Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 21 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग -51

सरयू सिंह और सुगना सूर्यास्त की प्रतीक्षा में थे सरयू सिंह मनोरमा के कमरे की चाबी लेकर उसकी साफ सफाई कर आए थे और सुगना की पसंद के कई फूल रख आए थे।




मनोरमा के इस कमरे में आज सुगना और सरयू सिंह के अरमान पूरे होने वाले थे।

सुगना अपने पुत्र के लिए उसे मुक्ति दिलाने वाली पुत्री की लालसा में गर्भवती होना चाहती थी और सरयू सिंह इच्छा का मान भी रखना चाहती थी।

इसका उपाय न तो सुगना को सूझ रहा और न नियति को….




अब आगे

बनारस महोत्सव का तीसरा दिन शाम 6 बजे...


सूर्य क्षितिज में विलीन होने को तैयार था दिन भर अपनी आभा से बनारस महोत्सव को रोशन करने वाला अब थक चुका था परंतु रंगीन शाम में अब युवा हृदय जवान हो रहे थे। जैसे-जैसे शाम की आहट बनारस महोत्सव में हो रही थी सुगना की सिहरन बढ़ती जा रही थी। वह अपने मन में तरह-तरह की रणनीति बना रही थी कि किस प्रकार अपने बाबू जी को अपनी कामकला से अपनी प्यासी बुर के अंदर ही स्खलित करा दिया जाए।

ऐसा नहीं था कि वह अपने बाबू जी को दिया वादा पूरा नहीं करना चाहती थी परंतु उसकी प्राथमिकता अलग थी और सरयू सिंह की अलग। यदि वह सरयू सिंह को सूरज की मुक्ति दायिनी बहन के बारे में बता पाती तो सरयू सिंह अपनी जान पर खेलकर भी उसे जी भर कर चोदते और गर्भवती अवश्य करते.

परंतु नियति को यह मंजूर नहीं था विद्यानंद की बातों को सुगना ने अक्षरसः आत्मसात कर लिया था और वह उस बात को किसी से साझा नहीं कर सकती थी। विद्यानंद का चमत्कार उसने देख लिया था और वह उनकी बातों से पूरी तरह आश्वस्त थी।

सुगना ने खूबसूरत सा लहंगा और चोली धारण किया और सज धज कर चुदने के लिए तैयार हो गयी। उधर सरयू सिंह अपने सामान की पोटली में शिलाजीत की दूसरी गोली को खोज रहे थे जो वह बड़ी उम्मीदों से बनारस महोत्सव में छुपा कर ले आए थे।

अधीरता और व्यग्रता सामान्य कार्य को भी दुरूह बना देती है। सरयू सिंह अपना पूरा सामान उलट-पुलट रहे थे परंतु वह दिव्य गोली उन्हें दिखाई न पड़ रही थी।

कजरी और पदमा ने उनकी व्यग्रता देखकर उनकी मदद करने की सोची कजरी ने पास जाकर कहा

"कुंवर जी का खोजा तानी?"

सरयू सिंह झेंप गए और बोले

"कुछ भी ना" पदमा पास में ही खड़ी थी वह किस मुंह से उस गोली का नाम लेते जिसको खाकर वह उसकी ही पुत्री के साथ अनैतिक और अप्राकृतिक कृत्य करने जा रहे थे।

पदमा और कजरी के जाने के बाद सरयू सिंह ने एक बार फिर बिखरे हुए सामानों पर ध्यान लगाया और वह छोटी सी दिव्य गोली उन्हें दिखाई पड़ गई।

देर हो रही थी। उन्होंने बिना पानी ही वह गोली लील ली।

सरयू सिंह वक्त के बेहद पाबंद थे और गोली के असर को वह किसी भी सूरत में कम नहीं करना चाह रहे थे और सुगना से मिलन के दौरान अपने लिंग की अद्भुत उत्तेजना का आनंद सुगना को देना चाह रहे थे। उन्हें शायद यह भ्रम था कि इस अप्राकृतिक मैथुन का सुगना भी उसी तरह आनंद लेगी जैसे उसने अपनी पहली चुदाई का लिया था।

कुछ देर बाद पदमा, सोनी और मोनी को लेकर बाहर बाजार में घूम रही थी। सूरज की उपस्थिति से प्रेम कीड़ा में बाधा आ सकती थी। सुगना ने सूरज को कजरी के हवाले किया और बोली

"मां थोड़ा बाबू के पकड़ हम सोनी मोनी खातिर कुछ सामान खरीदे जा तानी"

सुगना उन्मुक्त होकर सूरज की मुक्तिदाता का सृजन करने अपने मन में उत्तेजना और दिमाग में डर लिए मनोरमा के कमरे की तरफ चल पड़ी।

उधर बनारस महोत्सव में मनोरमा की मीटिंग आज ज्यादा लंबी चलने वाली थी। मीटिंग प्रारंभ हुए लगभग एक घंटा बीत चुका था। मीटिंग में भाग लेने वाले सभी अधिकारियों का चेहरा उतर गया था। सभी जलपान के लिए मीटिंग में ब्रेक चाह रहे थे। मनोरमा को जलपान से ज्यादा स्नान की आवश्यकता थी। सेक्रेटरी साहब का वीर्य उसकी जांघों पर सूख चुका था और मनोरमा को असहज कर रहा था।

जैसे ही मीटिंग में जलपान के ब्रेक का अनाउंसमेंट हुआ मनोरमा तेज कदमों से चलती हुई अपने कमरे की तरफ चल पड़ी। उसने मन ही मन निश्चय कर लिया था कि वह इस समय का उपयोग स्नान करके स्वयं को तरोताजा कर लेगी।

अंधेरा हो चुका था घड़ी में 7:00 बज चुके थे मनोरमा अपने कमरे के दरवाजे पर पहुंची और ताला खोलकर अंदर प्रवेश कर गई. अस्थाई निर्माण अस्थाई ही होता कमरे का दरवाजा अंदर से बंद नहीं हो पा रहा था उसने बड़ी मुश्किल से चटकानी चढ़ाने की कोशिश की परंतु वह उसे बड़ी मुश्किल से उसे फंसा पाई। दरवाजा ठीक से बंद नहीं हुआ हल्का सा धक्का देने पर वह दरवाजा खुल जाता।

अंदर का कमरा आज बेहद खूबसूरती से सजा हुआ था बिस्तर पर कुछ मनोरम फूल भी रखे हुए थे जिसकी सुगंध कमरे में व्याप्त थी। मनोरमा को अपने निर्णय पर कोई अफसोस नहीं था उसने इस कमरे की चाबी सरयू सिंह और उनकी बहु सुगना को देकर कोई गलती नहीं की थी।

मनोरमा के पास समय कम था उसने चिटकिनी के ठीक से बंद ना होने की बात पर ज्यादा ध्यान न दिया। वैसे भी उसके कमरे में आने की हिमाकत कोई नहीं कर सकता था। सरयू सिंह और उनका परिवार ताला खुला देख कर किसी हाल में अंदर प्रवेश नहीं करता। मनोरमा अपने वस्त्रों को करीने से उतारती गई और उन्हें सहेजकर रखती गयी।यही वस्त्र उसे स्नान के बाद पुनः पहनने थे।

पूर्ण तरह निर्वस्त्र होकर वह बाथरूम में प्रवेश कर गयी और झरने को चालू कर स्नान करने लगी।

नियति मनोरमा की मनोरम काया देकर मंत्रमुग्ध हो गई। मनोरमा के हाथ उसके कोमल पर कसे हुए शरीर पर तेजी से चल रहे थे। अपनी जांघों पर हाथ फेरते हुए मनोरमा के हाथों में सेक्रेटरी साहब का सूखा हुआ वीर्य लग गया जो अब लिसलिसा हो चला था।

उस वीर्य को अपने शरीर से हटाने की कोशिस में मनोरमा अपनी जांघों और बुर् के होठों को सहलाने लगी। ज्यों ज्यों मनोरमा की उंगलियां बुर् के होठों को छूती उसके शरीर में सिहरन बढ़ जाती है और न चाहते हुए भी वह उंगलियां दरारों के बीच अपनी जगह तलाशने लगती। एक पल के लिए मनोरमा यह भूल गई कि वह यहां मीटिंग से उठकर स्नान करने आई है न की अपनी प्यासी बुर को उत्तेजित कर स्खलित होने।

परंतु जब तक उसके मन में यह ख्याल आता उसकी बूर् की संवेदना जागृत हो चुकी थी। मनोरमा ने अपने कर्तव्य के आगे अपने निजी सुख को अहमियत न दी और बुर को थपथपा कर रात्रि तक इंतजार करने के लिए मना लिया और अपने बालों में लपेटे हुए तौलिए को उतार कर अपने शरीर को पोछने लगी।

उधर सुगना बाजार से होते हुए मनोरमा के कमरे की तरफ बढ़ रही थी। मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे उसके जीवन में भूचाल आने वाला हो। वह एक बार फिर गर्भवती होगी और फिर उसे गर्भावस्था के सुख और दुख दोनों झेलने पड़ेंगे। अभी उसकी कोख में सरयू सिंह का बीज आया भी न था और वह आगे होने वाली घटनाओं को सोच सोच कर आशंकित भी थी और उत्साहित भी। तभी एक पास की एक दुकान से आवाज आई..

