Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 2 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

आप क्या पसंद करेंगे......

1 सुगना का अगला मिलन





या

2 कामाग्नि की शुरुवात सुगना और सरयू सिंह करीब आते हुए और फिर ........





दोनो में से एक अपडेट शाम तक आ जायेगा....
 
सरयू सिंह सुगना की यादों में खोए हुए थे. कैसे सुगना उनकी जान से ज्यादा प्यारी ही गयी थी। जो एक समय पर उनसे बात तक न करती थी आज अपनी चूत चुदवाने के बाद पंखा झलते हुए उन्हें प्यार से खाना खिला रही थी। यह सफर रोमांचक था...



सुगना के गवना का दिन निर्धारित हो गया था। वह कुछ दिनों पहले हुए मुखिया के चुनाव में मतदान कर चुकी थी और शाशकीय तौर पर चुदने के लिए पूरी तरह तैयार थी। सरयू सिंह ने रतन को बुला लिया था। वह मन मसोसकर गांव आ गया पर उसकी सुगना में कोई रुचि नहीं थी। आपसी समझौते के तहत उसे गांव आना था सो आ गया था।

कजरी को अभी भी उम्मीद थी की सुगना की जवानी रतन को सुगना की जाँघों के बीच खींच लाएगी। कजरी सुगना से मिल आई थी। उसमें सुगना की कद काठी पे टंगी उसकी चूचियों और सुडौल कूल्हों के पीछे छुपी कुवांरी चूत को अंदाज लिया था। वह उसकी खूबसूरती से बेहद प्रभावित थी।

सरयू सिंह स्वयं खूबसूरती के जौहरी थे। उन्होंने जिन जिन महिलाओं को हाथ लगाया था वह सब एक से बढ़कर एक थीं। कजरी स्वयं उनमें से एक थी। सरयू सिंह ने अपने अनुभव के आधार पर ही सुगना को रतन के लिए पसंद कर लिया था। उन्हें पता था सुगना की मां पदमा जब इतनी खूबसूरत थी तो उसकी लड़की सुगना निश्चय ही खूबसूरत ही होगी।

सुगना की मां पदमा सरयू सिंह के ननिहाल की लड़की थी। अपनी जवानी में सरयू सिंह ने पदमा की जवानी का रस लूटा था। ज्यादा तो नहीं पर कभी-कभी। उस गाँव मे वही उनका सहारा थी। उस दिन पदमा की आंखों में आंसू देख कर उनका दिल पिघल गया था और उन्होंने एक ही झटके में सुगना को अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया था।

आखिर वह दिन आ ही गया जब सरयू सिंह की प्यारी बहू उनके घर आ गई। पूरे गांव में भोज हुआ सरयू सिंह मन ही मन डरे हुए थे की रतन और सुगना का मिलन होगा या नहीं। यह प्रश्न उन्हें खाए जा रहा था। वह कजरी की बातों से आश्वस्त थे पर रतन का व्यवहार उन्हें आशंकित किए हुए था। गवना के पूरे कार्यक्रम में वह बिना मन के उपस्थित रहा था।

कजरी ने गांव की महिलाओं के साथ मिलकर कोठरी में नई चादर बिछाई थी। सुगना अपनी सुहागरात की सेज देखकर मन ही मन शर्मा रही थी।





सरयू सिंह अब तक सुगना का चेहरा नहीं देख पाए थे पर अपनी पारखी निगाहों से यह अवश्य जान चुके थे कि उसे सुहाग की सेज पर देखना किसी मर्द के लिए एक स्वप्न जैसा ही था।

सचमुच् वह अपनी मां से बढ़कर कामुक थी। एक पल के लिए उन्हें लगा की रतन उसके प्रेम पास में निश्चय ही आ जाएगा पर हुआ उसके विपरीत।

रात में सुगना की कोठरी से चीखने की आवाज आने लगी। सरयू सिंह और कजरी उनकी बातें सुनने लगे सुगना ने लगभग चीखते हुए कहा

"जब राउर मन ना रहे तो ब्याह काहे कइनी?"

"जाके चाचा से पूछा"

"हमरा मांग में सिंदूर तू भरले बाड़ा कि तहार चाचा" सुगना की आवाज में तल्खी आ रही थी।

"जब हमारा के आपन बहिन बनावे के रहे त गवना करावे कौना मुंह से आइल रहला हा?"

रतन निरुत्तर था.

कुछ ही देर में वाह दरवाजा खोल कर कमरे से बाहर चला गया. सरयू सिंह अपनी चादर के अंदर विदके हुए अपने फैसले पर पछता रहे थे। कामाग्नि में चल रही सुगना का यह व्यवहार सर्वथा उचित था।

कजरी सुगना के कमरे में जाकर उसे समझा रही थी। जब क्रोध की परिणीति अनुकूल परिणाम में तब्दील न हुयी तो सुगना का क्रोध क्रंदन में बदल गया वह रो रही थी । कजरी उसकी पीठ सहलाती रही पर सुगना की सिसकियां कम ना हुई।

दो दिन बाद रतन वापस मुंबई चला गया और सुगना अपनी जवानी लिए हुए बिस्तर पर तड़पती रह गयी। घर में मनहूसियत का माहौल था। सरयू सिंह और कजरी दोनों ही दुखी थे। सुगना सरयू सिंह से कोई बात नहीं करती थी। वह उनकी आहट से तुरंत ही दूर हो जाती। उसकी यह आदत कभी सरयू सिंह को सम्मानजनक लगती कभी नफरत भरी।

जब कभी सुगना घर में अकेले रहती, यदि सरयू सिंह खाना पानी मांगते तो सुगना उन्हें खाना तो दे देती पर एक लफ्ज़ न बोलती। सरयू सिंह बार-बार उसे सुगना बेटा सुगना बेटा कहते पर सुगना ने उनसे कोई बात नहीं की। कजरी सुगना को समझाती पर उसका दिल खट्टा हो चुका था।

सुगना को आए एक महीना बीत चुका था। कजरी की चूत कभी-कभी पनियाती उसका मन भी चुदवाने का करता। सुगना अपनी चूत का भविष्य सोच कर दुखी हो जाती। क्या वह कुवांरी ही रहेगी? सुगना जवान थी उसका हक था कि वह भगवान द्वारा बनाए गए इस अद्भुत सुख को भोगती पर सब बिखर गया था।

सुगना को अपनी सास से भी हमदर्दी थी आखिर उन्होंने भी अपनी जवानी बिना अपने पति के गुजारी थी. सुगना अपनी दुखियारी सास से करीब होती होती गई. उसने अपनी फूटी किस्मत के लिए उन्हें उत्तरदाई नहीं ठहराया पर सरयू सिंह को वह माफ न कर पा रही थी।

सरयू सिंह की उत्तेजना भी धूल चाट गई थी। जब भी वह प्यारी सुगना को देखते वह दुखी हो जाते। उनकी प्यारी बहू मानसिक कष्ट से गुजर रही थी वह उसे खुश करने का जी भर प्रयास करते पर सब व्यर्थ था। सुगना दिन पर दिन उदास रहने लगी। सरयू सिंह इस एक महीने में सुगना का चेहरा तक न देख पाए थे।

इन दिनों सुगना यदि किसी के साथ खुश होती तो वह थी लाली। वह हरिया की बड़ी लड़की जिसका विवाह हो चुका था और कुछ ही दिनों में गवना होने वाला था। लाली दोपहर में सुगना के पास आती और बार-बार सुगना से उसकी सुहागरात का अनुभव पूछती। यह जले पर नमक छिड़कने जैसा था पर सुगना जानती थी की इसमें लाली की कोई गलती नहीं थी।

हर लड़की का यह स्वाभाविक कौतूहल होता है। सुगना उसे उत्तेजक भाषा में समझाने का प्रयास करती पर वह वैसा ही होता जैसे कोई गांव का व्यक्ति स्विट्जरलैंड की खूबसूरती का वर्णन कर रहा हो।

आखिरकार होली के दिन घर में खुशियों ने दस्तक दी। कजरी और सरयू सिंह ने हमेशा से होली के त्यौहार को आनंद पूर्वक मनाया था। वैसे भी वह दोनों देवर भौजाई थे।

सुबह सुबह का वक्त था। सुगना अपने कमरे में सो रही थी। कजरी अभी-अभी मुंह हाथ धोकर आंगन में आई थी। सरयू सिंह ने कजरी को देखा और अपने हाथों में रंग लेकर कजरी पर कूद पड़े। हमेशा से पहले रंग लगाने की उन दोनों में होड़ लगी रहती थी। सरयू सिंह अपनी कजरी भाभी की चुचियों को रंग रहे थे। घर के आंगन में कजरी खिलखिला कर हंस रही थी। एक पल के लिए वह भूल गई थी कि सुगना घर में ही है।

कहते हैं उत्तेजना में इंसान बहक जाता है। कई दिनों बाद अपनी चूचियों पर सरयू सिंह के हाथ पाकर उसकी बुर पनिया गई। वह उसकी चुचियों को मीसते रहे





तथा उनके होंठ कजरी के कानों और गालों पर अपने चुंबन बरसाते रहे। सरयू सिंह ने उसका पेटीकोट उठाना शुरू कर दिया। हाथों में लाल रंग लगा हुआ था। कजरी के गोरे शरीर पर सरयू सिंह के पंजों के निशान स्पष्ट दिखाई पड़ने लगे। सरयू सिंह ने नितंबों को भी नहीं छोड़ा। हथेलियों का पानी सूख चुका था पर उनकी उंगलियों ने कजरी की पनियायी बुर से पानी चुरा लिया। कजरी के गाल शर्म से और चूतड़ रंग से लाल हो गए।





कजरी के खिलखिलाकर हँसने की वजह से सुगना जाग गयी थी। वह शांति पूर्वक दरवाजे की सुराग से आगन का दृश्य देखने लगी। कुदरत ने अनूठा संयोग बना दिया था।

सरयू सिंह की हथेलियों को अपनी सास कजरी के जांघों पर देखकर सुगना आश्चर्यचकित थी। जितना आश्चर्य आंखों में था उतनी ही उत्तेजना उसके मन में जन्म ले रही थी। सरयू सिंह कजरी की बुर सहला रहे थे।

आंगन में चल रही ठंडी ठंडी बयार ने जब कजरी की पनियायी चूत को छुआ उसे अपनी नग्नता का एहसास हुआ। कजरी से अब और बर्दाश्त ना हुआ वह अपनी कोठरी की तरफ जाने लगी। सरयू सिंह चुंबक की तरह उसके पीछे हो लिए। वहअपने लंड को लगातार उसके कूल्हों से सटे हुए थे।

सुगना के पैर कांप रहे थे। आज जो उसने देखा था उसने उसे हिला कर रख दिया था। कजरी और सरयू सिंह के कमरे में जाने के बाद वह चोरी छुपे आंगन में आ गयी।

कमरे के अंदर अंधेरा था पर इतना भी नहीं। सूर्य का प्रकाश स्वतः ही गांव के कमरों में प्रवेश कर जाता है आप चाह कर भी उसे नहीं रोक सकते। जिस तरह सूर्य का प्रकाश अंदर जा रहा था सुगना की निगाहें भी दरवाजे के पतले छेद से अंदर चली गयीं।

सुगना ने आज वह दृश्य देख लिया जिस दृश्य कि कभी वह कल्पना करती थी। कजरी और सरयू सिंह पूरी तरह नंगे हो चुके थे। सरयू सिंह का बलिष्ठ शरीर सुगना की निगाहों के सामने था। चौड़ी छाती बड़ी बड़ी भुजाएं पतली कमर और मांसल जाँघे सुगना की आंखें बंद हो गयी। वह थरथर कांप रही थी।

सरयू सिंह का मजबूत और काला लंड सुगना की निगाहों के ठीक सामने था पर सुगना अपनी हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी कुछ सांसे और लेकर उसने अपनी आंखें खोल दीं। सरयू सिंह अपने मजबूत और काले लंड को हथेलियों में लेकर सहला रहे थे। सुगना की आंखें अब उस पर अटक गई बाप रे बाप इतना बड़ा उसने आज के पहले पुरुष लिंग सिर्फ मासूम बच्चों का देखा था इतने विशाल लिंग की उसने कल्पना भी नहीं की थी।

होली और वासना में रंगे हुए सरयू सिंह और कजरी एक दूसरे के आलिंगन में लिपटे हुए एक दूसरे के होंठ चूसे जा रहे थे। सरयू सिंह से और बर्दाश्त ना हुआ। उन्होंने कजरी को अपनी गोद में उठा लिया। कजरी उनके आलिंगन में आ गई और अपनी दोनों जांघों को सरयू सिंह की कमर में लपेट लिया। सरयू सिंह की दोनों हथेलियों ने कजरी को नितंबों से पकड़ा हुआ था।

उनका लंड कभी कजरी की गांड पर कभी चूत पर छू रहा था। वह लगातार उसे चुम्मे जा रहे थे। सरयू सिंह ने अपने लंड को जैसे ही कजरी की चिपचिपी चूत पर महसूस किया उन्होंने कजरी के चूतड़ों को दिया हुआ अपनी हथेलियों का सहारा हटा दिया।





कजरी अपने भार को नियंत्रित न कर पायी और नीचे आती गई। सरयू सिंह का मूसल अपनी ओखली में प्रवेश कर गया था। सुगना की सांसे तेज चल रही थी उसे अपनी जांघों के बीच की कुछ अजीब सी हलचल महसूस हो रही थी। चूचियों में मरोड़ हो रही थी।

वाह अपनी साड़ी के ऊपर से ही उसे छूने का प्रयास कर रही थी। सरयू सिंह अब उसकी सासू मां को कस कर चोद रहे थे वह उन दोनों की चुदाई और न देख पायी और भागते हुए अपने कमरे में आ गयी।

वह अपनी किस्मत को कोस रही थी जिसने उसकी जवानी बर्बाद कर दी थी। कुछ ही देर में सरयू सिंह ने कजरी को बिस्तर पर पटक दिया और उसकी दोनों जाँघे फैलाकर उसे गचागच चोदने लगे। चारपाई के चर चर आवाज सुनाई दे रही थी। पर वह दोनों बेशर्मों की तरह चुदाई में लिप्त थे उस समय उन दोनों को अपनी बहू का ख्याल नहीं आया जिसे वो ब्याह कर तो ले आया था पर उसे उसकी किस्मत के भरोसे छोड़ दिया था।

उधर सुगना का कलेजा मुंह को आ रहा था पर कुवारी चूत बह रही थी। उसने अपना एक पैर चारपाई के नीचे कर लिया और चारपाई के बास को अपनी दोनों जाँघों के बीच ले लिया। बॉस पर रस्सियों की लिपटन ने उसे खुदरा बना दिया था।





सुगना की चूत और उस बॉस के बीच सिर्फ उसका पेटीकोट और साड़ी थी। उसने अपनी चूत को उस बास पर रगड़ना शुरु कर दिया। कुछ ही पलों में उसकी जांघें तनने लगीं। सुगना अपनी ससुराल में आज पहली बार स्खलित हुई थी। वह हाफ रही थी। पर आज पहली बार उसके चेहरे पर सुकून और कुछ खुशी दिखाई दे रही थी। नियति मुस्कुरा रही थी ……

