भाग 171
रोजी शर्म से पानी पानी हो रही थी उसने सूरज के सर को खुद से अलग करने की कोशिश की परंतु सूरज रोजी की चूचियों पर लगे क्रीम का आनंद लेने लगा.. रोजी की अधखिली चूचियां सूरज की उत्तेजना को बढ़ा रही थी और उसके होठों में मिठास खोल रही थी..
कमरे में अब केक की मिठास और वासना की गर्माहट एक दूसरे में घुल रही थी। उत्सव की यह शुरुआत अब उस अंतिम अध्याय की ओर बढ़ रही थी, जहाँ सूरज और रोजी एक दूसरे में विलीन होने वाले थे।
नियति इस प्रेमी युगल को देखकर मोहित हो रही थी पर वह मजबूर थी..
अब आगे..
इधर सूरज रोगी की चूची चूसने में व्यस्त था उधर रोजी का तन-बदन मुस्कुरा रहा था। उसका रोम-रोम अब पूरी तरह जागृत हो चुका था। उसने एक बार फिर सुरज के लंड के सुपाड़े को छूने के लिए हाथ बढ़ाया सूरज सचेत हो गया। वह हिस्सा अब अत्यधिक संवेदनशील हो चुका था। सूरज ने तुरंत उसका हाथ थाम लिया और प्यार भरी झिड़की देते हुए बोला—
"अरे... थोड़ा तो आराम करने दो इसे। अभी इसे तुम्हारी बहुत सेवा करनी है, और मुझे भी तुम्हें खुशियों के उस मुकाम तक ले जाना है जहाँ अब से कुछ देर पहले तुमने मुझे पहुंचाया था।
रोजी का चेहरा शर्म से लाल हो गया…उसने अपनी गर्दन झुका ली।
वह उस मजबूत लिंग अपनी अनछुई और कुवारी बुर में जाते सोच कर सिहर उठी…
सूरज ने रोजी की ठुड्डी को पकड़कर ऊपर उठाया। उसकी आँखों में वह 'प्यास' अब एक 'शिकार' की भूख में बदल चुकी थी। उसने देखा कि रोजी के चेहरे पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं और उसकी सांसें उसके सीने की धड़कन के साथ तालमेल बिठा रही थीं।
सूरज ने रोजी को धीरे से बिस्तर पर लिटाया। वह सफेद कुर्ता अब पूरी तरह खुल चुका था और रोजी का वह तराशा हुआ, कुंवारा बदन सूरज के सामने एक खुली किताब की तरह था। सूरज ने अपने अंगूठे से रोजी के होठों को सहलाया और फिर उसकी नजरें सीधे रोजी की जाँघों के बीच उस पवित्र स्थान पर टिकीं, जहाँ आज उसे अपनी विजय पताका फहराने थी।
सूरज ने धीरे से रोजी की रेशमी जाँघों पर हाथ रखा और उस मंदिर के पट खोलना की कोशिश की जिसकी देहरी पर उसे पूर्ण समर्पण करना था । सूरज की लप लपाती जीभ देखकर रोजी ने एक सिहरन के साथ अपनी आँखें मूंद लीं और अपनी हथेलियां आपस में जोड़ लीं। उसके चेहरे पर शर्म की जो सुर्खी थी, वह सूरज को और भी ज्यादा दीवाना बना रही थी।
रोजी (कांपती आवाज़ में): "सूरज... प्लीज, वहां नहीं । मुझे बहुत शर्म आ रही है... तुमने बाकी सब तो देख ही लिया है। अब बस आ जाओ।"
उसने अपनी बाँहें फैला दीं, जैसे वह हार मान चुकी हो, लेकिन उसकी जाँघें अभी भी एक-दूसरे से जुदा होने को तैयार नहीं थीं। सूरज ने उसकी मासूमियत को देखा। वह सफेद झीना कुर्ता अब पूरी तरह से बेमानी हो चुका था। सूरज ने अपने हाथ आगे बढ़ाए और रोजी को अपनी बाहों में भरने की कोशिश की। सूरज की बाहों में जाकर उसका तन-बदन जैसे सूरज से एक जाकर हो गया था वह उस स्पर्श की उत्तेजना को सह नहीं पा रही थी और खुद को सूरज के फौलादी सीने में छुपा लेना चाहती थी।
