Incest पाप ने बचाया - Page 13 - SexBaba
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Incest पाप ने बचाया

Update- 87

जब पूर्वा ने अपनी माँ सुलोचना से पूछा तो सुलोचना ने कहा- महात्मा जी के यहां जाने से पहले जो बातें तूने मुझे बताई थी, बात तो वही है, तेरा अंदेशा सही था, शैतान अपनी जल्दी मुक्ति के लिए दुष्ट आत्माओं के बहकावे में आकर मानव स्त्री का अर्क इकट्ठा कर रहा है।

पूर्वा- अर्क शब्द तो मुझे पता है अम्मा......पर कैसा अर्क?...... क्या पसीना?

सुलोचना- नही

पूर्वा- फिर.....फिर कैसा अर्क......... क्या रक्त?

सुलोचना- अरे नही पुत्री........रक्त अर्क कैसे हो सकता है....रक्त तो रक्त है...... बताऊंगी अभी। पहले पूरी बात तो जान ले।

पूर्वा- अच्छा बोलो अम्मा।

सुलोचना- दरअसल शैतान बहकावे में आ गया है बुरी आत्माओं के, वो अर्क आत्माओं को चाहिए ताकि वह मानव स्त्री को वश में करके हमेशा हमेशा के लिए भोग सकें।

"भोग सकें" शब्द अपनी माँ के मुंह से सुनकर पूर्वा थोड़ी असहज हो गयी, कुछ अजीब सा लगा उसे।

सुलोचना- शैतान की समय पूर्व मुक्ति संभव नही, बुरी आत्मायें उसे बहकाकर उससे अपनी मंशा पूर्ण करा रही है, क्योंकि यज्ञ वही कर सकता है।

(इस तरह सुलोचना ने पूर्वा को महात्मा द्वारा सारी बात बताई, पूर्वा चुपचाप सारी बात सुनती रही, बस सुलोचना ने पाप शब्द का व्याख्यान उस तरह नही किया जैसा महात्मा ने उसे समझाया था, आखिर वो उसकी कुवांरी पुत्री थी, सुलोचना न जाने क्यों थोड़ा झिझक सी गयी, बाकी सारी बातें उसने ज्यों की त्यौं पूर्वा को बता दी, पर पूर्वा भी जिद्दी थी, बार बार बस यही पूछती की अम्मा कैसा पाप, मैं समझी नही, आखिर थक हारकर सुलोचना को पाप कर्म को पूर्वा को झिझकते हुए समझाना पड़ा, क्योंकि रात का वक्त था, अंधेरा था दोनों एक लाठी की दूरी पर अपनी अपनी खाट पर लेटी थी इसलिए एक दूसरे का चेहरा नही दिखाई दे रहा था, दरअसल पूर्वा समझ तो पहले ही गयी थी पर जानबूझ के अपनी अम्मा को छेड़ रही थी और ये बात सुलोचना समझ नही पाई, जब वो अनैतिक संभोग को समझाने लगी तो दोनों ही लजा भी गयी थी।)

पूर्वा- अम्मा आप फिक्र मत करो आपकी पुत्री कल से इस काम में आपके साथ डटी रहेगी जबतक ये पूर्ण नही हो जाता, आपने सही कहा हम स्त्री हैं और एक स्त्री के लिए इस विधि से इन आत्माओं को बुलाना बहुत आसान है, अभी घर मे 40- 50 नारियल रखे हैं, जितना है उतनो का नाश कल कर देंगे।

सुलोचना- हां बिल्कुल बेटी, पर बहुत संभल के, अब सो जा।

पूर्वा- ठीक है अम्मा, आप भी सो जाओ

(दोनों ने एक दूसरे को बोल तो दिया पर नींद किसे आ रही थी, चुपचाप दोनों काफी देर तक लेटी रही, न चाहते हुए भी बार बार ध्यान उस पाप और अनैतिक संभोग पर जा रहा था, आज बहुत अजीब भी लग रहा था, आज पहली बार सुलोचना ने पूर्वा से ऐसी बात की थी और पूर्वा ने भी पहली बार अपनी माँ के मुख से ऐसी बात सुनी थी)

पूर्वा अपने मन में सोचने लगी "आज अम्मा के मुख से योनि शब्द सुनकर कितना अजीब लगा, हम स्त्रियों की दोनों जाँघों के बीच कितनी सुंदर चीज़ बनाई है ईश्वर ने, क्या लिंग भी इतना ही सुंदर होता होगा? मैंने तो आजतक देखा भी नही है। कैसा होता होगा? लिंग और योनि आपस में कैसे मिलते होंगे? इनको मिलाने पर कैसा आनंद आता होगा?

इनका मिलन कैसा होता होगा? मैंने सुना है कि योनि को "बूर" भी कहते है? और लिंग को क्या क्या कहते होंगे? वो देखने में कैसा होता होगा? उसको योनि में कहां डालते होंगे? योनि तो कितनी नरम होती है, कितना दर्द होता होगा? एक संपूर्ण पुरुष का लिंग कितना लम्बा और बड़ा होता होगा? इसको योनि से कैसे मिलाते होंगे, क्या योनि के अंदर उसको डालते होंगे, इतनी छोटी सी योनि में वो कैसे अंदर जाता होगा, गहराई में जाकर वो कैसा महसूस होता होगा?

पूर्वा की योनि में हल्का सा संकुचन हुआ तो उसने अपनी दोनों जाँघों से योनि को हल्का सा भींच दिया, वो चुपचाप अपनी अम्मा की तरफ पीठ करके लेटी यही सब सोचने लगी थी, न चाहते हुए भी उसके जेहन में अब यही सब बातें आ रही थी, पर उसने जैसे तैसे अपने को संभाला।

इधर सुलोचना अपने मन में- आज पूर्वा के सामने ये सब बोलकर कैसा अजीब सा हो रहा है, उसके मन की स्थिति न जाने क्या होगी? मुझे संभोग किये हुए कितना अरसा हो गया, जब वो थे तो यौनसुख मिलता था पर इतने वर्षों में आज पहली बार अजीब सा महसूस हो रहा है, काश की वो होते, अब अगर ऐसा सोचते हुए योनि की तपिश बढ़ेगी तो मैं क्या करूँगी? सोचूंगी तो मन करेगा ही और सोचना जरूरी है वो भी अनैतिक, अनैतिक संभोग के विषय में आज महात्मा जी ने कैसे बताया कि जो खून के रिश्ते में पिता, भाई या फिर पुत्र के साथ किया गया सम्भोग हो, जो समाज के नियमों के खिलाफ हो, पर उन्होंने स्वयं अपने मुख से कहा कि इसमें परम आनंद होता है, एक पुत्री अपने ही पिता के साथ सम्भोग करेगी तो कैसा लगेगा, एक बहन अपने ही सगे भाई के साथ संभोग करेगी तो कैसा लगेगा और एक माँ...... एक माँ अपने ही सगे पुत्र के साथ .......सम्भभोभोभोभो.....गगगगगग.......आह........ कैसा लगेगा उस वक्त.......उस माँ को अपने ही पुत्र के साथ संभोग करके.....जिसे उसने जन्म दिया है उसी के साथ.........इसमें कैसा अजीब सा नशा है.......ये सब सोचने पर सच में ये सब चीज़ें तन मन पर हावी होती हैं...... . और सच में अजीब सी तपिश होती है.....कितनी अजीब सी सनसनी होती है पूरे बदन में........पर मैं ये अभी क्या क्या सोचने लगी।

ये मैं कल अच्छे से सोचूंगी......एक मां अपने ही पुत्र के साथ...........अनैतिक संभोग।

दोनों माँ बेटी चुपचाप काफी देर लेटे लेटे यही सब सोचती रहती हैं, दोनों को ही ये लगता है कि वो सो गई हैं, अपनी अपनी खाट पर दोनों ही लेटे लेटे सोचते हुए हल्की हल्की उत्तेजना में एक दूसरे का लिहाज करते हुए कसमसाती हैं काफी देर तक यही चलता रहता है फिर दोनों अपने पर काबू करते हुए ताकि योनि न रिसने लगे, सो जाती हैं।
 
अपडेट आ जायेगा भाई, अभी लाइफ में कुछ ऐसा हुआ है जिससे मूड बहुत अपसेट है बहुत ज्यादा, थोड़ा दिल संभलेगा तो जरूर लिखूंगा, नहीं भी संभल पायेगा तो भी लिखूंगा, पर कुछ वक्त दे दो, धोखा मिला है इस दिल को
 
प्रिय पाठकों,

कैसे हो आप सब लोग? उम्मीद करता हूँ सब अच्छे होंगे।

जैसा कि आपलोग जानते ही हैं मेरी दोनो कहानियां काफी दिनों से या यूं कहूँ काफी अरसे से बेजान और निर्जीव सी पड़ी है, इसका कारण बस यही था कि जीवन में कुछ ऐसी उथल पुथल मची हुई थी कि उससे मैं उबर ही नही पा रहा था, काफी हद तक मेरी कहानी लिखने की इच्छा ही शिथिल पड़ गयी थी, क्योंकि कहानी लिखना एक ऐसी कला है कि जब तक आप खुद कहानी के एक एक पल को स्वयं कल्पनाओं में नही जीते हो, आप एक अच्छी कहानी नही लिख सकते, एक अच्छा वार्तालाप नही बना सकते, दिमाग इतना खराब रहता था कि कहानी लिखने की इच्छा ही नही होती थी, पर कहानी को मैं छोड़ नही सकता था और न ही छोडूंगा, मेरी दोनो कहानियाँ पूरी होंगी, प्रिय पाठकों की भावनाओं का उनके उम्मीद का, उनके इंतजार का मैं अवहेलना नही कर सकता, इस फोरम के पाठकों से मुझे बहुत सम्मान, प्यार और उत्साह मिला है, जिसको मैं जीवन भर नही भूल सकता, प्रिय पाठकों बस 2 हफ्ते का इंतजार और कर लीजिए, दिसंबर से कहानी दुबारा शुरू होंगी और खत्म होकर ही दम लेंगी। कहानी मैं अधूरी नही छोड़ सकता, कहानी जल्द ही जरूर पूरी होंगी।

आप सभी लोगों का सहृदय धन्यवाद

आपका S_Kumar
 
Update- 88

दोनों माँ बेटी चुपचाप काफी देर लेटे लेटे यही सब सोचती रहती हैं, दोनों को ही ये लगता है कि वो सो गई हैं, अपनी अपनी खाट पर दोनों ही लेटे लेटे सोचते हुए हल्की हल्की उत्तेजना में एक दूसरे का लिहाज करते हुए कसमसाती हैं काफी देर तक यही चलता रहता है फिर दोनों अपने पर काबू करते हुए ताकि योनि न रिसने लगे, सो जाती हैं।

अब आगे---

अगली सुबह सुलोचना उठी तो पूर्वा बिस्तर पर नही थी, उसने दोनो का बिस्तर समेटा और बगल वाली कोठरी में रखकर जैसे ही रसोई की तरफ गयी तो देखा कि पूर्वा रसोई में नाश्ता तैयार कर रही थी। पूर्वा अपनी अम्मा को देखकर मुस्कुरा दी और बोली- अम्मा उठ गई आप, देखो आज मैंने जल्दी ही रसोई का काम खत्म कर लिया है, आओ चलो नाश्ता तैयार है।

सुलोचना- अरे तूने मुझे उठाया क्यों नही, आज देख कितना काम है। अकेले अकेले ही कर रही है।

पूर्वा- अम्मा मैंने सोचा कि कल आप महात्मा जी के पास गई थी तो थक गई होंगी इसलिए नही उठाया जल्दी। अच्छा चलो जल्दी आप दातुन कर के आओ।

सुलोचना नित्यकर्म करके आयी और पूर्वा ने नाश्ता निकाला, दोनो नाश्ता करने लगी, पूर्वा ने कहा- अम्मा घी तो आधी मेटी ही रखा है और नारियल भी 40- 50 ही होंगे।

सुलोचना- कोई बात नही पुत्री, भस्मीकरण यज्ञ आज रात शुरू करते हैं, एक दो दिन में उदयराज के पास संदेश पहुँचाती हूँ मैं, बिना मेरे पुत्र और पुत्री की मदद के ये कार्य सम्पन्न नही हो पायेगा।

पूर्वा नाश्ता करते हुए अपनी माँ को देखकर मुस्कुराती जा रही थी।

नाश्ता करके दोनो माँ बेटी यज्ञ के लिए सूखी पीपल की लकड़ियां लेने और घने जंगल की तरफ निकल गए।

रास्ते में चलते चलते पूर्वा ने जिज्ञासा से दुबारा अपनी अम्मा से पूछा- अम्मा, क्या ऐसा वास्तव में इस दुनियां में घटित हो रहा है? हो तो रहा ही है...है न, तभी तो ये बुरी आत्मायें ऐसी स्त्री की खोज में हैं जो ऐसा सोचती है और कर चुकी हैं या कर रही हैं। क्या स्त्री ही सोचती है...पुरुष नही?