सुगना की होली हैप्पी होली हो चुकी थी।



शेष अगले भाग में
 
अपडेट देर शाम तक आ जाएगा कहानी में जुड़े रहने के लिए सभी पाठकों का धन्यवाद
 
सरयू सिंह को पंखा झलते झलते सुगना के कोमल हाथ दुखने लगे थे सरयू सिंह भी अपने सोच में डूबे खाना खाए जा रहे थे अचानक सुगना ने कहा



"बाऊजी का सोचा तानी"

"कुछु ना, तोहरा गवना के बाद के पहिलकी होली याद आ गईल रहे"

सुगना शर्म से लाल हो गई उसे इतनी शर्म तो तब भी नहीं आई थी जब वह कुछ देर पहले अपने ससुर से चूँची मीसवाकर दूध निकलवा रही थी।

सरयू सिंह थाली में हाथ धो रहे थे। सुगना ने अब और देर ना की उसने घुंघट और नीचे कर लिया था वह थाली लेकर आंगन में चली गई। बाहर हरिया की आवाज आ रही थी

"भैया घर ही रहब की चलब खेत ओरे"

"तू जा हम थाकल बानी"

सरयू सिंह सुगना का कोमल खेत अभी-अभी जोत कर ही उठे थे वह पूरी तरह थके हुए थे। ऊपर से सुगना के हाथों मीठा भोजन कर वह नींद की आगोश में चले गए पर उनके दिमाग से सुगना छायी हुयी थी। वह फिर सुगना की पहली होली की यादों में डूब गए।

जब परिवार खुशहाल रहता है तो वयस्क पुरुषों और महिलाओं में कामुकता स्वयं जन्म लेती है। सुगना के चेहरे पर उस दिन चमक थी। होली का दिन था ही उसे सुबह सुबह खुशियां मिल चुकी थीं। वह उठकर तैयार हुई भगवान को गुलाल चढ़ाने के पश्चात उसने सासू मां के पैर छुए और हाथ में अबीर लिए पहली बार सरयू सिंह के पास आयी।

उसने सरयू सिंह के भी पैर छुए। उसकी कोमल और गोरी बाहें सरयू सिंह की निगाहों में आ गयीं। बहु के कोमल उंगलियों के स्पर्श अपने पैरों पर महसूस करते वह भाव विभोर हो गए। आज कई दिनों बाद सुगना उनके करीब आई थी और उनके पैर छूये थे।

उन्होंने उसे जी भर कर आशीर्वाद दिया.. "हमेशा खुश रहा, दूधो नहाओ पूतो फलो. भगवान तोहरा के हमेशा खुश रखे"

उन्होनें आदर्श ससुर की तरह आशीर्वाद दे तो दिया पर उन्हें तुरंत ही वस्तुस्थिति का अंदाजा हो गया। उन्होंने अपनी नजरें झुका कर फिर कहा

"हो सके तो हमरा के माफ कर दिहा"

सरयू सिंह ने आखरी वाक्य कहकर सुगना की दुखती रग पर हाथ रख दिया. वह कुछ बोल नहीं पाई पर उसे एक बार फिर उसके दिल में दर्द का एहसास हुआ। वह वहां से चली गई । सुगना ने उनके करीब आकर अपनी नाराजगी कम होने का संकेत दे दिया था। सरयू सिंह को भगवान ने होली का उपहार सुगना की खुशी के रूप में दे दिया था।

सरयू सिंह सुगना से दिल से प्यार करते थे उस समय उनके मन मे वासना कतई नहीं थी। वह कल रात ही उसकी पसंद की मिठाई और कपड़े ले आए थे। उन्हें पता था सुगना उसे स्वीकार नहीं करेगी पर आज सुगना ने उनके चरण छुए थे उन्हें कुछ उम्मीद जगी थी। वह भागकर कजरी के पास गए और लाए हुए उपहार लेकर सुगना को पुकारा। सुगना चहकती हुई बाहर आ गयी।

"सुगना बेटा इ ला होली में तोहरा खातिर ले आइल बानी" सुगना ने हाथ बढ़ाकर सहर्ष उपहार स्वीकार कर लिया। सरयू सिंह बहुत खुश थे। सुगना अपनी पसंद की मिठाई और कपडे देखकर खुश हो गई। सरयू सिंह द्वारा लाई गई लहंगा चोली बेहद खूबसूरत थी। सुगना ने एक बार फिर सरयू सिंह के पैर छुए और बोली

"बाबूजी, हमरा के माफ कर द" सरयू सिंह की छाती चौड़ी हो गई उन्होंने कहा

"सुगना बाबू, बहू और बेटी एक जैसन होवेले, हम तोहरा के हमेशा खुश राखब। जौन तू चहबू उहे ई घर मे होई. हमार गलती के माफ कर दिह"

सुगना स्वतः ही सरयू सिंह से सटती चली गई। उसके कंधे सरयू सिंह के सीने से सट गई पर उसने अपनी चुची सरयू सिंह से दूर ही रखी। वह परिस्थितिजन्य बाबूजी थे यह बात वह जानती थी और अब से कुछ देर पहले कि वह उनका अद्भुत और कामुक रूप देख चुकी थी।

होली के 2 दिनों बाद हरिया की बड़ी बेटी लाली का गवना था। पड़ोस में त्यौहार जैसा माहौल था। सुनना के उजड़े जीवन में यह खुशी का मौका था। वह सज सवरकर नई बहू की तरह हरिया के घर जाती और लाली के गवना की तैयारी में मदद करती। लाली भी बेहद सुंदर थी पर सुगना तो सुगना थी।

गांव की सभी महिलाएं सुगना को छेड़ती। वह उनके सामने शर्माती पर अंदर ही अंदर दुखी हो जाति। उसके मन की वेदना बाहर वाले क्या समझते . इतनी खूबसूरत और जवानी से भरपूर सुगना की जांघों के बीच उसकी कोमल और रिस रही चूत मायूस पड़ी हुयीं अपने उद्धारकर्ता की तलाश कर रही थी।

सुगना की कद काठी देखकर आस-पड़ोस के लड़के जो रिश्ते में उसके देवर थे उसके आसपास मंडराते जरूर थे, वे अपनी आंखें भी सेंकते पर उसके करीब जा पाने की हिम्मत किसी में नहीं थी आखिर सरयू सिंह का साया सुगना के सर पर था वो उनके घर की बहू थी।

गाँव के बाहर पशु मेला लगा हुआ था। सरयू सिंह ने वहां से एक सुंदर सी बछिया खरीद लाई उनकी गाय अब बूढ़ी हो चली थी।

सुगना बछिया देखकर खुश हो गयी। सरयू सिंह ने सुगना की आंखों में चमक देख कर बड़े प्यार से कहा

"सुगना बेटा ई तहरे खातिर आइल बिया"

बछिया बहुत सुंदर थी. वह कुछ ही दिनों में बच्चा जनने योग्य हो जाती. बछिया और सुगना की दोस्ती हो चली थी. दालान में बाँधी हुई बछिया के पास जब सुगना जाती बछिया खुश हो जाती। सुगना अपने हाथों से उसे घास और चारा खिलाती और वह बछिया खुशी-खुशी मुह बा कर चारा सुगना के कोमल हाथों ले लेती। सुगना खुशी से उछलने लगती।

कजरी और सरयू सिंह दालान में बैठे हुए यह दृश्य देखकर मन ही मन प्रसन्न होते।

आज से कुछ दिनों पहले तक सुगना के चेहरे पर जो उदासी छाई थी अब वह दूर हो रही थी। सरयू और कजरी दोनों इस खुशी के माहौल में आराम से चुदाई करते। पर एक कसक अभी भी थी। आखिर सुगना का होगा क्या? क्या वह ऐसे ही अविवाहिताओं की तरह पूरा जीवन बिता देगी। रतन क्या उसे अपनाएगा? या हमें सुगना का दूसरा विवाह करना चाहिए?

यह बात सरयू सिंह बोल तो गए थे पर उन्हें पता था गांव के परिवेश में यह संभव नहीं था। सरयू सिंह का मन बेचैन हो उठा था अपनी यादों में हुई इस बेचैनी की वजह से उनकी नींद खुल गई और वह उठ कर बैठ गए।

पुरानी यादों से दूर आज उनका दिन बहुत अच्छा गया था। अपनी प्यारी बहू सुगना की चूत चोदने के बाद आज नींद भी अच्छी आई थी। आंगन से हँसने खिलखिलाने की आवाज आ रही थी। कजरी और सुगना का हंस हंस कर बात करना यह साबित कर रहा था कि सूरज के दूध न पीने की समस्या का अंत हो चुका है।

सुगना स्वयं भी अपनी चूची से दूध निकालने में महारत हासिल कर चुकी थी और उसकी मदद के लिए सरयू सिंह सदैव एक पैर पर तैयार थे।

बच्चे को जन्म देने के बाद सुगना को तेल की मसाज देने के लिए एक नाउन आया करती थी। वह सुगना के पूरे शरीर की तेलमालिश करती और उसके शरीर का कसाव वापस लाने का प्रयास करती। उसका विशेष ध्यान चूचियों, पेट ,पेड़ू और जाँघों तथा उनके जोड़ पर नियति द्वारा बनाई गई अद्भुत कलाकृति पर रहता जो बच्चे के जन्म से सबसे ज्यादा प्रभावित हुई थी।

उस दिन वह नाउन नही आई थी। कजरी पर आज दोहरा भार आ गया था छोटे बच्चे सूरज को तो वह हमेशा से तेल लगाती थी पर आज उसे कजरी को भी तेल लगाना था।

कजरी सुगना को बहुत प्यार करती थी। सुगना उसकी बहू थी पर वह दोनों कभी सास बहू की तरह रहती कभी मां बेटी की तरह और कभी एक दूसरे की सहेली की तरह. वह दोनों एक दूसरे को समझने लगी थीं । सरयू सिंह को लेकर इन दोनों में कोई मतभेद या जलन नहीं थी अपितु वह दोनों एक दूसरे को सरयू सिंह के करीब आने का ज्यादा से ज्यादा मौका देतीं।

अपनी मालिश करने के बाद छोटा सूरज सो गया। कजरी बड़ी कटोरी में तेल दोबारा गर्म कर कर ले आई। सुगना ने अपनी साड़ी उतार दी थी। अब वह पेटीकोट और ब्लाउज में बेहद सुंदर दिखाई पढ़ रही थी.





कजरी की निगाहों ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा. नाउन की मेहनत से सुगना का बदन वापस पहले जैसा हो गया था पर बच्चा जनने के बाद उसकी जांघें और चूचियां गदरा गई थी। कोमल बछिया अब गाय बन चुकी थी। पेट का हिस्सा भी पिचक गया था पर बच्चा जनने के बाद और पहले का अंतर अभी भी थोड़ा नजर आ रहा था। नियति ने पेट पर पतली लकीरों के रूप में अपना निशान छोड़ दिया था जो सुगना को हमेशा मां होने का एहसास दिलाता रहता.

सुगना की ब्लाउज और पेटीकोट अपेक्षाकृत नए थे। कजरी ने कहा

"बाबू सुगना एहू के उतार द नया बा नु तेल लाग जाई" कजरी ने सुगना के ब्लाउज और पेटीकोट की तरफ इशारा किया। सुगना हिचकिचा रही थी। पर उसकी आंखें कजरी से मिलने के बाद उसने बिना तर्क किए अपनी पीठ कजरी की तरफ कर दी। कजरी की उंगलियां उसके ब्लाउज के हुक से खेलने लगी और इसी दौरान सुगना का पेटीकोट जमीन पर आ गया निश्चय ही यह सुगना की उंगलियों का ही कमाल था। सुगना का मादक जिस्म कजरी की निगाहों के ठीक सामने था। कजरी ने सुगना को इसके पहले सिर्फ एक बार ही पूरा नंगा देखा था। उसने सुगना को माथे पर चूम लिया और कहा..

"कुंवर जी के हाथ लगला से हमार बहू, रानी के नियन लाग तारी। भगवान तोहरा के हमेशा खुश रखे" सुगना के प्रति सरयू सिंह की आसक्ति का कारण अब कजरी जान चुकी थी। सुगना सच बेहद खूबसूरत लग रही थी सीने पर बड़ी-बड़ी तनी हुयी चूचियां और गदराई हुई जांघों के जोड़ पर हल्के हल्के बाल और उसके पीछे झांक रही उसकी प्यारी बुर…. ओह…. कजरी सुगना की खूबसूरती में खो गई थी।

कजरी अपने बेटे रतन को कोस रही थी। जिसके भाग्य में इतनी सुंदर कली भगवान ने दी थी पर वह उसकी कदर न कर पाया था…..

कजरी ने सुगना को अपने आलिंगन में ले लिया और उसकी पीठ को सहलाते हुए उसने सुगना के कान में कहा..

"अब हम जान गईनी तोहर बाबूजी दिन भर काहें तोहरा आगे पीछे घुमेले" इतना कहकर कजरी में सुगना के कोमल नितंबों को अपनी हथेलियों से दबा दिया सुगना ने कजरी के गालों को चुम लिया और बोली

"सब आपेके कइल धइल हा"

कजरी ने सुगना को चौकी पर लेट जाने का इशारा किया सुगना पेट के बल लेट गई और कजरी ने मालिश शुरू कर दी।

पैरों और पीठ की मालिश करने के बाद कजरी उसके कोमल नितंबों की मालिश करने लगी। वह अपने दोनों हाथों से सुगना के चूतड़ों को फैलाती और छोड़ देती वह दोनों वापस अपनी जगह पर आते पर कुछ देर तक हिलते रहते। कजरी ने कटोरी का गर्म तेल सुगना की दोनों चूतड़ों के बीच डाल दिया जो बीच की दरार से होता है सुगना की गदरायी गांड तक पहुंच गया। उसकी कोमल चमड़ी पर उस गर्म तेल के स्पर्श से सुगना चिहुँक उठी। उसने कहा

" माँ पोछ ढेर गरम बा"

कजरी ने अपनी उंगलियों से उसे पोछने की कोशिश की पर आज वह शरारत के मूड में थी उसने सुगना की गांड में अपनी तर्जनी उंगली कुछ ज्यादा ही अंदर तक कर दी तेल लगे होने की वजह से तर्जनी का ऊपरी भाग सुगना की गांड में घुस गया वह ज्यादा अंदर तक तो नहीं गया पर निश्चय ही मांसल भाग के आखिरी किनारे तक पहुंच गया था। इसके पश्चात जाना कजरी की उंगलियों को गंदा कर सकता था। कजरी की सधी हुई उंगलियां अपनी मर्यादा में रहते हुए वापस आ गयीं पर उसकी इस क्रिया ने सुगना के मन में एक अजीब सी संवेदना पैदा कर दी। उंगलियां हटने के बाद भी ऊपर से आता हुआ तेल सुगना की गांड के अंदर जाने का प्रयास करने लगा एक बार फिर कजरी ने अपनी उंगलियां कुछ दूर अंदर तक ले जाकर उसे पोछने का प्रयास किया पर यह क्रिया तेल पोछने की कम सुगना को उत्तेजित करने की ज्यादा लग रही थी। कजरी की उंगलियों ने सुगना की गांड का फूलना पिचकना महसूस कर लिया था। सुगना की सांसे अब तेज चल रही थीं।

वह कुछ बोल नहीं रही थी पर उसकी सासू मां कजरी अपनी बहू को जानती थी। एक बार फिर कटोरी का गर्म तेल सुगना के चूतड़ों पर गिर रहा था कुछ देर सुगना की गांड को सहलाने के बाद कजरी की उंगलियां स्वता ही नीचे चली गई सुगना की बुर से रिस आया मदन रस कजरी की उंगलियों में चासनी की भांति लग गया। कजरी ने अपने अंगूठे और तर्जनी से सुगना के प्रेम रस की सांद्रता को नापना चाहा। दोनों उंगलियों के बीच सुगना का प्रेम रस चासनी की बात सटा हुआ था उसका चिपचिपा पन निश्चय ही कुंवर जी के लंड को अपने भीतर समाहित करने के लिए आवश्यक था। कजरी मन ही मन उत्तेजित हो रही थी उसने कहा.

