Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed) - Page 8 - SexBaba
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Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed)

#66



मैंने देखा वकील परकाश एक गाँव वाले के साथ उलझा हुआ था. उसका गिरेबान पकड़ा हुआ था .

रमा- रोज का तमाशा है ये इधर कोई न कोई किसी न किसी से उलझा रहता है

पर मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा था .

मैं- रसूखदार लोगो को शोभा नहीं देता ऐसे राह चलते हुए ये ओछी हरकते करते हुए .

प्रकाश ने मुझे देखा और बोला- कुंवर साहब आप यहाँ

मैं- हमें तो आना ही था , यहाँ के नशे की बड़ी तारीफ सुनी थी .

प्रकाश ने एक नजर रमा पर डाली और बोला- नशा तो मशहूर है यहाँ का

मैंने रमा से हमारे लिए दारू लाने को कहा और हम थोडा दूर बैठ गए.

मैं- और वकील साहब वसीयत का काम कहाँ तक पहुंचा

वकील - बड़ी जल्दी है आपको हिस्सा लेने की

मैं- हमारे दो ही शौक है जमीने और जिस्म . जितने मिले उतने थोड़े

वकील-ये बात तो है , वैसे पसंद उम्दा है आपकी

वकील ने रमा को देखते हुए कहा

मैं- हमें आपकी हसरतो का भान भी है वकील साहब , आपकी ये इच्छा हम पूरी कर सकते है पर वो कहते हैं न हर चीज की एक कीमत होती है

वकील- और वो कीमत क्या है

मैं- बहुत छोटी कीमत. बस आपको बताना होगा की वसीयत के चौथे कागज में क्या लिखा है .

मेरी बात सुनकर वकील का नशा एक पल में ही उड़ गया वो आँखे फाड़े मुझे देखने लगा.

मैं- मेरे लिए काम करो मुह्मांगे पैसे और नए जिस्म जब तुम चाहो

वकील- कुंवर साहब, वसीयत के सिर्फ तीन हिस्से है आप जितना जल्दी इस बात को समझ ले बेहतर होगा.

मैं- देखो परकाश, जीवन जो हैं न बड़ा अनिश्चित है न जाने कब क्या हो जाये आज हम यहाँ बैठे है कल हम हो न हो. तो क्या ही फायदा इन सब चीजो का तुम हमारे पारिवारिक वकील हो तुम्हारा फर्ज है हमें हर वो जानकारी देना जिसकी हमें जरूरत है .

वकील- आप मुझे धमका रहे है

मैं- तुम्हे ऐसा लगता है तो ये ही सही पर जो जानकारी हमें चाहिए वो हम लेकर रहेंगे चाहे उसके लिए हमें तुम्हारी खाल ही क्यों न उधेद्नी पड़े.

मैंने अपना गिलास होंठो से लगाया.

वकील- ये बात राय साहब को मालूम होगी तो आप मुशकिल में आ जायेंगे

मैं- ये बात राय साहब को मालूम हुई तो तुम मुश्किल में आ जाओगे. आखिर ऐसी क्या वजह थी जो वसीयत के कागज लेकर तुम जंगल में गए थे राय साहब से मिलने.

प्रकाश के माथे पर पसीना उभर आया. उसने एक ही साँस में अपना गिलास खाली कर दिया और बोला- मेरा यकीन कीजिये

मैं- यकीन है बस तुम बता दो की उस चौथे टुकड़े में क्या लिखा था .

वकील- ऐसा कोई कागज नहीं था .

प्रकाश उठ खड़ा हुआ और जाने लगा.

“सुना है की रुडा की बेटी पर नजर है तुम्हारी ” मैंने थोडा जोर से कहा .

प्रकाश के कदम रुक गए वो एक पल पीछे मुड़ा और फिर तेज कदमो से वहां से नो दो ग्यारह हो गया. जितना मैंने समझा था उस से ज्यादा घाघ था ये . अगले दिन मैं जब मैं घर पहुंचा तो देखा की चंपा रसोई में थी . मैंने उसे छत पर आने को कहा . थोड़ी देर में वो मेरे सामने थी .

मैं- कहाँ ले गए थे तुझे राय साहब

चंपा- कहीं नहीं

मैं- बता भी दे वैसे भी अब छिपाने को कुछ नहीं है

चंपा- क्या सुनना चाहता है तू

मैं- जो तू छिपा रही है .

चंपा- मैंने तुझसे कुछ नहीं छिपाया

मैं- झूठी है तूने झूठ बोला की मंगू ने पेला तुझे जबकि तू किसी और के साथ सो रही है .

चंपा-मैंने पहले भी कहा था तुझे अब भी कहती हूँ मंगू करता है मेरे साथ

मैं- क्या वो बच्चा मंगू का था

चंपा- क्या फर्क पड़ता है अब

मैं- फर्क पड़ता है क्योंकि मेरी दोस्त मेरे बाप का बिस्तर गर्म कर रही है . मुझे दुःख होता है इस बात का

चंपा - देख कबीर तुझे जो सोचना है सोच, जो मानना है मान पर मैं नहीं चाहती की मेरी वजह से बाप-बेटो में तकरार हो .

मैं- सिर्फ इतना जानना है की कौन सी मज़बूरी में तू ये सब कर रही है

चंपा- कोई मज़बूरी नहीं है

मैं- कल तुझे चोदने ले गया था न मेरा बाप

चंपा- कल की क्या बात अब कल तो बीत गया आने वाला कल देख अब

मैं- दिल तो करता है तेरी ऐसी हालत कर दू की तो सौ बार सोचे. अरे तुझे क्या समझा था मैंने और तू इतना गिर गयी

चंपा- मैं अकेली नहीं हूँ जो गिरी हुई है ये दुनिया ही मादरचोद है कबीर.

मैं- ऐसी कैसी आग लगी थी तुझे जो दो दो लोग भी ठंडी नहीं कर पाए तुझे .

चंपा- तुझे जो कहना है कह ले.

मैं- तुझसे तो मैं क्या ही कहूँ , पर एक दिन आएगा जब राय साहब को उसी चौपाल पर नंगा करूँगा जहा न्याय की कसमे खाई जाती है .

निचे से भाभी ने चंपा को आवाज दी तो वो चली गयी . छत से गाँव के नज़ारे को देखते हुए मैं सोचने लगा कोई तो मजबूत सिरा मिले मुझे. दिल किया की राय साहब के कमरे की फिर से तलाशी ली जाये पर मेरा बाप ये मौका फिर नहीं देगा मुझे मैं जानता था .

मैंने भैया की गाड़ी आते देखा तो मैं निचे चला गया .

“कैसा है छोटे ” उतरते ही भैया ने पूछा मुझसे

मैं- नाराज हूँ

ये सुनकर भैया के कदम ठिठक गए .

भैया- फिर कभी ऐसा मत कहना मेरे भाई, तू नाराज होगा तो मेरा क्या होगा.

मैं- मेरे बारे में सोचते ही नहीं आप

भैया- तेरे बारे में नहीं सोचता मैं जानता है तू क्या कह रहा है

मैं- मेरे बारे में सोचते तो मेरे दुश्मन को सहारा नहीं दे रहे होते आप जिस दिन आपसे दूर चला जाऊंगा न उस दिन याद बहुत आएगी मेरी.