सुलोचना अचानक पूर्वा के इस तरह के सवाल पर पहले तो थोडा असहज हो गयी फिर कुछ देर चुप रहने के बाद बोली- पाप और पुण्य दोनो का अस्तित्व है पुत्री, पाप है तभी पुण्य है और पुण्य है तभी पाप भी है, जिस तरह रात्रि है तभी सवेरे का अस्तित्व है और फिर पुनः सवेरे के बाद सांझ है फिर रात्रि।

सब ईश्वर ने ही बनाया है, बुद्धि और विवेक भी उसी ने दिया है और वासना और अनैतिक सोच भी एक सीमा के बाद पनपना भी उसी की माया है, माया भी तो ईश्वर की ही बनाई हुई है। अब हमी को देख लो जान मानस की भलाई के लिए ही सही आखिर इस रास्ते से हमे भी तो गुजरना ही है न, बस यही है इंसान बेबस हो जाता है, कभी फ़र्ज़ के हांथों कभी वचन के हांथों कभी नियम और कर्तव्य के हांथों और कभी वासना के हांथों, आखिर इंद्रियां भी कोई चीज़ है पुत्री वो भी ईश्वर के द्वारा ही बनाई हुई हैं, क्या वो इतनी कमजोर हैं कि हर इंसान उनको बड़ी आसानी से जीत लेगा...नही न...अगर ऐसा होता तो हर कोई हिमालय पर बस तपस्या कर रहा होता, ध्यान से सोचो तो सब ईश्वर की बनाई हुई माया है बस, रचा सब ईश्वर ने ही है और इंसान सोचता है कि मैंने किया है।

पर पुत्री मैं चाहती हूं कि इस भस्मीकरण यज्ञ को केवल मैं ही अंजाम दूंगी, तू इसे न कर, इसकी विधि सीधे प्रवाह में नही है।

पूर्वा- पर अम्मा अभी कल ही आप कह रही थी कि मेरे बिना यह कैसे संभव होगा? मैं यह जानती हूं और बखूबी समझती हूं कि आप ऐसा क्यों कह रही हो...पर अम्मा बुरी आत्माओं के बीच आपका अकेले रहना मुझे चिंता में डाल रहा है।

सुलोचना- नही पुत्री इसमे चिंता की कोई बात नही, और ऐसा नही है कि तू बिल्कुल ही मेरे साथ नही रहेगी, बस यज्ञ नही करेगी बाकी तो बाहर रहकर एक प्रहरी की भांति मेरी सुरक्षा तो करेगी ही, बस मैं यही चाहती हूं कि अभी शुरुवात के लिए तू मुख्य कार्य नही करेगी, यह मुझे ही करने दे।

पुर्वा- मेरा मन तो नही है अम्मा की मैं यज्ञ में आपको अकेले बैठने दूँ, पर आपकी इच्छा को मैं टाल नही सकती, मैं अच्छी तरह समझ रही हूं कि आपने मुझे क्यों रोका है पर फिर भी यज्ञ के दौरान कहीं भी आप अकेली महसूस करना तो मैं शामिल हो जाउंगी यह बात मैं आपसे पहले ही कह रही हूं।

सुलोचना ने पुर्वा की तरफ देखा तो पुर्वा ने अपने अम्मा का हाँथ अपने हांथों में लेकर हल्का सा दबाते हुए आस्वासन देने के साथ साथ आज्ञा भी मांगी।

सुलोचना- ठीक है पुत्री...अच्छा चल अब जल्दी जल्दी पीपल की लकड़ियां इकट्ठी कर लेते हैं।

दोनो ने ढेर सारी लकड़ियां इकट्ठी की, उसके दो बड़े बड़े बोझ बनाये और सर पर रखकर अपनी कुटिया की तरह आ गयी, दिन का दूसरा पहर भी ढलने को आ गया था।

सुलोचना- पुर्वा..

पुर्वा- हाँ अम्मा

सुलोचना- पर पुत्री बिना किसी संदेश के, बिना किसी खबर के यह कैसे संभव हो सकता है कि तेरे भैया और रजनी यहां एक दो दिन में आ ही जायेंगे, क्या पता उन्हें आने में वक्त लगे? और अगर हम यहां पर अपना यह भस्मीकरण यज्ञ शुरू करेंगे तो इसके समाप्ति के बाद ही वहां जाकर वहां का यज्ञ सम्पन्न करा पाएंगे। और यहां के यज्ञ की समाप्ति तभी हो पाएगी जब संसाधन और यज्ञ से संबंधित पर्याप्त सामग्री उपलब्ध होगी, अभी तो हमारे पास पर्याप्त सामग्री है भी नही।

पुर्वा- हाँ अम्मा यह बात तो आप सही कह रही हो, हम केवल अनुमान के आधार पर इस यज्ञ को शुरू नही कर सकते पहले पर्याप्त लगने वाली सामग्री को एकत्र करना पड़ेगा, पर इसके लिए तो भैया का होना जरूरी है, और वो जल्द ही तभी आ पाएंगे जब उनतक संदेश पहुचेगा।

सुलोचना- सही कह रही हो बेटी, पर कैसे करें?

पुर्वा- अम्मा, मैं सिद्ध मंत्र के द्वारा ध्यान लगा कर देखती हूँ, क्या पता कुछ रास्ता दिखाई दे।

सुलोचना- ठीक है बेटी तू कोशिश कर..तब तक मैं, यज्ञ वाली कोठरी को यज्ञ के लिए तैयार करती हूं।

सांझ हो चली थी पुर्वा ने वहीं नीम के पेड़ के नीचे आसान लगाया और गंगाजल से आसान को स्वक्छ किया, पीपल का एक पत्ता लेकर उसपर कुछ हवन सामग्री रखकर उसे जला दिया फिर अपने सिद्ध किये हुए मंत्रो को पढ़ने लगी, कुछ वक्त मंत्र पढ़ने के बाद उसने ध्यान लगाया और उसे कुछ दिखाई दिया, उसने झट से आंखे खोली और सुलोचना को पुकारा।

पुर्वा- अम्मा

सुलोचना तुरंत कोठरी से बाहर आई- हाँ बेटी क्या हुआ, कुछ रास्ता समझ आया।

पुर्वा- अम्मा..एक तोता है जो इस घने जंगल से दो बार भैया के गांव की तरफ गया है, वो तोता शैतान की ओर से उड़कर उस गांव की तरफ दो बार गया है।

सुलोचना- शैतान की तरफ से।

पुर्वा- हाँ उसी तरफ से

सुलोचना- हो न हो ये कोई बुरी आत्मा ही होगी, जो रूप बदल सकती है, जो तोते का रूप धारण करके उस तरफ गयी हो।

पुर्वा- अम्मा..तो एक काम करते है न आज रात सबसे पहले इसे ही बांध देते हैं, मारने से पहले इसी से संदेश भेजवा देंगे, बांध के रखेंगे तो जाएगी कहाँ, संदेह कह के जैसे ही आएगी उसी समय भस्म कर देना।

सुलोचना मन में सोचने लगी- पर इसको बुलाने के लिए मुझे पहले अनैतिक संभोग के चिंतन में लीन होना होगा, अनैतिक संभोग के विषय में सोचती हुई स्त्री के मन की इच्छा ये आत्माएं जान लेती हैं तभी तो उस स्त्री के पास योनि का अर्क लेने आती हैं, और ये आत्मायें ये भी जान लेती है कि स्त्री किस पुरुष के विषय में सोचकर काम अग्नि में जल रही है, या कल्पनाओं में उसके साथ संभोगरत होकर आनंदित हो रही है, क्या पता ये वहां जाकर मेरे पुत्र के सामने ये बक दे कि मैं क्या सोच रही हूं, तो उदयराज मेरे बारे में क्या सोचेगा, इन आत्माओं का कोई भरोसा तो है नही...कैसे करूँ।

पुर्वा- क्या सोचने लगी अम्मा? क्या यह तरीका ठीक नही।

सुलोचना- नही पुत्री ठीक है...ऐसा ही करते हैं..मैं कोठरी को तैयार कर रही हूं, आज की रात यज्ञ शुरू करते हैं पहला वार उसी बुरी आत्मा को ढूंढकर करेंगे जो तोता बनकर वहां गयी थी, उसको बांधकर उससे ये काम करने के बाद उसको भस्म कर देंगे, जान छूट जाने की लालच में आकर वो वही करेगी जो हम चाहेंगे। तो बाहर की तैयारी कर मैं अंदर तैयार करती हूं।

(सुलोचना ने कह तो दिया कि तोते को दुबारा गुलाम बना कर संदेश पहुचने भेजेंगे पर वो मन ही मन बेचैन भी थी कि कहीं तोते ने उदयराज के सामने बक दिया कि मैं क्या सोच रही थी, क्या सोचकर मैंने उस बुरी आत्मा को अपनी ओर आकर्षित किया था तो उदयराज..मेरा पुत्र मेरे बारे में क्या सोचेगा...खैर जो भी हो देखा जाएगा)
 
Update- 89

सुलोचना ने भस्मीकरण यज्ञ के लिए कोठरी तैयार कर दी और पुर्वा ने यज्ञ की सारी सामग्री लाकर यज्ञ कुंड के पास रख दिया, रात्रि की बेला गहराती जा रही थी।

सुलोचना ने पुर्वा से कहा- पुत्री अब तू अपने लिए रात का भोजन तैयार कर ले, मैं तो महात्मा द्वारा दिया गया अमृत पेय का सेवन आज का यज्ञ समाप्त करने के बाद ग्रहण करूँगी, पर तू अपने लिए भोजन तैयार करके भोजन कर ले, और भोजन करने के बाद तू कोठरी के बाहर आराम करना, मैं यज्ञ करूँगी।

पुर्वा- ठीक है अम्मा।

पुर्वा अपने लिये भोजन तैयार करने लगी, कुछ ही देर में भोजन तैयार होने के बाद पुर्वा ने भोजन किया और बाहर अपनी खटिया बिछा कर बैठ गयी, रात काफी गहरी होती जा रही थी, जंगल मे छोटे-छोटे कीड़ों के बोलने की आवाज, पत्तों के आपस में रगड़ने से सरसराहट की आवाज रात के सन्नाटे को चीरते हुए आ रही थी, कभी कभी ऐसा लगता कि दूर किसी के चिल्लाने की आवाज आ रही है, कभी ऐसा लगता मानो दूर कहीं बहुत से लोग लड़ाई कर रहे हैं और उनके झगड़ने की आवाज हल्की हल्की सुनाई दे रही है, पर पुर्वा और सुलोचना के लिए ये सब आम बात थी फिर भी आज कुछ ज्यादा ही प्रतिकूल रात थी, ऐसा लग रहा था कि जो सुलोचना आज रात शुरू करने जा रही है वो किसी को अच्छा नही लग रहा था।

पुर्वा ने अपनी खाट पर बैठे बैठे सर घुमा घुमा कर बड़े गौर से चारों तरह देखा, ठंडी हवा से पेड़ों की पत्तियां लगातार हिल रही थी, ऊपर आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे, पुर्वा मुस्कुरा दी और बिस्तर पर लेट गयी, इतनी अंधेरी घने जंगलों की रात, जहां आम इंसान के रोंगट खड़े हो जाएं वहीं बिस्तर पर लेटते हुए पुर्वा बोली- "कितनी हसीन रात है आज की"

तब तक सुलोचना नहा कर आ गयी, उसने काले रंग की साड़ी और काले रंग का ब्लॉउज पहन रखा था, पुर्वा अपनी माँ को ही देखती रह गयी, जब पुर्वा को बड़े गौर से अपनी ओर देखते हुए सुलोचना ने देखा तो बोली- ऐसे क्या देख रही है पुर्वा, अपनी अम्मा को नही देखा क्या कभी...आज पहली बार देख रही है?

पुर्वा- इतनी सुंदरता आपके अंदर छिपी हुई है आज पहली बार देख रही हूं अम्मा, देखो न अंधेरी रात है, खिड़की पर दिया हल्का हल्का जल रहा है, और फिर भी आप पर नज़र ठहर गयी, आप ऐसे ही हरदम रहा करो न अम्मा।

सुलोचना- अच्छा जी...बस कर अब तारीफ मेरी, बूढ़ी हो चली हूँ मैं अब, अब वो दिन गए बेटी की मैं हरदम सज धज के रहूं, अच्छा!... रात्रि का भोजन कर लिया न तूने?

पुर्वा- किसने कहाँ बूढ़ी हो गयी हो अम्मा, बूढ़ी हो आपके दुश्मन....बूढ़ी हों वो बुरी आत्मायें, मेरी अम्मा तो हरदम जवान है। दिन तो आते जाते रहते हैं आप ऐसे ही रहा करो।

सुलोचना- अरे मैं पूछ रही हूं कि भोजन कर लिया तूने?

पुर्वा- पहले आप बोलो की ऐसे ही रहा करोगी न?

सुलोचना- अच्छा ठीक है...जैसा तू कहेगी वैसे ही रहा करूँगी....रात्रि का भोजन कर लिया न तूने?

पुर्वा- हाँ अम्मा कर लिया।

सुलोचना - तो चल ठीक है तू यहीं बाहर बिस्तर पर लेट और मैं यज्ञ शुरू करती हूं।

पुर्वा- मैं लेटूंगी नही अम्मा, मैं भी आसान लगा के बैठूंगी।

सलोचना- ठीक है तू बाहर ही बैठ, मैं अंदर जा रही हूं अब शुरू करने।

सुलोचना आज वास्तव में बहुत खूबसूरत लग रही थी, जब से उसके पति से उसका साथ छूटा और एक नीरस जिंदगी को जीने के लिए वह विवस हुई, लोककल्याण को ही अपना कर्तव्य मानकर पुर्वा के साथ अपना जीवन यापन करते-करते वह सजना संवरना मानो भूल ही गयी थी, आज यज्ञ में बुरी आत्माओं को बुलाने के लिए वह फिर से सजी धजी थी, बहुत अरसे के बाद उसने काली साड़ी पहनी, शृंगार किया, बालों में फूलों का गजरा लगाया।

काले रंग की साड़ी में उसका गोरा गोरा बदन कहर ढा रहा था, एक एक अंग का कसाव, कटाव मन में हलचल पैदा कर रहा था,बड़ी बड़ी गुदाज चूचीयाँ ध्यान खींच रही थी, पहले वो अपने अंगों को ज्यादा से ज्यादा ढककर रखती थी पर आज न जाने क्यों मानो सब अंगों को अपनी मादकता दिखाने के लिए आजाद सा कर दिया हो, बुरी आत्माओं को बुलाने के लिए, अनैतिक संभोग के विषय में सोचने के लिए उसने वेषभूसा सहित सब इस कार्य के प्रतिकूल कर लिया था।

रात्रि के 10 बज चुके थे, पुर्वा बाहर आसान लगा कर मंत्र जाप करने लगी। सुलोचना ने भी कोठरी में अपना आसान लगाने से पहले अपनी साड़ी को ऊपर उठा कर अंदर पहनी हुई काली रंग की छोटी सी कच्छी को जिसने उसके अनमोल खजानों को कस कर चारों तरफ से घेर कर एक आवरण बनाया हुआ था उसको अपने पुत्र के बारे में सोचती हुई निकालने लगी, उसके हृदय की गति एकदम से बढ़ गयी, एक पल के लिए उसने महसूस किया कि एक बेटा अगर अपनी ही सगी माँ की चड्डी को इस तरह निकलेगा तो वो अनुभूति कैसी होगी? ये सोचते ही उसकी हृदय की गति तेज हो गयी और उसने कच्छी को धीरे से घुटनों तक सरकाकर एक बार सीधे पैर को उठाकर फिर दूसरे पैर को उठाकर बड़े ही कामुक तरीके से बाहर पुर्वा की ओर देखते हुए निकाल दी।

कच्छी निकाल कर उसने आसान के नीचे दबा दिया और गंगाजल छिड़क कर यज्ञ कुंड, आसान और आस-पास की जगह को पवित्र करते हुए यज्ञ का आगाज किया, वह आसान पर जैसे ही आलथी-पालथी मार कर बैठी, उसकी मखमली बूर की दोनों फांकें बहुत ही हल्के "पुच्च" की आवाज के साथ बैठने की वजह से थोड़ा सा खुल गयी, गीला-पन आने की वजह से हल्की "पुच्च" की आवाज जब आयी तब सुलोचना को अहसास हुआ कि उसकी चूत हल्का सा पनिया गयी थी, उसने साड़ी में हाँथ डालकर अपनी मध्यमा उंगली से चूत की मोटी-मोटी फांकों को छुआ और बाहर आये हल्के से काम रस को उंगली से उठाकर जब सूँघा तो एक मदहोश करने वाली मूत्र की गंध लिए काम रस की महक ने उसे बेचैन कर दिया, वह सोचने लगी कि माँ-बेटा के बीच अभी थोड़ा सा ही अनैतिक सोचने पर जब इतना आनंद है और ये निगोड़ी रस बहाने लगी, तो जो सगे माँ बेटे इस अनैतिक संभोग को कर चुके होंगे और कर रहे होंगे उन्हें कितना आनंद आता होगा? एकदम ही यह सारी चीज़ें सुलोचना के मन पर हावी होने लगी तो उसने इसे झटक कर खुद को संभाला और कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।

