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सुबह की ठंडी हवा उस पुरे माहौल में एक सुकून भरा सन्नाटा भर रही थी और सविता को अभी ऐसी की जरुरत भी थी, वो धीरे से सत्यम की चारपाई की और बढ़ती है और उसके सावले चेहरे को देख क एक पल को उसकी कामुकता क ऊपर उसकी ममता हावी होनी लगती है.. इस पल वो सत्यम को सिर्फ एक माँ की नज़रों से देखने लगी थी
जहा कुछ पलों पहले तक उसका जिस्म उसे परेशां कर रहा था वही अब वो अपने जवान बेटे को सिर्फ ममता और स्नेह से निहार रही थी वो धीरे से उसकी चारपाई पे उसके पास बैठ जाती है और पियर से अपना हाथ आगे बड़ा क उसके बालों में अपनी उंगलिया चलने लगती है
न जाने एक hi पल में ऐस कोनसा बदलाव आ गया था की सविता की कामुकता पूरी तरह जैसे कही गायब हो हो गयी थी की तभी सीधा लेता हुआ सत्यम अपनी करवट बदलता है और उसका एक हाथ जो पहले से hi रज़ाई क बहार था वो सीधा सविता की नंगी कमर से आके टकराता है.. और उसकी गदराई कमर पे रगड़ता चला जाता है
सविता- Esssshhhhhhhhhhhhhh....
और एक बार फिर से सविता की कामुकता जाग पड़ती है, मानो जैसे उसे याद आ गया हो की वो किया करने वाली थी.. पर एक माँ की ममता तोह थी hi उसमे, अब बस ये ममता अपना असली रूप दिखने वाली थी
सत्यम गहरी नींद में सो रहा था, सविता एक बार को अपने पति की और देखती है और फिर धीरे से सत्यम वाली रज़ाई उठा क उसके अंदर का नज़ारा लेने लगती है जहा उसका जवान बीटा ऐसी ठण्ड में भी हमेशा की तरफ ऊपर से नंगा होक hi सो रहा था.. ये सत्यम की बचपन की आदत थी
अपने जवान बेटे की मज़बूत और हलके बालों से भरी मरदाना छाती यु सुबह सुबह देख क सविता क जिस्म में आग और बढ़ने लगती है.. जो आग कुछ दिएर पहले मोनू और मालती ने लगाई थी वो अब अपना रूप दिखने लगती थी.. जिसका परिणाम किया होगा कोई नहीं जनता
सविता की नज़रें अपने जवान बेटे की मज़बूत मरदाना छाती से नीचे की और बढ़ती है तोह वो पाती है की आज उसके बेटे ने सिर्फ एक लुंगी पेहेन राखी है जो की हमेशा नहीं होता, ककी सत्यम से लुंगी संभालती नहीं वो कहता है की वो बार बार खुलती रहती है वैसे आज भी ऐसा hi हुआ था ककी रज़ाई क नीचे सविता देख प् रही थी की उसके बेटे की लुंगी पूरी तरह खुली हुई थी पर तब भी वो उस खजाने को छुपा रही थी जिसकी जरुरत अभी इस समय सविता को थी
लुंगी भले hi सत्यम क मोठे हतियार को छुपाने में कामयाब हो रही थी पर इसके बाद भी उसकी मोटाई और बड़ा सा उभर साफ़ साफ़ पता चल रहा था और इतना काफी था सविता की आग में घी पड़ने क लिए, वो धीरे से अपने जवान बेटे क चेहरे क ऊपर झुकती चलती जाती है और बिना कोई विलम्ब किये उसके होंठ सत्यम क होंठों से मिल जाते है और वो धीरे से अपने जवान बेटे को चुम लेती है
"Ummmmmmmmmmmmmmm................"
