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अध्याय 11
कमरे में सुबह की पहली किरण जब पर्दा चीरकर अंदर आई, तो मैंने आँखें खोलीं। मैं सारी रात बेचैन होकर सोया था।
अम्मी मेरे बगल वाले बेड पर नहीं थीं। वह कमरे में आईने के सामने खड़ी थीं, उनकी पीठ मेरी तरफ थी। आईने में उनका चेहरा साफ़ दिख रहा था, और उनका पूरा ध्यान अपने होठों पर था। वह एक छोटे से ब्रश से अपने होठों पर चमकता हुआ लिप ग्लॉस लगा रही थीं। उन्होंने अपने होठों को थोड़ा सा 'O' शेप में बनाकर ग्लॉस लगाया और फिर उन्हें आपस में दबाकर फैलाया।
वह हल्दी के लिए तैयार थीं। उन्होंने एक खूबसूरत, बसंती पीले रंग का जॉर्जेट का सूट पहना हुआ था। कमीज़ हल्की थी, जिस पर सफेद चिकनकारी का काम था। कमीज़ उनकी कमर पर कसी हुई थी और नीचे उनके हिप्स के गिर्द एक नज़ाकत से फैल जाती थी।
उनके जॉर्जेट का दुपट्टा उनके कंधों पर लापरवाही से टिका हुआ था। उसकी ना तो कोई पिन लगी थी, ना ही कोई तह जमी हुई थी; बस वह उनके जिस्म की हरकत के साथ लहरा रहा था। दुपट्टे का एक छोर उनकी पीठ पर नीचे तक जा रहा था, और दूसरा उनके सीने के ऊपर से होता हुआ उनके हाथ तक। जब वह लिप ग्लॉस लगाने के लिए थोड़ा आगे झुकीं, तो दुपट्टा कंधे से हल्का सा सरका, उनकी गोरी, मुलायम कॉलरबोन और कंधे की गोलाई को बे-पर्दा कर गया।
उनका दुपट्टा उनके सीने पर ऐसे इकट्ठा था कि उनकी दोनों छातियाँ उस कपड़े के नीचे से और भी भरी हुई और गोल लग रही थीं। जॉर्जेट की कमीज़ उनकी ब्रा की कप-लाइन को हल्के से हाईलाइट कर रही थी।
उन्होंने अपने गीले बालों का जूड़ा बनाया हुआ था, जिससे पानी की कुछ बूंदें उनकी गर्दन पर फिसल रही थीं। जूड़े में लगा ताज़ा मोगरे का गजरा, उनके बदन से आ रही साबुन और इत्र की महक में मिलकर एक नशीली खुशबू बना रहा था। कानों में सोने की झुमके, गले में एक पतली सी चेन और हाथों में काँच की पीली-हरी चूड़ियाँ। वह बेहद ताज़ा, भीगी हुई और कातिल लग रही थीं।
उन्हें इस तरह देखकर, कल रात का सारा शक धुआँ बनकर उड़ गया। यह मेरी अम्मी नहीं थीं; यह एक औरत थी, पूरी की पूरी, जिसे मैं आज पहली बार देख रहा था। विशाल क्या, कोई भी उन्हें देखता तो दीवाना हो जाता। यह सोच मेरे सीने से बोझ बनकर नहीं, बल्कि एक अजीब सी गर्माहट बनकर उठी, जो मेरे पूरे बदन में फैल गयी।
वह आईने में मेरा अक्स देखकर पलटीं।, उनके होंठों पर एक गहरी मुस्कान थी। "उठ गया, साहिल? ऐसे क्या घूर रहा है?"
मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। "सॉरी, अम्मी… वह… आप..." अल्फ़ाज़ मेरे गले में ही फंस गए।
"मैं क्या?" उन्होंने अपनी एक आइब्रो उठाते हुए पूछा। उनकी आवाज़ में वही रोज़ की ममता थी, लेकिन आज उसमें एक अलग सी खनक थी, एक शरारत। "बहुत अच्छी लग रही हूँ?"
"आप… कयामत लग रही हैं," लफ़्ज़ मेरे मुँह से फिसल गए।
यह सुनकर उनके गाल लाल हो गए। वह सच में शर्मा गई। "बदमाश। चल, मस्का मत लगा। सब मेहमान नीचे इंतज़ार कर रहे हैं। जल्दी से नहा ले।"
मैं बस हाँ में सिर हिला सका।
"और सुन," वह मेरे बेड के पास आकर, थोड़ा झुकीं। उनके गजरे और उनके जिस्म की महक ने मुझे घेर लिया। अचानक मेरी नज़र सामने की तरफ गई, तो मेरा गला ही सूख गया। मेरी आँखों के सामने अम्मी के दोनों मम्मे 75% से ज़्यादा दिख रहे थे। उनके बीच की घाटी, उनकी सुडौलता... फिर मैंने जबरदस्ती अपनी आँखें फेर लीं, क्योंकि मुझे नीचे कुछ तनाव बढ़ता हुआ महसूस हुआ।
"तू भी वह पीले रंग का कुर्ता पहन लेना।"
सुबह की उस खामोशी में फोन की बीप किसी धमाके जैसी लगी। अम्मी का ध्यान उस तरफ हुआ। मेरी निगाह वापस से अम्मी की तरफ मुड़ी ताकि मैं उन्हें फिर से देख सकूँ, लेकिन अम्मी अब नाइटस्टैंड पर रखे फोन की तरफ बढ़ीं। और जब उन्होंने कॉल करने वाले का नाम देखा, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। थोड़े से संकोच के साथ उन्होंने अपना फोन उठाया।
अम्मी कुछ टाइप करने लगीं, उन मैसेजेस का जवाब दे रही थीं।
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विशाल: गुड मॉर्निंग आयशा जी।
आयशा : गुड मॉर्निंग।
विशाल: सारी रात आपकी याद आती रही, सो ही नहीं पाया।
आयशा (डरते हुए): क्यों?
विशाल: बस अपने हाथों में वह नरमी महसूस कर रहा था।
आयशा : मैं समझी नहीं।
विशाल: आपके मम्मों की...
आयशा (शर्माते हुए): विशाल जी, ऐसी बातें मत कीजिए।
विशाल: आप तो मेरी गर्लफ्रेंड हैं, भूल गईं? हमारा करार हुआ था, याद है?
आयशा (डरते हुए): याद है।
विशाल: तो मेरी गर्लफ्रेंड से एक गुज़ारिश है—आज मैं हल्दी के फंक्शन में आ रहा हूँ। मैं आपके मम्मों की खूबसूरती को देखना चाहता हूँ। मुझे वे दोनों पूरी तरह नज़र आने चाहिए, अपनी गुलाबी नप्पल्स के साथ।
आयशा के ज़हन में जैसे एक ज़लज़ला आ गया था। विशाल की उस बेबाक और गंदी मांग ने उनकी रूह को अंदर तक कंपा दिया था। उन्होंने फोन को सीने से सटा लिया, जैसे वह उन शब्दों को अपने दिल के अंदर ही दफ़न कर देना चाहती हों।
उनके मन में विचारों का एक हिंसक बवंडर उठ खड़ा हुआ:
"या अल्लाह, यह शख्स किस मिट्टी का बना है? हल्दी का पाक मौका, घर में मेहमानों की चहल-पहल, और यह मुझसे मेरे जिस्म की नुमाइश की मांग कर रहा है? 'गुलाबी टिप्स'... क्या उसे ज़रा भी अंदाज़ा है कि वह एक माँ से, एक इज़्ज़तदार बीवी से क्या कह रहा है?"
