भाग 158
उधर सोनी का कलेजा धक-धक कर रहा था उसे अब यकीन हो चला था कि सूरज के लिंग में आया हुआ तनाव निश्चित ही उसके अंगूठे सहलाए जाने के कारण हुआ था।
सोनी मन ही मन सोच रही थी पर तब तो सूरज एक बालक था अब तो तने हुए लिंग को शिथिल करने का उपाय सर्वविदित था। क्या सूरज को हस्तमैथुन के बारे में नहीं मालूम था? क्या सूरज ने इस तनाव को कम करने के लिए हस्तमैथुन नहीं किया होगा…
प्रश्न जटिल था सूरज की असहज स्थिति देखकर सोनी स्वयं परेशान हो गई थी इस प्रश्न का उत्तर जानना जरूरी था। सूरज के लिंग का तनाव कम करने का उपाय सोनी को बखूबी याद था पर ……
हे भगवान…. यह असंभव था….
पुत्र समान जवान सूरज का लंड ……चूमना……सोनी की रूह कांप उठी…अनिष्ट की आशंका से सोनी के माथे पर पसीने की बूंद चालक आई…थी…
अब आगे..
सूरज अपने कमरे में जा चुका था उसने अपना दरवाजा बंद कर लिया। सुगना ने भी सूरज के व्यवहार में परिवर्तन महसूस कर लिया था उसके जाते ही उसने सोनी से पूछा
इसे क्या हुआ आज बर्थडे के दिन भी कुछ टेंशन में लग रहा है।
सोनी स्वयं परेशान हो गई थी पर उसने संजीदगी से कहा
मुझे नहीं पता पर लग रहा कोई न कोई बात जरूर है?
सुगना अपने पुत्र को परेशान नहीं देख सकती थी वह उठ खड़ी हुई और बोली
मैं सूरज से मिलकर आती हूं…
सोनी भी उठ खड़ी हुई तभी सोने में घड़ी की तरफ निगाह दौड़ाई सुबह के 7.15 हो चुके थे..
दीदी घड़ी देखिए आपके योगा का समय हो गया। सुगना समय की पाबंद थी वैसे भी उसकी योगा क्लास में ढेर सारे सदस्य आया करते थे सुगना को उन्हें इंतजार करना पसंद नहीं था वह समय की कद्र करती थी।
सुगना को असमंजस में देखकर सोनी ने कहा आप जाइए मैं सूरज से बात करती हूं…
सुगना मन ही मन सोचने लगी की कही सूरज आज फिर अपनी मर्दानगी की बात को लेकर तो तनाव में नहीं आ गया है। हे भगवान आपने मुझे किसी मुसीबत में डाल दिया है…
सुगना को क्या पता था कि कल रात ही उसे अपने जन्मदिन का उपहार मिल चुका था और सूरज ने अपने जीवन में पहली बार वीर्य स्खलन का आनंद भी ले लिया था। और अब जो होने वाला था वह और भी अनूठा था सुगना तैयार होकर अपनी योगा क्लास में चली गई और इधर सोनी में सूरज के दरवाजे पर दस्तक दे दी।
दो-तीन बार खटखटाने पर अंदर से सूरज की आवाज आई..
कौन है अभी जाइए मैं सो रहा हूं…
आवाज की तल्खी से व्यक्ति की मनोदशा को पहचानना एक कला होती है सोनी ने सूरज की आवाज में छपी वेदना को पहचान लिया और बोली
सूरज दरवाजा खोलो मुझे तुमसे बात करनी है।
मौसी अभी नहीं बाद में.. सूरज की आवाज में वेदना स्पष्ट थी
सोनी ने दोबारा कहा..
सूरज मुझे तुम्हारी परेशानी पता है दरवाजा खोलो..
सूरज मजबूर हो चुका था वह उठा अपने तने हुए लंड को व्यवस्थित किया और आकर दरवाजे की चटकनी खोल दी पर तुरंत ही भाग कर बिस्तर में घुस गया..
सोनी अंदर आ चुकी थी वह सूरज के पास बिस्तर पर आकर बैठकर गई..
