Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed) - Page 7 - SexBaba
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Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed)

#57



“नजरे झुका के हमसे छिपा के तुम जा रही हो जाना ” मैंने निशा के हाथ को पकड़ते हुए कहा.

निसा- जाग रहे हो तुम.

मैं- तुम ऐसे नहीं जा सकती बिना बताये

निशा- फिर भी जाना तो पड़ेगा ही. जाउंगी नहीं तो दुबारा कैसे आउंगी.

मैं- जाने से पहले इस चाँद से माथे को जी भर के देखने तो दो मुझे .

निशा-तुम्हारी ये दिलकश बाते भटका नहीं सकती मुझे . रात का तीसरा पहर ख़त्म होने को है इन अंधेरो में खो जाने दो मुझे.

मैं- कुछ दूर चलता हु तुम्हारे साथ

निशा- जरुरत नहीं

मैं- फिर भी

मैंने थोडा पानी पिया और फिर उसका हाथ थाम कर चल दिया. जल्दी ही हम दोनों वनदेव के पत्थर के पास थे.

निशा- अब जाने भी दो

मैं- दिल नहीं कर रहा सरकार तुम्हारी जुदाई मंजूर नहीं मुझे

निशा- मैं नहीं थी तब भी तो जी रहे थे न

मैं- जिन्दगी क्या है तुमने ही तो बताया मुझे

वो आगे बढ़ी की मैंने फिर से उसका हाथ थाम लिया.

निशा- फिर भी जाना होगा मुझे .

मैंने उसका हाथ छोड़ दिया और वो धुंध की चादर में खो सी गयी. मैंने वनदेव के पत्थर को देखा और कहा-बाबा, एक दिन तेरा आशीर्वाद लेंगे हम यही पर. खैर, सुबह मेरी नींद खुली तो देखा की बाहर चूल्हे पर मंगू चाय बना रहा था .

मैं- तू कब आया.

मंगू- थोड़ी देर पहले ही . घर से यहाँ आते आते जम गया सोचा पहले चाय बना लू फिर जगा दूंगा तुमको

मैं- आता हु जरा.

मैं कुछ बाद फ्रेश होकर आया . मंगू ने मुझे चाय का गिलास पकड़ा दिया. आज हद ही जायदा ठण्ड थी .

मैं- मंगू तू कविता से कितना प्रेम करता था .

मंगू जो चाय की चुसकिया ले रहा था उसने घूर कर देखा मुझे

मैं- बता न भोसड़ी के

मंगू-दुनिया कुछ चीजो को कभी नहीं समझ सकती कबीर.

मैं- जानता हूँ पर तेरा भाई सब समझता है

मंगू- वो बहुत अच्छी थी . उम्र में बड़ी होने के बाद भी मैं दिल से चाहने लगा था उसे. अक्सर हम मिलते बाते करते धीरे धीरे हम करीब आ गए.

मैं- क्या उसके पति या ससुर को मालूम था तुम लोगो का

मंगू- नहीं भाई. यदि ऐसा होता तो मैं जिन्दा थोड़ी न रहता दूसरा उसका पति तो शहर में रहता है साल ६ ,महीने में आता था एक दो बार और वैध जी तो कभी इस गाँव में कभी उस गाँव में.

मैं- पर मैं नहीं मानता की तू कविता से सच्चा प्यार करता था .

मंगू- मैंने पहले ही कहा था दुनिया प्यार को नहीं समझती

मैं- अबे चोमू, तू अगर कविता से प्यार करता तो तू उसके कातिल को तलाश जरुर करता . पर तुझे बस उसकी चूत से मतलब था .

मंगू ने चाय का गिलास निचे रख दिया और बोला- मेरे भाई, तू कह सकता है क्योंकि तूने किसी से प्यार नहीं किया तू नहीं जानता की प्रेम क्या होता है . मैंने जब उसकी लाश देखि तो मैं ही जानता हूँ की क्या बीती थी मेरे दिल पर . मैं अभागा तो उसकी लाश को छू भी नहीं पाया.

मंगू का गला बैठ गया. उसकी रुलाई छूट पड़ी.

मंगू- मैं जानता हूँ उसे डाकन ने मारा है . इतनी बेरहमी केवल वो ही कर सकती है

मंगू ने जब डाकन का जिक्र किया तो मेरा दिल धडक उठा . पूरी रात मेरी बाँहों में थी एक डाकन .

मैं- तुझे कैसे मालूम की डाकन ने मारा उसे

मंगू- पूरा गाँव ये ही कहता है . तुझे क्या लगता है मैं इतना बेचैन क्यों हूँ , मुझे तलाश है उसकी जिस दिन वो मेरे सामने आई या तो मैं मर जाऊंगा या फिर उसे मार दूंगा.

मैं- गाँव वालो की बातो कर यकीन मत कर डाकन जैसा कुछ नहीं होता. पर तू चाहे तो कविता के कातिल को तलाश कर सकता है . तूने कभी सोचा की आखिर ऐसी क्या वजह थी की कविता इतनी रात को जंगल में गयी .

मंगू- यही बात तो मुझे उलझन में डाले हुई है भाई की उसे क्या जरूरत थी जंगल में आने की उसके तो खेत भी नहीं है .

मैं- पर मुझे विश्वास है तू इस राज को तलाश कर ही लेगा.

मैंने मंगू से तो कह दिया था पर मैं खुद इस सवाल में उलझा हुआ था अभी तक.

मंगू- मैं तुझे बताना तो भूल ही गया था की राय साहब ने कहा था की कबीर से कहना की दोपहर को घर पहुँच जाये कुछ बेहद जरुरी काम है

मैं- ऐसा क्या जरुरी काम हो गया

मंगू- मुझे क्या मालूम जो कहा तुझे बता दिया. मैं सड़ी सब्जियों को बाहर फेक रहा हु मदद कर दे

मैं- चल फिर.

नंगे पैर कीचड़ से भरे खेत में इस सर्द सुबह में जाना किसी खतरे का सामना करने से कम नहीं था . जैसे जैसे दिन चढ़ता गया और मजदुर भी आते गए. दोपहर को मैं गाँव की तरफ चल दिया. जब घर पहुंचा तो एक गाड़ी हमारे दरवाजे के सामने खड़ी थी जिसे मैंने आज से पहले कभी नहीं देखा था . मैं राय साहब के कमरे में गया तो भैया और चाची पहले से ही मोजूद थे . मैंने देखा की वहां पर एक आदमी और था जिसे मैं नहीं जाता था .

“हम तुम्हारी ही राह देख रहे थे ” राय साहब ने सोने के चश्मे से मुझे घूरते हुए कहा

वो आदमी खड़ा हुआ और बोला- आप सब सोच रहे होंगे की आप ऐसे अचानक यहाँ एक साथ क्यों बुलाये गए. दरअसल राय साहब ने अपनी वसीयत बनवाई है और उनका वकील होने के नाते मेरा फर्ज है की मैं वो आप लोगो को पढ़ कर बताऊ.

मैंने अपने बाप को देखा और सोचा आजकल इसको अजीब अजीब शौक हो रहे है कभी चंपा को रगड़ रहा है कभी वसीयत बना रहा है . पर किसलिए

“वसीयत पर किसलिए पिताजी ” मैं और भैया लगभग एक साथ ही बोल पड़े.

पिताजी- हमें लगता है की कुछ जिम्मेदारिया वक्त से निभा देनी चाहिए.

वकील - राय साहब ने अपनी तमाम संपति का आधा हिस्सा अपने भाई की पत्नी को दिया है . वो ये हिस्सा जैसे चाहे जहाँ चाहे जिस भी मकान, जमीन और जो भी राय साहब की मिलकियत है उसमे से अपनी पसंद अनुसार ले सकती है .

वकील ने गला खंखारा और आगे बोला- बाकि हिस्से में से कुवर अभिमानु और कुंवर कबीर का हिस्सा होगा.

भैया- पिताजी मेरा छोटा भाई मेरे लिए सब कुछ है जो है इसका ही है जो मेरा है इसका है . मेरी सबसे बड़ी सम्पति मेरा भाई है .

चाची- जेठ जी , मेरे लिए सबसे बड़ी सम्पति ये परिवार है मेरे दो बेटे अभिमानु और कबीर. आप ये वसीयत बदलवा दीजिये और सच कहूँ तो हमें भला क्या जरूरत है वसीयत की .

ये कहने के बाद भाभी और भैया दोनों कमरे से बाहर चले गए. रह गए हम तीनो. अचानक से राय साहब को वसीयत बनाने की क्या जरूरत आन पड़ी. मैं इसी सोच में उलझा था .

मैं- वकील साहब , मैं ये वसीयत पढना चाहता हूँ .

वकील- आपको पढने की भला क्या जरूरत कुंवर साहब, राय साहब ने जो किया है सोच समझ कर ही किया है आप बस दस्तखत करे और अपना हिस्सा ले ले.

न जाने क्यों मुझे मन किया की वकील के मुह पर एक मुक्का जड दू.

मैं- फिर भी मैं वसीयत पढना चाहूँगा.

वकील ने पिताजी की तरफ देखा पिताजी ने इशारा किया तो वकील ने मुझे तीन कागज के टुकड़े दिए पर एक कागज का टुकड़ा उसके हाथ में ही रह गया. मैंने तीनो कागज के टुकड़े देखे. जो बंटवारा पिताजी ने किया था वो ही लिखा था . पर मेरी दिलचस्पी उस चौथे टुकड़े में थी जो वकील के हाथ में था .

मैं- मुझे वो कागज भी देखना है

वकील- ये आपकी वसीयत का हिस्सा नहीं है ये मेरे काम का है वो बस साथ में आ गया.

