूमने का प्लान है और मैं जाना नहीं चाहती थी लेकिन प्रिंसिपल ने जबरदस्ती सबको आने के लिए मजबूर कर दिया है बस फिर क्या है, हम दोनों यहां पहुंच गए।
बाप रे तुमको झूठ बोलने में डर नहीं लगा,,,।
डर कैसा प्यार किया तो डरना क्या तुम शायद नहीं जानती अगर तुम्हें भी प्यार हो जाए तो तुम्हें भी डर बिल्कुल भी नहीं लगेगा और वैसे भी हम दोनों का मजा लेना था स्कूल में छुट्टी हो चुकी थी तो यहां आने का प्रोग्राम बना लिए।
(सुगंधा की बातें सुनकर बिंदिया के तन बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी क्योंकि वह जानती थी कि दोनों के बीच किस तरह का रिश्ता होगा दोनों एक दूसरे से अपनी जवानी की गर्मी शांत करते थे और यह सब सोच कर उसके खुदके बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी,,,,, वह अपनी मन में यही सोच रही थी कि शहर की ओर से कैसे अपने पति से झूठ बोल देती हैं जबकि गांव में औरत यह सब बातें सोच भी नहीं सकती,,, और यह शायद बिंदिया का ऐसा मानना था क्योंकि वह सीधी शादी घरेलू औरत थी उसे औरतों के इस रंग के बारे में नहीं मालूम था की ओर से कितनी चालाक होती है अगर वह किसी गैर मर्द से प्यार करने लगे तो घर को तबाह भी कर सकती हैं। तवे पर रोटी को पलटते हुए बिंदिया बोली।)
तब तो तुम दोनों बहुत मजा लूटते होगे।
यह भी कोई कहने की बात है,,,, तुम ही सोचो बिंदिया इस उम्र में पति घर की जिम्मेदारी पूरी करने में ही लग जाता है बच्चों को देखना पड़ा ही खर्च यह सब देखते-देखते उसके बदन में औरत को खुश करने वाला जोश रहता ही नहीं है मेरे पति का भी यही हाल हो गया था दिनभर ऑफिस का कामकाज बच्चों की पढ़ाई की टेंशन घर पर आते ही खाना खाकर सो जाते हैं,,, मोटाई भी बढ़ गई है,,, तोंद इतनी बड़ी निकली है कभी भी बिस्तर पर साथ ही नहीं देते तुम तो मुझे देख ही रही हो क्या तुम्हें लगता है कि इस उम्र में मुझे पति के बिना रात गुजारने में मजा आती होगी।
अब मैं क्या कहूं दीदी,,, (बिंदिया शरमाते हुए बोली और सुगंधा उसके सामने एकदम बेशर्म बनना चाहती थी,,,,,)
मेरी भी तो जरूरत है मेरी भी तो खुशियां है,,,, और सच कहूं मेरे पति जिंदगी की भाग दौड़ में इस कदर उलझ गए की समय से पहले पूरे हो गए,,,, मुझे समझ में आ गया था कि अब मेरी जरूरत मेरे पति पूरा नहीं कर सकते तो मुझे एक जवान लड़के की तलाश होने लगी,,, और तभी मार्केट में मुझे एक दिन यह मिल गया,,,।
मार्केट में,,,,,
अरे हां उसका भी किस्सा बड़ा दिलचस्प है,,,, वह क्या है ना कि मैं सब्जी खरीदने के लिए मार्केट गई थी। सब्जियां तो मैंने खरीद ली लेकिन जब थैला देखने लगी तो मेरा पर्स गायब था। मैं इधर-उधर ढुंड़ने लगी लेकिन पर्स मेरे पास था ही नहीं तो मिलता कहां से,,, मुझे सब्जी लेना भी जरूरी था। मैं एकदम परेशान हो गई और सब्जी वाले से मेरी कोई जान पहचान नहीं थी कि वह उधार कर लेता,,, तब ये मेरे पास आया और बोला,,, ।
क्या हुआ आंटी कोई तकलीफ है क्या,,,?
क्या कहा आंटी,,,(आश्चर्य जताते हुए बिंदिया बोली)
हां इसमें सबसे पहले मुझे आंटी कहकर ही बुलाया था।
बाप रे।
अरे सुनो तो,,,, तो मेरे मन में भी कुछ ऐसा बिल्कुल भी नहीं था मैं इससे बोली,,,।
हां बेटा मैं पर्स घर पर भूल गई हूं और इस समय मेरे पास बिल्कुल भी पैसे नहीं है सब्जी खरीदने के लिए।
बेटा,,,,!(एक बार फिर से आश्चर्य से बिंदिया बोली)
कहां बेटा मैं इसे बेटा ही कही थी क्योंकि मुझे आंटी कह कर बुलाया था तब शायद हम दोनों के पीछे सब कुछ होने की आशंका ही नहीं थी।
फिर,,,,।
(बिंदिया की उत्सुकता देखकर सुगंधा के तन बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी, क्योंकि वह मनगढ़ंत कहानी बिंदिया को बता रही थी और अपनी मां की चालाकी को देखकर उसकी बातों को सुनकर अंकित भी तख्ते पर बैठा बैठा मुस्कुरा रहा था,,,, इन सब बातों से सुगंधा की बुर पसीज रही थी। और यही हाल बिंदिया का भी था,बिंदिया के बदन में भी काम भावना जागरूक हो रही थी,,,, बरसात बड़े जोरों से हो रही थी छल छल करके पानी झुग्गी से लगकर पहाड़ से नीचे गिर रहा था बादलों के गरजने की आवाज लगातार आ रही थी लेकिन इस समय झुकी के अंदर माहौल पूरी तरह से मदहोशी के आलम में डूबने लगा था,,,, सुगंधा अपनी बातों को अपने शब्दों के रस में घोलकर बिंदिया के कानों में उतार रही थी,,,, सुगंधा को बताने में मजा आ रहा था और बिंदिया को सुनने में,,, और इन दोनों की बातों को सुनकर अंकित उत्तेजित हो रहा था सुगंधा अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,)
मेरी बात सुनकर यह अपनी जेब टटोलने लगा,,, और अपनी जेब से ₹100 का नोट निकाल कर मेरे हाथ में रख दिया,,,, मैं लेने से इंकार करती रही लेकिन यह जबरदस्ती मेरी हथेली में 100 का नोट रखकर मेरी मुट्ठी को बंद कर दिया यह सब इसने अपने हाथों से किया था पल भर के लिए तो मेरे बदन में अजीब सी हलचल हो गई थी क्योंकि एक जवान लड़का इस तरह से मेरा हाथ पकड़ लिया था मेरी मुट्ठी बंद कर दिया था मेरी मुट्ठी में 100 का नोट रख दिया था यह सब मेरे लिए अजीब था,,,,,, उस समय तो मैंने सब्जी वाले को पैसे दे दिए और जो पैसे बचे वह मैंने इसे लौटा भी दिए,,,, लेकिन मैं इससे बोली,,,
तुझे मेरे घर चलना होगा पैसे लेने के लिए,,,,, पर मालूम है इसने क्या कहा,,,?