सूरज अब लगभग पूरी तरह रोजी के ऊपर आ चुका था। दोनों के जिस्मों के बीच अब हवा का एक झोंका ही गुजर सकता था। रोजी की धड़कनें सूरज के सीने पर साफ सुनाई दे रही थीं। तभी, जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने रोजी के भीतर के सारे बंधनों को तोड़ दिया हो, उसने अपनी आँखें खोलीं और धीरे-धीरे अपनी 'जाँघों' के द्वार खोल दिए।
जैसे ही रोजी की जाँघें खुलीं, सूरज ने खुद को उस 'मखमली खाई' के बीच सटा दिया। वह एहसास अद्भुत था। रोजी की जाँघों की अंदरूनी कोमलता और सूरज के मजबूत जांघों से रगड़ खाती गई.. लिंग की वह पत्थर जैसी कठोरता जब रोजी की पेडू से टकराई तो पूरे कमरे का तापमान जैसे एकदम से बढ़ गया।
क्योंकि रोजी ने सूरज को अपने उसे गुप्त अंग को देखने के लिए रोक दिया था सूरज अंदाज से ही अपने लंड से उसकी कुंवारी बुर को छूने की कोशिश कर रहा था।
सूरज का वह 'जादुई अंग' अब सीधे रोजी की उस नाजुक दहलीज के समीप था, जहाँ से कुंवारेपन की सीमा समाप्त होती थी। रोजी ने महसूस किया कि सूरज का भारीपन और उसकी गर्मी उसके भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा कर रही है। वह स्वयं अब उसे मिलन के लिए छटपटा रही थी।
सूरज ने अपने कूल्हों को थोड़ा आगे बढ़ाया। रोजी ने अपने दांतों तले अपना निचला होंठ दबा लिया। उसे महसूस हो रहा था कि वह 'फौलादी अंग' अब धीरे-धीरे उसकी कुंवारी बुर के बिल्कुल करीब आ चुका है
सूरज ने रोजी के माथे पर पसीने की बूंदों को चूमा। उसे अहसास हुआ कि सोनी मौसी ने जिस 'अंगूठे' के जादू की बात की थी, वह अब अपने चरम पर था। उसकी रगों में दौड़ता खून अब एक सैलाब बन चुका था, जो रोजी के इस 'गुप्त खजाने' को फतह करने के लिए पूरी तरह तैयार था।
जैसे ही सूरज का वह लोहे जैसा सख्त लंड रोजी की कुंवारी देह की उस रेशमी दहलीज के पहरेदार (भग्नाशे) से सटा, नियति ने अपना क्रूर खेल खेल दिया। वह स्पर्श, जिसे पाकर किसी भी मर्द का पौरुष ज्वालामुखी बन जाना चाहिए था, सूरज के लिए किसी बर्फीले झोंके जैसा साबित हुआ।
जैसे किसी फूले हुए गुब्बारे में अचानक सुई चुभो दी गई हो, सूरज के अंग का वह सारा गर्व, वह सारी अकड़ और वह पर्वत जैसी कठोरता पल भर में काफूर हो गई।
रोजी ने अपनी आँखें मूंद रखी थीं, वह उस 'प्रहार' का इंतज़ार कर रही थी जो उसे लड़की से औरत बनाने वाला था, लेकिन उसे महसूस हुआ कि वह सख्त दबाव अचानक एक नरम छुअन में बदल गया है। सूरज का वह अंग, जो अभी कुछ पल पहले एक फौलाद जैसा था, अब एक 'मुरझाए हुए केले' की तरह बेजान होकर उसकी जाँघों के बीच लटक गया।
कमरे में मोगरे की महक और मिलन की वह तड़प अचानक एक ठंडी, डरावनी खामोशी में बदल गई। वह क्षण, जो सूरज के जीवन का सबसे गौरवशाली पुरुषार्थ बनने वाला था, उसकी सबसे बड़ी त्रासदी में तब्दील हो गया।
