Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 11 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 📃 301-302

अपडेट #18


सन 🖼️ #01

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सुबह क करीब 9.50 हो रहे होंगे और बारिश जो थोड़ी दिएर पहले कुछ काम सी हुई थी वो वापस से अपनी रफ़्तार बढ़ाने लगी थी, मानो जैसे आज ये बारिश भी मालती को उस खंडहर से बहार निकलने की इजाजत नहीं देना च रही हो.. सायद ये जिस्म को कंपकपा देने वाली ठंडी बारिश भी अपने तेज़ हवाओं और गरजती बिजली क जरिये किसी प्रकार क कामुक इशारे कर रही थी.. की खेल अभी पूरा नहीं हुआ है

वैसे ऐसी सोच सिर्फ इस कामुक बारिश की hi नहीं अपितु हमारी सविता क जवान बेटे सत्यम की भी थी, ककी उसकी साँसों की रफ़्तार अब धीरे धीरे संतुलित हो चुकी थी और चेहरे पे सुकून भरी पर किसी विजेता जैसी मुस्कान खेल रही थी

मानो जैसे वो मन hi मन अपनी जीत की खुशिया मन रहा हो और जोर से चिल्ला क कहना च रहा हो

'देख मोनू.. मैंने तेरी माँ छोड़ दी'

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सत्यम वस मालती

पर सायद सत्यम को ये खेल अभी और खेलना था.. या सायद बार बार खेलना था, वैसे भी मालती ऐसी औरत नहीं जिससे किसी मर्द का एक बार में मन भर जाये

मालती तोह उस सरब जैसी है.. जो जितनी पुराणी होती जाएगी उसका नशा उठना hi बढ़ेगा, और बढ़ता जायेगा

मालती और सत्यम अभी भी उसी चटाई पे आग क पास उसी प्रकार लेते हुए थे और मालती अपनी आँखों को बंद किये हुए हौले हौले साँसे ले रही थी जिससे उसकी कामुक और नंगी बड़ी बड़ी चूचियों में हल्का सा थिरकन नज़र आ रहा था और उसके चेहरे पे इतने समय बाद शारीरिक सुख मिलने की ख़ुशी साफ़ साफ़ देखि जा सकती थी

सत्यम जो इस समय उसके बगल लेता हुआ था वो अपने बगल में मालती जैसी कामुक और नंगी औरत को देख क मानो खुद की किस्मत पे भरोषा hi न कर प् रहा हो

'साला यकीन नहीं होता की मैंने मोनू की माँ छोड़ दी.. इतना मज़ा तोह कभी मुझे नहीं आया

उफ्फ्फ किया कासी हुई छूट है साली थी, ऐसा लग रहा था जैसे मेरे लुंड का पूरा रास निचोड़ दे रही हो.. सायद ये सब मेरी माँ क आशीर्वाद क कारन हुआ होगा'

सत्यम ये सब मन hi मन सोच रहा था, और वो जब अपनी माँ सविता क बारे में सोचता है तोह उसके अधरों पे मुस्कान खेल जाती है और आँखों क आगे वही नज़ारा घूमने लगता है जब सुबह सुबह उसने अपनी सगी माँ को छोड़ा था

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सत्यम वस सविता

किस्मत हो तोह हमारे सत्यम जैसी.. सुबह अपनी माँ छोड़ी और अब मोनू की माँ भी

वो खंडहर जो कभी किसी राजा की रखेल का घर हुआ करता था आज वो मालती क जिस्म का रास पीना का ेस्थान बन गया था, वैसे वह का माहौल अब भी कामुक और ठंडा hi था पर आग क पास होने क कारन दोनों को ठण्ड नहीं लग रही थी.. उल्टा जैसे सत्यम का लुंड एक बार फिर से अपना सर उठा रहा है उससे तोह लगता है उसे ठण्ड नहीं अपितु मालती क जिस्म की गर्मी महसूस हो रही हो.. और ऐसा होना स्वाभाविक भी है ककी मालती है hi ऐसी जिसकी गर्मी को सहना सबके बस की बात नहीं

बहार से तेज़ बारिश का आता हुआ स्वर उस कामुक माहौल को और ज्यादा कामुकता से भर रहा था वही खंडहर क जगह जगह टूटे हुए हिस्से से रिस क आता हुआ पानी अपनी मधुर कलकल की आवाज़ से पुरे दृस्य में एक संगीत जैसा भर रहा था.. सामने दिवार पे उकेरी गयी वो पुराणी तस्वीर उस पुरे माहौल में और ज्यादा गर्मी भरने का काम कर रही थी

सत्यम अपना एक हाथ अपने सर क नीचे रखता है और सीढ़ी लेती हुई नंगी कामुक मालती को देखता है जिसकी साँसों क कारन उसकी ुहथ्ती बैठी मोती चूचियों का दृस्य उसे पागल करने लगा था, उसने अभी अभी अपनी पूरी ताक़त से मालती को छोड़ा था पर एक बार फिर से उसका नंगा जिस्म देख क सत्यम का हाल ऐसा हो रहा था जैसे किसी कुंवारे लड़के को पहली बार छूट मिलने वाली हो

बारिश क पानी का तेज़ शोर और कलकल करता हुआ पानी जो खंडहर की टूटी दीवारों से होता हुआ नीचे की और आ रहा था और वो सारा पानी वही खंडहर क बीच में एक छोटे से गड्ढे जो किसी तालाब जैसा प्रतीत हो रहा था उसके जमा हो रहा था.. जिसे देख क ऐसा लग रहा था मानो वो कोई खूबसूरत सा छोटा तालाब हो ककी उसके कमल क खूबसूरत से फूल खिले हुए थे और ऐसे मौसम में हरियाली तोह अपने चरम पे होती hi है

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पर महेंद्र का छोटा बीटा सत्यम इस समय उस खंडहर की खूबसूरती नहीं अपितु अपनी भरी हुई गदराई कामुक चची का नंगा जिस्म और उनके जिस्म की कामुकता में खोया हुआ था.. वैसे भी जिसके सामने मालती जैसा यौवन नंगा लेता हो उसे किया hi फर्क पड़ेगा की बाकि दुनिया कितनी खूबसूरत है

वही मालती अपनी आँखों को बंद किये पूर्ण शांति से लेती हुई थी, उसके नंगे जिस्म पे आग की लपटों की रौशनी ऐसे पद रही थी मानो वो भी कह रही हो..

'ऐसे और पियर चाहिए'

चटाई क पास जलती उस आग क कारन वह का ठंडा माहौल पूरी तरह गर्मी से भरा हुआ था, वैसे अगर वह वो आग न भी होती तोह मेरी माँ (मालती) की गर्मी hi काफी थी.. 😉

आग की लाल रौशनी पुरे खंडहर में अस्स पास फैली हुई थी और वो खास तस्वीर जिसे देख क मालती क अंदर की कामुकता कई गुना बाद रही थी, वो इस समय कुछ ज्यादा hi साफ़ नज़र आ रही थी.. यानि वही तस्वीर जिसमे 2 मर्द मिलकर एक साथ किसी स्त्री को आगे पीछे से भोग रहे थे

आग की लाल लपटों क बीच वो तस्वीर ऐसे नज़र आ रही थी मानो आने वाले भविस्य की कल्पना कर रही हो

अगर इस समय सत्यम क सब्दो में लिखू तोह वो बंद आँखों वाली खूबसूरत मालती को ऐसे देख रहा था मानो उसका यौवन उसे वापस से आमंत्रण दे रहा हो.. मोनू की खूबसूरत माँ का दूध जैसा गोरा नंगा जिस्म जो न जाने कितने hi मर्दो का सपना है आज उसे मिल चूका था, जिसका उसका भरपूर सेवन और रसपान भी किया था

सत्यम धीरे से अपने कंधे क नीचे एक हाथ लगाए हुए हल्का ऊपर को उठा हुआ अपना दूसरा हाथ खूबसूरत और अपनी आँखों को बंद करके लेती हुई मालती क खूबसूरत और कासी पर बड़ी चुकी क काले जामुन जैसे निप्पल्स पे रखके उसपे पियर से अपनी ऊँगली फिरने लगता है.. उसका ये संवेदनशील स्पर्श मालती क जिस्म में कामुकता की नयी ऊर्जा का आवाहन करने लगता है और अपनी आँखों को बंद करके लेती हुई मालती क खूबसूरत लाल होंठों पे कामुकता और लज्जा की लालिमा खेल जाती है

पर वो कुछ बोलती है, अपितु अपनी आँखों को वैसे hi बंद किये हुए धीरे से मुस्कुराती रहती है.. मानो जैसे कोई मौन सहमति दे रही थी, पर सत्यम उसकी बढ़ती हुई गर्मी में अचानक रुकावट सी पैदा कर देता है और मालती की जामुन जैसे काले निप्पल्स से अपनी ऊँगली हटा लेता है जिससे मालती का पूरा जिस्म तड़प सा उठता है पर वो कुछ कहती है

उसकी जिस्म में एक बार फिर से कामुकता का ये प्रवाह कही न कही उसे अंदर तक विचलित भी कर रहा था और वो अपनी आँखों को बंद किये हुए खुद से hi कहती है

'ये मुझे किया होता जा रहा है.. ये जवान लड़का जो मेरे बेटे क सामान है आज मैंने उसे अपना सब कुछ सौप दिया.. और यहाँ तक भविस्य में भी उसे उसकी मर्ज़ी से सब कुछ करने का हक़ दे दिया

मैं ऐसा कैसे कर सकती हु.. और सबसे बड़ी बात, ऐसी बेरहम चुदाई क बाद भी मेरी योनि एक बार फिर से कुछ हलचल पैदा कर रही है, किया ऐसा सत्यम क इस नाजुक स्पर्श क कारन हुआ.. ?'

पर मालती क पास इसका कोई जवाब नहीं था, ककी इसका जवाब तोह बांकेलाल द्वारा बनाई गयी उस अधूरी jadi-buti में था.. जिसका ज्ञान तक मालती को नहीं था

आशा है आप सभी को वो सब कुछ याद होगा और अगर भूल गए है तोह कृपया एक बार ये अपडेट जरूर पड़े 👇

'मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #01 Complete'

[ Part #01, Update Update #49 ]

Satyam ek baar phir se sirf Maalti ko niharne ka karya karne lagta hai.. qki nangi laiti hui Maalti behad khubsurat aur had se jada kamuk lag rahi thi, jiski badi badi rasili chuchiya aag ki roshni mein aise chamak rahi thi maano kamukta ki koi sampurn murti ho.. wahi uske kaale kaale nipples toh aise pratit ho rahe tha jinhe bas munh mein bhar k unka raspaan kiya jana chahiye, maano jaise wo usi k liye bane ho

Paseene ki nanhi nanhi bunde uske nange jism pe itni khubsurat aur kamuk lag rahi thi ki mere pass likhne k liye sabdo ki kami hai, wahi wo paseene ki bunde ye bhi bata rahi thi ki Maalti k uper aaj kitni jada mehnat hui hai

Hamari khubsurat kamuk Maalti ki aankhen jarur band thi par usak jism jism abhi bhi haule haule hil raha tha aur uski tez chalti saanson k karan uski uthti baithi badi badi chuchiyon ki baat ki kuch aur thi

Satyam ki ghumti hui nazren jab Maalti ki tango k beech pahuchti hai toh uske adhron pe muskaan khel jaati hai qki waha se abhi bhi uska gaada ras bahar beh hi raha tha.. theek khandhar ki un tuti hui diwaron k beeche us thande paani jaise, par ye wala Paani gaada aur garam tha

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मालती को भी जैसे पता चल रहा था की उसके जवान भतीजे की नज़रें कहा घूम रही हो.. ककी वो न च की अपनी पैरों को आपस में ऐसे जोड़ लेती है मानो अपनी कामुकता को छुपाने की कोशिश सी कर रही हो, पर सत्यम ये नज़ारा देखना च रहा था इसलिए वो अपना हाथ धीरे से मालती की नंगी और खूबसूरत दूध जैसी नंगी जांघ पे रखते हुए धीरे से अपना हाथ नीचे फिसला देता है जिससे मालती क जिस्म में एक बार फिर से ये बढ़ती हुई आग उसका वजूद हिलने लगती है और वो न च क भी अपने पैरों को पूरा खोल देती है और उसकी एक दबी हुई कामुक सिसकारी भी साथ hi साथ फुट पड़ी थी

"Essshhhhhhhhhhhhhhhhhhhh..."

