- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 137,810
अपडेट 20
दिया अपने सीट को अपने पहले के पहने हुए कपडे से साफ़ करती है और फिर दोनों तरुण के सीट पर किसिंग करते हुए आराम से सो जाते हैं ....
आगे
4 बजे के करीब किसी के नॉक करने से तरुण की नींद खुलती है .... तरुण गेट खोलता है तो पता है की एक हॉट सी दिखने वाली लेडी एक लड़की के साथ कड़ी थी ....
लेडी : जी मेरा भी सीट है इसमें दोनों उप्पर बर्थ ....
तरुण : सॉरी वो जरा हम सो गए थे इसलिए गेट लॉक कर लिया था ....
लेडी : कोई नहीं ... हम अभी जस्ट hi आये हैं ...
तरुण उनके लगेज को अंदर करने में मदद कर देता है .... दिया अब भी गहरी नींद में सोई हुयी थी इसलिए तरुण उसके सीट पर बैठ जाता है ....
लेडी : मेरा उप्पेर बर्थ है ... क्या मैं आपके साथ बैठ सकती हु ... अभी मुझे नींद नहीं आ रही .... बेटी तुम चाहो तो ऊपर जाकर सो सकती हो ....
लड़की : हाँ मुम्मा आज मेरी नींद भी पूरी नहीं हुयी है मैं तो चली सोने ....
वो लड़की अपने बर्थ पर चढ़ कर सो जाती है .... वो लेडी तरुण से सात कर बैठ जाती है ... लेडी ने रेड कलर का एक सूट पहनी हुयी थी जिसका गाला थोड़ा डीप कटा हुआ था जिससे उसके क्लीवेज की जो झलक मिल रही थी वो काफी कामुक थी .... बैठते वक्त उसने अपनी चुन्नी भी हटा ली थी जिससे उसके बड़े बड़े बोबे उछाल कर बहार आने को तरस रहे थे .....
तरुण की आँखें भी कभी कभी उस लेडी की तरफ चली जा रही थी जिसे वो भी नोटिस कर रही थी पर वो तरुण के ऐसे खुद के जिस को देखता पाकर और खुस हो रही थी ....
लेडी : वैसे मेरा नाम शहनाज़ है और ये मेरी बेटी आयशा है ... हम एक शादी अटेंड करने जा रहे हैं .... इसके अब्बू को छूती नहीं थी तो बस हम दोनों माँ बेटी hi निकल लिए ....
तरुण : नीस ... मेरा नाम तरुण है और ये बगल की सीट पर जो सोई हुयी है मेरी दीदी है दिया ....
शहनाज़ : आपको पक्का न नींद नहीं आ रही ....
तरुण : नहीं मेरी नींद पूरी हो चुकी है ....
तरुण बात तो शहनाज़ से कर रहा था पर उसका ध्यान बार बार उसके हाहाकारी मम्मो पर चली जा रही थी .... अभी कुछ दिनों पहले से hi उसने औरतो के इस कामुक अंग का नजारा लेना सुरु किया था ... शहनाज़ के मम्मो का साइज उसके तरुण 2.0 अवतार बनने के बाद का सबसे बड़ा मां था इसलिए वो कौतुहल वस् उसके तरफ खिंचा चला जा रहा था ....
शहनाज़ (नॉटी स्माइल के साथ) : अचे हैं न ....
तरुण : जी क्या ...
शहनाज़ : वही जो आप देखने की कोसिस कर रहे हैं .... वैसे मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है .... अगर आप चाहे तो अचे से भी दिखा सकती हु ....
तरुण : सॉरी ... वो गलती से मेरी नजर वह चली गयी ....
शहनाज़ : अरे बाबा घबराने की जरुरत नहीं है .... इसके अब्बू तो अब मुझे भाव नहीं देते ... आज एक क्यूट सा बाँदा मुझे ताड़ रहा है तो मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है ... वैसे भी अब इस उम्र में ये सब नहीं देखोगे तो क्या बुढ़ापे में देखोगे ....
तरुण को एक हॉट सी लेडी का ये खुले ऍम प्रपोजल देने का अंदाज़ बहुत पसंद आता है वैसे भी कहा जाता न है की जब शेर के मुँह खून लग जाता है तो उसकी नजर सिर्फ खून या अपने शिकार पर hi होती है .... वैसे hi तरुण को जब श्रेया और दिया जैसी कमसिन कलियों का स्वाद लग चूका था तो वो एक मातुरे औरत के साथ भी हलकी फुलकी मस्ती कर लेना चाहता था ....
तरुण : पर आप यहाँ कैसे ....
शहनाज़ : यानि की तुम रेडी हो ....
तरुण : जब आप रेडी हो तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है ....
शहनाज़ : चलो ....
वो उठ कर गेट खोलती है और तरुण को अपने पीछे आने का इशारा करती है .... तरुण भी सावधानी से बहार आ कर गेट को बहार से लॉक कर देता है .... शहनाज़ एक वाशरूम में घुस जाती है और तरुण को अपने पीछे आने का इशारा करती है ...
तरुण जैसे hi अंदर घुसता है शहनाज़ गेट को लॉक करती है और किसी भूखी बिल्ली की तरह उसके ऊपर टूट पड़ती है .... पहले तो छोटा सा किश का दौर चलता है उसके बाद शहनाज़ जाली से अपना सूट निकल कर अपने बड़े बड़े चूचियों को आज़ाद कर देती है ... तरुण पहली बार इतनी बड़ी चुकी देख रहा था इसलिए उसके मुँह में पानी आ गया ....
शहनाज़ : अब बस देखते hi रहोगे या अपनी ख्वाहिस भी पूरी करोगे ....
तरुण किसी भूखे बच्चे की तरह उसके चूचियों पर टूट पड़ता है कभी वो उसके चुकियो को मसल रहा था तो कभी चूस ले रहा था ....
शहनाज़ के इरादे तो काफी कुछ करने का था इसलिए उसने जल्दी से अपनी पजामी का नाडा खोल दिया और झुक कर तरुण को पीछे से अपना लुंड डालने को कहा .... तरुण तो था अनादि पर उसने भी काफी पोर्न फिल्मे देख रही थी जो उसके काम आने वाली थी .....
शहनाज़ : रुको हैंडसम मुझे जरा तुम्हारे हलब्बी ुण्ड को प्यार तो कर लेने दो ....
वो अपने मुँह से धृ सारा थूक निकल कर तरुण के लुंड को अचे से गीला कर देती है ....
शहनाज़ : बस आ जाओ मेरे राजा अब न तरसाओ ...