क्या कहा,,,?
यह बोल कोई बात नहीं मुझे पैसे नहीं चाहिए।
ओहहह,,,(बिंदिया बोली)
लेकिन मैं कैसे पैसे ले सकती थी इसे पैसे लौटना भी जरूरी था इसलिए मैं इसे समझते हुए बोली,,, बेटा तूने मेरी मदद किया है लेकिन मुझे तुझे पैसे लौटाने ही होंगे इसके लिए तुझे मेरे घर चलना पड़ेगा,,, लेकिन यह इनकार करता रहा,,,,, फिर ना जाने कैसे यह तैयार हो गया और यह जब तैयार हुआ तो मेरे चेहरे पर प्रसन्नता के भाव नजर आने लगे मैं खुश हो गई क्योंकि मैं किसी का बोझ नहीं लेना चाहती थी मुझे जल्द से जल्द इसके पैसे लौटाने थे और मैं इसे घर लेकर आ गई। घर पर उसे समय कोई नहीं था मेरे दोनों बच्चे ट्यूशन गए हुए थे और मेरे पति ऑफिस में थे मैं इसे अपने घर लाई बिठाई और पैसे देने से पहले मैं इसका शुक्रिया अदा करना चाहती थी और मैं इसे बोली कि तू यहीं बैठ में चाय बनाकर लाती हूं।
दीदी तुम्हारा मन में कुछ था घर ले जाने से पहले,,,
नहीं बिल्कुल भी नहीं यह मुझे आंटी जो बोला था और मैं इसे बेटा बोल रही थी तो मेरे मन में ऐसा कुछ भी नहीं था लेकिन चाय बनाने के लिए मैं किचन की तरफ जाने लगी और उसे दौरान
(और इतना कहकर में किचन की तरफ जाने लगी लेकिन इस दौरान मैं किचन में जाते हुए अपनी साड़ी के पल्लू को अपनी कमर में खोंस दी थी और यही अदा इस लड़के पर भारी पड़ गई यह मुझे ना जाने कैसे गंदी नजर से देखने का क्या क्योंकि इससे पहले इसकी आंखों में भी मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था कि यह ऐसा कुछ कर सकता है है ना अंकित,,,)
हां बिल्कुल मार्केट के अंदर तो मैं इसलिए मदद किया था कि यह बहुत परेशान दिखाई दे रही थी तो मैं मानवता के नाते उनकी मदद कर दिया था मेरे मन में भी ऐसा कुछ भी नहीं था लेकिन घर पर पहुंच कर जब मैं सोफे पर बैठा था तो यह किचन की तरफ जा रही थी उस समय मुझे कहना तो नहीं चाहिए लेकिन जब बात खुल ही गई है तो बता दूं कि इनका पिछवाड़ा देखकर मुझे ना जाने क्या हो गया कसी हुई साड़ी में इनका पिछवाड़ा और भी ज्यादा बड़ा दिखाई दे रहा था उससे पहले मेरे मन में कुछ भी नहीं था लेकिन इनका पिछवाड़ा देखते हैं मेरी आंखों में न जाने कैसे चमक आ गई,,,,,,,।
(अंकित की बात को सुनकर तो बिंदिया के होश उड़े जा रहे थे आश्चर्य से उसका मुंह खुला का खुला रह गया था और यह सब बातें उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में हलचल मचा रही थी अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला) यह तो किचन के अंदर चली गई लेकिन मेरे अंदर एक तड़प जगने लगी,,,,.