सत्यम का मोटा काला भीमकाय लुंड जो अब भी थोड़ा सख्त hi था और उसपे मोनू की माँ की छूट का रास अब भी लगा हुआ था और उस कारन उसका लुंड आग की उस रौशनी में कुछ ज्यादा hi चमक सा रहा था.. उसके लुंड में में एक नया जोश भरने लगा था ककी नज़ारा hi ऐसा था यानि आप समाज hi गए होंगे की मालती की टंगे फिर से खुल चुकी थी

सत्यम से रहा नहीं जाता इसलिए वो धीरे से मालती क ऊपर झुकता है और उसके एक निप्पल्स को अपने मुंह में भर लेता है जिससे मालती क पुरे सरीर में कामुकता की गरम लहर सी दौड़ जाती है

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhh..................."

पर मालती अपनी आँखों को नहीं खोलती बस वैसे hi अपनी आँखें बंद किये हुए लेती रहती है.. मानो उस खेल में उसे मज़ा आ रहा था, जैसे कोई चोर पुलिस का खेल खेला जा रहा हो

सत्यम, मालती क काले निप्पल्स में अपने होंठों क बीच लेके धीरे से चूस लेता है

"ummmmmmmmmmmmmm............ ummmmmmmmmmmmm.... sssllllllummmmmmmmmmpppp..."

मालती बुरी तरह कामुकता की आग में जल उठती है पर फिर भी वो अपनी आँखें नहीं खोलती है.. ये खेल और ज्यादा कामुक होता जा रहा था और सत्यम ये खेल अचे से खेलना जनता था, सायद उसकी माँ सविता ने उसे अछि तरह से इस खेल में निपूर्ण किया है

सत्यम धीरे से मालती क काले निप्पल्स को होंठों से चूसने क बाद उसे अपने दाँतों क बीच लेके ऐसे काट लेता है मानो सच में जामुन का स्वाद चखना च रहा हो

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पर उसकी इस हरकत की वजह से मालती बुरी तरह मचल पड़ी थी.. पर बताने की जरुरत तोह है नहीं की उसने अब भी अपनी आँखें नहीं खोली

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhh........... Essshhhhhhhhhhhhhhhhhh"

सत्यम पुरे निप्पल को अपने मुंह में भर क जोर से चूस लेता है

"Sllllluuuuuuuuuuuurrrrrrrrrrpppppppp......... Ummmmmmmmmmmmm.... स्सल्ल्ल्ल्लूऊऊऊप्प्प्पप्प"

मालती बुरी तरह कामुकता से काँप उठती है उसका पूरा सरीर कामुकता की लहर से हिल उठता है.. पर ऐसी पल सत्यम मुस्कुराते हुए अपने होंठों और अपने दाँतों क बीच चूसे जा रहे मोनू की माँ क उस काले निप्पल्स को चोर देता है.. बेचारी मालती सिर्फ अपने होंठों को काट क रह जाती है ककी इतना सब होने क बाद भी उसकी लज्जा उसे आगे बढ़ने से रोक रही थी पर आखिर कब तक

ककी मालती की आग तोह हम सब जान hi चुके है, की जब वो गरम होती है तोह सही गलत कहा देखती है वो.. पर इसमें गलती किसकी है

सत्यम अपनी खूबसूरत चची क निप्पल्स से अपना मुंह हटा क पहले जैसे उसे निहारने लगता है जहा अब कुंदन की पत्नी का वो काला जामुन जैसा निप्पल्स उसके थूक से सना हुआ उस आग की लाल रौशनी में चमक रहा था

सत्यम को तोह जैसे अपनी किस्मत पे अब भी यकीन नहीं हो प् रहा था, वो धीरे से अपने लुंड पे अपना हाथ फिरता है और मुस्कुरा क कहता है

"यकीन नहीं होता.."

मालती धीरे से शर्म से लाल हुई इस बार अपनी आँखों को खोलती है और उसे देखती है और मुस्कुरा क कहती है

"किया.. ?"

मालती की तेज़ी से चलती हुई साँसे बता रही थी की उसके जिस्म की अग्नि पूरी तरह भड़क चुकी है, जो कब जवालामुखी जैसे पहात जाये वो भी नहीं जानती

कंटिन्यू... 👇
 


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सत्यम एक बार फिर मालती क निप्पल्स से खेलता है पर इस बार अपने हाथों से ककी वो अपना एक हाथ खूबसूरत नंगी लेती हुई मालती की एक चुकी पे पियर से रखते हुए उसके काले जामुन जैसे निप्पल्स को अपनी उँगलियों क बीच लेके पियर से मसल देता है, जिससे मालती की एक कामुक सिसकारी उस खंडहर में गूंज जाती है

"आअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह... ेस्स्स्सह्ह्ह्हह्ह किया कर रहा है ?"

"पियर"

मालती सत्यम की बात पे शर्मा सी जाती है और फिर कहती है

"किस बात पे तुझे यकीन नहीं हो रहा है.. ?"

सत्यम मुस्कुराते हुए अपनी उँगलियों क बीच मोनू की माँ की उस काले जामुन जैसे निप्पल्स को मसलते हुए कहता है

"यही की.. मैंने अभी अभी आपको छोड़ा"

मालती शर्म से लाल हो जाती है और अपना चेहरा दूसरी और घुमा लेती है, ककी मारे लज़्ज़ा क वो सत्यम की नज़रों का सामना नहीं कर प् रही थी.. पर फिर भी वो मुस्कुरा क कहती है

"बड़ा आया यकीन नहीं हो रहा.. कितनी गन्दी गन्दी गालिया दी मुझे, पता है न"

सत्यम मुस्कुराते हुए

"मैंने कहा कुछ कहा"

मालती उसकी और देख क मुस्कुरा देती है और कहती है

"ाचा.. तोह रंडी कुटिया चिनार.. वो सब किया था"

सत्यम मालती की गहरी आँखों में देखते हुए

"क्यू.. तुम नहीं हो मेरी रंडी ?"

मालती का पूरा जिस्म कामुकता से काँप उठता है और उसके जिस्म में न जाने कैसे वही आगा वापस से जल उठी थी, सायद सत्यम की उन हरकतों ने उसके अंदर की रंडी को फिर से जीवित कर दिया था.. ऐसा समझो की भुज चुकी आग वापस से प्रज्वलित हो गयी हो, पर किया ये संभव था

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सायद है.. ककी औरत की कामुकता का कोई अंत नहीं होता, उसपे बांकेलाल द्वारा बनाई गयी वो बूटी जिसे सविता ने लड्डू में मिलाया था और मालती ने उसका सेवन कर लिया था.. सायद ये उसका असर भी था

सत्यम ने नंगी लेती हुई शर्माती हुई खूबसूरत मालती की और देखते हुए कहा

"पता है जब आप आँखें बंद किये हुए थी और मैं आपके जिस्म से प्रेम कर रहा था तोह...."

मालती शर्माती हुई उसकी आँखों में देखते हुए

"तब किया....."

सत्यम पूरी तरह से नंगी लेती हुई मालती क नंगे जिस्म को ऊपर से नीचे तक देखता है.. और उसकी घूमती नज़रों का hi कमल था की मालती की योनि से गरम गरम तपिश सी निकलने लगी थी

"उस समय आप पर सबसे ज्यादा प्रेम आ रहा था.. मन कर रहा था आपको यही महसूस करता राहु"

मालती शर्म से लाल हो जाती है इसलिए उसके सब्द hi नहीं निकल पाते पर सत्यम आगे कहता है

"वैसे चची आपको ऐसे देख क मेरा मन फिर से होने लगा है.. उफ्फ्फ्फ़ किया रसीली छूट है आपकी"

मालती यु अपने बेटे सामान भतीजे से जिसने उसे अभी अभी थोड़ी दिएर पहले hi अपनी कुटिया बना क छोड़ा था उसकी इस बात पे शर्म से लाल हो जाती है और अपनी आँखों को बंद करते हुए कहती है

"चुप कर कमीने.. परेशां मत कर"

सत्यम मुस्कुराते हुए धीरे से अपना एक हाथ मालती की नाभि क पास रखते हुए उसे पियर से सेहलता है और कहता है

"क्यू आपको मज़ा नहीं आया.. मेरे प्रेम रास में भीग क"

मालती धीरे से उसकी और देखते हुए पहले तोह मुस्कुराती है और फिर थोड़ी सिखयात भरी आवाज़ में बोलती है

"कुत्ते बिलकुल जानवर बन गया था.. मेरी छूट का कचूमर निकल दिया और बोलता है मज़ा नहीं आया"

सत्यम मुस्कुराते हुए अपनी एक ऊँगली मेरी माँ यानि मालती की नाभि में घुसते हुए

"रंडी को ऐसा hi छोड़ा जाता है मेरी खूबसूरत चची"

मालती एक बार फिर से अपने लिए रंडी सब्द सुनकर पानी पानी हो जाती है जिसका असर उसकी योनि में बढ़ते हुए गीलेपन से लगाया जा सकता था.. वैसे इसकी वजह सत्यम की वो मासूम हरकते भी थी

वैसे दूसरी और ये हैरानी की बात थी की इतनी बेहरहम चुदाई क बाद भी उसकी योनि वापस से गरम होना सुरु हो चुकी थी.. या सायद हो चुकी थी.. उफ़ मेरी माँ की ये आग

सत्यम मुस्कुराते हुए अपना वो हाथ थोड़ा और नीचे सरकता है और जल्दी hi उसका हाथ मालती की कलाई काली झांटों क जंगल में अपनी उंगलिया ऐसे चलने लगता है मानो उस घने जंगल में किसी खजाने की तलाश चल रही हो.. वही मालती को सत्यम की हरकतों से अंदाजा होने लगा था की आगे किया हो सकता है

पर फिर भी एक जवान 18 साल का लड़का जब किसी 38 साल की भरी और गदराई औरत क जिस्म से यु खेलता है तोह उसकी साँसों का टूटना आम सी बात होती है

मालती अपनी उखड़ती हुई साँसों को काबू में करते हुए

"आअह्ह्ह्हह.. बीटा अब.. ेस्शह्ह्ह्ह.. हमे घर चलना चाहिए.. Aaahhhhhhhhhhhhh.. माआ............. कुटटटटटटी................ ऊँगली निकल.. Aahhhhhhhhhhhhhhhh"

पर सत्यम ये खेल सायद फिर से खेलना च रहा था तभी तोह इतनी दिएर से म्हणत कर रहा था, पर न जाने क्यू उसे देख क ऐसा लग रहा था जैसे उसके मन में कोई गन्दी सोच भी पनप रही हो.. और ऐसी कारन उसे उस घने जंगल में वो खजाना जल्दी hi मिल जाता है जिसकी वो खोज में लगा हुआ था.. और जैसे hi उसकी ऊँगली उस गीली और गरम गुफा क द्वार पे आती है वो बिना समय नस्ट किये अपना ऊँगली को अंदर घुसा देता है जिसका परिणाम अपने देख hi लिया

मालती- आअह्हह्ह्ह्ह... किया कर रहा है.. ेस्शह्ह्ह्ह.. निकल बीटा.. आअह्ह्ह्हह

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आप सायद ये भी सोच रहे होंगे की इतनी चुदाई क बाद तोह मालती की योनि और ज्यादा फ़ैल गयी होगी.. और अब तोह उसे ये पीड़ा नहीं होनी चाहिए था

है ये सच है की उसकी योनि का द्वार पहले से ज्यादा खुला हुआ लग रहा था पर ये पीड़ा उस द्वार की दीवारों में आयी सूजन क कारन हुई थी जो इतने समय बाद इतना मोटा लुंड लेने क कारन हलकी हलकी सूज सी गयी थी

"Esssshhhhhhhhhhh.... निकल ले सत्यम.. आअह्हह्ह्ह्हह"

पर सत्यम का ऐसा कोई भी इरादा नहीं था, उल्टा वो तोह और अंदर तक अपनी ऊँगली को घुसा देता है.. इतना की उसकी पूरी ऊँगली अब मोनू की माँ की योनि की गहराई नाप रही थी

"हैईईई.. उफ्फ्फ्फ़ मेरी रैंड.. तू तोह पूरी गीली है अंदर से"

सत्यम वापस से अपने वेहसि अंदाज में लौट रहा था, वो जोर से अपनी ऊँगली को अंदर घुसा क बहार निकलता है और इससे पहले की मालती उस पल का आनंद ले पाए या उस मीठे दर्द को महसूस भी कर पाती वो वापस से अपनी ऊँगली पूरी अंदर दाल क वापस से खींच लेता.. मानो वो उसे पूरा आनंद भी नहीं लेने देना च रहा था, न जाने वो ऐसा क्यू कर रहा था ?