तरुण जल्दी से शहनाज़ के छूट पर लुंड सेट करके एक धक्का मरता है लुंड आराम से सरकता हुआ आधा से ज्यादा अंदर तक घुस जाता है ... दूसरे धक्के में शेनाज की बड़ी सी गहरी छूट उसका पूरा लुंड निगल लेती है हलाकि उसको दूसरे धक्के में काफी तकलीफ हुयी थी पर वो इस मस्ती के आगे अपना वो दर्द भूल जाती है ... अब तरुण ने ताबड़तोड़ धक्के लगाने सुरु कर दिए ....
शहनाज़ की बड़ी बड़ी गांड को थम कर जब वो धक्के लगाए जा रहा था तो अचानक से उसको घर से वापसी की आखिरी रात याद आ जाती है जब उसने घर पर रात को अपने दादा जी को अपनी hi बहु को छोड़ते हुए देखा था .... वो याद कर न जाने क्यों वो और भी जोर जोर से शहनाज़ को छोड़ने लगता है .....
धक्काम पेल का ये सिलसिला करीब 10 -15 मिनट तक चलता है और तरुण शहनाज़ की छूट में hi खली हो जाता है ....
शहनाज़ पहले तो अपनी छूट को अचे से धोती है फिर तरुण के लुंड को चूस कर साफ़ करने के बाद उसको भी अचे से धो देती है ... अब दोनों जल्दी जल्दी अपने कपडे पहन लेते हैं ...
शहनाज़ : वाओ ... यार तुम तो सच्चे मर्द निकले ... तुम्हारे साथ छोड़ने के बाद तबियत मस्त हो गयी ....
तरुण : मेरी लाइफ का ये फर्स्ट सेक्स था .... मुझे भी बहुत ाचा लगा आपके साथ ये सब करके ...
उसके बाद शहनाज़ आखिरी बार तरुण के होंठो पर एक छोटा सा किश देकर वापस अपने कम्पार्टमेंट में आ जाती है थोड़ी देर बाद तरुण भी आ जाता है ....
उसके बाद कुछ खास नहीं होता शहनाज़ दोपहर को अपने स्टेशन पर उतर कर चली जाती है और तरुण का स्टेशन भी आख़िरकार इवनिंग तक आ hi जाता है और दोनों भाई बहन चल देते हैं दिया के घर की तरफ एक यादगार ट्रैन जर्नी की याद अपने दिल में संजोये ....
दिया के मम्मी पापा और कारन तरुण को सही सलामत देख काफी खुस होते हैं ....
उसके बाद तरुण अपने घर की तरफ लौट जाता है और दिया अपने ससुराल आ जाती है एक नयी लाइफ की शुरुआत करने ....
तरुण के चेहरे पर घर लौटने के वक्त मिले जुले भाव थे .... उसने अपने मन में थान लिया था की भी अब ेंट(
) का जवाब पत्थर से देगा .... घर आते आते इवनिंग हो चुकी थी ....
वो जब घर में एंटर करता है तो सबसे पहले उसका सामना उसकी भाभी शिवानी से होता है ... शिवानी उससे बड़े प्यार से हाल चल पूछती है जिसका जवाब तरुण उतने hi प्यार से देता है ....
उसको किचन में उसकी माँ और रानी दिखती है जिन्हे इग्नोर करके वो सीढ़ियों से होता हुआ अपने रूम आ जाता है ....
थोड़े hi देर में ruchika,ruby और प्रियांशी उसके रूम में आती है .... जहा रुचिका और रूबी को अपने रूम में देख तरुण का चेहरा फूल की तरह खिल उठता है वही प्रियांशी को देख उसने एक फीकी सी स्माइल पास की .... अब वो तो थी तरुण से बड़ी hi तो तरुण ने तीनो के पाओ छू लिए ....
रुचिका : कैसा है बाबू दिखा तो कहा पर गोली लगी थी तुझे ....
तरुण : पर दीदी अभी कैसे आप लोगो के सामने ...
रूबी उसकी बात समझ जाती है ....
रूबी : अरे पगलू तू हमारा छोटा भाई है अब हमारे सामने hi इतना सरमायेगा तो कैसे चलेगा .... जब से हमने ये सब सुना हमारी तो जान hi निकल गयी ....
तरुण अपनी टी शर्ट खोल कर पीछे मुद जाता है .... तीनो बहने तरुण के पीठ पर गोलियों के दो नीसाण देख काफी घबरा जाती है ...
रुचिका : बाप रे बाप कैसे इतना सह तूने भाई ... मेरी तो ये सब देख के hi बुरी हालत हो गयी ...
तरुण : छोडो न दीदी वो बस बुरा वक्त था गुजर गया ....अब तो आप लोग के सामने सही सलामत खड़ा हु न .... समझो आप लोगो की दुआ की वजह से hi बच पाया हु .... रूचि दीदी प्लीज अगली बार से मेरे रूम में उन लोगो को मत आने देना जो बस झूटी सिम्पथी जताने का बहाना कर के यहाँ आये हो ...
रुचिका समझ जाती है की तरुण प्रियांशी की बात कर रहा है ... प्रियांशी को भी ये समझ आ जाता है की ये शब्द उसके लिए hi कहे थे ....
प्रियांशी की आँखों में आंशू आ जाते हैं और वो तरुण के रूम से रोटी हुयी भाग जाती है ...
रुचिका तरुण को उस रात की साडी बात बताती है जिसमे प्रियांशी ने उसको फुल सपोर्ट किया था और ये भी बताया की कैसे वो हमेसा उसकी फिक्र किया करती थी तरुण के शादी में जाने के बाद से ....
तरुण रिया और रुचिका के सामने तो कुछ नहीं कहता पर उसके दिल में अब भी प्रियांशी को माफ़ करने का ख्याल अभी तो नहीं आया था ....
अभी ये दोनों बहने तरुण के रूम से निक्की hi थी की तरुण की बुआ और उसकी बड़ी चची उसके रूम में आ जाती है और उसका हाल चल पूछने लगती है ... तरुण ने अपने जख्म के नीसाण उन्हें भी दिखा दिए ....
डिनर तक लगभग सभी ने तरुण से उसके बारे में पूछ लिया था सिवाए उसकी म. चची, Richa,Rahul और रानी के ... रीज़न ु आल क्नोव वेल ... तरुण की माँ बस दूर से hi सबको तरुण का हाल चल पूछते हुए देख रही थी पर अपने बेटे के सामने आने की हिम्मत वो नहीं जूता प् रही थी .... पर जैसा वो सोच रही थी उसके उलट तरुण के दिल में उसकी माँ के लिए जो भी रत्ती भर फीलिंग थी वो ख़त्म होने के तरफ तेज़ी से बढ़ रही थी ... उसने एक दो बार अपनी माँ की तिरछी नजर खुद पर महसूस की पर उसका ऐसा करना उसके गुस्से को और बढ़ा रहा था ....