"लागा ता तू अपना बाबूजी के याद कर तारू" सुगना शर्मा गई उसने अपनी गांड को पूरी तरह से सिकोड़ लिया और जांघों को आपस में सटा लिया एक पल के लिए कजरी की उंगलियां उन कोमल दरारों के फसी गई।

सुगना अब पीठ के बल आ चुकी थी। सुगना की गोरी और मखमली चूत अब कजरी के ठीक सामने थी और प्रेम रस से पूरी तरह भीग कर चमक रही थी।





जिस तरह गुलाब की पंखुड़ियों पर ओस की बूंदे दिखाई पड़ती है उसी तरह सुगना की चूत के होंठो पर पर प्रेम रस की छोटी-छोटी बूंदे दिखाई पड़ रही थी। दिए रूपी बुर के निचले भाग से मदन रस चूने को तैयार था। उत्तेजनावश बुर की फांके फुल कर अलग हो गई थी और छोटे बालक सूरज का जन्म स्थान दिखाई पड़ने लगा था।

सुगना के उस सुनहरे छेद को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था की उसने कुछ दिनों पहले उसी छेद से एक बच्चे को जन्म दिया हुआ था। आज सुगना की वही चूत कजरी की उंगली के लिए भी दबाव बनाये हुए थी।

सुगना के लिए अब अपनी उत्तेजना छुप पाना कठिन हो रहा था। कजरी की हथेलियां अब सुगना की जांघों की मसाज कर रही थी। जैसे ही उसकी उंगलियां सुगना की चूत से सटती सुगना की सांसे तेज हो जाती। वह कजरी के हाथ पकड़ने की कोशिश करती। कजरी अब मूड में आ चुकी थी। उसने उसकी नाभि के आसपास भी तेल लगाया और अब सीधा उसकी चुचियों पर आ गई।

हाथों से उसकी चुचियों को मीसते हुए उसने सुगना से पूछा

"अब दूध त भरपूर होला ना?"

" हां मां"

" तब बाप बेटा बेटा दोनों पियत होइहें?"

"सुगना मुस्कुरा रही थी"

उसने फिर पूछा

"अच्छा के ढेर पीयेला"

सुगना खिलखिला कर हंस पड़ी उसने अपने हाथ से सरयू सिंह का लंड बनाने की कोशिश की. अपनी दाहिने हाथ की हथेलियों को मुट्ठी का रूप दिया और बाएं हाथ की हथेली से अपनी कोहनी के ऊपर का भाग पकड़ लिया और कजरी को दिखाते हुए कहा

" इहे ढेर पीएले …राउर.. कुँवर जी"

कजरी भी हंस पड़ी तभी सरयू सिंह की आवाज आई…

"अरे उ मुखिया के यहां जाए के रहे नु. जा ना तुही परसादी लेले आव।"

"हम रहुआ बाबू के तेल लगाव तानी"

सुगना आश्चर्य से कजरी की तरफ देख रही थी कजरी ने सुगना को बाबू कह कर पुकारा था।

सरयू सिंह ने कहा

"तू चल जा बाबू के तेल हम लगा देब ओसहूं हम नहाए जा तानी"

"ठीक बा हम जा तानी।. जल्दी आयी ना त राउर बाबू के ठंडा मार दी कपड़ा नइखे पहिनले।



इतना कहकर कजरी ने सोते हुए सूरज को अपनी गोद में उठाया और पड़ोस में मुखिया के घर प्रसाद लेने चली गई। सुगना मुस्कुरा रही थी उसकी सासू मां कजरी ने मन ही मन कुछ और सोच रखा था जो अब सुगना को तो समझ आ चुका था । सुगना ने अपने ऊपर चादर डाल ली और अपने बाबूजी का इंतजार करने लगी…
 
Chapter 7

चौकी पर लेटी हुई नंगी सुगना की सांसे तेज चल रहीं थीं। कजरी ने उसके शरीर की मालिश करते हुए उसे उत्तेजित कर दिया था। बस अंदरूनी मालिश बच गई थी जो सरयू सिंह के अद्भुत और मजबूत लंड से ही होनी थी. सुगना अपनी कोमल बुर में प्रेम रस भरे हुए अपने बाबूजी का इंतजार कर रही थी…

अपनी उत्तेजना को कायम रखने के लिए अपनी कोमल बुर को सहलाते हुए अपनी पुरानी यादों मे खो गयी….

सरयू सिंह द्वारा लाई गई बछिया के साथ खेलते खेलते सुगना अपने दर्द भूल गयी थी। उसका दिन बछिया के सहारे बीत जाता और रात को वह कजरी और सरयू सिंह का मिलन याद कर उत्तेजित हो जाती और अपनी बूर को चारपाई के बांस पर रगड़ कर वह स्खलित हो जाती।

पर जब भी वह सरयू सिंह के जादुई लंड को याद करती वह सिहर उठती। जैसे जैसे वो उत्तेजित होती वह लंड उसे अपने बेहद करीब महसूस होता। कभी वह अपने ख्यालों में उसे छूती कभी अपने कूल्हों और जाँघों से सटा हुआ महसूस करती। सुगना उस समय एक अधखिली कली की तरह थी जो शासकीय तौर पर जवान हो चुकी थी पर इतनी भी नही के सरयू सिंह जैसे बलिष्ठ और कामुक मर्द की उत्तेजना झेल सके।





वह सरयू सिंह के लंड के बारे में सोच कर अपनी बुर की प्यास तो वो मिटा लेती पर मन ही मन खुद को कोसती. वो आखिर उसकी पिता के उम्र के थे.

यह गलत है….. यह गलत है….. उसकी अंतरात्मा चीख चीख कर यह बात उसको समझाती पर उसकी चूत की मनोदशा ठीक उलट थी जो इन सब रिश्तों से दूर अब चुदने के लिए बेचैन हो रही थी।

एक दिन सुगना और कजरी दालान में बैठकर मटर छील रही थीं। सरयू सिंह अपनी गाय को नहला रहे थे। बाल्टी और मग्गे से उन्होंने गाय के पूरे शरीर को धोया वो एक साबुन की बट्टी भी ले आये थे। गर्म धूप में गाय को वह स्नान अच्छा लग रहा था। बछिया भी अपनी बारी का इंतजार कर रही थी।

सुगना उत्साहित थी जैसे ही गाय का नहाना खत्म हुआ उसने कहा

"बाबूजी हमरो बछिया के"

सरयू सिंह हंसने लगे और एक बाल्टी पानी लेकर वापस उस बछिया के पास आ गए। सुगना खुश हो गई। वह उस बछिया को धोने लगे। अचानक उनके हाथ बछिया के पेट पर चले गए वह उसके पेट की सफाई करते करते उस बछिया के स्तनों को भी साफ करने लगे। सुगना सिहर उठी। घूंघट के अंदर उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया।

वह सरयू सिंह की मजबूत हथेलियों को उस बछिया की चूचियों को धुलते देखकर स्वयं गनगना गई थी। उसे एक पल के लिए ऐसा महसूस हुआ जैसे सरयू सिंह के हाथ उसकी ही चूचियों पर हैं। वाह भाव विभोर होकर वह दृश्य देख रही थी।

कजरी ने कहा "बेटी जल्दी-जल्दी छील" सुगना की उंगलियां फिर चलने लगी पर उसकी कजरारी आंखें अभी भी सरयू सिंह की हथेलियों पर थीं। सरयू सिंह ने बछिया के स्तनों पर लगे छोटे-छोटे कीड़ों को हटाना शुरू किया। ( गांव में अक्सर मवेशियों के स्तनों में छोटे-छोटे कीड़े चिपक जाते हैं) सरयू सिंह अपने हाथों से वह निकालने लगे बीच-बीच में वह बछिया के स्तनों को सहला देते। उसकी चूचियों पर हाथ पढ़ते ही सुगना से बर्दाश्त ना होता उसे अब उसे अपनी जांघों के बीच गजब गीलापन महसूस हो रहा था।

बछिया को धोते समय सरयू सिंह ने सुगना की तरफ देखा ताकि वह उसकी प्रतिक्रिया देख सकें पर सुगना ने शर्म से अपना सर झुका लिया।

कजरी की उपस्थिति में वह अपनी बुर को छू भी नहीं सकती थी और न ही अपनी चूचियों को सहला सकती थी। वह उत्तेजना से भर चुकी थी और जल्द से जल्द वहां से हटना चाहती थी। उसने कजरी से अनुमति मांगी और भागकर गुसलखाने में चली गई।

जब वह मूतने के लिए नीचे बैठी, उसकी बुर से रिस रही चिपचिपी लार जमीन पर छू गयी।





सुगना की उंगलियां अपनी बुर के दाने पर चली गयीं। उत्तेजना में मूत पाना उसके लिए संभव नहीं हो रहा था।

उसने अपने दाने को मसलना शुरू किया। सुगना की जाँघें तन गयीं। वह कभी अपनी जांघों को आपस में सटाती कभी दूर करती, कभी अपने कोमल नितंबों को ऊपर करती। वह तड़प रही थी उसकी कुवांरी चूत पानी छोड़ने लगी उत्तेजना धीमी पड़ते ही मूत्र की तेज धार भी बाहर आ गई। सुगना तृप्त हो गई थी। आज उसकी कामुकता में एक नया अनुभव जुड़ गया था।

सुगना के कोमल मन में सरयू सिंह की छवि धीरे-धीरे बदल रही थी। वह उनके प्रति आकर्षित हो रही थी। उसे भी यह बात पता थी कि सरयू सिंह उसके पिता तुल्य थे और ससुर थे। पर वह एक बलिष्ठ और दमदार मर्द थे इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता था। सुगना को वह पसंद आने लगे थे। पर क्या वह अपने शरीर को उन्हें छूने देगी? जब वह सोचती वह शर्म से पानी पानी हो जाती पर जब एक बार उसके मन में यह विचार आ गया तो वह इस बारे में बार-बार सोचने लगी. जितना ही वह सोचती उतना ही वह उनके प्रति आसक्त होती. यह अद्भुत अनुभव था।

अपने ससुर को अपनी कल्पना में रख उसने कई बार अपनी चूत को सहलाया और मन ही मन उनके उस विशालकाय लंड को छूने और अपनी चूत पर रगड़ने के लिए खुद को तैयार किया। उसे अपनी चूत के अंदर ले पाना अभी भी उसकी कल्पना से परे था। सरयू सिंह का मूसल खलबट्टे के लायक था और सुगना की चूत अभी अदरख कूटने वाली ओखली के जैसे छोटी थी। इन सब के बावजूद सुगना अपनी कल्पनाओं में धीरे-धीरे सरयू सिंह के नजदीक आ रही थी।

सुगना को इस घर मे आये कई दिन बीत चुके थे पर सरयू सिंह अब तक सुगना का चेहरा नहीं देख पाए थे। घूंघट होने की वजह से चेहरा देखना संभव नहीं था न ही उन्होंने अपनी तरफ से कोई प्रयास किया था । वैसे भी सरयू सिंह के मन में उस समय तक सुगना के प्रति कोई कामुक भावनाएं नहीं थी। वह अपनी आत्मग्लानि से उबर रहे थे और सुगना को भरसक खुश करने का प्रयास कर रहे थे।

समय तेजी से बीत रहा था।उधर नियति उन्हें करीब लाने की साजिश रच रही थी। उस दिन बड़ी वाली गाय रंभा रही थी। उसकी योनि से चिकना द्रव्य बह रहा था। कजरी और सरयू सिंह बाहर टहल रहे थे। कजरी ने कहा

"लागा ता टाइम हो गइल बा जाइं ना भुवरा के बोल दी सांडवा के लेले आयी।" भूवरा पास के गांव का ही एक व्यक्ति था जिसने एक बलशाली सांड पाला हुआ था वही आसपास की सभी गायों को गर्भवती करने के काम आता था।

शाम तक भूवरा सांड लेकर दरवाजे पर आ चुका था। कजरी, सरयू सिंह और हरिया बाहर ही थे बाहर की गहमागहमी देखकर सुगना भी अपनी कोठरी से खिड़की खोल कर बाहर के दृश्य देखने लगी।

सांड निश्चय ही बेहद बलिष्ठ और मजबूत था। कुछ ही देर में सांड को गाय के पास लाया गया। बगल में बछिया भी टुकुर टुकुर देख रही थी। उसकी जवानी फूटने में ज्यादा वक्त नहीं था बस कुछ ही दिनों की बात थी ।

वह सांड बार-बार बछिया की तरफ ही आकर्षित हो रहा था। हरिया और सरयू सिंह उसे खींचकर गाय की तरफ लाते पर वह अपनी ताकत से वापस बछिया की तरफ चला जाता। सांड बार बार अपना चेहरा बछिया के पिछले भाग की तरफ ले जाता और उसे सूंघने का प्रयास करता।

कजरी यह देख कर मुस्कुरा रही थी। वह शर्माकर वहां से हट गई और दालान में आकर बैठ गयी। उधर कोठरी के अंदर सुगना सिहर रही थी। वह यह दृश्य अपने बचपन मे भी देख चुकी थी पर आज अलग बात थी। आज वह बलिष्ठ सांड उसकी बछिया के साथ मिलन का प्रयास कर रहा था। सुगना की खुद की चूत संभोग के लिए आतुर थी। उसने स्वयं को बछिया की जगह रख कर सोचना शुरू कर दिया था। उसकी कल्पना में सांड की जगह सरयू सिंह दिखाई पड़ने लगे और उस गाय की जगह उसकी अपनी सास कजरी।

सुगना अपनी सोच पर मुस्कुराई पर उसकी मुस्कुराहट पर उसकी उत्तेजना भारी थी। वह सांसे रोक कर यह दृश्य देख रही थी पर उसकी धड़कन तेज थी। उसने अपनी जाँघे आपस में सटाई हुई थी जैसे वह अपनी चूत से बह रहे मदन रस को वही रोके रखना चाहती हो।

सरयू सिंह सांड को खींच कर गाय की तरफ ले जाते पर वह बार-बार बछिया के पीछे जा रहा था और उछलकर उस पर चढ़ने का प्रयास करता। हरिया के कहा

"सार, इनको के नइकी माल चाहीं"

सरयू सिंह मुस्कुरा दिये। उधर सुगना अपनी जाँघों के बीच बहते मदन रस को अपने पेटीकोट से पोछ रही थी। उसे यह तो पता था की जानवरों में भी संभोग उसी प्रकार होता है जैसा मनुष्यों में पर क्या भावनाएं भी उसी प्रकार होंगी। क्या बाउजी भी उसके बारे में ऐसा सोचते होंगे?