पर उसकी इन हरकतों क कारन मालती अब पूरी तरफ सीढ़ी होक लेत चुकी थी और उसके पेअर सीधे अकड़ने लगे था.. उसकी आँखें कामुकता से बंद होने लगती थी और होंठ जिस्म की आग में फिर से फड़फड़ाने लगे थे

"आअह्हह्ह्ह्हह... किया करना च रहा है.. घर चल अब.. Aahhhhhhhhhhhhh"

मालती आनंद से भर उठी थी पर उसकी लज्जा यु कैसे उसका साथ चोर सकती थी, इसलिए वो फिर से घर की बात बोल पड़ती है

पर सत्यम कहा रुकने वाला.. वो जोर जोर से मालती की छूट में अपनी बीच वाली मोती ऊँगली अंदर बहार कर रहा था

उसी योनि में जिसमे उसने अभी थोड़ी दिएर पहले hi अपना गरम और गाड़ा रास भरा था, उसकी ऊँगली की तेज़ गति क कारन मालती की योनि में भरा उसका गाड़ा रास बहार निकलने लगा था और उसकी चिकनाहट क कारन सत्यम की ऊँगली ऐसे जोर जोर से अंदर बहार हो रही थी जैसे कोई पुराण इंजन जो जुंग खाने लगा हो उसमे खूब सारा लुब्रीकेंट दाल दिया गया हो और अब वो पूरी गति से चल रहा हो

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मालती जोर जोर से कामुकता क कारन मचलने लगी थी जिससे उसकी बड़ी बड़ी नंगी चूचियों में तेज़ी से थिरकन नज़र आने लगी थी

"Aaahhhhhhhhhhhhhh... बंद कर बीटा... ये.. Essshhhhhhhhhhhhhhhhhh... आअह्ह्ह नहीं नहीं बंद मत कर.. आअह्ह्ह्हह.. और जोर जोर से घुसा अंदर तक.. Aahhhhhhhhhh.. मायआ... esshhhhhhhhhhhhh... पूरी अंदर घुसा न कुत्ते.. किया कर रहा है.."

मालती का बदलता स्वर और सब्द सुनते hi सत्यम क अधरों पे मुस्कान खेल जाती है और वो पूरी तरह मालती क जिस्म पे झुकते हुए उसकी एक नंगी और हिलोरे कहती चुकी पे अपना हाथ रख क उसे जोर से मसल देता है.. जिससे मालती का पूरा जिस्म कामुकता और एक मीठे दर्द से तड़प उठता है

"आअह्हह्ह्ह्ह.. माआ...... कुटटी.......... Maaarrrrrrrrrrr.... gayiiiiiiiiii.. री......... धीरे धीरे दबा.. आअह्ह्ह्ह"

इतनी दिएर से सत्यम जो आग धीरे धीरे सुलगा रहा था अब वो एक भीमकाय बड़ी लपटों में बदल चुकी थी

"Aaahhhhhhhhhh.. माआ........ essshhhhhhhhhhhhh.... और अंदर तक घुसा बीटा.. .आह्ह्ह्हह्ह्ह्हह.. maaaaaaaaaaaaaa... Aaahhhhhhhhhhh धीरे मसल मेरी चूचियों को बीटा.. Aahhhhhhhhhhh दर्द होता है बीटा.. आअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह"

पर सत्यम बिलकुल उसका उल्टा करता है, वो जहा एक हाथ की बीच वाली मोती ऊँगली मालती की योनि में जोर जोर से अंदर बहार कर रहा था वही अपने दूसरे हाथ का मजबूत पंजा उसने मोनू की माँ की एक बड़ी सी नंगी चुकी पे जमा क उसे जोर जोर से दबाना सुरु कर दिया था

"आअह्हह्ह्ह्हह.. Saallliiiiiiiiiiiiiii.. कुट्टीयिययिया.. न जाने किया खास बात है तेरे अंदर.. चाहे जितनी छोड़ा जाये तुझे.. तुझे देख क फिर से छोड़ने का मन करने लगता है"

मालती बुरी तरह काँप रही थी, पर ठण्ड क कारन नहीं अपितु कामुकता से

"Aaahhhhhhhhhhhhhhh.. कुटटी.... माआ....... Esshhhhhhhhhhhh.. इतनी बेहरहमी से छोड़ने क बाद भी तेरा मन नहीं भरा है.. आह्ह्ह्हह्ह्ह्हह.. haiiiiiiiiiiiiiiiiii.. essshhhhhhhhhhhh.. और अंदर तक घुसा न कुत्त्ते अपनी ऊँगली को.. aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.. ऊँगली से hi पहाड़ दे मेरी योनि को.. Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhh.. उफ्फ्फ्फ़ ये मीठा मीठा दर्द... हैईईई आअज्ज्ज ये मेरी जान लेके रहेगा.. Aahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh"

पर तभी सत्यम जोर से मालती की चुकी को मसलते हुए उसकी आँखों में देखते हुए कहता है

"बोल रंडी फिर से छुड़ेगी मुझसे... बोल साली चिनार... हरामजादी"

मालती बुरी तरह हफ्ते हुए पहली चुदाई क समय उसने जो कसम खाई थी उसे याद करते हुए और कामुकता से कांपते हुए कहती है

"Aaahhhhhhhhhhhh.... हा.... कुट्टी.. छोड़.. अब तोह तूने मुझे अपनी रंडी बना लिया है ना.. तोह छोड़ ले... किसने रोका है"

सत्यम मुस्कुराते हुए

"रैंड अगर तुझे मेरा लुंड चाहिए तोह एक कसम और कहानी होगी तुझे"

सत्यम जैसे hi अपनी बात पूरी करता है वो गपक से अपनी ऊँगली को मालती की योनि से बहार खींच लेता है और उसकी मोती चुकी को दबाने का कार्य भी बंद कर देता है.. और उसकी आँखों में चुदाई क लिए वो तड़प देखने लगता है जो उसे पता थी है उसके अंदर है



कंटिन्यू... 👇
 


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वही मालती भी अपने जिस्म को मिलने वाले यु मज़े क अचानक बंद हो जाने क कारन पूरी पागल सी हो जाती है और उसकी आँखों में देखते और हफ्ते हुए कहती है

"Aaahhhhhhhhhhh... कुत्त्ते रुक क्यू गया.... कर न..."

सत्यम मुस्कुराते हुए

"नहीं पहले वो कसम..."

मालती कामुकता से कांपते हुए सोचती है की उसने जो कसम खायी थी भला उससे बड़ी और कोनसी कसम हो सकती है, इसलिए इस बार वो ज्यादा नहीं सोचती और कामुकता से कांपते हुए बोल पड़ती है

"मुझे सब कुछ मंजूर है"

सत्यम उसकी गहरी और कामुकता से भरी हुई आँखों में देखते हुए

"सोच ले रंडी.."

मालती कामुकता से कांपते हुए अपने जिस्म का नुमाया करवाते हुए

"है मुझे मंजूर है... बता किया कसम कहानी है ?"

सत्यम मुस्कुराते हुए

"एक ऐसी कसम जिसमे आज तुझे एक वडा करना होगा.. की तू समय आने पे मेरी एक बात मैंने से मन नहीं करेगी"

मालती को समझ नहीं आता ये किया बात हुई

"तूने मुझे इतनी बेहरहमी से छोड़ा.. और मैंने छोड़ने दिया

अब भला इससे ज्यादा किया चाहता है"

सत्यम- (मुस्कुराते हुए) इतना मत सोच मेरी खूबसूरत चिनार मालती.. बस एक वादा hi तोह है

मालती एक लम्बी सांस लेते हुए

"ाचा चल ठीक है दिया वडा.. अब खुस"

सत्यम मुस्कुराते हुए

"ऐसे नहीं.. यक्ष वृक्ष की कसम खा क कहो"

मालती हैरान रह जाती है

"पागल है किया.. उसकी कसम कोई बच्चों का खेल है"

सत्यम- यानि आप कभी भी अपना वडा पूरा नहीं करने वाली थी.. क्यू है न.. ?

मालती को समझ नहीं आता की वो किया कहे.. पर फिर वो कुछ सोचते हुए कहती है

"ाचा ठीक है.. उस यक्ष वृक्ष की कसम खाके कहती हु, तू जब भी कहेगा तेरी कोई एक बात मैंने से मैं मन नहीं करुँगी"

मालती फिर आगे मुस्कुराते हुए कहती है

"अब खुस.. वैसे तुझे कुछ भी करवाने क लिए किसी कसम की जरुरत नहीं.. समझा"

पर जब वो ये कहती है तोह काश वो सत्यम क चेहरे पे आयी उस ख़ुशी क पीछे छिपे हुए किसी राज़ को समझ पाती, पर अब तोह कसम खाई जा चुकी थी

सत्यम मन hi मन हस्ते हुए कहता है

'साली तू बस देखती जा.. आगे आगे तेरे साथ किया किया होने वाला है'

मालती उसी प्रकार पूर्ण नागि अवस्था में लेती हुई सत्यम की बातों में एक बार फिर से फास चुकी थी और अब देखना था की आने वाले समय में उसकी कही इस बात का किया परिणाम होता है

सत्यम वापस से अपने हाथों को मालती की काली झाटों क ऊपर ले जेक वह अपने हाथ का जादू दिखते हुए उसके नरम और काले बालों में अपनी उंगलिया चलने लगता है, जहा उसे गीलेपन का एहसास भी पूरी तरह महसूस हो प् रहा था

सत्यम मुस्कुराते हुए

"वैसे चची आप जैसा माल पाके कुंदन चाचा की तोह किस्मत hi खुल गयी है.."

सत्यम की बात सुनकर मालती की फिर से बढ़ती हुई साँसों में एक ठहराव जैसा आ जाता है और वो धीरे से मुस्कुराने की कोशिश करती हुई कहती है

"तू अपने चाचा की परवा मत कर.. अभी अपनी इस चची से प्रेम कर"

सत्यम मुस्कुराते हुए मालती क ऊपर झुकता चला जाता है और अगले hi पल एक बार उसकी नंगी मोती और बड़ी दुधारू चुकी क काले जामुन सामान निप्पल को मुंह में भर क जोर से चूस लेता है

"Ummmmmmmmmmmmmmmm............... sssslllllllllllluuuuuurrrrmmmmmmmmmm"

मालती एक बार फिर से बुरी तरह तड़प ुहति है

"Aaaahhhhhhhhhhhhhhhh..... Satyaaaaammmmmmmmmmmmmmmm... Essshhhhhhhhhh... माआ.......... Aaaahhhhhhhhhhhhhhh.... betaaaaaaaaaaaaaaa"

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उसकी कामुकता भरी वो सिसकारी उस खंडहर में दूर तक फैलती चली जाती है.. जहा पहले hi बारिश क पानी क कारन मधुर स्वर चारो और फैला हुआ था

"Ummmmmmmmmmmmm...... ummmmmmmmmmmmmmm.... sssllllllllllllluuupppppppppp"

मालती सत्यम की हरकतों का पूरा साथ देती हुई अपना हाथ उसके बालों में फिरते हुए उसका सर अपनी चुकी पे और ज्यादा जोर से दबाने लगती है

"Aaahhhhhhhhhhhh.... joroooooooooo.. से चूस बेताऑ......... Aaahhhhhhhhhhhhhhh.... अचे से चुसस्स..... Aaahhhhhhhhhhhhhh.... निचोड़ ले मेरी चुकी से पूरा doodhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh... Aahhhhhhhhhhhh... Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaa"

सत्यम भी मोनू की माँ की एक चुकी को मुंह में भरे हुए जोर जोर से चूस रहा था तोह दूसरी और दूसरा हमला भी जोरो से चल रहा था.. यानि वो नीचे कुंदन की पत्नी क पैरों क बीच अपनी ऊँगली को एक बार फिर से उसकी गीली योनि में अंदर तक उतर चूका था

"Ummmmmmmmmmmmmmmmmmm...... ummmmmmmmmmmmmmmmmmmm.......... सससलललललललललूऊऊऊऊप्प्प्पपप्पप्प"