सूरज के माथे पर पसीने की मोटी बूंदें उभर आईं। उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था मानो सीना फाड़कर बाहर निकल आएगा। उसने पागलों की तरह अपने हाथों से उस बेजान लंड को पकड़ा, उसे सहलाया, उसे झकझोरा कि शायद वह वापस जाग जाए, पर सब व्यर्थ था। वह अंग अब किसी कटे हुए पेड़ की टहनी की तरह निढाल था।
रोजी ने जब कोई हलचल नहीं महसूस की, तो उसने धीरे से आँखें खोलीं। सूरज का चेहरा पीला पड़ चुका था और उसकी आँखों में छटपटाहट थी। रोजी बिस्तर पर उठकर बैठ गई। उसकी नजर जब सूरज के पैरों के बीच गई, तो वह ठिठक गई। वह अंग, जिसे वह अभी कुछ देर पहले एक अद्भुत और शक्तिशाली अस्त्र समझ रही थी, अब पूरी तरह शांत और लटका हुआ था। वह अब भी अपनी बनावट में खूबसूरत था, लेकिन उसकी 'आत्मा' यानी उसका तनाव गायब था।
रोजी (धीमी और उलझन भरी आवाज़ में): "सूरज... क्या हुआ? अचानक तुम्हें क्या हो गया? यह... यह ऐसा क्यों हो गया?"
सूरज के पास कोई जवाब नहीं था। वह अंदर ही अंदर चिल्ला रहा था—"हे विधाता! यह तूने मेरे साथ क्या किया? जब मंजिल सामने थी, तो तूने मेरे पैर क्यों काट दिए?" उसे अपनी मौसी सोनी का वह जादुई स्पर्श याद आया, जिसने उसे सुबह एक विजेता जैसा महसूस कराया था, पर अब वह खुद को एक 'नपुंसक' की तरह महसूस कर रहा था।
सूरज अपनी पीठ बिस्तर के सिरहाने से टिककर बैठ गया। उसे अपनी देह से घृणा होने लगी थी। उसे लग रहा था जैसे वह एक अभिशप्त जीवन जी रहा है। रोजी का हर स्पर्श अब उसे सांत्वना नहीं, बल्कि एक घाव की तरह लग रहा था। उसकी मर्दानगी का वह पतन उसके आत्मविश्वास को राख कर चुका था।
पूरे कमरे का वह मादक वातावरण अब एक 'अस्पताल के वार्ड' जैसा बोझिल हो गया था। मिलन की वह आग बुझ चुकी थी और पीछे छोड़ गई थी केवल निराशा, अपमान और एक ऐसा सवाल जिसका जवाब सूरज के पास नहीं था।
फ्लैट के उस खूबसूरत हाल में जहाँ मोगरे की खुशबू और पीली रोशनी ने एक जादुई संसार रचा था, वहाँ अब एक भारी और दमघोंटू खामोशी पसरी हुई थी। वह बिस्तर, जो कुछ क्षण पहले तक दो रूहों के मिलन की पवित्र वेदी बनने वाला था, अब सूरज की पराजय और रोजी की अधूरी प्यास का गवाह बन गया था।
सोनी रोजी बिस्तर से उठी पास पड़े रुमाल से अपनी जांघों के बीच रिस रहे काम रस को पोछा और अपनी आंखें बंद किये कुछ सोचने लगी।
सूरज बिस्तर के एक कोने में सिर झुकाए बैठा था। उसकी आँखों में वह चमक गायब थी, जो थोड़ी देर पहले किसी विजेता की तरह दमक रही थी। वह 'पौरुष' जो फौलाद बनकर उभरा था, अब रेत के महल की तरह ढह चुका था। उसके शरीर की मांसलता अब भी वैसी ही थी, लेकिन उसका आत्मविश्वास जैसे किसी गहरी खाई में गिर गया था।
रोजी ने धीरे से अपने खुले हुए सफेद कुर्ते को समेटा। उसके चेहरे पर जो गुलाबी रंगत थी, वह अब एक फीकी उदासी में बदल गई थी। उसने देखा कि सूरज की उंगलियां कांप रही हैं। वह समझ सकती थी कि एक पुरुष के लिए अपनी प्रेमिका की बाहों में इस तरह 'हार' जाना मौत से कम नहीं होता।
रोजी उठी और बिना किसी शब्द के सूरज के पास जाकर बैठ गई। उसने अपने ठंडे हाथ सूरज के चौड़े और कसरती कंधों पर रखे। सूरज सिहर उठा—जैसे किसी घाव पर नमक पड़ गया हो।