यज्ञ कुंड में पीपल की लकड़ियां लगाई, यज्ञ सामग्री डालकर उसमे घी डाला और मंत्र पढ़ते हुए महात्मा जी नाम लेकर अग्नि प्रज्वलित कर दी, यज्ञ कुंड में अग्नि जलने लगी, काफी देर तक पहले सुलोचना अपने सिद्ध किये हुए मंत्रों का आवाहन करती रही, नारियल उसकी बगल में टोकरी में रखे थे, उसने एक नारियल उठाया और उसे साड़ी के अंदर ले जाकर अपनी बूर के थोड़ा आगे रख लिया, और एक बार फिर महात्मा जी का नाम लेकर कुछ मंत्र पढ़े फिर वह सोचने लगी-

"मुझे संभोग किये हुए कितने दिन हो गए, मन बहुत करता है, पर क्या करूँ बेबस हूँ, अब मुझे कोई पुरुष साथी कहाँ मिलेगा, कितना आनंद आता अगर कोई पुरुष मुझे रात को चोरी चोरी छुप छुप कर चो......द......आह!, पुरुष का लिंग....उसको छूने का....पकड़ने का....सहलाने का मन करता है.....उसकी महक.....कितने बरस बीत गए लिंग को देखे....कितना अच्छा लगता था जब उनका लिंग मेरी योनि में समाता था...(ऐसे सोचते ही सुलोचना की बूर में संकुचन हुआ और उसने अपनी जांघे थोड़ा भींच ली)

लिंग की चमड़ी खोलकर उसके अग्र भाग के छेद को चूमना कितना उत्तेजक होता है, उत्तेजना में फुले हुए उसके चिकने अग्र भाग को मुंह मे लेकर चूसने में कितना आनंद है, पूरे लिंग को धीरे धीरे सहलाना, चाटना, उसे अपने होंठों से प्यार कर-कर के योनि के लिए तैयार करना जैसे कोई माँ अपने बेटे को युद्ध में जाने से पहले तैयार करती है...कितना आनंदमय होता है लिंग को प्यार करना।

काश कोई लिंग मेरे जीवन में पुनः आ जाता, काश कोई मुझे बाहों में भरकर रात भर प्यार करता, काश मेरी योनि को कोई छूता...सहलाता....चूमता...क्यों मेरा जीवन इतना नीरस हो गया है? मेरा क्या दोष है?....क्यों मैं स्वयं को इस सुख से वंचित किये हुए हूँ, कहते हैं लिंग और योनि का कोई रिश्ता नही होता....तो क्या...तो क्या...वह पुरुष जो मेरे सबसे नजदीक है....वह मेरा हो सकता है....मेरे सबसे नजदीक कौन है?....मेरा पुत्र....मेरा पुत्र ही तो मेरे सबसे नजदीक है, एक माँ के लिए उसके जिगर का टुकड़ा उसका बेटा ही होता है, वही उसके सबसे नजदीक होता है, अगर माँ कुछ चाहती है तो क्या उसका बेटा उसे देगा? क्या बेटा भी चाहेगा? क्या वह उसकी वेदना को समझेगा? क्या मेरा उदय....उफ्फ्फ....कैसा होगा मेरे उदय का.....लिं......ग...ग..ग.गगगग....ओह!

(सुलोचना न चाहते हुए भी आज पाप सोचने के लिए विवश थी, आज जीवन में वो पहली बार व्यभिचार के सागर में चिंतन रूपी नाव पर सवार होकर उतरने जा रही थी, उसका बदन कांप गया, एक तो सामने यज्ञ कुंड में अग्नि धधक रही थी वातावरण वैसे ही गरम हो चुका था और सुलोचना अपने अंदर जो अग्नि सुलगा रही थी वो न जाने अब कैसे थमेगी ये नियति के ऊपर ही था, वह पसीने पसीने हो गयी, बार बार आंख बंद करके वो अनैतिक संभोग की कल्पना करती जिससे उसका बदन सनसना जाता, बेचैन होकर वो कभी इधर उधर देखने लगी, एकाध बार तो उसने चुपके से बाहर देखते हुए अपनी दायीं चूची को खुद ही मसल लिया, जांघों को रह रह कर सिकोड़ लेती, कभी लजा जाती, शर्माकर आँख बंद कर लेती, रह रह कर चुदाई की कल्पना से मन सिरह उठता, आखिर चुदाई का सुख लिए बरसों बीत चुके थे, सांसों की धौकनी बन जाना लाज़मी था)

आखिर खुलकर रिसने ही लगी उसकी निगोड़ी बूररर

एक बार धीरे से उसके मुंह से निकला... "उदय....मेरे पुत्र.....

कैसा महसूस होगा जब उदय मेरा बेटा मुझे छुएगा, मेरी प्रतिकिया क्या होगी?

आंख बंद करती तो कल्पना में मानो उदयराज उसे पीछे से बाहों में भरकर मेरी "माँ" बोलते हुए गालों को चूम रहा होता (सुलोचना सिरह जाती, आंख खोल कर इधर उधर देखती, उत्तेजना में गला सूख गया था...पर न जाने क्यों अच्छा भी लग रहा था, हल्का सा मुस्कुरा भी देती...फिर आंख बंद करती)

छोटे छोटे कल्पना में उत्तेजक दृश्य उसकी आँखों में ऐसे आ जाते जैसे वह घटित ही हो रहे हैं

मुँह से उसके सिसकारी निकल गयी, बस इस कल्पना मात्र से की, रात के घनघोर अंधेरे में बाहर नीम के पेड़ के नीचे खटिया पर वो धीरे-धीरे लेटती गयी, जैसे जैसे वो लेटती गयी उदयराज प्यार से उसे चूमते हुए उसपर चढ़ता गया, "आह माँ और हाय मेरा बेटा" की सिसकी के साथ दोनो लिपट गए और उदय का कठोर लंड सुलोचना की चूत को फैलाता हुआ चूत में घुसता चला गया। एक बेटे का लन्ड माँ की प्यासी गीली चूत में डूब गया। एक माँ की प्यासी चूत उसी के बेटे के लन्ड से भर गई।

सुलोचना पसीने पसीने हो गयी, कुछ पल के लिए उसने खुद को संभाला, बूर अब चिपचिपी हो गयी, भारी मन से उसने दुबारा मन्त्र पढ़ना शुरू किया।
 
Update- 90

मंत्र पढ़ते हुए अभी कुछ ही वक्त हुए थे, बाहर तेज हवाओं का रुख बार बार बदल जा रहा था, कुछ ही देर में झोपड़ी के ऊपर जहां सुलोचना यज्ञ कर रही थी कुछ बुरी आत्मायें मंडराने लगी, सुलोचना को उनके आगमन का आभास हो गया, पुर्वा ने भी एक नजर उन्हें देखा फिर जाप करने लगी, इन आत्माओं में वो आत्मा नही थी जो तोता बनकर विक्रमपुर गयी थी।

जैसे ही आत्मायें झोपड़ी में घुसी, दरवाजे पर लटका नींबू एकदम लाल हो गया, उन बुरी आत्माओं को पहले तो जरा भी आभास नहीं था कि वो कहाँ फंस गई अब वो वापिस नही जा सकती, मन्त्र सिद्ध किया हुआ नींबू उन्हें अंदर तो आने दे सकता था पर बिना सुलोचना की आज्ञा के अब वो बाहर नही जा सकती थी, वो झोपड़ी में यज्ञ कुंड को देखकर घबरा गई, तेज तेज चिल्लाती और, तरह तरह के डरावने चेहरे बनाती हुई सुलोचना और यज्ञ कुंड के चारों ओर घूमने लगी, सुलोचना को डराने की कोशिश करने लगी, सुलोचना की बूर की महकती खुशबू उन्हें आकर्षित कर रही थी।

एक तरफ यज्ञ कुंड में जल रही अग्नि और सुलोचना के मुख से निकल रहे मंत्र, दूसरी तरफ पाप की खुशबू उन्हें भ्रमित कर रही थी, वह बुरी आत्मायें जो बूर का अर्क लेने आयी थी यह सोचकर भ्रमित हो गयी कि एक तरफ मंत्र और अग्नि और दूसरी तरफ उसी स्त्री में पाप रस की खुशबू, योगिनी के अंदर भोगिनी, यह कैसे संभव है? वह भ्रमित थी कि कहीं और तो नही आ गयी पर सुलोचना की बूर की खुशबू उन्हें अपनी तरफ खींच रही थी, बिना बूर का रस लिए वो जाना नही चाहती थी, पर उन्हें ये नही पता था कि वापस तो अब वो जा ही नही सकती।

वह डरी हुई थी पर बनावटी निडरता दिखाते हुए जोर जोर से चीख चीख कर यज्ञ कुंड और सुलोचना के चारों तरफ चक्कर लगाने लगी। इतने भयानक चेहरे बनाती की आम इंसान देख ले तो वैसे ही मर जाये, कभी वो झोपड़ी की छप्पर से जा चिपकती तो कभी हाहाकार करती हुई सुलोचना के ठीक सामने आकर चीखने लगती और तरह तरह की डरावनी आकृतियां बनाती, खुद डरी हुई होने के बावजूद वो सुलोचना को डराने का भरकस प्रयास कर रही थी।

सुलोचना ने धीरे से आंख खोला और बगल में रखी सुपारी को मंत्र पढ़ते हुए अग्नि में डाल दिया, थोड़ा घी और डाला, फिर उसने आंख बंद की, अग्नि और भड़क उठी।

झोपडी में घी और हवन सामग्री की महक चारों तरफ फैली हुई थी, खिड़कियों और छप्पर के छोटे छोटे छेदों से हवन का धुआँ निकलकर बाहर के वातावरण में फैलने लगा।

सुलोचना ने मुस्कुराते हुए आँखे बंद की और एक बार फिर वासना के समंदर में उतरने लगी, कल्पना की दुनियां में उनसे देखा कि वह बाहर खटिया पर लेटी है, अंधेरी काली रात है, कुटिया के अंदर दिया जल रहा है जिसकी हल्की हल्की रोशनी बाहर आ रही है, खटिया पर लेटे लेटे वह झोपड़ी के दरवाजे की तरफ देखते हुए अंगड़ाई लेती है, तभी उदयराज झोपड़ी से निकलकर बाहर आता है बदन पर सिर्फ एक सफेद धोती पहने वह सुलोचना के पास आता है, उसके चेहरे पर झुककर उसको बड़े ध्यान से देखता है, वो भी उदयराज को बड़े ध्यान से देखती है, दोनो एक दूसरे के चेहरे को बड़े गौर से देखते है, फिर आंखों में देखने लगते हैं, कुछ देर एक दूसरे की आँखों में देखने के बाद उदयराज धीरे से कहता है- माँ

सुलोचना- मेरा बेटा

उदय जैसे ही सुलोचना के प्यासे होंठों को चूमने के लिए उसपर थोड़ा झुकता है, सुलोचना शर्म से अपना चेहरा दोनो हांथों से ढक लेती है।

उदय सुलोचना के कान के पास होंठ ले जाकर धीरे से कहता है- माँ... अपने रसीले होंठ चूमने दे न।

सुलोचना सिसक उठती है, फिर धीरे से बोलती है- क्या? रसीले होंठ, माँ के होंठ तुझे रसीले लगते हैं....धत्त

उदय- छूने दे न माँ... चूम लेने दे न...बहुत नशीले हैं ये होंठ।

सुलोचना- नशीले होंठ.....गन्दे....नही....बिल्कुल नही...

उदय- माँ... ओ मेरी प्यारी माँ.... कर लेने दे न मुझे तेरे साथ अपने मन की...छू लेने दे न इन होंठों को....तुझे भी मजा आएगा।

सुलोचना ने अपने चेहरे को ढके हुए मुस्कुराकर करवट बदल ली - नही मेरे बेटे....पाप है ये....महापाप...अपने ही बेटे के साथ...कैसे?

उदय ने सुलोचना को प्यार से फिर अपनी तरफ पलटा और चेहरे से हाँथ हटाता हुआ उसके गालों को चूम लिया और बोला- ऐसे (फिर दूसरा चुम्बन कान के बगल गर्दन पर लिया और सुलोचना सिसक पड़ी)

उदय- मजा आया न माँ

सुलोचना - गंदे....अपनी माँ के साथ गन्दा काम करेगा।

(और फिर से अपने चेहरे को ढकते हुए करवट लेकर लेट गयी)

उदय ने ब्लॉउज में से दिख रही सुलोचना की नग्न गोरी गोरी पीठ को कई जगह चूम लिया, सुलोचना का बदन थरथराया गया, हल्की हल्की सिसकी उसके मुँह से निकल गयी।

उदय- एक बेटा गन्दा काम तो अपनी माँ के साथ ही कर सकता है न माँ

सुलोचना मुस्कुरा दी, उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया, उदय ने उसे फिर अपनी तरफ पलटा और धीरे से बोला- बोल न माँ... मुझे तेरे साथ गन्दा काम करने देगी?

सुलोचना फिर सिसक गयी, उदय ने फिर गालों को चूम लिया, दोनो एक दूसरे की आंखों में देखने लगे।

उदय- बोल न माँ... मेरी प्यारी माँ

सुलोचना धीरे से- किसी को पता चल गया तो? यह महापाप करते हुए?

उदय- कैसे पता चलेगा माँ... न तुम बताओगी? न मैं।

उदय ने फिर सुलोचना के गालों को चूम लिया और वो फिर से हल्की से सिसकी।

उदय- माँ

सुलोचना- हूँ

उदय- तेरी योनि देखने का मन करता है?

सुलोचना- धत्त...गंदे...बदमाश

सुलोचना फिर से शर्म से बेहाल हो जाती है।

उदय- सच माँ... बहुत मन करता है तेरी प्यारी सी बूर देखने का, यह सच है कि बेटा अपनी माँ की बूर को देखना चाहता है, उसके मन मे ये इच्छा होती है कि उसकी माँ की बूर कैसी होगी?...दोनों फांकें कैसी होंगी?...फांकों के बीच की दरार कितनी लंबी और रसीली होगी?..... उसकी महक कैसी होगी?....माँ की बूर की गंध कैसी होगी?....भगनासा कैसा होगा?...बूर छोटी सी होगी या बड़ी सी, जब वो नंगी होकर दोनो पैर सीधे करके उसके सामने लेटेगी तो उसकी बूर कैसी दिखती होगी, एक बेटा अपनी माँ की बूर को देखना चाहता है चूमना चाहता है...मुझे दिखाओगी न अपनी बूर...माँ?