फिर,,,(धीरे से बिंदिया बोली,,,, उसकी उत्सुकता देखकर सुगंधा को भी मजा आ रहा था)
फिर क्या मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कुछ करने का मैं अपने अंदर हिम्मत जुटा रहा था क्योंकि घर पर कोई था भी नहीं,,,,,, थोड़ी देर में यह चाय बना कर ले आई,,, मैंने चाय पिया,,,,, मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कुछ करने को लेकिन मेरी हालत खराब थी मैं चाय पी कर उठकर खड़ा हो गया,,,,,, मेरे पेंट में तंबू बन चुका था,,,,। और उनकी नजर मेरे तंबू पर पहुंच गई थी और तंबू देखकर में ईन्हें मुस्कुराते हुए देखा था।
तंबू,,,,(आश्चर्य से बिंदिया बोली वह अंकित के कहने का मतलब समझ नहीं पाई थी लेकिन उसकी बात सुनकर सुगंधा हंसने लगी थी तो बिंदिया भी समझ गई कि वह किस बारे में बात कर रहा है इसलिए वह एकदम से शर्मा गई और कुछ पल के लिए अपनी नजर नीचे झुका ली,,,,,,,)
ये अपने पर्स में से पैसे निकाल कर मुझे देने लगी लेकिन मुझे ना जाने क्या सोचा मैं एकदम से इनका हाथ पकड़ लिया और अपनी तरफ खींच कर अपनी बाहों में भर लिया यह कुछ समझ पाती इससे पहले ही में इनके लाल लाल होठों पर अपने होंठ रख दिया और अपने दोनों हाथ को सीधा इनके पिछवाड़े पर रखकर दबाना शुरू कर दिया। पहले तो यह अपने आप को मेरी बाहों की कैद से छुड़ाने लगी लेकिन जल्दी एहसास होने लगा कि इनकी जरूरत क्या है यह अपने आप को एकदम से ढीला छोड़ दी,,,, यह एकदम से मेरे सामने समर्पण हो गई यह देखकर मेरी हिम्मत और बढ़ने लगी और धीरे-धीरे मेरे बदन से इनके बदन से वस्त्र दूर होने लगे,,, और उसी सोफे पर लिटा कर जिंदगी का मजा लिया,,,,
(अंकित अपनी बात पूरी भी नहीं किया था कि तभी सुगंधा बोल पड़ी)
तब से हम दोनों साथ में ही हैं रोज बाजार में मुलाकात करने लगी यह मुझे न जाने कितनी होटलों मे ले गया,,,
होटल में,,,(बिंदिया सुगंधा के कहने के मतलब को समझ नहीं पाई थी । तो सुगंध मुस्कुरा कर समझते हुए बोली,,,)
अरे बुद्धू करने के लिए,,,।
ओहहह ,,,(बिंदिया एकदम से शर्मा गई,,,,)
जब कोई घर पर नहीं होता तो यह घर पर ही आ जाता था पर मुझे जो इसे मजा मिल रहा था मैं कभी सोचा भी नहीं थी इसलिए तो आज तक किसका साथ नहीं छोड़ी और यह भी मेरा दीवाना बना फिर रहा है।
बाप रे तुम दोनों की तो कहानी भी गजब है,,,,,। तुम्हारी दिलचस्प कहानी सुनने में तो सब्जी भी नहीं बन पाई.
तो जल्दी से बनाओ मुझे तो बड़े जोरों की भूख लगी है,,, लेकिन इससे पहले मुझे बड़ी जोरों की पेशाब लगी है,,,(इतना कहते हुए सुगंधा अपनी जगह से उठकर खड़ी हो गई और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली) करना कहां है बिंदिया,,,,।
जब सब कुछ ठीक रहता है तब तो यह पीछे ही,,(हाथ से झुग्गी के पीछे की तरफ दिखाते हुए) कर लेते हैं लेकिन इतनी तूफानी बारिश में पीछे बैठ भी नहीं पाओगी फिसल जाओगी,,,,
तो अब,,,,,।
आगे,,,,(अंकित की तरफ देखते हुए) अगर कोई दिक्कत ना हो तो
(बिंदिया के कहने के मतलब को सुगंधा अच्छी तरह से समझ गई थी इसलिए वह बोली)
तुम इसकी चिंता मत करो यही आगे बैठना है ना,,,,
(सुगंधा को केवल उसके इजाजत की जरूरत थी क्योंकि किसी के घर में भी इधर-उधर पेशाब करना उचित तो बिल्कुल भी नहीं था,, भले ही वह छोटी सी झुग्गी थी लेकिन बिंदिया उसमें रहती थी और झुग्गी में तो कोई बाथरूम था नहीं जहां पर सुगंधा बिना बोले ही पेशाब करने के लिए चली जाती,,,, लेकिन बिंदिया हैरान थी क्योंकि सुगंधा जहां पर बैठकर पेशाब करने के बारे में पूछ रही थी वहीं पास में ही अंकित भी था और बिंदिया के नजरिया से भले ही दोनों के बीच कितने ही आपसी नजदीकी संबंध बन गए हो लेकिन फिर भी औरत की एक मर्यादा होती है वह इस तरह से किसी बंद के सामने बैठकर पेशाब करना शुरू नहीं कर देती और खास करके तब जाऊंगा किसी गैर इंसान के सामने हो लेकिन सुगंधा के व्यवहार को देखकर बिंदिया का दिल जोरो से धड़क रहा था, और अंकित मन ही मन उत्तेजित हुआ जा रहा था वह अपने मन में सोच रहा था कि उसकी मां पूरी तरह से एक मजी हुई खिलाड़ी बन चुकी है वरना अनजान लोगों के सामने तो वह ठीक तरह से बात करना भी पसंद नहीं करती थी। मुस्कुराते हुए सुगंधा झुग्गी के मुख्य द्वार पर पहुंच चुकी थी जहां पर दरवाजे के नाम पर केवल ताड पत्रि का पर्दा लटका हुआ था,, सुगंधा धीरे से उसे प्लास्टिक के पर्दे को खोलकर बाहर की तरफ देखने लगे बाहर अंधेरा अंधेरा था तेज चलती हवाएं और बारिश का शोर सुनाई दे रहा था पैरों के पास से ही पानी बड़े जोरों से पहाड़ी से नीचे की तरफ जा रहा था सुगंधा पल भर के लिए अपने मन में सोचने लगी कि अगर सर छुपाने के लिए यह झुग्गी ना मिलती तो आज उन दोनों का क्या होता,,,।
