Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 6 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

नियति ने इस होली पर सोनू और लाली के बीच एक आग सुलगा दी थी। ऐसा नहीं था कि उस आग में सिर्फ लाली और सोनू ही झुलस रहे थे। कुछ ऐसी ही स्थिति राजेश की भी थी वह सुगना के प्रति आसक्त हो चुका था। उधर रतन भी सुगना को अपनाने के लिए आतुर था।

त्यौहार खत्म होने के बाद धीरे-धीरे सब अपने अपने घरों को लौट गए। सोनू 12वीं की परीक्षा अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण किया था उसे शहर में आगे की पढ़ाई के लिए दाखिला लेना था। सरयू सिंह ने उसकी मदद की और उसका दाखिला शहर (बनारस) के एक अच्छे कालेज में करा दिया।

राजेश का पुश्तैनी घर लाली के गांव से लगभग 10 किलोमीटर दूर था। गांव में अक्सर वैवाहिक संबंध नजदीक के गांव में ही किये जाते हैं ताकि लोग एक दूसरे के सुख दुख में साथ दे सकें।

शहर में रहने की इच्छा गांव के लोगों में धीरे धीरे बलवती हो रही थी गांव के सभी लोग हर आवश्यक कार्य के लिए शहर (बनारस) का मुंह देखते थे चाहे वह स्वास्थ्य सुविधाएं हो या पढ़ाई। कजरी और सुगना जैसी कुछ कामुक महिलाएं भी अपनी साज-सज्जा और अरमानों को पूरा करने के लिए उसी शहर पर आश्रित थी। गांव के लोगों का शहर आना जाना अब सामान्य हो रहा था।

राजेश वर्तमान में मेरठ में नौकरी करता था। राजेश रेलवे में टीटी था। उसका गांव मेरठ से काफी दूर पड़ता था और वह लगातार अपने ट्रांसफर के प्रयास में था ताकि वह अपने गांव के करीब पहुंच जाए।

राजेश के अथक प्रयासों और लक्ष्मी जी की कृपा से उसका ट्रांसफर बनारस हो गया। इस ट्रांसफर में सोनू की भी दुआएं शामिल वह बार-बार अपनी लाली दीदी की कल्पना करता और सोचता की काश लाली दीदी इसी शहर में रहतीं। नियति ने सुगना के भाई सोनू की प्रार्थना सुन ली। सोनू की लाली दीदी उसके शहर बनारस आ रही थी। नियति लाली और सोनू को करीब ला रही थी।

राजेश के ट्रांसफर की खबर जब सरयू सिंह ने कजरी को बताई सुगना भी वहां उपस्थित थी। उसके दिमाग में एक बार लाली और सोनू का चेहरा घूम गया। लाली के शहर आ जाने से हरिया और सरयू सिंह का परिवार खुश हो गया था अब वह लाली से आसानी से मिल सकते थे। और तो और शहर में उनका एक ठिकाना हो गया था।

सोनू को भी लाली के शहर में आने की खबर लग चुकी थी। सोनू की कद काठी लड़कियों को आकर्षित करने के लिए काफी थी पर उसका दिल अभी अपनी लाली दीदी पर अटक गया था। लाली को लेकर सोनू के लंड में हरकत कब से हो रही थी यह कहना तो मुश्किल है पर निश्चय ही वह कुछ दिनों की बात न थी। शायद सोनू ने जब से हस्तमैथुन प्रारंभ किया था उसके ख्वाबों की मलिका लाली ही थी।

राजेश स्वयं इस ट्रांसफर से बेहद प्रसन्न था वह सुगना के करीब आ रहा था और अब तो शहर में आने के पश्चात उसका गांव आना जाना स्वाभाविक रूप से बढ़ सकता था सुगना से उसके मिलन की संभावनाएं बढ़ रही थी इस बार सुगना के साथ होली मनाने के पश्चात उसका साहस बढ़ गया था।

लाली को यह बात पता थी कि राजेश सुगना पर अपनी नजर गड़ाए हुए हैं पर अब लाली ने इसे स्वीकार कर लिया था तीन-चार वर्षों तक राजेश जैसे कामुक व्यक्ति के साथ रहते रहते लाली ने भी थोड़ी कामुकता उधार ले ली थी।

होली के दिन रात में जब राजेश में उसकी चुचियों को दीए की रोशनी में देखा तो चुचियों पर लगे हरे रंग को देखकर वह हैरान रह गया उसने लाली से पूछा

"तहरा चूची प हरियर रंग के लगा देलस हा"

लाली को सब याद था पर उसने अपनी आंखें शर्म से झुका ली और राजेश को अपनी तरफ खींचते हुए बोली

"अब होली में केहू रंग याद राखी"

राजेश ने लाली का सुंदर चेहरा अपने हाथों में ले लिया और उसके माथे को चूमते हुए बोला

"ओह त अपना भाई सोनू से रंग लगववले बाड़ू"

लाली शर्म से पानी पानी हो गई। उसने कोई उत्तर न दिया। राजेश यह बात जानता था की हरा रंग सिर्फ और सिर्फ सोनू के पास था । वह सोनू को लाली के आगे पीछे घूमते कई बार देख चुका था।

क्योंकि राजेश स्वयं एक कामुक व्यक्ति था वह किशोर लड़कों की भावनाएं पूरी तरह समझता था उस अवस्था में वह भी अपनी करीबी महिलाओं की चुचियों पर ध्यान देता तथा उन्हें छूने और मसलने की फिराक में रहता था। राजेश जानता था कि सोनू के मन में लाली के प्रति कामुक भावनाएं आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी। लाली को वह दीदी जरूर बोलता था पर यह तो सामाजिक रिश्ते थे वरना लाली जैसी गदरायी माल और सोनू जैसे लड़के के बीच जो कामुकता होनी चाहिए वह स्वाभाविक रूप से अपना रंग दिखा रही थी। राजेश ने लाली को छेड़ना जारी रखा….

"रंग खाली उपरे लगावाले बा के नीचहूँ"

लाली उत्तेजना से सिहर उठी राजेश ने तो यह बात सिर्फ कही थी पर लाली ने सोनू के मजबूत हथेलियों को अपनी बुर पर महसूस कर लिया वह मदहोश होने लगी राजेश की बातें उसे उत्तेजित कर रही थी राजेश चाह भी यही रहा था। लाली अपनी उत्तेजना को छुपाते हुए स्वयं हमलावर हो गई

"रहुआ पगला गईल बानी दिनभर आलतू फालतू सोचत रहेनी। जाई हमरा के छोड़ी और अपन साली सुगना से मन लगाई। आजू ओकर खूब चुची मिसले बानी अब जाके ओकरा जाँघि में मुह दे दीं"

लाली ने अनजाने में ही राजेश की सोच पर सटीक हमला कर दिया था राजेश हमेशा से सुगना की कोमल बुर की कल्पना किया करता था और उसे चूमने तथा चूसने के लिए अपने दिमाग में योजना बनाया करता था और आज उसकी पत्नी लाली ने खुलकर उसे वह बात कह दी थी।

राजेश से अब और बर्दाश्त ना हुआ उसने लाली की साड़ी और साया (पेटीकोट) को ऊपर करना शुरू कर दिया. लाली की गोरी जांघें राजेश की निगाहों में आ गई. उसकी बुर पनिया चुकी थी। शहर में रहने के कारण लाली अब अपनी बुर को साफ रखने लगी थी। राजेश ने अपनी लाली की बुर को सुगना की बुर मानकर अपने होठों और जीभ का कमाल दिखाना शुरू कर दिया।

उधर लाली अपने सोनू के बारे में सोचने लगी। उसने सोनू के उस मजबूत लंड को याद करना शुरू कर दिया। उत्तेजना ने लाली को वाचाल बना दिया लाली राजेश को उकसा रही थी उसने कराहती आवाज में कहा

"जीजा जी….. तनी धीरे से …..हां हां असहिं अअअअअअअ ईईईई लाली स्खलित होने वाली थी। कुछ ही देर में लाली की बुर में उसके पति राजेश का ल** आ चुका था और राजेश की कमर हिलने लगी थी।

दोनों पति पत्नी अपने अपने मन में अपनी कामुकता को जीते हुए संभोग सुख का आनंद लेने लगे। राजेश की कमर की रफ्तार बढ़ती गई जब लाली का स्खलन प्रारंभ हो गया तब राजेश ने उसे चूमते हुए सोनू की आवाज में कहा

" दीदी ठीक लागल ह नु"

लाली उत्तेजित तो थी ही उसने राजेश के गाल पर चपत लगाई और बोली

"अपना दीदी से असहिं बात कइल जाला" इतना कहकर उसने राजेश को अपने आलिंगन में ले लिया। राजेश भी उत्तेजित हो गया उसने अपने लंड को लाली की बुर में अंदर तक ठान्स दिया और झड़ते हुए बोला

" ना अपना दीदी के अईसे ना बोलल जाला लेकिन असहिं चोदल जाला।"

वह लाली को चूम रहा था और झड़ रहा था।

आज लाली और राजेश ने अपनी उत्तेजना में एक नया अंश जोड़ लिया था। होली के दिन किया गया यह संभोग उसके लिए यादगार बन गया था। उस रात के बाद सुगना और सोनू के बारे में कामुक बातें करने में उन्हें कोई ग्लानि नहीं होती अपितु वह दोनों अपनी अपनी उत्तेजना को जागृत कर एक-दूसरे से संभोग सुख लेने लगते। उनके जीवन में सेक्स को लेकर एक नया रोमांच पैदा हो गया था सोनू ने लाली के जीवन में एक नया रंग भर दिया था।