सुलोचना उदयराज से बुरी तरह लिपट जाती है, कुछ नही बोलती, शर्म से वह लाल हो चुकी थी, बूर शब्द उदय के मुंह से सुनते ही वह बेसुध हो जाती है, योनि, बूर, फांकें, ये सब शब्द सुने बरसों बीत गए थे,उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थी, मोटी मोटी चूचीयाँ उदय के सीने से दब गई थी।

उदय फिर धीरे से सुलोचना के कान में - माँ... मुझे अपनी बूर पेलने दोगी...चोदने दोगी मुझे, बहुत मन करता है बूर छूने का?

सुलोचना बदहवास ही उदय से लिपट जाती है काफी देर तक उससे लिपटी रहती है फिर सिसकते हुए धीरे से बोलती है- हाँ... हाँ....मेरे बेटे.....करने दूंगी।

और ख्यालों में इतना सोचते ही सुलोचना की आंखें खुल जाती है, उसके बदन में बहुत उत्तेजना हो रही थी, बूर उसकी बहुत पनिया गयी, उससे अब बर्दाश्त नही हो पाया और वह आंखें खोल कल्पना की दुनियाँ से बाहर आ गयी

देखा तो सारी आत्माएं चारों तरफ चीखते चिल्लाते हुए उसके चारों ओर घूम रही थी, उसमे से एक एकदम उसके सामने आके चिल्लाते हुए बोली- मजा आया...कितना आनंद है न पाप में?

और जैसे ही सुलोचना की योनि की तरफ लपकी योनि के ठीक सामने रखे नारियल में जा घुसी, वो नारियल भी सिद्ध मंत्र से तैयार किया हुआ था जैसे ही वह आत्मा उसमे घुसी उसके पीछे सारी आत्माएं एक एक करके बूर का अर्क छूने के लिए बड़ी तेजी से आगे बढ़ी और सब की सब नारियल में जा फंसी, बहुत तेज चीखने की आवाज हुई, सुलोचना ने वो नारियल साड़ी के अंदर से निकाला और बगल में रखे काले धागे से उसे बांधते हुए, मंत्र पढ़ा और महात्मा जी का नाम लेकर यज्ञ कुंड की धधकती अग्नि में डाल दिया, बुरी आत्माओं के भस्म होने के दौरान मानो चीखने की आवाज पूरे जंगल में गूंज गयी हो, अब तक आयी हुई सारी आत्मओं का एक ही नारियल में भस्मीकरण हो गया, अपनी उत्तेजना को सुलोचना ने काबू किया, दरवाजे पर लटका नीबू जो पूरा लाल हो गया था एक बार फिर अपने वास्तविक रंग में आ गया।
 
Update- 91

कुछ बुरी आत्माओं के भस्म हो जाने पर जो आवाज जंगल में गूंजी, उसे जंगल के शैतान ने भी सुनी और दूसरी बुरी आत्माओं का ध्यान कुटिया की ओर आकर्षित हुआ जिसमे वह आत्मा भी थी जो तोता बनकर रजनी के पास गई थी, शैतान को महात्मा ने यह छूट दी थी कि वह रजनी और उदयराज की मुसीबतों से रक्षा करेगा इसके लिए वह रजनी के गांव तक विचरण कर सकता है, महात्मा ने अपनी शक्ति से उसके बंधन को थोड़ा खोल दिया था, पर जब वह खुद ही अपनी शीघ्र मुक्ति के लिए नारी जाति के लिए मुसीबत बनने जा रहा था तो महात्मा ने उसे पुनः एक ही स्थान पर बांध दिया।

शैतान को इतनी आसानी से भस्म नही किया जा सकता था और उसे भस्म करने की जरूरत भी नही थी क्योंकि वह तो स्वयं ही एक पेड़ से एक जगह बंधा हुआ था, सारी बड़ी मुसीबत ये बुरी आत्माएँ थी उनको भस्म करना बहुत जरूरी था क्योंकि यही उस शैतान को भड़का रही थी और हर जगह भ्रमण कर रही थी, इसलिए ही सुलोचना को यह कार्य महात्मा ने सौंपा था जिसे वह सुचारू रूप से कर रही थी।

कुछ और बुरी आत्मायें जब झोपड़ी की ओर आकर्षित होकर आने लगी तो पुर्वा ने अपनी मन्त्र शक्ति से उस आत्मा को देख लिया जो तोता बनकर रजनी के पास दो बार जा चुकी थी।

पुर्वा उठकर झोपड़ी की तरफ दौड़ी और दरवाजे पर आकर बोली- अम्मा, अब की बार और भी आत्मायें आ रही है उसमें वो आत्मा भी है जो तोता बनकर गयी थी, आप संभाल लोगी या मैं भी आऊं?

सुलोचना- सारी एक साथ भी आ जाएंगी तो भी कुछ नही बिगाड़ सकती पुत्री, तू चिंता मत कर जा आराम कर ले मैं करती हूं नाश सबका, आने दे।

पुर्वा- पर अम्मा उसको मत मारना जो तोता बनी थी, उसको कैद कर लेना, उसको भेजना है न भैया के गांव।

सुलोचना- ठीक है बेटी तू अपने स्थान पर जाकर बैठ, उसको पकड़कर भेजती हूँ मैं, यहां झोपड़ी में बहुत गर्मी हो गयी है अग्नि की वजह से, तू जा बाहर बैठ।

पुर्वा- ठीक है अम्मा।

जैसे पुर्वा अपने स्थान पर बैठी वो सारी आत्मायें हाहाकार करती हुई झोपड़ी के ऊपर मंडराने लगी, पुर्वा ने उन्हें देखा और मुस्कुराकर फिर से मंत्र पढ़ने लगी।

पुर्वा भले ही बाहर बैठी थी पर वो जो मंत्र पढ़ रही थी वो मन्त्र सुलोचना द्ववारा पढ़े जा रहे मंत्र में सहायक था, उस मन्त्र से सुलोचना के मंत्र को और अधिक बल मिल रहा था, पुर्वा अपने काम में लग गयी।

आत्माएँ झोपड़ी के ऊपर मंडरा रही थी उन्हें योनि का रस महक रहा था, जैसे ही वो बुरी आत्माएँ झोपडी में घुसी, द्वार पर लगा निम्बू एकदम लाल हो गया। तेज तेज डरावनी आवाज़ें निकालकर चिल्लाने लगी, मानो अभी उठा ले जाएंगी सुलोचना को, मानो वो कोई असहाय नारी हो, उन्हें पता ही नही था कि कहां फंस गई हैं वो, पर जैसे ही उन्होंने अंदर घुसते ही अग्नि कुंड को देखा, असमंजस में पड़ गयी और दिखावटी डरावना चेहरा बना बना कर सुलोचना को डराने की कोशिश करने लगी।

उसमे से भी कुछ एक अत्यंत ही दुष्ट आत्मा जैसे ही साड़ी के अंदर लपकी,योनि के ठीक सामने रखे नारियल में जा घुसी, उसके पीछे पीछे एक दम से सारी आत्मायें साड़ी के अंदर बड़े ही वेग से लपकी पर सुलोचना ने उस आत्मा को पकड़कर बगल में रखे छोटे से सुपारी में कैद कर दिया, बाकी सब को नारियल में जाने दिया, नारियल को काले धागे से बांधा और मंत्र पढ़कर महात्मा जी का नाम लेते हुए अग्नि कुंड में डाल दिया, एक बार फिर बहुत तेज चीखने की आवाज हुई और नारियल के अंदर फंसी सारी आत्माएँ जलकर भस्म हो गयी, यह सारा वाक्या वह आत्मा देख रही थी जो सुपारी में बांधी गयी थी, वह बुरी तरह डर गई, सुलोचना ने उस सुपारी को हथेली पर रखा तो वो चिल्ला चिल्ला कर बहुत डरावनी आवाज में बोलने लगी- मुझे जाने दे!....मुझे जाने दे...मुझे छोड़ दे....नही आउंगी मैं यहाँ... मुझे छोड़ दे।

सुलोचना- तुझे जाने देने के लिए थोड़ी पकड़ा मैंने, देख तेरा भी यही हाल होगा जो इन सबका हुआ। पहले बता तोता क्यों बनी थी और विक्रमपुर क्यों गयी थी? बता जल्दी?

(सुलोचना और पुर्वा को यह नही पता था कि वह बुरी आत्मा तोता बनकर विक्रमपुर करने क्या गयी थी)

बुरी आत्मा- ये मैं तुझे नही बता सकती, मैं वचन बद्ध हूँ।

सुलोचना- कैसा वचन? किसको वचन दिया है तूने की तू किसी को नही बता सकती?

बुरी आत्मा- मनुष्य जाति को मैं यह नही बता सकती और यह वचन शैतान को दिया है, मैं उसके प्रति वचन बद्ध हूँ। अगर मैं वचन तोड़ती हूँ तो बहुत सारी मानव स्त्री की मत्यु निश्चित है?

(दरअसल सुलोचना और पुर्वा को यह नही पता था कि वो आत्मा विक्रमपुर रजनी की बूर का रस लेने दो बार गयी थी जैसे कि वह आज रात यहां आयी है, वो दोनों बस यहां तक जान पाई थी की वो आत्मा विक्रमपुर गयी थी, वह आत्मा किसी मनुष्य को यह न बताने के लिए वचन बद्ध थी कि वह आखिर कर क्या रही हैं, और विक्रमपुर क्यों गयी थी, अगर वह यह बता देती की वह रजनी के पाप कर्म से निकली योनि का रस लेकर आ चुकी है तो सुलोचना यह जान जाती की रजनी अपने पिता के साथ पाप कर चुकी है और उन दोनों का राज पुर्वा और सुलोचना के सामने आ जाता, नियति ने यहां बहुत सोच समझ कर खेल खेला था।)

(आम स्त्री को यह पता ही नही चलता था जब वह पाप कर्म के बारे में सोचती थी या करती थी तो ये आत्मायें उनकी योनि से योनिरस ये लेती थी, क्योंकि आत्मा वायु रूप (सूक्ष्म रूप) में होती हैं तो आम स्त्री को इसकी भनक तक नही लगती। इस आत्मा ने रजनी को रिझाने के लिए एक सुंदर तोते का रूप लेकर खुद को सूक्ष्म रूप से भौतिक देह रूप में लाकर बहुत बड़ी गलती कर दी थी, इसी वजह से वो नज़रों में आ गयी, अगर इस आत्मा ने ऐसा न किया होता तो पुर्वा इसे इतनी जल्दी नही ढूंढ पाती।)

सुलोचना- अच्छा तो तू नही बताएगी की विक्रमपुर क्यों गयी थी?

बुरी आत्मा- मैं नही बता सकती, मैं वचन बद्ध हूँ।

सुलोचना- तो तू यहां क्या करने आई थी।

बुरी आत्मा- इतना तो मैं अब जान गई हूं कि तू जानती है कि मैं यहां क्या करने आई थी?

सुलोचना- क्यों कर रही हो तुम लोग ये सब?

बुरी आत्मा- यह मैं नही बता सकती।

सुलोचना- कहीं तू विक्रमपुर भी तो यही करने नही गयी थी....बता जल्दी?

बुरी आत्मा- नही

(बुरी आत्मा ने यहाँ झूठ बोला)

सुलोचना- देख डायन...तुम सबको तो मैं ऐसे ही भस्म कर दूंगी जैसे अभी तेरे सामने उन सबको किया, अपने मंसूबे में तुम लोग कभी सफल नही हो सकती, इसलिए देख बता कि आखिर तुम लोग क्या कर रहे हो?, क्यों कर रहे हो? और तू विक्रमपुर क्यों गयी थी?

बुरी आत्मा हाहाकार करते हुए- अगर मैं अपना वचन तोड़कर तुझे बता दूंगी तो वो सारी स्त्री तुरंत मारी जाएंगी, जिनका अर्क इकट्ठा हो चुका है।

सुलोचना- अच्छा तो ये बात है। तो मरने के लिए तैयार हो जा।

बुरी आत्मा के चेहरे पर डर साफ झलकने लगा- नही नही मुझे मत मारो...मुझे जाने दो...मुझे छोड़ दो।

सुलोचना- एक काम करना है तुझे मेरे लिए।

बुरी आत्मा- क्या काम।

सुलोचना- विक्रमपुर जा और वहां उदयराज के घर के ऊपर पुर्वा... सुलोचना....पुर्वा.... सुलोचना का नाम बोलकर आ, सिर्फ यही बोलना है अभी तुरंत जा और सुबह 4 बजे से पहले पहले वापिस आ।

बुरी आत्मा- फिर मुझे नही मरोगी?

