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- Dec 5, 2013
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प्रीवियस अपडेट ों पेज No.
301-302
अपडेट #18
सन
#01
सुबह क करीब 9.50 हो रहे होंगे और बारिश जो थोड़ी दिएर पहले कुछ काम सी हुई थी वो वापस से अपनी रफ़्तार बढ़ाने लगी थी, मानो जैसे आज ये बारिश भी मालती को उस खंडहर से बहार निकलने की इजाजत नहीं देना च रही हो.. सायद ये जिस्म को कंपकपा देने वाली ठंडी बारिश भी अपने तेज़ हवाओं और गरजती बिजली क जरिये किसी प्रकार क कामुक इशारे कर रही थी.. की खेल अभी पूरा नहीं हुआ है
वैसे ऐसी सोच सिर्फ इस कामुक बारिश की hi नहीं अपितु हमारी सविता क जवान बेटे सत्यम की भी थी, ककी उसकी साँसों की रफ़्तार अब धीरे धीरे संतुलित हो चुकी थी और चेहरे पे सुकून भरी पर किसी विजेता जैसी मुस्कान खेल रही थी
मानो जैसे वो मन hi मन अपनी जीत की खुशिया मन रहा हो और जोर से चिल्ला क कहना च रहा हो
'देख मोनू.. मैंने तेरी माँ छोड़ दी'
सत्यम वस मालती
पर सायद सत्यम को ये खेल अभी और खेलना था.. या सायद बार बार खेलना था, वैसे भी मालती ऐसी औरत नहीं जिससे किसी मर्द का एक बार में मन भर जाये
मालती तोह उस सरब जैसी है.. जो जितनी पुराणी होती जाएगी उसका नशा उठना hi बढ़ेगा, और बढ़ता जायेगा
मालती और सत्यम अभी भी उसी चटाई पे आग क पास उसी प्रकार लेते हुए थे और मालती अपनी आँखों को बंद किये हुए हौले हौले साँसे ले रही थी जिससे उसकी कामुक और नंगी बड़ी बड़ी चूचियों में हल्का सा थिरकन नज़र आ रहा था और उसके चेहरे पे इतने समय बाद शारीरिक सुख मिलने की ख़ुशी साफ़ साफ़ देखि जा सकती थी
सत्यम जो इस समय उसके बगल लेता हुआ था वो अपने बगल में मालती जैसी कामुक और नंगी औरत को देख क मानो खुद की किस्मत पे भरोषा hi न कर प् रहा हो
'साला यकीन नहीं होता की मैंने मोनू की माँ छोड़ दी.. इतना मज़ा तोह कभी मुझे नहीं आया
उफ्फ्फ किया कासी हुई छूट है साली थी, ऐसा लग रहा था जैसे मेरे लुंड का पूरा रास निचोड़ दे रही हो.. सायद ये सब मेरी माँ क आशीर्वाद क कारन हुआ होगा'
सत्यम ये सब मन hi मन सोच रहा था, और वो जब अपनी माँ सविता क बारे में सोचता है तोह उसके अधरों पे मुस्कान खेल जाती है और आँखों क आगे वही नज़ारा घूमने लगता है जब सुबह सुबह उसने अपनी सगी माँ को छोड़ा था
सत्यम वस सविता
किस्मत हो तोह हमारे सत्यम जैसी.. सुबह अपनी माँ छोड़ी और अब मोनू की माँ भी
वो खंडहर जो कभी किसी राजा की रखेल का घर हुआ करता था आज वो मालती क जिस्म का रास पीना का ेस्थान बन गया था, वैसे वह का माहौल अब भी कामुक और ठंडा hi था पर आग क पास होने क कारन दोनों को ठण्ड नहीं लग रही थी.. उल्टा जैसे सत्यम का लुंड एक बार फिर से अपना सर उठा रहा है उससे तोह लगता है उसे ठण्ड नहीं अपितु मालती क जिस्म की गर्मी महसूस हो रही हो.. और ऐसा होना स्वाभाविक भी है ककी मालती है hi ऐसी जिसकी गर्मी को सहना सबके बस की बात नहीं
बहार से तेज़ बारिश का आता हुआ स्वर उस कामुक माहौल को और ज्यादा कामुकता से भर रहा था वही खंडहर क जगह जगह टूटे हुए हिस्से से रिस क आता हुआ पानी अपनी मधुर कलकल की आवाज़ से पुरे दृस्य में एक संगीत जैसा भर रहा था.. सामने दिवार पे उकेरी गयी वो पुराणी तस्वीर उस पुरे माहौल में और ज्यादा गर्मी भरने का काम कर रही थी
