Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 8 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

गौरैया 31

सुंदरपुर गाओं क सुनार की बहु 👇


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कैसी मोनरो
 
अपडेट #17

सन 🖼️ #01

सूरज की किरणों ने एक नए दिन का आगाज कर hi दिया था, और आज का ये एक और दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण था ककी बड़े दिनों बाद महेंद्र क घर में खुशियों ने वापस से कदम रखा था




पिछले 3 महीने सभी बस मोनू क स्वस्थ होने की कामना hi कर रहे थे, पर ऐसा नहीं था की सभी की सोच एक सी थी

जहा मोनू क ठीक होने क लिए उसकी माँ (मालती), बड़ी माँ (सविता), छोटी माँ (हर्षिता) और उसकी बुआ शीला रात दिन प्राथना कर रहे थे वही भानु और जब्बार जैसे लोग भी थे जो उसकी मौत की कामना करने से पीछे नहीं थे

पर वो कहते है न, ईश्वर की नियति क आगे किसी की नहीं चलती.. फिर भला ऐसे लोगो की कहा चलने वाली थी

वापस घर की बात करू तोह अभी भी पुरे घर में घोर सन्नाटा छाया हुआ था, सायद बहुत दिनों बाद सभी पूर्ण चैन की नींद ले प् रही थे

सुबह की ठण्ड उसपे रज़ाई की गर्माहट किसी को भी बहार आने नहीं दे रही थी पर ऐसा तोह हो नहीं सकता की आप पूरा दिन सोते hi रहे.. खासकर अगर आप घर की बहु, बेटी या उस घर में किसी भी प्रकार की स्त्री है

ककी एक घर में दिन की सुरुवात उस घर की स्त्री क चलने से होती है जब उसके पायल की झंकार पुरे घर में गूंज उठती है तोह ऐसा प्रतीत होता है मानो वो सुबह की घोसना कर रही हो


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तभी मालती का सरीर कोई हलके से हिलाते हुए

"मा.. माँ..."

एक बीटा अपनी माँ को पुकारे और माँ की चेतना उसे उसकी नींद से न जगाये ऐसा किया संभव है ?

मालती जैसे hi अपने बेटे की हलकी आवाज़ सुनती है उसकी नींद मानो कही गायब सी हो जाती है

"है.. अरे मोनू तू यहाँ किया कर रहा है, मन किया था न बहार आने से.. देख न कितनी ठण्ड है

कोई काम था तोह मुझे आवाज़ दे देता मैं वही आ जाती है"

एक माँ ने सुबह सुबह hi अपने पुत्र को अछि खासी डाट लगा दी थी, पर ये भी उसका प्रेम hi होता है

मोनू- (मुस्कुराते हुए) अरे काम है तभी उठा रहा हु.. वो त्यागी चाचा ने कहा था रोज़ सुबह नहाने क थोड़ी दिएर बाद उस टेल से मेरी मालिश होनी जरुरी है, मालिश तोह बड़ी माँ कर देंगी पर नहाने की हिम्मत नहीं हो रही है इतनी ठण्ड में

मालती अब तक अपनी चारपाई से उठकर बैठ चुकी थी वो कुछ बोलने hi वाली की थी तभी उसके बेटे क लोअर में उसे एक मोटा तम्बू नज़र आता है.. जिसे सुबह सुबह देख क मालती मुस्कुराये बिना नहीं रह पाती

"कमीने.. सुबह सुबह hi दर्शन करवा दिए"

मोनू एक पल तोह समझ hi नहीं पाटा पर जब वो अपनी माँ की नज़रों का पीछा करता है तोह उसे हसी आ जाती है

"फिर तोह ाचा है न माँ.. किया पता आज पूरा दिन आपको यही मिलता रहे"

मालती का तोह मुंह hi खुला का खुला रह जाता है पर अगले hi पल वो मुस्कुरा पड़ती है

"बदमाश कही का..

चल आज तुझे नहलाती हु"

मोनू बुरा सा मुंह बनाते हुए

"किया माँ.. इसीलिए तोह आपको जगाया है

आप सबसे कह देना की मैंने मोनू को नेहला दिया था, आपकी बात सब मान लेंगे

भला इतनी ठण्ड में कोण नाहटा है"

मालती अपनी हसी नहीं रोक पाती और अपने बेटे क उस बड़े से तम्बू को लगातार देखने क कारन उसके पैरों क बीचे भी कुछ चिपचिपापन आने लगा था

"ाचा तोह तू चाहता है की मैं घर में सबसे झूट बोलू.. थप्पड़ पड़ेगा, अपनी माँ से झूट बुलवाता है"

फिर मुस्कुराते हुए आगे कहती है

"चुपचाप पीछे स्नानघर में चल.. मैं पानी गरम करके लाती हु"

मोनू बुरा क मुंह बनाते हुए बड़बड़ाने लगता है और पीछे स्नानघर की तरफ चल पड़ता है

"इससे ाचा तोह बड़ी माँ को जगाता वो पक्का मेरा साथ देती, और ये स्नानघर किया होता है.. बाथरूम बोलो यार.. स्नानघर"

मोनू बड़बड़ाते हुए पीछे की तरफ चल पड़ता है वही मालती उसे ऐसे बड़बड़ाते हुए देख क अपनी हसी नहीं रोक पाती, काफी समय बाद उसके चेहरे पे ऐसा निखार दिख रहा था

जल्दी hi मालती एक शाऊल ओढ़ क रसोईघर में जेक पानी गरम करती है, वो इस बात का पूर्ण धियान रखती है की उसकी वजह से और किसी की नींद न ख़राब हो

अगले 10 मं बाद वो गरम पानी का भगोना लिए हुए घर क पीछे स्नानघर क सामने कड़ी थी

"दरवाजा तोह खोल या अंदर से बंद करके वही रहेगा"

मोनू- (अंदर से) यार आप सुबह सुबह नेहला डौगी, ठण्ड तोह देखो न

मालती- (मुस्कुराते हुए) अरे मेरा बीटा तोह सैर है न.. सैर डरते है किया

मोनू- ाचा तोह सैर को रोज़ सुबह नहाते हुए देखा है आपने

मालती- (हसी आ जाती है पर वो अपनी हसी पे काबू रखते हुए) चुपचुप दरवाजा खोलता है की तेरे बापू को बुला क लौ

फिर तोह एक पल का भी समय नस्ट नहीं होता और अगले hi पल दरवाजा खुल जाता है पर जैसे hi मालती अंदर देखती है दांग रह जाती है ककी सच में उसके बेटे ने सुबह सुबह दर्शन करवा hi दिए थे

अब बताने की जरुरत तोह है नहीं की मोनू का किसी ुचे टावर जैसा लुंड इस समय उसके लोअर क बहार था

"ठीक है नाहा लूंगा, पर एक सरत पे"

मोनू एक पल को तोह अपने बेटे का लुंड hi निहारती रहती है.. पर जल्दी से वो खुद को सँभालते हुए

"कोई सरत वर्त नहीं समझा.. कल तूने अपने मन से जो चाहा करवा लिया था, अभी चुपचुप नाहा"

मोनू ऐसे मुंह मन लेता है जैसे अभी अभी बस रो hi पड़ेगा

"आप मुझसे प्रेम hi नहीं करती"

मालती को हसी आ जाती है ककी कल भी ठीक ऐसी hi नौटंकी करके उसके बेटे ने उसे अपना लुंड चुसवा दिया था.. और आज फिर वो वही करने की चैस्ता कर रहा था

पर सच तोह ये भी था की अपने जवान बेटे क खम्भे जैसे खड़े लुंड को देख क उसकी योनि भी कॉमर्स की वर्षा करने लगी थी और उसके दबी वासना अपना सर बहार निकलने लगी थी

मालती पीछे देखते हुए

"समझा कर मेरे बचे.. अभी तू कमजोर है, ये सब तेरे लिए सही नहीं है"

मोनू धीरे से मुस्कुराते हुए, ककी सायद वो समझ रहा था की उसकी ीचा पूर्ण हो सकती है

"मैं तोह मुंह में लेने को कह रहा हु.."