सूरज ने लिहाफ अपनी गर्दन तक ओढ़ रखी थी और अपने दोनों घुटने ऊपर किए हुए थे जिससे लिहाफ में उसके इतने हुए लिंग पर एक मजबूत आवरण कर लिया था और लिंग का आकार पूरी तरह छुप गया था
सोनी को अब पूरी तरह यकीन हो चुका था कि लंड में आया हुआ यह तनाव निश्चित ही उसके अंगूठे के सहलाए जाने की वजह से था। अपनी बात की पुष्टि के लिए उसने एक बार चुटकी ली और बेहद संजीदा स्वर में बोली,
“सूरज, अंगूठे का दर्द कैसा है? ला, एक बार फिर मलहम लगा दूँ।”
सूरज की तो जैसे साँस हलक में अटक गई। अभी कुछ देर पहले ही, जब सोनी ने उसका अंगूठा फिर से हाथ में लिया था, तो वह तनाव से फटने की कगार पर आ गया था। अब यदि मौसी ने दोबारा अंगूठा सहलाया, तो जाने क्या होगा। यह सोचकर उसने झट से अपना अंगूठा सीने पर रखकर छुपाने की कोशिश की और बेहद हड़बड़ी में बोला,
“नहीं मौसी, अंगूठा मत छूना।”
क्यों, क्या हुआ? मैंने कुछ गलत कर दिया क्या, सूरज?”
सोनी कहती ही जा रही थी, तभी सूरज ने बीच में बात काटते हुए कहा,
“मौसी, प्लीज़… मैं वैसे ही बहुत परेशान हूँ। मुझे और परेशान मत कीजिए।”
इतना कहकर सूरज ने लिहाफ अपने चेहरे तक खींच लिया।
सोनी सूरज की वेदना समझ रही थी। उसने बेहद संजीदा स्वर में कहा,
“सूरज, मैं तुम्हारी मौसी हूँ। मौसी माँ समान होती है। तुम अपनी परेशानी खुलकर मुझे बता सकते हो। मैं कोई न कोई उपाय ज़रूर करूँगी।”
सूरज किस मुंह से यह बताता कि उसका लंड तना हुआ है और दो बार वीर्य स्खलन करने के बाद भी उसमें रंच मात्र भी तनाव कम नहीं हुआ है।
सूरज ने कोई उत्तर नहीं दिया सोनी ने फिर कहा
“ मुझसे शरमाओ मत यदि वह तुम्हारे प्राइवेट पार्ट की बात है तब भी मैंने बचपन में तुम्हें पूरी तरह नग्न देखा है वैसे भी मैं नर्स रही हूं मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता? क्या तुम्हारे प्राइवेट पार्ट में कोई दिक्कत है।
सूरज की तो जैसे हक्की बक्की गुम हो गई ।वह कुछ बोल पाने की स्थिति में नहीं था । सोनी ने फिर जिद की
“देखो बताओगे नहीं तो मैं तुम्हारी मदद कैसे करूंगी” सूरज के सब्र का बांध टूट गया उसके सुबकने की आवाज सोनी ने सुन ली। उसने लिहाफ खींचा और सूरज का उदास चेहरा और आंखों में आंसू को देखकर सोनी ने उठकर उसके माथे को चूमा और बोली
“ अब कुछ मत कहना अपनी आंखें बंद कर लो और जब तक मैं ना कहूं आंखें मत खोलना …”
सूरज कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं था वह एक टक सोनी को देखे जा रहा था। सोनी ने अपनी उंगलियों से सूरज की पलकें बंद की और लिहाफ को एक बार फिर उसके चेहरे पर डाल दिया।
कुछ ही देर में सोनी ने लिहाफ को नीचे से पकड़ा और उसके पैरों और जांघों अनावृत्त करते हुए लिहाफ को उसके कमर तक ले आई। पेट के अंदर लंड खूंटे की भांति तना हुआ था। सूरज को लग चुका था कि अब उसका लंड उसकी नर्स मौसी की आंखों के सामने आने में चंद पलों की देरी थी।
अब कोई चारा न था। वह चुपचाप बुद्धू बन पड़ा रहा बस एक अंतिम बार उसने सोनी को रोकने की कोशिश की
“ मौसी छोड़ दीजिए “
पर सोनी ने उसकी बात अनसुनी कर दी सोनी की उंगलियों ने पेट का हुक खोल दिया और अंडर बीयर हटाते ही अंदर से गेहुआं सांप अपना फन उठा कर बाहर आ गया। क्या खूबसूरत और प्यारा लंड था। बेदाग चिकना … नीली नसें उसकी खूबसूरती को और भी ज्यादा बढ़ा रही थी. गुलाबी सुपlड़ा खूबसूरती में होड़ लगाने को तैयार था ।