मालती एक बार फिर से होने वाले इस दोहरे हमले क आगे अपने अस्त्र डालते हुए उसकी हरकतों से दीवानी होती हुई कामुकता की उड़ान भरने लगी थी

"आअह्हह्ह्ह्हह... माआ................. उफ्फ्फ्फ़........... जोर जोर से Chusssssssssssss.... Aaahhhhhhhhhhhh.... चूस ले अपनी चची क दूध को... Aaahhhhhhhhhhhhhhhh.. पि jaaaaaaaaaaa....... मेरी जवानी....... Aaahhhhhhhhhhhh"

सत्यम इतनी जोर जोर से मालती की चुकी को अपने मुंह में भर क जोर जोर से चूस रहा था की उसके चूसने क कारन एक मधुर स्वर उस खंडहर की शांति को भांग करने का खूबसूरत सा काम बहुत hi अछि तरह कर रहा था.. वही मालती भी एक जवान 18 साल क लड़के क जरिये अपनी चुकी का ऐसा चुसन करवाके कामुकता की अग्नि में जलने लगी थी

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.................... अब कुछ और कर...... Aaahhhhhhhhhhhh... ये आग मुझे जला देगी......... Aaahhhhhhhhhhh... Maaaaaaaaaa.......... Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhh.... ufffffffffffffffff......... रेहम कर अपनी चची pe.......Aaahhhhhhhhhhhhhh.. Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa"

मालती कामुकता से जलती हुई अपने हाथ की उँगलियों को सत्यम क बालों में फिरते हुए उससे अपनी चुदाई क लिए भीख मांगने लगी थी.. ऐसा लग रहा था जैसे कोई रंडी अपनी जवानी लुटवाने क लिए पागल होती जा रही हो

मालती अपना एक हाथ आगे बड़ा क सत्यम क काले और भीमकाय लुंड को दबोच लेती है और जोर से उसे अपनी मुठी में मसलते हुए.. उसकी चमड़ी को ऊपर नीचे करते हुए कहती है

"Aaahhhhhhhhhhhhhh............. माआ........................ उफ्फफ्फ्फ़................. Haaiiiiiiiiiiiiiiiiiii... beeetttttttttttttaaaa........... essshhhhhhhhhhhhh.. कितना मोटा लुंड है तेराआ....... Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhh... उफ्फफ्फ्फ़............. कुट्ट्टीी.... यकीन नहीं होता इतना मोटा लुंड अभी थोड़ी दिएर पहले मेरी योनि की गहराई को चुम रहा था.. Aaahhhhhhhhhhhhhhhh"

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सत्यम ने अपनी बीच वाली मोती ऊँगली फिर से मालती की छूट में अन्दर तक उतर दी थी और जोर जोर से उसकी योनि को ऐसे छोड़ रहा था मानो वो मोनू की माँ नहीं उसकी रखेल हो सिर्फ.. वही मालती भी अपनी जवानी का ऐसा प्रयोग होता हुआ देख क जिस्म की अग्नि क आगे झुलसती जा रही थी

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhh..... उफ्फ्फ्फ़............ बेताऑ............. कब तक ऐसे तड़पाएगा अपनी चची को... Aaahhhhhhhhhhhhhh... घुसा दे ये अपना मोटा लुंड मेरी छूट में... Aaahhhhhhhhhhhh.. छोड़ दाल अपनी चची को... Aaahhhhhhhhhhhhhhhhh.. फिर से पहाड़ दे मेरी छूट... आअह्ह्ह्हह्ह्ह्हह"

मालती एक हाथ से सत्यम क बालों में अपनी उंगलिया चलती तोह दूसरे हाथ से उसका मोटा लुंड अपनी उँगलियों क बीच लेके उसे जोर जोर से उस मोठे लुंड पे चलते हुए कामुकता की अग्नि में जलती हुई कुछ भी बोले जा रही थी

सत्यम, मालती की चुकी को अपने मुंह से आज़ाद करते हुए अपना हाथ ऊपर उठता है तोह मोनू की माँ की वो चुकी पूरी तरह लाल नज़र आने लगती थी और उसपे दाँतों क निशान भी दिखने लगे थे.. सत्यम एक पल क लिए अपना काम और उसकी निशानी देख क खुस होता है.. पर अगले hi पल वो जोर से अपनी ऊँगली को पूरी तरह छूट क अंदर घुसा क वही रोकते हुए कहता है

"मादरचोद Saaallliiiiiiiiiiiiii.. कुटियाआ............ किया बीटा बीटा लगा रखा है सालियी.. कही मोनू से छोड़ने का मन तोह नहीं है.. साली रंडी तोह तू है hi.. बता छुड़ेगी मोनू से..... बोल मेरी चिनार... हरामजादी"

अपने बेटे का नाम और उससे छोड़ने की बात ने मालती क पुरे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ा दी थी, एक पल क लिए तोह उसे लगा की कही सत्यम को सब कुछ पता तोह नहीं है.. पर फिर वो जल्दी hi समझ गयी थी सत्यम सिर्फ कामुकता क बहुपस में बंधा हुआ ये सब बोल रहा है, पर जाने क्यू मोनू का नाम आते hi मालती की अग्नि और ज्यादा भड़क गयी थी

"आअह्ह्ह्हह्ह्ह्हह... कुट्ट्टीी.....

है मैं हु तेरी चिनार..

हु तेरी रंडी...

हु तेरी कुटिया..

तोह छोड़ न अपनी कुटिया को भड़वे.. छोड़.. दिखा अपना dum...aur अगर दम नहीं है तोह किया पता मोनू से hi छोड़ना पड़े मुझे"

कंटिन्यू... 👇
 


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मालती भी अब कामुकता की अग्नि में जलती हुई न जाने किया बोले जा रही थी, सायद उसे ज्ञात hi नहीं था की उसके मुख से किया निकल रहा है.. पर ये तोह सिर्फ एक औरत की हवस का बहुत छोटा सा नमूना मात्र है

वही मालती क मुंह से ऐसी बातें सुनकर सत्यम को इस बार ग़ुस्सा नहीं आता उल्टा वो मुस्कुरा क कहता है

"साली तुझे तोह सिर्फ मैं चुदुँगा.. और देखना एक दिन तेरे मोनू क सामने भी तुझे कुटिया बना क छोडूंगा"

मालती कामुकता की अधिकता में सही गलत सायद भूल चुकी थी

"हरामी.. उसके सामने भी छोड़ लेना, अब तोह मैं तेरी चिनार हु न

पर अभी पहले यही मुझे कुटिया बना क दिखा.. ?"

और इतना कहते हुए खुद hi उस चटाई पे हल्का सा उठते हुए अपने दोनों हाथों को वही जमीन में चटाई क ऊपर तीखाते हुए अपनी मोती और गोल गांड को बहार की और निकलते हुए.. एक खूबसूरत कुटिया बन चुकी थी

जिसके जिस्म पे आग की लपटों की वो लाल रौशनी इतनी खूबसूरत और कामुक लग रही थी मानो उसे बस उसी अवस्था में रखा जाये

सत्यम- (मुस्कुराते हुए) Aaaahhhhhhhhhh... Saaaliiiiiiiiiiiiiii... रंडी कितनी खूबसूरत है तू.. सही कहता है झींगुर.. पुरे गाओं में तेरी जैसी दूसरी नहीं है

सत्यम भी मालती को यु कुटिया बने हुए देख क उसकी खूबसूरती का भाखन करने से खुद को रोक नहीं पाटा.. वही सत्यम क मुंह से झींगुर का नाम सुनते hi मालती को पहले तोह याद नहीं आता पर फिर उसे धियान आता है की सत्यम का एक खास दोस्त है.. वो सायद उसी की बात कर रहा होगा

मालती उसी प्रकार कुटिया बानी हुई अपना चेहरा सत्यम की और करते हुए कहती है

"सही कहता है तेरा वो दोस्त झींगुर.. देख ऐसी खूबसूरत रंडी किया इस गाओं में हो सकती है"

सत्यम मुस्कुरा पड़ता है ककी मालती भी अब पूरी तरह चुदाई क लिए मरी जा रही थी, उसके हाथों का जादू और उसकी गालियों ने सायद ये जादू किया था.. वो अपने भीमकाय लुंड को मसलते हुए अपनी जगह से उठता है और मालती को यु कुटिया बने हुए देख क कहता है

"सच में.. सही कहता है झींगुर, असली गदराई माल है मोनू की माँ"

मालती अपने जवान बेटे का नाम सुनकर इतनी गर्मी में भी एक पल क लिए शर्मा जाती है पर इसका ये मतलब नहीं की उसकी कामुकता में कोई कमी आयी हो, उल्टा उसके अन्दर की गर्मी तोह मोनू नाम सुनते hi और ज्यादा भड़क रही थी

सत्यम अपना एक हाथ मालती की बड़ी और उभरती हुई गांड पे फिरते हुए कहता है

"साला झींगुर तुझे ऐसे देख ले तोह पागल hi हो जायेगा वो बेचारे तोह.."

सत्यम की बात पे मालती सिर्फ मुस्कुरा और शर्मा क रह जाती है.. इस बार वो कुछ बोलती नहीं, पर यु बार बार झींगुर का नाम आने क कारन उसकी आँखों क आगे उसका चेहरा एक पल क लिए जरूर आ गया था

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सत्यम मालती को यु कुटिया बने हुए देख क मंद मंद मुस्कुराते हुए उसकी गांड क मोठे उभर पे अपना हाथ फिरते हुए कहता है

"गांड को और उठा साली रंडी..

वैसे अगर तेरी ये गांड कही झींगुर देख ले तोह पक्का बिना कुछ बोले सीधा लोढ़ा अन्दर घुसा देगा वो"

यु अपनी गढरै मस्त गांड में ऐसे किसी नए लुंड क घुसने की बात सुनते hi न जाने क्यू मालती की योनि से कॉमर्स बहना सुरु हो जाता है और उसकी आँखें बंद होती चली जाती है.. सच में औरत को समझना आसान नहीं

"Aaahhhhhhhhhhhhhh.... झींगुर को जब घुसना होगा घुसा लेगा... Aaahhhhhhhhhhh पहले तू तोह घुसा दे"

ये मालती की कामुकता hi अधिकता थी की यु एक अनजान लड़के क लुंड की बात पे भी वो ग़ुस्सा नहीं हुई थी उल्टा उसने तोह ऐसा कुछ कह दिया मानो उसे झींगुर का लुंड खाने से भी दिक्कत नहीं

सत्यम.. मालती की बात सुनते hi मुस्कुरा पड़ता है और जोर से मोनू की माँ की नंगी गांड पे थप्पड़ मरते हुए कहता है

"Chattttaaaaaaaaaaaaaakkkkkkkkkkkkkkk... Aaaahhhhhhhhhhhhhhhhh.. साली बड़ी गर्मी है तेरे अंदर.. उफ्फफ्फ्फ़

लगता है तेरी गांड में झींगुर का लुंड डलवाना hi पड़ेगा.. उफ्फ्फ्फ़ किया माल पाया है कुंदन ने"

मालती कामुकता की आग में मानो जल क राख होने की इस्तिथि में पहुंच चुकी थी

"आअह्ह्ह्हह्ह्ह्हह... कुंदन का ये माल अब तेरा है, तोह इंतिजार क्यू कर रहा है.. आअह्ह्ह्ह"

और फिर मालती जो बोलती है उसे सुनकर सत्यम का लुंड बावला सा हो उठता है

"कुत्त्तीये........ छोड़ ले कुंडा की पत्नी को"

मालती क दोनों हाथ उस खंडहर की ठंडी जमीन पे जमे हुए थे.. कहने को तोह उसके हाथों क नीचे वो चटाई थी पर जमीन की ठंडक मालती को अपने हाथों में साफ़ साफ़ महसूस हो रही थी.. मालती ने अपनी गोरी और मोती गांड को सत्यम की तरफ हिलाते हुए फिर से कहा

"

तोह बता.. छोड़ेगा कुंदन की बीवी ?"

कंटिन्यू... 👇
 


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अब भला कोई जवान लड़का ऐसी बात का किया hi जवाब देता, वो बस मुस्कुराते हुए मालती क ठीक पीछे आके उसके गांड को दोनों हाथों से पकड़ क उसके चूतड़ को फ़ैलाने लगता है.. जिससे जैसे जैसे मालती की गांड फ़ैल रही थी, वैसे वैसे उसकी गांड का सुनहरा छेद नज़र आने लगा था और साथ hi साथ एक मनमोहक खुसबू उस वातावण में फैलनी सुरु हो गयी थी

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhh... किया खुसबूओ है चची आपकी गांड की... ssnsnnnnnnnnnnnnnnnfffffffffffff...."