आयशा : "मेरा बस चले तो मैं अभी इसका नंबर ब्लॉक कर दूँ और घर के दरवाज़े इसके लिए बंद कर दूँ। लेकिन सायमा... । अगर मैंने इसकी बात नहीं मानी, तो यह उस बच्ची की ज़िंदगी तबाह कर देगा। आज वह मम्मे देखना चाहता है, कल वह इससे भी आगे बढ़ेगा।"
आयशा की साँसें तेज़ हो गईं और उनकी आँखों से एक गर्म आँसू ढलकर उनके गालों पर आ गिरा।
आयशा के दिमाग में भले ही खौफ और नफरत का तूफान था, लेकिन उनके जिस्म ने एक बिल्कुल अलग और विश्वासघाती प्रतिक्रिया दी।
आयशा ने महसूस किया कि विशाल के मैसेज पढ़ते ही उनके पुष्ट मम्मों में एक सिहरन सी दौड़ गई। वे उभार, जिन्हें विशाल ने अपनी हथेलियों में भींचा था, अचानक और भी भारी महसूस होने लगे। उनके निप्पल्स, जिन्हें विशाल ने 'गुलाबी टिप्स' कहकर संबोधित किया था, वे पीले सूट के अंदर अपने आप सख्त होने लगे। यह एक ऐसी शर्मनाक सनसनी थी जिसे वह रोकना चाहती थीं, लेकिन उनका बदन उनके काबू से बाहर था।
आयशा ने आईने के सामने खड़े होकर अपने उस पीले रेशमी सूट को देखा जिसे उन्होंने हल्दी के फंक्शन के लिए चुना था। सूट का गला थोड़ा गहरा था, जो उनकी दूधिया गर्दन और छाती के ऊपरी हिस्से को बेबाक तरीके से दिखा रहा था।
सूट के पतले कपड़े के नीचे उनके भारी मम्मे अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे थे। विशाल के शब्दों का जादू या खौफ इतना गहरा था कि आयशा को महसूस हुआ जैसे उनके निप्पल्स कपड़े को फाड़कर बाहर निकलना चाहते हों। वह सख्त होकर सूट की सतह पर साफ उभर आए थे, जो किसी भी देखने वाले के लिए एक खुला निमंत्रण हो सकता था।
आयशा (हांफते हुए मन में): "तौबा... यह बदन तो जैसे मेरा रहा ही नहीं। अभी तो उसने सिर्फ मैसेज किया है और मेरी यह हालत है? अगर उसने सच में सबके सामने अंदर झांका, तो मैं खुद को कैसे संभालूँगी? ये उभार... ये निप्पल्स... जैसे उसकी पुकार का इंतज़ार कर रहे हों। मैं एक गुनहगार माँ हूँ, जो अपनी बच्ची को बचाने के बहाने अपने ही जिस्म की इस गद्दारी का लुत्फ़ उठा रही है।"
आयशा काँपते हाथों से दुपट्टे को सीने पर ओढ़ने की कोशिश की, ताकि उन सख्त होते निप्पल्स की नुमाइश को रोका जा सके, लेकिन अंदर ही अंदर एक अजीब सी 'लज़्ज़त' उन्हें यह एहसास दिला रही थी कि आज का दिन उस के वजूद को पूरी तरह बदल देने वाला है।
आयशा की साँसें अचानक तेज़ और गर्म हो गईं।
विशाल की वह "गर्लफ्रेंड" वाली बात उनके ज़हन में एक कड़वे नशे की तरह उतर रही थी। उन्हें याद आया कि कैसे उसकी उंगलियां उनके नंगे पेट पर रेंग रही थीं, और उस याद मात्र से ही उनकी पैंटी के अंदर एक हल्की सी नमी महसूस होने लगी।
वह जितनी शिद्दत से विशाल से नफरत करना चाहती थीं, उनका बदन उतनी ही शिद्दत से उस 'हैवान' की यादों को सहेज रहा था।
उन्हें अपनी ही इस 'गद्दार' देह से खौफ आने लगा, जो एक तरफ इज़्ज़त की दुहाई दे रही थी और दूसरी तरफ विशाल की उस ज़हरीली वासना की खुमारी में डूबती जा रही थी।
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चैट के बाद मैंने अम्मी को अपना फोन वापस उन्हीं मम्मों के बीच में रखते हुए देखा। मेरे मन में आया कि काश मैं वह फोन होता, तो उन्हें महसूस कर पाता। अम्मी की सांसें तेज़ चल रही थीं और उनके गाल पूरी तरह से लाल हो चुके थे। फिर अम्मी कुछ सोचती हुई मेरी तरफ मुड़ीं, "जल्दी तैयार होकर आ जाना," वह कहती हुई कमरे से बाहर निकल गईं।
मेरे मन में ख्याल आया—क्या मैसेज आया था? किसका था? अब्बू का? पहले तो अम्मी ठीक से चैट कर रही थीं, पर अंत में उनका चेहरा पूरा लाल क्यों हो गया? उनकी आँखों में खौफ दिख रहा था।
मैं तैयार होकर नीचे, आँगन की तरफ बढ़ा। ढोलक की थाप और औरतों के गाने की आवाज़ तेज़ हो रही थी। आँगन को गेंदे के फूलों से सजाया गया था। हर तरफ पीला रंग बिखरा हुआ था। पर मेरी निगाहें बस एक ही चेहरे ढूँढ़ रही थीं।
और फिर वह मुझे दिखीं।
वह दुल्हन के पास बैठी थीं, उनके हाथ में हल्दी की कटोरी थी। वह हंस रही थीं, किसी बात पर उन्होंने दुल्हन की नाक पर शरारत से हल्दी लगा दी। उनका चेहरा खुशी से तमतमा रहा था। इस भीड़ में वह सबसे अलग, सबसे हसीन लग रही थीं।
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इससे पहले आयशा ने सायमा को दिलासा देते हुए कहा था कि विशाल अब उसे परेशान नहीं करेगा और उसे अपनी शादी का आनंद लेना चाहिए।
जब सायमा ने हैरानी से पूछा कि यह कैसे मुमकिन हुआ, तो आयशा ने झूठ का सहारा लेते हुए कहा, "मैंने उसे सिक्युरिटी में जाने की धमकी दी है, तो वह कुछ पैसे लेकर वे तस्वीरें और वीडियो डिलीट करने को तैयार हो गया है।"
सायमा ने घबराते हुए पूछा, "कितने पैसे?"
आयशा ने उसकी आँखों में देखते हुए शांति से जवाब दिया, "दस लाख, पर तू फिक्र मत कर, मैं सब संभाल लूँगी।"
हल्दी की रस्म के बीच आयशा की हंसी के पीछे एक गहरा दर्द और समझौता छिपा था। वह जानती थीं कि विशाल को दस लाख की नहीं, बल्कि उनके इस मखमली जिस्म की भूख थी। सायमा के चेहरे पर आई मुस्कान आयशा के लिए एक मरहम जैसी थी, लेकिन उनका अपना दिल अभी भी उस खौफनाक 'करार' के बोझ तले दबा था।
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पीले रेशमी सूट में आयशा का हुस्न कहर ढा रहा था। जब वह झुककर दुल्हन को हल्दी लगा रही थीं, तो उनका गहरा गला उनके भारी और पुष्ट मम्मों की एक झलक दे जाता था। वह बार-बार अपने दुपट्टे को सँभालने की कोशिश कर रही थीं।
वहीं पर मेरी नानी खड़ी थीं, नौकर को कुछ समझा रही थीं। उन्होंने मुझे देखते ही अपने पास बुलाया।
"साहिल! इधर आ। सुबह से देख रही हूँ, कुछ खाया है या बस हवा में ही उड़ रहा है?" उनकी आवाज़ में वही हमेशा वाली फिक्र थी।
"नहीं नानी, बस अभी..."
"बस बस, रहने दे," उन्होंने मेरी बात काट दी। "चल, बैठ यहाँ।" उन्होंने खुद एक प्लेट में गरमा-गरम पूरी और आलू की सब्ज़ी रखी। "यह ले, चुपचाप खत्म कर।"
मैं उनकी बात टाल नहीं सका और एक कुर्सी पर बैठ गया। मैं नाश्ता कर ही रहा था कि एक साया मेरे ऊपर झुका।
"क्या बात है, साहिल! बड़े हैंडसम लग रहे हो पीले कुर्ते में," एक जानी-पहचानी आवाज़ आई।
मैंने पलट कर देखा। विशाल। वह भी एक पीला कुर्ता पहने हुए था। लेकिन वह अकेला नहीं था। उसके साथ दो औरतें थीं जिनके हाथ में खूबसूरत सजाई हुई थालियाँ थीं, जिन पर पीले रेशम के कपड़े थे।
"आप यहाँ?" मैं थोड़ा हैरत से पूछा।
"मैं तो दूल्हे का दोस्त हूँ। अकरम की तरफ से शगुन की हल्दी लेकर आया हूँ," उसने मुस्कुराते हुए कहा।
वैसे, तेरी अम्मी कहाँ हैं?"
