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अपडेट #16
सन
#01
मोनू वापस महेंद्र क घर क आँगन में एक चारपाई पे लेता हुआ था
त्यागी जी- (रहस्य्मय माहौल का निर्माण करते हुए) अब अंतिम क्रिया बाकी है.. ?
हर किसी की नज़रें इस समय चारपाई पे लेते हुए बेहोश मोनू और उसके पास कड़ी सविता की पे hi तिकी हुई थी, तभी घर क पीछे बने नाम मात्र क स्नानघर की तरफ से त्यागी जी आते हुए नज़र आते है और उनके पीछे पीछे सत्तू एक बाल्टी उठाये हुए चला आ रहा था
त्यागी जी जल्दी hi सभी क सामने खड़े थे और उन्ही क पास सत्तू भी बाल्टी लिए हुए खड़ा था मानो त्यागी जी क अगले आदेश का इन्तिज़ार कर रहा हो
त्यागी जी- (अपनी आवाज़ मैं भारीपन और रहस्य उत्पन करते हुए) इस पानी मैं एक खास जल्दी बूटी मिले है और अब ऐसे धीरे धीरे मोनू क ऊपर सरीर पे डाला जायेगा, इसलिए अगर घर की सभी स्त्री चाहे तोह यहाँ से जा सकती है.. ककी मुझे बताने की जरुरत तोह है नहीं की मुझे मोनू क सरीर से सभी कपडे उतरने पड़ेंगे
त्यागी जी की बात सुनकर महेंद्र.. सविता, मालती, शीला और हर्षिता की तरफ देखते हुए
"तुम सभी अंदर चली जाओ"
मालती का मन बिलकुल नहीं था अपने बेटे को फिर से यु चोर क जाने का, पर वो अपने जेठ जी की बात नहीं ताल सकती थी.. इसलिए वो और उसके साथ बाकि औरते भी जल्दी hi अंदर की तरफ चल पड़ती है
जहा मालती, सविता और महेंद्र क कमरे मैं बने एक छोटे से मंदिर क आगे बैठ क प्राथना करने लगती है.. उसके कान तरसने लगे थे 'माँ' सब्द सुनने क लिए
यहाँ बहार त्यागी जी स्नानघर से जो बाल्टी भर पानी लाये थे उसमें उन्होंने कुछ खास जड़ी बूटियों को मिलाया था.. जिसके बारे मैं आगे पता चलेगा
त्यागी जी, मोनू क बेहोश पड़े सरीर क पास खड़े होक उसे देखते हुए
'आज तेरे जरिये में अपनी इस नयी जड़ी बूटी का असर भी देख पाउँगा'
फिर त्यागी जी अपनी सोच से बहार आते हुए सत्तू को इशारा करते है पर उससे पहले hi कुंदन आगे बढ़कर अपने बेटे यानि मोनू क सरीर से कपड़ों को अलग करने लगता है और जल्दी hi एक बार फिर से मोनू पूर्ण निवस्त्र था
पर अपनी बड़ी माँ की योनि मैं घरसँ क साथ चुदाई करने क बाद उसका लुंड अब सुप्त अवस्था में था
त्यागी, सत्तू से बाल्टी अपने पैरों क पास रखवाते है फिर अपने झोले से एक कपडा निकलता है जिससे एक अजीब सी गंध सी आ रही थी.. सायद उसमे भी किसी प्रकार की जड़ी बूटी का लैप लगा हुआ था
त्यागी जी एक बार सबकी नज़रें बचते हुए वही खड़े भानु की तरफ देखते है तोह उसे मन hi मन हसी आ जाती है
त्यागी जी मन hi मन
'मुझे पता है इस समय तेरी हालत उस नाग जैसी है, जिसने नेवले को निगल लिया हो.. और अब वो उसे न उगल सकता है, और न निगल सकता है'
त्यागी की सोच बिलकुल सही थी, ककी भानु भी कुछ ऐसी hi उलझन मैं फसा हुआ था
भानु मन hi मन
'कही ऐसा तोह नहीं की ये त्यागी मुझसे झूट बोल रहा है, और इस सपोले को होश आते hi ये मेरा नाम ले ले.. नहीं नहीं त्यागी का कहना है की उसने ऐसी जड़ी बूटियों का प्रयोग किया है की ऐसे अपने अंतिम समय का कुछ याद नहीं होगा
पर अगर कही इसने मुझे धोका दिया तोह..'
भानु ये सोचता है तोह उसकी मुट्ठियां ग़ुस्से से भक्ति चली जाती है
'अगर ऐसा हुआ तोह आज सबसे पहले मेरे हाथों यही त्यागी मरेगा, इन सबको तोह बाद मैं देखूंगा.. खून की होली खेली जाएगी इस घर मैं आज खून की'
भानु खुद को तैयार कर रहा था पर वो जब कुंदन को देखता है तोह मानो उसका जोश हवा होने लगता है
भानु खुद की सोच मैं खुद से कहते हुए
'त्यागी ने अगर खेल बिगाड़ा तोह आज मैं किसी को नहीं छोड़ूंगा, बस ये कुंदन अकेला भरी पद सकता है मुझपे.. समय आया तोह आज आर पार की लड़ाई होगी'
त्यागी, भानु को देखते हुए मंद मंद मुस्कुरा रहा था, मानो जैसे वो भानु क अंतर्मन मैं चलती बातों को भली भांति सुन प् रहा हो
महेंद्र- (जो कबसे त्यागी जी को खड़े खड़े कुछ सोचते हुए देख रहे थे) किया हुआ.. आगे बढिये
त्यागी जी मानो होश मैं आते हुए
"है.. है.."
त्यागी जी अपने हाथ मैं थामे हुए उस कपडे को उस जड़ी बूटी मिले हुए पानी मैं भिगोते है और फिर धीरे धीरे उसका पानी बेहोश पड़े मोनू क सरीर पे निचोड़ना सुरु कर देते है.. ये काम अगले 5-7 मं तक यही चलता रहता है की अचानक hi सभी को एक हलकी आह सुनाई पड़ती है
"मायआ..."
सभी क चेहरे पे मानो ज़माने भर की ख़ुशी एक साथ उभर आयी हो, हर कोई मोनू क पास आके खड़ा हो जाता है अगर किसी को सक था तोह सिर्फ भानु और सत्यम को
सत्यम अपने अंदर चलती आवाज़ को सुनते हुए
'ये मादरचोद त्यागी किया सच मैं इतना बड़ा वैद है'
भानु क मन का विचार
'कही होश आते hi मोनू मेरा नाम न ले ले'
इन दोनों क अलावा हर किसी को इस समय त्यागी जी सिर्फ एक वैद नहीं बल्कि कोई चमत्कार करने वाले पुरुष लग रहे थे
महेंद्र ख़ुशी से भरते हुए मन hi मन
'मुझे पूर्ण यकीन था, त्यागी भाई hi हमारे मोनू को ठीक कर सकते है'
वीरेंदर की आँखें ख़ुशी और हैरानी से बड़ी होती जा रही थी
'वाह त्यागी भैया ने तोह सच मैं चमत्कार कर दिया'
कुंदन
'आखिर मेरा बचा ठीक हो जायेगा'
हर किसी क मन में ख़ुशी की नयी लहर दौड़ पड़ी थी
तभी त्यागी जी उस बाल्टी का पानी जो अब बस थोड़ा सा hi बचा था उसे एक hi बार मैं मोनू क चेहरे पे उड़ेल देता है और ऐसे मैं जैसा होता है की इन्शान को सांस लेले मैं दिक्कत आने लगती है ठीक वही मोनू क साथ भी होता है अचानक सांस न ले पाने की वजह से उसका पूरा सरीर एक तीव्र हलचल पैदा करता है और अचानक hi इतने समय से बेहोशी की हालत मैं घूम मोनू अपनी जगह उठ क बैठ जाता है
मोनू- मायआ.......