"सुगना बेटा बड़ा भाग से तू आ गईले" यह आवाज पदमा की थी जो सुगना के पुत्र सूरज के लिए उपहार स्वरूप हाथ का कंगन खरीद रही थी। पद्मा ने सुगना को दुकान के अंदर बुला लिया और उसे तरह-तरह के कंगन दिखाने लगी। सोना वैसे भी स्त्रियों की सबसे बड़ी कमजोरी होती है और ऊपर से वह उसके पुत्र सूरज के लिए था। सुगना एक पल के लिए यह भूल गई कि वह कहां जा रही थी। वह सूरज के हाथों के कंगन को पसंद करने में व्यस्त हो गई उसे यह ध्यान ही नहीं रहा कि कुछ ही देर में उसके बाबूजी भी मनोरमा के कमरे में पहुंच रहे होंगे।

उधर सरयू सिंह द्वारा निगली हुई शिलाजीत की गोली अपना असर दिखा चुकी थी। लंगोट में कसा हुआ उनका लण्ड तन चुका था। सरयू सिंह ने अपना लंगोट ढीला किया और अपने तने हुए लण्ड को लेकर दूसरे रास्ते से मनोरमा के कमरे की तरफ बढ़ने लगे। अपने मन मस्तिष्क में असीम उत्तेजना और तने हुए लण्ड को लेकर वह मनोरमा के कमरे के ठीक पास आ गए।

मनोरमा की गाड़ी आसपास न पाकर वह और भी खुश हो गए । वैसे भी आज मनोरमा ने उन्हें पदोन्नति देकर उनका दिल जीत लिया था। कमरे के दरवाजे पर ताला न पाकर वह खुशी से झूमने लगे उनकी सोच के अनुसार निश्चित ही सुगना अंदर आ चुकी थी।

अंदर स्थिति ठीक इसके उलट थी। अंदर मनोरमा अपना शरीर पोछने के बाद कमरे में आ चुकी थी। उसकी नग्न सुंदर और सुडौल काया चमक रही थी। मनोरमा की कद काठी सुगना से मिलती जुलती थी, पर शरीर का कसाव अलग था। मनोरमा का शरीर बेहद कसा हुआ था। शायद उसे मर्द का सानिध्य ज्यादा दिनों तक प्राप्त ना हुआ था और जो हुआ भी था मनोरमा की काम पिपासा बुझा पाने में सर्वथा अनुपयुक्त था।

मनोरमा ने जैसे ही आगे झुक कर अपना पेटीकोट उठाने की कोशिश की उधर सरयू सिह ने दरवाजे पर एक हल्का सा धक्का लगा और दरवाजा खुल गया।

जब तक मनोरमा पीछे मुड़ कर देख पाती बनारस महोत्सव के उस सेक्टर की बिजली अचानक ही गुल हो गई।

परंतु इस एक पल में सरयू सिंह ने उस दिव्य काया के दर्शन कर लिए। चमकते बदन पर पानी की बच गई बूंदे अभी भी विद्यमान थीं । सुगना ने संभोग से पहले स्नान किया यह बात सरयू सिंह को भा गई। उन्होंने मन ही मन निर्णय कर लिया कि वह वह आज उसकी बूर को चूस चूस कर इस स्खलित कर लेंगे और फिर उसके दूसरे छेद का जी भर कर आनंद लेंगे।

कमरे में घूप्प अंधेरा हो चुका था सरयू सिंह धीरे-धीरे आगे बढ़े और अपनी सुगना को पीछे से जाकर पकड़ लिया। क्योंकि कमरे में अंधेरा था उन्होंने अपना एक हाथ उसकी कमर में लगाया और दूसरी हथेली से सुगना के मुंह को बंद कर दिया ताकि वह चीख कर असहज स्थिति न बना दे।

मनोरमा ने सरयू सिंह की धोती देख ली थी। जब तक कि वह कुछ सोच पाती सरयू सिंह उसे अपनी आगोश में ले चुके थे। वह हतप्रभ थी और मूर्ति वत खड़ी थी। सरयू सिंह उसका मुंह दबाए हुए थे तथा उसके नंगे पेट पर हाथ लगाकर उसे अपनी ओर खींचे हुए थे।

अपने नितंबों पर सरयू सिंह के लंड को महसूस कर मनोरमा सिहर उठी। सरयू सिंह को सुगना की काया आज अलग ही महसूस हो रही थी अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए उन्होंने अपनी हथेली को सुगना की चुचियों पर लाया और उनका शक यकीन में बदल गया यह निश्चित ही सुगना नहीं थी। चुचियों का कसाव चीख चीख कर कह रहा था कि वह सुगना ना होकर कोई और स्त्री थी।

सरयू सिंह की पकड़ ढीली होने लगी उन्हें एक पल के लिए भी यह एहसास न था कि जिस नग्न स्त्री को वह अपनी आगोश में लिए हुए हैं वह उनकी एसडीएम मनोरमा थी। अपने नग्न शरीर पर चंद पलों के मर्दाना स्पर्श ने मनोरमा को वेसुध कर दिया था। इससे पहले कि सरयू सिंह उसकी चुचियों पर से हाथ हटा पाते मनोरमा की हथेलियों ने सरयू सिंह की हथेलियों को अपनी चुचियों पर वापस धकेल दिया। मनोरमा कि इस अदा से सरयू सिंह बेहद उत्तेजित हो गए। स्त्री शरीर की उत्तेजना और हाव-भाव से सरयू सिंह स्त्री की मनो स्थिति भांप लेते थे उन्होंने मनोरमा के कानों को चूम लिया और अपनी दोनों हथेलियों से उसकी चुचियों को सहलाने लगे।

प्रणय निवेदन मूक होता है परंतु शरीर के कामुक अंग इस निवेदन को सहज रूप से व्यक्त करते हैं। विपरीत लिंग उसे तुरंत महसूस कर लेता है।

मनोरमा की गर्म सांसे, तनी हुई चूचियां , और फूल चुके निप्पल मनोरमा की मनोस्थिति कह रहे थे। और मनोरमा की स्थिति जानकर सरयू सिंह का लण्ड उसके नितंबों में छेद करने को आतुर था।

सरयू सिंह एक हाथ से मनोरमा की चूँचियों को सहला रहे थे तथा दूसरे हाथ से बिना किसी विशेष प्रयास के अपने अधोभाग को नग्न कर रहे थे।

उनका लण्ड सारी बंदिशें तोड़ उछल कर बाहर आ चुका था। उन्होंने शर्म हया त्याग कर अपना लण्ड मनोरमा के नितंबों के नीचे से उसकी दोनों जांघों के बीच सटा दिया। मनोरमा उस अद्भुत लण्ड के आकार को महसूस कर आश्चर्यचकित थी। एक तो सरयू सिंह का लण्ड पहले से ही बलिष्ठ था और अब शिलाजीत के असर से वह और भी तन चुका था। लण्ड पर उभर आए नसे उसे एक अलग ही एहसास दिला रहे थे। मनोरमा ने अपनी जाँघे थोड़ी फैलायीं और वह लण्ड मनोरमा की जांघो के जोड़ से छूता हुआ बाहर की तरफ आ गया।