फिर धीरे से

"छूट में थोड़ी"

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मालती अपने बेटे की ऐसी बच्चों वाली जिद देख क हसे बिना नहीं रह पाती है, और पीछे देखते हुए

"ठीक है पर हमारे पास ज्यादा समय नहीं है, सभी उठने hi वाले है.. समझ"

मोनू ये सुनते hi ऐसे उछाल पड़ता है मानो उससे भानुमति का खजाना मिलने वाला हो, वैसे सुबह सुबह अपनी सगी माँ क मुंह में लुंड डालने का अवसर उस खजाने से भी ज्यादा कीमती होती है.. ये बात तोह मेरे सभी दोस्त जानते hi है

मालती जल्दी से गरम पानी का वो भगोना अंदर लाते हुए लपक क दरवाजा बंद कर लेती है, यानि अब उस छोटे से स्नानघर में सिर्फ वही दोनों उपस्थित थे.. जहा मोनू का लुंड पूरा आकर लिए हुए खड़ा था और लोअर क बहार लटक रहा था

मालती जल्दी से गरम पानी को एक कोने में रखते हुए वापस कड़ी होती है और अपने बेटे की आँखों में देखते हुए मुस्कुरा क कहती है

"कमीने शर्म नहीं आती सुबह सुबह अपनी माँ का मुंह छोड़ने की बात करते हुए"

मालती मुस्कुरा क बिलकुल खुले सब्दो में बात करती है.. इसकी वजह उसके अंदर बढ़ने वाली अग्नि थी, जो धीरे धीरे प्रज्वलित होने लगी थी

वही मोनू बस मुस्कुरा क 'न' में सर हिला देता है

मालती अपना हाथ आगे बड़ा क अपने जवान बेटे का मोटा लुंड पकड़ क उसके मोठे आलूबुखारे सामान सुपडे पे अपनी उँगलियाँ चलते हुए

"ऐसा किया सोच लिया जो ये इतना बेहरम बना हुआ है"

मोनू अपना उत्तर अपनी हरकत से देता है, वो अपना एक हाथ आगे बड़ा क अपनी माँ क मोठे दूध से भरे हुए एक स्तन पे रखते हुए

"अपनी माँ का दूध"


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मालती मुस्कुरा पड़ती है पर साथ hi साथ उसके अंदर की गर्मी भी पूरी गति से उसपे हावी होने लगी थी.. सायद आज एक बार फिर से वो अपने जिस्म की गर्मी से जलने वाली थी

पिछली बार जब ऐसा हुआ था तोह उसने अपने hi जवान बेटे का लुंड अपनी छूट में समां लिया था, न जाने आज किया तूफान आएगा

तभी मोनू अपना दूसरा हाथ भी आगे बड़ा क अपनी माँ क दोनों स्तनों को एक साथ जोर से दबा देता है

मालती- (अपने जवान बेटे क मजबूत हाथ जिसमे अभी कुछ कमजोरी थी उनसे अपनी बड़ी बड़ी चूचियों का मर्दन पाके मचल पड़ती है) ेस्स्स्सह्ह्ह्ह..... माआआआआ.... धीरे बीटा....

वो ये कहते हुए धीरे से अपने खूबसूरत लाल होंठों को खुद hi काट लेती है, और अपनी माँ की ऐसी कामुक ऐडा देख क मोनू का लुंड हिलोरे मारने लगता है

पर मालती उसे ज्यादा हिलने डुलने नहीं देती, ककी वो उसी पल उसे जोर से अपनी मुठी में दबोच लेती है मानो उसे दबा क hi उसका रास निकल देगी

"बहुत उछाल रहा है, अभी बताती हु"

और ये कहते हुए वो वही स्नानघर में नीचे घुटनो क बल बैठ जाती है और एक हाथ से अपनी खूबसूरत बालों की लातों को पीछे करते हुए धीरे से अपनी जीभ निकल क अपने जवान बेटे क मोठे टोपे ले चला देती है

"सललललररररररपपपप..........."

सुबह सुबह अपने लुंड और उसके सुपडे पे अपनी माँ की जीभ का स्पर्श पाते hi मोनू बुरी तरह उमंग से भर पड़ता है

"Aaaaaaaaaaaaaaahhhhh.... Maaaaaaaaaa"

मालती अपनी एक hi हरकत से अपने बेटे की ाः निकल देती है जिसे सुनकर उसे अपने आप पर गर्व होता है

उसका अंतर्मन उसकी तारीफ करते हुए कहता है

'वाह्ह्ह रिइइइइ.. मालती, कुछ बात तोह है तुझमें'

मोनू धीरे से अपना हाथ आगे बड़ा क अपनी खूबसूरत गाय जैसी गदराई माँ क सर पे रखते हुए कहता है

"आआआह्ह्ह्ह... आपकी तोह जीभ में भी जादू है"

एक माँ अपने बेटे से अपनी प्रशंशा पाके और ज्यादा खिल उठती है.. इसलिए वो उसे पूर्ण आनंद देने का फैसला कर लेती है

मालती अपना चेहरा ऊपर उठा क अपने जवान बेटे की आँखों में देखते हुए

"आज देख तेरा किया हाल करती हु"

और ये बोल क खुद hi शर्म से लाल होने लगती है, वही मोनू तोह खुद को खुशकिस्मत समझ रहा था ककी उसे पता था जल्दी hi उसे जन्म देने वाली औरत उसका लुंड चूसने वाली है

अब यहाँ से आगे (Monu)meri जुबानी पढ़िए

माँ ने अपना कामुक कार्य प्रारम्भ कर दिया था वो मेरे लुंड क टोपे को धीरे से अपने होंठों क बीच लेके उसे चूस लेती है

"Srrrrrrppppppppppp............"


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मैं- आआअह्ह्ह्हह..... मा.... ये किया कर रही ho.............essshhh बहुत ाचा लग रहा है

माँ मुस्कुराते हुए

"तुझे hi अपनी माँ से लुंड चुसवाना था न.. तोह अब ले मज़े"

और ये कहते हुए धीरे से उसके मोठे टोपे को अपने दाँतों क बीच लेके उसे थोड़ा सा परेशां करने क लिए वह हल्का सा काट लेती है.. जिससे मोनू उछाल hi पड़ता है

"Aaaaaaaaaaaahhhhhh.... Maaaaaaaaaaaa....... दर्द होता है...."


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मालती मुस्कुरा पड़ती है और हस्ते हुए कहती है

"तुझे अपनी माँ को सुबह सुबह लुंड चुसवाने क लिए थोड़ी सी सजा दे रही हु"

मोनू मुस्कुरा पड़ता है और कहता है

"आपके मुंह में अपना लुंड घुसाने क लिए तोह मैं कोई भी सजा सेह सकता हु"

मालती जो अभी अभी अपने बेटे क लुंड पे अपने दाँतों क निशान बना रही थी वो ऐसी बात सुनकर ऐसे शर्मा जाती है मानो कोई नयी दुल्हन हो

"बदमाश कही का"

वही मैं बस उनकी आँखों मैं देखते हुए धीरे से अपना सर हिला क कहता हु

"मैं तोह आपका बदमाश हु"

पर साथ hi साथ मेरा लुंड अब पूरी तरह अपनी माँ क मुंह में घुसने क लिए पागल होता जा रहा था.. मानो उसका अपना दिमाग हो

ऐसा सायद इसलिए था ककी असल इस समय मैं बस यही चाहता था की माँ बस जल्दी से मेरा लुंड अपने मुंह में भर क उसे चूसना सुरु कर दे

तभी मेरी खूबसूरत और कामुक माँ जो मेरे पैरों में बैठी हुई मेरे लुंड को अपने हाथों से जड़के हुए थी वो मेरी तरफ देखती है, मानो जान गयी हो की मुझे किया चाहिए.. और वापस बिना विलम्ब क मेरे लुंड क टोपे को मुंह मैं भर क चूसना सुरु कर देती है

"Srrrrrrppppppppppp...... उम्मम्मम्मम्मम..... Srrrrrrppppppppppp...... उम्मम्मम्मम्मम......"

