SAB KUCH JAYAZ HAI... - Page 12 - SexBaba
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SAB KUCH JAYAZ HAI...

सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 48


अभी सब लोग पुलिस वाले की बाते hi सुन रहे थे की तभी रचना का ध्यान कुसुम की तरफ गया. कुसुम अपनी जगह से गायब थी. पता नहीं कब वो उठ कर बाहर चली गयी थी और किसी को पता भी नहीं चल पाया था. ये देख कर रचना बुरी तरह घबरा गयी. उसने लगभग चीखते हुए माँ से कहा की कुसुम दीदी यहाँ नहीं हैं. रचना की इस बात से सब कोई दांग रह गया. तभी माँ ने कहा की उसे जहा जाना है जाने दो. मुझे उससे अब कोई मतलब नहीं है. उसी की वजह से मेरे बेटे की आज ये हालत हुयी है.

माँ की ये बाते सुन कर सब अवाक रह गए. कोई माँ अपनी बेटी के लिए ऐसा कैसे कह सकती थी.? दक्षिणा जल्दी से उठी और वेटिंग रूम के बाहर की तरफ तेज़ी से बढ़ चली. उसके पीछे पुलिस वाला भी चल पड़ा था. उन दोनों ले जाते hi प्रिय भी तेज़ी से बाहर की तरफ बढ़ गयी थी. जबकि रचना और पूजा माँ के पास उनको सम्हालने के लिए बैठी रही.

अब आगे पढ़िए....


दक्षिणा, पुलिस वाला और प्रिय तीनो ने हॉस्पिटल में हर जगह देख लिया था मगर कुसुम का कही कोई पता न चला था. पुलिस वाले को एक कॉल आया था तो वो चला गया था और अब दक्षिणा और प्रिय hi कुसुम को हर जगह खोज रहे थे. पूरा हॉस्पिटल छान मारा मगर कुसुम इन दोनों को कही नज़र न आयी थी. गुज़रते पालो के साथ दोनों की hi हालत खराब हुयी जा रही थी. प्रिय को अच्छी तरह समझ आ चूका था की कुसुम दीदी इस तरह क्यों चली गयी थी.

विक्की की आज जो हालत हुयी थी उसके लिए हर कोई कुसुम को hi जिम्मेदार मान रहा था. इस बात को ज़ाहिर रूप से सिर्फ माँ ने hi कहा था मगर बाकियो के मन में भी यही था की विक्की की हालत की जिम्मेदार कुसुम hi है. कुसुम खुद भी इस बात के लिए खुद को जिम्मेदार मान रही थी जिसका उसे अब भारी दुःख था. जिसकी वजह से उसने सोचा होगा की वो अब इन लोगो से कही दूर चली जाएगी.

कुसुम अपने होशो हवाश में नहीं थी. उसके दिल और दिमाग में तूफ़ान चल रहा था. उसने जब देखा की सब पुलिस वाले की बाते सुनने में बिजी हैं तो वो चुप चाप वेटिंग रूम से निकल गयी थी. उसे खुद नहीं पता था की वो कहा जा रही थी. बस वो कही खोयी हुयी बढ़ती hi चली गयी थी. उसे खुद भी पता नहीं चला की वो कब हॉस्पिटल से बाहर आयी और एक तरफ को बढ़ती चली गयी थी. बाहर सड़क पर भारी वाहनों का आना जाना लगा था जिसकी आवाज़ों से फ़िज़ा में शोर हो रहा था.

इधर दक्षिणा और प्रिय को जब कुसुम हॉस्पिटल में कही न मिली तो वो दोनों भागते हुए हॉस्पिटल से बाहर आ गयी. सड़क के दोनों तरफ दोनों ने देखा मगर कही पर भी उन्हें कुसुम नज़र न आयी. ये देख कर दोनों बुरी तरह घबरा गयी. प्रिय तो रोने hi लगी थी मगर दक्षिणा ने समझदारी से काम लिया. उसने सबसे पहले प्रिय को शांत रहने को कहा और उसे अंदर माँ के पास ये कह कर भेज दिया की वो कुसुम को खोज कर ले आएगी.

प्रिय से तो दक्षिणा ने कह दिया था की वो कुसुम को खोज कर लाएगी मगर वो इस काम में कामयाब होगी की नहीं इसका उसे खुद भी पता नहीं था. उसे टाइम का अहसास था इस लिए वो राइट साइड की तरफ तेज़ी से बढ़ती चली गयी. वो फुटपाथ पर hi चल रही थी और आस पास देखती भी का रही थी मगर काफी दूर आ जाने के बाद भी जब उसे कुसुम न दिखी तो उसके मन में तरह तरह की शंकाये उभरने लगी. उसे कुसुम की बहुत ज़्यादा चिंता होने लगी. वो जानती थी की कुसुम इस शहर के बारे में कुछ भी नहीं जानती है. अगर उसके साथ कुछ उल्टा सीधा हो गया तो वो विक्की को और उसकी फॅमिली को क्या जवाब देगी.?

दक्षिणा काफी दूर आ गयी थी. उसकी खुद की हालत काफी खराब हो गयी थी पैदल चलते चलते. उसका जिस्म पसीना पसीना हो गया था. अचानक उसे ख़याल आया की हो सकता है की कुसुम लेफ्ट साइड वाले रास्ते की तरफ गयी हो. ये सोच कर वो रुक गयी और सड़क को क्रॉस करके उसने एक ऑटो वाले को आवाज़ दी. ऑटो में बैठ कर उसने ऑटो वाले से कहा की वो आगे की तरफ चले मगर इस तरह की उसे किसी को खोजने में आसानी हो. उसकी इस बात से ऑटो वाले ने पूछा की मैडम बात क्या है तो दक्षिणा ने उसे बताया की वो एक लड़की को खोज रही है.

ऑटो वाला भला आदमी था. उसे बात समझ में आ गयी थी इस लिए उसने बड़ी ईमानदारी से ऑटो को आगे बढ़ा दिया और खुद भी आस पास नज़र दौड़ने लगा. दक्षिणा दोनों तरफ की सड़क पर देखती जा रही थी. करीब पांच मिनट बाद अचानक दक्षिणा की नज़र उस पार सड़क के किनारे फुटपाथ पर धीरे धीरे चलती कुसुम पर पड़ी. कुसुम को देखते hi दक्षिणा ने राहत की सांस ली और उसने ऑटो ड्राइवर को भी दिखाया कुसुम को. उसके बाद उसने ऑटो वाले से कहा की वो जल्दी से आगे चल कर सड़क के उस पार चले.

दक्षिणा की बात सुन कर ऑटो वाले ने ऑटो को तेज़ी से आगे बढ़ाया. दोनों तरफ की सड़क के बीच में एक फुट की दिवार बानी हुयी थी. यू टर्न लेने के लिए जगह hi नहीं दिख रही थी. काफी दूर आने के बाद एक रेड लाइट नज़र आयी तो ऑटो ड्राइवर ने बड़ी सावधानी से यू टर्न लिया और सड़क के उस तरफ आ कर ऑटो को फिर से तेज़ी से बढ़ा दिया.

सामे कुछ hi दूरी पर रेड लाइट बत्ती थी और इस वक्त वो ग्रीन hi थी मगर जैसे hi ऑटो वाला वह तक पंहुचा तो लाइट रेड हो गयी. ये देख कर दक्षिणा के चेहरे पर परेशानी और बढ़ गयी. वो सामने की तरफ hi देख रही थी मगर कुसुम उसे दिख नहीं रही थी. सड़क आगे जा कर लेफ्ट साइड को थोड़ा सा घूम गयी थी इस लिए उसे कुसुम नहीं दिख रही थी. रेड लाइट का टाइमर 80 से नीचे काउंट हो रहा था और उसी के साथ दक्षिणा के दिल की धड़कने भी डाउन होती जा रही थी.

आखिर लाइट ग्रीन हुयी तो आगे के वाहन चल पड़े और उनके पीछे ऑटो वाले ने भी ऑटो को आगे बढ़ा दिया. आगे सड़क पर जैसे hi ऑटो घूमा तो दक्षिणा की नज़र दूर से hi कुसुम पर पड़ी. उसने ऑटो वाले को थोड़ा और तेज़ चलने को कहा. ऑटो वाला पहले से hi तेज़ चल रहा था अब और चलने लगा.

दक्षिणा की नज़र बराबर कुसुम पर थी. वो कही खोयी हुयी धीरे धीरे इसी तरफ आ रही थी. पीले रंग के शलवार शूट में थी वो और उसके गले में पीले रंग का hi दुपट्टा था जो की इस वक्त अस्त ब्यस्त दिख रहा था. अभी दक्षिणा कुसुम को देख hi रही थी की तभी एक सफ़ेद रंग की ओमनी कार कुसुम के पास रुकी और उससे दो लोग बाहर निकले. वो दोनों आदमी आस पास देखते हुए सीधा कुसुम के पास गए. ये देख कर दक्षिणा के दिमाग में खतरे की घंटी बजी. उसने ऑटो वाले को और स्पीड से चलने को कहा.

उधर वो दोनों आदमी कुसुम के पास पहुंच कर उसके आगे खड़े हो गए और कुसुम से कुछ कहा. उसके बाद एक ने कुसुम का हाथ पकड़ा और उसे ओमनी की तरफ लेन लगा जबकि दूसरा कुसुम के पीछे था. दक्षिणा के देखते hi देखते उस आदमी ने कुसुम को ओमनी में बैठाया और खुद भी उसके साथ बैठ गया. जबकि दूसरा आदमी आगे वाली शीट पर बैठ गया. ओमनी का दरवाज़ा बंद होते hi ओमनी आगे बढ़ चली. बड़ी हैरत की बात थी की कुसुम ने उन आदमियों के साथ जाने से बिलकुल भी विरोध नहीं किया था.

दक्षिणा फटी आँखों से ये नज़ारा देखती रह गयी. उसकी आँखों के सामने कुसुम को उन लोगो ने अपहरण कर लिया था. दक्षिणा पूरी ताकत से ऑटो वाले पर चीख पड़ी. ऑटो वाला उस ओमनी से थोड़ा hi पीछे रह गया था. दक्षिणा ने ऑटो वाले से कहा की वो उस कार के पीछे hi फुल स्पीड से चले. उसे समझ नहीं आ रहा था की अब वो क्या करे. अगर वो लोग कुसुम को ले कर उसकी आँखों से ओझल हो गए तो फिर कुसुम को वापस पाना बहुत मुश्किल हो जाना था.

ऑटो वाला फुल स्पीड में ऑटो को दौड़ा रहा था मगर आगे जा रही ओमनी कार हर पल उससे और दूर होती जा रही थी. दक्षिणा के दिमाग ने एकदम से काम किया. उसने उस ओमनी का नंबर याद कर लिया. उसे याद आया की उसके पास अपना मोबाइल है और वो 100 नंबर पर कॉल करके पुलिस को सब कुछ बता सकती है. दक्षिणा ने फटाफट अपने पर्श से मोबाइल निकला और 100no पर लगा दिया.

कॉल लगने के बाद दक्षिणा ने पुलिस वालो को सब कुछ बता दिया और कहा की जितना जल्दी हो सके वो उस ओमनी कार से मेरी बहन को निकाल कर बचा ले. दक्षिणा ने यही बताया की कुसुम उसकी बहन है. कॉल पर पुलिस ने दक्षिणा को आश्वस्त रहने को कहा और बोले की वो जल्द से जल्द एक्शन ले रहे हैं.

दक्षिणा ने पुलिस को लोकेशन और उस ओमनी कार का नंबर वगैरा बता दिया था. आगे जा रही ओमनी कार एक मोड़ पर मुद चुकी थी. सड़क पर और भी बहुत से वाहन थे जिनके बीच कभी कभी वो ओमनी कार छुप जाती थी मगर दक्षिणा उस पर बराबर नज़र रखे हुए थी और ऑटो वाले को उसके पीछे लगाए हुए थी.

करीब दस मिनट बाद दक्षिणा ने देखा की लेफ्ट साइड की तरफ से एक ट्रैफिक पुलिस की कार आयी और उस ओमनी कार के पीछे लग गयी. अभी दक्षिणा उस तरफ देख hi रही थी की तभी पीछे से एक पुलिस गाडी निकली. सामने एक और रेड लाइट दिखी और सरे वाहन रुकने लगे. वो ओमनी कार भी रुक गयी थी. वो आगे की तरफ थी उसके कुछ दूरी पर वो ट्रैफिक पुलिस की कार थी. जैसे hi सरे वाहन रुके तो दक्षिणा ने देखा की ट्रैफिक पुलिस वाली कार से दो पुलिस वाले बाहर निकले और उस ओमनी कार की तरफ तेज़ी से बढ़ चले. अभी वो कुछ hi दूरी पर गए थे की सिग्नल ग्रीन हो गया और आगे के वाहन चल पड़े. उन वाहनों के साथ वो ओमनी कार भी चल पड़ी. ये देख कर वो दोनों पुलिस वाले वापस पालते और पुलिस कार में बैठ कर फिर से ओमनी कार के पीछे लग गए.

आगे की तरफ क्लीन सड़क थी इस लिए ओमनी फुल स्पीड से आगे बढ़ गयी थी. पुलिस की दोनों गाड़िया साईरन बजती हुयी दूसरे वाहनों को ओवरटेक करते हुए आगे निकल गयी. इधर ऑटो में दक्षिणा भी पीछे लगी हुयी थी. दक्षिणा को अब वो ओमनी कार दिखाई नहीं दे रही थी बल्कि पुलिस की गाड़िया ज़रूर उसे दिख रही थी. दक्षिणा के दिल की धड़कने कभी अचानक से तेज़ हो जाती तो कभी एकदम से रुक सी जाती थी.

आगे काफी दूर आ कर एक और रेड लाइट बत्ती आयी. आगे के सभी वाहन रुक गए थे. दक्षिणा ने देखा की पुलिस की दोनों गाड़िया काफी आगे थी. उसे वो ओमनी कार अब भी नज़र न आयी थी मगर उसने ये ज़रूर देखा की पुलिस गाडी से दो तीन पुलिस वाले उतरे और आगे की तरफ बड़ी तेज़ी से दौड़ते हुए जा रहे थे. दक्षिणा को समझते देर न लगी की वो पुलिस वाले उस ओमनी कार के पास hi जा रहे थे. कुछ hi देर में दक्षिणा ने देखा की वो पुलिस वाले एक जगह रुके और उस जगह कुछ करने लगे. ये देख कर दक्षिणा भी ऑटो से उतर गयी. उसने ऑटो वाले से कहा की वो अपने पैसो की फ़िक्र न करे और ऑटो को आगे ले जा कर साइड पर लगा ले.

ऑटो वाला भला आदमी था उसने कुछ नहीं कहा. दक्षिणा वाहनों के बीच से भागते हुए उन पुलिस वालो की तरफ बढ़ती चली गयी. कुछ hi पालो में उसे वो ओमनी कार दिखने लगी. दक्षिणा का पसीने से बुरा हाल था मगर वो खुद की कोई परवाह नहीं कर रही थी. उधर वो पुलिस वाले उस ओमनी कार के करीब पहुंच चुके थे. पुलिस वालो में से एक आगे की तरफ ड्राइवर के पास गया और हाथ दाल कर कार के इग्निशन से चाभी निकाल ली. तब तक पीछे से कुछ और पुलिस वाले भागते हुए आ गए थे.

दक्षिणा भी कुछ hi देर में उस ओमनी कार के पास पहुंच गयी और उसने पुलिस वालो को बताया की उसी ने फ़ोन किया था. पुलिस वालो ने ओमनी कार के अंदर से सबको बाहर निकला. उस गाडी में तीन आदमी थे. जिनमे से एक ड्राइवर था और बाकी दो वही थे जो कुसुम को ले कर ओमनी में बैठ गए थे. पहले तो वो लोग यही बोले की कुसुम उनकी रिश्तेदार है मगर जब दक्षिणा ने पुलिस वालो को बताया सब कुछ तो वो सब बगले झाँकने लगे.

पुलिस वालो ने उन तीनो को पकड़ लिया और कुसुम को कुछ पूछ तांछ के बाद दक्षिणा के हवाले कर दिया. कुसुम की हालत ऐसी थी जैसे वो किसी सदमे में हो. उस पर कोई रिएक्शन नहीं था. खेर लाइट ग्रीन हुयी तो सरे वाहन आगे बढ़ने के लिए हॉर्न देने लगे तो दक्षिणा कुसुम को ले कर ज़ेबरा क्रासिंग से चल कर किनारे साइड आ गयी.

