Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 10 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

लाइट जाने के बाद कमरे में अंधेरा हो गया था। बाहर गलियारे में कई लोगों के आने-जाने की आवाज आ रही थी। किसी ने चिल्लाया



"लाइट कब आएगी क्या फालतू होटल है जनरेटर नहीं है क्या?"

होटल वाले वेटर की आवाज आई

" पूरे शहर की लाइट गई है देखिए कब तक आती है हमारे पास जनरेटर नहीं है कहिए तो मोमबत्ती दे दूं।"

सरयू सिंह के मन में एक बार आया कि वह जाकर मोमबत्ती ले लें। परंतु वह तौलिया पहने हुए थे और इस स्थिति में बाहर जाना उचित न था। उन्होंने लाइट का इंतजार करना ही उचित समझा। कजरी और सुगना दोनों बिस्तर पर आकर बैठ चुकी थीं।

कजरी ने कुंवर जी को छेड़ा

"अच्छा केकर कपड़ा ज्यादा सुंदर लागतल हा?"

" तू कभी खराब काम करेलू का? तू जवन भी करेलू उ सब अच्छा होला"

सरयू सिंह ने कजरी की तारीफ कर दी उनके दोनों हाथ में लड्डू थे जिनकी तुलना वह नहीं करना चाह रहे थे। बिस्तर पर बैठे उत्तेजना में डूबे सरयू सिंह और कजरी लाइट आने का इंतजार कर रहे थे। परंतु लाइट आने में विलंब हो रहा था। धीरे धीरे वह तीनों बिस्तर पर लेटते गए एक किनारे सरयू सिंह थे बीच में कजरी और दूसरी तरफ अपनी सास और अपने ससुर की चहेती सुगना।

कजरी जानबूझकर बीच में नहीं आई थी वह अकस्मात थी उन दोनों के बीच आ गई थी।

सरयू सिंह का लंड अब इंतजार करने के मूड में नहीं था। उसे वैसे भी उसे अंधेरी गुफा की यात्रा करनी थी। बाहरी दुनिया और उसके आडंबर उसके किसी काम के नहीं थे। उसे तो उस गहरी और चिपचिपी गुफा में प्रवेश कर उस गर्भाशय को चूमना था जिसका चेहरा आज तक कोई नहीं देख पाया था। कजरी की पीठ सरयू सिंह की तरफ थी और चेहरा सुगना की तरफ।

सरयू सिंह से और बर्दाश्त नहीं हो रहा था उन्होंने कजरी के पेट पर हाथ लगाया और उसके नितंबों को अपनी तरफ खींच लिया।

उनका लंड कजरी के नितंबों के बीच से उसकी गॉड से टकराने लगा। कजरी स्वयं भी उत्तेजित थी। उसकी बुर से रिस रही लार उसकी अनछुई गांड तक पहुंच चुकी थी। एक पल के लिए कजरी को लगा यदि उसने सरयू सिंह के लंड को सही रास्ता न दिखाया तो वह आज उसकी गांड में ही छेद कर देंगे। सरयू सिंह आज दोहरी उत्तेजना के शिकार थे। एक तो उनकी सुगना बहू आज एक नए रूप में उपस्थित थी और वह भी अपनी सास कजरी के सामने।

कजरी ने अपनी कमर थोड़ी और पीछे की तथा सरयू सिंह के लंड को उस चिपचिपी चूत का द्वार मिल गया। सरयू सिंह ने आव देखा न ताव और एक ही झटके में अपना लंड अपनी भौजी की बुर में उतार दिया।

उनका मजबूत लंड कजरी की बुर को चीरता हुआ गर्भाशय तक जा पहुंचा कजरी चिहुँक पड़ी.

सुगना ने पूछा

"सासु मां का भइल?"

जब तक कजरी उत्तर देती तब तक सरयू सिंह तेजी से अपना लंड उसकी बुर में आगे पीछे करने लगे। कजरी की आवाज लहरा गई वह बड़ी मुश्किल से बोली

"कुछो….ना"

सरयू सिंह का लंड आज भी कजरी की बुर में पूरे कसाव के साथ जाता था।उसमें इतनी ताकत थी वह जब बाहर आता कजरी को खींचे लाता और जब वह अंदर की तरफ जाता कजरी दो -चार इंच ऊपर की तरफ उठ जाती। बिस्तर पर हो रही यह हलचल सुगना ने महसूस कर ली।

अंधेरा होने के बावजूद बिस्तर पर होने वाली इस गतिविधि ने सुगना का ध्यान खींच लिया था। उसे कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था परंतु वह कुछ उत्तेजक महसूस कर पा रही थी। वह कजरी की तरफ मुंह करके करवट लेट गयी। सरयू सिंह की हथेलियां कजरी की चुचियों को अपने आगोश में लेने के लिए आगे आयीं परंतु इससे पहले कि वह कजरी की चुचियों को पकड़ पाती, हथेली के पिछले भाग को सुगना की सूचियों का स्पर्श मिल गया।

सुगना की कोमल चुचियां सरयू सिंह कैसे भूल सकते थे। सरयू सिंह पसोपेश में आ गए। वह सुगना की चुचियाँ सहलाना चाहते थे परंतु उनका हाथ कजरी के सीने के ऊपर था। यदि वह कजरी की चुचियाँ ना पकड़ते कजरी तुरंत ही समझ जाती।

उन्होंने बड़ी ही चतुराई से कजरी की चुचियों को अपनी हथेलियों में भर लिया और बीच-बीच में वह अपनी पकड़ ढीली करते और उनकी हथेलियों के पिछले भाग को सुगना की चुचियों का स्पर्श मिलता।

सुगना अब समझ चुकी थी कि उसके बाबूजी कजरी की चुचियों को मीस रहे हैं। सुगना की की बुर सिहर उठी। अपने ठीक बगल में अपनी सास कजरी की चुदाई होने के ख्याल मात्र से उसकी कोमल और संवेदनशील बुर के मुंह में पानी आ गया।

वो आगे आ कर अपनी चुचियों को सरयू सिंह की हथेलियों से सटाने लगी।

सरयू सिह कजरी की चुचियों को मीस रहे थे और उधर सुगना अपनी चुचियों को उनकी हथेली के पिछले भाग पर रगड़ रही थी। अचानक सुगना के निप्पल उनकी दो उंगलियों के बीच आ गए सरयू सिंह से बर्दाश्त ना हुआ और उन्होंने सुगना के निप्पल को दबा दिया। सुगना कराह उठी

"बाबूजी…. "

उसने अपने आगे के वाक्यांश को अपने मुंह में ही रोक लिया और उस मीठे दर्द को सह लिया। कजरी ने पूछा

"सुगना बाबू का भइल"

सरयू सिंह का लंड सकते में आ गया वह कजरी की बुर में पूरा जड़ तक घुस कर शांत हो गया। एक पल के लिए सरयू सिह घबरा गए उन्हें लगा इस प्रेम क्रीडा में विघ्न आ गया।

तभी सुगना ने बात संभाल ली उसने कहा "बाबूजी लाइट कब आई?"

सरयू सिंह अपनी भौजी की बुर चोदते चोदते हाफ रहे थे उन्होंने उत्तर न दिया परंतु कजरी ने कहा

"नींद नईखे आवत का? सुते के कोशिश कर"

कजरी उत्तेजना में पूरी तरह डूब चुकी थी वह किसी हाल में भी बिना स्खलित हुए सरयू सिंह के लंड को नहीं छोड़ना चाहती थी। सुगना भी इस दर्द को समझती थी वह शांत हो गयी। परंतु अपनी चुचियों को अपने बाबुजी की हथेलियों के पीछे रगड़ती रही।

सरयू सिंह का पिस्टन एक बार फिर आगे पीछे होने लगा। कजरी अपनी कमर हिला कर उनका साथ दे रही थी। उसे अब बिस्तर पर हो रही हलचल से कोई लेना-देना नहीं था। उत्तेजना में उसका दिमाग वैसे भी कम काम कर रहा था। वह अपनी बहू के सामने एक ही बिस्तर पर पूरी तन्मयता से अपने नितंबों को आगे पीछे कर चुदवा रही थी।

अचानक सरयू सिंह ने अपना हाथ ऊपर उठाया उसी दौरान सुगना ने उनकी हथेलियों की तलाश में अपनी चूचियां और आगे बढ़ा दी जो सीधे-सीधे कजरी की चुचियों से सट गयीं। कजरी जिन चुचियों को वह हमेशा से छूना और महसूस करना चाहती थी आज उसकी बहू ने वह चूचियां स्वयं ही उसकी चुचियों से टकरा दी थी। इससे पहले की सुगना इस अप्रत्याशित स्थित से बचने के लिए अपनी चुचियाँ पीछे कर पाती कजरी ने तुरंत अपना हाथ ऊपर किया और सुगना को अपनी तरफ खींच लिया सुगना कुछ बोल ना पायी और उसकी मझोली चुचियाँ अपनी सास की भारी चूँचियों में समा गयीं।

सरयू सिंह ने अपने हाथ वापस उसी अवस्था में लाने की कोशिश परंतु सास और बहू की चूचियों के बीच उनके हाथ के लिए जगह नहीं थी परंतु उन्होंने हार न मानी और उन दोनों की चुचियों को अपनी हथेली से सहलाने लगे।

एक ही पल में सास बहू और सरयू सिंह के बीच की शर्म की दीवार लगभग गिर चुकी थी वह उन दोनों की छातियों के बीच ढेर सारी चुचियों को सहलाते हुए मदमस्त हो रहे थे और इसका एक तरफा आनंद कजरी की चूत उठा रही थी।

अचानक कजरी ने अपने शरीर को थोड़ा नीचे किया उसके होंठ सुगना के गर्दन के ठीक नीचे आ गए थे इससे ज्यादा नीचे आना संभव न था सरयू सिंह का लंड कजरी को लगातार ऊपर धकेल रहा था सुगना ने कजरी की मनोदशा का अंदाजा लगा लिया आज वह भी पूरे उन्माद में थी। उसने अपने शरीर को ऊपर की तरफ धकेला और अपनी कोमल चुचियों के निप्पलों को अपनी सास कजरी के मुंह में दे दिया।

सुगना ने उत्तेजना में एक बड़ा कदम उठा लिया था जो कजरी की मनोदशा के अनुरूप था सरयू सिंह अपनी हथेलियों से सुगना की चुचियों को ढूंढते हुए ऊपर की तरफ गए और कजरी के चेहरे पर हाथ लगते ही उन्हें वस्तुस्थिति का अंदाजा हो गया। सरयू सिंह स्वयं आनंद के अतिरेक से अभिभूत अपने लंड को अपनी भौजी की बुर में बेहद तेज गति से आगे पीछे करने लगे कजरी से अब और बर्दाश्त नहीं हुआ। उसकी कई इच्छाएं एक साथ पूरी हो रही थी कजरी के पैर सीधे होने लगे परंतु सरयू सिंह ने उसे चोदना जारी रखा। कजरी की बुर पानी छोड़ रही थी जितना रस वह अपनी बुर से बाहर छोड़ रही थी वह सुगना की कोमल चुचियों से उतना रस दूह लेना चाहती थी परंतु सुगना की चुचियां भी कच्चे आम जैसी थीं जिसे आप चूस तो सकते थे पर उसमें से रस निकलना असंभव था। उधर कजरी की मेहनत से सुगना की बुर भी पूरी तरह भजन कीर्तन के लिए आतुर थी।

स्खलन के दौरान कजरी ने अनजाने में ही सुगना के निप्पलों को जोर से दबा दिया सुगना से बर्दाश्त ना हुआ वह बोल उठी..

