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- Dec 5, 2013
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अपडेट :::::: 8
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इन पांच दिनों में मैंने बोहत सोचा क्या करना चाहिए, मैं अगर यहाँ से भाग जाऊं तो रेखा बाई को मुझपर शक न हो, के मैं प्लान बना कर यहाँ से भागा हूँ. और वो मेरी माँ और बहनो पर ज़ुल्म न करे. प्लान बनाये बगैर भागना मतलब अपनी माँ और बहनो की ज़िन्दगी को बाद से बदतर बनाना. नहीं मैं ऐसे नहीं भागों गए. कुछ तो ऐसा करना पड़ेगा जिस से रेखा बाई का धयान माँ की तरफ न जाये.
सोचते सोचते कई तरह के प्लान मेरे दमाग में आते रहे लेकिन कोई भी ऐसा नहीं था जिस में रिस्क न हो. हर प्लान को सोचते सोचते मैं दो घरों में बहने लगता था कभी लगता ये प्लान सही है कभी लगता नहीं ये प्लान सही नहीं है.
ये एक बोहत बड़ी खामी थी मुझ में. मेरे लिए फ़ासिला करना मुष्काल होता था अक्सर ऐसे hi मुआमलात में. मैंने बड़ी कोशिश की अपनी सोचो को डेविड होने से बचने के लिए. हालांकि जिस तरह के माहौल में मैं रह रहा था वह एक से बढ़ कर एक हरामी और कमीने लोग बास्ते थे. रेखा बाई की मार खा खा कर मैं dheet,ziddi, सरकश, तो बन गया था लेकिन हरामी और कमीना मैं अब तक सही से नहीं बन पाया था.. या शायद हरामी और कमीना मैं भी बन चूका था लेकिन वो मेरे अंदर hi अंदर कही दबे हुए थे.... मुझे इस दुन्या से लड़ने के लिए अपनी फॅमिली को सेफ लाइफ देने के लिए इस कमीनी दुन्या की हर क्वालिटी मुझसे में होनी चाहिए. वर्ण मैं अपने मक़सद को हासिल नहीं कर सकता.
डबल माइंडेड मेरी एक ऐसी बीमारी थी. जिस ने मेरे कई साल जाया कर दिए थे, अगर मुझ में अपनी डबल माइंडेड वाली स्ट्रेस से निकलने की हिम्मत आ गई तो मैं बोहत जल्द फैसले कर लिया करूंगा.
लेकिन जान तोड़ कोशिश कर के भी मैं अपनी इस खामी पर काबू नहीं प् सका था. अब भी मुझे कोई प्लान नहीं सूझ रहा था. तो मैं अपने दोस्त अजित भाई के पास चला गया.
दूकान पर एक दो कस्टमर खड़े थे. मैंने ऐसे hi अजित भाई से कोई चीज़ ले कर कहानी शुरू कर दी. अजित भाई मुझे देख "hello हाय" बोल कर अपने काम में लग गए, मैं भी दूकान के खली होने का इंतज़ार करने लगा. थोड़ी hi देर में वो बन्दे चले गए. मैंने एक नज़र पूरे बाजार पे डाली सब अपने अपने कामो में बिजी थे तो मैं अजित भाई की दूकान के अंदर चला गया.
अजित भाई .... आज ये चेहरा क्यों उतरा हुआ है. कोई बात हो गई है क्या..???
विजय ........ नहीं अजित भाई कोई बात क्या होनी है वही सोच रहा हूँ यहाँ से कैसे जाओं कोई प्लान hi नहीं सूज रहा. जो भी प्लान बनता है सब में hi रिस्क निकल आता है....
अजित भाई .... ाचा बताओ मुझे "क्या क्या प्लान सोचा है.."'
फिर मैंने अजित भाई को इन पांच दिनों में जो जो सोचा था सब बता दिया..
अजित भाई .... (कुछ देर सोचते रहे फिर बोले) हम्म्म ये तो सब खतरे वाले प्लान हैं कुछ गड़बड़ ज़रूर हो जाएगी .... तूने जो सोचा है उस पर अमल न करना.