सूरज (रुँधे हुए गले से): "रोजी... मुझे माफ़ कर दो। मैं... मैं नहीं जानता यह क्या हुआ। मैं तुम्हें वो सुख, वो पूर्णता नहीं दे पाया जिसका मैंने वादा किया था। मैं खुद को एक अपराधी महसूस कर रहा हूँ।"
रोजी ने अपना सिर उसकी मजबूत पीठ पर टिका दिया। उसे सूरज के दिल की धड़कनें महसूस हो रही थीं, जो किसी घायल परिंदे की तरह फड़फड़ा रही थीं।
रोजी (धीमी और रेशमी आवाज़ में): "शशश... सूरज, अपने आप को दोषी मत ठहराओ। तुम मेरे लिए सिर्फ एक 'अंग' नहीं हो, तुम मेरा पूरा संसार हो। आज अगर तुम्हारा शरीर साथ नहीं दे पाया, तो क्या हुआ? मेरी रूह तो तुम्हारी बाहों में ही सुकून पा रही है।"
रोजी ने हार नहीं मानी थी। उसका प्यार अब उसकी कामुकता के साथ एकाकार हो रहा था। उसने सूरज को धीरे से बिस्तर पर लेटाया और खुद उसके ऊपर झुक गई। उसका झीना कुर्ता अब भी पूरी तरह बंद नहीं था, और उसके वक्षों की गर्मी सूरज के चेहरे पर महसूस हो रही थी।
उसने सूरज की बंद आँखों को चूमा और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ी। उसने अपने कोमल हाथों से सूरज के उस निढाल अंग को फिर से अपनी हथेलियों में लिया। वह अब भी उतना ही सुंदर और कोमल था, बस उसमें वह 'अकड़' नहीं थी। रोजी ने अपनी जीभ की नोक से उस शांत मुकुट को छुआ।
"सूरज, ये तुम्हारी कमजोरी नहीं, ये शायद तुम्हारी बेपनाह मोहब्बत का बोझ है। तुम मुझे पाने के लिए इतने व्याकुल थे कि तुम्हारी धड़कनों ने तुम्हारे जिस्म का साथ छोड़ दिया।"
रोजी ने उसे अपनी मुट्ठी में भरकर धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। उसकी उंगलियों का दबाव एक ही समय में कोमल भी था और उत्तेजक भी। वह उसे चूम रही थी, उसे सहला रही थी, जैसे किसी रूठे हुए बच्चे को मनाया जाता है। सूरज ने महसूस किया कि रोजी का यह निस्वार्थ समर्पण उसके भीतर के डर को धीरे-धीरे कम कर रहा है।
सूरज ने रोजी के बालों में अपनी उंगलियां फँसा दीं। उसे अहसास हुआ कि मर्दानगी सिर्फ पत्थर जैसी कठोरता में नहीं, बल्कि इस गहरे जुड़ाव में भी है। भले ही उस रात वह 'अंतिम प्रहार' नहीं हो सका, लेकिन उनकी रूहों ने एक-दूसरे को नग्न अवस्था में स्वीकार कर लिया था।
सूरज की आँखों से आंसू थे।
सूरज: "रोजी, मुझे वक्त दो। मैं वापस आऊंगा... उस रूप में जिसे तुमने आज देखा था।
रोजी ने उसे कसकर गले लगा लिया। उनका मिलन अधूरा रहा, लेकिन उनकी प्रेम कहानी में एक ऐसा अध्याय जुड़ गया जिसने उन्हें जिस्मों से परे ले जाकर रूहों के धरातल पर मिला दिया था।
उधर हवेली के शांत कमरे में दोपहर की मद्धम धूप फर्श पर सुनहरी लकीरें खींच रही थी। सुगना बिस्तर पर लेटी थी, पर उसकीआँखें बोझिल थी, एक अनकही बेचैनी थी। माँ और पुत्र के बीच का रिश्ता केवल रक्त का नहीं, बल्कि रूह का होता है—एक ऐसा अदृश्य तार जो सात समंदर पार भी धड़कनों को जोड़ देता है।
सुगना की पलकें भारी हुईं और वह अर्ध-चेतन अवस्था (Trance) में चली गई शायद यह सुगना और सूरज के बीच की टेलीपैथी ही थी जिसने सुगना को उसके अतीत में धकेल दिया…