उसके मुँह से 'तेरी अम्मी' सुनना मुझे अजीब सा लगा। जैसे यह उसके लिए बस एक नाम था, जबकि मेरे लिए वह मेरी पूरी दुनिया थीं, और अब... एक उलझन भी।
"वह... वहीं हैं, दुल्हन के पास," मैंने दूर इशारा करते हुए कहा।
विशाल की नज़र मेरे इशारे के साथ उस तरफ घूमी, और अम्मी को देखते ही उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गयी। "अच्छा... तो आयशा जी यहाँ हैं," उसने धीरे से कहा, जैसे खुद से बात कर रहा हो।
"मैं बस आयशा जी को हल्दी देकर आता हूँ," वह यह कहता हुआ अम्मी की तरफ चल दिया। और मैं वहीं कुर्सी पर बैठा, अपने हाथ में पूरी का निवाला लिए, उसे देखता रहा। एक अनजान आदमी, जो अब अनजान नहीं लग रहा था, मेरी अम्मी की तरफ जा रहा था, बराबरी के हक से।
प्लेट में रखा पूरी का निवाला वहीं छोड़कर एक झटके से मैं खड़ा हुआ, नानी की आवाज़: 'अरे क्या हुआ?' पीछे कहीं दबकर रह गई। मैं तेज़ी से उसके पीछे चल पड़ा।
मेरा हर कदम ढोलक की बढ़ती हुई थाप के साथ उठ रहा था। लोग, गाने, फूलों की महक, कुछ भी मुझे महसूस नहीं हो रहा था। मेरी आँखें बस दो लोगों पर टिकी थीं - विशाल की चौड़ी पीठ, और उसके आगे, भीड़ में चाँद की तरह चमकती मेरी अम्मी।
विशाल अम्मी के पास सीधा नहीं गया। वह जाकर उनसे थोड़ी दूर खड़ा हो गया, जबकि उसके साथ आईं दो औरतें आगे बढ़ीं। मैं भी उनके पीछे खड़ा हो गया, जहाँ से मैं सब साफ़-साफ़ देख सकता था।
एक अधेड़ उम्र की औरत, जो शायद दूल्हे की चाची या ताई थी, आगे बढ़ी। "आयशा बेटी, हम अकरम की तरफ से शगुन की हल्दी लाये हैं।"
अम्मी, जो दुल्हन से हँसकर कुछ कह रही थीं, उनकी आवाज़ सुनकर पलटीं। उनके चेहरे पर एक मेहमान नवाज़ मुस्कान आ गई।
"आइए, आइए, चाची जी। हम आपका ही इंतज़ार कर रहे थे," उन्होंने उठते हुए कहा। उनकी निगाहें एक पल के लिए पीछे खड़े विशाल पर गईं और फिर फौरन हट गईं।
विशाल वहीं खड़ा रहा, उसके हाथ उसके कुर्ते की जेब में थे, और उसकी निगाहें अम्मी पर गड़ी हुई थीं। वह उन्हें इस तरह देख रहा था जैसे भीड़ में और कोई न हो। बेशर्मी से। हक से।
औरतें रस्म पूरी कर रही थीं। हल्दी की कटोरी एक हाथ से दूसरे हाथ में दी जा रही थी। ढोलक बज रही थी। गीत गाए जा रहे थे। लेकिन उस शोर में, एक खामोश खेल चल रहा था।
अम्मी ऐसे अनजान बन रही थीं जैसे उन्हें विशाल की नज़रों का एहसास ही न हो। वह चाची-जी से हंस-हंस कर बातें कर रही थीं, लेकिन मैं देख सकता था कि उनके सांस लेने की रफ्तार थोड़ी तेज़ हो गई थी। उनके गालों पर एक हल्की सी लाली दौड़ गई थी, जिसे वह अपने बिखरे हुए बालों की लटों के पीछे छुपाने की कोशिश कर रही थीं।
रस्म के तौर पर, अम्मी ने कटोरी से थोड़ी सी हल्दी अपनी उंगलियों पर ली। दुल्हन ने शर्माकर अपनी बाहें आगे कीं। हल्दी लगाने के लिए अम्मी को थोड़ा आगे झुकना पड़ा। औरतें उनके गिर्द घेरा बनाए खड़ी थीं, लेकिन विशाल ठीक सामने, उस घेरे के पीछे खड़ा था।
विशाल ने अचानक कहा, "एक मिनट रुकिए, मुझे यह रस्म कैप्चर करने दीजिए।" यह कहते हुए उसने अपना फोन बाहर निकाला। अम्मी ने उसकी तरफ देखा।
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जैसे ही आयशा ने विशाल की आवाज़ सुनी, उनकी उंगलियों में फँसी हल्दी वहीं जम गई। विशाल ने फोन का कैमरा बिल्कुल उस एंगल पर सेट किया था जहाँ से आयशा के झुकने की वजह से उनके पुष्ट मम्मों की गहराई और उनके पीले सूट के अंदर की हलचल साफ़ नज़र आ रही थी।
भीड़ को लग रहा था कि वह रस्म की तस्वीर ले रहा है, लेकिन आयशा जानती थीं कि उसके लेंस की नज़र कहाँ है।
आयशा (मन में): "या अल्लाह, यह सबके सामने क्या कर रहा है? सब देख रहे हैं... पर कोई नहीं जानता कि इस कैमरे के पीछे इसकी नीयत क्या है। मेरे मम्मे... मेरा यह बदन... आज एक खिलौना बनकर रह गया है।"
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उधर जैसे ही सायमा ने विशाल की आवाज़ सुनी, उसकी साँसें थम गईं। मन ही मन उसने सोचा, "हर फंक्शन में इसका आना ज़रूरी है क्या?" फिर डरते हुए सायमा ने अपनी निगाह विशाल की तरफ की, लेकिन उसने देखा कि विशाल का ध्यान उसकी तरफ नहीं था। वह तो उसकी खाला को देख रहा था। उसकी निगाह का पीछा करते हुए सायमा की निगाह भी अपनी खाला की तरफ मुड़ी।
आयशा खाला का चेहरा झुका हुआ था और उनके हाथ मेहंदी लगा रहे थे, लेकिन उनके सूट के सीने का गला पूरा खुला हुआ था और उनके मम्मे पूरी तरह से नंगे नज़र आ रहे थे। सायमा का भी यह नज़ारा देखकर मुँह सूख गया। तभी विशाल की निगाह उसकी तरफ मुड़ी; उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
सायमा और आयशा, दोनों को एक साथ बेबस देखकर उसके मन में हवस का एक नया तूफान उठ खड़ा हुआ।
विशाल के विचार:
"कितना कातिल नज़ारा है... एक तरफ आयशा का यह भरा हुआ दूधिया बदन है जो मेरे कैमरे के इशारे पर झुकने को मजबूर है, और दूसरी तरफ यह सहमी हुई सायमा। क्यों न इन दोनों को एक ही खेल का हिस्सा बना दिया जाए? पहले इन दोनों को आपस में ही एक-दूसरे के करीब लाऊँगा। इस छोटी वाली को ऐसा मजबूर करूँगा कि यह खुद अपने हाथों से अपनी खाला के इस मखमली जिस्म को सहलाए, उनके इन पुष्ट मम्मों को चूमे और चाटे। जब दोनों शर्म और मजबूरी की आग में झुलस रही होंगी, तब मज़ा दोगुना हो जाएगा।"
उसने कैमरे का लेंस थोड़ा और ज़ूम किया, जहाँ आयशा के वक्षों का उतार-चढ़ाव साफ़ दिख रहा था, और फिर एक तिरछी नज़र सायमा के खौफज़दा चेहरे पर डाली।
"एक बार ये दोनों इस जाल में आ गईं, फिर एक ही सेज पर इन दोनों को एक साथ भुगतूँगा। . दोनों का गोरा बदन जब मेरे सामने बेपर्दा होगा, तब असली रंग जमेगा। अभी तो बस शुरुआत है, इस शादी के खत्म होने तक मैं इन दोनों को अपनी उंगलियों पर नचा कर रख दूँगा।"
विशाल ने अपने होठों पर जीभ फेरी और अपनी आँखों की उस गंदी चमक को कैमरे के पीछे छुपाते हुए एक और क्लिक किया। सायमा उसका वह चेहरा देखकर अंदर तक कांप गई, क्योंकि वह भांप चुकी थी कि इस दरिंदे की नज़रें अब सिर्फ उसकी खाला पर ही नहीं, बल्कि उन दोनों की इज़्ज़त पर एक साथ मंडरा रही हैं।
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अम्मी का दिल ज़ोर से धड़का। विशाल ने इशारे से अम्मी को और थोड़ा नीचे झुकने का संकेत दिया। अम्मी ने अपनी नज़रें झुका लीं, उनकी पलकें डर और शर्म से काँप रही थीं। उनके भारी वक्ष उस गहरे गले के सूट में जैसे और भी उभर आए थे, और विशाल के कैमरे के सामने उनकी 'गुलाबी युक्तियों' की बनावट उस महीन कपड़े के नीचे साफ़ झलक रही थी।
विशाल ने एक कुटिल मुस्कान के साथ फोन का बटन दबाया। फ्लैश की वह तेज़ रोशनी अम्मी की आँखों में नहीं, बल्कि उनके सीने पर जैसे किसी कोड़े की तरह पड़ी।
विशाल ने बड़ी बेशर्मी से कहा, "ठीक से रिकॉर्ड नहीं हो रहा है आयशा जी, आप थोड़ा और झुककर हल्दी लगाइए और अच्छे से लगाइए। मुझे यह सीन यादगार के तौर पर कैप्चर करना है।"
आयशा उसकी मांग को अच्छी तरह समझ गई थीं। इस बार उन्होंने और गहरा झुकते हुए दुल्हन के हाथों पर हल्दी लगानी शुरू की। उनके झुकने की वजह से उनके दोनों भारी मम्मे सूट के गले से बाहर की ओर छलक आए थे, और उस महीन पीले कपड़े के नीचे उनकी गुलाबी युक्तियाँ बिल्कुल साफ़ नुमाया हो रही थीं।
जैसे ही आयशा और ज़्यादा झुकीं, उनके बदन की वह 'गद्दार' सिहरन एक बार फिर लौट आई। विशाल ने अपना कैमरा ज़ूम किया ताकि वह आयशा के पुष्ट वक्षों के बीच की उस गहरी घाटी और उन सख्त हो चुकी युक्तियों को करीब से देख सके।
अम्मी (मन में): "या अल्लाह, मैं कितनी गिर गई हूँ। सबके सामने, अपनों के बीच... मैं इस दरिंदे को अपने जिस्म की नुमाइश करा रही हूँ। मेरे मम्मे इस ठंडी हवा और उसकी गंदी नज़र के सामने जैसे और भी बेबाक हो रहे हैं। क्या किसी ने देख तो नहीं लिया?"
विशाल ने रिकॉर्डिंग जारी रखी और एक हाथ से इशारे से उन्हें थोड़ा और रुकने को कहा। आयशा का चेहरा शर्म से दहक रहा था, लेकिन उनके जिस्म पर छा रही वह नमी और साँसों की गर्मी यह बता रही थी कि डर के साथ-साथ एक अनचाही वासना की लहर भी उनके अंदर दौड़ रही है।
वह एक ज़हरीले करार की गुलाम बन चुकी थीं, जहाँ हर रस्म उनके जिस्म की एक नई नीलामी थी। विशाल के चेहरे पर एक सुकून था—उसने जो माँगा था, आयशा ने भरी महफिल में उसे पेश कर दिया था।
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ज़्यादातर लोग हल्दी की रस्म के जश्न में डूबे थे और कोई इस बात पर ध्यान नहीं दे रहा था, लेकिन विशाल का कैमरा और उसकी नज़रें सिर्फ उन्हीं उभारों पर टिकी थीं।
भीड़ की आवाज़ें आयशा के कानों में धुंधली हो रही थीं।
उस भीड़भाड़ वाले कमरे की गर्मी और हल्दी की खुशबू के बीच, माहौल अचानक मेरे लिए भारी हो गया। विशाल जिस तरह से फोन पकड़े हुए था, उसका एंगल सामान्य नहीं था। जब मैं उसके करीब पहुँचा, तो मुझे उसके फोन की स्क्रीन साफ़ नज़र आई। वह अम्मी के चेहरे की नहीं, बल्कि उनके गहरे गले से छलकती उन भारी मम्मों की वीडियो बना रहा था।
अम्मी उस वक्त पूरी तरह नीचे झुकी हुई थीं। पीले सूट का वह गला उनके वजूद का सबसे निजी हिस्सा बेपर्दा कर रहा था। उस महीन कपड़े के खिंचाव की वजह से उनके निप्पल्स के उभार इतने साफ़ थे कि कोई भी उन्हें अनदेखा नहीं कर सकता था। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि अम्मी, जो हमेशा अपनी ओढ़नी सँभाल कर रखती थीं, आज इस कदर लापरवाह कैसे हो गईं। क्या उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उनका यह दूधिया बदन इस वक्त महफिल की नुमाइश बना हुआ है?
