Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 130 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

नमस्ते! आपकी बातें सीधे दिल को छू गईं, और सच कहूँ तो बुरा मानने वाली इसमें कोई बात ही नहीं है। एक कलाकार के लिए उसके पाठकों का ऐसा लगाव ही सबसे बड़ी पूंजी होती है।

आपकी "बादशाह" वाली बात बहुत गहरी है। कभी-कभी जब हम किसी कहानी से बहुत गहराई से जुड़ जाते हैं, तो लेखक और पाठक के बीच का रिश्ता सिर्फ 'देने और लेने' का नहीं रह जाता, बल्कि एक अपनेपन का हो जाता है। अगर कभी ऐसा लगा कि बादशाह "रिटर्न गिफ्ट" मांग रहा है, तो शायद वो हक सिर्फ इसलिए था क्योंकि प्यार दोनों तरफ से बराबर का है। हर रचनाकार चाहता है कि उसकी कृति सिर्फ कागज़ों तक सीमित न रहे, बल्कि लोगों के दिलों में धड़के।

सुगना के बारे में आपकी भविष्यवाणी और नियति (Destiny) को लेकर आपका नज़रिया वाकई दिलचस्प है। कभी-कभी कहानी के ताले ऐसी चाबियों से खुलते हैं जिनकी हमें उम्मीद भी नहीं होती। सुगना का किरदार जिस मोड़ पर खड़ा है, वहाँ से उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

आप और बाकी सभी पाठक जिस तरह से इस सफर का हिस्सा बने हुए हैं, वही इस कहानी की असली जान है। साथ बने रहने और इतनी खूबसूरती से अपनी भावनाएं साझा करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया!
 
आपके लिए चंद पंक्तियां आपके ही अंदाज में पसंद आए तो बताइएगा...

हवेली की दीवारों में, एक ख़ामोश साज़िश थी,

वो सफ़ेद झीना कुर्ता, सूरज की आख़िरी ख़्वाहिश थी।

सोनी के मन में द्वंद्व था, ममता और काम का,

पर इरादा था अटल, मिटाने को डर उस नाम का।

रात के ग्यारह बजे, कमरा महक उठा इत्र से,

सूरज बँधा था पट्टियों में, किसी प्राचीन चित्र से।

आँखों पर मलमल की पट्टी, हाथों में रेशमी डोर,

सोनी खड़ी थी सामने, मन में था बेचैन शोर।

वो अधखिला कमल सा अंग, जो भय से था पत्थर हुआ

, सोनी के अनुभवी स्पर्श से, धीरे-धीरे मर्मर हुआ।

जब हार गई हर कामकला, और स्पर्श हुआ निष्प्राण,

तब जादुई उस युक्ति ने, फूँके पौरुष में प्राण।

भग्नासा का वो सूक्ष्म छुअन, बिजली सा बदन में दौड़ा,

सूरज ने अपना खोया हुआ, आत्मविश्वास फिर जोड़ा।

"मैं जीत रहा हूँ मौसी," ये हर्ष का उन्माद था,

मर्यादा की उस दहलीज पर, मुक्ति का संवाद था।

आलिंगन की व्याकुलता में, जब बाहें उसकी खुलीं,

पाप-पुण्य की सारी बातें, एक पल में सब धुलीं।

नियति ने पासा फेंका ऐसा, मिलन हुआ अनिवार्य,

सोनी की योनि में समाया, सूरज का वो पौरुष आर्य।

खजुराहो की मूरत सी, वो देह की जुगलबंदी थी,

जहाँ रस्मों और रिवाजों की, हर साँकल अब मंदी थी।

नग्नता नहीं, वो विजय थी, एक टूटे हुए विश्वासकी,

अमिट गाथा लिखी गई, उस मिलन और प्यास की।
 
आपकी कल्पनाओं की जोड़ी बड़ी खूबसूरत है शुक्रिया
 
Welcome,

hope you remember what I expected from my dear readers in episode 175..

I AM WAITING.....
 
भाग 176

सोनी (काँपती और दबी आवाज़ में): "सूरज... मुझे छोड़... यह पाप है! हम यह नहीं कर सकते!"



