Incest पाप ने बचाया - Page 8 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest पाप ने बचाया

Update- 53

आज ही का वो दिन था जब रजनी और उदयराज भी जमकर कुल वृक्ष के नीचे, खेत में और नदी में रसीली चुदाई करके घर लौटे थे और थककर सो रहे थे और इधर नीलम और बिरजू भी महापाप का अतुल्य आनंद लेकर एक दूसरे की बाहों में लेटे थे, हल्का हल्का उजाला होना शुरू हो गया था।

बिरजू उठने लगा तो नीलम ने फिर खींचकर अपनी बाहों में भर लिया और बोली- कहाँ बाबू, अभी लेटो न मेरी बाहों में।

बिरजू- हल्का हल्का उजाला हो रहा है।

नीलम- तो होने दो, बारिश हो रही है, सब अपने घरों में दुबके होंगे, अभी कौन किसके घर आएगा बाबू, आओ लेटो न मेरी आगोश में।

बिरजू- ठीक है मेरी रांड पर रुक जरा एक बार बाहर देख तो लूं, बारिश हो भी रही है या नही।

नीलम- ठीक है मेरे राजा, जाओ जल्दी आना

बिरजू फट से उठकर एक चादर अपने मदरजात नंगे बदन पर लपेटता है और बाहर जाता है, देखता है तो बारिश हल्की हल्की हो ही रही थी, नीलम सही कह रही थी सब अपने अपने घरों में दुबके थे अभी, बिरजू ये देखकर अंदर आ जाता है और मुख्य दरवाजा अंदर से बंद कर लेता है।

आकर पलंग के पास खड़ा हो जाता है उसने चादर ओढ़ ही रखी थी, नीलम ने भी बिरजू के जाने के बाद वही चादर जो बूर के ठीक सामने फाड़ी गयी थी ओढ़ ली थी, इस बार उसको ऐसे ओढ़ी थी कि चादर का फटा हुआ हिस्सा ठीक बायीं चूची के ऊपर था और गोरी गोरी मोटी चूची का काफी हिस्सा फटे हुए चादर में से बाहर को निकला हुआ था मोटे से जामुन जैसा निप्पल तनकर सख्त हो गया था, बिरजू तो चादर के झरोखे से झांकते हुए निप्पल को देखता रह गया ऐसा नही था कि वह पहली बार चूची को देख रहा था पर जिस तरह नीलम दिखा रही थी वो अदा बहुत रोमांटिक और कामुक थी।

नीलम की अदा ही सबसे ज्यादा बिरजू का मन मोह लेती थी, नीलम ने बड़े प्यार से अपने बाबू को देखा जो उसकी सख्त चूची को ललचाई नज़रों से घूर रहा था, नीलम मुस्कुराने लगी, बिरजू ने भी नीलम को देखते हुए अपने शरीर से चादर को हटा दिया और नीलम की मस्त मोटी चूची को देखकर बिरजू का लन्ड फिर से लगभग आधा खड़ा हो चुका था, नीलम की नज़र अपने बाबू के लन्ड पर पड़ते ही वो भी उसे घूरने लगी, अपने बाबू के पूरे नंगे बदन को वो ऊपर से नीचे तक एक टक लगा के घूरने लगी मानो पहली बार देख रही हो, यही होता है जब अपना मनपसंद साथी संभोग की दुनियां में मिल जाय तो उससे मन कभी भरता नही।

नीलम ने इशारे से अपने बाबू को और पास बुलाया फिर अपने सीधे हाँथ से बिरजू के मोटे विशाल लन्ड को पकड़ लिया और बड़े प्यार से उसकी आगे की चमड़ी को खोलकर पीछे किया, लंड का मोटा सा सुपाड़ा निकलकर बाहर आ गया, पहले तो नीलम ने आगे बढ़कर लेटे लेटे उसे आह भरते हुए सूँघा, एक तेज वीर्य की खुशबू उसे मदहोश कर गयी, फिर नीलम ने मुँह खोलकर सिसकते हुए लप्प से बड़े प्यार से सुपाड़े को मुँह में भर लिया, बिरजू ने आँखें बंद कर ली और कराहते हुए अपनी बेटी के सर को प्यार से पकड़ लिया, नीलम ने लॉलीपॉप की तरह अपने बाबू के लंड के सुपाड़े को चार पांच बार चूसा और मदहोशी से सर उठा के अपने बाबू को देखकर बोली- बाबू ये सच में बहुत प्यारा है, मैं इसके बिना अब नही रह सकती, मुझे अब ससुराल नही जाना, मेरा मायका ही तो मेरी ससुराल है अब, बिना आपसे चुदे मैं कैसे जी पाऊंगी मेरे बाबू, इस लंड से मुझे चोद चोद के जल्दी बच्चा पैदा करो न बाबू, ताकि जल्दी आपकी छिनार को दूध होने लगे और फिर आपकी रांड आपको रोज दूध पिलाएगी।

नीलम ने चादर के ऊपर से ही अपनी झांकती चूची को दोनों हांथों से पकड़कर अपने बाबू को दिखाते हुए बोली- देखो न बाबू, आपकी बेटी की चूची का निप्पल कैसे सूखा हुआ है, जब आप अपनी रांड बेटी को चोद चोद के बच्चा पैदा करोगे तो फिर इसमें से दूध की धार बहेगी और फिर पाप का मजा लेने में और मजा आएगा मेरे राजा।

नीलम ये सब मदहोशी में अपनी चूची को चादर के ऊपर से पकड़े अपने बाबू को दिखाते हुए बोले जा रही थी, फटे चादर में से मोटी सी चूची बाहर निकली हुई थी, नीलम ने दोनों हांथों से चूची को पकड़ा हुआ था, पहले तो बिरजू कुछ बोला नही, उसे चादर से झांकती चूची देखकर जोश इतना चढ़ा हुआ था कि उसने नीचे झुककर लप्प से मोटी सी चूची को मुँह में भर लिया, नीलम की जोर से सिसकी निकल गयी और वह एक हाथ से चूची को चादर के ऊपर से ही पकड़े अपने बाबू के मुँह में ठूसने लगी और दूसरे हाँथ से अपने बाबू के सर को जोर से सिसकारी लेते हुए सहलाने लगी।

काफी देर तक बिरजू नीलम की चूची को पीता रहा और नीलम पिलाती रही, काला निप्पल थूक से सन गया था और तनकर किसी बड़े जामुन के आकार का हो गया था, नीलम कराहते हुए अपने बाबू के सर को सहलाना छोड़ उनके खड़े लंड को पकड़कर उसकी चमड़ी को खोलने और बंद करने लगी, नीलम ने एक बार अपने हाँथ में ढेर सारा थूक लगाया और अपने बाबू के लंड के सुपाड़े पर लगा कर फिर से लन्ड को खोलने बन्द करने लगी, बिरजू को बहुत मजा आने लगा और वह तेज तेज अपनी बिटिया की चूची को पीने लगा।

दोनों फिर से सिसकने लगे

अब बिरजू बोला- मेरी रानी.....मेरी छिनाल......मेरी सजनी.....मैं भी कहाँ तेरे बिना रह पाऊंगा अब, तुझे अब तेरे ससुराल में भेजूंगा ही नही।

नीलम- हां बाबू....मुझे नही जाना अब वहां

बिरजू- मैं कुछ उपाय निकलता हूँ बेटी तू चिंता मत कर।

नीलम- पाप का मजा नही ले पाएंगे बाबू फिर हम अगर मैं वहां चली गयी तो।

बिरजू- तू ठीक कहती है, तेरी बुरिया के बिना अब मेरा लौड़ा नही रह सकता।

नीलम ने अपने बाबू को अपने ऊपर खींच लिया और बिरजू अपनी बेटी के ऊपर फिर से चढ़ गया।

बिरजू नीलम के ऊपर लेटकर उसके कान में- मैं तेरे को छिनार और रांड बोलता हूं तो तुझे कैसा लगता है?

नीलम- बहुत जोश चढ़ता है बाबू सुनकर, बदन गनगना जाता है ये सोचकर कि मैं आपकी, अपने बाबू की छिनार हूँ।

नीलम ने आगे कहा- बाबू मैं कुछ पूछूं आप बताना....... ठीक

बिरजू ने अपना लंड नीलम की बूर की फांक में रगड़ दिया तो वो सिसकते हुए चिंहुँक गयी।

बिरजू - हां ठीक,......पूछ

नीलम- जो मिट्टी के बर्तन बनाता है उसको क्या बोलते हैं?

बिरजू- उसको तो कुम्हार बोलते है, पर क्यों?

नीलम- अरे बाबू बताओ न? जो पूछूं वो बताओ बस.....ठीक

बिरजू- ठीक

ऐसा बोलकर बिरजू ने फिर लंड को बूर पर रगड़ दिया

नीलम- आह! बाबू.....जो बाल काटता है उसको क्या बोलते हैं?

बिरजू- नाई

नीलम- जो खेत जोतता है उसको?

बिरजू- किसान......ये तू मेरे से अनेक शब्दों के एक शब्द क्यों पूछ रही है, मेरी परीक्षा चल रही है क्या?

नीलम- अरे बाबू तुम बताते जाओ बस।

बिरजू- अच्छा पूछ

नीलम- हम्म्म्म...... जो तपस्या करता हो?

बिरजू- तपस्वी

नीलम ने फिर कान में धीरे से कहा- और जो अपनी सगी बेटी को चोदता हो.....वो

बिरजू- वो

नीलम- हम्म

बिरजू- वो तो तू ही बता दे मेरे कान में धीरे से

नीलम- उसको बोलते है बाबू.......बेटी को चोदने वाला

बिरजू- आआआआहहह......लेकिन ये एक शब्द थोड़ी न हुआ मेरी रांड....एक शब्द बताओ

नीलम ने फिर बड़े नशीले अंदाज में बिरजू के कान में कहा- बेटीचोद........है ना..

जैसे ही नीलम ने ये शब्द बोला बिरजू ने अपना लंड नीलम की मखमली रिसती बूर में अंदर तक एक ही बार में घुसेड़ दिया।

नीलम जोर से कराह उठी और मस्ती में अपने बाबू से लिपट गयी।

बिरजू- हाय....क्या नशा है तेरी बातों में....सच

कुछ देर तक बिरजू नीलम की बूर में लन्ड पेले पड़ा रहा और नीलम अपने बाबू की पीठ सहलाती रही।

नीलम सिसकते हुए बोली- बाबू मेरी पुरानी ससुराल में पड़ोस में एक औरत है पता है वो किसी भी आदमी पर जब गुस्सा होती है तो कैसी गाली देती हैं

बिरजू- पुरानी ससुराल?

नीलम- अरे हाँ मेरे बुध्धू राम, मेरे बच्चे के पिता जी......पुरानी ससुराल....नई तो ये है न

नीलम ने एक चपत अपने बाबू की पीठ पर मारा तो बिरजू ने जवाब में लन्ड बूर में से आधा निकाल के एक गच्चा जोर से मारा, नीलम गनगना गयी।

नीलम- हाय बाबू.....धीरे से......ऊऊऊऊईईईईईई अम्मा

बिरजू - अरे हां, तो फिर.....कैसे गाली देती है वो।

नीलम- वो बोलती है......"साला अपनी मईया को चोद के पैदा हुआ है"........अब बताओ कोई अपनी माँ को चोद के खुद कैसे पैदा होगा ?

बिरजू और नीलम दोनों हंसने लगे।

बिरजू- उसका बेटा ऐसे ही पैदा हुआ होगा, उसी को चोद के, तभी उसे पता है।

नीलम- हाँ सही कहा आपने बाबू।

बिरजू धीरे धीरे लंड बूर में अंदर बाहर करने लगा

नीलम सिसकने लगी और बोली- जरा भी देर लंड को बूर में घुसे हुए रोककर आराम नही करने देते ये मेरे बुध्धू राम.....बाबू

बिरजू- क्या करूँ मेरी छिनाल, तेरी बूर है ही इतनी मक्ख़न की डालने के बाद रुका ही नही जाता।

नीलम सिसकते हुए- बाबू

बिरजू- हाँ मेरी रानी

नीलम- अपने दामाद के सामने अपनी छिनाल बिटिया को चोदोगे?

बिरजू- दामाद के सामने.....मतलब

बिरजू बराबर बूर को हौले हौले चोद रहा था और दोनों सिसकते भी जा रहे थे

नीलम- अरे मेरा मतलब वो बगल में सोता रहेगा और आप अपनी सगी बिटिया को बगल में लिटाकर चोदना........हाय कितना मजा आएगा.....कितना रोमांच होगा।

बिरजू को ये सोचकर अत्यधिक रोमांच सा हुआ कि कैसा लगेगा एक ही बिस्तर पर बगल में मेरा दामाद लेटा होगा और मैं अपनी सगी बेटी को उसके पति के मौजूदगी में चोदुंगा।

रोमांच में आकर उसने अपने धक्के थोड़ा तेज ही कर दिया, नीलम के दोनों पैर उसने उठाकर अपनी कमर पर लपेट दिए और थोड़ा तेज तेज अपनी बेटी की बूर में लंड पेलने लगा, नीलम की तो मस्ती में आंखें बंद हो गयी, क्या मस्त लौड़ा था उसके बाबू का, कैसे बूर के अंदर बाहर हो रहा था। मस्ती में वो अपने बाबू की पीठ सहलाने लगी और उन्हें दुलारने लगी।

बिरजू- हां मेरी जान, मजा तो बहुत आएगा पर ये होगा कैसे, क्योंकि अपनी बिटिया को अब मैं वहां छोड़ नही सकता, किसी न किसी बहाने यहीं रखूंगा, तो ये मजा मिलेगा कैसे? लेकिन अगर ये काम तेरी पुरानी ससुराल में ही हो तो मजा और भी आ जायेगा क्यों?

नीलम- हाँ बाबू......आह..... उई....बाबू जरा धीरे धीरे हौले हौले चोदो....बात तो आप सही कह रहे हो, आप अगर ससुराल में आकर मुझे अपने दामाद के बगल में लिटा के चोदोगे तो रोमांच से बदन कितना गनगना जाएगा, लेकिन इसके लिए फिर मुझे वहां जाना पड़ेगा, बाबू अब मैं कहीं भी रहूँ बस मुझे आपका नशीला सा ये लन्ड मिलना चाहिए बस।

बिरजू- तेरी बूर के बिना मैं भी नही रह सकता मेरी जान, सिर्फ एक दो दिन के लिए वहां जाना फिर आ जाना।

नीलम- बाबू एक काम करो न एक बार अपने दामाद को यहीं बुला लो, एक बार यहीं पर उनकी मौजूदगी में चुदाई करेंगे।

बिरजू जोश में आकर हुमच हुमच कर नीलम की रसीली बूर चोदने लगा, दोनों कामुक प्लान बनाते जा रहे थे और घचा घच्च चुदाई भी कर रहे थे, नीलम कभी कभी तेजी से सिसक देती तो कभी कभी वासना में अपनी गांड उछाल उछाल कर चुदने लगती।

बिरजू- हां मेरी बेटी ये भी सही कहा तूने, तू ही किसी बहाने से बुला फिर तेरे पति के सामने तुझे ही हम चुदाई करेंगे।

नीलम- मेरे पति के सामने

नीलम ने आंख नाचते हुए कहा

बिरजू- हां तेरे पति के सामने ही तो

नीलम- पगलू मेरे पति तो सिर्फ और सर्फ आप हो, वो तो बस नाम के हैं अब

बिरजू- अच्छा जी

नीलम- हम्म

बिरजू- मैं तो पिता हूँ तेरा

नीलम- पति भी हो और पिता तो हो ही......ठीक है मैं उनको कल ही कैसे भी करके बुलाती हूँ एक दिन के लिए।

बिरजू- हाँ ठीक

बिरजू तेज तेज जोश में धक्के मारने लगा, नीलम मस्ती में गांड उठा उठा के चुदवाने लगी, तेज तेज सिसकियों की आवाज गूंजने लगी, दोनों पूर्ण रूप से नंगे थे। तेज तेज धक्कों से नीलम का पूरा बदन हिल रहा था, जोर जोर से सिसकते हुए वो अपने बाबू को सहलाये और दुलारे जा रही थी और वासना में सराबोर होकर कामुक बातें बोले जा रही थी- हाँ बाबू ऐसे ही चोदो..........ऐसे ही हुमच हुमच के तेज धक्के मारो.......मेरी बुरिया में............आह बाबू.............ऊऊऊऊईईईईईई........... थोड़ा किनारे से बूर की दीवारों से रगड़ते हुए अपना लंड अपनी इस रंडी की बूर में पेलो.......रगड़ता हुआ बच्चेदानी तक जाता है तो जन्नत का मजा आ जाता है पिता जी...........मेरे पिता जी..........आह..... मेरे बाबू जी.........चोदो अपनी बेटी को..........तरस मत खाओ...........बूर तो होती ही है फाड़ने के लिए..............एक बार और चोद चोद के फाड़ दो मेरी बूर...........आआआआआहहहहहहह