विशाल के चेहरे की दरिंदगी देखकर मेरा खून खौल उठा, लेकिन साथ ही एक अजीब सी घबराहट ने मुझे जकड़ लिया। वह अपनी जीभ को अपने होठों पर फेर रहा था, जैसे वह उस मंज़र को अभी ही चख लेना चाहता हो। उसकी आँखों में एक अजीब सी हवस थी, जो अम्मी के उन पुष्ट उभारों को ज़ूम करके देख रही थी।
विशाल के बगल में खड़े होकर, उस स्क्रीन पर अम्मी के उस प्रतिबंधित हिस्से को देख मेरा अपना शरीर भी अकड़ने लगा। एक तरफ गुस्से की आग थी और दूसरी तरफ वह नज़ारा, जिसने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया था।
अम्मी ने दुल्हन की बांहों पर हल्दी मल दी, और फिर, बहुत धीरे से, जैसे उन्हें कोई जल्दी ना हो, वह सीधी हुईं। उन्होंने दुपट्टे को एक झटका नहीं दिया। बड़ी नज़ाकत से, एक-एक करके उसकी सिलवटें ठीक कीं, और उसे वापस अपने सीने पर इस तरह सेट किया कि सब कुछ ढक गया।
उन्होंने एक बार भी विशाल की तरफ नहीं देखा। लेकिन उन्हें देखने की ज़रूरत ही नहीं थी। उन्हें पता था कि वह देख रहा था।
अम्मी ने अपनी पीली उंगलियों को देखा और मुस्कुराकर पीछे हट गईं, चाची-जी को आगे आने का इशारा करते हुए। अब दूल्हे की चाची जी और दूसरी औरतें आगे बढ़ आईं और बारी-बारी से दुल्हन को हल्दी लगाने लगीं। रस्म जारी थी, ढोलक और गानों का शोर और बढ़ गया था।
अम्मी अब रस्म के घेरे से बाहर आकर, किनारे पर खड़ी औरतों के झुंड में शामिल हो गईं। वह एक रिश्तेदार से हंस कर बात कर रही थीं। उनका रुख अभी भी उसी तरफ था जहाँ विशाल खड़ा था। और विशाल अभी भी वहीं था, जैसे ज़मीन से जुड़ गया हो। उसकी निगाहें अम्मी पर टिकी थीं।
वह इंतज़ार कर रहा था। और आखिरकार, अम्मी ने उसकी तरफ देखा।
कमरे में सुबह की पहली किरण जब पर्दा चीरकर अंदर आई, तो मैंने आँखें खोलीं। मैं सारी रात बेचैन होकर सोया था।
अम्मी मेरे बगल वाले बेड पर नहीं थीं। वह कमरे में आईने के सामने खड़ी थीं, उनकी पीठ मेरी तरफ थी। आईने में उनका चेहरा साफ़ दिख रहा था, और उनका पूरा ध्यान अपने होठों पर था। वह एक छोटे से ब्रश से अपने होठों पर चमकता हुआ लिप ग्लॉस लगा रही थीं। उन्होंने अपने होठों को थोड़ा सा 'O' शेप में बनाकर ग्लॉस लगाया और फिर उन्हें आपस में दबाकर फैलाया।
वह हल्दी के लिए तैयार थीं। उन्होंने एक खूबसूरत, बसंती पीले रंग का जॉर्जेट का सूट पहना हुआ था। कमीज़ हल्की थी, जिस पर सफेद चिकनकारी का काम था। कमीज़ उनकी कमर पर कसी हुई थी और नीचे उनके हिप्स के गिर्द एक नज़ाकत से फैल जाती थी।
उनके जॉर्जेट का दुपट्टा उनके कंधों पर लापरवाही से टिका हुआ था। उसकी ना तो कोई पिन लगी थी, ना ही कोई तह जमी हुई थी; बस वह उनके जिस्म की हरकत के साथ लहरा रहा था। दुपट्टे का एक छोर उनकी पीठ पर नीचे तक जा रहा था, और दूसरा उनके सीने के ऊपर से होता हुआ उनके हाथ तक। जब वह लिप ग्लॉस लगाने के लिए थोड़ा आगे झुकीं, तो दुपट्टा कंधे से हल्का सा सरका, उनकी गोरी, मुलायम कॉलरबोन और कंधे की गोलाई को बे-पर्दा कर गया।
उनका दुपट्टा उनके सीने पर ऐसे इकट्ठा था कि उनकी दोनों छातियाँ उस कपड़े के नीचे से और भी भरी हुई और गोल लग रही थीं। जॉर्जेट की कमीज़ उनकी ब्रा की कप-लाइन को हल्के से हाईलाइट कर रही थी।
उन्होंने अपने गीले बालों का जूड़ा बनाया हुआ था, जिससे पानी की कुछ बूंदें उनकी गर्दन पर फिसल रही थीं। जूड़े में लगा ताज़ा मोगरे का गजरा, उनके बदन से आ रही साबुन और इत्र की महक में मिलकर एक नशीली खुशबू बना रहा था। कानों में सोने की झुमके, गले में एक पतली सी चेन और हाथों में काँच की पीली-हरी चूड़ियाँ। वह बेहद ताज़ा, भीगी हुई और कातिल लग रही थीं।
उन्हें इस तरह देखकर, कल रात का सारा शक धुआँ बनकर उड़ गया। यह मेरी अम्मी नहीं थीं; यह एक औरत थी, पूरी की पूरी, जिसे मैं आज पहली बार देख रहा था। विशाल क्या, कोई भी उन्हें देखता तो दीवाना हो जाता। यह सोच मेरे सीने से बोझ बनकर नहीं, बल्कि एक अजीब सी गर्माहट बनकर उठी, जो मेरे पूरे बदन में फैल गयी।
वह आईने में मेरा अक्स देखकर पलटीं।, उनके होंठों पर एक गहरी मुस्कान थी। "उठ गया, साहिल? ऐसे क्या घूर रहा है?"
मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। "सॉरी, अम्मी… वह… आप..." अल्फ़ाज़ मेरे गले में ही फंस गए।
"मैं क्या?" उन्होंने अपनी एक आइब्रो उठाते हुए पूछा। उनकी आवाज़ में वही रोज़ की ममता थी, लेकिन आज उसमें एक अलग सी खनक थी, एक शरारत। "बहुत अच्छी लग रही हूँ?"
"आप… कयामत लग रही हैं," लफ़्ज़ मेरे मुँह से फिसल गए।
यह सुनकर उनके गाल लाल हो गए। वह सच में शर्मा गई। "बदमाश। चल, मस्का मत लगा। सब मेहमान नीचे इंतज़ार कर रहे हैं। जल्दी से नहा ले।"
मैं बस हाँ में सिर हिला सका।
"और सुन," वह मेरे बेड के पास आकर, थोड़ा झुकीं। उनके गजरे और उनके जिस्म की महक ने मुझे घेर लिया। अचानक मेरी नज़र सामने की तरफ गई, तो मेरा गला ही सूख गया। मेरी आँखों के सामने अम्मी के दोनों मम्मे 75% से ज़्यादा दिख रहे थे। उनके बीच की घाटी, उनकी सुडौलता... फिर मैंने जबरदस्ती अपनी आँखें फेर लीं, क्योंकि मुझे नीचे कुछ तनाव बढ़ता हुआ महसूस हुआ।
"तू भी वह पीले रंग का कुर्ता पहन लेना।"
सुबह की उस खामोशी में फोन की बीप किसी धमाके जैसी लगी। अम्मी का ध्यान उस तरफ हुआ। मेरी निगाह वापस से अम्मी की तरफ मुड़ी ताकि मैं उन्हें फिर से देख सकूँ, लेकिन अम्मी अब नाइटस्टैंड पर रखे फोन की तरफ बढ़ीं। और जब उन्होंने कॉल करने वाले का नाम देखा, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। थोड़े से संकोच के साथ उन्होंने अपना फोन उठाया।
अम्मी कुछ टाइप करने लगीं, उन मैसेजेस का जवाब दे रही थीं।
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विशाल: गुड मॉर्निंग आयशा जी।
आयशा : गुड मॉर्निंग।
विशाल: सारी रात आपकी याद आती रही, सो ही नहीं पाया।
आयशा (डरते हुए): क्यों?
विशाल: बस अपने हाथों में वह नरमी महसूस कर रहा था।
आयशा : मैं समझी नहीं।
विशाल: आपके मम्मों की...
आयशा (शर्माते हुए): विशाल जी, ऐसी बातें मत कीजिए।
विशाल: आप तो मेरी गर्लफ्रेंड हैं, भूल गईं? हमारा करार हुआ था, याद है?
आयशा (डरते हुए): याद है।
विशाल: तो मेरी गर्लफ्रेंड से एक गुज़ारिश है—आज मैं हल्दी के फंक्शन में आ रहा हूँ। मैं आपके मम्मों की खूबसूरती को देखना चाहता हूँ। मुझे वे दोनों पूरी तरह नज़र आने चाहिए, अपनी गुलाबी नप्पल्स के साथ।
आयशा के ज़हन में जैसे एक ज़लज़ला आ गया था। विशाल की उस बेबाक और गंदी मांग ने उनकी रूह को अंदर तक कंपा दिया था। उन्होंने फोन को सीने से सटा लिया, जैसे वह उन शब्दों को अपने दिल के अंदर ही दफ़न कर देना चाहती हों।
उनके मन में विचारों का एक हिंसक बवंडर उठ खड़ा हुआ:
"या अल्लाह, यह शख्स किस मिट्टी का बना है? हल्दी का पाक मौका, घर में मेहमानों की चहल-पहल, और यह मुझसे मेरे जिस्म की नुमाइश की मांग कर रहा है? 'गुलाबी टिप्स'... क्या उसे ज़रा भी अंदाज़ा है कि वह एक माँ से, एक इज़्ज़तदार बीवी से क्या कह रहा है?"