मनोरमा ने एक बार फिर अपनी जांघें सिकोड़ लीं। सरयू सिह के लण्ड का सुपाड़ा बिल्कुल सामने आ चुका था। मनोरमा अपनी उत्सुकता ना रोक पायी और अपने हाथ नीचे की तरफ ले गई । सरयू सिंह के लण्ड के सुपारे को अपनी उंगलियों से छूते ही मनोरमा की चिपचिपी बुर ने अपनी लार टपका दी जो ठीक लण्ड के फूले हुए सुपाड़े पर गिरी

मनोरमा की उंगलियों ने सरयू सिंह के सुपाडे से रिस रहे वीर्य और अपनी बुर से टपके प्रेम रस को एक दूसरे में मिला दिया सरजू सिंह के लण्ड पर बल दिया मनोरमा की कोमल उंगलियों और चिपचिपे रस से लण्ड थिरक थिरक उठा। मनोरमा को महसूस हुआ जैसे उसने कोई जीवित नाग पकड़ लिया जो उसके हाथों में फड़फड़ा रहा था।

यह पहला अवसर था जब सरयू सिंह के मुंह से कोई आवाज नहीं निकल रही थी। जिस सुंदर और नग्न महिला को अपनी बाहों में लिए उसे काम उत्तेजित कर रहे थे वह उनकी भाग्य विधाता एसडीएम मनोरमा थी सरयू सिंह यह बात भली-भांति जान चुके थे परंतु अब वह उनके लिए एसडीएम ना होकर एक काम आतुर युवती थी जो अपने हिस्से का सुख भोगना चाहती थी। अन्यथा वह पलट कर न सिर्फ प्रतिकार करती अपितु छिड़ककर उन्हें उनकी औकात पर ला देती।

जिस मर्यादा को भूलकर सरयू सिंह और मनोरमा करीब आ चुके अब उसका कोई अस्तित्व नहीं था। प्रकृति की बनाई दो अनुपम कलाकृतियां एक दूसरे से सटी हुई प्रेमालाप में लगी हुई थीं। धीरे धीरे मनोरमा सरयू सिंह की तरफ मुड़ती गई और सरयू सिंह का लण्ड उसकी जांघों के बीच से निकलकर मनोरमा के पेट से छूने लगा। सरयू सिंह ने इसी दौरान अपना कुर्ता भी बाहर निकाल दिया। मनोरमा अब पूरी तरह सरयु सिंह से सट चुकी थी। सरयू सिंह की बड़ी-बड़ी हथेलियों ने मनोरमा के नितंबों को अपने आगोश में ले लिया था। और वह उसे बेतहाशा सहलाए जा रहे थे।

उनकी उंगलियों ने उनके अचेतन मस्तिष्क के निर्देशों का पालन किया और सरयू सिंह ने न चाहते हुए भी मनोरमा की गांड को छू लिया। आज मनोरमा कामाग्नि से जल रही थी। उसे सरयू सिंह की उंगलियों की हर हरकत पसंद आ रही थी। बुर से रिस रहा कामरस सरयू सिंह की अंगुलियों तक पहुंच रहा था। मनोरमा अपनी चुचियों को उनके मजबूत और बालों से भरे हुए सीने पर रगड़ रही थी। सरयू सिंह उसके गालों को चुमे में जा रहे थे।

गजब विडंबना थी जब जब सरयू सिंगर का ध्यान मनोरमा के ओहदे की तरफ जाता वह घबरा जाते और अपने दिमाग में सुगना को ले आते। कभी वह मनोरमा द्वारा सुबह दिए गए पुरस्कार की प्रतिउत्तर में उसे जीवन का अद्भुत सुख देना चाहते और मनोरमा को चूमने लगते परंतु मनोरमा के होठों को छु पाने की हिम्मत वह अभी नहीं जुटा पा रहे थे। मनोरमा भी आज पुरुष संसर्ग पाकर अभिभूत थी। वह जीवन में यह अनुभव पहली बाहर कर रही थी। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह वशीभूत हो चुकी थी। वह अपने होठों से सरयू सिंह के होठों को खोज रही थी। मनोरमा धीरे धीरे अपने पंजों पर उठती चली गई और सरयू सिंह अपने दोनों पैरों के बीच दूरियां बढ़ाते गए और अपने कद को घटाते गए।

जैसे ही मनोरमा के ऊपरी होठों ने सरयू सिह के होठों का स्पर्श प्राप्त हुआ नीचे सरयू सिंह के लंड में उसकी पनियायी बूर् को चूम लिया। मनोरमा का पूरा शरीर सिहर उठा।

सरयू सिंह ने मनोरमा को अपनी तरफ खींचा और मनोरमा ने अपना वजन एक बार फिर अपने पैरों पर छोड़ती गई और सरयू सिह के मजबूत लण्ड को अपने बुर में समाहित करती गयी।

मनोरमा की बुर का अगला हिस्सा पिछले कई वर्षों से प्रयोग में आ रहा था उसने सरयू सिंह के सुपारे को थोड़ी मुश्किल से ही सही परंतु लील लिया। सरयू सिंह ने जैसे ही अपना दबाव बढ़ाया मनोरमा चिहुँक उठी।

सरयू सिंह मनोरमा को बिस्तर पर ले आए और उसकी जाँघे स्वतः ही फैलती गई सरयू सिंह अपने लण्ड का दबाव बढ़ाते गए और उनका मजबूत और तना हुआ लण्ड मनोरमा की बुर की अंदरूनी गहराइयों को फैलाता चला गया।

मनोरमा के लिए यह एहसास बिल्कुल नया था। बुर के अंदर गहराइयों को आज तक न तो मनोरमा की उंगलियां छु पायीं थी और न हीं उसके पति सेक्रेटरी साहब का छोटा सा लण्ड। जैसे जैसे जादुई मुसल अंदर धँसता गया मनोरमा की आंखें बाहर आती गयीं। मनोरमा ने महसूस किया अब वह दर्द बर्दाश्त नहीं कर पाएगी उसने अपनी कोमल हथेलियों से सरयू सिंह को दूर करने की कोशिश की।

सरयू सिंह भी अपने लण्ड पर मनोरमा की कसी हुई बुर का दबाव महसूस कर रहे थे उन्होंने कुछ देर यथा स्थिति बनाए रखी और मनोरमा के होठों को छोड़कर अपने होंठ उसके तने हुए निप्पल से सटा दिए।

सरयू सिंह के होठों के कमाल से मनोरमा बेहद उत्तेजित हो गई उनकी हथेलियां मनोरमा की कोमल जाँघों और कमर और पेड़ू को सहला रही थी जो उनके लण्ड को समाहित कर फूल चुका था।

जैसे-जैसे मनोरमा सहज होती गयी सरयू सिह का लण्ड और अंदर प्रवेश करता गया। मनोरमा के मुख से चीख निकल गई उसने पास पड़ा तकिया अपने दांतो के बीच रखकर उसे काट लिया परंतु उस चीख को अपने गले में ही दबा दिया। उधर लण्ड के सुपारे ने गर्भाशय के मुख को फैलाने की कोशिश की इधर सरयू सिंह के पेड़ूप्रदेश ने मनोरमा की भग्नासा को छू लिया। मिलन अपनी पूर्णता पर आ चुका था भग्नासा पर हो रही रगड़ मनोरमा को तृप्ति का एहसास दिलाने लगी ।

मनोरमा की कसी हुई बुर का यह दबाव बेहद आनंददायक था। सरयू सिंह कुछ देर इसी अवस्था में रहे और फिर मनोरमा की चुदाई चालू हो गई।

जैसे-जैसे शरीर सिंह का का लण्ड मनोरमा के बुर में हवा भरता गया मनोरंम की काम भावनाओं का गुब्बारा आसमान छूता गया। बुर् के अंदरूनी भाग से प्रेम रस झरने की तरह पर रहा था और यह उस मजबूत मुसल के आवागमन को आसान बना रहा था।

सरयू सिंह पर तो शिलाजीत का असर था एक तो उनके मूसल को पहले से ही कुदरत की शक्ति प्राप्त थी और अब उन्होंने शिलाजीत गोली का सहारा लेकर अपनी ताकत दुगनी करली थी । मनोरमा जैसी काम सुख से अतृप्त नवयौवना उस जादुई मुसल का संसर्ग ज्यादा देर तक न झेल पाई और उसकी बुर् के कंपन प्रारंभ हो गए।