कुछ सोचता हूँ मैं भी.
"अजित भाई कुछ देर सोचते रहे फिर उन को एक िद्या आ hi गया"
अजित भाई .... विजय एक िद्या है तो सही लेकिन खतरा उस में भी है, लेकिन काम बनने के चांस हैं,
विजय ..... (खुश हो कर) अजित भाई तो फिर बताओ न. खतरे के बगैर तो वैसे भी कुछ नहीं हो सकता.......
अजित भाई .... तुम ने बताया था रेखा बाई ने तुमको काई बार बुरी तरह से मारा पीटा है....
विजय ........ हाँ तो इस में िद्या कहाँ से आ गया ...
अजित भाई..... तू पहले दूकान के बहार एक नज़र दाल कोई इधर पास hi तो नहीं khada......."phir मैंने अजित भाई के कहने पर दूकान से बहार आ कर देखा दूर दूर थे सब लोग.." फिर मैं दूकान के अंदर आ गया..
विजय ....... कोई नहीं है आप जल्दी से बता दें ...
अजित भाई.... देख विजय तुझे कोई ऐसा काम करना पड़ेगा जिससे रेखा बाई को तुझपे ग़ुस्सा ए और वो तुझे मारने पीटने लगे. इस से तू दो तीन दिन के लिए उस की नज़रों से दूर एक कमरे में पड़ा रहेगा.. और रेखा बाई को गालियां भी निकल देना जिससे वो तुझसे और ग़ुस्सा हो जाएगी... इस बीच अगर तू यहाँ से भाग जायेगा तू रेखा बाई को तेरी माँ पर शक नहीं होगा... और तू अपनी माँ और बहनो को भी अच्छे से समझा देना के तेरे जाने के बाद 4 5 दिन तक कुछ न खाये पियें .. इस से वो कमज़ोर तो हो जाएँगी लेकिन फिर अपनी रूटीन पर आ जाएँगी ... रेखा बाई को अपने धंदे की फ़िक्र होगी और तू ठहरा कोठे का निकम्मा लड़का उसे तुझसे कोई खतरा तो होगा नहीं, इस लिए वो तेरी फ़िक्र छोड़ देगी.
मुझे भी अजित भाई का मश्वरा ाचा लगा लेकिन इस में भी खतरा था कही माँ और बहनो इमोशनल न हो जाएँ, यही बात मैंने अजित भाई को भी बताई.
अजित भाई .... देख विजय जब तक तू यहाँ रहे गए डरता रहे गए. तू बस यहाँ से निकल फिर देखना सब ठीक हो जायेगा और मैं तो हूँ न यहाँ पर कुछ भी गड़बड़ हुई तो मैं तुझे बता दूंगा. बस किसी जगा सेट होते hi मुझे अपना नंबर दे देना......
मैं अजित भाई की साड़ी बातों पर घोर करने लगा और अपने आप को तैयार करने लगा "मैंने सोच लिया था अब्ब जो भी हो मैं ये ज़रूर करूँगा"
रेखा बाई की मार का तो मुझे डर था नहीं, एंटी मार खा चूका था के अब्ब तो आदि हो चूजा था और मेरा जिस्म भी अब इतना कमज़ोर नहीं रहा था. जब अंदर आग लगी हो तो बहरी दर्द क्या मने रखते hain....mere चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कराहट आ गई.....
अजित भाई .... अपने अंदर hi आग को संभल के रखो कभी ये तेरे बोहत काम आयी गई .... चल अब्ब जाने की तैयारी कर ...
मैं भी अपने आप को मज़बूत बना कर कोठे पर चला गया और फिर घोर करने लगा ऐसा क्या करून के रेखा बाई का ग़ुस्सा मुझ पर बढ़ जाये. वैसी तो वो हरदम hi मुझे ग़ुस्से और नफरत से देखती रहती थी. लेकिन अब्ब मुझे कुछ तो ख़ास करना था जिससे रेखा बाई का पारा सातवें आसमान तक जा पोहंचे ....