उसे अपनी सोच पर शर्म आयी पर चूत तो विद्रोही हो चुकी थी। वह इस सोच पर सिहरने लगी। सुगना अपनी कोमल हथेलियों से अपनी बुर को मुट्ठी में भरकर अपनी उत्तेजना को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही थी।

हरिया ने बछिया को वहां से हटा दिया। सांड के पास और कोई रास्ता नहीं बचा था। वह कुछ देर इधर-उधर देखता रहा और फिर गाय के ऊपर चढ़ गया। सुगना एक पल के लिए उस सांड के लिंग को देख पायी। सुगना की भावनाओं में सरयू सिंह एक बार फिर कजरी को ही चोद रहे थे सुगना और उसकी बछिया को को शायद अभी और इंतजार करना था….





परन्तु आज सुगना का इंतजार खत्म हो चुका था सरयू सिंह के कदमों की आहट सुगना सुन पा रही थी। जैसे-जैसे उनके कदम करीब आ रहे थे सुगना की सांसे रुक रही थी पर उसकी कोमल चूत मुस्कुराने लगी थी

दरअसल सरयू सिंह नहाने ही जा रहे थे तब तक उन्हें मुखिया के घर हो रही पूजा का ध्यान आ गया था। वह अपनी लंगोट उतार चुके थे कजरी के कहने पर वह अपने सूरज बाबू को तेल लगाने के लिए उन्हीने वापस अपनी कमर में धोती लपेटी और सुगना के रूम में प्रवेश कर गए। चौकी पर सुगना लेटी हुई थी और चारपाई खाली थी छोटा बाबू हमेशा चारपाई पर ही सोता था उन्होंने पुकारा….

"सुगना बेटा…."

सुगना ने कोई उत्तर नहीं दिया.

"सुगना बेटा…." इस बार आवाज और भी मीठी थी पर सुगना ने फिर भी कोई उत्तर न दिया परंतु उसके होठों पर मुस्कान आ चुकी थी।

वो सुगना की चादर धीरे-धीरे खींचने लगे। जैसे-जैसे चादर हटती गयी सुगना का तेल से भीगा हुआ कोमल और सुंदर शरीर सरयू सिंह की निगाहों के सामने आता गया एक पल के लिए ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह खजुराहो की किसी मूर्ति का अनावरण कर रहे हों।

अपनी नग्न चूत का एहसास जब सुगना को हुआ उसने अपनी जाँघे एक दूसरे पर चढ़ा लीं और अपनी अध खुली आंखों से अपने बाबू जी को देखने लगी। उन आखों ने आज सरयू सिंह की धोती को उठते हुए देख लिया। धोती के अंदर छुपी हुई अनुपम कलाकृति अपना आकार बड़ा रही थी।

अपनी जान से प्यारी बहू को इस अवस्था में देखकर सरयू सिंह अपनी उत्तेजना को काबू में ना रख पाए और लंगोट न पहने होने की वजह से उनका लंड खुलकर सामने आ गया.

सरयू सिंह सुगना की आंखों में वासना देख चुके थे उनकी खुद की आंखें अब लाल हो चुकी थी सूरज कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था। सुगना को इस हाल में देखकर उनकी खुशी का ठिकाना न था। वह खुशी को काबू में नहीं रख पा रहे थे फिर भी उन्होंने सुगना से पूछा

"भवजी कहत रहली बाबू के तेल लगावे के, कहां बा? लाव लगा दी."

सुगना खिलखिला कर हंस पड़ी. उसने इतराते हुए कहा

"उ का तेल धइल बा लगा दीं?"

"लेकिन बाबू कहां बा?"

"हम राउर बाबू ना हईं? सासू मां हमरे के तेल लगावत रहली हा रउआ उनका के भेज देनी हां. उ सूरज के लेके पूजा में चल गइली"

सुगना ने यह बात बड़ी मासूमियत से कह दी पर उसकी मासूमियत ने सरयू सिंह के लंड को उछलने पर मजबूर कर दिया। सरयू सिंह से अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा था वह चौकी पर आ गए। धोती जाने कब उनके शरीर से अलग हो चुकी थी।

पास पड़ी हुई तेल की कटोरी में रखा हुआ तेल अब ठंडा हो चुका था उन्होंने सुगना से पूछा

"बाबू तेलवा गर्म कर दीं?"

"जइसन राउर मन" सुगना ने मुस्कुराते हुए कहा। शरीर सिंह तेल की कटोरी लेकर रसोई घर की तरफ गए अपनी खुशी में वह इतने उत्तेजित हो गए थे धोती पहनना भूल गए। सुगना चलते समय उनके हिलते हुए लंड को देख रही थी। वह मन ही मन मुस्कुरा रही थी। वह यह बात जानती थी कि उसे नंगा देखने के पश्चात सरयू सिंह के शरीर का सारा लहूं उनके लंड में समा जाता था और दिमाग सुस्त हो जाता था. कुछ ही देर में सरयू सिंह गर्म तेल लेकर सुगना के पास आ चुके थे।

वह अपने विशाल मर्दाना शरीर को लेकर चौकी पर पालथी मारकर पद्मासन में बैठ गए और पदमा की पुत्री सुगना को अपनी गोद में आने का न्योता दे दिया। उनका खड़ा लंड ऊपर की ओर मुह करके अपनी प्यारी बुर इंतजार कर रहा था।

सुगना के पास आते ही उन्होंने सुगना को अपनी गोद में बैठा लिया ठीक उसी तरह जैसे होलिका ने प्रहलाद को अपनी गोद में बैठाया हुआ था पर यहां परिस्थितियां उल्टी थीं सरयू सिंह के विशाल शरीर के बीच में छोटी सुगना भी उनकी गोद मे पालथी मारकर बैठ चुकी थी। सुगना ने बड़ी ही खूबसूरती से सरयू सिंह के काले और मजबूत लंड को अपनी दोनों गोरी जांघों के बीच से बाहर निकाल लिया था। सरयू सिंह ने सुगना का वजन अपनी जांघों पर लिया हुआ था।

सरयू सिंह ने पास पड़ी कटोरी से तेल अपनी हथेलियों में लिया और सुगना की पेट पर मलने लगे। सुगना की नाभि को तेल से सराबोर कर उन्होंने अपनी उंगली से उसे गुदगुदाया एक पल के लिए उन्हें नाभि का वह छेद सुगना की कोमल गांड के जैसा महसूस हुआ। जाने सरजू सिंह के लंड में इतनी संवेदना कहां कहां से आती थी वह उस सोच से तुरंत ही उछल गया जिसका एहसास सुगना और उसकी चूत को बखूबी हुआ जो खड़े लंड से सटी हुई थी।

उनकी एक हथेली ऊपर की तरफ बढ़ती गई और दूसरी नीचे की तरफ। सरयू सिंह की दाहिनी हथेली ने सुगना की चूची को पकड़ लिया पर अब सुगना की चूचियां बड़ी हो चली थी। सरयू सिंह को उसे अपनी हथेलियों में भरने में मशक्कत करनी पड़ रही थी। वह अपनी उंगलियों से उसे काबू में करने की कोशिश करते पर वह छलक कर दूसरी तरफ निकल जाती। कजरी द्वारा चुचीयों पर लगाया हुआ तेल उनकी परेशानी और बढ़ा रहा था। सुगना मुस्कुरा रही थी। सरयू सिंह उसका चेहरा नहीं देख पा रहे थे पर वह सुगना के शरीर की सिहरन को महसूस जरूर कर पा रहे थे। उनकी बायीं हथेली अब सुगना की जांघों के बीच में उसकी बूर को छूने का प्रयास कर रही थी। सुगना अपनी जांघों को सिकोड नहीं पा रही थी पर अपनी बुर को स्वयं अपनी हथेलियों से और अपने बाबूजी के लंड के सहारे ढकी हुई थी। सरयू सिंह की हथेलियां सुगना के कोमल हाथों को हटाने का प्रयास कर रही थीं पर सुगना अभी अपने बाबू जी को वह सुख नहीं देना चाह रही थी।

सरयू सिंह ने जिद नहीं की और वह उसकी जांघों का मसाज करने लगे। कुछ देर जाँघों से खेलने के बाद उन्होंने अपने दोनों हाथ सुगना की चूचियों पर ले आये। अपने दोनों हाथों के प्रयोग से उन्होंने सुगना की चुचियों पर काबू पा लिया और वह प्यार से मीसने लगे





सुगना की मादकता भरी कराह सुनायी दे गयी।

"बाबूजी तनि धीरे से…...दुखाता" उसकी बात खत्म होने से पहले ही चुचियों से धार फूट पड़ी।

खुशियों से निकली हुई दूध की धार जांघों पर गिर रही थी सरयू सिंह ने सुगना का दूध बर्बाद करना उचित नहीं समझा उन्होंने चुचियों को मीसना छोड़ उन्हें सहलाना शुरु कर दिया।

इधर सुगना के हाथ अपनी चूत को छोड़ सरयू सिंह के लंड पर आ गए। वह उसकी जांघों के बीच से निकल कर अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा था। हाथों में लगा हुआ तेल और सुगना की बुर से रिसा हुआ चिपचिपा प्रेम रस दोनों का प्रयोग कर सुगना ने लंड के सुपारे को मसल दिया। जितनी कोमलता से उसके बाबूजी उसकी चूचियां सहला रहे थे उसी कोमलता से सुगना उनके लंड को सहलाने लगी।

सरयू सिंह बेहद उत्तेजित हो गए। उन्होंने एक बार फिर ना चाहते हुए भी सुगना की चूचियां मसल दीं। सुगना जैसे-जैसे उनके लंड को सहलाये जा रही थी वो मदहोश हुए जा रहे थे। वह सुगना को लगातार गर्दन और कानों पर चूमे जा रहे थे। उनकी धड़कन तेज हो चुकी थीं। सुगना स्वयं भी पूरी तरह चुदने के लिए तैयार थी।

अचानक सुगना ने उनकी गोद से उठकर अपनी अवस्था बदल ली। अब वह अपने बाबूजी की तरफ चेहरा करके एक बार फिर वापस गोद में बैठ गयी। उसने अपने दोनों घुटने सरयू सिंह की कमर के दोनो तरफ कर लिए। नीचे बैठते समय एक पल के लिए उसे लगा कि लंड सीधा उसके बुर में प्रवेश कर जाएगा पर उसने अपने हाथों का प्रयोग कर लंड को अपने और अपने बाबूजी के पेट के बीच में व्यवस्थित कर दिया और उनकी मजबूत जांघों पर बैठ गई।

उसकी चूचियां अब सरयू सिंह के सीने में समा जाने को आतुर थीं सरयू सिंह उसे अपने आलिंगन में ले चुके थे और अपनी तरफ तेजी से खींचे हुए थे। सुगना की चुची बड़ी पावरोटी की तरह हो गई थी। पर निप्पल सरयू सिंह के सीने में अपनी उपस्थिति और प्रतिरोध दोनों दर्ज करा रहे थे।

ससुर और बहू की आंखें मिलते ही दोनों ने एक दूसरे की मनोदशा पढ़ ली। होंठ स्वतः ही मिलते चले गए। अब शर्म की गुंजाइश न थी। सरयू सिंह की बड़ी हथेलियां सुगना के चूतड़ों को सहलाने लगीं। वह उनसे सुगना को सहारा भी दिए हुए थे।

सरयू सिंह की मूछें सुगना के कोमल होठों में चुभ रही थीं। वह ज्यादा देर तक उन्हें न चूम पाई पर उसने बाबूजी को खुश करने की ठान ली थी वह बोली

"लायीं, आपोके तेल लगा दीं"

बिना उत्तर का इंतजार किए शुगना ने कटोरी से ढेर सारा तेरे हाथों में लिया और अपने बाबूजी की पीठ पर मलने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी विशाल प्रदेश पर छोटी-छोटी हथेलियां घूम रही हों। जैसे-जैसे वो उनकी पीठ पर अपनी हथेलियां फिराती उसे सरयू सिंह की दमदार मर्दानगी का एहसास होता। वह उनके बलिष्ठ शरीर की कायल शुरू से रही थी और आज अपने कोमल हाथों से उनकी मालिश कर वह भाव विभोर हो गयी। वह अपने दोनों घुटनों का सहारा लेकर थोड़ा ऊपर उठ गयी और अपने सिर को उनके कंधे के पीछे ले जाकर उनकी पीठ को मालिश करने लगी।

इस दौरान उसकी एक चुचीं सरयू सिंह के होंठों के ठीक सामने थी। उन्होंने बिना देर किए उसे मुह में ले लिया और चूसने लगे





उसके गोल और कोमल चूतड़ ऊपर उठ गए थे। सुगना की फूली और रिस रही चूत सरयू सिंह की नाभि तक आ चुकी थी। सरयू सिंह का लंड कभी उससे छू जाता कभी उससे दूर हो जाता। सरयू सिंह ने एक बार फिर अपनी हथेलियां तेल में डूबा लीं और सुगना बाबू के चूतड़ों को सहलाने लगे। उनकी उंगलियों ने सुगना की दरार में अपनी पसंदीदा जगह खोज ली तेल में डूबे होने की वजह से वो सुगना की गांड में उतनी ही दूर तक सफर कर पाई जितना रास्ता उसकी सास कजरी ने बनाया था। तेल की मात्रा अभी भी सुगना की गांड के अंदरूनी भाग पर उपलब्ध था। सरयू सिंह की मोटी तर्जनी सुगना की गांड के छेद को सहला रही थी। सुगना अपनी गांड को कभी सिकोडती कभी फैलाती वह आनंद में डूब चुकी थी उत्तेजना चरम पर थी। सरयू सिंह आज खुद आश्चर्यचकित थे। आज सुगना ने उनकी उंगलियों को हट जाने का न तो इशारा किया था न हीं अपनी तिरछी निगाहों से आपत्ति दर्ज की थी।

सरयू सिंह का लंड ससुर बहू के उत्तेजक क्रियाकलापों से परेशान हो चुका था उसे तो सिर्फ सुगना के बुर की रजाई ओढ़ कर उछल कूद करनी थी पर उसकी बारी आ ही नहीं रही थी। वह उछल उछल कर सुगना के बुर को चूमने का प्रयास जरूर कर रहा था

कहते हैं उत्तेजना में शरीर के अंग दिमाग का साथ न देकर कामुक अंगो का ही साथ देते हैं। सुगना की गांड से खेलते खेलते सरयू सिंह की उंगलियां कुछ ज्यादा अंदर तक प्रवेश कर गयीं। सुगना चिहुँक गयी और बोली

" बाबूजी तनी धीरे से ……….दुखाता"

सुगना अनियंत्रित हो गई और उसने वापस उनकी गोद में बैठने का प्रयास किया पर सुगना से एक गलती हो गई वो लंड को अपने और अपने बाबूजी के पेट में के बीच करना भूल गई। जैसे ही वह उनकी गोद में बैठी लंड गप्पपप्पप्प से उसकी बुर के अंदर प्रवेश कर गया। जब तक वह संभल पाती तब तक आधे से ज्यादा लंड भीतर हो चुका था। जब तक सुगना आगे की गतिविधि के बारे में सोचती सरयू सिंह में उसे और नीचे खींच लिया। लंड सुगना के गर्भाशय से टकरा रहा था पर फिर भी अभी गुंजाइश बाकी थी।