मेरी बात सुनकर भैया ने मुझे अपने सीने से लगा लिया. उनकी आँखों में आंसू भर आये- दुबारा तेरी जुबान पर ये शब्द नहीं आने चाहिए . तूने सोच भी कैसे लिया की तू मुझसे दूर चला जायेगा. तू मेरी दुनिया है छोटे

मैं- तो फिर मेरा भाई क्यों मेरे दुश्मन के साथ है

भैया- तू मेरा जिगर है छोटे और वो मेरा फर्ज........................

 
#67



मैं- कैसा फर्ज भैया

भैया- बस इतना समझ ले छोटे , उसे भी थाम कर रखना है मुझे

मैं- ये मुमकिन नहीं हो पायेगा भैया . मैं हद नफरत करता हु उससे . एक दिन आयेगा जब या तो वो रहेगा या मैं

भैया- जब तक मैं हूँ वो दिन कभी नहीं आएगा.

भैया ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और अन्दर चले गए. मैंने देखा भाभी मुझे ही देख रही थी .तमाम चीजो के बीच सिर्फ यही राहत थी की फिलहाल के लिए उस आदमखोर के हमले रुके हुए थे. गाँव वालो को भी थोडा चैन था . कुछ तो भैया छिपा रहे थे मुझसे पर क्या. राय साहब और भैया दोनों में एक बात एक सी थी की दोनों के कोई दोस्त नहीं थे. और जब आदमी अकेला होता है तो उसके इतिहास को तलाशना और मुस्किल हो जाता है .

एक बार फिर मैं दोपहर को रमा के अड्डे पर था.

रमा- पर तुम प्रकाश से जानकारी कैसे निकल्वाओगे

मैं- तुम्हारी मदद से , तुम्हारे हुस्न पर फ़िदा है वो तुम उसे अगर उलझाये रखो तो मैं उसके घर से कागज तलाश लूँगा.

रमा- मैं उसे जायदा देर तक नहीं उलझा पाउंगी , क्योंकि मैं उसे बस रिझा सकती हूँ उसकी मनचाही नहीं करुँगी. दूसरी बात वो बहुत धूर्त है समझ जायेगा की तुम्हारे कहने पर मैं कर रही हूँ ये

मैं- तो क्या करे.

रमा- रात की जगह तुम ये काम दिन में करो . दिन में वो अदालत में रहता है या फिर तुम्हारे पिता के साथ

.

रमा की बात में दम था . और दस्तूर भी क्योंकि प्रकाश का घर आबादी से दूर मलिकपुर के पिछले हिस्से में था. मैंने रमा को साथ लिया और हम उसके घर में घुस गए. घर ज्यादा बड़ा नहीं था तीन कमरे थे और एक छोटी सी रसोई. एक कमरे में उसके कागज थे कचहरी के . मैंने वसीयत के कागज तलाशे पर कुछ नहीं मिला. पूरा कमरा देख लिया. दुसरे कमरे में बस बिस्तर पड़ा था . पर तीसरे कमरे में कुछ ऐसा था जिसने मेरे मन को और मजबूत किया की प्रकाश धूर्त ही नहीं गलीच भी था. कमरे में औरतो की कछिया पड़ी थी . फटे हुए ब्लाउज पड़े थे. मतलब की यहाँ पर वो औरतो को चोदने के लिए लाया करता था .

मैं- देख रही हो रमा क्या काण्ड हो रहे है ये

रमा- समझ रही हूँ .

मेरी नजर रमा की छातियो पर पड़ी जो जोर से ऊपर निचे हो रही थी . बेशक उसने शाल ओढा हुआ था पर फिर भी मैं उसकी गोलाइयो को महसूस कर पा रहा था . एक पल को लगा की उसने मेरी नजरे पकड़ ली है.

रमा- वो कागज महत्वपूर्ण है उन्हें खुले में तो नहीं रखेगा . किसी तिजोरी जैसी जगह में रखेगा.

मुझे जायज लगी उसकी बात. मैंने एक बार फिर से गहनता से तलाशी शुरू की पर हालात वैसे के वैसे थे.

मैं- घी जब सीधी ऊँगली से नहीं निकलता तो ऊँगली टेढ़ी करनी पड़ती है प्रकाश अब खुद कागज देगा मुझे .

हम लोग वापिस रमा के ठिकाने पर आ गए.

रमा- जबसे तुम इधर आने लगे हो सूरजभान और उसके साथी आते नहीं इधर

मैं- मेरी वजह से तुम्हारा धंधा कम हो गया .

रमा- वो बात नहीं है

मैं- क्या उन्होंने तुमसे कहा नहीं की क्यों बिठाती हो मुझे .

रमा- अभी तक तो नहीं .

मैं- और रुडा

रमा- रुडा ज्यादातर बाहर ही रहता है . उसमे पहले वाली बात नहीं रही . किसी ज़माने में उसका सिक्का चलता था पर अब उम्र भी तो हो गयी है .

मैं- और उसकी बेटी

रमा- वो बाहर पढ़ती थी बड़े शहर में पुरे पांच बरस बाद लौटी है . रुडा और उसकी कम ही बनती है .जब वो आती है तो रुडा घर नहीं रहता रुडा आये तो वो चली जाती है . इतने दिन बाद आई है तो कोई विशेष कारण ही होगा.

मैं- ब्याह नहीं किया रुडा ने उसका

रमा- सुना है की वो करना नहीं चाहती ब्याह.

“भैया ने भी पुरे पांच साल बाद मलिकपुर की धरती पर कदम रखा क्या सूरजभान की बहन ही वो वजह थी . वो भी पांच साल बाद लौटी है क्या अतीत में इनके बीच कुछ था ” मैंने खुद से ये सवाल किया. वापिस गाँव आने के बाद मैं कोचवान हरिया के घर गया .

“कैसी हो भाभी ” मैंने पूछा

भाभी- बस जी रहे है कुंवर

मैं- जीना तो है ही भाभी, अपने लिए न सही इन बच्चो के पालन के लिए हरिया की कमी तो जिन्दगी भर रहेगी उसकी जगह तो कोई भर नहीं सकता पर जीवन में आगे बढ़ना भी जरुरी है

भाभी- बात तो सही है पर मेरे लिए मुश्किल हो रहा है तीन बच्चो और बूढ़े सास-ससुर को संभालना , पहले बालको का बापू कमा कर लाता था तो घर चलता था .

मैं- तुम्हे किसी भी चीज से परेशां होने की जरुरत नहीं है भाभी . ये तो मेरी कमी हुई जो तुम्हारा ध्यान नहीं रख पाया . घर में ये हालात है और तुम एक बार भी मुझसे कह नहीं पाई. ये तो गलत है न भाभी,

भाभी- किस मुह से कहे कुंवर. हाथ फ़ैलाने के लिए भी कलेजा लगता है

मैं- ये कह कर तुमने मुझे बहुत छोटा कर दिया भाभी

मैंने जेब से पैसे निकाले और भाभी के हाथ में रख दिए.

भाभी- मैं कहाँ से चूका पाऊँगी

मैं- कोई जरूरत नहीं है भाभी और तुम्हे काम भी मिल जायेगा तुम हमारे खेतो पर काम करो . अपनी मेहनत से पैसा कमाओ .

भाभी ने मेरे आगे हाथ जोड़ दिए.

मैं- शर्मिंदा मत करो

वापसी में मैंने बनिए से कह दिया की हरिया कोचवान के घर छ महीने का राशन तुरंत पहुंचा दे. घर आकार मैंने खाना खाया और बिस्तर पकड़ लिया पर आँखों में दूर दूर तक नींद नहीं थी . कभी इधर करवट कभी उधर करवट दिल में बस एक ही सवाल था .