नीलम ऐसे ही बड़बड़ाये जा रही थी और बिरजू तेज तेज धक्के मारे जा रहा था, एकाएक बिरजू ने नीलम की चूची को मुँह में भरा और पीने लगा, मस्ती में नीलम और मचल गयी, पूरा बदन उसका वासना में एक बार फिर ऐंठने सा लगा, एकाएक बाहर कुछ लोगों की हल्की हल्की आवाजें आने लगी।

नीलम तो पूरी मस्ती में थी पर बिरजू के कान खड़े हो गए, अभी तक तो वो यही सोच रहे थे कि बारिश हो रही है तो कौन आएगा सुबह सुबह, पर कोई तो था, बिरजू ने मन में कोसते हुए उठने की कोशिश की तो नीलम ने उनकी कमर को थाम लिया और पूछा- बाबू क्या हुआ चोदो न, रुक क्यों गए।

बिरजू- लगता है कोई आया है बाहर

नीलम- पर बाबू वो रोने लगेगी।

बिरजू- वहीं जिसके मुँह से आप निवाला छीन रहे हो सुबह सुबह, देखो न कैसे मजे से खा रही है।

बिरजू आश्चर्य से- कौन?....किसके मुँह से निवाला छीन रहा हूँ, मैं समझा नही।

नीलम- अरे मेरे बुध्धू राम........ये

ऐसा कहते हुए नीलम ने बड़ी अदा से अपने बाबू का हाँथ पकड़ा और अपनी बूर पर ले गयी जो बिरजू का पूरा लंड लीले हुए थी, और दोनों नीचे देखने लगे, लंड पूरा बूर में घुसा हुआ था।

नीलम- किसी के मुँह से निवाला नही छीनते बाबू, देखो कैसे बेसुध होकर मस्ती में आपका मोटा लंड खा रही है मेरी ये बुरिया, अब आप निकाल लोगे तो ये रोने लगेगी और फिर चुप कराए चुप भी नही होगी, अभी मजधार में न छोड़ो इसे, न रुलाओ बाबू इसको, इसके हक़ का खा लेने दो इसे पूरा। अब निवाला मुँह में ले रखा है तो खा लेने दो पूरा अपनी इस रांड की बुरिया को।

इतना सुनते ही बिरजू ने सर उठा के नीलम की आंखों में देखा तो नीलम खिलखिला के हंस भी दी और वासना भारी आंखों से विनती भी करने लगी की बाबू अभी चोदो रुको मत चाहे आग ही लग जाये पूरी दुनिया को।

बिरजू ने बड़े प्यार से नीलम के गाल को चूम लिया और बोला- बहुत प्यारी प्यारी बातें आती है मेरी इस बिटिया को, तेरी इन बातों का ही दीवाना हूँ मैं।

नीलम सिसकते हुए- बिटिया नही रांड, रांड हूँ न आपकी मैं।

बिरजू- हां मेरी रांड, अब तो चाहे कुछ भी हो अपनी रांड को चोद के ही छोडूंगा।

और फिर बिरजू ने नीलम के ऊपर अच्छे से चढ़ते हुए अपने दोनों हांथों से उसके विशाल 36 की साइज की चौड़ी गांड को अपने हांथों से उठा लिया और अपना मोटा दहाड़ता लंड तेज तेज धक्कों के साथ पूरा पूरा बूर में डाल डाल कर कराहते हुए रसीली बूर चोदने लगा, नीलम की दुबारा सिसकिया निकलने लगी, कुछ ही देर में पूरा कमरा मादक सिसकियों से गूंज उठा, पूरी पलंग तेज तेज धक्कों से चरमरा गई, करीब 10 मिनट की लगातार बाप बेटी की धुँवाधार चुदाई से दोनों के बदन थरथराने लगे और दोनो ही एक बार फिर तेज तेज हाँफते हुए कस के एक दूसरे से लिपट गए और सीत्कारते हुए एक साथ झड़ने लगे, कुछ देर तक झड़ने के बाद दोनों शांत होकर एक दूसरे को चूमने सहलाने लगे फिर बिरजू ने एक जोरदार चुम्बन नीलम के होंठों पर लिया और बोला-अब जाकर देखूं जरा क्या मामला है।

नीलम- हाँ बाबू जाओ अब, अब नही रोयेगी ये, पेट भर गया इसका अभी के लिए तो।

बिरजू- भूख लगेगी तो फिर बताता ठीक

नीलम ने भी मुस्कुराते हुए- ठीक बाबू...बिल्कुल

बिरजु ने झट से कपड़े पहने और बाहर आ गया, नीलम ने भी कपड़े पहन लिए।

बिरजू ने बाहर आके देखा तो किसी जानवर के पैरों के निशान थे द्वार पर, देखते ही वो समझ गया कि सुबह सुबह किसी के जानवर ने खूंटे से रस्सी तुड़ा ली होगी और इधर उधर भागता हुआ उसके द्वार पर आ गया होगा और उसको पकड़ने के लिए लोग आए होंगे, खैर अब तो कोई नही था द्वार पर, वो बाहर आ गया और एक अंगडाई लेते हुए जानवरों को चार डालने चला गया, नीलम भी मस्ती में काफी देर बिस्तर पर बैठी रही ये सोचते हुए की जिंदगी में अचानक ही कितने रंग घुल गए, ईश्वर जब देता है तो सच में छप्पर फाड़ के देता है, आज वो बहुत ही खुश थी, उठी खाट से और नाश्ता बनाने लगी।
 
Update- 54

उधर नीलम की माँ अपने मायके जामुन से भरा थैला लेकर पहुँच गयी थी, नीलम की माँ का नाम नगमा था, नीलम के नाना के यहां उसके नाना और मामा मामी ही रहते थे, नीलम के मामा उसके नाना के साथ खेती बाड़ी का काम संभालते थे, नीलम के नाना उम्रदराज तो हो गए थे पर अच्छे खान पान की वजह से शरीर ज्यादा ढला नही था, खेती बाड़ी का काम करने की वजह से सेहत अच्छी थी।

नगमा जब अपने मायके पहुँची तो शाम हो चुकी थी, नीलम की मामी ने उसका स्वागत किया, उसके मामा भी शाम तक घर आ चुके थे, बस उसके नाना अभी तक खेत से नही आये थे, नीलम की माँ नगमा ने पानी वानी पिया और आराम करने लगी।

नीलम की मामी- मेरे नंदोई और मेरी बिटिया नीलम कैसी है?

नगमा- सब ठीक है भौजी।

नीलम की मामी- नीलम को क्यों नही लायी, कम से कम उसे तो ले आती, कितना वक्त हो गया उसे देखे, जब भी आती हो अकेले ही आ जाती हो।

नगमा- अरे भौजी वो तो मायके ही कभी कभी आती है, कुछ दिन रहती है फिर चली जाती है अपनी ससुराल, लेकिन अब इस बार दुबारा आऊंगी तो उसको भी लिवा के आऊंगी, मैं इस बार आयी ही हूँ किसी खास काम से।

नीलम की मामी- कैसा काम, क्या हुआ?

नगमा ने फिर नीलम की मामी को सब कुछ बता दिया कि वो किस काम से आई है, नीलम की मामी ने कहा कि बिल्कुल ठीक है, ससुर जी उस बुढ़िया को जानते हैं वो तुम्हे लिवा कर वहां उसके पास चले जायेंगे, जाके पहले पता कर लेंगे फिर नीलम को लिवा आना दिखा देंगे, देखो क्या बताती है वो बुढ़िया।

नगमा- हाँ भौजी, अपना कर्म तो करना ही पड़ता है बाकी तो किस्मत है।

नीलम की मामी- चिंता मत कर ननद रानी सब ठीक हो जाएगा, हमारी नीलम की गोद भी सूनी नही रहेगी, तू चिंता बिल्कुल मत कर।

नगमा- भौजी लो ये जामुन खाओ नीलम ने खासकर अपने मामा मामी और नाना के लिए पेड़ से तोड़कर भेजा है, भैया लो आप भी खाओ मेरे ससुराल के जामुन।

नीलम के मामा वहीं बैठे थे वो भी नीलम की माँ नगमा से बातें कर रहे थे, सब जामुन खाने लगे।

नगमा- अरे इस जामुन को तोड़ने के चक्कर में पेड़ से भी गिरी है वो।

नीलम के मामा और मामी एक साथ- कौन?........नीलम

नगमा- हां वही.......तुम्हारी लाडली......नीलम, मानती तो है नही वो, जानती ही हो बचपन से जिद्दी है, सुने तब न किसी की.....बोल रही थी कि रहने दे लेकिन मानी नही, बोली कि मेरे मामा मामी और नाना के लिए जामुन जरूर लेके जाना।

नीलम के मामा- अरे उसे लगी तो नही कहीं, क्या जरूरत थी ये सब करने की, वो भी न पगली है बिल्कुल।

नीलम की मामी ने भी उसके मामा की बात में सहमति जताई।

नगमा- लगी नही बच गए, नीचे उसके बाबू खड़े थे उन्ही के ऊपर गिरी और वो दोनों बगल में पड़ी खाट पर गिरे....भगवान का शुक्र है बच गए, बस उसके बाबू के हाँथ में थोड़ी सी चोट आई थी पर अब वो भी ठीक हैं।

नीलम की मामी- बताओ नीलम को हमारी कितनी चाहत है, अपनी जान जोखिम में डालकर हम लोगों के लिए जामुन भेजे हैं मेरी लाडली ने। ऐसी बेटी सबको दे भगवान।

तभी नीलम के नाना खेत से आ जाते हैं, नीलम के नाना का नाम चंद्रभान सिंह था।

अपनी बेटी नगमा (नीलम की माँ) को देखते ही उनकी आंखें चमक गयी, मानो खुशियों का खजाना मिल गया हो।

चंद्रभान- अरे बिटिया कब आयी।

नगमा- अभी अभी आयी बाबू, आप तो अब घर पर आराम किया करो बाबू, अब खेती बाड़ी भैया संभालेंगे, काहे परेशान होते हो।

चंद्रभान- अरे बिटिया इनमे क्या परेशानी, खेती बाड़ी काम धाम करता रहूंगा तो शरीर में ताकत और हिम्मत रहेगी, घर बैठ के भी क्या करूँगा, इसलिए मन बहलाने के लिए खेत में चला जाता हूँ।

नगमा- वो तो ठीक है बाबू, पर फिर भी।

चंद्रभान- अरे बेटी ठीक है सब, तू बता तेरे ससुराल में सब ठीक है।

नगमा- हाँ बाबू, ठीक है सब, लो जामुन खाओ, तुम्हारी नातिन ने भेजे हैं तुम्हारे लिए।

चंद्रभान ने एक दो जामुन उठाते हए- अच्छा, जुग जुग जिये मेरी बिटिया, कितने बढ़िया बढ़िया जामुन भेजें हैं।

नगमा- हाँ बाबू, जो घर के आगे पेड़ है न उसी पेड़ के हैं ये जामुन, इस वक्त बहुत जामुन लगे हैं उसमें।

चन्द्रभान- बहुत मीठे और रसीले हैं, बिल्कुल मेरी बेटी की तरह।

(चन्द्रभान ने ये बात बिल्कुल धीरे से बोली)

नगमा ये सुनकर झेंप सी गयी और हल्का सा मुस्कुरा दी, तिरछी नज़रों से देखा कि कहीं नीलम के मामा मामी ने तो ये बात नही सुनी, पर वो लोग आपस में कुछ और बात करने लगे थे।

चन्द्रभान ने कुछ जामुन खाये फिर बोला- बेटी इसे अभी रख दे मेरे हिस्से का रात को देना खाना खाने के बाद खाऊंगा मैं।

नगमा- ठीक है बाबू अभी रख देती हूं आपके हिस्से का।

चन्द्रभान अपनी बेटी नगमा को और नीलम की माँ नगमा अपने पिता को चोरी चोरी एक दूसरे की आंखों में देखकर मुस्कुरा रहे थे, जैसे कि बेसब्री से किसी चीज़ का इंतज़ार हो।

चन्द्रभान अपनी बेटी नगमा को देखते हुए मुस्कुराकर उठकर कोई और काम करने चला गया, शाम हो ही चुकी थी, खाना बनाने की तैयारी करनी थी, नीलम की मामी ने बोला- दीदी (नीलम की मामी नीलम की माँ को कभी प्यार से ननद रानी तो कभी दीदी बोलती थी), तुम बैठो आराम करो मैं खाना बनाती हूँ।

नगमा- अरे मैं भी मदद करती हूं न तेरी, दोनों साथ में मिलकर बना लेते है, भैया थोड़ा कुएँ से पानी ला दीजिए, घर में बाल्टी खाली पड़ी है।

नीलम के मामा- हां दीदी मैं अभी ला देता हूँ।

नीलम के मामा कुएँ से पानी लेने बाहर चले गए, नीलम की माँ और उसकी मामी खाना बनाने लगी, कुछ ही देर में नीलम के मामा ने सारी बाल्टियां भर दी और वो भी किसी काम से बाहर चले गए।

नीलम की मामी- दीदी मुझे न जरा रात को कीर्तन में जाना है पड़ोस में, चाहो तो तुम भी चलो।

नगमा- अरे नही भौजी तू ही चली जा, रात को भैया और बाबू जी को खाना भी तो खिलाना है।

नीलम की मामी- हाँ ये भी ठीक कहा तुमने, तो तुम पिताजी और अपने भैया को खाना परोस देना मैं थोड़ा देर से ही आ पाऊंगी।

नगमा- कोई बात नही भौजी, खाना तो बना ही रहे हैं, खाना बना कर तुम चली जाना और मैं परोस दूंगी बाबू जी और भैया को, पर तुम खाना खा के जाना कीर्तन में।

नीलम की मामी- अरे नही दीदी, मैं आके खाऊँगी, तुम खा लेना और अपने भैया और पिताजी को खाना परोस देना, तुम्हारे भैया भी कहीं गए ही है लगता है देर से ही आएंगे।

नगमा- ठीक है भौजी मैं सम्भाल लुंगी तुम निश्चिन्त होकर जाओ।

फिर दोनों ने जल्दी जल्दी खाना बनाया।

नीलम की मामी- ननद रानी

नगमा- हां भौजी

नीलम की मामी- पिता जी के पैर में न..... सीधे अंगूठे के नाखून के पास परसों चलते हुए कहीं ठेस (ठोकर) लग गयी थी, तो उनको न सरसों का तेल उसमे लहसुन डाल के थोड़ा गरम करके लगा देना पैर में।

नगमा- कैसे......कैसे लग गयी बाबू को?

(नगमा की मानो जान ही निकल गयी हो सुनके)

नीलम की मामी- अरे वो कहीं से आ रहे होंगे तो कहीं रास्ते में लग गयी थी, पर अब ठीक हो गया है थोड़ा बहुत बाकी है, एक दो दिन और तेल ठीक से लगाएंगे तो ठीक हो जाएगा।

नगमा- बाबू गए कहाँ?

नीलम की मामी- जाएंगे कहाँ अब शाम को वहीं दालान में लेटे होंगे, अभी खाना खा के चले जायेंगे खेत में सोने, मचान पर

नगमा- खेत में सोने, मचान पर, आजकल खेत में सोते हैं क्या बाबू?

(यहां मैं आप लोगों को बता दूं कि मचान एक तरीके की खाट होती है जिसको चार बल्ली गाड़कर ऊंचाई पर बनाया जाता है, इसके ऊपर एक shed भी होता है घास फूस का, मचान को लोग अक्सर गांव में खेतों की रखवाली करने के लिए बनाते हैं, यह एक तरीके की झोपड़ी होती है जो कि जमीन से 8-10 फ़ीट ऊपर होती है।)

नीलम की मामी- हां.... मक्का बोया है न खेत में तो रखवाली करनी पड़ती है, रात को नीलगाय आती हैं अक्सर, और न भगाओ तो सारी फसल बर्बाद, इसीलिए वहीं खेत में एक मचान बना रखा है, रात को पिताजी खाना खाने के बाद वहीं चले जाते है और फिर सुबह ही आते हैं।

नगमा- भैया नही जाते?