समय का पहिया पीछे घूमा और सुगना का मन बनारस महोत्सव की उस धुंधली शाम के गलियारों में पहुँच गया, जिसे उसने अपनी स्मृति की सबसे गहरी परत में दफन कर दिया था।
सुगना को याद आया 'विद्यानंद' का वह रहस्यमयी कक्ष। चारों ओर जलती लोबान की गंध और दीवारों पर उकेरे गए विचित्र यंत्र। सुगना तब सूरज को अपनी गोद में लिए वहां पहुँची थी। नन्हा सूरज, जिसकी आँखों में गजब का तेज था, पर विद्यानंद की शांत और पारखी नज़रों ने उस तेज के पीछे छिपे एक भयंकर अवरोध को देख लिया था।
विद्यानंद की वह भारी और गूँजती हुई आवाज़ आज फिर सुगना के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरने लगी:
"देवी, यह पुत्र विलक्षण है... इसमें बुद्धिमत्ता का भंडार होगा, यह बालक पूरे विश्व के लिए एक सम्मानित और प्रतिष्ठित व्यक्ति बनेगा।
पर इसका जन्म एक ऐसे संयोग (पाप) की कोख से हुआ है जो इसके पौरुष को उम्र भर के लिए जकड़ देगा। परायी स्त्री से समागम के समय इसकी मर्दानगी इसका साथ छोड़ देगी।"
सुगना का कलेजा काँप उठा था। उसने सिसकते हुए पूछा था, "क्या विधाता के लिखे को बदलने का कोई मार्ग नहीं है महाराज?"
विद्यानंद ने एक लंबी और बोझिल चुप्पी के बाद सुगना की आँखों में झाँकते हुए वह 'कठोर सत्य' कहा था, जिसे सुनकर सुगना की रूह तक काँप गई थी:
"प्रकृति के इस दोष का निवारण प्रकृति के ही विरुद्ध जाकर संभव है। जिस ऊर्जा ने इसे जन्म दिया है, उसी ऊर्जा की ऊष्मा इसे पूर्ण करेगी। इसे अपनी ही माँ या अपनी सगी बहन के साथ संभोग की उस अग्नि परीक्षा से गुज़रना होगा, जहाँ इसके पुरुषार्थ अवरोध हमेशा के लिए टूट जाए। अन्यथा... यह जीवन भर एक प्यासे राही की तरह अपनी प्यास लिए भटकता रहेगा।"
सुगना अचानक एक झटके के साथ बिस्तर पर उठकर बैठ गई। उसका पूरा शरीर पसीने से लथपथ था और साँसें इस कदर तेज़ थीं जैसे वह किसी डरावने सपने से जागी हो। उसने अपने काँपते हाथों से पानी का घूंट पिया, पर उसके गले की खुश्की कम नहीं हुई।
सुगना के अंतर्मन में स्मृतियों का वह द्वार खुल गया था, जहाँ केवल अंधेरा और नियति का अट्टहास था। वह कोई साधारण वासना नहीं, बल्कि काल का एक क्रूर छलावा था।
बरसों पहले, जब सरयू सिंह और सुगना एक-दूसरे की देह के आकर्षण में बंधे थे, तब उन दोनों में से किसी को भी इस बात का लेशमात्र इल्म नहीं था कि वे एक ही रक्त के दो छोर हैं। नियति ने परिस्थितियों का ताना-बाना कुछ ऐसा बुना था कि पहचान धुंधली हो गई थी और वह वासना प्रबल। वो अनोखा मिलन अद्भुत था जिसमें पूर्ण तृप्ति थी संतोष था पर वह ऐसा 'अनजाना महापाप' था, जिसका फल आज सूरज के रूप में पल रहा था।
विद्यानंद की वाणी अब सुगना के कानों में गूंज रही थी।
नियति का षड्यंत्र इतना गहरा था कि उसने पिता-पुत्री के उस मिलन का दंड सूरज की नपुंसकता के रूप में चुना।
यद्यपि सुगना को अब तक इस बात का इल्म नहीं था कि सूरज अपनी इस मर्दाना कमजोरी से जूझ रहा है पर फिर भी न जाने उसे यह सपना क्यों आया?