यही सोचते हुए वह साड़ी को दोनों हाथों से पकड़ ली थी और बिंदिया की तरफ देखे बिना ही वहां अपनी साड़ी को ऊपर की तरफ उठाने लगी बिंदिया अंगीठी पर कढ़ाई रखते हुए सुगंधा की तरफ ही देख रही थी वह देख रही थी कि यह औरत कितनी बेशरम हो चुकी है एक शिक्षिका होने के बावजूद भी शर्म और मर्यादा नाम मात्र का भी नहीं है इसके अंदर यह सोचकर वह अंकित की तरफ देखने लगी अंकित भी बेझिझक अपनी मां की तरफ ही देख रहा था,,, और अंकित को देखकर बिंदिया अपने मन में सोच रही थी कि यह लड़का भी कितना बेशर्म है अपनी मां की उम्र के साथ मजे लूट रहा है,,, यह भी तो कोई बहाना बनाकर इसके साथ यहां पर आया होगा घरवालों को दोनों बेवकूफ बनाकर मजे लूट रहे हैं । बेटे की उम्र का है लेकिन एक पति होने का सुख भोग रहा है। जितनी औरत छिनार है उतना ही बेशर्म लड़का भी है हमारे गांव में होता तो दोनों की उम्र देखकर लड़का कभी भी यह सब नहीं करता बल्कि गांव के लड़कों में एक इस उम्र पर पहुंची महिला के प्रति कितनी इज्जत होती है चाचा मौसी या बड़ी मम्मी कह कर ही बुलाता है लेकिन यह शहर के लड़के कितने बेशर्म होते हैं कि अपनी मां की उम्र की औरत पर भी चढ़ने से बिल्कुल भी नहीं शरमाते। बिंदिया यह सब सो ही रही थी कि तब तक सुगंधा पुरी की पूरी साड़ी अपनी कमर तक उठा दी थी,,,, उसकी बड़ी-बड़ी जवानी से भरी हुई गांड देखकर खुद बिंदिया की बुर में पानी आ गया था। उसकी नजर में भी वासना और कामुकता एकदम साफ दिखाई दे रहे थे बहुत सुगंधा को ही देख रही थी और कढ़ाई में मसाले डाल रही थी। सुगंधा की जवानी से भरी हुई गांड देखकर बिंदिया अपने मन में बोली।
साल लड़का का भी कोई दोष नहीं है जब औरत ही इतनी खूबसूरत और जवानी से भरी हुई हो तो भला लड़का करके क्या सकता है जब औरत खुद मजा देने के लिए तैयार है तो कोई भी मजा लेने के लिए तैयार हो जाएगा वह यह नहीं देखेगा कि उसकी उम्र कितनी है, देखो तो सही कितनी खूबसूरत गोरी गोरी गांड है चिकोटि काट दो तो गांड टमाटर की तरह लाल हो जाए।ऐसी चिकनी गांड देखकर तो कीसी का भी मन फिसल जाए। अभी वह अपने मन में सोच ही रही थी कि तभी वह एकदम से नीचे बैठ गई और पेशाब करने लगी बारिश के शोर शराबे में भी उसकी बुर से निकलने वाली सिटी की आवाज बिंदिया के कानों में एकदम साफ सुनाई दे रही थी। जिसे सुनकर बिंदिया का मन मदहोश हुआ जा रहा था। गोरी गोरी बड़ी बड़ी गांड मक्खन की तरह लालटेन की पीली रोशनी में एकदम साफ दिखाई दे रही थी। जिसे देखकर बिंदिया मंत्र मुग्ध हुई जा रही थी। बिंदिया हैरान भी थी,आश्चर्य से उसकी आंखें फटी जा रही थी उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि एक औरत अपने बेटे के उम्र के लड़के की आंखों के सामने अपनी साड़ी उठाकर पेशाब करने बैठी हुई है इस बारे में सोचकर ही बिंदिया की हालत खराब हो रही थी,,, वह खुद जब कभी भी पेशाब करने जाती थी तो पेड़ के पीछे या जंगली झाड़ियां के बीच में जाती थी ताकि कोई उसे देखने दे और बैठने से पहले भी बार-बार वह चारों तरफ नजर घुमा कर देख लेती थी कि कहीं कोई उसे देख तो नहीं रहा है और यह बेशर्म औरत छिनार की तरह पेशाब करने बैठी हुई थी। बिंदिया एक हाथ मैं चमची लेकर मसले को चल रही थी और अपना पूरा ध्यान सुकांत पर लगाई हुई थी। थोड़ी देर में वह पेशाब करके उठ खड़ी हुई थी और वापस बिंदिया के पास आकर बैठ गई थी। उसने जिस तरह की हिम्मत दिखाई थी या शायद वह ऐसा बार-बार करती थी इस बारे में पूछने की हिम्मत बिंदिया कि बिल्कुल भी नहीं हुई।
Sugandha blouse kholti huyi
वह दोनों फिर से बातें करने लगे तब तक सब्जी पक रही थी लेकिन अंकित के मन में भी बहुत कुछ चल रहा था उसके मन में आज अपनी मां के सामने बिंदीया की चुदाई करने की इच्छा जागरुक हो रही थी और इस बात को अंकित अच्छी तरह से जानता था कि ऐसा कभी हो सकता है जब भी दिया खुद दोनों का साथ दे उत्तेजित हो जाए चुदवासी हो जाए और एक औरत को चुदवासी कैसे बनाना है यह हुनर अंकित अच्छी तरह से जानता था इसलिए वह धीरे से तख्ते पर से उठकर खड़ा हो गया और बोला।
मुझे भी बड़े जोरों की पेशाब लगी है अगर आप बुरा ना मानो तो मैं भी यही कर लूं,,,।