एक िद्या आया मैंने सोचा उस पर अमल करता हूँ शायद काम बन जाये. अब्ब पता नहीं मैं अपने मक़सद में कामियाब होता हूँ या नहीं....
अपने प्लान पर अमल करते हुए मैं उन दुसरे कमरों की तरफ बढ़ गया जो हमारे hi कोठे पर रह रही लड़कियों और औरतों के थे. में इक औरत को ढून्ढ रहा था. जो रेखा बाई की जनरों में माँ से आगे निकलना चाहती थी. साली वो भी अगवा हो कर आई थी लेकिन कोठे की ज़िन्दगी में रह कर उसे वो सब ऐशो आराम मिल रहे थे जो कभी उसे अपने रियल ghar(maa पिता का घर) में नहीं मिल सके थे. और उस की मेरी माँ से नहीं बनती थी वो जलती थी के रेखा बाई सब से ज़यादा मेरी माँ से लगाओ रखती क्यों रखती है. ज़ाहिर सी बात थी मेरी माँ की तरह वो मुझसे भी बोहत नफरत करती थी...
में उस को ढूंढ़ने के लिए सब कमरे चेक करने लगा. माँ की लौडियां साड़ी लड़कियां अपने आधे नंगे बदन लिए बातों में मशग़ूल थी. किसी ने मुझे देख कर आंख मार्डी तो किसी ने मुझे देख मोहन फेर लिया. कितनी जल्दी यहाँ के माहौल में एडजस्ट हो जाती हैं ये लड़कियां, मुसलसल छूट कुटाई से शर्म नाम की चीज़ hi इन सालियों में ख़तम हो जाती है... अब में इस खोते पर नाजायज़ लड़का था. तो सब के लिए ावें hi था. किसी की नज़र में मेरे लिए कोई वैल्यू नहीं थी. और वैसे भी मैं हर वक़्त तो मैले कुचले कपड़ों में रहता था. ख़ाक मेरी पर्सनालिटी थी यहाँ.
कभी नए कपडे तो मिलने से रहे पूरी ज़िन्दगी दूसरों के उत्तर कपडे पहने थे. साला किसी भिखारी जैसी शकल हो गई थी मेरी. मुझे नहीं याद के कब मैंने अपने बाल कटवाए हूँ या अचे से नाहा कर साफ़ सुथरे कपडे पहने हूँ.
माँ और बहनो को में बोहत पायरा लगता था. उन की नज़र में मेरे से ज़यादा ख़ूबसूरत कोई नहीं था. मेरी ऑंखें नीले रंग की थी उन में कशिश बोहत थी लेकिन अब्ब इन आँखों में हर वक़्त दर्द सहने की वजा से बोहत ज़यादा गहराई पैदा हो चुकी थी. माँ अक्सर मुझे नज़र न लगे इस लिए कला टिक्का लगाती थी. मैं है दिया करता माँ "काला टिक्का उसे लगते हैं जो ख़ूबसूरत हो. मैं तो कही से भी खूबसूरत नहीं दीखता."
माँ bolti"har माँ के लिए उसका बीटा राजकुमार जैसा होता है और तू तो मेरा बोहत hi पायरा और सुन्दर बीटा बीटा है. तेरे जैसा कोई नहीं. यहाँ तो तुझे अच्छे कपडे pehn'ne को नहीं मिलते इस लिए तू ऐसा दीखता है. देखना जिस दिन तू अपने बाल कटवा कर नए नए कपडे पहने गए. उस दिन तुझसे ज़यादा खूबसूरत कोई नहीं होगा.. " माँ की बातें सुन कर मुझे हंसी आ जाती और फिर फ़ौरन hi ऑंखें नाम हो जाती, कैसी दर्द भरी ज़िन्दगी थी, आह्ह्ह्ह काश इक रात सो जाऊं और फिर कभी न उठूं,,, कभी कभी तो दर्द बर्दश्त की सीमा लाँघ जाता था...
ऐसे hi सोचता सोचा मैं इक कमरे में पोहंचा तो देखा सामने वही साली "लाली" कमरे में कपडे उतारे किसी लड़की से मस्सगे करवा रही रही थी.
