Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 17 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

बनारस महोत्सव का दूसरा दिन अपरान्ह 3:00 बजे…..



बनारस महोत्सव के निकट एक पांच सितारा होटल के बेहतरीन सजे धजे कमरे में एक नग्न युवती अपने घुटनों के बल बैठी हुई एक मोटे और थुलथुले व्यक्ति का छोटा सा लण्ड अपने मुंह में लेकर चूस रही थी वह व्यक्ति उसके सर को पकड़कर अपने लण्ड पर आगे पीछे कर रहा था।

युवती पूरी तरह रति क्रिया के लिए आतुर थी और पूरी लगन से उस कमजोर हथियार में जान भरने की कोशिश कर रही थी। पुरुष की आंखों में वासना नाच रही थी परंतु जितनी उत्तेजना उसके दिमाग में थे उतना उसके हथियार तक न पहुंच रही थी। अपने चेहरे पर कामुक हावभाव लिए वह उस सुंदर युवती के मुंह में अपना लण्ड आगे पीछे कर रहा था। कुछ देर बाद उसने उस युवती को उठाया और बिस्तर पर लेटने का इशारा युवती खुशी खुशी बिस्तर पर बिछ गई।

कामुक और सुडोल अंगों से सुसज्जित वह युवती प्रणय निवेदन के लिए अपनी जांघें फैलाए और अपने हाथों से उस व्यक्ति को संभोग के लिए आमंत्रित कर रही थी। सुंदर, सुडोल और कामवासना से भरी हुई युवती का यह आमंत्रण देख वह व्यक्ति उस पर टूट पड़ा।

उस मोटे व्यक्ति ने सुंदर युवती की जांघों के बीच आकर अपने लगभग तने हुए लण्ड को अंदर प्रवेश कराया और अपनी कुशलता और क्षमता के अनुसार धक्के लगाने लगा।

वह उसकी चुचियों को भी मीसने और चूसने का प्रयास करता रहा और वह युवती उसकी पीठ और कमर को सहला कर उसे उत्तेजितऔर प्रोत्साहित करती रही। धक्कों की रफ्तार बढ़ती जा रही थी और उस युवती के चेहरे पर खुशी स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी।

अचानक उस व्यक्ति के धक्के गहरे होते गए परंतु उनके बीच का अंतराल कम हो गया वह स्खलित होते हुए बोल रहा था

"….मनोरमा मुझे माफ कर देना…"

मनोरमा के पति सेक्रेटरी साहब स्खलित हो चुके थे और मनोरमा बिस्तर पर आज फिर तड़पती छूट गई थी। कुछ देर यदि वह यूं ही अपने चर्म दंड को रगड़ पाने में सक्षम होते तो आज कई दिनों बाद मनोरमा को भी वह सुख प्राप्त हो गया होता। मनोरमा नाराज ना हुई परंतु उसकी बुर में बेजान पड़ा लण्ड अब फिसल कर बाहर आ रहा था और उसके द्वारा बुर के अंदर भरा पतला वीर्य भी उसी के साथ साथ बाहर आ रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे "बरसात में सड़क पर चलने वाला जोक अपनी लार गिराते हुए चल रहा हो."

सेक्रेटरी साहब ने अपनी उंगलियों से मनोरमा की बुर को और उत्तेजित कर स्खलित कराने की कोशिश की परंतु मनोरमा ने मना कर दिया। उसका रिदम टूट चुका था और अब वह अपनी उत्तेजना लगभग खो चुकी थी। उसने स्त्री सुलभ व्यवहार को दर्शाते हुए कहा...

"कोई बात नहीं जी अभी तो बनारस महोत्सव में कई दिन है. फिर कभी"

मनोरमा को संभोग के उपरांत नहाने की आदत थी उसने स्नान किया और वापस सज धज कर एक एसडीएम की तरह वापस सेक्रेटरी साहब के सामने आ गई। घड़ी एक के बाद एक टन टन टन की पांच घंटियां बजाई मनोरमा बनारस महोत्सव में जाने के लिए तैयार थी उसका ड्राइवर ठीक 5:00 बजे गाड़ी लेकर उस होटल के नीचे आ जाता.. था। मनोरमा होटल के रिसेप्शन हॉल में जाने के लिए सीढ़ीयां उतरने लगी बनारस महोत्सव के आयोजन से संबंधित रोजाना होने वाली मीटिंग में उसे पहुंचना अनिवार्य था।

एक सुंदर और अतृप्त नवयौवना अपना दैहिक सुख छोड़कर कर्तव्य निर्वहन के लिए निकल चुकी थी। परंतु नियति आज निष्ठुर न थी। वह सुंदर, सुशील तथा यौवन से भरी हुई मनोरमा की जागृत उत्तेजना को अपनी साजिश में शामिल करने का ताना-बाना बुनने लगी।

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उधर लाली अपने परिवार औरपरिवार के नए सदस्य सोनू को लेकर विद्यानंद जी के पंडाल में आ चुकी थी। जहां सरयू सिंह के परिवार के लगभग सभी सदस्य उपस्थित थे। सुगना भी सज धज कर अपनी दोनों बहनों सोनी और मोनी के साथ मेला घूमने को तैयार थी।

कजरी और सरयू सिंह विद्यानंद से मिलने को आतुर थे परंतु किसी न किसी वजह से उनकी मुलाकात टलती जा रही थी। परंतु आज दोनों ने उनसे मिलने का निश्चय कर लिया था। दोनों देवर भाभी मेला घूमने का मोह त्याग कर विद्यानंद से मिलने का उपाय तलाश रहे थे।

रात में कई बार चुदने की वजह से लाली की चाल में अंतर आ गया था। लाली खुद भी आश्चर्यचकित थी। उसे यह एहसास कई दिनों बाद हुआ था। फूली हुई बुर चलने पर अपनी संवेदना का एहसास करा रही थी और लाली की चाल स्वतः ही धीमे हो जा रही थी थी।

सुगना ने कहा..

"काहे धीरे धीरे चल रही हो?"

"सोनुवा से पूछ" लाली सुगना से अपने और सोनू के संबंधों के बारे में खुलकर बात करना चाह रही थी परंतु सीधी बात करने में उसकी स्त्री सुलभ लज्जा आड़े आ रही थी।

सोनू सोनी और मोनी के साथ आगे चल रहा था अपना नाम लाली की जुबान पर आते ही वह सतर्क हो गया और पीछे मुड़कर देखा पर सुगना ने कुछ ना कहा...

लाली ने मुस्कुराते हुए कहा..

"इसकी शादी जल्दी करनी पड़ेगी.."

लाली के बार-बार उकसाने से सुगना भी मूड में आ गई उसने लाली को छेड़ते हुए धीरे से बोला

"काहे तोहरा संगे फिर होली खेललस हा का"

सुगना ने होली के दिन सोनू को लाली की चूचियां पकड़े हुए देख लिया था और यह बात लाली भी बखूबी जानती थी लाली शर्मा गई और मुस्कुराते हुए बोली..