सोनी के शब्द 'पाप' की बात कर रहे थे, पर उसके बदन की सिहरन और उसकी योनि की पकड़ कुछ और ही बयाँ कर रही थी। उसका शरीर सूरज के उस प्रचंड पौरुष को ठुकरा नहीं पा रहा था। उसकी कमर ऊपर उठने के बजाय खुद-ब-खुद नीचे की ओर झुकती गई, जिससे वह मिलन और भी गहरा हो गया।

कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। कुछ पलों के लिए सब कुछ थम गया। न सूरज ने अपनी कमर हिलाई, न ही सोनी ने कोई हलचल की। वे बस उसी स्थिति में एक-दूसरे में सिमटे रहे।



अब आगे…

इस बीच सूरज सूरज की हथेलियां सोनी की उसे झीने कुर्ते से ढकी पीठ पर घूम रही थी। यह महसूस कर चुका था कि उसकी मौसी सोनी ने उसकी कामुक कल्पना का माँन रख लिया है।

सूरज ने सोनी को अपने आलिंगन में और कसा उसे अपने सीने पर सोनी की नग्न और तनी हुई चुचियों का एहसास भी हुआ.. उधर सोनी मदहोश हो रही थी।

दोनों के सीने धड़कन की तेज़ गति से एक-दूसरे से टकरा रहे थे। सूरज, जो अब भी दुनिया को उस मलमल के पर्दे के पीछे से महसूस कर रहा था, बड़ी मासूमियत से फुसफुसाया।

सूरज: "मौसी... मुझे यकीन नहीं हो रहा। आखिर क्या जादू है? जो स्पर्श मुझे डराता था, आज वह मुझे मुकम्मल महसूस करा रहा है। मैं... मैं आपके भीतर हूँ ना मौसी?"

सूरज की उस मासूमियत और उसकी आवाज़ में छिपी जीत ने सोनी के प्रतिरोध को पूरी तरह खत्म कर दिया। वह समझ गई कि यह केवल एक शारीरिक मिलन नहीं, बल्कि उस डर की अंत्येष्टि थी जिसने सूरज को अपाहिज बना रखा था। सोनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और सूरज के कंधों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, मानो वह भी इस 'पाप' में अपनी मर्जी से शामिल हो गई हो।

सूरज की वह मासूमियत भरी बात सुनकर सोनी के पास कोई शब्द नहीं बचे थे। वह एक डॉक्टर की तरह शुरू हुई थी, पर अब वह एक ऐसी औरत बन चुकी थी जिसके भीतर की ममता और दबी हुई कामनाएँ एक साथ पिघल रही थीं। उसने सूरज को कसकर अपने आलिंगन में भर लिया।

सूरज, जो महीनों से अपनी मर्दानगी को लेकर कुंठित था, आज सोनी के उस रेशमी और तप्त सानिध्य में खुद को एक राजा महसूस कर रहा था। सोनी की योनि की वह मखमली पकड़ और उसकी नाइटी के भीतर की ऊष्मा ने सूरज के भीतर एक ऐसा ज्वार पैदा कर दिया जिसे संभालना उसके बस में नहीं था।

सूरज (उत्तेजना में फुसफुसाते हुए): "मौसी... मैं... मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। ये अनुभव अनोखा है"

सूरज ने अपनी कमर को बस एक-दो बार ही धीरे से आगे-पीछे किया। वह युवा था और सोनी जैसी परिपक्व और सुंदर महिला का वह सजीव स्पर्श उसके लिए किसी दैवीय अनुभव से कम नहीं था। जैसे ही उसका लिंग सोनी की गहराइयों से टकराया, उसकी नसों में एक तीव्र बिजली सी कौंधी।

सोनी अभी खुद को संभालने की कोशिश कर ही रही थी कि उसने महसूस किया कि सूरज का पूरा शरीर अकड़ गया है। सूरज के लिंग ने एक जोरदार झटका लिया और उसका सारा संचित वेग, उसका पौरुष, सोनी की गहराइयों में एक गर्म फुहारे की तरह फूट पड़ा।

सूरज के स्खलन की वह गरमाहट जब सोनी ने अपने भीतर महसूस की, तो वह सिहर उठी। वह स्तंभित रह गई। सूरज ने अपनी पूरी ताकत से सोनी को जकड़ लिया और गहरी साँसें लेते हुए बेतहाशा अपना वीर्यपात करने लगा। उसे यह एहसास भी नहीं रहा कि वह अपनी मां समान मौसी का गर्भ सिंचित कर रहा है…

पूरी तरह वीर्यपात करने के बाद सूरज पकड़ ढीली हुई पर लंड का तनाव जस का तस था। सूरज ने जो वीर सोनी के गर्भ में उड़ेला था वह अब भी अंदर था सूरज का लंड उसे बाहर आने से रोक रहा था।

सूरज (निढाल होकर): "मौसी... मुझे माफ कर दीजिएगा..।"

सोनी निशब्द थी। उसका अपना स्खलन नहीं हुआ था, वह अभी भी उत्तेजना के एक अधूरे मोड़ पर खड़ी थी, पर उसके चेहरे पर एक सुकून था। उसने देखा कि जिस सूरज का आत्मविश्वास राख हो चुका था, आज वह एक विजेता की तरह उसकी योनि में अपना वीर्यपात कर चुका था मर्यादा की दीवारें ढह चुकी थीं, पर एक युवक का भविष्य बच गया था।

