इन्सेस्ट रिश्ता - Page 19 - SexBaba
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इन्सेस्ट रिश्ता

योर एनालिसिस है मेड में हैप्पी फॉर थे फर्स्ट टाइम.

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िफ़ थे अपडेट रिलेटेड तो थे कपल ऑफ़ थेइर लिकिंग वास् रीड विथ इंटरेस्ट ोथेरविसे स्किप्पड़, बूत no ओने अस्केद क़ुएस्तिओन्स अस यू अस्केद नाउ.

आईटी वास् सुर्प्रिसिंग फॉर में एंड वास् थिंकिंग तहत थे रीडर्स एक्सेप्ट ओने और तवो हद इतर इन्तेरेस्ट्स राथेर थान स्टोरी.

आईटी मेड में तो थिंक तहत थे स्टोरी शुड बे कट डाउन एंड स्टार्टेड राइटिंग इन थे फ़ास्ट मोड सो तहत आईटी कुड बे कंक्लूडेड.

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थैंक्स सो मच फॉर थे डिटेल्ड एनालिसिस एंड डीप इंटरेस्ट इन थे स्टोरी
 
आपका इस कहानी में एक साहित्यिक अंदाज़ में रूचि है मैं इस बात से वाकिफ हूँ और बहुत खुश भी हूँ.

आपकी साडी बातों का मैंने शायद जवाब दे दिया था लेकिन मुझे लगता है की आप शायद संतुष्ट नहीं हुए.

मैंने पहले भी कहा था फिर से कह रही हूँ की कोई भी समाधान या सोच या फैसला न तू सबसे अच्छा होता है, न hi ये होता है की सब उसको अनुमोदित करे या सराहें या उसका विरोध करें. हर एक व्यक्ति अपनी समझ से फैसला लेता है और वो उससे सबसे जयादा उचित लगता है.

रही बात परिवार की तू कोई जरुरी नहीं है की सब एक छत के नीचे रहकर एक दूसरे की इज़्ज़त करे और हर अच्छे बुरे फैसले की बात मने. ऐसे भी परिवार हैं जो कहने को तू िक्खत्ते हैं लेकिन अंदर hi अंदर सब मौका ढूंढने में लगे रहते हैं की कैसे दूसरे को नीचे दिखाएँ.

ऐसा हर परिवार में नहीं होता क्योँकि सबके समर्थ अलग अलग होते हैं.

आप से अनुरोध है की एक बार अपनी सोच को अलग रखकर सोचिये की संध्या ने जो फैसला लिया, अगर वो न लेती तू क्या यह परिवार बच पता.

मैंने आपको ये जवाब आपसे बहस करने के लिए नहीं दिया.

मैं आपकी साहित्यिक प्रतिभा का दिल से मान करते हुए ये बात कही है. इस कहानी को पढ़ने वालों में कुछ hi चुने हुए लोग हैं जो कहानी के मर्म को जानने के इच्छुक हैं जिनमे से आप एक हो.

आप को मेरी किसी भी बात का जरा सा भी बुरा लगा हो तू क्षमा चाहती हूँ.
 
डिअर फ्रेंड्स,

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थैंक्स
 
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रिक्वेस्ट यू तो जो थ्रू थे स्टोरी वन्स अगेन एंड यू वोउल्ड फंड अंसवेरस फॉर मोस्ट ऑफ़ थे क़ुएस्तिओन्स.

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अपडेट 94

संध्या जब बेहोश हुई तू उससे हॉस्पिटल पंहुचा दिया गया और वंहा वो होश में आने पर अपनी यादाशत खो चुकी थी लेकिन उसके साथ साथ वो प्रेग्नेंट भी हो चुकी थी. डॉक्टर्स को वो अपने बारे में कुछ नहीं बता प् रही थी. वो बच्चा जिससे उसने बचाया था उस बाजार के मालिक का बीटा था. वो और उसकी पत्नी अपने आप को संध्या के कर्ज़दार समझते थे जिसने उनके बच्चे को बचाया था. दोनों उसका पूरा इलाज़ करवा रहे थे और जब वो कुछ ठीक हो गयी तू उससे अपने घर ले आये और उसकी पूरी देखभाल करने लगे.

