Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed) - Page 18 - SexBaba
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Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed)

#133



तभी अचानक से सरला ने अपना लहंगा मेरे मुह पर फेंक दिया दो पल के लिए मैं उसमे उलझ गया और मंगू ने मुझ पर वार किया. ताकत में मंगू लगभग मेरे बराबर ही था . ऊपर से सरला के धोखा दिया था . मैं सकते में था पर मुझे साथ ही समझ आ रहा था की भैया कितने मजबूर रहे होंगे जब अपने दोस्त महावीर से लड़ना पड़ा था उन्हें पर मैं कमजोर नहीं था . मैंने मंगू को उठा कर पटका और एक लात सरला के पेट में मारी.

मंगू- सरला बचना नहीं चाहिए ये , अगर ये बचा तो फिर हमारे लिए मुसीबत हो जाएगी.

मैं- मुसीबत तो तुम्हरे लिए हो ही गयी है धोखेबाजो.

सरला उछल कर मेरी पीठ पर बैठ गयी और मेरे गले में अपने दोनों हाथ डाल कर गला दबाने लगी. आगे से मंगू ने भी अपने हाथ मेरी गर्दन पर कस दिए. मैं दोहरी गिरफ्त में था . मैंने मंगू के पैर पर लात मारी और खुद को बिस्तर पर गिरा लिया . सरला मेरे निचे आ गयी. मैंने उसकी पकड़ से छूटते ही दो तीन थप्पड़ दिए उसे और मंगू को धर लिया.

मैं पहले मंगू से निपटना चाहता था , सरला से मुझे दो सवालों के जवाब चाहिए थे .

एक पल मेरे दिमाग में ये ख़याल आया और इसी में मामला हाथ से निकल गया मंगू ने एक फावड़े से मेरे सर पर वार कर दिया. चोट जोरदार लगी थी आँखों के आगे तारे नाच गए . मंगू का अगला वार मेरी बाह पर हुआ फावड़े का नुकीला हिस्सा मेरी बांह में धंस गया था .

“आह ” मैं अपनी चीख नहीं रोक पाया .

मंगू- ये तो शुरुआत है कबीर. अपने बड़ो के कर्मो का फल छोटो को चुकाना पड़ता है तू खुशकिस्मत है जो तेरी तक़दीर में ये मुकाम आया.

मेरा सर भनभना रहा था , मंगू के लगातार वार मुझे कमजोर कर रहे थे . फावड़े की चोट मुझे बेहाल कर रही थी . हाथ पैर मारते हुए मेरे हाथ में मेरी बेल्ट आ गयी जो पास में ही पड़ी थी . मैंने उसे पकड़ा और मंगू के हाथ पर मारी . फावड़ा गिर गया. मैंने जोर लगाते हुए मंगू को धकेला और फावड़ा उठा लिया. अचानक से ही ये सब हुआ तन्न्न की जोरदार आवाज हुई और मंगू का सर फट गया.

नहीईईई “” सरला चीख पड़ी .

मैं- तेरा हिसाब बाद में करूँगा रुक जरा

पर सरला घाघ औरत थी , जितना मैं समझ रहा था वो उस से कहीं ज्यादा शातिर थी. उसने फुर्ती करते हुए मशाल बुझा दी . अचानक से हुए अँधेरे ने थोड़ी देर के लिए मुसीबत बढ़ा दी मेरी. मंगू ने मेरे पैरो पर वार किया .

मैं- मंगू ख़त्म करते है इस खेल को .

मैंने मंगू के अन्डकोशो पर जोरदार लात मारी वो जमीं पर गिर गया .मैं उसकी छाती पर बैठा और उसके गले पर अपनी गिरफ्त बढ़ा दी . वो हाथ पैर मारने लगा पर मुझ पर इतना उन्माद छा गया था की अब रुकने वाला था मैं

मैं- बस सब शांत हो जायेगा मंगू सब शांत हो जायेगा. भाई माना था तुझे पर तूने दगा किया कभी तुझे नौकर नहीं समझा पर न जाने क्यों तेरी आँखों पर लालच की पट्टी पड़ गयी देख आज तेरे आस पास कितना लालच है पर तू खाली हाथ जायेगा इस दुनिया से

इतना कह कर मैंने मंगू के गले पर और दवाब बढ़ा दिया . जब तक की वो हाथ पैर पटकता रहा धीरे धीरे उसका बदन शांत हो गया . मेरा दिल जल रहा था पर मैं रोया नहीं . उसकी लाश को एक बार भी नहीं देखा मैंने . इस बीच सरला वहां से भाग चुकी थी और मैं जानता था की वो कहाँ जाएगी.