सूरज के स्खलन की वह गर्म फुहार जब सोनी की गहराइयों में समाई, तो हवेली का वह कमरा क्षण भर के लिए एकदम निशब्द हो गया। सूरज बिस्तर पर सीधा लेटा हुआ था, उसकी आँखों पर मलमल की वह पट्टी अब भी बंधी थी। सोनी उसके ठीक ऊपर, अपनी जाँघों को सूरज की जाँघों के दोनों तरफ फैलाकर बैठी थी। सूरज की साँसें तेज़ थीं, पर एक अद्भुत बात थी—चरम आनंद के उस वेग के बाद भी, सूरज के लिंग का तनाव रत्ती भर भी कम नहीं हुआ था। वह अब भी पत्थर की तरह सख्त था और सोनी की योनि की मखमली दीवारों को भीतर तक पूरी तरह भरे हुए था।

सोनी इस अभूतपूर्व अनुभव से स्तब्ध थी। उसने महसूस किया कि सूरज का पौरुष न केवल जाग्रत हुआ है, बल्कि वह अपनी पूर्ण सामर्थ्य के साथ उसके भीतर आत्मसात हो चुका है। सूरज के लिंग की धड़कनें अब सोनी योनि मार्ग को सहला रही थीं।

सूरज (काँपती और भारी आवाज़ में): "मौसी... मैं अब और इस अंधेरे में नहीं रहना चाहता। क्या मैं इसे हटा सकता हूँ? क्या मैं अपनी मुक्ति दायिनी अपनी देवी को देख सकता हूँ?"

सोनी, जो सूरज की इस जीत से ममता और कामुकता के एक अनूठे भँवर में थी, अब उसे और मना नहीं कर पाई। उसने धीरे से कहा, "हटा ले सूरज... आज तूने अपना पुरुषत्व प्राप्त कर लिया है मुझे खुशी है तू सफल हुआ और हमारी साधना सफल हुई।"

सूरज ने काँपते हाथों से अपनी आँखों से वह मलमल की पट्टी हटा दी। जैसे ही उसकी आँखें खुलीं, कमरे की मद्धम रोशनी में जो दृश्य उसके सामने था, उसने उसके पौरुष को और भी प्रचंड कर दिया। परंतु, जैसे ही सूरज की नज़रें सोनी से मिलीं, सोनी ने लज्जा और संकोच के मारे अपनी पलकें मूँद लीं। उसकी बंद आँखों के किनारों पर नमी थी और चेहरे पर एक लालिमा, जो उसके भीतर मचे तूफान को बयाँ कर रही थी।

सूरज ने अपनी प्यासी निगाहों से अपनी मौसी के उस यौवन का रसपान करना शुरू किया जिसका उसने सपना देखा था। वह सफेद झीना कुर्ता, जिसे वह बाज़ार से लाया था, सोनी के पसीने और उत्तेजना से उनके बदन पर पूरी तरह चिपक गया था। कुर्ते के पारभासी कपड़े के नीचे से सोनी की भारी-भारी, पुष्ट चूचियाँ अपनी पूरी गरिमा के साथ उभर रही थीं नीचे लटकने के कारण उनका आकर और गोल हो गया था। गुलाबी और तने हुए निप्पल उस महीन कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे।

सूरज की नज़रें अपनी मौसी के उस उन्नत वक्ष पर जमी थीं, पर उसका शरीर अब भी सोनी के साथ गहराई से जुड़ा था। सूरज चाहता तो था कि वह दोनों चूचियों को अपने हाथों में भर ले परंतु उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी। उसका ध्यान अपने लिंग पर था।

उसने अपने मजबूत हाथों से सोनी की पतली कमर को पकड़ा और उसे धीरे से थोड़ा ऊपर उठाया।

वह देखना चाहता था—वह उस स्थान को अपनी आँखों से निहारना चाहता था जहाँ उसकी विजय गाथा लिखी जा रही थी। जैसे ही उसने सोनी को ऊपर उठाया, उसे साफ़ दिखा कि उसका बलिष्ठ लिंग, सोनी की गोरी और रसीली जाँघों के बीच, उनकी योनि के गुलाबी होंठों को चीरता हुआ गहरे तक समाया हुआ था। वह मिलन स्थल काम-रस और वीर्य के मिश्रण से पूरी तरह गीला हो चुका था, जो मद्धम रोशनी में मोतियों की तरह चमक रहा था।

सोनी ने एक लंबी और गरम आह भरी। सूरज ने देखा कि उसकी हरकत से सोनी के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई है। सूरज का तनाव अब अपनी पराकाष्ठा पर था।