नीलम की मामी- एक दो दिन शुरू में गए थे पर फिर पिताजी ने ही मना कर दिया, बोला तुम घर पे ही सोया करो, खेत में मैं चला जाऊंगा।

नीलम की मामी पड़ोस में कीर्तन में चली गईं।

नगमा को मौका मिला, उस वक्त घर में सिर्फ नगमा और उसके बाबू चन्द्रभान ही थे, नगमा ने झट से सरसों के तेल में लहसुन डालके गर्म किया और चिमटे से गर्म कटोरी को पकड़के एक प्लेट में रखा और लेकर पहुंच गई अपने बाबू चन्द्रभान के पास जो कि दालान में खाट पर लेटे आराम कर रहे थे।

नगमा- बाबू

चन्द्रभान की आंख खुली अपनी बिटिया की रसीली आवाज सुनकर- हाँ बेटी

झट से उठ बैठा खाट से चन्द्रभान

नगमा ने गर्म तेल की कटोरी बगल में रखी और झट से अपने बाबू की बाहों में समा गई, दोनों एक दूसरे को ताबड़तोड़ चूमने लगे।

चन्द्रभान- कब से इंतज़ार कर रहा हूँ दालान में लेटकर कि तू अब आएगी.....अब आएगी.... पर इतनी देर लगा दी......ह्म्म्म...... एक तो वैसे ही तू इस बार मायके कितने दिनों बाद आई है, तेरे बिना मैं कैसे रहता हूँ ये मुझे ही पता है मेरी बेटी। तेरी गुझिया के बिना मैं

बेकाबू होने लगता हूँ ये बात तुझे पता है न, तेरी गुझिया मैं कब से खा रहा हूँ जब तेरा ब्याह भी नही हुआ था, पर मेरा आजतक मन नही भर इससे, देख ले ये चीज़ ही ऐसी है, बेटी की गुझिया और

इसलिए मैं वहाँ से उठकर दालान में आकर लेट गया कि तू जल्दी आएगी।

(चन्द्रभान अपनी बेटी नगमा की बूर को गुझिया बोलता था बड़े प्यार से, यहां गुझिया का मतलब बूर से है, नगमा अपने बाबू के मुँह जब भी ये शब्द सुनती थी शरमा कर मुस्कुरा देती थी)

चन्द्रभान नगमा को बेसब्री से चूमता हुआ एक ही बार में इतना कुछ कह गया।

नगमा- आआआआहहह.....बाबू, बर्दास्त तो मुझसे भी नही होता पर क्या करती दीदी थी साथ में न, तो उन्ही के साथ लगी थी अब वो पड़ोस में गई हैं कीर्तन में, तो मैं झट से मौका पाते ही आ गयी आपके पास। इस वक्त घर में मेरे और आपके सिवा कोई नही है, भैया भी कहीं गए हैं, आपके बिना तो मैं भी नही रह पाती बाबू इसलिए ही तो मायके आने का बहाना ढूंढती रहती हूं, अब आ गयी हूँ न आपको आपकी प्यारी से गुझिया खिलाने, जैसे जी में आये खा लीजिएगा। इस बार थोड़ा ज्यादा वक्त हो गया, जुदाई बर्दास्त नही हुई तो चली आयी एक बहाना लेकर।

नगमा और चन्द्रभान एक दूसरे से लिपटे चूम रहे थे एक दूसरे को, जो इन दोनों बाप बेटी के बीच था वो आज का नही था, वो था बरसों पुराना।
 
Update- 55

नगमा- अच्छा पैर दिखाओ, देखूं जरा चोट कहाँ लगी मेरे साजन को, मैं नही रहूँगी तो ऐसे ही बहक बहक के चलोगे न, चाहे चोट ही लग जाये, दिखाओ जरा

नगमा ने प्यार से थोड़ा शिकायत भरे लहजे में कहा।

चन्द्रभान- क्या करूँ मेरी बेटी जब तू ससुराल चली जाती है तो मुझे तेरी गुझिया की बहुत याद आती है और जब मीठी मीठी गुझिया खाने को नही मिलती तो मैं बावरा सा होने लगता हूँ। ऐसे ही तेरी याद में खोया एक दिन खेत से आ रहा था तो रास्ते में ठोकर लग गयी, ये देख....पर अब तो ठीक हो गया है।

नगमा- मैं इसलिए ही तो मायके आती हूँ, आपको अपनी गुझिया खिलाने, आपके बिना मैं भी कहाँ रह पाती हूँ मेरे साजन, अच्छा लाओ पैर इधर करो गर्म तेल लगा दूँ बिल्कुल ठीक हो जाएगा अब।

चन्द्रभान- सच मेरी बेटी अब तू अपने हाथ से इस चोट में तेल लगा देगी न तो ये बिल्कुल ठीक हो जाएगा।

नगमा ने गर्म गर्म तेल चन्द्रभान के अंगूठे पर लगाया और थोड़ा मालिश किया।

चंद्रभान खाट पर लेटने लगा नगमा खाट के पास खड़ी हो गयी और तेल की कटोरी को थोड़ा दूर रखा, चंद्रभान ने खाट पर लेटकर बाहें फैला दी और नगमा झट से अपने बाबू ले ऊपर चढ़ गई और उनकी बाहों में समा गई, और दोनों एक दूसरे की आंखों में देखने लगे।

नगमा- बाबू.....कहीं भैया आ न जाएँ। चलो पहले खाना खा लो फिर अपनी गुझिया खाना।

चंद्रभान ने नगमा के होंठों को चूमते हुए बोला- एक बार नाम तो बोल उसका।

नगमा- अब समझ जाइये न

चंद्रभान ने नगमा के गालों को हौले से चूमते हुए बोला- बोल भी दे न मेरी रानी बेटी, तेरे मुँह से सुनके बहुत जोश चढ़ता है, इस वक्त तो कोई नही है घर में, कौन सुनेगा?

नगमा कुछ देर चंद्रभान की आंखों में देखकर मुस्कुराती रही फिर धीरे से कान में बोली- बूबूबूबूबूबूरररररर.......आपकी बेटी की बूर......चलो खाना खा लो फिर उसके बाद अपनी बेटी की फूली फूली बूर खाना...........अब खुश

चंद्रभान- आह..... अब आया न मजा....खाना खिलाने से पहले नही खिलाओगी अपनी बूर, मेरा तो अभी ही मन कर रहा है।

नगमा- थोड़ा सब्र बाबू... ..अभी इस वक्त भैया कभी भी आ सकते हैं, खाना खा लो फिर उसके बाद, खाना खाने ले बाद मीठा खाने में और मजा आता है, आप तो अब खेत में सोते हो न बाबू मचान पर।

चंद्रभान- हाँ खेत में जाता हूँ सोने......इसलिए तो बोल रहा हूँ कि चखा दे इसे...... फिर तो मैं खेत में चला जाऊंगा...तो अपनी गुझिया कैसे खाऊंगा।

(चंद्रभान ने ये बात नगमा की बूर को साड़ी के ऊपर से ही सहलाते हुए कहा, नगमा की आंखें मस्ती में बंद हो गयी, साड़ी के ऊपर से चंद्रभान कुछ देर बूर को सहलाता रहा)

नगमा- बाबू आपको मैं आपकी गुझिया खेत में ही आकर रात को परोसुंगी, आप चिंता मत करो, रात को खेत में मचान पे लेटकर करने में बहुत मजा आएगा।

चंद्रभान ने मस्ती में कहा- क्या करने में मेरी बिटिया।

नगमा- वही

चंद्रभान- वही क्या मेरी बिटिया

नगमा ने धीरे से कहा- चोदा चोदी.... और क्या.....(नगमा फिर थोड़ा शरमा गयी)

चंद्रभान- लेकिन तू खेत में कैसे आएगी वो भी रात को।

नगमा- बाबू.....एक बेटी को जब उसके पिता के लन्ड की प्यास लगती है न तो वो कहीं भी चली आएगी, उसकी चिंता आप मत करो.....बस खेत में जाते वक्त जरा जोर से ये बोलकर जाना कि नगमा... ओ नगमा बेटी....मेरा बचा हुआ जामुन खेत में ही पहुँचा देना मैं वहीं खा लूंगा.....बस इतना कर देना।

(नगमा अपने मुँह से कई दिनों के बाद लन्ड शब्द बोलकर फिर से शरमा गयी और अपने बाबू के सीने सर छुपा लिया)

चंद्रभान- मतलब आज रात को खेत में बेटी की गुझिया खाने को मिलेगी।

नगमा- हां.....बाबू.......गरम गरम.....मीठी मीठी गुझिया......बेटी की

इतने में नीलम के मामा के आने की आहट हुई तो दोनों अलग हो गए और नगमा दालान से बाहर आ गयी अपने भैया को देखते ही बोली- भैया आ गए, चलो खाना खा लो, खाना तैयार है।

नीलम के मामा- दीदी तुम बाबू को खिला दो मैं तो आज मित्र के यहाँ किसी काम से गया था वही खा लिया खाना अब मुझे आ रही है नींद, खेत में भी आज बहुत काम था, थक गया हूँ काफी, तुम खा लो बाबू को खिला दो।

नगमा- अच्छा ठीक है फिर जाओ सो जाओ, भौजी तो कीर्तन में गयी है, थोड़ा देर से ही आएंगी।

नीलम के मामा- हाँ मुझे पता है, बताया था उसने मुझे, आएगी तो खा लेगी निकाल के खाना, तुम खा लो और बाबू जी को परोस दो खाना, तुम भी तो काफी थक गई होगी।

नगमा- ठीक है भैया जाओ सो जाओ मैं और बाबू खा लेंगे खाना

नीलम के मामा तो चले गए अपने कमरे में सोने।

नगमा- बाबू.....ओ बाबू चलो खाना खा लो अब, रात हो गयी काफी, देखो 9 बजने को हैं।

चंद्रभान- ठीक है बेटी तू खाना परोस मैं आता हूँ।

नगमा ने रसोई के बाहर दरी बिछा कर अपने बाबू का खाना परोस दिया। चंद्रभान आया और खाना खाने बैठ गया।

चंद्रभान- तेरा खाना कहाँ है।

नगमा- बाबू आप खा लीजिए मैं भौजी के साथ थोड़ा बाद में खाऊँगी।

चंद्रभान- अरे मेरे साथ खा न, बहू जब आएगी तो उसके साथ भी खा लेना।

चंद्रभान ने एक निवाला नगमा के मुँह में डाल दिया और दोनों एक ही थाली में खाना खाने लगे, नगमा भी अपने हांथों से प्यार से चंद्रभान को खाना खिलाने लगी, कुछ देर खाने के बाद नगमा बोली- अच्छा बाबू अब आप खाइए।

और वो उठने लगी तो चंद्रभान बोला- खाने में मेरी मनपसंद चीज़ इस बार नही मिली मुझे।

नगमा ने उंगली से इशारा करते हुए कहा- इस बड़ी कटोरी के नीचे वाली कटोरी में है बाबू आपकी मनपसंद चीज, पूरा खाना खाने के बाद उसका भोग करना और हंसते हुए रसोई में चली गयी और दाल चावल लाने, थोड़ा और दाल चावल लेके आयी और चंद्रभान की थाली में परोस दिया, चन्द्रभान ने जी भरके अपनी बेटी को निहारते हुए खाना खाया।

नगमा भी वहीं बैठे बैठे बड़े प्यार से अपने बाबू को निहारती रही, बीच बीच में चंद्रभान निवाला नगमा के मुँह में डालता तो वो आ करके मुँह खोलती और निवाला खाने लगती, दोनों हंस भी देते मस्ती करते हुए।

खाना खाने के बाद चंद्रभान ने नगमा को देखते हुए वो बड़ी कटोरी हटाई और उसके नीचे छोटी कटोरी उठा के सूँघा और बोला- वाह...... वही खुशबू...... मजा आ गया।

नगमा- मजा आ गया बाबू

चंद्रभान- बहुत, ये है असली चीज़

नगमा- मेरा पेशाब आपको इतना पसंद है

चंद्रभान- बहुत मेरी जान.....बहुत

नगमा- तो पी लो.....कम है तो और भर दूँ कटोरी में मूत के

नगमा वासना से भर गई

चंद्रभान- भरना है तो मेरा मुँह ही भर दे न मेरी रानी उसमे मूतकर.........खाने के बाद मुझे तेरे मूत की महक मिल जाय तो मानो जन्नत मिल गयी।

चंद्रभान ने कटोरी उठाकर नगमा को देखते हुए उसमे अपनी जीभ निकाल के डुबोई और जीभ से चाट चाट के अपनी बेटी का महकता पेशाब पीने लगा मानो कोई शेर मांस खाने के बाद नदी किनारे पानी पीने आया हो।

चन्द्रभान- वाह क्या स्वाद है मेरी बेटी की गुझिया के पानी का।

चन्द्रभान कुछ देर कटोरी में पेशाब को चाटता रहा फिर गट गट करके पी गया।

नगमा एक टक लगाए अपने बाप को देखती रही और मुस्कुरा दी, चंद्रभान की आंखों में वासना के डोरे साफ झलक रहे थे।

नगमा ने धीरे से कहा- हाय बाबू आपको याद है पहली बार जब आपने मेरी कच्ची बूर से पेशाब पिया था, मेरी बूर कितनी कच्ची थी उस वक्त।

(नगमा बूर शब्द बहुत धीरे से बोल रही थी कि कहीं उसके भैया न सुन ले, वैसे तो वो सो गया था पर फिर भी डर तो था ही)

चंद्रभान- तेरी कच्ची बूर का स्वाद मैं कभी नही भूल सकता बेटी, वो पेशाब जो मैंने पहली बार पिया था।

नगमा- उस वक्त मैं कितना रोई थी जब अपने पहली बार अपने मूसल से मुझे "चोदा" था, मैं रोये भी जा रही थी और चुदवा भी रही थी, सच बताऊं बाबू मैं रो भले रही थी पर बाद में मुझे बहुत मजा आने लगा था, तभी से तो मैं इसकी दीवानी हो गयी।

चंद्रभान- किसकी मेरी बिटिया..?

नगमा- अब आगे बताऊंगी खेत में.....की मैं किसकी दीवानी हूँ।

चंद्रभान- मूत पिलाएगी अपना न.....खेत में

नगमा- क्यों नही.....मेरे सजना.....मेरे बाबू जो जो पियेंगे वो वो पिलाऊंगी।

चंद्रभान- तो फिर अब मैं चलता हूँ खेत में......तू जल्दी आना।

नगमा- पर बाबू भौजी आ जाएगी तब ही आऊंगी..... पर आप एक बार बोल के जाइये...थोड़ा रुक जाइये....भौजी को आने दीजिए उनके सामने बोलके जाइये।

चंद्रभान- ठीक है मेरी जान जैसी तेरी मर्जी

चंद्रभान खाना खा के और अपनी बेटी का परोसा हुआ पेशाब पी के बाहर चला गया

थोड़ी देर में जैसे ही नीलम की मामी आयी चंद्रभान ने बाहर से आवाज लगाई।

चंद्रभान- नगमा बेटी

नगमा- हाँ बाबू

चंद्रभान- अरे तूने खाना तो खिला दिया पर जो तू जामुन लायी थी मेरे हिस्से का वो तो रह ही गया, मैंने बोला था मुझे खाना खाने के बाद देना, अब मैं जा रहा हूँ खेत में....एक काम करना वहीं पहुँचा देना।

नगमा ने भी दिखावे के लिए- हां बाबू आप चलिए मैं ले आऊंगी आपके हिस्से का जामुन खेत मे।
 
Update- 56

चंद्रभान यह कहकर की मैं खेत में सोने जा रहा हूँ चला गया।

नगमा- भौजी चल अब खाना खा ले।

नीलम की मामी- हां दीदी चलो, सबने खा लिया खाना?