बनारस आकर लाली और राजेश बेहद खुश उन्हें रेलवे की तरफ से एक मध्यम दर्जे का मकान उपलब्ध करा दिया गया जो स्टेशन से बेहद करीब था यह एक संयोग ही था उनका घर सोनू के कालेज से भी ज्यादा दूर न था।

जब जब लाली और राजेश बिस्तर पर होते सुगना का जिक्र हो ना हो सोनू का जिक्र अवश्य होता। उत्तेजित स्त्री के साथ संभोग करने का सुख राजेश बखूबी जानता था। लाली को गर्म करने के लिए उसके हाथ में सोनू का ब्रह्मास्त्र आ चुका था। लाली को अपनी बाहों में लिए वह सोनू की बातें शुरू करता और लाली की जांघों के बीच मदन रस स्वयं ही बहने लगता।

लाली खुद भी यह न समझ पाती उसका आकर्षण दिन पर दिन सोनु के प्रति क्यों बढ़ता जा रहा था। अपने पति की शह पाकर उसकी कल्पना आसमान छूने लगी। वह वह मन ही मन अपनी कल्पनाओं में सोनू के साथ अठखेलियां करती। कभी वह अपनी चूचयों को उसके चेहरे से रगड़ती कभी उसके लंड को अपने हाथों में महसूस करती और कभी कभी अपनी जांघों…. आह…….इसके आगे वह स्वयं शर्म से पानी पानी हो जाती।

वह कैसे सोनू के सामने कैसे नंगी हो सकती है। नहीं नहीं यह संभव नहीं. वह अपने विचारों से स्वयं युद्ध लड़ती और उसकी उंगलियां उसकी उत्तेजना में डूबी बुर से। अंततः विजय उंगलियों की होती और उसकी बुर झड़ने लगती।

लाली और राजेश का वैवाहिक जीवन सोनू और सुगना की वजह से आनंदमय हो चला था।

महानगरी एक्सप्रेस के स्लीपर डिब्बे में बैठा रतन अपने भाग्य या दुर्भाग्य के बारे में सोच रहा था। क्यों वह अपना खुशहाल गांव छोड़कर मुंबई गया? जहां वह बबीता जैसी दुष्ट स्त्री के संपर्क में आया.

रतन गांव का एक सीधा साधा पर तेज दिमाग वाला युवक था जो जीवन में उन्नति और प्रगति करना चाहता था. इसी कारण वह साहस कर मुंबई आ गया था पर नियति ने उसे बबीता जैसी सुंदरी के मोह जाल में फंसा दिया और वह उसकी जांघों के बीच बनी अनुपम कलाकृति में खो गया।

शहर की चिकनी चुत ने रतन के जीवन में ऐसे रंग भर दिए जैसे इंद्रधनुष आकाश में भर देता है। इंद्रधनुष की यह सुंदरता ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाई। आकाश साफ होते ही इंद्रधनुष गायब हो गया और बबीता का असली चेहरा रतन की आंखों के सामने आ गया। अब उसे बबीता से रत्ती भर भी प्रेम न रहा था। उसे तो अब यह भी शक होता था कि कहीं चिंकी और मिंकी उसकी बेटियां थी या बबीता ने अपने गर्भ में किसी और का पाप पाल रखा था। चिंकी और मिंकी दोनों प्यारी बच्चियां थी जो रतन को पापा पापा बुलातीं। रतन इस बात को नजरअंदाज कर कि वो किस का बीज हैं उन बच्चियों से एक आदर्श पिता की भांति प्यार करता और उनके मोह में बबीता से संबंध बनाए हुए था। पर कब तक?

वैसे भी अब रतन की निगाहों में उसकी पत्नी सुगना आ चुकी थी। उसने मन ही मन सुगना को माफ कर दिया था। उसने यह जानते हुए कि सुगना का पुत्र सूरज लाली के पति राजेश के साथ हुए एक आकस्मिक संभोग की परिणिति थी उसने सूरज को भी अपना लिया था।

मन ही मन रतन ने यह निर्णय ले लिया कि वह सुगना को अपनी पत्नी और सूरज को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लेगा। पर क्या वह बबीता के साथ आगे संबंध जारी रख पाएगा? या वह चिंकी और मिंकी को लेकर बबीता को बिना बताए वापस अपने गांव लौट आएगा?

उसके मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे ट्रेन पटरी पर सरपट दौड़ी जा रही थी. ट्रेन का लक्ष्य निर्धारित था। परंतु रतन के मन में हलचल मची हुई थी। वह जिस सुगना के करीब आना चाहता था यह ट्रेन उसे उससे दूर ले जा रही थी।

वह उसी जंजाल में जा रहा था जहां से वह निकलना चाहता था। जितना वह सुगना के करीब आ रहा था उतना ही बबीता से दूर हुआ चला जा रहा था। नियति ने अपनी पटकथा लिख रखी थी रतन एक कठपुतली की भाति उस पर अपने कदम बढ़ाए जा रहा था।

चाय …..चाय …...की कर्कश आवाज डिब्बे में गूंजने लगी. एक मैला कुचेला कपड़ा पहने आदमी एलुमिनियम की केतली में चाय लिए कंपार्टमेंट में आ चुका था। रतन ने अपने विचारों को विराम दिया और ₹5 का पुराना नोट देकर एक कुल्हड़ चाय खरीदी और खिड़की के बाहर तरह तरह के लोगों को देखते हुए चाय पीने लगा। उन लोगों में कुछ बबीता जैसी औरतें थी कुछ सुगना जैसी …..

उधर गांव में कजरी सरयू सिंह के दाग पर हल्दी और दूध लगा रही थी सुगना के साथ हैंड पम्प पर होली मनाने के बाद दाग कुछ और बढ़ गया था।

सरयू सिंह जब उस दाग के बारे में सोचते उन्हें वह दिन याद आ जाता जब उन्होंने पहली बार अपनी बेटी समान बहू की कोमल और कुवारी बुर को अपनी कामुक निगाहों से देखा था। वह अपने बालों से उस दाग को छुपाने का प्रयास करते पर अब उम्र की वजह से बाल भी कम हो रहे थे वह दाग आकार बड़ा चुका था और अब बालों द्वारा छुपाया न जा पा रहा हर व्यक्ति की निगाह उस दाग पर पड़ती और वह सरयू सिंह से उसके बारे में जानकारी एकत्रित करना चाहता सरयू सिंह न उस दाग के लगने का कारण बता पाते नहीं उसके बढ़ने का। नियति ने उन्हें यह दाग देकर निरुत्तर कर दिया इस दाग का उपाय न तो नीम हकीमों के पास था न डॉक्टर के पास।

जाने सरयू सिंह के भाग्य में क्या लिखा था। सुगना अपनी पायल छम छम बजाते हुए एक हाथ से अपने सूरज को अपनी कमर पर बैठाये हुए और दूसरे हाथ में दूध का गिलास पकड़े अपने बाबू जी के पास आ चुकी थी।उसमें सूरज को अपने बाबू जी की गोद में दिया और फिर दूध का गिलास पकड़ा दिया। सरयू सिंह एक बार फिर सुगना की चूचियों को देखने लगे कितनी मादक थी सुगना। उनके लंड में फिर हरकत होने लगी उन्होंने अपना ध्यान भटकाया और अपने पुत्र सूरज को खिलाने लगे। बीच-बीच में वह गिलास से उसे दूध पिलाते और बचा हुआ दूध खुद भी पीते।।

उस गिलास और सुगना की चूँची में कोई विशेष अंतर न था आज भी सुगना की चूँची पर सरयू सिंह और सूरज का बराबर का अधिकार था यह अलग बात थी की सरयुसिंह सुगना की चूची से जितना दूध खींचते उससे ज्यादा वीर्य उसकी प्यासी बुर में भर देते और सुगना को तृप्त कर देते।

सिर्फ उस बढ़ते हुए दाग को छोड़कर सरयू सिंह अपनी कजरी भौजी और सुगना बहू के साथ खुश थे…..