सत्यम मोनू की माँ की गांड से आने वाली खुसबू से खुद को बचा नहीं पाटा और एक लम्बी सांस भरते हुए उसकी तारीफ कर hi देता है

वही मालती अपनी गांड की ऐसी तारीफ और जिसे दुनिया बदबू कहती है उसे सत्यम क मुंह से खूबसू सुनकर उसकी साँसे ऐसी भागने लगती है मानो उसकी बड़ी बड़ी चूचिया जोरो से ऊपर नीचे होने लगी हो.. वो तोह कुछ बोल hi नहीं पाती और भला कहती भी किया

वही अब सत्यम भी पूरी तरह मालती क पीछे अपनी जगह पे आ चुके था और उसका काला भीमकाय लुंड अपना सर उठा क मालती क नंगे जिस्म और अब उसकी गांड की तारीफ में खड़ा हो चूका था.. और जोरो से हिलोरे मरते हुए मानो मोनू की माँ की खूबसूरती की तारीफ कर रहा हो

मालती- (अपनी कांपती हुई आवाज़ में) Aaahhhhhhhhhhhhhh... सत्यम अब मुझसे बर्दास्त नहीं होता बीटा.. घुसा दे अपना लुंड और पहाड़ दे मेरी छूट... Aaahhhhhhhhhhh

सत्यम धीरे से अपना अगूंठा मालती की गांड क उस सुनहरे छेद पे ले जाता है जो बारिश में भीग क पूरी तरह सिकुड़ चूका था और धीरे धीरे ऐसे खुल बंद हो रहा था मानो अपनी खूबसूरती का भाखन खुद hi कर रहा हो

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मालती जैसे hi अपनी गांड क नन्हे से छेद पे सत्यम क अगूंठे को महसूस करती है तोह बुरी तरह काँप उठी है

"Aaahhhhhhhhhhhhh.. नहीं नहीं बीटा... वह नहीं... Aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhh............ माआ............................... kutttteeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee............"

पर सत्यम उसकी बात पूरी होने से पहले hi अपना वो मोटा अगूंठा उसकी गांड क नन्हे छेद में अन्दर तक घुसा देता है जिससे मालती को एक तीव्र दर्द का अनुभव होता है

"Aaahhhhhhhhhhh... Saaalllllllllllliiiiiiiiiiiiiii.. कितना कैसा हुआ छेद है तेरी गांड का.. आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह ऐसा लग रहा है मेरा अगूंठा जल जायेगा"

सत्यम ये कहते हुए सच में अपना अगूंठा मालती की गांड से बहार खींच लेता है ककी उसे सच में लगा जैसे मालती की गांड उसके अगूंठे को जला क भस्म कर देगी

मालती- (कामुकता क कांपते हुए) Aaahhhhhhhhhhhhhhh.... कमीने... किया कर रहा है.......... esssshhhhhhhhhh

सत्यम अपना मुंह आगे बढ़ाता है, और जल्दी hi उसका पूरा चेहरा मोनू की माँ की गांड यानि उसके बड़े चूतड़ों क बीच घुस चूका था.. और महेंद्र क बेटे की जीभ बहार निकल चुकी थी जो अब मालती की गांड क छेद क ऊपर से hi अपनी हरकत करने लगी थी

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhh........... Essshhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh............ Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa............ Ufffffffffffffffffffffffffff............ haiiiiiiiiiiiiiii............. reeeeeeeeeeeeeeeee............... सत्यम......... Aaahhhhhhhhhhhh"

सत्यम को सायद इसमें मज़ा आने लगा था या किसी खास प्रकार का स्वाद मिल रहा था उस जगह से, इसलिए वो पीछे हटने की जगह अपनी जीभ को पूरा निकल क छेद क द्वार पे चलने लगता है

"Ummmmmmmmmmmmmmmm.......... Ssllllllllllurrrrrrrrrrrrrrrppppppppppp... Slllllllllllllllluuuuuuuuuuppppppppp............... ummmmmmmmmmmmmmmm.........."

मालती अपने दोनों हाथों को जमीन पे जमाये हुए किसी कुटिया सामान अपनी गांड हिलने लगती है

"Aaahhhhhhhhhhhhh......... Esssshhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.......... मा.............. सत्यम ufffffffffffff..... किया कर रहा है......... Aahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.... Aaahhhhhhhhhhhhhhh...... कुट्ट्टीीे............. किया कर रहा है ये.......... Aaaahhhhhhhhhhhhhhh"

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पर सत्यम रुकता नहीं बल्कि अपनी जीभ को मालती की गांड क छेद पे अचे से चलते हुए उसे ऊपर ऊपर से hi चूसने लगता है

"Sssssrrrrrrrrrrrrrruuuuuuuuuuuuuuppppppppppp......... ummmmmmmmmmmmmm.............. grrruuuuuuuuuuuuppppppppppppppp"

मालती जोर जोर से अपनी गांड को हिलने लगती थी उसकी आँखें बंद हो चुकी थी और कामुकता की ज्वाला उसे पागल कर रही थी

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhh................. Saaattttttttttttyyyyyyyyyyyyyyyyyyyyaammmmmmmmmmm.... Kuttteeeeeeeeeeeeeeeeeee"

पर सत्यम दोनों हाथों से कुंदन की पत्नी की गांड को दबोचे हुए उसे जोर से फैलते हुए उसके बीच उस सुनहरे छेद पे अपनी जीभ का जादू चलता रहता है

"Ummmmmmmmmmmmmmmmmmm..................... ssssnnnnnnnnnnnnnnfffffffffff........ pusssshhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh................................"

सत्यम ने इस बार कुछ ज्यादा hi जोर से मालती की गांड को फैला दिया था जिससे जैसे hi उसकी गांड का छेद थोड़ा सा खुलता है उसे अपने चेहरे पे एक गरम हवा का तेज़ झोंका सा महसूस होता है और उसके नाक क द्वारा उसके पुरे सरीर में वो कामुक खुसबू फैलती चलती है

"रंडी.... कुटिया... मुंह पे पाद्टती है..... chatttaaaaaaaaaaaaaaaaakkkkkkkkkkkkkkkkkkkkkk"

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhh......... माआ.................... मैंने जान क नहीं किया.......... Aaahhhhhhhhhhhhhhhh"

पर सत्यम उसकी बात नहीं सुनता और एक बार फिर से उसके चूतड़ पे थपड झाड़ देता है.. जिससे उसकी उंगलिया कुंदन की पत्नी की गांड पे नज़र आने लगी थी

मालती को यकीन नहीं होता की उसने अभी अभी सत्यम क मुंह पे अपनी गरम हवा चोर दी.. वैसे इसमें उसकी गलती थोड़ी है, वो तोह मन hi कर रही थी

सत्यम अपनी पूरी जीभ निकल क मालती की गांड क छेद से लेके उसकी योनि द्वार क गीले मार्ग तक अपनी जीभ फिरता चला जाता है

"Sssssllllllllllllllllrrruuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuppppppppppppppppppppppp..............."

मालती तोह अभी अपनी गरम हवा क बारे में सोच hi रही थी.. की सत्यम की इस अनोखी हरकत क कारन उसकी आँखें बंद होती चली जाट है

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.............. माआ................. सत्यम.............."

सत्यम अपना चेहरा मोनू की माँ की गांड से अलग करता है और उसके ठीक पीछे आते हुए उसकी गांड क बीच अपना लुंड लगते हुए कहता है

"आज तोह तेरी गांड चोर रहा हु.. ककी अगर एक hi दिन छूट और गांड पहाड़ दूंगा तोह सबको पता चल जायेगा.. पर ज्यादा दिन तेरी ये गांड मुझसे बची नहीं रहेगी.. समझी रैंड..."

मालती कामुकता से कांपते हुए धीरे से अपनी बंद आँखों को खोलती है और अपने पीछे अपनी जगह पे निशाना जमाये हुए सत्यम को देख क धीरे से बस है में अपना सर हिला क रह जाती है.. सायद उसे भी सत्यम की बात सही लगी थी, वर्ण अगर सत्यम उसकी गांड में अपना काला लुंड घुसा देता तोह वो कोनसा उसे रोक पाती

सत्यम अपना मोटा लुंड अपनी खूबसूरत और नंगी कुटिया बानी हुई चची की गांड क छेद पे रखता है और जैसे hi उसका गरम और मोटा टोपा मालती की गांड क छेद को पियर से चूमता है.. कुंदन की धर्मपत्नी कामुकता से तड़प उठी और कांपते हुए कहती है

"नहीं.. नहीं.. बेताऑ... अभी तोह तूने खुद कहा था..... Essshhhhhhhhhh... Maaaaaaaaaaaaaa..... क्यू तड़पा रहा है... Aahhhhhhhhhhhhh"

मालती बेचारी ये सोच क काँप गयी थी की लगता है आज ऐसी जगह उसकी गांड का द्वार भी फटने वाला है, पर अभी यहाँ सायद सत्यम भी उसकी गांड का उद्घाटन नहीं करना चाहता था.. सायद उसने कुछ और सोचा हुआ था भविस्य क लिए.. इसलिए जैसे hi मालती तड़पती है सत्यम अपना लुंड और उसका मोटा टोपा उसकी गांड क छेद से नीचे सरकते हुए उसकी गीली और रास टपकती योनि क मुंह पे लाके रख देता है

मालती- (कामुकता की आग में जलते हुए) Aaahhhhhhhhhh... बेताऑ........... कितना तड़पाएगा... उफ्फफ्फ्फ़.......... घुसा दे हरामी

सत्यम मुस्कुराते हुए

"साली रंडी... बड़ी जल्दी है तुझे लुंड खाने की, अगर कही मेरी जगह तेरा मोनू होता तब भी यही कहती किया ?"

अपने जवान बीटा का नाम एक बार फिर से ऐसी इस्थिति में सुनकर हमारी खूबसूरत और ममता से भरी मालती की योनि अपना रास टपकने लगती है

"Aaahhhhhhhhhhh... उसका भी लुंड घुसवा लेती.. अब खुस... अब तोह घुसा दे अंदर कुत्त्ते कितना तड़पाएगा"

सत्यम को तोह एक पल क लिए यकीन नहीं होता की ये कितनी बड़ी रैंड है जो अपने सेज बेटे का लुंड लेने से भी पीछे नहीं हटेगी पर अगले hi पल उसे अपनी माँ की याद आ जाती है.. जिसे आज सुबह सुबह hi उसने छोड़ा था और ये सोचते hi उसके अधरों पे मुस्कान खेल जाती है

"तेरी जैसी गरम माँ hi होती है जो हम बेटों को मादरचोद बनती है.. ले और सोच मोनू तुझे छोड़ रहा है"

कंटिन्यू... 👇
 


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सत्यम इतना बोलते hi अपना मोटा काला लुंड मालती की गीली योनि क कोमल छेद पे रखता है और एक जोरदार दक्का जड़ देता है.. जिससे उसका मोटा लुंड कुंदन की पत्नी की योनि को फैलते हुए एक hi झटके में अंदर उतरता चला जाता है और मालती को ऐसा लगता है जैसे उसकी योनि में वो घुसता हुए लुंड उसके बेटे मोनू का है

पर जैसे hi वो काला लुंड छूट की गहराई में उतारते हुए उसकी कोमल और सूजी हुई दीवारों से टकराता है तोह सुरीली देवी की मंझली बहु को अपने पुरे सरीर में एक तीव्र पीड़ा का एहसास होता है और उसके मुंह खुलता चला जाता है

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.................... Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaa................ maaarrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr............ gaaayyyyyyyyyyyyyyyiiiiiiiiiiiiii.......... रीई......................... Kutttteeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee"

मालती क मुंह से यु तड़प भरी चीख सुनकर सत्यम ऐसे मुस्कुरा पड़ता है जैसे कोई विजेता जीतने क बाद मुस्कुराता है और वो हस्ते हुए कहता है

"क्यू साली... किया हुआ ?

अब नहीं छोड़ना अपने बेटे से... ये ले हरामजादी.. रंडी सालियी........."

और एक बार फिर से अपना लुंड बहार की और खींचता है पर सिर्फ इतना की उसका मोटा टोपा बहार न आ जाये.. और इससे पहले की सविता की देवरानी अपने दर्द से बहार आ पति इस बार फिर से वो लुंड उस योनि को पूरी तरह भर देता है

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"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhh................. मायआ................ मोनू.........................."