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इन पांच दिनों में मैंने बोहत सोचा क्या करना चाहिए, मैं अगर यहाँ से भाग जाऊं तो रेखा बाई को मुझपर शक न हो, के मैं प्लान बना कर यहाँ से भागा हूँ. और वो मेरी माँ और बहनो पर ज़ुल्म न करे. प्लान बनाये बगैर भागना मतलब अपनी माँ और बहनो की ज़िन्दगी को बाद से बदतर बनाना. नहीं मैं ऐसे नहीं भागों गए. कुछ तो ऐसा करना पड़ेगा जिस से रेखा बाई का धयान माँ की तरफ न जाये.
सोचते सोचते कई तरह के प्लान मेरे दमाग में आते रहे लेकिन कोई भी ऐसा नहीं था जिस में रिस्क न हो. हर प्लान को सोचते सोचते मैं दो घरों में बहने लगता था कभी लगता ये प्लान सही है कभी लगता नहीं ये प्लान सही नहीं है.
ये एक बोहत बड़ी खामी थी मुझ में. मेरे लिए फ़ासिला करना मुष्काल होता था अक्सर ऐसे hi मुआमलात में. मैंने बड़ी कोशिश की अपनी सोचो को डेविड होने से बचने के लिए. हालांकि जिस तरह के माहौल में मैं रह रहा था वह एक से बढ़ कर एक हरामी और कमीने लोग बास्ते थे. रेखा बाई की मार खा खा कर मैं dheet,ziddi, सरकश, तो बन गया था लेकिन हरामी और कमीना मैं अब तक सही से नहीं बन पाया था.. या शायद हरामी और कमीना मैं भी बन चूका था लेकिन वो मेरे अंदर hi अंदर कही दबे हुए थे.... मुझे इस दुन्या से लड़ने के लिए अपनी फॅमिली को सेफ लाइफ देने के लिए इस कमीनी दुन्या की हर क्वालिटी मुझसे में होनी चाहिए. वर्ण मैं अपने मक़सद को हासिल नहीं कर सकता.
डबल माइंडेड मेरी एक ऐसी बीमारी थी. जिस ने मेरे कई साल जाया कर दिए थे, अगर मुझ में अपनी डबल माइंडेड वाली स्ट्रेस से निकलने की हिम्मत आ गई तो मैं बोहत जल्द फैसले कर लिया करूंगा.
लेकिन जान तोड़ कोशिश कर के भी मैं अपनी इस खामी पर काबू नहीं प् सका था. अब भी मुझे कोई प्लान नहीं सूझ रहा था. तो मैं अपने दोस्त अजित भाई के पास चला गया.
दूकान पर एक दो कस्टमर खड़े थे. मैंने ऐसे hi अजित भाई से कोई चीज़ ले कर कहानी शुरू कर दी. अजित भाई मुझे देख "hello हाय" बोल कर अपने काम में लग गए, मैं भी दूकान के खली होने का इंतज़ार करने लगा. थोड़ी hi देर में वो बन्दे चले गए. मैंने एक नज़र पूरे बाजार पे डाली सब अपने अपने कामो में बिजी थे तो मैं अजित भाई की दूकान के अंदर चला गया.
अजित भाई .... आज ये चेहरा क्यों उतरा हुआ है. कोई बात हो गई है क्या..???
विजय ........ नहीं अजित भाई कोई बात क्या होनी है वही सोच रहा हूँ यहाँ से कैसे जाओं कोई प्लान hi नहीं सूज रहा. जो भी प्लान बनता है सब में hi रिस्क निकल आता है....
अजित भाई .... ाचा बताओ मुझे "क्या क्या प्लान सोचा है.."'
फिर मैंने अजित भाई को इन पांच दिनों में जो जो सोचा था सब बता दिया..
अजित भाई .... (कुछ देर सोचते रहे फिर बोले) हम्म्म ये तो सब खतरे वाले प्लान हैं कुछ गड़बड़ ज़रूर हो जाएगी .... तूने जो सोचा है उस पर अमल न करना.