सुगना अनजान थी पर अब समय का पहिया वहीं लौट आया था। सुगना बिस्तर पर लेटी पसीने से भीग रही थी, क्योंकि वह जानती थी कि जिस गाँठ को नियति ने अनजाने में लगाया था, उसे 'जान-बूझकर' ही खोलना होगा। सूरज की मुक्ति का द्वार अब उसी वर्जित अग्नि से होकर गुज़रना था।
वह शब्द—"माँ या बहन से संभोग"—किसी अभिशाप की तरह उसके दिमाग में तांडव मचा रहे थे।
हवेली के उस भारी सन्नाटे और सुगना के मानसिक द्वंद्व के बीच, कमरे के दरवाज़े पर हुई दस्तक किसी ठंडी हवा के झोंके की तरह महसूस हुई। दरवाज़ा खुला और ढलती हुई धूप के साथ मधु ने भीतर प्रवेश किया। कॉलेज की किताबों को सीने से चिपकाए, चेहरे पर वही चिर-परिचित मासूमियत लिए मधु को देखकर सुगना के चेहरे पर एक फीकी ही सही, पर सच्ची मुस्कान उभर आई।
मधु को देखते ही सुगना को याद आया कि विद्यानंद ने उस डरावनी भविष्यवाणी का बीज उसके मन में बोया था, तब सुगना कितनी टूट गई थी। वह खुद को उस 'पाप' का भागीदार नहीं बनाना चाहती थी, लेकिन अपने बेटे की विफलता भी उससे देखी नहीं जा रही थी।
तभी उसने विधाता से एक अनोखी मन्नत माँगी थी। उसने कठिन तप, व्रत और न जाने कितनी पूजा-अर्चना की थी, ताकि उसके घर में एक पुत्री का जन्म हो। सुगना के लिए मधु केवल एक संतान नहीं थी, बल्कि वह 'सूरज की मुक्ति' का वह विकल्प थी जिसे उसने समय रहते तैयार किया था।
मधु अपनी माँ के पास आकर बिस्तर पर बैठ गई और चहकते हुए कॉलेज की बातें करने लगी। सुगना उसे निहार रही थी, पर उसके दिमाग में विद्यानंद के वे शब्द अब भी गूंज रहे थे: "माँ या बहन।"
सुगना ने बड़े प्यार से मधु के सिर पर हाथ फेरा। मधु को अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी माँ की ममता भरी नज़रों के पीछे कितना गहरा और वर्जित संकल्प छिपा है। सुगना ने निश्चय कर लिया था कि वह आने वाले समय में आवश्यकता पड़ने पर मधु को इस तरह तैयार करेगी कि वह अनजाने में ही अपने भाई के उस 'अवरोध' को तोड़ने का जरिया बन जाए।
सुगना ने मधु का हाथ अपने हाथ में लिया और उसे खींचकर अपने करीब बिस्तर पर बैठा लिया। मधु की हथेलियाँ गुलाब की पंखुड़ियों जैसी नरम और अभी भी बचपन की छुअन लिए हुए थीं। सुगना ने उन छोटी-छोटी उंगलियों को सहलाना शुरू किया, पर उसकी आँखों में जो भाव था, वह केवल वात्सल्य नहीं था; वह एक पारखी की नज़र थी जो उस 'भविष्य की मुक्ति' को नाप रही थी।
सुगना की निगाहें धीरे-धीरे मधु के चेहरे से उतरकर उसके बदन पर घूमने लगीं। मधु अपनी अठारहवीं बसंत देख रही थी, पर उसकी देह में अभी भी किशोरावस्था की वह मासूमियत बाकी थी। उसके कंधे अभी भी सुकुमार थे, और सफेद कॉलेज कुर्ते के भीतर उभरती हुई उसकी काया किसी अधखिले फूल की तरह थी, जिसे अभी पूरी तरह खिलने के लिए वक्त और धूप की ज़रूरत थी।