सोनी रुकी नहीं उसने सूरज के अंडरवियर को थोड़ा और नीचे कर दिया। तभी सोनी को याद आया अरे उसने दरवाजे की चटकनी तो लगाई ही नहीं। सोनी बिस्तर से उठी और जाकर सिटकनी लगाने लगी।
उधर सूरज बिस्तर पर आधा नंगा लेटा हुआ था।
सूरज ने सिटकनी लगाने की आवाज महसूस की उसका करेजा धक-धक करने लगा …
हे भगवान यह क्या हो रहा था? परंतु सूरज के पास कोई उपाय नहीं था वह चुपचाप पड़ा रहा ।
सोनी एक बार फिर बिस्तर पर आइ और सूरज के अंडरवियर को पूरी तरह नीचे कर दिया सूरज ने यंत्रवत अपनी कमर उठाकर सोनी की मदद कर दी सोनू सूरज की पेंट और अंडरवियर दोनों जांघों तक आ चुके थे और लंड एक गन्ने की पूरी तरह तना हुआ खड़ा था सोनी उस लंड को देखकर हतप्रभ थी।
सरयू सिंह के पुत्र सूरज का लंड उनसे भी बेहतर था। उधर सूरज का लंड अब रह कर उछाल मार रहा था शायद सोनू के मन में चल रहे विचारों से लंड में यह हनक पैदा हो रही थी आखिरकार आज पहली बार सूरज का लंड किसी स्त्री के सामने नग्न हुआ था।
उधर सोनी की सांस हलक में अटक चुकी थी वह आंखें फाड़कर इस खूबसूरत और दिव्य लंड को देख रही थी। सोनी ने अब तक दो ही विशालकाय लिंग देखे थे एक तो उसे नीग्रो अल्बर्ट का दूसरा सरयू सिंह का। पर सूरज उन सब पर भारी था इतना खूबसूरत इतना दिव्य इतना मजबूत उतना ही कोमल कई विरोधाभास थे। लंड को त्वचा इतनी कोमल कि उसे पर आई नशे त्वचा को आसानी से उठा दे रही थी और अपने अस्तित्व का प्रदर्शन कर रही थी और कठोरता ऐसी जैसे वह इसका आकलन करने के लिए आकर्षित कर रहा हो।
सोनी उसे खूबसूरत लंड को अपने हाथों से महसूस करना चाहती थी मन के किसी कोने में वासना अपना फन उठा रही थी।
तभी उसकी चेतना ने उसे याद दिलाया कि जिस लंड को वह घूर रही है वह उसके पुत्र समान है। सोनी को इस लंड को शांत करने का उपाय याद आ चुका था उसने हिम्मत जुटा कर धीरे-धीरे अपने होंठ लंड के समीप ले आई।
लंड के समीप आते ही लंड से आ रही मर्दाना गंध हमने सोनी का ध्यान अपनी ओर खींचा… खुशबू मदहोश कर देने वाली थी। सोनी अपनी वासना में घिर चुकी थी..
उसके होंठ फड़कने लगे…सोनी के मन में क्या चल रहा था यह तो वही जाने परंतु जैसे ही उसने अपने होंठ सूरज के तने हुए लंड के सुपाड़े से लगाया लंड का आकार छोटा होने लगा…ऐसा लगा जैसे किसी ने गुब्बारे में छेद कर दिया हो देखते ही देखते लंड का तनाव पूरी तरह गायब हो गया और वह सामान्य स्थिति में आ गया…
सूरज ने चैन की सांस ली…वह मन ही मन बहुत खुश हो गया उसे इतना तो एहसास हुआ कि सोनी के किसी जीवित अंग ने उसके लंड को छुआ था जिसकी वजह से उसका तनाव कम हो गया था पर वह अंग कौन सा था क्या था इसका आकलन सूरज नहीं कर पाया करता भी कैसे उसकी आंखें बंद थी और चेहरे पर लिहाफ पड़ा हुआ था।
सोनी ने एक आखरी बार सूरज के लंड को दोबारा देखा जो एक मासूम और अबोध की तरह एक तरफ लटका हुआ था पर अब भी उतना ही खूबसूरत था।
सोनी ने उसे छूने की जहमत नहीं उठाई और न हीं सूरज के पेंट को ऊपर खींचने की। सोनी ने लिहाफ को ही खींचकर सूरज के अधो भाग को ढक दिया और उठकर दरवाजे के पास आ गई। उसने सिटकनी खोली और निकलते हुए बोली ..