मैं- पिताजी मैं सोचता हूँ की आजतक हमने जो भी शुभ कार्य किया है पुजारी जी से पूछ कर किया है मैं उनसे बात करूँगा यदि वो हाँ कहेंगे तो मैं दस्तखत कर दूंगा.

ये बात मैंनेहवा में फेंकी थी मेरी दिलचस्पी उस चौथे कागज में थी .

पिताजी- तुम जब चाहे दस्तखत करके अपना हिस्सा ले सकते हो . वकील साहब आप जाइये हम कागज वापिस भिजवा देंगे आपको

बाहर चबूतरे पर बैठे मैं सोच रहा था की वकील ने वो चौथा कागज क्यों नहीं दिखाया क्या था उस कागज में ऐसा . ...............
 
#58



मेरे सवालो में दो सवाल और जुड़ गए थे पहला की वसीयत की इतनी जल्दी क्यों दूजा चौथा कागज किसका था. मेरे ख्याल जब टूटे जब चाची ने मुझे खाना खाने के लिए अंदर बुलाया. चाची ने खाना परोसा और हम दोनों खाना खाने बैठ गए.

मैं- पिताजी ने इतनी जल्दी वसीयत क्यों बनवा ली

चाची- ये तो जेठ जी ही जाने पर मैंने कह दिया है मुझे कुछ नहीं चाहिए . मेरी पूंजी तो तू और अभी मानु हो.

मै- तुम्हारी भावनाओ की कद्र है चाची. विचार करो जरा पिताजी ने क्या पूरी ईमानदारी से वसीयत बनवाई है.

चाची- जायदाद के तीन टुकड़े किये एक मुझे और दो तुम दोनों भाइयो के. मुझे आधा हिस्सा इसलिए दिया क्योंकि तेरे चाचा होते तो आधा उनका मिलता.

मैं- उसकी बात नहीं कर रहा हूँ .

चाची-तो फिर क्या कहना चाहता है तू

मैं चाची से कुछ कहता उस से पहले ही भाभी अन्दर आ गयी मेरी बात अधूरी रह गयी.

भाभी- आजकल तो आपने हमें पराया ही कर दिया है चाची जी.

चाची- अपने बच्चो को कोई माँ कभी पराया नहीं कर सकती बैठ अभी परोसती हूँ तुझे भी .

हम तीनो हलकी-फुलकी बाते करते हुए खाना खाने लगे. फिर चाची बर्तन समेट कर बाहर चली गयी रह गए हम देवर-भाभी.

भाभी- तो बात कुछ आगे बढ़ी तुम्हारी.

मैं- कैसी बात भाभी

भाभी- इतने भी भोले नहीं तुम

तब मुझे समझ आया की निशा की बात कर रही है भाभी

मैं- बात पक्की तब समझूंगा जब वो दुल्हन बन कर इस चोखट पर आएगी

भाभी- उफ्फ्फ्फ़ ये दिल्लगी.

मैं- आशिकी भाभी

भाभी- पिताजी ने वसीयत बनवा ली है

मैं- जानता हूँ

भाभी- तुम्हारे तो वारे-न्यारे है सबसे ज्यादा हिस्सा तुम्हारा ही होने वाला है

मैं- मुझे ये परिवार चाहिए और कुछ नहीं . इस धन-दौलत का मोह नहीं मुझे

भाभी- मोह कैसे होगा दिल एक डाकन से जो लगा बैठे हो

मैं- बार बार एक ही बात करने से क्या हासिल होगा आपको

भाभी- मुझे लगता है की इस वसीयत में कमी है जल्दबाजी में बनवाई गयी है ये.

मैं- मेरा भी यही मानना है

भाभी- तो क्या कमी पकड़ी तुमने

मैं- अभी पकड़ी नहीं है पर जल्दी ही पिताजी से आमने सामने बात करूँगा

भाभी- मुझे लगता है की तुम्हे वसीयत को दुबारा पढना चाहिए

मैं- क्या आपको लगता है की पिताजी ने हमसे दूर कुछ ऐसा किया हुआ है जिसका हमें मालूम नहीं . मेरा मतलब कोई दूसरी औरत या परिवार

भाभी- तू जब अगली बार घर से बाहर जाओ तो जो भी तुम्हे पहला सक्श मिले और फिर अंतिम सख्श तक तुम सबसे ये सवाल करना तुम्हे जवाब मालूम हो जायेगा और ये भी की राय साहब का कद कितना बड़ा है .

मैं- पर उसी राय साहब ने अपनी बेटी समान चंपा को गर्भवती कर दिया

भाभी- ये दुनिया उतनी खूबसूरत कहाँ है जितनी हम सोचते है . ये जीवन उतना सरल कहाँ जितना हम सुनते है . मेरी एक बात गाँठ बाँध लो इस जग में केवल दो सच्चे रिश्ते है एक पुरुष और एक औरत का बाकी सब मिथ्या है . झूठ है .

भाभी ने बहुत बड़ी बात कही थी पर वो सोलह आने सच थी .

भाभी- पुरुष हर औरत को बस एक ही नजर से देखता है और उस नजर के बारे में तुम्हे बताने की जरूरत है नहीं. औरत के लिए उसकी सुन्दरता उसका सबसे बड़ा अभिशाप है . चंपा तो मात्र एक उदाहरण है . तुम खुद को देखो कितनी आसानी से चाहे जो भी बहाना रहा हो तुमने चाची संग सम्बन्ध बना लिए. चाची की गलती रही हो या तुम्हारी उमंगें पर रिश्ता सिर्फ औरत और मर्द का. अगर मैं भी तुम्हारे सामने टांगे खोल दू तो यकीन मानो देवर भाभी के रिश्ते की मर्यादा टूटते देर नहीं लगेगी.

मैं- आपकी हिम्मत कैसे हुई ये नीच बात जुबान पर लाते हुए. आप जानती हो मैंने हमेशा माँ का दर्जा दिया है आपको

भाभी- माँ तो चाची भी है न जब तुम उसके साथ सो सकते हो तो मेरे साथ क्यों नहीं, मेरे ख्याल से ये बेचैनी क्यों हुई.

भाभी की बात खरी थी .

मैं- वो परिस्तिथिया अलग थी आप समझ नहीं पाएंगी मैं समझा नहीं पाऊंगा.

भाभी- परिस्तिथिया कितना आसान बहाना है न .मैं मान लेती हु तुम्हारी बात कुछ पलो के लिए अब विचार करो वो क्या अलग परिस्तिथिया रही होंगी जब राय साहब और चंपा के बीच जिस्मो का खेल हो गया.

मैं- आपने ही मुझे बताया उसके बारे में और अब आप ही उनका पक्ष ले रही है

भाभी- मेरे प्यारे देवर जी, मैं तुम्हे समझा रही हूँ की परिस्तिथि कितना कमजोर बहाना है. असली सच है रजामंदी , मन की चाह . चाची या तुम्हारे मन में चाहत तो जरुर रही होगी एक दुसरे को पाने की.

मैं- क्या पिताजी अपनी जायदाद में से चंपा को कुछ हिस्सा दे सकते है

भाभी- वो चाहे तो पूरी जायदाद उसे दे दे

मैं- क्या आपको कभी ऐसा लगा की पिताजी की नजरे आप पर भी गलत है

भाभी- कभी भी नहीं

मैं - तो ऐसा क्या हुआ की एक इतनी साख वाला इन्सान चंपा संग ये कर बैठा.

भाभी- तुम जानो ये

न जाने मुझे क्यों लगने लगा था की भाभी मुझसे कुछ तो छिपा रही है.

खैर, चाची के आने से हमारी बात बंद हो गयी. मैं उठ कर बाहर चला गया. थोड़ी देर गाँव में घूमा . एक बात का सकूं था की फिलहाल गाँव में उस आदमखोर के हमले कम हो गए थे जो राहत थी . घूमते घूमते मैं जोहड़ के पीछे की तरफ चला गया मिटटी के टीले पर चढ़ कर मैं पेड़ो की तरफ गया ही था की मुझे भैया की गाडी खड़ी दिखी.

“भैया यहाँ ” मैंने खुद से सवाल किया . पर गाड़ी में भैया नहीं थे . ऐसे गाड़ी छोड़ कर वो कहाँ जा सकते थे . अजीब बात थी ये. की तभी मुझे दूर से एक और गाडी आती दिखी मैं पेड़ो की ओट में हो गया दौड़ कर और देखने लगा. वो गाड़ी भैया की गाड़ी के पास आकार रुकी मैंने देखा की उसमे भैया और सूरजभान थे. सूरजभान के सर पर पट्टी बंधी थी . पर भैया इस नीच के साथ क्या कर रहे थे और कहाँ से आये थे . सोच कर मेरा सरदर्द करने लगा.

थोड़ी देर कुछ बाते करने के बाद भैया की गाड़ी गाँव की तरफ बढ़ गयी और सूरजभान जिस रस्ते से आया था उसी पर वापिस मुड गया.

“कोई तो बात है जो मुहसे छिपाई जा रही है ” मैंने कहा

 
#५९



मेरा भाई सूरजभान को इतनी अहमियत क्यों देता था ये सोच सोच कर मैं पागल हुए जा रहा था . दूसरा राय साहब क्या चीज थे. मेरा वजूद मेरे घर की दीवारों से आजाद हो जाना चाहता था . रात को जब मैं घर पहुंचा तो पिताजी घर पर नहीं थे. मैंने देखा भाभी अपना काम कर रही थी मौका देख कर मैं पिताजी के कमरे में घुस गया. मेरा दिल में अजीब सी घबराहट थी ऐसा पहली बार तो नहीं था की मैं इस कमरे में आया था पर ऐसे चोरी छिपे घुसने में डर सा लग रहा था .