दक्षिणा कुसुम को अपने से इस तरह छुपकाये हुए थी जैसे वो कोई छोटी सी बच्ची हो. उसकी आँखों में आँशु थे. वो जानती थी की बहुत बड़ा काण्ड होने से बचा था. अगर आज कुसुम को वो लोग अपने साथ ले जाने में कामयाब हो जाते तो शायद बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता.

रोड के इस तरफ आ कर दक्षिणा ने ऑटो वाले की तरफ नज़र दौड़ाई तो उसने देखा की वो ऑटो वाला उसी कट से यू टर्न ले रहा था. कुछ hi पालो में वो ऑटो वाला आया तो दक्षिणा कुसुम को ले कर ऑटो में बैठ गयी. कुसुम एकदम शांत थी. जैसे वो इस दुनिया में थी hi नहीं. वो एकटक बस शून्य में देखे जा रही थी. दक्षिणा उसकी ये हालत देख कर उसे बार बार पुकार रही थी और उसको होश में लेन का प्रयास कर रही थी.

दक्षिणा ने ऑटो वाले को हॉस्पिटल का पता बताया और उसे हॉस्पिटल hi चलने को कहा. ऑटो वाला बिना कुछ कहे हॉस्पिटल की तरफ चल दिया. काफी देर बाद ऑटो उसी हॉस्पिटल के सामने रुका जिसमे विक्की को भर्ती किया गया था. ऑटो से उतर कर दक्षिणा ने ऑटो वाले को दो हज़ार का एक नोट पकड़ाया. ऑटो वाला दो हज़ार पाया तो वो खुश हो कर चला गया.

कुसुम को ले कर दक्षिणा हॉस्पिटल के अंदर की तरफ चल पड़ी. जैसे hi वो गेट के पास पहुंची तो उसे प्रिय पूजा मिल गयी. वो दोनों कुसुम को देख कर उससे लिपट गयी और फुट फुट कर रोने लगी.

"कहा चली गयी थी आप.? आपको पता है आपके इस तरह चले जाने से हमारी जान निकल गयी थी. ऐसा क्यों किया आपने दीदी.?" पूजा बुरी तरह सिसक उठी तो दक्षिणा ने उन दोनों को शांत रहने को कहा और फिर कुसुम के साथ साथ उन दोनों को भी हॉस्पिटल के अंदर ले आयी.

वेटिंग रूम में रचना और माँ एक लम्बी सी चेयर पर बैठी हुयी थी. दोनों के hi चेहरे से लग रहा था की वो कितना रोई थी. जैसे hi दक्षिणा कुसुम को ले कर वेटिंग रूम में दाखिल हुयी तो रचना और माँ की नज़र उस पर पड़ी. दक्षिणा के साथ कुसुम को देखते hi रचना उठ कर कुसुम के पास आयी और उसे अपने साथ ले जा कर चेयर पर बैठाया. यहाँ हैरानी की बात ये थी की माँ ने कुसुम की तरफ देखा ज़रूर मगर उसने कुसुम से कहा कुछ नहीं. शायद वो अब भी कुसुम से बहुत गुस्सा थी.

रचना और प्रिय पूजा के पूछने पर दक्षिणा ने बस यही कहा की कुसुम रास्ते में hi उसे मिली थी और वो काफी दूर निकल गयी थी. उसने ये नहीं बताया की आज कुसुम के साथ कितना बड़ा काण्ड हो गया था. खेर दक्षिणा कही से पानी ले कर आयी और कुसुम को ज़बरदस्ती पिलाया और हलके से उसका चेहरा भी धोया. कुसुम कुछ बोल नहीं रही थी बल्कि वो अभी भी सदमे जैसी हालत में hi थी.

अभी ये लोग यहाँ बैठे hi थे की तभी वह पर एक नर्स आयी और उसने कहा की मरीज की फॅमिली में से जो भी हैं उन्हें डॉ साहब ने बुलाया है. नर्स की बात सुन कर दक्षिणा चेयर से उठ कर कड़ी हो गयी और उसके साथ रचना भी. नर्स के साथ दक्षिणा गयी. उसने रचना को मन कर दिया था ये कह कर की वो यहाँ सबका ध्यान रखे. वैसे ये बड़ी अजीब बात थी की अभी तक इन लोगो ने दक्षिणा से उसके बारे में कुछ भी नहीं पूछा था या फिर शायद ऐसे हालात hi नहीं थे की उससे उसके बारे में कुछ पूछा जाये.

डॉ ने दक्षिणा से कहा की मरीज के इलाज़ में जो भी खर्चा लगा उसकी रसीद वो बनवा ले. डॉ ने ये भी बताया की विक्की को दोपहर तक होश आ जायेगा. डॉ से मिलने के बाद दक्षिणा वापस वेटिंग रूम में आ गयी थी. उसने रचना और माँ से बताया की विक्की को दोपहर तक होश आ जायेगा.

दक्षिणा को पता था की इन लोगो ने कल से कुछ नहीं खाया पिया था. पूजा ने उसे साडी कहानी बता दी थी की क्या हुआ था. दक्षिणा ने इन लोगो के खाने के लिए इंतजाम किया. वो बाहर से सबके लिए खाना ले के आयी. मगर कोई भी खाना खाने के लिए राज़ी नहीं था. दक्षिणा ने सबको समझाया की खाना न खाने से क्या हो जायेगा. भगवन का शुक्र मनाओ की विक्की को ज़्यादा कुछ नहीं हुआ वर्ण जिस तरह का उसका एक्सीडेंट हुआ था उसमे से उसकी जान भी जा सकती थी.

आखिर दक्षिणा के बहुत समझने पर सबने थोड़ा बहुत खाया. दक्षिणा ने अपने हाथो से कुसुम को भी ज़बरदस्ती खिलाया. अब वो पहले से ठीक थी मगर बोल वो अब भी किसी से नहीं रही थी. रह रह कर उसकी आँखों में आँशु आ जाते थे. खाना कहते वक्त hi माँ ने दक्षिणा से उसके बारे में पूछा था और ये भी कहा की वो उसकी अहसानमंद है की इस हालत में उसने उनकी इतनी मदद की.

माँ की इन बातो से दक्षिणा को बहुत राहत मिली थी. उसने माँ से बताया की शुरू शुरू में विक्की उसके यहाँ hi रहता था और उसी की फैक्ट्री में काम करता था. दक्षिणा ने उतना hi बताया जितना उसे इस वक्त ज़रूरी लग रहा था.

दोपहर को नर्स ने बताया की मरीज को होश आ गया है और ये लोग उससे मिल सकते हैं. नर्स की ये बात सुन कर सब के सब वेटिंग रूम से भाग पड़े विक्की से मिलने के लिए. सबसे आगे माँ थी. कुसुम नहीं जाना चाहती थी इस लिए दक्षिणा उसके पास hi रह गयी थी.

जिस कमरे में विक्की को बीएड पर लेटाया गया था ये सब वह पहुंचे. विक्की के हाथो पैरो में पत्तिया बढ़ी हुयी थी और उसके सर में भी. माँ ने जैसे hi मुझे इस हाल में देखा तो वो फुट फुट कर रोने लगी. सब मुझे इस हालत में देख कर दुखी थे और रोने लगे थे. डॉ और नर्स ने माँ और बाकी सबसे कहा की वो लोग मुझे ज़्यादा डिस्टर्बे न करे.

मैं होश में आ चूका था मगर मैं हिल नहीं सकता था और न hi अपनी गर्दन को इधर उधर कर सकता था. माँ मेरे चेहरे के पास hi झुकी हुयी रो रही थी और बार बार झुक कर मेरे माथे पर चूम रही थी और साथ hi जाने क्या क्या बोलती जा रही थी.

"क्यों किया तूने ऐसा.? क्या तूने एक बार भी ये नहीं सोचा की तेरे बिना हम सबका क्या होगा.? इस नयी जगह पर हम कैसे जियेंगे.?" माँ मुझसे बोलती जा रही थी और मैं चुप चाप उनकी तरफ देख रहा था. मैं बहुत कुछ बोलना चाहता था मगर मेरे होठ बस कांप कर hi रह जाते थे. मेरे सर में दर्द होने लगा. जिससे मेरा चेहरा बिगड़ने लगा था. ये देख कर डॉ ने माँ को मुझसे कुछ भी बोलने या पूछने से मन कर दिया और सबको ज़बरदस्ती बाहर भेज दिया.

कुछ देर बाद मेरे पास एक पुलिस वाला आया. उसने मुझे बड़े ध्यान से देखा और फिर उसने डॉ की तरफ देखते हुए कहा.

"अब कैसी कंडीशन है इसकी.?" पुलिस वाले ने डॉ से ये कहा तो डॉ ने कहा.

"कंडीशन तो बेटर hi है अफसर बूत ु क्नोव व्हाट खून बहुत ज़्यादा बाह गया था और छोटे भी काफी गहरी थी इस लिए रिकवर होने में इन्हे ज़रा टाइम लगेगा. वैसे ये हैरत की बात है की इतने खतरनाक एक्सीडेंट के बाद भी ये सलामत बच गए." डॉ ने ये कहा तो पुलिस वाला मेरी तरफ देख कर मुस्कुराया फिर बोलै.

"सुना है जब तक किसी के दिन पुरे नहीं हो जाते तब तक मौत नाम की बाला आ hi नहीं सकती." पुलिस वाले ने ये कहा तो डॉ ने कहा.

"यस यू अरे राइट अफसर. अन्य्वयस थैंक्स ा लोट. आप इन्हे टाइम से ले आये थे यहाँ इस लिए इन्हे बचा लिया गया वर्ण यू क्नोव.?" डॉ ने ये कहा तो पुलिस वाले ने एक बार फिर से मेरी तरफ देखा और फिर वो मेरी तरफ झुका और मुझसे बोलै.

"वेलकम तो नई लाइफ यंग बॉय. मैं उम्मीद करता हु की फ्यूचर में अब ऐसी ड्राइविंग नहीं करोगे तुम." पुलिस वाले ने मुझसे ये कहा तो मैंने अपनी पालक झपका कर हाँ कहा. उसके बाद वो डॉ के साथ बाहर चला गया.

कमरे में बीएड पर पड़ा मैं इस सबके बारे में सोचने लगा तो फिर से मेरे सर में दर्द उठा तो मैंने सोचना hi बंद कर दिया. मगर होश में आने के बाद ऐसा कैसे हो सकता था की मैं किसी चीज़ के बारे में न सोचु.? मेरे मन में एक hi बात आ रही थी की सब मुझे देखने आये थे मगर दीदी नहीं आयी थी. क्या मेरे साथ इतना कुछ होने के बाद भी वो मुझे देखना नहीं चाहती थी या फिर कोई और बात थी.?

मुझसे मिलने के बाद पुलिस वाला तो शायद चला गया था मगर डॉ मेरी फैमिकय को समझा रहा था की अब चिंता की कोई बात नहीं है. मरीज को अभी काम से काम दो से तीन हप्ते तक यही पर रखना ज़रूरी है. उसके बाद आप लोग उन्हें ले जा सकते हैं. डॉ के ऐसा कहने पर माँ ने कहा की वो अपने बेटे के पास hi रहेगी. उनकी इस बात से डॉ ने कहा की इसकी कोई ज़रूरत नहीं है क्यों की यहाँ पर उनका बहुत अच्छे से ख़याल रखा जायेगा मगर माँ मानने को तैयार न हुयी तो डॉ ने कहा की ठीक है एक ब्यक्ति यहाँ रुक सकता है.

उसके बाद यही तय हुआ की माँ मेरे पास hi रुकेगी और बाकी लोग घर जायेगे. दक्षिणा ने माँ से कहा की वो शाम तक यही रहे उसके बाद वो यहाँ आ जाएगी. दक्षिणा की इस बात से माँ ने कहा की नहीं इसकी कोई ज़रूरत नहीं है. वो अपने बेटे के पास तब तक रहेगी जब तक वो पूरी तरह ठीक नहीं हो जाता. माँ की इस बात से दक्षिणा ने उन्हें समझाया की कुछ टाइम की hi तो बात है उसके बाद तो विक्की को वैसे भी घर hi ले आएंगे. बड़ी मुश्किल से माँ मानी और फिर दक्षिणा सबको ले के घर चली गयी.

रास्ते में दक्षिणा कुसुम से थोड़ी बहुत बाते करती जा रही थी. तभी कुसुम ने उससे कहा की वो अब उस घर में नहीं रहना चाहती है और न hi वो अपने भाई को अपनी मनहूस शकल दिखाना चाहती है. उसकी इस बात से बाकी सब दुखी हो गए थे. प्रिय पूजा और रचना ने बहुत समझने की कोशिश की मगर वो न मानी, तब दक्षिणा ने कहा की वो कुसुम को अपने घर ले जाएगी. दक्षिणा की इस बात से कुसुम ने भी कह दिया की हाँ अब से वो उसके घर में hi रहेगी.

टैक्सी घर के सामने रुकी तो प्रिय पूजा और रचना टैक्सी से उतर गयी. उन तीनो ने एक बार फिर से कुसुम को घर चलने के लिए कहा मगर वो टैक्सी से न उत्तरी. ये देख कर दक्षिणा ने उन तीनो को जाने का इशारा किया तो वो तीनो स्टील वाले गेट को खोल कर अंदर की तरफ चली गयी. उनके जाते hi दक्षिणा ने टैक्सी वापस मोड़ने को कहा. कुछ hi देर में टैक्सी दक्षिणा के घर के सामने रुकी.

टैक्सी वाले को उसका पैसा दे कर दक्षिणा कुसुम को ले कर घर के अंदर आ गयी. घर के अंदर ड्रिंग रूम में रखे सोफे पर सविता की बेटी नैना बैठी हुयी बगल की दिवार पर लगी एक बड़ी सी लेद टीवी पर फिल्म देख रही थी. दक्षिणा को आया देख कर उसने जल्दी से टीवी बंद कर दिया.

दक्षिणा ने कुसुम को एक सोफे पर बैठाया और फिर उसने सविता को आवाज़ दी. जब सविता आयी तो उसने उससे पूछा की खाना गर्म है या नहीं. दक्षिणा के पूछने पर सविता ने कहा की वो जब तक फ्रेश होंगी तब तक वो गरमा गरम खाना बना देगी.

"चलो कुसुम तुम भी फ्रेश हो जाओ. उसके बाद हम दोनों साथ में खाना खायेगे." दक्षिणा ने बड़े प्यार से ये कहा तो कुसुम ने उसकी तरफ बड़ी मासूमियत से देखते हुए कहा.

"मुझे भूख नहीं है. आप खा लीजिये." कुसुम ने ये कहा तो दक्षिणा में कहा.

"हर बात में ज़िद अच्छी नहीं होती कुसुम. मुझे पता है तुम थोड़ा ज़िद्दी हो मगर मैं भी काम ज़िद्दी नहीं हु. अगर तुमने नहीं खाया तो मैं भी नहीं खाओगी." दक्षिणा ने एकदम से बच्चियों जैसे लहजे में ये कहा तो कुसुम ने कहा.

"मैं ज़िद नहीं कर रही. मुझे सच में भूख नहीं है." कुसुम ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"अच्छा चलो फ्रेश तो हो लो. देखो तो क्या हुलिया बना रखा है तुमने.? चलो उठो अब." दक्षिणा ने ये कहा और इस बार बिना कुसुम की कोई बात सुने कुसुम का हाथ पकड़ कर उठाया.

कुसुम ने भी ज़्यादा विरोध नहीं किया. शायद उसे भी इतना पता था की दूसरे के घर में दूसरे की बात भी मानना चाहिए. दक्षिणा कुसुम को ले कर अपने कमरे में गयी और फिर उसने कुसुम को कमरे में अटैच बाथरूम में भेज दिया.

कुसुम जब फ्रेश हो कर निकली तो दक्षिणा ने देखा की उसने वही कपडे पहन लिए थे जो उसने पहले पहने थे. ये देख कर दक्षिणा ने आलमारी से अपना एक शलवार शूट निकला और कुसुम की तरफ बढ़ाते हुए कहा की वो इन्हे पहन ले क्यों की उसके कपडे बहुत खराब हो चुके थे. खेर दक्षिणा के कहने पर कुसुम ने उससे कपडे ले लिए और बाथरूम के अंदर जा कर दरवाज़ा बंद कर लिया.