"आआआ…..तनी धीरे से दुखाता"

सुगना की इस कराह ने सरयू सिंह को पूरी तरह उत्तेजित कर दिया उन्होंने कजरी की बुर में लंड जड़ तक घुसा कर गर्भाशय को अंतिम विदाई दी और फक्कक कि आवाज के साथ अपना फनफनाता आता हुआ लंड बाहर निकाल लिए जो अब पूरी तरह कजरी के रस से भीगा हुआ था। आज कजरी की बुर ने इतना पानी स्खलित किया था कि उनके अंडकोष भी भीग गए थे।।

कजरी को अगले कदम का आभास हो गया था। सरयू सिंह का लंड अब भी स्खलित नहीं हुआ था और उन्हें अब अपनी बहू सुगना की कसी हुयी बुर की तलाश थी। कजरी बिना बात किए उनके बीच से उठी और सुगना की तरफ आ गई सुगना भी आतुर थी उसने तुरंत ही कजरी की जगह ले ली।

सरयू सिंह अब यह जान चुके थे की सुगना और कजरी दोनों ही इस खेल में शामिल हो चुके हैं। उन्होंने सुगना की जाँघे पकड़कर उसे खींच लिया और उसकी जांघों के बीच आ गए। उन्होंने अपनी हथेली से सुगना की कोमल बुर का मुआयना किया और बुर के होठों पर भरपूर प्रेम रस देखकर खुश हो गए। उन्होंने झुककर सुगना के निचले होठों को चूम लिया। सुगना के प्रेम रस से अपने होठों को भी भिगोने के पश्चात व सुगना को चूमने के लिए उसके चेहरे की तरह बढ़े।

तभी उन्हें कजरी के हाथ अपने और सुगना के सीने के बीच रेंगते महसूस हुए । कजरी सुगना की चुचियों को पकड़ने की कोशिश कर रही थी।

सरयू सिंह सुगना के कोमल होठों को घूमते हुए सुगना को उसका ही प्रेमरस चटा रहे थे उधर उनके तने हुए लंड ने सुगना की बुर को चूम लिया। वह रसीली बुर के अंदर प्रवेश करता गया। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे अब वह किसी इशारे की प्रतीक्षा में न था। सुगना भी अपनी जांघें फैला कर उसे खुला आमंत्रण दे रही थी। थोड़ी ही देर में सरयू सिह की कमर तेजी से हिलने लगी। सरयू सिंह ने खुद को सुगना अलग किया और उसकी जांघों को पकड़ कर उसके पेट के दोनों तरफ कर दिया और अपने लंड से उसकी बुर को पूरी गहराई तक हुमच हुमच कर चोदने लगे।

कजरी सरयू सिह का उत्तेजक रूप महसूस कर घबरा गयी। वह अपनी बहू सुगना के चिंतित थी जो अपने बाबूजी की इस अद्भुत उत्तेजना का आनंद ले रही थी।

कजरी ने कहा

"तनी धीरे धीरे… लइका बिया"

सरयू सिंह कजरी की इस बात पर और भी ज्यादा उत्तेजित हो गए उन्होंने सुगना के होंठ काट लिए तथा अपने लंड से उसके गर्भाशय में छेद करने को आतुर हो उठे। उधर कजरी सुगना की चूचियों को सहलाये जा रही थी। कभी-कभी वह अपनी उंगलियां सुगना की भग्नासा पर ले आती परंतु सरयू सिंह के लंड के तेज आवागमन को महसूस कर वह अपनी उंगलियां हटा लेती। उसे कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता जैसे उसकी उंगली भी सरयू सिंह के लंड के साथ सुगना की बुर में चली जाएगी इतना आवेग था सरयू सिंह के लंड में।

सुगना हाफ रही थी। ऐसी उत्तेजना उसने जीवन में पहली बार महसूस की थी। कजरी कभी उसके होठों को चूमती कभी उसके गालों को सहलाती कभी अपने हाथों से उसकी चुचियों को सहलाती। अपनी चुचियों पर अपनी सास और अपने प्रिय बाबुजी की हथेलियां एक साथ पाकर सुगना सिहर उठी।उसकी बुर में कसाव आ गया वह स्खलित होते हुए बोली

बाबूजी... "आआआआआ…..ई….असहिं….आ..आ…सासु....माआआआआआ….आ ईईईई"

वह अपने पैर सीधा करना चाह रही थी परंतु सरयू सिंह का लंड अब भी और गहराइयां खोज रहा था। वह उसकी अंतरात्मा में उतर जाना चाहते थे।सुगना की उत्तेजक कराह ने सरयू सिंह को स्खलन पर मजबूर कर दिया और उनके लंड ने अपनी पहली धार सुगना के गर्भाशय पर छोड़ दी।

सरयू सिंह ने अपना लंड बाहर निकाल लिया और अपने चिर परिचित अंदाज में अपने वीर्य से अपनी प्यारी बहू को भिगोने लगे। तभी उन्हें कजरी का ध्यान आया उन्होंने अपने लंड की दिशा घुमा ली और अपने पुराने खेत को भी उसी तरह खींचने की कोशिश की जिस तरह वह अपने आंगन की क्यारी सींच रहे थे।

परंतु दुर्भाग्य यह था की सुगना के शरीर में लगा हुआ इंजेक्शन खेत की जुताई और सिंचाई होने के बावजूद बीजारोपण में अक्षम था।

वीर्य स्खलन समाप्त होते ही उनकी हथेलियां कजरी और सुगना की चुचियों पर लगे वीर्य को बराबरी से फैलाने की कोशिश करने लगीं इसी दौरान लाइट आ गई।

अचानक आई रोशनी की वजह से सभी की आंखें मूंद गई परंतु सरयू सिंह इस अद्भुत दृश्य को देखना चाहते थे। उन्होंने अपनी आंखें खोल दी और अपनी दोनों नंगी प्रेमिकाओं को एक दूसरे से सटे और अपने वीर्य से भीगा हुआ देखकर अभिभूत हो गए। कजरी भी अब अपनी आंखें खोल कर सुगना को निहार रही थी।

परन्तु सुगना ने अपनी आंखें ना खोली। वह पूरी तरह शर्मसार थी। उसने पास पड़ा तकिया अपने चेहरे पर डाल लिया परंतु उसके खुले खजाने पर सरयू सिंह और कजरी का पूरा अधिकार और नियंत्रण था। वह दोनों उसकी खूबसूरत और कोमल शरीर को सहला रहे थे। सुगना की चुदी हुई फूली बुर को देखकर कजरी से न रहा गया उसने उसे चूम लिया। सुगना को यह अंदाजा न था उसने अपनी जांघें सिकोड़ी परंतु कजरी की जीभ को प्रेम रस चुराने से ना रोक पाइ उसने कहा..

"बाबूजी बत्ती बंद कर दीं"

सरयू सिह अपना झूलता हुआ लंड लेकर बिस्तर से उठे और उन्होंने ट्यूब लाइट बंद कर दी। कमरे में जल रहा नीला नाइट लैंप थोड़ी-थोड़ी रोशनी कमरे में फैला रहा था। सुगना अब उठ कर सिरहाने टेक लगाकर बैठ चुकी थी। कजरी उसकी नंगी जांघों को सहला रही थी। सरयू सिंह भी सुगना के दूसरी तरफ आकर बैठ गए थे। वह बेहद थके हुए थे। उसने सुगना को अपने सीने से लगा लिया और उसके गालों पर चुंबन लेते हुए बोले…

"तोहन लोग के बीच अतना प्यार बा हमरा आज मालूम चलल।

कजरी ने कहा..

"रहुआ आज भी ओकरा चूची पर गिरा देनी हां सुगना बाबू के इच्छा कैसे पूरा हुई?."

सुगना भी अब हाजिर जवाब हो चली थी उसने मुस्कुराते हुए कहा

"सासु मां अभी त रात बाकीये बा" और अपनी आंखें शरारत से मीच लीं।

सुगना की बात सुनकर सरयू सिंह और कजरी सुगना की तरफ मुड़ गए। उनकी नंगी जांघे सुगना कोमल जांघों पर आ गयीं। उन्होंने सुगना के गाल को चूम लिया। वह उन दोनों को जान से प्यारी हो गई थी। आज रात सुगना ने कजरी के मन में कई दिनों से उठ रही काम इच्छाओं को पूर्ण किया था और एक अलग किस्म की उत्तेजना को जन्म दिया था.

सरयू सिंह और कजरी दोनों सुगना के दोनों गालों को चूमे जा रहे थे तथा अपनी हथेलियों से वीर्य से सने सुगना की चुचियों को सहला रहे थे।



सुगना को आज की रात बहुत कुछ देखना और सीखना था।

तभी सुगना की मधुर आवाज सुनाई पड़ी..

"बाबूजी आपन स्टेशन आवे वाला बा"

ट्रेन में बैठे सरयू सिंह भी आज रात का ही इंतजार कर रहे थे। अपनी पूरी यात्रा को याद करते करते उनके लंड में तनाव भर चुका था। कजरी ने उनके जांघों के बीच उभार को महसूस कर लिया। सरयू सिंह अपनी कामुक दुनिया से लौटकर हकीकत में आ चुके थे। हरिया ने सारा सामान उठाया और सरयू सिंह कजरी के साथ ट्रेन की गेट पर आ गए। सुगना अपने ससुर द्वारा दी गई भेंट सूरज को लेकर खुशी खुशी उनके पीछे आ गई।

घर पहुंचने के बाद गांव वालों के आने-जाने का ताता लग गया। सरयू सिंह जैसा प्रभावशाली और मजबूत आदमी आज हॉस्पिटल में 2 दिन रह कर वापस आया था। सभी लोग उनका कुशलक्षेम पूछने उनके दरवाजे पर आ रहे थे। हरिया के परिवार वाले आगंतुकों का स्वागत कर रहे थे इधर कजरी और सुगना अपने घर को व्यवस्थित करने का प्रयास कर रही थीं।

सुधीर वकील भी उनका हालचाल घर में आया हुआ था यह वही वकील था जिसने सरयू सिंह पर केस किया परंतु अब वह उनका दोस्त बन चुका था।

सुधीर ने पूछा

"सरयू भैया तोहरा जैसा मजबूत आदमी कईसे हॉस्पिटल के चक्कर में पड़ गईल हा"

सरयू सिंह को कोई उत्तर न समझ रहा था उन्हें पता था उन्हें जो तकलीफ हुई थी वह सुगना को जरूरत से ज्यादा चोदने के कारण हुयी थी। सरयू सिंह हकीकत बयां कर पाने में असमर्थ थी उन्होंने मन मसोसकर कहा

"लागता अब हमनी के बुढ़ापा आ जायी…" सरयू सिंह मुस्कुराने लगे। अंदर आगन में सुगना और कजरी ने उनकी यह बात सुन ली और कजरी ने हंसते हुए कहा

"कुंवर जी के मुसल हमेशा ओसही रही. पूरा रास्ता खड़ा रहल हा….दुइये तीन दिन में तोरा खातिर बेचैन हो गइल बाड़े"

सुगना ने मुस्कुराते हुए कहा

"आज उनका के खुश कर दीयायी"

"सुगना बेटा उनका ले मेहनत मत करवइह"

सरयू सिंह खाना पीना खाने के पश्चात दालान में आराम करने चले गए आज उनकी इच्छा एक बार फिर सुगना से संभोग करने की थी परंतु लज्जावश उन्होंने यह बात न बोली।

कुछ देर बाद कजरी दालान में आई उसने कुँवर जी के पैर दबाए और जाने लगी। सरयू सिंह ने कहा...

"सुगना बाबू से दवाइयां और दूध भेज दीह. तनि शहद भी भेज दीह मीठा खाये के मन करता"

कजरी ने सुगना से कहा..

"कुंवर जी के दूध के साथ दवाई खिला दीह मीठा में तनी आपन शहद चटा दीह" इतना कहकर कजरी ने अपना चेहरा घुमा लिया और मुस्कुराने लगी।

सुगना ने सूरज को दूध पिलाया और उसे कजरी के हवाले कर अपने बाबू जी की सेवा में निकल पड़ी। शहद चटाने की बात ने उसके मन मे कामुकता को जन्म दे दिया था। सुगना मन ही मन मुस्कुरा रही थी और अपने बाबूजी के कमरे की तरफ बढ़ रही थी...

शेष अगले भाग में।

 
आपकी प्रतिक्रिया बेहतरीन रहती है। वर चुदे या कन्या...

तथास्तु हमेशा मिलता है....

रसप्रद और रोमांचक या उनमे से कोई एक

LoL

मुस्कुराते रहें।
 
जब तक सुगना अपने बाबूजी को दूध पिलाने के लिए उनके पास पहुंचे सोनू का हाल चाल ले लेते है...



सोनू तेज कदमों से लाली के घर की तरफ भागता जा रहा था वह आइसक्रीम को रास्ते में पिघलने से रोकना चाहता था और उसे अपनी लाली दीदी के होठों में पिघलते हुए देखना चाहता था। कुछ ही देर में वह लाली के दरवाजे पर खड़ा दरवाजा खटखटा रहा था….

"2 मिनट रुक जाइए आ रहे हैं"

लाली के बाथरूम से पानी गिरने की आवाज आ रही थी.."