सरयू सिंह स्त्री उत्तेजना का चरम बखूबी पहचानते थे और उसके चरम सुख आकाश की ऊंचाइयों तक ले जाना चाहते थे उन्होंने अपने धक्कों की रफ़्तार में आशातीत वृद्धि कर दी और मनोरमा की चुचियों को चूसने लगे। वह मनोरमा की चुचियों से दूध तो नहीं निकाल पर उनकी सारी मेहनत का फल मनोरमा के बूर् ने दे दिया। मनोरमा झड़ रही थी और उसका शरीर में निढाल पढ़ रहा था।

इसी दौरान बनारस महोत्सव के आयोजन कर्ताओं ने बिजली को वापस लाने का प्रयास किया और कमरे में एक पल के लिए उजाला हुआ और फिर अंधेरा कायम हो गया। बिजली का यह आवागमन आकाशीय बिजली की तरह ही था परंतु सरयू सिंह ने स्खलित होती मनोरमा का चेहरा देख लिया। और वह तृप्त हो गए। मनोरमा ने तो अपनी आंखें बंद की हुई थी परंतु उसे भी यह एहसास हो गया की सरयू सिंह ने उसे पूर्ण नग्न अवस्था में देख लिया है। परंतु मनोरमा अब अपना सर्वस्व न्योछावर कर चुकी थी। उसके पास अब कुछ न कुछ छुपाने को था न दिखाने को।

सरयू सिंह ने अपना लण्ड बाहर निकाल दिया और मनोरमा के वापस जागृत होने का इंतजार करने लगे। मनोरमा को अपना स्त्री धर्म पता था। जिस अद्भुत लण्ड में उसे यह सुख दिया था उसका वीर्यपात कराना न सिर्फ उसका धर्म था बल्कि यह नियति की इच्छा भी थी। मनोरमा अपने कोमल हाथों से उस लण्ड से खेलने लगी। कभी वह उसे नापती कभी अपनी मुठियों में भरती। अपने ही प्रेम रस से ओतप्रोत चिपचिपे लण्ड को अपने हाथों में लिए मनोरमा सरयू सिंह के प्रति आसक्त होती जा रही थी। सरयू सिंह के लण्ड में एक बार फिर उफान आ रहा था। उन्होंने मनोरमा को एक बार फिर जकड़ लिया और उसे डॉगी स्टाइल में ले आए।

सरयू सिंह यह भूल गए थे कि वह अपने ही भाग्य विधाता को उस मादक अवस्था में आने के लिए निर्देशित कर रहे थे जिस अवस्था में पुरुष उत्तेजना स्त्री से ज्यादा प्रधान होती है। अपनी काम पिपासा को प्राप्त कर चुकी मनोरमा अपने पद और ओहदे को भूल कर उनके गुलाम की तरह बर्ताव कर रही थी। वह तुरंत ही डॉगी स्टाइल में आ गयी और अपने नितंबों को ऊंचा कर लिया । सरयू सिंह अपने लण्ड से मनोरमा की बुर का मुंह खोजने लगे। उत्तेजित लण्ड और चिपचिपी बूर में चुंबकीय आकर्षण होता है।

उनका लंड एक बार फिर मनोरमा की बूर् में प्रवेश कर गया। अब यह रास्ता उनके लण्ड के लिए जाना पहचाना था। एक मजबूत धक्के में ही उनके लण्ड ने गर्भाशय के मुख हो एक बार फिर चूम लिया और मनोरमा ने फिर तकिए को अपने मुह में भर लिया। वाह चीख कर सरयू सिंह की उत्तेजना को कम नहीं करना चाहती थी।

लाइट के जाने से बाहर शोर हो रहा था। वह शोर उन्हें मनोरमा को चोदने के लिए उत्साहित कर रहा था।

सरयू सिंह की चुदाई की रफ्तार बढ़ रही थी। बिस्तर पर जो फूल व सुगना के लिए लाए थे वह मनोरमा के घुटनों और हाथ द्वारा मसले जा रहे थे। फूलों की खुशबू प्रेम रस की खुशबू के साथ मिलकर एक सुखद एहसास दे रही थी।

सरयू सिंह कभी मनोरमा की नंगी पीठ को चूमते कभी अपनी दोनों हथेलियों से उसके दोनों चुचियों को मीसते हैं कभी उसके बालों को पकड़कर मन ही मन एक घुड़सवार की भांति व्यवहार करते। अपने जीवन की इस विशेष उत्तेजना का मन ही मन आनंद लेते लेते सरयू सिंह भाव विभोर हो गए।

इधर मनोरमा दोबारा स्खलन की कगार पर पहुंच चुकी थी। मनोरमा के बूर की यह कपकपाआहट बेहद तीव्र थी। सरयू सिंह मनोरमा को स्खलित कर उसकी कोमल और तनी हुई चुचियों पर वीर्यपात कर उसे मसलना चाह रहे थे। बुर् की तेज कपकपाहट से सरयू सिंह का लण्ड अत्यंत उत्तेजित हो गया और अंडकोष में भरा हुआ वीर्य अपनी सीमा तोड़कर उबलता हुआ बाहर आ गया। मनोरमा के गर्भ पर वीर्य की पिचकारिया छूटने लगीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था बरसों से प्यासी धरती को सावन की रिमझिम में बूंदे भीगों रही थी। मनोरमा की प्यासी बुर अपने गर्भाशय का मुंह खोलें उस वीर्य को आत्मसात कर तृप्त तो हो रही थी।

मनोरमा अपने मन में सरयू सिंह के छैल छबीले चेहरे और बलिष्ठ शरीर की छवि को बसाये हए अपने गर्भाशय में हो रहे वीर्य पात के अद्वितीय अनुभव को महसूस कर रही थी।

नियति मुस्कुरा रही थी कहानी का एक प्रमुख पात्र सृजित हो रहा था…..

शेष अगले भाग में।
 
आपने यह अनुमान किस प्रकार लगाया और किस तर्क के आधार पर कृपया स्पष्ट करें ताकि मैं भी समझ सकूं कि यह एक महज अनुमान था या ...

धन्यवाद...
 
बात तो बिल्कुल सही कही है आपने पर गर्भ का लिंग निर्धारण नियति ने अभी तय नहीं किया है।

धन्यवाद कहानी को एक नया रास्ता दखाने के लिए
 
यह तो तय है कि यह कहानी मेरी आखिरी सेक्स कहानी है परंतु इसकी समाप्ति में अभी समय है जब तक यह कहानी चल रही है आप आनंद लेते रहे.
 
शायद कहानी के प्रति जो आपकी सोच है वह कहीं ना कहीं मेरी सोच से मिल गई है इसीलिए आपकी मनो इच्छा पूर्ण हुई.
 
कहानी के प्रमुख पाठक का सुझाव मेरे लिए निर्देश जैसा है परंतु कई बार पाठकों की सुस्त प्रतिक्रियाओं को देखकर कहानी पोस्ट करने की उपयोगिता खत्म हो जाती है जब तक पाठकों का साथ है मैं इस कहानी को पूर्ण अवश्य करूंगा.
 
हो सकता है आपकी मनोकामना पूर्ण हो
 
भाग 52

मनोरमा अपने मन में सरयू सिंह के छैल छबीले चेहरे और बलिष्ठ शरीर की छवि को बसाये हए अपने गर्भाशय में हो रहे वीर्य पात के अद्वितीय अनुभव को महसूस कर रही थी।

नियति मुस्कुरा रही थी कहानी का एक प्रमुख पात्र सृजित हो रहा था…..