“क्या परेशानी है नींद नहीं आ रही जो ” चाची ने कहा

मैं- चाची क्या भैया किसी लड़की से प्रेम करते थे . ................

 
#68



मैं- क्या भैया किसी लड़की से प्रेम करते थे .

चाची- जहाँ तक मैं अभिमानु को जानती हूँ नहीं , छोटी उम्र से ही वो व्यापार संभाल रहा है. उसे किताबो का शौक रहा है . सबसे आदर से बोलना सबका ख्याल रखना परिवार को हमेशा से पहली प्राथमिकता रखना बस यही जिन्दगी है उसकी.

मैं- जहाँ तक मुझे याद है मैंने भैया को कभी पढ़ते नहीं देखा

चाची- तूने उसे देखा ही कहाँ है

बात तो सही थी चाची की मोजुदा हालातो को देखतेहुए मैं समझ सकता था इस बात की गहराई को .

मैं- कितनी बार भैया के कमरे में गया हूँ मैंने वहां भी किताबो का ढेर नहीं देखा.

चाची- क्योंकि तू उस अभिमानु को जानता है जिसे तू आज देखता है . मैं उस अभिमानु की बात कर रही हूँ जिसे मैंने कल देखा था .

मैं- उसी अभिमानु को जानना चाहता हूँ मैं

चाची- उसने किसी से प्यार किया होगा ये मैं नहीं जानती पर अब इन बातो का कोई मतलब नहीं है कबीर, हमेशा ये याद रखना अब उसकी ग्रहस्थी ही उसका सबकुछ हो. मैं जानती हूँ आजकल तू किसी खुराफात में है पर इतना याद रहे तेरी वजह से किसी का घर न उजड़े.

मैं- और जो तेरा घर उजड़ा पड़ा है उसका क्या . चाचा के बिना तू कैसे जी रही है कोई नहीं समझता सिवाय तेरे खुद के. आदमी मर जाये तो औरत समझ जाती है , जीवन से समझौता कर लेती है पर चाचा ऐसे गया की लौटा नहीं . आज तक तू नहीं जानती वो कहाँ है जिन्दा है भी या नहीं . तेरी गृहस्थी का क्या . इसका कोई जवाब क्यों नहीं मिलता.

चाची ने एक गहरी साँस ली और बोली- तू समझता है न मेरा दुःख तो तू ले आ उसकी कोई खबर . राय साहब और अभिमानु ने दिन रात एक कर दिया था तेरे चाचा की तलाश में पर किस्मत में लिखे को नहीं टाल पाए. मेरे नसीब में जुदाई लिखी है तो ये ही सही .

मैं- कोरी बाते है ये .राय साहब की मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिल सकता इस इलाके में और पिछले कुछ सालो से उनका भाई गायब है . क्या तुझे कभी हैरानी नहीं हुई इस बात की. मान ले कोई दुश्मन ने कुछ उल्टा-सीधा कर दिया चाचा के साथ तो भी क्या मेरे बाप को मालूम नहीं हुआ होगा. सोच कर देख, लाली और उसके प्रेमी को तलाशने में कितना ही वक्त लगा था फिर चाचा को क्यों नहीं तलाश कर पाया वो इन्सान.

चाची- तू मुझे जेठ जी के खिलाफ भड़का रहा है

मैं- मैं तुझे आइना दिखा रहा हूँ. इस घर की खामोश दीवारे चीखना चाहती है तू मेरी मदद कर जरा

चाची-रसोई की बगल में जो पेंटिंग लगी है उसके पीछे दरवाजा है . उस कमरे में देख ले तुझे कुछ मिले तो .

मैं- इस घर में ऐसा भी कोई कमरा है मुझे आज तक नहीं पता .

चाची- अभिमानु का कमरा था वो किसी ज़माने में .

मैंने चाची के होंठो को चूम लिया और लालटेन लेकर उस तरफ चल दिया. हमेशा की तरह दरवाजा खुला पड़ा था . सारा घर सन्नाटे में डूबा था . मैंने उस बड़ी सी पेंटिंग को हटाया . दरवाजा मेरे सामने था . कोई ताला नहीं लगा था सिवाय एक कुण्डी के जो जंग खाई थी . देखने से ही मालूम होता था की बरसों से इसे छुआ नहीं गया. चुर्र्रर्र्र की आवाज करते हुए दरवाजा खुला और मैं अन्दर गया. कमरे की हालत ठीक नहीं थी . चारो तरफ जाले लगे थे . सीलन थी मैंने मुह पर कपडा बाँधा और थोड़े जाले हटाये. सामने एक बड़ी सी मेज थी . कुछ कुर्सिया थी .

लालटेन की लौ थोड़ी और ऊंची की . कमरे में शेल्फ ही शेल्फ थी जिनमे किताबे सलीके से लगाई गयी थी. मैंने धुल साफ़ की . तरह तरह की किताबे थी.टेबल पर कोरे कागज पड़े थे.

“अभिमानु ठाकुर , क्या छिपाया है तुमने अपने अतीत में ” मैंने कहा .

कोने में एक अलमारी थी मैंने उसे खोला , जिसमे कुछ कागज रखे थे. मैंने उन्हें देखा , वो कागज नहीं थे वो खत थे.

“हो सकता है के बहार आये पर सरसों पीली न हो .

हो सकता है की बारिश आये पर धरती गीली न हो

पर ये नहीं हो सकता मेरी जान की तेरी याद आये और ये आँखे गीली न हो ” मन ही मन मैंने शायरी की दाद दी.

कागज पर धुल थी वक्त की मार ने उसे पुराना कर दिया था पर उस पर लिखे शब्द आज भी उतने ही कारगर थे जितना किसी ज़माने में रहे होंगे. कुछ और पन्ने थे जिन पर बस शायरिया ही लिखी थी . किस तरह के खत थे ये जिनमे केवल शायरियो के माध्यम से ही बाते हो रही थी. मेरा भाई गजब था ये मैंने उस रात जाना था.

तमाम बाते ये तो पुख्ता कर रही थी की भैया की जिदंगी में कोई लड़की थी , पर क्या वो रुडा की बेटी थी अब ये मालूम करने की बात थी. लड़की थी तो कोई तस्वीर भी रही होगी उसकी जरुर. मैंने सब कुछ देख मारा हर एक किताब का पन्ना पलटा की कही उनमे तो कुछ नहीं छिपाया गया. पर हाथ कुछ नहीं लगा. सुबह होने में थोड़ी ही देर थी और भाभी जल्दी जाग जाती थी मैंने कमरे से निकलने का सोचा दरवाजे के पास पहुंचा ही था की जालो में कैद मुझे कुछ दिखा इस हिस्से पर . मैंने कपडे से उसे साफ़ किया देखा की ये एक तस्वीर थी . ....

खेतो पर पहुंचा तो पाया की हरिया कोचवान की बीवी सरला पहले ही वहां आ चुकी थी . मैंने मंगू से कहा की अब से ये हमारे साथ ही काम करेगी उसे काम समझा दे और हर शाम उसे बिना किसी देरी के मजदूरी का भुगतान करे. कुवे की मुंडेर पर बैठे बैठे मैं बस उस तस्वीर के बारे में ही सोचता रहा . आखिर क्या खास बात थी उस तस्वीर में जो उसे दिवार पर जगह दी गयी थी .