"बदमाश होली त छोड़ दिवाली भी मना ले ले बा"

"का कहतारे?" सुगना को जैसे विश्वास ही नहीं हुआ उसे अभी भी सोनू एक किशोर के जैसा ही दिखाई पड़ता था यद्यपि उसकी कद काठी एक पूर्ण युवा की हो चुकी थी।

"जाके ओकरे से पूछ" लाली का चेहरा पूरी तरह शर्म से लाल था

"तूने ही उकसाया होगा.."

"मतलब?"

"मतलब.. मिठाई खुली छोड़ी होगी"

"अरे वाह मिठाई का ढक्कन खुला छूट गया तो कोई भी खा ले…" लाली ने झूठी नाराजगी दिखाते हुए कहा

"तूने जानबूझकर अपनी मिठाई खोलकर दिखाई होगी मेरा भाई सोनू ऐसा लगता तो नहीं है.."

" वाह मेरा भाई….तो क्या वह मेरा भाई नहीं है ?"

"जब भाई मान रही है तब मिठाई की बात क्यों कर रही है?" सुगना ने जैसे बेहद सटीक बात कह दी वह अपने इस हंसी ठिठोली में आए इस तार्किक बात से खुद की पीठ थपथपा रही थी।

"अरे वाह जब मेरा भाई मिठाई का भूखा हो तो उसको क्यों ना खिलाऊं कही इधर उधर की मिठाई खाया और पेट खराब हुआ तो…" लाली ने नहले पर दहला मार दिया।

"अच्छा जाने दे छोड़ चल वह झूला झूलते हैं…" सुगना ने प्रसंग बदलते हुए कहा... वह सोनू के बारे में ज्यादा अश्लील बातें करना नहीं चाह रही थी।

सुगना को यह विश्वास न था की लाली और सोनू ने प्रेम समागम पूर्ण कर लिया है। परंतु लाली के चंचल स्वभाव और बातों से वह इतना अवश्य जानती थी की लाली सोनू को अपने अंग प्रत्यंग दिखा कर उत्तेजित किया रहती थी और भाई-बहन के संबंधों की मर्यादा को तार तार करती थी।

झूले के पास पहुंचने पर झूले वाले ने बच्चों को झूले पर चढ़ाने से इनकार कर दिया। यह झूला लकड़ी की बड़ी-बड़ी बल्लियों से मिलकर बनाया गया था और बच्चों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम न होने की वजह से उस पर 10 वर्ष से कम के बच्चों को चढ़ने की रोक थी।

राजेश ने सामने की दुकान से दो बड़े-बड़े लॉलीपॉप लाया और बच्चों को देकर बोला

"बेटा तुम और रीमा सामने सर्कस का शो देख लो। सोनू मामा दिखा लाएंगे।" सोनू बगले झांकने लगा वह लाली से दूर नहीं होना चाहता था।

"साले साहब जाइए अपने मामा होने का हक अदा कीजिए और बच्चों को सर्कस दिखा लाइए तब तक मैं इन लोगों को झूला झूला देता हूं.."

सोनू ने राजेश की बात मान ली. वैसे भी इन दोनों बच्चों की मां ने उसके सारे सपने कल रात पूरे कर दिए थे और इन बच्चों ने भी पूरी रात भर गहरी नींद सो कर उनकी प्रेम कीड़ा में कोई विघ्न न पहुंचाया था।

सोनू के जाने के पश्चात झूले पर बैठने की बारी आ रही थी। सुगना और उसकी दोनों बहनों ने उनका पसंदीदा घाघरा चोली कहना हुआ था।

झूले पर कुल चार खटोले बंधे हुए थे एक खटोले पर दो व्यक्ति बैठ सकते थे। सुगना और सोनी एक साथ बैठे और लाली तथा मोनी एक साथ। राजेश में अपनी सधी हुई चाल चलते हुए सुगना के ठीक सामने वाला खटोला चुन लिया। परंतु उसका साथी न जाने कौन होता तभी सोनू का दोस्त विकास न जाने कहां से भागता हुआ आ गया और राजेश के बगल में बैठ गया।

एक पल के लिए राजेश को लगा जैसे उसने उस व्यक्ति को कहीं देखा है परंतु वह उसे पहचान नहीं पाया। चौथे खटोले पर एक अनजान युगल बैठा हुआ था। झूले वाले ने झूला घुमाना प्रारंभ कर दिया जैसे जैसे झूले की रफ्तार बढ़ती गई सुगना और सोनी दोनों के लहंगे हवा में उड़ने लगे। जब राजेश और विकास का खटोला ऊपर रहता उन दोनों की निगाहें सुगना और सोनी के गर्दन के नीचे टिकी रहती और चूँचियों के बीच गहराइयों में उतरने का प्रयास करतीं। सुगना और सोनी दोनों बहने अपनी चुचियों का उधार छुपा पाने में नाकाम थीं सुगना तो चाह कर भी अपनी मादक चुचियों को नहीं छुपा सकती थी परंतु आज सोनी ने भी अपनी छोटी चचियों को चोली में कसकर उनमें एक अद्भुत और मोहक उभार दे दिया था।

शाम के सुहाने मौसम और खिली हुई रोशनी में सुगना और सोनी के पैर चमकने लगे पैरों में बनी हुई पाजेब और पैरों में लगा हुआ आलता उनकी स्त्री सुलभ खूबसूरती को और उजागर कर रहा था। जैसे-जैसे झूला तेज होता गया ऊपर से नीचे आते वक्त उनका घाघरा और ऊपर उठता गया। सोनी के सुंदर घुटने पर लगी चोट देख कर विकास आहत हो गया। सोनी की खूबसूरत जांघों से उसकी नजर हटकर एक पल के लिए घुटनों पर केंद्रित हो गई थी। चोट का जिम्मेदार कहीं ना कहीं विकास खुद को मान रहा था।

उधर सुगना की मदमस्त और गोरी जाघे राजेश की उत्तेजना नया आयाम दे रही थी। कितनी सुंदर थी सुगना और कितने सुंदर थे उसके खजाने। आज कई दिनों बाद सुगना के नग्न पैरों को देख राजेश का लण्ड पूरी तरह खड़ा हो गया। उसकी नजरें सुगना के कोमल और खूबसूरत पैरों पर रेंगने लगी धीरे धीरे वह अपने ख्यालों में सुगना की जांघों को नग्न करता गया और उसकी जांघों के बीच छुपे स्वर्गद्वार की कल्पना करता गया।

राजेश जिस एकाग्रता से सुगना की जांघों के बीच अपना ध्यान लगाया हुआ उस एकाग्रता को पाने के लिए न जाने कितने तपस्वी कितने दिनों तक ध्यान लगाया करते होंगे।

राजेश की कामुक नजरों का यह खेल ज्यादा देर तक न चल पाया और झूला शांत होने लगा। राजेश की उत्तेजना पर भी ग्रहण लग गया।

नई सवारियां झूले पर बैठने को तैयार हो रही थीं। खूबसूरत रंग-बिरंगे कपड़ों में लड़के और लड़कियां युवक और युवतियां अपने मन में तरह-तरह के भाव और संवेदनाएं लिए झूले पर अपने जीवन की खुशियां ढूंढने कतार में इंतजार कर रहे थे। झूला रुकते ही विकास और राजेश ने अपनी भावनाओं को काबू में किया तथा तने हुए लण्ड को अपने पेट की तरफ इशारा कर उसे फूलने पिचकने का मौका दिया.