कुछ सोचता हूँ मैं भी.
"अजित भाई कुछ देर सोचते रहे फिर उन को एक िद्या आ hi गया"
अजित भाई .... विजय एक िद्या है तो सही लेकिन खतरा उस में भी है, लेकिन काम बनने के चांस हैं,
विजय ..... (खुश हो कर) अजित भाई तो फिर बताओ न. खतरे के बगैर तो वैसे भी कुछ नहीं हो सकता.......
अजित भाई .... तुम ने बताया था रेखा बाई ने तुमको काई बार बुरी तरह से मारा पीटा है....
विजय ........ हाँ तो इस में िद्या कहाँ से आ गया ...
अजित भाई..... तू पहले दूकान के बहार एक नज़र दाल कोई इधर पास hi तो नहीं khada......."phir मैंने अजित भाई के कहने पर दूकान से बहार आ कर देखा दूर दूर थे सब लोग.." फिर मैं दूकान के अंदर आ गया..
विजय ....... कोई नहीं है आप जल्दी से बता दें ...
अजित भाई.... देख विजय तुझे कोई ऐसा काम करना पड़ेगा जिससे रेखा बाई को तुझपे ग़ुस्सा ए और वो तुझे मारने पीटने लगे. इस से तू दो तीन दिन के लिए उस की नज़रों से दूर एक कमरे में पड़ा रहेगा.. और रेखा बाई को गालियां भी निकल देना जिससे वो तुझसे और ग़ुस्सा हो जाएगी... इस बीच अगर तू यहाँ से भाग जायेगा तू रेखा बाई को तेरी माँ पर शक नहीं होगा... और तू अपनी माँ और बहनो को भी अच्छे से समझा देना के तेरे जाने के बाद 4 5 दिन तक कुछ न खाये पियें .. इस से वो कमज़ोर तो हो जाएँगी लेकिन फिर अपनी रूटीन पर आ जाएँगी ... रेखा बाई को अपने धंदे की फ़िक्र होगी और तू ठहरा कोठे का निकम्मा लड़का उसे तुझसे कोई खतरा तो होगा नहीं, इस लिए वो तेरी फ़िक्र छोड़ देगी.
मुझे भी अजित भाई का मश्वरा ाचा लगा लेकिन इस में भी खतरा था कही माँ और बहनो इमोशनल न हो जाएँ, यही बात मैंने अजित भाई को भी बताई.
अजित भाई .... देख विजय जब तक तू यहाँ रहे गए डरता रहे गए. तू बस यहाँ से निकल फिर देखना सब ठीक हो जायेगा और मैं तो हूँ न यहाँ पर कुछ भी गड़बड़ हुई तो मैं तुझे बता दूंगा. बस किसी जगा सेट होते hi मुझे अपना नंबर दे देना......
मैं अजित भाई की साड़ी बातों पर घोर करने लगा और अपने आप को तैयार करने लगा "मैंने सोच लिया था अब्ब जो भी हो मैं ये ज़रूर करूँगा"
रेखा बाई की मार का तो मुझे डर था नहीं, एंटी मार खा चूका था के अब्ब तो आदि हो चूजा था और मेरा जिस्म भी अब इतना कमज़ोर नहीं रहा था. जब अंदर आग लगी हो तो बहरी दर्द क्या मने रखते hain....mere चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कराहट आ गई.....
अजित भाई .... अपने अंदर hi आग को संभल के रखो कभी ये तेरे बोहत काम आयी गई .... चल अब्ब जाने की तैयारी कर ...
मैं भी अपने आप को मज़बूत बना कर कोठे पर चला गया और फिर घोर करने लगा ऐसा क्या करून के रेखा बाई का ग़ुस्सा मुझ पर बढ़ जाये. वैसी तो वो हरदम hi मुझे ग़ुस्से और नफरत से देखती रहती थी. लेकिन अब्ब मुझे कुछ तो ख़ास करना था जिससे रेखा बाई का पारा सातवें आसमान तक जा पोहंचे ....