सायद मालती अब यही सोचने लगती थी की उसकी योनि में वो लुंड उसके अपने सेज बेटे का है, पर ये दर्द और पीड़ा भी उसके चेहरे पे एक अलग सा सुकून दिखा रही थी

सत्यम- (वापस से अपने लुंड को फिर से पीछे खींचता है और कुटिया बानी हुई मोनू की माँ की योनि में अन्दर उतारते हुए) Aaahhhhhhhhhhhhhh... रंडी Saaaallliiiiiiiiiiiiii.. लगता है सच में मोनू का लुंड लेना चाहती है.. चिनार कही की... हरामजादी

सत्यम क सब्द और उसका मोटा लुंड जब एक बार फिर से मालती को महसूस होता है तोह उसे याद आता है की ये लुंड उसके जवान बेटे का नहीं बल्कि बेटे सामान उसके भतीजे सत्यम का है

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhh... कुटटी................. एक बार फिर से तूने अपनी चची छोड़ दी...."

सत्यम जैसे hi ये सुनता है उसके चेहरे पे ख़ुशी नज़र आने लगती है ककी इस बात का साफ़ मतलब था की अब बात उसकी हो रही है

"Aaaahhhhhhhhhhhhh... Saaallliiiiiiiiiiiiii... तू मेरी कुटिया है रैंड.. तेरी तोह छूट लाल कर दूंगा कुटिया.. ये ले.. Aaaaahhhhhhhhhhhhhhh... इतना छोड़ने क बाद भी तेरी छूट की गर्मी में जरा भी कमी नहीं है....... Aaaahhhhhhhhhhh मेरा लुंड जला क मानेगी तू हरामजादी कही की.. Aaahhhhhhhhhhh"

सत्यम अपना एक हाथ आगे बड़ा क मोनू की माँ क बाल पकड़ क जोर से खींच लेता है और पूरी ताक़त से अपना लुंड बहार खींच क उतनी hi ताक़त से अंदर घुसा देता है

"Aaaahhhhhhhhhhhhhh... Maaaaaaaaaaaaaaaa............ uffffffffffffffffffff....... haiiiiiiiiiiiiiiiiii... कुट्ट्टीी.......... तूने तोह सच में मेरी छूट फडनी सुरु कर दी... Aaaahhhhhhhhhhhhhhh.. ऐसे hi छोड़.. अपनी इस रंडी को....... Aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh.... माआ.............. पहाड़ दे मेरी छूट को........... Aaaahhhhhhhhhhhhhhh........ Maaaaaaaaaaaaaaaa"

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सत्यम पूरी ताक़त से अपना लुंड बहार खींचता और उतनी hi गति से अंदर उतर देता.. जिससे जब उसका मोटा लुंड अन्दर तक घुसता तोह उसके बड़े बड़े ाँद कुंडा की पत्नी की जाँझों से टकराते हुए उस खंडहर में उस बारिश क शोर क साथ साथ एक और स्वर गूंज जाता.. chatttaaakkkkkkkkkkkkkkkk........ छहहाआटटटटटटटककककककक

सत्यम का मोटा और भीमकाय लुंड अपनी गति पकड़ चूका था और जल्दी hi उसका वो मोटा लुंड पूरी गति से अन्दर घुसता और उसी गति से बहार निकलता.. ऐसे लगता मानो कामुकता का शानदार नरतिय चल रहा हो

"Aaahhhhhhhhhhhh........... माआ.................. uffffffffffffffffffffffff............... Aaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhh.... haiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii.... बेटा........... पहाड़ दे मेरी छूट को........ Aaahhhhhhhhhhhhh... आअज इतना छोड़ मुझे की कुंदन की ये पत्नी तेरी गुलाम बन जाये... Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhh... ufffffffffffffffffff.......... माआ.............. Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhh... ऐसे hi........... Aaahhhhhhhhhhhhhh... haiiiiiiiiiiiiiii... ऐसे hi...... ऐसे hi........ Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhh... ऐसे hi जोर जोर से छोड़ मुझे"

सत्यम का हर जोरदार दक्का इतना ताक़तवर था की मालती की बड़ी बड़ी चूचिया जोरो से हिलोरे खा रही थी और आग की लपटों में उसकी सुंदरता बस देखते hi बन रही थी.. यु समझो उसकी खूबसूरती की तारीफ क लिए मेरे पास सब्दो की कमी है

वही सविता का जवान बीटा सत्यम अपनी पूरी ताक़त का सबूत देते हुए सुरीली की मंझली बहु की छूटा का कचूमर निकलने में लग चूका था

"Aaahhhhhhhhhhhh... Saaallliiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii... रंडी.... सोच मैं तुझे ऐसे छोड़ रहा हु और मोनू हमे देख ले... तोह सोच किया होगा..."

मालती क कानो में जैसे hi ये बात पड़ती है उसकी कामुकता का रास बहने लगता है और आँखें बंद होने लगती है और ऐसा लगता है जैसे सच में उस आग की लपटों में उसके बेटे मोनू का चेहरा नज़र आने लगा हो और यु उसकी चुदाई और उसकी छूट में लुंड को घुसते हुए देख क मुस्कुरा रहा हो

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh... पता नहीं किया होगा......... Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhh.. ऐसे hi छोड़...... Aaahhhhhhhhhh पहाड़ दाल मेरी छूट को.......... Aaahhhhhhhhhhh... मायआ.......... जोर जोर से छोड़ मुझे........ Aaaahhhhhhhhhhhhhhh..... Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaa"

पर सत्यम इस बात को इतनी आसानी से नहीं जाने देना च रहा था

"बता साली.. बोल कुटिया.. सोच.. की मैं तुझे जोर जोर से छोड़ रहा हु..

तेरी छूट में मेरा लुंड है और मोनू तुझे देख रहा है तोह बता किया करेगा वो... बोल रंडी... बोल"

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यु अपने बेटे क लिए ऐसी बात और उसके सामने किसी और का लुंड लेने की बात न जाने क्यू मालती क अंदर की गर्मी को ऐसे भड़का रही थी मानो आग में घी डाला जा रहा हो

"Aaahhhhhhhhhhhhhh.. उसे मज़ा आएगा.. उसे मज़ा... आएगा... aaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhh.. ऐसे hi......... Aaahhhhhhhhhhhhhhh... देखो मेरा मोनू देख रहा है हमे... Aaaahhhhhhhhhhhhhhh.... देख मोनू तेरी माँ छोड़ी जा रही है...... Aaaahhhhhhhhhhhhhhhh....Satyyyaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaammmmmmmmmmmm"

मालती ने जैसे hi मोनू को लेके ये सब्द बोलने सुरु hi किये की उसका जिस्म एक बार फिर से अकड़ने लगा.. सायद आज से पहले एक बार में उसकी छूट ने कभी इतना पानी नहीं बहाया होगा.. पर न जाने मोनू क सामने छोड़ने की सिर्फ कल्पना मात्र ने उसके अंदर की कामुकता में ऐसा कोनसा जादू कर दिया था की वो अचानक से बहुत ज्यादा बाद गयी थी

सत्यम को भी पहले से ज्यादा मज़ा आने लगा था.. उसे ऐसा लग रहा था जैसे मोनू की बात होने पे मालती को योनि सिकुड़ रही हो और उसके लुंड का रास निचोड़ने की कोषसिंह करने लग रही हो, जिससे उसे एक अलग hi आनंद मिलने लगा था

"Aaaahhhhhhhhhhhhhh... देख मैं तुझे छोड़ रहा हु.. और सामने मोनू खड़ा है.. हमे देख रहा है.. बता मुझे रंडी वो किया बोल रहा है.. बता साली चिनार.. बता"

मालती का जिस्म जोरो से काँप रहा था और उसकी बड़ी बड़ी चूचिया ऐसे हिल रही थी मानो ताल से ताल मिला रही हो.. और सत्यम की बातों को सुनकर वो सामने देखती है तोह उसे सच में ऐसा लगता है जैसे सामने की उस दिवार में उस पुराणी तस्वीर में उसके बेटे का चेहरा हो.. जो उसकी चुदाई देख क मुस्कुरा रहा है और उससे कह रहा है

'Aaahhhhhhhhhhhhhhh.. माआ......... तुम कितनी अछि हो.... यही तोह मैं चाहता हु.. तुम्हारी छूट में रोज़ रोज़ नए लुंड... आअह्हह्ह्ह्हह मेरी पियरी माँ'

सत्यम कुटिया बानी हुई मालती को पीछे से जोर जोर से छोड़ते हुए कभी उसकी पीट पे अपना हाथ फिरता तोह कभी उसके बालों को पकड़ क जोर से खींचता.. साथ hi उसके बड़े बड़े ाँद जब मालती की जाँघों से टकराते तोह अलग hi अनोखा स्वर चारो और गूंज उठता उससे

Dhaaaaaappppaaaaaaaaaaaaaakkkkkkkkkk... chatttaaaaaaaaaaaaakkkkkkkkkk..... chaaaaaaaaaaappppppkkkkk

सत्यम सटासट गपागप अपना लुंड अन्दर बहार करते हुए

"बोल रंडी तेरा बीटा किया कह रहा है.. किया चाहता है वो.. बोल साली चिनार"

सायद सत्यम भी अब खेल क अंतिम पड़ाव पे आ चूका था.. ककी अचानक से उसकी गति कई गुना बाद रही थी और उसका जिस्म अकड़ने लगा था

मालती- (अपनी योनि में अपने भतीजे का मोटा लुंड घुसवति हुई और अपने कानो में अपने बेटे का स्वर सुनती हुई बोल पड़ती है) उसे मज़ा आ रहा है.. अपनी चुदती हुई माँ को देख क.. वो चाहता है ऐसे hi रोज़ रोज़ मेरी चुदाई हो.. Aaahhhhhhhhhhhhhh.. मेरा ाचा बीटा.. आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह मेरा दुलारा बीटा.. मेरी चुदाई चाहता है.. जोर जोर से छोड़ो मुझे.. उसके बात का मान रखो.. आअह्ह्ह्ह जोर जोर से छोड़ो मोनू की माँ.... Aaahhhhhhhhhh

सत्यम ये सुनता है तोह जैसे पागल hi हो जाता है और उसकी आँखें बंद होने लगती है वो अपना पूरा जोर लगा देता है और कुंदन की धर्मपत्नी की छूट का गुलदस्ता बनाने पे लग जाता है

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhh...... रंडी Saaalllllllllliiiiiiiiiiiiiiiii.. कुटिया.......... जरूर छोडूंगा तुझे.. देखना मोनू क सामने भी छोडूंगा.. Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh............... Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa..."

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उसके धक्के अब इतने जोरदार हो चुके थे की हर जोरदार दकके मालती का पूरा जिस्म हिला दे रहा था, उसकी बड़ी बड़ी चूचिया ऐसे हिलोरे कहते हुए हिल रही थी की देखने वालों का पानी यही उसके लुंड से बहना सुरु कर दे.. वही सविता क जवान बेटे क जोरदार दक्कों क कारन उसके मोठे मोठे ाँद जब हर्षिता की जेठानी की जांघ से टकराते तोह पुरे खंडहर में पत्ततत्तट्ठह्ह........ Phhhhhaaaatttttttttttttt.... phhhhaaaaaaaaaaaaatttttttttt... की मधुर आवाज़ गूंज रही थी

मालती पूरी तरह पागल होती जा रही थी, उसकी योनि में घुसता वो मोटा लुंड उसे पूरी तरह आनंदित कर रहा था और उसके पुरे सरीर में आनंद क तूफान को उठा रहा था

"Aaaahhhhhhhhhhhh... haiiiiiiiiiiiiiii.. Maaaaaaaaaaa.......... Aaaahhhhhhhhhhh.... ufffffffffffffffffff.... Aaaahhhhhhhhhhh........ हैईईई.... पहहहहादददद दे कुत्ते मेरी छूट को.. आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह... phaaadddddddddddddd... दे मेरी छूट... Aaaahhhhhhhhhhhh"

सत्यम- (पूरी ताक़त से अपना दम दिखते हुए) Aaahhhhhhhhhh... साललीई आज तेरी छूट भर दूंगा... तुझे अपने बचा की माँ बना दूंगा साआल्लीइइइइइइइ... रंडी... कुटिया कही की........ एक दिन ऐसे hi तुझे मोनू क सामने कुटिया बना क छोडूंगा... बोल मेरी रंडी.. छुड़ेगी न.. अपने बेटे क सामने.. बोल कुटिया.......... बोल

मालती का जिस्म जोरो से अकड़ने लगता है.. ऐसा लगता है उसकी गर्मी में कोई तूफान आने वाला हो

"Aaaahhhhhhhhhh.. है मेरे मोनू क सामने भी मुझे कुटिया बनाना... मुझे रंडी बना क छोड़ना... मोनू मेरी चुदाई देखेगा... Aaaahhhhhhhhhhh... मोनू मेरी छूट में लुंड देखेगा.. Aaahhhhhhhhhhh"

सत्यम क कानो में ये सब्द उसके पुरे जिस्म में जीत का नशा भर रही थी, और उसके अंतिम दकके पहले से ज्यादा तेज़ होते जा रहे थे

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.............. कुत्त्तीइइइइइइइइइइइयाआआआआ... Maaaalllllllllttttttttttiiiiiii..."