चूँकि आज घर से खाना आया नहीं तो मैंने मंगू को घर भेज दिया खाना लाने के लिए और सरला को अपने पास बुलाया .

मैं- भाभी , मैं तुमसे दो चार बात पूछ सकता हूँ क्या

सरला- जी कुंवर जी

मैं- तुम गाँव में सबको जानती होगी

उसने हाँ में सर हिलाया

मैं- क्या तुम किसी रमा को जानती हो जो कुछ साल पहले अपने गाँव में रहती थी .

सरला- जानती हूँ

मैं- वो गाँव क्यों छोड़ गयी

सरला- उसके पति की मौत हो गयी थी .कोई सहारा नहीं था एक दिन मालूम हुआ की वो गाँव छोड़ गयी.

मैं- खेती करके वो अपना पेट पाल सकती थी फिर ऐसा क्या हुआ जो उसे गाँव छोड़ना पड़ा.

सरला- मैं नहीं जानती कुवर.

मैं- क्या मैं तुम पर पूर्ण विश्वास कर सकता हूँ

सरला- तुमने ऐसे समय पर मुझे और मेरे परिवार को थामा है जब हम टूट चुके थे. तुम्हारा अहसान है मुझ पर मैं हमेशा वैसा ही करुँगी जो तुम कहोगे.

मैं- बढ़िया .

हम बात कर ही रहे थे की तभी मैंने मंगू और भाभी को आते देखा . मंगू के जल्दी आने का मतलब ये ही था की भाभी उसे रस्ते में मिल गए. भाभी ने एक नजर सरला पर डाली और बोली- ये यहाँ क्या कर रही है

मैंने भाभी को बताया की इसे काम पर रखा है .

भाभी ने हम सबको खाना परोसा . खाने के बाद मैंने भाभी से साथ आने को कहा और हम टहलने चल दिए.

भाभी- क्या बात है

मैं- क्या आपके और भैया के बीच सब ठीक चल रहा है

भाभी चलते चलते रुक गयी और बोली- तुम्हे क्या लगता है

मैं- आप बताओ न

भाभी- सब ठीक है

मैं- क्या वो आपसे प्रेम करते है

भाभी- बेशुमार मोहब्बत , इतनी की कोई सोच न सके.

मैं- क्या आप जानती है की भैया ब्याह से पहले किसी लड़की के प्यार करते थे .

भाभी- जानती हूँ . बिलकुल जानती हूँ

मैं- ये जानते हुए भी आपको कोई शिकायत नहीं

भाभी- मुझे भला क्यों शिकायत होगी. अभिमानु जैसे पति किस्मत वाली को ही मिलते है .

मैं- हो सकता है की वो आज भी उसी को चाहते हो .

भाभी- वो आज भी उसी को चाहते है देवर जी.

भाभी की आंखो की चमक ने मेरे विश्वास को कमजोर कर दिया. क्या औरत है ये अपने पति की बुराई को भी हंस कर स्वीकार कर रही है .



मैं- फिर भी तुम उनके साथ हो क्यों...............
 
#



भाभी- मैं अभिमानु के साथ नहीं रहूंगी तो फिर कौन रहेगा भला

मैं- कुछ समझा नहीं मैं

भाभी- क्योंकि मैं ही थी वो लड़की जिससे अभिमानु ने प्यार किया है .

भाभी की बात सुन कर मेरा मुह खुला का खुला ही रह गया. खेतो की पगडण्डी पर बैठ गयी भाभी और मुझे भी अपने साथ बिठा लिया .

भाभी- इस जंगल में तुम अकेले नहीं हो जो प्रेम कर रहे है तुमसे पहले भी कोई और है जो यहाँ प्यार कर चुके है . ये हवाए ये फिजाये ये घटाए . ये सर्द मौसम, वो गर्मियों की लू, वो बारिशो की रिमझिम हमने भी यही कहीं देखि थी प्यारे.

मैं- मैं नहीं मानता ये कैसे मुमकिन है .

भाभी- अच्छा जी. मुमकिन तो एक डाकन का दामन थामना भी नहीं है पर फिर भी तुम्हे उसकी लगन लगी है न.

मैं- कैसे. मेरा मतलब आप और भैया कैसे मिले .

भाभी- कहने को तो लम्बी कहानी है .

मैं- फिर भी मैं सुनना चाहता हूँ

एक पल को भाभी अतीत में खो सी गयी और अतीत यक़ीनन गजब रहा होगा क्योंकि भाभी के गाल थोड़े और गुलाबी हो गए थे.

भाभी- मुझे लगा था की तुम्हे मालूम हो जायेगा. खैर, ये उन दिनों की बात है जब हमारे दिल धडकने को बेताब थे और आशिकी के लिए आसमान था . तुम जानना चाहते हो न की वो क्या कारण था जिसके लिए मलिकपुर बार बार जाते थे अभिमानु, कुवर , वो कारण मैं थी . अभिमानु कभी नहीं चाहते की उनका अतीत कुरेदा जाये पर तुम्हारी रगों में भी वो ही जोश दौड़ रहा है .

मैं- आपका क्या रिश्ता है मलिकपुर से .

भाभी- चौधरी रुडा मेरा फूफा है .

मैंने अपना माथा पीट लिया . दिल किया की सर को दे मारू किसी दिवार पर .

मैं- मैं कैसे नहीं जानता इस बात को

भाभी- आ रही हूँ मुद्दे पर . तो कहानी शुरू होती है मलिकपुर के सरकारी स्कूल से. मैं अपनी बुआ के घर पर रहकर पढ़ती थी . अभिमानु भी पढने के लिए मलिकपुर आते थे .कभी बाजार में तो कभी रहो में हमारी मुलाकाते होने लगी. चढ़ती जवानी और जज्बातों का दौर था वो . न जाने किस घडी हम एक दुसरे को दिल बैठे. दिल मिले तो मुलाकातों के सिलसिले शुरू हुए. इसी जंगल में हम मिलने लगे. कभी मुलाकाते होती कभी खत लिखते.

पर इश्क ऐसा मर्ज था जो छुपाने से छुप नहीं पाता. फूफा और राय साहब में न जाने कब से बैर चला आ रहा था. अभिमानु समझते थे इस बात को हम घंटो सपने संजोते अपने सुनहरे भविष्य के . चर्चे होने लगे थे हमारे प्यार के और होते क्यों नहीं हम महक रहे थे प्यार हद से ज्यादा परवान चढ़ चूका था . अभिमानु मुझे मांजी से मिलवाना चाहते थे पर उनका ये अरमान दिल में ही रह गया. अचानक से हुए ह्रदयघात से मांजी चल बसी. अभिमानु टूट ही तो गए थे. घंटो वो बैठे रहते मेरे काँधे पर सर रख कर पर कहते कुछ नहीं.

मैं बस तड़प कर रह जाती थी .दूसरी तरफ फूफा को मालूम हो गया था तो मेरे लिए अलग ही मुसीबत शुरू हो गयी. ठाकुरों की लडकियों को आजादी नहीं होती दहलीज पार करने की और मैं तो आसमान में उड़ रही थी . बुआ बहुत नाराज थी वो भरोसे पर लायी थी मुझे जो मैंने तोड़ दिया था . पर इस से पहले की बात बिगडती , राय साहब मेरे घर पहुँच गए रिश्ता लेकर. कौन भला राय साहब का रिश्तेदार नहीं बनना चाहेगा मेरे पिता ने एक मिनट भी नहीं लगाई हाँ कहने में . जब फूफा को ये बात मालूम हुई तो उन्होंने मेरे माँ-बापू से रिश्ता तोड़ लिया .इस तरह मैं अभिमानु की दुल्हन बन कर इस घर में आ गयी .