नगमा- हाँ, बाबू जी और भैया ने तो खा लिया।

दोनों ननद भौजाई ने खाना खाया।

नीलम की मामी- दीदी अभी तो आप पिताजी के पास जाओगी न, खेत में।

नगमा- हाँ भौजी, उन्होंने बोला है न कि खेत में ही पहुँचा देना मेरे हिस्से का जामुन, पहुँचा देती हूं, नही तो कल तक तो खराब हो जाएंगे, बाबू खेत में ही खा लेंगे।

नीलम की मामी- हाँ भौजी जरूर.....मैं भी चलूं क्या, अकेली कैसे जाओगी रात को खेत में।

नगमा- अरे नही भाभी मैं चली जाउंगी, ये तो मेरा मायका है यहां कैसा डर, तुम भैया का ख्याल रखो यहां।

इतना कहकर नगमा मुस्कुरा दी तो नीलम की मामी भी मुस्कुरा दी और बोली- वो तो मैं रोज ही रात को ख्याल रखती हूं तुम्हारे भैया का।

नीलम की मामी- दीदी अगर देर हो जाये तो वहीं सो जाना रात को, अकेले वापिस आना ठीक नही होगा।

नगमा- वहीं......वहां कहाँ सोऊंगी मैं भौजी?

नीलम की मामी- अरे पिताजी के पास मचान पर, और कहां, उनके बगल में सो जाना।

नगमा ऊपरी दिखावा करते हए- क्या भौजी तू भी न, पिता हैं वो, उनके पास सोऊंगी, वो भी इस उम्र में तुम भी क्या-क्या सुझाव देती हो भौजी, बड़ी शर्म आएगी मुझे...........अब कोई छोटी बच्ची थोड़ी न हूँ।

नीलम की मामी- अरे इसमें क्या शर्म, पिता ही तो हैं वो.............बगल में सोने में क्या हर्ज है?......बड़ी हो गयी हो तो क्या हुआ, हो तो बेटी ही...........आखिर इतनी रात को वापिस आना ठीक नही.........थोड़ा दूर भी तो है खेत, क्या अपने ऊपर भरोसा नही दीदी आपको (नीलम की मामी ने ये बात मुस्कुराते हुए कहा)

नगमा- कैसा भरोसा भौजी?

नीलम की मामी- यही की मन कहीं बहक गया रात को..…...तो हो जाएगा सब कुछ.......पिता जी के साथ ही......ह्म्म्म

नगमा- धत्त भौजी.......बेशर्म हो तुम बिल्कुल.......क्या बोलती हो तुम भी.......पिता हैं वो मेरे...........कितना गलत है ये...........बोलने से पहले सोच तो लो भौजी. ......लगता है तुम सोई हो अपने पिता के साथ एक ही खाट पे।

नीलम की मामी- हाँ दीदी सोई तो हूँ एक बार, मैं अपने मायके में।

नगमा- क्या सच?

नीलम की मामी- हाँ

नगमा- कब......कैसे.......आजतक कभी बताया नही तुमने?

नीलम की मामी- ऐसी बाते कोई बताई जाती हैं वो तो आज बात चली तो बता रही हूं।

नगमा- अच्छा!.. बताओ तो सही जरा मैं भी सुनू, मेरी भौजी ने क्या क्या किया है।

नीलम की मामी- तू किसी को बताएगी तो नही न।

नगमा- भौजी तुझे मेरे ऊपर विश्वास नही, तुम मेरी भौजी होने के साथ साथ एक अच्छी सहेली भी हो, मैं वचन देती हूं कभी किसी को नही बताऊंगी, और मैं भला बताऊंगी ही क्यों, क्या मैं अपनी भौजी का जो मुझे इतना सम्मान इतनी इज्जत देती हो उनको बदनाम करूँगी, कभी नही।

नीलम की मामी- ओह दीदी, अपने तो मेरा मन हल्का कर दिया।

नगमा- तो चल अब बता क्या क्या हुआ था? कैसे हुआ था? कब हुआ था?

नीलम की मामी- अरे अभी छः महीने पहले की ही बात है, जब मैं मायके नही गयी थी मेरी चाची के यहां ग्रह प्रवेश का कार्यक्रम था।

नगमा बड़े ध्यान से सुनते हुए- हम्म

नीलम की मामी- तभी की ही बात है, घर में काफी महमान आये हुए थे जगह की कमी थी, काफी देर रात तक घर का काम करती रही मैं, सब को खाना पीना खिलाकर, बर्तन वगैरह धोते धोते 11 बज गए रात के, ज्यादातर लोग सो ही गए थे, जब काम से फुरसत मिली तो खाना पीना खाकर सोने की जगह ढूंढने लगी, घर मे तो सारी महिलाएं कब्जा करके लेटी थी, बाहर सारे मर्द बिस्तर लगाए लेटे थे, अब बची मैं कहाँ जाऊं, कहाँ सोऊं, सोचा अम्मा के पास जाकर लेट जाती हूँ, उसके पास जाके देखा तो बगल में मेरी मामी लेटी थी, फिर मैं बरामदे में आ गयी, वहां कोने में एक खाट पे मेरे बाबू लेटे थे, उनकी खाट बिल्कुल एकांत में थी, वो जग रहे थे, उन्होंने मुझे इधर उधर बार बार आते जाते देखा तो उन्होंने मुझे अपने पास बुलाकर अपनी खाट पर सो जाने के लिए बोल दिया, मैं भी काफी थकी हुई थी, सोचा कि पिताजी के पास ही लेट जाती हूं, आखिर पिता ही तो है, इतनी रात को अब कौन यहां कोने में देखेगा, सुबह जल्दी उठकर चली जाउंगी, मुझे बहुत शर्म भी आ रही थी और अजीब भी लग रहा था, पहले तो नींद सता रही थी पर अब बाबू के पास लेटने की सोचकर एक अजीब से रोमांच और असमंजस में नींद ही उड़ गई मेरी, पर क्या करती बगल में लेट गयी, बाबू दूसरी तरफ मुँह करके लेट गए मैं दूसरी तरफ करवट लेकर लेटी थी।

काफी देर तक लेटी रही पर नींद ही नही आ रही थी, इतना तो मुझे पता था कि बाबू को भी नींद नही आ रही थी, मुझे न जाने क्यों बहुत अजीब सा लग रहा था, मैं कभी इस करवट लेटती तो कभी उस करवट, पर बाबू एक ही करवट, मेरी तरफ पीठ करके लेटे थे, काफी देर के बाद मुझे नींद आयी......आखिर सो गई मैं यूँ ही लेटे लेटे........पर रात को करीब 2 बजे के आस पास जब अचानक मेरी नींद खुली तो मैंने अपने आपको अपने बाबू के आगोश में पाया, उन्होंने मुझे नींद में बाहों में भर लिया था, मेरा जवान गदराया बदन नींद में न जाने कब उनकी बाहों में चला गया मुझे पता ही नही चला दीदी.........उनकी एक टाँग मेरी दोनों जाँघों के बीच में थी...खुद मैंने भी अपनी एक टांग उठा कर उनके जांघ पर रख रखी थी, दोनों पति पत्नी की तरह सो रहे थे.......मैंने खुद भी अपने बाबू को अपनी बाहों में भरा हुआ था..........मेरे दोनों दुद्धू (चूचीयाँ) बाबू के सीने से दबे हुए थे........इतना तो मुझे पता था कि बाबू ने ये जानबूझ कर नही किया था, ये बस हो गया था, पर मेरे होश उड़ गए, बाबू के मर्दाने पसीने की गंध मुझे मदहोश करने लगी दीदी........बहुत शर्म आयी मुझे..........मेरा मन शर्म के साथ साथ एक अजीब से रोमांच से भर गया.......तभी बाबू की भी आंख खुल गयी और उन्होंने हड़बड़ा कर मुझे छोड़ दिया, मैं झट से खाट पर उठ के बैठी गयी, अंधेरे में मेरी तेज चलती सांसों को बाबू अच्छे से महसूस कर रहे थे।

(नगमा बड़े गौर से अपनी भौजी की बातें सुन रही थी, अपनी भौजी के जीवन की ये घटना सुनकर उसकी बूर उत्तेजना में हल्की हल्की रिसने लगी)

नीलम की मामी ने आगे कहा- मैं लोक लाज की वजह से खाट से उठ गई बाबू मुझे देखने लगे, मैं उठकर जाने लगी तो बाबू ने मेरा हाँथ पकड़ लिया, मैन हाँथ को हल्का सा जोर लगा कर छुड़ाया और जाने लगी घर में, बाबू ने मुझसे कहा- तू उठ क्यों गयी।

मैं- बाबू अब मैं बड़ी हो गयी हूँ, ऐसे कैसे सो सकती हूं आपके पास, अनजाने में मैं कैसे आपसे लिपट....गयी........

बाबू- सो क्यों नही सकती, लिपट गयी तो क्या हो गया......... क्या तू मेरी बेटी नही

मैं- बेटी तो हूँ पर बहुत अजीब लग रहा है, पहले की बात अलग थी, कोई देख लेगा तो बाबू।

बाबू- कोई नही देखेगा, सब तो सो रहे हैं, तुझे अच्छा नही लगा मेरे से लिपट कर सोना।

मैं इस बात पर कुछ देर चुप हो गयी फिर बोली- मैं जा रही हूं घर में ही कहीं सो जाउंगी....बाबू।

बाबू ने दुबारा पूछा- क्या तुझे अच्छा नही लगा मेरी बाहों में मेरी बिटिया?, देख बेटी ये सब बस अनजाने में हो गया, हम दोनों ही नींद में थे, मैंने जानबूझ कर नही किया, पर एक बात बोलूं, तू मेरी बाहों में थी तो बहुत अच्छा लग रहा था, क्या तुझे नही अच्छा लगा?

मैं फिर चुप रही

बाबू- देख बेटी तुझे जाना है तो जा, पर तुझे जरा भी अच्छा लगा हो...........तो मैं तेरा इंतजार पूरी रात करूँगा।

ये सुनकर मेरी सांसें तेज चलने लगी

मैं- बाबू आपके मन में क्या है?

बाबू- मुझे नही पता बेटी........पर तू मुझे अच्छी लगती है बहुत........पर जो भी है मैं बस यही जनता हूँ कि तेरे साथ लिपटकर सोने में न जाने क्यों बहुत अच्छा लगा। अगर तुझे बिल्कुल अच्छा नही लगा तो तू जा सकती है पर......

मैं धीरे से उठकर बेमन से जाने लगी घर में, बाबू मुझे शायद मिन्नत भरी नजरों से देख रहे थे की मैं रुक जाऊं, क्योंकि अंधेरे में साफ दिख नही रहा था, मैं धीरे धीरे चलकर घर के दरवाजे तक आयी, दरवाजे की चौखट लांघ कर अंदर भी आ गयी....पर ज जाने क्यों मैं वहीं रुक गयी, मेरी साँसे तेज चल रही थी, बदन रोमांच से भरता जा रहा था, अच्छे बुरे के बीच मन और दिमाग में लड़ाई चल रही थी, बाबू के बदन की छुवन का मजा, उनके मर्दाने पसीने की गंध मुझे उनकी ओर खींच रही थी और मान मर्यादा लोक लाज मेरे कदम वापिस मुड़ने से रोक रहे थे.......अचानक न जाने मुझे क्या हुआ मैंने धीरे से दरवाजे से झांक कर अंधेरे में बाबू को देखने की कोशिश की।

बाबू शायद निराश होकर दूसरी तरफ करवट लेकर लेट चुके थे, न जाने मुझे क्या हुआ मैंने अपने कदम बाबू की तरफ बढ़ा दिए, मन जीत चुका था, क्योंकि ये बात सच थी कि मजा तो उनकी बाहों में मुझे भी आया था।

मैं धीरे धीरे चलकर उनकी खाट तक पहुँची और खाट पर बैठ गयी, बाबू झट से पलटे और मुझे देखने लगे, मैं भी एक टक अंधेरे में उनकी आंखों में देख रही थी, उनको मानो विश्वास नही हुआ कि मैं आ गयी हूँ, अब कोई असमंजस था ही नही, ये सच था कि मुझे भी मजा आया था उनकी बाहों में सोकर ,तभी तो मैं पलटकर आयी थी फिर से उनकी बाहों में सोने अपनी मर्जी से।

बाबू मुझे और मैं बाबू को कुछ देर अंधेरे में ही देखते रहे और फिर बाबू ने मुझे अपनी बाहों में भरकर अपने ऊपर खींच लिया मैं भी उनकी बाहों में सिसकते हुए समा गई......आज पहली बार मैं बाबू के सामने सिसकी थी और इस सिसकी का साफ मतलब ये था कि मैं राजी थी वो सुख पाने के लिए जो एक औरत को मर्द से ही मिलता है, बाबू की खुशी का ठिकाना नही था, मैं मुस्कुरा भी रही थी और सिसक भी रही थी, हम दोनों ही एक दूसरे की बाहों में समाए पूरी खाट पर लोट पोट रहे थे, कभी मैं बाबू के ऊपर आ जाती तो कभी बाबू मेरे ऊपर, मैंने धीरे से बाबू के कान में कहा- बाबू बस सिर्फ बाहों में लेकर सोना मुझे।

मैंने ये बात जानबूझकर बाबू के कान में इसलिए बोली क्योंकि मैं बाबू के मोटे से हथियार को अपनी जाँघों के बीच महसूस कर रही थी, हालांकि मैं खुद बेकाबू हो गयी थी, पर फ़िर भी मैंने ऊपरी मन से कहा।

(नीलम की मामी ने नगमा के सामने लंड शब्द का इस्तेमाल न करके हथियार शब्द का प्रयोग किया क्योंकि उनके बीच अभी भी एक मर्यादा और झिझक थी, नगमा बड़े गौर से अपनी भौजी की बात सुनकर उत्तेजित होती जा रही थी, नीलम की मामी की भी साँसे तेज हो रही थी, दोनों की बूर हल्की हल्की रिसकर महकने लगी)

बाबू- सिर्फ बाहों में लेकर सोऊ तुझे

मैं- हाँ बाबू

बाबू- इतना जुल्म न कर मेरी बेटी मुझपर।

मैं मन ही मन मुस्कुराते हुए- जुल्म कैसा बाबू

बाबू- आजतक तूने मुझे कुछ भी मीठा खाने को दिया है तो ये तो नही बोला कि बाबू बस इसे देखना, खाना मत, खाने की चीज़ तो खाई ही जाएगी न, इतनी सुंदर औरत मेरी बाहों में हो और मैं बस उसको लेकर सोऊं, ऐसा जुल्म।

मैं बाबू के मुँह से ये सुनकर बहुत शर्मा गयी और धीरे से हंस दी फिर बोली- अच्छा जो करना है कर लीजिए, पर धीरे धीरे कीजिये कोई सुन न ले, घर में बहुत महमान हैं, बहुत धीरे धीरे कर लीजिए बाबू, बस ये ख्याल रखना कभी किसी को पता न चले, नही तो मैं जीते जी मर जाउंगी बाबू और आपके दामाद मुझे जिंदा गाड़ देंगे, चुपके चुपके ही करना, तुम्हारी बेटी की इज्जत अब सिर्फ तुम्हारे हाँथ में है।

नगमा सन्न रह गयी ये सुनकर, वो अवाक सी अपनी भौजी को देखती रह गयी, नीलम की मामी कुछ देर चुप रही, वो बहुत शर्मा रही थी अपना राज बताते हुए, पर नगमा ने उसका हाथ थाम लिया और बोला भौजी मैं जीवन में कभी किसी को नही बताऊंगी, आगे बता न फिर क्या हुआ।

नीलम की मामी- सच दीदी आप कभी अपने भैया को नही बताओगी न, आप पर विश्वास करके मैं आपको अपना राज बता रही हूं।

नगमा ने आगे बढ़कर अपनी भौजी को अपनी बाहों में भर लिया दोनों कस के लिपट गयी, नगमा बोली- भौजी मुझे गंगा मैया की सौगंध, मैं कभी किसी को नही बताऊंगी, मैं भला अपनी भौजी का राज क्यों किसी को बताऊंगी, तू तो मुझे जान से ज्यादा प्यारी है।

दोनों की आंखें नम हो गयी।

नगमा ने फिर कहा- आगे बता न भौजी फिर क्या हुआ था और जरा खुल के बता शर्मा क्यों रही है। फिर क्या किया तेरे बाबू में तेरे साथ।

नीलम की मामी ने कुछ देर नगमा की आंखों में देखा फिर बोली- फिर उस रात मेरे बाबू ने रात भर तीन बार अपने मोटे.....

नगमा- अपने मोटे क्या?.......बोल न

नीलम की मामी- बाबू ने अपने मोटे लंड से मुझे उस रात तीन बार हुमच हुमच के खूब चोदा।

नगमा- हाय दैय्या, आह.......तीन बार.....एक ही रात में..