कुछ देर बाद जब कुसुम बाहर निकली तो दक्षिणा उसे देखती रह गयी. विक्की ने उसे बताया की उसकी कुसुम दीदी दुनिया की सबसे सुन्दर और मासूम हैं मगर इस वक्त वो अपनी आँखों से देख रही थी उसे और उसकी सुंदरता को. दक्षिणा को एकदम से ख़याल आया की ये वही लड़की है जिसकी विक्की इबादत करता है. उसने विक्की के मुख से बहुतो बार कुसुम की बाते सुनी थी.

दक्षिणा का शलवार शूट कुसुम की बॉडी पर फिट तो नहीं आ रहा था क्यों की दक्षिणा का जिसम कुसुम के जिसम से थोड़ा भारी था मगर इसके बाद भी वो कपडे उस पर काफी जांच रहे थे.

"वाह तुम तो एकदम पारी लग रही हो कुसुम. तुम सच में बहुत सुन्दर हो मगर इस सुंदरता में तुमने एक ग्रहण लगाया हुआ है और वो ये है की तुमने अपने इस चाँद से चेहरे पर उदासियों की चादर धमफ राखी है." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम को थोड़ा शर्म तो आयी मगर फिर उसने जैसे इस पर ध्यान hi नहीं दिया था.

"अच्छा अब तुम यही बीएड पर बैठो मैं भी फ्रेश हो लेती हु. उसके बाद दोनों साथ में hi चलेंगे. ठीक है न.?" दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम ने हाँ में सर हिला दिया. उसके बाद दक्षिणा भी बाथरूम में घुस गयी मगर उसे नहीं पता था की उसके बाथरूम से वापस आने के बाद कमरे में क्या होने वाला है.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 49


"वाह तुम तो एकदम पारी लग रही हो कुसुम. तुम सच में बहुत सुन्दर हो मगर इस सुंदरता में तुमने एक ग्रहण लगाया हुआ है और वो ये है की तुमने अपने इस चाँद से चेहरे पर उदासियों की चादर धमफ राखी है." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम को थोड़ा शर्म तो आयी मगर फिर उसने जैसे इस पर ध्यान hi नहीं दिया था.

"अच्छा अब तुम यही बीएड पर बैठो मैं भी फ्रेश हो लेती हु. उसके बाद दोनों साथ में hi चलेंगे. ठीक है न.?" दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम ने हाँ में सर हिला दिया. उसके बाद दक्षिणा भी बाथरूम में घुस गयी मगर उसे नहीं पता था की उसके बाथरूम से वापस आने के बाद कमरे में क्या होने वाला है.

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उधर हॉस्पिटल से सबके चले जाने के बाद माँ वेटिंग रूम से उठ कर मेरे पास आ गयी थी. मेरे बीएड के पास hi वो एक चेयर पर बैठ गयी थी और मेरी हालत को देख कर बार बार रो पड़ती थी. उनकी आँखे सूझ कर गुब्बारा हो गयी थी. उनको इस हालत में देख कर मुझे भी बड़ी तकलीफ हो रही थी. मैं पहले से अब थोड़ा बेहतर था इस लिए हलकी आवाज़ में माँ से बार बार यही कहता की वो इस तरह न रोये, क्यों की उनके इस तरह रोने से मुझे बहुत दुःख होता है.

डॉ ने भी माँ को हिदायत दिया था की वो मरीज के सामने खुद के जज़्बातो को शांत रखे. मगर ममता से भरी हुयी माँ अपने बेटे की इस हालत को देख कर बार बार डॉ की हिदायत को भूल जाती थी.

"आपके इस तरह रोने से और दुखी होने से मुझे बहुत तकलीफ हो रही है माँ. क्या आप चाहती हैं की मैं इस हाल में और भी ज़्यादा तकलीफ में हो जाओ.?" मैंने हलकी आवाज़ में माँ से ये कहा तो माँ ने दुखी हो कर इंकार में सर हिलाया और कहा.

"नहीं मेरे laal...main भला ये कैसे चाह सकती हु की मेरे कलेजे का टुकड़ा तकलीफ में हो जाये.?" माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"तो फिर इस तरह आँशु बहाना बंद कर दीजिये. मैं आपको इस तरह दुखी होते नहीं देख सकता." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"तो फिर क्यों किया ऐसा तूने.? क्या तुझे एक बार भी मेरा ख़याल नहीं आया.? क्या तूने एक बार भी ये नहीं सोचा की तुझे अगर कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा.? ारी पगले मैं तेरे बिना एक पल भी नहीं जी सकती थी." माँ ने दुखी हो के ये कहा तो मैंने कहा.

"उस वक्त मैं कुछ भी सोचने की हालत में hi नहीं था माँ. मेरे दिल और दिमाग में आँधिया चल रही थी और बस यही ख़याल आ रहा था की खुद को ख़तम कर दू." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"तूने उस करमजली की वजह से बाकी सबको भी भुला दिया और चला गया था हम सब की जान लेने के लिए." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"बताया न माँ की उस वक्त मैं कुछ भी सोचने की हालत में नहीं था." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"मैं नहीं जानती थी की उस कलमुही के मन में मेरे बेटे के लिए इतना ज़हर भर चूका है वर्ण तुझे कभी न उससे बात करने की इजाज़त देती." माँ ने थोड़ा गुस्से में ये कहा तो मैंने कहा.

"नहीं माँ. दीदी के लिए ऐसा मत कहिये. मैं मानता हु की मुझे उस वक्त उनकी बाते चुभ गयी थी जिसकी वजह से मैंने अपनी ये हालत बना ली मगर मैं ये भी जनता हु की उन्होंने वो सब मुझे इस हालत में लेन के उद्देश्य से नहीं कहा था." मैंने ये कहा hi था की माँ ने मेरी बात बीच में hi काट कर कहा.

"इतना कुछ हो जाने के बाद भी तू उस डायन की तरफदारी कर रहा है.? खबरदार अब अगर तूने मेरे सामने उसका ज़िक्र भी किया तो. जो मेरे बेटे की सगी नहीं वो मेरी भी सगी नहीं." माँ ने आवेश में आ कर ये कहा तो मैंने कहा.

"अभी आपके मन में दीदी के प्रति गुस्सा भरा हुआ है maa...is लिए आप ये नहीं सोच प् रही हैं की इस सब में दीदी की कोई गलती नहीं है. मेरे साथ ऐसा होना था सो हो गया. हो सकता है की इसी वजह से दीदी का मन बदल जाये सबके लिए." मैंने ये कहा तो माँ ने एकदम से कहा.

"मुझे उसके बारे में अब कुछ सोचना hi नहीं है और हाँ तू भी मत सोच उसके बारे में. मैं तेरा ब्याह रचना और प्रिय पूजा से कर दूगी. तू बस ठीक हो जा जल्दी से और हाँ उस करमजली की छाया भी अब मैं तेरे ऊपर नहीं पड़ने दूगी." माँ ने ये कहा तो मैं देखता रह गया उन्हें.

मैं समझ गया था की इस वक्त दीदी के बारे में माँ से बात करने का कोई फायदा नहीं था. क्यों की उनके मन में दीदी के प्रति कड़वाहट भर चुकी थी जो अब इतनी आसानी से जाने वाली नहीं थी. अब तो शायद ये आने वाला वक्त hi कुछ कर सकता था. खेर उनकी इन बातो से जब मैं कुछ न बोलै तो माँ ने इस बार थोड़ा शांत लहजे में कहा.

"अच्छा तुझे पता है जिसके यहाँ तू काम करता था न उसने हमारी बहुत मदद की. क्या नाम बताया था उसने apna....aree हाँ याद aaya..Dakshina...haan यही नाम है उसका. बहुत अच्छी औरत है वो. अगर वो न होती तो हम सब तुझ तक कैसे पहुंच पते और तेरा इलाज़ कैसे करा पाते.?" माँ ने ये कहा तो मैं एकदम से मन hi मन चौंक गया.

मुझे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी की इस हादसे में दक्षिणा इस तरह खुल के मेरी फॅमिली के सामने आ जाएगी. मेरे दिमाग में एकदम से हज़ारो बाते हज़ारो ख़याल उभरने लगे थे. मेरे मन में सबसे पहले यही ख़याल आया की क्या मेरी फॅमिली को दक्षिणा ने हमारे बारे में बताया होगा.? वैसे ऐसा होना तो नहीं चाहिए था. दक्षिणा ऐसी बात मेरी फॅमिली को नहीं बता सकती थी. काम से काम इस सिचुएशन में तो बिलकुल भी नहीं. तो फिर उसने क्या क्या बताया होगा मेरी फॅमिली को अपने बारे में.? मेरा दिमाग एकदम से दर्द करने लगा था. जिसकी पीड़ा मेरे चेहरे पर उभर आयी थी. ये देख कर माँ के चेहरे पर भी चिंता छलक पड़ी.

"क्या हुआ बीटा. तू ठीक तो है न मेरे लाल.?" माँ एकदम से चिंतित हो उठी थी. जबकि मैंने अपने आपको बड़ी मुश्किल से सम्हाला. दक्षिणा और मेरे बीच के रिश्ते के बारे में एक दिन तो सबको पता चलना hi था मगर इस वक्त नहीं. ये वक्त इसके लिए सही नहीं था बल्कि अगर ये बात यहाँ पर खुल गयी थी तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो सकती थी.

"कुछ नहीं माँ. वो बस किसी किसी पल सर में दर्द जाग उठता है." मैंने ये कहा तो माँ ने मेरे चेहरे को सहलाते हुए प्यार से कहा.

"तू ज़्यादा बोल मत बीटा. तू बस आराम से लेता rah...main भी अब तुझसे कुछ नहीं बोलवाउगि." माँ ने ये कहा तो मैं हलके से मुस्कुराया और बोलै.

"तो क्या वो हमारे घर खुद hi आयी थी माँ.?" मैंने माँ से दक्षिणा के बारे में जानने की उत्सुकता से ये पूछा तो माँ ने कहा.

"कल जब तू चला गया था तो हम सब बहुत घबरा गए थे और दुखी भी हो गए थे. मैंने उस कलमुही को खूब डाटा था इसके लिए और उससे कहा भी की अगर मेरे बेटे को कुछ हुआ तो मैं अपने हाथो से उसका गाला काटूगी. हम सब तो इस नयी जगह से अनजान hi थे. तेरे आने के इंतज़ार में सारा दिन और साड़ी रात रट कलपते hi गुज़र गयी. मेरे मन में तरह तरह के बुरे ख़याल आ रहे थे. जब मुझसे न रहा गया तो सुबह मैं खुद hi तुझे खोजने के लिए चल पड़ी मगर रचना ने मुझे रोक लिया. उसने मुझसे कहा की मैं भला इतने बड़े शहर में तुझे कहा खोजूंगी.? पूजा कल से तुझे फ़ोन लगा रही थी मगर तेरा फ़ोन बंद hi बताता रहा था. मगर आज सुबह तेरे hi नंबर से पूजा के मोबाइल पर फोन आया तो पहले तो मैंने hi बात की. कोई पुलिस वाला बात कर रहा था. उसने जैसे hi ये बताया की तेरा एक्सीडेंट हो गया है और तू हॉस्पिटल में है तो मेरे हाथ से मोबाइल छूट गया. उसके बाद रचना ने hi बात की थी. फ़ोन पर बात करने के बाद हम सब हॉस्पिटल के लिए चल दिए. मगर जैसे hi हम सब दरवाज़े के पास पहुंचे तो बाहर से किसी ने घंटी बजायी और जब मैंने दरवाज़ा खोला तो बाहर वही दक्षिणा कड़ी थी. जब हम सबने उसे देखा तो हमें समझ hi न आया की वो कौन है और उस वक्त वो हमारे घर क्यों आयी थी. बाद में जब उसने ये कहा की वो तुझे जानती है और तेरे पास hi हम सबको ले कर जा रही है तो हम सब बिना सोचे समझे उसके साथ यहाँ आ गए. उसके बाद उसी ने सब कुछ किया. हम में से तो किसी का दिमाग hi काम नहीं कर रहा था की क्या और कैसे करे.?" माँ ने ये सब बताया तो मैं दक्षिणा के बारे में सोचने लगा.

दक्षिणा ने सच में ऐसे वक्त पर बहुत hi अच्छा काम किया था और मेरी फॅमिली का साथ दिया था. माँ ने मुझे साडी बाते बतायी. ये भी बताया की कुसुम दीदी कही गायब हो गयी थी और फिर दक्षिणा hi उन्हें ढूंढ कर लायी थी. कुसुम दीदी के इस मामले के बारे में जान कर मैं थोड़ा सोच में पद गया था. मैं समझ सकता था की उन्होंने ऐसा किस मानसिकता की वजह से किया था.

कुसुम दीदी ने ये सब पछतावे की वजह से किया था मगर ये किस तरह का पछतावा था.? इंसान को अगर अपनी किसी गलती का अहसास होता है तो वो सामने वाले से अपनी गलती के लिए माफ़ी मांगता है मगर दीदी ने तो ऐसा कुछ किया hi नहीं था बल्कि उन्होंने तो ऐसा कदम उठा लिया था जिसकी वजह से हर कोई बहुत बड़ी प्रॉब्लम में आ जाता. आखिर क्यों किया था दीदी ने ऐसा.? क्या वो अपने किये पर शर्मिंदा थी जिसकी वजह से वो मेरे सामने नहीं आना चाहती थी.? या फिर इसकी कोई दूसरी वजह भी थी.?

मैं हर चीज़ के बारे में ऐसे hi सोचता रहा. माँ मेरे पास hi कुर्सी पर बैठी कही खोयी थी. डॉ और नर्स ने माँ से साफ़ कह दिया था की मुझसे ऐसी बाते बिलकुल भी न करे जिससे मुझे किसी तरह की तकलीफ हो.

उधर बाथरूम में फ्रेश होने के बाद दक्षिणा वापस रूम में आयी और जैसे hi उसकी नज़र कुसुम पर पड़ी तो उसके पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी. बीएड के एक साइड एक छोटे से स्टूल की तरफ कुसुम एकटक देखे जा रही थी. उसके चेहरे पर बड़े अजीब से भाव थे. वो जिस स्टूल को देखे जा रही थी उस स्टूल में एक बड़े से फ्रेम में सजी एक ऐसी फोटो थी जिसमे दक्षिणा तो थी hi मगर उसके साथ जो शख्स था वो विक्की था.

उस फोटो में दक्षिणा एक पेड़ के नीचे अपनी दोनों टांगो को सीधा करके बैठी थी और विक्की उसकी जांघो में सर रखे ऊपर की तरफ दक्षिणा के हस्ते हुए चेहरे को देख कर मुस्कुरा रहा था. दक्षिणा ने एक हाथ से विक्की का हाथ भी पकड़ रखा था. उस फोटो को देख कर कोई भी कह सकता था की फोटो में दिख रहे ये दोनों इंसान लवर्स हैं. कुसुम एकटक उसी फोटो को देखे जा रही थी.

दक्षिणा को इस बात का ख़याल hi नहीं आया था की उसके कमरे में उसकी इस तरह की फोटो मौजूद है जिसे कुसुम देख सकती है और उसके बारे में कई तरह के सवाल खड़े कर सकती है. दक्षिणा बुरी तरह घबरा गयी थी. उसके चेहरे पर पसीना छलक आया था. उसे समझ न आया की वो इस सिचुएशन को कैसे सम्हाले.? उसे पता था की विक्की के मामले में कुसुम बहुत hi ज़्यादा सीरियस है. उसे ये भी पता था की वो विक्की को इतना प्रेम करती है की वो विक्की के साथ किसी को भी नहीं देखना चाहती. आज जो भी हालात बन गए थे ये उसी का नतीजा था.

दक्षिणा को एकदम से ख़याल आया की कुसुम ने आज किस हिसाब से वो सब किया था. मतलब की उसे अपनी गलती का अहसास हो चूका था. उसे समझ में आ चूका था की विक्की सिर्फ उसका hi नहीं है बल्कि उसके चाहने वाले और भी हैं जिनका उस पर हक़ है. दक्षिणा को लगा की वो इस सिचुएशन को सम्हाल सकक्ति है मगर ज़रा सावधानी से.

दक्षिणा ने सबसे पहले अपने आपको सम्हाला उसके बाद उसने खुद के चेहरे पर ख़ुशी के भाव लाये और कुसुम की तरफ देखते हुए कहा.