सुगना का जीवन भी बेहद खुशहाल हो चला था पिछले तीन-चार वर्षों से वह अपने बाबू जी से लगातार चुदवा रही थी उसने अपने बाबूजी सरयू सिंह और अपनी सास कजरी से कामकला के ऐसे ऐसे अनोखे ढंग सीखें थे जो शायद उसे एक नौजवान से प्राप्त न हो पाते।

सुगना ने अपने गर्भवती होने से पहले काम कला का लगभग हर सुख प्राप्त किया था। इसमें जितना सरयू सिंह का योगदान था उतना ही कजरी का।

परंतु उसकी चिंता का एक ही कारण था वह था सरयू सिंह के माथे का दाग। पता नहीं जब भी वह उनसे संभोग करती वह दाग उसे परेशान करता। जब वह सरयू सिंह के साथ संभोग कर रही होती तब भी वह दाग उसका ध्यान आकर्षित करता और उसे सोचने पर मजबूर कर देता। यह भटकाव उसकी उत्तेजना में भी कमी कर देता।

यह एक विडंबना ही थी कि उस विलक्षण कीड़े को न सरयू सिंह देख पाए थे न सुगना। उस समय यदि वह कीड़े को देख लिए होते तो निश्चय ही उसके दंश का कुछ न कुछ उपाय अवश्य कर गए होते। पर उन्होंने उस समय उस दाग को नजरअंदाज कर दिया था। सुगना को भी इस दाग का कोई उपाय न समझ रहा था कभी वह दाग कुछ कम होता कभी बढ़ जाता।

अब कजरी धीरे धीरे अपनी कामुकता को विराम दे रही थी। उसने अपनी बहू को पूर्ण पारंगत कर दिया था और वह उसके कुंवर जी का भरपूर ख्याल रखती कजरी अब सूरज के लालन-पालन में व्यस्त हो चली थी। वह अधिक से अधिक समय सुगना और सरयू सिंह को देती ताकि वह दोनों एक दूसरे के साथ का जी भर कर आनंद ले सकें।

उसे सुगना की कामुकता का अंदाजा था सुगना अभी भरपूर जवान थी उसकी बुर की प्यास सिर्फ और सिर्फ सरयू सिंह बुझा सकते थे… कजरी को यह बात पता थी की सरयू सिंह आज भी सुगना की गोरी और गुदांज गांड के पीछे थे। सुगना उससे हर बात बताती थी। परंतु कजरी और सुगना दोनों यह बात जानती थी कि सरयू सिंह के विशाल लंड को अपनी गांड में लेना तो दूर यह सोच कर भी उन दोनों की रूह कांप जाती थी। आज भी सरयू सिंह का लंड सुगना की चूत में वैसे ही जाता जैसे एक बच्चे के मोजे में कोई युवा अपना पैर घुसा रहा हो।

सुगना बार-बार प्रकृति को धन्यवाद देती जिसने उसके बुर को असीम लचीलापन दिया था जो सरयू सिंह के लंड को अपने अंदर उसी आत्मीयता और लगाव से पनाह देती थी जैसे उसकी पतली और मुलायम उंगलियों को।

सरजू सिंह की उस निराली इच्छा को पूरा करना अभी न कजरी के बस में था न सुगना के। कजरी ने तो उन्हें दिलासा देते देते अपना जीवन काट लिया था और अब पिछले दो-तीन वर्षों से सुगना उन्हें ललचाए जा रही थी। वह अपनी सुगना और कजरी से बेहद प्यार करते थे उन्होंने कभी उन दोनों पर अनुचित कार्य के लिए दबाव नहीं बनाया था उन्हें पता था यह एक अप्राकृतिक क्रिया थी । पर मन का क्या वह तो निराला था सरयू सिंह का भी और हम आप पाठकों का भी…..

शेष अगले भाग में
 
धन्यवाद

ऊपर दिए गए अपडेट में रतन अभी गांव से वापस मुंबई के लिए जा रहा है बबिता के पास।

सरयू सिंह और सुगना इस कहानी के मुख्य कलाकार हैं और काफी समय तक रहेंगे अभी तो सरयू सिंह की उंगलियों ने सुगना का कौमार्य सीना अभी तो पहला संभोग भी नहीं हुआ है समय के साथ सुगना और सरयू सिंह के अद्भुत मिलन और सुगना को कामकला का ज्ञान मिलना बाकी है

रही बात रतन की उसने शुरू से ही सुगना को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार न किया उसने बाल विवाह को नकारा था और सुगना को सुहाग की सेज पर छोड़कर कोई अक्षम्य अपराध नहीं किया था उसने बबीता के साथ किए गए अपने वादे को निभाया सुगना के साथ वह चाहता तो संभोग कर के भी छोड़ सकता था परंतु उसने ऐसा नहीं किया

आने वाले समय में कथा में कई मोड़ आएंगे जो कभी आप की अपेक्षा अनुसार होंगे कभी अपेक्षा से हटकर

साथ बनें रहे और अपनी प्रतिक्रियाएं देते रहे।
 
धन्यवाद

अपना पक्ष रखने हेतु। सच कहूँ तो

कहानी पढ़कर हस्तमैथुन करने वाले सम्मानित पाठको के लिए लिखना मेरा उद्देश्य नहीं है।

हां कभी-कभी उत्तेजना को नया रूप देने के लिए इन कहानियो में कामुक अंश भी डालना मुझे ठीक लगता था सो किया है।

संभव है जिन पाठकों की इच्छा आपसे मेल खाती होगी उन्हें शायद निराश होना पड़ेगा। कहानी में सेक्स वहीं आएगा जहां वो आवश्यक होगा।

दूसरी बात आपने जो कहा

"Kamuk Likhein, Na Ki LUND jaise Shbd Ko "L***" Likh Kar Ghaas Kaatein! "

ऐसी टिप्पणी करने से अच्छा था कि आप न करते। दुसरो के प्रति प्रयोग किये गए शब्द आपके व्यक्तित्व को दर्शाते हैं।

मुझे आपसे यह उम्मीद नहीं थी।

खैर जब तक पाठक पढ़ेंगे मैं लिखता रहूंगा पर आप के लिए एक बार फिर कहूंगा

"पाप ने बचाया"कहानी पढ़िए यह आपकी अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी।

धन्यवाद।
 
There is difference in suggestion and instruction. What you told in your comment was instruction that too was in rough language which was not acceptable.

Writing sex stories is not like writing Panchtantra stories it is INCEST category it does not mean promotion of sex between blood relation.

It is a fiction and imagination share as your comment was directly to the writer I.e.me.

Any way Close this discussion as it is mere waste of time. If U realise what I told it ok else be happy in your own world. I am also trying to forget that comment.

As a reader u are always welcome. But while suggesting any thing donot be offensive..

Feel good and have sweet dreams with your imaginations......
 
धन्यवाद

संजू जी। मालपानी जी इस कहानी के एक प्रमुख पाठक थे। जिन्होंने लगभग हर अपडेट पर अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया दी। लेखक से कहानी में सेक्स सीन की अपेक्षा रखना उचित है और इसे आप जोर देकर कह सकते है पर " घाँस काटने " जैसे शब्दों का प्रयोग अशोभनीय है।

मेरी तीखी प्रतिक्रिया सिर्फ उसी लिए थी।

इस कुमार जी का लेखन सराहनीय है। उन्हीने नजदीकी और खूनी रिश्तों सेक्स को दर्शाया है और बेहद उत्तेजक तरीके से दर्शाया है और पाठक उसे पसंद भी करते हैं।

मैने उनका नाम इसीलिए सुझाया था ताकि जो पाठक अति उत्तेजक और नजदीकी रिश्ते जैसे पिता पुत्री में गहन सेक्स पढ़ना चाहते हों वे वह कहानी पढ़ सकते है।

मेरा आशय एस कुमार जी के लिए कतई गलत नहीं था।

मालपानी जी का अभी भी स्वागत है।

पुनः धन्यवाद...

अगला अपडेट सुबह आएगा।

शुभ रात्री।
 
होली के दौरान राजेश और सुगना के बीच बढ़ रही नजदीकियों को सरयू सिंह की पारखी निगाहों ने देख लिया था। वह स्वयं इस कला में माहिर थे। उनकी आंखों के सामने उनकी प्यारी सुगना अपने हम उम्र और युवा राजेश के करीब आ रही थी।

उन्होंने सुगना पर अपना अधिकार कायम रखने के लिए उसके साथ बार-बार और विविध प्रकार से संभोग करने लगे परंतु सुगना बदल रही थी। सरयू सिंह की मुट्ठी से रेत फिसल रही थी। जितनी तेजी से वह अपनी मुट्ठी दबाते रेत उतनी ही तेजी से फिसल कर बाहर आती।

दिन पर दिन वह सुगना के साथ और कामुक होते चले गए कभी-कभी वह दिन में दो बार सुगना की जमकर चुदाई करते सुगना उसका आनंद अवश्य लेती पर जो चुलबुला पन उसे राजेश के सानिध्य और उसके एहसास में मिलता वह अब सरयू सिंह के बस में न था। यद्यपि राजेश और सुगना के बीच अब तक कुछ विशेष ना हुआ था फिर भी वह बाहरी स्पर्श भी सुगना को उत्तेजित कर जाता था। वह उसकी सहेली लाली का पति था यही बात सुनना को ज्यादा उत्तेजित करती थी।

सुगना अब भी सरयू सिंह से उतना ही प्यार करती थी परंतु धीरे धीरे उस प्यार में कामुकता का अंश घट रहा था। इधर सुगना की कामुकता में कमी आ रही थी उधर सरयू सिंह कामुकता के अतिरेक पर थे वह अपनी अति कामुकता से अपनी बहू सुगना के मन में वही आकर्षण जगाना चाह रहे थे जो आज से कुछ वर्षों पहले सुगना के मन में था।

सरयू सिंह का दिया बुझने से पहले फड़फड़ा रहा था। यही हाल उनके लंड का था। लंड का तनाव कम हो रहा था यह तो सुगना की बेहद खूबसूरत और मलाईदार बुर थी जो बूढ़ों के लंड में भी एक हरकत पैदा कर देती थी उस बुर के आकर्षण में सरयू सिंह का लंड अब भी तुरंत खड़ा हो जाता था।

सरयू सिंह नीम हकीम से अपने माथे का दाग तो ठीक न करा सके थे परंतु लंड को और खड़ा करने तथा स्तंभन शक्ति को बढ़ाने के लिए वह कई दवाइयों का सेवन करने लगे थे जिसका परिणाम सुगना को भुगतना पड़ता था वह उसे जरूरत से ज्यादा चोदने लगे थे। सुगना की निर्दोषऔर कोमल जाँघे अब थकने लगी थी। वह वासना के अतिरेक से अब तंग हो चली थी।

वह अपने बाबू जी से अब भी प्यार करती थी और अपना जीवन संवारने के लिए उनके प्रति कृतज्ञ थी पर वह चाह कर भी अपने बाबू जी को इस वासना के दलदल से निकाल नहीं पा रही थी। जब भी वह उनसे दूर होती सरयू सिंह की आंखों में आग्रह देखकर वह उनकी बाहों में चली।

आज भी सुगना नहा कर निकली ही थी तभी सरयू सिंह ने उसे अपनी बाहों में ले लिया उन्होंने पीछे से आकर सुगना की कमर में हाथ डाला और उसे अपने पेट से सटा कर उठा लिया। सुगना के दोनों पैर हवा में हो गये। सुगना ने कहा

"बाबूजी अभी ना राती के".