नीलम की मामी- हाँ दीदी तीन बार.......मेरा भी बहुत मन कर रहा था चुदने का और ऊपर से रिश्ता ऐसा....बाप बेटी का.....वो भी सगे, जोश कम ही नही हो रहा था, लगातार बाबू मुझे तीन बार चोदे, मैं भी बदहवास ही पसीने से लथपथ अपने पैर फैलाये उनसे चुदवाती रही, मेरी वो जितना उस रात पनियायी थी शायद ही कभी उतना गीली हुई हो, न जाने क्यों उनकी चुदाई से मन ही नही भर रहा था, बाबू और मैं एक बार झड़ते कुछ देर वो मुझे और मैं उनको चूमने लगते फिर वो अपना मोटा सा हथियार मेरी उसमे पुरा अंदर तक पेल देते और फिर मेरे दोनों पैरों को फैलाकर अपने हांथों से मेरे विशाल गांड को उठाकर पूरा पूरा अपना हथियार मेरी उसमे डालते हुए मुझे चोदने लगते, मैं भी वासना में बदहवास होकर दुबारा सिसकते हुए नीचे से अपनी विशाल गांड उछाल उछाल कर उनका साथ देकर चुदने लगती। बाबू और मैंने बहुत सावधानी से उस रात जन्नत का सुख लिया।

नगमा- एक बात पूछूं भौजी

नीलम की मामी- ह्म्म्म

नगमा- मजा आया था तुम्हे अपने सगे बाबू के साथ।

इस बात पर नीलम की मामी नगमा से लिपट गयी और धीरे से कान में बोली- बहुत दीदी....बहुत मैं बता नही सकती,न जाने क्यों उनके साथ बहुत मजा आया था मुझे....बहुत।

नगमा- उसके बाद फिर कितनी बार हुआ ये सब।

नीलम की मामी- फिर कहाँ दीदी उसी रात हुआ था बस, अगले दिन नसीब नही हुआ, और उसके अगले दिन मैं यहां वापिस आ गयी, बाबू बहुत तड़पते होंगे मेरे लिए।

नगमा- हाय, और मेरी भौजी नही तड़प रही।

नीलम की मामी चुप रही

नगमा ने उसका चेहरा उठा के बोला- बोल न...नही तड़प रही क्या मेरी भौजी?

नीलम की मामी- तड़प रही हूं दीदी, बहुत तड़प रही हूं मैं भी।

नगमा- सगे पिता से मिलन के लिए.....ह्म्म्म

नीलम की मामी शर्मा गयी

नगमा ने नीलम की मामी को गले से लगा लिया और उसकी पीठ सहलाने लगी, फिर बोली- एक बात बोलूं भौजी

नीलम की मामी- हाँ दीदी बोल न

नगमा- तू मायके हो आ न एक दो दिन के लिए, मैं तब तक यहां हूँ संभाल लूँगी।

नीलम की मामी नगमा को अवाक सी देखने लगी, उसे विश्वास नही हुआ कि नगमा उसका इतना साथ देगी, उसकी आंख से आंसू छलक पड़े, नगमा ने अपनी भौजी के आँसूं को पोछते हुए बड़े प्यार से कहा- मैंने कहा था न कि मैं तेरी पक्की सहेली हूँ, मैं अपनी भौजी की प्यास और उनका दर्द समझ सकती हूं, तू हो आ मायके भौजी, मैं बाबू से बात कर लुंगी, कल ही चली जाना, एक दो दिन रहना फिर आ जाना, मैं यहां संभाल लूँगी।

नीलम की मामी एक टक नगमा को निहारती रही, मानो सौ सौ बार उसका धन्यवाद कर रही हो।

नगमा ने उसके गाल को थपथपाया और बोली- कहाँ खो गयी भौजी, बता न विस्तार से की उस रात क्या क्या कैसे कैसे हुआ था?

नीलम की मामी- तुम जैसा इंसान मुझे जीवन में कभी नही मिलेगा दीदी, मैं कितनी खुशनसीब हूँ जो मुझे तुम जैसी ननद मिली, जो मुझे इतना समझ सकती है और मेरा इतना साथ देगी।

नगमा- मैं तेरा हमेशा साथ दूंगी भौजी....हमेशा।

नीलम की मामी- कभी जीवन में मेरे से कुछ बन पड़े तो मैं भी पीछे नही हटूंगी दीदी, आपका हमेशा साथ दूंगी....हमेशा।

नीलम की मामी ने आगे कहा- दीदी मैं अपने बाबू के साथ मेरे पहले मिलन को विस्तार से कल बताऊंगी, क्योंकि आज बहुत देर हो रही है और आपको जामुन लेकर खेत में भी जाना है।

नगमा- लेकिन कल तो तू मायके चली जायेगी तब फिर.....और भौजी उसको मिलन के अलावा एक चीज़ और बोलते हैं वो बोल न

नीलम की मामी- क्या?

नगमा ने आगे बढ़कर कान में कहा- चुदाई भौजी......चुदाई

नीलम की मामी ने प्यार से एक मुक्का नगमा की पीठ पर मारा और बोली- धत्त

नगमा- धत्त क्या, चुदाई की है तो चुदाई ही बोल न, शर्म कैसी, वो भी मेरे से।

नीलम को मामी- अच्छा ठीक है, अब यही बोलूंगी........चुदाई

नगमा- ह्म्म्म ये हुई न बात

नीलम की मामी- दीदी मैं मायके जाउंगी भी तो शाम तक जाउंगी, अब दीदी आप जाओ जामुन लेकर खेत में अपने बाबू के पास और वहीं सो जाना आराम से, और अगर कुछ हो तो हो जाने देना, इस जामुन के साथ साथ अपना जामुन भी खिला देना उनको (नीलम की मामी ये कहकर मुस्कुरा दी)

(नीलम की मामी को जरा भी ये अहसास नही था कि जो चीज़ अपने बाबू के साथ करके वो शर्मा रही है नगमा तो वो सब बरसों से करती चली आ रही है)

नगमा- धत्त, पगली........कुछ भी बोलती है.........अच्छा चल मैं जाती हूँ।

नीलम की मामी ने अंदर से एक बड़ी कटोरी में जामुन और एक लोटा पानी लाकर दिया और नगमा रात के अंधेरे में निकल पड़ी खेत में जाने के लिए। नीलम की मामी चली गयी घर में ये सोचते हुए की अब आ गयी बाहर उसकी जिन्दगी में।
 
Dear Readers

बहुत busy चल रहा हूँ आजकल, जैसे ही टाइम मिलेगा एक दो दिन में update दे दूंगा और हाँ इस कहानी का update आने में देर भले ही हो जाये पर ये बंद नही हो सकती, तो कृपया update आने में हुई थोड़ी सी देरी में ऐसा न सोचें कि कहानी बंद हो गयी, कहानी बंद नही होगी।

Update जल्द ही आ जायेगा।
 
Update- 57

नगमा खेत में जाने के लिए घर से निकल गयी उसके हाँथ में एक छोटी लालटेन, माचिस, और दूसरे हाँथ में डिब्बे में जामुन था जो कि एक छोटे थैले में रखा था, पहले तो उसने पानी भी ले जाने की सोची तो नीलम की मामी ने ये कहकर मना कर दिया कि पिताजी पानी वहां मचान पर रखते हैं इतना सारा सामान एक साथ तुम कैसे ले जाओगी, पानी रहने दो, बस ये जामुन ले जाओ।

उधर चंद्रभान बड़ी बेचैनी से बार बार करवट बदलते हुए उस रास्ते की तरफ एक टक लगाए अपनी बेटी की राह देख रहा था जो उसके घर की ओर से आता था, नगमा भी बेचैनी में जल्द से जल्द पहुचने की कोशिश में तेज कदमों से अपने खेत की तरफ बढ़ रही थी।

चंद्रभान को एकाएक खेत में दूर लालटेन की हल्की रोशनी दिखाई दी तो उसका मोटा लंड फ़नफना गया। आंखों में उसके चमक आ गयी। वो झट से मचान से उतरकर नीचे आया और अपनी बेटी की तरफ बढ़ने लगा, बहुत बेचैन था वो।

जैसे ही नगमा ने अपने खेत में कदम रखा, देखा तो उसके बाबू चंद्रभान उसी की ओर आ रहे थे उसने लालटेन और बाकी समान खेत की जमीन पर जैसे ही रखा चंद्रभान ने आके उसे अपनी बाहों में भर लिया वो भी बड़ी बेचैनी से अपने बाबू से लिपट गयी, दोनों एक दूसरे को बेताहाशा चूमने और सहलाने लगे, चंद्रभान ने तो ताबड़तोड़ नगमा के गालों और होठों पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी।

नगमा में धीरे से कहा- इतने बेचैन है मेरे बाबू, की दौड़कर खुद ही आ गए और मुझे बाहों में भर लिया।

चंद्रभान- बहुत मेरी बेटी, बहुत तड़प रहा हूँ तेरे लिए, तू चीज़ ही वो है जो दुनियां में मुझे सबसे ज्यादा प्यारी है। तुझे खाये बिना मैं रह नही पता।

नगमा- अच्छा जी, मैं खाने की चीज़ हूँ।

चंद्रभान- हाँ, बिल्कुल

नगमा- तो अपनी इस चीज़ को आराम से मचान पर ले चलकर खाइए बाबू, यहाँ कोई देख न ले।

चंद्रभान ने अपनी बेटी को बाहों में उठा लिया तो नगमा बोली- रुको बाबू लालटेन और जामुन तो जमीन पर ही रह गया, उसे तो उठा लूं।

नगमा ने दोनों चीज़ उठा ली और चंद्रभान अपनी बेटी को लेकर मचान तक आया और फिर नगमा मचान पर लगी छोटी सीढ़ी से ऊपर चढ़ गई, उसके बाद चंद्रभान भी सारा सामान लेकर मचान पर चढ़ गया, मचान के ऊपर एक छोटी झोपड़ी बनी थी।

लालटेन को उसने एक कोने में बिल्कुल मध्यम करके रख दिया, नगमा ने लालटेन की हल्की रोशनी में झोपड़ी के अंदर एक नजर दौड़ाईं तो देखा कि नीचे घास फूस की फर्श बनाई हुई थी उसपर बिस्तर लगा हुआ था, बांस की बनी दीवारों पर कहीं कहीं खूंटी बनी हुई थी जिनपर छोटे छोटे समान टंगे हुए थे जैसे, उसके बाबू का कुर्ता, पानी का कमण्डलनुमा लोटा, पगड़ी, नगमा नजर घुमा के ये सब देख रही थी और चंद्रभान उसको निहार रहा था, जैसे कि आज पहली बार देख रहा था, अचानक दोनों की नजरें मिली तो नगमा मुस्कुरा उठी, चंद्रभान ने एकाएक अपनी बेटी को बाहों में भर लिया और बिस्तर पर लिटा कर उसके ऊपर चढ़ गया, नगमा की अपने बाबू की इस तरह जल्दबाजी और बेसब्री को देखकर हंसी छूट गयी, पर दोनों ही मस्ती में कराह भी उठे, नगमा ने अपनी बाहें अपने बाबू की पीठ पर लपेट दी, चंद्रभान नगमा के गालों पर गीले गीले चुम्बन जड़ने लगा, मस्ती में नगमा की आंखें अपने सगे बाबू के बेताब होंठों की छुवन से बंद हो गयी।

चंद्रभान अपनी बेटी नगमा को चूम ही रहा था कि नगमा ने उसके कान में सिसकते हुए कहा- बाबू पहले जामुन तो खा लो मुझे बाद में खा लेना।

चंद्रभान- पहले मुझे खोलकर अपनी फूली हुई महकती बूर दिखा।

चंद्रभान ने अपना सीधा हाँथ अपनी बेटी की बूर पर रखते हुए कहा।

नगमा मस्ती में मचलते हुए बोली- मेरी फूली हुई बूर? इस बार पहले सीधे बूर ही देखोगे बाबू?

चंद्रभान- हाँ, दिखा न, बहुत दिन हो गए, तेरी फूली फूली बूर मुझे बहुत पसंद है? खोल न जल्दी साड़ी।

नगमा अपने बाबू से मस्ती करने लगी- बिटिया की बूर देखोगे।

चंद्रभान- हाँ, देखुंगा, दिखा न, कैसी है?

नगमा- गलत बात है ये बाबू, पाप है ये।

चंद्रभान- कोई बात नही मेरी बिटिया, पाप है तो मुझे ये पाप करना है।

नगमा- अपनी बेटी को नंगी करोगे? उसके नंगे बदन को देखोगे? उसकी बूर देखोगे?

चंद्रभान- हाँ देखुंगा, दिखा न

नगमा- मुझे लज़्ज़ा आएगी बाबू? आपके सामने मैं अपनी बूर कैसे खोलूं?

चंद्रभान भी मस्ती के मूड में आ गया- एक बार खोल के दिखा दे बस मेरी बिटिया, देखूं तो सही कैसी है मेरी सगी बिटिया की बूर, कैसी है उसकी बनावट।

नगमा- जैसी सबकी होती है वैसी ही आपकी बिटिया की भी है।

चंद्रभान- दिखा न, मैं कैसे मान लूं। मुझे पता है बेटी की बूर की महक और बनावट अलग होती है, क्योंकि वो बेटी की होती है....दिखा न, तेरी फूली फूली बूर।

नगमा- ऐसा क्यों बाबू की बेटी की बूर अलग होती है, बूर तो सबकी एक जैसी ही होती है न।

चंद्रभान- नही मेरी बिटिया, बेटी की बूर का नशा अलग होता है, उसकी लज़्ज़त अलग ही होती है, ये रिश्ते की वजह से होता है।

नगमा- बेटी की बूर में ज्यादा लज़्ज़त होती है।

चंद्रभान- बहुत....बहुत ज्यादा

चंद्रभान के ये बोलते ही दोनों कस के एक दूसरे से सिसकते हुए और तेज से लिपट जाते हैं।

चंद्रभान- दिखा न, साड़ी खोल के बूर अपनी।

नगमा- तो उठो, उठ के बैठो मेरी टांगों के बीच में

चंद्रभान उठकर अपनी बेटी की दोनों जाँघों के बीच बैठ जाता है और लालटेन को थोड़ा तेज कर लेता है, ऐसा करते हुए जब नगमा उसे देखती है तो मुस्कुरा देती है, चंद्रभान एक टक लगाए दोनों जाँघों के बीच देखने लगता है।

नगमा ने अपने दोनों पैर फैला ही रखे थे, नगमा ने बगल में रखा एक चादर अपने ऊपर डालकर कमर तक ओढ़ लिया तो चंद्रभान उसे सवालिया निगाहों से देखने लगा, नगमा के मुस्कुराते हुए आंखों के इशारे से थोड़ा सब्र रखने का आश्वासन दिया और चादर के अंदर अपने दोनों हाँथ ले जाकर धीरे से उसने अपनी साड़ी को ऊपर उठना शुरू कर दिया और फिर एक ही पल में पूरी साड़ी को अपनी कमर तक जल्दी से उठाकर अपनी कच्छी को खोलकर बगल में रखा फिर अपनी दोनों जाँघों को अच्छे से फैलाकर एकाएक चादर को हटा कर बगल रख दिया और एक पल में अपनी रिसती महकती मोटे मोटे फाँकों वाली बूर को अपने सगे बाबू के सामने खोल दिया और बोली- लो बाबू देखो, अपनी बेटी की फूली फूली बूर।

ऐसा कहते हुए नगमा ने अपने दोनों हांथों से अपनी बूर की फांकों को हल्का सा खोलकर उसका गुलाबी छेद अपने बाबू को दिखाया फिर बोली- तीन महीने हो गए न बाबू इस छेद को देखे।

चंद्रभान ललचाई नज़रों से अपनी बेटी की बूर को घूरता हुआ- हाँ बिटिया ये तीन महीने तो जैसे तीन बरस हो, बहुत तरस गया था मैं इस बूर को देखने के लिए, देखो कितना महक रही है ये तेरी बूर, पूरी झोपड़ी में इसकी महक फैल गयी है, कितना मदहोश कर देने वाली महक आ रही है मेरी बेटी की बूर से।

