Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed) - Page 17 - SexBaba
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Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed)

#127



मैं- होगा, इस बार फाग मैं ऐसा खेलूँगा की किसी ने नहीं खेला होगा.

भैया- तूने ऐसा किया तो गुलाल की जगह रक्त की ही होगी ये होली

मैं- किसे परवाह है भैया, जानते है दुनिया उसे क्या कहती है डाकन . मैंने एक डाकन का हाथ थामा है , खुशनसीबी है ये मेरी की वो मेरी जिन्दगी में आई .

भैया- काश ये मुझे पहले मालूम होता

मैं- आशिको पर क्या जोर किसी का भैया, वैसे भी आपने मुझसे वादा किया हुआ है की मैं जहाँ चाहूँ जिस से चाहूँ आप मेरी शादी करवा देंगे.

भैया-मैं आज भी अपनी बात पर कायम हूँ , निशा के अलावा तो किसी की तरफ भी इशारा कर

मैं- निशा नहीं तो फिर कोई नहीं

भैया- मुझे धर्म संकट में मत डाल छोटे,

मैं- साथ नहीं दे सकते तो मुझे रोकना भी मत भैया.

भैया- नंदिनी तुम ही समझाओ इसे कुछ

मैं- भाभी ने हमारे प्रेम को आशीर्वाद दे दिया है

भैया ने भाभी की तरफ देखा और बोले- ये क्या अनर्थ किया तुमने नंदिनी क्या कर दिया ये तुमने

भाभी- अपनी मोहब्बत के लिए तुम जमाने से अड़ गए थे अभी, और अगर अपने बच्चे के हक़ के लिए हम खड़े नहीं होंगे तो फिर कौन होगा.

भैया- सब जानते हुए भी नंदिनी

भाभी- हाँ सब जानते हुए . सब समझते हुए.

भैया- ये जानते हुए भी की क्या कीमत चुकानी पड़ेगी.

भाभी- कब तक कोई न कोई ये कीमत चुकाता रहेगा अभी कब तक कोई न कोई तो खड़ा होगा न . आखिर कब तक अभी कब तक , आपको क्या लगता है कबीर रुक जायेगा. आशिक किस हद तक जा सकते है आपसे बेहतर कौन जानता है .

भैया- नंदिनी, मुझे मेरे भाई की फ़िक्र है

भाभी- आप अपने भाई को जानते है न , आपसे ज्यादा कौन जानता है इसे .

भैया- फिलहाल हमें घर चलना चाहिए . वैसे भी सुबह होने में अब ज्यादा देर बची नहीं है .

मैं समझ गया था की भैया भाभी के आगे त्रिदेव की कहानी नहीं बताना चाहते थे या फिर वो कहानी भाभी भी ठीक से नहीं जानती होंगी. पर इस रात ने मुझे आदमखोर वाली चिंता से मुक्त कर दिया था फिलहाल के लिए तो ऐसा ही मान लिया मैंने.कमरे से निकलने से पहले मैंने एक नजर फिर से उन दीवारों पर डाली जिन्होंने न जाने क्या क्या देखा था . एक बार फिर मुझे लगा की वो कुछ कहना चाहती है मुझसे पर तभी भैया ने चिमनी बुझा दी और हम लोग कुवे पर आ गए. भैया ने गाडी स्टार्ट की और हम घर की तरफ चल दिए जहाँ पर मातम हमारा इंतज़ार कर रहा था .

मैंने किसी से कुछ भी नहीं कहा . एक खाली कोना पकड़ा और मेरी आँखे नींद में डूब गयी. शायद नींद ही मरहम की तरह थी उस वक्त. जब मैं जागा तो देखा की पंडाल, मंडप हटा दिए गए थे . लाशे भी हटा दी गयी थी. जो सामान रह गया था वो इधर उधर बिखरा पड़ा था जैसे किसी ने परवाह ही नहीं की थी उसकी.अंजू मेरे पास आई और बोली- मंगू का कल रात से कुछ पता नहीं है.

मैं- तलाश लूँगा उसे भी. फिलहाल भैया कहा है ये बताओ मुझे .

अंजू- जंगल में

मैं- समझ गया .

मैं तुरंत जंगल की तरफ दौड़ पड़ा. मैं जानता था की भैया मुझे कहा मिलेंगे. वो ठीक मुझे वहां पर मिले जहाँ से ये कहानी शुरू हुई थी, मतलब जहाँ पर कोचवान हरिया पर हमला हुआ था .

भैया- आ गया तू

मैं- आना ही था .

भैया- मैं नहीं जानता की इसके बाद तू क्या सोचेगा . क्या समझेगा पर मैंने निर्णय कर लिया है की तुझे वो सब बताया जाये जो शायद नहीं होना चाहिए था . कहते है की वक्त बलवान होता है , वक्त अपने अन्दर न जाने क्या छिपाए होता है पर तब तक जब तक की कोई वक्त को थाम ने ले. जैसे तूने वकत के पहिये को थाम लिया उसे वापिस से उस दिशा में घुमा दिया जो मैंने कभी नहीं सोचा था .

“त्रिदेव , हाँ हम त्रिदेव ही तो थे, दोस्ती की ऐसी मिसाल जो सबने देखि थी , ये जंगल हमारा घर था . इसने हमारी चढ़ती जवानी को थामा . इसमें खेल पर हम बड़े हुए. हम सोचते थे की इस जंगल को हमसे बेहतर कोई नहीं जानता था पर कहते है न की आधी दुनिया भ्रम में जीती है . मैं भी ऐसे ही भ्रम में था की दोस्ती से बड़ा कुछ नहीं होता. कम से कम मेरे लिए तो बिलकुल नहीं .” भैया ने ये कह कर अपनी सांसो को थामा थोड़े समय के लिए

भैया-ये बरगद का पेड़ देख छोटे, इसकी शाखाओ पर तुझे वो तीन नाम बहुत सी जगह पर खुदे मिलेंगे जो तुझे परेशां किये हुए है MAP जिस तरीके से हमने ये लिखे कोई भी उस तीसरे छिपे हुए नाम को नहीं समझ सकता था सिवाय हमारे. सब कुछ बड़ा सही था पर हमें ये नहीं मालूम था की इस जंगल में हमसे पहले भी कोई अपनी जिन्दगी जी गया है या जी रहा है , हम नादान तो बस ये ही समझते थे की हम तीनो ही मालिक है इस जंगल के

मैं- अभिमानु, परकाश के अलावा वो तीसरा नाम किसका था भैया

भैया- महावीर ठाकुर का

भैया ने एक गहरी सांस ली . हम दोनों के बीच सन्नाटा छा गया .