पर सरयू सिंह कहां मानने वाले थे। शिलाजीत के असर और सुगना की गदरायी जवानी ने उन्हें कामुकता के जाल में जकड़ लिया था। सूरज कजरी के साथ किचन में बैठा हुआ आटे की लोई से खेल रहा था। आंगन में सरयू सिंह उसकी मां को अर्धनग्न अवस्था में अपने सीने से सटाये घुमा रहे थे। कजरी को पता था सुगना चुदने वाली है उसने किचन से आवाज दी

"अपना सुगना बाबू संगे कुछ देर बाद खेल लेब चली पहले खाना खा लीं।" कजरी ने सरयू सिंह को रोकने की कोशिश की

सरयू सिंह कुछ सुनने के मूड में नहीं थे वह सुगना को लिए लिए उसके कमरे में आ गए सुगना अभी उत्तेजित न थी परंतु अपने बाबूजी की इच्छा का मान रखने के लिए वह तुरंत ही डॉगी स्टाइल में आ गई सरयू सिंह ने उसके साये को ऊपर किया और उसके गदराये नितंबों को अनावृत कर दिया।





सुगना के नितंब पूरी तरह गोल और अत्यंत मादक थे। सुगना अभी अभी नहा कर आई थी और उसकी जांघों पर पानी की बूंदे मोतियों की तरह चमक रही थीं। उसकी जांघो और शरीर से लक्स साबुन की खुशबू आ रही थी। सरयू सिंह ने अपने लंड का सुपाड़ा सुगना की बुर पर सटा दिया।

सुगना ना तो उत्तेजित थी नहीं उसका मन इस कृत्य के लिए तैयार था परंतु वह सरयू सिंह की इच्छा का मान रखते हुए इस अवस्था में आ गई थी। सरयू सिंह ने उसकी जांघों और नितंबों को सह लाया और अपने लंड को सुगना की बुर में घुसाने का प्रयास करने लगे।

सुगना की बुर गीली न थी सरयू सिंह को अपना लंड अंदर डालने में परेशानी हो रही थी परंतु वह तो बेचैन थे। उन्होंने ढेर सारी लार अपने हथेलियों में ली और अपने लंड पर मल दिया। लंड की चिकनाई बढ़ चली थी। सुगना की बुर उनके लंड को और ना रोक पायी।

सुगना की सांसे रुक गई सरयू सिंह का लंड सुगना की नाभि को चूमने लगा। सरयू सिंह ने अपनी बहू की कमर पकड लिया और लगातार धक्के लगाने लगे।

उन्हें यह भ्रम हो गया था कि शायद उनकी उत्तेजना में वह आवेश और नयापन नहीं था जो सुगना युवा मर्दों में खोज रही थी। वह अपने लंड को बेहद तेजी से आगे पीछे कर रहे थे। सुगना इससे उलट परेशान हो रही थी वह उन्हें दुखी नहीं करना चाहती इसलिए उनकी कामुकता को लगभग सह रही थी।

सरयू सिंह सुगना की बुर से वह सहयोग न पाकर मन ही मन उससे नाराज हो जाते और उनकी चुदाई में प्यार गायब हो जाता। सुगना उनके व्यवहार में आए बदलाव को बखूबी महसूस करती परंतु उनकी उम्र और पुराने संबंधों को ध्यान रखते हुए कोई प्रतिरोध न करती।

सरयू सिंह अब भी सुगना की गुदांज गाड़ के पीछे पड़े हुए थे। डॉगी स्टाइल में सुगना को चोदते समय सुगना की सुंदर गांड उन्हें ललचाती कभी वह फूलती कभी पिचकती। वह केलाइडोस्कोप की भांति अपनी आकृति बदल कर सरयू सिंह को लुभाती। वह अपनी उंगलियों से उसे सहलाते कभी अपनी उंगलियों में थूक लगाकर अपनी उंगली को थोड़ा अंदर प्रवेश कराते।

सुगना सिहर उठती और बोलती..

"बाबू जी तनी धीरे से….. दुखाता"

उसे पता था सरयू सिंह उसकी उस गुदांज गांड के पीछे शुरू से ही पड़े थे। उसे अपना वादा याद था परंतु आज भी वह हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। सरयू सिंह उसे कभी-कभी हंसकर उसे उसका वादा याद दिलाते।

सुगना अपने बाबू जी की यह इच्छा पूरी तो करना चाहती थी पर वह हिम्मत न जुटा पाती थी। सरयू सिंह की चुदाई की रफ्तार बढ़ती जा रही थी। सुगना ना चाहते हुए भी स्खलित होने को तैयार हो गई थी। आज भी सरयू सिंह के लंड में जादू कायम था। कुछ देर की चुदाई में सुगना की बुर सुगना की बात न मानकर स्खलन के लिए तैयार हो गई।

सरयू सिंह ने अंततः अपनी बहू के बुर से बह रहे मदन रस को महसूस कर लिया और अपनी चुदाई को और तेज कर दिया। वह हांफ रहे थे।





"सुगना…….हमार बाबू, ठीक…. लग ता नु" कहते हुए वह अपनी प्यारी बहु को चोद रहे थे। अंततः उन्होंने अपने लंड को पूरी तरह सुगना की स्खलित हो रही बुर में ठान्स दिया। सुगना पहले ही स्खलित हो रही थी उधर सरयू सिंगर की आवाज लहराने लगी। सुगना …...कहते हुए अचानक सरयू सिंह एक कटे हुए पेड़ की भांति जमीन पर गिर पड़े।

उनके लंड से वीर्य उछल उछल कर बह रहा था। सुगना पीछे मुड़ी और अपने बाबुजी को जमीन पर गिरते हुए देख रही थी। सर्विसिंग अपना सीना पकड़े जमीन पर पड़े कराह रहे थे

नंगी सुगना ने रोते हुए कजरी को आवाज दी।

"माँ बाबुजी गिर गइले"

कजरी सूरज को गोद मे लिए भागते हुए कमरे में आयी….

अंदर का दृश्य देखकर कजरी की सांसे रुक गई नंग धड़ंग सरयू सिंह जमीन पर अपना सीना पकड़े कराह रहे थे नंगी सुगना उनके चेहरे को हिला कर बाबूजी…. बाबूजी… पुकार रही थी.

शरीर सिंह की का मुंह टेढ़ा हो रहा था कजरी ने कहा

"सुगना बाबू... अपन कपड़ा पहन और जाकर हरिया चाचा के बुला ले आव.."

सुगना ने अपने उपेक्षित पड़े साये से अपनी चुदी हुई बुर को पोछा फिर सरयू सिंह की जाँघों पर गिरा वीर्य पोछकर उसे पहना और कजरी की मदद से सरयू सिंह को लंगोट और धोती पहनायी और आनन फानन में साड़ी लपेट कर हरिया को बुलाने चली गयी।

गाँव के वैद्य की मेहरबानी से सरयू सिंह उठ तो गए पर सुगना और कजरी ने दबाव बनाकर उन्हें शहर इलाज कराने ले आयीं।

नियति ने सरयू सिंह की कामुकता पर विराम लगा लेने की सोच ली थी... आज वह अपनी अति कामुकता की वजह से ही अपनी बहू सुगना को चोदते चोदते गिर पड़े थे। उनकी सांस ऊपर नीचे होने लगी थी।

यह कैसा वासना का अतिरेक था सुगना जैसी सुंदरी की जांघों के बीच जाने कौन सा रत्न छुपा था जिसे सरयू सिंह का लंड बार-बार खोद कर निकालना चाहता पर हर बार उसका गुरुर उन गुफाओं में पानी की भांति बह जाता और सुगना की बुर एक बार फिर उन्हें वही प्रयत्न करने को बाध्य कर देती।

आज उनके माथे का दाग भी बढ़ा हुआ प्रतीत हो रहा था। कभी-कभी तो सुगना को लगता की उसके बाबूजी जब जब उसको अति उत्तेजना से चोदते हैं तभी उनके माथे का दाग बढ़ जाता है। उसका यह वहम उसे अपने बाबू जी से दूर रहने को प्रेरित करता पर सरयू सिंह वह तो सुगना की कमर के नीचे छुपे खजाने के गुलाम थे। उनके हाथ सुगना का एक खजाना तो लग ही चुका था और दूसरे खजाने को प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षारत थे।