"ठीक है दीदी"

"दीदी" शब्द सुनकर लाली ने सोनू की आवाज पहचान ली परंतु वह इस स्थिति में नहीं थी कि जाकर तुरंत दरवाजा खोल दे पर लाली सोनू को इंतजार भी नहीं कराना चाहती थी।

लाली बाथरूम में पूर्ण नग्न होकर स्नान का आनंद ले रही थी सोनू के आने के बाद अचानक ही उसके शरीर में सिहरन बढ़ गई। चुचियों पर लगा साबुन साफ करते करते उसकी चूचियां तनाव में आने लगी निप्पल खड़े हो गए। चूचियों पर लगे साबुन का झाग नाभि को छूते हुए दोनों जांघों के बीच आ गया था लाली की हथेली जैसे उस साबुन के झाग के साथ साथ स्वतः ही जांघों के बीच आ गयी और उसने अपनी रसीली बुर को छू लिया। उसकी जांघों के जोड़ पर जितना पानी था उससे ज्यादा उस मखमली बुर के अंदर था। जो अब रिस रहा था।

सोनू के आगमन ने लाली को उत्तेजित कर दिया था।

लाली लाख प्रयास करने के बावजूद अपने शरीर पर लगा साबुन साफ नहीं कर पा रही थी आज वह इत्मीनान से स्नान करने के मूड में थी परंतु सोनू के आकस्मिक आगमन ने उसे जल्दी बाजी में नहाने पर मजबूर कर दिया था परंतु धन्य हो वह रेलवे का नल जिस पर पानी थोड़ा-थोड़ा ही आ रहा था।

अंततः लाली ने यह फैसला किया कि वह अपनी नाइटी पहन कर जाकर दरवाजा खोल देगी और वापस आकर इत्मीनान से स्नान करेगी।

लाली ने जल्दी-जल्दी अपना अर्ध स्नान पूरा किया और अपनी लाल रंग की बेहद खूबसूरत नाइटी पहन कर बाहर आ गई। एकमात्र वही वस्त्र था जिसे लेकर वह बाथरूम में गई थी जो उसके शरीर पोछने और ढकने दोनों के काम आता था। दरअसल राजेश नाइटी, गाउन और अंतर्वस्त्र का बेहद शौकीन था वह लाली के लिए तरह-तरह की नाइटी और नाइट गाउन लाया करता था आखिर वही उसके सपनों की रानी थी जिसे सजा धजा कर वह कामकला के विविध रंग देखता था।

लाली ने दरवाजा खोला …

सोनू लाली को लगभग भीगी हुई अवस्था में नाइटी पहने देखकर सन्न रह गया. उसका ध्यान लाली की चुचियों पर चला गया जो पूरी तरह भीगी हुई थी . लाल रंग की नाइटी उस पर चिपक कर उन्हें और भी आकर्षक रूप दे रही थी. लाली के कड़े निप्पल उस नाइटी का आवरण छेद कर बाहर आने को तैयार थे. सोनू कुछ बोल नहीं पाया जुबान उसके हलक में अटक गई जब तक वह कुछ सोच पाता तब तक लाली ने कहा…

"सोनू बाबू थोड़ी देर बैठो मैं नहा लेती हूँ "

सोनू कुछ बोला नहीं उसने सिर्फ अपनी गर्दन हिलाई और अपने सूखे मुख से थूक गटकने का प्रयास करने लगा लाली। धीमे कदमों से बाथरूम के अंदर प्रवेश कर गयी परंतु वापस जाते समय उसके गोल नितंब लय में हिलते हुए सोनू के मन में हलचल पैदा कर गए।

कुछ ही देर में बाथरूम से पानी गिरने की आवाज फिर से आने लगी सोनू बेचैन हो गया उसका ध्यान न चाहते हुए भी उस पानी की आवाज की तरफ जा रहा था जो उसकी नंगी लाली दीदी के शरीर पर गिर रहा होगा। क्या लाली दीदी नंगी होकर नहा रही होंगी? या उन्होंने वह नाइटी पहनी हुई होगी? सोनू अपनी उधेड़बुन में खोया हुआ था. पता नहीं भगवान ने उसे कौन सी शक्ति दी उसके कदम धीरे धीरे बाथरूम के दरवाजे की तरफ बढ़ने लगे. रेलवे का दरवाजा कितना अच्छा होगा यह आप अंदाजा लगा सकते हैं।

अंततः सोनू को वह दरार मिल गई जिससे उसे जन्नत के दर्शन होने थे। उसकी पुतलियां फैल गई और उस छोटे से दरार से उसने नारी का वह रूप देख लिया जो सोनू जैसे नवयुवक को मर्द बनने पर मजबूर कर देता।

लाली पूरी तरह नंगी होकर पीढ़े पर बैठकर नहा रही थी। लाली पूरी तरह नंगी थी परंतु दरवाजे की तरफ उसका दाहिना हिस्सा था उसकी दाहिनी चूँची उभरकर दिखाई पड़ रही थी तथा उसकी मुड़ी हुई जाँघे अपने खूबसूरत आकार का प्रदर्शन कर रही थीं।

लाली को यह आभास नहीं था की सोनू उसे नहाते हुए देखने की हिम्मत कर सकता है पर सोनू भी अब बड़ा हो चुका था और उसका लंड भी ।

लाली बेफिक्र होकर अपनी चुचियों पर लगा साबुन धो रही थी तथा अपनी जांघों के बीच उस अद्भुत गुफा को भी साफ कर रही थी जो हर मर्द की लालसा थी।

सोनू उत्तेजना से कांप रहा था वह डर कर वापस चौकी पर बैठ गया। कुछ देर बाद उसने फिर हिम्मत जुटाई और एक बार फिर दरवाजे पर जाकर उसी दरार पर अपनी आंख लगाने लगा तभी लाली ने दरवाजा खोल दिया सोनू की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई।

सोनू का मुंह खुला का खुला रह गया उसके हाव-भाव को देखकर लाली ने यह अंदाज लगाया की सोनू निश्चय ही उसे देखने के लिए यहां आया था लाली सब कुछ समझ गई पर उसने सोनू को शर्मसार न किया और बोली…..

"सोनू बाबू कुछ चाहिए क्या"

सोनू की जान में जान आई उसने अपना सिर झुका लिया और तेजी से भागते हुए आइसक्रीम के पैकेट की तरफ गया और उसे हाथ में लेकर बोला

"दीदी आइसक्रीम फ्रिज में रखना है पिघल जाएगी।"

लाली ने उसे किचन में रखें फ्रिज को दिखाया और मुस्कुराते हुए कहा " फ्रिज में रख दो मैं 5 मिनट में कपड़े बदल कर आती हूं"

सोनू ने लाली को अपने कमरे में जाते हुए देखा वह लाली के कामुक शरीर से बेहद प्रभावित हुआ था। उसके लंड में अब भी सिहरन कायम थी।

लाली के कमरे का दरवाजा आसानी से बंद नहीं होता था दरअसल कभी इसकी जरूरत भी नहीं पड़ती थी। परंतु आज लाली दरवाजे को बंद करना चाहती थी उसने प्रयास किया परंतु असफल रही।

कमरे के अंदर उसकी पुत्री रीमा सो रही थी। लाली ने दरवाजा सटा दिया और अपने शरीर पर पड़ी नाइटी को उतार कर पूर्ण रूप से नग्न हो गई उसने उसी नाइटी से अपने शरीर को पोछा। उसे सोनू का ध्यान आया क्या वह बाथरूम में उसे नंगा देखने के लिए आया था यह सोच कर उसका तन बदन सिहर उठा।

सोनू चौकी पर बैठे-बैठे लाली के कमरे की तरफ ही देख रहा था वह दोबारा दरवाजे पर जाकर अपनी बेइज्जती करवाने का इच्छुक नहीं था। वह मन मसोसकर अपनी कल्पनाओं में ही लाली को कपड़े बदलते हुए देखने लगा।

उधर लाली अलमारी पर रखे जैतून के तेल के डिब्बे को उठाने गई पर डिब्बा फिसल कर नीचे गिर पड़ा। अंदर हुई आवाज ने सोनू को मौका दे दिया और वह लाली के दरवाजे के करीब आकर अंदर झांकने लगा।

अंदर का दृश्य देखकर सोनू के सारे सपने एक पल में ही पूरे हो गए लाली पूरी तरह नीचे झुकी हुई थी और गिरे हुए जैतून के तेल के डिब्बे को उठा रही थी उसके भरे भरे गोल और गदराये नितंब सोनू की आंखों के ठीक सामने थे। लाली की गांड तो नितंबों ने छुपा ली थी परंतु लाली की बुर बालों के आवरण के पीछे से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी।

बाल उसे पूरी तरह ढकने में असमर्थ थे लाली की बुर् के दोनों होंठ उसकी बुर को सुनहरा आकार दे रहे थे और उन होठों के बीच से लाली का गुलाबी छेद सोनू को आकर्षित कर रहा था।

लाली की नजर अपने दोनों पैरों के बीच से दरवाजे पर पड़ी उसे वहां सोनू के होने का एहसास हुआ लाली तेजी से उठ खड़ी हुई उसने अपनी बुर तो छुपा ली पर अपने मदमस्त यौवन का अद्भुत नजारा सोनू की आंखों के सामने परोस दिया। भरे भरे गोल नितंब पतली कमर और भरा भरा सीना…..आह सोनू सिहर उठा। ऊपर वाले ने लाली को भरपूर जवानी थी जिसका नयन सुख उसका मुंह बोला भाई सोनू उठा रहा था।

लाली और सोनू दोनों उत्तेजना के शिकार हो चले थे अब जब सोनू ने लाली के नग्न शरीर का दर्शन कर लिया था और यह बात लाली जान चुकी थी उसमें सोनू को और उत्तेजित करने की सोची उसने अपना एक पैर बिस्तर पर रखा और अपने हाथों से अपनी जाँघों और पैरों पर जैतून का तेल मलने लगी। लाली यहां भी ना रुकी उसने अपनी चुचियों पर भी तेल मला तथा अपनी जाँघों के अंदरूनी भाग तक अपनी हथेलियों को ले गयी। एक पल के लिए उसके मन में आया की वह अपनी जांघों को फैलाकर अपनी बुर के दर्शन सोनू को करा दे परंतु उसे यह छिछोरापन लगा। बेचारी लाली को क्या पता था उसके खजाने का दर्शन सोनू अब से कुछ देर पहले कर चुका था।

स्वाभाविक रूप से ही आज लाली ने सोनू को भरपूर खुशियां प्रदान कर दी थीं। लाली ने अपने हाथ रोक लिए और अपने कपड़े पहनने शुरू कर दीये। सोनू अपनी लाली दीदी को देखकर भाव विभोर हो चुका था और अपने हाथों से अपने लंड को सहला रहा था।

लाली की नग्न काया पर एक-एक करके वस्त्रों के आवरण चढ़ते गए और उसकी सुंदर लाली दीदी हाल में आने के लिए कदम बढ़ाने लगी सोनू अपनी सांसों को नियंत्रण में किए हुए चौकी पर आकर बैठ गया।

लाली ने बड़ी आत्मीयता से कहा सोनू

"बाबू तुमको बहुत इंतजार करवा दिए"

"सुगना कहां चली गई"

सोनू ने हॉस्पिटल का पूरा वृतांत लाली को सुना दिया लाली और सोनू अब सामान्य हो चले थे उत्तेजना का दौर धीमा पढ़ रहा था। सोनू की सांसें भी अब सामान्य हो रही थीं।

लाली ने झटपट सोनू और अपने लिए लिए खाना निकाला और उसके बगल में बैठ कर खाना खाने लगी।

लाली ने बमुश्किल 1- 2 कौर खाए होंगे तभी उसकी बेटी रीमा रोने लगी हालांकि रीमा अब 2 वर्ष की हो चुकी थी परंतु उसे सुलाते समय लाली को अब भी अपनी चूचियां पकडानी पड़ती थीं। लाली अपना खाना छोड़कर रीमा की तरफ भागी और उसे अपनी चूचियां पिलाकर सुलाने लगी।

लाली को आने में देर हो रही थी उधर खाना ठंडा हो रहा था। सोनू ने आवाज दी

"दीदी खाना ठंडा हो रहा है रीमा को लेकर यहीं आ जाइए"

लाली ने रीमां को गोद में उठाया और अपनी चूचियां पकड़ाये हुए ही लेकर हाल में आ गई उसने अपनी चुचियों को आंचल से ढक रखा था।

लाली सोनू के बगल में बैठ गई और रीमा को सुलाने का प्रयास करने लगी परंतु उसके दोनों ही हाथ रीमा को सुलाने में व्यस्त थे अभी खाना खा पाना उसके बस में न था तभी सोनू ने एक निवाला लाली के मुंह में डालने की कोशिश की…

लाली ने अपना सुंदर मुंह खोला और उस निवाले को स्वीकार कर लिया उसे सोनू पर बेहद प्यार आया कितना अच्छा था सोनू।

सोनू बाबू तुम खाना खा लो मैं रीमा को सुला कर खा लूंगी

दीदी मैं अपने हाथ से खिला देता हूं ना खाना ठंडा हो जाएगा

लाली मुस्कुराने लगी और बोली…

आज अपनी लाली दीदी पर खूब प्यार आ रहा है होली के दिन तो मुझको पकड़ कर अपनी सुगना दीदी से रंग लगवा रहे थे

दीदी पकड़म पकड़ाई में तो आपको भी अच्छा लग रहा था क्या आप गुस्सा थीं ? सोनू ने मासूमियत से पूछा

नहीं पगले अपने सोनू बाबू से कोई गुस्सा होगा क्या तू तो इतना प्यार करता है मुझे। लाली ने उसके गालों को प्यार से चुम लिया।

लाली में इस बार निवाला लेते समय उसकी उंगलियों को चूस लिया था..