सॉरी सूरज गलती मेरी ही थी …थोड़ी देर आराम कर लो फिर बात करेंगे…
सूरज को यह सारा माजरा समझ नहीं आ रहा था। पर वह सुकून की सांस ले रहा था।
इधर सूरज सुकून की सांस ले रहा था उधर सोनी का दिल अभी धड़क रहा था। कितना खूबसूरत था वह लंड सोनी की वासना तड़प उठी थी उसने महसूस किया कि आज कई दिनों बाद उसकी योनि में कुछ हलचल महसूस हुई थी ।
संवेदनाओं की तरंगे योनि द्वार पर अपनी सरगम छेड़ रही थी सोनी को अपने पुराने दिन याद आने लगे कभी वह कभी अल्बर्ट के बारे में सोचती कभी सरयू सिंह के बारे में। अपना आखिर अपना होता है अल्बर्ट सोनी का अपना नहीं था उससे मुलाकात कुछ घंटे की थी परंतु सरयू सिंह …उनके साथ तो सोनी की कई यादें जुड़ी हुई थी।
सोनी एक बार फिर अपनी यादों में खो गई…
जब से उसने सलेमपुर में सरयू सिंह के बक्से से अपनी लाल पैंटी को उनके वीर्य से सना हुआ पाया था इतना तो वह जान ही चुकी थी की सरयू सिंह अविवाहित अवश्य थे परंतु ब्रह्मचारी कतई नहीं थे। न जाने क्यों वह स्वयं अब उनकी उत्तेजना को जाने अनजाने बढ़ाने को तत्पर थी।
उस घटना के कुछ दिनों बाद एक दिन बनारस में सोनी सुगना के घर में ही थी। उसे सुबह-सुबह कहीं जाना था वह गुसलखाने में स्नान करने चली गई दरअसल सरयू सिंह इसी वक्त स्नान के लिए जाया करते थे। एक तो सोनी स्नान में ज्यादा वक्त लगाया करती थी । उसे अपने शरीर का ख्याल रखना बेहद पसंद था सोनी ने एक बार जब अपने वस्त्र उतारे और स्नान शुरू किया समय निकलता गया सरयू सिंह गलियारे में इधर-उधर भटक रहे थे और गुसलखाने के खाली होने का इंतजार कर रहे थे इसी दौरान सुगना ने सरयू सिंह की बेचैनी महसूस कर ली और बाथरूम के दरवाजे पर जाकर धीमी आवाज में बोली
ए सोनी जल्दी कर बाबूजी के नहाए के टाइम हो गइल बा।
गुसलखाने के अंदर नल से निकल रहा पानी बाल्टी में गिरकर आवाज कर रहा था। सोनी ने यह तो महसूस किया की सुगना कुछ कह रही है पर सुगना की आवाज स्पष्ट नहीं थी अंदर से सोनी ने नल बंद किया और आवाज दी…
क्या हुआ दीदी क्या बोल रही हो
अरे बाबूजी के नहाए के टाइम हो गइल बा तनी जल्दी कर।
ठीक बा सोनी ने फिर आवाज दी और नल चालू कर दिया।
सरयू सिंह स्नान के लिए इंतजार कर रहे हैं यह बात सोनी की रास आ गई।
अगले कुछ मिनट में सोनी ने अपना स्नान पूरा कर लिया पर अपने वस्त्र जो उसने रहने से पहले उतरे थे उन्हें धुलने का समय कम पड़ गया फिर भी उसने एक-एक करके अपने सारे वस्त्र कपड़ा धोने वाली बाल्टी में डालें पर अपनी खूबसूरत पेंटी को देखकर उसे सरयू सिंह की याद आ गई।
उसने मन ही मन कुछ सोचा और अपने बदन से उतारी हुई पेंटी को धोने की बजाय वहीं नल के ऊपर टांग दिया। सोनी मन ही मन मुस्कुरा रही थी..