आवाज़ इतनी तेज़ थी की अंदर तक सभी औरतों को सुनाई पद जाता है और सभी की सभी एक hi साथ बहार भाग पड़ती है
महेंद्र को अंदाज़ा हो गया था की अब सभी की सभी औरते यहाँ आने वाली होगी इसलिए वो जल्दी से अपने कंधे पे रखने वाले गमछा को मोनू क गुप्तांग यानि उसके लुंड क स्तन पे रख देता है
इधर अपने बेटे की आवाज़ सुनते hi प्राथना मैं लीं मालती क सरीर मैं मानो ऊर्जा का नया प्रवाह सा बहने लगा हो, वो जल्दी से बहार भगति हुई सभी से आगे मोनू क पास आती है और किसी भी बात की परवा किये बिना उसे गले से लगा लेती है.. इस समय अगर वह कुछ था तोह सिर्फ एक माँ बेटे का प्रेम
सिर्फ एक माँ की ममता, इस प्रेम मैं हवस और कामुकता का कोई भी अंश नहीं था
मालती- मोनू.. मेरे बचे.. मेरा बचा
मालती ये कहते हुए मोनू को कसके गले से लगा लेती है, पूरा hi वातावरण कुछ ऐसा हो चूका था की वह मौजूद सत्तू तक की आँखें भर आयी थी, बाकि मालती की आँखों से उसकी ममता तोह न जाने कबसे आंसुओं क रूप मैं बह hi रही थी
मोनू- (इतने समय बाद पहली बार कुछ कहता है) ाःह मा.. धीरे, लगता है मोती हो गयी हो
मोनू की बात पे वह खड़ा कुंदन तक है पड़ता है
मालती हस्ते और ममता रुपी आंसू बहते हुए उससे अलग होती है और पियर से उसके गालों पे मरते हुए
"नालायक अपनी माँ को मोती बोलता है"
सभी लोग एक बार फिर से है पड़ते है, बस भानु hi एक ऐसा था की उसे दर था की कही मोनू उसका नाम न ले ले
वीरू- बीटा तुम्हारे साथ उस दिन किया हुआ था, कोण था जिसने ये किया ?
वीरू जो अब तक कुछ नहीं बोलता था आखिर वो बोल पड़ता है, वैसे न जाने वो कबसे ये जानना च रहा था की वो कोण है जो उसके परिवार का अहित करना चाहता है इसलिए इतने समय बाद मोनू को होश मैं आते हुए देख क आखिर वो खुद को रोक नहीं पाटा ये सवाल पूछने से
वीरू क ये सवाल करते hi भानु की साँसे मानो रुकनी सुरु हो जाती है, उसे दर लगने लगता है की कही मोनू अब उसका नाम न ले ले
पर जब मोनू अपने छोटे चाचा की बात सुनता है और इस बारे मैं सोचता है तोह अचानक उसके सर मैं तीव्र दर्द सा महसूस होता है
उसे ऐसा लगता है वो जो याद करने की कोशिश कर रहा है वो उसके दिमाग में मौजूद hi न हो.. सिर्फ अँधेरा hi अँधेरा हो वह
मोनू- आआआआह्ह्ह्ह..........
मोनू को यु चीखते हुए देख क सभी लोग बुरी तरह दर जाते है वही मालती का तोह जैसे कजेला hi पहात पड़ता है, वो जल्दी से मोनू का चेहरा अपने हाथों क बीच लेते हुए
"किया हुआ मेरे बचे.. बोल न मोनू.. किया हुआ"
सभी काफी दर गए थे सिवाय त्यागी क ककी वो मुस्कुरा रहा था मानो उसे पता था की यही होगा
"आआह्ह्ह्ह.. पता नहीं माँ किया हुआ, मुझे कुछ याद नहीं आ रहा
ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ बस अंडकार जैसा है.. मुझे किया हुआ है था कुछ याद क्यू नहीं आ रहा है
मैं घर से खेतों क लिए निकला था पर फिर.. aaaaaaaaaahhhhh"
मोनू एक बार फिर से उन पलों को याद करने की कोशिश करता है पर एक बार फिर से उसके सर में वही दर्द सुरु हो जाता है
त्यागी जी- (बीच मैं बोलते हुए) तुम्हे परेशां होने की जरुरत नहीं है बीटा, इतने समय से बेहोश रहने का कारन कभी कभी अंतिम पलों की कुछ यादें मिट जाती है.. पर इस समय कुछ भी हो जाये तुम्हे अपने दिमाग पे बिलकुल भी जोर नहीं देना है
ककी अभी तुम शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो चुके हो.. इसलिए पूरी तरह स्वस्थ होने मैं समय लगेगा"
फिर त्यागी सभी की तरफ देखते हुए
"आप सब से भी मेरी विनती है की मोनू को किसी भी चीज़ क लिए परेशां न करे, और जितना ज्यादा हो सके उसे प्रेम दे.. ककी प्रेम hi वो असली दवा है तोह इस समय हमारे मोनू को चाहिए"
महेंद्र- (त्यागी जी की बात से सहमत होते हुए) आज क बाद कोई भी मोनू से ऐसी कोई बात नहीं पूछेगा जिससे उसे परेशानी हो.. बाकि समय क साथ साथ उसे सब कुछ खुद hi याद आ जायेगा, इसलिए सभी को उसके खान पान का खास धियान रखना है
त्यागी और महेंद्र की बात से सभी लोग बहुत खुस थे.. फिर सभी एक एक करके मोनू को गले लगते हुए उसके जल्दी से ठीक होने की कामना करते है
त्यागी जी सभी की तरफ देखते है फिर कुंदन और महेंद्र की तरफ देखते हुए
"वैसे तोह मोनू अब ठीक है पर पूर्ण स्वस्थ होने मैं उसे थोड़ा और समय लगेगा.. पर मैं चाहता हु की"
पर फिर त्यागी खुद hi रुक जाता है और मुस्कुरा क मोनू को देखते हुए कहता है
"अरे भाई पहले, मोनू को कुछ खिलाओ पिलाओ.. इतने समय से भूका होगा"
और फिर मोनू को देखते हुए है क कहते है
"और तू किया नंगा पुंगा बैठा है शर्म नहीं आती"
त्यागी जी की बात पे मोनू को अपनी इस्तिथि का आभास होता है उसे पता चलता है की वो पूर्ण नंगा है सिर्फ उसके लुंड क स्तन पे एक गमछा पड़ा हुआ है
त्यागी जी की बात पे पूरा घर है पड़ता है, इतने समय बाद जेक कही इस घर मैं हसी गुंजी थी तोह सबसे ज्यादा ख़ुशी महेंद्र को hi थी
महेंद्र- चलो चलो.. सबसे पहले मोनू को अंदर ले जेक कुछ पहना दो और फिर आज से 1 हफ्ते तक सिर्फ मोनू की पसंद का hi खाना बनेगा इस घर मैं
अपने बड़े तय जी की बात सुनकर मोनू खुसी से हाथ उठाते हुए
"ये हुई न बात"
उसी ऐसी बच्चों जैसी बात सुनकर सभी फिर से khil-khila से पड़ते है
जल्दी hi मोनू को सत्तू सहारा देके वापस अंदर वाले रूप मैं ले जाने लगता है, ककी शारीरिक रूप से मोनू अब भी बहुत कमजोर था उससे खुद से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था.. है वो अलग बात है की आज उसका लुंड कुछ ज्यादा hi खड़ा हो रहा था
सत्तू, हस्ते हुए धीरे से मोनू को अंदर ले जाते हुए उसके कान में कहता है
"खुद तोह खड़ा नहीं हो रहा, फिर ऐसे क्यू खड़ा करके रखा है"
मोनू अपनी कमर में वही गमछा लपेटे हुए था, जहा उसे एक बड़े से आकर का तम्बू बना हुआ नज़र आता है.. उसे पता hi नहीं चलता कब उसका लुंड खड़ा हो गया
मोनू- (धीरे से शरमाते हुए) पता नहीं भैया.. ये कैसे.. मतलब
सत्तू समझ जाता है की उसमें मोनू की कोई गलती नहीं, और वो नहीं चाहता था की मोनू अपने दिमाग पे ज्यादा जोर लगाए इसलिए हस्ते हुए अपनी बात कहता है
"अरे तोह किया हुआ, मेरा छोटा भाई असली मर्द है.. और खड़ा तोह मर्द का hi होता है न"