सोनू की उंगलियों को लाली के सुंदर होठों का यह स्पर्श बेहद उत्तेजक और आकर्षक लगा वह बार-बार लाली से इसकी उम्मीद करने लगा लाली ने भी उसे निराश ना किया जब भी सोनू उसे खिलाता वह उसकी उंगलियों को चूम लेती कभी अपने होंठों के बीच लेकर चुम ला देती सोनू को लाली का वह स्पर्श सीधा अपने लंड पर प्रतीत हो रहा था जो अब पूरी तरह तन कर खड़ा था और जांघों के बीच उधार बनाए हुए था।

खाना समाप्त होने के पश्चात लाली ने कहा

सोनू बाबू अपने जीजा जी के लुंगी पहनकर आराम कर लो

सोनू ने मन ही मन अपनी तुलना अपने जीजा जी से कर ली और उनकी लुंगी पहनकर हॉल में लगी चौकी पर लेटने की तैयारी करने लगा लाली रीमा को लेकर अंदर अपने कमरे में आ गई।

सोनू बिस्तर पर लेट कर आराम करने लगा तभी उसे बिस्तर के नीचे कुछ गड़ने का एहसास उसने बिस्तर हटाकर देखा वहां पर कुछ पतली पतली किताबें पढ़ी हुई थी सोनू ने उत्सुकता बस किताब अपने हाथ में ले ली परंतु पन्ने पलटते ही उसके होश एक बार फिर उड़ गए।

वह किताब एक सचित्र कामुक कहानियों की पुस्तक की जिसमें देसी विदेशी लड़कियों को अलग-अलग सेक्स मुद्राओं में दिखाया गया था और कई तरीके की उत्तेजक कथाओं के मार्फत कामुक पुरुषों और युवतियों की उत्तेजना जागृत करने का प्रयास किया गया था।

सोनू ने अपने सिरहाने की दिशा बदल दी अब उसके पैर लाली के दरवाजे की तरफ से और वह लेट कर उस किताब को देखने लगा उसका लंड एक बार फिर तन कर खड़ा हो गया।

जैसे-जैसे सोनू के लंड में खून का प्रवाह बढ़ता गया उसका दिमाग शांत होता गया वह पूरी तन्मयता से किताब के अंदर बनी नंगी लड़कियों के अंदर खोता गया परंतु जो नग्नता उन्होंने अब से कुछ देर पहले देखी थी वह उसके दिलो-दिमाग पर चढ़ी हुई थी। फोटो में एक से एक सुंदर लड़कियां थी परंतु सोनू को लाली से ज्यादा कोई भी खूबसूरत नहीं दिखाई पड़ रही थी। परंतु अब अपना कच्छा खिसका कर लंड को सहलाने लगा बल्कि अपनी मुठीयों में भरकर उसे तेजी से आगे पीछे करने लगा। उसे इस बात का आभास न रहा की लाली कभी भी यहां आ सकती है। उत्तेजना के अतिरेक में लूंगी का पतला कपड़ा जाने कब लंड के ऊपर से हट गया।

नियति आज लाली और सोनू के बीच सारी दीवार गिरा देना चाहती थी अचानक लाली को पेशाब करने की इच्छा हुई और वह न चाहते हुए भी उठकर अपने दरवाजे के पास आ गई।

उसके कानों में "लाली दीदी" की कामुक कराह सुनाई पड़ रही थी उसने अपना सर दरवाजे से बाहर कर सोनू को देखा जो बेफिक्र होकर अपने सुकुमार पर सुदृढ़ लंड को मसल रहा था।

लाली की आंखें फटी रह गई अब से कुछ घंटों पहले उत्तेजना का जो खेल खेल उसने सोनू को दिखाया था नियति उसे प्रत्युत्तर में उसी खेल को दिखा रही थी। सोनू अपने लंड को लगातार आगे पीछे कर रहा था और उसके मुख से "लाली दीदी" का नाम धीमे स्वर में आ रहा था। सोनू का लंड नितांत ही कोमल पर बेहद खूबसूरत था लाली के होठों में एक मरोड़ से उत्पन्न हुई वह अपने पति राजेश का लंड तो कई बार चुसती थी परंतु सोनू का लंड चूसने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त था कितना सुंदर था वह बेहद मासूम कोमल और तना हुआ।

एक बार के लिए लाली के मन में इच्छा हुई कि वह अचानक ही कमरे में प्रवेश कर सोनू को रंगे हाथों पकड़ ले परंतु उसने अपने आप को रोक लिया वह भी उत्तेजना में डूब चुकी थी उसकी बुर पनिया गई थी।

सोनू के हाथों की गति बढ़ती गई और अचानक उसने अपनी कमर के नीचे से पीले रंग की पेंटी निकाली जो लाली अब से कुछ घंटों पहले नहाने के पश्चात सुखाने के लिए बाथरूम के सामने रस्सी पर डाली थी।

सोनू के लंड से वीर्य धारा फूट पड़ी और उसने लाली की पेंटी में अपना सारा माल भर लिया। लाली को अब जाकर यह बात समझ में आ रही थी कि सारे पुरुष स्त्रियों की पेंटी में जाने कौन सा रस पाते हैं। राजेश भी पेंटी का दीवाना था और अब यह छोटा सोनू भी उसकी पैंटी पर अपना वीर्य गिरा कर तृप्त हो गया था।

सोनू फटाफट बिस्तर से उठा और वह पेंटिं मोड़ कर खूंटी पर टंगे अपने पैंट की जेब में डाल ली और बिस्तर पर आ कर वापस लेट गया।

लाली ने दरवाजा खोला और हाल में प्रवेश कर गयी सोनू आंखें बंद कर लेटा हुआ था।

लाली बाथरूम गई और वापस आ गई तथा किचन में चाय बनाने लगी इसी दौरान जब सोनू बाथरूम गया तो लाली ने अपनी पेंटी उसकी जेब से निकालकर छुपा ली।

तभी दरवाजे पर घंटी बजी और लाली ने पुकारा

कौन है

दरवाजे पर राजेश खड़ा था….

सोनू ने राजेश की आवाज पहचान ली…

वह थोड़ा घबराया और आनन-फानन में जल्दी से हाल में आया।

उसने राजेश के चरण छुए और तभी उसकी निगाह चौकी पर रखी उस गंदी किताब पर गई उसने राजेश की नजर बचाकर उसे उसकी ही लूंगी से ढक दिया और राजेश के अंदर जाते ही उसे वापस उसी जगह पर रख दिया जहां से उसने वह किताब ली थी।

सोनू यथाशीघ्र वहां से निकल जाना चाहता था।

अब तक लाली चाय बना चुकी थी। चाय पीने के पश्चात सोनू ने लाली और राजेश से विदा ली और बाहर आने के बाद अपने पैंट की जेब चेक की जिसमें उसने अपनी लाली दीदी की चूत का आवरण अपने वीर्य से भिगोकर रखा हुआ था।

अपनी जेब पर हाथ जाते हैं वह सन्न रह गया जेब से पैंटी गायब थी वह घबरा गया वह पेंटी किसने निकाली? क्या लाली दीजिए ने? क्या उन्होंने उसे हस्तमैथुन करते हुए देख लिया?

हे भगवान यह क्या हो गया वह अपने मन में अफसोस और उत्तेजना लिए हॉस्टल की तरफ चलता जा रहा था.

उधर सुगना अपनी जांघों के बीच उत्तेजना लिए और अपने बाबूजी सरयू सिंह को खुश करने के लिए दूध और दवाइयां लेकर उनके कमरे में पहुंच गई राजेश और लाली से मिलने के पश्चात वह रह-रहकर कामूक ख्यालों में हो जाया करती थी।

"बाबूजी ली दूध पी ली"

सुगना ने अपनी मधुर आवाज में पुकारा परंतु सरयू सिह सो गए थे। शायद हॉस्पिटल में भी जा रहे दवाओं की वजह से वह थोड़ा सुस्त हो गये थे। अब से कुछ ही देर पहले अपना तना हुआ लंड लिए सुगना का इंतजार कर रहे थे पर अब उनके चेहरे पर सुकून भरी नींद थी।

सुगना ने अपनी उत्तेजना पर नियंत्रण कर लिया और सरयू सिंह के माथे को सहलाते हुए उन्हें उठाया दवाइयां खिलाई और दूध पिलाया।

वह कजरी का आग्रह पूरा न कर पाई । सरयू सिह की स्थिति उसकी जांघों के बीच रिस रहा शहद चाटने लायक न थी। सुगना ने पूरी आत्मीयता से उनके पैर दबाये और वो पुनः एक सुखद नींद सो गए।

अगले दिन सुगना की मां पदमा, सुगना की दोनों छोटी बहनों सोनी और मोनी के साथ सरयू सिंह के घर पर आ गई उनका यह आना अकस्मात न था। निश्चय ही वह सरयू सिंह को देखने के लिए यहां आई थीं।

सोनी और मोनी युवावस्था की दहलीज पर खड़ी थीं। प्रकृति के गूढ़ रहस्य उन्हें पता चल चुके थे। जांघो के बीच की दिव्य चीज का ज्ञान उन्हें ही चुका था और उसकी उपयोगिता भी यह अलग बात थी कि उन्होंने उसका उपयोग आज तक न किया था। भगवान ने उन्हें सुंदरता उसी प्रकार दी थी जैसे सुगना और पद्मा को। ऐसा प्रतीत होता था जैसे पदमा की फैक्ट्री से निकलने वाली कलाकृतियों का में कामुकता का सृजन नियति ने विशेष प्रयोजन के लिए किया था।

सुगना पुत्र सूरज को देखते ही सोनी ने उसे अपनी गोद में ले लिया सूरज वैसे भी बहुत प्यारा बच्चा था। सोनी जैसी सुंदरी की गोद में जाकर वह और भी खिल गया सोनी भी बड़ी आत्मीयता से उसे अपने सीने से लगाए हुए थी।

सूरज करते हुए अपने छोटे पैर सोनी के पेट पर मार रहा था तथा वह सोनी के हाथों पर बैठकर सोनी के सानिध्य का आनंद ले रहा था तभी सोनी का ध्यान सूरज के दाहिने अंगूठे पर गया उस अंगूठे पर नाखून लगभग नहीं के बराबर था और नाखून की जगह एक गुलगुला सा उभरा हुआ भाग था वह स्वता ही ध्यान आकर्षित कर रहा था।

सोनी उस विलक्षण अंगूठे को देखकर खुद को रोक न पाए और उसे अपने अंगूठे और तर्जनी से कौतूहल वश सहलाने लगी...

अचानक सोनी को अपनी चूँचियों पर कुछ गड़ने का एहसास हुआ। उसने सूरज को तुरंत अपने दोनों हाथों में उठाया और सुगना से बोला…

दीदी लगता है बाबू पेशाब करेगा

तो करा देना..

सोनी ने सूरज का कच्छा उतारा और अपने हाथों का सहारा देख कर उसे सु सु कराने लगी…

सूरज की मुन्नी तन गई थी पर वह सुसु नही कर रहा था..

अंत में सोनी ने परेशान होकर उसका कच्छा ऊपर किया और उसे सुगना की गोद में देकर सरयू सिह के पास चली गयी जहां उसकी माँ पद्मा घूंघट ओढ़े हुए बैठी हुई थी…

नियति आंगन में बैठी हुयी सोनी और सूरज को निहार रही थी सोनी ने सूरज के जिस अंगूठे को सहलाया था वह नियति ने किसी विशेष प्रयोजन के लिए बनाया था जिसे सोनी ने अनजाने में छू दिया था… नियति मुस्कुरा रही थी सोनी ने अनजाने में ही गलत उतार छेड़ दिया था जिस की सरगम उसे सुनाई पड़नी थी...