भैया त्रिदेवो की तीसरी कड़ी महावीर ठाकुर. उबलती जवानी के जोश से भरे तीन युवाओ की कहानी, त्रिदेव की कहानी जो शुरू हुई उस दोपहर से जिसने हम तीनो की जिंदगियो को बदल दिया. और बदलने वाला कोई और नहीं था सिवाय चाचा के . जैसा मैंने कहा चाचा भी इस जंगल को खुद का हिस्सा मानता था . चाचा को हमने एक दोपहर रमा के साथ देखा , जिन्दगी में ये पहली बार था पर चूँकि मैंने चाचा के बारे में गाँव के लोगो से बहुत सुना था आज देख भी लिया. मुझे उसी दिन से घर्णा हो गयी थी उस से.

“पर कहाँ जानता था की चाचा और रमा को आपतिजनक अवस्था में देखना आगे जाकर क्या करवा देगा. कुछ दिनों बाद महावीर बाहर चला गया पढने के लिए रह गए मैं और प्रकाश . सब ठीक ही था की एक दिन रमा के पति की लाश मिली. और फिर ये सिलसिला शुरू हो गया . पिताजी भी कम नहीं थे चाचा से अय्याशी के मामले में पर उनकी छवि मजबूत थी गाँव में . रमा वो औरत थी जिसके लिए दोनों भाइयो में दरार पड़ गयी बहुत से लोग ऐसा कहते है पर सच मैं जानता हूँ , सच था वो सोना . वो सोने की खान जो मुझे विश्वास है की तूने जान लिया होगा उसके बारे में . ” भैया ने कहा .

मैं- जान लिया है .

भैया- उस खान के बारे में सिर्फ और सिर्फ पिताजी को मालूम था उन्होंने ही तलाश की थी उसकी कैसे ये कोई नहीं जानता पर चाचा को न जाने कैसे ये मालूम हो गया. अपनी अय्याशियों के लिए वो सोना चुराने लगा. पिताजी को ये बात जब मालूम हुई तो दोनों में कलेश हो गया . थोडा वक्त और बीता और महावीर वापिस लौट आया .



मैं- फिर , फिर क्या हुआ ................
 
#128



भैया- वो हुआ जो नहीं होना चाहिए था . पिताजी और चाचा में तल्खी इतनी बढ़ गयी थी की चाचा ने घर आना छोड़ दिया था . न जाने वो कहाँ गायब रहता . मैंने तहकीकात की मालूम हुआ की वो रमा के पास भी नहीं जाता उसने कविता से भी नाता तोड़ लिया था . कभी कभी वो कुवे पर आता. न जाने किस परेशानी में डूबा था वो . मेरे लिए बस ये ही एक समस्या नहीं थी ,एक और मुसीबत थी जो कैसे हल करनी है मैं बिलकुल नहीं जानता था वो मुसीबत थी महावीर .

मैं- कैसे भैया

भैया- वो पहले जैसा नहीं था वो अपने साथ ऐसी मुसीबत ले आया था जो सब कुछ तबाह करने वाली थी . महावीर ही वो आदमखोर था जिसके पंजो के निशान तुमने तालाब के छिपे कमरे में देखे थे . मेरा अजीज दोस्त अपने साथ एक ऐसा श्राप लेकर आया था . देहरादून के जंगलो में उसे न जाने किसने काटा . पर उसका असर बहुत हुआ महावीर पर. गाँव वालो पर इतनी दहशत कभी नहीं थी , हर कोई डरा हुआ था मैने और परकाश ने निर्णय लिया की उस आदमखोर को हम पकड़ कर रहेंगे ऐसे ही एक रात को मेरा सामना उस आदमखोर से इसी जंगल में हुआ मेरे सामने उसने एक हिरन मारा था पर मुझ पर हमला नहीं किया इस बात ने मूझे बहुत सोचने पर मजबूर कर दिया . जैसा तुमने नंदिनी के बारे में महसूस किया था ठीक वैसा ही .

धीरे धीरे उसने मुझसे मिलना छोड़ दिया. अकेला ही रहता वो पर दोस्ती ये ही तो होती है , एक शाम उसने मुझसे कहा की मैं उसे मार दू. ये सुन कर मैं हैरान रह गया . पूछा उस से की क्यों कहा उसने ऐसा तब उसने मुझे बताया की क्यों परेशान है वो . उस वक्त मेरा हाल भी ऐसा ही था जैसा तुम्हारा आजकल है . पर दोस्ती यही तो होती है की मुश्किल वक्त में अपने साथी को ना छोड़े . मैंने महावीर को पूरी जिम्मेदारी ली . वो खंडहर मुझे बहुत प्रिय था , उसकी ख़ामोशी मुझे सकून देती थी . मैं महावीर को चांदनी रात में वहां पर बंद कर देता था और सुबह ले आता था . सब ठीक होने लगा था ऐसा मैं सोचने लगा था .