झूला परिसर से बाहर आते समय सोनी और विकास थोड़ा पीछे रह गए यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी दोनों ही एक दूसरे से मिलने को आतुर थे। विकास ने सोनी से कहा..

"आपके घुटने पर तो ज्यादा चोट लगी है मुझे माफ कर दीजिएगा"

सोनी शर्मा गई परंतु वह मन ही मन बेहद प्रसन्न थी। उसके सपनों का राजकुमार मैं आज पहली बार खुद पास आकर उससे बात की थी। सोनी को इस बात का आभास न था उसने अनजाने में ही अपने प्रेमी को अपने खूबसूरत अंगों की एक झलक दिखा दी थी।

सोनी को चुप देखकर विकास ने कहां

"अपना नाम तो बता दीजिए"

"मिलते रहिये नाम भी मालूम चल जाएगा" सोनी ने अपने कदम तेज किये। वह अपने परिवार से थोड़ा दूर हो गई थी इससे पहले कि कोई देख पाता वह परिवार में शामिल हो जाना चाह रही थी।

तभी विकास के दोस्त भोलू ने आवाज दी

"साले मुझे मौत का कुआं की टिकट लेने भेज कर तू यहां झूला झूल रहा है. चल जल्दी अगला शो शुरू होने वाला है"

विकास अब से कुछ मिनट पहले जिस दृश्य को देख रहा था उसमें जीवन का रस छुपा था। काश कुछ देर झूला यूं ही घूमता रहता तो विकास अपनी युवा नायिका की जांघों के दर्शन कुछ देर और कर पाता।

विकास ने सोनी के नग्न पैरों को देखकर उसकी जांघों के जोड़ पर बैठी उसकी सोन चिरैया की कल्पना कर ली थी। वह सोनी के बारे में ढेर सारी बातें करना चाहता था उसका प्रिय मित्र सोनू अपनी लाली दीदी के यहां जाकर बैठ गया था। आज विकास में सोच लिया कि वह जाकर सोनू से जरूर मिलेगा। विकास को क्या पता था कि उसका दोस्त सोनू कुछ ही दूर पर ध्यान सर्कश के जोकर पर आँखे टिकाये सर्कस खत्म होने का इंतजार कर रहा था।

कुछ देर बाद सोनू बच्चों को सर्कस दिखा कर वापस आ गया और पूरा परिवार एक बार फिर मेले में आगे बढ़ने लगा।

रास्ते में एक हाउसिंग प्रोजेक्ट की बड़ी-बड़ी होर्डिंस लगी हुई थीं। (उस समय बनारस शहर का विकास तेजी से हो रहा था। गंगा नदी के किनारे कई सारे हाउसिंग प्रोजेक्ट चालू हो गए थे।)

होर्डिंग पर बने हुए खूबसूरत घर, सड़कें और न जाने क्या-क्या बरबस ही ग्रामीण युवतियों का ध्यान खींच लेते हैं अपनी आभाव भरी जिंदगी से हटकर उन खूबसूरत दृश्यों को देखकर ही उनका मन भाव विभोर हो उठता है। होर्डिंस में दिखाए गए घर उन्हें स्वर्ग से कम प्रतीत नहीं होते। सुगना और लाली भी इन से अछूती न थीं। लाली का पति तो फिर भी आगे पीछे कर कुछ पैसा कमा लेता था परंतु सुगना वह तो परित्यक्ता की भांति अपना जीवन बिता रही थी। यह तो शुक्र है सरयू सिंह का जिन्होंने सुगना और कजरी की आर्थिक स्थिति को संभाले रखा था और सुगना को कभी भी उसका एहसास नहीं होने दिया था तथा एक मुखिया के रूप में सुगना की हर इच्छा पूरी की थी परंतु इस घर को खरीद पाना उनकी हैसियत में न था।

सुगना और लाली दोनों टकटकी लगाकर उन खूबसूरत मकानों को देखे जा रही थी और उन मकानों के सामने सजे धजे कपड़ों में खुद को अपनी कल्पनाओं में देख मन ही मन खुश हो रही थीं

सोनी ने कहा.

"सुगना दीदी चल आगे, ई सब हमनी खातिर ना ह"

सुगना और लाली ने सोनी की बात को सुना जरूर पर जैसे उनके पैर जमीन से चिपक गए थे और आंखें होर्डिंग पर।

उस हाउसिंग प्रोजेक्ट के बुकिंग काउंटर के ठीक बगल में एक लॉटरी काउंटर था। जिनके पास पैसे थे वह हाउसिंग प्रोजेक्ट के काउंटर पर जाकर प्रोजेक्ट से संबंधित पूछताछ कर रहे थे और जिनकी हैसियत न थी परंतु उम्मीदें और आकांक्षाएं भरपूर थी वह अपना भाग्य आजमाने के लिए लाटरी की दुकान में खड़े थे।

अपनी पत्नी लाली और अपने ख्वाबों की मलिका सुगना को उन घरों की तरफ देखते हुए राजेश का मन मचल गया था काश कि वह टाटा बिरला जैसा कोई धनाढ्य व्यापारी होता अपनी खूबसूरत सुगना को निश्चित ही वह घर उपहार स्वरूप दे देता। अपने मनोभावों को ध्यान में रखते हुए राजेश ने लाटरी की टिकट खरीद ली दो टिकट अपने बच्चों के नाम और एक टिकट सूरज के नाम। उसे अपने भाग्य पर भरोसा न था परंतु बच्चों के भाग्य को लेकर वह हमेशा से आशान्वित था।

लॉटरी का ड्रा बनारस महोत्सव के समाप्ति के 1 दिन पूर्व होना था। राजेश खुशी-खुशी सुगना और लाली के पास गया और सुगना की गोद में खेल रहे सूरज को वह टिकट पकड़ाते हुए बोला...

"सूरज बहुत भाग्यशाली है इसके छूने से यह टिकट सोना हो जाएगा" सूरज ने वह टिकट पकड़ लिया और तुरंत ही अपने होठों से सटाने लगा सुगना ने उसका हाथ पकड़ लिया और राजेश से बोली...