वक़्त बीतता रहा और संध्या ने एक खूबसूरत बच्चे को जनम दिया जो की एक लड़का था और संध्या ने अपने आप को उसकी परवरिश में व्यस्त कर लिया.

वो पति पत्नी (राजाराम और शोभा) संध्या का पूरा ख्याल रखते थे. जब संध्या हॉस्पिटल में पंहुच गयी थी तब उन्होंने उसके सामान को धर्मशाला से लेने गए तू उसका मालिक राजाराम का दोस्त था, इस वजह से सामान दे दिया लेकिन उस बैग में टाला लगा हुआ था. पति पत्नी काफी वक़्त तक इस दुविधा में थे की इस बैग को खोले या न खोले. उन्होंने सोचा की बैग में पता नहीं क्या हो, उन्होंने सोचा की जब ये ठीक हो जाएगी तब इससे खोलेंगे.

जब काफी वक़्त तक संध्या की यादाशत वापिस नहीं आयी तब डॉक्टर्स के कहने पर उस बैग को खोला गया तू उसमे संध्या के कपडे थे और एक बहुत पुराणी छोटी सी डायरी थी जिसमे एक पुराण फोटो भी था और उस डायरी में एक नंबर भी लिखा हुआ था. राजाराम ने उस नंबर पर फ़ोन किया तू उससे कोई जवाब नहीं मिला. वो लगातार कई दिन तक उस नंबर पर फ़ोन करता रहा लेकिन कोई जवाब नहीं. राजाराम थोड़ा सा चिंतित हो गया की या तू ये नंबर गलत है या वो व्यक्ति जवाब देना नहीं चाहता. दोनों पति पत्नी ने सोच लिया की अब इससे वो दोनों अपने पास रखेंगे और जिंदगी भर इस देवी को बहिन मानकर अपने घर में रखेंगे.

ऐसे hi एक दिन राजाराम, शोभा और संध्या बैठे हुए थे की एक अनजान नंबर से फ़ोन आया और वो पूछने लगा तू राजाराम ने कुछ कुछ जो उससे पता था बता दिया और उस व्यक्ति ने कहा की ठीक है जैसा आप कान्हे हम वैसा hi कर लेंगे और फिर फ़ोन बंद हो गया. इधर राजाराम और शोभा रात को उस फ़ोन के बारे में बात करते रहे और आगे क्या करना है उस बारे में विचार विमर्श करते रहे.

इनको यही विचार विमर्श करने देते हैं और हम चलते हैं उधर रुचिका और दिया के पास

रुचिका 'मैं कुछ भी नहीं भूली हूँ, क्या वो तुम्हारे पति नहीं हैं'

दिया 'मेरे मैंने या न मैंने से क्या होता है. ये उन पर निर्भर करता है की वो मुझे पत्नी मानते हैं या नहीं. जब तक वो मुझे पत्नी नहीं मानते, तब तक सिर्फ और सिर्फ तुम hi उनकी पत्नी हो'

रुचिका 'शायद तुम भूल गयी हो की गुरु जी ने क्या कहा था?'

दिया 'मैं कुछ नहीं भूली हूँ, मुझे अच्छी तरह से याद है. मई उस पूजा को कैसे भूल सकती हूँ क्योँकि उस पूजा की वजह से मेरी इनसे (सूरज जी) काफी लड़ाई हुई थी. लेकिन होनी को कौन ताल सकता है, इनका गुरूजी पर अंध विश्वास है और उन्होंने बता दिया था की अगर ये पूजा नहीं होगी तू सब कुछ ख़तम हो जायेगा, जो कुछ भी हमारे पास है सब तबाह जो जाएग और हम में से कोई भी जीवित नहीं बचेगा'

रुचिका 'मैं समझी नहीं'

दिया 'तुम्हे मैंने बताया था न की इन्हे, मुझे, दीपक जी और अवनि को किडनैप कर लिया गया था. उन लोगों ने हमें नग्न करके रखा था और हम दोनों को सूरज जी और दीपक जी के सामने नग्न रखा जिससे हमें बहुत शर्म आ रही थी, लेकिन क्या कर सकते थे. थे और अपनी नज़रे नीचे किये हुए थे. ये दोनों भी शर्म से गधे हुए थे और इन्होने भी अपनी नज़रों को झुका रखा था.