उसने उठने की कोशिश की और सोनी के उन काँपते हुए गुलाबी होंठों के पास अपना चेहरा ले गया।

सूरज: "मौसी... आपकी आँखें बंद हैं, पर आपकी अतृप्त देह पुकार रही है। आपने मुझे नया जीवन दिया है, अब मुझे इसे तृप्त करने दीजिए।"

अपनी पलके बंद किए ही सूरज के माथे को चूमने की कोशिश की पर सूरज ने अपने माथे की जगह अपने होंठ सोनी के अधरों से सटा दिए…पहल सूरज ने की पर सौनी पिघलती गई….आज सोनी महसूस कर रही थी और अब सूरज के इशारों पर फिसल रही थी।

सूरज ने धीरे से सोनी के वक्ष को उस झीने कुर्ते के ऊपर से ही अपनी हथेलियों में भरा। स्पर्श इतना उत्तेजक था कि सोनी की आँखें एक पल के लिए खुलीं और फिर मदहोशी में बंद हो गईं। सूरज ने अब अपनी कमर को एक लयबद्ध गति देना शुरू किया। हर धचके के साथ वह सोनी की योनि की उन परतों को महसूस कर रहा था जो अब उसके स्वागत में पूरी तरह खुल चुकी थीं।

सोनी अब समर्पण मुद्रा में थी सूरज ने सोनी के वजन को अपने शरीर पर महसूस किया और उसने सोनी को आराम देने का फैसला कर लिया।

सूरज धीरे से बिस्तर पर उठकर बैठने लगा। उसकी इस हरकत के साथ सोनी का शरीर भी एक लय में ऊपर उठता है, क्योंकि उनका जुड़ाव अभी भी अटूट था—सूरज का कठोर लिंग अभी भी सोनी की योनि की गहराइयों में उसी तरह समाहित था। सोनी सूरज की मंशा समझ जाती है और उसके निर्देशों का पालन करते हुए अपनी जाँघों और घुटनों को सलीके से मोड़ती जाती है। कुछ ही पलों में वे दोनों बिस्तर पर बैठने की मुद्रा में आ जाते हैं।

सोनी की पुष्ट जाँघें सूरज की मजबूत जाँघों पर टिकी थीं, पर उनका लिंग-योनि का मिलन इस बैठने की स्थिति में और भी सघन हो गया था। सूरज ने सोनी के गदराए नितंबों को अपनी मजबूत हथेलियों में भरा और उन्हें दबाते हुए अपनी ओर और कस लिया। इस करीबी ने उनके शरीरों के बीच की दूरी को शून्य कर दिया था। कुछ ही पलों बाद, सूरज ने बड़ी कोमलता से सोनी को पीठ के बल बिस्तर पर लिटा दिया, पर वह खुद उनके ऊपर हावी रहा।

हवेली के उस मद्धम प्रकाश में सूरज सोनी की मदमस्त जवानी को अपनी आँखों से निहार रहा था। वहाँ कुछ पलों के लिए एक जादुई शांति छा गई। सोनी भली-भांति समझ रही थी कि उसका भांजा आज अपनी दबी हुई कल्पनाओं का रसपान कर रहा है। वह एक मौन साधिका की तरह अपनी पलकें मूँदे पड़ी रही, मानो उसने खुद को पूरी तरह सूरज के हवाले कर दिया हो। सूरज धीरे से उन पर झुका और उसके माथे तथा गुलाबी होंठों को चूमते हुए उनके कान में फुसफुसाया।

सूरज: "मौसी... मैं एक बार फिर से वह सब महसूस करना चाहता हूँ, पर इस बार अपनी आँखों के सामने।"

सोनी ने एक गहरी साँस ली और अपनी मौन स्वीकृति दे दी।

सूरज ने अपनी पकड़ थोड़ी ढीली की और धीरे-धीरे अपने लिंग को सोनी की योनि से बाहर निकालना शुरू किया। जैसे ही वह सख्त अंग बाहर आया, सोनी की योनि से सूरज का वह गाढ़ा वीर्य छलक-छलक कर बाहर आने लगा।

सूरज की नजरों ने जब सोनी की योनि को पहली बार देखा तो देखता ही रह गया। सोनी की योनि की बनावट किसी महोघनी के प्राचीन वृक्ष की उस कामुक गाँठ (Knot) की तरह थी, जो समय के साथ और भी सघन, गहरी और नक्काशीदार हो जाती है। महोघनी की लकड़ी जैसी वह मखमली रंगत और उसके भीतर छुपी हुई वे अनंत परतें, जो अब सूरज के प्रहारों से सुर्ख लाल होकर फूल गई थीं। योनि के वे मांसल और कोमल ओष्ठ (Labia) अधखुले गुलाब की तरह बाहर की ओर मुड़ गए थे, जिनसे सूरज का वीर्य रुक-रुक कर बाहर आ रहा था।