अब आगे

सरयू सिंह द्वारा की गई जबरदस्त चुदाई से मनोरमा तृप्त हो चुकी थी और उसके गर्भ में सरयू सिंह के खानदान का एक अंश आ चुका था। तृप्ति का भाव मनोरमा और सरयू सिंह दोनों में ही था। जिस प्रेम भाव और अद्भुत मिलन से इस गर्भ का सृजन हुआ था उसने स्वतः ही इस मिलन की गुणवत्ता को आत्मसात कर लिया था। मनोरमा जैसी काबिल मां और सरयू सिंह जैसे विशेष व्यक्तित्व वाले पिता की संतान निश्चित ही विलक्षण होती।

मनोरमा, सरयू सिंह के लण्ड निकालने का इंतजार कर रही थी। सरयू सिंह पूरी तरह स्खलित होने के बावजूद उस मखमली एहसास को छोड़ना नहीं चाह रहे थे। वह अभी भी मनोरमा की पीठ को चूमे जा रहे थे और अपनी हथेलियों से उसकी चुचियों को मीस रहे थे।

शिलाजीत के असर से लण्ड में तनाव अभी भी बना हुआ था। परंतु अंडकोशों ने उसका साथ छोड़ दिया था और ढीले पड़ चुके थे।

वैसे भी वह दोनों द्वारपाल की तरह हमेशा इस क्रीडा में बाहर ही छोड़ दिए जाते थे। वह तो काम कला में दक्ष और पारखी सुगना थी जो इस द्वारपालों को भी अपनी कोमल उंगलियों का स्पर्श देकर उनकी उपयोगिता को बनाए रखती थी। परंतु मनोरमा वह तो अभी कामकला के पहले पायदान पर ही थी। उसने तो यह चरम सुख आज शायद पहली बार प्राप्त किया था।

स्खलित हो जाना ही चरमोत्कर्ष नहीं है। जिस सुख की अनुभूति आज मनोरमा ने की थी वह सामान्य स्खलन से कई गुणा बढ़कर था। मनोरमा के शरीर का रोम रोम अंग अंग सरयू सिंह के इस अद्भुत संभोग का कायल था।

सरयू सिंह अपना लण्ड निकालने के बाद अपनी धोती ढूंढने लगे। थोड़ा प्रयास करने पर उन्होंने अपना धोती और कुर्ता ढूंढ लिया परंतु लंगोट को ढूंढ पाना इतना आसान न था। वह बिजली आने से पहले ही कमरे से हट जाना चाहते थे। मनोरमा से आंखें मिला पाने की उनकी हिम्मत अब नहीं थी। यह अलग बात थी की कामवासना के दौरान उन्होंने उसे कस कर चोदा था परंतु उसके कद और अहमियत को वह भली-भांति जानते थे। सरयू सिंह ने आनन-फानन में अपनी धोती को मद्रासी तरीके से पहना और कुर्ता डालकर कमरे से बाहर आ गए।

मनोरमा अभी भी बिस्तर पर निढाल पड़ी हुई थी। उसकी बुर से रिस रहा वीर्य जांघों पर आ चुका था। मनोरमा के सारे कपड़े बिस्तर पर तितर-बितर थे। बिना प्रकाश के उन्हें ढूंढना और धारण करना असंभव था। वह नग्न अवस्था में लेटी हुई बिजली आने का इंतजार करने लगी। नियत ने मनोरमा को निराश ना किया और जब तक मनोरमा की सांसें सामान्य होतीं बनारस महोत्सव की लाइट वापस आ गई।

मनोरमा ने अपनी जांघों पर लगे वीर्य को पोछने की कोशिश नहीं की। वह सरयू सिंह की चुदाई और उनके प्रेम के हर चिन्ह को सजाकर रखना चाहती थी। उसने फटाफट अपने कपड़े पहने और बिस्तर पर पड़े लाल लंगोट को देख कर मुस्कुराने लगी।

सरयू सिंह ने आज नया लंगोट पहना हुआ था परंतु लंगोट में कसे हुए लण्ड की खुशबू समाहित हो चुकी थी। मनोरमा ने उसे अपने हाथों में उठाया और मुस्कुराते हुये उसे मोड़ कर अपने पर्स में रख लिया। उसके लिए यह एक यादगार भेंट बन चुकी थी।

भरपूर चुदाई के बाद स्त्री का शरीर अस्तव्यस्त हो जाता है। वह चाह कर भी तुरंत अपनी पूर्व अवस्था में नहीं आ सकती। मनोरमा का चेहरा और शरीर अलसा चुका था। उसने अपने बाल ठीक किए और कमरे से बाहर आ गयी पर उसकी हालत कतई ठीक नहीं थी। उसे अभी मीटिंग में भी जाना था। वह अनमने मन से मीटिंग हाल की तरफ बढ़ने लगी तभी उसे सुगना दिखाई दे गयी जो उसके कमरे की तरफ ही आ रही थी।

सुगना ने मनोरमा को देखा और अपने दोनों हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया।

"अरे मैडम जी इतनी रात को"

"हां सुगना आज मेरी मीटिंग कुछ ज्यादा ही लंबी चल रही है"

सुगना ने मनोरमा के ऐश्वर्य भरे चेहरे और कसी हुई काया में आया बदलाव महसूस कर लिया उसने मनोरमा से पूछा

"मैडम जी आपकी तबीयत ठीक है ना? आप काफी थकी हुई लग रही है।"

सुगना ने जो कहा था इसका एहसास मनोरमा को भी था उसने बड़ी सफाई से अपने आप को बचाते हुए बोला..

"अरे सुगना होटल का खाना मुझे सूट नहीं किया पेट भी खराब हो गया है इसी लिए कमरे में आना पड़ा"

सुगना ने मन ही मन मनोरमा की स्थिति का आकलन कर लिया और उस कमरे के उपयोग के औचित्य के बारे में भी अपने स्वविवेक से सोच लिया।

सुगना को संशय में देखकर मनोरमा सोच में पड़ गई कहीं सुगना ने उसकी शारीरिक स्थिति देखकर कुछ अंदाज तो नहीं लगा लिया उसने बात बदलने की कोशिश की..

"तुमने बनारस घूम लिया कि नहीं?"

"अभी है ना दो-तीन दिन घूम लूंगी'

"कल मैं अपनी गाड़ी भेज दूंगी अपने बाबू जी के साथ जाकर बनारस घूम लेना"

सुगना बेहद प्रसन्न हो गई। मनोरमा ने कहा

"तुम उस कमरे में जा सकती हो मैं अब वापस जा रही हूँ।"

मनोरमा अपने मीटिंग हॉल की तरफ बढ़ चली और सुगना कमरे की तरफ।

सुगना मन ही मन घबरा रही थी कि निश्चित ही उसके बाबू जी आज उसका इंतजार करते करते थक चुके होंगे.. परंतु वह क्या कर सकती थी. उसकी मां ने कुछ देर तक उसे सूरज के कंगन में उलझाये रखा तभी बत्ती गुल हो गई थी। अंधेरे में वहां से कमरे तक जाना संभव न था।

जवान स्त्री तब भी मनचलों के आकर्षण का केंद्र रहती थी और आज भी।

पद्मा ने सुगना को लाइट आने तक रोक लिया था।

उधर सरयू सिंह कमरे से बाहर निकलने के पश्चात कुछ दूर पर जाकर खड़े हो गए थे। वह मनोरमा के कमरे से चले जाने का इंतजार कर रहे थे। उन्हें अपना लंगोट भी लेना था।

उन्हें पूरा विश्वास था कि सुगना अवश्य आएगी। निश्चित ही वह बिजली गुल हो जाने होने की वजह से समय पर नहीं आ पाई थी।

सुगना को कमरे की तरफ आता देख सरयू सिंह सुगना की तरफ बढ़ चले उन्होंने सुगना पर झूठी नाराजगी दिखाते हुए कहा..

"सुगना बाबू कहां रह गईलू हा..?" अपने झूठे क्रोध में यह प्यार सिर्फ सरयू सिंह ही दिखा सकते थे।

सुगना ने अपना सच स्पष्ट शब्दों में बयान कर दिया. सरयू सिंह ने सुगना से कहा

"लागा ता आज देर हो गईल बा तोहार उपहार के भोग आज ना लाग पायी "

सचमुच देर हो चुकी थी सुगना तो पूरी तरह उत्तेजित थी और चुदना भी चाहती थी परंतु इस क्रिया में लगने वाला समय उन दोनों की हकीकत पूरे परिवार के सामने ला देता। खाने के समय न पहुंचने पर कजरी पदमा को लेकर उसे ढूंढती हुई यहां आ जाती।

सुगना ने अपना मन मसोसकर कहा

ठीक बा बाबू जी "काल एहि बेरा (बेरा मतलब समय)"

सरयू सिंह ने सुगना से चाबी मांगी और दरवाजा खोलकर अपना लंगोट ढूंढने लगे।

सुगना ने दरवाजे पर खड़े खड़े पूछा

" ...का खोजा तानी?".