सरयू सिंह जब अपनी जांघें ऊपर उठाते सुगना ऊपर की तरफ आती और लंड बाहर निकल आता पर उसका मुखड़ा चुत से सटा रहता और जैसे ही वह अपनी जाँघे फैलाते सुगना नीचे आती और लंड गप्पपपप से एक बार फिर सुगना की गर्भाशय को चूमने लगता। सरयू सिंह का लंड अब खुश हो गया था उसका खेल चालू हो गया था सुगना की चूत भी मुस्कुरा रही थी।

सरयू सिंह अभी भी अपनी आदत से बाज नहीं आ रहे थे उनकी उंगलियां अभी भी सुगना की गांड से खेल रही थी पर अब सुगना को कोई आपत्ति नहीं थी वह उस का आनंद ले रही थी उसी दौरान सुगना की निगाह अपने बाबू जी से टकरा गयी उनकी उंगली सुगना की गांड में फंसी हुई थी सुगना ने उनके होंठ चूम लिये जैसे वह उनकी इस गतिविधि को सहर्ष स्वीकार कर रही हो सरयू सिंह खुश हो गए। सुगना के इशारे पर वह चौकी पर पीठ के बल लेट गए।

सुगना अभी भी उनके लंड पर बैठी हुई थी उनके पैर सीधे हो गए अब प्रेमरथ को खींचने की सारी जिम्मेदारी सुगना के ऊपर आ चुकी थी। वह अपनी कमर को तेजी से हिलाने लगी। उसकी चूचियां सरयू सिंह की आंखों के ठीक सामने थीं। जिन सूचियों को शरीर सिंह ने अपने हाथों से बड़ा किया था वह चलकर उन्हें ललचा रही थी। सरयू सिंह इतनी मादक अवस्था में सुगना को देखकर अपना होश खो बैठे उन्होंने अपनी गर्दन उठाई और सुगना की दाहिनी चूँची को लेकर लगभग पीने लगे। दूध की धार फूट पड़ी पर वह लगातार उसे पीते रहे।





सुगना भी इतनी उत्तेजना बर्दाश्त न कर पायी उसकी चूत कांपने लगी। उसके चेहरे पर तरह-तरह के भाव आ रहे थे तभी वह अपने होठों को दांतों से काटती कभी आंखें बड़ी कर लेती कभी सिकोड लेती... सरयू सिंह ने उसी अवस्था में उसकी कमर पर अपनी हथेलियां रखते हुए उसे अपनी तरफ खींच लिया और अपने लंड को तेजी से आगे पीछे करने लगे। सुगना की थरथराहट और बढ़ती गई बाबूजी……. बाबूजी…….आ……..ईईईई………..बा…..बु……..अअअअअअअ…... हहहहहह…..सुगना मादक कराह निकालते हुए वह स्खलित हो गयी। ससुर जी ने अभी भी अपनी रफ्तार कम न की और अपने लंड को उसके गर्भाशय के मुख तक पहुचा कर अपनी वीर्य धारा छोड़ दी।

सुगना अपने अंदर हो रही इस वर्षा को महसूस किया लंड का फूलना पिचकना उसकी बुर बड़े अच्छे से समझने लगी थी। सुगना अपने बाबुजी के पेट पर लेटी हुई एक छोटे बच्चे की भांति प्रतीत हो रही थी सरयू सिंह प्यार से कभी उसकी पीठ सहलाते कभी नितम्ब।

बाहर से कजरी के आने की आवाज आई कजरी ने आंगन से ही आवाज दी थी

"लगा लेनी अपना सुगना बाबू के तेल" सरयू सिंह शरमा गए और सुगना भी। सुगना उनके शरीर से उठकर जमीन पर खड़ी होने लगी। सरयू सिंह ने आनन-फानन में अपनी धोती पहनी और बोले

"हां हां लगा देनी तोहरा बतावे के रहे हम ही पूजा में चल जईति"

कजरी मुस्कुरा रही थी उसने अपने कुँवर जी को फिर छेड़ा

"चारों ओर लगा देनी है नु बहरी भीतरी"

सरयू सिंह ने कोई जवाब न दिया वह अपनी कजरी भाभी की छेड़खानी समझ रहे थे. उन्होंने धोती पहन ली और हैंड पंप के पास आकर नहाने की तैयारी करने लगे। कजरी ने सूरज को सुगना के हवाले किया और सरयू सिंह को नहलाने के लिए हैंडपंप से बाल्टी में पानी निकालने लगी।

सुगना बेहद खुश थी। और वह अपनी कोठरी से अपने बाबूजी को नहाते हुए देखने लगी और मंद मंद मुस्कुराने लगी। उसके जीवन में अब खुशियां ही खुशियां थीं

सुगना सरयू सिंह के मन में छुपी कामुक इच्छाओं को भलीभांति जानती थी और समय के साथ उसे पूरा करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ भी थी……. फिलहाल वो अपने बाबूजी के बलिष्ठ शरीर को नंगा देखकर उस सांड को याद करने लगी...

Wish u happy weekend.
 
इस अनैतिक पर कामुक कहानी को पढ़ने और सराहने के लिए पाठकों को धन्यवाद....

जुड़े रहे....और प्रोत्साहित करते रहें....

आपका दिन मंगलमय हो.....
 
सुगना ने जब से सांड को बछिया की तरफ आकर्षित होते हुए देखा था तब से ही वह यह बात सोचती कि क्या संभोग के लिए उम्र का कोई अंतर नहीं है? वह सांड जब गाय और बछिया दोनों को चोदने की सोच सकता है तो क्या बाबूजी के मन में भी ख्याल आता होगा? जितना ही वह सोचती उतना ही उत्तेजित होती। वैसे भी सरयू सिंह सुगना के ससुर नहीं थे । हां एक रिश्ता जरूर बन गया था जो उनके और कजरी के बीच बने नाजायज रिश्ते की वजह से था।

सुगना ने अपने बाबूजी का मन टटोलने का फैसला कर लिया। वह अपनी बछिया की तरह नंगी तो नही घूम सकती थी पर उसने मन ही मन कुछ सोच लिया था।

सरयू सिंह और कजरी सुगना की मनोदशा से अनभिज्ञ थे। वह अभी भी उन्हें मासूम सी दिखाई पड़ती जिसके साथ उन्होंने न चाहते हुए भी अन्याय कर दिया था। अभी भी उन्हें ऊपर वाले पर भरोसा था पर सुगना अब और इंतजार करने की इच्छुक नहीं थी।

सुबह-सुबह आंगन में लगे हैंडपंप पर उकड़ू बैठ कर सुगना बर्तन धो रही थी सरयू सिंह दालान से आंगन में आ गए। सुगना ने अपनी सास कजरी का ब्लाउज पहना हुआ था जो उसकी मझोली चूचियों पर फिट नहीं आ रहा था। ब्लाउज थोड़ा नीचे लटका हुआ था और चुचियों का उभार साफ साफ दिखाई पड़ रहा था। काम करने की वजह से उसने अपने पल्लू पर ध्यान न दिया। वह उसके चेहरे को तो ढक रहा था पर चूचियों का ऊपरी भाग खुली हवा में सांस ले रहा था। ब्लाउज सुगना के निप्पलों का सहारा लेकर लटका हुआ प्रतीत हो रहा था।





सरयू सिंह सुगना की चुचियों को देख कर अवाक रह गए। वह गोरी गोरी चूचियों के आकर्षण में खोए हुए कुछ देर तक उसी अवस्था में खड़े रहे। एक पल के लिए वह यह भूल गए कि वह अपनी मासूम बहू सुगना की चूँची पर ध्यान गड़ाए हुए हैं। सुगना उनकी कामुक दृष्टि को अपनी चुचियों पर महसूस जरूर कर रही थी। उसे घूंघट का फायदा मिल रहा था वो सरयू सिंह की निगाहों को पढ़ रही थी।

सुगना ने अनजान बनते हुए कहा

" बाबूजी कुछु चाहीं का?"

" ना बेटा एक लोटा पानी दे द दतुअन कर लीं" उन्होंने बेटा कह कर अपनी कामुक निगाहों के पाप को धोने की कोशिश की। पर उनके मन मस्तिष्क पर बहु की चुचीं का रंग चढ़ चुका था। आज उन्होंने जो देखा था उसने उन्हें हिला दिया था वह वापस दालान में आ गए और अपने तनाव में आ रहे लंड को ध्यान भटका कर शांत करने की कोशिश की। यह पाप है….. यह पाप है उन्होंने मन ही अपने दिमाग को समझाया और वापस अपने कार्य में लग गए.

सुगना बर्तन धो कर गिलास में दूध लेकर सरयू सिंह के पास आयी। उसने सरयू सिंह को दोहरा झटका दे दिया। उसका घूंघट उठा हुआ था.





सुगना का बेहद सुंदर चेहरा, कोमल गुलाबी होंठ और कजरारी आंखें सब कुछ एक साथ …… बेहद खूबसूरत … सरयू सिंह सुगना की खूबसूरती में खो गए। सुगना ने घूंघट जरूर लिया था पर उसने सिर्फ अपने माथे को ढका हुआ था। सरयू सिंह उसे एकटक देखते रह गए। वह अपनी मां पदमा की प्रतिमूर्ति थी। सरयू सिंह एक बार फिर जड़ हो गए।

"बाउजी दूध ले लीं" सुगना की मधुर आवाज ने उनकी तंद्रा तोड़ी। सरयू सिंह ने कांपते हाथों से दूध ले जिया। आज सरयू सिंह जैसे मजबूत और बलिष्ठ आदमी के हाँथ अपनी सुंदर बहु के हांथों दूध लेने में कांप रहे थे। यह कंपन निश्चय ही उनके मन मे आयी गलत भावना की वजह से था।

सरयू सिंह का अंतर्मन हिला हुआ था। वह खुद को समझा भी नहीं पा रहे थे। वह पद्मा को याद करते हुए दूध पीने लगे।

पदमा सरयू सिंह के जीवन में आई दूसरी महिला थी सरयू सिंह उस समय अपनी जवानी के चरम पर थे 25 - 26 वर्ष की आयु कसरती शरीर चेहरे पर चमक और अपनी कजरी भाभी से मिले नारी शरीर का अनुभव और कामकला के ज्ञान ने उन्हें एक आदर्श पुरुष की श्रेणी में ला दिया था। सफेद धोती कुर्ता और अंग वस्त्र में वह एकदम संभ्रांत पुरुष दिखाई पड़ते। ऊपर से पटवारी का पद वह पूर्णतयः वर योग्य पुरुष थे पर उन्होंने विवाह न किया था। वैसे भी उनकी शारीरिक जरूरतें कजरी से पूरी हो ही जा रही थी।

सरयू सिंह की ननिहाल बेलापुर में उनके मामा की लड़की की शादी थी। सरयू सिंह ने वहां जाने के लिए पूरी तैयारी की और सज धज कर बेलापुर के लिए निकल पड़े।

गांव लगभग 10- 15 किलोमीटर दूर था उन्होंने पैदल ही जाने का फैसला किया उन्हें साइकिल से चलना अच्छा नहीं लगता था. अपने लंबे लंबे कदमों से उन्होंने वह दूरी डेढ़ -दो घंटे में तय कर ली. वह बेलापुर गांव के तालाब के पास आ चुके थे. यह तालाब बेहद मनोरम था यूं कहिए तो वह बेलापुर की शान था. वहां पर दो अलग- अलग घाट थे एक महिलाओं के लिए और दूसरा पुरुषों के लिए। सौभाग्य की बात थी बेलापुर जाते समय महिलाओं वाला घाट रास्ते में ही पड़ता था।

सरयू सिंह की नारी शरीर से विशेष आसक्ति थी वह ना चाहते हुए भी एक बार तालाब में नहा रही महिलाओं को नजरें बचाकर देख लेते थे। छोटी बड़ी सब प्रकार की महिलाएं उनके नजरों से एक बार जरूर गुजरतीं। आज भी तालाब के करीब आते ही उनके दिल में हलचल होने लगी।

सुबह 9-10 बजे का वक्त था कई सारी जवान युवतियां और लड़कियां तालाब में नहा रहीं थी। सरयू सिंह ने अपनी निगाहों से तालाब में नहा रही जवानीयों को अपनी निगाहों में कैद करना चाहा। वह चलते-चलते बीच-बीच में एक झलक उन्हें जरूर देख लेते। धीरे धीरे उनके नैनसुख का वक्त खत्म हो रहा था तालाब का दूसरा किनारा करीब आ चुका था तभी कुछ लड़कियों के चिल्लाने की आवाज आई

"बचाव….बचाव…..उ डूब जाइ केहू बचा ले…"

ढेर सारी लड़कियों के चीखने की आवाज आ रही थी। सरयू सिंह के कदम रुक गए उन्होंने पीछे मुड़कर देखा सारी लड़कियां उन्हें ही पुकार रही थीं। वाह भागकर तालाब तक गए। उन्होंने कंधे में टंगा हुआ बैग और लाठी जमीन पर रखी और कुर्ता खोल कर तालाब में कूद पड़े। उन्होंने अपनी धोती नहीं खोली उन्हें उन लड़कियों के सामने इस तरह नंगा होना अच्छा नहीं लगा।

वह तालाब के अंदर तैरते हुए उस जगह तक पहुंच गए जहां एक लड़की पानी में अपनी जान बचाने के लिए हाथ पैर मार रही थी।





वह कभी वह पानी के भीतर चली जाती, कभी उसका सर बाहर दिखाई पड़ता। सरयु सिंह उसके करीब पहुंच गए वह पदमा थी उन्होंने उसे अपनी मजबूत भुजाओं से पकड़ लिया। पद्मा अमरबेल की तरह उनसे लिपट गई। पर यह क्या पदमा ऊपर से पूरी तरह नग्न थी। उसकी चूचियां सरयू सिंह के कंधे पर थी सरयू सिंह ने अपने दाहिने हाथ से पदमा के नितंबों को सहारा दिया और बाये हाथ से पानी को हटाते हुए किनारे की तरफ आ गए।

उनके बलिष्ठ शरीर पर पदमा जैसी सुंदर और गोरी युवती का अर्धनग्न शरीर बेहद आकर्षक लग रहा था। यदि वहां पर कैमरा होता तो निश्चय ही किसी हिंदी फिल्म का सीन बन सकता था।

किनारे पर खड़ी सारी लड़कियां बेहद खुश थी सिर्फ एक लड़की डरी हुई खड़ी थी वह पदमा की सहेली थी।

दरअसल पदमा और उस लड़की ने तालाब के अंदर ही एक दूसरे से छेड़खानी शुरू कर दी थी उन्होंने अपने ब्लाउज उतार कर एक दूसरे की चूचियों का आकार नापना और खेलना शुरू कर दिया था। इसी दौरान पदमा का पैर फिसल गया था और वह गहरे पानी में चली गई थी। सभी लड़कियां उस बेचारी लड़की को कोस रहीं थीं।

सरयू सिंह किनारे पर आ चुके थे





उन्होंने पदमा को जमीन पर लिटा दिया और वहां से हटकर अपना कुर्ता पहनने लगे। पदमा अभी भी बेसुध थी लड़कियों ने फिर चिल्लाया