पर इस बार वो अपना पूर्ण अनुभव दिखा रही थी, ककी मेरे टोपे को चूसने क साथ साथ वो अपने दूसरे हाथ से मेरे लुंड को सेहला भी रही थी

"Srrrrrrppppppppppp...... घुम्म्म्मम्म्म्म..... घुम्म्म्मम्म्म्म... ह्ह्ह्हह्हहपपपपपू........ Srrrrrrppppppppppp..... उम्मम्मम्म.... उम्मम्मम्मम्म....."

वो बार बार मेरी आँखों मैं देखती और मेरे लुंड को चूसने लगती.. उफ्फ्फ्फ़.. मेरा लुंड अब पूरी तरह खड़ा हो चूका था, वैसे तोह वो पहले से खड़ा था पर मैं महसूस कर प् रहा था की जैसे जैसे माँ मेरा लुंड चूस रही है उसमे और ज्यादा कड़कपन आता जा रहा है

जहा कुछ दिएर पहले मैं उनसे विनती कर राग था, अब वही उनके मुंह मैं मेरा लुंड था

"आआआअह्ह्ह...... ेस्स्स्सह्ह्ह... मा.... हीी....... उफ्फ्फ्फ़..... मा.... ऐसे hi.... आआह्ह्ह्ह....."

तभी माँ मेरे लुंड से अपना मुंह अलग करती है, और मुस्कुराते हुए कहती है

"वैसे तू बहुत बदमाश होता जा रहा है, कल भी मुझे अपनी बातों में फसा क मुझसे अपना लुंड चुसवा लिया और आज फिर"

मैं हसे बिना नहीं रह पाटा हु

"अब किया करू माँ.. आप छोड़ने तोह डौगी नहीं"

माँ मुझे देख क एक पल को ग़ुस्से वाला चेहरा बनती है पर अगले hi पल मुस्कुरा पड़ती है

"बदमाश कही का.."

माँ मेरे लुंड क मोठे टोपे पे अपनी उँगलियाँ चलती हुई उसे पियर से कुरेदने लगती है और फिर कहती है

"तू पहले पूर्ण स्वस्थ हो जा, फिर जो चाहे कर लेना"

मैं ख़ुशी से उछाल hi पड़ता हु

"किया सच्ची.. सब कुछ"

माँ मुस्कुरा क धीरे से मेरे लुंड पे चपत मरते हुए

"बदमाश..."

और फिर से मेरा पूरा लुंड गपक से अपने गरम कामुक मुंह मैं भर लेती है और मुझे असीम आनंद देने लगती है

"Srrrrrrppppppppppp..... Srrrrrrppppppppppp...... उम्मम्मम्मम्म..... Srrrrrrppppppppppp....... उम्मम्मम्मम...... Srrrrrrppppppppppp....... उम्मम्मम्मम...... Srrrrrrppppppppppp........ उम्मम्मम्मम... Srrrrrrppppppppppp......."

मैं तोह जैसे पूरा पागल होता जा रहा था इसलिए खुद hi अपनी टैंगो को पूरा फैला देता हु जिससे माँ को और अचे से मेरा लुंड मिल सके और उन्हें चूसने मैं कोई परेशानी न हो

माँ भी मेरे आधे से ज्यादा लुंड को मुंह मैं भर क खूब अचे से चूस रही थी.. मैं तोह जैसे सातवे आसमान मैं ुध रहा था

ऐसा लग रहा था, जैसे वो मेरे लुंड क जरिये मेरे अंदर कोई अनोखी ऊर्जा भर रही हो

मैं मज़े मैं अपनी आँखों को बंद करते हुए.. पियर से उनके सर पे हाथ रख क और जोर से अपना लुंड नीचे की तरफ दबाने लगता हु और जोर जोर से उनके मुंह मैं अपना लुंड घुसा क उन्हें चुसवाने लगता हु

धीरे धीरे मेरी रफ़्तार बढ़ती जा रही थी, और माँ भी मेरी रफ़्तार की बराबरी करती हुई उतनी hi जोर जोर से मेरे लुंड को चूस रही थी

"Srrrrrrppppppppppp....... घूउपपपपपप..... Srrrrrrppppppppppp...... हूऊऊऊलललूउपप्पूवू....... Srrrrrrppppppppppp..... उम्मम्मम्मम्म..... Ummmmmmmmmmmmm...."


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मेरा पूरा सरीर अब काम ऊर्जा से भर चूका था इसलिए मैं अपने दोनों हाथों से उनके सर को पकड़ क जोर जोर से उनका मुंह छोड़ने लगा था.. मुझे असीम आनंद की प्राप्ति हो रही थी

वही मेरे इतनी जोर जोर से लुंड घुसाने क बाद भी मेरी खूबसूरत माँ मुझे रोक नहीं रही थी.. उल्टा मेरी गति से गति मिला क मेरा लुंड चूसते हुए उसका रास निचोड़ रही थी

"सललललूउपपप.... उम्मम्मम... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp..... उम्मम्मम्मम.... सललललूउपपप..... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... उम्मम्मम्म... गलल्लूऊऊऊप्प्प...... गररररररललललपपप..... सललललूउपपप.... Ummmmmmmmmmm"

उस छोटे से स्नानघर में लुंड और मुख का ये खेल पूरी गति से आगे बाद रहा था और पुरे स्नानघर में छप्प्प्प... सललललूउपपप..... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp .... चाहाआपपपप की मधुर आवाज़ गूंज रही थी जो अगर कोई दरवाजे क बहार भी होता तोह सायद सुन hi लेता और ठीक ऐसा hi कुछ हो जाता है

मैं पूरी रफ़्तार से अपनी खूबसूरत कामुक माँ क मुंह में अपना लुंड अंदर घुसा रहा था और इस आनंद क कारन मेरी आँखें भी पूरी तरह बंद हुई पड़ी थी वही माँ भी मेरे लुंड को अब धीरे धीरे अपने गले तक पे जाने लगी थी.. हम दोनों माँ बेटे दुनिया की परवा किये बिना आज क दिन की सुरुवात ऐसे कामुक रूप से कर रहे थे.. की तभी

हमारे इस कामुक खेल में एक अड़चन आ जाती है

"कोण है अंदर ?"

ये आवाज़ हमारे कानो में पड़ते hi हम बुरी तरह काँप से उठते है, वही माँ ने भी जल्दी से मेरे लुंड को चोर क अपना मुंह उससे आज़ाद कर दिया था

तभी वो आवाज़ जो और किसी की नहीं अपितु बड़ी माँ की थी फिर से हमारे कानो में पड़ती है

"मैंने पूछा कोण है अंदर.. ?"

हमे ऐसा लगा मानो बड़ी माँ ग़ुस्से में हो, यानि अब हम पक्का पड़के जाने वाले थे.. और ऐसी दर क चलते हम दोनों माँ बेटे एक गलती कर बैठते है

मैं- मैं.. बड़ी माँ.. मोनू.. मोनू

और ठीक मेरे hi साथ माँ भी बोल पड़ती है

"बड़की भाभी मैं.. मालती"

हम दोनों जैसे hi एक साथ ये बोलते है तोह तुरंत hi एक दूसरे की तरफ देखने लगते है ककी हमने यहाँ एक बड़ी गलती कर दी थी जो हम एक साथ बोल पड़े थे

तभी फिर से बहार से बड़ी माँ की आवाज़ आती है पर इस बार उनकी आवाज़ में ग़ुस्सा नहीं हलकी सी हसी जैसी थी

"इतनी ठण्ड में, सुबह सुबह दोनों माँ बेटे अंदर किया कर रहे हो"

मेरी तोह साँसें hi अटक गयी थी पर साथ hi साथ माँ का भी हाल मुझसे कुछ अलग नहीं था ककी उनका चेहरा भी पूरी तरह लाल पद चूका था

बड़ी माँ- अरे किया हो गया, सुबह सुबह इतनी ठण्ड में ऐसा किया कर रहे हो दोनों माँ बेटे जो बता भी नहीं प् रहे हो

इस बार माँ ने हिम्मत से खुदपे काबू रखते हुए

"वो भाभी.. मैं वो मोनू को नेहला रही थी.. त्यागी.. त्यागी जी ने कहा था न"