सत्यम अपना एक हाथ अपने सर क नीचे रखता है और सीढ़ी लेती हुई नंगी कामुक मालती को देखता है जिसकी साँसों क कारन उसकी ुहथ्ती बैठी मोती चूचियों का दृस्य उसे पागल करने लगा था, उसने अभी अभी अपनी पूरी ताक़त से मालती को छोड़ा था पर एक बार फिर से उसका नंगा जिस्म देख क सत्यम का हाल ऐसा हो रहा था जैसे किसी कुंवारे लड़के को पहली बार छूट मिलने वाली हो
बारिश क पानी का तेज़ शोर और कलकल करता हुआ पानी जो खंडहर की टूटी दीवारों से होता हुआ नीचे की और आ रहा था और वो सारा पानी वही खंडहर क बीच में एक छोटे से गड्ढे जो किसी तालाब जैसा प्रतीत हो रहा था उसके जमा हो रहा था.. जिसे देख क ऐसा लग रहा था मानो वो कोई खूबसूरत सा छोटा तालाब हो ककी उसके कमल क खूबसूरत से फूल खिले हुए थे और ऐसे मौसम में हरियाली तोह अपने चरम पे होती hi है
पर महेंद्र का छोटा बीटा सत्यम इस समय उस खंडहर की खूबसूरती नहीं अपितु अपनी भरी हुई गदराई कामुक चची का नंगा जिस्म और उनके जिस्म की कामुकता में खोया हुआ था.. वैसे भी जिसके सामने मालती जैसा यौवन नंगा लेता हो उसे किया hi फर्क पड़ेगा की बाकि दुनिया कितनी खूबसूरत है
वही मालती अपनी आँखों को बंद किये पूर्ण शांति से लेती हुई थी, उसके नंगे जिस्म पे आग की लपटों की रौशनी ऐसे पद रही थी मानो वो भी कह रही हो..
'ऐसे और पियर चाहिए'
चटाई क पास जलती उस आग क कारन वह का ठंडा माहौल पूरी तरह गर्मी से भरा हुआ था, वैसे अगर वह वो आग न भी होती तोह मेरी माँ (मालती) की गर्मी hi काफी थी..
आग की लाल रौशनी पुरे खंडहर में अस्स पास फैली हुई थी और वो खास तस्वीर जिसे देख क मालती क अंदर की कामुकता कई गुना बाद रही थी, वो इस समय कुछ ज्यादा hi साफ़ नज़र आ रही थी.. यानि वही तस्वीर जिसमे 2 मर्द मिलकर एक साथ किसी स्त्री को आगे पीछे से भोग रहे थे
आग की लाल लपटों क बीच वो तस्वीर ऐसे नज़र आ रही थी मानो आने वाले भविस्य की कल्पना कर रही हो
अगर इस समय सत्यम क सब्दो में लिखू तोह वो बंद आँखों वाली खूबसूरत मालती को ऐसे देख रहा था मानो उसका यौवन उसे वापस से आमंत्रण दे रहा हो.. मोनू की खूबसूरत माँ का दूध जैसा गोरा नंगा जिस्म जो न जाने कितने hi मर्दो का सपना है आज उसे मिल चूका था, जिसका उसका भरपूर सेवन और रसपान भी किया था
सत्यम धीरे से अपने कंधे क नीचे एक हाथ लगाए हुए हल्का ऊपर को उठा हुआ अपना दूसरा हाथ खूबसूरत और अपनी आँखों को बंद करके लेती हुई मालती क खूबसूरत और कासी पर बड़ी चुकी क काले जामुन जैसे निप्पल्स पे रखके उसपे पियर से अपनी ऊँगली फिरने लगता है.. उसका ये संवेदनशील स्पर्श मालती क जिस्म में कामुकता की नयी ऊर्जा का आवाहन करने लगता है और अपनी आँखों को बंद करके लेती हुई मालती क खूबसूरत लाल होंठों पे कामुकता और लज्जा की लालिमा खेल जाती है
पर वो कुछ बोलती है, अपितु अपनी आँखों को वैसे hi बंद किये हुए धीरे से मुस्कुराती रहती है.. मानो जैसे कोई मौन सहमति दे रही थी, पर सत्यम उसकी बढ़ती हुई गर्मी में अचानक रुकावट सी पैदा कर देता है और मालती की जामुन जैसे काले निप्पल्स से अपनी ऊँगली हटा लेता है जिससे मालती का पूरा जिस्म तड़प सा उठता है पर वो कुछ कहती है