सुबह का ये पहला चुम्बन ज्यादा लम्बा नहीं होता पर इतना था की सविता की आग को और बड़का दे.. वही सोते हुए सत्यम का जिस्म भी यु नरम होंठों की छुवन को सायद पहचान गया था की ककी उसके लुंड में एक मजबूत हलचल हुई थी, जिसे सविता ने देख लिया था और उस कारन उसकी आँखों में भरी कामुकता कई गुना बाद गयी थी
सविता की साँसे धीरे धीरे और भरी होती जा रही थी वो एक बार फिर से अपने जवान बेटे को अचे से निहारती है और उसकी रज़ाई को वापस से उसके ऊपर दाल देती है, पर इस बार उसका एक हाथ रज़ाई क अन्दर hi था जो धीरे धीरे सत्यम की खुली लुंगी की और बाद रहा था.. और अगले कुछ hi पलों बाद सविता का हाथ एक ऐसी गरम चीज़ को छूटा है को भट्टी जैसी गरम और ऐसी सुबह की ठंडक में रहत देने का दम रखती थी
वही सत्यम अपनी माँ क जिस्म की आग से पूरी तरह अंबिग गहरी नींद में खोया हुआ था, उसे किया पता उसकी माँ क गंदे इरादे कैसे है और वो आज किया करने की सोच रही थी.. मालती धीरे से रज़ाई क अंदर अपने जवान बेटे की लुंगी क ऊपर से उसके मोठे उभर को महसूस करती है और जब उसकी कोमल कोमल उंगलिया उस मजबूत चीज़ पे धीरे से चलती है तोह सविता को ऐसा लगता है जैसे सुबह की ये ठण्ड भी अब उसका कुछ नहीं बिगड़ पायेगी
सायद अब सुबह क इस मौसम में उतनी ठण्ड नहीं बची थी की वो एक माँ की गर्मी को सेहन कर पाती, वही सत्यम गहरी नींद में खोया हुआ पूरी तरह शांत था.. सविता धीरे से लुंगी को हल्का सा खिसका देती है, और अगला काम करने से पहले वो अपने पति की और देखती है जो अब भी गहरी नींद में सोया हुआ था और फिर मुस्कुराते हुए अपने बेटे को देखती है और उसके जिस्म पे पड़ी रज़ाई क अंदर अपने हाथ को अगला आदेश सा दे देती है
फिर किया था सविता का कोमल हाथ अगले hi पल उसके जवान बेटे क गरम लुंड को महसूस करने लगता है इस खूबसूरत एहसास में न जाने किया था की सिर्फ एक साड़ी में सुबह सुबह ऐसी ठण्ड में घर क बहार बैठी हुई सविता को जरा भी ठण्ड महसूस नहीं हो रही थी.. मानो जैसे उसका जिस्म अब अपने बेटे क लुंड की गर्माहट से गर्मी खींचने लगा था
सविता का जिस्म धीरे धीरे कामुकता क चलते कांपने लगता है पर ये कंपकपी ठण्ड वाली नहीं था, उसकी बड़ी बड़ी चूचियां जो इतनी भारी और बड़ी थी की उन्हें एक हाथ से दबोच पाना संभव hi नहीं था.. वो अब धीरे धीरे ऊपर नीचे हो रही थी
सविता ने अब अपने जवान बेटे क गरम लुंड को पूरी शख्ती से अपनी मुठी में दबोच लिया था और धीरे धीरे उसपे अपना पियर बरसते हुए उसे सहलाने का काम काने लगी थी, उसके हाथों का कमल जल्दी hi नज़र आने लगा था की ककी सत्यम का सरीर धीरे धीरे हलचल उप्टन करने लाहा था और उसके लुंड में सुबह की शक्ति आने लगी थी जो उसके उसकी माँ क हाथों में नज़र आणि सुरु हो चुकी थी ककी सविता अपने जवान बेटे क लुंड क आकर को बड़ा होता हुए महसूस कर प् रही थी
हाथों क बीच एक लुंड जब अपना आकर बदलता है तोह वो एहसास सबसे खूबसूरत होता है.. और अगर वो हाथ एक माँ क हो तोह बात hi अलग होती ककी उस समय कामुकता क साथ साथ एक रिस्ता भी होता है जो उस पल को और रोमांचित कर देता है
कुछ ऐसा hi हाल इस समय सविता का था.. सायद उसने एक ऐसा खेल सुरु कर दिया था जिसे अब पूरा करे बिना उसका पीछे हटना संभव नहीं होगा
कंटिन्यू...