माँ की इस बात से मुझे भी काफी रहत मिलती है और ऐसा लगता है की चालू अब सायद बात संभल जाएगी, वैसे मैं बताना भूल गया था की माँ अब भी मेरे कदमो में नीचे बैठी हुई थी और मेरा लुंड इतना सब होने क बाद भी शांत नहीं हो रहा था.. इसलिए वो पूरी तरह तना हुआ माँ क होंठों क ठीक सामने लहरा रहा था

इधर बड़ी माँ, माँ की बातों का जवाब देती है

"ाचा तोह ये बता न चल ठीक है अचे से हमारे मोनू का पानी निकल.. मेरा मतलब पानी से नेहला"

एक पल को तोह लगता है जैसे बड़ी माँ को हमपे किसी प्रकार का सक हो गया हो, पर फिर जब उसके कुछ समय तक पूर्ण शांति थी.. यानि बड़ी माँ जा चुकी थी

तोह माँ एक लम्बी सी सांस लेते हुए

"बदमाश आज तेरे चक्कर में मैं किसी को मुंह दिखने लायक न रहती"

इतना सब होने क बाद भी मुझे मस्ती hi सूझती है

"आप बस अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को खुला चोर देना, फिर कोई भी आपका मुंह देखेगा hi नहीं"

माँ जो अब तक दरी हुई थी वो भी बात पे है पड़ती है और मुझे मज़ाक मज़ाक में सजा देने क लिए मेरे दोनों ाँद एक साथ मुठी में दबोच लेती है

"बड़ा आया.. अब बता"

मैं बुरी तरह मचल पड़ता हु, ककी ऐसा होगा तोह कामुकता क साथ साथ दर्द भी होगा न

"Aaaaaaaaaaaaahhhh... माआआ.... सॉरी.... सॉरी.... गलती हो गे"

माँ ने हस्ते हुए मेरे ाँद चोर दिए और जैसे hi वो उतने लगी मैंने उनके सर पे अपना हाथ रख दिया यानि उन्हें ऊपर उठाने नहीं दिया, तोह माँ मुझे सवालिया नज़रों से देखते हुए

"पागल है किया.. फिर से कोई आ गया तोह ?"

मैं- (अपनी खूबसूरत और कामुक माँ से विनती करते हुए) जल्दी से चूस क मेरा पानी निकल दो न माँ.. इससे पहले hi कोई वापस आये, अपने बेटे क लिए इतना नहीं करोगी

माँ हसे बिना नहीं रह पाती

"सुधरेंगे नहीं तू.."

और मुस्कुराते हुए वापस से मेरे लुंड को अपनी उँगलियों क बीच लेके उसे पियर से सहलाते हुए आगे पीछे करने लगता है.. तोह मैं उन्हें देख क मुस्कुरा क कहता हु

"ऐसे नहीं माँ.."

माँ भी मेरी बात पे अपने होंठों को काटते हुए

"जानती हु.. बदमाश कही का"

माँ ने बस इतना hi बोलै ककी अगले hi पल वापस से मेरा खड़ा हुआ मोटा लुंड जो हैरानी की बात थी कुछ ज्यादा hi जोश और बुरी तरह अकड़ क खड़ा था.. उसे अपने गरम मुंह में समां लेती है, और एक बार फिर से वही खेल सुरु हो जाता है

"सललललूउपपप.... srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp..... Ggggggggggg..... Ummmmmmmmmmm..... Ummmmmmmmmmm..... सललललूउपपप"


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माँ ने इस बार सुरुवात से hi चौथा गियर लगा लिया था, यानि उन्होंने जैसे hi वापस से मेरा लुंड मुंह में लिया गपक से उसे गले तक घुसा क चूसना सुरु कर दिया था.. एक बात तोह माननी होगी मेरा माँ लुंड चूसने में सच में बड़ी निपुड़ है

"उम्मम्मम्मम्मम..... चाहाआपपपप.... सललललूउपपप..... उम्म्म्म... सललललूउपपप.... गररररररललललपपप"

मेरा पूरा लुंड माँ क थूक से सना हुआ था और माँ उसे अपने मुंह की गहराई में घुसा क अचे से चूस रही थी, मेरी आँखें एक बार फिर से आनंद क चलते बंद हो चुकी थी और मैं जोर जोर से अपने दोनों हाथों को माँ क सर पे रखे हुए उनका सर अपने लुंड पे दबा रहा था

"आआआअह्ह्ह... माआआआ... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... हाआआईईई..... ऐसे hi.... ेस्स्स्सह्ह्ह.... माआआआआ.... कितना गरम मुंह है अआप्का.... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़..... बिलकुल किसी कुवारी लड़की की छूट जैसा.... Aaaaaaaaaahhhhhh"

जब आपकी खूबसूरत माँ आपका लुंड चुस्ती है तोह आप मज़े की अलग hi दुनिया की सैर करते है, और ठीक यही हाल इस समय मेरा था.. वही मेरी माँ भी बहुत अचे से म्हणत कर रही थी

"गलल्लूऊऊऊप्प्प.... उम्मम्मम्मम.... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp..... उम्मम्मम्मम्म...... सस्ससररररलललल्लूऊप्प.... Srrrrrrrrrrrrrrrrlllllppppp.... सललललूउपपप"

सच्ची लिखू तोह... उफ्फ्फ्फ़ मेरे पास सब्द नहीं की मैं ये एहसास बता सकू

मैं- आआआहहहहह........ मा.... हैईईई... मायआ..... मज़ा...... आआअह्ह.. रहा है.... माआ.... हीी...... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ कितना गरम है आपका मुंह... आआआआअह्हह्ह्ह्ह

वही मेरी खूबसूरत कामुक माँ कुछ बोल तोह नहीं सकती थी, पर वो मेरी भावनाओ को पूरी तरह समझ रही थी, और जैम क मेरे लुंड को चूस रही थी

"Srrrrrrppppppppppp...... हूऊऊऊलललूउपप्पूवू..... Srrrrrrppppppppppp..... उम्मम्मम्मम्म..... Srrrrrrppppppppppp........"


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धीरे धीरे मेरा जिस्म अकड़ने लगा था.. और मेरी आँखें काम भावना की वजह से बंद होने लगी थी, मैं अपने अंतिम पड़ाव पे पहुंच चूका था



कंटिन्यू.. 👇
 
जहा कभी भी मेरे अंदर का लावा फुट सकता था.. इसलिए मैं और जोर जोर से अपनी माँ का मुख छोडन करने लगता हु



पर तभी मेरी नज़र माँ पे पड़ती है और मैं मुस्कुरा पड़ता है.. ककी माँ उस समय मेरा लुंड चूसते हुए अपना एक हाथ नीचे ले जा चुकी थी और अपनी साड़ी को आगे से खिसका क अपनी योनि को जोर जोर से रगड़ रही थी सायद उन्हें भी अपना पानी निकलना है, और ऐसा होता भी क्यू नहीं सुबह सुबह अपने जवान बीटा का लुंड चूसने क बाद किसी भी माँ का यही हाल होगा

पर मैं वापस से अपनी आँखों को बंद करके उस आनंद में खो सा जाता हु, और अब मैं पूरी तरह पागल हो चूका था.. वही मेरी माँ भी किसी भूखी बिल्ली की तरह मेरे लुंड को निचोड़ क चूस रही थी

"Srrrrrrppppppppppp.... Srrrrrrppppppppppp...... हूऊऊऊलललूउपप्पूवू..... घूउपपपपपप.... Srrrrrrppppppppppp..... उम्मम्मम्मम्मम.... Srrrrrrppppppppppp........"

मेरे लुंड की नसे पूरी तरह तन जाती है, इसलिए मैं जल्दी से उनका सर अपने लुंड से अलग कर देता हु

माँ को समझ नहीं आता की ये अचानक मैंने क्यू किया

मैं थोड़ा शरमाते हुए

"वो.. माँ... मेरा निकलने वाला है.. तोह..."

मेरी बात सुनकर माँ मुस्कुरा पड़ती है और वापस से मेरे गीले लुंड पे अपना हाथ चलते हुए.. ऐसी आवाज़ में बोलती है मानो हवस उनपे पूरी तरह चढ़ चुकी हो

"कहा निकलेगा.. ला पीला दे अपना रास अपनी माँ को"

मैं- सच्ची.. सुबह सुबह आप पियोगी मेरा वीर्य

माँ जिनकी आँखों में हवस क लाल डोरे तैर रहे थे

"बदमाश ये मलाई बर्बाद करने क लिए नहीं होती, ला दे मुझे पीनी है.."