मैं- जो औरत खुद के प्रेम के लिए दुनिया से लड़ गयी वो मेरी मोहब्बत का समर्थन नहीं कर रही अजीब है न

भाभी- तुम इस दुनिया में किसी भी लड़की पर हाथ रखो मैं उसे दुल्हन बना कर ले आउंगी . पर जिस आग से तुम खेल रहे हो उसमे तुम्हे झुलसना नहीं जलना है .

मैं- इश्क किया है कोई चोरी नहीं की. और फिर तुम्हारी ही परवरिश हूँ मैं . जब तुमने अपने इश्क को पा लिया तो सोचो मैं किस हद से गुजर जाऊंगा.

भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- ये ही तो नहीं चाहती मैं. वो कभी नहीं हो पायेगी तुम्हारी. डाकन और तुम्हारा कोई मेल नहीं कबीर. हो सकता है की किसी घडी में तुम करीब आ गए. पर शायद वो भी जानती होगी की एक दिवार है तुम्हारे बीच जो हमेशा रहेगी.

मैं- मुझे बस उसकी हाँ का इंतज़ार है भाभी. जिस दिन वो कहेगी की वो मोहब्बत करती है मुझसे मैं ब्याह लाऊंगा उसे.

भाभी कुछ नहीं बोली उसने बस मेरे सर पर हाथ रख कर सहलाया और बोली- देर हो गयी चलना चाहिए अब.

मेरे मन में अजब उथल-पुथल मचा दी भाभी ने, जो औरत अपने प्यार के लिए ज़माने के आगे खड़ी हो गयी वो मेरी मोहब्बत को समझ नहीं पा रही थी ये बात गले से नहीं उतर रही थी. आज भाभी ने जो बताया उस से ये भी साबित होता था की मेरा बाप अपनी औलाद के लिए कुछ भी कर सकता था . जब उसे मालूम हुआ तो उसने बिना देर किये भैया के लिए भाभी का हाथ मांग लिया था.

तो अब ऐसा क्या हुआ था की वो चंपा को ही चोदने लगा था . बाप का चरित्र समझ नहीं आ रहा था और उलझ गए थे ख्यालात मेरे.

सबके जाने के बाद मैंने चारपाई बाहर बिछाई और लेट गया. ठण्ड बढ़ने लगी थी पर मैं अपने ख्यालो में खोया था .रमा के अनुसार भैया ने अचानक ही मलिकपुर जाना छोड़ दिया था उसका कारण यही रहा होगा की जिसके लिए जाते थे वो अब उनके पास थी .पर सूरजभान का सिस्टम समझ से बाहर था . हो सकता था की सूरजभान भाभी और भैया को मिलने में मदद करता हो जिसके लिए भैया उसे मानते थे. अब इसी सवाल की तलाश थी मुझे.

 
#70



रात को मेरी आँख खुली तो देखा की निशा का सियार मुझसे लिपटा हुआ था

“तू कब आया ” मैंने उसे थपथपाते हुए कहा . उसने अपने पंजे मेरे सीने पर रखे और मेरी गर्दन चाटने लगा.

मैं- निशा है क्या वहां

उसने फिर से अपनी जीभ से गर्दन को चाटा.

मैं- चले क्या फिर.

वो चारपाई से कूदा और आगे चलने लगा.

मैं- दो मिनट रुक . मैं कमरे में गया और कम्बल ओढ़ लिया कमरा बंद करने के बाद मैं उसके साथ साथ खंडहर की तरफ चल पड़ा. ठिठोली करते हुए हम खंडहर पर पहुँच गए. मैंने देखा सब कुछ अँधेरे में डूबा हुआ था .

“बड़ी देर की सरकार आने में ” ये निशा की आवाज थी .

मैं- कहाँ है तू जाना

निशा- तेरे पास ही तो हूँ

अचानक से वो मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी.

मैं- इतना अँधेरा क्यों आज

निशा- अँधेरा ही भाग है मेरा .

उसने मेरा हाथ पकड़ा और हम अन्दर एक दिवार के पास जाकर बैठ गए.

निशा- बड़ी याद आ रही थी तेरी.

मैं- तो आ जाती

निशा- तुझे बुला तो लिया

मैं- अगर तू कहे तो मैं यही रह जाऊ तेरे पास मेरी जान. मैं एक बार फिर कहता हूँ इस ठिकाने को हम अपना छोटा सा आशियाना बना लेंगे.

निशा-मुमकिन होता तेरा होना तो फिर ये खंडहर ही क्या मैं तेरे घर न रह जाती.

मैं- तू जहाँ है वो ही मेरा घर है. वैसे मेरी छोटी सी इच्छा है कभी किसी रात तेरे हाथ की रोटी खानी है .

निशा- माँगा भी तो क्या माँगा रे सनम तूने

मैं- रहने दे तू, इतना ही देने वाली है तो फिर अपना दिल क्यों नहीं दे देती मुझे.

निशा ने मेरा हाथ अपने सीने पर रखा और बोली- पूछ इन धडकनों से ये देंगी जवाब तुझे.

मैं- फिर तेरे होंठो क्यों लरजते है ये कबूल करने में

निशा- क्योंकि मैं तेरी नहीं हो सकती

मैं- झूठी है तू , तू भी जानती है तू मेरी हो चुकी. बस चंपा का ब्याह हो जाये फिर तेरी एक नहीं सुनने वाला. जब तक भी रहे ये डाकन मेरी ही रहेगी.

निशा- क्या बताया चंपा ने तुझे

मैं- बोली उसकी मर्जी आयेगी वो करेगी

निशा- सही तो कहती है वो. तू ध्यान मत दे उसपे

मैं- भाभी ने बताया की उसका और भैया का प्यार भी इसी जंगल में जवान हुआ था .

निशा- कितनी ही कहानिया छिपी है यहाँ

मैं- पर भाभी कहती है की तुझसे ब्याह नहीं होने देगी मेरा

निशा- सही तो कहती है वो.

मैं- क्या सही कहती है

निशा- वो जानती है उस हद को जो तेरे मेरे बिच की दिवार है

मैं- ऐसी कोई दिवार नहीं जिस को मोहब्बत तोड़ न सके.

निशा- छोड़ इन बातो को . तुझे कुछ ऐसा दिखाती हूँ जो अनोखा है

मैं-इस अँधेरी रात में तुझसे अनोखा भला क्या है

निशा- आ तो सही .

निशा के पीछे पीछे मैं पानी के तालाब तक आ गया .

निशा- झेल लेगा न बर्फीले पानी की ठण्ड को

मैं- तू साथ है तो झेल ही लेंगे.

निशा- आजा फिर.

आहिस्ता से निशा पानी में उतर गयी और तालाब के बीचो बीच पहुँच गयी . मैंने पानी में पैर डाला और अन्दर तक जम गया मैं .

निशा- खुद को इसके हवाले कर दे बस

मैंने निशा का कहा माना पर दिसम्बर की ठिठुरती रात में जमे हुए पानी में जाना कोई ज्यादा बढ़िया हरकत नहीं थी . पर मुझे विश्वास था उस पर. निशा ने गोता लगाया निचे की तरफ मैंने उसका अनुसरण किया. जैसे जैसे निचे जाते गए मेरे फेफड़ो पर दबाव बढ़ता गया . धड़कने जमने लगी . और जब लगा की अब बस की बात नहीं रही , निशा ने मेरा हाथ थाम लिया और मुझे कुछ देखने को कहा. अँधेरी रात की गहराई में मैंने कुछ चमकता सा देखा और जब निशा मुझे उसके और पास ले गयी तो जैसे मेरा सब कुछ जम गया. इस तालाब की तलहटी में वो चीज पड़ी थी जिसका किसी को भी भान हो जाता तो गजब हो जाता.