बनारस पहुंच कर सरयू सिंह जी को हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया गया डॉक्टर ने उनके शरीर की विधिवत जांच और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कुछ विशेष दवाओं के सेवन की वजह से उनका रक्तचाप आवश्यकता से अधिक बढ़ गया था. यह एक लघु हृदयाघात से कम न था।

डॉक्टर बार-बार सरयू सिंह से उन दवाओं के बारे में पूछता पर सरयू सिंह ने उन दवाओं का नाम डॉक्टर को ना बताएं आखिर वह किस मुंह से डॉक्टर को यह बताते हैं कि उन्होंने शिलाजीत और अन्य कामोत्तेजक दवाइयों का सेवन किया है जबकि वह ऐसे सम्मानित पुरुष थे जिसने आज तक विवाह न किया था।

डॉक्टर ने कहा ने 2 दिन यही रहना पड़ेगा आप में से कोई एक व्यक्ति यहां रह सकता है।

हरिया ने कहा

"भौजी तू इनका संगे रुक जा हम सुगना के लाली के यहां ले जा तानी सूरज बाबू के खाए पिए के इंतजाम हो जाए. काल सुबह फेर आइब जा"

हरिया का यह प्रस्ताव सर्वाधिक उचित था पर सरयू सिंह उदास हो गए हॉस्पिटल के कमरे में वह सुगना के साथ की उम्मीद कर रहे थे उन्हें हर वक्त सुगना का साथ पसंद आता था। उनके दिमाग में बार बार यह बात आ रही थी कि सुगना लाली के घर में जाएगी तो राजेश निश्चय ही उनकी बहु सुगना से नजदीकियां बढ़ाने का प्रयास करेगा जो उन्हें कतई गवारा ना था मौके की नजाकत को देखते हुए उन्होंने कोई प्रतिकार न किया और सुगना हरिया के साथ कमरे से बाहर जाने लगी सुगना के भरे पूरे नितंब उनकी आंखों के सामने हिलते हुए ओझल हो रहे थे कजरी सरयू सिंह की निगाहों को सुगना की चूतड़ का पीछा करते हुए देख रही थी सुगना के जाते ही उसने कहा

"सुगना के साथ उ सब काम कईल अब छोड़ दी। देखी आज उहे कारण हॉस्पिटल में आवे के परल बा"

सरयू सिंह किसी भी सूरत में यह बात मानने को तैयार न थे कि वह और उनकी मर्दानगी सुगना को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। परंतु आज वह बिस्तर पर पड़े थे और उनके पास कजरी की बात मानने के अलावा दूसरा रास्ता ना था।

कजरी सरयू सिंह के बिस्तर के बगल में पढ़े लंबे बेंच पर लेट कर ऊँघने लगी.

सरयू सिंह अपने और सुगना के प्रथम मिलन को याद करने लगे…..

कजरी ने जब से सुगना और शरीर सिंह के मिलन का रास्ता बनाया था वह बेहद प्रसन्न थी। सरयू सिंह ने उसकी बात मान कर उसकी राह आसान कर दी थी। दरअसल कजरी को सुगना और सरयू सिंह के बीच पनप रही कामुकता की भनक बिल्कुल न थी. बेचारी कजरी तो सुगना की भावनाओं में बहकर सरयू सिंह के पास चली गई थी। वरना कुछ ही समय में सुगना की कोमल बुर का आकर्षण सरयू सिंह को उसके लहंगे में खींच लाता अद्भुत सुंदरी थी सुगना...अपनी मां पदमा से भी ज्यादा।

सुबह सुगना के चेहरे पर खुशी के साथ-साथ नववधू वाली लालिमा भी थी। पिछली दोपहर में सरयू सिंह की मजबूत उंगलियों ने उसका कौमार्य हर लिया था। सरयू सिंह की उंगली किसी कमजोर मर्द के लंड से कम नहीं थी। सुगना को अपना कौमार्य खोने का दर्द वैसा महसूस न हुआ था जैसा लंड से चोदने के बाद होता उसके बाबुजी ने मक्खन की मदद से स्खलित होते समय यह शुभ कार्य किया था सुगना खुश थी।

अब सुगना तैयार हो रही थी बीती रात उसकी कोमल उंगलियों ने पहली बार उसकी बुर की अंदरूनी मालिश की थी और सुगना को स्खलित कर दिया था। सुगना को अब अपनी उंगलियां करामातीं लग रही थी। उसने अपनी उनलियों को चूम लिया और अनजाने में ही अपने होंठों से स्वयं के प्रेम रस का स्वाद भी ले लिया।

कजरी की आवाज आयी

" ए सुगना कुँवर जी के दूध दे आवा"

कजरी सुगना को पहले भी बता चुकी थी कि वह सरयू सिंह को बाबूजी की जगह कुंवर जी ही बोला करें। कजरी के अनुसार बाबूजी शब्द पिता पुत्री के बीच का संबोधन है इस संबोधन के साथ चुदना या चोदना दोनों अनुचित होगा। परंतु सुगना के मुंह से हमेशा बाबूजी शब्द ही निकलता। वही हाल शरीर सिंह का था वह अपने मन में सुगना को नग्न करते मन ही मन उसे चोदते उसके साथ सारे नैतिक और अनैतिक क्रियाकलाप करते पर जैसे ही वह सामने आती उसे सुगना बेटा या सुगना बेटी ही बुलाते। सिर्फ सुगना बोलना जैसे उनकी जीभ को गवारा ना था। शुरुआती महीनों में सुगना और सरयू सिंह के बीच बना ससुर बहु का संबंध प्रगाढ़ हो गया था।

यह तो पिछले दो-तीन महीनों में सरयू सिंह और सुगना प्रेम की पाठशाला में पढ़ने लगे थे और दिन पर दिन महारत हासिल करते जा रहे थे।

"बाबूजी दूध ले ली" सुगना ने कहा। अपनी गलती पर उसकी जीभ खुद-ब-खुद दांतो के बीच आ गई।

सरयू सिंह ने दूध पकड़ते वक्त उसका चेहरा देख लिया सुगना ने अपनी नजरें झुका ली. वह अब बाबुजी से शर्माने लगी थी। दूध का गिलास छोड़ते ही सुगना वापस जाने लगी। सरयू सिंह ने कहा

"सुगना बाबू कोनो दिक्कत नइखे नु, दुखाइल होखे त माफ कर दिह"

वह सुगना की बुर की तरफ इशारा कर रहे थे।

"ना सब ठीक बा" वह मुस्कुराते हुए अपनी पायल बजाते हुए छम छम करती आगन में चली गई. नव योवनाओं की खुशी सरयू सिंह के लिए सबसे महत्वपूर्ण थी।

तभी अंदर से कजरी की आवाज आई

"सुगना के मायके घुमा ले आयीं दीपावली से पहले अपना मां पदमा से मिल ली"

कजरी ने दीपावली शब्द पर ज्यादा ही जोर दिया था। सरयू सिंह को ऐसा महसूस हुआ जैसे सुगना दीपावली के दिन अपनी चुदाई से पहले अपनी मां से मिलना चाहती हो। यह सच ही था सुगना के लिए वह अवसर एक त्यौहार से कम न था वह अपनी मां से आशीर्वाद चाहती होगी ऐसा उन्होंने अनुमान लगाया।

सुगना मायके जाने के नाम से खुश हो गई थी।

कजरी और सुगना ने मिलकर सुगना के छोटे भाई बहनों के लिए कई सारी मिठाइयां बनाई और अगले दिन सुगना अपने बाबुजी के साथ मायके के लिए निकल पड़ी।

सरयू सिंह जब भी पदमा के बारे में सोचते उनके शरीर में उत्तेजना की लहर दौड़ जाती। यद्यपि वह पिछले कई वर्षों से वह पदमा के संपर्क में नहीं आए थे पर उसका नाम सुनकर उनका लंड थिरक उठता।

वह पद्मा को याद करते करते आगे आगे चल रहे थे और पद्मा पुत्री सुगना पीछे पीछे चल रही थी।

आज जब वह सुगना को लेकर पदमा के पास जा रहे थे उन्हें वह दिन याद आ गया जब सुगना पदमा की गोद में थी और पदमा अपने मायके आई हुई थी । सरयू सिंह भी अपने मामा के यहां पहुंचे हुए थे। पदमा को तांगे से उतरते देखकर ही उनकी आंखों में चमक आ गई। शहर से आई हुई पदमा और खूबसूरत हो गई थी। गोद में सुगना को लिए हुए व नीचे उतर रही थी। आँचल हटते ही उसकी बड़ी बड़ी चूचियाँ का उभार दिखाई दे गया। चूचियाँ सच मे कुछ ज्यादा बड़ी लग रही थीं। बड़ी हो भी क्यों न? उन चूचियों पर चार चार हथेलियो (सरयू सिंह और पद्मा का पति) ने मेहनत की थी। ऊपर से चूँचियों में सुगना के लिए दूध भी भर आया था। सरयू सिंह उन चूँचियों को सोचकर ही मस्त हो गए धोती में लंड फनफनाने लगा।

पदमा का पति लोहे की दो बड़े-बड़े संदूके लिए घर की तरफ आ रहा था। पास पहुंचने पर पद्मा ने अपने सरयू भैया की तरफ देखा और मुस्कुरायी।





पद्मा ने उनसे बात नहीं की पर आंखों ही आंखों में एक दूसरे के प्रति प्यार का इजहार हो गया। सरयू सिंह का दिल बल्लियों उछल रहा था और लंड का क्या कहना वह तनाव में आ रहा था और पद्मा की जाँघों के बीच खो जाने को बेकरार था।

पदमा का पिछवाड़ा अब सरयू सिंह की निगाह में था। उसके गोरे-गोरे गदराए नितंब लाल रंग की साड़ी में छुपे हुए हिल रहे थे। सुगना अपनी मां के कंधे पर सर रखे हुए सरयू सिंह का को टुकुर टुकुर देख रही थी। कुछ ही देर में पदमा अपने आंगन में चली गई और सरयू सिंह का नयनसुख खत्म हो गया।

"सरयू भैया कहां चल दिहल… अ" गांव के एक किसान बुधिया ने कहा

सरयू सिंह अपनी यादों से बाहर आये। वो और सुगना चलते चलते गांव के लगभग बाहर आ गए थे।।।

शेष अगले भाग में
 
सभी नए पाठको का कहानी में स्वागत और प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद।

जुड़े रहिये और अपने सुझाव देते रहें।





अगला अपडेट कल आएगा।
 
"सरयू भैया कहां चल दिहल… अ"गांव के एक किसान बुधिया ने कहा

सरयू सिंह अपनी यादों से बाहर आये। वो और सुगना चलते चलते गांव के लगभग बाहर आ गए थे।

"सीतापुर जा तानी हो"

"बहु रानी खाती पालकी ना मिलल हा का?"