सरयू सिंह क्या जवाब देते जो वह खोज रहे थे वह मनोरमा ले जा चुकी थी।

सुगना और शरीर सिंह धीरे-धीरे वापस पंडाल की तरफ आ रहे थे।

सूरज के परिवार का एक अभिन्न अंग मनोरमा के गर्भ में आ चुका था काश कि यह बात सुगना जान पाती तो अपने गर्भधारण को लेकर उसकी अधीरता थोड़ा कम हो जाती। हो सकता था की सूरज की जिस बहन की तलाश में वह गर्भधारण करना चाह रही थी वह मनोरमा की कोख में सृजित हो चुकी हो….

बनारस महोत्सव के बिजली विभाग के कर्मचारियों की एक गलती ने नियति को नया मौका दे दिया था।

सुगना से मिलने के बाद मनोरमा मीटिंग में पहुंची तो जरूर परंतु उसका मन मीटिंग में कतई नहीं लग रहा था। बिजली गुल होने की वजह से मीटिंग का तारत्म्य बिगड़ गया था और सभी प्रतिभागी घर जाने को आतुर थे।

अंततः मीटिंग समाप्त कर दी गई और मनोरमा एक बार फिर अपने पांच सितारा होटल की तरफ चल पड़ी।

कमरे में पहुंचकर उसने अपने वस्त्र उतारे और अपनी जाँघों और बूर् के होठों पर लगे श्वेत गाढ़े वीर्य के धब्बे को देख कर मुस्कुराने लगी। उसे अपने शरीर और चरित्र पर लगे दाग से कोई शिकायत न थी। उसने सरयू सिंह के साथ हुए इस अद्भुत संभोग को भगवान का वरदान मान लिया था। उसकी काम पिपासा कई वर्षों के लिए शांत हो चुकी थी। वह अपनी फूली और संवेदनशील हो चुकी बुर को अपनी हथेलियों से सहला रही थी और मन ही मन आनंद का अनुभव कर रही थी।

मनोरमा ने अपने हाथ पैर और चेहरे को धुला परंतु स्नान करने का विचार त्याग दिया। सरयू सिंह के वीर्य को अपने शरीर से वह कतई अलग नहीं करना चाह रही थी। अनजाने में ही सही मनोरमा ने पुरुष का वह दिव्य स्वरूप देख लिया था। वह मन ही मन भगवान के प्रति कृतज्ञ थी और इस संभोग को अपने गर्भधारण का आधार बनाना चाह रही थी।

मनोरमा ने अपने इष्ट देव को याद किया और अपने गर्भधारण की अर्जी लगा दी। सरयू सिंह जैसे बलिष्ठ और स्वस्थ पुरुष की संतान निश्चित ही उनके जैसी ही होगी।

मनोरमा के गर्भ से पुत्र होगा या पुत्री इसका निर्धारण नियति ने नियंता के हाथों छोड़ दिया।

बनारस महोत्सव का चौथा दिन……

बनारस महोत्सव के इन 3 दिनों में कथा के दो पात्रों का सृजन हो चुका था एक लाली के गर्भ में और दूसरा एसडीएम मनोरमा के गर्भ में नियति ने इन दोनों पात्रों का लिंग निर्धारण अपनी योजना के अनुसार कर दिया था। परंतु सुगना अभी भी अपने गर्भधारण का इंतजार कर रही थी। कल का सुनहरा अवसर उसने अनायास ही गवां दिया था और सरयू सिंह के प्यार और अद्भुत चुदाई का आनंद लेते हुए गर्भवती का होने का सुख सुगना की जगह मनोरमा ने उठा लिया था।

बनारस महोत्सव के चौथे दिन महिलाओं का एक विशेष व्रत था घर की सभी महिलाओं ने व्रत रखा हुआ था। सुगना भी उस से अछूती न थी। सुगना ही क्या उसकी दोनों छोटी बहनें भी आज व्रत थी सुगना को आज के व्रत का ध्यान ही नहीं आया था। कल शाम उसने अपने बाबू जी से मिलने के लिए आज का दिन मुकर्रर किया था। परंतु अब यह व्रत... जिसे वह छोड़ नहीं सकती थी।

परंतु व्रत के दौरान संभोग क्या यह उचित होगा? सुगना अपनी अंतरात्मा से एक बार फिर लड़ रही थी।

क्या बनारस महोत्सव का चौथा दिन क्या यूं ही बीत जाएगा?

हे भगवान अब मैं क्या करूं। सुगना ने इससे पहले भी व्रत रखा था परंतु उस दौरान वह संभोग से सर्वथा दूर रही थी। बातों ही बातों में कजरी ने उसे व्रत की अहमियत और व्रत के दौरान पालन किए जाने वाले दिशा निर्देशों की जानकारी बखूबी दी हुई थी। परंतु आज का दिन वह किस प्रकार व्यर्थ जाने दे सकती थी।

यदि वह गर्भवती ना हुई तो?? सुगना की रूह कांप उठी। सूरज को मुक्ति दिलाने के लिए वह हर हाल में गर्भवती होना चाहती थी।

उसकी अंतरात्मा ने आवाज दी

व्रत के पावन दिन यदि तू संभोग कर गर्भवती होना भी चाहेगी तो भगवान तेरा मनोरथ कभी नहीं पूर्ण करेंगे। हो सकता है तेरे गर्भ में आने वाला तेरी मनोकामना की पूर्ति न कर तुझे और मुसीबत में डाल दे।

सुगना एक बार फिर कांप उठी यदि सचमुच उसके गर्भ में पुत्री की जगह पुत्र का सृजन हुआ तो वह आने वाले समय में सूरज को मुक्ति किस प्रकार दिला पाएगी। क्या उसे स्वयं सूरज से …. इस विचार से ही उसके शरीर में कंपन उत्पन्न हो गए।

"मैं भगवान से प्रार्थना करूंगी मेरी मजबूरी और मनोदशा को समझ कर वह मुझे माफ कर देंगे सुगना ने खुद को समझाने की कोशिश की"

"यदि भगवान चाहेंगे तो तेरा यह संभोग कल और परसों भी हो सकता है आज व्रत के दिन तुझे निश्चित ही इस से दूर रहना चाहिए।" अंतरात्मा ने फिर अपनी बात रखी।

सुगना चाह कर भी व्रत के नियम तोड़ पाने में स्वयं को असहज महसूस कर रही थी परंतु जैसे-जैसे समय बीत रहा था उसकी अधीरता बढ़ती जा रही थी।

सरयू सिंह को भी महिलाओं के व्रत का पता चल चुका था उनकी उत्तेजना भी व्रत के नाम पर शांत हो चुकी वैसे भी पिछले शाम उन्होंने अपनी मनोरमा मैडम की जी भर कर चुदाई की थी और उनकी कामोत्तेजना कुछ समय के लिए तृप्त हो गई थी।

सुबह-सुबह मनोरमा मैडम की गाड़ी विद्यानंद के पांडाल के सामने आ गई थी। सुगना ने इसकी सूचना पहले ही अपनी मां पदमा और सास कजरी को दे दी थी। सोनी और मोनी दोनों भी बनारस घूमने के नाम से बेहद उत्साहित थी।

सबको बनारस घूमने के कार्यक्रम के बारे में पता था परंतु यह बात सरयू सिंह को पता न थी कल शाम की मुलाकात में वह यह बात सरयू सिंह को बताना भूल गई थी।

पंडाल के सामने गाड़ी खड़ी देख सरयू सिंह उठ कर गाड़ी की तरफ गए उन्हें लगा जैसे मनोरमा मैडम स्वयं आई हैं। उन्हें देखकर ड्राइवर बाहर आया और अदब से बोला

" मैडम ने यह गाड़ी आप लोगों को बनारस घुमाने के लिए भेजी है शायद सुगना मैडम से उनकी बात हुई है"

सरयू सिंह ने पांडाल की तरफ देखा और अपने परिवार की सजी धजी महिलाओं को देखकर वह बेहद भाव विभोर हो उठे।

सोनी और मोनी युवावस्था की दहलीज लांघने को तैयार थी परंतु सरयू सिंह का सारा ध्यान अपनी जान सुगना पर ही लगा था। सुगना के कोमल अंगों को न जाने वह कितनी बार अपने हाथों से नाप चुके थे पर जब जब वह सुगना को देखते उनकी नजरें सुगना के अंगो का नाप लेने लगतीं और उसके अंदर छुपे हुए खजाने की कल्पना कर उनके लण्ड जागृत हो जाता। आज व्रत के भी दिन भी वह अपनी उत्तेजना पर काबू न रख पाए और उनका लण्ड एक बार फिर थिरक उठा।