पूरा गाँव अँधेरे में डूबा था . बिजली नहीं थी . पर मेरे कदम जानते थे की कहाँ जाना है. मैंने कविता के कमरे की खिड़की को हल्का सा धक्का दिया और अन्दर घुस गया . घर में सन्नाटा था पर मैं इस धोखे को जानता था . वैध के कमरे में जाते ही मैंने सरला को दबोच लिया .

“छोड़ कबीर मुझे ” सरला घुटी आवाज में बोली.

मैं- छुपने के लिए सबसे कमजोर जगह चुनी तूने. कहा था न तुझ पर भरोसा कर रहा हूँ भरोसा मत तोडना मेरा. तुझे क्या माना था मैंने और तू क्या निकली. पर फ़िक्र कर तुझे नहीं मारूंगा . तेरे खून से अपने हाथ गंदे नहीं करूँगा. मेरे सवाल है जवाब दे और सच बोलेगी तू वर्ना पूरा गाँव तेरा तमाशा देखेगा. उस रात कोचवान ने ऐसा क्या देख लिया था जो वो पागल हो गया था

सरला-उसने मुझे परकाश से चुदवाते हुए देख लिया था .

इस नए खुलासे ने मुझे हैरान कर दिया था. परकाश मादरचोद तीनो रंडियों को पेल रहा था.

सरला- सबसे पहले हम तीनो को छोटे ठाकुर ने चोदा था . पर फिर रमा का मोह टूट गया उसने महावीर ठाकुर से यारी कर ली . महावीर ठाकुर सहर से लौटे थे . रमा उनके किस्से बताती हमको. कविता को भी चोद चुके थे वो और फिर मैं भी उनके साथ सो ली. महावीर ठाकुर शहर से काफी चीजे लाते हमारे लिए. तरह तरह की रंगीन किताबे दिखाते और वैसे ही चोदते हमको. अलग तरह के कपडे लाते खुद सजाते हमको . पर फिर एक रात खबर आई की महावीर ठाकुर मर गए. छोटे ठाकुर उसी दौरान गायब हो गए थे .

वक्त बड़ा नाजुक हो गया था . रमा गाँव छोड़ कर मलिकपुर में पहले ही बस चुकी थी . मैंने और कविता ने निर्णय लिया की अब ये अब बंद करेंगे . और ऐसा हमने किया भी . कुछ साल ऐसे ही बीत गये पर मुसीबत फिर से लौट आई. इस बार परकाश था न जाने कैसे उसके पास हम तीनो की नंगी तस्वीरे थी जिसमे हम महावीर के साथ सम्भोग में लिप्त थी . वो भी हमसे जिस्म ही चाहता था . बेशक हम को उन तस्वीरों से फर्क नहीं पड़ना था गाँव में तो बदनाम थे ही पर फिर रमा के कहने पर हम ने उस से भी नाता जोड़ लिया. पर उसको कविता सबसे ज्यादा पसंद थी . उस रात जब मेरे पति के साथ वो घटना हुई तब मैं और परकाश जंगल में मोजूद थे. परकास के शौक भी निराले थे वो अपने साथ जानवरों की पोशाके लाता था वो पहन कर हम लोग जंगल में चुदाई करते थे .

उस रात बदकिस्मती से मेरा पति उस तरफ निकल आया. जंगल में अफवाहे तो फैली हुई ही थी , मेरे पति ने हम दोनों को आदमखोर या डाकन समझ लिया और उसे दौरा पड़ गया . परकाश के पास कोई दवाई थी जो उसने मेरे पति को दी जिस से उसकी हालात और ख़राब हो गयी. प्रकाश ने गाँव में नकली ओझा भी बुलाया था जिसने अफवाहों को गर्म कर दिया हर कोई ये समझने लगा की जंगल में डायन है पञ्च के लड़के को भी प्रकाश ने ही वो दवाई पिलाई थी .

अब मुझे परकास के घर में मिली उन पोशाको का राज समझ आ गया था दवाई उसे कविता देती होगी.

मैं- अपने पति को मौत का रास्ता दिखा दिया तूने .

सरला कुछ नहीं बोली.

मैं- वैध को क्यों जान देनी पड़ी.

सरला- वैध जंगल में बहुत दखल दे रहा था हर रात ही पता नहीं क्या करने जाता था वो हम लोगो को उसकी वजह से परेशानी हो रही थी इसलिए उसे रस्ते से हटाना पड़ा.