मैं- फिर

भैया- पर इस जंगल में मेरी नजरो के सामने कुछ ऐसा भी हो रहा था जो नहीं होना चाहिए था या बदकिस्मती जिसे मैं देख नहीं पाया. महावीर ने रमा से नाता जोड़ लिया था न जाने कैसे. ये बात ज्यादा दिन छुप नहीं पायी और एक दिन चाचा ने महावीर को रमा के साथ देख लिया दोनों में लड़ाई हो गयी .चाचा ने महावीर को पीट दिया . पर उसके सीने में जो आग लगी उसने अपना काम बखूबी किया. रमा ने कुछ दिन बाद चाचा का साथ छोड़ दिया और महावीर के साथ मजे करने लगी. चाचा ने भी रमा को भुला दिया और कविता से नाता जोड़ लिया चूँकि रमा कविता की भी सहेली थी महावीर ने उसे भी अपने साथ जोड़ लिया. चाचा ये झटका सह नहीं पाया. दोनों में दुश्मनी हद से ज्यादा बढ़ने लगी थी .

काश ये सब मुझे पहले मालुम होता तो मैं संभाल लेता पर शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था .चाचा की परेशानी बढ़ रही थी चाचा एक रात मुझसे मिलने आया और बोला- अभी, महावीर का साथ छोड़ दे .

मैंने चाचा से पूछा की वो क्यों कह रहा है ऐसा चाचा ने मुझे कुछ नहीं बताया और वापिस मुड गया . पर तूफ़ान सर पर था और मैं हवाओ को नहीं भांप पा रहा था . महावीर ने काफी हद तक अपने आप पर काबू पाना सीख लिया था . मैं भी खुश था पर महावीर के मन में पाप ने घर कर लिया था . वो चाचा को ब्लेकमेल करने लगा.

ये मेरे लिए एक और झटका था .

मैं- कैसे और क्यों .

भैया- चाचा का सब कुछ एक झटके में महावीर ने हथिया लिया था . चाचा नफरत की आग में जल रहा था ऊपर से मेले में रुडा और चाचा की दंगल में लड़ाई हो गयी थी . चाचा ने ऐसा पाप किया जिसके लिए उसे मैं भी मार देता वो काम था अंजू का बलात्कार .रुडा से दुश्मनी के चलते चाचा ने मासूम अंजू को शिकार बना लिया. ये बात हमारी माँ को मालूम हो गयी थी , उन्होंने चाचा को खूब भला बुरा कहा और धमकी दी की पिताजी के सहर से आते ही वो उनको सब बता देंगी

चाचा ये हरगिज नहीं चाहता था क्योंकि जो भूल उस से हुई थी वो कोई नादानी नहीं थी जिसे माफ़ कर दिया जाये राय साहब अंजू को बेहद स्नेह करते थे . चाचा माँ के हाथ पाँव जोड़ने लगा पर माँ बहुत गुस्से में थी , उसी बीच चाचा का धक्का माँ को लग गया और वो सीढियों से गिर गयी , और ऐसी गिरी की फिर कभी उठ ही नहीं पायी .

महावीर सहर से अपने साथ एक कैमरा लाया था न जाने कैसे उसने इस घटना की फोटो खींच ली .

मेरी आँखों से आंसू बहने लगे,

मैं- माँ की हत्या चाचा ने की और आपने कुछ नहीं किया भैया

भैया- जब मुझे ये मालूम हुआ उस से पहले ही चाचा मर चूका था . महावीर का कैमरा नहीं मिलता मुझे तो मैं ये कभी नहीं जान पाता छोटे.

बहुत मुश्किल था जज्बातों को सँभाल कर रखना मैंने आंसुओ को बहने दिया इस दर्द का बह जाना ही ठीक था .

कुछ देर बाद भैया ने बोलना शुरू किया.

भैया-महावीर की रगों में हवस दौड़ने लगी थी . रमा और कविता के साथ जिस्मो के खेल में वो इतना मग्न था की उसने मुझसे भी नाता तोड़ लिया था , और जानता है उसने अपना ठिकाना कहाँ बनाया खंडहर के छिपे कमरे में . सहर से वो अपने साथ वो रंगीन किताबे लाया जो तूने देख ही ली होंगी वहां पर. खैर, एक रात फिर चाचा मुझसे मिलने आया और बोला- की महावीर उस से कुछ चाहता था .मैंने पूछा की क्या तो चाचा बोला की वो तेरी चाची के साथ सोना चाहता है . ये सुनकर मेरे कदमो तले से जमीन खिसक गयी मेरा इतना अजीज दोस्त जिसे भाई माना मैंने , जिसके राज को अपने सीने में दफन कर लिया वो मेरे घर की इज्जत से खेलना चाहता था . मुझे गुस्सा तो बहुत आया मैंने अगले दिन महावीर से मिलने का सोचा, चाचा ने बताया की उसने चाची की नहाती हुई नंगी तस्वीरे बना ली है और यदि चाचा ने उसकी बात नहीं मानी तो वो गाँव के घर घर में वो तस्वीरे फेंक देगा. ये बहुत बड़ी धमकी थी . मैंने महावीर से मिलने से पहले सोचा की चाचा और महावीर की खिंची हुई है क्या पता चाचा मुझे भड़का रहा हो महावीर के प्रति. मैंने सच का पता लगाने के लिए महावीर के ठिकाने की तलाशी ली तो मालुम हुआ की चाचा सही कह रहा था . चाची की तस्वीरों को मैंने जला दिया पर कुछ तस्वीरे वो भी मिली जिस से मुझे चाचा पर भी गुस्सा आया ये वो ही तस्वीरे थी जिनकी वजह से माहवीर चाचा पर दबाव बना रहा था . मैं बहुत गुस्से में भरा था , पर जब तक मैं चाचा के पास पंहुचा चाची ने मार दिया था उसे. मेरे लिए एक नयी मुसीबत और तैयार हो गयी थी .

 
#129



भैया- एक न एक दिन ये होना ही था पर चाची ये करेंगी सोचा नहीं था , मैने और चाची ने चाचा को उस रात के अँधेरे में दफना दिया और ये बात फैला दी की वो गायब हो गया है . मैने चाचा की गाड़ी को भी ठिकाने लगा दिया. मैं महावीर से मिलने गया पर वो खंडहर में नहीं था , बहुत दिनों बाद मैं उन कमरों में गया जो अब महावीर की अयाशियो के गवाह बन चुके थे. जंगल की ख़ामोशी में मेरा सकून यही बसता था महावीर ने मेरी दोस्ती को छल लिया था . इतनी हताशा मुझे कभी नहीं हुई थी .