एक िद्या आया मैंने सोचा उस पर अमल करता हूँ शायद काम बन जाये. अब्ब पता नहीं मैं अपने मक़सद में कामियाब होता हूँ या नहीं....
अपने प्लान पर अमल करते हुए मैं उन दुसरे कमरों की तरफ बढ़ गया जो हमारे hi कोठे पर रह रही लड़कियों और औरतों के थे. में इक औरत को ढून्ढ रहा था. जो रेखा बाई की जनरों में माँ से आगे निकलना चाहती थी. साली वो भी अगवा हो कर आई थी लेकिन कोठे की ज़िन्दगी में रह कर उसे वो सब ऐशो आराम मिल रहे थे जो कभी उसे अपने रियल ghar(maa पिता का घर) में नहीं मिल सके थे. और उस की मेरी माँ से नहीं बनती थी वो जलती थी के रेखा बाई सब से ज़यादा मेरी माँ से लगाओ रखती क्यों रखती है. ज़ाहिर सी बात थी मेरी माँ की तरह वो मुझसे भी बोहत नफरत करती थी...
में उस को ढूंढ़ने के लिए सब कमरे चेक करने लगा. माँ की लौडियां साड़ी लड़कियां अपने आधे नंगे बदन लिए बातों में मशग़ूल थी. किसी ने मुझे देख कर आंख मार्डी तो किसी ने मुझे देख मोहन फेर लिया. कितनी जल्दी यहाँ के माहौल में एडजस्ट हो जाती हैं ये लड़कियां, मुसलसल छूट कुटाई से शर्म नाम की चीज़ hi इन सालियों में ख़तम हो जाती है... अब में इस खोते पर नाजायज़ लड़का था. तो सब के लिए ावें hi था. किसी की नज़र में मेरे लिए कोई वैल्यू नहीं थी. और वैसे भी मैं हर वक़्त तो मैले कुचले कपड़ों में रहता था. ख़ाक मेरी पर्सनालिटी थी यहाँ.
कभी नए कपडे तो मिलने से रहे पूरी ज़िन्दगी दूसरों के उत्तर कपडे पहने थे. साला किसी भिखारी जैसी शकल हो गई थी मेरी. मुझे नहीं याद के कब मैंने अपने बाल कटवाए हूँ या अचे से नाहा कर साफ़ सुथरे कपडे पहने हूँ.
माँ और बहनो को में बोहत पायरा लगता था. उन की नज़र में मेरे से ज़यादा ख़ूबसूरत कोई नहीं था. मेरी ऑंखें नीले रंग की थी उन में कशिश बोहत थी लेकिन अब्ब इन आँखों में हर वक़्त दर्द सहने की वजा से बोहत ज़यादा गहराई पैदा हो चुकी थी. माँ अक्सर मुझे नज़र न लगे इस लिए कला टिक्का लगाती थी. मैं है दिया करता माँ "काला टिक्का उसे लगते हैं जो ख़ूबसूरत हो. मैं तो कही से भी खूबसूरत नहीं दीखता."
माँ bolti"har माँ के लिए उसका बीटा राजकुमार जैसा होता है और तू तो मेरा बोहत hi पायरा और सुन्दर बीटा बीटा है. तेरे जैसा कोई नहीं. यहाँ तो तुझे अच्छे कपडे pehn'ne को नहीं मिलते इस लिए तू ऐसा दीखता है. देखना जिस दिन तू अपने बाल कटवा कर नए नए कपडे पहने गए. उस दिन तुझसे ज़यादा खूबसूरत कोई नहीं होगा.. " माँ की बातें सुन कर मुझे हंसी आ जाती और फिर फ़ौरन hi ऑंखें नाम हो जाती, कैसी दर्द भरी ज़िन्दगी थी, आह्ह्ह्ह काश इक रात सो जाऊं और फिर कभी न उठूं,,, कभी कभी तो दर्द बर्दश्त की सीमा लाँघ जाता था...
ऐसे hi सोचता सोचा मैं इक कमरे में पोहंचा तो देखा सामने वही साली "लाली" कमरे में कपडे उतारे किसी लड़की से मस्सगे करवा रही रही थी.