शेष अगले भाग में….
 
स्पेशल अपडेट।

आखिरकार सोनू ने लाली के साथ संभोग कर लिया वह बेहद रसप्रद और रोमांचक रहा। उधर सरयू सिंह भी सुगना के अगले अपडेट की प्रतीक्षा में लगे थे।

उम्मीद है पाठकों को यह स्पेशल अपडेट पसंद आया होगा जो आपकी प्रतिक्रियाओं के अनुरूप हैं।

आप सब की चार लाइन की लाइन की प्रतिक्रियाएं ही कहानी को लिखने की प्रेरणा देती है। जितनी संवेदना से आप अपने कमेंट देते हैं उसी संवेदना से कहानी लिखने वाला कहानी लिखता है ताली दोनों हाथ से बजती है ....

मुस्कुराते रहिए और स्वस्थ रहें एवं कामोत्तेजना को जागृत किए रहिए जीवन का यह अभिन्न अंग है इस का आनंद लीजिए।

अगला अपडेट शीघ्र आएगा...
 
उधर लाली के घर में

राजेश के आने के कुछ ही देर बाद सोनू घर से चला गया राजेश को यह बात समझ में ना आए कि जाने की इतनी जल्दी क्यों परंतु उसने ज़िद न की. लाली ने सरयू सिंह की स्थिति और सुगना के वापस जाने की खबर राजेश को सुना दी। राजेश दुखी हो गया वह आज फिर सुगना के कोमल और कामुक शरीर को देखने और अपने मन में उसके करीब आने के लिए कई प्रकार से योजना बना रहा था परंतु उसके सारे अरमान धूमिल हो रहे थे वह उदास हो गया और चौकी पर लेट कर अपनी आंखें बंद किए सोचने लगा।

तभी लाली अपने कमरे में गई और रात में सुगना के शरीर से उतारी हुई पेंटी को लेकर आयी और राजेश के चेहरे पर रख दिया.

राजेश ने अपनी आंखें खोली और उस खूबसूरत पेंटी को देख कर लाली से कहा..

"इसे हटाओ अभी मन नहीं है"

राजेश ने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई उसके जवाब में बेरुखी थी।

लाली ने कहा अरे आपकी साली साहिबा के शरीर से उतरी है अभी उसकी जांघों के बीच की खुशबू वैसे ही होगी"

राजेश के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी उसने उस पेंटी को लिया और अपने बड़े-बड़े नथुनों से सुगना की बुर की खुशबू लेने की कोशिश करने लगा। सच वह खुशबू अलग ही थी वह उसमें खो गया और पेंटिं के उस भाग को चूमने लगा जो अब से कुछ घंटे पहले सुगना की बुर को चूम रही थी।

राजेश में उत्तेजना भर गई वह खुश हो गया और उठकर लाली को आलिंगन में ले लिया तभी लाली ने दूसरा बम फोड़ दिया उसने वह दूसरी पेंटी भी राजेश के हाथों में थमा दी जिसमें अब से कुछ देर पहले सोनू ने अपना हस्तमैथुन कर अपना वीर्य उस पेंटिं में भर दिया था। पेंटी अब भी गीली थी।

राजेश ने पूछा

"अब यह क्या है?"

लाली ने उसके सीने पर सर रख दिया और बोली

"यह आपके साले साहब की करतूत है"

राजेश को बात समझते देर न लगी उसने लाली को तुरंत ही अपनी गोद में उठा लिया और अपने कमरे में ले आया. राजेश को आज एक साथ दो दो सरप्राइज मिले थे। सोनू में उसके ही घर में आज उसकी ही पत्नी की पेंटिं में अपना वीर्य स्खलन किया था निश्चय ही सोनू की कल्पना में लाली का ही स्थान रहा होगा यह सोचकर राजेश बेहद खुश हो गया।

उसने फटाफट लाली को नग्न करने की कोशिश की तभी लाली ने लाल झंडी दिखा दी वह अब भी रजस्वला थी। राजेश एक बार फिर दुखी हो गया लाली ने तुरंत ही उसके लंड को अपने हाथ में लिया और सुगना की बातें करते हुए सहलाने लगी। कुछ ही देर में राजेश का लंड लाली के हाथों में अठखेलियां करने लगा राजेश ने पूछा…

"क्या सुगना ने अपनी पैंटी जानबूझकर छोड़ी थी?" राजेश ने बेहद उम्मीद और उत्सुकता से लाली से पूछा

"पता नहीं पर आपके जाने के बाद मैं और सुगना एक दूसरे के आलिंगन में आ रहे थे तभी मैंने उसकी पैंटी उतार दी थी"

राजेश बेहद उत्तेजित हो गया काश उस बिस्तर पर लाली और सुगना के साथ वह भी उपस्थित होता उसके मन में तरह तरह की कल्पनाएं जवान होने लगी वह मन ही मन अपने ख्वाबों में लाली और सुगना को एक साथ देखने लगा.

अचानक राजेश को सोनू का ध्यान आया उसने लाली से पूरा विवरण सुनना चाहा जिसे लाली ने चटखारे ले लेकर बताया।

राजेश का वीर्य स्खलन प्रारंभ होते ही लाली ने वही पेंटी राजेश के लंड पर रख दी जिस पर कुछ देर पहले उसके भाई सोनू ने अपना वीर्य भरा था।

राजेश यह देखकर और भी उत्तेजित हो गया और पूरी गति से अपना वीर्य लाली की पेंटी में भरने लगा। लाली मन ही मन मोनू और राजेश का वीर्य अपनी पेंटी पर गिरते हुए देख रही थी और उसे अपनी बुर की गहराइयों में महसूस कर रही थी उसके मन में भी सपने जवान हो रहे थे।

नियति राजेश और लाली को एक अलग किस्म की उत्तेजना और कल्पनाएं दे रही थी जो सुगना और सोनू के बिना संभव नहीं था परंतु यह कार्य नियत ने स्वयं संभाल रखा था सोनू अपने आज के दिन को याद करते हुए हॉस्टल में बिस्तर पर लेटा अपने लंड को सहला रहा था। लाली की गोरी और गदराई जांघों के बीच उसने जिस पवित्र गुफा के दर्शन किए थे वह उसे चूमना और चोदना चाहता था यह भूल कर भी कि उस गुफा पर राजेश का वीर्य न जाने कितनी बार गिरा होगा। उसे लाली आज भी उतनी ही पवित्र लगती थी जितनी उसने अपने बचपन से देखी थी।

लाली के सीने से सटते हुए उसे कई वर्ष हो गए परंतु आज के बाद वह लाली के गले किस प्रकार लगेगा यह सोचकर ही उसका लंड फिर स्खलन के लिए तैयार हो रहा था।

इधर सरयू सिंह के घर पर सोनी की उत्सुकता कायम थी

दोपहर में सुगना ने सोनी से कहा "सूरज बाबू को तेल लगा कर नहला दो"

तभी दालान में सुगना आ गयी। सोनी के होंठो पर तेल देखकर उसने पूछा…

"होंठ में तेल काहे लगवले बाड़े?"

सोनी ने सुगना को सारी बात बताने की कोसिश की पर सुगना के कहा..

" अच्छा एक बार फेर करके देखा त"

सुगना ने मुस्कुराते हुए कहा…

"लागाता हमार सोनी अब जवान हो गईल बिया जल्दी ब्याह करावे के परी। दिने में सपनात बिया"

सोनी भगवान को शुक्रिया अदा कर रही थी कि उसने सुगना को आधी ही बताई थी कि सूरज केअंगूठे को सहलाने पर उसकी नुंनी आश्चर्यजनक रूप से बढ़ती है। जब तक वह यह बात बता पाती कि होठों से छूने पर नुंनी का आकार वापस हो जाता है इसके पहले ही सुगना ने उसे करके दिखाने के लिए कह दिया था।

सोनी उधेड़बुन में थी परंतु उसे नुंनी के बढ़ने और घटने दोनों का राज पता था। सोनी ने मन ही मन इस बात को अपनी बहन मोनी से साझा करने की सोची।उसमें अपनी बहन मोनी को आवाज दी परंतु वह बाहर नहीं थी। सोनी सुगना की बात को याद कर थोड़ा उत्तेजित हो चुकी थी विवाह की बात सुनकर उसकी जांघों के बीच एक अजब किस्म की हलचल हो रही थी जिसे सिर्फ और सिर्फ सोनी ही समझ सकतीथी या फिर हमारे प्रबुद्ध पाठक गण।

उधर सरयू सिह ट्यूबवेल में पड़ी चारपाई पर लेते हुए सुगना को याद कर रहे थे वह अपनी पूरी की यादों में खोए हुए थे जब उनके लंड को सुगना के होंठों का स्पर्श प्राप्त हुआ था। एक बार सुगना को जी भर चोदने के बाद पुरी के होटल में वह अपनी भौजी कजरी और सुगना के साथ बिस्तर पर लेटे हुए थे।

सुगना अब भी पूरी तरह नंगी बीच में लेटी हुई थी। उसने अपनी पीठ पलंग के सिरहाने टिका रखी थी वह किसी छोटी महारानी की तरह प्रतीत हो रही थी और हो भी क्यों ना वह अपने बाबूजी और सासू मां की चहेती थी और उन दोनों की अधूरी मनोकामनाएं पूर्ण कर रही थी सुगना के प्रति कजरी के मन में आई वासना बिल्कुल नयी थी कजरी तो सुगना की मासूमियत और उसके अंग प्रत्यंग ओं की कोमलता पर मोहित हो गई थी सच कितनी कोमल थी सुगना की बुर।


कजरी ने जब उसकी बुर पर अपने होंठ फिराए थे उसे अपनी जीभ ज्यादा कठोर महसूस हो रही थी सुगना का मालपुआ अद्भुत था। सरयू सिंह और कजरी दोनों उसके कोमल जिस्म को अपने हाथों और जांघों से सहला रहे थे। सुगना की तेज चल रही सांसे अब सामान्य हो चली थीं।

तभी कजरी की नजर दीवाल पर टंगी घड़ी पर गई रात के 12:00 बज चुके थे। उसने कहा..

"आज त सुगना बाबू के चुमत चाटत 12:00 बज गइल"

सुगना ने मुस्कुराते हुए कहा…

"हां चली सुत जाईल जाउ राउर कुँवर जी अब थाक गईल बाड़े"

सरयू सिंह को सुगना का यह वाक्य उत्तेजित करने वाला लगा। उनके सोए हुए लंड में हरकत हुई परंतु वह तुरंत खड़ा हो पाने की स्थिति में नहीं था। अब से कुछ देर पहले ही उसने अपनी प्यारी ओखलीओं में जी भर कर अदृश्य चटनी कुटी थी जिसका रस छलक छलक कर दोनों ओखलियों से बह रहा था।

सुगना की बात सुनकर उन्होंने जल्दी बाजी में सुगना की चुचियां अपने मुंह में भर लीं और अपनी उत्तेजना को जागृत करने का प्रयास करने लगे पर अनायास ही उनके ही वीर्य का स्वाद उनके मुंह में आने लगा।

कजरी ने अपने कुंवर जी की मदद करने की सोची और उठ कर उनके जादुई लंड को अपने हाथों से सहलाने लगी। उधर सरयू सिंह सुगना की चूचियों से उर्जा लेकर अपने लंड में उत्तेजना भर रहे थे।

कजरी के सधे हुए हाथ प्रेम रस से लथपथ मुसल को खड़ा करने में लगे हुए थे। कजरी ने अब अपने होठों को भी मैदान में उतार दिया।

कमरे की मद्धम रोशनी में सुगना ने अपनी सास कजरी को कुछ नया करते हुए देख लिया। कजरी लंड के सुपाडे को मुंह में भरकर चूस रही थी।

सुगना यह देखकर आश्चर्यचकित थी। उसकी आंखें कजरी के होठों पर टिक गई। उसे दीपावली की वह रात याद आई जब उसके बाबूजी ने उसकी कोमल और प्यारी कुँवारी बुर को जी भर कर चूमा और चाटा था।

कजरी ने अकस्मात सुगना की तरफ देखा और उनकी आंखें चार हो गई कजरी ने सुगना के मनोभाव पढ़ लिए थे उसने मुस्कुराते हुए कहा

"ए सुगना तनि इकरा में ताकत भर द हम आव तानि"