और जब हमारी मुलाकात हुई तो हालात अचानक से नाजुक हो गए. राय साहब अपने भाई के गायब होने से परेशान हो गए थे , वो हर हाल में चाचा की तलाश करना चाहते थे , उन्हें महावीर और चाचा की दुश्मनी का मालूम हुआ तो उन्होंने सोच लिया की चाचा के गायब होने में महावीर का हाथ है वो बस एक सुराग की तलाश में थे की कब शक यकीन में बदले और वो महावीर को मार दे.

एक दिन हमारी मुलाकात हुई मेरे सामने मेरे अजीज की जगह एक धूर्त मक्कार महावीर खड़ा था जो मेरे घर की औरतो के बारे में बदनीयती रखता था . उसे अपने किये की जरा भी शर्म नहीं थी

अभी- महावीर तुझसे ये उम्मीद नहीं थी . तेरी हवस की आग में तू मेरे घर की औरतो को झुलसाना चाहता है .

महावीर- औरत और मर्द का एक ही रिश्ता होता है अभी, और क्या फर्क पड़ जायेगा दुनिया की लुगाई के मजे तो ले ही रहे है , अपने घर के हुस्न को चख लिया तो क्या होगा. उस पर सबसे पहला हक़ हमारा ही होना चाहिए न , मैं तो कहता हूँ हम एक सौदा कर लेते है तू मुझे चाची और नंदिनी को चोदने दे बदले में तू मेरे घर की औरतो को चोद लेना .

महावीर के मुह से ये सुनकर मुझे खुद पर बहुत अफ़सोस हुआ ये क्या बोल गया था . महावीर ने ही मुझे बताया की उसे सोने की खान मिल गयी है वो वहां से सोना लाकर तालाब में छिपा रहा है मौका मिलने पर उसे कहीं महफूज़ कर देगा. पर वो ये नहीं जानता था की वो सोना हमारा ही है . उसकी तमाम अर्नगल बातो से मेरा खून खौल रहा था और एक कमजोर लम्हे में मेरा हाथ उठ गया उस पर. महावीर हक्का-बक्का रह गया , उसके अहंकार पर लगी थी वो चोट.

महावीर- अभी, तो तू ये चाहता है

अभी- महावीर, इस से पहले की देर हो जाये लौट जा और फिर दुबारा इस तरफ मत मुड़ना

महावीर- गलती की तूने अभी

अभी- इस से पहले की गलती हो जाये तू चला जा महावीर

महावीर- अगर तूने सोच ही लिया है तो फिर अब कदम पीछे हटाने का सवाल ही नहीं, इस जंगल ने हमारी दोस्ती देखि है दुश्मनी भी देखने का मौका मिलना चाहिए न इसे.

अभी- मैं फिर कहता हूँ लौट जा.

महावीर- अब तो कोई एक ही लौटेगा

महावीर ने मुझ पर वार किया. मैं भी खुद को ज्यादा देर तक नहीं रोक सका और वो शुरू हो गया जो नहीं होता तो हालात ये ना होते. जल्दी ही महावीर पर मैं भारी पड़ने लगा तो उसने रूप बदल लिया . मैंने कभी नहीं सोचा था की इस बीमारी का ये इस्तेमाल करेगा. उसके सामने मेरा टिकना मुश्किल हो रहा था . उसके वार लगतार मुझे घायल कर रहे थे . जंगल की धरा मेरे रक्त से अपनी प्यास बुझाने लगी थी . पर तभी न जाने कहाँ से नंदिनी आ गयी . वो महावीर पर झपटी पर महावीर के आदमखोर रूप पर खून सवार था उसने नंदिनी को काट लिया. मेरे लिए बर्दाश्त करना आसान नहीं था पर ये सच था , गुस्से से मैंने महावीर को धर लिया. उस वक्त मैं इतना मजबूत नहीं था की आदमखोर की शक्ति के आगे भारी पडू, और मुझे जरुरत भी नहीं पड़ी थी , अचानक ही जंगल गोलियों की आवाजो से गूँज उठा .और जब हमने चलाने वाले को देखा तो हम सब हैरान रह गए. आदमखोर की खाल से रक्त की मोटी मोटी धारा बह रही थी .

धरती पर गिरते ही महावीर अपने असली रूप में आ गया . मौत कितनी भयावह हो सकती है ये मुझसे पूछो कबीर, एक रात पहले ही मुझे मालूम हुआ की मेरी माँ की जान चाचा की वजह से गयी, फिर अपने हाथो से मैंने चाचा की लाश को दफनाया और अब एक और जिसे मैं इतना करीब से जानता था मेरी आँखों के सामने दम तोड़ रहा था . उसने मरते हुए मुझसे बस एक बात कही थी ...........

मैं- उसे गोली किसने मारी थी .

भैया- अंजू, अंजू थी वो .

मैं अब समझ गया था की वो क्यों ये लाकेट पहनती थी क्यों वो शहर चली गयी थी उस वक्त और क्यों उसने ये लाकेट मुझे दिया था .

भैया- इस जंगल ने सबके राज छिपाए थे ये महावीर का राज भी छिपा सकता था पर मैं नहीं चाहता था , मैं चाहता था की उसकी लाश का अंतिम संस्कार होना चाहिए . ये जानते हुए भी की ये एक भूल होगी उसके परिणाम जानते हुए भी मैंने उसकी लाश को गायब नहीं किया.

मैं- क्या कहा था उसने मरने से पहले

भैया- तु जानता है , तू समझ गया होगा की मैं क्यों तुझसे ज्यादा सूरजभान को वरीयता देता था .

मैंने अपना माथा पीट लिया . मेरे सामने जो इन्सान खड़ा था अपने सीने में न जाने क्या क्या लिए बैठा था .