सुलोचना- सही से काम करके आएगी तो कुछ दिन और पृथ्वी लोक पर रह लेगी....अब जल्दी जा।

सुलोचना ने एक मंत्र पढ़ा और उस आत्मा को विक्रमपुर के गांव की सीध तक बांध दिया ताकि वह इधर उधर न जा पाए, सुपारी में से आजाद कर छोड़ दिया, निम्बू अभी भी हल्का सा लाल था क्योंकि सभी कैद आत्माओं में से एक आत्मा अभी भस्मीकरण से बच गयी थी

वो आत्मा झट से झोपड़ी से निकल विक्रमपुर की ओर उड़ चली।

रात के 2 बज रहे थे जैसे वह आत्मा विक्रमपुर रजनी के गांव पहुंची उसने देखा कि काकी बाहर नीम के पेड़ के नीचे एक छोटी सी बच्ची को लेकर सो रही थी, वह नीम के पेड़ पर थोड़ा रुकी फिर घर की तरफ गयी, घनी अंधेरी रात में वह घर के आंगन की मुंडेर पर जा बैठी और जैसे ही उसने आंगन में देखा वह खुश हो गयी, आंगन के अंदर के दृश्य देखकर एक पल के लिए वह ये भूल गयी कि करने क्या आयी थी।
 
Update- 92

आँगन में एक तरफ जहां गुसलखाना था ठीक उसके सामने एक चौकी थी चौकी पर दो बाल्टी रखी थी जिसमे से एक पानी से पूरी भरी थी और दूसरी खाली थी, भरी बाल्टी में एक लोटा तैर रहा था, पास में ही कुछ बर्तन रखे थे, जिन्हें रजनी ने आज रात धोया नही था, ठीक उन बर्तनों के समीप दीवार के सहारे रजनी खड़ी थी उसके दूधिया बदन पर मात्र पेटीकॉट (साया) और ब्रा रह गयी थी, पैंटी उदय ने घुटनों तक खींच कर नीचे सरका रखी थी, रजनी दीवार का सहारा लेकर ऐसे खड़ी थी मानो दीवार हट जाए तो वो तुरंत गिर पड़ेगी, दोनो मोटी मोटी जांघे उसकी थोड़ी फैली हुई थी, और केले के तने के समान मोटी मोटी जांघों के बीच पावरोटी की तरह उत्तेजना में फूली हुई उसकी बूर महक रही थी।

अंधेरी रात थी और खिड़की पर एक छोटा सा दिया जल रहा था और ये दिया रजनी ने रात के 2 बजे जानबूझ कर जलाया था ताकि व्यभिचार में मगन दो बदन को आसानी से देखा जा सके।

मोटी मोटी दोनो चूचीयाँ उत्तेजना में ब्रा के अंदर और फूलकर किसी गोल गोल गुब्बारे का रूप ले चुकी थी। रजनी ने अपने बाएं हाँथ से आगे की तरफ से साये को कमर तक उठाकर मोड़कर पकड़ रखा था और दूसरे हाँथ से अपनी रसीली पावरोटी जैसी बूर की दोनो फांकों को हल्का सा खोलते हुए धीरे से बोली- "बाबू अब रगड़िये न अपने उससे यहां पर, पेशाब आने वाला है मुझे।"

उदयराज ने झट से अपनी धोती खोली और अपना विशाल फुंकारता हुआ काला लंड बाहर निकाला, उसे देखते ही रजनी ने एक पल के लिए अपनी बूर को छोड़कर अपने बाबू के दहकते लंड पर हाँथ फेरा और कराह उठी, उसकी चमड़ी को उसने सिसकते हुए खोला और फिर बंद किया, फिर खोला और फिर हल्का सा बन्द किया, लंड लोहे की तरह सख्त होकर ठुनकने लगा, उदय ने अपनी पूरी धोती खोल दी, और एक हाँथ से अपनी बिटिया की महकती फूली हुई बूर को हल्का हल्का सहलाने लगा, फिर हाँथ को नाक तक ले जाकर धीरे से सूँघा और अपनी सगी बेटी की बूर की मदहोश कर देने वाली गन्ध को सूंघकर उसकी आह निकल गयी, रजनी अपने बाबू को देखकर शर्मा गयी

रजनी- आआआआहहहहहह...बाबू रगड़िये न बूर के मुँह पर पेशाब आने वाला है मेरा...खेलिये न वही खेल...मैं मूतूँगी आप इसे रगड़िये बूर की दरार में।

(इतना कहकर रजनी ने सिसकते हुए अपने सगे बाबू के लंड की चमड़ी को पूरा नीचे की तरफ खींचते हुए सुपाड़ा खोल दिया, छोटे गेंद की भांति फुले हुए चिकने सुपाड़े पर वो बड़ी मादकता से अपना अंगूठा रगड़ने लगी और मारे उत्तेजना के उदय का लंड रह रहकर ठुनकने लगा)

उदयराज रजनी की फूली हुई गोरी गोरी बूर को सहलाये जा रहा था, एक बार उसने अच्छे से अपनी बिटिया की मस्त मोटी मोटी जांघों को सहलाया और फिर से बूर की फांकों को तर्जनी और मध्यमा उंगली से हल्का सा खोलकर जैसे ही हल्का सा अपनी गांड को आगे किया रजनी ने कराहते हुए अपने बाबू के लंड को पकड़कर उसका सुपाड़ा अपनी बूर की फांकों के बीच बैठा दिया, दोनो का बदन मस्ती में गनगना गया।

उदयराज- आआआहहह मेरी बिटिया...कितनी नरम है तेरी बूरररररर....आह....अब मूत... बहुत धीरे धीरे धार छोड़ना....हाय मेरी रानी...मेरी बेटी।

रजनी उत्तेजना में अपने बाबू से लिपट गयी, अपने बाबू के गालों को शर्माते हुए चूमने लगी, फिर धीरे से उसने पेशाब की थोड़ी सी धार छोड़ी और गरम गरम अपनी सगी बेटी के पेशाब की धार जब उदयराज को अपने चिकने सुपाड़े पर पड़ी तो दोनों ही सिसक पड़े, मस्ती की तरंगें पूरे बदन में सनसनी की तरह फैल गयी। थोड़ा सा मूतकर रजनी हल्का सा रुकी, रजनी का गरम गरम पेशाब दोनो बाप बेटी की जांघों से बहता हुआ नीचे आने लगा।

उदय- हाय मेरी रसीली बिटिया...और मूत न...मूत के भिगा दे अपने बाबू का लंड अपने मूत से।

रजनी शर्म से बेहाल भी होती जा रही थी और उत्तेजना में अपने गाल अपने बाबू के गाल से रगड़ भी जा रही थी, रह रहकर उत्तेजना में उसका बदन थरथरा जाता, दरअसल उदयराज का मूसल जैसा लंड उसकी बूर के भग्नासे से भिड़ा हुआ था, बूर की दोनो फांक अच्छे से फैली हुई थी और लंड का सुपाड़ा धीरे धीरे दोनो फांकों के बीच रगड़ रहा था जिससे रजनी मस्ती में थरथरा जा रही थी। अगर उदय हल्का सा और लंड को थोड़ा नीचे करके पेलता तो लन्ड एक ही बार में रजनी की बूर में घुसता हुआ बच्चेदानी से जा टकराता, पर खेल ये था कि उदय अपना मोटा सुपाड़ा अपनी बिटिया की बूर की फांकों में रगड़ेगा और रजनी धीरे धीरे मूतेगी। इसके लिए रजनी ने कुछ देर पहले डेढ़ लोटा पानी पिया था।

रजनी ने एक बार फिर धीरे धीरे पेशाब करना शुरू किया, पेशाब की गर्म गर्म धार फिर से बूर से निकलकर उदय के पूरे लंड को भिगोते हुए दोनों की जांघों से होकर नीचे को बहने लगी, दोनो फिर सिसकने लगे, उदय और रजनी दोनो ही हौले हौले अपनी अपनी गांड हिलाने लगे, उत्तेजना इतनी थी कि उत्तेजना में रजनी से ठीक से मूता भी नही जा रहा था जबकि उसको पेशाब तेजी से लगी थी पर उत्तेजना में मूत्र त्याग जल्दी से नही होता, और यही मजा था, रजनी ने अपने साये को छोड़ दिया और वह चौकी पर जा गिरा, वह बुरी तरह अपने बाबू के गले मे दोनो बाहें डालते हुए लिपट गयी। अब वह दीवार के सहारे कम और अपने बाबू पर पूरी तरह लदी हुई थी, उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि कोई चिकना खूंटा उसकी बूर को दो भाग में बांट देगा।

उदयराज मस्ती में अपनी बेटी की मांसल चौड़ी गांड को दोनो हथेलियों में भरकर मसलने लगा, रजनी और सिसकने लगी, कभी कभी वह अपनी हथेली से रजनी के गोरे गुदाज भारी भरकम नितम्ब के दोनों पाटों को अच्छे से और चौड़ा करके फाड़ता और बड़े प्यार से उसके गांड के गुलाबी चिकने छेद को अपनी उंगलियों से छेड़ता और सहलाता तो रजनी "आआआआ हहहहहहह....बाबू बस...धीरे से" कहकर उनके गालों को शर्माकर चूम लेती।

उदय- मूत न बिटिया रानी।

रजनी ने फिर तेजी से पेशाब की धार छोड़ी और दोनों हल्का हल्का एक दूसरे को चोदने लगे, पर रजनी उत्तेजना में सनसना गयी और उसका मूत फिर एक बार रुक गया।

उदय- मूत न बेटी....थोड़ी देर तक धार छोड़।

रजनी ने उत्तेजना को काबू करने की कोशिश की और पेशाब पर अपना ध्यान लगा कर मूतने लगी, उसने एक तेज धार छोड़ी और कुछ देर तक सससर्रर्रर्रर्रर्रर्ररररररर की आवाज करते हुए मूतने लगी, उदय ने उत्तेजना में रजनी के गर्दन और गालों, होंठों पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी, गर्म गर्म सगी बेटी का पेशाब काफी देर तक बूर की दोनो फांकों से निकलकर पिता के लंबे काले मोटे लंड को भिगाता हुआ दोनो की जांघों से होता हुआ चौकी पर गिरने लगा।

काफी देर तक मूतने के बाद रजनी और कस के अपने बाबू से शर्माते हुए लिपट गयी, उदय ने उसके चेहरे को सामने किया और उसके रसभरे होंठों को अपने होंठों में भरकर चूमने लगा।

उत्तेजना से लंड और बूर का बुरा हाल था, आँगन की मुंडेर पर बैठी बुरी आत्मा सगे बाप-बेटी के पाप और व्यभिचार को देखकर मगन हो गयी।

जब पेशाब की आखिरी बूंद तक रजनी की बूर से निकलकर उसके बाबू के लंड को भिगा दी तो उदय ने रजनी को अपनी दोनों बाहों में उठा लिया और रजनी एक मादक अंगड़ाई लेते हुए मचल उठी, उदय पूरा नग्न था उसका काला लंड स्वछंद रूप से इधर उधर लहरा रहा था बेसब्री से अपनी सगी बेटी की मखमली बूर में जाने के लिए व्याकुल हो रहा था।

रजनी को बाहों में लिए वह चौकी से चलकर आँगन के बीचों बीच रखी एक छोटी सी खटिया पर आया जिसपर एक चादर बिछी हुई थी, ठीक उसी के सामने खिड़की पर छोटा सा दिया जल रहा था।
 
Update- 93

उदय रजनी को बाहों में उठाये खटिया तक आया और बड़े प्यार से उसे खटिया पर लिटा दिया, लेटते ही रजनी की नज़र अपने बाबू के काले फंफनाते हुए लंड पर गयी, रजनी ने लेटे लेटे सिसकते हुए दोनो बाहें अपने बाबू की ओर फैला दी, उदय अपनी बेटी पर चढ़ गया।

रजनी- ओओओहहहह.....मेरे बाबू....आआ आहहहह..अम्मममा

रजनी के ऊपर लेटते ही उदय का खड़ा लन्ड

उसकी बूर की फांकों से जा टकराया। रजनी ने अपने पिता को अपने आगोश में भर लिया।

अपनी सगी बेटी के नंगे बदन को बाहों में भरने पर मिलने वाले मजे से उदय मदहोश हो गया, जैसे ही उसका लंड रजनी की बूर की दरार के ऊपर वाले हिस्से पर छुआ उदय ने रजनी को चूमते हुए उसके कान के पास धीरे से बोला

"हाय... मेरी बिटिया....तेरी.... बूररररर"

रजनी बूररररर शब्द सुनकर वासना से भर गई, अपनी कसी कसी चूचीयों को अपने पिता की नग्न छाती पर स्वयं ही दबाते हुए उनसे लिपट गयी।

उदय अपनी बेटी के गुदाज मखमली बदन पर ऐसे छा गया मानो किसी शेर ने हिरण को दबोच लिया हो। पिता का काला लंड बेटी की चिकनी मोटी मोटी जांघों पर, बूर पर, नाभि पर इधर उधर रगड़ खाने लगा, रजनी ने अपनी जांघे उठायी और अपने बाबू की कमर पर लपेट दी, ऐसा करते ही बूर की फांकें फैल गयी और लंड का मोटा सुपाड़ा बेटी की बूर की फांकों में अच्छे से दस्तक देने लगा, रजनी अपने बाबू के मोटे सुपाड़े को हल्का हल्का अपनी रसीली बूर की फांकों में डुबकी लगाते हुए महसूस कर एक बार फिर लजा गयी, उदय ने मस्ती में रजनी के कानों की लौ को चूम लिया, रजनी ने सिसकते हुए अपने होंठ आगे किये तो उदय अपनी बेटी के रसीले होंठों को अपने होंठों में भरकर चूमने लगा।

रजनी मचलते हुए अपने बाबू के सर को पकड़ कर उन्हें और अपने होंठों पर दबाने लगी फिर धीरे से मुंह खोल दिया उदय ने एक बार रजनी की आंखों में देखा तो वह मुस्कुराकर लजा गयी।

उदय- हाय... मेरी बेटी...लजा गयी....खोल न मुँह... रस पिला दे अपनी जीभ का।

दिये कि हल्की रोशनी में रजनी का गोरा गोरा अति उत्तेजित चेहरा दमक रहा था, शर्म और वासना की लाली उसके चेहरे को और भी आकर्षित और कामुक बना रही थी।

रजनी ने अपने बाबू की आंखों में वासना भरी अदा से देखते हुए अपने होंठ खोल दिये और अपनी जीभ को हल्का सा बाहर निकाल दिया।

उदय अपनी बिटिया की इस अदा पर कायल हो गया और मारे उत्तेजना के एक झटका अपने लंड से उनकी बूर की दरार के ऊपरी हिस्से पर मारते हुए (बूर की फांक जहां से शुरू होती है) उसकी जीभ को अपने मुंह में भर लिया, रजनी अपने बाबू के मुंह में ही "ऊऊऊऊ ईईईईईई ईई...अममम्म्ममा" कहते हुए चिहुंक उठी।

उदय रजनी की जीभ को कुल्फी की तरह धीरे धीरे नीचे से ऊपर की ओर अपने मुंह में भर भर कर चूसने लगा, साथ कि साथ वह अपने लंड से बिटिया की बूर जो अब बहुत पनिया गयी थी कि ऊपरी दरार में हल्का हल्का डुबो डुबो कर रगड़ने लगा, रजनी का बदन अपने बाबू के इस खेल की दोहरी मार से अति उत्तेजना में रह रहकर कंपकपा जा रहा था जिसको उदय बखूबी महसूस कर रहा था, रजनी अपने बाबू के सर को पकड़कर खुद मुंह खोले अपनी जीभ उनके मुंह में जितना अंदर हो सके डालने लगी, उदय जी भरकर अपनी बेटी की रसीली जीभ को कुल्फी की तरह पूरा मुंह में भर भरकर नीचे से ऊपर की ओर चूसता रहा, नीचे बूर का बुरा हाल होता जा रहा था और लंड लगातार हल्के हल्के कभी भग्नासे पर तो कभी बूर की फांकों के जोड़ पर ठोकर मार रहा था, उदय में बहुत संयम था, वह जानता था कि स्त्री को कैसे तैयार किया जाता है।

जीभ चूसते चूसते काफी देर हो गयी, दोनो बाप बेटी सारी दुनियां भूल कर एक दूसरे में डूबे हुए थे, रजनी ने हाँफते हुए अपने बाबू के मुँह से अपनी जीभ निकाली और अच्छे से सांस भरने के लिए अपने चेहरे को कभी दाएं तो कभी बाएं करने लगी, दिए कि रोशनी में उदय उसे देखने लगा, चेहरा दायें बायें घुमाने से कान की झुमकी इधर उधर हिलने से उससे रहा नही गया, वह रजनी की कान की झुमकी और उसके कान के आस पास चूमने लगा, रजनी का बदन फिर सनसना गया, उसकी साँसे धौकनी की भांति चलने लगी।

उत्तेजना भरी आवाज में वह धीरे से बोली- बाबू...चूची को भी खोलिये न....उसे भी दबाइये न बाबू..