"जीजा जी क्यों आपने पैसा बर्बाद किया?"

"अरे ₹10 ही तो है सूरज के हाथ लगने से यह 1000000 हो जाए तो बात बन जाए. आप यह टिकट संभाल कर रख लीजिए"

सुगना ने सूरज के हाथ से वह टिकट ले लिया और अपनी चोली के अंदर चुचियों के बीच छुपा लिया।

लाली राजेश और सुगना को देख रही थी राजेश ने उसे भी निराश ना किया और उसके भी दोनों बच्चों को एक-एक लॉटरी की टिकट पकड़ा दी। लाली भी खुश हो गयी। राजेश चंद पलों में ही कई सारे सपने बेच गया।

आगे-आगे चल रही युवा पीढ़ी अपने में ही मगन थी जहां सोनू अपनी लाली दीदी के साथ बिताई गई रात के बारे में सोच रहा था और लाली की शर्म और उसके चेहरे पर आए मनोभावों को पढ़कर अपनी मेहनत के सफल या असफल होने का आकलन कर रहा था वहीं दूसरी तरफ सोनी के जांघों के बीच हलचल मची हुई थी विकास से मिलने के बाद उसे अपनी जांघों के बीच एक अजीब सी सनसनी महसूस हो रही थी ऐसा लग रहा था जैसे उसकी छोटी सी बुर के अगल बगल के बाल इस सिहरन से सतर्क हो गए थे। चोली में कसी हुई चूचियां उसके शरीर से रक्त खींचकर बड़ी हो गई थी और बार-बार सोनी का ध्यान अपनी तरफ खींच रही थी वह मौका देख कर उन्हें सामान्य करने की कोशिश भी कर रही थी।

सोनी के लिए यह एहसास बेहद सुखद था उसे आज रात का इंतजार था जब वह मोनी के साथ खुलकर इस विषय पर बात करती और अपने एहसासों से मोनी को अवगत करती। मोनी अभी भी मेले की खूबसूरती में खोई हुई थी उसके शांत मन में हलचल पैदा करने वाला न जाने कहां खोया हुआ था।

बनारस महोत्सव का यह मेला वास्तव में निराला था देखते ही देखते तीन-चार घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला और सुगना तथा लाली का परिवार एक बार फिर विद्यानंद के पंडाल की तरफ आ रहा था।

सोनू अपने इष्ट देव से राजेश की नाइट ड्यूटी लगवाने का अनुरोध कर रहा था। वह अनजाने में ही उसके और लाली के मिलन के प्रणेता को अपने बीच से हटाना चाह रहा था। लाली के साथ रात बिताने की सोच कर उसका लण्ड अचानक ही खड़ा हो गया परंतु नियति ने आज लाली की बुर को आराम देने की सोच ली थी।

राजेश नियति के विरुद्ध जाकर अपनी पत्नी लाली को एक बार फिर सुख देने पर आमादा था उसने सोनू पर अपना मोह पास फेका।

"सोनू अपनी लाली दीदी और रीमा को घर पहुंचा दो.."

सोनू की तो जैसे बांछें खिल गयीं छोटी रीमा लाली के साथ की जाने वाली प्रेम कीड़ा में कोई अड़ंगा डाल पाने में असमर्थ थी। सोनू के दिमाग मे लाली के साथ होने वाले संभोग आसन की मादक तस्वीर खींच गई वह लाली को करवट लिटा कर चोदने की तैयारी करने लगा इस अवस्था में लाली अपनी पुत्री रीमा को आराम से दूध पिला सकती थी और उसकी कसी हुई बुर अपने भाई सोनू के लण्ड से दूध दूह सकती थी।

परंतु नियति को यह मंजूर न था उसने कुछ और ही सोच रखा था।

शेष अगले भाग में..
 
आप लोगों को आपकी प्रतिक्रियाओं के लिए धन्यवाद एक बात और कहना चाहूंगा आपको इस कहानी में क्या अच्छा लगता है और क्या खराब इसे खुलकर बताने का प्रयास करें मुझे उम्मीद है आप कहानी को ध्यान पूर्वक पढ़ते होंगे और उसका यथोचित आनंद भी लेते होंगे परंतु मेरे लिए आपकी प्रतिक्रियाओं में सिर्फ चंद शब्द ही होते हैं जबकि मेरे लिए यह प्रतिक्रियाएं ही उत्साहवर्धन का एकमात्र स्रोत है खुलकर लिखिए जरूरी नहीं कि आपकी भाषा शैली में वजन हो परंतु विचार तो हर व्यक्ति खुलकर रख सकता है।

मैं आप सबसे कोमल जी जैसी प्रतिक्रियाओं की उम्मीद नहीं करता वह स्वयं एक लेखिका हैं और भाषा पर उनकी पकड़ अच्छी है परम आप napster जी जैसी चंद लाइनों की प्रतिक्रिया तो अवश्य दे सकते हैं।

(Napster जी आप इसे अन्यथा मत लीजिएगा आपकी प्रतिक्रियाएं भी मुझे बेहद पसंद है)

आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा मुझे हमेशा रहती है और रहेगी...
 
धन्यवाद ।।

सुगना को अपना वादा याद है दरअसल वह मिलन कहानी का एक ऐसा पड़ाव है जहां से कहानी की दशा और दिशा बदलेगी इसलिए थोड़ा सब्र आवश्यक है अभी मैं सिर्फ इतना ही इशारा कर सकता हूं परंतु आपको यह विश्वास दिलाता हूँ की कहानी में जिन भी विशेष बातों का उल्लेख किया गया है वह विशेष प्रयोजन से ही किया गया है और हर चीज की उपयोगिता समय के साथ उजागर होती जाएगी।।।
 
आपकी प्रतिक्रियाएं भी एक-दो अपडेट छोड़ छोड़ कर आती है परंतु यह जानकर अच्छा लगा कि आप यह कहानी अभी भी पढ़ रही हैं।

आपको इस कहानी से क्या चाहिए यह जानकर अच्छा लगा परंतु यह पूरा होगा या नहीं यह तो नियति ही जाने मैं तो सिर्फ इतना कहूंगा जुड़े रहिए और अपने सुझाव देते रहिए।

मेरे सतत अनुरोध करने के बाद भी पाठक अपनी प्रतिक्रियाएं देने में हिचकीचा रहे हैं ऐसा क्यों हो रहा है मैं तो यह नहीं जानता परंतु मुझे इसकी आवश्यकता ठीक वैसे ही है जैसे कृष फिल्म में जादू को धूप की थी।

ऊर्जा प्राप्त होते ही अगला अपडेट आ जाएगा।।

सोनू की तरफ से हैप्पी रक्षाबंधन
 
रेखा जी कहानी पर मैं रिव्यू की उम्मीद नहीं करता। परंतु पाठकों के लिखे चंद वाक्यांशों से मैं उन्हें और उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश करता हूं।

कहानी के पात्रों से जुड़ाव महसूस करना ही कहानी की सफलता का द्योतक है।

यूं ही कुछ कुछ लिखते रहिये....
 