(इतना सुनते ही बिंदिया की बुर उत्तेजना से फूलने पिचकने लगी क्योंकि उसे विश्वास हो गया था कि जब औरत इस तरह से बेशरम बनाकर गांड दिखाते हुए पेशाब कर सकती है तो यह जवान लड़का तो उससे भी ज्यादा बेशर्म होगा वह जरूर वहीं खड़ा होकर पेशाब करेगा और जिस तरह का तंबू उसके तोलिया में बना हुआ था बिंदिया का दिल जोरो से धड़कने लगा था वह भी अपनी आंखों से उसके मर्दाना अंग को देखना चाहती थी क्योंकि उसे भी महीनों गुजर गए थे लंड देखें। इसलिए वह अंकित की बात सुनते ही बोली।)
हां हां कोई बात नहीं, इतनी तेज बारिश में जा भी कहां सकते हो वहीं पर कर लो जहां पर दीदी ने की।
(इतना सुनते ही अंकित का मन प्रसन्नता से भर गया,,, वह भी तुरंत उसी जगह पर पहुंच गया जहां पर उसकी मां बैठकर पेशाब कर रही थी वह जानता था कि वहां से उसका लंड बिंदिया को एकदम साफ दिखाई देगा और कुछ ही देर में पता चल जाएगा कि बिंदीया इस खेल में आगे बढ़ना चाहती है कि नहीं,,, और देखते ही देखते अंकित पूरी तरह से बेशर्मी दिखाते हुए अपने टॉवल को अपनी कमर से खोल दिया पल भर में ही वह अपनी मां और उस औरत की आंखों के सामने एकदम से नंगा हो गया,,, सुगंधा भी उसकी तरफ देख रही थी और बिंदिया भी, दोनों का दिल बड़ी जोरों से धड़क रहा था सुगंधा अपने बेटे की हरकत को अच्छी तरह से जानती थी किसी गैर की मौजूदगी में सब करते हुए उसके बेटे को अच्छा लगता था और धीरे-धीरे उसके बेटे ने उसे भी यह लत लगा दिया था। बिंदिया की सांस ऊपर नीचे हो रही थी उसकी आंखों के सामने अंकित का मोटा तगड़ा लंड एकदम टनटना कर खड़ा था लालटेन की पीली रोशनी में उसे सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था। अंकित जानता था कि दोनों औरतें उसकी तरफ ही देख रही है इसलिए वह उन दोनों की उत्तेजना को और ज्यादा बढ़ाते हुए अपने लैंड के जड़ को अपनी उंगलियों के सहारे पकड़ कर हल्के-हल्के ऊपर नीचे करके हिलाना शुरू कर दिया था और मुतना शुरू कर दिया था, सुगंधा के लिए तो यह रोज कथा लेकिन बिंदिया की हालत खराब हो रही थी उसकी सांसों की गति एकदम भारी हो चली थी सुगंधा को यह सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था वह देख रही थी की बिंदिया मदहोश हो रही थी,,, उसके ब्लाउज में कैद उसकी चुचीया सांसों की गति के साथ ऊपर नीचे हो रही थी।
झुग्गी के अंदर का नजारा पूरी तरह सहमत हो स हुआ जा रहा था दोनों औरतें मस्त हो रही थी दोनों की आंखों में वासना का तूफान उठ रहा था सुगंधा के लिए यह कोई नई बात नहीं थी लेकिन बिंदिया के लिए तो उसकी आंखों के सामने कुआं था और वह प्यासी थी बस उसे कुएं के पास जाना था प्यास बुझाने के लिए लेकिन यह 2 मीटर की दूरी भी मर्यादा और संस्कार की बड़ी-बड़ी दीवारें जैसी लग रही थी जिसे कूद कर पार कर जाना बहुत कठिन था,,, लेकिन जिस तरह के हालात बन चुके थे उसे देखते हुए बिंदिया के लिए संस्कार और मर्यादा की दीवार को लांघ जाना मुश्किल नहीं लग रहा था। अंकित एक औरत के मन में चुदासपन की लहर भरने में माहिर था। और वही युक्ति वह इधर भी आजमा रहा था उसके लंड से पेशाब की धार निकल रही थी और वह उसे पकड़ कर ऊपर नीचे करके हिला रहा था एक तो वैसे ही अंकित का लंड सामान्य लंड से 2 इंच ज्यादा ही था और उसकी मोटाई खरे की तरह थी जिसे देखकर बिंदिया की बुर पनिया रही थी,,,, अंकित ऊपर नीचे करके हिलाता हुआ पेशाब कर रहा था उसने अभी तक ना तो अपनी मां की तरफ देखा था और ना ही बिंदिया की तरफ क्योंकि वह जानता था कि ऐसे हालात में उसे बोलने की कोई जरूरत नहीं है जो कुछ भी कहना है उसका मर्दाना अंग ही बात को आगे बढ़ा रहा था और आंखों ही आंखों में बात आगे बढ़ भी रही थी।
अपने मर्दाना अंग का भरपूर दर्शन कराने के बाद अंकित टॉवल को फिर से अपनी कमर से लपेट लिया था,,, लेकिन टनटनाया हुआ लंड अभी भी तंबू का शक्ल लिया हुआ था जिस पर बिंदिया की नजर बराबर बनी हुई थी उसे एहसास हो रहा था कि उसकी बुर पानी पर पानी छोड़ रही थी और ऐसा उसके साथ बहुत दिनों बाद हो रहा था बहुत दिनों क्या महीनो गुजर गए थे,,, अपना जलवा भी खेलने के बाद अंकित फिर से अपनी जगह पर आकर बैठ गया था और दोनों औरतें खाना बनाने में लग गई थी थोड़ी ही देर में खाना बनकर तैयार हो चुका था,,, बिंदिया ने तीन थाली लगा दी थी,,,, इस समय मां बेटी के लिए यह ताड़पत्रि की बनी झुग्गी किसी महल से कम नहीं थी क्योंकि ऐसी तूफानी बारिश में और पहाड़ के ऊपर उसे सहारा मिलना मुश्किल था लेकिन दोनों की किस्मत तेज थी कि वह दोनों ऐसी तूफानी बारिश में झुग्गी के अंदर आराम से थे भी और खाने का भी प्रबंध हो चुका था,,, तीनों बड़े चाव से खाना खा रहे थे खाना खाते हुए अंकित बिंदिया की तारीफ करते हुए बोला।