किसी बेटे क लिए दिन की सुरुवात ऐसी हो तोह किया hi कहने, और ऐसी कारन मेरा लुंड बस पहात hi पड़ता है और मैं जल्दी से उनके होंठों और मुंह क ऊपर अपना लुंड उठा क हिलना सुरु कर देता हु.. यानि आप समझ hi चुके होंगे मैं उन्हें अपनी मलाई कैसे पिलाने वाला हु


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मैं- आआअह्ह्ह.. माँ.... मेरी पियरी मालती.. मा...... Aaahhhhhhhhhhhhhhhhh..............

और मेरा लुंड अपनी आग उगल देता है

मैं अपनी खूबसूरत कामुकता की देवी सामान माँ का सर कसके पकड़ क अपने लुंड को मुठ पे मरते हुए उसका सारा रास उनके मुंह मैं निकलना सुरु कर देता हु

वो भी किसी कामदेवी सामान उस कॉमर्स को अपने पेट मैं भर्ती चली जाती है

वैसे मन्ना पड़ेगा मेरी माँ 'मालती' को ककी उन्होंने एक भी बून्द अपने मुंह क बहार नहीं टपकने दी थी

और जब मेरे लुंड से वीर्य का एक एक अंश निकल जाता है तोह वो मुस्कुराते हुए अपना मुंह खोल क मुझे दिखती है.. जिसमें मेरा वीर्य भरा हुआ था और फिर पूरा एक hi बार मैं जातक जाती है

और लम्बी सी जीभ निकल क दिखती है की ले देख.. मैं सब निगल गयी

उनकी ऐसी कामुक हरकत ने तोह मुझे उनका दीवाना hi बना दिया था, वैसे दीवाना तोह मैं उनका बचपन से hi हु

मैंने पाया की माँ एक बार फिर से अपनी योनि को रगड़े जा रही थी.. हम दोनों एक दूसरे को देख क मंद मंद मुस्कुरा रहे थे की तभी

"हो गया दोनों माँ बेटे का या अभी और आगे कुछ है.. वैसे समय तोह लगता है, पर बता तोह दो

आखिर मैं और कबतक यु बहार कड़ी कड़ी इन्तिज़ार करती रहूंगी"

आप तोह समझ hi चुके होंगे ये वाणी बड़ी माँ की थी, जिसे सुनकर हम दोनों क सर पे मानो पहाड़ पटक दिया गया हो.. ऐसा लगता है जैसे चक्कर खा क कही गिर न पड़े

इस बार दर का पारा इतना अधिक था की ये सुनते hi माँ तुरंत उठ कड़ी हुई थी, वो कभी मुझे देखती तोह मैं कभी उन्हें.. ककी हम दोनों भली भांति समझ चुके थे की बड़ी माँ इतनी दिएर से स्नानघर क ठीक बहार hi कड़ी थी यानि उन्होंने न सिर्फ हमारी बातें सुनी होगी बल्कि उन्हें पता भी चल चूका होगा की हम यहाँ कोनसा गुल खिला रहे है

इसलिए पहले की हम दोनों ये तय कर पाते की उन्हें जवान किया देना है उनका हल्का सा व्यंग भरा स्वर हमारे कानो में पड़ता है

"किया हुआ मालती, अभी तक मोनू को नेहला नहीं पायी का ?

बता तोह दे अगर और अधिक समय लगने वाला है

मुझे भी स्नान करना है, और तुझे भी तोह आज मंदिर जाना है की नहीं ??"

बड़ी माँ की बात सुनते hi माँ ऐसी रहत भरी सांस लेती है मानो किसी ने उनकी गर्दन को दबोच रखा था और अब जेक कही उसमे कुछ ढील दी है

माँ- है.. वो.. बस 5.. 5 मं और भाभी.. हो.. हो hi गया.. क्यू है.. है न.. मोनू बीटा

माँ की लड़खड़ती हुई जबान और उनके माथे पे आ चुके पसीने से पता चल रहा था की उन्हें कितनी रहत मिली है बड़ी माँ की इस बात से

बड़ी माँ- (दरवाजे क दूसरी तरफ से) चलो फिर में 5 मं बाद hi आती हु.. वैसे मुझे लगता नहीं इतनी जल्दी होगा कुछ, आखिर जवान लड़का है

बड़ी माँ इतना hi कहती है और एक बार फिर से पूर्ण शांति च जाती है, माँ बार बार मुझे देख रही थी तोह कभी उस दरवाजे की तरफ और फिर हिम्मत करके धीरे से दरवाजा खोल क देखती है तोह इस बार सच में वह कोई नहीं था

हम रहत भरी एक लम्बी सी सांस लेते है, और उसके बाद माँ स्नानघर क अंदर और नहीं रूकती.. मैं भी उन्हें नहीं रोकता और फिर जल्दी से मैं उस गरम पानी जो अब बस गुनगुना hi रह गया था उससे नाहा लेता हु और फिर जल्दी से कमरे की तरफ भाग जाता हु

वैसे तोह माँ मुझे खुद नहलाने वाली थी पर फिर जो हुआ उसके कारन वो इस बार स्नानघर क बहार hi कड़ी रही वो सायद किसी बात को लेके चिंतित थी

मैं उनसे कहा भी था

"माँ आप परेशां क्यू होती हु, बड़ी माँ को कुछ नहीं पता है.."

माँ ने मेरी बात पे अपना सर जरूर हिला दिया था पर सायद कोई तोह बात उनके मानसिक पटल पे अटक चुकी थी.. वो सायद बड़ी माँ क कहे वो सब्द थे

'चलो फिर में 5 मं बाद hi आती हु.. वैसे मुझे लगता नहीं इतनी जल्दी होगा कुछ, आखिर जवान लड़का है'

अब वापस माँ क भावनाओं क साथ आगे बढ़ते है

माँ अब भी वही स्नानघर क बहार hi यहाँ से वह चल रही थी उनके मन में रह रह क यही चल रहा था की

'किया भाभी सब जान गयी है, और अगर ऐसा है तोह मैं उनका सामना कैसे करुँगी.. कल भी जब मैंने अपने बेटे का लुंड चूसा था तब भी वो कमरे क बहार hi मिली थी और अब आज फिर से'

इतनी ठण्ड में भी माँ को पसीना आ चूका था वो अपने पल्लू से अपना पसीना पूछते हुए

"कही भाभी को सब पता चल गया होगा तब.."

माँ ये सब सोच hi रही थी की तभी हवा का एक ठंडा झोका उनके खूबसूरत चेहरे से टकराता है और उनके बालों को बिखरा देता है.. जिससे एक पल क लिए उनकी आँखें बंद होती चली जाती है पर जब पुनः उनकी आँखें खुलती है तोह वो खुद को एक कच्ची सड़क पे पाती है

सन 🖼️ #02

"किया हुआ चची.. जल्दी जल्दी चलो मंदिर अभी दूर है, और मौसम बिगड़ता hi जा रहा है"

मेरे कानो में जब ये आवाज़ पड़ती है तोह मुझे अपनी इस्तिथि का एहसास होता है मैं इस समय गाओं क पुराने मंदिर की तरफ आगे बाद रही थी और मेरे साथ मेरा 'भतीजा' सत्यम था

आज सुबह सुबह मोनू क चलते जो हुआ मैं उस बात को लेके अब भी इतना परेशां थी की गाओं की कच्ची सड़क पे आगे बढ़ते हुए उसी बारे में सोचती जा रही थी

और किया हुआ था ये तोह आप सभी जान hi चुके है

वैसे अभी सुबह क करीब 8:45 हो रहे होंगे, मैं सत्यम की तरफ देखती हु जो मेरे आगे आगे चल रहा था और मुझे जल्दी जल्दी चलने को कह रहा था.. वैसे उसकी बात बिलकुल सत्य थी आज मौसम सच में काफी ख़राब होता जा रहा था

ऐसा लग रहा था जैसे जल्दी hi एक बार फिर से अंधकार सा च जायेगा, जी है मौसम इतना काला होता का रहा था मानो जैसे रात फिर से आने वाली हो