उसकी जिस्म में एक बार फिर से कामुकता का ये प्रवाह कही न कही उसे अंदर तक विचलित भी कर रहा था और वो अपनी आँखों को बंद किये हुए खुद से hi कहती है
'ये मुझे किया होता जा रहा है.. ये जवान लड़का जो मेरे बेटे क सामान है आज मैंने उसे अपना सब कुछ सौप दिया.. और यहाँ तक भविस्य में भी उसे उसकी मर्ज़ी से सब कुछ करने का हक़ दे दिया
मैं ऐसा कैसे कर सकती हु.. और सबसे बड़ी बात, ऐसी बेरहम चुदाई क बाद भी मेरी योनि एक बार फिर से कुछ हलचल पैदा कर रही है, किया ऐसा सत्यम क इस नाजुक स्पर्श क कारन हुआ.. ?'
पर मालती क पास इसका कोई जवाब नहीं था, ककी इसका जवाब तोह बांकेलाल द्वारा बनाई गयी उस अधूरी jadi-buti में था.. जिसका ज्ञान तक मालती को नहीं था
आशा है आप सभी को वो सब कुछ याद होगा और अगर भूल गए है तोह कृपया एक बार ये अपडेट जरूर पड़े
'मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #01 Complete'
[ Part #01, Update Update #49 ]
Satyam ek baar phir se sirf Maalti ko niharne ka karya karne lagta hai.. qki nangi laiti hui Maalti behad khubsurat aur had se jada kamuk lag rahi thi, jiski badi badi rasili chuchiya aag ki roshni mein aise chamak rahi thi maano kamukta ki koi sampurn murti ho.. wahi uske kaale kaale nipples toh aise pratit ho rahe tha jinhe bas munh mein bhar k unka raspaan kiya jana chahiye, maano jaise wo usi k liye bane ho
Paseene ki nanhi nanhi bunde uske nange jism pe itni khubsurat aur kamuk lag rahi thi ki mere pass likhne k liye sabdo ki kami hai, wahi wo paseene ki bunde ye bhi bata rahi thi ki Maalti k uper aaj kitni jada mehnat hui hai
Hamari khubsurat kamuk Maalti ki aankhen jarur band thi par usak jism jism abhi bhi haule haule hil raha tha aur uski tez chalti saanson k karan uski uthti baithi badi badi chuchiyon ki baat ki kuch aur thi
Satyam ki ghumti hui nazren jab Maalti ki tango k beech pahuchti hai toh uske adhron pe muskaan khel jaati hai qki waha se abhi bhi uska gaada ras bahar beh hi raha tha.. theek khandhar ki un tuti hui diwaron k beeche us thande paani jaise, par ye wala Paani gaada aur garam tha
मालती को भी जैसे पता चल रहा था की उसके जवान भतीजे की नज़रें कहा घूम रही हो.. ककी वो न च की अपनी पैरों को आपस में ऐसे जोड़ लेती है मानो अपनी कामुकता को छुपाने की कोशिश सी कर रही हो, पर सत्यम ये नज़ारा देखना च रहा था इसलिए वो अपना हाथ धीरे से मालती की नंगी और खूबसूरत दूध जैसी नंगी जांघ पे रखते हुए धीरे से अपना हाथ नीचे फिसला देता है जिससे मालती क जिस्म में एक बार फिर से ये बढ़ती हुई आग उसका वजूद हिलने लगती है और वो न च क भी अपने पैरों को पूरा खोल देती है और उसकी एक दबी हुई कामुक सिसकारी भी साथ hi साथ फुट पड़ी थी
"Essshhhhhhhhhhhhhhhhhhhh..."