वह जानबूझकर सरयू सिंह की वासना को अब भड़काने की कोशिश कर रही थी।
सोनी स्नान कर एक खिले हुए फूल की भांति बाथरूम से बाहर आई सरयू सिंह अब भी गलियारे में टहल रहे थे।
मदमस्त सोनी को नाइटी में देखकर सरयू सिंह के तन बदन में एक लहर सी दौड़ गई सोनी का गदराया हुआ बदन छुपाना नाइटी के बस में नहीं था उसके उभार और कटाव स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे गीले होने की वजह से नाइटी जगह-जगह सोनी के बदन से चिपकी हुई थी…
सरयू सिंह का लंड अचानक ही तनने लगा सोनी ने भी सरयू सिंह की निगाहों को अपने बदन पर घूमते महसूस कर लिया आंख मिलने पर सोनी मुस्कुराई और बड़ी अदा से उसने कहा
जाई नहा ली थोड़ा देर हो गईल हा…
सोनी की खनकती आवाज से सरयू सिंह को एहसास हुआ कि वह पिछले कुछ पलों से लगातार सोनी को ताड़ रहे थे।
आखिरकार सरयू सिंह गुसलखाने के अंदर आ गए। उन्होंने अपने कपड़े गुसलखाने में बंधी रस्सी पर टांगे और नल खोलने के लिए मुड़े।
नल पर टंगी हुई पेंटी उनका ध्यान खींच रही थी। गुसलखाने की यह आम व्यवस्था थी कि जो भी व्यक्ति नहाने जाता वह अपने कपड़े अंदर धोकर उस कपड़े धोने वाली बाल्टी में लेकर बाहर आ जाता। पर आज जल्दी बाजी के कारण सोनी को ऐसे ही बाहर आना पड़ा था पर सोनी अपने बाकी कपड़ों के साथ-साथ इस पैंटी को भी तो उस बाल्टी में डाल सकती थी। तो क्या सोनी ने जानबूझकर यह गुलाबी पेंटी उनके लिए छोड़ी थी…?
सरयू सिंह अचानक बेहद उत्तेजित हो गए इस कल्पना मात्र से की सोनी स्वयं उनकी और आकर्षित है उनका लंड फन फनाकर पूरी तरह खड़ा हो गया। वैसे भी जब कोई महिला सरयू सिंह की प्रेम पास में पड़ जाती थी सरयू सिंह की वासना और भी जागृत हो जाती थी।
उन्होंने अगल-बगल देखा और झट से उसे पेंटी को उठाकर अपने नथुनों के करीब ले आए अपनी महबूबा की बुर की खुशबू उनके नथुनों में भरने लगी.. इधर नथनों से होती हुई बुर की मादक खुशबू उनके दिमाग में भर रही थी उधर दिमाग सोनी की मादक बुर की तस्वीर बनाने की कोशिश कर रहा था।
सरयू सिंह उस पेंटिं को अपने नथुनों से लगाए मदहोश हो रहे थे तभी पेंटिं का एक सिर उनके आधारों से छू गया। सरयू सिंह के होठों ने उसे पेटी को अपनी ओर खींचा जैसे वह सोने की बुर की फांकों को अपने होठों से पकड़ कर खींचने की कोशिश कर रहे हैं नीचे उनका लंड उछल उछल कर ध्यान आकर्षित कर रहा था और आखिरकार सरयू सिंह ने अपने तने हुए लंड को अपने हाथ से सहारा दे दिया।
सोने की पैंटी ने सरयू सिंह को हस्तमैथुन के लिए विवश कर दिया। सरयू सिंह ने आज सोनी के मौन निमंत्रण को स्वीकार किया और मन ही मन या निश्चय कर लिया की वह उसके निमंत्रण को पूरी तरह स्वीकार करेंगे और उम्र और रिश्तो से परे इस संबंध को बेझिझक अपना लेंगे।
सरयू सिंह की कल्पनाएं वैसे भी अजीब थी सोनी को चोदने के लिए वह तरह-तरह की कल्पनाएं करते तरह-तरह की परिस्थितियों बनाते और इधर उनका लंड लावा उगलने को तैयार हो चुका था आखिरकार सरयू सिंह के लंड ने की सोनी की बुर की साथी उसकी पैंटी पर जी भरकर वीर्य त्याग कर दिया…सोनी की पैंटी लगभग वीर्य से सुन चुकी थी..