"टाआड़द्दाआआअआककककककककक"


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मैं बुरी तरह काँप पड़ती हु, ककी कही दूर जोर से बिजली चमक उठी थी.. मैं खुद पे काबू रखते हुए

"न जाने आज कोसना तूफान आने वाला है"

सत्यम- (बिजली क चमकने से मुझे कांपते हुए देख क मेरे पास अत है और मुस्कुरा क कहता है) किया हुआ चची.. जरा सी बिजली से दर गयी आप भी न, ाचा अब जल्दी जल्दी चलो ककी ऐसा लगता है की बारिश का कोई भरोषा नहीं

मैं एक बार को सत्यम को देखती हु और फिर मुस्कुराने की कोशिश करते हुए

"मुझे लगता है हमे लौट चलना चाहिए, मंदिर फिर कभी आ जायेंगे"

सत्यम- कैसी बात करती हो चची, हम आधे से ज्यादा रास्ता पार कर चुके है.. और देखना बारिश होने से पहले hi हम दर्शन करने वापस भी लौट आएंगे

मैं है में सर हिला देती हु और अपनी मंज़िल की तरफ आगे बाद चलती हु

आगे का रास्ता जल्दी hi काट जाता है और अब हम दोनों मंदिर क बिलकुल पास आ चुके थे और जैसे hi आगे कुछ कदम बढ़ते है हमे सामने से एक खूबसूरत 31-32 साल की औरत तेज़ क़दमों से चलती हुई नज़र आती है जिसके पैरों में चप्पल नहीं थी.. पर इसका ये मतलब नहीं की वो कोई गरीब औरत थी ककी उसके सरीर पे चमकने वाले आभूषण उसके अमीर होने का प्रत्यक्ष प्रमाण था

तभी मेरे बगल चलता हुआ सत्यम मेरे कानो क पास अपना मुंह लेक धीरे से कहता है

"ये तोह 'गौरैया भाभी' है न ?"


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मैं जैसे hi उसकी तरफ देखती है तोह वो मेरे इतने पास था की अगर हल्का सा भी अपने चेहरे और घूमती तोह सायद उसके होंठों से मेरे होंठों का मिलान हो जाता.. इसलिए में खुद hi तुरंत और किनारे की तरफ खिसकते हुए

"चुम्बक चाचा की बहु है"

सत्यम- (सामने से आती गौरैया को देखते हुए) ये ऐसे नंगे पाऊँ क्यू है.. लगता है कोई मंदिर से चप्पल ुधा ले गया

सत्यम ये बोलते हुए धीरे से है पड़ता है, मैं उसकी तरफ देखती हु तोह पाती हु की वो कुछ ज्यादा hi गौर से गौरैया को घूरे जा रहा था.. न जाने क्यू मुझे उसका ये किसी औरत को ताड़ना ाचा नहीं लग रहा था, पर मैंने ये बात उससे बोली नहीं

इतनी दिएर में गौरैया लगभग हमारे बिलकुल पास आ चुकी थी

"नमस्ते मालती भाभी, आप तोह बड़े दिनों बाद नज़र आयी ?"

मैं उसे देख क मुस्कुराते हुए

"किया करू गौरैया, तूने तोह सुना hi होगा मेरे मोनू क बारे में"

गौरैया- (एक लम्बी सी सांस लेते हुए) है भाभी पता चला, न जाने कोण कमीना होगा जो एक पियरे से बचे क साथ ऐसा कर गया.. अब कैसा है हमारा मोनू ?

"अब ठीक है, पर पूर्ण स्वस्थ होने में थोड़ा समय लगेगा"

गौरैया- अब आप वापस न जाने दीजियेगा उसे, यही गाओं में रखिये.. अरे अपना गाओं किसी सेहर से काम है का ?"

गौरैया की बात पे हम दोनों hi पास पड़ते है, तभी मैं सत्यम की तरफ देखती हु जो लगातार गौरैया को घूरे जा रहा था खासकर उसके उन्नत और कठोर उरोजों को.. वो भी ऐसे की अगर उसे अवसर मिले तोह वो उन्हें चूस क उनका दूध पीना सुरु कर दे

मैं धीरे से गौरैया की नज़रों से बचते हुए सत्यम की कमर पे एक हलकी सी चिकोटी काट लेती हु.. जिससे वो वास्तविकता में लौट आता है

तभी गौरैया ऊपर आसमान की तरफ देखते हुए

"ाचा भाभी अभी मैं घर चलती हु, ऐसी ठण्ड में ऐसा मौसम तोह पहली बार देख रही hi.. ऐसा प्रतीत होता है मानो रात होने को हो"

मैं- (उसकी तरफ देख क मुस्कुराते हुए) है सच कहा, पर देख रही हु तू ऐसे मौसम में भी अपना प्राण पूरा कर रही है

गौरैया हस्ती जरूर है पर उसकी हसी क पीछे का दर्द एक माँ अचे से पहचान सकती थी

मैं आगे बढ़कर उसके हाथ पे अपना हाथ रखते हुए

"मायुश क्यू होती है, देखना एक दिन तू भी एक पियरे से बचे जो जन्म देगी.. बिलकुल मेरे मोनू जैसा"

गौरैया मेरी बात पे इस बार सच्ची मुस्कान क साथ मेरा धन्यवाद् कहती है और वापस से चलने वाली ठंडी हवाओं से कांपते हुए बोलती है

"आज तोह बड़ा hi अजीब मौसम हो रहा है"

मैं भी ऊपर आसमान और दूर तेज़ी से हिलते पैदा को देखते हुए

"सही कहा.. न जाने आज कोनसा तूफान आने को है"

वैसे गौरैया सच hi कह रही थी, ककी हवाएं काफी ज्यादा ठंडी हो चुकी थी और हम तीनो क hi जिस्म पूरी तरह ठण्ड से कांपने सुरु हो चुके थे.. वही सूरज तोह पूरी तरह hi चुप चूका था और धीरे धीरे पूर्ण अँधेरे बढ़ता जा रहा था

ऐसा लग hi नहीं रहा था की सुबह क 9 बज रहे होंगे

गौरैया अपनी बात कहकर मुझे नमस्ते करती है और एक सरसरी की नज़र सत्यम पे दाल क आगे बाद जाती है, वो जैसे hi कुछ कदम आगे बढ़ती है मैं पाती हु की सत्यम उसकी बड़ी सी गांड को हवस भरी नज़रों से घूरे जा रहा था.. वैसे इसमें पूरी गलती उसकी नहीं है

ककी गौरैया सच में ऐसी hi है.. 31-32 साल की गौरैया हमारे गाओं क सुनार चाचा 'चुम्बक लाल' की बहु है

उसका पति 'चमन लाल' भी अपने बाप जैसा hi सुनारी का काम करता है पर वो ये काम हमारे पडोसी गाओं 'लोभी गाओं' में करता है.. ककी इस गाओं में तोह उसके पिता का नाम पहले से hi चलता है

गौरैया की शादी को लगभग 6 साल होने को है.. पर अभी तक उसे माँ बनने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो पाया है, ऐसी कारन वो हर सुबह अपने घर से नंगे पाऊँ मंदिर आती है और पूजा करने क बाद उसी अवस्था में वापस भी लौटती है

उसने प्राण किया है जी जबतक उसके गर्भ में बीज नहीं ठहरेगा वो ऐसा hi करती रहेगी

अगर गौरैया क सरीर की बात करू तोह वो हलकी सावली और पक्के रंग की है, पर उसकी बड़ी बड़ी आँखें और उसका सलोना सा मुखड़ा बहुत hi सुन्दर लगता है

पर इतने सालों से बचे की आस लगाए बैठी गौरैया की खूबसूरती भी मानो अपना दम तोड़ती जा रही है.. उसके सलोने चेहरे का निखार मानो कही खो सा गया है और वो हर समय कुछ भुजी भुजी सी रहती है

वैसे उसके कामुक अंगों की बात करू तोह पूरा hi सरीर कॉमर्स से भरा हुआ है, उसकी 32डी की चूचियों को देख क ऐसा लगता है जैसे उन्हें उतना नहीं मसला गया है जितना उसे मसल और चूसा जाना चाहिए