राजेश नियति के विरुद्ध जाकर अपनी पत्नी लाली को एक बार फिर सुख देने पर आमादा था उसने सोनू पर अपना मोह पास फेका।

"सोनू अपनी लाली दीदी और रीमा को घर पहुंचा दो.."

सोनू की तो जैसे बांछें खिल गयीं छोटी रीमा लाली के साथ की जाने वाली प्रेम कीड़ा में कोई अड़ंगा डाल पाने में असमर्थ थी। सोनू के दिमाग मे लाली के साथ होने वाले संभोग आसन की मादक तस्वीर खींच गई वह लाली को करवट लिटा कर चोदने की तैयारी करने लगा इस अवस्था में लाली अपनी पुत्री रीमा को आराम से दूध पिला सकती थी और उसकी कसी हुई बुर अपने भाई सोनू के लण्ड से दूध दूह सकती थी।

परंतु नियति को यह मंजूर न था उसने कुछ और ही सोच रखा था।


अब आगे..

सुगना की खनकती आवाज सुनाई दी

"जीजा जी आज सब लोग खाना यहीं पंडाल में खाएंगे और यही रहेंगे।" सुगना ने अपनी मादक अदा से यह बात कह दी।

राजेश के लिए यह आग्रह से ज्यादा और आदेश से कम था।

सुगना और सोनू की मां पदमा भी वहां आ चुकी थी उसने भी सुगना की बातों में हां में हां मिलाई और सोनू के हाथ में आया मौका फिसल गया…।

परंतु सोनू को इस बात का सुकून था की आज रात वह अपने पूरे परिवार के साथ रह सकता था और अपनी दोनों छोटी बहनों तथा मां के साथ कई दिनों बाद जी भर कर बातें कर सकता था।

पूरा परिवार गांव की पुरानी यादों और परस्पर प्रेम में डूब गया। सरयू सिंह भी अपने परिवार को हंसी खुशी देखकर उनकी खुशियों में शामिल हो गए।

बनारस महोत्सव पारिवारिक मिलन के एक बेहद खूबसूरत उत्सव में बदल गया था जहां किसी को कोई चिंता न थी खान-पान की। रहन-सहन की व्यवस्था रहने वालों की मनोदशा के अनुकूल थी।

परंतु नियति ने इस खुशहाल परिवार में कामुकता का जाल बिछा दिया था... लाली और सोनू अभी नियति के चहेते चेहरे थे परंतु सुगना और सरयू सिंह के बीच की आग भी धधक रही थी। पिछले दो-तीन महीनों से सरयू सिंह सुगना को चोद तो नहीं पाए थे परंतु हस्तमैथुन और मुखमैथुन द्वारा एक दूसरे की उत्तेजना शांत कर अपना सब्र बनाए हुए थे।

यदि मनोरमा मैडम उन्हें उनके जन्मदिन पर सलेमपुर से खींचकर बनारस महोत्सव में न ले आई होती तो निश्चित ही उस दिन वह सुगना के आगे और पीछे दोनों छेदों का जी भर कर आनंद ले चुके होते।

सुगना ने डॉक्टर की सलाह के विपरीत जाकर जन्मदिन के उपहार स्वरूप अपने दोनों छेदों से खुलकर खेलने का मजा देने का वचन दे दिया था।

सरयू सिंह सुगना के अकेले आशिक न थे। राजेश की चाहत भी अब अपनी पराकाष्ठा पर थी लाली को वासना के दलदल में उतार देने के पश्चात अब उसे कोई डर भय नहीं था। राजेश सुगना को भी उसी फिसलन में खींच लेना चाहता था तथा रिश्तो की मर्यादा को ताक पर रख वह अपनी और सुगना की अतृप्त काम इच्छाओं की पूर्ति करना चाहता था।

उसे क्या पता था की सुगना की कामेच्छा पूरा करने वाले उसके बाबूजी सरयू सिंह कामकला के न सिर्फ धनी थे अपितु नियति द्वारा एक खूबसूरत और मजबूत लण्ड से नवाजे गए थे।

सुगना अपने बाबूजी सरयुसिंह की तरफ देख रही थी जो अपनी जानेमन सुगना को हंसता और खुश देख कर उसे अपने आगोश में लेने को तड़प रहे थे…

नयन चार होते ही सुगना ने सरयू सिंह के मनोभाव पढ़ लिए.. उसने मुस्कुराते हुए अपनी नजरें नीची कर ली। उसके गदराए शरीर में ऐठन सी हो रही वह अपने बाबूजी के आगोश में जाने को मचल उठी।

खुशहाल युवती स्वभाव से ही उत्तेजक प्रतीत होती है हंसती मुस्कुराती नग्न युवती को बाहों में लिए उससे कामुक अठखेलियां करना और संभोग करते हुए उसकी हंसी को उत्तेजना में तब्दील कर देना हर मर्द की चाहत होती है।

सरयू सिंह भी इससे अछूते न थे उनका मजबूत हथियार अपने कोमल और मुलायम आवरण (सुगना की बुर) में छुपने को तैयार था….

ग्रामीण समाज की परंपराओं के अनुसार स्त्रियों और पुरुषों का झुंड अलग-अलग घेरा बना कर बैठ चुका था। पांडाल में महिलाओं और पुरुषों के रहने की व्यवस्था अलग-अलग थी। सरयू सिंह और राजेश यह बात भली-भांति जानते थे कि पांडाल परिसर में वासना का खेल खेलना अनुचित और बेहद खतरनाक हो सकता था। सामाजिक प्रतिष्ठा एक पल में धूमिल हो सकती थी।

परंतु सरयू सिंह बेचैन थे सुगना द्वारा किया हुआ वादा याद करके उनकी उत्तेजना सातवें आसमान पर पहुंच जाती और हंसती खिलखिलाती सुनना की आवाजें उनकी उत्तेजना के लिए आग में घी का काम कर रही थी।

वह रह-रहकर सुगना की तरफ देख रहे थे और सुगना भी इस बात को महसूस कर रही थी। इन दोनों का नैन मटक्का शक के दायरे में कतई न था। परंतु सोनू को यह अप्रत्याशित लगा उसने सरयू सिंह से पूछ लिया...

"बाबूजी कुछ चाही का?"