सरयू सिंह तृप्त हो चुके थे। उन्होंने उस वीर्य से सनी उस पैंटी को वही नल पर वापस टांग दिया। उन्होंने अपना स्नान पूरा किया और बाथरूम से बाहर आ गए सोनी उनका इंतजार गलियारे में ही कर रही थी। पूरी तरह सजी सवरी विवाहिता सोनी को देखकर सरजू सिंह मन ही मन सोचने लगे कि क्या विवाहित स्त्रियां भी तृप्त नहीं होती हैं.. क्या सोनी के मन में अतिरिक्त काम इच्छाएं हैं… सरयू सिंह यह भी जानते थे कि अब तक सोनी गर्भवती नहीं हुई है..
सरयू सिंह ने अब से कुछ पलों पहले सोनी को अपनी कल्पनाओं में जिस जिस तरीके से भोगा था अब वह सोनी से नजर मिला पाने में खुद को असहज महसूस कर रहे थे। वैसे भी अब से कुछ पलों पहले जो उन्होंने सोने की पैंटी पर जो हरकत की थी अब वह उसे सोनी की निगाहों में आ ही जाना था।
सोनी गुसलखाने में अपने कपड़े लेने गई और अपनी पैंटी की हालत देखकर उसे अंदाजा हो गया कि आग दोनों तरफ बराबर से लगी हुई है।
सोनी और सरयू सिंह की छेड़छाड़ बढ़ती जा रही थी।
एक तरफ सोनी अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही थी पर सफलता ने तो जैसे उससे दूरी बना ली थी क्या डॉक्टर क्या नीम हकीम सबने अपने-अपने नुस्खे आजमाए पर सोनी का पेट फुला पाने में असमर्थ रहे। उस दौरान सोनी तीन-चार महीने तक बनारस में हर संभव प्रयास करती रही परंतु नतीजा सिफर ही रहा। इन दिनों एक ही काम हुआ की सरयू सिंह की वासना सोनी को लेकर पूरी तरह जागृत हो गई बस सोनी के हां करने की देर थी और सरयू सिंह चोद चोद कर सोनी की बुर का कचूमर बनाने को तैयार थे।
परंतु इस बेमेल जोड़ी का मेल कराने वाली सुगना इन सब गतिविधियों से अनजान स्वयं अपनी वासना में मस्त थी और सोनू के संग जी भरकर गुलछरे उड़ा रही थी।
समय बीते देर नहीं लगती सोनी के वापस अमेरिका जाने का वक्त आ चुका था।
सोनी को अपने पिता सरयू सिंह की यादों से बाहर लाने का काम सूरज ने ही किया। सूरज बेहद खुश था उसका लंड सामान्य हो चुका था वह सोनी के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया और बिस्तर पर तकिए का सहारा लेकर अपने सिरहाने पर पीठ टिकाए सोनी को देख कर बोला
“मौसी थैंक यू…”
सोनी ने महसूस किया कि उसने दरवाजा बंद नहीं किया था ।
अपनी यादों में खोई हुई सोनी ने न जाने कब से अपनी उंगलियों से अपनी बुर को छूना शुरु कर दिया था.. सूरज की उपस्थिति को महसूस कर उसने बेहद सावधानी से अपने हांथ लिहाफ से बाहर निकाले .. और सूरज को अपने पास बुलाते हुए बोली…
अब ठीक लग रहा है ना?
हां मौसी अब ठीक है…पर मौसी .. पर अपने किया क्या था?
सूरज के मन में कई प्रश्न थे ..