सत्यम का मोटा काला भीमकाय लुंड जो अब भी थोड़ा सख्त hi था और उसपे मोनू की माँ की छूट का रास अब भी लगा हुआ था और उस कारन उसका लुंड आग की उस रौशनी में कुछ ज्यादा hi चमक सा रहा था.. उसके लुंड में में एक नया जोश भरने लगा था ककी नज़ारा hi ऐसा था यानि आप समाज hi गए होंगे की मालती की टंगे फिर से खुल चुकी थी
सत्यम से रहा नहीं जाता इसलिए वो धीरे से मालती क ऊपर झुकता है और उसके एक निप्पल्स को अपने मुंह में भर लेता है जिससे मालती क पुरे सरीर में कामुकता की गरम लहर सी दौड़ जाती है
"Aaahhhhhhhhhhhhhhhh..................."
पर मालती अपनी आँखों को नहीं खोलती बस वैसे hi अपनी आँखें बंद किये हुए लेती रहती है.. मानो उस खेल में उसे मज़ा आ रहा था, जैसे कोई चोर पुलिस का खेल खेला जा रहा हो
सत्यम, मालती क काले निप्पल्स में अपने होंठों क बीच लेके धीरे से चूस लेता है
"ummmmmmmmmmmmmm............ ummmmmmmmmmmmm.... sssllllllummmmmmmmmmpppp..."
मालती बुरी तरह कामुकता की आग में जल उठती है पर फिर भी वो अपनी आँखें नहीं खोलती है.. ये खेल और ज्यादा कामुक होता जा रहा था और सत्यम ये खेल अचे से खेलना जनता था, सायद उसकी माँ सविता ने उसे अछि तरह से इस खेल में निपूर्ण किया है
सत्यम धीरे से मालती क काले निप्पल्स को होंठों से चूसने क बाद उसे अपने दाँतों क बीच लेके ऐसे काट लेता है मानो सच में जामुन का स्वाद चखना च रहा हो
पर उसकी इस हरकत की वजह से मालती बुरी तरह मचल पड़ी थी.. पर बताने की जरुरत तोह है नहीं की उसने अब भी अपनी आँखें नहीं खोली
"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhh........... Essshhhhhhhhhhhhhhhhhh"
सत्यम पुरे निप्पल को अपने मुंह में भर क जोर से चूस लेता है
"Sllllluuuuuuuuuuuurrrrrrrrrrpppppppp......... Ummmmmmmmmmmmm.... स्सल्ल्ल्ल्लूऊऊऊप्प्प्पप्प"
मालती बुरी तरह कामुकता से काँप उठती है उसका पूरा सरीर कामुकता की लहर से हिल उठता है.. पर ऐसी पल सत्यम मुस्कुराते हुए अपने होंठों और अपने दाँतों क बीच चूसे जा रहे मोनू की माँ क उस काले निप्पल्स को चोर देता है.. बेचारी मालती सिर्फ अपने होंठों को काट क रह जाती है ककी इतना सब होने क बाद भी उसकी लज्जा उसे आगे बढ़ने से रोक रही थी पर आखिर कब तक
ककी मालती की आग तोह हम सब जान hi चुके है, की जब वो गरम होती है तोह सही गलत कहा देखती है वो.. पर इसमें गलती किसकी है
सत्यम अपनी खूबसूरत चची क निप्पल्स से अपना मुंह हटा क पहले जैसे उसे निहारने लगता है जहा अब कुंदन की पत्नी का वो काला जामुन जैसा निप्पल्स उसके थूक से सना हुआ उस आग की लाल रौशनी में चमक रहा था
सत्यम को तोह जैसे अपनी किस्मत पे अब भी यकीन नहीं हो प् रहा था, वो धीरे से अपने लुंड पे अपना हाथ फिरता है और मुस्कुरा क कहता है
"यकीन नहीं होता.."
मालती धीरे से शर्म से लाल हुई इस बार अपनी आँखों को खोलती है और उसे देखती है और मुस्कुरा क कहती है
"किया.. ?"
मालती की तेज़ी से चलती हुई साँसे बता रही थी की उसके जिस्म की अग्नि पूरी तरह भड़क चुकी है, जो कब जवालामुखी जैसे पहात जाये वो भी नहीं जानती
कंटिन्यू...