वाह क्या खाना बना है जी तो करता है कि तुम्हारे हाथ चूम लु इतना स्वादिष्ट खाना मैंने आज तक नहीं खाया,,,,।
(अंकित की बात सुनकर बिंदिया मन ही मन बहुत खुश हो रही थी और सुगंधा बनावटी गुस्से के साथ उसकी तरफ देख रही थी जिसे देखकर अंकित बात को संभालते हुए बोला)
तुम भी बहुत अच्छा खाना बनाती हो,,, लेकिन मैं कभी सोचा नहीं था कि ऐसी तूफानी बारिश में और अभी इस पहाड़ पर ऐसा खाना खाने को मिल जाएगा। (ऐसा कहकर मुस्कुराने लगा,,,,, थोड़ी ही देर में दोनों खाना खा चुके थे,,,,, अब सोने की तैयारी करना था ऐसा बिंदिया सोच रही थी लेकिन अभी तो पूरा खेल बाकी था सुगंधा और अंकित के लिए तो यह पल हनीमून से बिल्कुल भी कम नहीं था। अभी भी बरसात का जोर बिल्कुल भी कम नहीं हुआ था,,,,, तेज हवाएं रह रहे कर ताड़पत्री की सरसराहट को बढ़ा दे रही थी,,,, वातावरण एकदम ठंडा हो चुका था लेकिन फिर भी झुग्गी के अंदर मदहोशी की गर्मी बरकरार थी, बिंदिया सुगंधा से बोली।
दीदी तुम दोनों तख्ते पर सो जाओ,, मैं यहीं पर बिछा लेती हूं,,,।
(यह सुनकर सुगंधा बोली,,,)
तुम नीचे सोओगी,, नहीं नहीं यह तुम्हारा घर है हम लोग तो पराए हैं बाहर से आए हैं हम लोग नीचे सो जाएंगे।
यह क्या कह रही हो दीदी मैं तुमको दीदी कह रही हूं तो पराए कैसे हो गए,,, वैसे भी तुम मेहमान हो और मेहमान को कोई नीचे सुलाता है क्या और वैसे भी मैं तख्ते पर नहीं सोती मैं नीचे ही बिछाकर सोती हुं,,,, इसलिए तुम्हें तख्ते पर ही सोना होगा।
तुम भी ना एकदम छोटी बहन की तरह जीद करती हो।
तुम्हारी बहन ही तो हूं,,,,,।
(दोनों की बातें सुनकर अंकित मन ही मन मुस्कुरा रहा था लेकिन इस दौरान उसकी नजर बिंदिया के दोनों गोलाई पर टिकी हुई थी,,, सामान्य से दिखने वाले ब्लाउज के अंदर उसकी मदहोश कर देने वाली चूचियां हाहाकार मचा रही थी,,, बिंदिया की बात सुनकर सुगंधा भी मुस्कुरा रही थी सुगंध कभी सोची नहीं थी कि अंजान औरत उसकी इतनी मदद करेगी इसलिए वह मुस्कुराते हुए बोली।)
तुम्हारा यह एहसान में जिंदगी भर नहीं बोलूंगी अगर तुम ना होती तो आज हम दोनों का न जाने क्या होता,,,।
ऐसी कोई बात नहीं है तेरी बल्कि आज की रात में जिंदगी भर नहीं बोलूंगी कि मेरे घर आप जैसे मेहमान आए थे,,,,।
(दोनों मुस्कुराने लगे और बिंदिया अपनी बिस्तर के पास चली गई और जाकर लेट गई हफ्ते पर अंकित लेटा हुआ था लेकिन जिस तरह से वह लेता था उसका तो लिया उसकी जांघों को पूरी तरह से खोल दिया था और हल्का-हल्का उसके लंड की झलक दिखाई दे रही थी जो की लालटेन की पीली रोशनी में बिंदिया को साफ तौर पर दिखाई दे रहा था। उसके पास में ही सुगंधा भी लेट गई,,,,,, देखते ही देखते तकरीबन 20 मिनट का समय गुजर चुका था लेकिन तीनों की आंखों में नींद बिल्कुल भी नहीं थी,, तीनों अपने-अपने तरीके से आगे की रणनीति तय कर रहे थे। बिंदिया को इस बात का एहसास था कि यह दोनों जरूर कुछ ना कुछ करेंगे इसलिए उसे नींद नहीं आ रही थी और सुगंधा एक बार फिर से किसी गैर के सामने शरीर सुख प्राप्त करने की कामना में जाग रही थी और अंकित अपने काम कलाओं से बिंदिया को भी इस खेल में शामिल करने के जुगाड़ में था। इसलिए वह धीरे से अपनी मां के कान में बोला।)
तो शुरू करें इसलिए अब तक तो हम दोनों ने किसी गैर मर्द के सामने इस तरह का सुख प्राप्त किया है लेकिन आज किसी औरत के सामने यह सब करके कैसा महसूस होता है यह देखने वाली बात है तैयार होना।
बिल्कुल मेरे राजा,,,,,(इतना कहने के साथ ही सुगंधा अपने बेटे के लंड पर अपना हाथ रख कर उसे सहलाने लगी यह देखकर बिंदिया की हालत खराब होने लगी,,, बिंदिया की सांसे ऊपर नीचे होने लगी,,, उसे जिस बात की उम्मीद थी वही उसकी आंखों के सामने हो रहा था,,,, वह अपनी आंखों को बंद की हुई थी ताकि उन दोनों को लगे कि यह सो रही है लेकिन हल्के से अपनी आंखों को खोलकर देख ले रही थी लेकिन बिंदिया की सोच इस बात है के लिए गलत थी कि वह दोनों को लग रहा था कि वह सो रही है बल्कि वह दोनों जानते थे की बिंदिया जाग रही है ऐसे हालात में एक औरत के मन में क्या चलता है वह क्या सोचती है यह सब कुछ अंकित को अच्छी तरह से मालूम था। सुगंधा देखते ही देखते अपने बेटे के लंड को पकड़ कर हिलाना शुरू कर दी थी और अंकित अपनी मां के लाल-लाल होठों को अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दिया था,,,, बिंदिया के लिए यह सब अद्भुत था इस तरह कर जा रहा है उसने आज तक कभी अपनी आंखों से अच्छी नहीं थी कि उसकी आंखों के सामने ही एक मर्द और एक औरत इस तरह का हरकत कर रहे हो इसलिए उसके बदन में भी मदहोशी छा रही थी। देखते ही देखते मां बेटे दोनों मदहोश होने लगे। मां बेटे दोनों जानते थे की बिंदिया जाग रही है लेकिन फिर भी अंकित जानबूझकर अपनी मां से बोला।)