"अब लग रहा है की आज की साड़ी थकान उतर गयी है. वर्ण लग रहा था की कितना थक गयी थी मैं." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम के जिसम में एकदम से हलचल हुयी. अभी तक जैसे वो जैम सी गयी थी. दक्षिणा की आवाज़ से उसका ध्यान टूटा था और फिर उसने उस फोटो से अपनी नज़रे हटा कर दक्षिणा की तरफ चेहरा कर के देखा.

कुसुम के चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता थी. उसने आग उगलती नज़रो से दक्षिणा की तरफ देखा. दक्षिणा को समझते देर न लगी की कुसुम उस फोटो की वजह से उससे अब गुस्सा हो गयी है. दक्षिणा ने भी सोच लिया की कुसुम को वो बड़े अच्छे तरीके से इन सब बातो को समझाएगी. उसे समझाएगी की इस दुनिया में किसी इंसान के साथ क्या क्या हो जाता है.

"क्या हुआ तुम इस तरह क्यों देख रही हो मुझे.?" दक्षिणा ने एकदम शांत भाव से ये कहा तो कुसुम ने एक हाथ से स्टूल पर राखी फोटो को उठाया और फिर उसे दक्षिणा को दिखते हुए गुस्से से कहा.

"ये क्या है.? क्या रिश्ता है तुम्हारा विक्की के साथ.?" कुसुम ने डायरेक्ट रिश्ते की बात की तो दक्षिणा मुस्कुरायी और चल कर उसके पास आयी. दक्षिणा ने इस वक्त अपने गोर जिसम में सिर्फ टॉवल लपेटा हुआ था. वो बीएड पर कुसुम के सामने बैठ गयी.

"कमाल है कुसुम. इतना कुछ हो जाने के बाद भी तुम्हारी सोच नहीं बदली." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम ने कठोरता से कहा.

"क्या मतलब है तुम्हारा.?" कुसुम ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"सच हमेशा कड़वा होता है कुसुम और ये बात तुम भी अच्छी तरह समझती hi होगी. आज विक्की की जो हालत है उसकी जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ तुम हो. मेरी बात का बुरा मानने से पहले ज़रूरी है की तुम साड़ी बातो के बारे में गहराई से सोचो." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम ने कहा.

"कहना क्या चाहती हो तुम.?" कुसुम ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"तुम मेरी बेटी की उम्र की हो और इस वक्त तुम मुझे 'तुम' कह रही हो इसका मतलब ये हुआ की तुममे तमीज नहीं है. खेर छोडो ये baat...ham मुद्दे की बात पर आते हैं." दक्षिणा ने ये कह कर एक लम्बी सांस ली उसके बाद उसने कहना शुरू किया.

"तुम्हे पता है कुसुम आज कल इस दुनिया में बहुत कुछ ऐसा भी होता है जिसकी हम इंसान कल्पना भी नहीं कर सकते और जब ऐसी कोई चीज़ हो जाती है तो हम इंसान उसे हजम भी नहीं कर पाते. तुम्हारे साथ यही हुआ है. तुमने अपने hi भाई से प्रेम किया और उसे hi अपना सब कुछ मान लिया. जब की तुम खुद जानती हो की सेज भाई बहन के बीच बना ये रिश्ता हर तरह से गलत है मगर इसके बावजूद तुम अपने भाई से प्रेम करती हो और चाहती हो की वो तुम्हे हर जन्मो में मिले. अब अगर कोई तुमसे ये कहे की तुम अपने hi भाई को अपना पति बनाना चाहती हो तो कौन सा सही कर रही हो तो क्या जवाब डौगी तुम.? मुझे पता है की इसका जवाब तुम सिर्फ यही डौगी की तुम उसे प्रेम करती हो. इसके शिव तुम कोई जवाब नहीं दे सकती. तुम्हारे माता पिता भी जानते हैं की ये रिश्ता हर तरह से गलत है फिर भी उन्होंने अपने बच्चो की ख़ुशी के लिए ऐसे गलत रिश्ते को भी स्वीकार कर लिया. मगर तुमने क्या किया कुसुम.? तुमने तो सिर्फ अपने बारे में सोचा. हाँ कुसुम तुमने सिर्फ अपने बारे में hi सोचा. तुम सिर्फ ये चाहती रही की विक्की सिर्फ तुम्हारा बन कर रहे. तुम उसे हमेशा के लिए अपना बना कर रखना चाहती हो जैसे वो कोई चीज़ हो और उसकी अपनी कोई ख्वाहिश hi न हो. ारी प्रेम करती हो तो प्रेम का मतलब भी समझो कुसुम. प्रेम में सिर्फ समर्पण होता है. उसमे किसी चीज़ को हासिल कर लेने की ज़िद जैसी बात नहीं होती. प्रेम एक इबादत है और प्रेमी वो है जिसकी हम इबादत करते हैं. अगर तुम अपने प्रेमी भगवन को मानती हो और उसकी इबादत करती हो तो तुम्हे ये भी समझना चाहिए की भगवन किसी एक का नहीं होता बल्कि वो तो सबका होता है. वो हर उस इंसान का है जो उसकी इबादत करता है. क्या तुम ये कर सकती हो की दुनिया के हर उस इंसान को रोक लो जो भगवन की इबादत करता hai...nahi न.? तो फिर ऐसा क्यों सोचती हो की विक्की सिर्फ तुम्हारा hi होगा.? सिर्फ अपने बारे में न सोचो कुसुम बल्कि सबके बारे में सोचो." दक्षिणा सांस लेने के लिए रुकी उसके बाद उसने फिर से कहना शुरू किया.

"जैसे एक भगवन की दुनिया का हर इंसान इबादत करता है वैसे hi एक इंसान से बहुत से लोग भी प्रेम कर सकते हैं. ये आस्था और श्रद्धा की बात है कुसुम. तुमने अपने भाई से प्रेम किया क्यों की वो तुम्हे अच्छा लगा और उसमे तुम्हारी आस्था थी वैसे hi तुम्हारी दोनों बहनो के साथ हुआ. उन दोनों को भी अपने भाई से प्रेम है. अब अगर तुम ये कहो की उन दोनों ने ऐसा क्यों किया तो वो दोनों भी तुमसे पूछ सकती हैं की तुमने ऐसा क्यों किया.? बात तो प्रेम की है kusum...jaise तुम्हे अपने भाई से हो गया वैसे hi उन दोनों को भी हो गया. अब जैसे तुम चाहती हो की विक्की सिर्फ तुम्हारा हो वैसे hi वो दोनों भी चाहेगी. मगर क्या सच में वो दोनों ऐसा चाहती हैं.? तुम को तो इस बात से बहुत ज़्यादा ऐतराज़ है की विक्की से कोई प्रेम न करे और विक्की किसी दूसरे का न हो मगर तुम्हारे अलावा किसी को भी ऐसा कोई ऐतराज़ नहीं है. तुम्हारी दोनों बहनो को पता है की प्रेम में कैसी भावना और सोच होती है. तुम बड़ी हो तुम्हे तो खुद अपनी बहनो की खुशियों के बारे में सोचना चाहिए मगर तुम तो सिर्फ अपनी ख़ुशी के बारे में hi सोचती रही हो. जिस दिन सबके बारे में सोचने लगोगी उस दिन तुम्हे पता चलेगा की खुशिया क्या होती हैं." दक्षिणा एक बार फिर से सांस लेने के लिए रुकी उसके बाद बोली.

"मुझे तुम सबके बारे में सब कुछ पता है कुसुम. बल्कि ये कहु तो भी गलत नहीं होगा की तुमसे ज़्यादा मुझे तुम सबके बारे में पता है शुरू से ले कर लास्ट तक. मुझे तो वो भी पता है जो तुम में से किसी को भी पता नहीं है." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम ने उसकी तरफ देखा.

कुसुम जो इसके पहले गुस्से में थी अब वो एकदम से शांत हो गयी थी. शायद दक्षिणा की बातो का बहुत असर हुआ था उस पर. उसके मासूमियत से भरे चेहरे की तरफ देखते हुए दक्षिणा ने कहा.

"पिछले पांच सालो से विक्की हमारे यहाँ hi रहा. इन पांच सालो में उसकी ज़िन्दगी में क्या क्या हुआ ये तुम सब नहीं जानते. उसने मुझे अपनी साड़ी कहानी बतायी थी. शुरू में जब वो घर से निकाल दिया गया था तो उसके मन में हर पल बस यही बात आती थी की वो अपने आपको ख़तम कर दे. मगर उसकी किस्मत में तो कुछ और hi होना लिखा था इस लिए वो आत्म हत्या नहीं कर सका था. उसकी किस्मत में तो ये लिखा था की वो एक दिन अपनी hi बहनो का पति बनेगा. कहने सुनने में ये बात कितनी अजीब लगती है और हजम न होने वाली भी मगर सच तो यही है. हमारे साथ अक्सर वो चीज़े हो जाती हैं जिसकी हमने कभी कल्पना नहीं की होती. क्या तुमने कभी सोचा था की तुम्हारे अलावा विक्की के इतने सरे चाहने वाले निकल आएंगे.?" दक्षिणा ने ये कहा तो इस बार कुसुम ने धीमे स्वर में कहा.

"क्या आप भी विक्की से प्यार करती हैं.?" कुसुम ने ये कहा तो दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"विक्की है hi ऐसा की उससे दुनिया की हर लड़की या हर औरत प्यार करना चाहेगी. तुम्हे तो खुश होना चाहिए कुसुम की तुम जिस विक्की से प्रेम करती हो वो सबसे ख़ास है और सब उससे प्रेम करना चाहते हैं. तुमने पूछा की क्या मैं भी उससे प्यार करती हु तो हाँ kusum...main भी उससे बहुत प्यार करती हु. शुरू शुरू में अगर हमने उसे सहारा दिया था तो एक वक्त ऐसा भी आया जब वो हमारा सहारा बना. सबकी ज़िन्दगी में दुःख तकलीफे आती हैं मगर जो आपकी तकलीफो को बात ले और आपके जीवन में खुशिया भर दे उससे कौन प्यार नहीं करेगा.?" दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम ने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"क्या आप मुझे इसके बारे में सब कुछ बताएंगी.?" कुसुम ने ये कहा तो दक्षिणा ने उसके सुन्दर से चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में लिया और फिर मुस्कुराते हुए प्यार से कहा.

"बिलकुल बताऊगी कुसुम मगर उसके पहले तुम मुझे ये बताओ की क्या अब भी तुम यही चाहती हो की विक्की सिर्फ तुम्हारा हो.?" दक्षिणा ने ये पूछा तो कुसुम ने नज़रे झुकाते हुए कहा.

"मुझे समझ में नहीं आता की मैं इस बारे में क्या कहु.? हाँ ये समझ गयी हु की मैंने अब तक जो कुछ भी किया या जो कुछ भी सोचा वो गलत था. विक्की और मैं बचपन से hi एक दूसरे के बहुत करीब थे. हमारी आपस में कभी किसी बात पर लड़ाई नहीं हुयी. हम दोनों एक दूसरे का बहुत ख़याल रखते थे. धीरे धीरे वक्त गुज़रता गया और हम बड़े हो गए. मैं भाई बहनो में सबसे बड़ी थी और जब मैं शादी के लायक हो गयी तो पिता जी मेरे लिए लड़का खोजने लगे. लड़का मिलता और लड़के वाले मुझे देखने भी आते मगर मुझे देखने के बाद जब वो चले जाते तो घर से उनका सन्देश आता की वो ये शादी नहीं करेंगे. ऐसा बार बार होने लगा. जिससे माँ पिता जी परेशां हो गए और दुखी भी. मुझे भी बहुत दुःख लगता की जो भी रिश्ता आता है वो टूट जाता है. हम सब जानते थे की ये सब गांव के सरपंच यानी रचना के बाप की वजह से होता था मगर इसके लिए हम कुछ कर नहीं सकते थे. जब बार बार रिश्ता टूटने लगा तो मैं भी दुखी रहने लगी. धीरे धीरे मुझे ये लगने लगा जैसे मैं मनहूस हु. माँ पिता जी सब मुझे समझते और मुझे हर तरह से खुश रखने की कोशिश करते. उनके सामने तो मैं खुश होने का दिखावा करती मगर अकेले में मैं इन सब बातो को अपने मन से नहीं निकाल पाती थी. विक्की को पता नहीं कैसे पता चल जाता था की मैं उदास हु या दुखी हु. वो मेरे पास आता और मुझसे दुनिया जहां की बाते करता मुझे खुश रखने के लिए. वो अक्सर मुझसे कहता की मैं दुनिया की सबसे सुन्दर और मासूम दीदी हु उसकी. उसकी ये बाते मुझे उस वक्त बहुत अच्छी लगती और मुझे उस पर प्यार भी बहुत आता था. मैं जानती थी की मेरा भाई मुझे बस खुश देखना चाहता है. वो शहर में पढता था और रोज़ फ़ोन पर मुझसे घंटो बात करता और मुझे खुश रखने की कोशिश करता. सच कहु तो मैं माँ पिता जी के समझने से इतना खुश नहीं होती थी जितना अपने भाई से बात करने पर खुश हो जाती थी. मैं अक्सर रात होने का इंतज़ार करती और उसके फ़ोन का. धीरे धीरे ये एक आदत सी बन गयी थी. वो शहर से हर हप्ते गांव आ जाता था सिर्फ मेरी वजह से. माँ पिता जी गुस्सा होते मगर वो फिर भी नहीं मानता था. शहर से वो कुछ न कुछ मेरे लिए ज़रूर लाता और रात में जब सब सो जाते तो वो मेरे कमरे में आ कर मुझे दे देता था." कुसुम बोलते बोलते सांस लेने के लिए रुकी उसके बाद उसने फिर से कहना शुरू किया.

"मैं आज भी नहीं जानती की ऐसा वो कौन सा वक्त था या ऐसा कौन सा वो पल था जब मुझे अपने hi भाई से प्रेम हो गया था और जब पता चला तो लगा ये क्या गजब हो गया.? मैं अकेले में इस बारे में सोच सोच कर दुखी होती और खूब रोटी. मैं जानती थी की ये गलत था और अगर मैंने अपने दिल से अपने भाई के लिए ये प्रेम नहीं निकला तो भविष्य में और भी दुखी होने वाली बात हो जाएगी मगर मैं अपने दिल से अपने भाई के लिए वो प्रेम नहीं निकाल पायी. एक दिन मैंने फैसला किया की मैं विक्की से अब दूर रहूगी. उससे बात करना बंद कर दूगी. मगर ये इतना आसान नहीं था. क्यों की मैं चाह कर भी विक्की को कुछ कह नहीं सकती थी. उधर माँ को भी पता चल गया था की मेरे दिल में अपने hi भाई के लिए क्या है. माँ ने मुझे इसके लिए बहुत डाटा था. उस दिन मैं बहुत रोई. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मेरे साथ भगवन ये कैसा मज़ाक कर रहा था.? मैंने फैसला कर लिया की अब मैं विक्की से दूर रहूगी. सबसे पहले मैंने उसके कमरे में सोना बंद किया और उसके सामने जाना भी. जब मैंने विक्की के सामने जाना hi बंद कर दिया तो विक्की खुद मेरे पास आया और मुझसे इस सबका कारण पूछने लगा. मैं जानती थी की वो पूछेगा hi. मैंने भी उसे किसी तरह अपने से दूर रहने के लिए कह दिया. मुझ में सच बताने की हिम्मत नहीं थी. मैं नहीं चाहती थी की सच जान कर मेरा भाई मुझे गलत समझने लगे और मैं उसकी नज़र से गिर जाओ." कुसुम कहते कहते रुक गयी तो दक्षिणा ने उसकी तरफ देखा. कुसुम की आँखों से आँशु बाह रहे थे. वो सिसकने लगी थी और उससे अब कुछ बोलै नहीं जा रहा था.

"चलो शांत हो जाओ कुसुम. मुझे ये साडी कहानी पता है. मैं समझ सकती हु की ये सब तुम्हारे लिए कितना मुश्किल था. बाद में तो तुम्हारे माता पिता इस रिश्ते के लिए मान भी गए थे मगर उसके बाद भी तुमने विक्की से बात नहीं की और उससे अनबन hi राखी थी. इसकी क्या वजह थी.? क्या सिर्फ यही की तुम विक्की को किसी और का होते नहीं देखना चाहती थी.?" दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम ने कहा.