अपडेट #18
सन
सुबह क करीब 9.50 हो रहे होंगे और बारिश जो थोड़ी दिएर पहले कुछ काम सी हुई थी वो वापस से अपनी रफ़्तार बढ़ाने लगी थी, मानो जैसे आज ये बारिश भी मालती को उस खंडहर से बहार निकलने की इजाजत नहीं देना च रही हो.. सायद ये जिस्म को कंपकपा देने वाली ठंडी बारिश भी अपने तेज़ हवाओं और गरजती बिजली क जरिये किसी प्रकार क कामुक इशारे कर रही थी.. की खेल अभी पूरा नहीं हुआ है
वैसे ऐसी सोच सिर्फ इस कामुक बारिश की hi नहीं अपितु हमारी सविता क जवान बेटे सत्यम की भी थी, ककी उसकी साँसों की रफ़्तार अब धीरे धीरे संतुलित हो चुकी थी और चेहरे पे सुकून भरी पर किसी विजेता जैसी मुस्कान खेल रही थी
मानो जैसे वो मन hi मन अपनी जीत की खुशिया मन रहा हो और जोर से चिल्ला क कहना च रहा हो
'देख मोनू.. मैंने तेरी माँ छोड़ दी'
सत्यम वस मालती
पर सायद सत्यम को ये खेल अभी और खेलना था.. या सायद बार बार खेलना था, वैसे भी मालती ऐसी औरत नहीं जिससे किसी मर्द का एक बार में मन भर जाये
मालती तोह उस सरब जैसी है.. जो जितनी पुराणी होती जाएगी उसका नशा उठना hi बढ़ेगा, और बढ़ता जायेगा
मालती और सत्यम अभी भी उसी चटाई पे आग क पास उसी प्रकार लेते हुए थे और मालती अपनी आँखों को बंद किये हुए हौले हौले साँसे ले रही थी जिससे उसकी कामुक और नंगी बड़ी बड़ी चूचियों में हल्का सा थिरकन नज़र आ रहा था और उसके चेहरे पे इतने समय बाद शारीरिक सुख मिलने की ख़ुशी साफ़ साफ़ देखि जा सकती थी
सत्यम जो इस समय उसके बगल लेता हुआ था वो अपने बगल में मालती जैसी कामुक और नंगी औरत को देख क मानो खुद की किस्मत पे भरोषा hi न कर प् रहा हो
'साला यकीन नहीं होता की मैंने मोनू की माँ छोड़ दी.. इतना मज़ा तोह कभी मुझे नहीं आया
उफ्फ्फ किया कासी हुई छूट है साली थी, ऐसा लग रहा था जैसे मेरे लुंड का पूरा रास निचोड़ दे रही हो.. सायद ये सब मेरी माँ क आशीर्वाद क कारन हुआ होगा'
सत्यम ये सब मन hi मन सोच रहा था, और वो जब अपनी माँ सविता क बारे में सोचता है तोह उसके अधरों पे मुस्कान खेल जाती है और आँखों क आगे वही नज़ारा घूमने लगता है जब सुबह सुबह उसने अपनी सगी माँ को छोड़ा था
सत्यम वस सविता
किस्मत हो तोह हमारे सत्यम जैसी.. सुबह अपनी माँ छोड़ी और अब मोनू की माँ भी
वो खंडहर जो कभी किसी राजा की रखेल का घर हुआ करता था आज वो मालती क जिस्म का रास पीना का ेस्थान बन गया था, वैसे वह का माहौल अब भी कामुक और ठंडा hi था पर आग क पास होने क कारन दोनों को ठण्ड नहीं लग रही थी.. उल्टा जैसे सत्यम का लुंड एक बार फिर से अपना सर उठा रहा है उससे तोह लगता है उसे ठण्ड नहीं अपितु मालती क जिस्म की गर्मी महसूस हो रही हो.. और ऐसा होना स्वाभाविक भी है ककी मालती है hi ऐसी जिसकी गर्मी को सहना सबके बस की बात नहीं
बहार से तेज़ बारिश का आता हुआ स्वर उस कामुक माहौल को और ज्यादा कामुकता से भर रहा था वही खंडहर क जगह जगह टूटे हुए हिस्से से रिस क आता हुआ पानी अपनी मधुर कलकल की आवाज़ से पुरे दृस्य में एक संगीत जैसा भर रहा था.. सामने दिवार पे उकेरी गयी वो पुराणी तस्वीर उस पुरे माहौल में और ज्यादा गर्मी भरने का काम कर रही थी