सत्तू जान क बात को ताल देता है, और फिर वो मोनू को अंदर ले जेक उसे वापस से चारपाई पे लिटा देता है.. जहा बाद मैं सत्तू hi उसके सरीर को कपडे से सूखा क उसे साफ़ कपडे पहना देता है
यहाँ बहार
सविता- (मालती की तरफ देखते हु) चल आज हम दोनों मोनू क लिए कुछ ाचा सा बनाते है कहने मैं
पर सविता की बात को त्यागी जी काट देते है
"नहीं भौजाई.. मोनू क सरीर की अभी मालिश होनी है, इसलिए मैं आपको तरीका बता देता हु ताकि बीच बीच मैं उसके सरीर की मालिश होती रहे
उसका सरीर अभी बहुत कमजोर है"
मालती- आप मुझे बता दीजिये मैं कर दूंगी, भाभी पहले hi इतना परेशां हो चुकी है
सविता- (पियर भरे ग़ुस्से से मालती को देखते हुए) किया कहा परेशां, है है मोनू मेरा तोह बचा है नहीं.. बड़ी आयी
सविता क इस अंदाज़ पे मालती क साथ साथ वह मौजूद सभी लोग है पड़ते है
त्यागी जी- (हस्ते हुए) अभी मैं भौजाई को बता दूंगा, फिर वो आप सभी को समझा देंगी ताकि कोई न कोई मोनू क मालिश करता रहे
फिर त्यागी जी सभी नज़रों से बचते हुए सविता की तरफ देख क
"क्यू.. है न भौजाई"
सविता का जिस्म कामुकता की एक हलकी लहर को महसूस करता है और वो भी 'है' में सर हिला देती है
सच तोह ये था की त्यागी जी क यु कहने की वजह से उसे एक पल क लिए वापस से अपनी योनि और गांड में 2 लुंड अंदर बहार होते हुए महसूस होने लगे थे

शीला- (इतने समय मैं पहली बार बोलते हुए) ठीक है, तब तक मैं और छोटी भाभी रसोई का काम देखते है
वही महेंद्र ने धियान दिया था की त्यागी सुरु मैं मोनू की सेहत को लेके कुछ बोलने वाले थे पर अचानक रुक गए थे, इसलिए वो कुंदन, वीरू और भानु को बहार चलने का इशारा करते हुए त्यागी जी की तरफ देख क कहते है
"त्यागी भाई हम सब बहार है, आप सविता को सब समझा क आइए.. फिर सब बढ़िया सी चाय पीते है"
फिर वो हर्षिता की तरफ देखते हुए
"बहु जरा अपने हाथों से मसाले वाली चाय बना दो"
हर्षिता मुस्कुराते हुए, है में सर हिला देती है

जल्दी hi सभी मर्द घर क बहार छप्पर क नीचे बैठे हुए थे, जिसमें से सबसे ज्यादा संतुष्ट भानु hi लग रहा था, ककी त्यागी ने जैसा कहा था आखिर वही हुआ
मोनू को बेहोश होने से पहले का कुछ याद नहीं, यानि वो उसका नाम भूल चूका है
भानु सबके साथ बैठे हुए सोचने लगता है
'अगर जब्बार ने मालती पे हमला करने की गलती न की होती, तोह आज उसे भी किसी बहाने वापस बुला सकता था.. पर उस मादरचोद ने पूरा खेल बिगड़ डाला'
तभी जैसे भानु क दिमाग में एक बात आती है और उसका चेहरा खिल सा जाता है, वो अपनी जगह से उठते हुए
"मैं जरा एक मं में आता हु"
भानु सबकी नज़रों से काफी दूर निकल आता है और फिर अपनी धोती में छुपाया हुआ एक फ़ोन निकल क किसी को फ़ोन मिलाने लगता है
भानु कान पे फ़ोन लगाए, दूसरी तरफ से फ़ोन उठने का इन्तिज़ार करने लगता है, और जल्दी hi उसकी ये ीचा पूरी भी होती है
दूसरी तरफ से
"कैसे याद किया भानु भाई, और आखिर कब तक हम दोनों को यहाँ पड़े रहना होगा"
भानु- (चारो तरफ देखते हुए) फ़िक्र मत करो, इसीलिए फ़ोन किया है.. अब समय आ गया है जब तुम्हे अपना खेल सुरु करना है
इसके आगे भानु फ़ोन पे उन्हें किया समझाता है, और वो किस्से बात कर रहा था ये आगे जानने को मिलेगा.. अभी हम करीब 2 जानते आगे चलते है यानि सूरज का ताप धीरे धीरे काम होना सुरु हो चूका था
सन
#02 
मोनू ने इस समय सिर्फ एक धोती पहनी हुई थी और ये धोती भी उसे सविता ने hi पहनाई थी
असल मैं त्यागी जी ने जाने से पहले सविता क हाथों उसके क पुरे सरीर पे एक खास जड़ी बूटी की मालिश सी करवाई थी.. जिस कारणवस मोनू को कुछ ज्यादा hi गर्मी महसूस हो रही थी
साथ hi साथ सविता क हाथों को इस बार मोनू ने पुरे होश में अपने सरीर पे महसूस किया था जिससे उसका लुंड कुछ ज्यादा hi बड़ा आकर लेके खड़ा हो चूका था
पर उस समय किया किया हुआ ये मैं थोड़ा आगे बताऊंगा.. अभी इस पल की बात करते है
मोनू का लुंड अब भी पहाड़ की ुचि छोटी सामान खड़ा हुआ था जिसे उसने धोती क कपडे से ऐसे एडजस्ट करने की कोशिश की थी की वो पता न चले
मोनू को सच मैं गर्मी महसूस हो रही थी, वर्ण जनुअरी क अंतिम दिनों और ऐसे ठन्डे मौसम मैं कोई लगभग पूर्ण निवस्त्र हो और उसे गर्मी लगे ये कोई आम बात तोह है नहीं
तभी कमरे में मुस्कुराती हुई मालती अंदर प्रवेश करती है.. जिसकी खूबसूरती और बालों से बहते हुए पानी को देख क मोनू को समझने में देरी नहीं लगती की उसकी खूबसूरत कामुक माँ नाहा क आयी है
मालती, मोनू क पास चारपाई पे बैठे हुए पियर से उसके सर पे हाथ फिरते हुए
"किया हुआ कुछ परेशां सा लग रहा है"
मोनू धीरे से मुस्कुराते हुए
"अब जिसकी माँ इतनी खूबसूरत हो और उन्होंने अभी तक अपने बेटे को पियर न किया हो वो परेशां नहीं होगा किया"
मालती को समझ नहीं आता वो मुस्कुराये या शर्माए, पर मोनू जो अपने अंदर बढ़ती गर्मी से परेशां था वो अपनी खूबसूरत माँ क सरीर से आती भीनी भीनी खुशबु क कारन अपना आप खो रहा था
मोनू धीरे से अपना एक हाथ उठा क मालती की साड़ी से नज़र आती उसकी गहरी नाभि पे रख क अपनी एक ऊँगली को उसकी गहरी नाभि में अंदर घुसा देता है

मालती जो इतने समय से, अपने बेटे क कारन कामुकता की जकड से दूर थी यु होश मैं आते hi अपने बेटे क द्वारा ऐसी हरकत पे मचल सी पड़ती है
"आआआआहहह... किया कर रहा है... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह"
मालती को मचलते देख मोनू अपनी ऊँगली को उसकी नाभि मैं और अंदर घुसा क घूमने से लगता है जिससे मालती और ज्यादा तरप दी पड़ती है
"ेस्स्स्सह्ह्ह... मत्तत्त कर बीटा.... Aaaaaaaaaahhhhh"
पर मोनू कहा रुकता है वो उसी प्रकार चारपाई पे लेते हुए, नाभि से अपनी ऊँगली निकल क अपनी माँ की अब भी गीले गोर और कामुक पेट पे अपने हाथ का पूरा पंजा रख क बुरी तरह मसल देता है
मालती अपने बेटे क हाथों अपने गोर और नंगे पेट क मसले जाने से और ज्यादा तरप उठी है
"ेस्स्स्सस्स्शह्ह्ह... माआट्त करररर.... मोनू"

मोनू मुस्कुराते हुए उसी प्रकार लेते लेते अपनी माँ क पेट को धीरे धीरे मसलना सुरु कर देता है और कहता है
"माँ आप मुझे पियर नहीं करती"
मालती अपनी आँखों को धीरे से खोलते हुए
"किया कहा, एक माँ अपने बेटे से पियर नहीं करती.. ऐसा कभी हो सकता है किया ?"