कमरे में रोशनी थी हर सामान बड़े सलीके से रखा था . बिस्तर के सिराहने एक अलमारी थी थोड़ी दूर एक मेज थी जिस पर कुछ सामान रखा हुआ था . मैंने अलमारी खोली पिताजी के कपडे थे. पर मुझे किसी और चीज की तलाश थी दराज में देखा पर वसीयत के कागज वहां भी नहीं थे . क्या पिताजी के कमरे में कोई ख़ुफ़िया दराज थी या ऐसी जगह जहाँ पर कुछ छुपाया जा सके. मैंने लगभग कमरा छान लिया पर कागज नहीं मिले मुझे.

हताशा में मैंने इधर उधर हाथ पैर मारे बिस्तर के एक कोने में मुझे कुछ ऐसा मिला जिसने एक बार फिर मुझे हैरान कर दिया. बिस्तर के कोने में चूडियो के कुछ टूटे टुकड़े पड़े थे. मेरे बाप के बिस्तर पर टूटी चूडियो के टुकड़े सोचने वाली बात थी . न जाने क्यों मैंने वो टुकड़े अपनी जेब में रख लिए और कमरे से बाहर आया.

इस घर में दो औरते थे भाभी हमेशा सोने के कंगन पहनती थी चाची के हाथो को मैंने खाली देखा था तो क्या कोई तीसरी औरत थी जो मेरी जानकारी के बिना घर में आती थी पर कैसे , किसलिए. टूटी चूडियो ने मेरे दिमाग को उलझा कर रख दिया था ऐसा क्या था इस घर की दीवारों के पीछे छिपा हुआ जो बाहर आने को बेकरार था .

“किस सोच में इतना गहरे डूबे हो ” निशा ने अलाव जलाते हुए कहा

मैं- क्या मालूम

निशा- दोस्तों को बताने से दिल हल्का हो जाता है

मैंने सोचा की निशा से ये बात करना ठीक रहेगा या नहीं क्योंकि राय शहाब के बारे में ऐसी बात करना सामाजिक तौर पर ठीक नहीं था फिर भी मैंने निशा को सारी बात बताई

निशा कुछ देर सोचती रही और फिर बोली- तुम्हारी भाभी का कहना बिलकुल सही है इस दुनिया में एक ही रिश्ता है औरत और मर्द का रिश्ता और जिस्मो की प्यास कबीर कब न जाने क्या कर जाये कोई नहीं जानता . परदे के पीछे जो चीजे होती है उनका सामने आना कभी कभी सब कुछ बर्बाद कर बैठता है . हर चीज के दो मायने होते है इसके भी है समझो , तुम्हारे पिता काफी सालो से अकेले रहे है , एक इन्सान की कुछ खास जरूरते होती है जिनमे से एक सम्भोग भी है यदि चंपा और पिताजी के बीच इस रिश्ते में दोनों की रजामंदी है तो उनके नजरिये से ठीक है ये अब दूसरा नजरिया समझो यदि वो चंपा का शोषण कर रहे है तो पाप के भागीदार है वो . सही और गलत के मध्य एक बहुत महीन रेखा होती है कबीर.

निशा ने एक गहरी साँस ली और बोली- ये समाज रिश्तो की एक ऐसी भूलभुलैया है जिसमे अपने हिसाब से रिश्तो की व्याख्या की जाती है , भाभी को देखो वो नहीं चाहती की उसका देवर एक डाकन संग रहे पर तू और मैं जानते है इस रिश्ते की सच्चाई को. बेशक हम दोनों के कर्म अलग है पर नियति ने दोस्ती की डोर बाँधी. यदि चंपा को ऐतराज नहीं है तो तू भी इस पर मिटटी डाल .

मैं- और वसीयत का चौथा टुकड़ा उसका क्या

निशा- तुझे किसका मोह है . वो राय साहब की कमाई दौलत है उनकी जमीने है वो चाहे जिसे भी दे तू अपना कर्म कर तू किसान है . तेरे हाथो की मेहनत बंजर धरती पर भी सोना उगा देती है . तू अपनी तक़दीर अपने हाथो से लिखता है

मैं- मेरे हाथो की तक़दीर में कोई रेखा तेरे साथ की भी है क्या

निशा- नियति जाने .

मैं- नियति ही तुझे मेरी जिन्दगी में लाइ है नियति ही तुझे मेरी बनाएगी.

निशा- मेरा मोह भी छोड़ दे , दुनिया में हजारो-लाखो होंगी मुझसे हसीं मुझसे जुदा

मैं- पर तू तो एक ही हैं न मेरी सरकार.

निशा- मैं अँधेरा हूँ तेरे सामने सुनहरा उजाला है

मैं- तेरे साथ इन अँधेरे प्यारे है मुझे

मैंने निशा की गोद में अपना सर रखा और लेट गया . अलाव की आंच चट चट चटकती रही हम बाते करते रहे.

मैं- भाभी कहती है की इस धागे को उतार कर फेक दे ये डाकन का है

निशा- सच ही तो कहती है ठकुराइन

मैं- पर वो इस डाकन को जानती नहीं

निशा- वो जान गयी होगी

मैं- बताया नहीं फिर मुझे

निशा- तू जाने वो जाने

मैं- कोई तो रास्ता होगा तेरे मेरे मिलने का . तेरी दुनिया के नियम भी तो टूटते होंगे.

निशा- मैं वो सपने नहीं देखती जिनके टूटने पर दुःख हो.

वो मेरे पास लेट गयी उसका हाथ मेरे सीने पर आया.

“दिल करता है इस दिल को निकाल लू ” उसने कहा

मैं- तेरा दिल है ले जा बेशक

निशा- दुनिया कहेगी डायन एक और को खा गयी.

मैं- ये तू जाने दुनिया जाने.

इसके आगे मैं कुछ और नहीं कह पाया अगले ही पल निशा ने अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए और फिर मैं सब कुछ भूल गया. आँख खुली तो मैंने खुद को अलाव की राख में लिपटे हुए पाया. मुस्कुराते हुए मैंने कपडे झाडे और वापिस घर की तरफ चल पड़ा. घर पहुँच कर देखा की पिताजी , भैया और पुजारी जी आँगन में बैठे कुछ बाते कर रहे थे . पुजारी का सुबह सुबह हमारे घर आना मुझे अजीब ही लगा. उन पर नजर डाल कर मैं मुड़ा ही था की भैया की नजर मुझ पर पड़ी और मुझे अपने पास बुलाया

भैया- छोटे, चंपा के ब्याह का मुहूर्त निकलवाया है पुजारी जी कहते है की होली के बाद की पूनम को बड़ा ही शुभ मुहूर्त है .

पूनम की रात का जिक्र होते ही मेरे तन में झुरझुरी दौड़ गयी .

मैं- पुजारी जी कहते है तो ठीक ही होगा.

मैंने अनमने भाव से कहा.

“पुजारी जी हमारे देवर के बारे में भी कुछ कहिये , चंपा के ब्याह के बाद इनका ही नम्बर होगा आप कोई योग देखिये ताकि हम रिश्तो की बात शुरू कर पाए. ” भाभी ने चाय के कप रखते हुए कहा

मैंने अपनी आस्तीन थोड़ी चढ़ाई पुजारी की नजर मेरी कलाई पर बंधे निशा के धागे पर पड़ी और वो बोला- मैं देख कर बता दूंगा

पिताजी- तो लगभग दो सवा दो महीने बीच में है . अभिमानु तयारी शुरू कर दो

भैया ने हाँ में सर हिलाया

भाभी- मैं बता दू चंपा को

मैं- नहीं ये काम मुझे करने दो

तभी पिताजी बोल पड़े- उसे ये खबर हम देंगे . भाई शुभ समाचार है बिना किसी तोहफे के कैसे बताएँगे उसे.



मैं सोचने लगा कही उसे चोद कर तो नहीं बताएगा मेरा बाप.
 
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कम्बल ओढ़े मैं कुर्सी पर बैठा सोच रहा था तमाम संभावनाओ के बारे में की चाची भी मेरे पास आकर बैठ गयी चाची ने कुछ मूंगफलिया दी मुझे और बोली- देख रही हूँ पिछले कुछ दिनों से चिंता सी है तेरे चेहरे पर क्या बात है

मैं- कुछ खास नहीं बस ऐसे ही

चाची- फिर भी तू बता सकता है मुझे.

मैं-पिताजी के कमरे की सफाई कौन करता है

चाची- कोई नहीं . क्या तुझे नहीं मालूम जेठ जी की इजाजत के बिना कोई नहीं आता जाता वहां पर.

मैं- आज बड़ी प्यारी लग रही हूँ

चाची- समझ रही हूँ तेरी इन बातो को पर तेरा काम अब कुछ दिन हो नहीं पायेगा, मासिक आया है मुझे.

मैं मुस्कुरा दिया और उठ गया वहां से

चाची- कहाँ चला

मैं- थोड़ी देर सोना चाहता हूँ मैं.

मैंने रजाई ओढ़ी और आँखे बंद कर ली. शाम को मैं चंपा के घर गया . वो सिलबट्टे पर मसाले पीस रही थी . मैंने भरपूर नजर डाली उस पर बाप से चुदाई करवा के गदरा तो गयी थी वो.

चंपा- तू बैठ मैं बस अभी आती हु

मैं- कोई नहीं .

मैंने छप्पर के बाहर चारपाई लगाई और बैठ गया.

मैं- घरवाले कहाँ गए.

चंपा- बापू खेत पर और माँ पड़ोस में आती ही होगी .

मैं- तुझसे कुछ कहना था

चंपा- हाँ

मैं- तू कैसी चुडिया पहनती है

चंपा- मै क्यों चूड़ी पहनने लगी. अभी मेरा ब्याह कहाँ हुआ

मेरे ध्यान में ये बात क्यों नहीं आई थी . मतलब वो जो भी थी शादीशुदा ही रही होगी.