सत्यम अपना एक हाथ अपने सर क नीचे रखता है और सीढ़ी लेती हुई नंगी कामुक मालती को देखता है जिसकी साँसों क कारन उसकी ुहथ्ती बैठी मोती चूचियों का दृस्य उसे पागल करने लगा था, उसने अभी अभी अपनी पूरी ताक़त से मालती को छोड़ा था पर एक बार फिर से उसका नंगा जिस्म देख क सत्यम का हाल ऐसा हो रहा था जैसे किसी कुंवारे लड़के को पहली बार छूट मिलने वाली हो
बारिश क पानी का तेज़ शोर और कलकल करता हुआ पानी जो खंडहर की टूटी दीवारों से होता हुआ नीचे की और आ रहा था और वो सारा पानी वही खंडहर क बीच में एक छोटे से गड्ढे जो किसी तालाब जैसा प्रतीत हो रहा था उसके जमा हो रहा था.. जिसे देख क ऐसा लग रहा था मानो वो कोई खूबसूरत सा छोटा तालाब हो ककी उसके कमल क खूबसूरत से फूल खिले हुए थे और ऐसे मौसम में हरियाली तोह अपने चरम पे होती hi है
पर महेंद्र का छोटा बीटा सत्यम इस समय उस खंडहर की खूबसूरती नहीं अपितु अपनी भरी हुई गदराई कामुक चची का नंगा जिस्म और उनके जिस्म की कामुकता में खोया हुआ था.. वैसे भी जिसके सामने मालती जैसा यौवन नंगा लेता हो उसे किया hi फर्क पड़ेगा की बाकि दुनिया कितनी खूबसूरत है
वही मालती अपनी आँखों को बंद किये पूर्ण शांति से लेती हुई थी, उसके नंगे जिस्म पे आग की लपटों की रौशनी ऐसे पद रही थी मानो वो भी कह रही हो..
'ऐसे और पियर चाहिए'
चटाई क पास जलती उस आग क कारन वह का ठंडा माहौल पूरी तरह गर्मी से भरा हुआ था, वैसे अगर वह वो आग न भी होती तोह मेरी माँ (मालती) की गर्मी hi काफी थी..
आग की लाल रौशनी पुरे खंडहर में अस्स पास फैली हुई थी और वो खास तस्वीर जिसे देख क मालती क अंदर की कामुकता कई गुना बाद रही थी, वो इस समय कुछ ज्यादा hi साफ़ नज़र आ रही थी.. यानि वही तस्वीर जिसमे 2 मर्द मिलकर एक साथ किसी स्त्री को आगे पीछे से भोग रहे थे
आग की लाल लपटों क बीच वो तस्वीर ऐसे नज़र आ रही थी मानो आने वाले भविस्य की कल्पना कर रही हो
अगर इस समय सत्यम क सब्दो में लिखू तोह वो बंद आँखों वाली खूबसूरत मालती को ऐसे देख रहा था मानो उसका यौवन उसे वापस से आमंत्रण दे रहा हो.. मोनू की खूबसूरत माँ का दूध जैसा गोरा नंगा जिस्म जो न जाने कितने hi मर्दो का सपना है आज उसे मिल चूका था, जिसका उसका भरपूर सेवन और रसपान भी किया था
सत्यम धीरे से अपने कंधे क नीचे एक हाथ लगाए हुए हल्का ऊपर को उठा हुआ अपना दूसरा हाथ खूबसूरत और अपनी आँखों को बंद करके लेती हुई मालती क खूबसूरत और कासी पर बड़ी चुकी क काले जामुन जैसे निप्पल्स पे रखके उसपे पियर से अपनी ऊँगली फिरने लगता है.. उसका ये संवेदनशील स्पर्श मालती क जिस्म में कामुकता की नयी ऊर्जा का आवाहन करने लगता है और अपनी आँखों को बंद करके लेती हुई मालती क खूबसूरत लाल होंठों पे कामुकता और लज्जा की लालिमा खेल जाती है
पर वो कुछ बोलती है, अपितु अपनी आँखों को वैसे hi बंद किये हुए धीरे से मुस्कुराती रहती है.. मानो जैसे कोई मौन सहमति दे रही थी, पर सत्यम उसकी बढ़ती हुई गर्मी में अचानक रुकावट सी पैदा कर देता है और मालती की जामुन जैसे काले निप्पल्स से अपनी ऊँगली हटा लेता है जिससे मालती का पूरा जिस्म तड़प सा उठता है पर वो कुछ कहती है