"इनके मन रहे पैदल चलेके"

दरअसल पैदल चलने का सुझाव सुगना का ही था वह पालकी में अकेले नहीं जाना चाहती थी। जितना ज्यादा से ज्यादा समय वह अपने बाबुजी के साथ व्यतीत करती उतना ही आनंदित होती जब तक वह गांव के करीब थी.
तब तक सुगना सरयू सिंह के पीछे पीछे चल रही थी. सरयू सिंह अपने गांव से बाहर आ चुके थे और अभी सुगना का गांव आने में कुछ वक्त था बीच का यह रास्ता लगभग एकांत जैसा था सरयू सिंह ने सुगना से कहा "सुगना बाबू तू आगे-आगे चल...अ"

सुगना मासूम लड़की की तरह सरयू सिंह के आगे आगे चलने लगी। दो खेतों के बीच पतली पगडंडी जिस पर बमुश्किल एक आदमी चल पाता है सुगना और शरीर सिंह आगे का सफर तय करने लगे सुगना अपने मदमस्त यौवन के साथ सरयू सिंह की निगाहों के सामने आगे आगे चलने लगी सरयू सिंह की निगाहों को सुगना की खूबसूरती के दर्शन होने लगे। जैसे-जैसे सुगना के कदम आगे बढ़ते उसकी उभरे हुए नितंब सरयू सिंह का ध्यान खींचते जब कभी वह अपने शरीर का संतुलन बनाए रखने के लिए अपने हाथ उठाती उसकी कोमल बाहें सरयू सिंह को आमंत्रित करती वह सुगना के पीछे पीछे चल रहे थे। और अपनी बहु पदमा के अंग प्रत्यंगो का निरीक्षण कर रहे थे जिन्हें दीपावली के दिन सहलाते और मसलते हुए सुगना को उसके जीवन का पहला संभोग सुख देना था।

सरयू सिंह जी की निगाहों ने अपनी पुत्री समान बहू के वस्त्रों का हरण कर लिया था जैसे-जैसे सरयू सिंह सुगना के नितंबों के बीच अपना ध्यान केंद्रित कर रहे थे उन्हें सुगना के नितंब निर्वस्त्र दिखाई दे रहे थे और उन हिलते हुए मादक नितंबों के बीच सुगना की कोमल गांड की कल्पना कर रहे थे निश्चय ही सुगना अपनी मां पदमा से ज्यादा खूबसूरत थी और हो भी क्यों ना सुगना की कमसिन उमर और गदराई जवानी ऊपर वाले की देन थी।

सुगना को अब तक एहसास हो चुका था कि उसके बाबूजी उसके शरीर को देख कर आनंदित हो रहे हैं । उसने पीछे मुड़कर देखा सरयू सिंह अपनी लंगोट में तन रहे लंड को व्यवस्थित कर रहे थे। सुगना शर्मा गयी।

सुगना और सरयू सिंह बातें करते हुए पदमा के घर पहुंच गए। पदमा का छोटा भाई सोनू कुछ दूर पहले ही गली में खेल रहा था उसने शरीर सिंह और पदमा को आते हुए देख लिया उसकी खुशी की सीमा न रही वह सरयू सिंह और सुगना के पास आने की बजाय भागता हुआ घर गया। शायद उसे अपने घर यह सूचना देना ज्यादा आवश्यक लगा वनस्पत कि वह अपनी बहन सुगना और सरयू सिंह से मिलता।

पदमा खुश हो गई। सुगना की दोनों बहने सोनी और मोनी अपने गोबर से सने हाथ धोकर सुगना के स्वागत के लिए तैयार हो गयीं। घर पहुंचते ही तीनोंं ने सुगना को घेर लिया गजब का उत्साह था ।

सरयू सिंह ने अपना झोला खोला और जो मिठाईयां कजरी और सुगना ने बनाई थी वह तीनों के सुपुर्द कर दीं। उनके इस कार्य से सोनी मोनी और सरयू सिंह में थोड़ी आत्मीयता बढ़ी।

सोनू ने पूछा

" चाचा कब चलल रहला हा"

सोनू द्वारा सरयू सिंह से जोड़ा गया यह रिश्ता अपेक्षाकृत ज्यादा उचित था। इसने सुगना और सरयू सिंह के बीच चल रहे कामुक प्रेम प्रसंग की ग्लानि को थोड़ा कम कर दिया। सरयू सिंह खुश हो गए। उन्होंने सोनू से खेती किसानी की बातें की और कुछ ही देर में बाद घर के आंगन से सफेद साड़ी में लिपटी हुई पदमा आज कई दिनों बाद उनके नजरों के सामने आ गयी।

सरयू सिंह खुद उस समय लगभग 45 -46 वर्ष के युवा थे पदमा की उम्र भी 42 -43 के आसपास रही होगी. इस उमर में भी पदमा के शरीर का कसाव कजरी जैसा ही था. विधवा होने के बावजूद गांव में लगातार श्रम करने की वजह से वाह अपने शरीर की बनावट को कायम रख पाई थी। सरयू सिंह की निगाहें एक सधे हुए दर्जी की भांति उसके शरीर के उभारों और कटावों का नाप लेने लगीं। तभी पद्मा ने उन्हें गुड़ और पानी पकड़ा दिया। जाने अधेड़ महिलाएं इतनी निश्चिंत क्यों होती है। झुकते समय यदि वह सावधानी ना बरतें तो अपनी चूचियां अनायास ही सामने बैठे पुरुष को दिखा देती हैं।

पद्मा ने भी अनजाने में अपनी गदरायी हुई चूँचियों के दर्शन सरयू सिंह को करा दिए। पर जैसे सांड के मन मे गाय की जगह बछिया छायी हुई थी वैसे ही सरयू सिंह के मन में सुगना छाई हुई थी। सरयू सिंह ने पदमा की गदरायी हुई चुचियों को नजरअंदाज कर दिया।

अभी एक-दो दिन पहले ही सुगना का कसा हुआ बदन उन्होंने अपने हाथों से हुआ था। छूआ ही क्या उसके शरीर के हर अंग को महसूस किया था तथा अपनी उंगलियों से सुगना की कुंवारी बुर को जी भर कर सहलाया तथा उसका कौमार्य हरण किया था।

पदमा पुरानी रसमलाई थी और सुगना ताजी। इस समय सरयू सिंह की कामुकता पर सुगना एकछत्र राज कर रही थी।

सोनू ने कहा

"चाचा तनी धान में पानी डालकर आव तानी तब तक रउआ आराम कर लीं"

सोनी - मोनी भी खेलने भाग गयीं।

अब घर में सिर्फ सुगना और पदमा ही बचे थे। कुछ देर बाद सुगना भी अपनी सहेलियों से मिलने चली गई।

पद्मा सरयू सिंह के लिए खाना बना रही थी वह सरयू सिंह की यादों में खो गयी। और संयोग से उसी दिन को याद करने लगी (जिस दिन को रास्ते मे सरयू सिंह याद कर रहे थे) जब वह छोटी सुगना को लेकर अपने मायके गई हुई थी।

सरयू सिंह भी अपने मामा के यहां पहुंचे हुए थे। तांगे से उतरते हुए उसमें सरयू सिंह को देख लिया था और उसकी आंखों में चमक आ गई थी। ऐसा नहीं था कि सिर्फ पद्मा ही खुश हुयी थी सरयू सिंह भी उतना ही खुश थे।

आंखों ही आंखों में एक दूसरे के प्रति ललक जाग उठी प्रेम छलक उठा। शाम होते होते पदमा सरयू सिंह से मिलने उनके मामा के घर आ गयी। सरयू सिंह ने सुगना को अपनी पास में ले लिया और अपने जेब से ₹50 निकालकर पद्मा को दिया और बोला "केतना प्यारी बेटी बिया"

सुगना भी उनके साथ खेलने लगी वह उनकी गोद में रच बस गई. वह कभी उनकी मूछें छूती कभी बाल पकड़ती पदमा सुगना को बार-बार रोकती पर सुगना उसे अपना हक मान रही थी।