सरयू सिंह दलबल समेत बनारस दर्शन के लिए निकल चुके थे। सुगना ने लाली को भी अपने साथ ले लिया। महिलाओं का सारा ध्यान बनारस की खूबसूरत बिल्डिंगों को छोड़कर मंदिरों पर था। सबकी अपनी अपनी मनोकामनाएं थी जहां सुगना सिर्फ और सिर्फ सूरज के बारे में सोच रही थी और अपने इष्ट देव से उसकी मुक्ति दाईनी बहन का सृजन करने के लिए अनुरोध कर रही थी वही पदमा अपने सोनू के उज्जवल भविष्य तथा उसके लिए भगवान से नौकरी की मांग कर रही थी।

कजरी भी अपने पुत्र मोह से नहीं बच पाई थी वह भी भगवान से अपने पुत्र रतन की वापसी मांग रही थी। वही उसके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा था।

माता का पुत्र के प्रति प्रेम दुनिया का सबसे पवित्र प्रेम है। यह बात इन तीनों महिलाओं पर लागू हो रही थी परंतु सुगना दुधारी तलवार पर चल रही थी यदि उसकी मांग पूरी ना होती तो सुगना को मृत्यु तुल्य कष्ट से गुजरना होता। अपने ही पुत्र के साथ संभोग करने का दंड वह स्वीकार न कर पाती।

अपने अवचेतन मन से उसने अपने इष्ट देव को वह फैसला सुना दिया था। उसने अपने इष्ट देव को यह खुली धमकी दे दी थी यदि उसके गर्भ में पुत्री का सृजन ना हुआ और यदि सूरज को मुक्ति दिलाने के लिए यदि उसे अपने ही पुत्र से संभोग करना पड़ा तो वह यह निकृष्ट कार्य भी करेगी परंतु उसके पश्चात अपनी देह त्याग देगी।

वह मंदिर मंदिर अनुनय विनय करती रही और अपनी एकमात्र इच्छा को पूरा करने के लिए मन्नतें मांगती रही।

उधर सरयू सिंह भगवान के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करते रहे । सरयू सिंह मनोरमा को जी भर कर चोदने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज थे। उन्होंने डॉक्टर की सलाह को झुठला दिया था और उनके निर्देशों के विपरीत जाकर न सिर्फ शिलाजीत का सेवन किया था अपितु एक नौजवान युवती के साथ जी भर कर संभोग किया था और उसे एक नहीं दो दो बार स्खलित किया था। भगवान ने उन्हें एक बार फिर मर्दाना ताकत से भर दिया था।

सभी के पास मांगने के लिए कुछ ना कुछ था परंतु सोनी जो चाहती थी उसे वह मांगना भी नहीं आता था। विकास उसे पसंद तो आने लगा था परंतु इस कच्ची उम्र में वह विकास से कोई रिश्ता नही जोड़ना चाहती थी। और जो वह विकास से चाहती थी उसे भगवान से मांगने का कोई औचित्य नहीं था। सोनी विकास से लिपटकर पुरुष शरीर का स्पर्श एवं आनंद अनुभव करना चाहती थी। वह अपनी चुचियों पर पुरुष स्पर्श के लिए लालायित थी। अपने दिवास्वप्न में वह कभी-कभी पुरुषों के लण्ड के बारे में भी सोचती और अपनी अस्पष्ट जानकारी के अनुसार उसके आकार की कल्पना करती।

अपने भांजे सूरज की नुन्नी सहलाकर उसने नुन्नी का बढ़ा हुआ आकार देखा था और पुरुष लिंग की कल्पना उसी के अनुरूप कर ली थी। परंतु क्या सभी पुरुषों का लिंग उसी प्रकार होता होगा? सोनी के मन में भविष्य को लेकर कई प्रश्न थे? तुरंत सारे प्रश्नों के उत्तर भविष्य के गर्भ में छुपे हुए थे।

सोनी के ठीक उलट मोनी अभी इस कामवासना की दुनिया से बेहद दूर थी। घर के कामकाज में मन लगाने वाली मुनि धर्म परायण भी थी और एक निहायत ही पारिवारिक लड़की थी अपने संस्कारों से भरी हुई। जब सुगना के कहने पर मोनी ने सूरज के अंगूठे सहलाया था और उसकी बड़ी हुई नुन्नी को अपने होठों से छू कर छोटा किया था वह बेहद शर्मसार थी और फिर कभी सूरज के अंगूठे से ना खेलने का मन ही मन फैसला कर लिया था।

हालांकि यह फैसला कब तक कायम रहता यह तो नियति ही जानती थी। जब जांघों के बीच आग बढ़ेगी कई फैसले उसी आग में दफन हो जाने थे।

इस समय सिर्फ लाली ही की जिसके दोनों हाथों में लड्डू थे उसका पति राजेश उससे बेहद प्यार करता था और अब सोनू के उसके जीवन मे हलचल मचा दी थी। सोनू दो-तीन दिनों से लाली के घर नहीं आया था। लाली की अधीरता भगवान ने समझ ली थी।

मंदिर से बाहर निकलते समय सुगना ने सरयू सिंह के माथे पर तिलक लगाया और उनसे अनुरोध किया…

"बाबूजी कल और कोनो काम मत करब कल हम पूरा दिन आपके साथ रहब । उ वाला होटल ठीक कर लीं जवना में हमनी के पहला बार एक साथ रुकल रहनी जा जब हमार हाथ टूटल रहे।"

सरयू सिह बेहद प्रसन्न हो गए सुगना ने जिस बेबाकी से होटल में रहकर चुदने की इच्छा जाहिर की थी वह उसके कायल हो गए थे।

सरयू सिंह मुस्कुराते हुए बोले

"हां उहे वाला होटल में जवना में तू रात भर तक सपनात रहलु"

सुगना को उस रात की सारी बातें याद आ गई


((("मैं सुगना"



दिन भर की भागदौड़ से मैं थक गई थी। शहर के उस अनजान होटल के कमरे में लेटते ही मैं सो गई। बाबुजी दूसरे बिस्तर पर सो रहे थे.

रात में एक अनजान शख्स मेरी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर की तरफ उठा रहा था. पता नहीं क्यों मुझे अच्छा लग रहा था। मैंने अपने घुटने मोड़ लिए। मेरा पेटीकोट मेरी जांघो को तक आ चुका था। पंखे की हवा मेरे जांघों के अंदरूनी भाग को छू रही थी और मुझे शीतलता का एहसास करा रही थी। उस आदमी ने मेरी पेटीकोट को मेरे नितंबों तक ला दिया था। उसे और ऊपर उठाने के मैने स्वयं अपने नितंबों को ऊपर उठा दिया। उस आदमी के सामने मुझे नंगा होने में पता नहीं क्यों शर्म नही आ रही थी। मैं उत्तेजित हो चली थी।

पेटिकोट और साड़ी इकट्ठा होकर मेरी कमर के नीचे आ गए। घुंघराले बालों के नीचे छुपी मेरी बूर उस आदमी की निगाहों के सामने आ गयी।





उस आदमी का चेहरा मुझे दिखाई नहीं पड़ रहा था पर उसकी कद काठी बाबूजी के जैसी ही थी। वह आदमी मेरी जाँघों को छू रहा था। उसकी बड़ी बड़ी खुरदुरी हथेलियां मेरे जाँघों को सहलाते हुए मेरी बुर तक पहुंचती पर उसे छू नही रही थीं।

मैं चाहती थी कि वह उन्हें छुए पर ऐसा नहीं हो रहा था। मेरी बुर के होठों पर चिपचिपा प्रेमरस छलक आया था। अंततः उसकी तर्जनी उंगली ने मेरी बुर से रिस रहे लार को छू लिया। उसकी उंगली जब बुर से दूर हो रही थी तो प्रेमरस एक पतले धागे के रूप में उंगली और बूर के बीच आ गया। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मेरी बुर उस उंगली को अपने पास खींचे रखना चाहती थी।