तरुण (मन में) : ये कैसी माँ है ... इसने बचपन से मुझे ढेले भर का भी प्यार नहीं दिया .... बचपन से मुझ पर जुल्म ढाती रही वो अलग ... अभी जब इसको पता चला है की मैं जिंदगी और मौत के बीच लड़ कर आया हु फिर भी एक बार भी मुझे एक hi hello तक नहीं किया ... क्या ये सच में मेरी hi माँ है या मुझे कही फुटपाथ से उठा कर लाया गया है .... मैंने तो सुना है की एक माँ अपने बच्चो के लिए खुद की जान देने से भी हिचकती पर इन्हे तो अगर कोई कहे की मुझे मार दो तो ये रत्ती भर भी इंतजार नहीं करेगी ... उपरवाले मेरी तुझसे सिर्फ एक दुआ है की किसी को ऐसी माँ न देना जिसे माँ शब्द का मतलब तक नहीं मालूम ...
उस दिन और कुछ खास नहीं होता है ... तरुण भी सफर का थका हरा था इसलिए वो जल्दी hi डिनर करके सो गया ...
अगले दिन इवनिंग को तरुण अपने रूम में बैठा बोर हो रहा था की तभी उसके रूम में रुचिका आती है ...
रुचिका : क्या कर रहे हो भाई ....
तरुण : कुछ नहीं दी बस ऐसे hi बोर हो रहा था रूम में बैठा बैठा ....
रुचिका : मैं और प्रियांशी फलो के बगीचे जाने की सोच रहे हैं ... अगर तुम चाहो तो हमें ज्वाइन कर सकते हो .... ऐसे में तुम्हारी बोरियत भी दूर हो जाएगी और बगीचे भी देख लोगे .... तुम्हारे साथ होने से हमें किसी से परमिशन लेने की जरुरत भी नहीं पड़ेगी ...
तरुण : ये ाचा आईडिया है दीदी ... पर हम लोग जायेंगे कैसे ....
रुचिका : एक जीप है उससे hi जायेंगे और क्या ..... बगीचा यहाँ से काफी दूर है... वैसे आज मौसम भी बड़ा ाचा है मज़ा आएगा ...
तरुण : ठीक है दीदी आप लोग भी रेडी हो जाओ ... मैं तैयार हो कर आता हु ...
उसके बाद तीनो भाई बहन निकल पड़ते हैं बगीचे की सैर करने ... तरुण ने अभी एक ट्रॉउज़र और टी - शर्ट डाला हु था जबकि रुचिका और प्रियांशी ने अभी सलवार सूट डाला हुआ था ... वैसे तो तरुण की साडी बहने hi खूबसूरत थी पर प्रियांशी की बात hi कुछ और थी उसके तीखे नैन नक्शा और उसका नटखट स्वाभाव उसको ज्यादा अट्रैक्टिव बनता था .... पर तरुण के साथ टूर पर हुए हादसे के बाद से वो तरुण के सामने बिलकुल शांत सी रहने लगी थी .... आज भी वो दोनों के साथ तो चल रही थी पर कही खोयी खोयी सी थी ....
जीप रुचिका ड्राइव कर रही थी और तरुण उसके बगल वाले सीट पर था ... जबकि प्रियांशी पीछे वाले सीट पर बैठी हुयी थी ....
रुचिका बड़े प्यार से अपने भाई को गाँव के बारे में बताती जा रही थी .... उनका गाँव एक नदी के किनारे बसा हुआ था .... उन्हें बगीचे में जाने के लिए नदी के दूसरे साइड जाना होता था ...
तरुण : दीदी नदी में तो पानी का फ्लो काफी ाचा है यहाँ तो नहाने में काफी मज़ा आएगा ....
रुचिका : हाँ है तो पर क्या फायदा न हमें यहाँ नहाने की परमिशन होती है न hi हमें तैरना आता है ...
थोड़े देर में hi वो लोग फलो के बगीचे में थे .... बगीचे में amrud,aam,kele और भी बहुत सरे फलो के पेड़ लगे हुए थे ... बगीचे की देख भल के लिए उन्होंने एक गार्ड को भी रखा हुआ था ... प्रियांशी और रुचिका को देखते hi वो गार्ड पहचान जाता है क्यूंकि वो पहले भी कभी कभी अपने दादा के साथ भी वह आया करती थी ...
उन्होंने गाडी एक दिसे में लगा कर कीस गार्ड को दे दी ....
रुचिका : मोहन अंकल अभी कौन कौन से फल खाने लायक होंगे अंदर ....
गार्ड : मैडम ... अभी तो आम का टाइम है और लीची भी तैयार है .... अमरुद भी खा सकते हैं आप ... वैसे आपके साथ ये साहब कौन हैं पहले इन्हे कभी नहीं देखा यहाँ ....
रुचिका : मेरा छोटा भाई है सहर गया था पढ़ाई करने कुछ दिन पहले hi यहाँ आया है ....
गार्ड : नमस्ते साहब ...
तरुण : नमस्ते अंकल ... मेरा नाम तरुण है ... आप मुझे नाम से hi बुलाया करो ...
उसके बाद तीनो अंदर जाते हैं ...
रुचिका : क्यों प्रिय तुझे क्या हुआ ये ऐसे maun-vrat क्यों धारण किये हुए है ....
प्रियांशी : कुछ नहीं बस ऐसे hi .... ुम लोग आपस में बात कर hi रहे हो तो मैं क्यों बीच में आऊं ...
तरुण : दीदी इस पेड़ में आहूत अचे फल लगे हैं .... पर मुझे तो पेड़ पर चढ़ना भी नहीं आता ...
रुचिका : पेड़ पर चढ़ना तो मुझे भी नहीं आता और फल भी इतने ऊँचे लगे हैं की शायद hi तेरा हाथ पहुँच पाए ....
तरुण : तब तो दीदी एक hi आईडिया है किसी डंडे के सहारे तोडा जाये या पत्थर मार कर .... पर इतना बड़ा डंडा तो कही दिख नहीं रहा और पत्थर फेंकने से चोट भी तो लग सकती है ...
रुचिका : एक आईडिया है तू मुझे या प्रियांशी को अपने कंधे पर उठा ले .... वैसे उठा तो लेगा न तू हमें ....