"हाँ, ये सच है की इसके पहले मैं अपने hi बारे में सोच रही थी. मैं शुरू से hi विक्की के करीब थी और फिर जब माँ पिता जी ने हमारे रिश्ते को स्वीकार कर लिया तो मुझे पता चला की माँ विक्की की शादी रचना से करना चाहती हैं. मैं ये नहीं चाहती थी की माँ विक्की की शादी उस रचना से करे जिसके बाप ने हमारे साथ हमेशा बुरा किया. जिसका बाप ऐसा था उसकी बेटी भी वैसी hi होगी." कुसुम ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"ऐसा ज़रूरी तो नहीं होता की जिसका बाप बुरा इंसान हो तो उसकी बेटी भी बुरी hi होगी और इसका सबूत तुम देख भी चुकी हो. उसी बुरे इंसान की बेटी की वजह से तुम सब पिछले पांच सालो से सही सलामत रहे हो. उसे भी विक्की से प्रेम था और उसी प्रेम की वजह से उसने वो सब किया था. आज के समय में ऐसा कौन है कुसुम जो उस प्रेम की खातिर इतना कुछ कर डाले जिस प्रेम के बारे में उसे अच्छी तरह पता हो की वो उसे मिल hi नहीं सकता.? रचना ने अपने प्रेम के लिए कितना बड़ा त्याग किया इसके बारे में तुम्हे सोचना चाहिए था. तुम्हारी माँ ने अगर उसकी शादी अपने बेटे से करने के बारे में सोचा तो इसमें कुछ भी गलत नहीं किया उन्होंने. उस बेचारी को उसके इतने बड़े त्याग का क्या कोई भी फल न मिले.? ये तो हर तरह से गलत हो जायेगा कुसुम." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम ने कहा.

"मैं मानती हु की उसने हमारे लिए बहुत कुछ किया है मगर इसका मतलब ये तो नहीं हो गया की वो अच्छी है. ये भी तो हो सकता है की उसने ये सब अपने बाप के कहने पर hi किया हो और हम सबसे झूठ मूठ की कहानी गढ़ दी हो की उसने सब कुछ विक्की के प्रेम पर किया." कुसुम ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"ये सब तुम्हारे सोचने का नजरिया है कुसुम और अगर एक बार के लिए मान भी ले की तुम उसके बारे में जो कुछ कह रही वो सच है तो बताओ की अगर उसके मन में यही होता तो वो गांव से तुम सबके साथ यहाँ क्यों आ जाती.? यहाँ आ कर वो तुम सबका ऐसा क्या बुरा कर सकती है वो भी अपने बाप के कहने पर.? उसके बाप के मन में ऐसा क्या होगा जो यहाँ आ जाने के बाद भी वो अपनी बेटी के द्वारा तुम सबका बुरा कर देगा.? नहीं kusum...ye सब तुम्हारा भ्रम है. मुझे कही से भी नहीं लगता की रचना या उसका बाप ऐसा कुछ करेंगे. रचना सच में एक अच्छी लड़की है और वो सच में विक्की से प्रेम करती है. उसने सब कुछ प्रेम की वजह से hi किया. तुम बेवजह उस पर शक कर रही हो और उसे अपना दुश्मन मानती हो." डकहीना ने ये कहा तो कुसुम कुछ न बोली.

"मुझे लगता है की तुम अब तक अपने और विक्की के शिव कुछ और सोच hi नहीं रही थी कुसुम. तुम अब तक सिर्फ यही सोचती रही हो की तुम अपने भाई से दिलो जान से प्रेम करती हो और वो सिर्फ तुम्हारा hi रहे. जब ऐसा नहीं हुआ तो तुम इसके लिए अपनी किस्मत को और खुद अपने hi प्रेमी यानी की अपने भाई को दोषी मानती रही. विक्की के करीब जो भी आया तुम उसे अपना दुश्मन मानने लगी. तुम अपने उन दुश्मनो का कुछ कर नहीं सकीय इस बात से तुम अंदर hi अंदर जलती रही. हाँ कुसुम यही सच hai...tum अब तक इसी जाल में फांसी रही या ये कहु की तुमने खुद को ऐसे hi जाल में अब तक फसाये रखा. अगर कभी इस जाल से बाहर आ कर खुद को शांत किया होता तो शायद तुम सबके बारे में सोच पाती की जिन्हे तुम अपना दुश्मन मानती रही हो वो तुम्हारे दुश्मन थे hi नहीं और न hi कोई विक्की को तुमसे छीनना चाहता था. बल्कि वो सब भी तुम्हारी तरह विक्की से सच्चा प्यार hi करते थे." दक्षिणा ने ये सब कहा तो कुसुम को एकदम से झटका सा लगा. उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे एकदम से उसके अंदर ज्ञान का प्रकाश फ़ैल गया हो और उसके मन का सारा अँधेरा दूर हो गया हो.

कुसुम ने एक लम्बी सी सांस ली और दक्षिणा की तरफ बड़े अजीब अंदाज़ से देखने लगी. उसके चेहरे पर पल पल कई तरह के भाव आते जा रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आँखों के सामने कई तरह की फिल्मे चलने लगी हो और वो उन्हें देख देख कर हैरान हो रही हो. दक्षिणा उसी के चेहरे की तरफ देख रही थी. वो देख रही थी की कुसुम किसी दूसरी hi दुनिया में खो गयी थी. उसे समझते देर न लगी की कुसुम के अंदर बदलाव शुरू हो चूका है. उसकी बातो ने उसके सोये हुए ज्ञान और विवेक को जगा दिया है. दक्षिणा काफी देर तक उसे यु hi चुपचाप देखती रही उसके बाद उसने अपने दोनों हाथो को कुसुम के कंधो पर रख कर उसे हलके से हिलाया. जिससे कुसुम दूसरी दुनिया से हकीकत की दुनिया में आ गयी. उसने फिर से दक्षिणा की तरफ देखा मगर इस बार कुसुम की आँखों में आँशु थे.

कुसुम के होठ कुछ कहने के लिए खुले ज़रूर मगर वो कुछ बोल न सकीय. उसका चेहरा एकदम से बिगड़ गया और वो फुट फुट कर रोने लगी. दक्षिणा ने उसे खींच कर अपने सीने से लगा लिया. दक्षिणा के सीने से लिपटी कुसुम तेज़ तेज़ सिसकिया ले कर रोये जा रही थी. दक्षिणा जानती थी की ये उसके दिल में बर्षो का जमा हुआ गुबार था जो आँशु बन कर बाहर निकल रहा था. इस लिए दक्षिणा ने उसे रोने दिया. वो चाहती थी की उसके अंदर का सारा गुबार निकल जाये और उसका मन हल्का हो जाये. कुछ देर बाद जब कुसुम का रोना कुछ काम हुआ तो दक्षिणा ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा.

"मैं मानती हु कुसुम की कुछ दुःख दर्द तुम्हे तुम्हारी किस्मत ने दिए मगर ये भी सच मानो की कुछ दुःख दर्द तुमने खुद अपने आपको दिए हैं. हर इंसान खुश रहने के लिए कोई न कोई जरिया खोजता है मगर तुमने खुश रहने का नहीं बल्कि दुखी रहने का जरिया खोजै और उसी में खुद को तड़पाती रही. खेर chhodo...mujhe लगता है की अब तुम्हे कुछ भी समझने की ज़रूरत नहीं है. अब तुम्हे समझ आ गया होगा की ज़िन्दगी में जब हम सबसे पहले दुसरो के बारे में अच्छा सोचते हैं तभी हमारे साथ भी अच्छा होता है." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम ने उससे अलग हो कर पहले अपने आंशुओ को पोछा फिर गंभीर हो के कहा.

"कितनी गलत थी मैं. सच में मैं कभी इस बारे में सोच hi नहीं पायी. आपको पता है मैं हर उस ब्यक्ति से नफरत करने लगी थी जो विक्की से जुड़ गया था. हे भगवन ये मैं क्या कर रही थी अब तक.? मैंने सबका दिल dukhaya...apni छोटी बहनो को बुरा भला कहा. अपने उस भाई को दुःख दिया जिसे दुःख देने के बाद मैं खुद भी तड़पती थी. कितनी बुरी हु न मैं.? क्या सोचते होंगे सब मेरे बारे में.? आज मेरी वजह से मेरा भाई इस हालत में पहुंच गया. मुझे याद है की वो कई बार मेरे पास मुझसे बात करने के लिए आया था मगर हर बार मैंने उसे गुस्से से दुत्कार दिया था. मैंने बहुत गलत किया aunty....meri गलतियों के लिए कोई माफ़ी नहीं हो सकती. जिस माँ ने मेरी ख़ुशी के लिए उस रिश्ते को स्वीकार कर लिया जो हर तरह से गलत था उसी माँ को तकलीफ दी मैंने. जो माँ अपनी बेटियों में सबसे ज़्यादा मुझे प्यार करती थी उसी के बेटे को मैंने इस हालत में पंहुचा दिया. क्या क्या नहीं बुरा किया मैंने." कुसुम ये सब कहते हुए बुरी तरह रोने लगी थी. दक्षिण ने उसे फिर से अपने सीने से लगा लिया था.

"सब कुछ किस्मत का खेल है कुसुम. ये सब होना लिखा था तो हो गया. हो सकता है की तुम सबको इतना सब सहना लिखा रहा हो इस लिए अब तक सहना पड़ा. मगर ये सच है की दुःख तकलीफ के बाद खुशियों के दिन भी आते हैं. मैं अब दावे के साथ कह सकती हु की अब से तुम सब बहुत खुश रहने वाले हो. इस लिए अपने आपको दोष मत दो कुसुम. बल्कि अब ये सोचो की तुमने सबके साथ जो नहीं किया अब तक वो तुम्हे करना है. सबके बारे में अच्छा सोचना है और अच्छा करना है मगर सबसे पहले तुम्हे अपने भाई के पास जाना चाहिए और उससे माफ़ी मांगना चाहिए. वैसे मैं जानती हु की तुम्हे माफ़ी मांगने ज़रूरत नहीं पड़ेगी उससे. क्यों की वो तुम्हे आज भी उतना hi प्रेम करता है जितना पहले करता था. वो आज भी तुम्हे उदास नहीं देख सकता. तुमने अब तक उसे अपनी कसम में बढ़ा हुआ है इस लिए वो कुछ कर नहीं सका था." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम की आँखों से फिर से आँशु बहने लगे.

"हाँ मैं जानती हु. वो इतना कुछ होने के बाद भी मुझसे नफरत नहीं करेगा. आपको पता है जब मुझे ये महसूस हुआ की जिसे मैं प्रेम करती हु वो भी मुझसे प्रेम करता है तो मैं उस दिन ख़ुशी से फूली नहीं समां रही थी. ऐसा लग रहा था मुझे जैसे दुनिया की साड़ी दौलत और साड़ी खुशिया मुझे मिल गयी हो. मगर ये महसूस करने के बाद भी मुझ में इतनी हिम्मत नहीं थी की मैं अपने उस महबूब से कह सकू की मैं उससे बहुत प्रेम करती हु. मैं उससे कहना चाहती थी की वो मुझे अपनी बहन समझ कर नहीं बल्कि अपनी एक दासी समझ कर अपने सीने से लगा ले मगर मैं ऐसा कहने की हिम्मत नहीं कर सकती थी. लाज और शर्म से इतना गाड़ी जा रही थी की मैं उसके सामने जाने से भी कटरा रही थी. उस दिन की मेरी वो ख़ुशी माँ को खटक गयी और फिर जाने कैसे उन्होंने मेरा मन पढ़ लिया. उसके बाद उन्होंने एक दिन मुझसे खुल कर कहा और मुझे खूब डाटा भी. प्रेम के जिस नशे में बावली हो कर मैं खुश हो गयी थी उस नशे को माँ की डाट ने एक झटके में उतार दिया था. मुझे इस बात का अहसास करा दिया गया की मैं अपने मन में जिस रिश्ते को पनाह देना चाहती हु वो हर तरह से गलत है और उसे जितना जल्दी हो सके अपने दिल और दिमाग से निकाल दू. उसके बाद तो जैसे मुझ पर दुःख और तकलीफो की बारिश होने लगी. भाई के चले जाने के बाद तो जैसे सब कुछ ख़तम hi हो गया था. हर रोज़ भगवन से दुआ मांगती की वो मेरे भाई को वापस घर भेज दे और पांच साल के बाद दुआ कबूल भी हुयी. जब भाई घर लौटा तो मैं बहुत खुश हुयी. बर्षो बाद मेरे चेहरे पर ख़ुशी की चमक आयी थी मगर माँ ने जब उस चमक को देखा तो वो फिर से मुझे समझने आ गयी. उस दिन के बाद से सब कुछ बदल गया. पिता जी के मरने के बाद माँ ने एक दिन मुझसे कहा की उन्हें मेरे और विक्की के रिश्ते से कोई परेशानी नहीं है बल्कि पिता जी ने खुद मरने से पहले ये कह दिया था उनसे की वो विक्की से मेरी शादी कर दे मगर तब जब हम सब उस गांव से कही दूर चले जाये. इस सबसे मैं फिर से बहुत खुश हो गयी मगर मेरी ये ख़ुशी ज़्यादा देर तक नहीं रही. एक रात मैंने देखा की मेरी दोनों बहने विक्की के कमरे में अपने hi भाई के साथ वो काम कर रही थी जो एक पति और पत्नी के बीच होता है. मुझे विक्की से ये उम्मीद नहीं थी और न hi अपनी बहनो से. उस वक्त मेरे दिल पर क्या गुज़री थी ये मैं hi जानती थी. अपने कमरे में जा कर मैं बहुत रोई. जिसके प्रेम में मैं पागल सी बन गयी थी वो अपनी छोटी बहनो के साथ वो सब कर रहा था. मैं चाह कर भी उससे नफरत नहीं कर पायी मगर मेरे मन में बहनो के लिए गुस्सा ज़रूर भर गया. इसके लिए एक दिन जब मैंने उन दोनों को डाटा तो वो दोनों उल्टा मुझे hi ज्ञान देने लगी. उस वक्त उनका वो ज्ञान मुझे ज़हर की सुई की तरह चुभ गया था जब की आज लगता है की मुझे वैसा नहीं करना चाहिए था. खेर उसके बाद एक दिन माँ ने मुझे अपने कमरे में बुलाया. मैंने देखा की माँ के साथ उनके कमरे में रचना भी थी. माँ ने जब ये कहा की वो विक्की की शादी हम तीनो बहनो के अलावा रचना से भी करेगी तो मेरे होश hi उड़ गए. मैं ये कभी बर्दास्त नहीं कर सकती थी की विक्की की शादी रचन से हो मगर मैं जानती थी और माँ ने कह भी दिया था की रचना को उसके प्रेम और उसके त्याग का फल उसे ज़रूर मिलेगा. ये सब सुन कर मैं एक पल के लिए उनके कमरे में नहीं रुकी बल्कि रट हुए अपने कमरे में चली आयी थी. अपने कमरे में मैं इसके लिए बहुत रोई मगर मुझे उम्मीद थी की विक्की रचना से शादी नहीं करेगा मगर मैं गलत थी. विक्की माँ के आदेश को ठुकरा नहीं सका और रचना से शादी करने के लिए तैयार हो गया. बस उसके बाद मैं कुछ भी सोचने समझने की हालत में नहीं रही. हर पल यही सोच सोच कर कुढ़ती रही की ये लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं.? विक्की सिर्फ मेरा hai...us पर किसी और का कोई हक़ नहीं हो सकता." कुसुम ने ये सब कहा और चुप हो गयी. उसके चुप होते hi कमरे में सन्नाटा छ गया. कुछ देर की ख़ामोशी के बाद दक्षिणा ने कहा.

"मैं समझ सकती हु कुसुम की उस समय तुम किस हालत से गुज़र रही थी. तुम अपने भाई के प्रेम में बावली हो चुकी थी और तुम हर पल बस यही सोचती थी की विक्की सिर्फ तुम्हारा है. मुझे लगता है की जिस मानसिक हालत में उस समय तुम थी उस हालत में कोई भी लड़की वैसा hi करती. खेर छोडो और ये बताओ की अब तुम क्या करोगी.?" दक्षिणा ने ये पूछा तो कुसुम ने कहा.