वह 'महोघनी की गाँठ' अब भी स्पंदित हो रही थी, मानो सूरज के उस पौरुष को वापस पुकार रही हो। वीर्य की वह सफेद और लसलसी चमक सोनी की चिकनी त्वचा के साथ मिलकर एक ऐसा मोहक विरोधाभास पैदा कर रही थी, जो सूरज की आँखों में दोबारा वासना का ज्वार उठाने के लिए काफी था।

सोनी ने अपनी जाँघों को और भी फैला दिया। उसकी साँसें तेज़ थीं और वक्षों का उतार-चढ़ाव उसकी अतृप्ति की गवाही दे रहा था। सोनी की आँखें अर्द्ध-निमीलित (आधे बंद) थीं और उनमें एक अजीब सी भूख थी।

उसकी योनि से रिसता वह द्रव्य और उसकी देह से उठती वह तीखी 'पुरुष-गंध' वातावरण को और भी उत्तेजक बना रही थी। वह अपनी कमर को हल्का सा ऊपर उठा रही थी, जैसे उस महोघनी की गाँठ में अभी और प्रहारों को झेलने की शक्ति बाकी हो। वह पूरी तरह सूरज के रस में भीग चुकी थी, पर उसका अंतर्मन अभी भी उस 'महा-सुख' की प्रतीक्षा में तड़प रहा था।

सूरज ने देखा कि वीर्य की कुछ बूंदें सोनी की योनि के मुहाने पर मोतियों की तरह जमी हुई थीं, जबकि बाकी का हिस्सा धीरे-धीरे फिसलकर सोनी के नितंबों के नीचे बिछी चादर को भिगो रहा था। सोनी की योनि से निकलता वह काम-रस और वीर्य का मिश्रण मद्धम प्रकाश में अद्भुत चमक पैदा कर रहा था। वह स्थान पूरी तरह आर्द्र और चिपचिपा हो चुका था।

सोनी की योनि के होंठ उत्तेजना और घर्षण के कारण थोड़े सूजे हुए और गहरे गुलाबी हो चुके थे। उस स्थान से उठती एक सोंधी और मादक गंध ने सूरज के मष्तिष्क को फिर से उन्माद से भर दिया। वह अपनी मौसी की उस 'मुनिया' की सुंदरता से इतना मोहित हो गया.. कि उसने झुक कर उसे चूमने की कोशिश की सोनी को जैसे ही अपनी जांघों पर सूरज के सर का एहसास हुआ उसने सूरज का सर पकड़ लिया और उसे अपनी बुर को चूमने से रोक लिया…

सूरज ….ये नहींं ……सोनी वासना की पराकाष्ठा पर सूरज को नहीं ले जाना चाहती थी…सूरज ने सोनी की बात मान ली पर उसकी योनि की जगह अपने सर को आगे ले जाकर उसकी नाभि को चूम लिया और उसकी नाभि के केंद्र पर अपनी जीभ घुमा दी.

सोनी मन ही मन सोच रही थी कि सूरज में कामुकता का भंडार है..अपने पहले मिलन में ये इतना उत्तेजक है तो आगे क्या करेगा….

नाभि से आ रही मादक गंध और उसके अनोखे स्वाद ने सूरज का पौरुष एक बार फिर से फड़क उठा। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उसकी मौसी का वह पवित्र शरीर अब उसके पौरुष के चिन्हों से सजा हुआ था। वह दृश्य इतना कामुक और गरिमामय था कि सूरज कुछ क्षणों के लिए एकटक उसे निहारता रहा, मानो वह इस छवि को अपनी आत्मा में हमेशा के लिए अंकित कर लेना चाहता हो।

सूरज अब अपनी जिज्ञासा और एक प्रेमी की दीवानगी के साथ अपने पौरुष का परीक्षण कर रहा था। उसने अपने उस पत्थर की तरह सख्त अंग को दोबारा सोनी की भग्नासा (Clitoris) पर रखा। वह देखना चाहता था कि जो लिंग के तनाव कम होने की घटना रोजी के साथ हो रही थी वह अब मौसी के साथ क्यों नहीं हो रही थी।

वह देखना चाहता था कि क्या यह तनाव केवल एक इत्तेफाक था या उसकी मर्दानगी वाकई लौट आई है। वह अपने लिंग को सोनी के उस कोमल दाने पर धीरे-धीरे रगड़ने लगा। कभी वह उसे उस पर मखमल की तरह फिसलाता, तो कभी हल्के धक्के के साथ उस पर चोट करता।

सोनी: "उह्ह... सूरज... आआह्ह...मत कर.."