मैं- परकाश ने ही कहा हो गा की कबीर से सम्बन्ध बना ले

सरला ने हाँ में सर हिलाया

मैं- परकाश क्या चाहता था .



सरला- वो महावीर के कातिल को तलाश रहा था ..
 
खत्म ही नहीं हो रही क्या करू यार
 
#134



मैं- परकाश क्यों तलाश रहा था महावीर के कातिल को

सरला- उसने कभी बताया नहीं .

मैं- तुझे क्या लगता है कौन हो सकता है उसका कातिल

सरला- इतनी बड़ी दुनिया है कोई भी हो सकता है

मैं- तू भी हो सकती है

सरला- तुम्हे लगता है ऐसा.

मैं- तुम तीनो औरते किसकी हुई, न अपने पतियों की न अपने आशिको की

सरला- माना हम तो बदनाम थे कुंवर . तुम तो नहीं थे न, तुमको भी मुझसे चूत ही तो चाहिए थी. मेरी मदद के बहाने तुमने भी तो भोग ही लिया न मुझे . तुम जो बड़े इमानदार , धर्मात्मा हो तुमने खुद को क्यों नहीं रोका कैसे मेरे एक इशारे पर बिस्तर में घुस गए. तुम्हारी हवस दोस्ती हमारी हवस रंडी पना ये तो दोगलापन हुआ न कुवर. औरतो को सम्भोग के अलावा क्या ही समझा है इस तुम लोगो ने . मेरी पीठ पर जो वार है तुम्हारे , वो मेरी पीठ पर नहीं मेरी आत्मा पर है , याद करो तुमने ही तो मुझसे कहा था की चाहे जो करो मंगू को चूत का लालच दो पर उस से राज उगलवा लो . फिर क्यों आग लग गयी तुम्हारे सीने में उसके साथ सोते देख कर मुझे.

“इमान की बड़ी बड़ी बाते करने वाले कुंवर तुम कितने बेईमान हो ये कौन बताएगा ” सरला की बात से बड़ी गहरी चोट पहुंची थी मुझे.

सरला- तुम्हारे संपर्क में आने के बाद मैंने जाना था की मैंने आज तक जो जी वो तो जिन्दगी थी ही नहीं. तुम्हारे साथ रह कर मैंने सीखा था की रिश्तो की अहमियत कैसी होती है रिश्ते कैसे निभाए जाते है . मैं अपनी आत्मा की सौगंध खाती हु मैंने कभी तुम्हारा बुरा नहीं सोचा. जब प्रकाश ने मुझे कहा की मैं तुम्हारे साथ सम्बन्ध बना लू तो मैं सोचने पर मजबूर हो गयी की क्या प्रयोजन हो सकता है उसका. जिस राह पर तुम चलना चाहते थे उस राह पर वो तुमको रोकना चाहता था . मेरी कभी कोई मज़बूरी नहीं थी की मैं परकाश से चुदु मैं बस जानना चाहती थी की महावीर को किसने मारा, छोटे ठाकुर कहा है

मैं- हरिया , उसका क्या दोष था उसे क्यों मरवाया तुमने

सरला- उस रात से पहले तुम कितना जानते थे उसके बारे में .

मेरे पास कोई जवाब नहीं था

सरला- नाकाम आदमी दो पैसे का नशा करके अपनी कुंठा परिवार पर उतारता है . मैंने उस से कभी नहीं छिपाया की मैं किस किस से चुदती हूँ , चोदने वाले मुझे वो सब देते थे जिस से मैं अपने बच्चो को पाल पाती थी . हरिया का मन ही नहीं था कमाने के लिए, जितना कमाता दारू में उड़ा देता. कुछ कहती तो मारता मुझे. मैं लाख गलत थी कुंवर पर यदि आदमी अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाए तो औरत घर से बाहर कदम क्यों उठायेगी. क्या कहा था तुमने रंडी, हाँ हूँ मैं रंडी पर मुझे रंडी बनाया किसने, मैं तुमसे पूछती हूँ. छोटे ठाकुर की बुरी नजर क्यों पड़ी मुझे, अरे तुम लोग गाँव के मालिक हो. हम सबको संभालना तुम्हारा काम है पर जब बाड़ ही खेत को खाएगी तो रखवाली कौन करेगा. आज मेरा अन्दर की रंडी दिखती है सबको खैर इन बातो का कोई मोल नहीं है कुंवर. ये दुनिया हमेशा से एक रिश्ते को समझती आई है वो है तन का रिश्ता. कहने को हम इन्सान है पर जानवरों से भी गए गुजरे है . तुम बेशक मुझे मार कर इस किस्से को ख़त्म कर सकते हो मुझे अफ़सोस नहीं होगा.