तालाब की तलहटी में सोना पड़ा था . इतना सोना की कोई सोच भी नहीं सकता. निशा ने कुछ मेरे हाथ में थमा दिया और मुझे ऊपर खेंचने लगी. फेफड़ो को ताजा हवा मिली तो करार आया. बदन को ठण्ड का अहसास जैसे मर ही गया था तालाब के बीचो बीच मैं अपने हाथ में लिए उस ईंट को देख रहा था जो खालिस सोने की बनी थी . निशा तालाब की मुंडेर पर बैठ गयी मैं तैरते हुए उसके पास गया . बदन बुरी तरह से कांप रहा था समझ नहीं आया की वो ठण्ड से कांप रहा था या फिर सोने के ढेर की वजह से.

वापिस आते ही मैंने कम्बल ओढ़ लिया और बैठ गया.

निशा- मेरी तरफ से तोहफा है तेरे लिए.

मैने उसे अपने कम्बल में लिया और बोला- नियति ने तुझसे मिलवाया तुझे मेरी जिन्दगी में भेजा सबसे बड़ा तोहफा तू है मेरे लिए. तेरे बाद मुझे कोई चाह नहीं . मेरी आजमाइश मत कर मेरी जाना, मेरी आजमाइश उस दिन होगी जब तेरा हाथ थामुंगा तुझे दुल्हन बनाने के लिए. ये जो भी है उसे वहीँ रहने दे . मेरा कोई हक़ नहीं इस पर.

निशा- ये मैं दे रही हूँ तुझे

मैंने उसे अपने आगोश में लिया और उसके गालो को चूमते हुए बोला- कहा न तुझसे इस मोह की जरुरत नहीं मुझे

मैंने उसे अपनी बाँहों में जकड लिया और आँखे बंद कर ली.

निशा- डरती हूँ कहीं टूट कर बिखर न जाऊ मैं

मैं- तुझे थामने के लिए हु मैं

निशा- इसलिए तो बिखरना नहीं चाहती मैं

मैं- मेरा हक़ है तुझ पर

निशा- मानती हूँ

मैं- तू एक बार फिर भाभी से मिल ले . क्या पता वो समझ जाए

निशा- उसकी जरुरत नहीं कबीर. तेरी जिद अगर यूँ ही रही तो किसी दिन वो जरुर आएगी.

मैं- पर मेरे प्यार को क्यों नहीं समझती वो

निशा- समझती है इसलिए ही नहीं मानती वो .

ये भीगी हुई रात हमारे जलते जज्बातों की गवाह थी रात के तीसरे पहर में उसे वहीँ छोड़ कर मैं वापिस कुवे पर आ गया . सुबह आँख खुली तो दिन चढ़ आया था सबसे पहले मेरी नजर सरला पर पड़ी जो खेतो पर थी .

मैं- मंगू नहीं आया क्या भाभी

सरला- अभिमानु जी के साथ कहीं गया है वो .

मैं- भैया आये थे क्या यहाँ

सरला- जी

मैं- मुझे क्यों नहीं जगाया

सरला- उन्होंने कहा की सोने दो कुवर को .

मैं- भाभी, थोड़ी चाय बना दो जरा

मैं जंगल की तरफ चला गया . कुछ देर बाद आया तो चाय की महक से सब महक रहा था .

मैंने उसे भी पीने को कहा और उस से बाते शुरू की .

मैं- भाभी मुझे रमा के बारे में जानना है सब कुछ जानना है .

सरला- रमा शुरू से ही गाँव के बाहर की तरफ रहती थी कुंवर . उसका कम ही आना जाना था गाँव में . काम भी होता तो बस बनिए की दूकान तक पर उसकी एक सहेली थी जिसके साथ वो बहुत समय बिताती थी .

मैं- कौन भाभी

सरला - कविता .

कविता रमा की सहेली थी ये सुनते ही मेरा दिमाग घूम गया .

सरला- रोहताश और रमा का पति दोनों हम उम्र थे साथ ही खेती करते थे खूब आना जाना था दोनों का फिर एक रात अचानक से रमा का आदमी मर गया उसके बाद रोहताश का आना जाना कम हो गया . रमा कुछ महीनो बाद मलिकपुर में बस गयी. बस इतना ही जानती हूँ .

मैं- रमा का पुराना घर कहा है भाभी

सरला- जोहड़ के पीछे जो पेड़ है उनको पार करते ही जो बंजर पड़ी है न वो उसकी ही जमीन थी . वहीँ पर उसका घर था .

मैं- कुछ तो जरुर था वर्ना अपनी जमीन छोड़ कर कोई कैसे जायेगा दूसरी जगह .

सरला- मैं नहीं जानती .

मैं- जो भी बाते हमारे बीच हुई है भाभी, किसी को भी मालूम न हो .

सरला ने हाँ में सर हिलाया . वो चाय का कप उठाने को झुकी तो उसका आंचल सरक गया . मेरी नजर उसकी भारी छातियो पर पड़ी.

“ठाकुरों को विरासत में मिली है अयाशी ” एक बार फिर ये शब्द मेरे कानो में गूंजने लगे. मैंने रमा के पुराने घर जाने का सोचा.
 
अपडेट 70 मे एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात थी जिस पर किसी भी पाठक ने ध्यान नहीं दिया
 
#71



रमा पर शक करने का मेरे पास ठोस कारण था . कुछ ही मुलाकातों में मैंने उसे इतना तो समझा था की उसे पैसो को कोई भूख नहीं थी फिर वो मेरे नोटो की खातिर मेरी मदद क्यों कर रही थी . उसका सिर्फ ये कहना की वो सूरजभान का अंत चाहती थी एक हद तक ठीक थी पर जो सवाल मेरे मन में खटक रहा था वो ये था की उसे गाँव क्यों छोड़ना पड़ा.

सरला के अनुसार उसकी एकमात्र सहेली कविता थी .वो कविता जिसके अवैध सम्बन्ध राय साहब से थे. तो क्या रमा को भी राय साहब की वजह से ही गाँव छोड़ना पड़ा. इस ख्याल में दम था क्योंकि किसकी इतनी मजाल जो उनके आगे सर उठा सके. पर क्या रमा को भी चोदा था मेरे बाप ने .

सोचने को बहुत कुछ था पर साबित करने को कुछ नहीं था . मुझे वैध मिल गया तो मैं थोड़ी देर उसके पास रुक गया .

मैं- कैसे है आप

वैध- बस जी रहा हूँ कुवर.

मैं- कोई परेशानी हो तो मुझसे कह सकते है

वैध- नहीं कुवर , कोई परेशानी नहीं बस ये खाली घर काटने को दौड़ता है .

मैं- रोहताश को सुचना भिजवा दीजिये . और फिर ऐसी कमाई का क्या ही फायदा जिसके लिए अपनों से दूर रहना पड़े.

वैध- पहले तो वो यही खेती करता था बेटा . वो तो राय साहब का भला हो जिन्होंने उसे सहर में काम दिलवा कर उसकी जिन्दगी संवार दी.