मोनू- (मुस्कुराते हुए) तोह सबूत दो माँ
मोनू ये कहते हुए अपनी माँ क नंगे पेट को मसलना चोर क वह से अपना हाथ हटा लेता है.. और अपनी धोती को एक hi झटके से खोल देता है जिससे उसका परेशां करता लुंड जो पूरी अकड़ क साथ आसमान की तरफ सर उठा क खड़ा था मालती को अपने दर्शन देने लगता है

मालती इतने समय बाद लुंड को इतनी पास से देखते हुए अपने अंदर एक बार फिर से गर्मी का प्रवाह महसूस करने लगती है
पर वो अपनी हिम्मत क साथ खुद पे काबू रखते हुए अपने मन मैं चल रही एक बात कहने से खुद को रोक नहीं पाती
मालती- (थोड़ा मायुश होक) नहीं बीटा.. ये सही नहीं है, मुझे कभी कभी लगता है ये सब तुम्हारे साथ जो हुआ कही उसकी वजह बरसात की वो रात तोह नहीं जिस दिन हमने वो पाप किया था.. या सायद वो पाप सिर्फ मैंने किया था
मालती ये कहते हुए अपना सर नीचे कर लेती है, उसकी आँखों मैं आंसू भर आये है.. और जो कामुकता उसपे हावी होने लगी थी वो वापस से हवा की तरह गायब होने लगती है
मोनू अपनी माँ की बात सुनकर परेशां नहीं होता उल्टा बस मुस्कुराता है और उठ क बैठे की कोशिश करता है पर इतने समय से लगातार बिस्तर पे पड़े रहने और सही से न खाने क कारन उसका सरीर बहुत कमजोर हो चूका था
मालती, मोनू को उठता हुआ देख क जल्दी से उसे सहारा देती है और मोनू उठ क बैठ जाता है और अपनी खूबसूरत माँ की आँखों मैं देखते हुए अपना एक हाथ आगे बड़ा क अपनी पियरी माँ क गालों पे चलता है और फिर कहता है
"मैंने ज्यादा दुनिया नहीं देखि, पर इतना जनता हु की कभी भी एक माँ की वजह से उसके बेटे का अहित नहीं हो सकता
बल्कि आज मैं अगर ज़िंदा हु तोह सिर्फ आपकी प्राथना और प्रेम क कारन, वर्ण वैसे तोह मुझे याद नहीं आ रहा उस दिन हुआ किया था पर किया पता आपका आशीर्वाद न होता तोह स्याद मैं मर..."
मोनू इतना hi बोल पता है की, मालती जल्दी से मोनू क मुंह पे हाथ रख देती है और ग़ुस्से से कहती है
"जोर से मरूंगी, अगर दुबारा मरने की बात की.. मरे तेरे दुश्मन"
मोनू पियर से अपने माँ का हाथ जो उसके मुंह पे था उसे चुम लेता है.. मालती शर्मा और मुस्कुरा पड़ती है और जल्दी से अपना हाथ हटा लेती है
"बदमाश"
मोनू वापस से हस्ते हुए
"वैसे मैंने सुना था की त्यागी चाचा कह रहे थे की.. मोनू को किसी बात क लिए परेशां न करना और उसे खूब प्रेम देना.. है न ऐसा hi कुछ कहा था न"
मालती जानती थी की उसका बीटा बात को कहा ले जाना चाहता है पर फिर भी वो है में सर हिला देती है
मोनू- (मुस्कुराते हुए) अब इतने बड़े वैद ने कहा है तोह आपको उनकी बात माननी चाहिए
मालती- ाचा जी.. तोह मैं अपने बेटे को प्रेम नहीं करती, किसने कहा ये
मोनू- करती होंगी, पर बिना साबुत क कैसे कोई माने
मालती- ाचा जी.. तोह तुम hi बताओ तुम्हारी ये माँ कैसे ये साबित करे को वो अपने बेटे से पियर करती है
मोनू जिसका लुंड अब भी अपना आकर लिए तन क खड़ा था उसकी तरफ इशारा करते हुए
"तरीका तोह सामने है"
मालती शर्मा सी जाती है
"बदमाश"
मोनू- प्लीज माँ.. पता नहीं क्यू ये बैठ नहीं रहा.. प्लीज.. प्लीज
मालती, मोनू की ऐसी हरकत देख क है hi पड़ती है
"देखो अभी तुम बहुत कमजोर है और ये सब तुम्हारे स्वस्थ क लिए सही है है"
मोनू- (हस्ते हुए आँख मार क कहता है) अरे मैं कोनसा कह रहा हु लुंड पे छूट रख क बैठ जाओ
मालती शर्म से लाल पद जाती है पर फिर मुस्कुराते हुए अपने बेटे क सीने पे पियर से मरते हुए
"बदमाश कही का.. कुछ भी बोलता है"
मोनू हस्ते हुए वापस से लुंड की तरफ इशारा करते हुए
"बस एक बार.. इतने समय बाद आपका बीटा होश मैं आया है और आप उसकी इत्ती छोटी सी ीचा नहीं पूरी कर सकती
ये किया बात होती है"
मालती एक पल क लिए कुछ सोचती है और फिर अपनी जगह से उठ क दरवाजे की तरफ जाने लगती है, वही अपनी माँ को यु जाते हुए देख क मोनू का मुंह लटक जाता है
पर ख़ुशी वापस तब लौट आती है जब वो देखता है की उसकी माँ दरवाजा अंदर से बंद कर रही है.. और फिर मालती दरवाजा बंद करने क बाद मुस्कुराते हुए मोनू को देखती है और अपने बालों का जुड़ा सा बनाते हुए उसकी तरफ आगे बढ़ने लगती है

मालती- (जिसकी नज़रें अब उसके बेटे क लुंड से हैट hi नहीं रही है) चल तुझे सबूत दे hi देती hi.. की तेरी ये माँ तुझसे कितना प्रेम करती है
कंटिन्यू..
सवाल कई है..
1- भानु फ़ोन पे किस्से बात कर रहा था ?
2- सविता ने फिर से मोनू की मालिश की.. तोह किया फिर से वही कामुकता का खेल हुआ ?
3- त्यागी, मोनू को लेके कोनसी बात कहना च रहा था.. जिसके लिए महेंद्र ने सभी को घर क बहार बुलाया ?
और न जाने ऐसे कितनी hi सवाल अभी भी बाकी है.. ??