"भैया ई सांस नइखे लेत तनि देखीं ना। ए पद्मा उठ …...उठ ना…"

सरयू सिंह एक बार फिर पदमा के पास आ गए वह पीठ के बल लेटी हुई थी एक पल के लिए वो उसकी पतली कमर और चौड़ा सीना तथा उस पर दो मझौली आकार की चुचियां ( जिन पर अब किसी लड़की का झीना लाल दुपट्टा पड़ा हुआ था ) देखकर वह उसकी खूबसूरती में खो गए।

पद्मा का मुख मंडल बेहद खूबसूरत पर शांत पड़ा हुआ था सरयू सिंह नीचे झुके उन्हें आज की आरपीआर तकनीकी आती थी उन्होंने पदमा के पेट को दबाया पानी की एक धार पदमा के मुंह से निकलकर बगलमें गिर पड़ी। यही क्रिया दो-तीन बार कर उन्होंने पदमा के पेट में जमा हो गया पानी बाहर निकाल दिया। पदमा अभी भी होश में नहीं थी उन्होंने अपने दोनों हाथ उसकी चुचियों के ठीक नीचे रखें और उसके सीने को दबाने लगे पदमा के कोमल होठों को खोल कर उन्होंने उसे मुंह से सांस देने की भी कोशिश की।

उनकी यह कोशिश रंग लाई और पदमा ने अपनी आंखें खोल दें उसे अपनी नग्नता का एहसास हुआ तो उसने अपनी दोनों गोरी बाहें अपनी चुचियों पर ले गयी।

सरयू सिंह खुश हो गए उनकी मेहनत रंग लाई थी। सारी लड़कियां खुशी से चहकने लगींऔर सरयू सिंह मुस्कुराते हुए वापस अपनी लाठी के पास आ गए।

वह तालाब से बाहर आ गए लड़कियां उन्हें लगातार देखे जा रही थीं उन्होंने हाथ हिलाकर उनका अभिवादन किया और अपने मामा के घर चल पड़े। उनके दिमाग में पदमा की सुंदर और कमनीय काया घूमने लगी विशेषकर मासूम सा कोमल चेहरा, उसका कटि प्रदेश और मदमस्त चूचियाँ।

सरयू सिंह पदमा को पहले से भी जानते थे। वह उनके मामा के ठीक बगल में अपने मां-बाप के साथ रहती थी। बचपन में भी जब वह मामा के घर आया करते दोपहर में सारे बच्चे एक साथ खेलते जिसमें एक पदमा भी थी। पर आज पदमा पूरी तरह जवान थी उसका विवाह कुछ समय पहले हुई हुआ था और गवना भी हो चुका था। शायद वह भी सरयू सिंह के मामा की लड़की की शादी में ही आई हुई थी। पदमा को यौन संभोग का सुख मिल चुका था।

सरयू सिंह जब भी अपने मामा के घर आंगन में जाते आसपास की लड़कियां और युवा औरतें उन्हें घेर लेतीं। ऐसा नहीं था कि वह सब की सब उनसे चुदने के लिए आतुर रहती थीं अपितु यह एक सामान्य प्रक्रिया होती। लड़कियां उनसे बातें करतीं। वैसे भी वह गांव के ऐसे व्यक्ति थे जो नौकरी कर रहे थे और प्रतिष्ठित भी थे। इस छोटी सी उम्र में जो उपलब्धियां उन्होंने हासिल की थी वह उन्हें उस उम्र के पुरुषों से अलग खड़ा करती थीं।

शाम को एक बार फिर सरयू सिंह अपने मामा के आंगन में चारपाई पर बैठे हुए थे और महिलाओं से गिरे हुए थे उन लड़कियों में पदमा भी थी।

एक लड़की ने कहा

"ए पदमा देख सरयू भैया आईल बाड़े जो तनि सेवा वेवा कर"

कुछ लड़कियों ने पदमा को ढकेल कर सरयू सिंह के सामने कर दिया। पदमा शर्मा रही थी। उसने एक सुंदर लहंगा और चोली पहना हुआ था। चोली के अंदर उसकी गोल गोल चूचियाँ झांक रही थी पर सरयू सिंह को वह बिना कपड़ों के ही दिखाई पड़ रही थी उनकी आंखों में सुबह की नग्न छवि कैद हो गयी थी।

सरयू सिंह ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर पदमा इतनी गहराई में कैसे चली गई थी पीछे से लड़कियों की खुश फुसाहट सुनाई पड़ी..

"जवानी फुटल बा नु चूँची लड़ावतली हा लोग"

पदमा एक बार फिर लड़कियों के पीछे छुप गयी।

पद्मा ने हिम्मत जुटाकर सरयू सिंह से कहा "चली हमरा घरे, अपना हाथ से हलवा खिलाईब" तभी उसकी सहेली ने कहा

"हां भैया जाइं बहुत बढ़िया हलवा बनावेले तनी हमरो के भेज दिहे"

सरयू सिंह हंसने लगे पर पद्मा ने कहा

"हम जा तानी घरे आइब जरूर"

इतना कहकर पदमा अपने घर की तरफ चली गई। सरयू सिंह कुछ देर तक अपनी मामी से बात करते रहे और फिर वापस घर के बाहर आकर पुरुष समाज में शामिल हो गए पर उनके दिमाग में अब भी पदमा घूम रही थी। कभी वस्त्रों में कभी बिना वस्त्रों के। वह पदमा की चुचियों की तुलना कजरी से तुलना कर रहे थे। निश्चय ही पदमा की चूचियां कजरी से ज्यादा खूबसूरत और तनी हुयीं थी। कजरी की चूचियां तो उन्होंने तब देखी थी जब वह मां बन चुकी थी।

सरयू सिंह के मामा उनका परिचय गांव के और लोगों से करा रहे थे उन्हें सरयू सिंह पर हमेशा से गर्व था।

पदमा शादीशुदा थी और यौन सुख भोग चुकी पर फिर भी आज जब सरयू सिंह उसे बचा रहे थे उसे उनके बलिष्ठ शरीर का अंदाजा हो गया था वह उनके प्रति आसक्त हो रही थी। नई-नई विवाहताओं में सम्भोग को लेकर बड़ी उत्तेजना होती है। मनपसंद पुरुष का संसर्ग पाकर उनकी चूत तुरंत चुदने के लिए आतुर हो जाती है बशर्ते उस पुरुष से उन्हें प्यार हो और चुदने में मानसिक ग्लानि और प्रतिरोध ना हो। पदमा के केस में दोनो ही बातें अनुकूल थीं। अभी कल ही वह अपने पति से शुरू कर आई थी परंतु आज फिर गरमा चुकी थी

वह सरयू सिंह से बचपन से ही प्रभावित थी पर आज तो उसके मन में सरयू सिंह के प्रति प्रेम आदर और समर्पण तीनों ही भाव चरम पर थे उसकी स्वयं की उत्तेजना भी जागृत थी। सात दिनों तक मायके में अकेले रहने के बाद उसकी नई नई चुदी हुई बुर अपना साथी खोज रही थी। पद्मा ने सरयू सिंह से चुदने का मन बना लिया वह हलवा बनाते हुए अपने सरयू भैया का इंतजार करने लगी।

सरयू सिंह के मन में भी पदमा के प्रति कामुकता जाग चुकी थी। आग और फूस दोनों तैयार खड़े थे। बस उन्हें करीब लाने की देर थी।

इधर सरयू सिंह के गिलास का दूध खत्म हो गया था। आखरी घूंट में जब उन्होंने हवा निगली तो वह अपनी सोच से बाहर आ गए और मन ही मन मुस्कुराने लगे।

पदमा और पदमा की पुत्री सुगना, उन दोनों ने उनकी यादों और वर्तमान पर कब्जा जमा लिया था। वह आंखें खोल कर सुगना को ढूंढने लगे। उन्होंने सुगना का नाम एक दो बार पुकारा उत्तर ना आने पर वह आंगन में चले गए। उन्होंने एक बार फिर कोमल स्वर में सुगना का नाम पुकारा तभी कोठरी के अंदर से सुगना की मधुर आवाज आई

" बाबूजी आवतानी तनिक कपड़ा बदल लीं"

एक पल के लिए सरयू सिंह ने अपने विचारों में सुगना को कपड़े बदलते हुए सोच लिया। एक अजीब सी सनसनी उनके लंड तक पहुँच गयी। अभी उनके दिमाग में पद्मा छायी हुयी थी। एक पल के लिए उन्हें लगा कि वह कोठरी की खिड़की से सुगना को देख लें पर अभी उनका जमीर इतना भी नहीं गिरा था। वह उनकी प्यारी बहू थी और अभी भी बेटी स्वरूप थी।

तभी दरवाजे पर आवाज आई

"सरयू भैया, सरयू भैया' सुधीरवा साला केस कईले बा।

"रुक आवतानी ओकर बेटी चोदो इतना हिम्मत भईल बा"

सरयू सिंह की मर्दाना आवाज गरज उठी जिसे अंदर कपड़े बदल रही सुगना ने सुन लिया। उसने सिर्फ अपने काम की बात ही सुना "बेटी चोद"। वह भी तो किसी की बेटी थी क्या सरयू सिंह उसे चोदने के बारे में सोच सकते हैं पेटीकोट का नाड़ा बांधते सुगना के हाथ कांप रहे थे उसकी कोमल बुर सुगना की मनोदशा पढ़ रही थी।

सुधीर पास के गांव का ही एक 30 32 वर्षीय लड़का था जिसने हाल ही में वकालत की पढ़ाई एन केन प्रकारेण पूरी की थी। सरयू सिंह से उसका विवाद जमीन को लेकर था। सरयू सिंह स्वयं पटवारी थे और वह वकील दोनों एक दूसरे को हमेशा कमजोर ही आंकते थे। कद काठी में सुधीर सरयू सिंह से निश्चय ही कमजोर था पर वकालत पड़े होने की वजह से वह कागजी कार्यवाही में उनसे आगे था।

खेत विवाद का उचित समाधान न मिलने की वजह से उसने शहर में केस कर दिया था। सरयू सिंह उसकी इस हरकत से आगबबूला थे और घर के बाहर आकर अपने साथी के साथ मिलकर आगे की रणनीति बनाने लगे।

सारा दिन उस केस की बारीकियां समझने में भी बीत गया। सूरज ढल रहा था। जब वह घर पहुंचे वो पूरी तरह थके हुए थे। कजरी ने थाली में पानी लेकर उनके पैर धोए। तब तक सुगना हलवा बनाकर ले आयी। यह हलवा खाते उन्हें पद्मा का वह आमंत्रण याद आ गया जब पद्मा ने उन्हें अपने घर हलुआ खाने के लिए बुलाया था…


वह पद्मा के साथ बितायी उस कामुक शाम की यादों में खो गए…
 
@मालपानी जी और जिन पाठकों ने उत्साह दिखाया है उन्हें धन्यवाद...

पदमा हलवा बना रही है उम्मीद है कल शाम तक बन ही जाएगा तब तक के लिए





योगा करते रहिए।
 
अपनी बहू सुगना (पदमा पुत्री) के हाथों बना मुलायम हलवा खाते खाते सरयू सिंह फिर पदमा की यादों में खो गए। मामा के आँगन में बैठे हुए सरयू सिंह को पद्मा ने अपने घर हलवा खाने का निमंत्रण दे दिया था वह मन ही मन पदमा के नजदीक आने की सोचने लगे।



वैसे भी अपने मामा के आंगन में इतनी देर तक लड़कियों और औरतों के बीच में बैठकर सरयू सिंह अब बोर हो चले थे ऊपर से पद्मा ने अपने घर हलवा खाने बुलाकर एक उम्मीद जगा दी थी वह घर से बाहर आकर दालान में मर्दो के बीच बैठ गए पर उनके दिलो-दिमाग में पदमा की गोरी चूचियां ही छाई रहीं ।

शाम हो चली थी चिड़ियों की चहचहाहट बढ़ रही थी सरयू सिंह अपने मामा के घर के सामने टहल रहे थे। वह कभी-कभी टहलते हुए पदमा के घर के तरफ भी आ जाते अचानक अपने घर के बाहर पदमा खड़ी हुई दिखाई पड़ी सरयू सिंह से नजर मिलते ही उसने उन्हें अंदर आने का इशारा किया सरयू सिंह धीरे धीरे पदमा के घर की तरफ बढ़ चले





आगन के दरवाजे को खोलकर सरयू सिंह पदमा के आंगन में आ चुके थे उन्होंने पदमा की मां के चरण छुए और पास पड़ी चारपाई पर बैठ गए। पदमा अपनी मां को आज सुबह तालाब में हुआ वाकिया बताने लगी पदमा की मां बेहद खुश थी और सरयू सिंह की शुक्रगुजार भी। उन्होंने कहा

"बबुआ तू पदमा के बचा लेला हा तू सच में हमनी खातिर भगवान हवा"

सरयू सिंह अपनी तारीफ सुनकर फूले नहीं समा रहे थे. पद्मा भागकर हलवा ले आई सरयू सिंह अपनी उंगलियों से हलवा खाने लगे तभी भागती हुई एक छोटी सी लड़की आई और बोली

"चाची चला सबकेहु तोहरा के बुलावत बा" सरयू सिंह के मामा के यहां विवाह से संबंधित कोई कार्यक्रम था जिसके लिए वह लड़की पदमा की मां को बुलाने आई थी। पदमा की मां धीरे-धीरे उठ कर खड़ी हो गई और सरयू सिंह के मामा के घर जाने लगीं। उन्होंने पदमा से कहा

"तू ताला बंद करके आ जाइह"

अपनी मां के जाने के बाद पदमा और चंचल हो गयी उसने सरयू सिंह से

"पूछा हलवा मुलायम बानू"

सरयू सिंह मुस्कुरा रहे थे उन्होंने पदमा को छेड़ दिया

"ताहरा से कम बा"

पदमा शर्म से लाल हो गई. उसने कहा

"रउआ कइसे मालूम"

" सबरे के बात भुला गइलू"

"ओह त रहुआ हमरा के ओ घरी छुवत रहनी हां"

अब बारी सरयू सिंह की थी उनकी कटोरी में हलवा खत्म हो चुका था उन्होंने कहा "पदमा सच में तू बहुत सुंदर बाड़ू हम इतना सुंदर लईकी पहली बार देख ले रहनी हा"

"का"

"तहरा जइसन लईकी"

"साँच साँच बताई हमारा के देखत रहनी की हमार ……" उसने अपनी निगाह अपनी चुचियों की तरफ कर दी थी।

सरयू सिंह ने कहा

"तू और तहर ई दोनो बहुत सुंदर बा"

पद्मा शर्म से लाल हो गयी। वह हलवा की कटोरी उठाने के लिए झुकी और एक बार फिर सरयू सिंह की निगाहें उसकी चूची ऊपर चली गयीं। उन्होंने कहा

"देखा केतना सुंदर बा"

पदमा को उसकी खुद की चुचियां झाकतीं हुई दिखाई दे गई। वह शर्म से अपने गाल लाल किए हुए सरयू सिंह के सामने खड़ी हो गयी। सरयू सिंह ने अंतिम दांव खेल दिया

" ए पदमा, एक बार फेर दिखा द ना"

" हेने आयीं"

पद्मा ने सरयू सिंह को आंगन के कोने में बुलाया और इधर उधर देख कर अपनी चुचियों को ब्लाउज से आजाद कर दिया। लाल रंग की ब्लाउज से पद्मा की दोनों चूचियां आजाद होकर सरयू सिंह के सामने हिल रही थीं और उन्हें खुला आमंत्रण दे रही थीं। पदमा की निगाहें झुकी हुई थीं वह अपने दोनों हाथ से ब्लाउज को पकड़े हुए थी।





सरयू सिंह ने बिना कुछ कहे उसे अपने आलिंगन में ले लिया। पदमा की नंगी चूचियां उनके सीने से छूने लगीं। पदमा के हाथ नीचे आ गए वह सावधान मुद्रा में खड़ी थी पर सरयु सिंह ने आगे बढ़कर उसके गालों को चूम लिया। पदमा शांत थी पर सरयू सिंह ने कोई ढिलाई नहीं बरती वह उसके होठों को चूमने लगे। पदमा अपनी जगह पर कसमसा रही थी पर उनका सहयोग नहीं कर रही थी। वह मन ही मन इस हो रही घटना पर विचार कर रही थी क्या यह ठीक है? वह अपनी सोच में डूबी हुई थी उधर सरयू सिंह की हथेलियां उसकी चुचियों का आकार नापने लगीं। जब सरयू सिंह की उंगलियों ने उसकी चुचियों के निप्पल को दबाया तब पदमा अपनी सोच से बाहर आयी। उसका मन और तन अब पूरी तरह मिलन के लिए तैयार था। उसकी हथेलियां सरयू सिंह की पीठ पर आ चुकी थीं। दोनों एक दूसरे में समा जाने के लिए तत्पर थे। पदमा की नई-नई चुदी हुयी बुर अपने होठों पर प्रेम रस लेकर अपने नए साथी का इंतजार कर रही थी।

सरयू सिंह के हाथ उसके नितंबों को छूने के लिए जैसे ही नीचे बढ़े एक बच्चे के आने की आहट सुनाई थी। पद्मा ने झट से अपना ब्लाउज नीचे कर लिया और सरयू सिंह से दूर हट गई। सरयू सिंह की धोती में खड़ा लंड उसने महसूस कर लिया था। आग लग चुकी थी बस उसमें पदमा और सरयू सिंह का जलना बाकी रह गया था...