हम सब मन में सोच रहे थे की या तू हम बचेंगे नहीं और बच भी गए तू जिन्दा कैसे रहेंगे.

अभी हम ये सोच hi रहे थे की मोहन भाई साहब पता नहीं कान्हा से फरिश्ता बनकर आये और उन गुंडों को मार भगाया और हमें वंहा से छुड़ाया और हमें कपडे दिए और हम सब वापिस आ गए.

उस घटना से हम सब बहुत डरे हुए थे. हम सबने मोहन भाई साहब का एहसान भूल नहीं पा रहे थे. हमने इन्हे बहुत कुछ देना चाहा लेकिन ये बहुत hi स्वभिमाई व्यक्ति हैं और इन्होने कहा की हम दोनों इसकी बहने हैं और कहने लगे की बहिन से भी कोई कुछ लेता है. हमने भी इनको दिल से अपना बड़ा भाई मानकर इज़्ज़त दी और इतना hi नहीं इन्हे राखी भी बांधने लगी.

उस घटना के बाद पता नहीं क्या हुआ की हमारा बिज़नेस में नुक्सान होने लगा. छोटा मोटा नुक्सान तू चलता है लेकिन एक डैम से 10 करोड़ का घटा हो गया और दीपक जी को कोई 3 से 4 करोड़ का. हम पति पत्नी गुरूजी के पास गए और उन्होंने पहले तू हम दोनों को ये सलाह दी की अबसे कभी भी सूरज जी अकेले बिज़नेस नहीं करेंगे. अब से सूरज जी को दीपक जी के साथ बिज़नेस करने की सलाह दी उससे फायदा तू नहीं हुआ लेकिन नुक्सान भी नहीं हुआ.

हम फिर से गुरु जी के पास गए मैं और ये (सूरज जी). गुरु जी ने ध्यान लगाया और जो बात बताई उससे करने में मेरा बिलकुल दिल नहीं था. गुरु जी ने कहा की अगर वो उपपाये नहीं किया तू बिज़नेस hi नहीं बल्कि जिंदगी पर भी खतरा है. उन्होंने बताया की जिन लोगों ने हमें किडनैप किया था उन्होंने हमारी बलि की तयारी कर राखी थी.

हमें याद आया की जब हम नग्न थे तू वो गुंडे किसी महात्मा जैसे शक्श को लेकर आये थे जो हमारे ऊपर कुछ जल सा छिड़क कर मंतर पढ़ रहा था और पता नहीं वो लोग किस भाषा में बात कर रहे थे जो हमें समझ नहीं आ रहा था. हम तू दर से hi थार थार कांप रहे थे. मुझे गुरूजी की बातों पर विश्वास होने लगा लेकिन वो जो करने के लिए कह रहे थे बिलकुल मन गवाही नहीं दे रहा था.

मैं और ये (सूरज जी) घर वापिस आ गए और इनका गुरु जी पर अंध विश्वास था और इन्होने मुझे भी कहा की ये तू करना hi पड़ेगा. मैंने सख्ती के साथ कह दिया की मैं नहीं करुँगी क्योँकि मेरा मानना था की ये सब बेकार की बातें हैं और जो होना है वो होकर रहेगा. वक़्त बीतता रहा और हम दोनों के बीच एक दुरी आने लगी.

फिर एक दिन पता लगा की दीपक जी और अवनि का एक्सीडेंट हुआ है, लेकिन वो बच गए हैं. इधर सूरज जी को सीने में दर्द होने लगा तू इनको हॉस्पिटल में भर्ती करवा दिया गया और पता लगा की इनको हार्ट अटैक हुआ है जो की माइल्ड था. डॉक्टर्स ने कह दिया की इन्हे खुश रखे और कोई भी बुरी खबर न दे.