भैया- उसके बाद मैंने खंडहर से मुह मोड़ लिया. जंगल में वैध से साथ भटकता रहा ताकि नंदिनी के लिए इलाज तलाश कर सकू, वैध ने काफी हद तक नंदिनी की मदद कर भी दी थी , वैध की पुडिया से वो चांदनी रात में भी कंट्रोल कर पाती थी खुद पर. पर किसी ने वैध को मार दिया.और बात बिगड़ गयी हालात ऐसे हुए की एक ही पुडिया बची थी और नंदिनी ने वो तुमसे देने को कहा. हमने निर्णय लिया की अगर वो रूप बदलती भी है तो मैं उसे खंडहर में ले आऊंगा इतने सालो बाद मैंने उस जगह पर कदम रखा और तभी तुम भी वहां पहुँच गए.

मैं- भाभी ने कारीगर को भी तो काटा था वो फिर आदमखोर क्यों नहीं बना

भैया- दरअसल ये अलग अलग लोगो पर अलग असर करता है , मेरा अनुमान है की कारीगर उस वक्त खूब नशे में था तो जहर और शराब के मिश्रण से वो आदमखोर बनने की जगह सड गया . वो न ठीक से मर पाया न जिन्दा रहा . जब थोड़ी बहुत सुध आई तो वो भटकते हुए गाँव में पहुंचा जहाँ हमने मुठभेड़ में मार दिया उसे. मेरे ख्याल से सब कुछ जान गए हो तुम

मैं-मैंने क्या जाना , मैंने तो कुछ सुना ही नहीं

मैंने इतना कहा और भैया से लिपट गया .
 
#130



मैं बहुत कुछ जान गया था , पानी में पड़ा सोना किसका था , वो चुदाई की किताबे जाहिर था की सहर से महावीर लाया था पर अभी भी बहुत कुछ जानना बाकि था यदि महावीर ठाकुर को अंजू ने मार दिया था तो फिर कविता , कविता किससे मिलने जाती थी जंगल में. मान लिया की कविता भी महावीर से चुदती होगी पर जब महावीर मर ही गया था तो वो किससे मिलने गयी थी . और सबसे महत्वपूर्ण सवाल रमा या कविता ने कमरे में रखे बैग से सोना क्यों नहीं चुराया. कविता के कमरे से नोटों की गद्दिया और जेवर जरुर मिले थे जो महावीर ने ही उसे दिए होंगे या फिर राय साहब ने ये जानना बहुत जरुरी था.

भैया की पीठ पर वो निशान तभी बने होंगे जब वो भाभी को सँभालते होंगे. इस कहानी का अब तक का सार लालच और चुदाई, ही था पर मैंने मोहब्बत की थी . मुझे थामना था उस डोर को जो इस झमेले में हाथो से फिसल रही थी . और मंगू का भी तो देखना था उस चूतिये के मन में क्या चल रहा था , अपनी ही बहन को रगड रहा था , राय साहब से चुदवा रहा था .

त्रिदेव की कहानी जानकार मैं और परेशां हो गया था .अभिमानु भैया सर पर खड़े तूफान को नहीं भांप पाए थे पर मैंने जान लिया था की जब ये तूफ़ान वापिस लौटेगा तो सब तबाह कर देगा. घर आने पर मैंने देखा की अंजू छत पर है तो मैं उसके पास चला गया .

अंजू- कहा थे तुम

मैं- त्रिदेव की कहानी सुन रहा था .

मैंने अपने गले से लाकेट उतारा और अंजू के हाथ में रख दिया .

मैं-नहीं रख पाऊंगा इसे.

अंजू- दुनिया का सबसे बड़ा बोझ रिश्तो का होता है कबीर, उन रिश्तो का जो हमसे जुड़े है . बेशक हमारे पास चॉइस होती है की हम जब चाहे उन रिश्तो की डोर को तोड़ कर खुद को मुक्त कर सकते है पर वो रिश्ते हमें नहीं छोड़ते हमेशा हमारे साथ रहते है . ये लाकेट भी वैसा ही है .जानते हो इसे अपने सीने से क्यों लगाया मैंने , क्योंकि ये रिश्ते ही तो है , ये रिश्तो के बंधन जो हमें जोड़ते है . परिवार , हमारी सबसे बड़ी शक्ति परिवार होता है . उस शाम अगर मैंने, नंदिनी और अभिमानु ने वो राज नहीं दबाया होता तो ये परिवार कभी का बिखर गया होता. हमें हर पल ये मालूम था की इसके क्या परिणाम होंगे .

किसी की जान लेना , इस से घ्रणित और क्या होगा . मैं आज भी जरा सी आहट पर जाग जाती हूँ , दुनिया मुझे पागल समझती है पर मैं क्या हूँ , क्या खोया है मैंने ये बस मैं ही जानती हूँ . वक्त के साथ हमने भी अपने अपने भरम पाले हुए है , जंगल में भटकते है झूठी आस लिए की न जाने कहा से महावीर आकर सामने खड़ा हो जायेगा. बहुत मुश्किल होता है अपने परिवार की गलतियों को छिपाना.महावीर कभी समझ ही नै पाया की उसकी असली शक्ति अपनों का साथ है , वो मुर्ख तो अपनों का ही सौदा करने चला था .क्या एक लड़की, औरत के जिस्म का मोल बस इतना ही है की कोई भी उसे अपने तले रौंद दे, क्या औरत गुलाम है पुरुषो की .

मेरे पास अंजू की किसी भी बात का कोई जवाब नहीं था .

मैं- अगर आप को ये मालूम होता की महावीर ही आदमखोर है तो क्या आप उसे मारती.

अंजू- उसके पापो का घड़ा भर गया था उसे मरना ही था मैं नहीं तो कोई और मार देता. दुःख बस ये है की जिन हालातो में ये हुआ वो हालात ठीक नहीं थे, उसे ना मारती तो नंदिनी और अभिमानु को खोना पड़ता .

अंजू ने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और बोली- चांदी तुम्हारे जज्बातों को काबू में रखेगी. मन विचलित नहीं होगा तुम्हारा.

अंजू ने वापिस से लाकेट मुझे दे दिया न जाने कैसे वो जान गयी थी मेरा राज भी .