सन
मोनू वापस महेंद्र क घर क आँगन में एक चारपाई पे लेता हुआ था
त्यागी जी- (रहस्य्मय माहौल का निर्माण करते हुए) अब अंतिम क्रिया बाकी है.. ?
हर किसी की नज़रें इस समय चारपाई पे लेते हुए बेहोश मोनू और उसके पास कड़ी सविता की पे hi तिकी हुई थी, तभी घर क पीछे बने नाम मात्र क स्नानघर की तरफ से त्यागी जी आते हुए नज़र आते है और उनके पीछे पीछे सत्तू एक बाल्टी उठाये हुए चला आ रहा था
त्यागी जी जल्दी hi सभी क सामने खड़े थे और उन्ही क पास सत्तू भी बाल्टी लिए हुए खड़ा था मानो त्यागी जी क अगले आदेश का इन्तिज़ार कर रहा हो
त्यागी जी- (अपनी आवाज़ मैं भारीपन और रहस्य उत्पन करते हुए) इस पानी मैं एक खास जल्दी बूटी मिले है और अब ऐसे धीरे धीरे मोनू क ऊपर सरीर पे डाला जायेगा, इसलिए अगर घर की सभी स्त्री चाहे तोह यहाँ से जा सकती है.. ककी मुझे बताने की जरुरत तोह है नहीं की मुझे मोनू क सरीर से सभी कपडे उतरने पड़ेंगे
त्यागी जी की बात सुनकर महेंद्र.. सविता, मालती, शीला और हर्षिता की तरफ देखते हुए
"तुम सभी अंदर चली जाओ"
मालती का मन बिलकुल नहीं था अपने बेटे को फिर से यु चोर क जाने का, पर वो अपने जेठ जी की बात नहीं ताल सकती थी.. इसलिए वो और उसके साथ बाकि औरते भी जल्दी hi अंदर की तरफ चल पड़ती है
जहा मालती, सविता और महेंद्र क कमरे मैं बने एक छोटे से मंदिर क आगे बैठ क प्राथना करने लगती है.. उसके कान तरसने लगे थे 'माँ' सब्द सुनने क लिए
यहाँ बहार त्यागी जी स्नानघर से जो बाल्टी भर पानी लाये थे उसमें उन्होंने कुछ खास जड़ी बूटियों को मिलाया था.. जिसके बारे मैं आगे पता चलेगा
त्यागी जी, मोनू क बेहोश पड़े सरीर क पास खड़े होक उसे देखते हुए
'आज तेरे जरिये में अपनी इस नयी जड़ी बूटी का असर भी देख पाउँगा'
फिर त्यागी जी अपनी सोच से बहार आते हुए सत्तू को इशारा करते है पर उससे पहले hi कुंदन आगे बढ़कर अपने बेटे यानि मोनू क सरीर से कपड़ों को अलग करने लगता है और जल्दी hi एक बार फिर से मोनू पूर्ण निवस्त्र था
पर अपनी बड़ी माँ की योनि मैं घरसँ क साथ चुदाई करने क बाद उसका लुंड अब सुप्त अवस्था में था
त्यागी, सत्तू से बाल्टी अपने पैरों क पास रखवाते है फिर अपने झोले से एक कपडा निकलता है जिससे एक अजीब सी गंध सी आ रही थी.. सायद उसमे भी किसी प्रकार की जड़ी बूटी का लैप लगा हुआ था
त्यागी जी एक बार सबकी नज़रें बचते हुए वही खड़े भानु की तरफ देखते है तोह उसे मन hi मन हसी आ जाती है
त्यागी जी मन hi मन
'मुझे पता है इस समय तेरी हालत उस नाग जैसी है, जिसने नेवले को निगल लिया हो.. और अब वो उसे न उगल सकता है, और न निगल सकता है'
त्यागी की सोच बिलकुल सही थी, ककी भानु भी कुछ ऐसी hi उलझन मैं फसा हुआ था
भानु मन hi मन
'कही ऐसा तोह नहीं की ये त्यागी मुझसे झूट बोल रहा है, और इस सपोले को होश आते hi ये मेरा नाम ले ले.. नहीं नहीं त्यागी का कहना है की उसने ऐसी जड़ी बूटियों का प्रयोग किया है की ऐसे अपने अंतिम समय का कुछ याद नहीं होगा
पर अगर कही इसने मुझे धोका दिया तोह..'
भानु ये सोचता है तोह उसकी मुट्ठियां ग़ुस्से से भक्ति चली जाती है
'अगर ऐसा हुआ तोह आज सबसे पहले मेरे हाथों यही त्यागी मरेगा, इन सबको तोह बाद मैं देखूंगा.. खून की होली खेली जाएगी इस घर मैं आज खून की'
भानु खुद को तैयार कर रहा था पर वो जब कुंदन को देखता है तोह मानो उसका जोश हवा होने लगता है
भानु खुद की सोच मैं खुद से कहते हुए
'त्यागी ने अगर खेल बिगाड़ा तोह आज मैं किसी को नहीं छोड़ूंगा, बस ये कुंदन अकेला भरी पद सकता है मुझपे.. समय आया तोह आज आर पार की लड़ाई होगी'
त्यागी, भानु को देखते हुए मंद मंद मुस्कुरा रहा था, मानो जैसे वो भानु क अंतर्मन मैं चलती बातों को भली भांति सुन प् रहा हो
महेंद्र- (जो कबसे त्यागी जी को खड़े खड़े कुछ सोचते हुए देख रहे थे) किया हुआ.. आगे बढिये
त्यागी जी मानो होश मैं आते हुए
"है.. है.."
त्यागी जी अपने हाथ मैं थामे हुए उस कपडे को उस जड़ी बूटी मिले हुए पानी मैं भिगोते है और फिर धीरे धीरे उसका पानी बेहोश पड़े मोनू क सरीर पे निचोड़ना सुरु कर देते है.. ये काम अगले 5-7 मं तक यही चलता रहता है की अचानक hi सभी को एक हलकी आह सुनाई पड़ती है
"मायआ..."
सभी क चेहरे पे मानो ज़माने भर की ख़ुशी एक साथ उभर आयी हो, हर कोई मोनू क पास आके खड़ा हो जाता है अगर किसी को सक था तोह सिर्फ भानु और सत्यम को
सत्यम अपने अंदर चलती आवाज़ को सुनते हुए
'ये मादरचोद त्यागी किया सच मैं इतना बड़ा वैद है'
भानु क मन का विचार
'कही होश आते hi मोनू मेरा नाम न ले ले'
इन दोनों क अलावा हर किसी को इस समय त्यागी जी सिर्फ एक वैद नहीं बल्कि कोई चमत्कार करने वाले पुरुष लग रहे थे
महेंद्र ख़ुशी से भरते हुए मन hi मन
'मुझे पूर्ण यकीन था, त्यागी भाई hi हमारे मोनू को ठीक कर सकते है'
वीरेंदर की आँखें ख़ुशी और हैरानी से बड़ी होती जा रही थी
'वाह त्यागी भैया ने तोह सच मैं चमत्कार कर दिया'
कुंदन
'आखिर मेरा बचा ठीक हो जायेगा'
हर किसी क मन में ख़ुशी की नयी लहर दौड़ पड़ी थी
तभी त्यागी जी उस बाल्टी का पानी जो अब बस थोड़ा सा hi बचा था उसे एक hi बार मैं मोनू क चेहरे पे उड़ेल देता है और ऐसे मैं जैसा होता है की इन्शान को सांस लेले मैं दिक्कत आने लगती है ठीक वही मोनू क साथ भी होता है अचानक सांस न ले पाने की वजह से उसका पूरा सरीर एक तीव्र हलचल पैदा करता है और अचानक hi इतने समय से बेहोशी की हालत मैं घूम मोनू अपनी जगह उठ क बैठ जाता है
मोनू- मायआ.......