मैंने गुरूजी से पता किया तू उन्होंने कह दिया की 'पुत्री जो मैं देख रहा हूँ वो शायद तुम नहीं समझ पा रही हो. तुम्हे अगर अपने घर को बचाना है तू वो पूजा करनी hi पड़ेगी.'

मैंने गुरूजी से कहा 'आप एक बात बताइये की मैंने अग्नि को साक्षी मानकर inko(Pati) मन है और वचन दिया है. अब अगर मैं आपकी बात मानकर इस पूजा में शामिल होती हूँ तू मैं अपने वचन से हैट नहीं जाउंगी'

गुरूजी 'पुत्री तुमने सूरज को हर कष्ट में साथ निभाने का वचन भी दिया है. तुमने ये वचन भी दिया है की इनकी हर बात मानोगी. ये वचन भी दिया था की उनकी परछाई बनकर उनसे कभी अलग नहीं होगी. जब तुम इनकी बात नहीं मानोगी तू फिर ये वचन भी टूट जायेंगे'

दिया 'गुरूजी, मुझे एक शंका है की अगर मैं इस पूजा में बैठत्ती हूँ तब मुझे आपकी बात मैंने से उस शख्स से मेरा दूसरा रिश्ता है, वो भी तू ख़राब हो जायेगा'

तब उन्होंने कहा की 'पुत्री उस रिश्ते को तुमने खुद चुना है, जबकि ये जो मैं बता रहा हूँ, बहुत पहले लिखा जा चूका है और ये न तुम बदल सकती हो और न hi मैं. तुम चाहे कितना भी मन करो, जब ऊपर वाला चाहेगा, तुम इंकार नहीं कर पाओगी'

मैं भरी मन से वंहा से वापिस आ गयी और सूरज जी को पूजा के लिए हाँ कह दी'

रुचिका 'फिर क्या हुआ'

दिया 'फिर तू तुम्हे पता hi है, गुरूजी ने हमें बता दिया था की हम सब बहुत जल्दी मिलेंगे और हम सब मिले'

रुचिका 'ये हम सब हम सबकी पत्नियां है का क्या छाकर है'

दिया 'तुम्हे याद होगा जब हम गुरु जी के पास गए थे और तुम्हारी बीमारी का पूछने गए थे, तब उन्होंने कहा था न की जो पूजा हुई थी उसका मतलब यही था की हम तीनों हम इन् तीनों पुरुषों की पत्नियां हैं और हमें ये भी चेतावनी दी थी की कोई भी किसी के साथ जबरदस्ती नहीं करेगा. तुम तीनों असल में एक की पत्नी हो, लेकिन ऐसा वक़्त आ सकता है जब तुम्हे दूसरे पुरुष की पत्नी का धरम निभाना पद सकता है और मैं ये होते हुए देख रहा हूँ, लेकिन फिर से कह रहा हूँ की जबरदस्ती किसी की पत्नी नहीं बनना है. हाँ ये भी सच है की जरुरत पड़ने पर पीछे भी नहीं हटना है. तुम सब अब एक परिवार हो और सबने अलग होने की सोचना भी नहीं है नहीं तू मैं भी कुछ नहीं कर पाउँगा. ये भी बता दूँ की अगर तुम सब िक्खत्ते रहोगे तब कोई भी मुसीबत कितनी भी बड़ी हो वो उस पूजा के सुरक्षा चाकर की वजह से ताल जाएगी'

रुचिका 'मतलब की तुम अब इनकी पक्की वाली बीवी हो'

दिया 'गुरूजी के कहे अनुसार हूँ तू सही, लेकिन ये सिर्फ और सिर्फ तुम्हे hi अपनी पत्नी मानते हैं'