चंपा- क्यों पूछ रहा है तू चूडियो के बारे में

मैं- छोड़ ये बता राय साहब मिले क्या तुझसे आज

चंपा- नहीं पर क्या बात है

मैं- कुछ नहीं वो कह रहे थे की तुझसे मिलना है उनको

चंपा ने मेरी तरफ देखा और बोली- माँ आ जाती है फिर चलती हूँ मैं

तभी चंपा के पिता घर आ गए. मैंने देखा उनके चेहरे पर थोड़ी हताशा थी . चंपा ने पानी पकडाया अपने पिता को वो मेरे पास बैठ गए.

मैं- क्या बात है काका कुछ परेशां हो .

काका- नहीं कुंवर कोई परेशानी नहीं

मैंने काका का हाथ पकड़ा और बोला- अपने बेटे से छिपाने लगे हो काका कोई तो गंभीर बात जरुर है .

काका- बेटा आज चंपा के ब्याह की तिथि पक्की हो गयी है . और इस बार की ही फसल खराब हो गयी है . वैसे इतना जुगाड़ तो है मेरे पास की बारात की रोटी-पानी हो जायेगा पर शेखर बाबु का परिवार संपन है . दान-दहेज़ की फ़िक्र है उनकी हसियत जैसा ब्याह नहीं किया तो समाज में बेइज्जती होगी.

मैं- काका इस बात की क्या चिंता आपको . बहन-बेटिया कभी माँ बाप पर बोझ नहीं होती चंपा के भाग्य में जो है वो लेकर जाएगी ये. आप जरा भी फ़िक्र मत करो मैं हूँ न.

काका- बेटा राय साहब के बड़े अहसान रहे है हम पर . चंपा के लिए इतना योग्य वर तलाशा उन्होंने हम तो अपनी चमड़ी की जुतिया भी राय साहब के लिए बना दे तो भी उनका अहसान इस जन्म में नहीं उतार पाएंगे.

मैं- कैसी बाते कर रहे है आप काका. मेरा बचपन इस घर में गुजरा है आपके दो बेटे है मैं और मंगू चंपा के ब्याह की आपको कोई चिंता नहीं करनी है . मैं और मंगू जितनी भी कमाई करते है उसका एक हिस्सा हम बचपन से इसी दिन के लिए ही जमा करते आये है . आप निश्चिन्त रहो .

काका ने मुझे अपने सीने से लगा लिया और मेरे सर को पुचकारने लगे. उस दिन मैंने जाना था की बाप होना दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता है . मेरी नजर चंपा पर पड़ी जो दहलीज पर खड़ी भीगी आँखों से हमें ही देख रही थी . कुछ देर बाद मैं चंपा के घर से निकला और गली में आ गया.

“कबीर रुक जरा ”चंपा ने पीछे से आवाज दी तो मैं रुक गया . वो दौड़ते हुए आई और मेरे आगोश में समां गयी.

मैं- अरे क्या कर रही है , कोई देखेगा तो क्या सोचेगा

चंपा- परवाह नहीं मुझे . लगने दे मुझे सीने से तेरे

मैं- पागल मत बन

चंपा ने मेरे माथे को हौले से चूमा और वापिस चली गयी. मैं सोचने लगा इसके मन में क्या आया. मैं वापिस हुआ ही था की मेरी नजर वैध जी के घर के खुले दरवाजे पर पड़ी. मैं उधर हो लिया . देखा की वैध जी अन्दर बैठे दवाइया कूट रहे थे.

मैं- कैसे है वैध जी.

वैध- ठीक हूँ कुंवर . कैसे आना हुआ

मैं- इधर से गुजर रहा था सोचा मिलता चलू

मैंने गौर किया कविता की मौत के बाद घर पर इतना ध्यान दिया नहीं गया था और देता भी कौन .

मैं- वैध जी भाभी के जाने के बाद आप अकेले रह गए . आपको किसी प्रकार की समस्या हो तो मुझे बताना .

वैध- नहीं कुंवर सब ठीक है . मुझे बूढ़े की भला क्या जरूरते हो सकती है दो रोटियों के सिवाय उसकी भी अब चिंता नहीं मंगू रोज सुबह शाम खाना दे जाता है .

जिन्दगी में पहली बार मुझे मंगू पर गर्व हुआ .

मैं- आप शहर क्यों नहीं चले जाते या फिर रोहतास को यहाँ बुला लो ऐसी भी क्या कमाई करनी जिसमे परिवार संग ही न रह पाए.

वैध- रोहतास की तो बहुत इच्छा है वो हमें ले जाना चाहता था पर मुझे शहर की आबो हवा रास नहीं मेरी वजह से ही कविता बहु को यहाँ रहना पड़ा पर आज सोचता हूँ तो की काश हम शहर चले गए होते तो वो जिन्दा होती.

मैं- जाने वाले चले जातेहै पीछे यादे रह जाती है पर इतनी रात को भाभी जंगल में करने क्या गयी थी

वैध- इसी यक्ष प्रश्न ने मेरा जीना हराम किया हुआ है. मैं हैरान हु सोच सोच कर बेटा

मैं- वैध जी आप को जरा भी परेशां नहीं होना. आप अकेले नहीं है रोहतास शहर में है पर यहाँ भी आपका परिवार है हम लोग है आपके साथ .

वैध की बूढी आँखों में पानी आ गया. थोड़ी देर बाद मैं वहां से उठ कर कुवे की तरफ चल दिया. सवाल अब भी मेरे मन में था की जंगल में कविता क्या कर रही थी उस रात. ? कविता की मौत अगर जंगल में हुई तो उसकी मौत की वजह भी जंगल में ही होगी मैंने इस बात पर गौर किया और संभावनाओ पर विचार करते हुए मैं कुवे पर पहुँच गया. इस जंगल में कुछ तो ऐसा था जो छिपा हुआ था या जिसे छुपाया गया था .

मंगू से मिलने आई होगी कविता ये विचार ही निरर्थक था क्योंकि मंगू से मिलने के लिए उसके घर से जायदा सुरक्षित कुछ नहीं था . जब घर में चुदाई हो सकती थी तो बाहर खुले में रिस्क क्यों लेगी वो . दूसरा महत्वपूर्ण सवाल ये था की क्या कविता के मंगू के अलावा किसी और से भी सम्बन्ध हो सकते थे . इस शक का ठोस कारण था मेरे पास क्योंकि उस रात पहली हरकत में ही कविता ने लगभग मेरा लंड चूस ही लिया था .
 
#61



उस दोपहर मैं कुछ कपडे लेने अपने चोबारे में गया . कुछ पुराणी चीजे थी जरुरत की मैंने सोचा की इनको चाची के घर ही ले चलता हूँ. फिर देखा की चोबारे की सफाई काफी दिनों से हुई नहीं सोचा की चंपा को बोल दू पर फिर विचार किया छोटे से काम के लिए उसे क्या परेशां करना . इसी काम में थोडा धुल-मिटटी में सन गया मैं . मैंने अपने कपडे उतारे और बाथरूम की तरफ बढ़ गया.

दरवाजा आधा खुला था , मैंने पल्ले को और खोल दिया पर जो देखा मैंने कसम से एक पल नजरे ऐसी ठहरी की फिर उठ नहीं पाई. बाथरूम में मेरी आंखो के सामने भाभी पूरी नंगी पानी की बूंदों में लिपटी हुई खड़ी थी . साबुन के झाग में लिपटी भाभी की उन्नत चुचिया . गुलाबी जांघे और उतनी ही गुलाबी भाभी की छोटी सी चूत मेरे होश-हवास छीन ले गयी उस एक छोटे से पल में .

अचानक से ऐसा मामला हो गया जो न उसने सोचा था न मैंने. वो भोचक्की रह गयी मैं हैरान . भाभी के हुस्न का ऐसा दीदार शुक्र था मैं पिघल कर बह नहीं गया. जब भाभी को भान हुआ तो उसने तुरंत दरवाजा बंद कर लिया .अपनी तेज धडकनों को सँभालते हुए मैं तुरंत निचे आ गया.

निचे आते समय मेरी नजर राय साहब के कमरे पर पड़ी . मैंने सोचा की ये जाते कहाँ है . मैं पूरी ताक में था की कब वो चंपा को बुलाएगा चोदने के लिए . मैंने साइकिल उठाई और चौपाल पर जाकर बैठ गया. मेरे दिल में इस जगह को देख कर हमेशा ख्याल आता था की मेरी मोहब्बत की कहानी यही पर पूरी होगी. हाथ जोड़ कर मैंने लाली से माफ़ी मांगी और अपनी आगे की योजना पर विचार करने लगा.

समाज की चाशनी में लिपटे इस गाँव में अवैध संबंधो का तंदूर दहक रहा था . जिसका उधाहरण, लालि, चंपा राय साहब , मंगू-कविता, चाची और मैं खुद दे. मैंने सोचा ऐसे ही सम्बन्ध न जाने और भी गाँव वालो के रहे होंगे पर साले सब ने मुखोटे ओढ़े हुए थे शराफत के.

समझ नहीं आ रहा था की बाप चंपा को कहा किस जगह पेल रहा था . अभिमानु भाई और सूरजभान के बीच क्या था . मेरा दिल कहता था की मंगू को अपना राजदार बना लू पर चाह कर भी मैं उस पर विश्वास बना नहीं पा रहा था . मेरे पास दो सवाल थे एक का जवाब मेरे घर में था उअर दुसरे का जबाब तलाशने के लिए मुझे मलिकपुर जाना था . क्योंकि सूरजभान के बारे में मुझे जो भी जानकारी मिले वो वही से मिलती.