आवाज़ इतनी तेज़ थी की अंदर तक सभी औरतों को सुनाई पद जाता है और सभी की सभी एक hi साथ बहार भाग पड़ती है
महेंद्र को अंदाज़ा हो गया था की अब सभी की सभी औरते यहाँ आने वाली होगी इसलिए वो जल्दी से अपने कंधे पे रखने वाले गमछा को मोनू क गुप्तांग यानि उसके लुंड क स्तन पे रख देता है
इधर अपने बेटे की आवाज़ सुनते hi प्राथना मैं लीं मालती क सरीर मैं मानो ऊर्जा का नया प्रवाह सा बहने लगा हो, वो जल्दी से बहार भगति हुई सभी से आगे मोनू क पास आती है और किसी भी बात की परवा किये बिना उसे गले से लगा लेती है.. इस समय अगर वह कुछ था तोह सिर्फ एक माँ बेटे का प्रेम
सिर्फ एक माँ की ममता, इस प्रेम मैं हवस और कामुकता का कोई भी अंश नहीं था
मालती- मोनू.. मेरे बचे.. मेरा बचा
मालती ये कहते हुए मोनू को कसके गले से लगा लेती है, पूरा hi वातावरण कुछ ऐसा हो चूका था की वह मौजूद सत्तू तक की आँखें भर आयी थी, बाकि मालती की आँखों से उसकी ममता तोह न जाने कबसे आंसुओं क रूप मैं बह hi रही थी
मोनू- (इतने समय बाद पहली बार कुछ कहता है) ाःह मा.. धीरे, लगता है मोती हो गयी हो
मोनू की बात पे वह खड़ा कुंदन तक है पड़ता है
मालती हस्ते और ममता रुपी आंसू बहते हुए उससे अलग होती है और पियर से उसके गालों पे मरते हुए
"नालायक अपनी माँ को मोती बोलता है"
सभी लोग एक बार फिर से है पड़ते है, बस भानु hi एक ऐसा था की उसे दर था की कही मोनू उसका नाम न ले ले
वीरू- बीटा तुम्हारे साथ उस दिन किया हुआ था, कोण था जिसने ये किया ?
वीरू जो अब तक कुछ नहीं बोलता था आखिर वो बोल पड़ता है, वैसे न जाने वो कबसे ये जानना च रहा था की वो कोण है जो उसके परिवार का अहित करना चाहता है इसलिए इतने समय बाद मोनू को होश मैं आते हुए देख क आखिर वो खुद को रोक नहीं पाटा ये सवाल पूछने से
वीरू क ये सवाल करते hi भानु की साँसे मानो रुकनी सुरु हो जाती है, उसे दर लगने लगता है की कही मोनू अब उसका नाम न ले ले
पर जब मोनू अपने छोटे चाचा की बात सुनता है और इस बारे मैं सोचता है तोह अचानक उसके सर मैं तीव्र दर्द सा महसूस होता है
उसे ऐसा लगता है वो जो याद करने की कोशिश कर रहा है वो उसके दिमाग में मौजूद hi न हो.. सिर्फ अँधेरा hi अँधेरा हो वह
मोनू- आआआआह्ह्ह्ह..........
मोनू को यु चीखते हुए देख क सभी लोग बुरी तरह दर जाते है वही मालती का तोह जैसे कजेला hi पहात पड़ता है, वो जल्दी से मोनू का चेहरा अपने हाथों क बीच लेते हुए
"किया हुआ मेरे बचे.. बोल न मोनू.. किया हुआ"
सभी काफी दर गए थे सिवाय त्यागी क ककी वो मुस्कुरा रहा था मानो उसे पता था की यही होगा
"आआह्ह्ह्ह.. पता नहीं माँ किया हुआ, मुझे कुछ याद नहीं आ रहा
ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ बस अंडकार जैसा है.. मुझे किया हुआ है था कुछ याद क्यू नहीं आ रहा है
मैं घर से खेतों क लिए निकला था पर फिर.. aaaaaaaaaahhhhh"
मोनू एक बार फिर से उन पलों को याद करने की कोशिश करता है पर एक बार फिर से उसके सर में वही दर्द सुरु हो जाता है
त्यागी जी- (बीच मैं बोलते हुए) तुम्हे परेशां होने की जरुरत नहीं है बीटा, इतने समय से बेहोश रहने का कारन कभी कभी अंतिम पलों की कुछ यादें मिट जाती है.. पर इस समय कुछ भी हो जाये तुम्हे अपने दिमाग पे बिलकुल भी जोर नहीं देना है
ककी अभी तुम शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो चुके हो.. इसलिए पूरी तरह स्वस्थ होने मैं समय लगेगा"
फिर त्यागी सभी की तरफ देखते हुए
"आप सब से भी मेरी विनती है की मोनू को किसी भी चीज़ क लिए परेशां न करे, और जितना ज्यादा हो सके उसे प्रेम दे.. ककी प्रेम hi वो असली दवा है तोह इस समय हमारे मोनू को चाहिए"
महेंद्र- (त्यागी जी की बात से सहमत होते हुए) आज क बाद कोई भी मोनू से ऐसी कोई बात नहीं पूछेगा जिससे उसे परेशानी हो.. बाकि समय क साथ साथ उसे सब कुछ खुद hi याद आ जायेगा, इसलिए सभी को उसके खान पान का खास धियान रखना है
त्यागी और महेंद्र की बात से सभी लोग बहुत खुस थे.. फिर सभी एक एक करके मोनू को गले लगते हुए उसके जल्दी से ठीक होने की कामना करते है
त्यागी जी सभी की तरफ देखते है फिर कुंदन और महेंद्र की तरफ देखते हुए
"वैसे तोह मोनू अब ठीक है पर पूर्ण स्वस्थ होने मैं उसे थोड़ा और समय लगेगा.. पर मैं चाहता हु की"
पर फिर त्यागी खुद hi रुक जाता है और मुस्कुरा क मोनू को देखते हुए कहता है
"अरे भाई पहले, मोनू को कुछ खिलाओ पिलाओ.. इतने समय से भूका होगा"
और फिर मोनू को देखते हुए है क कहते है
"और तू किया नंगा पुंगा बैठा है शर्म नहीं आती"
त्यागी जी की बात पे मोनू को अपनी इस्तिथि का आभास होता है उसे पता चलता है की वो पूर्ण नंगा है सिर्फ उसके लुंड क स्तन पे एक गमछा पड़ा हुआ है
त्यागी जी की बात पे पूरा घर है पड़ता है, इतने समय बाद जेक कही इस घर मैं हसी गुंजी थी तोह सबसे ज्यादा ख़ुशी महेंद्र को hi थी
महेंद्र- चलो चलो.. सबसे पहले मोनू को अंदर ले जेक कुछ पहना दो और फिर आज से 1 हफ्ते तक सिर्फ मोनू की पसंद का hi खाना बनेगा इस घर मैं
अपने बड़े तय जी की बात सुनकर मोनू खुसी से हाथ उठाते हुए
"ये हुई न बात"
उसी ऐसी बच्चों जैसी बात सुनकर सभी फिर से khil-khila से पड़ते है
जल्दी hi मोनू को सत्तू सहारा देके वापस अंदर वाले रूप मैं ले जाने लगता है, ककी शारीरिक रूप से मोनू अब भी बहुत कमजोर था उससे खुद से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था.. है वो अलग बात है की आज उसका लुंड कुछ ज्यादा hi खड़ा हो रहा था
सत्तू, हस्ते हुए धीरे से मोनू को अंदर ले जाते हुए उसके कान में कहता है
"खुद तोह खड़ा नहीं हो रहा, फिर ऐसे क्यू खड़ा करके रखा है"
मोनू अपनी कमर में वही गमछा लपेटे हुए था, जहा उसे एक बड़े से आकर का तम्बू बना हुआ नज़र आता है.. उसे पता hi नहीं चलता कब उसका लुंड खड़ा हो गया
मोनू- (धीरे से शरमाते हुए) पता नहीं भैया.. ये कैसे.. मतलब
सत्तू समझ जाता है की उसमें मोनू की कोई गलती नहीं, और वो नहीं चाहता था की मोनू अपने दिमाग पे ज्यादा जोर लगाए इसलिए हस्ते हुए अपनी बात कहता है
"अरे तोह किया हुआ, मेरा छोटा भाई असली मर्द है.. और खड़ा तोह मर्द का hi होता है न"