उसकी जिस्म में एक बार फिर से कामुकता का ये प्रवाह कही न कही उसे अंदर तक विचलित भी कर रहा था और वो अपनी आँखों को बंद किये हुए खुद से hi कहती है
'ये मुझे किया होता जा रहा है.. ये जवान लड़का जो मेरे बेटे क सामान है आज मैंने उसे अपना सब कुछ सौप दिया.. और यहाँ तक भविस्य में भी उसे उसकी मर्ज़ी से सब कुछ करने का हक़ दे दिया
मैं ऐसा कैसे कर सकती हु.. और सबसे बड़ी बात, ऐसी बेरहम चुदाई क बाद भी मेरी योनि एक बार फिर से कुछ हलचल पैदा कर रही है, किया ऐसा सत्यम क इस नाजुक स्पर्श क कारन हुआ.. ?'
पर मालती क पास इसका कोई जवाब नहीं था, ककी इसका जवाब तोह बांकेलाल द्वारा बनाई गयी उस अधूरी jadi-buti में था.. जिसका ज्ञान तक मालती को नहीं था
आशा है आप सभी को वो सब कुछ याद होगा और अगर भूल गए है तोह कृपया एक बार ये अपडेट जरूर पड़े
'मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #01 Complete'
[ Part #01, Update Update #49 ]
Satyam ek baar phir se sirf Maalti ko niharne ka karya karne lagta hai.. qki nangi laiti hui Maalti behad khubsurat aur had se jada kamuk lag rahi thi, jiski badi badi rasili chuchiya aag ki roshni mein aise chamak rahi thi maano kamukta ki koi sampurn murti ho.. wahi uske kaale kaale nipples toh aise pratit ho rahe tha jinhe bas munh mein bhar k unka raspaan kiya jana chahiye, maano jaise wo usi k liye bane ho
Paseene ki nanhi nanhi bunde uske nange jism pe itni khubsurat aur kamuk lag rahi thi ki mere pass likhne k liye sabdo ki kami hai, wahi wo paseene ki bunde ye bhi bata rahi thi ki Maalti k uper aaj kitni jada mehnat hui hai
Hamari khubsurat kamuk Maalti ki aankhen jarur band thi par usak jism jism abhi bhi haule haule hil raha tha aur uski tez chalti saanson k karan uski uthti baithi badi badi chuchiyon ki baat ki kuch aur thi
Satyam ki ghumti hui nazren jab Maalti ki tango k beech pahuchti hai toh uske adhron pe muskaan khel jaati hai qki waha se abhi bhi uska gaada ras bahar beh hi raha tha.. theek khandhar ki un tuti hui diwaron k beeche us thande paani jaise, par ye wala Paani gaada aur garam tha
मालती को भी जैसे पता चल रहा था की उसके जवान भतीजे की नज़रें कहा घूम रही हो.. ककी वो न च की अपनी पैरों को आपस में ऐसे जोड़ लेती है मानो अपनी कामुकता को छुपाने की कोशिश सी कर रही हो, पर सत्यम ये नज़ारा देखना च रहा था इसलिए वो अपना हाथ धीरे से मालती की नंगी और खूबसूरत दूध जैसी नंगी जांघ पे रखते हुए धीरे से अपना हाथ नीचे फिसला देता है जिससे मालती क जिस्म में एक बार फिर से ये बढ़ती हुई आग उसका वजूद हिलने लगती है और वो न च क भी अपने पैरों को पूरा खोल देती है और उसकी एक दबी हुई कामुक सिसकारी भी साथ hi साथ फुट पड़ी थी
"Essshhhhhhhhhhhhhhhhhhhh..."