पसरते अँधेरे में घूमते घूमते मैं मलिकपुर में पहुँच गया . दो चार दुकानों का बाजार बंद हो रहा था . मैंने देखा की शराब की दूकान खुली थी . मैं उस तरफ बढ़ गया. मैंने देखा की एक भी आदमी नहीं था वहां पर सिर्फ एक औरत बैठी थी तीखे नैन-नक्श कपडे कम बदन की नुमाइश ज्यादा मैं समझ गया तेज औरत है ये .

“आज शराब नहीं मिलेगी आगे से माल आया नहीं ” उसने मुझे देख कर कहा.

मैं- शराब की तलब नहीं मुझे मेरी जरुरत कुछ और है .

उसने ऊपर से निचे तक देखा मुझे और बोली- तू तो वही है न जिसने सूरजभान का सर फोड़ा था .

मैं-किसी को न बताये तो वही हु मैं

वो- क्या चाहिए तुझे

मैं- कुछ सवाल है मेरे मन में जवाबो की तलाश है

वो- मेरा क्या फायदा तेरी मदद करने में

मैंने जेब से पाच पांच के नोटों की गड्डी निकाली और उसके हाथ में रख दी .

मैं- बहुत मामूली सवाल है मेरे तेरे अड्डे पर सब लोग आते है तू सबको जानती है हम एक दुसरे के काम आ सकते है .

उसने इधर उधर देखा और बोली- अन्दर आजा

मैं दुकान के अन्दर गया उसने दरवाजा बंद कर लिया . मैं उसके उन्नत उभारो को देखता रहा .

वो- क्या चाहता है तू

मैं-सूरजभान के बारे में क्या बता सकती है तू

वो- उसके बारे में क्या बताना सारा गाँव जानता है कितना नीच आदमी है वो .उसके दो ही काम है लोगो को तंग करना और पराई बहन बेटियों पर बुरी नजर डालना

मैं- कोई विरोध नहीं करता उसका .

वो- रुडा चौधरी बाप है उसका , ये गाँव उसकी जागीर है यहाँ पत्ता तक नहीं हिलता उसकी मर्जी के बिना . और फिर गाँव वाले क्या विरोध करेंगे. ये गाँव नहीं मुर्दा लोगो की बस्ती है जो सर झुका सकते है , गुलामी इनकी नसों में इतना अन्दर तक फ़ैल गयी है की आँखों में आँखे तक नहीं मिला सकते ये लोग.

मैं- तू तो दबंग लगती है . तू नहीं डरती उन लोगो से

वो- नहीं डरती मेरे पास है ही क्या खोने को जो मुझसे छीन लेंगे.

मैं- नाम क्या है तेरा

वो- रमा

मैं- रमा, तू इतना तो समझ ही गयी होगी की मुझे सूरजभान से कितनी नफरत है

रमा- जानती हूँ

मैं- उसके आतंक के अंत के लिए क्या तू मेरी सहायता करेगी मैं तुझे मुह मांगे पैसे दूंगा

रमा- पैसे नहीं चाहिए , क्या तू वादा कर सकता है की तू उसे मार देगा

मैं- इच्छा तो मेरी भी यही है . पर तू क्यों चाहती है ऐसा

रमा- उसकी वजह से मेरी बेटी को मरना पड़ा था .

मैंने रमा के कंधे पर हाथ रखा और बोला- मैं तुझसे वादा करता हु उसकी खाल जरुर उतारूंगा . एक बात बता तू अभिमानु ठाकुर को जानती है .

रमा- जानती हूँ

मैं- अभी मानु और सूरजभान की दोस्ती कैसी है . मेरा मतलब अभिमानु आते जाते रहता होगा यहाँ

रमा ने अजीब नजरो से देखा मुझे और बोली- सूरजभान से अभीमानु ठाकुर की दोस्ती. तुझे तो बिन पिए ही नशा हो रहा है .

मैं- कुछ समझा नहीं

रमा- अभिमानु शीतल जल है और सूरजभान तेल . दोनों अलग है उनमे दोस्ती मुमकिन नहीं

मैं- पर उस दिन जब मैंने सूरजभान को मारा तूने भी देखा होगा मेरा भाई कैसे उसे अपने सीने से लगाया था .

रमा- यही बात मुझे बहुत दिन से खटक रही है . अभिमानु ठाकुर ने पुरे पांच साल बाद इस गाँव में कदम रखा था .

रमा की बात से मैं और हिल गया.

मैं- पांच साल बाद, पर क्यों . और क्या पहले भैया रोज आते थे यहाँ

रमा- रोज तो नहीं पर तीसरे-चौथे दिन जरुर आते थे. फिर अचानक से उनका आना बंद हो गया.

पांच साल से भैया ने मुह मोड़ा हुआ था मलिकपुर से और फिर अचानक ही वो उस दिन आते है जब मैंने सूरजभान को लगभग मार ही दिया था और रमा बताती है की उन दोनों में कोई दोस्ती नहीं है . खैर मैंने रमा से वादा किया की मैं उस से मिलता रहूँगा और जो भी कुछ मेरे मतलब का उसे मालूम हो वो मुझे बतादे. वापसी में मेरा मन था की कुवे पर ही सो जाऊ . रस्ते में मैंने देखा की एक जगह राय साहब की गाड़ी खड़ी थी . जंगल के घने हिस्से में राय साहब की गाड़ी का होना अटपटा सा लगा मुझे. मैंने गाड़ी को देखा कोई नहीं था अन्दर.

“बाप, क्या करने आया होगा इधर ” मैंने अपनी साइकिल एक तरफ लगाई और झाड़ियो में छुप गया आज मुझे मालूम करना ही था की बाप के मन में क्या चल रहा था ..........................
 
#62



कुछ देर बीती , फिर और देर हुई और होती ही गयी . राय साहब का कहें कोई पता नहीं था. इंतज़ार करते हुए मैं थकने लगा था.इतने बड़े जंगल में मैं तलाश करू तो कहाँ करू न जाने किस दिशा में गए होंगे वो. मेरी आँखे नींद के मारे झूलने लगी थी की तभी जंगल एक चिंघाड़ से गूंज उठा . आवाज इतने करीब से आई थी की मैं बुरी तरह से हिल गया.

आज जंगल शांत नहीं था और मुझे तुरंत समझ आ गया की शिकारी निकल पड़ा है शिकार में पर वो ये नहीं जानता था की मैं भी हूँ यहाँ .मैं आवाज की दिशा में दौड़ा. झुरमुट पार करके मैं खुली जगह में पहुंचा तो देखा की एक बड़े से पत्थर पर वो ही आदमखोर बैठा है . उसकी पीठ मेरी तरफ थी पर न जाने कैसे उसे मेरी उपस्तिथि का भान हो गया था .

गर्दन पीछे घुमा कर उसने अपनी सुलगती आँखों से मुझे देखा . मैं भी खुल कर उसके सामने आ गया. अँधेरी रात में भी हम दोनों एक दुसरे को घूर रहे थे . समय को बस इतंजार था की पहला वार कौन करे .क्योंकि आज मौका भी था दस्तूर भी था और ये मैदान भी . आज या तो उसकी कहानी खत्म होती या फिर मेरी. एक छलांग में ही वो तुरंत पत्थर से मेरे सामने आकर खड़ा हो गया.

मैंने अपना घुटना उसके पेट में मारा और उछलते हुए उसके सर पर वार किया. ऐसा लगा की जैसे पत्थर पर हाथ दे मारा हो मैंने. उसने प्रतिकार किया और मुझे धक्का दिया मैं थोड़ी दूर एक सूखे लट्ठे पर जाकर गिरा. इस से पहले की मैं उठ पाता उसने अपने पैर के पंजे से मेरे पेट पर मारा.

दुसरे वार को मैंने हाथो से रोका और उसे हवा में उछाल दिया. न जाने क्यों मुझे वो कमजोर सा लग रहा था . तबेले वाली मुठभेड़ में भी मैंने ऐसा ही महसूस किया था .मेरे हाथ में एक पत्थर आ गया जो मैंने उसके सर पर दे मारा . वो चिंघाड़ उठा और अगले ही पल उसने मुझे कंधो से पकड़ कर उठा लिया मैं हवा में हाथ पैर मारने लगा. कंधो से होते हुए उसकी लम्बी उंगलिया मेरी गर्दन पर कसने लगी . मेरी साँसे फूलने लगी पर तभी उसने अपनी पकड़ ढीली कर दी और मुझे फेंक दिया .

मै हैरान हो गया ये दूसरी बार था जब वो चाहता तो मुझे मार सकता था पर उसने ऐसा नहीं किया . अपने आप को संभाल ही रहा था मैं की तभी मुझे गाड़ी चालू होने की आवाज सुनाई दी .मैं तुरंत उस दिशा में दौड़ा पर मुझे थोड़ी देर हो गयी गाड़ी जा चुकी थी . मैंने अपनी साइकिल उठाई और तुरंत गाँव की तरफ मोड़ दी. जितना तेज मैं उसे चला सकता था उतनी तेज मैंने कोशिश की . घर पहुंचा , सांस फूली हुई थी . मैं तुरंत पिताजी के कमरे के पास पहुंचा और दरवाजे को धक्का दिया. दरवाजा अन्दर से बंद था .

“पिताजी दरवाजा खोलिए ” मैंने किवाड़ पिटा

“हम व्यस्त है अभी ” अन्दर से आवाज आई

मैं- पिताजी दरवाजा खोलिए अभी के अभी

कुछ देर ख़ामोशी छाई रही इस से पहले की मैं आज दरवाजे को तोड़ देता अन्दर से दरवाजा खुला . मैं कमरे में घुस गया .पिताजी के हाथ में जाम था . टेबल पर एक किताब खुली थी .