"मुझ में किसी से नज़र मिलाने की हिम्मत तो नहीं है मगर मैं सबसे अपने किये की माफ़ी मांगूगी और अपने भाई से कहुगी की वो मेरी गलतियों को भूल कर मुझे फिर से वैसा hi प्यार करे जैसे पांच साल पहले करता था. उससे कहुगी की वो अपनी उस दीदी को अपने सीने से लगा ले जो उसकी नज़र में दुनिया की सबसे सुन्दर और मासूम रही है." कुसुम ने सिसकते हुए ये कहा तो दक्षिणा की भी आँखे भर आयी. उसने उसे एक बार फिर से अपने सीने से लगा लिया और उसके सर पर प्यार से हाथ फेरने लगी.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
भय आपने बिना सोचे समझे इतनी बड़ी बड़ी बाते कह दी. ये देख कर ताज्जुब भी हुआ और दुःख भी. यहाँ पर सिर्फ आप hi मेरी स्टोरी को नहीं पढ़ते हैं बल्कि और भी बहुत से यार भाई हैं जो ये स्टोरी पढ़ते हैं मगर आपके शिव किसी ने भी ऐसी बात नहीं की और न hi ये सोचा की मैं अपने रीडर्स को क्या समझता हु. आपको अगर ऐसा लगता है तो मत पढ़ो मेरी स्टोरी को....

कुछ भी कहने से पहले ये भी सोच लेना चाहिए था की मैंने अगर इतने दिन से अपडेट नहीं दिया तो उसके पीछे मेरी कोई प्रॉब्लम भी रही होगी ना की ये की मैं अपने रीडर्स को तरसा रहा हु या उन्हें गली का कुत्ता समझता हु. मुझे आप जैसे राइटर & रीडर से इस बात की बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी भय. आप भी स्टोरी लिखते हैं तो क्या आपके साथ कभी कोई प्रॉब्लम नहीं होती.? सबकी लाइफ में प्रोब्लेम्स हो जाती हैं....

भाई लोग मैंने स्टोरी के दो अपडेट तैयार कर लिए थे पोस्ट करने के लिए. मैं चाहता था की इस बार एक साथ दो अपडेट दुगा और आप सबको खुश कर दुगा मगर मेरा नसीब hi खराब था की मेरा फ़ोन hi चलती मोटर सिक्ले से गिर गया और फ़ोन की स्क्रीन टूट गयी. फ़ोन की स्क्रीन टूट जाने से मैं कितना दुखी और परेशां हुआ ये मैं जनता हु. मैं ये बता भी नहीं सकता था आप लोगो को की क्या हुआ. कल शाम को फ़ोन बना तो रात को जाग कर और आज तक में एक अपडेट तैयार किया. मुझे भी पता है की मेरे रीडर्स अपडेट का वेट करते होंगे. मैं अपने रीडर्स को न hi तरसना चाहता हु और न hi उन्हें गली का कुत्ता समझता हु. वो सब मेरे यार भाई हैं....

मैं इस बात को कई बार बता चूका हु की मैं ये स्टोरी कम्पलीट करुगा मगर आप लोगो को मुझ पर भरोसा नहीं है. अगर चार दिन अपडेट न आया तो आप ऐसा बोलने लगते हैं. यहाँ पर बहुत सी स्टोरी ऐसी हैं जिनमे महीनो अपडेट नहीं आते फिर भी लोग वेटिंग के कमेंट की लाइन लगा देते हैं. खेर छोडो भय मैंने अपडेट दे दिया है एन्जॉय कीजिये....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 50


"मैं समझ सकती हु कुसुम की उस समय तुम किस हालत से गुज़र रही थी. तुम अपने भाई के प्रेम में बावली हो चुकी थी और तुम हर पल बस यही सोचती थी की विक्की सिर्फ तुम्हारा है. मुझे लगता है की जिस मानसिक हालत में उस समय तुम थी उस हालत में कोई भी लड़की वैसा hi करती. खेर छोडो और ये बताओ की अब तुम क्या करोगी.?" दक्षिणा ने ये पूछा तो कुसुम ने कहा.

"मुझ में किसी से नज़र मिलाने की हिम्मत तो नहीं है मगर मैं सबसे अपने किये की माफ़ी मांगूगी और अपने भाई से कहुगी की वो मेरी गलतियों को भूल कर मुझे फिर से वैसा hi प्यार करे जैसे पांच साल पहले करता था. उससे कहुगी की वो अपनी उस दीदी को अपने सीने से लगा ले जो उसकी नज़र में दुनिया की सबसे सुन्दर और मासूम रही है." कुसुम ने सिसकते हुए ये कहा तो दक्षिणा की भी आँखे भर आयी. उसने उसे एक बार फिर से अपने सीने से लगा लिया और उसके सर पर प्यार से हाथ फेरने लगी.

अब आगे पढ़िए....


अभी दक्षिणा कुसुम को सीने से लगाए उसके सर पर प्यार से हाथ hi फेर रही थी की तभी कमरे का दरवाज़ा खटखटाया गया. दरवाज़े पर हुयी दस्तक को सुन कर दक्षिणा ने कुसुम को खुद से अलग किया और फिर उसकी तरफ प्यार से देखते हुए मुस्कुरा कर कहा.

"इन साड़ी बातो में मैं ये भूल hi गयी थी की मैंने सविता को खाना बनाने के लिए कहा था. लगता है बना लिया है उसने और अब वो हम दोनों को खाने के लिए बुलाने आयी है. तुम चलो मैं भी कपडे पहन के आती हु." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम ने हलके से अपना सर हाँ में हिलाया और फिर वो बीएड से उतर कर दरवाज़े की तरफ बढ़ गयी.

कुसुम के जाने के बाद दक्षिणा ने दो तीन बार गहरी सांस ली. ऐसा लगा जैसे उसके सर से बहुत बड़ा बोझ हैट गया हो. वैसे देखा जाये तो कुसुम को समझने का ये बोझ hi तो था. एक ऐसा समझने वाला बोझ जो शायद बहुत hi मुश्किल था. खेर कुसुम के जाने के बाद दक्षिणा ने भी कपडे पहने और कमरे से बाहर आ गयी.

डाइनिंग टेबल के आमने सामने राखी कुर्सियों पर दक्षिणा और कुसुम बैठी खाना खा रही थी. सविता ने सच में बहुत hi अच्छा खाना बनाया था. दक्षिणा ने खाना कहते वक्त hi कुसुम को सविता और उसकी बेटी के बारे में बता दिया था.

खाना खाने के बाद दक्षिणा ने कुसुम को एक अलग कमरे में आराम करने के लिए कह दिया था. कुसुम की इच्छा थी की वो दक्षिणा से उसके और विक्की के रिश्ते के बारे में विस्तार से जाने मगर दक्षिणा ने उससे कहा था की वो बाद में उसे सब कुछ बता देगी. अभी ज़रूरी ये है की वो आराम करे और अपने दिल और दिमाग से पिछली सभी बातो को निकालने की कोशिश करे.

कुसुम को दक्षिणा ने बताया की वो कुछ देर आराम करने के बाद उसकी माँ के लिए खाना ले कर हॉस्पिटल जाएगी. दक्षिणा की इस बात से कुसुम ने उससे कहा की वो भी उसके साथ जाएगी मगर दक्षिणा ने उसे इस वक्त जाने से मन कर दिया. उसने उसे समझाया की उसकी माँ इस हादसे की वजह से अभी उससे बहुत नाराज़ है और इस वक्त अगर वो उनके सामने गयी तो हो सकता है की वो उसके लिए अच्छा न हो.

शाम होने से पहले hi दक्षिणा खाने का एक टिफिन एक छोटे थैले में ले कर हॉस्पिटल निकल गयी थी और सविता को समझा भी गयी थी की वो कुसुम का हर तरह से ख़याल रखे. घर से बाहर आने के बाद दक्षिणा को याद आया था की प्रिय पूजा और रचना इस वक्त अकेली hi होंगी. उसे इस बात का भी अहसास था की विक्की की वजह से हो सकता है की उन तीनो ने खाना पीना न किया हो. इस लिए दक्षिणा एक बार इस बात की तसल्ली कर लेना चाहती थी.

दक्षिणा ने विक्की वाले घर के दरवाज़े पर पहुंच कर दूर बेल्ल बजाय तो कुछ hi देर में दरवाजा खुला. उसके सामने पूजा कड़ी थी. पूजा का हुलिया देख कर hi दक्षिणा समझ गयी की हॉस्पिटल से आने के बाद उसने नहाया नहीं है. उधर दरवाज़े पर दक्षिणा को देख कर पूजा के चेहरे पर हल्का ख़ुशी के भाव उभरे और उसने एक तरफ हैट कर दक्षिणा को अंदर आने का रास्ता दिया.

घर के अंदर आ कर दक्षिणा ने हर जगह का बारीकी से जायज़ा लिया और फिर सोफे पर बैठी प्रिय पूजा और रचना की तरफ देखा. तीनो में से रचना फ्रेश लग रही थी जबकि प्रिय पूजा वैसी hi थी जैसी हॉस्पिटल से आने के वक्त थी.

"तुम लोगो ने कुछ खाया पिया है या ऐसे hi भूखी प्यासी यहाँ पर बैठी हुयी हो.?" दक्षिणा ने तीनो की तरफ देखते हुए ये कहा तो रचना ने कहा.

"अच्छा हुआ की आप आ गयी. मैं तो इन दोनों को समझा समझा के थक गयी हु मगर ये दोनों सुनती hi नहीं हैं. हॉस्पिटल से आने के बाद hi मैंने इन दोनों से कहा था की नाहा धो कर फ्रेश हो जाओ. उसके बाद खाना पीना भी कर लो. मैंने ये भी कहा की माँ जी हॉस्पिटल में हैं तो मैं उनके खाने के लिए खाना भी पैक कर दूगी. मगर सब कुछ रेडी रखने के बाद भी ये दोनों तब से ऐसी hi बैठी हुयी हैं." रचना ने ये सब बताया तो दक्षिणा ने प्रिय पूजा की तरफ देखते हुए कहा.

"मैंने तो सुना था की तुम दोनों बहुत समझदार और बहुत होशियार हो मगर लगता है की जिसके द्वारा भी मैंने ये सुना था उसने झूठ बोलै था मुझसे. हॉस्पिटल जा कर विक्की से पूछूगी की उसने मुझसे तुम दोनों के बारे में ऐसा झूठ क्यों बोलै था.?" दक्षिणा ने ये कहा तो प्रिय पूजा दोनों ने एकदम से उसकी तरफ हैरानी से देखा.

"भाई ने आपसे ऐसा कब कहा.? क्या वो आपके यहाँ रहते थे पहले.?" पूजा ने हैरानी से ये पूछा तो दक्षिणा ने कहा.

"हाँ वो हमारे यहाँ hi रहता था और हमारी फैक्ट्री में काम करता tha..aaj भी करता है. पिछले पांच सालो से वो हमारे यहाँ hi था. हमेशा तुम दोनों के बारे में वो बाते करता था और कहता था की उसकी दो जुड़वाँ बहने हैं जो परियो से काम नहीं हैं. वो दोनों बहुत सुन्दर हैं और बहुत ज़्यादा चंचल भी. खेर छोडो ये बात मैं बस ये कहना चाहती हु की तुम दोनों भगवन का शुक्र मनाओ की तुम्हारे भाई को कुछ नहीं हुआ. उसे तुम सबके प्यार ने कुछ नहीं होने दिया. वो तुम सब से बहुत प्यार करता है और जब उसे पता चलेगा की उसकी परियो ने खाना पीना कुछ नहीं किया तो सोचो उसे कितनी तकलीफ होगी. इस लिए किसी बात के लिए अब तुम दोनों दुखी न हो. बल्कि इस बात की ख़ुशी मनाओ की तुम्हारा भाई सही सलामत है." दक्षिणा ने ये सब कहा तो प्रिय ने कहा.

"ये सब कुसुम दीदी की वजह से हुआ है आंटी. उन्हें hi भाई से कोई प्यार नहीं था वर्ण वो ऐसा नहीं करती. अगर भाई को कुछ हो जाता तो इस अजनबी शहर में हम सबका क्या होता.? हम सब किसके सहारे यहाँ रहते.? हम सब तो जीते जी hi मर जाते." प्रिय ने सिसकते हुए ये कहा तो दक्षिणा ने आगे बढ़ कर उसके सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा.

"जो हो गया उसे अब भूल जाओ प्रिय. ये समझो की बुरे वक्त का वो आखिरी समय था. ये तो अच्छा hi हुआ न की बुरे वक्त का वो आखिरी वक्त भी चला गया. अब जो वक्त शुरू होगा वो एक नया वक्त शुरू होगा जिसमे बस खुशिया hi खुशिया होंगी. चलो अब शांत हो jaao...aur जाओ तुम दोनों भी फ्रेश हो जाओ. उसके बाद तीनो साथ में बैठ कर खाना. माँ और विक्की की फ़िक्र मत करो. ये जो तुम मेरे हाथ में थैला देख रही हो na...isme टिफिन है और इसमें तुम्हारी माँ के लिए खाना है. मैं उन्हें hi ये ले कर जा रही थी हॉस्पिटल मगर फिर तुम लोगो का ध्यान आ गया तो यहाँ चली आयी. अच्छा हुआ की चली आयी yaha...warna मुझे कैसे पता चलता की तुम सब ऐसे hi बैठी हुयी हो.?" दक्षिणा ने ये सब कहा तो रचना ने कहा.

"मैं भी यही सब इन दोनों को समझा रही थी आंटी मगर ये दोनों कुछ समझ hi नहीं रही थी." रचना ने ये कहा तो दक्षिणा ने प्रिय पूजा की तरफ देखते हुए कहा.

"मुझसे वडा करो तुम दोनों की अब से ऐसा नहीं करोगी." दक्षिणा ने ये कहा तो प्रिय पूजा दोनों ने हाँ में सर हिलाया.

रचना ने बताया की उसने खाना बना लिया था. वो बस इन दोनों का hi वेट कर रही थी. खेर दक्षिणा के समझने पर प्रिय पूजा उठी और फ्रेश होने के लिए चली गयी. उन दोनों के जाने के बॉस दक्षिणा ने रचना से कहा.

"इन दोनों में अभी भी बचपना है. तुम इन दोनों का ख़याल रखना और खुद का भी. विक्की के बारे में बिलकुल भी फ़िक्र मत करना. मैं सब ठीक कर दूगी." दक्षिणा ने ये कहा तो रचना के चेहरे पर ख़ुशी के भाव उभर आये.

"आप सच में बहुत अच्छी हैं आंटी. आपने हम सबके लिए इतना कुछ किया. ऐसा आज के समय में कौन करता है.?" रचना ने ये कहा तो दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"ऐसा वही करता है रचना जो उसका अपना हो या फिर वो किसी को अपना समझता हो. खेर चलो अब मैं चलती हु और हाँ मैं तुम्हारी होने वाली सासु माँ को यहाँ आने का कहुगी. वैसे वो मानेगी तो नहीं पर मैं कोशिश करुँगी." दक्षिणा ने ये कहा तो रचना ने उसे हैरानी से देखा.

"आप ये सब..." रचना अभी कुछ बोलने hi वाली थी की दक्षिणा ने उसकी बात बीच में hi काट कर मुस्कुराते हुए कहा.

"मुझे सब पता है रचना और हाँ तुम्हे इस बारे में हैरान होने की कोई ज़रूरत नहीं है. अच्छा अब मैं चलती hu...sabka ख़याल रखना और अगर किसी बात की ज़रूरत पड़े तो मुझे फ़ोन कर देना. ये मेरा कार्ड है. इसमें मेरा नंबर है." दक्षिणा ने अपने मिनी पुरष से एक विजिटिंग कार्ड रचना को देते हुए कहा तो रचना ने उस कार्ड को हाथ बढ़ा कर ले लिया और उसे देखने लगी.

कार्ड देने के बाद दक्षिणा ने टिफिन का थैला उठाया और बाहर की तरफ चल पड़ी. उसके पीछे पीछे रचना भी दरवाज़े तक आयी. जब दक्षिणा दरवाज़े से बाहर निकल गयी तो रचना ने दरवाज़े को बंद कर दिया.

दक्षिणा जब हॉस्पिटल पहुंची तो विक्की की माँ को उसने विक्की के बीएड के पास hi राखी कुर्सी पर बैठे पाया. कुर्सी की पिछली सतह से तक लगाए बैठी विक्की की माँ किसी गहरे खयालो में खोयी हुयी थी. यहाँ तक की उसे दक्षिणा के आने का भी आभास नहीं हुआ. उधर बीएड पर विक्की आँखे बंद किये शायद सो रहा था.