बिंदिया रानी सो तो गई है ना,,,,,।
पता नहीं रुक देख कर बताती हूं,,,,(दोनों आपस में जानबूझकर धीरे में बात कर रहे थे ताकि बिंदिया को बिल्कुल भी शक ना हो कि वह दोनों को मालूम है कि वह जाग रही है और सुगंधा भी एक मजे हुए हीरोइन की तरह एक्टिंग कर रही थी वह हल्के से उठकर देखने लगी तो भी दिया जानबूझकर एकदम अपनी आंखों को बंद करके और गहरी गहरी सांस लेने लगी यह देखकर मुस्कुराते हुए सुगंधा अपने बेटे से बोली)
बिंदिया तो घोड़े बेचकर सो रही है,।
चलो अच्छा हुआ अब हम दोनों आराम से कुछ भी कर सकते हैं,,,,(एक बार फिर से अंकित अपनी मां को अपनी बाहों में भरते हुए बोला और यह सब बिंदिया सुन रही थी बल्कि अंकित और उसकी मां जानबूझकर अपनी बातों को उसके कानों तक पहुंचा रहे थे,,,, दोनों की बातें सुनकर बिंदिया का दिल जोरो से धड़क रहा था,,,,,, वह कुछ देर तक अपनी आंखों को बंद किए हुए लेटी रही,,,, वैसे तो सोते समय वह लालटेन बुझा कर सोती थी लेकिन आज जानबूझकर लालटेन जलने दे रही थी क्योंकि उसकी पीली रोशनी में उसे सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था और वह सब कुछ देखना चाहती थी,,,,, अपनी मां के लाल लाल हो तो कर रहे चूसते हुए धीरे से अपने होठों को अपनी मां के होठों से अलग करते हुए अंकित बोला,,)
अच्छा हुआ की बिंदिया रानी के पास दूसरा ब्लाउज नहीं था।
क्यों,,,,(अपने बेटे के लंड को हिलाते हुए वह बोली,,,)
क्योंकि उसे उतारने के लिए मेहनत नहीं करनी होगी बस साड़ी का पल्लू हटा दो और दोनों कबूतर आंखों के सामने पंख फड़फड़ाते हुए दिखाई देने लगेंगे,,,,(इतना कहने के साथ ही हुआ अपनी मां के छाती पर से साड़ी के पल्लू को हटा दिया और उसकी छाती को नंगी कर दिया उसकी बड़ी-बड़ी चूची है तड़प रही थी अंकित के मुंह में जाने के लिए और अंकित अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर अपनी मां की दोनों चूचियों को पकड़ कर दबाते हुए बोला)
देख रही हो जानेमन तुम्हारी चूचियां तड़प रही है मेरे मुंह में आने के लिए।
तो देर किस बात की है राजा मुंह में लेकर चुस जी भर कर,,,,,,।
(दोनों की बातें बेहद रसीली थी दोनों की बातों को सुनकर बिंदिया की टांगों के बीच की पतली दरार में हलचल हो रही थी वह अपने मन में सोच रही थी कि यह दोनों अपनी जिंदगी में कितना मजा लूट रहे हैं भले ही दोनों के बीच उम्र की कभी न मिटने वाली खाई है लेकिन फिर भी दोनों ने अपने हौसले से अपनी उम्र की सीमा को खत्म करके एक दूसरे की बाहों में जिंदगी का वह सुख प्राप्त कर रहे हैं जो सुख प्राप्त करने की इच्छा हर एक मर्द और औरत में होती है। देखते ही देखते झुग्गी के अंदर सुगंधा के सिसकने की आवाज आ रही थी वह मस्ती के सागर में डूब रही थी इस तरह की आवाज सुनकर बिंदिया अपने आप पर काबू नहीं कर पाई और धीरे से अपनी आंखों को खोलकर तख्ते की तरफ देखने लगी,,,,, सामने का नजारा देखकर उसके बदन में कंपन होने लगा वह मद होश होने लगी उसकी आंखों में खुमारी छाने लगी,,,, लालटेन के पीली रोशनी में बिंदिया को सुगंधा की बड़ी-बड़ी चूचीया एकदम साफ दिखाई दे रही थी। जिसे देखने के लिए बिंदिया काफी देर से तड़प रही थी उसे एहसास हो रहा था कि वाकई में सुगंधा की चूचियां लाजवाब थी एकदम गोल कसी हुई खरबूजे जैसी बड़ी-बड़ी भला ऐसी चुचीया पाने के लिए कौन सा मर्द होगा जो कुछ भी करने को तैयार नहीं हो जाएगा,,,, बिंदिया यह देखकर शिहर उठ रही थी कि उसके बेटे की उम्र का लड़का उसकी दोनों चूचियों को पकड़ कर दबा भी रहा था और बारी-बारी से मुंह में लेकर पी रहा था और इस दौरान वह अपने हाथ में उसके लंड को लेकर जोर जोर से हिला रही थी वाकई में बिंदिया को एहसास हो रहा था कि लड़के में दम बहुत ज्यादा है क्योंकि आज तक उसने खुद इतना मोटा और लंबा लंड नहीं देखी थी,,, वह खुद अपने मन में यह सोचकर मस्त हो रही थी कि जब इस तरह का लंड बुर में जाता होगा तो कितना मजा आता होगा,,,,,।