सरयू सिंह के प्रति नियति शुरू से मेहरबान थी। वह अविवाहित जरूर थे पर नियति ने उन्हें उनकी कजरी भाभी से मिला दिया था जो उनका एक पत्नी की भांति ख्याल रखती थी। आज उन्हें एक और स्त्री के नजदीक आने का मौका मिल रहा था जो उनकी सुंदरता की पराकाष्ठा पर पूरी तरह खरी उतर रही थी। पदमा निश्चय ही कजरी से ज्यादा खूबसूरत और सुंदर और जवान थी।

अगले दिन सरयू सिंह के मामा की लड़की का तिलक जाना था। गांव के अधिकतर पुरुष उस तिलक में शामिल होने थे उन्हें लड़के वालों के घर जाना था।

सरयू सिंह को भी उस तिलक में जाना था पर आज सवेरे से ही उनके पेट में दर्द था। निकलने का वक्त हो चला था पर सरयु सिंह अपने पेट दर्द से परेशान थे।आखिरकार उनके मामा ने कहा

"जाए द तू एहिजे रहा" वैसे भी कुछ मर्दों को घर में रहना भी जरूरी होता था. सरयू सिंह अपने घर में रुक गए। पदमा के घर में उसकी मां और पिता ही रहते थे। पदमा का कोई भाई नहीं था। पड़ोसी होने की वजह से पदमा के पिता भी तिलक में शामिल होने चले गए। पदमा के घर और उनके मामा के घर में सिर्फ सरयू सिंह और उनके मामा का छोटा लड़का ही दो मर्द बचे थे बाकी सभी महिलाएं थीं।

शाम होते होते यह तय होने लगा की क्या आज बाहर सोना जरूरी है? सरयू सिंह की मामी ने कहा

"अरे दोनों जन भीतरे सुत रहा "

दरअसल सरयू सिंह के मामा के यहां तो विवाह में आए कई महिलाएं थीं परंतु पदमा के यहां पदमा और उसकी मा ही थीं। अंततः यह फैसला हुआ कि सरयू सिंह पदमा की दालान में सो जाएंगे और उनके मामा का लड़का घर में ही सो जाएगा। यह बात उचित भी थी और सभी को स्वीकार्य भी। सरयू सिंह मन ही मन खुश हो गए उधर पद्मा के चेहरे पर भी मुस्कान आ चुकी थी कुछ धमाल होने वाला था। नियति की साजिश कामयाब हो रही थी।

खाना खाने के पश्चात सरयू सिंह जब पद्मा के घर पहुंचे बाहर दालान में चारपाई पर मुलायम बिस्तर लगा हुआ था। उनके लिए विशेष रूप से नई चादर बिछाई गई थी। हल्की ठंड होने की वजह से ओढ़ने के लिए एक सुंदर लिहाफ भी रखा हुआ था जिसे अभी-अभी दीवान से निकाला गया लगता था। उसमें कुछ अजीब सी खुशबू आ रही थी।

पदमा उनका इंतजार ही कर रही थी। लालटेन की रोशनी में दोनों की नजरें मिलते ही आंखों ही आंखों में सारा कार्यक्रम तय हो गया। फिर भी सरयू सिंह ने पदमा को छेड़ ही दिया

"अकेले ही सुते के बा नु"

पदमा शर्मा गई और बोली

"थोड़ा देर अकेले ही सुत लीं"

यह कहकर वह अंदर चली गई उसकी मां की खासने की आवाज बाहर तक आ रही थी.

सरयू सिंह अपनी चारपाई पर लेटे हुए पदमा का ही इंतजार कर रहे थे। धोती के अंदर सरयू सिंह का लंड उन दोनों की बातचीत सुन चुका था और वह भी पदमा का इंतजार कर रहा था। सरयू सिंह के हाथों ने उसके इंतजार को और कठिन बना दिया था. वो उसे सहलाये जा रहे थे। वह पूरी उत्तेजना में तना हुआ अपनी बुर रूपी रजाई का इंतजार करने लगा जिसके अंदर वह हमेशा खुशहाल और मगन रहता था।

पदमा के कदमों की आहट सुनते सरयू सिंह सतर्क हो गए. पदमा अपने हाथ में दिया लिए हुए दालान में आ चुकी थी। दीए की रोशनी में उसका चेहरा दमक रहा था। उसने अपनी नजरें झुकायी हुई थीं। सरयू सिंह के करीब आते ही उसने अपने हाथ से दिया बुझा दिया और उसे जमीन पर रख दिया। काली अंधियारी रात में अब वह सरयू सिंह को दिखाई नहीं पड़ रही थी। वह चुपचाप आकर सरयू सिंह के बगल में लेट गई।

सरयू सिंह ने करवट लेकर उसके लिए जगह बना दी। पदमा की पीठ सरयू सिंह के सीने से हट गई थी। बातचीत करने का समय खत्म हो चुका था। सरयू सिंह ने अपना बायां हाथ पदमा के सिर के नीचे से ले जाकर उसके सर को सहारा दे दिया और इस सहारे के एवज में उसकी दाईं चूची पर अपना कब्जा जमा लिया।

सरयू सिंह की खुशी का ठिकाना ना रहा पद्मा ने ब्लाउज नहीं पहना था। उसकी नंगी चूँची पर हाथ फेर कर सरयू सिंह आनंद में खो गये। वह पदमा के प्रति कृतज्ञ थे जिसने ब्लाउज न पहनकर उनकी परेशानी कम कर दी थी अन्यथा इस अंधेरी रात में ब्लाउज के हुक खोलना समय बर्बाद करने जैसा ही था। अपनी चूँची के सहलाने पर पद्मा ने कोई आपत्ति न की अपितु अपनी बढ़ती हुई धड़कनों से अपनी रजामंदी अवश्य जाहिर कर दी। सरयू सिंह की दाहिनी हथेली ने बायीं चुची पर अपना कब्जा जमा लिया। वह अपनी दोनों हथेलियों से पदमा की दोनों चूचियों को सहलाने लगे और उसके गर्दन और कानों पर लगातार चुंबन करने लगे।

पदमा के रोएं खड़े हो गए। वह सिहर उठी। सरयू सिंह का मर्दाना स्पर्श बिल्कुल अलग था। वह उसके पति की तुलना में ज्यादा सख्त और मजबूत था। पदमा आनंद में डूबने लगी। सरयू सिंह ने अपनी बाई हथेली को चुचियों की सेवा में छोड़कर दाहिनी हथेली को नीचे ले आए पद्मा की बुर कब से उसका इंतजार कर रही थी। नितंबों को छु पाना अभी कठिन हो रहा था। सरयू सिंह के मजबूत हाथ सुगना के पेट और नाभि को सहलाते हुए नीचे आने लगे। पदमा के पेटीकोट में उनके हाथों को नीचे जाने से रोक लिया। वह पदमा को पूरी तरह नग्न करने के इच्छुक नहीं थे। बाहर दालान में यह खतरनाक हो सकता था। उन्होंने पेटीकोट से अपनी रंजिस खत्म कर दी और अपने हाथों को पदमा की जांघों पर लेकर चले गए। वह जांघों को सहलाते सहलाते उसकी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर की तरफ खींचने लगे।

कुछ ही देर में साड़ी और पेटीकोट पदमा के पेट तक आ चुके थे और पदमा के पेट के चारों तरफ एक घेरा बनाकर इकट्ठा हो गए। यह निश्चय ही पदमा को आरामदायक नहीं लग रहा होगा पर यह मजबूरी थी वैसे भी पदमा इतनी उत्तेजित थी कि उसे इन कपड़ों का आभास भी नहीं हो रहा था।

पदमा के कोमल नितम्ब और जाँघे पूरी तरह नग्न थीं सरयू सिंह की हथेलियां जांघों से होते हुए उसके जोड़ तक पहुंच गयीं।

घुंघराले घास के बीच से बहता हुआ चिपचिपा पानी का झरना उनकी उंगलियों से छू गया। वह पदमा की मादक बुर थी। पदमा की कोमल बुर को छूते ही पद्मा ने अपनी दोनों जाँघेंऊपर की तरफ उठायीं जैसे वह सरयू सिंह से हाथों को रोकना चाहती हो।

सरयू सिंह ने जैसे ही अपनी उंगलियां हटाई पद्मा ने अपनी जाँघे फिर फिर खोल दीं। उंगलियों और पदमा की कोमल बुर् का यह मेलजोल कुछ देर यूँ ही चलता रहा





इधर लंड धोती सरका कर बाहर आ चुका था। सरयू सिंह ने अपनी कमर जैसे ही पदमा से सटाई उनका लंड पदमा की जांघों से टकराने लगा। पद्मा ने सरयू सिंह के अद्भुत लंड का आकार और तनाव महसूस कर लिया। उसकी सिहरन बढ़ गई। वह उसे छूने के लिए अपने हाथ उस पर ले गई पर वह अपनी हथेलियों से उसे पूरा न पकड़ पायी। पदमा की धड़कनें तेज थी सरयू सिंह की उंगलियां पदमा की बुर से प्रेम रस चुरा रही थीं जिसे वह उसकी बुर पर फैला रहे थे तथा उसकी गाड़ को भी सहला रहे थे। उन्हें गांड का छेद सहलाना बेहद उत्तेजक लगता था।

लंड अपनी जगह तलाश रहा था पद्मा भी बेचैन हो रही थी। वह अपने चूतड़ हिलाकर लंड को बुर के समीप लाना चाह रही थी। निशाना मिलने पर सरयू सिंह ने अपने लंड को अंदर दबाने की कोशिश पदमा चिहूक गयी। सरयू सिंह को एक बार ऐसा लगा जैसे उन्होंने गलत छेद में अपना लंड डाल दिया है। उन्होंने तुरंत उसे बाहर निकाला और एक बार फिर अपना दबाव बढ़ा दिया। खेल उल्टा हो गया था इस बार उनका लंड पदमा की गांड में जा रहा था। पदमा लगभग कराह उठी। उसने कहा

"सरयू भैया पहिल के में, ई दोसर छेद ह" सरयू सिंह को अफसोस हो गया. वह काम कला के पारखी थे पर आज पदमा जैसी सुंदरी के सामने अनाड़ी बन गए थे। दर असल पदमा की कोमल बुर ने आज उन्हें उतना ही प्रतिरोध दिखाया था जितना कजरी की गांड दिखाया करती थी।

उन्होंने एक बार फिर अपने लंड का निशाना पदमा की कोमल बुर पर किया और अपनी उंगलियों से अपने लंड और पदमा के बुर् के दाने को छूकर इस बात की तस्दीक भी कर ली कि उनका निशाना सही जगह पर है। पदमा मुस्कुरा रही थी। सरयू सिंह ने उसे चूमते हुए कहा

"पदमा हमरा के माफ कर दीह" इतना कहते हुए उन्होंने पद्मा के मुंह पर अपना हाथ रख लिया और लंड का दबाव बढ़ा दिया वह पदमा की बूर को चीरता हुआ अंदर प्रवेश कर गया। पदमा दर्द से बिलबिला उठी। उसकी आंखों में आंसू आ गए जो सरयू सिंह को दिखाई नहीं पड़ रहे थे पर हां पदमा के दांत सरयू सिंह की उंगलियों को काट रहे थे। पदमा हाफ रही थी। लंड का अभी आधा भाग ही अंदर गया था।

सरयू सिंह ने कुछ देर खुद को इसी अवस्था में रखा। वह पदमा को वापस सहलाने लगे। उसके जांघों और नितंबों को सहलाने से पदमा को दर्द से कुछ राहत मिली और वह सामान्य होने लगी। सरयू सिंह ने अपने हाथ उसके मुंह से हटा कर वापस उसकी चुचियों को सहलाना शुरु कर दिया। पद्मा ने लगभग कराते हुए कहा

"सरयू भैया तनी धीरे धीरे …..दुखाता" सरयू सिंह ने उसके कानों को चुम लिया और बोले

"थोड़ा इंतजार कर ल तहरा ई हमेशा याद रही" कुछ देर बाद सरयू सिंह ने अपने लिंग को आगे पीछे करना शुरू कर दिया. पदमा सातवें आसमान पर पहुंच गई. उसकी चूत ने इतना तनाव कभी महसूस नहीं किया था। वह लगातार प्रेम रस छोड़े जा रही थी। पदमा अपनी जांघों को कभी ऊपर करती कभी नीचे। सरयू सिंह अपने लंड को बार-बार आगे पीछे कर रहे थे। हर बार जब वह अंदर जाता वह सुगना की चूत में धीरे-धीरे आगे बढ़ जाता।





कुछ ही देर की चुदाई में वह उसके गर्भाशय को छूने लगा। पद्मा से और बर्दाश्त नहीं हो रहा था। वह सरयू सिंह की उंगलियों को चूमे जा रही थी। कुछ ही देर में उसकी थरथराहट बढ़ गई। उसकी जांघें तनने लगीं।