नगमा मुस्कुराते हुए- ये बहुत चुदासी है न बाबू.....इसलिए

चंद्रभान अपनी बेटी की चुदासी बूर को मंत्रमुग्द होकर निहारता रहा, नगमा कभी अपने हांथों को अपनी जाँघों पर चलाने लगती कभी बूर को सहलाने लगती तो कभी दोनों फांकों को चीर देती। नगमा की बूर वाकई में बड़ी और फूली हुई पावरोटी जैसी थी, और जब वो चुदासी होती थी तब तो उसकी मस्त बूर और मनमोहक लगने लगती थी।

नगमा- बाबू मुझे भी अपना लंड दिखाओ न।

नगमा ने हाथ बढ़ा कर अपनी बूर को निहारते हुए चंद्रभान के खड़े लन्ड को धोती के ऊपर से ही टटोलते हुए कहा। चंद्रभान ने झट से धोती बगल कर अपना मोटा काला लंड बाहर निकाल लिया, नगमा के मुँह से अपने बाबू का तन्नाया हुआ विशाल लंड देखकर सिसकी फूट पड़ी, वो लेटे लेटे सर उठाये अपने बाबू का दहकता मोटा लंड देखने लगी, जैसे ही चंद्रभान ने अपने लंड की चमड़ी को खोलकर सुपाड़ा बाहर लाने की कोशिश की, नगमा ने कहा- बाबू रुको।

और नगमा ने सिसकते हुए खुद अपने हाँथ से अपने बाबू के लंड की चमड़ी को पीछे खींचा, लंड का मोटा सुपाड़ा निकलकर बाहर आ गया।

नगमा- तड़प तड़प कर कितना मोटा हो गया है बाबू आपका ये लंड, और कितना प्यासा है ये।

चंद्रभान- अपनी बेटी की बूर की याद में इसकी ये हालत हो गयी है।

दोनों बाप बेटी एक दूसरे के यौनांग को देखकर वासना से भर गए।

अपनी बेटी की फूली फूली बूर देखकर चंद्रभान से रहा नही गया और उसने झट से अपने लन्ड का दहकता सुपाड़ा नगमा की बूर को फाँकों के बीच लगा दिया, दोनों के मुँह से मस्ती की सिसकारियां फुट पड़ी।

नगमा ने आंखें बंद करके मस्ती में कराहते हुए

अपने हाथों को आगे बढ़ा के चंद्रभान के चूतड़ पर रखा और पूरा लन्ड बूर में घुसेड़ने का इशारा किया, बेटी की तड़प देख चंद्रभान से भी रहा नही गया और उसने अपनी सगी बेटी की बूर में पूरा जड़ तक अपना लन्ड घुसेड़ दिया, नगमा को अपने बच्चेदानी तक अपने सगे पिता का लंड सरसरा कर घुसता हुआ महसूस हुआ तो वो मस्ती में सीत्कार उठी।

नगमा- आआआआहहहहह.......बाबू......एक बार पहले मुझे जरा चोद दीजिए.......आपके लंड के लिए बहुत प्यासी है ये मेरी बूर।

चंद्रभान अपनी बेटी नगमा की ये बात सुनकर दनादन उसकी बूर में लन्ड पेलने लगा, नगमा अपनी टांगें उठाये घचा घच्च अपने सगे पिता से चुदवाने लगी।

चंद्रभान नगमा को चोदते हुए- एक बात पूछूँ मेरी बिटिया रानी।

नगमा- पूछो न बाबू, चोदते भी रहो और पूछते भी रहो......आह...ह..ह....हाँ ऐसे ही पेलो मेरी बूर......पूछो बाबू?

चंद्रभान- बिरजू का लन्ड कैसा है, क्या मेरे लन्ड से कमजोर है? बेटियों को सगे पिता के साथ इतना मजा क्यों आता है?

ताबड़तोड़ धक्के लगाते हुए चंद्रभान ने पूछा

नगमा जोर से सिसकते हुए बोली- नही बाबू ऐसा नही है कि उनका लन्ड कमजोर है उनका लन्ड भी आपके लन्ड की तरह बलशाली है पर जो मजा सगे पिता के साथ है वो किसी और के साथ कहाँ बाबू......आहहहहहहहहहह......ऐसे ही अंदर तक डाल डाल के अपनी बेटी की बूर चोदिये........हाय

चंद्रभान- ऐसा क्यों, पिता के साथ ही ऐसा मजा क्यों? अच्छा तुम स्त्रियों को पिता के साथ चुदवाने में इतना कामवेग क्यों चढ़ता है?

नगमा ये बात सुनकर मचल उठी और बोली- जैसे पिता को अपनी सगी बेटी की बूर चोदते वक्त अतुलनीय कामवेग चढ़ता है वैसे ही बाबू बेटियों को भी कामवेग सताता है और भरपूर जोश चढ़ता है। सगे पिता से यौन संबंध बनाने का मन करता है बहुत।

चंद्रभान- पर क्यों?... कुछ तो बताओ....आज मेरा मन है तुम्हारे मुँह से सुनने का.......बताओ न

नगमा नीचे से अपनी चौड़ी गुदाज गांड उछाल उछाल के चुदवाते हुए- बाबू....बेटी के बदन में काम तरंगे ये सोचकर जोर मारने लगती हैं कि एक दिन वो जिस लन्ड से पैदा हुई वही लन्ड उसकी बूर को कैसे कुचल कुचल कर चोद रहा है, सगे पिता का लंड जब बेटी की कमसिन

बूर को छूता है तो कैसा लगता है बाबू....कैसा महसूस होता है वह बताने के लिए मेरे पास शब्द ही नही है, कितना आनंद मिलता है ये सोचकर कि जिस लंड से वो पैदा हुई

वही लंड आज उसकी बूर मैं कैसे गोते लगा रहा है, कैसे उसकी बूर में डूब रहा है। ये बात तन बदन को रोमांच से भर देती है की ये लंड मेरे सगे पिता का लंड है।

ये सुनकर चंद्रभान मानो बावला सा हो गया हुमच हुमच कर नगमा को चोदने लगा, नगमा ने प्यार से कराहते हुए चंद्रभान को अपनी बाहों में भर लिया और जोर जोर सिसियाने लगी, फिर कुछ देर बाद ही नगमा ने अपना ब्लॉउज खोलकर दायीं चूची को बाहर निकाल दिया, चंद्रभान मस्त 34 साइज की चूची देख जोश से भर गया, नगमा ने बड़े प्यार से अपनी चूची को हांथों में लिया और चंद्रभान के मुंह में भरते हुए सिसककर बोली- अपनी बिटिया की चूची पियों न बाबू, बस मेरी बूर ही चोदे जा रहे हो, चूची को भी प्यार करो न, ये भी तो प्यासी हैं तीन महीने से।

चंद्रभान जोर जोर से चोदते हुए- मेरी लाडली बिटिया रानी ने ही तो बोला था पहले मुझे चोद दो, अपनी जान का का हुक्म तो मानना पड़ेगा न।

नगमा- अरे बाबू मैं तो पागल दीवानी हूँ आपकी कुछ भी बोलूंगी, आप अपने मन का कीजिये, जो जी में आये वो खाइए पीजिए।

एक पल के लिए दोनों मुस्कुरा उठे।

चंद्रभान नगमा की दोनों चूचीयों को खोलकर तेज तेज धक्के बूर में लगाते हुए, चूचीयों को दबाने और पीने लगा, नगमा को अब मानो किसी का होश नही था, जल बिन मछली की तरह तड़प तड़प कर वो अपने सगे पिता से चुदवाने लगी जोर जोर से कराहने लगी।

चंद्रभान थोड़ा सा रुक तो नगमा आंखों खोल अपने बाबू को देखने लगी और बोली- क्या हुआ बाबू चोदो न, रुक क्यों गए?

चंद्रभान- थोड़ा ठीक से लेट बेटी...मेरा लंड पूरा गहराई तक नही जा पा रहा है तेरी बूर में।

नगमा अपने बाबू की बात सुनकर मुस्कुराई और बोली- हाँ बाबू, मुझे भी कुछ कम कम सा महसूस हो रहा है...रुको जरा

ऐसा कहकर नगमा बिल्कुल अच्छे से अपने बाबू के नीचे अपनी दोनों जाँघों को फैला कर लेट गयी और चंद्रभान ने अपने दोनों हांथों से अपनी बेटी की 38 साइज की चौड़ी गांड को थामकर एक भरपूर धक्का मारा जिससे उसका लन्ड नगमा की बूर में अत्यंत गहराई तक उतर गया। मस्ती में नगमा मचल उठी, एक जोर की सीत्कार उसके मुँह से निकल गयी।

चन्द्रभान अब अपनी सगी बिटिया के गालों को चूम चूम कर चोदने लगा, नगमा कभी मस्ती में मुस्कुरा उठती तो कभी जोर जोर सिसकारने लगती, बड़े प्यार से कराहते हुए वो चंद्रभान की पीठ को सहलाने लगी, उसके हाँथ अपने बाबू की पीठ, कमर, गर्दन और सिर पर रेंगने लगे, अपने बाबू के लन्ड के जोरदार धक्कों की ताल से ताल मिला कर वो भी अपनी गांड ऊपर को उछाल उछाल कर अपने बाबू का लंड जितना अंदर तक जा सके अपनी प्यासी बूर में लेने लगी। काफी देर चंद्रभान तेज तेज धक्के लगा कर नगमा को चोदता रहा फिर एकाएक दोनों एक साथ झड़ने लगे, चंद्रभान का तीन महीने से रुक हुआ मोटा गाढ़ा गरम गरम वीर्य पिचकारी की धार की तरह छूटकर बूर की गहराई में गिरता हुआ नगमा को महसूस हुआ तो मानो नगमा की बूर की प्यास बुझने लगी, वो अति आनंद में बावली होकर झड़ते हुए अपने बाबू से लिपट गयी। रात के अभी 12 ही बजे थे, काफी देर झड़ने के बाद दोनों एक दूसरे को उखड़ती सांसों से देखने लगे, दोनों मुस्कुरा दिए।

चंद्रभान- मजा आया

नगमा ये सुनकर मुस्कुराते हुए लज़ा गयी।

नगमा- बाबू अपना वीर्य कितना गरम और गाढ़ा है, मेरी बूर की गहराई में गिरकर भर गया है, बूर की गहराई में कितना गरम गरम महसूस हो रहा है।

चंद्रभान- तुझे अच्छा लग रहा है।

नगमा- बहुत...बहुत बाबू बहुत।

चंद्रभान- चाटेगी.....अपने बाबू का वीर्य।

नगमा- चटाओ न......हर बार चटाते हो....तो पूछना कैसा......उसे चाटने के लिए तड़प रही हूं मैं। (नगमा ने थोड़ा लजाते हुए कहा)

चंद्रभान ने अपनी कमर को थोड़ा ऊपर उठा कर अपना सीधा हाँथ नगमा की बूर के निचले हिस्से पर ले गया, चंद्रभान का मोटा लन्ड अभी भी नगमा की बूर में घुसा हुआ था, चंद्रभान ने नीचे बह रहे वीर्य को उंगलियों से उठाया और नगमा के होंठों के पास लाकर बोला- ले मेरी बिटिया रानी, ये है तेरा और मेरा कामरस।

नगमा ने झट से मस्ती में जीभ बाहर निकाल कर गरम महकते वीर्य को मचलकर चाटने के लिए जैसे ही जीभ लगाया, चंद्रभान ने सारा वीर्य नगमा की जीभ पर लगा कर उसकी जीभ को अपने मुँह में भर लिया और दोनों मस्ती में काम रस चाटने हुए एक दूसरे की जीभ से खेलने लगे।

कुछ देर बाद नगमा बोली- और चटाओ न बाबू....कितना मक्ख़न जैसा है अपना वीर्य.....मुझे बहुत पसंद है....और चटाओ।

चन्द्रभान ने कुछ देर और अपनी बेटी को अपना वीर्य चटाया, नगमा अपने बाबू का गरम वीर्य चाटकर मस्त हो गयी।
 
Update- 58

नगमा और चंद्रभान एक दूसरे की आंखों में देखने लगे तो नगमा मुस्कुरा उठी।

चंद्रभान- मजा आया

नगमा- आया तो बाबू पर अभी मन कहाँ भरा।

चंद्रभान- अच्छा, मेरी बेटी का मन नही भरा अभी।

(ऐसा कहते हुए चंद्रभान ने एक करारा धक्का नगमा की बूर में मारा)

नगमा- आआआआआहहहहह......दैय्या...... ऐसे कैसे भर जाएगा बाबू मन?

चंद्रभान- तो कैसे भरेगा मेरी बेटी?

नगमा अपने बाबू की आंखों में देखते हुए- अभी तो पूरी रात अपनी बिटिया की प्यासी बूर को अपने वीर्य से सींचिये, तब जाके इसकी प्यास बुझेगी।

चंद्रभान ने नगमा के मुँह से ये सुनकर उसके होंठों को चूम लिया- जरूर मेरी प्यारी बिटिया, जरूर।

नगमा ने चंद्रभान को अपनी बाहों में भरते हुए बोला- बाबू एक बात सुनिए।

चंद्रभान- बोल न मेरी रानी

नगमा- भौजी अपने मायके कब गयी थी आखिरी बार?

चंद्रभान- क्यों, तुम ऐसे क्यों पूछ रही हो?

नगमा- अरे बाबू बताओ तो सही पहले।

चंद्रभान- गयी थी यही छः महीने पहले करीब, उसके मायके में उसकी चाची के यहां ग्रह प्रवेश था तब गयी थी दो तीन दिन के लिए। पर बात क्या है तुम ऐसे क्यों पूछ रही हो? कोई बात है क्या?

(चंद्रभान नगमा की आंखों में सवालिया निगाहों से देखने लगा तो नगमा ने एक कातिल मुस्कान ली)

नगमा- हाँ बात है तभी तो पूछ रही हूं। बाबू आप भौजी को जल्दी जल्दी उसके मायके भेज दिया कीजिये।

चंद्रभान- पर क्यों? बता तो सही।

नगमा- है कुछ बात बाबू, मैं बता नही सकती क्योंकि मैंने भौजी को वचन दिया है इसलिए, पर मैं आपसे छुपा भी नही सकती, तो इतना समझ जाइये की तड़प रही है वो भी.....अपने....

(नगमा ये बोलते हुए थोड़ा चुप हो गयी और वासना में अपनी आंखें बंद करके अपने बाबू को अपनी बाहों में कसके उनकी पीठ सहलाने लगी)

चंद्रभान- बता न किसके लिए तड़प रही है वो, कुछ है क्या उसका किसी के साथ?

नगमा ने मदहोशी में आंखें बंद किये हुए चंद्रभान के कान में धीरे से बोला- बाबू किसी से कहना मत, वैसे मैंने भौजी को वचन दिया है पर मैं आपको बताने से खुद को रोक नही सकती, मैं आपकी हूँ और आप मेरे, हम दोनों एक ही हैं बस इसलिए ये राज मैं आपको बता रही हूं।

चंद्रभान- तू मेरी सबकुछ है मेरी जान, तुझे मुझपर विश्वास है न।

नगमा- अपने से भी ज्यादा है बाबू...अपने से भी ज्यादा, तभी तो आपसे छुपा नही सकती, पर बाबू भौजी के सामने सामान्य ही रहना उन्हें कभी ये न लगे कि आपको पता है ये बात।

चंद्रभान- तू चिंता न कर बेटी, मैं उसे इसका अहसाह नही होने दूंगा, वो मेरी बहू है, अब बता की वो किसके लिए तड़पती है।

नगमा ने चंद्रभान की आंखों में एक बार मुस्कुराते हुए देखा फिर कस के दुबारा गले से लगा लिया और कान में सिसकते हुए बोली- अपने पिता के लिए।

चंद्रभान- क्या?

नगमा- हां बाबू..... वो भी अपने सगे पिता के साथ चुदाई का मजा ले चुकी है, उनके पिता ने भी उन्हें चोदा रखा है।

(चंद्रभान ने ये सुनते ही अपनी बेटी नगमा की बूर में घुसे हुए अपने फौलादी लन्ड जो कि पूरी तरह अब खड़ा हो चुका था, बाहर निकाल कर बूर की गहराई में जड़ तक एक तेज धक्का मारा तो नगमा मस्ती में सीत्कार उठी)

चंद्रभान- कब....कैसे.....कब से चल रहा है ये, मेरे समधी भी अपनी सगी बिटिया की बूर का मजा ले रहे हैं.... ह्म्म्म

नगमा जोर से कराहते हुए- हां बाबू......इसी में तो असली मजा है। भौजी भी अपने सगे बाप से चुदाई का मजा ले चुकी है और ये सब अभी जब भौजी अपने मायके गयी थी तब ही शुरू हुआ, तब से वो तड़प रही है और मुझे उसकी तड़प देखी नही जाती, जाना चाहती है वो मायके, भेज दीजिए, यहां मैं संभाल लुंगी एक दो दिन।

चंद्रभान- ये तो तूने मुझे गज़ब का राज बता दिया, मेरी बहु अपने पिता से चुदती है.....