तो रोहताश को शहर में नौकरी पिताजी की देंन थी . उसे गाँव से दूर शायद इसलिए ही भेजा गया हो ताकि पिताजी कविता के करीब रह सके.

मैं- आपको कोई भी जरुरत हो तो बेहिचक मुझसे कहना

उसके बाद मैं जोहड़ की तरफ चल दिया. पहले तो इस जोहड़ पर बहुत चहल पहल रहती थी . पशु क्या आदमी क्या सब यही पानी पीते. कपडे धोते पर जब से गाँव में नयी टंकी बनी थी इधर से मोह टूट गया था लोगो का. अब तो कोई सुध भी नहीं लेता था इसकी. जोहड़ किनारे की झाड़ियो को पार करते हुए मैं पेड़ो के पास से होते हुए उस तरफ चले जा रहा था जो सरला ने मुझे बताया था . कंटीली झाड़ियो से होते हुए मैं बंजर जमीन पर जा पहुंचा चलते चलते मैं थकने लगा था .

झुरमुट में काफी आगे जाने पर मुझे बेहद खस्ताहाल दीवारे दिखी. जगह जगह से चुना झड़ रहा था. दरवाजे के नाम पर लकड़ी झूल रही थी . दो कमरे थे . किसी दौर में किसी के अरमानो का घर रहा होगा ये पर आज वक्त से जूझ रहा था . अन्दर मिटटी का फर्श था . कड़ीयो की छत थी कुछ कडिया सील कर फूल गयी थी .सामान के नाम पर एक पलंग पड़ा था . आलो में बर्तन थे जो अब किसी काम के नहीं थे. दुसरे कमरे में भी एक चारपाई पड़ी थी धुल से सनी हुईउसके निचे एक संदूक पड़ा था जिस पर ताला था.

पत्थर का सिर्फ एक वार झेल पाया वो ताला मैंने संदूक खोली . कुछ कपडे थे . उनके निचे रंग बिरंगी कच्छी का ढेर . पर जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा हैरान किया वो थी वो किताबे जिन पर आदमी और औरतो की नंगी तस्वीरे थी. चुदाई की तस्वीरे . रमा के घर में ये होना मुझे बता रहा था की कविता की चुदाई वाली बात में रमा भी पूरी पूरी हिस्सेदार थी .

उस दिन सूरजभान और भैया भी मुझे जीप से इसी तरफ आते दिखे थे हो सकता है की रमा के इस खाली घर को वो चुदाई के लिए इस्तेमाल करते हो क्योंकि इस तरफ कोई आताजाता ही नहीं था. मेरे तर्क को सिर्फ एक चीज ख़ारिज कर रही थी वो थी कमरों में लगी बेशुमार धुल और जाले यदि कोई चुदाई के लिए आता होगा तो थोड़ी सफाई जरुर मिलती या फिर धुल में निशान पर ऐसा कुछ नहीं था .

कुछ सोच कर मैंने वो कच्छी और वो किताबे अपने पास ही रख ली. रात को एक बार फिर मैं उस तस्वीर को घूर रहा था. कहने को उस तस्वीर में कुछ नहीं था पर उस कमरे में सिर्फ उसका मोजूद होना ये बताने को काफी था की ये बहुत करीब रही होगी अभिमानु ठाकुर के दिल के.

वो चुदाई की तस्वीरों वाली किताबे इस गाँव में क्या आस पास भी किसी के पास नहीं हो सकती थी. क्योंकि ऐसी चीजे बड़े शहरो में ही मिल सकती थी

“तो क्या कविता के साथ साथ रमा को भी राय साहब चोदते थे ” मेरे मन में ये ख्याल इसलिए आया क्योंकि राय साब अक्सर शहर जाते थे . पर अगर रमा चुदती थी तो चुदती रहती राय साहब उसे कोई कमी तो रहने नहीं देते होंगे फिर गाँव क्यों छोड़ा उसने. कल सुबह मुझे दो लोगो से मिलना था एक तो रमा से और दूसरा रुडा की बेटी से.

सुबह कुछ समय खेतो पर बिताने के बाद मैं रमा के ठिकाने पर पहुँच गया .

“तुम इस वक्त ” उसने कहा

मैं-कुछ काम से आया था सोचा तुमसे मिलता चलू

रमा- सही वक्त पर आये हो मैं खाना खाने जा ही रही थी . तुम भी आ जाओ

खाना खाते हुए मेरी नजर उसके जिस्म पर थी इतनी अड़तीस चालीस की होने के बाद भी कटीली औरत थी रमा.

मैं- मुझे मालूम हुआ कविता तुम्हारी बहुत अच्छी दोस्त थी .

रमा- कोई न कोई किसी न किसी का दोस्त होता ही है .

मैं- रमा मैं सीधी बात करूँगा. मैं जानता हु की तुम मेरा साथ सिर्फ पैसो के लिए नहीं दे रही .

रमा- जब जानते हो तो क्यों पूछ रहे हो .

मैं- मैं वो वजह जानना चाहता हूँ जिसके कारण तुझे अपना घर छोड़ कर मलिकपुर में बसना पड़ा.

मैंने वो कच्छी और किताबे रमा के सामने रख दी. रमा ने अपनी थाली सरकाई और उठ कर खड़ी हो गयी.

मैं- मैं ये तो नहीं जानता की तेरे साथ क्या हुआ था पर तू मुझे बताएगी तो मैं तेरी मदद जरुर करूँगा.

रमा- तुम चले जाओ यहाँ से कुंवर और फिर कभी मत लौटना

मैं- तू क्या समझती है मैं मालूम नहीं कर लूँगा. क्योंकि तेरी कहानी से मेरी कहानी भी जुडी है कहीं न कही. माना की मंजिल दूर है पर मेरा साथ दे इस सफ़र को पार कर ही लेंगे हम

रमा- कुछ नहीं कर पाओगे तुम कुछ नहीं .

मैं- जब तक तू मुझे नहीं बताएगी मैं कैसे समझ पाउँगा इस सब को

रमा- ठीक है मेरा साथ देना है तो जाओ और अभिमानु ठाकुर से पूछो की क्यों रमा को बर्बाद होना पड़ा.

 
#72



मैं- उस से भी पूछूँगा पर अभी मैं तुमसे जानना चाहता हूँ. मैं कविता और तुम्हारे किस्से सुनना चाहता हूँ .और मेरा विश्वास कर , मैं तुझे जुबान देता हूँ ये ठाकुर कबीर का वादा है तुझसे . तेरे गुनेहगार को सजा जरुर मिलेगी.

रमा- जुबान की कीमत जानते हो न कुंवर

मैं- तू चाहे तो आजमा ले मुझे , मैं जानता हूँ की तेरा दिल कहीं न कहीं विश्वास करता है मुझ पर

रमा- मेरी बेटी की लाश ठाकुर अभिमानु लाया था .जिस्म नोच लिया गया था मेरी बेटी का . सब कुछ तार तार था. अभिमानु ने उसकी लाश रखी कुछ गद्दिया फेंक गया और हम रह गए रोते-बिलखते . बहुत मिन्नते की हमने पंचायत में गए पर किसी ने नहीं सुनी. कोई सुनता भी कैसे मेरी ठाकुर अभिमानु के सामने कौन जुबान खोलता अपनी.