तरुण : आप भी क्या बात करती हो दीदी आप तो देखने से hi किसी फूल जैसी हलकी प्रतीत होती हो आपको तो मैं अपने बाये हाथ से hi उठा लूंगा ....
रुचिका : इतनी भी हलकी नहीं हु मैं .... मेरा वजन 58 कग है ....
तरुण : बस इतना hi वजन इतना वजन तो मैं अपने दोनों कंधो पर रख कर एक किलोमीटर तक चल सकता हु और आप बस उठाने की बात करती है ...
रुचिका : मेरे से ाचा तू प्रियांशी को उठा ले वो बस 44 कग की hi है ....
तरुण एक बार प्रियांशी को देखता है तो खुद की तरफ तरुण की नजर प् कर प्रियांशी का चेहरा जो अब तक किसी किसी मुरझाये हुए फूल की तरह दिख रहा था वो ताज़े फूल की तरह खिल उठता है ....
प्रियांशी (मन में) : काश तरुण मुझे उठा ले तो मज़ा आ जाये .... काम से काम इसी बहाने मुझे छू तो लेगा .... कितना प्यारा है मेरा भाई .... ैनवाय hi सब इससे नफरत करते हैं ... इसकी एक एक हसी पर मैं कुर्बान जॉन ... रूचि के साथ ये कितने प्यार से पेश आता है पर गलती भी तो मेरी hi थी कोई ऐसे प्यारे से भाई से नफरत कैसे कर सकता है .... प्लीज प्लीज मुझे उठा ले न ... मैं जल्दी से हमारे बीच आयी हुयी नफरत की ये दिवार गिरा कर तुम्हे प्यार से गले लगा कर एक भाई का वो टच महसूस करना चाहती हु जिससे आज तक मुझे मेरे घरवालों ने मरहूम रखा है ....
रुचिका : अब बस देखता hi रहेगा या रात ढलने का इंतजार करेगा ....
तरुण झुक कर बैठ जाता है ...
तरुण : दीदी अब चढ़ मेरे कंधे पर और जल्दी से कुछ फल तोड़ लो ....
रुचिका भी जल्दी से जल्दी प्रियांशी और तरुण का पैच उप करना चाहती थी क्यूंकि उसने प्रियांशी की आँखों में भी तरुण के लिए वही प्यार और ममता महसूस की थी जो उसकी दिल में तरुण के लिए था ... थी तो दोनों जुड़वाँ बहने hi और वर्षो के साथ ने उन्हें एक दूसरे के दिल का हर हाल जानना सीखा दिया था ....
रुचिका : चलो प्रियांशी चढ़ जाओ घोड़ी पर ....
प्रियांशी : p...pa..par मैं कैसे ...
प्रियांशी की जुबान उसके मन के बिलकुल उलट बोल रहा था जबकि वो जल्द से जल्द इस ओप्पोर्तुनिटी को भुना लेना चाहती थी ...
तरुण प्रियांशी की तरफ देख एक बार सहमति में सर हिला देता है ये देख प्रियांशी को इतनी ख़ुशी मिलती है मनो उसको जन्नत hi मिल गयी हो ...
वो जल्दी से अपने स्लिपर उतर कर तरुण के सर पर हाथ रख कर उसके कंधो पर धीरे धीरे बैठ रही थी मनो वो अपने प्यारे से घोड़े की सैर करने जा रही हो उसको बिना कोई चोट पहुंचाए ... जब वो ठीक से बैठ जाती है तो तरुण उसके दोनों पाओ को पकड़ कर बैलेंस बना कर खड़ा होने लगता है ... तरुण के हाथ को अपने पाओ पर महसूस होते hi प्रियांशी के पुरे जिस्म में एक तेज़ सो सिहरन दौड़ जाती है ...
प्रियांशी ने एक एक करके 7 - 8 आम तोड़ लिए उसके बाद तरुण उसको आराम से उतर देता है ... अब तीनो मिल कर तोड़े हुए आम को खाने लगते हैं ...
तरुण : वाओ दीदी मज़ा आ गया .... ऐसे पैर से पके हुए आम शायद पहली बार खा रहा हु ... कितना मज़ा आ रहा है ...
रुचिका : हम तो अक्सर पेड़ के पके आम hi कहते हैं पर आज के आम में कुछ खास बात है ये बड़े टेस्टी और मीठे हैं .... शायद इसमें तुम्हारे और प्रियांशी के साथ की वजह से स्वाद बढ़ गया है ...
प्रियांशी (साद सा फेस बनाते हुए) : हम अब भी कहा साथ हैं ... वो तो तुम्हारे वजह से तरुण ने मुझे उठाया वर्ण ये तो अब भी मुझसे नाराज है ... पहले घर के बड़ो की वजह से हम अलग रहे ... जब ये वापिस लौटा तब तक हमारे घर वालो में हमारे मन में जितना ज़हर घोला था उसके वजह से हम न मिल पाए और अब ये मुझसे नाराज चल रहा ... अब क्या पता साडी जिंदगी हम ऐसे hi एक दूसरे से दूर रहेंगे ... तू खुसनसीब है रूचि की तुझे अब इसका प्यार और स्नेह तो नसीब हो रहा है ... पता नहीं कब हम दोनों के बीच आयी हुयी ये दूरिया मिटेगी ... ी ऍम रियली वैरी वैरी सॉरी तरुण .... मैंने आज तक जाने अनजाने में तुम्हारे साथ जो भी गलत किया है हो सके तो उसके लिए मुझे माफ़ कर दो ... मैं ये प्रॉमिस करती हु की अगर तुम मुझे माफ़ कर दो तो मैं तुम्हे मेरी तरफ से कभी भी शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा ....
रुचिका : देखो भाई मैं तुमसे जबरदस्ती तो नहीं कर सकती पर इतना जरूर कहूँगी की तुम्हे एक बार प्रियांशी को एक मौका जरूर देना चाहिए ... अगर वो तुम्हारे टेस्ट में सफल होती है तो तुम्हे एक प्यारी सी बहन और मिल जाएगी जो तुमसे बेइंतेहा प्यार करती हो .... मन की हमारा जिस्म अलग है हमारा नेचर अलग है पर हमारा दिल एक सा hi है ....
अब दोनों बहने तरुण के चेहरे की तरफ बड़े गौर से देख रही थी ... वही तरुण के चेहरे पर तरह तरह के भाव आ रहे थे और चले जा रहे थे वो डीडे नहीं कर प् रहा था की उसको प्रियांशी को माफ़ करना चाहिए या नहीं ...