उंगली के दूर होते ही वह पतली कमजोर लार टूट गयी जिस का आधा भाग वापस मेरी बूर पर आया और आधा उसकी उंगली से सट गया। उस आदमी ने अपनी उंगली को ध्यान से देखा और अपने नाक के करीब लाकर उसकी खुशबू लेने की कोशिश की। और अंततः अपनी जीभ से उसे चाट लिया। मेरी बुर उस जीभ का इंतजार कर रही थी पर उस अभागी का कोई पुछनहार न था। मैं अपनी कमर हिला रही थी मेरी जाघें पूरी तरह फैल चुकी थी ।

अचानक वह व्यक्ति उठकर मेरी चूँचियों के पास आ गया। मेरी ब्लाउज का हुक खुद ब खुद खुलता जा रहा था। तीन चार हुक खुलने के पश्चात चूचियां उछलकर ब्लाउज से बाहर आ गयीं। उस व्यक्ति ने मेरी चूचियों को चूम लिया। एक पल के लिए मुझे उसका चेहरा दिखाई दिया पर फिर अंधेरा हो गया। वह मेरी चुचियों को चूमे जा रहा था। उसकी हथेलियां भी मेरी चुचियों पर घूम रही थी। आज पहली बार किसी पुरुष का हाथ अपनी चुचियों पर महसूस कर मेरी उत्तेजना सातवें आसमान पर पहुंच गई। मेरी बुर फड़फड़ा रही थी। मैंने स्वयं अपनी उंगलियां को अपने बुर के होठों पर ले जाकर सहलाने लगी। मेरी बुर खुश हो रही थी और उसकी खुशी उसके होठों से बह रहे प्रेम रस के रूप में स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी।

अचानक मेरी चूचि का निप्पल उस आदमी के मुह में जाता महसूस हुआ। वह मेरे निप्पलों को चुभला रहा था। मैं कापने लगी। मैने इतनी उत्तेजना आज तक महसूस नहीं की थी।

कुछ देर बाद मैंने उस आदमी को अपनी धोती उतारते देखा। उसका लंड मेरी आंखों के ठीक सामने आ गया यह। लंड तो बाबुजी से ठीक मिलता-जुलता था मैं अपने हाथ बढ़ाकर उसे छूना चाह रही थी। वह मेरे पास था पर मैं उसे पकड़ नहीं पा रही थी। मेरी कोमल हथेलियां ठीक उसके पास तक पहुंचती पर उसे छु पाने में नाकाम हो रही थी।

मैं चाह कर भी उस आदमी को अपने पास नहीं बुला पा रही थी पर उसके लंड को देखकर मेरी बुर चुदवाने के लिए बेचैन हो चली थी। मैं अपनी जांघों को कभी फैलाती और कभी सिकोड़ रही थी।

वह आदमी मेरी उत्तेजना समझ रहा था कुछ ही देर में वह बिस्तर पर आ गया और मेरी जांघों के बीच बैठकर अपनी गर्दन झुका दिया वह अपने होठों से मेरी नाभि को चूम रहा था और हथेलियों से चूचियों को सहला रहा था। मैं स्वयं अपनी हथेलियों से उसके सर को धकेल कर अपनी बुर पर लाना चाहती थी पर जाने यह यह क्यों संभव नहीं हो पा रहा था । मेरी हथेलियां उसके सर तक पहुंचती पर मैं उसे छू नहीं पा रही थी।

अचानक मुझे मेरी जाँघे फैलती हुई महसूस हुयीं। लंड का स्पर्श मेरी बुर पर हो रहा था बुर से निकल रहा चिपचिपा रस रिश्ते हुए मेरी कोमल गांड तक जा पहुंचा था। मैं उत्तेजना से हाफ रही थी तभी लंड मेरी बुर में घुसता हुआ महसूस हुआ।

मैं चीख पड़ी

"बाबूजी……"

मेरी नींद खुल गई पर बाबूजी जाग चुके थे। उन्होंने कहा

"का भईल सुगना बेटी"

भगवान का शुक्र था। लाइट गयी हुयी थी। मेरी दोनों जाँघें पूरी तरह फैली हुई थी और कोमल बुर खुली हवा में सांस ले रही थी। वह पूरी तरह चिपचिपी हो चली थी मेरी उंगलियां उस प्रेम रस से सन चुकी थी। मैंने सपने में अपनी बुर को कुछ ज्यादा ही सहला दिया था। मेरी चूचियां भी ब्लाउज से बाहर थी।





मैंने बाबूजी की आवाज सुनकर तुरंत ही अपनी साड़ी नीचे कर दी।

मुझे चुचियों का ध्यान नहीं आया। बाबूजी की टॉर्च जल चुकी थी उसकी रोशनी सीधा मेरी चुचियों पर ही पड़ी। प्रकाश का अहसास होते ही मैंने अपनी साड़ी का पल्लू खींच लिया पर बाबूजी का कैमरा क्लिक हो चुका था। मेरी चुचियों का नग्न दर्शन उन्होंने अवश्य ही कर लिया था। साड़ी के अंदर चुचियां फूलने पिचकने लगीं।

मेरी सांसे अभी भी तेज थीं। बाबू जी ने टॉर्च बंद कर दी शायद वह अपनी बहू की चूँचियों पर टार्च मारकर शर्मा गए थे। उन्होंने फिर पूछा

" सुगना बेटी कोनो सपना देखलू हा का?" उनकी बात सच थी। मैंने सपना ही देखा था पर उसे बता पाने की मेरी हिम्मत नहीं थी। मैंने कहा

"हां बाबू जी"

"चिंता मत कर….नया जगह पर नींद ठीक से ना आवेला"

" हा, आप सूत रहीं"

मैंने करवट लेकर अपनी चुचियों को बाबूजी से दूर कर लिया और मन ही मन मुस्कुराते हुए सोने लगी। डर वश मेरी बुर पर रिस आया प्रेमरस सूख गया था।



उपरोक्त यादें भाग 11 से ली गयी हैं))))

वह शर्म से पानी पानी हो गई।

सरयू सिंह सुगना के अंतर्मन को नहीं जान रहे थे परंतु होटल और एकांत दोनों एक ही बात की तरफ इशारा कर रहे थे जिसे वह बखूबी समझ रहे थे। वह बेहद प्रसन्न हो गए और सुगना को अपने सीने से सटा लिया कजरी और पदमा को आते देख इस आलिंगन का कसाव तुरंत ही ढीला पड़ गया और सुगना के द्वारा दिया प्रसाद सरयू सिंह मुंह में डालकर सभी को जल्दी चलने का निर्देश देने लगे।

शाम हो चली थी बनारस महोत्सव में आज धर्म हावी था हर तरफ पूजा-पाठ की सामग्री बिक रही थी लगभग हर पांडाल से शंख ध्वनि और आरती की गूंज सुनाई पड़ रही थी सभी महिलाएं भाव विभोर होकर अपने-अपने इष्ट देव की आराधना कर रही थीं।

बनारस महोत्सव का चौथा दिन पूजा पाठ की भेंट चढ़ गया।

पंडाल की छत को एकटक निहारती सुगना कल के दिन का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। कल का दिन सुगना के लिए बेहद अहम था। कल वह अपने बाबू जी से जी भर कर संभोग करना चाहती थी। और एक नहीं कई बार उनके वीर्य को अपने गर्भाशय में भरकर गर्भवती होना चाहती थी। अपने पुत्र मोह में वो यह बात भूल चुकी थी की डॉक्टर ने सरयू सिंह को संभोग न करने की सलाह दी हुई है।

सुगना की अधीरता को देख नियति भी मर्माहत हो चुकी थी वह सुगना के गर्भधारण को लेकर वह तरह-तरह के प्रयास कर रही थी। सुकुमारी और अपने पूरे परिवार की प्यारी सुगना के गर्भ से सुगना के परिवार की दशा दिशा तय होनी थी..

परंतु नियति निष्ठुर थी सुगना की तड़प को नजरअंदाज कर उसने अपनी चाल चल दी..

शेष अगले भाग में…
 
आपके दर्शन भी बड़े दिनों बाद हुए.। कुछ ही पाठक है इस कहानी के जो प्रतिक्रिया के रूप में चंद लाइने लिख पाते हैं।

आपको साधुवाद इस कामुक कथा को प्रमोट करने के लिए
 
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