सरयू सिंह ने इशारे से उसे मना किया और एक बार फिर इधर-उधर की बातों में लग गये।

अचानक उन्होंने सुगना को उठकर पांडाल से बाहर बने बाथरूम की दिशा में जाते देखा उनकी बांछें खिल उठी। वह तड़प उठे उनसे बर्दाश्त ना हुआ और जैसे ही सुगना पांडाल से बाहर निकल गई सरयू सिंह भी पांडाल के सामने वाले गेट से निकलकर बाहर आ गए और तेज कदमों से भागते हुए एक बार फिर पांडाल के पीछे पहुंचे और बाथरूम से आ रही सुगना का इंतजार करने लगे।

शाम वयस्क हो चुकी थी। बनारस महोत्सव में रोशनी की कोई कमी न थी परंतु रात को दिन कर पाना बनारस महोत्सव के आयोजकों के बस में नहीं था। अभी भी कुछ जगहों पर घुप अंधेरा था। सरयू सिंह अंधेरे में घात लगाए अपनी बहु सुगना का इंतजार करने लगे। बाथरूम से बाहर आकर सुगना ने अपनी चोली और लहंगे को व्यवस्थित किया। बालों की लटो को अपने कान के पीछे करते हुए अपना सुंदर मुखड़ा अंधेरे में दूर खड़े अपने बाबूजी को दिखा दिया और अपनी मदमस्त चाल से पांडाल की तरफ आने लगी। अचानक सरयू सिंह बाहर आ गए। सुगना के आश्चर्य का ठिकाना न था

"बाबूजी आप"

सरयू सिंह ने अपने होठों पर उंगलियां रखकर सुगना को चुप रहने का इशारा किया और उसकी कलाइयां पकड़कर खींचते हुए उस अंधेरी जगह पर ले आए।

सुगना स्वयं भी पुरुष संसर्ग पाने को आतुर थी। वह अपने बाबूजी के आगोश में आने के लिए तड़प उठी। सरयू सिंह सुगना को अपनी बाहों में भर उसकी चुचियों को अपनी छाती से सटा लिया उनके हाथ सुगना की गोरी पीठ पर अपना शिकंजा बनाए हुए थे और धीरे-धीरे सुगना ऊपर उठती जा रही थी। उसका वजन अब सरयू सिंह की मजबूत बांहों ने उठा लिया था और सुगना के कोमल होंठ अपने बाबुजी के होठों से टकराने लगे।

सरयू सिंह ने एक झटके में अपना बड़ा सा मुंह खोला और सुगना के दोनों होठों को मुंह में भरने की कोशिश की। परंतु सुगना भी उनका निचला होंठ चूसना चाहती थी उसने भी अपना मुंह खोल दिया।

सरयू सिंह और सुगना दोनों मुस्कुराने लगे। आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी।

सुगना अपने कोमल होठों से अपने बाबूजी के मजबूत होठों को चूसने लगी और सरयू सिंह भी उसी तन्मयता से अपनी बहू की इस अदा का रसास्वादन करने लगे। ऊपर हो रही हलचल को शरीर के बाकी अंगों ने भी महसूस किया। सरयू सिंह की हथेलियां सुगना के कोमल नितंबों की तलाश में लग गयीं। सुगना एक बार फिर अपने पैरों पर खड़ी हो गई और सरयू सिंह की हथेलियों ने उसके दोनों नितंबों को अपनी आगोश में ले लिया।

सुगना के नितंबों के आकार को महसूस कर सरयू सिंह सुगना की किशोरावस्था को याद कर रहे थे। नितंबों के आकार में आशातीत वृद्धि हुई थी। दीपावली कि वह पहली रात उन्हें याद आ रही थी। तब से अब तक नितंबों का आकार बढ़ चुका था और निश्चय ही इसका श्रेय कहीं न कहीं सरयू सिंह की भरपूर चुदाई को था उन्होंने सुगना के कान में कहा..

"सुगना बाबू ई दोनों फूलते जा तारे से"

"सब राहुर एकरे कइल ह" सुगना ने सरयू सिंह के लण्ड को पकड़ कर दबा दिया।

"अब उ सुख कहां मिला ता"

सुगना ने अपने होंठ गोल किए और अपनी जीभ को बाहर निकाल कर सरयू सिंह के मुंह में आगे पीछे करते हुए बोली

"कौन सुख ई वाला"

सरयू सिंह सुगना के इस मजाक से और भी उत्तेजित हो गए हो गए उन्होंने अपनी उंगलियां सुगना की गांड से सटा दीं और उसे सहलाते हुए बोले...

"ना ई वाला"

सुगना ने उनका हाथ खींच कर अपनी जांघों के बीच अपनी पनिया चुकी बुर पर ला दिया और बोला..

"तब इकर का होइ.."

"तू और तोहार सास ही पागल डॉक्टर के चक्कर में हमारा के रोकले बाड़ू हम त हमेशा तडपत रहे नी।"

"सरयू सिंह सुगना की उत्तेजित अवस्था को बखूबी पहचानते थे. सुगना का गोरा और चमकदार चेहरा वासना से वशीभूत हो चुका था। उसकी आंखों में लाल डोरे तैरने लगे थे। उसने अपनी पलके झुका लीं और अपने बाबु जी के मजबूत हथेलियों के स्पर्श को महसूस करने लगी।

सरयू सिंह सुगना के हर उस अंग को सहलाए जा रहे थे जो उन्हें अपने शरीर से अलग दिखाई पड़ रहा सुगना के हाथ भी अपने बहुप्रतीक्षित और जादुई मुसल को हाथों में लेकर अपना स्पर्श सुख देने लगे। कपड़ों का आवरण हटा पाना इतना आसान न था। परंतु ससुर और बहू दोनों ने यथासंभव नग्न त्वचा को छूने की भरपूर कोशिश की। दोनों दो-तीन दिनों से मन में जाग रही उत्तेजना को शांत कर लेना चाहते थे।

सरयू सिंह ने आनन-फानन में सुगना का लहंगा ऊपर कर दिया और अपनी उंगलियों को सुगना की बुर् के होठों पर फिराने लगे सुगना चिहुँक उठी। सरयू सिंह की उंगलियां अपनी बहू की बुर् के होठों पर उग आए बालों को अलग करती हुयी उस चिपचिपी छेद के भीतर प्रवेश कर प्रेम रस चुराने लगीं।

मध्यमा और तर्जनी जहां सुगना के बुर् के अंदरूनी भाग को मसाज दे रही थी वही बाकी दोनों उंगलियां सुगना की गांड पर घूम रही थी। सुगना सिहर रही थी। न जाने उसके बाबूजी को उस गंदे छेद में क्या दिखाई पड़ गया था। वह तो जैसे पागल ही हो गए थे।

जिस बुर में उनकी उत्तेजना को पिछले तीन-चार वर्षो तक शांत किया था उसे छोड़कर वह उस सौतन के पीछे लग गए थे।

सरयू सिंह के तन मन में उत्तेजना भरने के लिए अपने अंगों के बीच लगी होड़ को महसूस कर सुगना परेशान भी थी और उत्तेजित भी।