पर अगर उसकी बड़ी और मोती हिलती हुई गांड की बात करू तोह माहौल पूरा बदल जाता है.. ककी जहा उसकी चूचियों में अब भी भी उभर नहीं आया है वही उसकी गांड कुछ ज्यादा hi निखार लिए हुए है

ऐसा लगता है साड़ी म्हणत वही पे करि जा रही है


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Eske baad dono aur nahi rukte aur jaldi se Mandir k liye chal padte hai, waise bhi wo dono lagbhag Mandir k bahar hi thay

Wahi jab Maalti, Gauraiya se baat kar rahi thi tab inse dur ek paid 🌴 k pass laal vastro mein ek buddha khada hua muskura raha tha

Aur jab Maalti kehti hai

"Mayush q hoti hai, dekhna ek din tu bhi ek piyare se bache jo janm degi.. bilkul mere Monu jaisa"

Tab itni dur khade us buddhe ko bhi maano wo sabd sunai pade ho qki wo muskurate hue dhire se kehta hai

"तथास्तु"



ी होप इतने दिनों बाद ये अपडेट पड़के आप सभी को मज़ा आएगा, मैं आप सभी क विचारो को जानने की प्रतीक्षा करूँगा
 
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मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas)
 
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मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas)
 




मेरी माँ 'मालती' भविस्य में
 
Rinkp219 न Mukhtar भाई क कहने पे कहानी क पात्रो को पहले पैन पे जोड़ने का कार्य आरम्भ किया है



आशा है ये आप सभी को पसंद आएगा

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Thread 'मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas)'
 
अपडेट #17

सन 🖼️ #02

मालती और सत्यम दोनों hi 'गौरैया' भाभी से मिलने क बाद और समय नस्ट नहीं करते और सीधा मंदिर में दर्शन क लिए चल पड़ते है, दोनों जब तक मंदिर नहीं पहुँच जाते कोई बात नहीं करते ककी दोनों hi भली भांति जानते थे की और समय नस्ट नहीं किया जा सकता है.. ककी बादलों की गडग़ड़ाहट बता रही थी की वो कभी भी वर्षा का रूप लेके नीचे आ सकते है

जल्दी hi दोनों 'चची भतीजे' दर्शन करने क बाद बहार आ जाते है जहा मालती को मंदिर क बहार आते hi तीव्र ठण्ड की अनुभूति होती है, वैसे ऐसा होना सव्भाविक भी था ककी सुबह का thanda-thanda मौसम कुछ ऐसी प्रकार का था

हवा में एक सार्ड सी ठंडक थी जो उनके चेहरे को छू रही थी मानो कोई प्यार भरी सी chhedh-chhad कर रही हो, मालती को वो ठंडक जहा हड्डी कंपकपा देनी वाली लग रही थी वही इतने दिनों क बाद घर से निकलने क कारन उसे ये सब ाचा भी लग रहा था.. वैसे भी पिछले कुछ महीने उसके आंसुओं में hi कटे था

आसमान पे काले बदल छाये हुए थे यानि कभी भी बारिश सुरु हो सकती थी, मंदिर के आसपास का नज़ारा ऐसा था जो किसी क भी दिल को लुभा ले, दूर तक फैली हरियाली और उसपे नीम और पीपल के पेड़ों क पत्तों का हवा में लहराना बहुत hi सुखद लग रहा था

सुबह की ओस से भीगे हुए कमल क फूलों से सजा हुआ एक छोटा सा तालाब ठीक मंदिर के पास था जो इतना खूबसूरत लग रहा था की बस उसे देखते hi रहो


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सुबह की ठंडी हवा में मिटटी की खुशबू भी समय हुई थी जो मानो जैसे बारिश के आने की खबर दे रही हो

अब ऐसे लुभावने मासूम मैं किसी की कामता कैसे नहीं जागेगी.. मंदिर के पास hi एक विशाल पेड पे एक पुराण सा झूला पड़ा हुआ था जो हवा के झोंकों में dheere-dheere हिल रहा था और एक मधुर सा संगीत उत्पन कर रहा था

मालती तोह मंदिर क बहार क इस खूबसूरत नज़ारे में इतना खो गयी की उसे ठण्ड का भी एहसास होना बंद हो गया था

"घर चलना है की नहीं ?"

पर तभी उसकी खूबसूरत सोच को तोड़ने का कार्य उसके बेटे सामान भतीजा 'सत्यम' करता है, और मालती उसकी तरफ देखते हुए बस मुस्कुरा क है में अपना सर हिला देती है.. वैसे मालती जब उसकी तरफ पलटती है तोह देखती है की उसके बेटे सामान सत्यम एकटुक उसे hi देखे जा रहा था और ये बात मालती को थोड़ा अंदर तक हिला दे रही थी

ककी उसे सत्यम की आँखों में बड़े दिनों बाद वही पियास नज़र आ रही थी, और ये बात उसे विचलित कर देती है

वैसे हमारे मोनू की खूबसूरत माँ यानि मालती इस समय एक खूबसूरत सी साड़ी में थी जिसके ऊपर उसने एक मोती सी शाऊल ओढ़ राखी थी, पर वो शाऊल भी मालती क यौवन को पूरी तरह छुपा नहीं प् रही थी.. उसके ऊपर से भी ये साफ़ साफ़ पता चल रहा था की उसके अंदर कैसा अनमोल खजाना छुपा हुआ है

तभी तेज़ हवा का एक ठंडा सा झोंका हमारी खूबसूरत मालती की शाऊल को न सिर्फ ुधा देता है बल्कि उसके साथ hi उसकी साड़ी का पल्लू भी हवा में लहरा उठता है.. जिसे एक ऐसा खूबसूरत नज़ारा बनता है जिसे सत्यम बस देखता hi रह जाता है


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लाल साड़ी मैं सजी हुई मालती किसी कामुक मूर्ति जैसी लग रही है, जिससे लिपट क प्रेम करने का मन हर किसी का करे

मालती जल्दी से अपने कपड़ों को संभालती है और जब वापस सत्यम की तरफ देखती है तोह मुस्कुरा क रह जाती है ककी सत्यम की आँखों में इस समय उसे पाने की लालशा साफ़ साफ़ नज़र आ रही थी

मालती के लम्बे घने बाल उसके चेहरे पे ऐसे गिर रहे थे जैसे बादल ज़मीन पे उतर आये हों और खूबसूरती मैं सत्यम किया कोई 'साधु पुरुष' भी अपना आपने खो सकता था

"आप बहुत खूबसूरत हो"

आखिर सत्यम जैसा लड़का उस खूबसूरती से खुद को कब तक बचा सकता था.. अंततः उसके मुख से ये सब्द निकल hi पड़ते है, वैसे सुबह से hi पूरी तरह गरम और अपने जिस्म की बढ़ती गर्मी से परेशां मालती ये सब्द सुनते hi बस शर्म से लाल हो जाती है, मनाओ किसी नवयुवती की तारीफ की जा रही हो और उसका चेहरा लाल पद गया हो

मालती मुस्कुराते हुए अपना चेहरा नीचे की तरफ झुका लेती है पर उसकी badi-badi आँखें जिसमे एक समुन्दर सी गहराई थी वो उसका किया करती, ककी इस समुन्दर में गर्मी का ताप सुबह से hi बढ़ना सुरु हो चूका था, पहले मोनू की हरकतों ने उसे इतना गरम कर दिया और फिर उसके जवान बेटे ने जब उसे अपना गाड़ा गरम वीर्य पिलाया तोह उसके अंदर hi गर्मी बहार आने को पूरी तरह बेचैन हो गयी थी


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पर वो अपनी इस गर्मी को अपने आप से अलग नहीं कर पायी.. ककी उसके आगे बढ़ने से पहले hi उसकी जेठानी 'सविता' का आगमन हो गया था.. और वो किसी दहकती गरम भट्टी जैसे सुलग क रह गयी थी

ऐसे मैं अब सत्यम की ये नज़रें उसे चची भतीजे वाले प्रेम की नहीं, अपितु एक अलग रिश्ते की तरफ इशारा कर रही थी.. पर वो पूरी कोशिश कर रही थी वो अपने दमन पे कोई दाग न लगने दे