सत्यम का मोटा काला भीमकाय लुंड जो अब भी थोड़ा सख्त hi था और उसपे मोनू की माँ की छूट का रास अब भी लगा हुआ था और उस कारन उसका लुंड आग की उस रौशनी में कुछ ज्यादा hi चमक सा रहा था.. उसके लुंड में में एक नया जोश भरने लगा था ककी नज़ारा hi ऐसा था यानि आप समाज hi गए होंगे की मालती की टंगे फिर से खुल चुकी थी
सत्यम से रहा नहीं जाता इसलिए वो धीरे से मालती क ऊपर झुकता है और उसके एक निप्पल्स को अपने मुंह में भर लेता है जिससे मालती क पुरे सरीर में कामुकता की गरम लहर सी दौड़ जाती है
"Aaahhhhhhhhhhhhhhhh..................."
पर मालती अपनी आँखों को नहीं खोलती बस वैसे hi अपनी आँखें बंद किये हुए लेती रहती है.. मानो उस खेल में उसे मज़ा आ रहा था, जैसे कोई चोर पुलिस का खेल खेला जा रहा हो
सत्यम, मालती क काले निप्पल्स में अपने होंठों क बीच लेके धीरे से चूस लेता है
"ummmmmmmmmmmmmm............ ummmmmmmmmmmmm.... sssllllllummmmmmmmmmpppp..."
मालती बुरी तरह कामुकता की आग में जल उठती है पर फिर भी वो अपनी आँखें नहीं खोलती है.. ये खेल और ज्यादा कामुक होता जा रहा था और सत्यम ये खेल अचे से खेलना जनता था, सायद उसकी माँ सविता ने उसे अछि तरह से इस खेल में निपूर्ण किया है
सत्यम धीरे से मालती क काले निप्पल्स को होंठों से चूसने क बाद उसे अपने दाँतों क बीच लेके ऐसे काट लेता है मानो सच में जामुन का स्वाद चखना च रहा हो
पर उसकी इस हरकत की वजह से मालती बुरी तरह मचल पड़ी थी.. पर बताने की जरुरत तोह है नहीं की उसने अब भी अपनी आँखें नहीं खोली
"Aaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhh........... Essshhhhhhhhhhhhhhhhhh"
सत्यम पुरे निप्पल को अपने मुंह में भर क जोर से चूस लेता है
"Sllllluuuuuuuuuuuurrrrrrrrrrpppppppp......... Ummmmmmmmmmmmm.... स्सल्ल्ल्ल्लूऊऊऊप्प्प्पप्प"
मालती बुरी तरह कामुकता से काँप उठती है उसका पूरा सरीर कामुकता की लहर से हिल उठता है.. पर ऐसी पल सत्यम मुस्कुराते हुए अपने होंठों और अपने दाँतों क बीच चूसे जा रहे मोनू की माँ क उस काले निप्पल्स को चोर देता है.. बेचारी मालती सिर्फ अपने होंठों को काट क रह जाती है ककी इतना सब होने क बाद भी उसकी लज्जा उसे आगे बढ़ने से रोक रही थी पर आखिर कब तक
ककी मालती की आग तोह हम सब जान hi चुके है, की जब वो गरम होती है तोह सही गलत कहा देखती है वो.. पर इसमें गलती किसकी है
सत्यम अपनी खूबसूरत चची क निप्पल्स से अपना मुंह हटा क पहले जैसे उसे निहारने लगता है जहा अब कुंदन की पत्नी का वो काला जामुन जैसा निप्पल्स उसके थूक से सना हुआ उस आग की लाल रौशनी में चमक रहा था
सत्यम को तोह जैसे अपनी किस्मत पे अब भी यकीन नहीं हो प् रहा था, वो धीरे से अपने लुंड पे अपना हाथ फिरता है और मुस्कुरा क कहता है
"यकीन नहीं होता.."
मालती धीरे से शर्म से लाल हुई इस बार अपनी आँखों को खोलती है और उसे देखती है और मुस्कुरा क कहती है
"किया.. ?"
मालती की तेज़ी से चलती हुई साँसे बता रही थी की उसके जिस्म की अग्नि पूरी तरह भड़क चुकी है, जो कब जवालामुखी जैसे पहात जाये वो भी नहीं जानती
कंटिन्यू...