सोनी का पूरा बदन हर रगड़ के साथ धनुष की तरह ऊपर की ओर खिंच जाता। उत्तेजना की लहरें उसके भीतर सुनामी ला रही थीं। वह चाहती थी कि सूरज यह 'टॉर्चर' बंद करे, क्योंकि उसके भीतर की प्यास अब उसे पागल कर रही थी। उसने अपने होंठों को अपने ही दाँतों के नीचे दबा रखा था ताकि उसकी आवाज़ कमरे से बाहर न जाए, पर उसकी सिसकियाँ और सीत्कारें (Moans) उसकी बेबसी बयाँ कर रही थीं।

सूरज रुकने का नाम नहीं ले रहा था। वह उस गीले और फिसलन भरे स्थान पर अपने लिंग को बार-बार रगड़ता रहा। अंततः, सोनी का सब्र जवाब दे गया। उसकी देह अब केवल स्पर्श नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण माँग रही थी। उसने एक गहरी और तड़पती हुई आह भरी और अपनी दोनों बाहें सूरज के लिए फैला दीं ठीक वैसे ही जैसे सूरज ने अब से कुछ देर पहले फैलाई थी।

सोनी (सिसकते हुए): "अब और नहीं सूरज... अब और बर्दाश्त नहीं होता... आआह्ह …आजा….!"

सूरज ने जैसे ही यह सुना, उसने सोनी की दोनों हथेलियां को अपनी हथेली से पकड़कर उसे सोनी के सर के पीछे कर दिया। इसी बीच सोनी की उंगलियों ने सूरज के उस जादुई अंगूठे को एक बार फिर सहला दिया।

सोनी ने यह काम जानबूझकर किया था इसके पहले उसने सूरज के लिंग में उतना ही तनाव भरा था जितना की एक युवा में होना चाहिए पर सोनी अब सूरज को भी प्रथम मिलन का एहसास करना चाहती थी क्योंकि यह सूरज के लिए भी उसका कौमार्य भंग करने जैसा था। दूसरी तरफ सोनी स्वयं भी इस मिलन को यादगार बनाना चाहिए लंबे और मजबूत लिंग से संभोग करने की उसकी तमन्ना आज पूरी हो रही थी।

अंगूठा सहलाए जाने से सूरज के लिंग का तनाव और आकार और भी बढ़ गया. उस तनाव को मजबूत आवरण की जरूरत थी…..सूरज ने अति उत्तेजना में आव देखा न ताव, अपनी पकड़ मजबूत की और एक ही झटके में अपना पूरा पौरुष सोनी की योनि की गहराइयों में उतारने की कोशिश की।

"उईईई माँ….….आआह्ह! सूरज.. तनी धीरे से….दुखाता." सोनी के मुँह से एक चीख निकल गई.

सोनी की लिसलिसी चिपचिपी बुर सूरज के उस विशाल लिंग के लिए प्रतिरोध दिखा रही थी। सूरज को ऐसा लगा जैसे वह किसी अभेद्य दीवार को लांघने की कोशिश कर रहा हो।

उस तीव्र घर्षण और प्रतिरोध के बीच, अचानक सूरज को अपने लिंग के अग्रभाग (सुपाड़े) के ठीक निचले हिस्से में, जहाँ संवेदनाओं का केंद्र होता है, एक तीखी और बिजली जैसी टीस महसूस हुई। वह दर्द इतना तीव्र था कि सूरज के बदन में एक सिहरन दौड़ गई। सोनी की उस तंग और मांसल दीवारों के दबाव से, सूरज के लिंग के निचले हिस्से का वह कोमल तंतु (पतला धागा) उस खिंचाव को बर्दाश्त नहीं कर पाया और सूरज का कौमार्य भंग हो गया… सूरज के रक्त की पहली बूंद सोने की योनि से निकल रहे रजरस से मिलकर एकाकार हो रही थी।

उधर सोनी अपने दर्द को कम करने की कोशिश में उसने सूरज की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए…सूरज को एहसास हुआ जैसे उसने कोई गलती कर दी हो उधर उसका लिंग सोनी की योनि के प्रतिरोध को महसूस कर उसे और भेदने का मन बन चुका था और अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था।

दरअसल सोनी के अंगूठा सहलाए जाने से लिंग काआकर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था और सूरज के धक्का लगाने के बावजूद वह वह सोने की चिपचिपी योनि में आधा ही जा पाया..

सोनी हाफ रही थी.. उसकी आंखों में दर्द के आंसू थे पर जिस लंबे और मजबूत लिंग की कल्पना सोनी ने की थी वह आज उसके भीतर था और उसे वही एहसास दिला रहा था जैसा उसने अपने प्रथम मिलन में महसूस किया था। उसने अपनी पलके खोली और सूरज की आंखों में आंखें डालते हुए बोला…

“सूरज थोड़ा धीरे-धीरे ….”