मैं- जंगल में क्या कर रहे थे आप

पिताजी ने किताब बंद करके रखी और बोली- जंगल में जाना कोई गुनाह तो नहीं . हमें लगता है की इतनी आजादी तो है हमें की अपनी मर्जी से कही भी आ सके जा सके.

मैं- ये मेरे सवाल का जवाब नहीं है पिताजी

पिताजी- हम जरुरी नहीं समझते तुम्हारे सवालो का जवाब देना . रात बहुत हुई है सो जाओ जाकर

मैं- आपको जवाब देना होगा. आप अभी जवाब देंगे मुझे .

पिताजी ने अजीब नजरो से देखा मुझे और बोले- अभी तुम इतने बड़े नहीं हुए हो की हमसे नजरे मिला कर बात कर सको

मैं-नजरे छिपा कर तो आप भागे थे जंगल से . मैंने आपको पहचान लिया है आपके अन्दर छुपे उस शैतान को पहचान लिया है मैं जान चूका हूँ की वो हमलावर आदमखोर कोई और नहीं मेरा बाप है .

जिन्दगी में ये दूसरा अवसर था जब मैंने राय साहब के सामने ऊँची आवाज की थी .

राय साहब ने अपनी ऐनक उतारी उसे साफ़ किया और दुबारा पहनते हुए बोले- माना की हौंसला बहुत है तुममे बरखुरदार पर ये इल्जाम लगाते हुए तुम्हे सोचना चाहिए था क्योंकि हम चाहे तो इसी समय तुम्हारी जीभ खींच ली जाएगी.

मैं- ये ढकोसले, ये शान ओ शोकत ये झूठी नवाबी का चोला उतार कर फेंक दीजिये राय साहब .मैं जानता हूँ वो हमलावर आप ही है .

पिताजी ने जाम दुबारा उठा लिया और बोले- इस यकीन की वजह जानने में दिलचश्पी है हमें

मैं-क्योंकि मैं भी उसी जगह मोजूद था मेरी मुठभेड़ हुई उसी हमलावर से और जब मैं उसके पीछे था ठीक उसी समय आप की गाडी वहां से निकली . क्या ये महज इतेफाक है .

पिताजी ने शराब का एक घूँट गले के निचे उतारा और बोले-इत्तेफाक तू जनता ही क्या है इत्तेफाक के बारे में . समस्या ये नहीं है की हमारी गाड़ी वहां क्या कर रही थी समस्या ये है की जमीनों के साथ साथ जंगल को भी तुमने अपनी मिलकियत समझ लिया है किसी और का जंगल में जाना गवारा नहीं तुम्हे

मैं- कितना कमजोर बहाना है ये . चलो मान लिया की मुझ पर हमला होना और हमलावर का उसी समय भागना और आपका भी वही से एक साथ निकलना संयोग ही था पर इतनी रातको ऐसा क्या काम हुआ जो राय साहब को जंगल में जाना पड़ा.

पिताजी- हमने कहा न तुम्हे ये जानने की जरुरत नहीं

मैं- जरुरत है मुझे. गाँव के लोग मारे जा रहे है . गाँव की सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है

पिताजी- बेशक तुम्हारी जिम्मेदारी है पर तुम्हे यहाँ मेरी रात ख़राब करने की जगह कातिल को तलाशना चाहिए

मैं- उसे तो मैं तलाश लूँगा और जिस दिन ऐसा होगा मैं हर लिहाज भूल जाऊंगा.

गुस्से से दनदनाते हुए मैं कमरे से बाहर निकला . पहले चंपा के साथ सम्बन्ध और फिर ये घटना मैंने सोच लिया राय सहाब के चेहरे पर चढ़े मुखोटे को उसी पंचायत में उतारूंगा जहाँ लाली को फांसी दी गयी थी .



सुबह होते ही मैं उसी जगह पर पहुँच गया और वहां की भोगोलिक स्तिथि को समझने की कोशिश करने लगा. चारो दिशाओ में मैंने खूब छानबीन की तीन दिशाओ में मुझे कुछ नहीं मिला पर चौथी दिशा में काफी चलने के बाद मैं संकरी झाड़ियो से होते हुए उस जगह पर पहुँच गया जो मुझे हैरान कर गयी . मैं काले खंडहर के सामने खड़ा था .
 
#63



क्या पिताजी निशा से मिलने आये थे या फिर वो किसी तरह से जानते है निशा को मैंने खुद से सवाल किया और फिर खुद ही नकार दिया क्योंकि चारो दिशाओ में से कोई न कोई कहीं न कहीं तो जायेगी ही . अंजुली भर कर मैंने तालाब के पानी से अपने गले को तर किया और सीढिया चढ़ते हुए खंडहर में घुस गया. कुछ भी ऐसा नहीं था जो बताये की किसी और की आमद हुई हो वहां पर . फिर भी मैंने इस खंडहर को तलाशने का सोचा .

ऐसा कुछ भी नहीं था जो इस जगह को खास बनाये सिवाय निशा की मोजुदगी के. इक तरफ से ऊपर आती सीढिया जो घूम पर पीछे उस पगडण्डी पर जाती थी. मंदिर की गुम्बद नुमा छत और दो पायो के बीच तीन कमरे जैसे बरामदे. एक तरफ बड़ी दीवारे थी दूजी तरफ कुछ नहीं .राय साहब जैसा सक्श बिना किसी बात के जंगल में क्यों जायेगा इतनी रात को . ये बात पच नहीं रही थी मुझे.

निशा जब साथ होती थी तो ये जगह किसी जन्नत से कम नहीं लगती थी पर अभी यहाँ पर घोर सन्नाटा पसरा हुआ था . खैर, भूख भी लगी थी तो मैं वापिस कुवे पर चला गया . देखा चंपा घास खोद रही थी मैंने उसे अपने पास बुलाया

मैं- कुछ है क्या खाने को

चंपा- नहीं मालूम होता की तू यहाँ है तो ले आती खाना

मैं- कोई बात नहीं

मैंने चारपाई बाहर निकाली और लेट गया .चंपा थोड़ी दूर बैठ गयी मूढे पर

मैं- आज मजदुर नहीं आये क्या .

चंपा- पता नहीं क्यों नहीं आये

मैं- मंगू भी नहीं दिख रहा

चंपा- वो शहर गया है अभिमानु के साथ

मैं-किसलिए

चंपा- ये तो नहीं मालूम

मैंने एक नजर चंपा की फूली हुई चुचियो पर डाली और बोला- तू बता कैसा चल रहा है तेरा

चंपा- बस ठीक ही हूँ

मैं-तू आजकल घर नहीं आती

चंपा- तूने ही तो कहा था थोड़े दिन न आऊ

मैं- मेरा मतलब था की बच्चा गिराने की वजह से कमजोरी लगेगी तो आराम करना पर इतना भी आराम नहीं करना तुझे. वैसे मुझे मालूम है की मंगू ने नहीं चोदा तुझे. तू झूठ बोली मेरे से

चंपा- मैं तुझसे कभी झूठ नहीं बोलती

मैं- मंगू ने खुद कहा मुझसे

चंपा- कल को तू मुझे चोद रहा होता तो क्या तू ये बात कबूल कर लेता

मैं- मैं नहीं मानता तेरी बात क्योंकि मंगू किसी और से प्यार करता था .

चंपा- चूत मरवाई को प्यार नहीं कहते कबीर. उस रांड कविता के लिए मंगू एक खिलौना था बस जिस से वो खेल रही थी .

मैं- मंगू हद से जायदा मोहब्बत करता था उस से

चंपा- मुफ्त की चूत बड़ी प्यारी लगती है कबीर. मंगू को चूत चाहिए था कविता को लंड खुमारी प्यार लगेगी ही .

मैं- तू बहुत बड़ा आरोप लगा रही है

चंपा- मैं बस सच कह रही हूँ

मैं चंपा को देखता रहा .

चंपा- अब तू मुझे बता चुदाई के लिए आदमी किसी सुरक्षित स्थान की तलाश करेगा की नहीं

मैं- बिलकुल

चंपा- कविता ज्यादातर अकेली रहती थी वैध कभी होता कभी नहीं . तो जब घर पर गांड मरवा सकती थी वो तो जंगल में क्या माँ चुदाने गयी थी .

मैंने चंपा के हसीं चेहरे को देखा. लडकिया गाली बकते समय और भी प्यारी लगती थी. अफ़सोस इस बात का था की मेरे पास कोई जवाब नहीं था .

चंपा- मुझे पूर्ण विश्वास है की उसका कोई और यार था जिससे चुदने वो जंगल में गयी थी और तभी उस पर हमला हुआ

मैं- क्या ऐसा नहीं हो सकता की किसी ने उस पर हमला किया जान बूझ कर जंगल में बुलाया ताकि शक उस आदमखोर पर जाये

चंपा- हो सकता है

मेरे मन में था की सीधे चंपा से पुछू की राय साहब ने कैसे चोदा उसे पर मैं पूछने से कतरा रहा था .

मैं- तुझे क्या लगता है की वो दूसरा कौन होगा जिस से कविता चुदती होगी . वैध जी की गैर मोजुदगी में कोई तो आता होगा उसके घर .

चंपा- ये अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है क्योंकि कोई भी बीमारी का बहाना करके जा सकता था उनके घर

कविता चालू औरत थी चंपा की इस बात को पुख्ता कविता की वो हरकत कर रही थी जब उसने मेरा लंड चूसने की हरकत की थी.