सरयू सिंह का लंड भी लंगोट से बाहर आ चुका था। परंतु मर्यादा और परिस्थितिवश वह धोती की पतले और झीने आवरण के अंदर कैद था। सुगना अपनी हथेलियों से उसके नग्न स्पर्श को महसूस करने को बेताब थी पर धोती जाने कैसे उलझ गई थी।

उसके होंठ अभी भी अपने बाबूजी के होठों से खेल रहे थे और वह चाह कर भी नीचे नहीं देख पा रहे थी। सरयू सिह सुगना की कोमाल हथेलियों का स्पर्श अपने लण्ड पर महसूस कर रहे थे और सुपाड़े ओर रिस रहा वीर्य सुगना की उगलियों को चिपचिपा कर रहा था।

दोनों स्स्खलन की कगार पर पहुंच रहे थे परंतु नियति को यह मंजूर न था । इस बनारस महोत्सव में सरयू सिंह का वीर्य व्यर्थ नहीं जाना था। सरयू सिंह के वीर्य से कथा का एक और पात्र सृजित होने वाला था।

नियति ने अपनी चाल चल दी। पास से गुजरती एक महिला ठोकर खाकर गिर पड़ी। उसे उठाने के लिए आसपास के कई सारे लोग इकट्ठा हो गए। सरयू सिंह को ना चाहते हुए भी सुगना को छोड़ना पड़ा। सुगना स्वयं बाबूजी के इस अप्रत्याशित व्यवहार से चौक गई। उसे पीछे हो रही घटना का अनुमान गलत वह तो अपने बाबूजी के आलिंगन में अद्भुत कामसुख के आनंद में डूबी हुई थी।

उसने पीछे मुड़कर देखा और सारा माजरा उसकी समझ में आ गया उसने सरयू सिंह से धीरे से कहा..

"बाबूजी कल शाम के मनोरमा जी वाला कमरा में …." इतना कह कर वह तेज कदमों से पंडाल की तरफ भाग गई।

सरयू सिंह ने अपने खूंटे जैसे तने हुए लण्ड को वापस अपनी लंगोट में डाला और अपनी उंगलियों को चुमते और सुघते हुए पांडाल की तरफ चल पड़े। इस थोड़ी देर के मिलन ने सरयू सिंह में जान भर दी थी। उनकी उंगलियों ने सुगना की बुर से प्रेम रस और उसकी खुशबू चुरा ली थी। वह अपनी उंगलियों को चूम रहे थे और सुगना के मदमस्त बुर की खुशबू को अपने नथुनों में भर रहे थे। उधर सुगना की उंगलियां भी अपने हिस्से का सुख ले आयी थी। सरयू सिंह के लण्ड से रिस रहा वीर्य धोती के पतले आवरण को छेद कर सुगना की उंगलियों तक पहुंच चुका था। उसकी बाबूजी के लण्ड ने दिन में न जाने कितनी बार वीर्य रस की बूंदे अपने होठों पर लायी थी और वहीं पर सूख गया था। लण्ड की वह खुशबू बेहद मादक थी और सुगना को बेहद पसंद थी। वह अपनी उंगलियों को बार-बार सूंघ रही थी और उसकी खुसबू को महसूस कर उसकी बूर चुदने के लिए थिरक रही थी।

सुगना ने कल शाम अपने बाबू जी को खुश करने का मन बना लिया था। सुगना के मनोभावों को जानकर उसकी छोटी सी गांड ठीक वैसे ही सिहर उठी थी जैसे घर पर आने वाले मेहमानों की सूचना सुनकर कामवाली सिहर उठती है।

खानपान का समारोह संपन्न होने के पश्चात स्त्री और पुरुषों के अलग होने की बारी थी । लाली सोनू को प्यार भरी निगाहों से देख रही थी और उधर सुगना कभी राजेश को देखती कभी सरयू सिंह को….। राजेश की निगाहों में सुगना के लिए जितना प्यार और आत्मीयता थी शायद सुगना उसका चौथाई भी सुगना की आंखों में न था वह पूरी तरह तरफ पिछले दो-तीन महीनों को छोड़ दें तो उसे एक पुरुष से जो कुछ मिल सकता था वह सारा उसके बाबूजी सरयू सिंह ने जी भर कर दिया था। उसने सरयू सिंह से अपने सारे अरमान पूरे किए थे।

घर की सभी महिलाएं पांडाल में सोने चली गई लाली और सुगना अगल-बगल लेटे हुए थे सोनी और मोनी की भी जोड़ी जमी हुई थी। और अपनी जवानी जी चुकीं कजरी और पदमा अपने जीवन में आए अध्यात्म को महसूस कर रही थी।

परंतु सुगना की आंखों में नींद न थी वह पांडाल की छत की तरफ देख रही थी। उसके जहन में बार-बार यही ख्याल आ रहा था कि सूरज को मुक्ति दिलाने वाली उसकी बहन का पिता कौन होगा.

डॉक्टर ने सरयू सिंह के चोदने पर प्रतिबंध लगाया था उस बात को याद कर सुगना तनाव में आ गई थी। वह स्वयं कभी भी दूसरी संतान नहीं चाहती थी परंतु विद्यानंद की बातों को सुनकर गर्भधारण करना अब उसकी मजबूरी हो चली थी.

क्या वह अपने बाबूजी के स्वास्थ्य को ताक पर रखकर उनसे एक बार फिर गर्भधारण की उम्मीद करेगी?

क्या यह 1 - 2 मुलाकातों में संभव हो पाएगा.?

सुगना इस बात से भी परेशान थी कि सरयू सिंह की प्राथमिकता अब उसकी बुर ना होकर वह निगोड़ी गांड हो चली थी।

सुगना को अभी अपनी कामकला पर पूरा विश्वास था उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि कल मनोरमा के कमरे में जाने के पश्चात वह अपनी कामकला से सरयू सिंह को अपनी जांघों के बीच स्खलित होने पर मजबूर कर देगी और रही बात उस दूसरे छेद की तो वह फिर कभी देखा जाएगा।

सुगना की अंतरात्मा ने उसे झकझोरा..

"तो क्या तू अपने पुत्र को मुक्ति दिलाने के लिए अपने बाबूजी के जीवन से खिलवाड़ करेगी…?

यदि तुझे चोदते हुए वह फिर एक बार मूर्छित हो गए तब??