सोनी क्या उत्तर देती कि उसने उसके लंड को चुम्मा था…
सोनी ने मुस्कुराते हुए कहा मैं छोटी डॉक्टर हूं मेरे पास कई इलाज है दोबारा जरूरत पड़े तो बताना।
अचानक सूरज फफक फफक कर रोने लगा…. सोनी ने उसके सर को खींचकर अपने सीने से सटा लिया.. और बेहद प्यार से बोली
सोनू क्या हुआ आज तेरा जन्मदिन है और तू रो रहा है क्या बात है मुझे खुलकर बता…
सूरज के सब्र का बांध टूट गया उसने अपने लिंग में तनाव न आने की बात सोनी से खुलकर बता दी। उसने सोनी को यह बात भी बता दी कि आज से पहले उसने कभी भी हस्तमैथुन नहीं किया है और कल पहली बार उसने जीवन में हस्तमैथुन किया वह भी एक नहीं दो-दो बार फिर भी उसके लिंग का तनाव कम नहीं हुआ।
सोनी को यकीन ही नहीं हो रहा था की 21 वर्ष का सूरज आज से पहले कभी भी यौन सुख को प्राप्त नहीं किया था जहां लड़के अपनी किशोरावस्था से ही वीर्य स्खलन के सुख का आनंद लेने लगते हैं वहां सूरज अब तक इस सुख से वंचित था।
अपने वात्सल्य में सोनी यह भूल गई कि उसकी दाहिनी हाथ की उंगलियां उसकी बुर के रस से सनी हुई है.. उसमें सूरज के हाथों को अपने हाथों में लेकर बेहद प्यार से सहलाते हुए सूरज की हथेली को अपने बुर का की खुशबू से ओत प्रोत कर दिया।
सूरज अभी भी सुबक कर रहा था और अपने दिल की बात अपनी मौसी से साझा कर रहा था उसने रोजी के बारे में भी खुलकर सोनी को बता दिया। बातचीत के दौरान कभी भी सूरज ने यह संकेत नहीं दिया कि वह खुद सोनी को अपनी वासना के दायरे में लाता रहता है। रोजी के बारे में बात करते-करते सूरज एक बार फिर भावुक हो गया और बोला..
मौसी लगता है मेरे भाग्य में सिर्फ और सिर्फ अपमान लिखा है। रोजी आज कितनी खुश थी। पर फिर कभी वह मुझे कैसे एक मर्द मान पाएगी? मुझे उससे नज़रें मिलाने में शर्म आती है आखिर मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ है..
इससे पहले की सूरज कुछ और बोल पाता सोनी ने अपनी तर्जनी सूरज के होठों पर रख दी…और उसे तसल्ली देते हुए बोली..
आज तेरे जन्मदिन पर तुझे वचन देती हूं कि तेरी इस समस्या का निदान जरूर करूंगी…सोनी ने सूरज के आंसुओं को अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछ दिया.. और उसकी ठूड्डी पकड़ते हुए कहा
अब मुस्कुराओ और खुश हो जाओ मैं हूं ना…
इस बीच सूरज में जब सांस देने की कोशिश की सोनी की उंगलियों पर लगे उसकी बुर के रस की मादक खुशबू सूरज के नथुनों में पड़ी। यह गंध अनोखी थी…सूरज ने आज से पहले कभी इस गंध को महसूस नहीं किया था…सूरज उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था पर यह संभव न था…
अब तक सुगना सूरज को खोजते हुए सोनी के कमरे में आ गई ..
सूरज के चेहरे पर तनाव गायब था सूरज के होठों पर मुस्कराहट देख सुगना खुश हो गई…
सुगना ने सूरज के गाल पर चिकोटी काटते हुए बोला..
अरे वाह अब मां से ज्यादा प्यारी मौसी हो गई.. मैं तुझे कब से खोज रही हूं …और तू यहां बैठा है…क्या बात हो रही है…
सूरज किस मुंह से सुगना को यह बात बताता कि आज उसके जन्मदिन पर जो उपहार (प्रथम वीर्य स्खलन के सुख का) सोनी मौसी ने दिया है वो अनुपम है अद्भुत है अद्वितीय है…
सोनी मुस्कुरा रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि उसने जो वचन सूरज को दे तो दिया है पर निभाएगी कैसे??
शेष अगले भाग में