और ऐसी क साथ उसका लुंड अपना गरम लावा उगलने लगता है जो एक बार फिर से मोनू की माँ की छूट में अन्दर तक भरने लगता है और उसके सुखी भूमि में अपना भीज बोन का काम करने लगता है

"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh..................... Maaaaaaaaaaaaaaaaa"

मालती को भी जब अपनी योनि की गहराई में उस गरम प्राधारत का भरना महसूस होता है उसकी आँखें एक बार फिर से बंद होती चली जाती है और वो वही सीधा उसी चारपाई पे गिर पड़ती है, पर ऐसी क साथ मालती की योनि एक बार फिर से अपना कॉमर्स बहा चुकी थी

सत्यम भी उसी क ऊपर लेत क जोरो से हाफने लगता है.. उसके चेहरे पे किसी विजेता जैसी मुस्कान थी तोह मालती क अधरों पे भी एक ख़ुशी नज़र आ रही थी

बहार जोरो से बरसता वो पानी अब भी पहले की गति से बरसता जा रहा था.. जैसे वो आज रुकने की वाला hi न हो..

🎆

कंटिन्यू... 👇 (झलकियां भविस्य की)
 
सन (भविष्य क अपडेट से..) 👇

ऐसी सुबह करीब 8:55 पे जब बारिश ने सिर्फ रफ़्तार पकड़ी hi थी.. उस समय ऐसी सुंदरपुर गाओं में किसी खेतों क बीच एक पेड क सहारे कोई औरत झुकी हुई थी और उसके जिस्म पे एक काला बुरखा उसकी कमर तक ऊपर उठा हुआ था, वैसे तोह वो उस पेड को पकड़ की किसी गोदी जैसी बन क झुकी थी पर पीछे से उसके उठे हुए बुरखे से नज़र आती उसकी बड़ी और मनमोहक गांड का नज़ारा ये बताने क लिए काफी था की वो कितनी अधिक गर्दै हुई औरत है

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बारिश ने करीब करीब अपनी रफ़्तार पकड़ ली थी और उस पेड क नीचे होने क बाद भी दोनों ऐसे भीग रहे थे जैसे पूरी वर्षा उन्ही पे हो रही थी.. पर उस औरत क पीछे खड़ा वो जवान काला लड़का इन सब बातों की परवा नहीं कर रहा था

बल्कि उसने तोह अपने दोनों हाथों से उस गदराई खूबसूरत औरत की मोती और बड़ी गांड को पूरा फैला रखा था जिससे उसकी गांड का वो भूरा छेद नज़र आ रहा था.. और साथ hi साथ उस छेद पे हलकी चिपकी हुई गंदगी भी साफ़ साफ़ दिख रही थी, जिसका मतलब था की उसने आज हगने क बाद अपनी गांड को सही से धुला नहीं होगा

पर वो जवान लड़का इस बात की परवा नहीं कर रहा था.. वो जी भर क उस औरत की गांड को पूरा फैलाये हुए उसके बुरे गंदे छेद को देखता रहता है मानो जैसे उसमे कही खो गया हो, तब्बी उसके कानो में उस औरत की आवाज़ सुनाई पड़ती है

"बीटा.. ये गुनाह है, मत कर.. मैं.. अम्मी हु तेरी"

पर वो लड़का उस खूबसूरत औरत की बात तोह सुनता है पर उसकी तरफ देखता नहीं मानो एक पल क लिए भी अपनी नज़रों को उस हसीं नज़ारे से हटाना नहीं च रहा था.. वो उसी प्रकार उस गांड क बुरे छेद को देखते हुए कहता है

"जनता हु अम्मी.. पर किया करू, मुझे मादरचोद बनना है"

सन (भविष्य क अपडेट से..) 👇

ऐसी दिन ठीक जिस पल सत्यम.. मोनू की माँ की छूट में जोर जोर से अपना लुंड घुसा रहा था, ठीक उसी पल महेंद्र क घर में

जोरदार बारिश का मधुर स्वर पुरे घर में गूंज रहा था, साथ hi साथ घर क भाड़े से आँगन में गिरता बारिश का वो पानी अलग hi सुर लगा रहा था.. कुलमिला क घर का पूरा वातावरण अलग hi कामुकता लिए हुए था और ऐसे मौसम में इन्शान पाप कर hi लेता है

महेंद्र क घर में.. एक कमरे क अंदर का नज़ारा इस पुरे मौसम की सटीक व्याख्या कर रहा था ककी पुरे कमरे में घुंटी वो मधुर आवाज़ इस बात का सबूत थी

"Ummmmmmmmmmmm......... glllluuuuuuuuuuuuuupppppppp.... grrrrrrrrrruuuuuuppppp... Srrrrrrppppppppppp...... उम्मम्मम्मम्मम..... Srrrrrrppppppppppp...... उम्मम्मम्मम्मम......"

भरी जिस्म वाली और भीगी साड़ी में कैद सविता उस मोठे लुंड को अपने मुंह में भरे हुए अपनी नज़रों को ऊपर उठती है और जब उसकी कामुकता से भरी नज़रें उस लुंड क मालिक से टकराती है तोह सविता क चेहरे पे मुस्कान खेल जाती है पर उसके मुंह की गहराई में घुसा वो मोटा लुंड उसके चेहरे की ख़ुशी पड़ने नहीं दे रहा था

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सविता जैसे hi उस लुंड क मालिक की आँखों में देखती है वो समझ जाती है वो किया चाहता है और पुरे प्रेम क साथ उस मोठे लुंड को अपने मुंह क थोड़ा बहार निकलती है.. यु समझो वो टोपा हल्का सा नज़र आने लगा था पर फिर तुरंत hi उसे पूरा का पूरा निगल जाती है

"Sssllllllllllluuuuuuuppppppppppppp.... ummmmmmmmmmmmmmm........... gglllllllllluuuuppppppppp"

महेंद्र की पत्नी अपना पूरा अनुभव दिखा रही थी, ककी वो उस मोठे लुंड को पूरी सिद्दत से चूसना सुरु कर चुकी थी

"Srrrrrrppppppppppp...... घुम्म्म्मम्म्म्म..... घुम्म्म्मम्म्म्म... ह्ह्ह्हह्हहपपपपप........ Srrrrrrppppppppppp..... उम्मम्मम्म.... उम्मम्मम्मम्म..... ggggllllllllllluuuuuuuuuppp..... स्स्स्सस्स्स्सलललललल्लूऊऊऊऊप्प्प्पपप्प"

उस लुंड का मालिक अपना एक हाथ सत्यम की माँ क सर पे रखते हुए अपनी उँगलियों को उसके बालों में फिरते हुए मुस्कुरा क अपनी बंद आँखों क साथ कहता है

"Aaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh......... बड़ी Maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa............"

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सबसे पहले इतने लम्बे गैप क लिए आप सभी से सॉरी एंड उन सभी दोस्तों का धन्यवाद् जिन्होंने मुझे इन दिनों इतना प्रेम और सहयोग दिया


🙏🙏

अपडेट 18, सन 01 कैसा लगा आप सभी मुझे जरूर बताना



अपडेट 18 में अभी 2 और सन आने बाकी है.. आशा है वो भी आपको ऐसे hi पसंद आएंगे
 
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Page No. 316-317

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प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 📃 316-317

अपडेट #18


सन 🖼️ #02

सुंदरपुर गाओं की ठण्ड वैसे भी और दूसरी जगहों क मुकाबले कुछ ज्यादा hi है, सायद उसकी वजह इस गाओं की इस्तिथि है जो जहा एक और घने जंगल से कैद है तोह दूसरी और सप्रा जैसी विशाल नदी लहराती हुई बहती रहती है..

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उसपे गाओं क अंतिम चोर पे मौजूद विशाल पर्वत इस गाओं को बाकि हर दूसरे गाओं से कही ज्यादा खूबसूरती प्रदान करते है

चारो और हरियाली और जगह जगह छोटे बड़े तालाब इस गाओं की सुंदरता को कई गुना बड़ा देते है.. उसपे जहा तक देखो बस हरियाली से भरे लहराते हुए खेत आँखों को अलग hi ठंडक और सुकून देते है

कहते है जहा अंधकार होगा वह उसके विपरीत रौशनी भी होगी.. यानि आप और हम कह सकते है की बिना पाप क पुण्य की परिकल्पना करना भी संभव नहीं है, और सुंदरपुर गाओं भी इस पाप पुण्य.. सच झूट.. लालच और हवस से बचा हुआ नहीं है

बल्कि इस गाओं में ये सब कुछ ज्यादा hi है.. कही किसी घर में एक माँ अपने जवान बेटे का लुंड चूस क उसे शांति दे देती है तोह कभी बारिश में भीगी एक खूबसूरत चची अपने जवान भतीजे को अपना जिस्म सौप देती है और रिश्तों क बीच कामुकता की चासनी घोल लेती है

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कही एक माँ सुबह की पहली किरण क साथ अपने जवान बेटे क मोठे भीमकाय लुंड पे बैठना पसंद करती है तोह कभी वो घर क किसी शांत कमरे में अपनी देवरानी क जवान बेटे का लुंड और उसके मोठे मोठे ाँद चूस क नए दिन की घोसना भी करती है

कुछ ऐसा hi है मेरा ये अनोखा गाओं सुंदरपुर

सुबह क करीब 6 बजे...

सुंदरपुर गाओं में सुबह की ये गुलाबी ठण्ड एक अलग hi माहौल को उत्पन्न कर रही थी, यानि रस्ते पुरे तरह शांत और सुनसान था और दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा था.. वैसे आप देखने भी चाहते तोह देख नहीं पाते ककी पुरे वातावरण में कोहरे की एक घनी परत चाय हुई थी

गाओं क एकलौते स्टेशन क पास एक छोटी सी झोपडी और उसी क पास उस विशाल और पुराने पेड क नीचे आग की हलकी रौशनी नज़र आ रही थी जो उस घने कोहरे को चीरने की कोशिश कर रही थी पर उसमे पूरी तरह नाकाम हो रही थी, आज गर्मी भी ठण्ड से हार रही थी.. पर हर जगह नहीं

झोपडी क चारो और जहा तक नज़र जा रही थी वह सिर्फ घाना कोहरा hi नज़र आ रहा था, मानो कोई चोर पुलिस का खेल खेला जा रहा हो.. सुबह की ठंडी हवा में हड्डिया कंपकपा देने की ताक़त थी तोह सुबह का ये सन्नाटा अलग hi रहस्य बना रहा था

ऐसे में इतनी सुबह सुबह उस छोटी और गन्दी सी झोपडी क बहार जलती वो लकडिया आनंद का एकलौता साधन थी, और उन dhire-dhire जलती लकड़ियों की रौशनी और उसकी गर्मी क ठीक सामने बैठा हुआ था.. जग्गू

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आग की वो लपटे सुबह की ठंडी हवा में लहरा रही थी और ठीक उसी प्रकार जग्गू क मन में भी अलग अलग विचार हिलोरे मार रहे थे मानो वो किसी एक निष्कर्ष तक पहुंचने क लिए मारा जा रहा हो, वैसे जग्गू का आचरण अगर आपको याद नहीं तोह बता दू की ये जलती हुई लकडिया भी उसने कल रात दारु के ठेके से आते हुए किसी के घर के पास से चोरी छुपे उठा ली थी.. यानि जग्गू प्रवृति से एक चोर है