(निष्ठुर नियति को यह पवित्र प्यार रास न आया था और उसने अगले कुछ सालों में उसने यह परिस्थितियां पैदा कर दी कि अपनी गोद में खिलाई हुई सुगना को सरयू सिंह दीपावली के दिन चोदने जा रहे थे)

कुछ देर खेलने के बाद सुगना पदमा की गोद में चली गई।

उस समय गांव में रामलीला हो रही थी। सारे बुजुर्ग और धर्म कर्म में लिप्त लोग वह रामलीला देखने अवश्य जाया करते थे। पदमा के मां और पिताजी भी वह रामलीला नियमित रूप से देखते थे।

सुगना आज रो रही थी इसलिए पदमा रामलीला देखने न गई उसकी मां ने कहा "बेटा जब सुगना सुत जाई तब आ जाइह" पदमा के घर से उनके माता-पिता को निकलते देख कर सरयू सिंह की आंखें चमकने लगी. उनकी प्रेयसी घर में अकेली थी उसकी रखवाली के लिए सिर्फ और सिर्फ एक छोटी सुगना थी ।

रामलीला का प्रसंग प्रारंभ होते ही लाउड स्पीकर की आवाज गांव में गूंजने लगी सरयू सिंह के कदम पदमा के घर की तरफ बढ़ चले।

कमरे में दिए की रोशनी चल रही थी। पद्मा अपनी चारपाई पर लेटी हुई थी उसकी चारपाई अपेक्षाकृत बड़ी थी जिस पर दो व्यक्ति आसानी से सो सकते थे। पदमा को सरयू सिंह के कदमों की आहट लग चुकी थी। उसने सरयू सिंह से कहा

"अंगनवा के द्वार में किल्ली लगा दी"

( आगन का दरवाजा बंद करके लॉक कर दीजिए )

सरयू सिंह उल्टे कदमों से एक बार फिर आंगन में गए और अपनी प्रेयसी पदमा के कथन का पालन किया। जैसे ही दरवाजा बंद हुआ उनके दिमाग ने उनकी हथेलियों को निर्देश पारित कर दिया शरीर सिंह की धोती खुल चुकी थी। कुछ ही देर में धोती और लंगोट दोनों पदमा के कमरे में दिखाई पड़ रहे थे पर उनका तनाव में आता हुआ लिंग अभी कुर्ते के पीछे छुपा हुआ था। सरयू सिंह की हथेलियां पदमा की पीठ पर घूमने लगी पद्मा ने खिलखिलाते हुए कहा "तनी धीरज धरी सुगना के सूत जाए दी"

पर सरयू सिंह अधीर हो चले थे। दीए की रोशनी में पदमा की बेदाग पीठ चमक रही थी। रीड की हड्डी का भाग दबा हुआ था साड़ी सरक पर नितंबों तक आ चुकी थी। सरयू सिंह के हाथ पदमा की पीठ पर रेंगते हुए उसकी चूचियो तक पहुंच गए।

पद्मा बाई करवट लेटी हुई थी और आगे की तरफ झुक कर अपनी दाहिनी चूची सुगना को पिला रही थी जिससे वह लगभग पेट के बल लेटी हुई प्रतीत हो रही थी।

सरयू सिंह को तो जैसे जन्नत मिल गई वह तो पदमा का चुचियों का रस लेने गए थे उन्हें पदमा के गोल नितंबों को छूने का विधिवत आमंत्रण मिल चुका था। उनकी हथेलियां चूँची को छोड़कर वापस पीठ पर आ गयीं और धीरे-धीरे पदमा के कोमल और गोल नितंबों की तरफ बढ़ने लगीं।

नितंबों की दरार आते आते सरयू सिंह की उंगलियां पेटीकोट का नाड़ा खोज रही थी पर वह दिखाई न पढ़ रहा था। कुछ ही देर में उनके हाथ में पदमा के नितंब आ गए वह पेटीकोट न पाकर थोड़ा आश्चर्यचकित थे पर जैसे ही उनके हाथ आगे बढ़े साड़ी की गांठ खुल गयी और एक पल के लिए उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे साड़ी द्वारा लगाया जा रहा प्रतिरोध पूरी तरह खत्म हो गया। साड़ी एक पतली चादर की भांति हटती गई पदमा के गोर और मादक नितंब उनकी आंखों के ठीक सामने थे। उन्होंने अपनी दोनों हथेलियों से उसे सहलाना शुरु कर दिया।

कभी वह उन्हें फैलाते कभी आपस में सटा देते। उन्हें पदमा की गोरी और ग़दरायी गांड उन्हें दिखाई देने लगी। अद्भुत थी पदमा। सरयू सिंह की उंगलियां और आगे बढ़ती गई। और वह उनकी पसंदीदा जगह पर पहुंच गई। पदमा की बूर पनिया चुकी थी। उनकी उंगलियों में लिसलिसा मदन रस लग गया। सरयू सिंह प्रसन्न हो गए पदमा पहले से ही उत्तेजित थी। उनके लंड का पदमा की बुर मिलन शीघ्र होने वाला था। उन्होंने एक ही झटके में अपना कुर्ता उतार दिया और पदमा के बगल में आकर लेट गये।

सरयू सिंह के प्यासे लंड ने अपना रास्ता खोज लिया। पदमा ने भी अपने दोनों पैर अपने पेट की तरफ लाकर अपनी बुर को सरयू सिंह के लंड के सामने ला दिया।

पद्मा के सरयू भैया का मूसल उसकी ओखली में प्रवेश कर गया। गजब चिपचिपी थी पदमा की बुर। सुगना के जन्म के बाद भी उसका कसाव कायम था। सरयू सिंह अपनी कमर हिलाने लगे।और पदमा की बुर सरयू सिंह के अंडकोष में दही के उत्पादन को बढ़ावा दे रही थी।

अब पदमा निश्चिंत थी वह चारपाई से उठ खड़ी हुई सरयू सिंह का लंड पूरी तरह खड़ा था और उछल रहा था पदमा की बुर से रिस रहा चिपचिपा मदन रस उस पर एक आवरण की तरह लिपटा हुआ था। पदमा जैसे ही चारपाई से उतर कर खड़ी हुई उसकी साड़ी जमीन पर आ गयी।

दीए की रोशनी में अपनी नंगी और गदरायी पद्मा को देखकर सरयू सिंह मदहोश हो गए। जांघों के बीच बीच फूली हुयी बुर चमक रही थी कुछ ही देर की चुदाई में उसका मुंह खुल गया था। बुर की फांके अलग-अलग थीं जिन पर प्रेम रस सना हुआ था। होठों के बीच से बुर का गुलाबी मुख दिखाई पड़ रहा था। पदमा ने अपने कदम उनकी तरफ बढ़ाएं पर सरयू सिंह ने रोक दिया।

" बस 2 मिनट जी भर कर देख लेवे द जाने फेर कब मिलबु"

पदमा शर्मा गई उसने अपनी आंखें बंद कर ली पर अपने सरयू भैया के लिए अपना सारा खजाना खोल दिया सरयू सिंह उस खूबसूरती को देखकर मस्त हो गए।

चारपाई की पाठ पर बैठकर पदमा को अपने पास खींच लिया और पदमा की पीठ को अपने सीने से हटा लिया।पदमा अभी भी खड़ी थी उसकी जांघों के बीच से सरयू सिंह का चिपचिपा लंड निकलकर पदमा को छूने का खुला आमंत्रण दे रहा था।

लंड का सुपाड़ा सच में बहुत आकर्षक लग रहा था दीए की रोशनी में वह चमक रहा था। पद्मा ने अपने हाथ नीचे किए और अपने छोटे कोमल हथेलियों में उस जादुई लट्टू को पकड़ लिया। जैसे ही लंड पर पदमा के हाथ लगे वह उछलकर उसकी बुर की तरफ बढ़ने लगा। वह बार-बार उसे नीचे करती पर सरयू सिंह का लंड मजबूत था वह पदमा की हथेलियों को ऊपर की तरफ धकेल रहा था। वह बुर में समा जाने को बेताब था।

जिस तरह एक मदमस्त नाग सपेरे की पकड़ में आने के बावजूद अपना तनाव लगातार बनाए रखता है उसी प्रकार सरयू सिंह का लंड पद्मा की हथेलियों को ऊपर की तरफ धकेल कर बुर में घुस जाने को बेताब था। पदमा हंस रही थी उसने कहा "संरयु भैया ई त पकड़ में आवते नईखे"

सरयू सिंह ने पदमा की चूचियां सहलायीं और उसकी कमर को नीचे की तरफ आने का इशारा किया और कहा

"जायेदा तू आराम से बैठा उ अपन रास्ता खोज ली"

ठीक वैसा ही हुआ पदमा उनकी गोद में बैठ रही थी और लंड अपना रास्ता खोजता हुआ बुर के मुहाने पर पहुंच गया। जैसे-जैसे पदमा अपना वजन छोड़ती गई उसकी पनियाई बुर एक बार फिर से भर गई। पदमा के पैर जमीन के ऊपर आ चुके थे। लंड नाभि को चूम रहा था। पदमा पूरी तरह भरी हुई महसूस हो रही थी। सरयू सिंह ने थोड़ी देर उसकी चूचियां सहलायीं और फिर अपने हाथों और पैरों का उपयोग कर पदमा को अपनी गोद में ऊपर नीचे करने लगे। जैसे जैसे पदमा ऊपर नीचे हो रही थी सरयू सिंह का लंड बुर में आगे पीछे होने लगा। अद्भुत आनंद में डूबे दोनों प्रेमी युगल एक दूसरे में खोने लगे। कुछ देर इसी अवस्था में पदमा को चोदने के बाद उन्होंने पदमा की अवस्था बदल अब भी पदमा उनकी गोद में ही थी पर उसका चेहरा सरयू सिंह की तरफ था।