अंजू- मैं कल लौट जाउंगी शहर वापिस

मैं- थोड़े दिन रुक जाओ.मैं निशा को ले आऊ उसके बाद. बल्कि ये घर तुम्हारा ही तो है तुम्हे कही नहीं जाना .

अंजू- निशा का हाथ थामने की कीमत चुकानी पड़ेगी कबीर, एक बार फिर सोच लो

मैं- उस से प्रेम सोच कर नहीं किया था मैंने, और फिर मोल भाव का सोचा तो क्या ख़ाक मोहब्बत की मैंने

अंजू- आशिकी इम्तिहान लेती है

मैं- देख लूँगा.

अंजू- तुम अकेले नहीं हम सब ही देखेंगे फिर तो

अंजू ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और निचे चली गयी . मेरी नजर सामने चोबारे में लगी भैया-भाभी की तस्वीर पर पड़ी. मैं मुस्कुरा पड़ा दुनिया की सबसे खूबसूरत जोड़ी को देख रहा था मैं. तभी मुझे निशा का ख्याल आया और दिल धडक उठा. अजीब सी बेताबी , सुरूर चढ़ने लगा मुझ पर . सोचने लगा न जाने कैसे लम्हे होंगे वो जब वो मेरे इतना करीब होगी , उस पर मेरा हक़ होगा. उसकी खनकती चुडिया जब मेरे कानो में गूंजेगी , उसकी लहराती जुल्फे मेरे सीने को छू जाएँगी . उसकी कमर में हाथ डाल कर जब उसे अपने आप से जोड़ लूँगा , उसकी गर्म सांसे मेरे लबो को अधीरता की तरफ ले जायेंगी.

“कबीर , क्या सोच रहे हो खड़े खड़े इधर आओ जरा ” भाभी की आवाज ने मुझे ख्यालो की दुनिया से बाहर ला पटका .

मैं-अ आया भाभी

भाभी- चंपा से मिल लो. थोड़ी बात चित कर लो . तुम्हारा साथ हौंसला देगा उसे .

मैं- जी , वैसे एक बात पूछनी थी आपसे

भाभी- जानती हूँ क्या पूछना चाहते हो तुम

मैं- तो फिर बताओ

भाभी- कविता की मौत का आरोप तुम पर इसलिए लगाया मैंने ताकि तुम सोचो उस चीज को , मैं परेशान थी की आखिर कौन था वो जो आदमखोर को दुबारा जिन्दा कर रहा था . कविता एक महत्वपूर्ण कड़ी थी .उसकी मौत सामान्य नाही थी किसी ने उसे मार डाला. सवाल ये था की क्यों इतने साल बाद क्यों . दूसरी तरफ तुम थे जो अतीत को उधेड़ रहे थे . मैं चाहती थी की तुम तलाश करो कविता के कातिल को तुम पता लगाओ की कौन था वो जिसने अतीत को दुबारा से जिन्दा किया. कौन था वो जो गड़े मुर्दे उखाड़ रहा था . तुमसे बेहतर कौन था मेरे पास जो ये काम करता . अपने से दूर किया मैंने तुम को ताकि तुम समझ सको जंगल को , कातिल को

मैं- पर मैं कविता के कातिल को तलाश नहीं कर पाया .

भाभी- उसे भी पकड़ लोगे. उसके आलावा भी तुमने बहुत कुछ पा लिया है जंगल में

मैं जानता था की भाभी किस बारे में बात कर रही थी .

 
#131



राय साहब अभी तक नहीं लौटे थे, हमले की रात से ही वो गायब थे. इतना बड़ा काण्ड होने के बाद भी वो कैसे अनजान बने रह सकते थे. मुझे भी लगने लगा था की कहीं ये बाप की ही तो साजिश नही. पर किसलिए , मेरे पास वक्त बहुत कम था . निशा को इस घर में लाने से पहले मैं इस तमाम चुतियापे से छुटकारा पा लेना चाहता था ताकि आगे की जिन्दगी आराम से जी सकू मैं. सवालो का अम्बार लगा था मेरे मन के अन्दर .

महावीर ने सोना चुराया था , जिसका आरोप पिताजी ने चाचा पर लगाया था . अथाह सोना था धरती के सीने में थोडा बहुत अगर गायब हुआ भी तो क्या ही फर्क पड़ना था . अंदेशा था की या तो पिताजी को महावीर की कारस्तानी मालूम थी या फिर पिताजी ने ही कोई ऐसा खेल खेला था जिससे की महावीर और चाचा उलझ गए थे , जिस तरह से रमा आजतक पिताजी के साथ थी और पहले बी पिताजी और चाचा के बीच झगडे की वजह रमा बनी थी तो क्या ऐसा नहीं हो सकता था की महावीर को इस्तेमाल किया गया हो.

पिताजी के कमरे से मिली चुडिया , वैसी ही चुडिया कविता के कमरे से मिलना कोई इत्तेफाक नहीं हो सकता था. कुछ तो ऐसा था जिसे समझ नही पा रहा था मैं. लगने लगा था की पिताजी ने कोई चक्रव्यूह रचा है हम लोग जिसके मोहरे मात्र है . कठपुतिलियो को अपने इशारे पर नचा रहे हो जैसे वो. मैंने एक नजर ढलती शाम को देखा और सोचा क्या ये बदलता मौसम किस्मत भी बदल पायेगा क्या

चूत का चक्कर , इन्सान कितना भी शातिर क्यों न हो इस चक्कर में जो उलझा फिर पार नहीं पा पाया. जवानी के जोश से भरे महावीर को अपने हुस्न के जाल में फ़साना रमा के लिए भला कितना मुश्किल रहा होगा. और जो एक बार इस चक्कर में पड़े फिर उसके लिए क्या रिश्ता क्या नाता. उदाहरण मैं खुद था कितनी आसानी से मैं चाची को चोद गया था और फिर सरला से भी सम्बन्ध बना गया था. मुझमे और महावीर में देखा जाये तो ज्यादा फर्क नहीं था . मैं चाची के पास गया और बोला- सर बहुत दुःख रहा है बाम लगा दो

चाची ने बाम लगाना शुरू किया .