मैं- मुझे भी लेनी है तेरी

चंपा ने मेरी बात बहुत गौर से सुनी और बोली- जानता है मैं हमेशा से चाहती थी तेरे साथ ये सब करना पर मैं तुझे तुझसे ज्यादा जानती हूँ तू ये कह रहा है क्योंकि तू मेरे मन की थाह लेना चाहता है .ऐसे कितने लम्हे आये गए जब हम एक हो सकते थे पर तू न जाने किस मिटटी का बना है और मुझे अभिमान है इस बात का की नियति ने मुझे तुझ जैसा दोस्त दिया है जो ये जानते हुए भी की मैं गलत हु मेरे साथ है .

मैं- फिर भी मुझे लेनी है

चंपा उठी और सलवार का नाडा खोल दिया मेरे सामने सलवार उसके पैरो में गिर गयी.

“ले फिर कर ले तेरी मनचाही ” उसने कहा

मैं- अभी नहीं जब मेरा मन करेगा तब

चंपा- ये खेल मत खेल मेरे साथ तू जो जानना चाहता है कह तो सही मुझे

मैं- मुझे लगता है की चाची और राय साहब के बीच चुदाई होती है

मेरी बात सुनकर चंपा की आँखे बाहर ही आ गयी.

चंपा- असंभव है ये . चाची कदापि ऐसा नहीं करेगी

मैं- चाची नहीं करेगी राय साहब तो कर सकते है न और दोनों के पास वजह भी तो है दोनों अकेलेपन से जूझ रहे है और फिर घर में ही जब सुख मिल सकता है तो क्या रोकेगा उनको.

चंपा - चाची बहुत नेक औरत है

मैं-नेक तो तू भी है पर अपने ही भाई का बिस्तर गर्म करती है जब तू कर सकती है तो राय साहब अपने भाई की बीवी को क्यों नहीं चोद सकते.

मैंने अपना पासा द्रढ़ता से फेंका.

चंपा-मानती हूँ चाची प्यासी है कितनी ही बार मैंने उसकी चूत का पानी निकाला है पर फिर भी मैं कहूँगी की तेरी कही बात कोई कल्पना है

मैं- मैं सच कह रहा हूँ , मैंने राय साहब के कमरे में किसी को देखा था .

मेरी बात सुनकर चंपा के माथे पर बल पड़ गये.

मैं- राय साहब अकेले है उनको भी तो इस चीज की जरुरत है और जब घर में ही चूत मिले तो उसके मजे ही मजे तू तो समझती ही हैं न

चंपा इस से पहले की मेरी बात का जवाब देती . पगडण्डी से आते मैंने राय साहब को देखा .

पिताजी ने एक नजर हम दोनों पर डाली और फिर चंपा से बोले- हमने तुमसे कहा था की तुम्हे कही चलना है हमारे साथ . हम गाड़ी में इंतजार कर रहे है तुम्हारा इतना कह कर पिताजी वापिस मुड गए. मैंने चंपा के चेहरे पर एक अजीब कशमकश देखि.

 
#64



“कहाँ जाना है आपको ” मैंने राय साहब से पूछा

पिताजी ने एक नजर मुझपर डाली और बोले- तुम्हारा जानना जरुरी नहीं है .

मैं- ये फिर कभी जाएगी आप के साथ मुझसे इस से कुछ काम है बाद में आएगी ये

पिताजी- चंपा तूने सुना नहीं हमने क्या कहा

मैं- चंपा ने सुना भी और देख भी रही है पर ये अभी यही रहेगी.

पिताजी ने गहरी नजरो से देखा चंपा को उसने अपने कदम आगे बढ़ाये की मैंने उसकी कलाई पकड़ ली .

“बदतमीजी एक हद तक ही बर्दास्त के काबिल रहती है बरखुरदार ” इस बार पिताजी थोडा तल्ख़ थे.

चंपा - जाने दे कबीर, मैं बाद में मिलूंगी तुझे.

मैं चाहता तो नहीं था पर चंपा की आँखों में एक विनती सी थी .दस्तूर तो ये था की चंपा अपनी चूत किसी को भी दे उसकी मर्जी पर न जाने क्यों मुझे बुरा बहुत लगने लगा था . मैंने रजाई ओढ़ी और सोने की कोशिश करने लगा क्योंकि नींद ही मेर सर के दर्द को मिटा सकती थी .

नींद उचटी तो पाया की अँधेरा घिरा हुआ था . आसमान में कुछ नहीं था काली रात के सिवाय . मटके से पानी पीने आया तो देखा की कुवे की मुंडेर पर निशा बैठी थी .

मैं- तू कब आई

निशा- तूने देखा तभी

मैं- मुझे जगा लेती और बाहर क्यों बैठी है

निशा- अजब सा सकून है तेरे दर पर कदम अपने आप बढ़ने लगे है इस दहलीज की तरफ .

मैं- जहाँ तक तेरी नजर देखे सब कुछ तेरा ही तो है

निशा- बेशक ,पर मुझे क्या मोह क्या चाहत जो कुछ है तू है

मैं- कहती है तू मानती तो नहीं

निशा-मैं मानु न मानु ये रात सब जानती है

मैं- अन्दर आजा

मैंने पानी पिया और हम अन्दर आ गए.

निशा मेरी रजाई में घुस कर बैठ गयी और बोली- क्या बात है कुछ परेशान से लगते हो कुंवर जी

मैं - वही घर की परेशानी . चंपा और राय साहब का अलग ही नाटक चल रहा है .

निशा- बड़े रंगीले है पिताजी तुम्हारे. तुम्हे बुरा लगता है क्योंकि वो बाप है तुम्हारा पर ठाकुरों को विरासत में अय्याशी ही मिलती है . खून में दौड़ता है जिस्मो को पाने का नशा. इनको लगता है की दुनिया में जो भी मिले उसे अपने निचे पटक लो.

मैं- कहती तो तू सही है मेरी जाना पर क्या करू तू ही बता

निशा- जीने दे उनको अपनी जिन्दगी . चंपा को ठीक लगता है तो चलने दे जो चल रहा है .

मैं- बात सिर्फ इतनी सी नहीं है मेरी समस्या गाँव वालो की सुरक्षा की भी है . ये जो सिलसिला शुरू हुआ है इसका अंत न जाने क्या होगा

निशा-जो भी होगा ठीक ही होगा

मैं- तू कर न मेरी मदद .

निशा- क्या चाहिए तुझे बता

मैं- कविता उस रात जंगल में क्या कर रही थी इसका जवाब चाहिए और कल राय साहब जंगल में क्या कर रहे थे ये भी .

निशा-जंगल का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है कबीर. जंगल साक्षात् जीवन है क्या नहीं देता ये तुमको. खाना , पानी इंधन, जडीबुटी . पर लोग इसको भूलने लगे है . कितनी ही लोग इसको ख़राब कर रहे है , मतलबी इंसानी जात . ये लोग भी अपना कोई मकसद साध रहे होंगे.

मैं- क्या पिताजी कल तेरे ठिकाने की तरफ आये थे .

निशा- वहां कोई नहीं आता , भुला दी गयी एक कहानी है वो जिसे मैं और तू जी रहे है . क्या हुआ कभी कोई पशु बेशक आ निकले पर इन्सान नहीं झांकता उधर. दूसरी बात वो एक शापित जगह है और इन्सान एक कमजोर कौम है जिसके दिल में कुछ नहीं सिवाय खौफ के .

मैं- समझ नहीं आ रहा की ऐसा क्या है इस जंगल में जो कविता और राय साहब को खींच लाये . तूने तो देखा था न कविता को

निशा- मुझे अफ़सोस है की मैं उसे बचा नहीं पाई. वैसे क्या तूने चंपा और राय साहब को देखा हमबिस्तर होते हुए

मैं- नहीं भाभी ने बताया मुझे

निशा - कानो का कच्चा है क्या तू . तूने मान लिया

मैं- और वो टूटी चुडिया

निशा- बड़े भोले हो कुंवर जी , तुम्हे रंगे हाथ पकड़ना चाहिए उन दोनों को . भाभी ने अगर उनको देखा तो उसने तुम्हारे भैया को क्यों नहीं बताया उसने क्यों प्रतिकार नहीं किया की घर में ये अनैतिक काम क्यों हो रहा है पर उसने चुप्पी साधी और तुम्हे बताया .मैं पूछती हु क्यों तुम ही क्यों

मेरे पास कोई जवाब नहीं था निशा की बात का

निशा- जो राज घर में दबे होते है उनकी जड़े बहुत गहरी होती है . मैं तुम्हे रास्ता दिखा सकती हूँ चलना तुम्हे खुद पड़ेगा .

मैं-वही कोशिस कर रहा हूँ . एक मेरे घर की समस्या दूजा वो आदमखोर और तीसरा एक चुतिया वो सूरजभान कुंडली मार कर मेरे सुख पर बैठ गए है .एक तू ही तो है जिसको देख कर मैं अपना गम भूल जाता हूँ तू एक बार कह तो सही मैं सब कुछ छोड़ दू तेरे लिए तू कहे तो उसी खंडहर को हम अपना आशियाँ बना लेंगे. तू एक बार थाम तो सही हाथ मेरा

निशा- न मुझमे इतनी शक्ति है कबीर न मेरी नियति में तेरा साथ है ये एक अकाट्य सत्य है

मैं- तू ही बता मैं क्या करू

निशा- तू खोज उस सच को जो तेरी दहलीज में छुपा है . तुझे लगता है तेरे पिता गलत है तो साबित कर उनको गलत . इतिहास को तलाशना बहुत मुश्किल होता है कबीर . गड़े मुर्दे उख्ड़ेंगे तो उनकी बदबू जीना हराम कर देगी तेरा. कड़ीयो को जोड़ना सीख . पहली कड़ी तुझे तलाशनी है तो देख वो कमजोर कड़ी कहाँ है .