इतना कहकर रजनी लजाकर एक बार फिर अपने बाबू से कस के लिपट गयी।

अपनी सगी बेटी के इस तरह अपने बाबू से चूची खोलकर उसको दबाने के आग्रह से उदय वासना में कराह उठा और रजनी की आंखों में देखकर बोला - रहा नही जा रहा अब...मेरी बिटिया से?

रजनी- नही बाबू....बिल्कुल भी नही, खोलिये न इसको भी। (रजनी ने फिर लजाते हुए कहा)

उदय- किसको मेरी बेटी?

रजनी ने आंखों से ब्रा में कैद भारी सुडौल फूली हुई दोनो चूचियों की तरफ इशारा करते हुए कहा- इसको बाबू?

उदय ने छेड़ते हुए कहा- इसको किसको मेरी रानी बेटी? किसको?

रजनी (सिसकते हुए) - अपनी बेटी की चूची को.....अपनी बेटी की चूची को खोलिये बाबू....खोलकर देखिए...आह ह ह ह...इनसे भी खेलिये.....इनको भी दबाइये न बाबू....ये भी तरस रहे हैं.....निप्पल को देखिए न बाबू कैसे तन गए हैं...आपके लिए

(रजनी सिसकते हुए एक बार में बोल गई)

उदय- आह ह ह ह....हाय मेरी रां.....

रजनी- हाँ बाबू बोलिये न...जो बोल रहे थे....मैं हूँ आपकी वही....वही बोलिये न जो अभी बोलने जा रहे थे...बोलिये बाबू।

दोनो एक दूसरे को देखने लगे, रजनी की आंखों में गंदी बातें सुनने का आग्रह झलक रहा था।

उदय- मेरी बेटी...मेरी जान

रजनी ने उदय के सर को सहलाते हुए धीरे से फिर बोला- वही बोलिये न बाबू जो बोलने जा रहे थे...मैं वही हूँ आपकी?

उदय- मेरी रांड... मेरी रंडी बेटी...

रजनी- आआआआ हहहहहह....बाबू बू बू बू.... हाँ मैं आपकी राँड़ हूँ....मैं अपने बाबू की रांड हूँ.... मैं अपने बाबू की रंडी हूं.... चूची खोलिये न बाबू...अपनी रांड की चूची पीजिये न।

(रजनी आज पहली बार वासना में बहक चुकी थी)

उदय उसे चूमे जा रहा था और वह बड़बड़ाये जा रही थी

उदय हल्का सा उठा और हाँथ पीछे ले जाकर ब्रा का हुक खोल दिया, रजनी ने अपनी छाती को ऊपर उठा कर अपने बाबू को ब्रा का हुक खोलने में मदद की, जैसे ही उदय ने ब्रा को खोलकर खटिया के नीचे गिराया, रजनी ने सिसकते हुए बड़ी अदा से हल्की सी अंगड़ाई लेकर अपने बदन को धनुषाकार में ऊपर को उठाते हुए अपनी दोनों चूचियों को और भी ऊपर की ओर तान दिया, मोटी-मोटी गोरी-गोरी 36 की साइज की दोनो चूचीयाँ गोल गोल फुले हुए गुब्बारे की तरह तनकर ऊपर की ओर उठ गयीं। उत्तेजना में दोनों चूचीयाँ फूलकर और भी बड़ी हो गयी थी, दोनो रसीले गुलाबी निप्पल तनकर कब से खड़े थे और अब खुली हवा में आजाद हो गए थे, दिये की हल्की रोशनी में अपनी सगी बेटी की 36 साइज की मोटी मोटी छलकती दोनो चूचियों को देखकर उदय मंत्रमुग्ध सा हो गया, ऐसा नहीं था कि पहली बार देख रहा था पर हर बार रजनी की मदमस्त चूचीयाँ उसका मन मोह लेती थी, बिना एक पल गवाएं वो अपनी बेटी की गुदाज चूचीयों पर टूट पड़ा, रजनी जोर से सिसक उठी-

"आह बाबू....पीजिये न....दबाइये.... हाँ ऐसे ही मेरे बाबू...ऐसे ही....ऊ ऊ ऊ ईईई...हाय दैय्या..... ऊऊईईईईई माँ..... धीरे बाबू....थोड़ा धीरे धीरे मसलिये.....ऊऊफ़्फ़फ़फ़फ़....आह बाबू (उदय ने नीचे मारे उत्तेजना के लंड बेटी की बूर में कस के रगड़ दिया) ...ऊऊफ़्फ़फ़फ़फ़ बाबू...धीरे धीरे ठोकर मारिये बाबू....आआआह हहहह...मेरे बाबू....अब इसको पीजिये (रजनी ने बायीं चूची को आने बाबू के मुंह में भरते हुए कहा)...अअअआआआआआहहहहहहहहह....बाबू, अपने पिता की गरम गरम जीभ अपने निप्पल पर महसूस कर रजनी पागल होती जा रही थी, उसका बदन वासनामय गुदगुदी और उत्तेजना से रह रहकर थिरक सा जा रहा था, पूरे बदन में सनसनाहट और कंपन दौड़ रही थी, हर बार एक नया अहसाह रजनी को कायल कर दे रहा था।

उदय बेसुध होकर अपनी बेटी की चूचीयों को दबा दबा कर पिये जा रहा था, कभी रुककर सहलाने लगता, कभी निप्पल को चूसने लगता, कभी मुँह में भरकर तेज तेज पीने लगता, कभी निप्पल को दोनो होंठों के बीच दबा कर चूसता, कभी जीभ से पूरी चूची को चाटने लगता, अपने बाबू के थूक से रजनी की गोरी गोरी चूचीयाँ दिये कि रोशनी में और भी चमकने लगी। उदय के सख्त हाँथ रजनी की कोमल नरम गुदाज चूचियों को रगड़ रगड़ कर मसल रहे थे, जब उदय कस के रजनी की चूची को दबाता तो गुलाबी निप्पल से सफेद सफेद दूध निकल आता जिसे उदय जीभ से चाट लेता, अपनी सगी बेटी का मीठा मीठा अमृत जैसा दूध उसे और उत्तेजित कर रहा था, रजनी अपने बाबू की मस्ती देख वासना में कराह उठती।

एक बेटी अपने सगे पिता से अपनी चूचीयाँ मसलवा रही थी। रजनी सनसना कर कभी आंखें बंद कर लेती, कभी उदय को चूची पीते हुए देखने लगती, लगातार उसके नरम नरम हाँथ अपने बाबू के सिर को प्यार से सहला रहे थे, रह रह कर वो अपने बाबू का सर अपनी दोनो चूचियों के बीच दबा भी देती, कस के खुद ही अपनी चूचियों को अपने बाबू के मुंह में भरकर कराह उठती "बाबू.….कितना अच्छा लगता है न ये सब करना....छुप छुप कर अपने बाबू के साथ पाप करना....आह...

कराहते हुए रजनी ने अपना दाहिना हाँथ नीचे ले जाकर अपने बाबू का दहकता काला लंड जो पनियानी बूर की फांकों में रगड़ रगड़ कर हलचल मचा रहा था, पकड़ लिया, और अपने नितम्बों को हल्का सा पीछे कर अपनी बूर को अपने बाबू के लंड से थोड़ा सा दूर किया, नही तो मारे उत्तेजना के वो बस झड़ने ही वाली थी क्योंकि उदय का लंड लगातार बूर की दरार में फांकों के बीच रसीली घाटी में रगड़ रहा था।

अपनी बेटी की बूर की रसीली चाशनी में उदय के लंड का सुपाड़ा सना हुआ था, लगातार रगड़ने से चमड़ी पूरी तो नही पर सुपाड़े से थोड़ी उतर गई थी, आधा सुपाड़ा चमड़ी से बाहर आ गया था और रजनी की बूर की चाशनी में सना हुआ था।

अपने बाबू के काले सख्त लंड को पकड़कर रजनी के चेहरे पर फिर शर्म की लालिमा तैर गयी, ऐसा जान पड़ रहा था कि लंड पहले से और विकराल रूप ले चुका है, काफी देर से उत्तेजना में होने की वजह से मोटी मोटी नशें खून के वेग से उभरकर खुरदरा अहसाह कर रही थी, लंड को हाँथ में लेते ही रजनी की आह भरी सिसकी निकल गयी, अपनी बेटी के नरम नरम हाँथ का अहसाह अपने लंड पर पाकर उदयराज की आंखें मस्ती में बंद हो गयी, रजनी ने पूरे लंड पर बड़े प्यार से हाँथ फेरा, एक एक हिस्से को हल्का दबा दबा कर सहलाया, अपने बाबू के दोनों मोठे मोठे अण्डकोष जिनपर काले काले बाल भी थे उन्हें अपनी हथेली में लेकर कुछ देर तक बड़े प्यार से सहलाया, उदय का लंड अपनी बेटी के नरम नरम हाथों की छुवन पाकर बार बार उछलने लगा। उदय मस्ती में चूची पीना छोड़कर रजनी की आंखों में बड़े प्यार से देखने लगा, रजनी भी आंखों में शर्म की लाली लिए मदहोशी में अपने बाबू की आंखों में बड़े प्यार से लंड की लंबाई मोटाई को नापते हुए, सहलाते हुए देखने लगी, मानो कह रही हो "बाबू ऐसे ही सहलाऊँ आपके लन्ड को...ऐसे ही छुऊँ अपने बाबू के लंड को.....बहुत प्यासा है मेरे बाबू का लंड अपनी बिटिया का प्यार पाने के लिए...... तरस रहा है आपका लन्ड मेरे बाबू" और मानो उदय भी बड़ी आग्रह से अपनी बिटिया की आंखों में देखकर बोल रहा हो "हाँ मेरी सलोनी बिटिया...मेरी रानी ऐसे ही सहला मेरा लंड, ऐसे ही टटोल टटोल कर लंड के हर हिस्से को छू मेरी बेटी....ऐसे ही मेरे लंड से खेल....इसको सहला...इसको दबा...इसकी लंबाई को सहला सहला कर नाप ले...ऐसे ही प्यार कर इसको....तेरे नरम नरम हांथों के लिए ये बरसों से तरसा है मेरी बेटी"।

रजनी धीरे धीरे लंड को सहलाती रही और दोनो के होंठ मस्ती में मिल गए, उदय ने अपनी गांड को थोड़ा और ऊपर को उठा लिया ताकि रजनी को हाँथ चलाने में दिक्कत न हो और वो लंड को अच्छे से महसूस कर सहला सके। रजनी चार इंच चौड़े लंड को कभी हथेली में भरती, कभी उसकी पूरी लंबाई पर हाँथ फेरती, कभी लंड के जोड़ पर घने घुंघराले बालों में उंगलियाँ चलती, कभी हाँथ नीचे की तरफ कर मोठे मोठे अंडकोषों को सहलाती, मारे उत्तेजना के लंड सख्त होकर लोहा बन गया था, बार बार मस्ती में ठुनक रहा था, उछल रहा था, रजनी ने मचलते हुए अब अपने बाबू के सुपाड़े की चमड़ी को पकड़कर पीछे की तरफ खींचकर खोला और सुपाड़े पर से चमड़ी उतरकर पीछे की ओर सिमटती गयी, छोटे गेंद की भांति फूला हुआ चिकना सुपाड़ा बाहर आ गया, लंड और तेज तेज ठुनकने लगा, उदय ने रजनी के होंठों और गालों को चूमना जारी रखा, ऊपर रजनी कभी अपने गाल तो कभी अपने होंठ अपने बाबू को परोसती रही और नीचे अपने बाबू के लंड से खेलती जा रही थी, दोनो की सिसकी से आँगन गूंज रहा था।

लंड का सुपाड़ा खोलकर रजनी उसे अपनी मुट्ठी में भरकर चिकने भाग को सहलाने लगी और उदय उत्तेजना में गनगना जा रहा था, रजनी कुछ देर तक अपने बाबू के सुपाड़े को कभी अंगूठे से तो कभी उँगलियों से सहलाती रही और दूसरे हाँथ से वो अण्डकोषों को बड़े प्यार से दुलारती रही, दोनो में अब उत्तेजना अपने चरम पर थी। ऊपर बैठी डायन बाप बेटी का महापाप देख मंत्रमुग्ध थी, बाहर काकी और रजनी की बेटी बेसुध होकर सो रहे थे और आँगन में बाप बेटी पाप के आनंद में डूबे हुए थे।

रजनी से अब रहा नही जा रहा था वही हाल उदय का भी हो रहा था, अब बर्दाश्त करना मुश्किल था, रजनी ने मादक आवाज में धीरे से अपने बाबू से आग्रह किया- "बाबू अब बर्दाश्त नही हो रहा है.."

उदय- मेरी बेटी से अब बर्दाश्त नही हो रहा है?

रजनी- आआआह बाबू....हाँ आपकी रंडी से अब बरदाश्त नही हो रहा....अब आइये न...ऊपर चढ़िए मेरे।

उदय- रहा तो मुझसे भी नही जा रहा मेरी बेटी।

रजनी उदय के लंड को सहलाये जा रही थी और उदय ने भी एक हाथ नीचे ले जाकर अपनी बेटी की दहकती बूर को हथेली में भर लिया, रजनी सिसक उठी "आआआह हाय... बाबू...अब पेल दीजिये न अपनी बिटिया को...और मत तड़पाइये.... बाबू...आआआह...चोदिये न मुझे....अच्छे से...चोद दीजिये बाबू मुझे...अब बर्दाश्त नही होता मुझसे...मजा लीजिये न अपनी बेटी की बूर का....