सुगना ने महसूस किया कि मधु का रंग कुंदन जैसा साफ़ था, और उसकी गर्दन की सुराहीदार बनावट उसे किसी प्राचीन प्रतिमा जैसा रूप दे रही थी। सुगना ने मन ही मन कल्पना की—जब यह कली पूरी तरह खिलेगी, जब इसके नयन-नक्शों में वह मादकता आएगी जिसे देखकर पत्थर भी पिघल जाए, तभी यह सूरज की कामाग्नि को दिशा दे पाएगी और उसे मुक्ति दिला पाएगी।
सुगना की कल्पनाओं में एक धुंधला सा दृश्य उभरने लगा—सूरज का वह फौलादी बदन और उसके सामने मधु का यह कोमल, चंदन जैसा शरीर। उस वर्जित मिलन की कल्पना मात्र से सुगना के भीतर एक सिहरन दौड़ गई। वह देख रही थी कि कैसे मधु का यह निष्पाप यौवन सूरज के उस 'अवरोध' को पिघलाकर उसे एक नया जीवन दे रहा है।
तभी मधु ने अपनी माँ की आँखों में खोया हुआ सा भाव देखा और सुगना के हाथ को हल्के से झकझोरा।
मधु (हैरानी से): "मां.. ! कहाँ खो गई आप? ऐसे क्या सोच रही हैं जैसे मैं कोई पराई हो गई हूँ?"
सुगना एक झटके से यथार्थ में लौटी। उसकी गालों पर एक अनजानी सी लालिमा (लाज) तैर गई, जैसे उसका कोई बहुत गहरा राज़ पकड़ा गया हो। उसने तुरंत अपनी नज़रों को सँभाला और मधु के गाल को हल्के से सहलाया।
सुगना (मुस्कुराते हुए): "अरे कुछ नहीं लाडो... बस देख रही थी कि मेरी छोटी सी गुड़िया अब कितनी बड़ी हो गई है और इतनी सुंदर हो गई है कि तुझे किसी की नज़र न लग जाए।"
मधु खिलखिलाकर हँस पड़ी और अपनी माँ के गले से लिपट गई। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस माँ के सीने से वह आज अपनी थकान मिटा रही है, उसी माँ ने उसे सूरज के 'अनोखे उपचार' के लिए विधाता से माँग कर लाया है।
सुगना (मन ही मन): "हे महादेव, आपने मेरी पुकार सुनी थी। मैंने मधु को इसीलिए माँगा था ताकि वह अपने भाई के जीवन के उस अंधेरे को मिटा सके। मैं खुद को इस बोझ से मुक्त रखूँगी, पर सूरज को अधूरा नहीं रहने दूँगी। समय आने पर, मैं स्वयं इन दोनों के बीच की उस झूठी मर्यादा की दीवार को गिरा दूँगी।"
हवेली की दीवारों ने आज एक नया और डरावना राज़ अपने भीतर दफन कर लिया। सुगना की आँखों में अब हताशा नहीं, बल्कि एक अजीब सा संतोष था। उसे लग रहा था कि उसने अपने बेटे को बचाने का 'सुरक्षित' रास्ता खोज लिया है—एक ऐसा रास्ता जहाँ वह स्वयं किनारे पर रहकर सूरज को किनारे लगा सकेगी।
पर हाय री सुगना की किस्मत….. उसे यह ज्ञात ही नहीं था की जिस मधु के भरोसे वह सूरज की मुक्ति का मार्ग खोज रही है वह उसकी सगी बहन नहीं है अपितु उसका सृजन सोनू के वीर्य से हुआ है और वह लाली के गर्भ से जन्मी है.. यह करामात भी सूरज की मौसी सोनी की थी….
नियति विधाता के विधान के पन्ने पलट रही थी और उनके लेख को समझने का प्रयास कर रही थी..