सत्तू जान क बात को ताल देता है, और फिर वो मोनू को अंदर ले जेक उसे वापस से चारपाई पे लिटा देता है.. जहा बाद मैं सत्तू hi उसके सरीर को कपडे से सूखा क उसे साफ़ कपडे पहना देता है
यहाँ बहार
सविता- (मालती की तरफ देखते हु) चल आज हम दोनों मोनू क लिए कुछ ाचा सा बनाते है कहने मैं
पर सविता की बात को त्यागी जी काट देते है
"नहीं भौजाई.. मोनू क सरीर की अभी मालिश होनी है, इसलिए मैं आपको तरीका बता देता हु ताकि बीच बीच मैं उसके सरीर की मालिश होती रहे
उसका सरीर अभी बहुत कमजोर है"
मालती- आप मुझे बता दीजिये मैं कर दूंगी, भाभी पहले hi इतना परेशां हो चुकी है
सविता- (पियर भरे ग़ुस्से से मालती को देखते हुए) किया कहा परेशां, है है मोनू मेरा तोह बचा है नहीं.. बड़ी आयी
सविता क इस अंदाज़ पे मालती क साथ साथ वह मौजूद सभी लोग है पड़ते है
त्यागी जी- (हस्ते हुए) अभी मैं भौजाई को बता दूंगा, फिर वो आप सभी को समझा देंगी ताकि कोई न कोई मोनू क मालिश करता रहे
फिर त्यागी जी सभी नज़रों से बचते हुए सविता की तरफ देख क
"क्यू.. है न भौजाई"
सविता का जिस्म कामुकता की एक हलकी लहर को महसूस करता है और वो भी 'है' में सर हिला देती है
सच तोह ये था की त्यागी जी क यु कहने की वजह से उसे एक पल क लिए वापस से अपनी योनि और गांड में 2 लुंड अंदर बहार होते हुए महसूस होने लगे थे

शीला- (इतने समय मैं पहली बार बोलते हुए) ठीक है, तब तक मैं और छोटी भाभी रसोई का काम देखते है
वही महेंद्र ने धियान दिया था की त्यागी सुरु मैं मोनू की सेहत को लेके कुछ बोलने वाले थे पर अचानक रुक गए थे, इसलिए वो कुंदन, वीरू और भानु को बहार चलने का इशारा करते हुए त्यागी जी की तरफ देख क कहते है
"त्यागी भाई हम सब बहार है, आप सविता को सब समझा क आइए.. फिर सब बढ़िया सी चाय पीते है"
फिर वो हर्षिता की तरफ देखते हुए
"बहु जरा अपने हाथों से मसाले वाली चाय बना दो"
हर्षिता मुस्कुराते हुए, है में सर हिला देती है

जल्दी hi सभी मर्द घर क बहार छप्पर क नीचे बैठे हुए थे, जिसमें से सबसे ज्यादा संतुष्ट भानु hi लग रहा था, ककी त्यागी ने जैसा कहा था आखिर वही हुआ
मोनू को बेहोश होने से पहले का कुछ याद नहीं, यानि वो उसका नाम भूल चूका है
भानु सबके साथ बैठे हुए सोचने लगता है
'अगर जब्बार ने मालती पे हमला करने की गलती न की होती, तोह आज उसे भी किसी बहाने वापस बुला सकता था.. पर उस मादरचोद ने पूरा खेल बिगड़ डाला'
तभी जैसे भानु क दिमाग में एक बात आती है और उसका चेहरा खिल सा जाता है, वो अपनी जगह से उठते हुए
"मैं जरा एक मं में आता हु"
भानु सबकी नज़रों से काफी दूर निकल आता है और फिर अपनी धोती में छुपाया हुआ एक फ़ोन निकल क किसी को फ़ोन मिलाने लगता है
भानु कान पे फ़ोन लगाए, दूसरी तरफ से फ़ोन उठने का इन्तिज़ार करने लगता है, और जल्दी hi उसकी ये ीचा पूरी भी होती है
दूसरी तरफ से
"कैसे याद किया भानु भाई, और आखिर कब तक हम दोनों को यहाँ पड़े रहना होगा"
भानु- (चारो तरफ देखते हुए) फ़िक्र मत करो, इसीलिए फ़ोन किया है.. अब समय आ गया है जब तुम्हे अपना खेल सुरु करना है
इसके आगे भानु फ़ोन पे उन्हें किया समझाता है, और वो किस्से बात कर रहा था ये आगे जानने को मिलेगा.. अभी हम करीब 2 जानते आगे चलते है यानि सूरज का ताप धीरे धीरे काम होना सुरु हो चूका था
मोनू ने इस समय सिर्फ एक धोती पहनी हुई थी और ये धोती भी उसे सविता ने hi पहनाई थी
असल मैं त्यागी जी ने जाने से पहले सविता क हाथों उसके क पुरे सरीर पे एक खास जड़ी बूटी की मालिश सी करवाई थी.. जिस कारणवस मोनू को कुछ ज्यादा hi गर्मी महसूस हो रही थी
साथ hi साथ सविता क हाथों को इस बार मोनू ने पुरे होश में अपने सरीर पे महसूस किया था जिससे उसका लुंड कुछ ज्यादा hi बड़ा आकर लेके खड़ा हो चूका था
पर उस समय किया किया हुआ ये मैं थोड़ा आगे बताऊंगा.. अभी इस पल की बात करते है
मोनू का लुंड अब भी पहाड़ की ुचि छोटी सामान खड़ा हुआ था जिसे उसने धोती क कपडे से ऐसे एडजस्ट करने की कोशिश की थी की वो पता न चले
मोनू को सच मैं गर्मी महसूस हो रही थी, वर्ण जनुअरी क अंतिम दिनों और ऐसे ठन्डे मौसम मैं कोई लगभग पूर्ण निवस्त्र हो और उसे गर्मी लगे ये कोई आम बात तोह है नहीं
तभी कमरे में मुस्कुराती हुई मालती अंदर प्रवेश करती है.. जिसकी खूबसूरती और बालों से बहते हुए पानी को देख क मोनू को समझने में देरी नहीं लगती की उसकी खूबसूरत कामुक माँ नाहा क आयी है
मालती, मोनू क पास चारपाई पे बैठे हुए पियर से उसके सर पे हाथ फिरते हुए
"किया हुआ कुछ परेशां सा लग रहा है"
मोनू धीरे से मुस्कुराते हुए
"अब जिसकी माँ इतनी खूबसूरत हो और उन्होंने अभी तक अपने बेटे को पियर न किया हो वो परेशां नहीं होगा किया"
मालती को समझ नहीं आता वो मुस्कुराये या शर्माए, पर मोनू जो अपने अंदर बढ़ती गर्मी से परेशां था वो अपनी खूबसूरत माँ क सरीर से आती भीनी भीनी खुशबु क कारन अपना आप खो रहा था
मोनू धीरे से अपना एक हाथ उठा क मालती की साड़ी से नज़र आती उसकी गहरी नाभि पे रख क अपनी एक ऊँगली को उसकी गहरी नाभि में अंदर घुसा देता है

मालती जो इतने समय से, अपने बेटे क कारन कामुकता की जकड से दूर थी यु होश मैं आते hi अपने बेटे क द्वारा ऐसी हरकत पे मचल सी पड़ती है
"आआआआहहह... किया कर रहा है... ेस्शह्ह्ह्हह्ह्ह्ह"
मालती को मचलते देख मोनू अपनी ऊँगली को उसकी नाभि मैं और अंदर घुसा क घूमने से लगता है जिससे मालती और ज्यादा तरप दी पड़ती है
"ेस्स्स्सह्ह्ह... मत्तत्त कर बीटा.... Aaaaaaaaaahhhhh"
पर मोनू कहा रुकता है वो उसी प्रकार चारपाई पे लेते हुए, नाभि से अपनी ऊँगली निकल क अपनी माँ की अब भी गीले गोर और कामुक पेट पे अपने हाथ का पूरा पंजा रख क बुरी तरह मसल देता है
मालती अपने बेटे क हाथों अपने गोर और नंगे पेट क मसले जाने से और ज्यादा तरप उठी है
"ेस्स्स्सस्स्शह्ह्ह... माआट्त करररर.... मोनू"

मोनू मुस्कुराते हुए उसी प्रकार लेते लेते अपनी माँ क पेट को धीरे धीरे मसलना सुरु कर देता है और कहता है
"माँ आप मुझे पियर नहीं करती"
मालती अपनी आँखों को धीरे से खोलते हुए
"किया कहा, एक माँ अपने बेटे से पियर नहीं करती.. ऐसा कभी हो सकता है किया ?"