उदय से रजनी का आग्रह बर्दाश्त नही हुआ और वो उठ बैठा, तकिये को उठा कर उसने रजनी के नितम्बों के नीचे लगाया, रजनी ने अपनी मदमस्त गांड उठा कर तकिया नीचे लगाने में अपने बाबू की मदद की और थोड़ा नीचे सरक गयी ताकि उसका सर खटिये की पाटी से न लगे।

पास में रखा दिया उदय ने हाँथ में ले लिया और अपनी सगी बेटी की दहकती बूर को अच्छे से देखने के लिए जांघों के पास ले आया, रजनी अपने बाबू की मंशा जान गयी और शर्म से लजा गयी, पर दूसरे ही पल उसने खुद अपनी जांघों को अच्छे से खोलते हुए अपनी मदमस्त गोरी गोरी प्यारी सी मखमली बूर अपने बाबू के सामने परोस दी और बड़ी मादकता से शर्माते हुए लजाते हुए अपनी तर्जनी और मध्यमा दो उंगली से अपनी बूर की फांकों को खोलकर उसका गुलाबी छेद जो चाशनी से भरा था बाबू को दिखाने लगी, मदहोश कर देने वाली काम रस और पेशाब की महक उदय को पागल कर गयी, ऐसा नही था कि वो रजनी की बूर पहली बार देख रहा था पर सगी बेटी की बूर जितनी बार भी देखो हर बार वही पहले वाला अहसास कराती है, दिए कि रोशनी में अपनी सगी बेटी की महकती बूर देखकर उदय का लंड इतना सख्त हो गया कि मानो अभी फट जाएगा, रजनी ने और भी अदा दिखाते हुए अपने बाबू को ललचाते हुए धीरे धीरे अपनी बूर से खेलने लगी, उदय मदहोश होकर बूर को देखे जा रहा था, रजनी कभी फांकों को अच्छे से चीरकर गुलाबी छेद को अच्छे से अपने बाबू को दिखाती, कभी बीच वाली उंगली से भग्नासे को धीरे धीरे सहला कर थपथपाती, कभी गुलाबी छेद के मुहाने पर बीच वाली उंगली गोल गोल घुमाती, कभी तर्जनी उँगली को बूर की पूरी दरार में अच्छे से ऊपर नीचे तक रगड़ती, ऐसा करते हुए वो खुद भी बर्दाश्त से बाहर हो रही थी पर आज उसे अपने बाबू को अपनी बूर खुलकर दिखाने में न जाने कैसे आनंद का अनुभव हो रहा था, उसका बदन रह रहकर गनगना जा रहा था।

उदय से अब रहा नही गया और वह दिया अपनी जगह पर रखकर अपनी बेटी की बूर पर टूट पड़ा, लप्प से उसने रजनी की पनियानी बूर को मुँह में भर लिया और लगा चूसने, रजनी अब हाय हाय करने लगी "आआआआआआआ हहहहहहहह बाबू .....हाय मेरी बूर..धीरे धीरे बाबू....नही तो मैं झड़ जाउंगी बाबू......आआआह माँ...... दांत मत लगाइये बाबू.....प्यार से खाइये बिटिया की बूर......आआआह मेरे प्यारे बाबू.....सारा रस चाट लीजिये मेरे राजा....आआआह.....ऊऊईईईईई..... ओ ओ ओ ओ ओ हहहहहह अम्मा....धीरे धीरे मेरे बाबू .....हाय मेरी बूर (दोनों हाथों से रजनी अपने बाबू के सर को पागलों की तरह सहलाये जा रही थी और मस्ती में सिसकते हुए बड़बड़ाये जा रही थी), आआआह बाबू आपकी गरम गरम जीभ....आह बस बाबू मैं झड़ जाउंगी....आह बस....मुझे आपके लंड से झड़ना है बाबू...ऊऊईईईईई अम्मा.....बाबू

रजनी ने उदय के सर को पकड़ कर ऊपर चढ़ने के इशारा किया तो उदय ने अपनी बिटिया की बात मानी और उसके ऊपर आ गया, दोनो के होंठ आपस मे मिल गए

रजनी- अब डालिये न बाबू...चोदिये मुझे

(रजनी ने बडी मादकता से कहा)

उदय पूरी तरह बेकाबू हो गया था पर फिर भी खुद को संभालता हुआ बोला- हाय मेरी राँड़...मेरी बेटी...कैसे डालूं...धीरे धीरे या एक ही बार मे?

(ऐसा कहते हुए उसने रजनी को चूम लिया, रजनी ने बड़े प्यार से उदय से कहा)

"एक ही बार मे बाबू...एक ही बार में"

उदय- एक ही बार मे सीधे बच्चेदानी तक

रजनी कराहते हुए- हाँ मेरे बाबू...हाँ

उदय ने अपनी बेटी को फिर चूमा और बोला-

"तो लंड को पकड़ कर सीध में लगा और एक हाथ से अपनी बूर की फांक को खोल कर रख"

ऐसा कहते हुए दोनो ने पोजीशन की और उदय अपनी बेटी पर झुक गया, कमर को जरूरत भर के हिसाब से उठा लिया।

रजनी ने मारे उत्तेजना के अपने बाबू को ताबड़तोड़ कई बार चूम लिया और जल्दी से दोनो जांघों को अच्छे से फैलाकर कराहते हुए अपने हाँथ नीचे ले जाकर एक हाँथ से अपने बाबू के दहकते लंड को पकड़कर एक बार फिर अच्छे से सहलाया, चमड़ी को और अच्छे से खोलकर पीछे कर लिया और जल्दी से अपना हाँथ दुबारा अपने मुंह तक लायी और ढेर सारा थूक लेकर गरम गरम थूक काले फंफनाते लंड पर लगा दिया, रजनी ने लंड को ठीक बूर के छेद पर लगाया और दूसरे हाथ से अपनी बूर की फांकों को चीरकर खोल दिया।

उदय से रहा नही गया और उसने अपनी बिटिया के होंठों को चूमते हुए पहले तो पांच छः बार लंड को बूर की दरार में रगड़ा, फिर चिकने सुपाड़े को बूर के गुलाबी छेद के मुहाने पर कई बार छुआया जिससे हल्की "पुच्च पुच्च" की आवाज होने लगी और दोनो मस्त हो गए, क्योंकि बूर बहुत पनिया गयी थी इसलिए जैसे ही चिकना सुपाड़ा बूर के छेद पर छूता और उदय अपनी गांड को उठा लेता तो हल्की "पुच्च" की आवाज आती, बूर के रसीले गुलाबी छेद से निकल रहे लेसदार रस में चिकना सुपाड़ा बार बार डूबता और हटाने पर पुच्च की आवाज होती और एक दो हल्के तार भी बन जाते। रजनी लंड को सीधा पकड़े हुए उत्तेजना में कराह रही थी उससे अब बर्दाश्त नही हो रहा था, बस सिसकती जा रही थी, एकाएक उदय ने तेज धक्का मारा और लंड बूर की फांकों को फैलाता हुआ संकरी रसीले छेद को चीरता हुआ बूर की गहराई में उतर गया

"आआआ आआआआआ हहहहहह.. बाबू"

रजनी मस्ती में कराह उठी, लंड सीधा उसकी बच्चेदानी से जा टकराया, उसने दोनो हाथों से अपने बाबू के कंधों को थाम लिया और हल्के दर्द में सीत्कार उठी, पूरा आँगन रजनी की कामुक सीत्कार से गूंज उठा, दर्द बहुत तीखा तो नही था पर हल्का हल्का हो रहा था, क्योंकि बूर बहुत चिकनी हो गयी थी तो दर्द से कहीं ज्यादा मीठेपन का अहसाह था, मीठे दर्द से रजनी का बदन एक बार फिर धनुष की भांति ऐंठ गया, अपने बाबू का चार इंच मोटा लंड अपने बच्चेदानी तक महसूस कर रजनी कँपकँपा गयी, लंड के ऊपर की मोटी मोटी उभरी नशें उसे अपनी बूर की अंदरूनी दीवार की मांसपेशियों पर बखूबी महसूस हो रही थी।

वो धीरे धीरे कराह रही थी और कस के अपने बाबू से लिपटी हुई थी, उदय अपनी बेटी की नरम नरम बूर में अपना मूसल जैसा लन्ड जड़ तक घुसा कर उसकी नरमी, नमी, चिकनाहट और गर्माहट को अच्छे से महसूस करने लगा, रजनी ने कराहते हुए अपने पैर अपने बाबू की कमर पर कैंची की तरह आपस मे लपेट कर कस लिए और उन्हें चूमते हुए सहलाने लगी मानो शाबाशी दे रही हो। बूर में रह रहकर संकुचन हो रहा था वह लंड को अपने अंदर जितना हो सके आत्मसात कर रही थी, उदय का लंड रजनी की बूर की गहराइयों में घुसकर उसकी अंदरूनी दीवारों की गर्माहट को महसूस कर, बूर के अंदर ही बार बार ठुनक कर हल्का हल्का उछल रहा था जिसे रजनी बखूबी महसूस कर उत्तेजना से सनसना जा रही थी।

बूर अंदर से बहुत गर्म हो चुकी थी जिससे उदय के लंड की अच्छे से सिकाई भी हो रही थी, उदय ने दोनो हाँथ नीचे ले जाकर रजनी की गुदाज मोटी मोटी गांड को हथेली में भरा और हल्का सा ऊपर की ओर उठाते हुए एक बार फिर कस के लंड को और भी ज्यादा बूर में ठूंस दिया, रजनी मस्ती में फिर कराह उठी "बस बाबू.....आआआआ हहहह.. अम्मा....बस कितना अंदर डालोगे बाबू..अब जगह नही है...पूरा बच्चेदानी तक चला गया है मेरे बाबू....ऊऊईईईईई माँ..... हाय मेरी बूर....कितना मोटा है बाबू आपका.....कितना लम्बा है.....आआआह....बस करो....ऊऊईईईईई (उदय ने गच्च से एक बार फिर लंड हल्का सा बाहर निकाल कर रसीली बूर में जड़ तक पेल दिया)

उदय- आआआह मेरी बेटी....मेरी राँड़...मेरी रानी... क्या बूर है तेरी.....कितनी गहरी है.....बहुत मजा आ गया....आआआह

रजनी तेजी से सिसकते हुए- मजा आया मेरे बाबू को...अपनी बिटिया की बूर में लंड डालकर।

उदय- आआआह हाँ मेरी बिटिया...बहुत

रजनी- बाबू एक बार फिर निकाल कर गच्छ से डालिये न, मैं निशाना लगाती हूँ

(रजनी ने कराहते हुए मस्ती में कहा)

उदय ने झट से पक की आवाज के साथ बूर में घुसा हुआ लंड बाहर निकाल लिया और अपनी गांड को ऊपर की तरफ उठा कर पोजीशन ली, रजनी हल्का सा चिहुंक गयी, लंड पूरा बूर की रशीली चाशनी से सना हुआ था, रजनी ने मदहोशी से एक बार फिर अपने बाबू के दहकते हुए लंड को थामा, लंड अबकी बार ज्यादा गर्म था, जैसे ही रजनी ने एक हाँथ से लंड को पकड़ा और दूसरे हाँथ से अपनी बूर की फांकों को खोलकर रसीले गुलाबी छेद को खोला उदय ने एक बार फिर कस के एक ही बार मे पूरा लंड बूर की गहराई में उतार दिया, रजनी मीठे मीठे रसीले दर्द के अहसाह से फिर सीत्कार उठी, एक बार फिर उसका बदन मस्ती में ऐंठ गया, उदय ने एक ही बार में अपनी बेटी की बूर में अपना लंड जड़ तक घुसेड़ दिया और तुरंत ही हल्का हल्का तीन चार बार थोड़ा थोड़ा बाहर निकाल कर गच्च गच्च धक्का मारा, रजनी मदहोश हो गयी और तेजी से सिसकते हुए अपने बाबू से उत्तेजना में बोली- "आआआह बाबू....अब रुकिए मत....हुमच हुमच कर अपनी सगी बिटिया को चोदिये....चोदिये न बाबू।

उदय ने रजनी की गांड को एक बार फिर दोनों हांथों से हल्का सा उठाया और उसके गालों और होंठों को चूमते हुए हुमच हुमच कर पूरा पूरा लंड बूर में जड़ तक घुसेड़ घुसेड़ कर अपनी बेटी को चोदने लगा, अब वो रुकने वाला नही था, रजनी हाय हाय करने लगी, उसके बाबू का लोहे जैसा इतना मोटा, लम्बा काला लंड उसकी बूर की गहराई में बार बार उतरने लगा, उदय ने रजनी को अच्छे से दबोचा और बड़े बड़े लंबे लंबे धक्के तेजी तेजी लगाने लगा, रजनी बदहवास सी तेज तेज सिसकते हुए नीचे से अपनी गांड उछाल उछाल के अपने बाबू की ताल से ताल मिलाने लगी, छोटी सी खटिया ताबड़तोड़ धक्कों से चरमरा गई और चर्र चर्र की आवाज आँगन में मदमस्त सिसकियों के साथ गूँजने लगी।

हर बार की तरह एक बार फिर रजनी अपने बाबू का लंड पाकर जन्नत में थी, उदय भी अपनी सगी बेटी को चोदते हुए सातवें आसमान में था। तेज तेज धक्कों के साथ हुमच हुमच कर चोदते हुए जब कभी उदय का लंड रजनी की बूर में थोड़ा तिरछा होकर बूर की दीवारों से तेजी से रगड़ता हुआ बच्चेदानी से टकराता तो रजनी मस्ती में बडी तेजी से कराह उठती, और ऐसा हर तीसरे चौथे धक्के के बाद हो रहा था कि लन्ड तिरछा होते हुए बूर की दीवारों को रगड़ता हुआ बच्चेदानी से जा टकराता और रजनी मस्ती में चिहुंक उठती। अपने बाबू का मोटा चिकना सुपाड़ा बूर की बच्चेदानी से बार बार टकराने से रजनी के पूरे बदन में एक अजीब से सनसनी होने लगी, मीठी तरंगे पूरे बदन में घुलने लगी, वह लगातार नीचे से गांड उछाल उछाल कर अपने बाबू से चुदवा रही थी। जब कभी उदय बहुत तेजी से लंड बूर में ठूँसकर थोड़ा रुकता तो रजनी का बदन मस्ती में थरथरा जाता, उदय फिर हुमच हुमच कर चोदने लगता और रजनी फिर तेजी से कराहते हुए नीचे से गांड उछाल उछाल कर चुदवाने लगती

"आआआह....हाय.... पापा.... आह मेरे प्यारे पापा....चोदिये मेरे पापा जी...