आयशा : "मेरा बस चले तो मैं अभी इसका नंबर ब्लॉक कर दूँ और घर के दरवाज़े इसके लिए बंद कर दूँ। लेकिन सायमा... । अगर मैंने इसकी बात नहीं मानी, तो यह उस बच्ची की ज़िंदगी तबाह कर देगा। आज वह मम्मे देखना चाहता है, कल वह इससे भी आगे बढ़ेगा।"
आयशा की साँसें तेज़ हो गईं और उनकी आँखों से एक गर्म आँसू ढलकर उनके गालों पर आ गिरा।
आयशा के दिमाग में भले ही खौफ और नफरत का तूफान था, लेकिन उनके जिस्म ने एक बिल्कुल अलग और विश्वासघाती प्रतिक्रिया दी।
आयशा ने महसूस किया कि विशाल के मैसेज पढ़ते ही उनके पुष्ट मम्मों में एक सिहरन सी दौड़ गई। वे उभार, जिन्हें विशाल ने अपनी हथेलियों में भींचा था, अचानक और भी भारी महसूस होने लगे। उनके निप्पल्स, जिन्हें विशाल ने 'गुलाबी टिप्स' कहकर संबोधित किया था, वे पीले सूट के अंदर अपने आप सख्त होने लगे। यह एक ऐसी शर्मनाक सनसनी थी जिसे वह रोकना चाहती थीं, लेकिन उनका बदन उनके काबू से बाहर था।
आयशा ने आईने के सामने खड़े होकर अपने उस पीले रेशमी सूट को देखा जिसे उन्होंने हल्दी के फंक्शन के लिए चुना था। सूट का गला थोड़ा गहरा था, जो उनकी दूधिया गर्दन और छाती के ऊपरी हिस्से को बेबाक तरीके से दिखा रहा था।
सूट के पतले कपड़े के नीचे उनके भारी मम्मे अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे थे। विशाल के शब्दों का जादू या खौफ इतना गहरा था कि आयशा को महसूस हुआ जैसे उनके निप्पल्स कपड़े को फाड़कर बाहर निकलना चाहते हों। वह सख्त होकर सूट की सतह पर साफ उभर आए थे, जो किसी भी देखने वाले के लिए एक खुला निमंत्रण हो सकता था।
आयशा (हांफते हुए मन में): "तौबा... यह बदन तो जैसे मेरा रहा ही नहीं। अभी तो उसने सिर्फ मैसेज किया है और मेरी यह हालत है? अगर उसने सच में सबके सामने अंदर झांका, तो मैं खुद को कैसे संभालूँगी? ये उभार... ये निप्पल्स... जैसे उसकी पुकार का इंतज़ार कर रहे हों। मैं एक गुनहगार माँ हूँ, जो अपनी बच्ची को बचाने के बहाने अपने ही जिस्म की इस गद्दारी का लुत्फ़ उठा रही है।"
आयशा काँपते हाथों से दुपट्टे को सीने पर ओढ़ने की कोशिश की, ताकि उन सख्त होते निप्पल्स की नुमाइश को रोका जा सके, लेकिन अंदर ही अंदर एक अजीब सी 'लज़्ज़त' उन्हें यह एहसास दिला रही थी कि आज का दिन उस के वजूद को पूरी तरह बदल देने वाला है।
आयशा की साँसें अचानक तेज़ और गर्म हो गईं।
विशाल की वह "गर्लफ्रेंड" वाली बात उनके ज़हन में एक कड़वे नशे की तरह उतर रही थी। उन्हें याद आया कि कैसे उसकी उंगलियां उनके नंगे पेट पर रेंग रही थीं, और उस याद मात्र से ही उनकी पैंटी के अंदर एक हल्की सी नमी महसूस होने लगी।
वह जितनी शिद्दत से विशाल से नफरत करना चाहती थीं, उनका बदन उतनी ही शिद्दत से उस 'हैवान' की यादों को सहेज रहा था।
उन्हें अपनी ही इस 'गद्दार' देह से खौफ आने लगा, जो एक तरफ इज़्ज़त की दुहाई दे रही थी और दूसरी तरफ विशाल की उस ज़हरीली वासना की खुमारी में डूबती जा रही थी।
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चैट के बाद मैंने अम्मी को अपना फोन वापस उन्हीं मम्मों के बीच में रखते हुए देखा। मेरे मन में आया कि काश मैं वह फोन होता, तो उन्हें महसूस कर पाता। अम्मी की सांसें तेज़ चल रही थीं और उनके गाल पूरी तरह से लाल हो चुके थे। फिर अम्मी कुछ सोचती हुई मेरी तरफ मुड़ीं, "जल्दी तैयार होकर आ जाना," वह कहती हुई कमरे से बाहर निकल गईं।
मेरे मन में ख्याल आया—क्या मैसेज आया था? किसका था? अब्बू का? पहले तो अम्मी ठीक से चैट कर रही थीं, पर अंत में उनका चेहरा पूरा लाल क्यों हो गया? उनकी आँखों में खौफ दिख रहा था।
मैं तैयार होकर नीचे, आँगन की तरफ बढ़ा। ढोलक की थाप और औरतों के गाने की आवाज़ तेज़ हो रही थी। आँगन को गेंदे के फूलों से सजाया गया था। हर तरफ पीला रंग बिखरा हुआ था। पर मेरी निगाहें बस एक ही चेहरे ढूँढ़ रही थीं।
और फिर वह मुझे दिखीं।
वह दुल्हन के पास बैठी थीं, उनके हाथ में हल्दी की कटोरी थी। वह हंस रही थीं, किसी बात पर उन्होंने दुल्हन की नाक पर शरारत से हल्दी लगा दी। उनका चेहरा खुशी से तमतमा रहा था। इस भीड़ में वह सबसे अलग, सबसे हसीन लग रही थीं।
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इससे पहले आयशा ने सायमा को दिलासा देते हुए कहा था कि विशाल अब उसे परेशान नहीं करेगा और उसे अपनी शादी का आनंद लेना चाहिए।
जब सायमा ने हैरानी से पूछा कि यह कैसे मुमकिन हुआ, तो आयशा ने झूठ का सहारा लेते हुए कहा, "मैंने उसे सिक्युरिटी में जाने की धमकी दी है, तो वह कुछ पैसे लेकर वे तस्वीरें और वीडियो डिलीट करने को तैयार हो गया है।"
सायमा ने घबराते हुए पूछा, "कितने पैसे?"
आयशा ने उसकी आँखों में देखते हुए शांति से जवाब दिया, "दस लाख, पर तू फिक्र मत कर, मैं सब संभाल लूँगी।"
हल्दी की रस्म के बीच आयशा की हंसी के पीछे एक गहरा दर्द और समझौता छिपा था। वह जानती थीं कि विशाल को दस लाख की नहीं, बल्कि उनके इस मखमली जिस्म की भूख थी। सायमा के चेहरे पर आई मुस्कान आयशा के लिए एक मरहम जैसी थी, लेकिन उनका अपना दिल अभी भी उस खौफनाक 'करार' के बोझ तले दबा था।
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पीले रेशमी सूट में आयशा का हुस्न कहर ढा रहा था। जब वह झुककर दुल्हन को हल्दी लगा रही थीं, तो उनका गहरा गला उनके भारी और पुष्ट मम्मों की एक झलक दे जाता था। वह बार-बार अपने दुपट्टे को सँभालने की कोशिश कर रही थीं।
वहीं पर मेरी नानी खड़ी थीं, नौकर को कुछ समझा रही थीं। उन्होंने मुझे देखते ही अपने पास बुलाया।
"साहिल! इधर आ। सुबह से देख रही हूँ, कुछ खाया है या बस हवा में ही उड़ रहा है?" उनकी आवाज़ में वही हमेशा वाली फिक्र थी।
"नहीं नानी, बस अभी..."
"बस बस, रहने दे," उन्होंने मेरी बात काट दी। "चल, बैठ यहाँ।" उन्होंने खुद एक प्लेट में गरमा-गरम पूरी और आलू की सब्ज़ी रखी। "यह ले, चुपचाप खत्म कर।"
मैं उनकी बात टाल नहीं सका और एक कुर्सी पर बैठ गया। मैं नाश्ता कर ही रहा था कि एक साया मेरे ऊपर झुका।
"क्या बात है, साहिल! बड़े हैंडसम लग रहे हो पीले कुर्ते में," एक जानी-पहचानी आवाज़ आई।
मैंने पलट कर देखा। विशाल। वह भी एक पीला कुर्ता पहने हुए था। लेकिन वह अकेला नहीं था। उसके साथ दो औरतें थीं जिनके हाथ में खूबसूरत सजाई हुई थालियाँ थीं, जिन पर पीले रेशम के कपड़े थे।
"आप यहाँ?" मैं थोड़ा हैरत से पूछा।
"मैं तो दूल्हे का दोस्त हूँ। अकरम की तरफ से शगुन की हल्दी लेकर आया हूँ," उसने मुस्कुराते हुए कहा।
वैसे, तेरी अम्मी कहाँ हैं?"