रुचिका 'ऐसा नहीं है क्योंकि गुरूजी ने इन्हे भी कहा था की 'तुम्हारी जिंदगी में और पत्नियां आएँगी' इन्हे पता है और ये सब जान चुके हैं की तुम इनको बीवी बन चुकी हो'

दिया 'लेकिन यह भी उतना hi सत्य है की इन्होने दुनिया के सामने भले hi मुझे बीवी कहा हो, लेकिन दिल से कभी भी मुझे बीवी नहीं बल्कि बहिन hi मन है'

रुचिका 'अच्छा यार एक बात बता की तुम्हारा मन है की तुम इन्हे बीवी वाला प्यार दो'

दिया 'शायद तुम भूल गयी हो की गुरूजी ने बड़े hi स्पष्ट शब्दों में कहा था की कोई किसी के साथ जबरदस्ती नहीं करेगा, तू मैं कैसे कर सकती हूँ'

रुचिका 'अब ये तू क्लियर हो गया न की तुम मन से चाहती ये तू हो'

दिया उसकी बात सुनकर सोच में पद गयी और वो अमेरिका में हुए उस वाकये को याद करने लगी की जब डांस के बाद वो सब खाना खाने जा रहे थे तब मोहनलाल ने दिया की कमर में हाथ डालकर अपने से चिपकते हुए डिनर लेने चल दिए.

उस वक़्त मोहनलाल की उँगलियों में दिया की नंगी कमर की छुआ और उँगलियों की पोरे उसके नंगे पेट को स्पर्श कर रहे थे. मोहनलाल की उँगलियों का आपने शरीर पर स्पर्श ने दिया की भावना को भड़का दिया और उसके मन में उठल पुथल मचने लगी. इतना hi नहीं मोहनलाल की बाजु से दिया के उन्मत्त उरोजों पर दबाव पद रहा था. जब साथ साथ चल रहे थे तू आगे पीछे होने से बाजु का दबाव उरोजों पर और उँगलियों का दबाव पेट पर कभी काम तू कभी जयादा हो रहा था. ऐसा लग रहा था की कोई उरोजों को दबा रहा हो जैसे की दबाये और छोड़ दे. ये महसूस करते hi दिया मदहोश होने लगी. जब वो डिनर टेबल पर पंहुचे तब तक दिया किसी और hi दुनिया में पंहुच चुकी थी और मोहनलाल के पुकारने पर भी उससे कोई होश न रहा तू मोहनलाल ने उसकी कमर में चुटकी काट ली तू वो होश में आयी.

अभी रुचिका उसके कंधे पर हाथ रखकर हिला रही थी की कान्हा खो गयी

दिया हड़बड़ाते हुए कहने लगी 'मैंने तू इन्हे बड़ा भाई मन है और आज भी मानती हूँ, लेकिन गुरूजी के अनुसार मेरा इनसे रिश्ता बहुत पहले hi लिखा जा चूका है. अगर ऐसा है तू मैं कौन होती हूँ उस फैसले को बदलने वाली. अगर नियति में लिखा है की मुझे उनकी बीवी का धरम निभाना है तू उनकी बीवी बनूँगी और पुरे तन मन से बनूँगी'

रुचिका 'वह क्या कहने, मैं तू वादा ले रही थी और मैडम जी तू पहले से hi तैयार बैठी हैं'

दिया 'चलो मान लिया की मैं तैयार हूँ लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आयी की बीवी कभी भी अपने पति को दूसरी औरत के साथ नहीं बांटती है और तुम मुझ से वादा लेना छह रही हो क्योँ?'