मैं- राय साब भी तो थे. उन्होंने इन्साफ नहीं किया

रमा- वो बस इतना बोले जो हुआ उसे भूल जाओ और नयी शुरुआत करो जीवन की. थोड़े दिन पहले ही मेरा पति खेत में मरा हुआ पाया गया था . मैंने किस्मत का लिखा समझ पर समझौता कर लिया था पर अपने कलेजे के एक मात्र टुकड़े को ऐसे छीन लिया गया मैं तडप कर रह गयी . क्या करती मैं वहां पर , इसलिए यहाँ आकर बस गयी .

मैं- तू फिर कभी मिली भैया से

रमा-बहुत बार, पैर भी पकडे उस निर्दयी के जानना चाह की क्या किया था मेरी बेटी के साथ . क्यों किया पर वो पत्थर बना रहा .

मैं- ये तो थी तेरी वजह नफरत करने की . प्यार करने की और बता तुम दोनों भैया या फिर पिताजी किस से चुद रही थी .

मेरी बात सुन कर रमा के चेहरे पर अजीब सा भाव आया . उसने पानी के कुछ घूँट भरे और बोली- दोनों में से किसी से भी नहीं.

मेरा तो दिमाग ही घूम गया .

मैं- ऐसा कैसे हो सकता है . मेरे पास सबूत है की कविता पिताजी का बिस्तर गर्म कर रही थी . और फिर ये किताबे ये महंगे अंतर्वस्त्र उन दोनों में से कोई और नहीं लाया तो फिर कौन लाया.

रमा- कविता और मैं एक सी थी. जवानी और जोश से भरपूर . इस गाँव में हमारे जैसा हुस्न किसी का नहीं था . हमें भी मजा आता था जब लोग आहे भरते थे हमें देख कर. और यही मजे हम पर भारी पड़ गए. ऐसे ही एक दिन जोहड़ पर हमें नहाते हुए ठाकुर जरनैल ने देख लिया. ठाकुर सहाब के बारे में हमने बहुत सुना था की वो बहुत जोशीले मर्द है . गाँव की कोई ही औरत रही होगी जिसके साथ वो सोये नहीं होंगे. न जाने कैसा जादू था उनमे. हम भी उनकी तरफ खींचे चले गए. वो ख्याल भी बहुत रखते हमारा. धीरे धीरे जिस्म पिघलने लगे. हमें भी उनसे कोई शिकायत नहीं थी वो अगर हमसे कुछ लेते तो बहुत कुछ देते भी थे. वो तमाम सामान ठाकुर साहब ने ही लाकर दिया था.

चाचा जरनैल के बारे में ऐसा खुलासा सुन कर मुझे ज्यादा हैरत नहीं हुई . क्योंकि बीते दिनों से सबके बारे में कुछ न कुछ मालूम हो ही रहा था ये भी सही फिर.

रमा- फिर एक दिन राय साहब ने हमें पकड लिया रंगे हाथो चुदाई करते हुए. उन्होंने मुझसे तो कुछ नहीं कहा पर छोटे ठाकुर को बहुत मारा. मैं खड़ी खड़ी देखती रही . राय साहब को इतना गुस्से में पहले कभी नहीं देखा था . पर छोटे ठाकुर भी जिद्दी थे उन्होंने अपने भाई का कहना नहीं माना . कभी कभी तो वो पूरी पूरी रात मुझे चोदते. मेरे लिए भी मुश्किल होने लगी थी क्योंकि मेरा भी घर बार था. और ऐसी बाते छिपती भी नहीं . मेरा आदमी कहता नहीं था मुझसे पर उसकी नजरे जब मुझ को देखती तो मैं कटने लगी थी . एक दिन मैंने सब कुछ ख़त्म करने का सोचा. मैंने छोटे ठाकुर से कह दिया की अब ये बंद होना चाइये और उन्होंने भी मेरी बात मान ली.

सात-आठ महीने बीत गए. सब ठीक चल रहा था की एक दिन मेरा आदमी मर गया. जैसे तैसे खुद को संभाला था की फिर बेटी मर गयी. जिंदगी में कुछ नहीं बचा था .

मैं- जब तुम अकेली थी तो फिर चाचा ने दुबारा तुमसे नाता जोड़ने की कोशिश नहीं की.

रमा- नहीं

मैं- क्यों . लम्पट इन्सान तो ऐसे मौके ढूंढते है .

रमा-मेरे मलिकपुर आने के कुछ महीनो बाद ही छोटे ठाकुर गायब हो गए और फिर तबसे आजतक कोई खबर नहीं उनकी तुम जानते तो हो ही.

मैं- सूरजभान से तुम्हारी क्या दुश्मनी

रमा- मुझे लगता है की सूरजभान भी शामिल था मेरी बेटी के क़त्ल में .

मैं- अगर वो शामिल हुआ तो कसम है मुझे उसकी खाल नोच ली जाएगी और मैं भैया से भी सवाल करूँगा इस मामले में . कबीर किसी भी अन्याय को बर्दास्त नहीं करेगा. ये बता की रुडा की लड़की से मुलाकात कहाँ हो पायेगी.

रमा-कल उसका और रुडा का झगड़ा हुआ वो रात को ही शहर चली गयी.

मैं- रमा तुझ पर भरोसा किया है ये टूटना नहीं चाहिए .

उसने हाँ में सर हिलाया मैं वापिस मुड गया.

“आयाशी विरासत में मिली है खून में दौड़ती है ” रस्ते भर ये शब्द मेरे कानो में चुभते रहे.

भैया मुझे खेतो पर ही मिल गये.

मैं- भैया आपसे कुछ बात करनी है

भैया- हाँ छोटे

मैं- रमा को जानते है आप

भैया- जानता हूँ.

मैं- उसे गाँव छोड़ कर क्यों जाना पड़ा. हम उसे यही आसरा क्यों नहीं दे पाए. आप कहते है न की इस गाँव का प्रत्येक घर की जिम्मेदारी हमारी है तो फिर क्यों जाना पड़ा उसे.

भैया- उसका परिवार खत्म हो गया था . अवसाद में गाँव छोड़ गयी वो .

मैं-उसकी बेटी को किसने मारा.

भैया- मैं नहीं जानता

मैं- उसकी लाश आप लेकर आये थे .

भैया- लाया था पर कातिल को नहीं जानता मैं

मैं- ऐसा कैसे हो सकता है . किसका हाथ था उसके क़त्ल में मुझे बताना होगा भैया . क्या आपने मारा था उसकी बेटी को

भैया- जानता है न तू क्या बोल रहा है

मैं- तो फिर बताते क्यों नहीं मुझे .उसकी लाश आपके पास कैसे आई.

भैया - जैसे कविता की लाश तुझे मिली थी. तू ही लाया था न उसकी लाश को गाँव में . तो क्या तुझे भी कातिल मान लू. उसकी लाश जंगल में मिली थी मुझे. मिटटी समेटने को मैं ले आया. चाहता तो वहीँ छोड़ देता पर मेरा मन नहीं माना . कम से कम उसके शरीर का तो सम्मान कर सकता था न मैं.

मैं- रमा कहती है की आपने मारा उसकी बेटी को

भैया- उसके दिल को ऐसे तस्सली मिलती है तो मुझे ये आरोप मंजूर है छोटे.मैं तेरे मन की व्यथा समझता हूँ पर तू इतना जरुर समझना तेरा भाई ऐसा कुछ नहीं करेगा जिस से तुझे शर्मिंदा होना पड़े.

भैया ने मेरे सर पर हाथ फेरा और चले गये. एक बार फिर मैं अकेला रह गया.

 
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