अंकित पागलों की तरह अपनी मां की दोनों चूचियों पर टूट पड़ा था यह जानते हुए भी की बिंदिया अपनी आंखों से उन दोनों के काम कला को देख रही थी,, अंकित को अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव हो रहा था क्योंकि 1 मीटर की ही दूरी पर एक खूबसूरत जवान से भरी हुई औरत अपनी जवानी की तड़प को काबू में करने की कोशिश करते हुए उन दोनों की कम लीला को देख रही थी भला ऐसे में कौन सी औरत होगी जो अपनी कामुकता को काबू में कर पाएंगी अंकित को पूरा विश्वास था कि आज की रात उस औरत की बुर पर भी उसके लंड का नाम लीखा है। इसलिए तो वह उसे औरत को और भी ज्यादा मदहोश करने की कोशिश करते हुए पलों की तरह अपनी मां की चूची को दबा रहा था पी रहा था मसल रहा था और उसकी मां भी कुछ काम नहीं थी वह अपने बेटे के मोटे से बड़े लंड को अपनी मुट्ठी में भरकर उसे मुठिया रही थी।। सुगंधा की हरकत को देखकर बिंदिया अपने मन में सोचने लगी की,,, अगर वाकई में किसी भी औरत को इतना मोटा तगड़ा लंड मिल जाए तो वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो जाएगी,,,, तब वह बिल्कुल भी नहीं सोचेगी कि समाज क्या कहेगा समाज क्या सोचेगा पकड़ी जाएगी कि नहीं पकड़ी जाएगी यह सब ख्याल उसके मन से एकदम से गायब हो जाएगा बस उसकी आंखों के सामने उस मर्द का मोटा तगड़ा लंड झुलता हुआ दिखाई देगा,,,,,।
मदहोशी अपनी चरम पर था। मां बेटे एक दूसरे के अंगों को सहलाने और दबाने में लगे हुए थे। अंकित के बदन से तौलिया छूट गया था वह पूरी तरह से नंगा हो चुका था,,, लालटेन की पीली रोशनी में अंकित का मोटा तगड़ा लंड और भी ज्यादा भयानक लग रहा था। और इस बीच लगातार बिंदिया की बुर से मदन रस बह रहा था जो देखते-देखते उसके पेटीकोट को गीला कर रहा था। बहुत दिनों बाद आज बिंदिया की बुर ने इतना सारा पानी निकाली थी,,,, बिंदिया की सांसे ऊपर नीचे हो रही थी। ईस बीच सुगंधा धीरे से उठकर बैठ गई उसकी सांसे उसकी चूचियों की गति को ऊपर नीचे कर रही थी। बिंदिया फिर से अपनी आंखों को बंद कर ली थी उसे इस बात का डर था कि कहीं सुगंधा उसे देख ना ले की वह जाग रही है,,,। लेकिन वह जानती थी की बिंदिया जाग रही है उसके उठकर बैठते ही वह अपनी आंखों को बंद कर ली थी इस बात का एहसास सुगंधा को हो गया था इसलिए वह मुस्कुरा रही थी,,,,,, अपनी मां को मुस्कुराता हुआ देखकर अंकित बोला।
जरा सोचो यह भी हमारे हनीमून जैसा ही है कितना अच्छा मौसम है इतना तो पैसा देकर भी इस तरह का माहौल नहीं बना सकते थे अच्छा हुआ कि हम लोग यहां रह गए और बारिश पड़ने लगी।
तू सच कह रहा है बिंदिया कितनी अच्छी औरत है मुझे इस बात का दुख है कि इसका पति शराबी है वरना तू ही देख कितनी जवानी से भरी हुई है इस वक्त तो उसे अपने पति की बाहों में होना चाहिए।
अगर पति सुख नहीं दे पा रहा है तो मेरा तो कहना ही की है किसी जवान मर्द की बाहों में होना चाहिए क्योंकि बिंदिया पूरी तरह से प्यार करने की चीज देखो तो सही कद काठी से तुम बराबर है ना तो ज्यादा मोटी हो ना तो ज्यादा पतली एकदम मांसल बदन है गोल गोल चूचियां और उभरी हुई गांड एकदम चोदने लायक,,,आहहहहहहहह ,,,,,(ऐसा कहते हुए वह उत्तेजना में अपनी मां की चूची पकड़ कर दबाने लगा वैसे तो कोई और समय होता तो अपने बेटे के मुंह से किसी और औरत की खूबसूरती की तारीफ सुनकर सुगंधा जल भुन जाती लेकिन इस समय उसके बदन में जिस तरह का खुमार छाया हुआ था उसके चलते सुगंधा को अपने बेटे की बातें और भी ज्यादा मदहोश कर देने वाली लग रही थी और यह सब बिंदिया सुन रही थी एक जवान लड़के के मुंह से इस तरह की बातें सुनकर बिंदिया के तन बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी,,, और वह जिस तरह से खुलकर उसे भी मजा लेने के लिए बोल रहा था पल भर के लिए बिंदिया सोचने पर मजबूर हो गई थी कि,, क्या वह भी ऐसा कर सकती है? (अपनी सवाल का जवाब उसे खुद ही अपने अंदर से मिल रहा था इसका एक मां कह रहा था क्यों नहीं कर सकती आखिर तू भी तो एक औरत है औरत भी अपनी खुशी के लिए जीती है,,, अपनी जरूरत के लिए जीती है पेट भरना भी जरूरी है क्योंकि भूख लगती है लेकिन बदन की जरूरत को भी पूरा करना महत्वपूर्ण है क्योंकि समय-समय पर जिस तरह से भूख लगती है इस तरह से औरत को भी मर्द की जरूरत का एहसास होता है। एक मन उसे समझा रहा था कि अपनी आंखों से देख ले क्या हो रहा है एक औरत है जो अपने पति से संतुष्ट नहीं है सुख सुविधा से निपुण है टीचर है स्कूल में पढ़ाती है लेकिन फिर भी अपनी जरूरत को नजर अंदाज नहीं करती आखिरकार यह भी तो एक औरत है इसके भी तो कोई मर्यादा है संस्कार है परिवार है लेकिन फिर भी अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए चली आई एक जवान लड़के को अपने साथ लेकर यहां पर और देखो कैसे मजा लूट रही है।