(चंद्रभान बहुत आश्चर्यचकित था सुनकर, नगमा मुस्कुराते हुए उनको देखे जा रही थी)

नगमा- क्या हुआ बाबू?

(नगमा ने चंद्रभान की पीठ पर हल्की सी चिकोटी काटते हुए बोला)

चंद्रभान- कुछ नही...पर बेटी वो मेरी बहू है, इस घर की लष्मी है, उसका राज ही है इस घर पर, जब उसका मन करे तब जाए, मैंने उसे कभी रोका कहाँ, वो जब जाना चाहे जाए, तुम कहो तो उसके बाबू को ही यहां बुला दूँ।

(ऐसा कहकर चंद्रभान हंसने लगा)

नगमा भी हंसते हुए- अरे नही बाबू, भौजी को ही भेज दो, फिर कभी उनको यहीं बुला लेना जब मैं अगली बार आऊंगी तब।

चंद्रभान हंसते हुए- फिर एक ही घर में वो अपनी बेटी को चोदेंगे और मैं अपनी बिटिया को।

नगमा- धत्त......उनकी मौजूदगी में ही, ये सब छुप छुप के किया जाता है चोरी चोरी बाबू.....चोरी चोरी.....तब ही तो और मजा आता है।

चंद्रभान- अरे उनकी मौजूदगी में नही.....मतलब अब वो यहां आएंगे तो अपनी बेटी को चोदने का मन तो करेगा ही उनका, तो कुछ न कुछ जुगाड़ तो बैठाएंगे ही वो और दूसरी तरफ मैं भी कहाँ तुझे छोड़ने वाला हूँ।

नगमा मुस्कुराते हुए- बदमाश......अच्छा बाबा मत छोड़ना........चोद लेना अपनी बेटी को...जहां मन करे जैसे मन करे, अब खुश।

चंद्रभान- चलो ये तो बाद कि बात है, कल तुम अपनी भौजी को बोल देना की मैंने बोला है कि वो एक दो दिन अपने मायके घूम आये, जब तक तुम यहाँ हो, पर बेटी उसको शक तो होगा न, की मैं उसको अचानक मायके क्यों भेज रहा हूँ।

नगमा- नही होगा बाबू, मैंने भौजी को बोला था कि मैं बाबू से तुम्हे मायके भेजने के लिए बोल दूंगी, लेकिन भौजी को ये थोड़ी बोला था कि उनका राज मैं आपको बताऊंगी।

चंद्रभान- पर तुमने तो बता दिया मुझे।

नगमा- हाँ तो क्या करती, मैं और आप तो एक ही है और आपसे मैं छुपा नही सकती थी, पर भौजी की शर्म को बरकरार रखना बाबू, उन्हें कभी ये जाहिर मत होने देना की आपको पता है।

चंद्रभान- भौजी की शर्म......ह्म्म्म

नगमा कातिल मुस्कान लेते हुए- हाँ.....शर्म

चंद्रभान- क्या होती है शर्म?

नगमा- शर्म......उउउउमममम......शर्म का मतलब

(नगमा थोड़ा सोचने लगी जानबूझ कर)

चंद्रभान- भौजी की शर्म का मतलब....क्या?

(नगमा कुछ देर अपने बाबू की आंखों में देखती रही कि वो क्या सुनना चाहते हैं, फिर वो उनकी मन की मंशा समझ गयी, और वासना से भरकर बोली)

नगमा- मतलब..........बूर.....बूर बाबू.....बूर......शर्म का मतलब.......बूर

(नगमा अपने बाबू की मंशा समझ कर वासना से भर गई)

चंद्रभान- किसकी बूर बेटी

(चंद्रभान नगमा के मुँह से सुनना चाहता था)

नगमा- भौजी की बूर बाबू भौजी की.......भौजी की बूर की लाज रखना बाबू......वो भी तो आपकी बेटी जैसी हैं न

(नगमा ने खुलकर बोल दिया, वो समझ चुकी थी कि उसके बाबू के मन में क्या है, उसको इस बात से न कोई तकलीफ हुई न जलन, उल्टा न जाने क्यों उसे असीम आनंद सा मिला और वो और भी ज्यादा वासना से भर गई, चंद्रभान अपनी बेटी की इस स्वीकृति से गदगद हो उठा)

चंद्रभान ने नीचे झुककर नगमा के कान में धीरे से अपना लन्ड उनकी बूर में और गहराई तक घुसाते हुए कहा- बहू.....मेरी बहू

नगमा वासना भरी निगाहों से अपने बाबू को कुछ देर देखती रही, चंद्रभान भी नगमा की आंखों में देखता रहा, फिर नगमा ने एकएक चंद्रभान को अपनी बाहों में भर लिया और उनके कान में बोली- पिता जी......भौजी यही बोलती है न आपको बाबू जी

चंद्रभान- हाँ बेटी

नगमा- तो आप मुझे भौजी समझ लीजिए बाबू.......मैं आपको भौजी बनकर पिताजी या ससुरजी बोलूंगी........आप अपनी बहू को आज चोद दीजिए, मेरी बूर को आप भौजी की बूर समझ कर बहू का सुख ले लीजिए, न जाने क्यों मुझे बहुत मजा आ रहा है ये सोचकर।

(चंद्रभान अपनी बेटी के मुंह से ये सुनते ही खुश हो गया)

नगमा फिर बोली- पिता जी

चंद्रभान- आआआहहहह......मेरी बहू

(नगमा समझ चुकी थी कि उसके बाबू क्या चाहते हैं)

नगमा- बाबू

चंद्रभान- ह्म्म्म बेटी

नगमा- आप भौजी को चोदना चाहते हैं

चंद्रभान उठकर नगमा की आंखों में देखने लगता है, नगमा मुस्कुरा रही थी

नगमा- बोलो न

चंद्रभान- हाँ

नगमा ने बहुत ही मस्ती भरे अंदाज में दुबारा बोला- पिताजी.......मेरे ससुर जी

चंद्रभान- बहू...... हाय मेरी बहू

नगमा- पिताजी.......चोदिये अपनी बहू को......बहुत प्यासी हूँ मैं.....आपके लंड के लिए.......चोद दीजिए अपनी बहू को..........हाय

चंद्रभान- पैर को उठा के मेरी कमर पर लपेट न बहू

नगमा ने वैसा ही किया और चंद्रभान धीरे धीरे धक्कों की रफ्तार बढ़ाते हुए अपनी बेटी को बहू समझ कर फिर से चोदने लगा, नगमा आंखें बंद कर फिर से सिसकते हुए अपने बाबू से बहु बनकर चुदवाने लगी। चोदते चोदते नशे में चंद्रभान ने नगमा की 36 साइज की चूची को देखा जो हर धक्के के साथ हिल रही थी, गुलाबी निप्पल तन कर खड़े हो चुके थे, लप्प से चंद्रभान ने चोदते हुए गुलाबी निप्पल को मुँह में भर लिया और चूची पीते हुए अपनी बहू रूपी बिटिया को जोर जोर धक्के लगा कर चोदने लगा, मदमस्त होकर नगमा भी अपने बाबू के बदन को जहां तक उसका हाँथ उनके बदन पर पहुंचता, सहलाने लगी, जैसे ही नगमा एक बार फिर से झड़ने को हुई अपने बाबू के चेहरे को थामकर उनके होंठों पर टूट पड़ी और जोर से सिसकारते हुए चंद्रभान के होंठों को अपने होंठों में भरते हुए झड़ने लगी, अपनी चौड़ी गुदाज गांड को ऊपर उठाकर अपने बाबू का मोटा लंड जितना हो सके नगमा ने अपनी बूर में लील लिया और इस तरह झड़ी मानो बरसों की प्यासी हो.....आआआआहहहहहह.......ससुर जी....मजा ही आ गया......आपसे चुदकर मैं निहाल हो गयी..........हाय......ससुर जी से चुदाई में जो शर्म के साथ साथ मजा है उसकी कोई तुलना नही पिताजी......देखो मेरी बूर कैसे झड़ रही है आपका लंड खाकर......... कितना मजा है इसमें......आआआआहहहहहह.......पिताजी

चन्द्रभान भी आज पहली बार अपनी बेटी में बहू का अहसास पाकर बहुत जल्दी दहाड़ते हुए झड़ गया, नगमा ने ये बखूबी महसूस किया, वो समझ गयी कि बाबू भौजी को सोचकर जल्दी झड़ गए, चोदना चाहते हैं वो भौजी को।

नगमा अपने बाबू के मोटे मोटे आंड को हाँथ पीछे ले जाकर सहलाने लगी, साथ ही साथ वो लंड और बूर को छूकर देखने लगी कि कैसे एक ससुर का लंड उसी की सगी बहू की बूर में घुसा हुआ है, ये मिलन कितना आनंद देने वाला है।

चंद्रभान कुछ देर रुका रहा तो नगमा ने आंखें खोलकर उनको देखा और अपने हाँथ से अपने बाबू की गांड को इशारे से दबाकर फिर बूर चोदने का इशारा किया, पर चंद्रभान के मन में अब कुछ और पाने की लालसा थी।

नगमा- पिताजी और चोदो न अपनी बहू को।

चंद्रभान नगमा को मुस्कुराते हुए देखने लगा तो नगमा भी मुस्कुरा दी और बोली- कुछ और चल रहा है क्या मन में?, कुछ और चाहिए मेरे ससुर जी को?

(नगमा लगभग समझ ही गयी थी कि उसके बाबू को क्या चाहिए पर वो उनके मुँह से सुनना चाहती थी)

चंद्रभान- हाँ..... कुछ और चाहिए

नगमा इतरा कर- क्या चाहिए बोलो.....जो चाहिए वो मिलेगा.....बोलो.....बोलो....जल्दी बोलो

चंद्रभान ने नगमा के कान के निचले हिस्से को अपने होंठों से हल्का सा काटते हुए कहा- अपनी बहु की गांड........ मुझे अपनी बहू की गांड मारनी है......चौड़ी चौड़ी गुदाज गांड की छेद में अपना लंड डालना है।

(ऐसा कहते हुए चंद्रभान नगमा की 38 साइज की चौडी गांड को अपनी दोनों हथेली में थामकर कराहते हुए सहलाने लगा, नगमा ने भी अपनी गांड को हल्का सा ऊपर उठा लिया ताकि उसके बाबू के दोनों हाँथ पूरी तरह गांड के नीचे आ जाएं)

अपने बाबू द्वारा हल्का सा कान काटने और चूमने से नगमा गनगना गयी और जानबूझ कर बोली- धत्त....बदमाश.....गांड भी कोई मारने की चीज़ है....मरना है तो बहू की चूत मारिये.....चूत

चंद्रभान- तेरे मुँह से चूत शब्द सुनकर बहुत मजा आ गया.......दुबारा बोल न

नगमा शर्माते हुए- चू....... त.......बहू बेटी की चूत.......अब खुश

चंद्रभान- लेकिन हमेशा चूत ही मारूंगा तो गांड नाराज़ नही हो जाएगी.........आखिर वो भी तो कितनी सुंदर.....मनमोहक और प्यार की हकदार है.......ये तो तुम उसके ऊपर जुल्म कर रही हो..........मरवा लो न गांड अपने ससुर से।

नगमा पूरी तरह शर्मा गयी अपने बाबू का ये आग्रह सुनकर फिर बोली- अच्छा पिताजी मार लीजिए मेरी गांड.....पर धीरे धीरे मारना......दर्द होता है।

चंद्रभान- तुम हर बार ऐसे ही बोलती हो पर फिर बाद में अच्छे से मरवाती हो अपनी गांड।

नगमा- क्या करूँ पिताजी आपका लन्ड इतना मोटा है कि जब घुसने लगता है तो जैसे लगता है कि कोई मोटी कील गांड में जा रही है पर बाद में जब लंड की रगड़ मिलने लगती है तो बहुत अच्छा लगने लगता है।

चंद्रभान ने अपनी तर्जनी उंगली से नगमा की फैली हुई चौड़ी गांड के छेद को हौले हौले सहलाना शुरू कर दिया, नगमा अपने बाबू की इस हरकत से कराहते हुए शर्म से लाल हो गयी।
 
प्रिय पाठकों,

माना कि updates में अब काफी देरी हो रही है, वादा करने के बाद भी updates देर से आ रहे हैं, इसका कारण ये है कि अभी मेरी लाइफ में बहुत up and downs चल रहे हैं, पर इसका मतलब ये तो नही की कहानी बंद हो जाएगी, मैं लाइफ की कुछ प्रोब्लेम्स से जूझकर बाहर निकलने की कोशिश में लगा हूँ, उम्मीद है कि आपलोग मेरी प्रोब्लेम्स को समझते हुए मुझे थोड़ा वक्त देंगे, अब वादा तो नही करूँगा, पर कोशिश जारी है कि next update जल्द ही दूँ।

ये कहानी बीच में बंद नही हो सकती।

धन्यवाद आप सबका
 
Update- 59

चंद्रभान हौले हौले अपनी बेटी में बहू की कल्पना कर उसकी गांड के छेद को सहलाते हुए बोला- बहू

नगमा- हाँ......बाबू जी.......मेरा मतलब मेरे ससुर जी

चंद्रभान और नगमा दोनों मुस्कुराने लगे

चंद्रभान- गांड खोल न.......अब रहा नही जा रहा.......तेरी गांड मारने को बेताब है लंड।

नगमा- भौजी की गांड मारके रहोगे आप.......बदमाश!........थोड़ा ऊपर उठो, मुझे पलटने के लिए जगह तो दो मेरे ससुर जी।

चन्द्रभान नगमा के ऊपर से उठ गया, नगमा पेट के बल घूमकर लेट गयी, लेटते वक्त पहले तो उसने साड़ी को पूरा पैर तक ढक लिया पर जब पेट के बल लेटी तो बड़ी अदा से अपनी साड़ी दोनों हांथों से पकड़कर अपने बाबू को कातिल मुस्कान के साथ देखते हुए ऊपर उठाने लगी, चंद्रभान आंखें फाड़े अपनी बेटी का निवस्त्र होता शरीर देखने लगा और देखते ही देखते नगमा ने अपनी 38 साइज की चौड़ी मखमली गोरी गोरी गांड अपने बाबू के सामने खोलकर रख दी।

ऐसा नही था कि चंद्रभान पहली बार नगमा की गांड देख रहा था इससे पहले भी न जाने कितनी बार उसने अपनी बेटी की गांड देखी, सहलाई और मारी थी पर हर बार जब नगमा अपनी गांड खोलती थी तो अपनी सगी बेटी की मनमोहक चौड़ी गुदाज गांड देखकर वो पगला ही जाता था और उसका मन करता था कि गप्प से अपना मूसल जैसा लन्ड अपनी सगी बेटी की गाँड़ में पेल दे।

मंत्रमुग्ध सा अभी चंद्रभान नगमा की गाँड़ को देख ही रहा था कि नगमा ने कुछ ऐसा कर दिया कि चंद्रभान के मुँह से आह निकल गयी, नगमा ने ये बोलते हुए "बाबू भौजी की गाँड़ ऐसी ही होगी न" अपने दोनों हांथों से अपनी गाँड़ के दोनों पाट को फाड़ कर उसका छोटा सा गुलाबी छेद दिखाया और अपने बाबू को देखकर खुद भी आहें भरने लगी।

चंद्रभान- वाह मेरी बिटिया आज तो तूने मुझे मेरी बहू का भी मजा दे दिया, तेरी जैसी बिटिया पाकर मैं धन्य हो गया।

चंद्रभान ने नीचे झुककर बड़े प्यार से अपनी बेटी के गाल को चूमकर मानो उसका शुक्रिया किया।

नगमा- बाबू.....मैं आपकी हूँ और आप मेरे, आपका सुख मेरा सुख है, जो आपको चाहिए जैसा चाहिए मैं वैसी ही बन जाउंगी, वही सुख दूंगी आपको, आप निश्चिन्त रहिये, आपको मजा आना चाहिए बस।