दक्षिणा को समझ न आया की वो विक्की की माँ को क्या कह कर पुकारे.? यु तो वो भी उसकी hi उम्र की थी और वो उसे बहन या दीदी कह सकती थी मगर क्यों की विक्की से उसका प्रेम सम्बन्ध था और वो कही न कही ये भी चाहती थी की विक्की उसका पति बन जाये. इस लिए इस रिश्ते से उसे विक्की की माँ को बहन या दीदी बोलने में थोड़ा झिझक सी महसूस हो रही थी.

वैसे इस वक्त वो विक्की की माँ यानी रेणुका को बहन या दीदी hi कहे तो बेहतर था और ये बात वो भी जानती थी क्यों की जो वो बोलना चाहती थी उसको बोल देने से एक नया बखेड़ा खड़ा हो सकता था. पता नहीं क्यों इस बात के बारे में सोच कर दक्षिणा को मन hi मन हसी भी आयी और थोड़ा शर्म भी महसूस हुयी.

दक्षिणा बीएड के पास कड़ी कुछ देर तक यही सब सोचती रही उसके बाद उसने एक लम्बी सांस ली और रेणुका के पास चल कर आयी. रेणुका का चेहरा विक्की की तरफ था और वो दक्षिणा को साइड से बैठी दिख रही थी.

"आप इस तरह कब तक बैठी rahegi...aur यहाँ कुछ खाया पिया भी है या सुबह से ऐसे hi भूखी बैठी हैं.?" दक्षिणा ने रेणुका के कंधे पर अपने हाथ का थोड़ा सा दबाव देते हुए ये कहा तो रेणुका एकदम से चौंक गयी. वो कही खोयी हुयी थी इस लिए जब अचानक से उसके कंधे पर दक्षिणा का हाथ पड़ा तो वो दर कर चौंक पड़ी थी.

रेणुका ने अपने सर को ऊपर की तरफ उठा कर दक्षिणा की तरफ देखा. जैसे समझने की कोशिश कर रही हो वो कहा और किस हालत में है. कुछ पालो तक देखते रहने के बाद उसने दो तीन बार गहरी गहरी साँसे ली उसके बाद बोली.

"आप यहाँ कब आयी.?" रेणुका ने दक्षिणा को जब 'आप' कहा तो दक्षिणा को बड़ा अजीब सा लगा. साथ hi उसे ऐसा भी महसूस हुआ जैसे वो रेणुका से उम्र में बड़ी हो. मगर उसने इस बारे में कुछ नहीं कहा. बल्कि ये कहना ज़्यादा सही होगा की वो इस बारे में उससे कुछ कह hi नहीं सकती थी. क्यों की उससे कई सरे सवाल खड़े हो जाते.

"मैं तो अभी कुछ देर पहले hi आयी हु और हाँ आपके लिए खाना भी ले आयी हु. इस लिए आप सबसे पहले हाथ मुँह धो कर ये खाना खा लीजिये." दक्षिणा ने बहुत hi अपनेपन से और बड़े सम्मान से ये कहा तो रेणुका ने कहा.

"ारी आपने इसकी तकलीफ क्यों की बहन जी.? मुझे तो बिलकुल भी भूख नहीं है और मैं तो कई दिनों तक अपने बेटे के पास ऐसे hi बैठी रह सकती हु." रेणुका ने जब दक्षिणा को 'बहन जी' कहा तो दक्षिणा को बड़ा अजीब लगा. उसके मन में ख़याल उभरा की 'मैं तो आपके बेटे की बीवी बनना चाहती हु माँ जी और आप मुझे बहन जी बना रही हैं'. मगर ऐसा उसने कहा नहीं.

"इसमें तकलीफ जैसी कोई बात नहीं है. अगर विक्की आपका बीटा है तो मेरा भी कुछ न कुछ लगता hi है. पिछले पांच सालो से ये हमारे यहाँ रहा और हमारी फैक्ट्री में काम करता रहा. सच कहु तो जब से आपका बीटा हमारे यहाँ आया है तब से हमें कारोबार में बहुत मुनाफा हुआ है. हमने आपके बेटे को कभी भी गैर नहीं समझा और उसका सबसे बड़ा सबूत यही है की इस वक्त मैं यहाँ हु." दक्षिणा ने ये सब कहा तो रेणुका के चेहरे पर ख़ुशी के भाव उभर आये. वो कुर्सी से उठ कर कड़ी हो गयी.

"ज़रूर मेरे बेटे ने पिछले जन्म में कोई बहुत hi अच्छे पुण्य किये रहे होंगे जिसकी वजह से उसे आप जैसे लोगो का सहारा मिला था. वर्ण जैसी हालत में उसे घर से निकाल दिया गया था उस हालत में उसका भगवान् hi मालिक हो सकता था. मैं आपका लाखो बार भी शुक्रिया ऐडा करू तो शायद काम hi होगा." रेणुका ने दक्षिणा का एक हाथ पकड़ कर हल्का दुखी हो के ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"इसमें शुक्रिया ऐडा करने जैसी कोई बात नहीं है. फिर भी अगर आप शुक्रिया ऐडा करना चाहती हैं तो शुक्रिया में बस यही कीजिये की ये खाना खा लीजिये." दक्षिणा ने अपने दूसरे हाथ में पकडे थैले की तरफ इशारा करते हुए ये कहा तो रेणुका उसे देख कर मुस्कुरायी.

"अब अगर इसके बाद भी मैं आपके कहने पर खाना खाने से इंकार करू तो शायद ये ठीक नहीं लगेगा. मुझे भूख तो नहीं है मगर सिर्फ आपकी ख़ुशी के लिए मैं खा लेती हु." रेणुका ने ये कहा तो दक्षिणा के चेहरे पर ख़ुशी की चमक आ गयी.

रेणुका को खाना खाने से पहले हाथ मुँह धोना था इस लिए दक्षिणा ने टिफिन के थैले को वही कुर्सी पर रखा और दक्षिणा को ले कर बाथरूम की तरफ चली गयी. कुछ देर में वो दोनों वापस आयी और फिर दक्षिणा ने खुद टिफिन से खाना निकला और उसे अलग अलग रख कर सजाया. रेणुका मन करती hi रह गयी मगर दक्षिणा न मानी.

दक्षिणा को ये सब करने से बहुत ख़ुशी महसूस हो रही थी. उसे ऐसा लग रहा था जैसे रेणुका सच में उसकी सास हो और वो अपनी सास के लिए अपने हाथो से खाना सजा रही हो. उसका बस चलता तो वो रेणुका को अपने हाथो से खाना भी खिलाती मगर इस वक्त वो ऐसा नहीं कर सकती थी. दक्षिणा ने मन hi मन भगवन को याद किया और उनसे विनती करते हुए कहा की 'हे भगवन आप तो मेरे मन का सब हाल जानते हैं. इस लिए मैं आपसे बस यही प्रार्थना करती हु की आप मेरे मन की ये मुराद पूरी कर दीजिये'.

दक्षिणा के बार बार कहने पर रेणुका को भर पेट खाना खाना hi पड़ा. सविता ने बहुत hi अच्छा खाना बनाया था. ये बात रेणुका ने भी दक्षिणा से कहा था. रेणुका को यही लगता था की खाना दक्षिणा का बनाया हुआ था. खाना खाने के बाद रेणुका बाथरूम चली गयी हाथ धोने के लिए. जबकि दक्षिणा टिफिन को बंद करने लगी थी.

बीएड पर विक्की आँखे बंद किये शायद सो रहा था. उसके हाथ पेअर और सर पर पत्तिया बढ़ी हुयी थी. डॉ ने बताया था की विक्की का लेफ्ट वाला हाथ टूट गया था और बाकी जगहों पर खरोंचे थी. इसके अलावा सर पर चोट लगी थी. वो तो अच्छा हुआ की उसकी किस्मत खराब नहीं थी वर्ण उसके साथ बहुत कुछ हो सकता था.

खाना खाने के बाद जब रेणुका बाथरूम में हाथ मुँह धोने चली गयी थी तो दक्षिणा ने पहले टिफिन को वापस पैक किया और फिर उसे थैले में दाल दिया था. उसके बाद उसने सविता को फ़ोन लगा कर उसे हॉस्पिटल आने के लिए कह दिया था.

रेणुका जब वापस आयी तो उसने एक दूसरी कुर्सी में दक्षिणा को बैठे पाया. दक्षिणा दिल से ये चाहती थी की रेणुका वापस घर चली जाये और घर जा कर आराम करे. वो सुबह जब से यहाँ आयी थी तब से hi अपने बेटे के पास थी. दक्षिणा को पता था की रेणुका को वापस घर भेजना आसान नहीं होगा क्यों की सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो जायेगा की विक्की के पास उसके बाद कौन रहेगा और अगर दक्षिणा ये कहती है की वो खुद रह जाएगी रात में तो उसकी इस बात से सवाल भी खड़े हो जायेगे. रेणुका के मन में ये ख़याल उभर सकता है की एक परायी औरत उसके बेटे के पास रात में रहने की बात कैसे कर सकती है.? मन की विक्की उसके यहाँ नौकरी करता है मगर उसका यहाँ रुकने की बात कहना जल्दी से हजम होने वाली बात नहीं होगी.

उधर रेणुका आयी और फिर से उसी कुर्सी पर बैठ गयी जिसमे वो पहले बैठी थी. इधर दक्षिणा को समझ नहीं आ रहा था की वो कैसे इस बारे में रेणुका से बात शुरू करे.? उसका तो इस बारे में सोच कर hi दिल बुरी तरह धड़कने लगा था. एकदम से hi उसके अंदर घबराहट भर गयी थी.

"आप सुबह से यहाँ हैं और मुझे लगता है की आपने नहाया भी नहीं है. इस लिए अच्छा होता अगर आप घर चली जाये और फ्रेश हो कर आराम करे." दक्षिणा ने धड़कते दिल से ये कहा तो रेणुका ने मुस्कुराते हुए कहा.

"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है बहन जी और वैसे भी मेरा बीटा जब तक ठीक हो के घर नहीं आ जाता तब तक मैं आराम करने का सोच भी नहीं सकक्ति. मैं तो बस अपने बेटे के पास hi रहना चाहती हु." रेणुका ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"ऐसा आप इस लिए कह रही हैं क्यों की आप अपने बेटे से बहुत प्यार करती हैं और हर माँ ऐसा hi अपने बेटे से प्यार करती है. मगर ज़रा ये भी तो सोचिये की इस बेटे के अलावा भी आपकी दो बेतिया हैं और एक होने वाली बहु भी. जो की इस वक्त उतने बड़े घर में अकेली hi हैं. उनके बारे में भी सोचिये आप." दक्षिणा ने ये कहा तो रेणुका को सच में ख़याल आया की विक्की के अलावा भी उसके बच्चे हैं. दक्षिणा बड़े ध्यान से रेणुका को hi देख रही थी और उसके चेहरे पर एकदम से उभर आये सोच के भावो को भी.

"मैं आते वक्त डॉक्टर से मिली थी और उनसे बात भी की थी. डॉक्टर ने यही कहा की विक्की के लिए चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है. उसकी देख भाल के लिए यहाँ चौबीसो घंटे नर्स और हॉस्पिटल के दूसरे कर्मचारी रहते हैं. डॉक्टर ने ये भी कहा की रात में यहाँ रुकना अल्लोव नहीं है. इसी लिए मैं आपसे कह रही थी की आप विक्की के लिए इतना चिंतित मत होइए और घर जा कर आराम कीजिये." दक्षिणा ने डॉक्टर वाली बात झूठ के रूप में कही थी. जिसे सुन कर रेणुका ने कहा.

"ये कैसा हॉस्पिटल है बहन जी की यहाँ मैं अपने बेटे के पास रात में रह भी नहीं सकती.?" रेणुका ने इस बार थोड़ा आहात भाव से ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"रात में यहाँ रुकने नहीं देते हैं. डॉक्टर का कहना है की हम हर मरीज़ का बहुत अच्छे से ख़याल रखते हैं इस लिए घर वालो को यहाँ रुकने की ज़रूरत hi नहीं है. डॉक्टर तो ये भी कहते हैं की दिन में भी यहाँ ज़्यादा देर तक रुकने की ज़रूरत नहीं है. मगर आप तो जानती हैं की किसी भी मरीज़ के घर वाले ऐसा नहीं कर सकते. रात में वो भले hi न रुकने पाए मगर दिन में तो वो आएंगे hi." दक्षिणा ने ये कहा तो रेणुका ने कहा.

"मुझे डॉक्टर से बात करना है बहन जी. मैं डॉक्टर से हाथ जोड़ कर विनती करुँगी की वो मुझे अपने बेटे के पास रुकने दे." रेणुका ने दुखी भाव से ये कहा तो दक्षिणा मन hi मन हड़बड़ा गयी. मगर उसने जल्दी से खुद को सम्हाला और फिर कहा.

"इतना अधीर क्यों होती हैं aap...aur आपको क्या लगता है मैंने डॉक्टर से ये बात नहीं की होगी.? मुझे पता है की आप अपने बेटे के पास hi रहना चाहेगी इस लिए मैंने डॉक्टर से कहा और उनसे विनती भी की अगर आप यहाँ रात में अपने बेटे के पास रुकना चाहे तो वो आपको रुकने दे मगर वो नहीं माने. कहने लगे की ऐसा नहीं हो सकता. सबके लिए एक hi कानून है. घर के किसी भी सदस्य को यहाँ रात में रुकने की अनुमति नहीं है." दक्षिणा ने ये कहा तो रेणुका इस बार कुछ न बोली. उसने आहात भाव से बस गहरी सी सांस ली.

दक्षिणा को इस बारे में रेणुका से झूठ बोल कर बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था. वो इस झूठ के लिए मन hi मन भगवान् से माफ़ी भी मांग रही थी. वैसे भी उसके इस झूठ में उसका कोई बुरा इरादा नहीं था और न hi वो विक्की या उसकी माँ के लिए बुरा सोच सकती थी. वो तो बस यही चाहती थी की विक्की की माँ घर जा कर आराम करे. उसके मन में कोई खोट नहीं था.

अभी दक्षिणा ये सोच hi रही थी की तभी उसका मोबाइल फ़ोन बजा. उसने पर्श से निकाल कर मोबाइल की स्क्रीन पर देखा. कॉल सविता का था. ये देख कर दक्षिणा ने कॉल उठाया और मोबाइल कान से लगा लिया. फ़ोन पर सविता ने दक्षिणा को बताया की वो हॉस्पिटल पहुंच गयी है और इस वक्त वो हॉस्पिटल के अंदर आ गयी है. मगर उसे ये नहीं पता की दक्षिणा कहा पर है. उसकी इस बात से दक्षिणा ने उससे कहा की वो आ रही है उसके पास.

फ़ोन वापस पर्श में रखने के बाद दक्षिणा ने रेणुका को बताया की उसके घर की एक नौकरानी का फ़ोन था. उसने उसे यहाँ पर बुलाया था जो की वो आ चुकी है. खेर रेणुका को बता कर दक्षिणा कमरे से बाहर निकल गयी. दक्षिणा के जाने के बाद रेणुका ने विक्की की तरफ देखा. वो वैसे hi आँखे बंद किये सो रहा था. उसे इस तरह आराम से सोता देख कर रेणुका ने उसके चेहरे को हलके से सहलाया.

मैं पहले सो hi रहा था मगर जब दक्षिणा और माँ की बाते मेरे कानो में पड़ी तो मेरी नींद खुल गयी थी मगर मैंने आँखे खोल कर दोनों को देखना सही नहीं समझा था उस वक्त. मैं सुन्ना चाहता था की दक्षिणा मेरी माँ से क्या बाते करती है और इस लिए मैं आँखे बंद किये चुप चाप पड़ा hi रहा. मुझे ये सुन कर और जान कर बहुत अच्छा लगा की दक्षिणा को मेरी माँ की इतनी फ़िक्र थी और वो माँ के लिए खाना ले के आयी थी.

मुझे महसूस हो रहा था की सब में बदलाव हुआ है. दक्षिणा में भी बदलाव हुआ है. इसके पहले वो भी कुसुम दीदी की तरह अपने बारे में hi सोचती थी. मगर अब ऐसा नहीं था. बल्कि अब तो ऐसा था जैसे वो मेरे परिवार का हिस्सा बनती जा रही थी. वो मेरे परिवार को अपना hi परिवार समझ रही थी और जैसे उसने एक जिम्मेदारी को अपने कंधे पर रख लिया था. वो जिम्मेदारी उसी परिवार की थी जिसे अब वो अपना समझने लगी थी.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट....

थैंक्स भय इतने अच्छे रिव्यु के लिए....