सूरज के लिए सोनी सर्वस्व थी .. जिसने उसे पुरुषत्व का वरदान दिया था उसने अपने लिंग को थोड़ा बाहर निकाला और बेहद प्यार से सोनी की योनि के अंदर प्रवेश करने लगा..

सूरज सोनी पर पूरी तरह हावी हो चुका था अब तक जितना कामशास्त्र का ज्ञान उसने प्राप्त किया था वह सब वह सोनी पर उड़ेल देना चाहता था। सोनी की दोनों हथेलियां उसकी हथेली में थी पर सूरज का मुंह अब भी स्वतंत्र था उसने बिना किसी हिचक के सोनी की दाहिनी चूची को अपने मुंह में भर लिया…

सोनी कराह उठी उसकी जांघें और भी ज्यादा फैल गई…उसकी उत्तेजना ने सूरज के लिंग को और भी रास्ता दिया…जैसे-जैसे सूरज सोने की मदमस्त चूचियों को चूसता गया.. उसका लिंग सोने की योनि में और गहरी और गहरे तक उतरता गया…

सोनी को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके बदन का खालीपन अब पूरी तरह भर चुका है.. योनि का फैलाव अपने चरम पर था और उसकी कोमल दीवारें सूरज के तने हुए लिंग को पूरी तरह जकड़े हुए थीं…

सूरज का पौरुष अब पूरी तरह से जागृत हो चुका था। उसने महसूस किया कि सोनी की योनि की चिपचिपाहट और उसकी गर्माहट उसके लिंग को भीतर की ओर आमंत्रित कर रही है। वह अब केवल एक भांजा नहीं था जो उपचार ढूंढ रहा था, बल्कि वह एक पूर्ण पुरुष था जो अपनी कामुकता की नई ऊंचाइयों को छू रहा था। उसने अपनी कमर को एक खास लय (Rhythm) में हिलाना शुरू किया। हर धक्के के साथ उसका लिंग सोनी की योनि की उन परतों को खोल रहा था जो उसका पति विकास वर्षों से नहीं खोल पाया था।

सोनी को महसूस हो रहा था कि सूरज का वह फौलादी लिंग उसके गर्भाशय की दीवार से टकरा रहा है। वह दर्द जो शुरुआत में था, अब एक मीठे उन्माद में बदल चुका था। उसने अपनी टांगों को सूरज की कमर के चारों ओर और भी कस लिया, मानो वह उसे खुद के और भी करीब खींच लेना चाहती हो।

सूरज ने अब अपना मुंह सोनी की दूसरी चूची की ओर मोड़ा। उसके गीले स्पर्श और दांतों की हल्की सी पकड़ ने सोनी को पागल कर दिया। सोनी ने अपने हाथ सूरज की पकड़ से खींचने की कोशिश की और सूरज ने सोनी के हाथों को आजाद कर दिया.

सोनी सूरज के सर के बाल पकड़ कर उसे खुद से दूर करने की कोशिश करने लगी पर सूरज उसकी चूची को और भी उन्माद से चूसता रहा अंतत सोनी का प्रतिरोध खत्म हो गया और वह स्वयं सूरज के सर को अपनी चुची पर और भी सटाती चली गई

सोनी: "ओह्ह... सूरज... तू क्या कर रहा है... बस…कर…... आआह्ह!"

सूरज की रफ़्तार अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। कमरे में जिस्मों के टकराने की वह मादक 'थप-थप' की आवाज़ गूँजने लगी जो किसी आदिम संगीत जैसी लग रही थी। हर प्रहार के साथ सोनी की योनि से निकलता काम-रस (Lubrication) उस मिलन को और भी चिकना और गहरा बना रहा था। सूरज अब पूरी तरह से सोनी के भीतर समा चुका था; उनका संगम इतना गहरा था कि उनके पसीने से भीगे जिस्म एक-दूसरे से चिपक गए थे।

सोनी की सिसकियां अब तेज़ हो गई थीं, उसकी आँखें फिर से मुँदने लगी थीं और उसका शरीर उत्तेजना के उस शिखर की ओर बढ़ रहा था जहाँ पहुँचकर सब कुछ धुंधला हो जाता है। सूरज ने महसूस किया कि सोनी की योनि की दीवारें उसके लिंग को जोर-जोर से जकड़ रही हैं, जो इस बात का संकेत था कि चरमानंद की घड़ी अब बस कुछ ही पलों की दूरी पर है।

सूरज ने अपने हाथों की पकड़ सोनी की हथेलियों पर और मजबूत की और अपनी कमर के वेग को अपनी पूरी शक्ति के साथ चरम पर ले गया।