कजरी बिस्तर से उठी और अपने नंगे चूतड़ मटकाती हुई बाथरूम की तरफ चल पड़ी। सरयू सिंह सुगना की चूँचियों को छोड़ चुके थे और बड़ी बेसब्री से अपनी प्यारी बहू सुगना के होठों का इंतजार अपने लंड पर कर रहे थे। सुगना मन में कई भाव लिए सरयू सिंह के लंड की तरफ बढ़ गई उसने अपने कोमल हाथों से उसे छूआ और लंड एक ही झटके में तन कर खड़ा हो गया।

जैसे जैसे वह अपने कोमल हाथ उस लंड पर फिराती गई वह तनता चला गया। सुगना ने अपने बाबूजी की तरफ देखा जो अपनी पलकों को लगभग मूंदे हुए उसे निहार रहे थे।

सुगना के हाथ चिपचिपे हो चले थे ऐसा लग रहा था जैसे सरयू सिंह ने अपना लंड मक्खन में घुसा कर बाहर निकाला हो। सुगना ने अपने छोटे होठों को गोल किया और लंड के सुपाड़े को चूम लिया। वह कुछ समय पहले अपनी सास कजरी से यह ज्ञान प्राप्त कर चुकी थी और कुछ ही देर में उसने लंड का सुपाड़ा अपने मुंह में लेकर लेमनचूस की तरह चुभालाने लगी। अपना और अपने बाबूजी का प्रेम रस पहले भी चख चुकी थी परंतु आज उसमें कजरी का भी अंश शामिल था।

उसके मुलायम हाथ लंड की जड़ तक जा रहे थे तथा अंडकोशों को सहला रहे थे। नियति ने उसे यह शिक्षा जाने कब प्रदान कर दी थी की लंड की जान अंडकोष में बसती है। उसे गर्भाधान कराने वाला लंड एक निमित्त मात्र है जबकि असली बीज उत्पादन में वह दोनों उपेक्षित अंडकोष ही लगे हुए हैं।

सुगना के होंठ गति पकड़ते गए। सुगना जब-जब लंड को अपने मुंह में गले तक लेती सरयू सिंह के मुंह से आह… निकल जाती सुगना अपनी आंखें तिरछी कर उन्हें देखती और उनके चेहरे का सुकून देख उसे और प्रेरणा मिलती।

सुगना अपने हाथों से लंड की चमड़ी को ऊपर कर सुपाड़े को उसके अंदर करने का प्रयास करती परंतु जब तक वह सफल होती तब तक बाहरी चमड़ी छलक कर वापस अपनी जगह पर पहुंच जाती और लंड का चमकदार सुपाड़ा एक बार फिर उसे आकर्षित करने लगता वह उसे कभी चूमती कभी अपने मुंह में भर लेती सुगना को भगवान ने एक अद्भुत खिलौना दे दिया था जिससे वह आज मन लगाकर खेल रही थी।

सुगना का छोटा सा मुंह सरयू सिंह के लड्डू नुमा सुपाडे से पूरी तरह भर जाता। जब वह उसके गर्दन से टकराता सुगना गूँ...गूँ ... की आवाज निकालने लगती और तुरंत ही अपना मुंह पीछे कर लेती। सरयू सिंह कभी उसके बालों को सहलाते और उसके चेहरे को दबाकर उसे लंड का और भी ज्यादा भाग मुंह में लेने को प्रेरित करते। बीच बीच मे वह उसके चूतड़ों पर हाथ फेर रहे थे जो इस समय उनके सीने के ठीक बगल में थे। सुगना के गोल नितंबों के बीच उसकी चूत का फूला हुआ छेद बेहद आकर्षक लग रहा था परंतु वह सरयू सिंह की जिह्वा से बहुत दूर था।

अपने बाबू जी का हाथ अपने चूतड़ों पर महसूस कर सुगना और गर्म हो गई। सरजू सिंह कभी-कभी अपनी मध्यमा उंगली को सुगना की बुर के बीच घुमा देते। सुगना की कमर थिरक उठती।

कजरी अब बाथरूम से बाहर आ चुकी थी और उसने कमरे की लाइट अचानक ही जला दी। सुगना के मुंह में अपने कुंवर जी का लंड भरा हुआ देखकर कजरी खुश हो गई।

कजरी अपनी चुचियाँ हिलाती हुई बिस्तर पर आ गई और अपनी बहू सुगना का साथ देने लगी सरयू सिंह अपने लंड की किस्मत पर नाज कर रहे थे जिसे उनकी दोनों प्रेमिकाये मुखमैथुन देने को आतुर थीं।

अचानक कजरी को अपनी बहु सुगना की कोमल बुर याद आ गई वह कुंवर जी के लंड को अकेला छोड़ कर सुगना की जांघों के बीच आ गई और अपने प्यारे मालपुए से रस खींचने का प्रयास करने लगी। जितना आनंद सुगना अपने बाबूजी के लंड में भर रही थी उसकी सास कजरी उसकी बुर में उतनी ही उत्तेजना।

कजरी की जीभ के कमाल से सुगना को ऐसा लगा जैसे वह स्खलित हो जाएगी….

उसने कहा…

"सासु माँ……" कजरी ने अपना सिर उसकी जांघों के बीच से बाहर निकाला..

"अब छोड़ दीं ... हमारा हउ चाहीं…" सुगना ने शरमाते हुए अपने बाबूजी के लंड को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर चूम लिया।

सरयू सिंह भी उत्तेजना के अतिरेक पर थे उन्होंने और देर नहीं की उन्होंने सुगना को अपने दोनों हाथों से उठा लिया। जब तक सरयू सिंह सुगना को बिस्तर पर लिटा पाते कजरी सुगना के ठीक नीचे आ गयी।

सरयू सिंह ने अपनी गोद में ही सुगना को पलटा दिया और उसे पेट के बल कजरी के ऊपर ही सुला दिया।

कितना मोहक दृश्य था पीठ के बल लेटी हुई कजरी अपनी प्यारी बहू को अपने ऊपर लिटाये हुए थी। कजरी और सुगना की जांघें एक दूसरे से सटी हुई स्वता ही अपना आकार ले रही थीं। सुगना की उभरती हुई चूचियां अपनी सास कजरी की चूचियों के बीच जगह बनाने का प्रयास कर रही थीं। कजरी और सुगना के ऊपरी होंठ एक दूसरे में समा गए थे। वासना का यह रूप उन दोनों के लिए नया था। उनकी कमर निचले होठों को भी सटाने का भरपूर प्रयास कर रही थी पर यह संभव नहीं हो पा रहा था। सरयू सिंह अपनी भौजी और सुगना बाबू की चूत एक साथ देख कर मदमस्त हो गए थे।

सरयू सिंह का लंड सुगना के गोल नितंबों के बीच विचरण कर रहा था वह कभी कजरी की बुर को चुमता कभी सुगना की। सरयू सिंह को अपनी प्यारी सुगना की गुदांज गांड के दर्शन हो गए। सरयू सिह का लंड फटने को हुआ उन्होंने देर न की और कजरी की बुर में अपना लंड जड़ तक ठान्स दिया। कजरी चिहुंक उठी उसने सुगना के होंठ काट लिये…

सुगना ने कराहते हुए कहा…

"सासु माँ, तनि धीरे से ….दुखाता…"

सुगना के मुंह से निकली यह कराह सरयू सिंह की उत्तेजना को आसमान पर पहुंचा देती थी उन्होंने अपना लंड कजरी की बुर के मुहाने तक लाया और उसे वापस कजरी की बुर में पूरी ताकत से डालने लगे परंतु उनका लंड कुछ ज्यादा ही बाहर आ गया था। वह कजरी की बुर से छटक कर सुगना की कोमल बुर में प्रवेश कर गया। उन्होंने अपनी कमर का दबाव कजरी के हिसाब से लगाया था जिसका सामना कोमल सुगना को करना पड़ गया। लंड एक ही बार मे उसकी नाभि को चूमने लगा। सुगना सिहर उठी….और एक बार फिर कराह उठी…

"बाबूजी….तनि धीरे से….दुखाता"

सुगना की पुकार सुनकर सरयू सिंह उसे और जोर जोर से चोदने लगे बीच-बीच में वह अपने लंड को कजरी की बुर में घुसा देते तथा सुगना की कोमल बुर पर अपनी उंगलियां फिराते रहते।

सरयू सिंह की चुदाई की रफ्तार देखकर कजरी समझ गई की सरयू सिंह इस दोहरे मजे में जल्दी ही स्खलित हो जाएंगे वह किसी भी हाल में अपनी बहू सुगना को गर्भवती करना चाहती थी। उसने कहा…

"रुक जायीं सुगना के नीचे आवे दी हम थक गईनी"

सरयू सिंह रुकते रुकते भी सुगना को चोदे जा रहे थे वह अपना लंड निकालने के मूड में बिल्कुल नहीं थी परंतु सुगना अब कजरी के ऊपर से उठकर नीचे बिस्तर पर पीठ के बल लेट रही थी। सरयू सिंह का लंड उस कोमल बुर से बाहर आकर थिरक रहा था। कजरी आज उसकी चमक देखकर बेहद खुश हो रही थी उधर सुगना की बुर पूरी तरह फूल चुकी थी।

सरयू सिंह सुगना की जांघों के बीच आ गए और उसके दोनों पैरों को अपने कंधे पर रखकर गचागच चोदने लगे आज वह एक नवयुवक की तरह बर्ताव कर रहे थे। कजरी सुगना की चुचियों को चूमने लगी वह धीरे-धीरे उसके सपाट पेट को चूमती हुई बुर की तरफ जा रही थी सुगना सिहर उठी।

क्या सासू मां उसकी चुद रही बुर को चूमेंगी?

कितना कामुक अनुभव होगा? वह अपनी भग्नासा पर कजरी की जीभ का इंतजार करने लगी. कजरी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी पर सुगना से अब और बर्दाश्त ना हुआ उसने अपनी हथेलियों से कजरी के सिर को अपनी बुर की तरफ धकेला कजरी प्रसन्न हो गई और उसने सुगना का कोमल भग्नासा चूम लिया।

सुगना तड़प उठी…

"आईई। मा…...असही…. आह आआआ ईईईई "

वह सिसकारियां लेने लगी. उसे आज जैसी उत्तेजना कभी अनुभव नहीं हुई थी उसने अपने पैर अपने बाबूजी के कंधे से उतार लिए और अपने हाथों से पैरों को पकड़ कर पूरी तरह फैला लिया।

कजरी लगातार उसकी भग्नासा को चुमें जा रही थी बीच-बीच में उसकी जीभ सरयू सिंह के लंड से भी टकराती। सरयू सिंह सुगना को बेतहाशा चोदे जा रहे थे आज पहली बार वह सुगना को चूम नहीं पा रहे थे परंतु उसे जमकर चोद रहे थे उनके मन में आज सुगना वह जींस वाली लड़की थी जिसकी जींस उन्होंने अब से कुछ घंटे पहले अपने हाथों से खोली थी और उसके गोल चूतड़ों को सहलाया था।

सरयू सिंह की कामुक चुदाई से सुगना अभिभूत हो गई उसकी जांघें तन गई और उसकी बुर से प्रेम रस का रिसाव चालू हो गया ऐसा लग रहा था जैसी उसकी कोमल गुफा की हर दीवार से रस छलक छलक कर बह रहा हो.. जब सरयू सिंह का लंड बाहर आता छलका हुआ प्रेम रस उस गुफा में इकट्ठा हो जाता और जैसे ही सरयू सिंह अपना लंड अंदर घुसाते वह बुर् के किनारों से छलक कर बाहर आ जाता जिसे कजरी तुरंत ही आत्मसात कर लेती।

सरयू सिंह ने एक बार फिर अपने लंड को सुगना की नाभि से छुवाने की कोशिश की और स्खलन के लिए तैयार हो गए।

उन्होंने अपना लंड बाहर निकाला और पहली धार कजरी के होठों पर ही मार दी जो अब तक सुगना का ही रस पी रही थी। कजरी ने तुरंत ही अपनी हथेली से लंड पकड़ा और उसे वापस सुगना की बुर में डाल दिया जहां से वह बाहर आया था।

सरयू सिंह को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह एक बार फिर सुगना को झड़ते झड़ते चोदने लगे और उन्होंने सुगना की बुर मलाई से भर दी।

कजरी भी रसपान कर तृप्त हो चुकी थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह मक्खन की हांडी में मुंह मार कर आई हो। सरयू सिंह का लंड निकलने के बाद कजरी ने सुगना के पैर ऊंचे कर दिए वह उसकी बुर में भरे हुए वीर्य को बाहर नहीं निकलने देना चाह रही थी। उसकी चूत रूपी दिये में उसके बाबूजी का तेल रूपी वीर्य लबालब भरा हुआ था जिसे कजरी और सुगना मिलकर छलकने से रोक रहे थे।

सरयू सिंह और सुगना दोनों ही इस उत्तेजक संभोग से हाफ रहे थे परंतु सुगना अपने पैर ऊंचे किए गर्भवती होने का प्रयास कर रही थी। उधर सरयू सिंह उसके इस प्रयास पर सुगना को इंजेक्शन दिलाने का अफसोस कर रहे थे।

सरयू सिंह ने कहा

"अरे सुगना बाबू के खुश रहे द गाभिन त उ कभियो हो जायीं।"

सुगना और कजरी अब मुस्कुराने लगे और सरयू सिंह भी।

कजरी ने भी मुस्कुराते हुए कहा

"हां अब ई सब में एकरो मन लागता"

सुगना का चेहरा शर्म से लाल हो गया उसने कुछ बोला नहीं पर शर्म से अपनी आंखें बंद कर ली उसका यह रूप बेहद मोहक था।

सरयू सिंह और कजरी दोनों सुगना के करीब आ गए। किसने किसको किस तरह चुम्मा यह बताना कठिन था पर कजरी के होठों पर लगा मक्खन तीनों प्रेमियों के होंठो से लिपट गया….