और इस समय उन्ही चोरी की हुई लकड़ियों की लपटे उसके सरीर को रोशन कर रही थी.. दारू पीना, चोरी करना और जब कुछ ज्यादा पैसे चोरी करने में कामयाबी मिल जाये तोह पड़ोस क गाओं सूरजमुखी में जेक वह किसी सबसे सस्ती रंडी को छोड़ लेना.. यही है जग्गू का जीवन

वैसे तोह उसके जीवन में कोई लाक्षा नहीं है, और अगर कुछ है तोह सिर्फ एक.. मालती

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कहने को सुबह हुई थी पर इस समय भी जग्गू उस आग के पास बैठा हुआ अपने एक हाथ में कच्चे दारू की बोतल थामे हुए था.. उसके पुरे जिस्म पे मिटटी लगी हुई थी जो कल दारू क नसे में ठेके से आते हुए गिरने क कारन लगी थी और वो उसी प्रकार आके सो भी गया था

वैसे तोह उसके सरीर से ऐसी बदबू आ रही थी की अगर कोई उसके अस्स पास से भी गुजर जाये तोह सांस लेने की गलती न करे पर उसे इन सब की परवा नहीं थी.. उसे तोह ये भी याद नहीं की वो आखिरी बार नहाया कब था

करीब 42 साल का जग्गू ज्यादातर रात क अँधेरे में hi बहार निकलता था और बाकि का पूरा दिन ऐसी झोपडी में पड़े पड़े गुजर देता था, उसके सर क ज्यादातर बाल सफ़ेद हो चुके थे.. और उसके सीने के बाल भी सफ़ेद होने सुरु हो गए थे जो उसकी पुराणी फटी हुई बनिया से झांक रहे थे

उसके चेहरे पे एक गन्दी सफ़ेद होती हुई हलकी दादी भी थी जो उसके घिनोने रूप को और निखार रही थी.. कुलमिलाकर जग्गू ऐसा इंसान था जिसे देखकर कोई भी अछि औरत अपना मुंह बना लेती और नाक बंद कर लेती

पर ऐसा इन्शान अक्सर अकेले में अपना मोटा लुंड हाथ में थाम क मालती क नाम की माला झपटा है

जग्गू की आँखें दारू क हलके सुरूर से चढ़ने लगी और उस आग की रौशनी में किसी सैतान जैसे चमक रही थी, तभी वो उस कच्ची दारू का एक बड़ा सा घूंट भरता है और अपना चेहरा घुमा क अपनी झोपडी क खुले दरवाजे की और देखता है जहा मालती क हाथों घायल जब्बार गहरी नींद में सो रहा था.. इस समय जब्बार का जिस्म एक पुराने कम्बल में लिप्त हुआ था

उसकी हलकी सांसें उस झोपडी में धीरे धीरे गूंज रही थी, और उसका एक हाथ उस गंदे से कम्बल से बहार निकला हुआ था.. जग्गू वापस से दारु का एक और घूंट भरते हुए जब्बार को देखता है और मन में सोचने लगता है

"खूबसूरत मालती को पाने का यही एक तरीका हो सकता है... पर मुझे बहुत सोच समझ के आगे बढ़ना होगा"

उसके मन की आवाज़ कब उसके काले होंठों तक आ गयी थी वो भी नहीं जनता था, पर आवाज़ इतनी धीमी थी की उसके बगल भी अगर कोई बैठा होता तोह सुन नहीं पाटा

यु समझो इस समय वो खुद से बातें करने लगा था.. और उसकी आँखों में एक गंदे सद्यन्त्र का ताना बाना बुनने लगा था

"अगर मेरे इन इरादों की ज़रा सी भी भनक इस हरामी जब्बार को मिल गयी तोह मेरे लिए ाचा नहीं होगा.. यह साला मुझसे बहुत तगड़ा है और शारीरिक ताकत में मैं इससे कभी जीत नहीं पाउँगा

इसलिए जो भी करना है.. बहुत सोच समझ क करना होगा"

जग्गू ने एक लम्बी सी सांस भरी और अपनी आँखें बंद कर ली.. मानो जैसे अपने मन क अँधेरे में कोई रास्ता ढूंढ रहा हो, आग की उन लपटों की वो रोहसनि उसके गंदे चेहरे पे जब पड़ती तोह उसका चेहरा ऐसे चमकने लगता जैसे कोई कुत्ता काटने की तैयारी में हो

जग्गू ने उस बोतल में बची हुई दारू भी एक hi घूंट में अपने अंदर भर ले और उस खली बोतल को उस घने कोहरे की दिवार की और उछाल दिया.. और तभी सुबह का सन्नाटा और उस घने कोहरे को चीरती हुई एक आकृति उभरनी सुरु हो जाती है, जब्बार तोह हैरानी से बस उसी और देखने लगा था उसकी आँखें खुद hi पूरी खुल गयी और मुंह भी धीरे धीरे खुलने लगा था

ककी उसकी आँखों के सामने कोहरे क बीच उभरने वाली वो आकर्ति और कोई नहीं अपितु मालती थी

मालती.. उसकी सपनों की वो औरत जिसके सपने वो अक्सर अपना लुंड हिलाते हुए देखता है, जब्बार का मुंह पूरी तरह खुल चूका था और मानो जैसे वो ये भी भूल गया था की उसे सांस लेनी है, ककी सामने का दृश्य था hi ऐसा

ककी इस समय मालती उसके सामने पूरी तरह निवस्त्र कड़ी थी, सरीर पे कपडे तोह दूर धागे का एक कटरा भी नहीं थी.. संपूर्ण रूप से नंगी थी वो

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उसका गोरा जिस्म सुबह क घने कोहरे क बीच एक अलग सी गर्मी उत्पन्न कर रहा था जिससे ऐसा लग रहा था मानो उस घने कोहरे की परत धीरे धीरे ख़तम होनी सुरु हो चुकी हो.. वही उस आग की लपटों की रौशनी में उसकी बड़ी बड़ी कासी मोती और गोल चूचिया ऐसे चमक रही थी मानो वो जग्गू को बुलावा दे रही हो

मालती धीरे से जग्गू को देखती है और मुस्कुरा उठी है.. बेचारे जग्गू का लुंड तोह उसकी गन्दी लुंगी में किसी विशाल बांस जैसे खड़ा हो चूका था, और तभी मालती उसकी आँखों में देखते हुए धीरे से घूम जाती है जिससे एक पल क लिए जग्गू को उस खूबसूरत बाला की गांड क दर्शन भी अचे से हो जाते है

जग्गू की आँखें पूरी की पूरी फ़ैल गयी थी ककी सामने का दृस्य hi ऐसा था.. मालती की मचलती और मटकती बड़ी सी गोल गांड और उसके गोर गोर चूतड़ क छोटे छोटे पहाड़ जग्गू को उसका और दीवाना बना रहे था.. जग्गू से रहा नहीं जाता और वो अपनी जगह से उठ खड़ा होता है

"मालती.............."

उसके मुख से ये सब्द निकल hi पड़ते है

मालती वापस उसकी और मुड़ती है और उसके गले से उसकी सुरीली आवाज़ निकलती है

"कैसे मर्द हो.. मुझे पाने की कोई कोशिश hi नहीं कर रहे हो ?"

जग्गू को अपने कानो पे यकीन hi नहीं होता.. कही वो जागते हुए सपना तोह नहीं देख रहा है, पर तभी मालती उसकी और देखते हुए फिर से कहती है

"देखो जग्गू.. मेरा ये सरीर तुम्हे बुला रहा है, इसकी गर्मी सिर्फ तुम शांत कर सकते हो

बोलो.. करोगे न मेरे जिस्म को ठंडा ?"

"है.. है में करूँगा.. मैं.. अरे रुको.. रुको"

जग्गू जैसे hi अपने दिल की बात कहता है उसके सपनो की हसीं औरत मालती धीरे धीरे अपने पेअर पीछे लेने लगती है और देखते देखते hi वो उस घने कोहरे में कही खोने लगती है

जग्गू बिना समय व्यर्थ किये उसकी और दौड़ पड़ता है, पर ये किया वह तोह सिर्फ वो घाना कोहरा था.. न मालती न उसका वो नंगा सरीर

"अरे अभी तोह यही थी... बहनचोद, लगता है दारू ज्यादा hi चढ़ गयी है"

जग्गू अपने सर पे अपना हाथ रखते हुए निराशा से भर पड़ा था और वो अपने सुस्त पैरों क साथ वापस अपनी झोपडी की और बाद चलता है, पर उसे नहीं पता था की वही एक पेड क पीछे कोई निवस्त्र औरत कड़ी है पर उसका सरीर गोरा नहीं अपितु सलोना और सावला है और इस समय उसके अधरों पे एक मुकसान खेल रही थी

"अब ऐसी औरत क मोह में तू मेरे लिए एक आत्मा का प्रबंध करेगा.. मेरे भोजन का प्रबंध करेगा"

जब वो औरत ये बोल रही थी तोह धीरे धीरे उसके सरीर पे एक साड़ी आने लगी थी और पूरा सरीर खुद hi सजने लगा था और जल्दी hi वो पूरी तरह एक सलोनी पर बेहद कामुक स्त्री बन चुकी थी

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"तुम इंसानो की यही काम ीचा मेरा सबसे बड़ा हतियार है, ये सर्प अपना भोजन और अपना कार्य करवाना जानती है.."

जी है ये और कोई नहीं अपितु सर्प है.. वही जिसके हाथों से मोनू नाम का भोजन उसके पिता कुंदन ने चीन लिया था

[Agar wo Update nahi pada toh aap yaha se pad sakte hai 👇

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Edhar Jaggu puri tarah mayushi ki halat mein wapas se usi aag k pass aage baith chuka tha aur ab toh uski daru bhi khatam ho gayi thi.. wahi uska nasha toh Maalti k us nange sarir ne utar diya tha

"Yakeen nahi hota ki wo bas ek sapna tha, aisa laga jaise sach mein wo Maalti mujhe bula rahi ho.. ?"

Par tabhi uske mutti khud hi bhichti chali jaati hai aur wo uske chehre pe kathorta nazar aane lagti hai, wo andar Jhopdi mein puri khamoshi se sote hue Jabbar ki aur dekh k dhimi aawaz mein khud se kehta hai

"Maalti ko paane k liye, uski tange failane ke liye main kuch bhi karunga... chahe mujhe is Jabbar ki bali hi kyun na deni pade"

Jaggu k ye sabd waha se dur us paid k peeche khadi Sarpa bhi na jane kaise sun pa rahi thi.. ye sunte hi uske adhron pe muskaan khil uthi thi

"Ye hawas k mare inshan"

Wahi Jaggu k irade ab pakke hote ja rahe thay.. maano jaise uska josh achanak se kai guna bad gaya ho aur uske dimag mein ek sadhyantra ka taana-baana bunne laga tha aur uski aankhen aag ki lau ki tarah chamakne lagi thi

Usne apni dhoti ke upar se apne mote lund ko dabaya, jo Maalti k nange sarir aur Jabbar ke khilaaf sadhyantra k vicharon se aur bhi sakht ho chuka tha

Jaggu ache se janta tha ki Jabbar ke hote hue Maalti k ass pass bhi jana namumkin sa hai, qki uske liye use Maalti ko ye bhi batana hoga ki uske dushman ko chatt dene wala wahi hai.. aur agar kahi Jabbar ko pata chaal ki wo Maalti se milne ki koshish kar raha hai toh wo use bhi haani pahucha sakta hai

Par uska man Maalti ke nange jism k karan itna uttejit ho chuka tha ki wo kisi bhi hadh tak jaane ko taiyaar tha, kal tak jo sirf ek kalpana thi aaj wo use haqiqat banana cha raha tha

"Maalti ko paane k liye ye jabbar khud hi mera rasta ban sakta hai.. par kaise ?"

Jaggu sochte sochte apni aankhon ko ek pal k liye band karta hai toh uske samne Maalti ka wahi kaamuk roop ubhar aata hai.. yani uski wo khubsurat si halke kaale baalon waali bur aur uske wo tane hue kaale jamun saman nipples, ye soch uske lund mein aur jada josh bhar deti hai

aur jaldi hi Jaggu ne apne man mein ek yojana banani shuru kar di thi aur phir uske mukh se wo sabd nikalte hai

"Jabbar mujhpe barosha karta hai, aur main esi baat ka fayda utha sakta hu.. yani phir se wahi hoga jo pehle ho chuka hai

"घर का भेदी लंका ढाये"

अपडेट 18 क फाइनल सन #03 क साथ जल्दी लौटूंगा
 
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