मैं- एक बात पुछू

चाची- हाँ

मैं- तू चाहती तो तू रमा को भी मार सकती थी उसने तेरा पति तुझसे छिना था पर ऐसा नहीं किया क्यों

चाची- कितनी रमा को मारती मैं , छोटे ठाकुर ने गाँव की किसी ही औरत को छोड़ा होगा . मैं किस किस से लडती . उन दिनों घर का माहौल बहुत तनाव से भरा था . राय साहब ने पूरा जोर लगाया हुआ था अपने भाई की तलाश करने को . मैंने छोटे ठाकुर को मार तो दिया था पर जानती थी की ये राज छुप नहीं पायेगा. अभिमानु अगर हर कदम मेरे साथ नहीं खड़ा होता तो टूट कर बिखर चुकी होती मैं.

चाची का कहना सही था . किस किस से लडती वो जब कमी खुद उसके पति की थी . न जाने क्यों मुझे लग रहा था की कुछ तो छूट रहा है मुझसे एक बार फिर से मैंने चीजो को जोड़ना शुरू किया. महावीर के मरने के बाद आदमखोर का हव्वा फैलाना , इसका क्या कारन हो सकता था . माना की राय साहब हरगिज नहीं चाहते थे की सोने की खदान का राज किसी को भी मालूम हो पर वो तो पहले ही छिपी हुई थी न . छिपी हुई चीज को छिपाने की भला क्या जरुरत आन पड़ी थी .

दूसरी सम्भावना ये थी की मंगू जो नकली आदमखोर बन कर घूम रहा था उसकी जानकारी राय साहब को मालूम ही न हो , राय साहब का भी चुतिया काटा जा रहा हो. मंगू गायब था और यदि मेरा अनुमान सही था तो मैं जानता था की वो मुझे कहाँ मिलेगा. रात के अँधेरे को चीरते हुए मैं दबे पाँव चले जा रहा था खदान के उस हिस्से की तरफ जहाँ पर मुझे वो नंगी तस्वीरे पड़ी मिली थी .



अँधेरे में चलते चलते मुझे कोफ़्त होने लगी थी पर दूर जलती मशाल की रौशनी बता रही थी की खान में कोई तो है जरुर. और जब मैं वहां पर पहुंचा तो मैंने जो देखा , ऐसा लगा की फिर से किस्मत ने मुझे छल लिया हो . बिस्तर पर मंगू अकेला नहीं था , उसके साथ ...... उसके साथ कोई और भी थी और वो की और जो थी मैंने सोचा नहीं था की उस से इस हालात में मुलाकात होगी.
 
सहाब ये लोग जो हमसे बार बार कहते हैं कि अब तो बड़े हो जाओ कैसे समझाया जाए इनको की बड़ी मुश्किल से बचा कर रखी है हमने अपनी मासूमियत
 
#132

मेरी आँखों के सामने मंगू के साथ बिस्तर पर कोई और नहीं बल्कि सरला थी . वो सरला जिस पर भरोसा किया था मैंने. वैसे तो आदत सी हो चली थी अपर कभी सोचा नहीं था की सरला भी मुझे धोखा देने वालो की लिस्ट में खड़ी होगी बड़ी तल्लीनता से दोनों एक दुसरे की बाहों में खोये हुए थे . कायदे से मुझे इंतज़ार करना चाहिए था की दोनों क्या बाते करते है पर मेरे गुस्से का बाँध शायद टूट ही गया था . मैंने अपनी चमड़े की बेल्ट निकाली और सीधा सरला की पीठ पर मारी जो मंगू के ऊपर चढ़ कर चुद रही थी .

“आईईईईईई ” अचानक से पड़ी बेल्ट ने सरला के पुरे बदन में दर्द की लहर दौड़ा दी . सरला जो एक सेकंड पहले चुदाई का मजा ले रही थी अब दर्द से दोहरी हो गयी. पर मैं रुका नहीं . दना दन उसकी पीठ पर बेल्ट मारता ही रहा उसे सँभालने का जरा भी मौका नहीं दिया .

मुझे वहां देख कर दोनों की आँखे हैरत से फट ही गयी . मैंने अगला नम्बर मंगू का लगाया और ये भूलते हुए की वो मेरा दोस्त है उसे पीटना शुरू किया . पर मंगू ने पर्तिकार किया .

मंगू- बस कबीर बस बहुत हुआ .

मैं- अभी तो शुरू ही नहीं किया मैंने . तूने क्या सोचा मेरी पीठ पीछे तू जो गुल खिला रहा है मुझे तो मालूम ही नहीं होगा.

मंगू-तू यहाँ से जा कबीर

मैं- जाऊंगा पर पहले मुझे बता की ये सब क्या कर रहा है तू क्यों कर रहा है . अपनी ही बहन के मंडप को क्यों बर्बाद किया तूने.

मंगू- तुझे क्या लेना देना उस से

मैं- पूछता है मेरा क्या लेना देना . अगर मेरा नहीं तो किसका है . चंपा पर क्या बीतेगी जब उसे मालूम होगा की उसके ही भाई ने उसकी खुशियों में आग लगा दी. बात सिर्फ चंपा की ही नहीं शुरू से शुरू कर मंगू . कविता को क्यों मारा तूने, वैध को क्यों मारा तूने परकाश को क्यों मारा तूने . रोहताश को क्यों मारा तूने

मंगू- मेरे मन में आया मार दिया

मैं- कल को तेरे मन में आएगा की कबीर को मार दे तो क्या मार देगा .

मंगू- मार दूंगा

कितनी आसानी से उसने कह दी थी इए बात साले ने बरसो की दोस्ती की जरा भी परवाह नहीं की .