वह कराह रही थी… सरयूऊऊऊ ….भैया…आईईईई अंम्म्म्ममम्म और वह हांफते हांफते स्खलित हो गई। सरयू सिंह उसे और चोदना चाह रहे थे पर यह संभव नहीं था। उसने अपनी कमर हटा ली और सरयू सिंह का लंड फक्क….की आवाज के साथ उसकी चूत से बाहर आ गया।

सरयू सिंह अभी भी अपना लंड उसकी बुर में रखना चाहते थे। पर पदमा की बुर संवेदनशील हो चुकी थी। पद्मा ने करवट ले ली और सरयू सिंह की तरफ हो गई। उसने सरयू सिंह को होठों पर चूम लिया और बोली

"सरयू भैया साँच में हमरा ई हमेशा याद रही"

सरयू ने कहा

"त हमरो यादगार बना द"

वह उन्हें चूमती रही और बोली

" तनी इंतजार कर लीं" वह अपने हाथों से उनके लंड को सहलाने लगी। लंड के आकार को महसूस कर वह आश्चर्यचकित थी और गनगना रही थी।

तभी अचानक पदमा के मां की खासने की आवाज आई। वह बड़ी जल्दी से चारपाई से उठी और अंधेरे में ही आंगन की तरफ भागी। जब तक सरयू सिंह अपनी टार्च जलाकर उसे जाने का रास्ता दिखाते पदमा नजरों से ओझल हो गई…

सरयू सिंह बिस्तर पर पड़े पड़े पदमा का इंतजार कर रहे थे पर उनका इंतजार लंबा हो रहा था। आधे घंटे से ज्यादा का वक्त बीत चुका था उनका तना हुआ लंड भी उदास होकर वापस अपने सामान्य आकार में आ चुका था। उसकी उम्मीद टूट चुकी थी। पद्मा की चूत का रस लंड पर सूख चुका था

सरयू सिंह की आंखें भी भारी हो रही थीं। पदमा के साथ कुछ देर पहले उन्होंने जो सुखद पल बिताए थे उसे याद करते हुए उनकी आंखें अब नींद के आगोश में आ रही थी। तभी बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ी। इन महीनों में सामान्यता बारिश नहीं होती है परंतु आज अकस्मात ही बादलों की गड़गड़ाहट हो रही थी। कुछ ही देर में बिजली भी चमकने लगी। यह अजीब सा संयोग था। उनकी नींद एक बार फिर खुल गई। बाहर बह रही ठंडी हवा उन्हें अच्छी लग रही थी। देखते ही देखते बारिश शुरू हो गई। दालान में हवा के साथ साथ पानी के छींटे भी आ रहे थे।

सरयू सिंह अपनी चारपाई से उठ गए उन्होंने अपनी धोती ठीक की और चारपाई को खींच कर कोने में ले गए जिससे वह पानी के छीटों से बच सकें। अजीब मुसीबत थी। उनकी रात खराब हो रही थी। तभी अचानक आगन का दरवाजा खुला और पदमा एक बार फिर बाहर आ गई। पदमा को देखकर सरयू सिंह की खुशी सातवें आसमान पर पहुंच गई। उन्हें यह उम्मीद कतई नहीं थी कि इस भरी बरसात में पदमा इस तरह बाहर आ जाएगी। पदमा थोड़ा भीग भी गई थी। सरयू सिंह ने अपनी टॉर्च से उसे रास्ता दिखाया और वह उनके बिल्कुल समीप आ गई।

सरयू सिंह ने पदमा को अपने आलिंगन में ले लिया उसके शरीर पर पानी की बूंदे थी जो ठंडक का एहसास दिला रही थी। पद्मा ने कहा

"भैया भूसा वाला कमरा में चली वहां पुआल लागल बा"

सरयू सिंह उस कमरे की तरफ बढ़ चले पद्मा ने चारपाई पर पड़ी हुई चादर खींच ली. और उनके साथ कमरे में आ गयी। सरयू सिंह ने टॉर्च मारकर कमरे का मुआयना किया। कमरे में एक तरफ भूसा रखा हुआ था और नीचे कुछ पुआल बिछा हुआ था जिस पर चादर डालकर आराम से सोया जा सकता था। कमरे में एक खिड़की थी जिससे कभी-कभी बिजली की रोशनी आ रही थी। जब जब बिजली कड़कती कमरा रोशन हो जाता। अंदर आने के बाद पद्मा ने दरवाजा बंद कर दिया और सरयू सिंह के आलिंगन में आ गयी। उसके शरीर पर पानी की बूंदे देखकर सरयू सिंह ने उसे पोंछने की कोशिश की। उन्होंने अपनी धोती खोल ली और पदमा के चेहरे और कंधों को पोंछने लगे।

सरयू सिंह ने पदमा की साड़ी जो थोड़ा भीग गया थी उसे हटाने की कोशिश की। पद्मा ने कोई आपत्ति नहीं की और कुछ ही देर में पदमा कमर के ऊपर नग्न खड़ी थी। सरयू सिंह ने साड़ी को और भी खोलना चाहा कमर की गांठ खुलते ही साड़ी एक ही झटके में नीचे आ गयी। पद्मा ने पेटीकोट नहीं पहना था उसने साड़ी को सीधा ही कमर में बांध लिया था। साड़ी के हटते ही पदमा पूरी तरह नग्न हो गई।

सरयू सिंह को यह यकीन ही नहीं हुआ। अचानक बिजली कड़की और पदमा का नग्न शरीर उनकी आंखों के सामने आ गया। एक पल के लिए उन्हें लगा जैसे वह सपना देख रहे हैं। गोरी चिट्टी पदमा अपने सीने पर दो मझौली आकार की चूँचियां लिए उनके सामने खड़ी थी। सपाट पेट उस पर छोटी सी नाभि कमर का उभार और सुडौल जाँघे आह…. पदमा एक आदर्श कामुक नारी की तरह लग रही थी। जांघों के जोड़ पर काले बालों के पीछे फूली हुई हुई बूर बेजड़ आकर्षक लग रही थी।

सरयू सिंह उस खूबसूरती को देखकर मदहोश हो गए। उन्हें यह अहसास नहीं था कि वह स्वयं पदमा के सामने नग्न खड़े थे। बिजली की रोशनी जितनी पदमा के शरीर पर पड़ रही थी उतनी ही रोशनी उनके शरीर पर भी पड़ रही थी। पदमा सरयू सिंह के बलिष्ठ शरीर और उनके अद्भुत लंड को देख कर सिहर भी रही थी और मन ही मन उनकी मर्दानगी की कायल भी हो रही थी।

प्रकृति के बनाए दो अद्भुत नगीने एक दूसरे के सामने खड़े थे बिजली की गड़गड़ाहट से वह करीब आ गए और एक दूसरे से सट गए। सरयू सिंह का लंड एक बार फिर पदमा की नाभि से छूने लगा।

पदमा की चुचियां उनके सीने में समा जाने को बेताब थीं। सरयू सिंह पहली बार पदमा के नितंबों को पूरे मन से सहला रहे थे। नितंबों के बीच पदमा की गदरायी गांड पर

उनकी उंगलियां घूम रही थी उसकी गोरी पीठ भी सरयू सिंह की हथेलियों का इंतजार कर रही थी। एक दूसरे के आगोश में लिपटे हुए सरयू सिंह और पदमा के होंठ आपस में मिल गए।





पदमा ने खुद को सरयू सिंह से अलग किया और पुवाल पर बिछी चादर पर आकर पीठ के बल लेट गई। पुवाल पर लेटी हुई नग्न सुंदरी की कल्पना मात्र से सरयू सिंह का लंड गनगना गया। उन्होंने पदमा की चूचियों पर टॉर्च मारी। श्वेत धवल चूचियाँ सांची के स्तूप की तरह तनी हुई थी। उस पर भूरा निप्पल स्तूप ले मीनार की भांति दिखाई पड़ रहा था। पद्मा ने तुरंत ही अपनी हथेलियां अपनी चुचियों पर ले जाकर उन्हें ढक लिया। सरयू सिंह ने टॉर्च का मुह बालों के पीछे छुपी बुर पर कर दिया। पद्मा के बुर की खूबसूरती बयां करने योग्य शब्द मेरे पास नहीं है वह अद्भुत थी। दो गोरी जांघों के बीच छोटे छोटे काले काले बालों के बीच पदमा की मखमली गुलाबी बुर शर्माते हुए झांक रही थी।

ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह सरयू सिंह के खड़े लंड को खुला आमंत्रण दे रही हो।पद्मा ने सिर्फ फिर एक बार अपनी हथेलियों से अपने बुर को ढक लिया।

सरयू सिंह मुस्कुरा रहे थे। एक सुंदर नवयौवना अपने अनमोल खजाने को छुपाने का प्रयास कर रही थी। उन्होंने अब अपनी टॉर्च का मुह पद्मा ने सुंदर चेहरे पर कर दिया। सुंदर काले बाल बिखरे हुए थे और उन बालों की बीच से पदमा का खूबसूरत चेहरा सरयू सिंह की आंखों में बस गया। टॉर्च की रोशनी चेहरे पर पढ़ते ही पद्मा ने अपनी दोनों हथेलियां अपनी आंखों पर रख लीं वह टार्च की रोशनी को सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही थी। पर वह यह भूल गई रोशनी में उसका बाकी बदन भी चमक रहा है।

सरयू सिंह ने कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना वाली कहावत चरितार्थ कर दी थी। उन्होंने टॉर्च का निशाना चेहरे की तरह किया था और पदमा के हाथों को मजबूर कर दिया था कि वह उसके चेहरे को ही ढके रहे परंतु इस दौरान पदमा की सुंदर चुची और कोमल बुर पूरी तरह खुले थे। पदमा को यह एहसास भी नहीं था कि सरयू सिंह उसके अनमोल खजाने को आंखों से ही लूट रहे हैं।

सरयू सिंह से अब और बर्दाश्त नहीं हुआ। नियति ने आज जो संयोग बनाया था वह मिलन के लिए आदर्श था।





पदमा की कोमल बुर जो अब से कुछ देर पहले एक अद्भुत चुदाई का आनंद ले चुकी थी एक बार फिर पनिया चुकी थी। सरयू सिंह ने और देर न की। पदमा पुआल पर लेट कर अपनी जांघें फैलाकर सरयू सिंह का इंतजार कर रही थी। सरयू सिंह ने अपनी टॉर्च बगल में रखी और पदमा की जांघों के बीच में आ गए।

अपना लंड पदमा की कोमल बुर् के मुहाने पर रख दिया। उन्होंने अपनी टार्च जलाई और पदमा के मुंह की तरफ देखते हुए अपने लंड का दबाव बढ़ाते गए। पदमा का मुंह खुलता गया आंखें बड़ी हो गई पर उसने सरयू सिंह के लंड को अपनी बुर में बड़े प्रेम से समाहित कर लिया।

लंड पूरा जाने के बाद पद्मा ने अपनी आंखें खोली और चेहरे पर मुस्कुराहट लायी। सरयू सिंह ने उसे चूम लिया। पद्मा ने कहा

"सरयू भैया, अब मैं भर चो……...लीं" पदमा में उत्तेजना में जिस शब्द का पहला भाग बोल दिया था वह सरयू सिंह के कानों में किसी कामुक पुकार की तरह सुनाई दिया। वह अत्यधिक उत्तेजित हो गए।

उन्होंने अपने लंड को आगे पीछे करना शुरू कर दिया। वह पदमा को चोदना शुरू कर चुके थे। जैसे जैसे बिजली कड़कती वह दोनों एक हो जाते उनके सीने आपस में सट बजाते पर सरयू सिंह की कमर नहीं रुकती वह पदमा को लगातार चोदे जा रहे थे।

बीच-बीच में वह टॉर्च जलाकर पदमा का चेहरा जरूर देख लेते जो अब आहें भर रही थी। कुछ ही देर में पदमा की जाघें फिर तनने लगीं। सरयू सिंह ने इस बार कोई ढिलाई देना उचित नहीं समझा वह बिना पदमा का इंतजार किए अपने लंड को तेजी से आगे पीछे करने लगे। पदमा थरथरा रही थी और अपनी जाघें सीधी कर रही थी पर सरयू सिंह लगातार उसे चोद रहे थे।

तभी पदमा की मां की आवाज एक बार फिर सुनाई पड़ी वह पदमा... पदमा... पुकार रही पद्मा ने भी चुदवाते हुए ही आवाज दी..

" मां रुक जा सरयू भैया के चादर बदल के आवतानी भीग गईल बा" पर बोलते समय उसकी आवाज कांप रही थी। सरयू सिंह इस दौरान भी चुदाई जारी रखे हुए थे। पदमा की कामुक कराह कमरे में गूंजने लगी।

सरयू सिंह स्वयं पदमा….पदमा... पुकार रहे थे पर उसे लगातार चोद रहे थे. कुछ ही देर में उन्होंने अपने लंड को उस कोमल बूर में जड़ तक डाल दिया। ऐसा लग रहा था जैसे वह उसकी नाभि में छेद को छूना चाहते हों।

परन्तु गर्भाशय के मुहाने पर जाकर उनके लंड ने दम तोड़ दिया वह अपना वीर्य स्खलित करने लगा। पदमा की चूत के अंदर लंड का फुलना पिचकना जारी था। पदमा हाफ रही थी पर सरयू भैया को चूमे जा रही थी। उसके गर्भाशय पर सरयू सिंह की मलाई बरस रही थी। पदमा तृप्त हो रही थी। उसी दौरान पुवाल के अंदर छिपे एक अनजान कीड़े ने शरीर सिंह के अंडकोष के ठीक बगल में जांघों पर काट लिया। सरयू सिंह दर्द से तड़प उठे। वह उस समय स्खलित हो रहे थे।

उत्तेजना और दर्द का यह मिलन अनोखा था। सरयू सिंह उस दर्द को भूल कर पदमा की मलाईदार चूत में अपनी मलाई भरते रहे। उन्होंने हाथ लगाकर उस कीड़े को हटाया। जब तक वह टॉर्च उठाकर उस कीड़े को देख पाते वह पुवाल में गायब हो गया पर जाते-जाते वह अपना निशान छोड़ गया। शरीर सिंह का ध्यान भटकते ही पद्मा ने पूछा

" भैया का भइल?"

" कुछो ना, लगाता तोहरा घर के निशानी मिल गईल"

सरयू सिंह का उफान ठंडा पड़ते ही उन्होंने पदमा को फिर चूम लिया और कहा "पदमा ई रात हमेशा याद रही"

" हमरो" पद्मा ने कहा। वह अपने कपड़े समेटने के लिए नीचे झुकी और सरयू सिंह के हाथ में रखी टॉर्च और दिमाग की टॉर्च एक साथ जल गयी। पद्मा के गोरे और गोल नितंबों के बीच से उसकी गुदांज गांड दिखाई पड़ गई। उन्होंने पद्मा के कूल्हों को चूम लिया।

पदमा उठ खड़ी हुई और मुस्कुराते हुए बोली "सबर करीं"

पदमा मुस्कुराते हुए आंगन में चली गई पर आज सरयू सिंह के जीवन में नई बहार आ गई थी….

सुगना द्वारा लाया गया हलवा खत्म हो चुका था..

सुगना की मधुर आवाज आयी

"बाबूजी का सोचा तानी?"


सरयू सिंह ने उत्तर देना उचित न समझा पर सुगना को देख मुस्कुराने लगे....
 
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