मैं- मैंने कहा न तुझे नहीं मारूंगा . मुझे दुःख हुआ जो तूने धोखा दिया .

सरला- हम सब नकाब ओढ़े हुए है हम सब किसी न किसी को धोखा दे ही रहे है

मैं- वो कौन सा ठिकाना था जहाँ महावीर तुझे चोदता था .

सरला- कुंवे पर बने कमरे में

मैं- उसके आलावा

सरला- मैंने हमेशा सच बताया था उस बारे में तुमको

मैं- परकाश कहा चोदता था

सरला- इस घर में , हमारे मिलने का सबसे सुरक्षित ठिकाना था ये घर , वैध ज्यादातर घर होता ही नहीं था , रोहताश शहर में था मेरे और कविता के लिए सबसे बढ़िया जगह यही थी .

मैं- तो फिर जंगल में जानवरों की पोशाके पहन कर क्यों चुदाई होती थी.

सरला- परकाश चाहता था की जंगल सुनसान रहे . जंगल में जितने भी खून हुए सब प्रकाश ने किये . और परकाश को मंगू ने मारा.

इस चीज जो मुझे सबसे जायदा परेशां किये हुए थी वो थी की अगर महावीर इन सबको चोदता था तो फिर इन तीनो औरतो को खंडहर वाले कमरे के बारे में क्यों नहीं मालूम . इन्होने हमेशा ये ही कहा की जब जब चुदी कुवे वाले कमरे में चुदी , खंडहर का जिक्र क्यों नहीं किया इन्होने. जबकि वो तस्वीरे वो बिस्तर चीख चीख कर कहता था की यहाँ पर खूब अय्याशी की गयी है. जब इन औरतो ने तमाम बाते कबूल ही ली थी तो फिर खंडहर की बात क्यों छिपा रही थी क्या ये सच में उस जगह के बारे में नहीं जानती थी ,इनको क्या मिलता उस जगह को छिपा के.

खेल इतना भी सरल नहीं था जितना मैं समझ रहा था . जंगल में ऐसा क्या छिपा था जो साला मुझे नहीं मिल रहा था . बाप ने जंगल में सोने की खान खोज ली थी हम साला खंडहर में कौन आता जाता था ये नहीं मालूम कर पा रहे थे .

मैं- क्या रे साहब ने तुझे कभी चोदा

सरला- कितनी बार पूछोगे

मैं- ऐसा क्या है जो तू जानती है मैं नहीं

सरला- मैं बस इतना जानती हूँ की तुम भी नंगे हो मैं भी नंगी.

मैं- कहती तो सही है तू . वैसे वो कौन सी दवाई थी जो वैध के यहाँ से चुरा के परकाश को दी जाती थी .

सरला ने कुछ शीशिया टटोली और फिर एक सीशी मुझे दे दी.

मैं- रात बहुत बीती जा लौट जा

सरला- मुझे जिन्दा छोड़ रहे हो .

मैं- कहा न जा लौट जा . तेरा दोष नहीं है जिस जिस को अपना समझा है साले सब ही धोखेबाज़ निकले जब इतने लोगो से धोखा खाया है तो एक और सही .



सरला एक पल को मेरे पास हुई और मेरे होंठो पर अपने होंठ रख दिए उसने. मैंने अपनी आँखे बंद कर ली. उसके जाने के बाद भी मैं बस यही सोचता रहा की अगर ये तीन औरते नहीं तो फिर कौन ............... वो कौन थी जो खंडहर पर बने कमरे में आती थी .
 
फाग नजदीक ही तो है फिर खुद ही देख लेना जब कबीर उसे लेने जाएगा. मैंने कभी नहीं छिपाया निशा को हमले की रात तक वो कबीर के साथ थी और बस ही एक रात बीती है कहानी मे एक रात की दूरी को छिपाना कहते है क्या. मैंने हमेशा कहा निशा डाकन है इसका मतलब है कि वो है :D

लेखक का काम है पाठकों को भटकाना मैं वो कर रहा हूं :cool:. मुझे जैसे ही वो जगह मिल जाएगी बता दूँगा
 
आपकी सहायता से कहानी 20 लाख व्यू पार कर गई है मित्रों
 
उम्मीद है कि कुछ रोमांच होगा
 
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