दिया अपने सीट को अपने पहले के पहने हुए कपडे से साफ़ करती है और फिर दोनों तरुण के सीट पर किसिंग करते हुए आराम से सो जाते हैं ....
आगे
4 बजे के करीब किसी के नॉक करने से तरुण की नींद खुलती है .... तरुण गेट खोलता है तो पता है की एक हॉट सी दिखने वाली लेडी एक लड़की के साथ कड़ी थी ....
लेडी : जी मेरा भी सीट है इसमें दोनों उप्पर बर्थ ....
तरुण : सॉरी वो जरा हम सो गए थे इसलिए गेट लॉक कर लिया था ....
लेडी : कोई नहीं ... हम अभी जस्ट hi आये हैं ...
तरुण उनके लगेज को अंदर करने में मदद कर देता है .... दिया अब भी गहरी नींद में सोई हुयी थी इसलिए तरुण उसके सीट पर बैठ जाता है ....
लेडी : मेरा उप्पेर बर्थ है ... क्या मैं आपके साथ बैठ सकती हु ... अभी मुझे नींद नहीं आ रही .... बेटी तुम चाहो तो ऊपर जाकर सो सकती हो ....
लड़की : हाँ मुम्मा आज मेरी नींद भी पूरी नहीं हुयी है मैं तो चली सोने ....
वो लड़की अपने बर्थ पर चढ़ कर सो जाती है .... वो लेडी तरुण से सात कर बैठ जाती है ... लेडी ने रेड कलर का एक सूट पहनी हुयी थी जिसका गाला थोड़ा डीप कटा हुआ था जिससे उसके क्लीवेज की जो झलक मिल रही थी वो काफी कामुक थी .... बैठते वक्त उसने अपनी चुन्नी भी हटा ली थी जिससे उसके बड़े बड़े बोबे उछाल कर बहार आने को तरस रहे थे .....
तरुण की आँखें भी कभी कभी उस लेडी की तरफ चली जा रही थी जिसे वो भी नोटिस कर रही थी पर वो तरुण के ऐसे खुद के जिस को देखता पाकर और खुस हो रही थी ....
लेडी : वैसे मेरा नाम शहनाज़ है और ये मेरी बेटी आयशा है ... हम एक शादी अटेंड करने जा रहे हैं .... इसके अब्बू को छूती नहीं थी तो बस हम दोनों माँ बेटी hi निकल लिए ....
तरुण : नीस ... मेरा नाम तरुण है और ये बगल की सीट पर जो सोई हुयी है मेरी दीदी है दिया ....
शहनाज़ : आपको पक्का न नींद नहीं आ रही ....
तरुण : नहीं मेरी नींद पूरी हो चुकी है ....
तरुण बात तो शहनाज़ से कर रहा था पर उसका ध्यान बार बार उसके हाहाकारी मम्मो पर चली जा रही थी .... अभी कुछ दिनों पहले से hi उसने औरतो के इस कामुक अंग का नजारा लेना सुरु किया था ... शहनाज़ के मम्मो का साइज उसके तरुण 2.0 अवतार बनने के बाद का सबसे बड़ा मां था इसलिए वो कौतुहल वस् उसके तरफ खिंचा चला जा रहा था ....
शहनाज़ (नॉटी स्माइल के साथ) : अचे हैं न ....
तरुण : जी क्या ...
शहनाज़ : वही जो आप देखने की कोसिस कर रहे हैं .... वैसे मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है .... अगर आप चाहे तो अचे से भी दिखा सकती हु ....
तरुण : सॉरी ... वो गलती से मेरी नजर वह चली गयी ....
शहनाज़ : अरे बाबा घबराने की जरुरत नहीं है .... इसके अब्बू तो अब मुझे भाव नहीं देते ... आज एक क्यूट सा बाँदा मुझे ताड़ रहा है तो मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है ... वैसे भी अब इस उम्र में ये सब नहीं देखोगे तो क्या बुढ़ापे में देखोगे ....
तरुण को एक हॉट सी लेडी का ये खुले ऍम प्रपोजल देने का अंदाज़ बहुत पसंद आता है वैसे भी कहा जाता न है की जब शेर के मुँह खून लग जाता है तो उसकी नजर सिर्फ खून या अपने शिकार पर hi होती है .... वैसे hi तरुण को जब श्रेया और दिया जैसी कमसिन कलियों का स्वाद लग चूका था तो वो एक मातुरे औरत के साथ भी हलकी फुलकी मस्ती कर लेना चाहता था ....
तरुण : पर आप यहाँ कैसे ....
शहनाज़ : यानि की तुम रेडी हो ....
तरुण : जब आप रेडी हो तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है ....
शहनाज़ : चलो ....
वो उठ कर गेट खोलती है और तरुण को अपने पीछे आने का इशारा करती है .... तरुण भी सावधानी से बहार आ कर गेट को बहार से लॉक कर देता है .... शहनाज़ एक वाशरूम में घुस जाती है और तरुण को अपने पीछे आने का इशारा करती है ...
तरुण जैसे hi अंदर घुसता है शहनाज़ गेट को लॉक करती है और किसी भूखी बिल्ली की तरह उसके ऊपर टूट पड़ती है .... पहले तो छोटा सा किश का दौर चलता है उसके बाद शहनाज़ जाली से अपना सूट निकल कर अपने बड़े बड़े चूचियों को आज़ाद कर देती है ... तरुण पहली बार इतनी बड़ी चुकी देख रहा था इसलिए उसके मुँह में पानी आ गया ....
शहनाज़ : अब बस देखते hi रहोगे या अपनी ख्वाहिस भी पूरी करोगे ....
तरुण किसी भूखे बच्चे की तरह उसके चूचियों पर टूट पड़ता है कभी वो उसके चुकियो को मसल रहा था तो कभी चूस ले रहा था ....
शहनाज़ के इरादे तो काफी कुछ करने का था इसलिए उसने जल्दी से अपनी पजामी का नाडा खोल दिया और झुक कर तरुण को पीछे से अपना लुंड डालने को कहा .... तरुण तो था अनादि पर उसने भी काफी पोर्न फिल्मे देख रही थी जो उसके काम आने वाली थी .....
शहनाज़ : रुको हैंडसम मुझे जरा तुम्हारे हलब्बी ुण्ड को प्यार तो कर लेने दो ....
वो अपने मुँह से धृ सारा थूक निकल कर तरुण के लुंड को अचे से गीला कर देती है ....