शेष अगले भाग में।
 
अरे वाह यह जानकर खुशी हुई की कहानी के दो पाठक अभी भी बचे हैं..
 
जब तक पढ़ने वालों की प्रतिकिया नही आती इन चूतियापा की कहानी लिखने में समय बर्बाद करने कॉ मन नही कर रहा.

फिर भी यदि पढ़ने वाले पढ़ेंगे और अपनी भावनाएं या अच्छा बुरा बताते रहेंगे तो अपडेट आते रहेंगे ..... बाकी लाकडाउन खुल चुका है।
 
सरयू सिंह अपनी पुरी यात्रा की यादों में खोए हुए अपनी बहु सुगना की गर्म चूत को याद कर अपने लंड को सहलाए जा रहे थे और वह उनके शरीर से सारा लहू खींचकर अपना आकार बढ़ा रहा था परंतु उस पर लगाम लगाने वाली सुगना अपने घर पर अपनी मां पदमा और प्यारी बहनों सोनी और मोनी के साथ खोई हुई थी।

मायके के लोगों का साथ पाकर सुगना बेहद खुश थी। सुगना और सरयू सिंह के बीच पिछले तीन-चार वर्षों में आई नज़दीकियों के बारे में पदमा को पता चल चुका था परंतु उसे यह बात नहीं मालूम थी कि कजरी और सुगना दोनों एक साथ सरयू सिंह के सानिध्य का आनंद उठा चुकी हैं।

अब पदमा को सरयू सिंह और सुगना के बीच चल रहे संबंधों से कोई आपत्ति नहीं थी। उसे सुगना की खुशी चाहिए थी जो उसे मिल रही थी।

शाम होते-होते सरयू सिंह वापस दालान में आ गए और खानपान के पश्चात अपनी तीनों प्रेमिकाओं के साथ बैठकर वार्तालाप करने लगे सोनी और मोनी की उपस्थिति ने कामुकता पर विराम लगा दिया था तभी कजरी ने सोनी से कहा..

"सोनी बेटा सूरज बाबू के ले जाकर सुता द"

सोनी और मोनी दोनो सूरज की ओर चल पड़ी

मोनी ने बिस्तर से उठते हुए सोनी से कहा

"जब सोनू बड़ा हो जाएगा क्या तब भी उसका अंगूठा ऐसे ही कार्य करेगा?"

दोनों बहने एक दूसरे की तरफ देख कर मुस्कुरा दी उनकी जांघों के बीच एक अलग से सिहरन उत्पन्न हो रही थी जिसका एहसास सुखद था।

आँगन में बैठी सुगना के चेहरे पर खुशी देखकर पदमा को सारी खुशियां मिल चुकी थी। सरयू सिंह ने पद्मा को उसकी जवानी में उसे कामुक और अद्भुत संभोग का आनंद कई बार दिया था और पदमा ने भी बढ़-चढ़कर उस कामुक प्रेमालाप में सरयू सिंह का साथ दिया था।

आज सरयू सिंह उसकी पुत्री उनके जीवन में खुशियां भर रहे थे। कजरी ने पदमा के सामने ही सुगना को छेड़ दिया….

"ई त कुँवर जी पर कब्जा जमा लेले बिया दिनभर एकरे खातिर बेचैन रहे ले"

पद्मा ने सुगना को छेड़ना उचित नहीं समझा आखिर वह उसकी पुत्री थी और मां बेटी के बीच जो मर्यादा कायम थी वह उसे तार-तार नहीं करना चाहती थी फिर भी कजरी की हां में हां मिलाते हुए उसने कहा..

"हमार सुगना बाबू केहू के दिल जीत ली"

सुगना सूरज को अपना दूध पिलाने चली गई।

सुगना के मन में कल रात की बात याद आ रही थी जब वह अपने मन में कामुकता का अंश लिए अपने बाबूजी को शहद चटाने के लिए निकली परंतु सरयू सिंह दवाइयों की प्रभाव की वजह से शीघ्र सो गए थे

सुगना ने आज मन ही मन सरयू सिंह को खुश करने की ठान ली थी आखिर वह उसका इंतजार पिछले तीन-चार दिनों से कर रहे थे। शायद यह इंतजार पिछले तीन-चार वर्षो में पहली बार उन्हें करना पड़ा था अन्यथा उनके लंड से वीर्य दोहन का कार्य या तो सुगना करती या कजरी।

सुगना उठ कर खड़ी हो गई थी और अपनी भरी हुई चुचियों को ब्लाउज के अंदर बंद कर रही थी तभी पदमा और कजरी दोनों कमरे में आ गयीं।

पदमा को अपनी जवानी के दिन याद आ गए। सुगना की भरी भरी और मदमस्त चूचियाँ देखकर पदमा मन ही मन बेहद प्रसन्न हो गई उसकी पुत्री वास्तव में इतनी खूबसूरत हो गई थी इसका उसे इल्म न था। कजरी की बात सही थी सुगना की भरपूर जवानी किसी भी मर्द को उसके इर्द-गिर्द घूमने पर मजबूर कर सकती थी।

कजरी ने सुगना से कहा

"तोर बाबू जी इंतजार करत बाड़े जो उनका के दूध पिया दे"

पदमा आश्चर्यचकित थी की कजरी ने कितने खुले तरीके से सुगना को सरयू सिंह को अपनी चूचियां पिलाने के लिए कह दिया था।

तभी कजरी में अपना वार्ड के पूरा किया और कहा

"हम गिलास में दूध निकाल देले बानी"

पदमा को अपनी सोच पर शर्म आ गयी वह सुगना की चूँचियों में खोई हुई थी और कजरी की बात सुनकर उसने अपने अनुसार ही मतलब निकाल लिया था।


सुगना ने अपना सिर झुकाया और मुस्कुराते हुए रसोई की तरफ बढ़ चली पदमा सुगना को जाते हुए देख रही थी भगवान ने जितनी सुंदर चूचियां सुगना को दी थी उतने ही सुंदर नितंब भी जो एक ताल में थिरक रहे थे।

सरयू सिंह अविवाहित होकर भी जिस सुख का आनंद ले रहे थे वह विवाहित मर्दो को भी प्राप्त न था।

अपनी कोठरी में लेटे सरयू सिंह अपनी आंखें बंद किये सुगना को ही याद कर रहे थे। उनका लंड खड़ा हो चुका था तभी सुगना आयी और झुक कर बोली …

"बाबूजी दूध पी ली"

अपनी ब्लाउज में कसी भारी चूँचियों को दिखाती हुयी बोली…

सरयू सिंह को एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे सुगना उन्हें अपनी चुचियों से दूध पिलाने जा रही थी परंतु तभी सुगना ने अपने हाथ में लिया गिलास आगे कर दिया सरयू सिंह ने वह गिलास पकड़ा और सुगना द्वारा दिया दूध पीने लगे। सुगना की निगाह सरयू सिंह के लंड पर पड़ गई जो तन कर खड़ा था।

सुगना ने मुस्कुराते हुए पूछा…

"सुते के बेरा में ई काहे खड़ा बाड़े"

सुगना ने उत्सुकता वश सरयू सिंह के लंड को हाथ लगा दिया वैसे भी पिछले दो तीन दिनों में उसने काफी उत्तेजना का सामना किया था। राजेश ने उसके तन बदन में आग लगा दी थी परंतु उसे पता था इसकी शांति उसके बाबू जी के द्वारा ही होनी थी। उसे कजरी की बात याद आई सुगना ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वह आज बाबू जी को तंग नहीं करेगी परंतु….. वह मुस्कुराते हुए उनके दूध खत्म होने का इंतजार करने लगी।

सरयू सिंह का चेहरा शांत था परंतु उनका दाग अप्रत्याशित रूप से कम था सुगना उनके दाग के घटते आकार को देखकर बेहद प्रसन्न थी।

"बाबूजी राउर दाग कितना कम हो गईल बा" सुगना ने पूरी आत्मीयता से कहा

सरयू सिंह को दाग से कोई लेना-देना नहीं था आज वह पूरी तरह वासना के आधीन थे और सुगना को अपनी बाहों में भर लेना चाहते थे वैसे भी सुगना के मायके वालों की उपस्थिति में उसे चोदने का अवसर उन्हें पहली बार प्राप्त हुआ था जाने उन्हें इसमें कौन सा आनंद मिलता यह तो वही समझ सकते थे परंतु आज उनमें उत्तेजना भरपूर थी।

दूध की मलाई उनकी मूछों में लग गई थी ठीक वैसे ही जैसे छोटे बच्चे दूध पीते समय अपने ऊपरी होठों पर दूध का कुछ भाग लगा लेते हैं सुगना उनकी मासूमियत देखकर द्रवित हो गई और उनके गालों को चुमने के लिए अपने होंठ आगे बढ़ाएं तभी शरीर सिंह ने अपना चेहरा घुमा दिया और अपनी प्यारी बहू के होंठों को अपने होंठों में भर कर चूस लिया।

सरयू सिंह की मजबूत बाहों ने सुगना को अपने आगोश में ले लिया और कुछ ही देर में सुगना सरयू सिंह के ऊपर लेट चुकी थी।

सरयू सिंह का लंड सुगना की जांघों के बीच घुसने का प्रयास कर रहा था परंतु उसमें सुगना की साड़ी और पेटीकोट को चीर पाने की हिम्मत न थी।

सरयू सिंह की ठुड्डी सुगना की चुचियों से छू रही थी सरयू सिंह ने सुगना को ऊपर की तरफ खींचा और अपना चेहरा सुगना की गोरी चूचियां पर मलने लगे।

सुगना उनके माथे के दाग को देखती हुई उनके बाल सहला रही थी और उनके माथे पर चुंबन ले रही थी। आज सरयू सिंह पर उसे बेहद प्यार आ रहा था। कैसे आज से कुछ दिनों पहले वह उसे चोदते हुए गिर पड़े थे। कुछ ही पलों के लिए सही परंतु सुगना को अपने अनाथ होने का एहसास हो गया था। उसकी आत्मा कांप उठी थी सरयू सिंह उसके लिए बेहद अहम थे नियति ने उन दोनों के बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया था जिसे सुगना हमेशा उनकी बाहों में रह कर निभाना चाहती थी परंतु वह सरयू सिंह को किसी भी प्रकार से कष्ट में नहीं देखना चाहती थी।


इधर सुगना सरयू सिंह से भावनात्मक रूप से आसक्त हो रही थी उधर सरयू सिह के हाथ सुगना की साड़ी और पेटीकोट को खींचते हुए कमर तक ले आए उसकी गोरी जाघें नग्न हो चुकी थी। जब उनके तने हुए लंड ने सुगना की पनियायी बुर ने को स्पर्श किया तब जाके सुगना सतर्क हुई एक पल के लिए उसने अपनी कमर पीछे कर उस लंड को आत्मसात करने की सोची तभी उसे कजरी द्वारा दी गई नसीहत याद आ गई कि अपना बाबूजी से ज्यादा मेहनत मत करवइह।

सुगना की पनियायी बुर ने लंड के सुपारे को गीला कर दिया था। लंड स्वभाविक रूप से सुगना की मखमली बुर के अंदर प्रवेश कर रहा था परंतु सुगना ने मन मसोसकर अपनी जाघें ऊपर उठा ली सरयू सिंह उसके कोमल नितंबों को हाथ लगा कर अपने लंड की तरफ खींचते रहे परंतु सुगना ने उनके इशारे को नजरअंदाज कर दिया वह बिस्तर से उठ कर खड़ी हो गई।

उसके पेटीकोट और साड़ी ने उसके सुंदर और सुडौल पैरों को फिर से ढक लिया।

सरयू सिंह कातर निगाहों से सुगना की तरफ देख रहे थे उन्होंने बड़े ही प्यार से कहा सुगना बाबू

"धीरे धीरे करब"

सुगना को उन पर बेहद प्यार आया वह उसे चोदने के लिए पूरी तरह आतुर थे उस ने मुस्कुराते हुए कहा..