रुचिका उसकी बात सुनकर थोड़ा सा उदास हो गयी और उसकी आँखों में नमी आ गयी और वो कहने लगी 'मेरी जिंदगी का तू पता नहीं और मैं इन्हे कोई भी पत्नी का सुख नहीं दे पायी. ये इतने अच्छे है की मेरे से कभी शिकायत तू दूर कभी उफ़ भी नहीं किया, नहीं तू मर्द लोग ऐसी सिथिति में ऐसी पत्नी की पीठ पीछे पता नहीं क्या क्या करते हैं. कुछ तू ऐसी बीमार बीवी को छोड़ कर hi भाग जाते हैं. भगवन ने मेरी सहायता के लिए तुझे और अवनि को भेज दिया. अवनि का तू पता नहीं लेकिन तुम तू उनकी बीवी वाले रूप में रह चुकी हो और मेरी हालत को जानते हुए मैं चाहुगी की तुम इन्हे पत्नी का सुख दो, मुझे बुरा नहीं बल्कि अच्छा लगेगा' ये कह तू गयी लेकिन उसकी आँखों में आयी नमी साडी हकीकत बयां कर गयी

दिया 'मैं इसमें कुछ नहीं कर पाऊँगी क्योँकि इनको (मोहन जी) अपने निश्चय से नहीं डिगा सकते और वो कभी भी ये सब नहीं करेंगे'

रुचिका 'लेकिन यार एक बात बताओ की सूरज जी इस बात के लिए कभी राज़ी होंगे की तुम इन्हे पत्नी वाला सुख दो'

दिया हंसने लगी और कहने लगी 'वो रहते इस ज़माने में हैं और बात करते हैं पता नहीं किस युग की. उनका मन्ना है की अब मैं तीनों की पत्नी हूँ और मोहन जी सबसे बड़े हैं तू मुझपर सबसे पहला अधिकार मोहन जी का है'

रुचिका 'यार सच्ची में ऐसा बोलै'

दिया 'हाँ यार और उनकी बात सुनकर मुझे एक बार झटका भी लगा था और जब मैंने ये पूछा तब उन्होंने जो कहा मेरे पैरों टेल ज़मीन hi निकल गयी' और फिर वो रोने लगी.

रुचिका उससे चुप करने लगी लेकिन वो चुप होने का नाम hi नहीं ले रही थी और बस रोटी रोटी भावनाओं में बहकर इतना hi बोल कर चुप हो गयी 'मेरी जिंदगी पता नहीं मुझे कान्हा ले जा रही है. मेरे लिए तू एक तरफ कुंआ और दूसरी तरफ खाई है, समझ नहीं आ रहा की क्या करूँ'

अभी और कोई बात होती की मोहनलाल आये और बहुत hi घबराये हुए से लग रहे थे और बस इतना hi कहा की वो दो चार दिन के लिए कहीं बहार जा रहे हैं और दिया से रुचिका की देखभाल का वादा लेकर चले गए.
 
आपने बहुत सही समीक्षा और विश्लेषण किया है.

बात बिलकुल सच है की हर व्यक्ति को हर एक पातर पसंद आये मुमकिन नहीं है.

ये भी जरुरी नहीं है की एक hi पातर सबको पसंद आये.

हर एक व्यक्ति अपनी सोच के हिसाब से किसी पातर को अच्छा या बुरा कहता है. इसलिए इस विषय पर अनावश्यक बहस उचित नहीं है.

मैं यही बात पहले भी कह चुकी हूँ और इस बहस का अंत करने के लिए कहानी को निष्कर्ष की तरफ जल्दी से जल्दी ले जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

आपकी सलाह और सुझाव को पूरा सम्मान दिया जायेगा.

धन्यवाद्
 
आपका जवाब पड़खार आपने सिर्फ मेरे मन को hi ठेस नहीं पंहुचायी है बल्कि आपने अपने आप को सही और बाकि साड़ी दुनिया को गलत तेरा दिया है.

मैं यंहा पर यह कहानी किसी फायदे या किसी लाभ के लिए नहीं लिख रही थी बल्कि लोगों के मनोरंजन के लिए लिख रही थी.

मैंने आज तक कभी भूल से भी किसी का दिल नहीं दुखाया है.

आपकी बात ने आज मुझे सच में दुखी कर दिया है.

इतनी बेइज़्ज़ती का बाद मुझे अब इस फोरम पर रहने का कोई अधिकार नहीं है.

अब मैं इस फोरम पर नहीं आउंगी.

आपकी सोच आपको मुबारक.

धन्यवाद्
 
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