शहनाज़ : बस आ जाओ मेरे राजा अब न तरसाओ ...
तरुण जल्दी से शहनाज़ के छूट पर लुंड सेट करके एक धक्का मरता है लुंड आराम से सरकता हुआ आधा से ज्यादा अंदर तक घुस जाता है ... दूसरे धक्के में शेनाज की बड़ी सी गहरी छूट उसका पूरा लुंड निगल लेती है हलाकि उसको दूसरे धक्के में काफी तकलीफ हुयी थी पर वो इस मस्ती के आगे अपना वो दर्द भूल जाती है ... अब तरुण ने ताबड़तोड़ धक्के लगाने सुरु कर दिए ....
शहनाज़ की बड़ी बड़ी गांड को थम कर जब वो धक्के लगाए जा रहा था तो अचानक से उसको घर से वापसी की आखिरी रात याद आ जाती है जब उसने घर पर रात को अपने दादा जी को अपनी hi बहु को छोड़ते हुए देखा था .... वो याद कर न जाने क्यों वो और भी जोर जोर से शहनाज़ को छोड़ने लगता है .....
धक्काम पेल का ये सिलसिला करीब 10 -15 मिनट तक चलता है और तरुण शहनाज़ की छूट में hi खली हो जाता है ....
शहनाज़ पहले तो अपनी छूट को अचे से धोती है फिर तरुण के लुंड को चूस कर साफ़ करने के बाद उसको भी अचे से धो देती है ... अब दोनों जल्दी जल्दी अपने कपडे पहन लेते हैं ...
शहनाज़ : वाओ ... यार तुम तो सच्चे मर्द निकले ... तुम्हारे साथ छोड़ने के बाद तबियत मस्त हो गयी ....
तरुण : मेरी लाइफ का ये फर्स्ट सेक्स था .... मुझे भी बहुत ाचा लगा आपके साथ ये सब करके ...
उसके बाद शहनाज़ आखिरी बार तरुण के होंठो पर एक छोटा सा किश देकर वापस अपने कम्पार्टमेंट में आ जाती है थोड़ी देर बाद तरुण भी आ जाता है ....
उसके बाद कुछ खास नहीं होता शहनाज़ दोपहर को अपने स्टेशन पर उतर कर चली जाती है और तरुण का स्टेशन भी आख़िरकार इवनिंग तक आ hi जाता है और दोनों भाई बहन चल देते हैं दिया के घर की तरफ एक यादगार ट्रैन जर्नी की याद अपने दिल में संजोये ....
दिया के मम्मी पापा और कारन तरुण को सही सलामत देख काफी खुस होते हैं ....
उसके बाद तरुण अपने घर की तरफ लौट जाता है और दिया अपने ससुराल आ जाती है एक नयी लाइफ की शुरुआत करने ....
तरुण के चेहरे पर घर लौटने के वक्त मिले जुले भाव थे .... उसने अपने मन में थान लिया था की भी अब ेंट(
वो जब घर में एंटर करता है तो सबसे पहले उसका सामना उसकी भाभी शिवानी से होता है ... शिवानी उससे बड़े प्यार से हाल चल पूछती है जिसका जवाब तरुण उतने hi प्यार से देता है ....
उसको किचन में उसकी माँ और रानी दिखती है जिन्हे इग्नोर करके वो सीढ़ियों से होता हुआ अपने रूम आ जाता है ....
थोड़े hi देर में ruchika,ruby और प्रियांशी उसके रूम में आती है .... जहा रुचिका और रूबी को अपने रूम में देख तरुण का चेहरा फूल की तरह खिल उठता है वही प्रियांशी को देख उसने एक फीकी सी स्माइल पास की .... अब वो तो थी तरुण से बड़ी hi तो तरुण ने तीनो के पाओ छू लिए ....
रुचिका : कैसा है बाबू दिखा तो कहा पर गोली लगी थी तुझे ....
तरुण : पर दीदी अभी कैसे आप लोगो के सामने ...
रूबी उसकी बात समझ जाती है ....
रूबी : अरे पगलू तू हमारा छोटा भाई है अब हमारे सामने hi इतना सरमायेगा तो कैसे चलेगा .... जब से हमने ये सब सुना हमारी तो जान hi निकल गयी ....
तरुण अपनी टी शर्ट खोल कर पीछे मुद जाता है .... तीनो बहने तरुण के पीठ पर गोलियों के दो नीसाण देख काफी घबरा जाती है ...
रुचिका : बाप रे बाप कैसे इतना सह तूने भाई ... मेरी तो ये सब देख के hi बुरी हालत हो गयी ...
तरुण : छोडो न दीदी वो बस बुरा वक्त था गुजर गया ....अब तो आप लोग के सामने सही सलामत खड़ा हु न .... समझो आप लोगो की दुआ की वजह से hi बच पाया हु .... रूचि दीदी प्लीज अगली बार से मेरे रूम में उन लोगो को मत आने देना जो बस झूटी सिम्पथी जताने का बहाना कर के यहाँ आये हो ...
रुचिका समझ जाती है की तरुण प्रियांशी की बात कर रहा है ... प्रियांशी को भी ये समझ आ जाता है की ये शब्द उसके लिए hi कहे थे ....
प्रियांशी की आँखों में आंशू आ जाते हैं और वो तरुण के रूम से रोटी हुयी भाग जाती है ...
रुचिका तरुण को उस रात की साडी बात बताती है जिसमे प्रियांशी ने उसको फुल सपोर्ट किया था और ये भी बताया की कैसे वो हमेसा उसकी फिक्र किया करती थी तरुण के शादी में जाने के बाद से ....
तरुण रिया और रुचिका के सामने तो कुछ नहीं कहता पर उसके दिल में अब भी प्रियांशी को माफ़ करने का ख्याल अभी तो नहीं आया था ....
अभी ये दोनों बहने तरुण के रूम से निक्की hi थी की तरुण की बुआ और उसकी बड़ी चची उसके रूम में आ जाती है और उसका हाल चल पूछने लगती है ... तरुण ने अपने जख्म के नीसाण उन्हें भी दिखा दिए ....
डिनर तक लगभग सभी ने तरुण से उसके बारे में पूछ लिया था सिवाए उसकी म. चची, Richa,Rahul और रानी के ... रीज़न ु आल क्नोव वेल ... तरुण की माँ बस दूर से hi सबको तरुण का हाल चल पूछते हुए देख रही थी पर अपने बेटे के सामने आने की हिम्मत वो नहीं जूता प् रही थी .... पर जैसा वो सोच रही थी उसके उलट तरुण के दिल में उसकी माँ के लिए जो भी रत्ती भर फीलिंग थी वो ख़त्म होने के तरफ तेज़ी से बढ़ रही थी ... उसने एक दो बार अपनी माँ की तिरछी नजर खुद पर महसूस की पर उसका ऐसा करना उसके गुस्से को और बढ़ा रहा था ....