"बाबू जी पहले ठीक हो जाई फिर हम कहां जा तनि हमरो ओकरे इंतजार बा"

सरयू सिंह को सुगना की बात सुनकर तसल्ली तो हुई परंतु उनका लंड विद्रोह पर उतारू था वह पहले भी सुगना की बुर की खुशबू पाकर बेचैन हो जाता था उसे संवेदनाएं और भावनाओं से कोई सरोकार नहीं था और आज तो उसने सुगना की बुर चूम ली थी और उसके रस से भीगा हुआ उसी के इंतजार में खड़ा था।

सरयू सिंह ने सुगना की तरफ देखा और फिर अपने लंड की ओर देखते हुए फिर कहा…

" सुगाना बाबू, इहो दु-तीन दिन से तोहरे इंतजार करा ता एकरा के कइसे समझाईं"

सुगना मुस्कुराई और बड़े ही प्यार से बोली

"इकरा के हम समझा दे तानी रहुआ खाली आंख बंद करके सुतल रही"

सरयू सिंह ने छोटे बच्चे की तरह अपनी आंखें बंद कर लीं पर शरारत वस अपनी पलकों के बीच से वह अपने तने हुए लंड को देख रहे तभी सुगना का प्यारा चेहरा उनकी आंखों के सामने आया और उनके लंड का चमकता हुआ सुपाड़ा सुगना के कोमल होंठों के बीच खो गया। जीभ का स्पर्श सुपाड़े के पिछले भाग पर लगते हैं ही लंड ने उछाल मारी और एक पल के लिए वह सुगना के मुख से बाहर आने लगा। सुगना ने अपनी कोमल हथेलियां उस लंड को वश में करने के लिए उतार दी और उसे वापस अपने मुह में अंदर कर दिया वह लॉलीपॉप की तरह अपने बाबूजी का लंड चूसने लगी।


उसकी स्वयं की बुर पूरी तरह पनीयाई हुई थी और लंड का इंतजार कर रही थी। सरयू सिंह के हाथ सुगना के नितंबों को सहलाने लगे और सुगना के नितंब धीरे-धीरे उनके सीने के करीब आने लगे। सरजू संघ ने सुगना के गोल नितंबों को अनावृत कर दिया और उनके मखमली स्पर्श का आनंद लेने लगे।

उधर सुगना अपनी पूरी कार्यकुशलता से सरयू सिह के लंड को चूस कर उन्हें आनंद देने की भरपूर प्रयास कर रही थी। उसने अब इस कला में पर्याप्त दक्षता हासिल करली थी।

सरयू सिंह उत्तेजना में पागल हो रहे थे उन्होंने सुगना के बाएं पैर को उठाया और उसे अपने सीने के दूसरी तरफ ले आए सुगना कि दोनों नितंबों उनके चेहरे के ठीक सामने थे और उसके बीच में उनकी प्यारी बहू सुगना का वह अपवित्र द्वार ( गुदाजं गांड) सरयू सिंह को आज भी पुकार रही थी.

सरयू सिंह ने सुगना के नितंबों को अपनी ओर खींचा और उनकी लंबी जीभ ने सुगना की बुर को छू लिया।

सुगना की बुर प्रेम रस से लबालब भरी हुई थी जीभ का स्पर्श पाते ही प्रेम रस को बहने का रास्ता मिल गया और वह सर्विसिंग के मुख में प्रवेश करने लगा। सरयु सिह अपनी प्यारी बहु सुगना की गुफा से निकलने वाले शहद का रसपान करने लगे उनकी नाक बार-बार सुगना की गोरी और प्यारी गांड से टकरा रही थी।

वासना के आधीन सरयू सिंह उस अपवित्र द्वार को ही स्वर्ग का द्वार समझ रहे थे उन्होंने जाने कितनी बार सुगना से उस द्वारा को भेदने की अनुमति मांगी थी परंतु सुगना ने हर बार बहाना कर दिया था।


आज एक बार फिर उन्हें सुगना से कहा बेहद आत्मीयता से कहा

"सुगना बाबु हम कितना दिन जीयब हमरा मालूम नइखे लेकिन लागता हमार ई इच्छा अधूरा रह जायी।"

सुखना ने शरयू सिंह के लंड को अपने मुंह से बाहर निकाला परंतु अपने हाथों से उसे सहलाते हुए बोली


"आइसन अशुभ बात मत बोलीं रउआ ठीक हो जायीं अबकी हाली हम खुद ही परोस देब"

सरयू सिंह की खुशी दुगनी हो गई। अपनी बहू की चूत को चाट कर वह पहले ही आनंद में आ चुके थे और सुगना का यह आश्वासन उनके तन बदन में आग लगा चुका था उन्होंने सुगना की बुर को अपने होंठों के बीच भर लिया और एक झटके में उसकी रस से भरी गगरी खाली करने का प्रयास करने लगे। तथा अपनी नाक से उसकी सुनहरी गांड पर प्रहार करने लगे सुगमा उत्तेजना में हिलोरें ले रही थी ।

सुगना अपनी बुर को उनके चेहरे पर रगड़ रही थी उसकी उत्तेजना अब चरम पर थी और वह स्खलन के लिए पूरी तरह तैयार थी।

सरयू सिंह धीरे-धीरे अपने होठों को भग्नासा की तरफ ले गए और उसके उभरे हुए दाने को चूसते समय उन्होंने अपने दांतो का भी प्रयोग कर दिया सुगना की चीख निकल गई।

उसने कराहते हुए कहा

"बाबू जी तनी धीरे………""


सरयू सिंह को यह मधुर ध्वनि बेहद पसंद थी उन्होंने अपनी जीभ से उसके भग्नासे से को सहलाना जारी रखा और उनकी नाक से सुगना की बुर में छेद करने को आतुर हो गए।

सुगना सरयू सिह कि इस अधीरता का आनंद लेते हुए स्खलित होने लगी सरयू सिंह सुगना की बुर के कंपन कई दिनों बाद अपने होठों पर महसूस कर रहे थे। जितनी उत्तेजना उन्हें सुगना की बुर को चूसने से मिल रही थी उसका असर उनके लंड पर भी पड़ रहा था।

उनके लंड ने लावा उगलना शुरू कर दिया। पिछले तीन चार दिनों से उनके अंडकोष ने जितना वीर्य उत्पादन किया था वह सब सुगना की मुंह में भर देना चाहते थे परंतु सुगना का छोटा मुंह वीर्य की पूरी मात्रा को आत्मसात करने में अक्षम था। अपना मुंह भरने के बाद सुगना ने अपने होंठ हटा लिए और सरयू सिंह के लंड ने बचे हुये वीर्य की धार सुगना के चेहरे पर छोड़ दी।

सरयू सिंह और सुगना दोनों हाफ रहे थे सुगना ने अपना शरीर सरयू सिंह के ऊपर छोड़ दिया था वह अपनी सांसों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही थी वह अभी भी अपनी बुर को अपने बाबूजी के होठों पर रखी हुई थी और सरयू सिंह अपनी नाक उसके नितंबों से निकालकर सांस ले रहे थे।

वासना का ज्वार थमते ही सुगना सरयू सिंह के ऊपर से उठी और खड़ी हो गई उसने सरयू सिंह के लंड को वापस धोती के अंदर किया और अपने होठों से अपने बाबूजी को चुंबन दिया और उनके माथे को सहला कर बोली

"अब आराम से सूत जायीं। सरयू सिंह बेहद प्रसन्न हो गए और जाते-जाते उसकी चुचियों को सह लाते हुए बोले

"सुगना बाबू एक हाली हमार इच्छा जरूर पूरा कर दीह"


सुगना ने नजरें नीची कर ली और बोली

"राउर इच्छा जरूर पूरा होयी"


सुगना अपने कमरे में जाते हुए सरयू सिंह की उस अनोखी इच्छा के बारे में सोच रही थी. जिस आत्मीयता और अनुरोध से उन्होंने अपनी इस इच्छा को जाहिर किया था उसमें सुगना को द्रवित कर दिया था। उसने मन ही मन अपने बाबू जी की इस अनूठी और अप्राकृतिक इच्छा को पूरा करने की ठान ली थी।

रास्ते में जाते समय उसने अपने आंचल से अपने चेहरे पर लगे वीर्य को भरसक पोछने की कोशिश की और कमरे में आ गई जहां कजरी और पदमा उसका इंतजार कर रही थीं। कजरी को तो पता था परंतु पदमा को यह उम्मीद नहीं थी आज पूरे परिवार की उपस्थिति में सरयू सिंह और सुगना कोई कामुक संबंध बनाएंगे पद्मा ने सुगना से पूछा...

"दवाई खिला देलू हा?"

"हां खिला दे देनी हां।"

कजरी सुगना के चेहरे को ध्यान से देख रही थी उसकी पलकों के पास अभी भी सरयू सिंह का वीर्य लगा हुआ था। उसने अपने हाथ बढ़ाएं और उंगलियों से उसे पोछते हुए बोली लिया..

"अपना बाबूजी के परेशान ना नु कईलू हा?"

सुगना मुस्कुरा रही थी उसने एक बार फिर अपने आंचल से अपना चेहरा पोंछा और अपनी मां से लिपट कर सो गई।

अगली सुबह पदमा अपनी दोनों पुत्रियों सोनी और मोनी के साथ वापस जाने की तैयारी करने लगी।

दिन तेजी से बीत रहे थे और सरयू सिंह धीरे धीरे स्वस्थ हो रहे थे उन्होंने खेती किसानी का काम फिर से संभाल लिया था बस अपनी बहू सुगना की क्यारी जोतने का काम बचा हुआ था। सुगना को चोदने का वह अवसर अवश्य खोजते परंतु सुगना ने अपनी कामुकता पर काबू पाना सीख लिया था । कभी-कभी वह और कजरी सरयू सिंह का हस्तमैथुन और कभी मुखमैथुन कर उनकी उत्तेजना को शांत कर देती थीं । परंतु कजरी ने संभोग करना पहले ही बंद कर दिया था और अब सुगना ने भी सरयू सिंह से उचित दूरी बना ली थी वह अपने बाबू जी को फिर उसी हाल में नहीं पहुंचाना चाहती थी। वह उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थी।

इसी दौरान बनारस शहर में दंगे हो गए और कर्फ्यू लगने की तैयारियां हो गई। सोनू का हॉस्टल पूरी तरह बंद हो गया जो लड़के आसपास के रहने वाले थे वह सब अपने अपने घरों को चले गए परंतु दूर से आए लड़कों के लिए यह संभव न था। कुछ लड़के हॉस्टल में बचे जरूर थे परंतु यह तय था कि उन्हें अगले दो-तीन दिनों में खाने-पीने की दिक्कतों का सामना करना था ।

सोनू वापस गांव आ पाने की स्थिति में नहीं था अंततः उसे अपनी लाली दीदी की याद आई उसने अपने जरूरी कपड़े लिए और अपनी लाली दीदी के घर की ओर निकल पड़ा उस शहर में उसकी लाली दीदी का घर ही एकमात्र आसरा था। उसे पता था लाली देवी उसे बेहद मानती हैं और एक-दो दिन वहां गुजारने में कोई दिक्कत नहीं होगी। कुछ ही घंटों बाद अपने मन में ढेर सारे अरमान लिए सोनू लाली के दरवाजे पर खड़ा था…


शेष अगले भाग में।
 
अब तक की कहानी पढ़ ली आपने?
 
अरे आप भी मालपानी जी को जानती हैं वह इस कथा के प्रमुख पाठक थे . अब वह कहानी पढ़ रहे हैं कि नहीं मुझे नहीं पता परंतु आपसे जलने की बात समझ में नहीं आयी।
 
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