तभी मालती अपने हाथ को उठा क अपनी भिखरी लताओं को सही करती है तोह ुकि चूड़ियों की खनक सत्यम को उसकी तरफ बढ़ने क लिए मजबूर कर देती है, मालती बुरी तरह दर जाती है की ये ऐसे क्यू बाद रहा था, वो जल्दी से अपने आप को सँभालते हुए

"घर.. घर चलते है बीटा, वर्ण बारिश सुरु हो जाएगी"

सत्यम को भी जैसे होश आता है और वो मालती की खूबसूरती क बहुपस से खुद को आज़ाद करते हुए है में सर हिला देता है

सत्यम मन hi मन

'आज चची ज्यादा खूबसूरत लग रही है या मेरी हवस बाद गयी है'

मालती अब और समय नस्ट नहीं करती और तेज़ कदमो से होते हुए सत्यम क बगल से गुजर क आगे बाद चलती है, पर जैसे hi वो सत्यम क पास से गुजरती है सत्यम को एक भीनी भीनी सी कामुक खुसबू मिलती है और उसकी आँखें बंद होने लगती है.. वैसे इस खुसबू का सीधा असर उसके पैरों क बीचे भी नज़र आने लगा था

सत्यम भी एक लम्बी सांस चोरते हुए मालती क पीछे पीछे चल पड़ता है और जल्दी hi दोनों साथ साथ घर की तरफ आगे बाद रहे थे की तभी एक ठंडी हवा का झोंका सीधा आके मालती क चेहरे से टकराता है और उसके अंदर ठंडक भरता चला जाता है

"उफ्फ्फ्फ़ कितनी ठण्ड है आज सुबह सुबह"

सत्यम जो मालती क ठीक बगल चल रहा था वो ये सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता है, मालती उसकी तरफ देखते हुए धीरे से अपनी आँखों को तरेरते हुए कहती है

"इसमें हसने की किया बात है"

सत्यम- (एक पल चुप रहने क बाद) कुछ नहीं बस सोच रहा था.. आपको भी ठण्ड लगती है किया ?

मालती- (हस्ते हुए) क्यू मैं इन्शान नहीं हु..?

"इन्शान तोह आप है, पर इतनी गरम है की ठण्ड कैसे लग सकती है आपको"


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सत्यम ने एक मिनट रुकते हुए मुस्कुरा क कहा, ाहिर मज़ाक क रस्ते से hi सही उसके अंदर की गर्मी भी नज़र आने लगी थी.. वही मालती तोह बस शर्म से लाल hi हो पड़ती है और धीरे से मुस्कुराते हुए कहती है

"बदमाश"

सत्यम ने हिम्मत करके वापस पुराने रस्ते पे जाने की कोशिश करने का निर्णय लिया

"इसमें बदमाश वाली कोनसी बात है, किया आप नहीं मानती की आप बहुत गरम है"

मालती शर्म से लाल पद जाती है पर फिर धीरे से मुस्कुराते हुए कहती है

"तुझे अचे से पता होगा.. आखिर तूने सब कुछ देखा जो है"

मालती ये कह तोह देती है पर वो खुद hi शर्म से लाल हो जाती है, सायद उसे ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए था पर इसमें उसकी अकेले की गलती नहीं, आज सुबह सुबह उसके बेटे ने जो किया उसके बाद उसकी गर्मी का तापमान लगातार बढ़ता hi जा रहा है


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सत्यम जब ये सुनता है तोह उसे यकीन होने लगता है की खेल बीच मैं रुक गया था मोनू क कारन अब वो वापस से खेला जा सकता है.. इसलिए वो मुस्कुराते हुए कहता है

चची आपको याद है आपने एक वडा किया था.. ?

ये सुन्ना था की मालती क कानो मैं उसके hi कहे सब्द गूंजने लगते है और साथ hi साथ वो दिन मानो वापस से उसकी आँखों क आगे जीवित हो जाता है

टूबवेल क पास घास क ऊपर लेती हुई नंगी मालती


(रिफरेन्स - Part 01,

अपडेट 19, 20 न 21) 👇

[ सत्यम- (मुस्कुराते हुए) पक्का ग़ुस्सा दू न चची

मालती- (कामुकता से कांपती हुई आवाज़ मैं) हा... बीटा... घुसा.. दो.........

और उसका लुंड अपने एक हाथ से पकड़ क अपने पैरों को फैला क छूट को उसपे खुद hi रगड़ना सुरु कर देती हु

"आआआआह्ह्ह्ह... माआआआआ.... कितना तर्पयेगा बीटा.. आआआअह्ह्ह्ह... माआआआ..... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह....... उफ्फफ्फ्फ़......"

सत्यम- मोनू की कसम... घुसा दू...

मैं तोह जैसे अब कुछ सुन hi नहीं रही थी, बस यही चाहती थी की सत्यम बस मेरी छूट मैं अपना लुंड घुसा दे.. इसलिए बिना सोचे समझे फिर से कह देती हु

"है.. है... मोनू की कसम.. ग़ुस्सा दे कुत्ते....." ]

मेरी आँखों क आगे वो दिन और वो सब्द, और अपने hi बेटे की खाई कसम.. जैसे सब कुछ एक पल में पूरी तरह मुझपे हावी होने लगी थी, उस दिन बांकेलाल क कारन जो खेल अधूरा रह गया था वो कभी पूरा hi नहीं हो पाया था.. और आज सुबह से मेरी जो हालत थी.. इस याद ने उसमे घी डालने का कार्य कर दिया था

मैं बुरी तरह काँप उठी है, पर ये कंपकपी ठण्ड क कारन नहीं थी.. मैंने जल्दी से एक बार सत्यम को देखा और फिर इधर उधर देखते हुए धीरे से कहा

"भूल जाओ बीटा.. उस बात को"

सत्यम एक सार्ड और ठंडी सांस चोरते हुए

"आपका मखमली जिस्म कोई कैसे भूल सकता है चची.. पर आप फ़िक्र न करो, अगर कभी कुछ होगा तोह सिर्फ आपकी मर्ज़ी से hi होगा"

मालती क कदम तोह वही क वही मानो ठहर से गए थे और उसके दिल की धड़कन जोरो से भागने लगी थी.. उसके मुख से को सब्द hi नहीं निकल सका और आखिर वो बोलती भी किया

तभी सत्यम रुकी हुई अपनी खूबसूरत चची की तरफ देखते हुए

"बारिश मैं नहाने का मन है किया"

और ये बोलते हुए धीरे से मुस्कुरा पड़ता है, मालती को भी जैसे होश आता है और वो वापस से चल पड़ती है.. पर वो रह रह क सतयम को देख रही थी और उसके कानो मैं अब उसके कहे सब्द hi गूंज रहे था

'आपका मखमली जिस्म कोई कैसे भूल सकता है चची.. पर आप फ़िक्र न करो, अगर कभी कुछ होगा तोह सिर्फ आपकी मर्ज़ी से hi होगा'

इस बात ने उसपे न जाने कोनसा जादू कर दिया था, सायद आज मालती को पहली बार सत्यम में कोई बचा नहीं.. अपितु एक मर्द दिखने लगा था, और इस बात ने उसके जिस्म क रोये रोये को कामुकता से भरना सुरु कर दिया था

वही दूसरी तरह सत्यम क मन का हाल कुछ अलग था वो मालती क साथ चलते हुए खुद से कह रहा था

'बहनचोद ऐसे छोड़ने क चक्कर मैं और कितने झूट बोलने पड़ेंगे, बस ये साली एक बार मेरे नीचे आ जाये.. फिर देखना साले 'मोनू'.. कैसे तेरी माँ छोड़ता हु'

पर सत्यम क इरादों से पूरी तरह अनभिग मालती को आज उसके अंदर एक मर्द नज़र आने लगा था और कही न कही उसका जिस्म उस मर्द क हाथों पीसना च रहा था.. पर सवाल ये है की किया ऐसा होगा ?


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थ्रेड 'बारिश की वो रात'

ये मेरे एक मित्र की कहानी है, प्लीज पढ़िए और कमेंट करके उन्हें सुझाव दीजिये
 
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