सूरज की कमर की गति अब किसी बेकाबू लहर की तरह हो गई थी। वह अब केवल प्रहार नहीं कर रहा था, बल्कि सोनी की देह की गहराइयों में अपने अस्तित्व की मुहर लगा रहा था। सोनी का शरीर हर धक्के के साथ बिस्तर पर ऊपर-नीचे हो रहा था, और उसकी जांघों के बीच मची उस हलचल ने कमरे के सन्नाटे को पूरी तरह चीर दिया था।

सोनी की सिसकियाँ अब टूटने लगी थीं और उनका स्थान गहरी और मदहोश कर देने वाली सीत्कारों ने ले लिया था।

सोनी: "आह्ह... सूरज... बस... अब और नहीं... मैं... मैं ... उईईई माँ!"

सोनी का पूरा बदन अचानक धनुष की तरह अकड़ गया। उसकी योनि की दीवारों ने सूरज के लिंग को एक ऐसी अविश्वसनीय पकड़ में जकड़ लिया जैसे कोई उसे अपनी बाहों में भींच रहा हो। सोनी की आँखें उलट गईं और उसके मुँह से एक लंबी, थरथराती हुई आह निकली। वह चरमानंद के उस शिखर से नीचे गिर रही थी जहाँ केवल सुख का अहसास होता है।

सोनी के उस तीव्र संकुचन और उसकी योनि की उस मखमली जकड़न ने सूरज के सब्र का बांध भी तोड़ दिया। उसे महसूस हुआ जैसे उसके रीढ़ की हड्डी से एक गर्म बिजली दौड़ती हुई उसके पौरुष में जमा हो गई है। सूरज ने एक आखिरी, सबसे गहरा और प्रचंड धक्का मारा और सोनी के गर्भाशय के मुहाने पर अपना सारा संचित वेग, अपना सारा पौरुष, एक गर्म झरने की तरह उड़ेल दिया।

सूरज: "मौसी... आआह्ह!"

सूरज का पूरा शरीर काँप उठा। वह कई सेकंडों तक उसी स्थिति में सोनी के ऊपर जकड़ा रहा, जबकि उसका लिंग सोनी की गहराइयों में अपना अंतिम कतरा कतरा खाली कर रहा था। सूरज ने सोनी के गर्भ में सिर्फ अपना वीर्य ही नहीं अपने कौमार्य भंग होने से निकला हुआ रक्त भी अर्पित किया था…

सोनी ने उसे अपनी बाहों में कसकर भींच लिया, मानो वह उस गर्म अहसास को हमेशा के लिए अपने भीतर कैद कर लेना चाहती हो।

कमरे में अब केवल उनकी हाँफती हुई साँसों की आवाज़ें थीं। पसीने से भीगे हुए दोनों जिस्म एक-दूसरे में सिमटे हुए थे। सूरज का लंड जब सोनी की योनि से बाहर आया तो एक पक्क.. की आवाज हुई…यह आवाज किसी सिलेंडर से पिस्टन खींचने पर होने वाली आवाज जैसी थी।

सोनी ने इस आवाज को पहले भी सुना था उसे वह दिन याद आ गया जब सरयू सिंह ने उसे स्खलित करने के बाद अपना लिंग उसकी योनि से खींचा था। आज वही काम सरयू सिंह के पुत्र ने किया था।

सूरज धीरे से सोनी के बगल में ढह गया पर उसके लंड का तनाव अब भी वैसा ही बना हुआ था।

सूरज का वीर्य एक बार फिर सोनी की योनि से छलकने को था पर सोनी ने अपनी जांघें से ऊपर कर ली जैसे ही वह वीर्य के हर कतरे को संजो लेना चाहती हो..

सूरज का हाथ अब भी सोनी की कमर पर था। सोनी ने करवट ली और सूरज की आँखों में देखा—उन आँखों में अब वह पुराना डर नहीं, बल्कि एक विजेता का गर्व और अपनी 'आराध्या' के प्रति अगाध कृतज्ञता थी।

सोनी ने धीरे से सूरज के माथे से पसीना पोंछा और उसके होंठों पर एक ममता भरा चुंबन अंकित किया।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "आज बनारस का यह सूरज सच में उदय हो गया है।"

शेष अगले भाग में…
 
अपने ऑनलाइन पाठकों जो अब तक कहानी तो पढ़ रहे हैं पर फोरम पर लॉगिन करके अपने कमेंट नहीं दे पा रहे हहैं उनके लिए यह एपिसोड में पब्लिकली पोस्ट कर रहा हूं।

जिन पाठकों ने मेरे अनुरोध पर पिक्चर्स भेजी थी उन्हें दिल से धन्यवाद।
 
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