मंगू- तुझे किस बात की तकलीफ है कबीर, सरला को मैं नहीं चोद सकता क्या , ये तो ना इंसाफी हुई न साले तुम लोग पुरे गाँव की इज्जत से खिलवाड़ करते रहो , दुनिया तुम्हारी मर्जी से चलेगी क्या हमारी भी कोई जिन्दगी है के नहीं. मेरा गलत है इसे चोदना तो तेरा इसे चोदना सही कैसे हुआ.

मैं- मैं सिर्फ इतना जानना चाहता हूँ की मंडप क्यों उजाड़ा तूने

मंगू- क्योंकि मैं नहीं चाहता था की चंपा यहाँ से और कही जाये.

मैं- बहुत बढ़िया . मतलब सारी जिन्दगी तू ही रगड़ता रहे उसे .

मंगू- वो मेरा निजी मामला है

मैं- भोसड़ी के तेरे निजी मामले ने मेरी जिन्दगी की लेनी कर रखी है . कविता को क्यों मारा .

मंगू- वो बहन की लौड़ी किसी की भी सगी नहीं थी . मैं उस से प्यार करता था क्या नहीं किया मैंने उसके लिए पर साली बेवफा निकली , उस परकाश से भी गांड मरवा रही थी साली. परकाश इतना मादरचोद था की अगर तू उसके बारे में जानता तो तुझे भी साले से घिन्न हो जाती मुझसे पहले तू मार देता उस को.

मैं- ऐसा क्या किया था उसने .

मंगू- ये पूछ क्या नहीं किया था उसने. परकाश ने कविता को पटा लिया था जंगल में पेलता था उसको . एक दिन मैंने उन दोनों को देख लिया . चुदाई के बाद बाते कर रहे थे . मुझे मालूम हुआ की कविता का पति रोहतास उस पर दबाव बनाये हुए था उसे शहर ले जाने के लिए वो जाना नहीं चाहती थी , परकाश ने कहा की वो रोहतास का इलाज करवा देगा. याद है तुझे वो रात जब मैंने बहुत ज्यादा पि ली थी उस रात नशे में चूर मैं कुवे पर जा रहा था की मुझे मोड़ पर कविता और प्रकाश मिले. मेरा तो दिल ही जल गया . दोनों को साथ देख कर आगबबुला हो गया था मैं. मेरा और दिमाग ख़राब तब हो गया जब परकाश ने कविता से कहा की कबीर को कैसे भी करके अपने हुस्न के जाल में फंसा ले.कविता ने उसे बताया की उसी शाम कैसे उसने तुझे उलझा ही दिया था अपने जाल में .

मुझे याद आया की वैध के घर में कैसे लगभग उसने मेरा लंड चूस ही लिया था .

मंगू- मैंने उसको दिल से चाह था पर वो साली उसको मरना ही था .

मैं- चूतिये काश तू समझ पाता वो तेरा इस्तेमाल कर रही थी . रमा भी तेरा इस्तेमाल कर रही है और ये हरामजादी भी .

मंगू- अब फर्क नहीं पड़ता मुझे .

मैं- खेल तो बढ़िया खेला अब बता परकाश का नुम्बर कैसे लगाया तूने .

मगु- वो बहन का लंड भी साला पक्का हरामी था . उसने राय साहब की न जाने कौन सी नस दबा ली थी . रमा को भी तंग कर रहा था वो . पर जब उसने राय साहब से चंपा की मांग की तो वो अपनी औकात से जायदा आगे बढ़ गया था . मैंने और रमा ने मिल कर उसे मारने की योजना बनाई . रमा ने उसे चुदाई के बहाने बुलाया और मैंने उसे मार दिया.

मैं- क्या तू जानता था की परकाश अंजू से प्यार करता था

मंगू- किसी से प्यार नहीं करता था वो , उसे अंजू से किसी चीज की तलाश थी बस . उस को लगता था की अंजू सोने के बारे में जानती है पर चुतिया के बच्चे को कभी सोने के बारे में नहीं मालूम हो सका . जानता है क्यों , क्योंकि मैंने होने ही नहीं दिया. सो सोचता ही रह गया की सोना कहाँ होगा .

मैं- उसे कैसे पता चला की सोना है .

मंगू- राय साब का सारा हिसाब किताब वो और उसका बाप ही देखते थे किसी तरह से उसने मालूम कर लिया होगा.

मुझे मंगू की इस बात में दम नहीं लगा . प्रकाश की दिलचस्पी थी तो बस अपने हिस्से में . वसीयत का चौथा टुकड़ा. रमा को भी उसने राय साहब पर दबाव बनाने में इस्तेमाल किया था और रमा उसके तो कहने ही क्या , चाचा, महावीर, पिताजी और प्रकाश आखिर इनमे से किसके साथ थी वो शायद किसी के साथ भी नहीं.

मैं- चंपा के साथ क्यों सम्बन्ध बनाये तूने .

मंगू- वो कुतिया इसी लायक है , साली की गांड में हमेशा आग लगी रहती थी , जब तेरे बाप को दे सकती है वो तू मैं तो फिर भी उसका अपना हूँ मैंने भी ले ली.

मुझे भैया की याद आई कैसे महावीर ठाकुर ने कहा था की घर की औरतो पर सबसे पहला हक़ घर वालो का ही होता है .

मंगू- जानता है मैंने तुझे ये सब क्यों बता दिया.

मैं- मुझे नहीं बताएगा तो किसे बताएगा.

मंगू- तू सोच रहा होगा इस बारे में पर मैंने सोचा की मरने से पहले तुझे सच जानने का हक़ तो है ही . बरसो से तेरे बाप ने मेरी माँ को चोदा फिर चंपा पर हाथ डाला अब मेरी बारी है . राय साहब का पालतू बन कर मैंने इस सोने की खान का पता लगा लिया इस पर मैं कब्ज़ा करूँगा तुमको मारने के बाद ये सब कुछ मेरा हो जायेगा.

मैं तो ये है तेरी असलियत . साले तुझे अपने भाई जैसा समझा मैंने और तूने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया.


मंगू- कोई अहसान नहीं किया तुमने, बरसो तक मेरे बाप ने फिर मैंने तुम्हारी चाकरी की है . पर अब नहीं करेंगे.
 
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