चंद्रभान नगमा के बगल में लेटकर उसको बाहों में भर लेता है और भावुक होकर दुलारने लगता है, नगमा भी थोड़ा भावुक होकर अपने बाबू से लिपट जाती है।

नगमा फिर धीरे से चंद्रभान के कान में- बाबू भौजी की गाँड़ मारिये न, मेरी गाँड़ को भौजी की गाँड़ समझ कर मार के देखिए कि कितना मजा आता है।

(ऐसा कहकर नगमा अपने बाबू के फौलाद हो चुके लंड को अपनी हथेली में भरकर एक कातिल मुस्कान के साथ सहलाने लगती है)

चंद्रभान मस्ती में भरकर फिर से नगमा के ऊपर आ जाता है और नगमा फिर से पेट के बल लेटकर अपनी गाँड़ को दोनों हांथों से फाड़कर, थोड़ा ऊपर उठाते हुए उसके गुलाबी छेद को अपने बाबू के सामने परोसते हुए बोलती है- लो पिताजी अपनी बहू की गाँड़।

चंद्रभान नीचे झुककर पहले तो गाँड़ के छेद को जीभ से चाटता है, जीभ की छुअन गाँड़ के छेद पर पाकर नगमा का बदन थरथरा जाता है, एक मीठी सिसकारी उसके मुँह से फूट पड़ती है, अपनी गाँड़ को वो अपने दोनों हांथों से वैसे ही चीरे रहती है।

थोड़ी देर गाँड़ के छेद को सूंघने और चाटने के बाद चंद्रभान नगमा की पूरी गाँड़ को अपनी दोनों हथेली में जितना हो सके भर भरकर मीजता, सहलाता और दबाता है, नगमा जोर जोर से सिसकारने लगती है, काफी देर गाँड़ का अच्छे से मुआयना करने के बाद चंद्रभान बोलता है- बहू

नगमा मस्ती में आंखें बंद किये हुए- हाँ पिताजी

चंद्रभान- मार लूं अब तेरी गाँड़

नगमा- हाँ मारिये न पिता जी, पूछना कैसा....जल्दी मारिये....डालिये अपना लंड अपनी बहू की गाँड़ में।

ये सुनते ही चंद्रभान अपने दहाड़ते लंड को हांथों में लेकर अपनी बेटी की गाँड़ के गुलाबी छेद पर सेट करता है और एक तेज धक्का मरता है।

नगमा जोर से कराह उठती है- पिताजी धीरे से....मैं सच में भौजी नही हूँ......बेटी हूँ आपकी....थोड़ा धीरे से.....बाबू

लन्ड सरसराता हुआ आधा नगमा की गाँड़ में समा जाता है, नगमा का बदन अकड़ जाता है, चंद्रभान उसके ऊपर लेटकर उसे दबोच लेता है और एकएक तुरंत एक जोरदार दूसरा धक्का इतनी तेज मरता है कि उसका समूचा लंड नगमा की गाँड़ में उतर जाता है

दर्द से नगमा तेजी से सीत्कार उठती है, चंद्रभान जल्दी से झुककर नगमा को "ओह मेरी बहू.... मेरी प्यारी बहू" कहकर चूमने लगता है, दर्द से कराहते हुए भी नगमा की हंसी छूट पड़ती है और फिर वो जल्दी से दिखावा गुस्सा करते हुए हाँथ घुमा कर चंद्रभान की गाँड़ पर एक मुक्का मारते हुए बोली- पहले गच्च से एक ही बार में पूरा लंड घुसा दो फिर प्यार से दुलारो....बहुत बदमाश हो पिताजी आप.....कितना दर्द हो रहा है मुझे.......आपको पता भी है.......थोड़ी देर रुके रहना अभी धक्का मत लगाना।

चंद्रभान- क्या करूँ बेटी तेरी गाँड़ देखकर तो मैं पहले ही बेकाबू हो जाता हूँ ऊपर से तूने जो बहू का अलग से तड़का लगाया है उससे तो मैं पगला ही गया हूँ।

नगमा- अच्छा जी, तो कैसा लग रहा है भौजी की गाँड़ में पूरा लंड डाल के, नरम नरम है न

चंद्रभान- मत पूछ मेरी बेटी.....बहू की कल्पना करके ही इतना मजा आ रहा है कि क्या बताऊँ।

नगमा- अच्छा मेरे प्यारे बाबू, बहू के चक्कर में बेटी को न भूल जाना।

चंद्रभान- कैसी बातें करती है मेरी रानी, तू पहले है, बाकी सब बाद में।

नगमा- मेरे बाबू...मेरा सैयां...अब मारो न भौजी की मखमली गाँड़.....मारो

चंद्रभान- मैं तुझे बेटी बोलकर गाँड़ मारूं, या बहू

नगमा- जो आपका मन कर रहा है, वो बोलिये

चंद्रभान- मेरा तो दोनों कर रहा है

नगमा- तो एक एक करके दोनों बोलिये, और जल्दी मारिये मेरी गाँड़...अब रहा नही जाता।

चंद्रभान- तो तू आग्रह कर न...और मजा आएगा।

नगमा- अच्छा जी....

चंद्रभान- हाँ.... बोल न...आग्रह कर

नगमा- बाबू जी......गाँड़ मारिये न अपनी बिटिया की......….....................पिताजी....ओ मेरे ससुर जी.....गाँड़ मारिये न अपनी बहू की

(कहने के बाद नगमा मस्ती में हंस पड़ी)

चंद्रभान "आह मेरी बेटी.....ओह मेरी बहू" " आह क्या गाँड़ है तेरी" कह कहकर नगमा की गाँड़ मारने लगा, जब चंद्रभान बेटी बोलता तो नगमा बाबू जी बोलती और जब चंद्रभान बहू बोलता तो नगमा मस्ती में सिसकारते हुए पिताजी या ससुर जी बोलती, शुरू में धीरे धक्कों से शुरू हुई चुदाई धीरे धीरे तेज धक्कों के साथ आगे बढ़ने लगी, नगमा अब अपनी गाँड़ को पूरा उठा उठा कर ताल से ताल मिला रही थी, पूरी झोपड़ी में आह बहू... आह बेटी और हाय बाबू....उफ्फ पिताजी, हाय पिताजी की आवाज गूंजने लगी।

चंद्रभान पूरी ताकत से नगमा की गाँड़ में दनादन धक्के लगाने लगा, नगमा ने अपने दोनों हांथों से बिस्तर को पकड़ कर मानो भींच सा रखा था, दोनों को इतना मजा आज पहली बार आ रहा था, इसका कारण साफ था कि इस चुदाई में काल्पनिक तौर पर उस घर की बहू भी शामिल थी।

चंद्रभान से ज्यादा देर टिका नही गया और वह एक मोटी वीर्य की धार छोड़ते हुए " ओह मेरी बहू, मेरे बेटे की पत्नी, क्या गाँड़ है तेरी" कहते हुए झड़ने लगा, नगमा अपने बाबू की मस्ती भरी सिसकारी और बातें सुनकर मस्ती से भर गई और मुस्कुराने लगी। नगमा की गाँड़ चंद्रभान के गरम वीर्य से भर गई, चंद्रभान नगमा के ऊपर ढेर हो गया और काफी देर तक लेटा रहा फिर अपना सुस्त लंड नगमा की गाँड़ से निकाला और बगल में लेट गया, नगमा ने अपने बाबू को सहलाते हुए बाहों में ले लिया।
 
Update- 60

(आइए अब चलते हैं जरा नीलम के पास उसके बाद देखेंगे हमारी नायिका रजनी क्या कर रही हैं)

नीलम ने नाश्ता तैयार किया और लेकर अपने बाबू बिरजू के पास द्वारा पर गयी जहां बिरजू नहा धोकर बैठा था, बारिश अब बंद हो चुकी थी पर बादल छाए हुए थे।

अभी दोनों बाप बेटी नाश्ता करने बैठे ही थे कि इत्तेफ़ाक़ देखो एक तांगा घर के सामने रोड पर आकर रुका, उसमे से नीलम का पति उतरा, उसको देखकर बिरजू नीलम से बोला- लो दामाद जी की उम्र तो बहुत लंबी है, अभी इनको बुलाने के बारे में सोच ही रहे थे पर ये तो खुद ही आ गए।

नीलम- हाँ बाबू, बात तो अपने ठीक कही, ईश्वर जब देता है तो ऐसे ही छप्पर फाड़ के देता है, पर ये अचानक अपने आप कैसे आ धमके, जरूर कोई बात है।

बिरजू दामाद के स्वागत के लिए आगे बढ़ा- अरे दामाद जी अचानक कैसे आना हुआ?

(यहां मैं बता दूं कि नीलम के पति का नाम महेंद्र है)

नीलम के पति ने बिरजू के पैर छूकर प्रणाम किया और बोला- बाबू जी मैं किसी काम से भैरवपुर गया था वहां से वापिस आ रहा था रास्ते में आपके ही गांव का एक मेरा मित्र मिला उसी ने बताया कि आप पेड़ से गिर गए थे और हाँथ में चोट लगी है तो वही मैंने सोचा कि जब अपनी ससुराल के नजदीक से गुजर ही रहा हूँ तो आपका हाल चाल लेता चलूं।

(बिरजू ये सुनकर काफी खुश हुआ)

बिरजू- आओ दामाद जी बैठो, अच्छा ही किये चले आये, मैं और नीलम अभी कुछ देर पहले तुम्हारा ही जिक्र कर रहे थे, बड़ी लंबी उम्र है तुम्हारी, दरअसल मैं पेड़ से नही गिरा था, बस क्या है कि नीलम जामुन तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ी हुई थी और मैं नीचे जमीन पर खड़ा था, पता नही कैसे डाल टूट गयी और वो सीधा मेरे ऊपर गिरी, बस उसी वजह से थोड़ा मोच आ गयी थी पर अब तो बिल्कुल ठीक हो गया है।

ये सुनकर महेंद्र ने नीलम की तरफ देखा तो वो मुस्कुरा रही थी।

महेन्द्र- मायके में आ के बचपना छा ही जाता है तुम्हे भी, इत्तेफ़ाक़ है तुम तो बच गयी पर बाबू जी को तो चोट लग गयी न।

नीलम- अब क्या करूँ, अम्मा ननिहाल जा रही थी तो सोचा कुछ पके हुए जामुन तोड़कर दे दूं मामा लोगों के लिए, उसी के लिए चढ़ी थी पेड़ पर, अब ये हादसा हो गया तो क्या करूँ।

बिरजू- अरे बेटा कोई बात नही ये तो होता जाता रहता है, जिंदगी है, तुम बताओ कैसे हो?, नीलम जा के पानी तो ले आ दामाद जी के लिए।

(बिरजू ने नीलम की तरह देखकर मुस्कुरा कर कहा)

नीलम- हाँ बाबू अभी लायी।

और नीलम महेन्द्र को देखते हुए घर के अंदर चली गयी

महेन्द्र- मैं ठीक हूँ बाबू जी, आप बताइए, कैसा चल रहा है, खेती बाड़ी सब ठीक चल रही है न।

बिरजू- हाँ बेटा सब ठीक है, धान की रोपाई करनी है, बरसात अच्छे से होने लगे तो करूँ, धान की छोटी पौध तो तैयार है, आज देखो मौसम अच्छा है, रात भर बारिश हुई है, अभी तो खैर बंद हो गयी, पर बदल छाए ही हैं, बरसात शुरू होने में अब ज्यादा दिन नही, मानसून आने वाला है।

महेन्द्र- हाँ पिताजी मानसून अब आने वाला है, वैसे आप नहर के पानी से खेत भरकर धान की रोपाई कर ही लीजिए, ज्यादा देर करना ठीक नही, बाद में पैदावार होने में देरी हो जाती है अगर फसल देर से लगाओ तो, बरसात तो देखो बाबूजी होगी ही, उसका ज्यादा इंतज़ार करना ठीक नही।

बिरजू- हाँ बेटा बात तो तुम ठीक कह रहे हो, करता हूँ जल्द ही, नीलम की माँ भी अभी अपने मायके गयी हुई हैं न, बस वो आ जाय तो धान की रोपाई शुरू करता हूँ, खैर तुम बताओ वहां पर कैसे हैं सब, नीलम के बगैर वहां कोई दिक्कत या परेशानी तो नही हो रही।

महेन्द्र- नही बाबू ऐसी कोई बात नही, हैं घर में और सब लोग संभाल लेते हैं, वैसे नीलम जब तक चाहे रह सकती है यहाँ आराम से, मुझे कोई दिक्कत नही है पर अब अम्मा-बाबू नीलम को ससुराल बुलाना चाहें तो वही जाने, बाकी मेरी पूछो तो मुझे कोई दिक्कत नही, वैसे अम्मा बाबू को भी कोई परेशानी नही है, क्योंकि वहां तो हैं ही और लोग घर संभालने के लिए, अम्मा बाबू भी समझते हैं कि आपलोग अकेले हैं इसलिए भी नीलम पर ससुराल में रहने के लिए ज्यादा कोई दबाव नही डालते हैं।

बिरजू- हाँ बेटा बात तो तुम ठीक कह रहे हो, नीलम को अच्छा घर मिला है अच्छे लोग मिले हैं तभी तो नीलम ज्यादार हमारे साथ रह लेती है, वैसे भी शादी के बाद लड़की को मायके में ज्यादा दिन कौन रहने देता है, वैसे जब भी जरूरत लगे लिवा जाना, नीलम तो पहले उस घर की है इस घर की तो बाद में है।

(बिरजू ने दबे मन से जानबूझकर कहा)

महेन्द्र- अरे बाबू जी कैसी बातें कर रहे हैं, ऐसा कुछ नही है ऐसा न सोचा कीजिये, नीलम का जब तक मन करे यहां रहे। खेतों के काम धाम यहां पर करवा लेगी तो लिवा जाएंगे।

तभी नीलम सुबह सुबह जो नाश्ता बनाया था वो और पानी लेके आ जाती है, बरसात होने की वजह से उमस हो रही थी गर्मी तो थी ही, सुबह सुबह चूल्हे के पास बैठकर नाश्ता बनाने से नीलम थोड़ा पसीना पसीना भी हो गयी थी, पसीने से उसका ब्लॉउज काफी भीग भी गया था, उसकी दोनों कांख पसीने से भीगी हुई थी, ब्लॉउज वहां पर गीला हो गया था, इसकी कांख पर हल्के हल्के काले काले बाल थे जो कि हाँथ उठाने पर ब्लॉउज गीला होने की वजह से दिखते थे, जिसको देखकर किसी का भी लंड फुंकार मार सकता था।

नीलम की कांख से पसीने की मनमोहक गंध रिस रही थी, जैसे ही वह एक ही खाट पर बैठे ससुर और दामाद के बीच में नाश्ते की प्लेट रखने के लिए झुकी, साड़ी का पल्लू सरक कर गिर गया और हाँथ आगे की तरफ फैलने की वजह से कांख से निकली स्त्री के पसीने की भीनी भीनी गंध दो पुरुष जिसमे से एक सगा पिता और एक पति था, के नथुनों में गयी तो उनकी काम वासना जागने लगी, दोनों की नज़र एक साथ नीलम के बड़े गले के ब्लॉउज में से झांकते 34 साइज की कसी कसी दोनों चूचीयों पर पडी तो दोनों के लंड ने एक साथ हल्का सा झटका लिया, और दोनों पुरुष यही सोच रहे थे कि ये बस मेरे साथ ही हो रहा है, पर ऐसा नही था, बिरजू ने अपने दामाद की नज़र बचा कर अपनी सगी बेटी की मदमस्त चुचियों का नज़रों से रसपान किया तो नीलम का पति जो कि कुछ महीनों ने चुदाई का प्यासा था आज नीलम की अधखुली चूचीयों को देखकर मचल उठा। नीलम भी मन ही मन मुस्कुरा रही थी उसे पता था कि दोनों लोग मेरी चूचीयों को खा जाने वाली नज़रों से घूर रहे हैं।

महेन्द्र का तो समझ में आता है कि वो कुछ महीनों से प्यासा था पर बिरजू तो बीती रात ही नीलम को तीन बार जबरदस्त हर तरह से चोद चुका था पर फिर भी एक सुंदर मदमस्त स्त्री के बदन का जादू देखो, कैसे पुरुष की प्यास को कभी बुझने नही देता, न जाने ये कौन सा जादू है, ईश्वर ने भी क्या चीज़ बनाई है- स्त्री
 
Back
Top