शर्म से लाल पद्मा के चेहरे को देखकर सरयू सिंह उसे चूमने लगे। उसके होठों पर अपनी जीभ फिराते हुए वह आनंद लेने लगे। पद्मा ने भी अपने होंठ खोल कर अपनी जीभ को बाहर निकाल लिया। दोनों छोटी तलवारे एक दूसरे में उलझ पड़ी। कभी पदमा की जीभ सरयू सिंह के मुह में प्रवेश कर जाती कभी सरयू सिंह की जीभ पद्मा में।

ऊपर के इस छोटे प्रेम युद्ध ने सरयू सिंह के लंड की रफ्तार बढ़ा दी उसे जैसे इशारा मिल रहा था। जितना प्यार सरयू सिंह और पदमा के होंठ एक दूसरे से कर रहे थे पदमा की बुर में लंड का आवागमन उतना ही तेज हो रहा था।

पदमा की दूध से भरी फूली हुई चूचियां सरयू सिंह के सीने से सटकर सपाट हो रहीं थी उसके निप्पल ओं से दूध रिस रहा था जो शरीर से के पेट से होता हुआ उनके लंड तक पहुंच रहा था।

एक बार फिर तूफान रफ्तार पकड़ रहा था पदमा की जाँघे तनने लगी। सरयू सिंह उसके होठों को चूमे जा रहे थे। उनकी हथेलियां पदमा के दोनों नितंबों को सहलाए जा रहीं थीं और दोनों ही हाथों की मध्यमा उंगली पदमा की गांड को छूने में होड़ लगा रही थीं। जब जब पदमा की गांड पर सरयू सिंह की उंगलियां घूमती पद्मा सिहर उठती पर उसकी उत्तेजना में चार चांद लग जाते। पद्मा से अब और बर्दाश्त न हुआ वह स्खलित होने लगी। वह उनसे अमरबेल की भांति लिपट चुकी थी। वह अपनी चूँचियां उनके सीने से रगड़ रही थी। कुछ ही देर में पद्मा स्खलित होकर शांत हो गई पर सरयू सिंह का लंड इतनी जल्दी पानी छोड़ने के मूड में नहीं था।

पदमा कोमलंगी थी उसे इस अद्भुत लंड का साथ पाकर झड़ने में ज्यादा समय नहीं लगता था वह उनके प्यार से अभिभूत हो जाती थी। पदमा शांत हो चुकी थी और अपनी तेज चल रही सांसो को सामान्य करने की कोशिश कर रही थी। उससे अपनी कमर और नहीं हिलाई जा रही थी। सरयू सिंह उसे चूमे जा रहे थे और उसके स्खलन को आनंददायक बना रहे थे।

पदमा अगले कदम के बारे में सोच रही थी उसकी कोमल बुर इस अद्भुत चुदाई के बाद संवेदनशील हो चुकी थी वह सरयू सिंह के लंड को अपने अंदर प्रवेश देने में अक्षम थी ठीक उसी प्रकार जिस तरह बारात में जी भर कर मिठाई खाकर पानी पी लेने के पश्चात दोबारा मिठाई खाने की हिम्मत नहीं होती वही हाल पद्मा की बुर का हो चुका था वह अपनी जी भर कर चुदाई करा चुकी थी और अब कुछ देर शांत रहना चाहती थी। सरयू सिंह अपना लंड लिए पदमा के अगले कदम का इंतजार कर रहे थे।

तभी सुगना रोने लगी पद्मा ने लोटे से पानी निकाला अपनी चूचियां पर पानी का छींटा मारा सरयू भैया के कुर्ते से उसे पोछा।

सरयू सिंह पदमा के चूतड़ों पर अपना लंड रगड़ रहे थे उन्हें पता था अभी बुर के अंदर लंड प्रवेश करा पाना उचित नहीं था पर वह अपनी उत्तेजना कायम रखते हुए पदमा के गोल नितंबों से खेलने लगे। अचानक ही पदमा डॉगी स्टाइल में आ गई। सुगना पदमा के पेट के ठीक नीचे थी और अपना सिर ऊपर कर उनकी चूचियां पी रही थी सरयू सिंह को यह समझ नहीं आया।

पदमा को इस मादक अवस्था में देखकर उन्होंने तुरंत ही अपना लंड उसकी बुर में ठाँस दिया पदमा आगे की तरफ झुक गई सरयू सिंह ने अपना लंड बाहर निकाल लिया।

इस अवस्था में वह अपनी प्यारी पदमा को चोदने को लालायित थे पर सुगना उनका खेल बिगाड़ रही थी वह छोटी सुगना अनजाने में ही सरयू सिंह को सता रही थी।

(नियति का खेल निराला था जो सुगना अनजाने में सरयू सिंह को सता रही थी वही 2 दिनों बाद उसी निराले लंड से स्वयं चुदने जा रही थी)

जैसे ही उन्होंने अपना लंड बाहर निकाला तभी पद्मा ने कहा "सरयू भैया आगे आ जाई" सरयू सिंह पदमा के चेहरे की तरफ चले गए। पदमा एक हाथ से उनका लंड सहलाने लगी। सरयू सिंह के मन में वासना जाग उठी उन्होंने अपना लंड पदमा के होठों से छुवाने की कोशिश की। पदमा शहर जाने के बाद पुरुषों का यह आदत बखूबी जानती थी। उसका फौजी पति भी इस सुख का कायल था। पदमा में अपने प्रेमी सरयू भैया को वह सुख देने की सोची और अपने होठों से उनके लंड का सुपाड़ा छूने लगी।

सरयू सिंह की उत्तेजना सातवें आसमान पर पहुंच गई यह पहला अवसर था जब किसी स्त्री ने उनके लंड को अपने होठों से छुआ था। सरयू सिंह के हाथ पदमा के सिर के ऊपर आ गए वह उसके कोमल बालों से खेलने लगे। पदमा ने लंड का सुपाड़ा अपने मुंह के भीतर ले लिया।

इधर सुगना की मां पदमा सरयू सिंह का लंड चूस रही थी। सरयू सिंह पदमा के प्रति कृतज्ञ हो रहे थे। आज वो जीवन का एक नया सुख पाकर खुश थे। वीर्य धार फूट पड़ी वह पद्मा के होठों को सीचने लगे पदमा को पता था कि यदि उसने अपना मुंह अभी खोला तो वीर्य की धार न सिर्फ पदमा को भीगोएगी अपितु छोटी सुगना पर भी पड़ सकती थी जो पदमा को कतई पसंद न था।

पदमा के मुंह में वीर्य का दबाव बढ़ रहा था। पदमा अपने होठों को उनके लंड पर जकड़ी रही। उसका पूरा मुंह भर चुका था। सरयू सिंह की उत्तेजना भी शांत हो चुकी थी। लंड का उछलना खत्म हो चुका था। अब लंड को बाहर आने का समय हो चुका था। उन्होंने अपना ल** धीरे-धीरे पीछे करना शुरू किया और पदमा ने अपने होंठों को सिकोड़ना शुरू किया। जैसे-जैसे पदमा के हॉट सिकुड़ रहे थे उसके मुंह में भरे हुए वीर्य के लिए जगह कम पड़ रही थी।

अंततः जब लंड बाहर आया पदमा के मुंह से वीर्य की धार बह निकली।। पद्मा ने अपना चेहरा नीचे कर दिया और वह वीर तकिए पर गिरने लगा। पदमा के मुंह पर वीर्य की एक परत चढ़ चुकी थी।

अब तक सुगना सो चुकी थी। पदमा एक बार फिर बिस्तर से उतरकर सरयू सिंह के करीब आ गयी उसने सरयू सिंह के पास आकर कहा

" भैया हम का करीं हमार ई ( बुर की तरफ इशारा करते हुए) हमेशा हार जाले"

सरयू सिंह ने उसे अपने सीने से सता लिया और उसके होंठों को चूमते हुए बोले

"लेकिन अब तहरा भीरी इहो बा. अब ना हरबू"

पद्मा उनका इशारा समझ चुकी थी। वो मुस्कुराने लगी।

सरयू सिंह अपनी प्रेमिका के होठों से अपने ही बीर्य को चुराकर उन्होंने उसका स्वाद लिया और भाव विभोर होकर बोले

"पदमा आज तू जीत गईलू हम तोहार दिहल ई सुख कभी ना भूलब तू हमारा से कुछो माग ल"

"ठीक बा माग लेब"

पदमा अपनी तारीफ सुनकर उनसे सटती चली गई। सरयू सिंह अभी भी पदमा के नितंबों को सहलाए जा रहे थे। उनका जी पदमा से कभी नहीं भरता था।

पद्मा रोटी बनाते हुए सोचने लगी कि क्या वह आज सरयू सिंह से अपनी सुगना को गर्भवती करने का वचन मांग ले? क्या यह उचित होगा?


शेष अगले भाग में
 
आप सभी को धन्यवाद।

आप सब क्या पसंद करेंगे सुगना का वर्तमान या सुगना की दीपावली ?
 
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