तरुण (मन में) : ये कैसी माँ है ... इसने बचपन से मुझे ढेले भर का भी प्यार नहीं दिया .... बचपन से मुझ पर जुल्म ढाती रही वो अलग ... अभी जब इसको पता चला है की मैं जिंदगी और मौत के बीच लड़ कर आया हु फिर भी एक बार भी मुझे एक hi hello तक नहीं किया ... क्या ये सच में मेरी hi माँ है या मुझे कही फुटपाथ से उठा कर लाया गया है .... मैंने तो सुना है की एक माँ अपने बच्चो के लिए खुद की जान देने से भी हिचकती पर इन्हे तो अगर कोई कहे की मुझे मार दो तो ये रत्ती भर भी इंतजार नहीं करेगी ... उपरवाले मेरी तुझसे सिर्फ एक दुआ है की किसी को ऐसी माँ न देना जिसे माँ शब्द का मतलब तक नहीं मालूम ...
उस दिन और कुछ खास नहीं होता है ... तरुण भी सफर का थका हरा था इसलिए वो जल्दी hi डिनर करके सो गया ...
अगले दिन इवनिंग को तरुण अपने रूम में बैठा बोर हो रहा था की तभी उसके रूम में रुचिका आती है ...
रुचिका : क्या कर रहे हो भाई ....
तरुण : कुछ नहीं दी बस ऐसे hi बोर हो रहा था रूम में बैठा बैठा ....
रुचिका : मैं और प्रियांशी फलो के बगीचे जाने की सोच रहे हैं ... अगर तुम चाहो तो हमें ज्वाइन कर सकते हो .... ऐसे में तुम्हारी बोरियत भी दूर हो जाएगी और बगीचे भी देख लोगे .... तुम्हारे साथ होने से हमें किसी से परमिशन लेने की जरुरत भी नहीं पड़ेगी ...
तरुण : ये ाचा आईडिया है दीदी ... पर हम लोग जायेंगे कैसे ....
रुचिका : एक जीप है उससे hi जायेंगे और क्या ..... बगीचा यहाँ से काफी दूर है... वैसे आज मौसम भी बड़ा ाचा है मज़ा आएगा ...
तरुण : ठीक है दीदी आप लोग भी रेडी हो जाओ ... मैं तैयार हो कर आता हु ...
उसके बाद तीनो भाई बहन निकल पड़ते हैं बगीचे की सैर करने ... तरुण ने अभी एक ट्रॉउज़र और टी - शर्ट डाला हु था जबकि रुचिका और प्रियांशी ने अभी सलवार सूट डाला हुआ था ... वैसे तो तरुण की साडी बहने hi खूबसूरत थी पर प्रियांशी की बात hi कुछ और थी उसके तीखे नैन नक्शा और उसका नटखट स्वाभाव उसको ज्यादा अट्रैक्टिव बनता था .... पर तरुण के साथ टूर पर हुए हादसे के बाद से वो तरुण के सामने बिलकुल शांत सी रहने लगी थी .... आज भी वो दोनों के साथ तो चल रही थी पर कही खोयी खोयी सी थी ....
जीप रुचिका ड्राइव कर रही थी और तरुण उसके बगल वाले सीट पर था ... जबकि प्रियांशी पीछे वाले सीट पर बैठी हुयी थी ....
रुचिका बड़े प्यार से अपने भाई को गाँव के बारे में बताती जा रही थी .... उनका गाँव एक नदी के किनारे बसा हुआ था .... उन्हें बगीचे में जाने के लिए नदी के दूसरे साइड जाना होता था ...
तरुण : दीदी नदी में तो पानी का फ्लो काफी ाचा है यहाँ तो नहाने में काफी मज़ा आएगा ....
रुचिका : हाँ है तो पर क्या फायदा न हमें यहाँ नहाने की परमिशन होती है न hi हमें तैरना आता है ...
थोड़े देर में hi वो लोग फलो के बगीचे में थे .... बगीचे में amrud,aam,kele और भी बहुत सरे फलो के पेड़ लगे हुए थे ... बगीचे की देख भल के लिए उन्होंने एक गार्ड को भी रखा हुआ था ... प्रियांशी और रुचिका को देखते hi वो गार्ड पहचान जाता है क्यूंकि वो पहले भी कभी कभी अपने दादा के साथ भी वह आया करती थी ...
उन्होंने गाडी एक दिसे में लगा कर कीस गार्ड को दे दी ....
रुचिका : मोहन अंकल अभी कौन कौन से फल खाने लायक होंगे अंदर ....
गार्ड : मैडम ... अभी तो आम का टाइम है और लीची भी तैयार है .... अमरुद भी खा सकते हैं आप ... वैसे आपके साथ ये साहब कौन हैं पहले इन्हे कभी नहीं देखा यहाँ ....
रुचिका : मेरा छोटा भाई है सहर गया था पढ़ाई करने कुछ दिन पहले hi यहाँ आया है ....
गार्ड : नमस्ते साहब ...
तरुण : नमस्ते अंकल ... मेरा नाम तरुण है ... आप मुझे नाम से hi बुलाया करो ...
उसके बाद तीनो अंदर जाते हैं ...
रुचिका : क्यों प्रिय तुझे क्या हुआ ये ऐसे maun-vrat क्यों धारण किये हुए है ....
प्रियांशी : कुछ नहीं बस ऐसे hi .... ुम लोग आपस में बात कर hi रहे हो तो मैं क्यों बीच में आऊं ...
तरुण : दीदी इस पेड़ में आहूत अचे फल लगे हैं .... पर मुझे तो पेड़ पर चढ़ना भी नहीं आता ...
रुचिका : पेड़ पर चढ़ना तो मुझे भी नहीं आता और फल भी इतने ऊँचे लगे हैं की शायद hi तेरा हाथ पहुँच पाए ....
तरुण : तब तो दीदी एक hi आईडिया है किसी डंडे के सहारे तोडा जाये या पत्थर मार कर .... पर इतना बड़ा डंडा तो कही दिख नहीं रहा और पत्थर फेंकने से चोट भी तो लग सकती है ...
रुचिका : एक आईडिया है तू मुझे या प्रियांशी को अपने कंधे पर उठा ले .... वैसे उठा तो लेगा न तू हमें ....