मैं- ठीक है चंपा से कल खुल कर पूछताछ करूँगा.

निशा- लोगो को पहचान परख उनको

मैं- समझ गया .

निशा ने मेरे गालो को चूमा और बोली- कल राय साहब किसी आदमी के साथ थे जंगल में . दोनों बड़ी देर तक दोनों कुछ देख रहे थे अनुमान लगा रहे थे

मैं- क्या देख रहे थे

निशा- शायद कुछ ऐसा जो तू जानना चाहता है .

 
उर्वशी की तबीयत अचानक खराब होने की सूचना मिली है मन थोड़ा व्याकुल है
 
#65



सुबह जब मैं जागा तो निशा जा चुकी थी . बाहर आकर देखा की भाभी, चंपा और मंगू तीनो ही खेतो पर थे. मैंने एक नजर उन पर डाली और जंगल में चला गया. वापिस आते ही चंपा ने मुझे चाय का गिलास पकडाया . मेरी नजर भाभी पर पड़ी जो हमें ही देख रही थी . मैं उनके पास गया .

मैं- इतनी सुबह आप खेतो पर

भाभी- कभी कभी मुझे भी घर से बाहर निकलना चाहिए न .

मैं- सही किया जो आप आ गयी मैं आ ही रहा था आपसे मिलने

भाभी- मुझसे क्या काम

मैं- वसीयत के चौथे टुकड़े के बारे में बात करनी थी

भाभी - मैं नहीं जानती उसके बारे में

मैं- पर मुझे जानना है . चाची, भैया और मैं हमसे अजीज और कौन है पिताजी के लिए . क्या चंपा का नाम है उस चौथे हिस्से में

भाभी- वो इतनी भी महत्वपूर्ण नहीं है .

मैं- तो बता भी दो मुझे

भाभी- मुझे जरा भी दिलचस्पी नहीं है जायदाद में कबीर .

मैं- इतना भी प्रेम नहीं बरस रहा इस परिवार में की ना आप हिस्सा चाहती है न भैया और न चाची. आप सब को इस जमीन में दिलचस्पी नहीं है तो क्या चाहते है आप लोग क्या ख्वाहिश है आप सब की

भाभी- परकाश नाम है उसके पुरखे मुनिमाई करते थे राय साहब के यहाँ उसने वकालत का पेशा चुना . राय साहब और तुम्हारे भैया के सारे क़ानूनी मामले वही संभालता है. वो ही बता सकता है क्या था उस हिस्से में .

मैं- क्या भैया को मालूम है उस चौथे हिस्से के बारे में

भाभी- क्या तुम जानते हो तुम्हारे भैया को

भाभी- परकाश से मिलो . खैर , क्या अब भी उस डाकन से मिलते हो तुम

मैं- मिलना क्या है पूरी रात साथ ही सो रहे थे हम

मैंने भाभी से कहा और वापिस मुड गया. मैंने देखा नहीं भाभी के चेहरे पर क्या भाव थे .मैंने मंगू को देखा जो खाली खेतो को देख रहा था .

मैं- कहाँ गया था तू भैया के साथ

मंगू- टेक्टर लेने , भैया का कहना है की जमाना बदल रहा है हल की जगह खेती में टेक्टर का उपयोग करना चाहिए . पैसे भर आये है जल्दी ही आ जायेगा.

मैं- भैया वो जो नई जमीन के बारे में कह रहे थे वो जमीन देखने कब जायेंगे

मंगू- मुझे नहीं पता

मैं- मंगू बुरा मत मानियो पर मुझे लगता है की कविता का तेरे आलावा किसी और से भी चक्कर चल रहा था .

मंगू ने अजीब नजरो से देखा मुझे

मंगू- वो चालू औरत नहीं थी

मैं- क्या कभी उसने तुझे कुछ बताया

मंगू- हम ज्यादा बाते नहीं करते थे बस मिलते चुदाई करते और अलग हो जाते.

मुझे लगा की चंपा सच कहती थी की कविता बस इस्तेमाल कर रही थी मंगू का . कविता के बारे में कुछ तलाशना था तो उसके घर से ही शुरुआत करनी थी . मैंने पता लगाया की वैध किसी दुसरे में गाँव में गया हुआ है मैं चुपके से उसके घर में घुस गया. एक तरफ दुनिया भर की शीशिया थी जिनमे दवाइया और उन्हें बनाने का सामान था . मैंने कविता के कमरे में तलाशी शुरू की . दीवारों में बने खाने औरत के कपड़ो से भरे थे .

कमरा वैसे तो कुछ खास नहीं था एक पलंग था . पास में एक मेज थी जिस पर औरतो का कुछ सामान लाली-पोडर पड़ा था. मेज की दराज खोली तो उसमे तरह तरह की कच्छी पड़ी थी . रेशमी, जालीदार और भी कई तरह की . मैंने उनको हाथ में लेकर अच्छे से देखा. गाँव में मनिहारिन तो ऐसी नहीं बेच सकती थी मैं दावे से कह सकता था . मुझे कुछ जेवर मिले . गाँव की एक आम औरत जिसकी आर्थिक स्तिथि इतनी अच्छी भी नहीं थी की वो इतने जेवर बनवा ले इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया.

मैंने कमरे को और अच्छे से खंगाला. मुझे एक छोटा बक्सा मिला जिसमे सौ-सौ के नोटों की गद्दिया थी. मेरा तो दिमाग ही घूम गया . एक वैध की बहु के पास इतना पैसा कहाँ से आया. किसने दिया. इतनी रात में जब आदमखोर का आतंक मचा हुआ है कविता जंगल में जाती है , जाहिर है उसे कुछ तो ऐसी प्रचंड लालसा रही होगी या फिर कोई गहरी मज़बूरी सिर्फ इन्ही दो सूरतो में वो जा सकती थी . कुछ तो कुकर्म कर रही थी वो .मंगू के आलावा कौन पेल रहा था उसे. कविता के जेवरो को वापिस रख ही रहा था की मेरी नजर आईने के पास पड़ी डिबिया पर पड़ी.

उत्सुकता वश मैंने उसे खोला . उसमे कांच की चुडिया थी . ऐसा लगा की मैंने इनको पहले देखा हो पर याद नहीं आ रहा था मैंने थोडा जोर दिया और जब याद आया तो ऐसा याद आया की सर्द मौसम में भी मैं अपने माथे पर आये पसीने को नहीं रोक सका. मैंने अपनी जेब से टूटी चूड़ियां निकाली और मिलान किया . मामला शीशे की तरह साफ़ था . ये चुडिया, ये पैसे और ये महंगे जेवर चीख चीख कर कह रहे थे की ये सब राय साहब की ही मेहरबानी थी . राय साहब ही वो दुसरे शक्श थे जो कविता को चोदते थे.

गरीबो का मसीहा, सबके लिए पूजनीय राय साहब का ऐसा चेहरा भी हो सकता था कोई विश्वास नहीं करे अगर मैं किसी से कहूँ तो पर सच शायद ये ही था. पर यहाँ एक सवाल और मेरे सामने आ खड़ा हुआ था की वसीयत का चौथा हिस्सा कविता का नहीं हो सकता क्योंकि कविता तो मर चुकी थी . वो शायद बस दिल बहलाने के लिए ही हो . निशा ने कहा था हवस , अयाशी खून में दौड़ती है . अब मुझे ये सच लग रहा था कितनी आसानी से मैंने चाची को चोद दिया था . कितनी ही मचल रही थी चंपा मुझसे चुदने के लिए.

वैध के घर से आने के बाद मैं चौपाल के चबूतरे पर बैठे सोच रहा था की राय साहब को रंगे हाथ चुदाई करते हुए पकड़ने के लिए मुझे एक ठोस योजना बनानी पड़ेगी जिसके लिए मुझे दो लोग तलाशने थे एक जो राय साहब का बिलकुल खास हो और जो उनके खिलाफ हो. खैर सुबह मुझे प्रकाश से मिलना ही था . कुछ सोच कर मैं रमा के ठेके की तरफ चल दिया. वहां पहुन्चा तो पाया की काफी लोग दारू पी रहे थे पर सूरजभान या उसका कोई साथी नहीं था.

मैंने रमा को देखा उसने मुझे इशारा किया और हम ठेके के पीछे बने कमरे में आ गए.

रमा- कैसे है कुंवर जी

मैंने रमा की भरपूर खिली हुई चुचियो पर नजर डाली और बोला - बढ़िया तुम बताओ

रमा- वो मुनीम का छोरा प्रकाश बहुत चक्कर लगा रहा है मलिकपुर के रुडा से खूब मिल रहा है

मैं- वकील है न जाने कितने लोगो का काम देखता होगा.

रमा-बड़ा धूर्त है वो .

मैं- क्या प्रयोजन हो सकता है उसका

रमा-रुडा की लड़की सहर से पढ़ कर आई है . मुझे लगता है की उसी के चक्कर में जाता होगा .

मैं- जान प्यारी नहीं क्या उसे . परकाश को क्या नहीं मालूम की ठाकुरों की बहन-बेटियों पर बुरी नजर डालने का क्या अंजाम होगा.

रमा- बहन-बेटी तो सबकी समान होवे है कुंवर जी, कोई माने या ना माने वैसे भी हर औरत निचे से एक जैसी ही होती है .

बातो बातो में रमा ने मुझे बताया की पहले वो मेरे गाँव में ही रहती थी फिर उसके पति की मौत हो गयी तो वो मलिकपुर आ गयी यहाँ भी तक़दीर ने उसे दुःख ही दिए.

हम बात कर ही रहे थे की बाहर से कुछ चीखने चिल्लाने की आवाजे आने लगी तो हम ठेके की तरफ गए और वहां जो मैंने देखा ...................
 
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