सुगना पूरी तरह आतुर थी वह अपनी अंतरात्मा की आवाज को नकार रही थी उसने मन ही मन उसे उत्तर दिया…

"मैं उन्हें मेहनत नहीं करवाऊंगी मैं स्वयं उनका वीर्य दोहन करूंगी और यदि कुछ ऊंच-नीच होता भी है तो हम सब बनारस में ही हैं डॉक्टर की सुविधाएं तुरंत मिल सकती हैं"

"देख उनके माथे का दाग भी अब कितना कम हो गया है तेरे वासना के खेल से उनका दाग फिर बढ़ जाएगा"

"मुझे गर्भवती होना है इसके लिए इतनी कुर्बानी तो मेरे बाबूजी दे ही सकते हैं"

सुगना की अंतरात्मा ने हार मान ली और सुगना अपने प्यारे बाबू जी सरयू सिंह से चुदकर गर्भवती होने की तैयारी करने लगी।

मन ही मन फैसला लेने के पश्चात सुगना संतुष्ट थी।

"सुगना मैं तेरे बगल में लेटी हूं और तू न जाने क्या सोच रही हो?"

लाली ने सुनना का ध्यान भंग करते हुए कहा.

सुगना अपना निर्णय करने के पश्चात सहज महसूस कर रही थी। उसमें करवट ली। सुगना को अपनी तरफ करवट लेते देख लाली ने भी करवट ली और एक बार फिर उन दोनों की चुचियों ने एक दूसरे को छू लिया। दोनों मुस्कुराने लगी । उनकी चुचियों एक दूसरे से सट कर गोल से सपाट होने लगी।

"तुझे रतन भैया की याद नहीं आती है?"

लाली में सुगना की सुगना को सह लाते हुए कहा

"तू फिर फालतू बात लेकर शुरू हो गई"

"अरे वाह ये निप्पल ऐसे ही कड़ा है? यह सब फालतू बात है?" लाली सुगना को छेड़ने लगी

सुगना सरयू सिह के बारे में सोच सोच कर उत्तेजित थी लाली द्वारा अपनी चूँचीयां सहलाये जाने से उसके निप्पल और भी खड़े हो गए थे।

"मैंने तो बदलाव का सुख ले लिया है पर तेरे जीजा जी अभी भी तड़प रहे हैं"

लाली अपने और सोनू के बीच हुए संभोग के बारे में सुगना से खुल कर बताना चाह रही थी। परंतु यह उसकी जुबान पर खुलकर नहीं आ पा रहा था अनैतिक कृत्य तो आखिर अनैतिक ही था।

सुगना भली-भांति उसका मंतव्य जानती थी परंतु उसे इस बात का कतई विश्वास न था की सोनू उसे चोद चुका था।

"तो तू इस समय घूम घूम कर अनजानो से मजे ले रही है क्या?"

"ऐसे ऐसे मत बोल मैं कोई छिनाल थोड़ी हूं"

"बातें तो तू वैसी ही कर रही है"

"मैंने अपने सबसे प्यारे सोनू से ही व सुख बांटा है."

"क्या सच में पर यह हुआ कैसे.." सुगना ने लाली के उत्साह भरे चेहरे को देखकर उसकी बातें सुनने का निर्णय कर लिया।

सुगना के इस प्रश्न ने लाली के मन में भरी हुई बातों का मुंह खोल दिया। वह बेहद बेसब्री से अपने और सोनू के बीच हुए प्रेमालाप को अपनी भाषा में सुना दिया वह राजेश के सहयोग को जानबूझकर छुपा गयी। परंतु अपने और सोनू के बीच हुए हर तरीके के कामुक स्थितियों और परिस्थितियों को विस्तार पूर्वक सुना कर सुगना को उत्तेजित करती रही। परंतु वह किसी भी प्रकार से राजेश के व्यवहार को संदेह के घेरे में नहीं लाना चाहती थी। लाली मैं सोनू के साथ जितना संभोग सुख का आनंद लिया था वह अपनी सहेली को मना कर वही सुख अपने पति राजेश को दिलाना चाह रही थी।

सुगना को कभी उसकी बात पर विश्वास होता कभी लाली के फेंकने की आदत मानकर उसे नजरअंदाज कर देती। परंतु जितना भाव विभोर होकर लाली अपनी चुदाई की दास्तान बताए जा रही थी वह सुगना को उद्वेलित कर रहा था।

" क्या सचमुच उसका छोटा भाई सोनू उसकी हम उम्र लाली को चोद रहा था…?

व्यभिचार और विवाहेतर संबंधों के बारे में ज्यादा बातें करने और सोचने से वह सहज और सामान्य लगने लगता है. सुगना के कोमल मन मस्तिष्क पर लाली की बातों ने असर कर दिया था उसे यह सामान्य प्रतीत होने लगा था। परंतु मासूम सोनू ने लाली को घोड़ी बनाकर चोदा होगा यह नसरत विस्मयकारी था अपितु सोनू के व्यवहार से मेल नही खाता था।

अपनी ही चुदाई की दास्तान बताकर लाली भी गरमा गई थी। दोनों युवतियां अपने मन में तरह-तरह के अरमान और जांघों के बीच तकिया लिए अपनी चुचियां एक दूसरे से सटाए हुए सोने लगी…।

सोनी और मोनी बगल में लेटी हुई थी. सोनी विकास के साथ बिताए गए पलों को याद कर अपने तन बदन में उठ रही लहरों को महसूस कर रही वह अपनी बहन मोनी से सटकर लेटी हुई थी। उसकी जांघों पर अपनी जाँघे रखे सोनी अपनी बहन को विकास मानकर अपनी सूचियों को मोनी की बाहों से रगड़ रही थी तथा उसकी मोनी मोनी के जाँघों से सट रही थी।

मोनी के लिए यह खेल अभी नया था वह थकी हुई थी और नींद में आ चुकी परंतु सोनी के हिलाने डुलाने से ने अपनी आंखें खोली और बोली चल अब सो जा...

घर जाकर अपनी आग बुझा लेना…

सोनी शर्मा गई और मोनी को चूम कर सोने का प्रयास करने लगी। पंडाल में स्खलन जैसे वर्जित था।

परंतु नियति इस बनारस महोत्सव में इस परिवार में संबंधों की रूपरेखा को बदलकर आने वाले समय की व्यूह रचना कर रही थी।


शेष अगले भाग में….
 
धन्यवाद....यू ही जुड़े रहिये
 
आपकी प्रतिक्रिया को पढ़ना उतना ही आनंददायक है जितना कुछ पाठको के लिये इस कहानी को पढ़ना।

आपके द्वारा दिए गए वेदों के अनुच्छेदों का वर्णन यह इंगित करता है कि आप एक प्रबुद्ध और जागरूक पाठिका हैं।

परंतु सच कहूं तो मुझे अब इस कहानी की उपयोगिता को लेकर प्रश्नचिन्ह कायम है ।

पाठकों की उदासीनता इस प्रश्न चिन्ह को हमेशा बनाए रखती है।

फिर भी आप जैसे कुछ चुनिंदा पाठकों की प्रतिक्रियाओं के इंतजार में यह उपन्यास और आगे बढ़ता रहेगा , मंथर गति से।।

पुनः धन्यवाद
 
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