तरुण : आप भी क्या बात करती हो दीदी आप तो देखने से hi किसी फूल जैसी हलकी प्रतीत होती हो आपको तो मैं अपने बाये हाथ से hi उठा लूंगा ....
रुचिका : इतनी भी हलकी नहीं हु मैं .... मेरा वजन 58 कग है ....
तरुण : बस इतना hi वजन इतना वजन तो मैं अपने दोनों कंधो पर रख कर एक किलोमीटर तक चल सकता हु और आप बस उठाने की बात करती है ...
रुचिका : मेरे से ाचा तू प्रियांशी को उठा ले वो बस 44 कग की hi है ....
तरुण एक बार प्रियांशी को देखता है तो खुद की तरफ तरुण की नजर प् कर प्रियांशी का चेहरा जो अब तक किसी किसी मुरझाये हुए फूल की तरह दिख रहा था वो ताज़े फूल की तरह खिल उठता है ....
प्रियांशी (मन में) : काश तरुण मुझे उठा ले तो मज़ा आ जाये .... काम से काम इसी बहाने मुझे छू तो लेगा .... कितना प्यारा है मेरा भाई .... ैनवाय hi सब इससे नफरत करते हैं ... इसकी एक एक हसी पर मैं कुर्बान जॉन ... रूचि के साथ ये कितने प्यार से पेश आता है पर गलती भी तो मेरी hi थी कोई ऐसे प्यारे से भाई से नफरत कैसे कर सकता है .... प्लीज प्लीज मुझे उठा ले न ... मैं जल्दी से हमारे बीच आयी हुयी नफरत की ये दिवार गिरा कर तुम्हे प्यार से गले लगा कर एक भाई का वो टच महसूस करना चाहती हु जिससे आज तक मुझे मेरे घरवालों ने मरहूम रखा है ....
रुचिका : अब बस देखता hi रहेगा या रात ढलने का इंतजार करेगा ....
तरुण झुक कर बैठ जाता है ...
तरुण : दीदी अब चढ़ मेरे कंधे पर और जल्दी से कुछ फल तोड़ लो ....
रुचिका भी जल्दी से जल्दी प्रियांशी और तरुण का पैच उप करना चाहती थी क्यूंकि उसने प्रियांशी की आँखों में भी तरुण के लिए वही प्यार और ममता महसूस की थी जो उसकी दिल में तरुण के लिए था ... थी तो दोनों जुड़वाँ बहने hi और वर्षो के साथ ने उन्हें एक दूसरे के दिल का हर हाल जानना सीखा दिया था ....
रुचिका : चलो प्रियांशी चढ़ जाओ घोड़ी पर ....
प्रियांशी : p...pa..par मैं कैसे ...
प्रियांशी की जुबान उसके मन के बिलकुल उलट बोल रहा था जबकि वो जल्द से जल्द इस ओप्पोर्तुनिटी को भुना लेना चाहती थी ...
तरुण प्रियांशी की तरफ देख एक बार सहमति में सर हिला देता है ये देख प्रियांशी को इतनी ख़ुशी मिलती है मनो उसको जन्नत hi मिल गयी हो ...
वो जल्दी से अपने स्लिपर उतर कर तरुण के सर पर हाथ रख कर उसके कंधो पर धीरे धीरे बैठ रही थी मनो वो अपने प्यारे से घोड़े की सैर करने जा रही हो उसको बिना कोई चोट पहुंचाए ... जब वो ठीक से बैठ जाती है तो तरुण उसके दोनों पाओ को पकड़ कर बैलेंस बना कर खड़ा होने लगता है ... तरुण के हाथ को अपने पाओ पर महसूस होते hi प्रियांशी के पुरे जिस्म में एक तेज़ सो सिहरन दौड़ जाती है ...
प्रियांशी ने एक एक करके 7 - 8 आम तोड़ लिए उसके बाद तरुण उसको आराम से उतर देता है ... अब तीनो मिल कर तोड़े हुए आम को खाने लगते हैं ...
तरुण : वाओ दीदी मज़ा आ गया .... ऐसे पैर से पके हुए आम शायद पहली बार खा रहा हु ... कितना मज़ा आ रहा है ...
रुचिका : हम तो अक्सर पेड़ के पके आम hi कहते हैं पर आज के आम में कुछ खास बात है ये बड़े टेस्टी और मीठे हैं .... शायद इसमें तुम्हारे और प्रियांशी के साथ की वजह से स्वाद बढ़ गया है ...
प्रियांशी (साद सा फेस बनाते हुए) : हम अब भी कहा साथ हैं ... वो तो तुम्हारे वजह से तरुण ने मुझे उठाया वर्ण ये तो अब भी मुझसे नाराज है ... पहले घर के बड़ो की वजह से हम अलग रहे ... जब ये वापिस लौटा तब तक हमारे घर वालो में हमारे मन में जितना ज़हर घोला था उसके वजह से हम न मिल पाए और अब ये मुझसे नाराज चल रहा ... अब क्या पता साडी जिंदगी हम ऐसे hi एक दूसरे से दूर रहेंगे ... तू खुसनसीब है रूचि की तुझे अब इसका प्यार और स्नेह तो नसीब हो रहा है ... पता नहीं कब हम दोनों के बीच आयी हुयी ये दूरिया मिटेगी ... ी ऍम रियली वैरी वैरी सॉरी तरुण .... मैंने आज तक जाने अनजाने में तुम्हारे साथ जो भी गलत किया है हो सके तो उसके लिए मुझे माफ़ कर दो ... मैं ये प्रॉमिस करती हु की अगर तुम मुझे माफ़ कर दो तो मैं तुम्हे मेरी तरफ से कभी भी शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा ....
रुचिका : देखो भाई मैं तुमसे जबरदस्ती तो नहीं कर सकती पर इतना जरूर कहूँगी की तुम्हे एक बार प्रियांशी को एक मौका जरूर देना चाहिए ... अगर वो तुम्हारे टेस्ट में सफल होती है तो तुम्हे एक प्यारी सी बहन और मिल जाएगी जो तुमसे बेइंतेहा प्यार करती हो .... मन की हमारा जिस्म अलग है हमारा नेचर अलग है पर हमारा दिल एक सा hi है ....
अब दोनों बहने तरुण के चेहरे की तरफ बड़े गौर से देख रही थी ... वही तरुण के चेहरे पर तरह तरह के भाव आ रहे थे और चले जा रहे थे वो डीडे नहीं कर प् रहा था की उसको प्रियांशी को माफ़ करना चाहिए या नहीं ...