उसके मुँह से 'तेरी अम्मी' सुनना मुझे अजीब सा लगा। जैसे यह उसके लिए बस एक नाम था, जबकि मेरे लिए वह मेरी पूरी दुनिया थीं, और अब... एक उलझन भी।
"वह... वहीं हैं, दुल्हन के पास," मैंने दूर इशारा करते हुए कहा।
विशाल की नज़र मेरे इशारे के साथ उस तरफ घूमी, और अम्मी को देखते ही उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गयी। "अच्छा... तो आयशा जी यहाँ हैं," उसने धीरे से कहा, जैसे खुद से बात कर रहा हो।
"मैं बस आयशा जी को हल्दी देकर आता हूँ," वह यह कहता हुआ अम्मी की तरफ चल दिया। और मैं वहीं कुर्सी पर बैठा, अपने हाथ में पूरी का निवाला लिए, उसे देखता रहा। एक अनजान आदमी, जो अब अनजान नहीं लग रहा था, मेरी अम्मी की तरफ जा रहा था, बराबरी के हक से।
प्लेट में रखा पूरी का निवाला वहीं छोड़कर एक झटके से मैं खड़ा हुआ, नानी की आवाज़: 'अरे क्या हुआ?' पीछे कहीं दबकर रह गई। मैं तेज़ी से उसके पीछे चल पड़ा।
मेरा हर कदम ढोलक की बढ़ती हुई थाप के साथ उठ रहा था। लोग, गाने, फूलों की महक, कुछ भी मुझे महसूस नहीं हो रहा था। मेरी आँखें बस दो लोगों पर टिकी थीं - विशाल की चौड़ी पीठ, और उसके आगे, भीड़ में चाँद की तरह चमकती मेरी अम्मी।
विशाल अम्मी के पास सीधा नहीं गया। वह जाकर उनसे थोड़ी दूर खड़ा हो गया, जबकि उसके साथ आईं दो औरतें आगे बढ़ीं। मैं भी उनके पीछे खड़ा हो गया, जहाँ से मैं सब साफ़-साफ़ देख सकता था।
एक अधेड़ उम्र की औरत, जो शायद दूल्हे की चाची या ताई थी, आगे बढ़ी। "आयशा बेटी, हम अकरम की तरफ से शगुन की हल्दी लाये हैं।"
अम्मी, जो दुल्हन से हँसकर कुछ कह रही थीं, उनकी आवाज़ सुनकर पलटीं। उनके चेहरे पर एक मेहमान नवाज़ मुस्कान आ गई।
"आइए, आइए, चाची जी। हम आपका ही इंतज़ार कर रहे थे," उन्होंने उठते हुए कहा। उनकी निगाहें एक पल के लिए पीछे खड़े विशाल पर गईं और फिर फौरन हट गईं।
विशाल वहीं खड़ा रहा, उसके हाथ उसके कुर्ते की जेब में थे, और उसकी निगाहें अम्मी पर गड़ी हुई थीं। वह उन्हें इस तरह देख रहा था जैसे भीड़ में और कोई न हो। बेशर्मी से। हक से।
औरतें रस्म पूरी कर रही थीं। हल्दी की कटोरी एक हाथ से दूसरे हाथ में दी जा रही थी। ढोलक बज रही थी। गीत गाए जा रहे थे। लेकिन उस शोर में, एक खामोश खेल चल रहा था।
अम्मी ऐसे अनजान बन रही थीं जैसे उन्हें विशाल की नज़रों का एहसास ही न हो। वह चाची-जी से हंस-हंस कर बातें कर रही थीं, लेकिन मैं देख सकता था कि उनके सांस लेने की रफ्तार थोड़ी तेज़ हो गई थी। उनके गालों पर एक हल्की सी लाली दौड़ गई थी, जिसे वह अपने बिखरे हुए बालों की लटों के पीछे छुपाने की कोशिश कर रही थीं।
रस्म के तौर पर, अम्मी ने कटोरी से थोड़ी सी हल्दी अपनी उंगलियों पर ली। दुल्हन ने शर्माकर अपनी बाहें आगे कीं। हल्दी लगाने के लिए अम्मी को थोड़ा आगे झुकना पड़ा। औरतें उनके गिर्द घेरा बनाए खड़ी थीं, लेकिन विशाल ठीक सामने, उस घेरे के पीछे खड़ा था।
विशाल ने अचानक कहा, "एक मिनट रुकिए, मुझे यह रस्म कैप्चर करने दीजिए।" यह कहते हुए उसने अपना फोन बाहर निकाला। अम्मी ने उसकी तरफ देखा।
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जैसे ही आयशा ने विशाल की आवाज़ सुनी, उनकी उंगलियों में फँसी हल्दी वहीं जम गई। विशाल ने फोन का कैमरा बिल्कुल उस एंगल पर सेट किया था जहाँ से आयशा के झुकने की वजह से उनके पुष्ट मम्मों की गहराई और उनके पीले सूट के अंदर की हलचल साफ़ नज़र आ रही थी।
भीड़ को लग रहा था कि वह रस्म की तस्वीर ले रहा है, लेकिन आयशा जानती थीं कि उसके लेंस की नज़र कहाँ है।
आयशा (मन में): "या अल्लाह, यह सबके सामने क्या कर रहा है? सब देख रहे हैं... पर कोई नहीं जानता कि इस कैमरे के पीछे इसकी नीयत क्या है। मेरे मम्मे... मेरा यह बदन... आज एक खिलौना बनकर रह गया है।"
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उधर जैसे ही सायमा ने विशाल की आवाज़ सुनी, उसकी साँसें थम गईं। मन ही मन उसने सोचा, "हर फंक्शन में इसका आना ज़रूरी है क्या?" फिर डरते हुए सायमा ने अपनी निगाह विशाल की तरफ की, लेकिन उसने देखा कि विशाल का ध्यान उसकी तरफ नहीं था। वह तो उसकी खाला को देख रहा था। उसकी निगाह का पीछा करते हुए सायमा की निगाह भी अपनी खाला की तरफ मुड़ी।
आयशा खाला का चेहरा झुका हुआ था और उनके हाथ मेहंदी लगा रहे थे, लेकिन उनके सूट के सीने का गला पूरा खुला हुआ था और उनके मम्मे पूरी तरह से नंगे नज़र आ रहे थे। सायमा का भी यह नज़ारा देखकर मुँह सूख गया। तभी विशाल की निगाह उसकी तरफ मुड़ी; उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
सायमा और आयशा, दोनों को एक साथ बेबस देखकर उसके मन में हवस का एक नया तूफान उठ खड़ा हुआ।
विशाल के विचार:
"कितना कातिल नज़ारा है... एक तरफ आयशा का यह भरा हुआ दूधिया बदन है जो मेरे कैमरे के इशारे पर झुकने को मजबूर है, और दूसरी तरफ यह सहमी हुई सायमा। क्यों न इन दोनों को एक ही खेल का हिस्सा बना दिया जाए? पहले इन दोनों को आपस में ही एक-दूसरे के करीब लाऊँगा। इस छोटी वाली को ऐसा मजबूर करूँगा कि यह खुद अपने हाथों से अपनी खाला के इस मखमली जिस्म को सहलाए, उनके इन पुष्ट मम्मों को चूमे और चाटे। जब दोनों शर्म और मजबूरी की आग में झुलस रही होंगी, तब मज़ा दोगुना हो जाएगा।"
उसने कैमरे का लेंस थोड़ा और ज़ूम किया, जहाँ आयशा के वक्षों का उतार-चढ़ाव साफ़ दिख रहा था, और फिर एक तिरछी नज़र सायमा के खौफज़दा चेहरे पर डाली।
"एक बार ये दोनों इस जाल में आ गईं, फिर एक ही सेज पर इन दोनों को एक साथ भुगतूँगा। . दोनों का गोरा बदन जब मेरे सामने बेपर्दा होगा, तब असली रंग जमेगा। अभी तो बस शुरुआत है, इस शादी के खत्म होने तक मैं इन दोनों को अपनी उंगलियों पर नचा कर रख दूँगा।"