(रजनी ने ये पापा शब्द अपनी सहेली के मुंह से सुना था, उसी ने रजनी को बताया था कि शहर में बाबू या पिता को पापा कहते हैं, अचानक ही रजनी के मुँह से पापा शब्द निकल गया और उदय ने रजनी के होंठों को कस कर चूम लिया, उदय को बहुत अच्छा लगा ये रजनी जान गई उत्तेजना की आग में पापा शब्द ने घी का काम किया और सनसनी से दोनों के बदन गनगना गए)

आआआह मेरे पापा...मेरे राजा पापा.....चोदिये अपनी लाडली बेटी को, ऊऊईईईईई माँ.... हाय....देखो न अम्मा पापा मुझे चोद रहे हैं......आह पापा..... हाँ हाँ ऐसे ही....पूरा अंदर तक डाल डाल कर पेलिये अपनी बेटी को....आआआह..... मेरे पापा.....पापा जी....आह पापा...अम्मा के सामने मुझे चोदिये पापा.... चोद दीजिये मुझे मेरे प्यारे पापा.... ऊऊईईईईई माँ..... आपका लंड कितना बड़ा है पापा..... देखो न कैसे मेरी छोटी सी चूत में घुसा हुआ है पापा.....आआआह मेरे पापा जी. . आह

उदय पूरी ताकत से रजनी की बूर तेज तेज धक्कों के साथ चोदने लगा, रजनी मस्ती में कराहती हुई, वासना के उन्माद में बड़बड़ाती हुई नीचे से गांड को उछाल उछाल कर अपने बाबू को "पापा" बोलते हुए चुदवाने लगी, वासना के आवेग में कई बार उसको ऐसा लगा कि उसकी अम्मा उसको देख रही है और वो वासना से अपनी अम्मा की तरफ देखते हुए अपनी गांड उछाल उछाल के अपने पापा से चुदवा रही है। यह अहसाह होते ही कि उसकी अम्मा उसे पापा से चुदवाते हुए देख रही है, उसका बदन वासना और पाप के आनंद में और भी गनगना गया। (जबकि उसकी अम्मा इस दुनिया में अब है ही नही)

रजनी की इतनी सारी वासनामय रसभरी कामुक बातें सुनकर अचानक कुछ ही देर में उदय से बर्दाश्त नहीं हुआ और वो एक तेज धक्का मारते हुए अपनी बेटी की बूर में झड़ने लगा, रजनी तेजी से चिहुंक उठी और उसे भी अपने बदन में तेज सनसनाहट का अहसाह हुआ, कराहते हुए वो भी अपने बाबू के साथ ताल से ताल मिला कर झड़ने लगी, दोनो बाप बेटी एक दूसरे से सिसकते हुए गुथ गए और एक साथ तेजी से कराहते हुए झड़ने लगे।

आआआह....मेरी बेटी..... मेरी राँड़....हाय तेरी बूर....तेरी बूर....तेरी बूर मेरी बेटी....आआआह मैं गया...आह मेरी रानी बिटिया।

आआआह मेरे पापा......आआआह आपका प्यार लंड.... ऊऊईईईईई अम्मा.. .आह पापा मैं झड़ रही हूं पापा.... कितना प्यारा है आपका लन्ड....आआआह मैं झड़ रही हूं पापा..... मेरे प्यारे पापा।

दोनो बुरी तरह एक साथ झड़ने लगे, रजनी की बूर तेज सनसनाहट के साथ संकुचित होकर अपने बाबू के लन्ड को निचोड़ते हुए ऐसे झड़ने लगी जैसे बरसों से अपने पापा के लंड के लिए प्यासी थी।

उदय के लंड से गरम गरम लावा रजनी की बच्चेदानी में भरने लगा, रजनी का बदन कुछ पल के लिए अनगिनत थरथराहट से कांप गया, चरमसुख के असीम सागर में वह खो गयी, बहुत देर तक उसकी बूर थरथराहट के साथ झड़ती रही, उसी तरह उदय का लंड भी रजनी की बूर में बहुत देर तक उछलता रहा और रह रहकर वीर्य की गरम धार बूर में उगलता रहा, दोनो की सांसें रात के अंधेरे में आँगन में गूँजने लगी, प्यार से दोनो एक दूसरे को सहलाते और चूमते रहे, अच्छी तरह झड़ जाने के बाद दोनों एक दूसरे को बड़े प्यार से चूमने लगे फिर उदय रजनी के ऊपर लेट गया और रजनी ने अपने बाबू को चूमते हुए बड़े प्यार से अपने आगोश में भर लिया, "मेरे पापा" बोलते हुए उसने बड़े प्यार से उनके सिर को चूमा और सहलाने लगी।

 
Update- 94

कुछ देर बाद उदय को ध्यान आया तो उसने रजनी की ओर बड़े आश्चर्य से मुस्कुराते हुए देखा

लंड अभी भी रजनी की बूर में घुसा हुआ था पर थोड़ा सुस्त पड़ गया था, दोनो का कामरस रिस रिस कर तकिये पर गिर रहा था, रजनी ने अपने बाबू को बड़े प्यार से अपनी ओर देखते हुए देखा तो बोली- क्या हुआ मेरे सैयां?

उदय - अम्मा की याद आ रही थी क्या मेरी बेटी को?

रजनी ने उदय को चूमते हुए पूछा- कब बाबू? (वैसे रजनी समझ गयी थी)

उदय ने रजनी के कान में धीरे से कहा- आपने बाबू से चुदवाते वक्त?

रजनी और उदय दोनो सिसक उठे, उदय के लन्ड ने बूर के अंदर एक हल्की सी ठुनकी ली जिसको रजनी ने बखूबी महसूस किया, ऐसा बोलते वक्त उदय थोड़ा ऊपर को सरका जिससे उसका लंड रजनी की बूर में थोड़ा अंदर सरक गया और किनारे किनारे से गाढ़ा सफेद सफेद वीर्य निकलकर रजनी की जांघों से होता हुआ तकिये पर गिरने लगा।

रजनी एक बार शर्मा गयी फिर बोली- अच्छा वो?

उदय- हाँ वो मेरी राँड़...क्या हो गया था मेरी बेटी को जो उसके मुँह से उत्तेजना में निकला "अम्मा देखो पापा चोद रहे हैं मुझे"

रजनी फिर शर्मा गयी- पता नही क्या हो गया था बाबू, कुछ भी बड़बड़ाये जा रही थी, पर न जाने क्यों मुझे बहुत गुदगुदी हुई वो बोलते हुए....बहुत उत्तेजना भी हुई, एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे अम्मा मुझे थोड़ी दूर खड़े होकर देख रही है और मैं आपसे चुदवा रही हूं, न मुझे डर लगा की अम्मा क्या सोचेंगी, न घबराहट हुई, न लाज लगी, बल्कि उल्टा बहुत अजीब सा मजा आया, और एक बात बताऊं?

उदय - हम्म

रजनी- अम्मा भी मुस्कुरा रही थी।

"आआआह" उदय के लंड ने धीरे धीरे सख्ती पकड़नी शुरू कर दी, रजनी ने भी मस्ती में आँखे बंद कर ली, उदय का धीरे धीरे सख्त होता लंड उसे बूर के अंदर अच्छे से महसूस हो रहा था।

उदय- तुझे ऐसा बोलते हुए मजा आया?

रजनी उदय को सहलाते हुए- हाँ बाबू बहुत...अब भी मन कर रहा है

उदय - क्या...क्या मन कर रहा है मेरी बिटिया का?

रजनी फुसफुसाते हुए- वही महसूस करने का।

उदय- तो किसने रोका है मेरी रानी...कर न महसूस।

रजनी धीरे धीरे उदय को सहलाने लगी फिर धीरे से उदय के कान में फुसफुसाई- आआआह.....मेरे बेटे...तू मुझे चोदेगा?....

उदय आश्चर्य से रजनी की आंखों में देखने लगा, उसे विश्वास नही हुआ कि रजनी ये बोलेगी, उसका लंड रजनी की बूर में सख्त एकदम लोहा बन गया, रजनी समझ गयी कि उसके बाबू को बहुत मजा आया है।

दोनो एक दूसरे को देखने लगे, रजनी की आंखें वासना से भरी हुई थी और वह कामुक मुस्कान लिए अपने बाबू की आंखों में एक आग्रह से देख रही थी। उदय अब समझा कि रजनी के मन में क्या है, वह क्या चाहती है? रजनी के मन की प्यास को वह अच्छे से जान गया, उसने रजनी को बड़े प्यार से गालों पर चूमा और बोला- माँ...मेरी अम्मा।

दोनो का बदन गनगना गया, रजनी ने "आह मेरा बेटा...मेरा बच्चा" बोलते हुए अपने बाबू को कस के आगोश में भर लिया।

उदय ने फिर धीरे से रजनी के कान में फुसफुसा कर बोला- अम्मा...मुझे बूर देगी....अपनी बूर चाटने देगी....?

रजनी मस्ती में सनसना गयी "हां मेरे लाल...मेरे राजा बेटा....बूर दूंगी मैं अपने राजा बेटा को?

उदय- तेरी बूर चोदने का बहुत मन करता है माँ... बहुत तरसता हूँ मैं तेरी रसभरी बूर के लिए।

रजनी की मस्ती में तेज सिसकारी निकल जाती है, उदय कस के अपना लंड रजनी की बूर में गाड़ देता है जिससे रजनी और मस्ती में सिसकते हुए उसके पीठ पर हल्का सा चिकोटी काट लेती है।

रजनी- ऊऊईईईईई मां.... हाँ मेरे बेटे...मैं भी तेरे लंड के लिए बहुत प्यासी हूँ.... तेरे से चुदवाना चाहती हूँ.... पर शर्म से कह नही पा रही थी....तेरी माँ बहुत तरस रही है तेरे लंड के लिए.....चोद अपनी माँ को....चोद दे मुझे बेटे.....आआआह..

एक बार फिर दोनों का बदन एक नई उत्तेजना के अहसास से जलने लगा, दोनो एक दूसरे को चूमने लगे, उदय ने एक बार लंड बूर से पूरा निकाला और कस के एक ही बार में रजनी की बूर में जड़ तक घुसेड़ दिया

"आआआह...मेरे लाल...धीरे धीरे...धीरे धीरे डाल अपनी माँ की बूर में"

"हाय अम्मा क्या बूर है तेरी...कितनी रसीली है..."

उदय से रहा नही गया और वह एक बार फिर कस कस के ताबड़तोड़ धक्के लगाने लगा, रजनी भी बदहवास सी "हाय मेरे बेटे...आह मेरे लाल...चोद अपनी माँ को...आह ऐसे ही.." बोलते हुए सिसकारी लेते हुए अपने बाबू से चुदवाने लगी।

उदय ने सोचा भी नही था कि उसकी बेटी आज उसे जन्नत का अनोखा मजा देगी, उसकी सगी बेटी उसे माँ को चोदने का मजा इतनी लज्जत भरे तरीके से दिलाएगी, उसे विस्वास नही हो रहा था, और यही बात उसकी उत्तेजना को चरम पर ला रहा था, एक बार चुदाई कर चुके होने के बाद भी दुबारा उससे ज्यादा उत्तेजना का अहसाह इस बदलते हुए रिश्ते को सोचकर करने में दोनो बाप बेटी को आ रहा था।

रजनी कराहते हुए - आआआ आ आ आ आ आ आ ह ह ह ह...ऊऊईईईईई मईया..... आआआह मेरे बेटे.....धीरे धीरे....चोद.... तेरी अम्मा की बूर बस तेरी है.....तेरे बाबू को भी मैं नही दूँगी अब.....मेरी बूर बस मेरे बेटे के लिए है.....आआआह मेरे लाल....धीरे धीरे पेल अपनी माँ को....मां को पेलने का मजा ले ले मेरा लाल....देख कैसे...कितनी गहराई तक जा रहा है तेरा मूसल मेरी बूर में....ऊऊईईईईई मां

उदय ने एक बार फिर रजनी की गांड को दोनो हांथों से उठाया और उसे कस कस के हुमच हुमच कर चोदने लगा।

उदय- अम्मा...

रजनी- हाँ मेरे राजा बेटा.... आआआह

उदय- मजा आ रहा है मेरी अम्मा को

रजनी - बहुत मेरे राजा बेटा.... बहुत

तेज तेज धक्कों से रजनी की इधर उधर उछलती दोनो चूचीयों को उदय ने लप्प से मुंह में भरा और चोदते हुए पीने लगा, रजनी का बदन मस्ती में कांप गया, वो हाय हाय करने लगी, उदय के सर, पीठ और कमर को सहलाते हुए वह नीचे से अपनी गांड उछाल उछाल कर अपने बाबू को बेटे के रूप में महसूस कर मस्ती में चुदवाने लगी, इस तरह का आनंद आज पहली बार दोनो महसूस कर बेसुध हो गए थे।

इस बार उदय के लंड का सुपाड़ा बेटे के लंड के रूप में बार बार अपनी बच्चेदानी के मुहाने पर टकराता हुआ महसूस कर रजनी की बूर का बुरा हाल हो चुका था वह इतना पानी छोड़ रही थी कि खुद उसे भी यकीन नही हो रहा था कि माँ-बेटे के बीच की चुदाई इतनी वासनामय और आनददायक होती है की सबकुछ भुला दे।

अपनी सगी बेटी में अपनी माँ को पाकर उदय का लंड मारे उत्तेजना के किसी गर्म लोहे की तरह हो गया था।

रजनी ने कराहते हुए अपने दोनों हाँथ अपने बाबू के नितम्बों पर रखे और तेज तेज ताल से ताल मिलाते हुए नीचे से अपनी गांड उछाल उछाल कर अपने बेटे से चुदवाने लगी, उत्तेजना इतनी थी कि कुछ ही देर में दोनो फिर एक साथ सीत्कारते हुआ, मस्ती में कराहते हुए झड़ने लगे

"आआआह ह ह ह ह ह ह....मेरे लाल...मैं गयी....हाएएए.....ऊऊईईईईई अम्मा...कितना मजा है इसमें.....इस पाप में.....हाय मेरे राजा बेटा.... कितना प्यारा है तेरा लंड...

उदय भी कराहते हुए अपनी माँ के गर्भ में अपना गरम गरम वीर्य उड़ेलता हुआ उसपर ढेर हो गया।

रजनी कस के उदय को फिर अपनी आगोश में भरकर चूमने लगी, कुछ देर तक फिर दोनों झड़ते रहे, पूरा तकिया दोनो के वीर्य से पूरी तरह भीग गया। उदय और रजनी दोनो अपनी सांसों को काबू करते हुए एक दूसरे को बड़े प्यार से सहलाने लगे। रात के 3:30 हो चुके थे

ऊपर बैठी डायन बाप बेटी का ये नया खेल देखकर मस्ती में हँसे जा रही थी, वह आँगन के अंदर नही उतर सकती थी, क्योंकि उदय का घर मन्त्र से बांधा हुआ था, सुरक्षित था, इसलिए वह बस मुंडेर पर बैठी थी वरना वह नीचे उतरकर बूर का अर्क लेने के लिए कब से ललचा रही थी क्योंकि अंदर का दृश्य ही इतना कामुक और उत्तेजना भरा था कि वह डायन अपनी आंखों से सामने महापाप होते हुए देखकर सुध बुध खो बैठी थी, वह कुछ पल के लिए यह भूल गयी कि उसे सुलोचना ने बांध रखा है वह चाहकर भी इधर उधर कुछ उल्टा सीधा नही कर सकती थी। उदय और रजनी थककर एक दूसरे की बाहों में ऊँघने लगे।
 
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