मोनू- (मुस्कुराते हुए) तोह सबूत दो माँ
मोनू ये कहते हुए अपनी माँ क नंगे पेट को मसलना चोर क वह से अपना हाथ हटा लेता है.. और अपनी धोती को एक hi झटके से खोल देता है जिससे उसका परेशां करता लुंड जो पूरी अकड़ क साथ आसमान की तरफ सर उठा क खड़ा था मालती को अपने दर्शन देने लगता है

मालती इतने समय बाद लुंड को इतनी पास से देखते हुए अपने अंदर एक बार फिर से गर्मी का प्रवाह महसूस करने लगती है
पर वो अपनी हिम्मत क साथ खुद पे काबू रखते हुए अपने मन मैं चल रही एक बात कहने से खुद को रोक नहीं पाती
मालती- (थोड़ा मायुश होक) नहीं बीटा.. ये सही नहीं है, मुझे कभी कभी लगता है ये सब तुम्हारे साथ जो हुआ कही उसकी वजह बरसात की वो रात तोह नहीं जिस दिन हमने वो पाप किया था.. या सायद वो पाप सिर्फ मैंने किया था
मालती ये कहते हुए अपना सर नीचे कर लेती है, उसकी आँखों मैं आंसू भर आये है.. और जो कामुकता उसपे हावी होने लगी थी वो वापस से हवा की तरह गायब होने लगती है
मोनू अपनी माँ की बात सुनकर परेशां नहीं होता उल्टा बस मुस्कुराता है और उठ क बैठे की कोशिश करता है पर इतने समय से लगातार बिस्तर पे पड़े रहने और सही से न खाने क कारन उसका सरीर बहुत कमजोर हो चूका था
मालती, मोनू को उठता हुआ देख क जल्दी से उसे सहारा देती है और मोनू उठ क बैठ जाता है और अपनी खूबसूरत माँ की आँखों मैं देखते हुए अपना एक हाथ आगे बड़ा क अपनी पियरी माँ क गालों पे चलता है और फिर कहता है
"मैंने ज्यादा दुनिया नहीं देखि, पर इतना जनता हु की कभी भी एक माँ की वजह से उसके बेटे का अहित नहीं हो सकता
बल्कि आज मैं अगर ज़िंदा हु तोह सिर्फ आपकी प्राथना और प्रेम क कारन, वर्ण वैसे तोह मुझे याद नहीं आ रहा उस दिन हुआ किया था पर किया पता आपका आशीर्वाद न होता तोह स्याद मैं मर..."
मोनू इतना hi बोल पता है की, मालती जल्दी से मोनू क मुंह पे हाथ रख देती है और ग़ुस्से से कहती है
"जोर से मरूंगी, अगर दुबारा मरने की बात की.. मरे तेरे दुश्मन"
मोनू पियर से अपने माँ का हाथ जो उसके मुंह पे था उसे चुम लेता है.. मालती शर्मा और मुस्कुरा पड़ती है और जल्दी से अपना हाथ हटा लेती है
"बदमाश"
मोनू वापस से हस्ते हुए
"वैसे मैंने सुना था की त्यागी चाचा कह रहे थे की.. मोनू को किसी बात क लिए परेशां न करना और उसे खूब प्रेम देना.. है न ऐसा hi कुछ कहा था न"
मालती जानती थी की उसका बीटा बात को कहा ले जाना चाहता है पर फिर भी वो है में सर हिला देती है
मोनू- (मुस्कुराते हुए) अब इतने बड़े वैद ने कहा है तोह आपको उनकी बात माननी चाहिए
मालती- ाचा जी.. तोह मैं अपने बेटे को प्रेम नहीं करती, किसने कहा ये
मोनू- करती होंगी, पर बिना साबुत क कैसे कोई माने
मालती- ाचा जी.. तोह तुम hi बताओ तुम्हारी ये माँ कैसे ये साबित करे को वो अपने बेटे से पियर करती है
मोनू जिसका लुंड अब भी अपना आकर लिए तन क खड़ा था उसकी तरफ इशारा करते हुए
"तरीका तोह सामने है"
मालती शर्मा सी जाती है
"बदमाश"
मोनू- प्लीज माँ.. पता नहीं क्यू ये बैठ नहीं रहा.. प्लीज.. प्लीज
मालती, मोनू की ऐसी हरकत देख क है hi पड़ती है
"देखो अभी तुम बहुत कमजोर है और ये सब तुम्हारे स्वस्थ क लिए सही है है"
मोनू- (हस्ते हुए आँख मार क कहता है) अरे मैं कोनसा कह रहा हु लुंड पे छूट रख क बैठ जाओ
मालती शर्म से लाल पद जाती है पर फिर मुस्कुराते हुए अपने बेटे क सीने पे पियर से मरते हुए
"बदमाश कही का.. कुछ भी बोलता है"
मोनू हस्ते हुए वापस से लुंड की तरफ इशारा करते हुए
"बस एक बार.. इतने समय बाद आपका बीटा होश मैं आया है और आप उसकी इत्ती छोटी सी ीचा नहीं पूरी कर सकती
ये किया बात होती है"
मालती एक पल क लिए कुछ सोचती है और फिर अपनी जगह से उठ क दरवाजे की तरफ जाने लगती है, वही अपनी माँ को यु जाते हुए देख क मोनू का मुंह लटक जाता है
पर ख़ुशी वापस तब लौट आती है जब वो देखता है की उसकी माँ दरवाजा अंदर से बंद कर रही है.. और फिर मालती दरवाजा बंद करने क बाद मुस्कुराते हुए मोनू को देखती है और अपने बालों का जुड़ा सा बनाते हुए उसकी तरफ आगे बढ़ने लगती है

मालती- (जिसकी नज़रें अब उसके बेटे क लुंड से हैट hi नहीं रही है) चल तुझे सबूत दे hi देती hi.. की तेरी ये माँ तुझसे कितना प्रेम करती है
कंटिन्यू..
सवाल कई है..
1- भानु फ़ोन पे किस्से बात कर रहा था ?
2- सविता ने फिर से मोनू की मालिश की.. तोह किया फिर से वही कामुकता का खेल हुआ ?
3- त्यागी, मोनू को लेके कोनसी बात कहना च रहा था.. जिसके लिए महेंद्र ने सभी को घर क बहार बुलाया ?
और न जाने ऐसे कितनी hi सवाल अभी भी बाकी है.. ??