विशाल ने अपने होठों पर जीभ फेरी और अपनी आँखों की उस गंदी चमक को कैमरे के पीछे छुपाते हुए एक और क्लिक किया। सायमा उसका वह चेहरा देखकर अंदर तक कांप गई, क्योंकि वह भांप चुकी थी कि इस दरिंदे की नज़रें अब सिर्फ उसकी खाला पर ही नहीं, बल्कि उन दोनों की इज़्ज़त पर एक साथ मंडरा रही हैं।
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अम्मी का दिल ज़ोर से धड़का। विशाल ने इशारे से अम्मी को और थोड़ा नीचे झुकने का संकेत दिया। अम्मी ने अपनी नज़रें झुका लीं, उनकी पलकें डर और शर्म से काँप रही थीं। उनके भारी वक्ष उस गहरे गले के सूट में जैसे और भी उभर आए थे, और विशाल के कैमरे के सामने उनकी 'गुलाबी युक्तियों' की बनावट उस महीन कपड़े के नीचे साफ़ झलक रही थी।
विशाल ने एक कुटिल मुस्कान के साथ फोन का बटन दबाया। फ्लैश की वह तेज़ रोशनी अम्मी की आँखों में नहीं, बल्कि उनके सीने पर जैसे किसी कोड़े की तरह पड़ी।
विशाल ने बड़ी बेशर्मी से कहा, "ठीक से रिकॉर्ड नहीं हो रहा है आयशा जी, आप थोड़ा और झुककर हल्दी लगाइए और अच्छे से लगाइए। मुझे यह सीन यादगार के तौर पर कैप्चर करना है।"
आयशा उसकी मांग को अच्छी तरह समझ गई थीं। इस बार उन्होंने और गहरा झुकते हुए दुल्हन के हाथों पर हल्दी लगानी शुरू की। उनके झुकने की वजह से उनके दोनों भारी मम्मे सूट के गले से बाहर की ओर छलक आए थे, और उस महीन पीले कपड़े के नीचे उनकी गुलाबी युक्तियाँ बिल्कुल साफ़ नुमाया हो रही थीं।
जैसे ही आयशा और ज़्यादा झुकीं, उनके बदन की वह 'गद्दार' सिहरन एक बार फिर लौट आई। विशाल ने अपना कैमरा ज़ूम किया ताकि वह आयशा के पुष्ट वक्षों के बीच की उस गहरी घाटी और उन सख्त हो चुकी युक्तियों को करीब से देख सके।
अम्मी (मन में): "या अल्लाह, मैं कितनी गिर गई हूँ। सबके सामने, अपनों के बीच... मैं इस दरिंदे को अपने जिस्म की नुमाइश करा रही हूँ। मेरे मम्मे इस ठंडी हवा और उसकी गंदी नज़र के सामने जैसे और भी बेबाक हो रहे हैं। क्या किसी ने देख तो नहीं लिया?"
विशाल ने रिकॉर्डिंग जारी रखी और एक हाथ से इशारे से उन्हें थोड़ा और रुकने को कहा। आयशा का चेहरा शर्म से दहक रहा था, लेकिन उनके जिस्म पर छा रही वह नमी और साँसों की गर्मी यह बता रही थी कि डर के साथ-साथ एक अनचाही वासना की लहर भी उनके अंदर दौड़ रही है।
वह एक ज़हरीले करार की गुलाम बन चुकी थीं, जहाँ हर रस्म उनके जिस्म की एक नई नीलामी थी। विशाल के चेहरे पर एक सुकून था—उसने जो माँगा था, आयशा ने भरी महफिल में उसे पेश कर दिया था।
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ज़्यादातर लोग हल्दी की रस्म के जश्न में डूबे थे और कोई इस बात पर ध्यान नहीं दे रहा था, लेकिन विशाल का कैमरा और उसकी नज़रें सिर्फ उन्हीं उभारों पर टिकी थीं।
भीड़ की आवाज़ें आयशा के कानों में धुंधली हो रही थीं।
उस भीड़भाड़ वाले कमरे की गर्मी और हल्दी की खुशबू के बीच, माहौल अचानक मेरे लिए भारी हो गया। विशाल जिस तरह से फोन पकड़े हुए था, उसका एंगल सामान्य नहीं था। जब मैं उसके करीब पहुँचा, तो मुझे उसके फोन की स्क्रीन साफ़ नज़र आई। वह अम्मी के चेहरे की नहीं, बल्कि उनके गहरे गले से छलकती उन भारी मम्मों की वीडियो बना रहा था।
अम्मी उस वक्त पूरी तरह नीचे झुकी हुई थीं। पीले सूट का वह गला उनके वजूद का सबसे निजी हिस्सा बेपर्दा कर रहा था। उस महीन कपड़े के खिंचाव की वजह से उनके निप्पल्स के उभार इतने साफ़ थे कि कोई भी उन्हें अनदेखा नहीं कर सकता था। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि अम्मी, जो हमेशा अपनी ओढ़नी सँभाल कर रखती थीं, आज इस कदर लापरवाह कैसे हो गईं। क्या उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उनका यह दूधिया बदन इस वक्त महफिल की नुमाइश बना हुआ है?
विशाल के चेहरे की दरिंदगी देखकर मेरा खून खौल उठा, लेकिन साथ ही एक अजीब सी घबराहट ने मुझे जकड़ लिया। वह अपनी जीभ को अपने होठों पर फेर रहा था, जैसे वह उस मंज़र को अभी ही चख लेना चाहता हो। उसकी आँखों में एक अजीब सी हवस थी, जो अम्मी के उन पुष्ट उभारों को ज़ूम करके देख रही थी।
विशाल के बगल में खड़े होकर, उस स्क्रीन पर अम्मी के उस प्रतिबंधित हिस्से को देख मेरा अपना शरीर भी अकड़ने लगा। एक तरफ गुस्से की आग थी और दूसरी तरफ वह नज़ारा, जिसने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया था।
अम्मी ने दुल्हन की बांहों पर हल्दी मल दी, और फिर, बहुत धीरे से, जैसे उन्हें कोई जल्दी ना हो, वह सीधी हुईं। उन्होंने दुपट्टे को एक झटका नहीं दिया। बड़ी नज़ाकत से, एक-एक करके उसकी सिलवटें ठीक कीं, और उसे वापस अपने सीने पर इस तरह सेट किया कि सब कुछ ढक गया।
उन्होंने एक बार भी विशाल की तरफ नहीं देखा। लेकिन उन्हें देखने की ज़रूरत ही नहीं थी। उन्हें पता था कि वह देख रहा था।
अम्मी ने अपनी पीली उंगलियों को देखा और मुस्कुराकर पीछे हट गईं, चाची-जी को आगे आने का इशारा करते हुए। अब दूल्हे की चाची जी और दूसरी औरतें आगे बढ़ आईं और बारी-बारी से दुल्हन को हल्दी लगाने लगीं। रस्म जारी थी, ढोलक और गानों का शोर और बढ़ गया था।
अम्मी अब रस्म के घेरे से बाहर आकर, किनारे पर खड़ी औरतों के झुंड में शामिल हो गईं। वह एक रिश्तेदार से हंस कर बात कर रही थीं। उनका रुख अभी भी उसी तरफ था जहाँ विशाल खड़ा था। और विशाल अभी भी वहीं था, जैसे ज़मीन से जुड़ गया हो। उसकी निगाहें अम्मी पर टिकी थीं।
वह इंतज़ार कर रहा था। और आखिरकार, अम्मी ने उसकी तरफ देखा।