यारा मैं मोबाइल में hi टाइप करता हु. मुझे मोबाइल में टाइप करके अपडेट देने में ज़्यादा इजी लगता है. आप देख hi रहे हैं की मेरा हर अपडेट दो अपडेट से काम नहीं होता. लाइफ में सबके पास कुछ न कुछ काम धाम होता hi है. उसके बिना लाइफ में गुज़ारा नहीं है. इसी चक्कर में अपडेट आने में देर हो जाती है मगर उस देर की भरपाई मैं हर बार मेगा अपडेट दे कर करता हु. मैंने देखा है की कुछ राइटर जो डेली अपडेट देते हैं उनके अपडेट कितने छोटे हैं. मैं उन वरिटेरस की बुराई नहीं करता. क्यों की मुझे पता है की सबकी अपनी अपनी सोच है. उनकी सोच शायद ये है की अपडेट भले hi छोटा दो मगर डेली दो. इससे रीडर्स को यही लगेगा की बाँदा डेली अपडेट देता है....

मास्स भय से मेरी कोई नाराज़गी नहीं है भय. हाँ उनकी बात से थोड़ा बुरा ज़रूर लगा मुझे. उन्होंने मेरी पिछली बातो का हवाला दिया जबकि मैं पिछले सब कुछ भूल चूका हु और इस बारे में मैंने यहाँ पर बोलै भी था. मेरा बस यही कहना है की अपडेट आने की देरी पर कोई भी रीडर हताश न हो और न hi नाराज़ हो. इस बात को ज़रूर याद रखे की मैंने स्टोरी कम्पलीट करने के लिए hi कहा है तो ये स्टोरी मैं ज़रूर कम्पलीट करुगा. मुझे भी ख़ुशी होगी की मैंने अपनी स्टोरी कम्पलीट की. किसी चीज़ का इंतज़ार कभी भी कड़वा फल नहीं देता....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 227....

रीड & एन्जॉय....
 
भय आपको मेरी पिछली ये बाते तो याद रही मगर ये बात भूल गए की मैंने बाद में क्या कहा था. मैंने हमेशा यही कहा है की ये स्टोरी ज़रूर कम्पलीट करुगा. ये कभी नहीं कहा की स्टोरी अधूरी छोड़ दुगा. अपडेट आने में देर हो सकती है मगर इसका मतलब ये नहीं है की स्टोरी को मैंने अधूरी छोड़ दी....

यारा मैं आपसे ऐसी बातो की उम्मीद नहीं करता था. पिछली बातो को भुला चूका हु मैं और नई ईयर से नई स्टार्टिंग की है और ये बात भी मैंने सबसे बताया था. खेर छोडो भय और हाँ प्ल्ज़ ये मत समझना की मैं आपकी बातो से नाराज़ हु. मैं ये भी समझता हु की आपका इरादा मेरा दिल दुखने का नहीं था. सो चिल यारा....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 227....

रीड & एन्जॉय.....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट....

थैंक्स भय इतने अच्छे रिव्यु के लिए....

मेरे मन में अचानक hi ये ख़याल आया था की कुछ ऐसा हो जिसकी उम्मीद किसी ने न की हो और जो अनएक्सपेक्टेड हो. पहले मैंने सोचा था की दक्षिणा के बारे में रचना के द्वारा फ्लैशबैक में बताउगा मगर फिर मैंने सोचा की क्यों न ऐसा करू की जिससे सब दर रहे हैं उसी को शामिल किया जाये. वही किया maine....aapne देखा की कैसे मैंने कुसुम को गायब होने का सन क्रिएट किया और दक्षिणा को उसके पीछे लगाया. यहाँ पर मैं चाहता तो कुसुम को विक्की के पास भी भेज सकता था उससे माफ़ी मगवाने के लिए मगर मैंने ऐसा नहीं किया. क्यों की मेरे मन में तभी ख़याल आया था की कुसुम को दक्षिणा के पास भेजना है और फिर अपने और विक्की के रिलेशन की बात दक्षिणा फ्लैशबैक के द्वारा कुसुम को बताये. ये अनएक्सपेक्टेड था खुद मेरे लिए भी....:)

मेरा ये प्रयोग आप सबको अच्छा लगा इससे मुझे भी ख़ुशी हुयी....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 227....

रीड & एन्जॉय....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 51


मैं पहले सो hi रहा था मगर जब दक्षिणा और माँ की बाते मेरे कानो में पड़ी तो मेरी नींद खुल गयी थी मगर मैंने आँखे खोल कर दोनों को देखना सही नहीं समझा था उस वक्त. मैं सुन्ना चाहता था की दक्षिणा मेरी माँ से क्या बाते करती है और इस लिए मैं आँखे बंद किये चुप चाप पड़ा hi रहा. मुझे ये सुन कर और जान कर बहुत अच्छा लगा की दक्षिणा को मेरी माँ की इतनी फ़िक्र थी और वो माँ के लिए खाना ले के आयी थी.

मुझे महसूस हो रहा था की सब में बदलाव हुआ है. दक्षिणा में भी बदलाव हुआ है. इसके पहले वो भी कुसुम दीदी की तरह अपने बारे में hi सोचती थी. मगर अब ऐसा नहीं था. बल्कि अब तो ऐसा था जैसे वो मेरे परिवार का हिस्सा बनती जा रही थी. वो मेरे परिवार को अपना hi परिवार समझ रही थी और जैसे उसने एक जिम्मेदारी को अपने कंधे पर रख लिया था. वो जिम्मेदारी उसी परिवार की थी जिसे अब वो अपना समझने लगी थी.

अब आगे पढ़िए....


शाम होने वाली थी इस लिए सविता के आने के बाद दक्षिणा ने रेणुका को उसके साथ घर भेज दिया. रेणुका अपने बेटे से दूर जाना तो नहीं चाहती थी मगर दक्षिणा ने उसे बता दिया था की डॉक्टर यहाँ घर के किसी भी सदस्य को रुकने की अनुमति नहीं देते हैं. जब रेणुका ने दक्षिणा से पूछा की वो साथ में क्यों नहीं चल रही तो दक्षिणा ने उससे कहा की उसे किसी ज़रूरी काम से कही जाना है तो वो यही से चली जाएगी.

सविता के साथ रेणुका को भेजने के बाद दक्षिणा ने राहत की सांस ली थी. उसने सविता से कहा था की वो रेणुका को उसके घर तक छोड़ने जाये और फिर अपने घर जाये. घर में वो सबका ख़याल rakhe....khaas कर कुसुम का.

इधर मैं बीएड पर आँखे बंद किये अभी भी लेता हुआ था. जाते वक्त माँ मुझे पुकार रही थी. शायद वो चाहती थी की जाने से पहले वो मुझसे कुछ बात करे मगर मैं सोया hi बना रहा. क्यों की मुझे पता था की अगर मैं जाग गया तो माँ मुझसे भी यही कहेगी की वो मेरे पास रुक जाये. जबकि मैं चाहता था की माँ घर जा कर आराम करे. खेर मुझे सोता देख कर माँ ने मेरे गालो पर चूम कर अपना प्यार दिया उसके बाद सविता के साथ चली गयी थी.

"माँ को तो सविता के साथ घर भेज दिया मगर क्या तुम यही रुकने वाली हो रात में.?" दक्षिणा जब मेरे पास आ कर बैठ गयी तो मैंने आँखे खोल कर उससे ये कहा तो दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"मुझे पता था की तुम जाग चुके हो और सोने का नाटक कर रहे हो. खेर तुम्हारी माँ को घर भेजना ज़रूरी था डिअर. तुम्हे तो पता है की वो सुबह से यहाँ थी और उन्हें आराम करने की ज़रूरत थी. इसी लिए मैंने उनसे झूठ बोलै की डॉक्टर यहाँ घर वालो को रुकने की अनुमति नहीं देते हैं." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"वो सब तो ठीक है मगर अब क्या तुम रात में यहाँ मेरे पास hi रुकना चाहती हो.?" मैंने ये पूछा तो दक्षिणा ने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए कहा.

"क्या मुझे यहाँ तुम्हारे पास नहीं रुकना चाहिए.?" दक्षिणा ने मेरे सवाल पर उल्टा सवाल करते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"यहाँ रुकने का कोई मतलब भी तो नहीं है पर अगर तुम्हारी इच्छा है तो मैं तुम्हे ज़बरदस्ती जाने को भी नहीं कहुगा." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"रुकने का मतलब क्यों नहीं है जान.? मैं तुम्हे यहाँ अकेले कैसे रहने दे सकती हु.? माँ को भेजना ज़रूरी था मगर मैं यहाँ ज़रूर रुकूंगी. तुम लाख मन करोगे तब भी रुकोगी." दक्षिणा ने ये कहा तो मैं बस उसकी तरफ देखता रहा.

"तुम्हे पता है कुसुम प्रिय पूजा के साथ अपने घर नहीं गयी बल्कि वो मेरे घर गयी है और अब से वो मेरे साथ hi रहेगी. तुम्हे तो पता है की तुम्हारी माँ कुसुम से बहुत नाराज़ हैं और ऐसे माहौल में कुसुम तुम्हारी माँ के सामने आयी तो वो ज़रूर कुसुम को कुछ ऐसा वैसा बोलेंगी जिससे कुसुम का फिर से मूड बिगड़ जाये." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"कमाल है. दीदी तुम्हारे यहाँ रहेगी." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"हाँ, और पता है मेरे घर में पहुंचते hi एक बड़ा सा धमाका भी हो गया है." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"क्या matlab...kaisa धमाका हो गया.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"कुसुम को हमारे रिश्ते के बारे में पता चल गया है." दक्षिणा ने ये कहा तो मैं बुरी तरह हैरान रह गया और घबरा भी गया. जबकि मेरी हालत को देखते हुए दक्षिणा ने कहा.

"चिंता मत करो जान. मैंने सब सम्हाल लिया है और कुसुम को ऐसा समझाया है की अब उसके दिमाग की साड़ी बत्तिया भी जल गयी हैं." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"क्या मतलब है तुम्हारा.?" मैंने हैरानी से ये पूछा तो दक्षिणा ने मुझे शुरू से लेकर लास्ट तक का सब कुछ बता दिया. साड़ी बाते सुनने के बाद मैं बुरी तरह हैरान रह गया था. मैं दक्षिणा की तरफ ऐसे देखने लगा था जैसे दक्षिणा के सर में अचानक hi मुझे आगरे का ताजमहल नज़र आने लगा हो.

मैं बुरी तरह से अचंभित था दक्षिणा की साड़ी बाते सुन कर. मैं सोच भी नहीं सकता था की इतनी आसानी से कुसुम को इसके बारे में पता चल जायेगा और वो इस रिश्ते के बारे में कुछ कहेगी भी नहीं. जबकि मैं इसी बात से दर रहा था की अगर इस बात का कुसुम दीदी को पता चलेगा तो क्या होगा. बाकी लोगो से मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं हो सकती थी मगर कुसुम दीदी का सबसे ज़्यादा दर था मुझे. मैं दक्षिणा के बुद्धि विवेक से काफी प्रभावित हो गया था. क्या कमाल के तरीके से उसने कुसुम को शीशे में उतरा था.

"तुमने कमाल कर दिया यार. सच में ऐसा लगता है जैसे तुम्हारे पास कोई जादू की छड़ी थी जिसे तुमने कुसुम दीदी पर घुमाया और उनका कायाकल्प हो गया." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाहाहा हाँ ऐसा भी कह सकते हो मेरे जानू मगर सच कहु तो मैं भी हैरान थी की ये इतना आसानी से कैसे हो गया.? कुसुम के बारे में जैसा तुमने बताया था उस हिसाब से उसे समझाना बहुत hi मुश्किल काम होना चाहिए था मगर हैरत की बात है की मुझे कोई मुश्किल नहीं हुयी. उस वक्त तो मैं सच में बहुत घबरा गयी थी जब मैंने उसके हाथ में हमारी वो फोटो देखि जिसमे हम दोनों लवर बने हुए थे. मुझे लगा की अब सब कुछ बिगड़ गया. एक तो वो वैसे hi हालातो की वजह से शायद खुद से खफा हो गयी थी और दूसरे उसने उस फोटो को देख लिया तो और बखेड़ा हो गया. मैं दर गयी थी की उस फोटो को देखने के बाद कुसुम कैसा वर्ताव करेगी मगर भगवन का शुक्र था की सब कुछ बिगड़ने से बच गया." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"चलो जो भी हुआ अच्छा hi हुआ. इस सबके लिए जिससे सबसे ज़्यादा दर था उससे अब हमें डरने की ज़रूरत नहीं रह गयी. खेर अभी तो वो तुमसे ये भी पूछेंगी की हमारे बीच ऐसा रिश्ता कैसे बना.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"हाँ उसने उसी वक्त इस बारे में मुझसे जानना चाहा था मगर मैंने उससे कह दिया की अभी इस बारे में बात करने का सही वक्त नहीं है. तुम ठीक हो कर जब घर आ जाओगे तो फुर्सत से उसे बताऊगी." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मुझे नहीं लगता की वो मेरे ठीक हो कर घर लौटने का इंतज़ार करेंगी. उनके मन में हर पल इस बारे में जान्ने की उत्सुकता बानी रहेगी और जब तक तुमसे हमारे बारे में जान नहीं लेंगी तब तक शायद उन्हें चैन भी नहीं आएगा." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"तो तुम्हे क्या लगता है मैं उसे सब कुछ अभी बता दू.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अभी बता देने में कोई बुराई भी नहीं है डिअर. वैसे भी इस वक्त वो जिस मानसिकता में हैं उसमे उन्हें बता देना hi सही रहेगा. उनको ये नहीं लग्न चाहिए की हमने उनसे किसी चीज़ को छुपाने की कोशिश की है. हो सकता है की तुम्हारे सब कुछ बताने के बाद उनके अंदर कुछ और भी बदलाव देखने को मिले जो की हमारे लिए hi नहीं बल्कि सबके लिए बेहतर हो." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"शायद तुम ठीक कह रहे हो. मुझे उसे सब कुछ बता hi देना चाहिए. वैसे भी इस वक्त तुम यहाँ हो और ऐसे हालात में जब उसको हमारे बारे में सब कुछ पता चलेगा तो उसके अंदर इस बात का अहसास ज़रूर जागेगा की वक्त और हालात हमें ऐसे मोड़ पर भी ले आते हैं जहा ऐसा कुछ हो जाता है जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"बिलकुल अभी उनके अंदर अपराध बोध की भावना है और ऐसे वक्त पर वो सब कुछ बहुत बेहतर तरीके से समझ सकती हैं." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"और तो सब ठीक है मगर इस सबके बीच जो एक नई प्रॉब्लम कड़ी हो गयी है उसका क्या.? मेरा मतलब है की तुम्हारी माँ कुसुम से बहुत ज़्यादा नाराज़ हैं और वो अपनी आँखों के सामने कुसुम को देखना भी नहीं चाहती हैं. ये एक प्रॉब्लम वाली बात है इसका क्या करोगे.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ ये प्रॉब्लम तो है मगर ये प्रॉब्लम तभी तक है जब तक मैं यहाँ इस हालत में पड़ा हुआ हु. जब तक माँ मुझे इस हालत में देखेंगी तब तक वो दीदी से नाराज़ hi रहेंगी और जब मैं पूरी तरह से ठीक हो कर घर आ जाउगा तभी माँ का मन बदल सकेगा. मैं भी उन्हें मानाने की कोशिश करुगा. मुझे पूरा भरोसा है की दीदी के प्रति माँ की नाराज़गी जल्द hi दूर हो जाएगी." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"मुझे भी यही लगता है. वैसे भी वो एक माँ हैं और माँ के अंदर अपने बच्चो के प्रति ज़्यादा दिनों तक नाराज़गी नहीं रह सकती." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"खेर छोडो और ये बताओ की क्या सच में तुम यहाँ रुकने वाली हो.?" मैंने ये पूछा तो दक्षिणा ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"क्या तुम्हे मुझ पर भरोसा नहीं है.?" दक्षिणा ने मुझे घूर कर देखते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"नहीं ऐसी बात नहीं है. मैं तो बस इस लिए कह रहा था की जबकि मैं इस हालत में पड़ा हुआ हु तो तुम भला यहाँ रुक कर क्या करोगी.? वैसे मौका तो अच्छा था घर से दूर यहाँ हॉस्पिटल में प्यार करने का." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दक्षिणा ने भी मुस्कुराते हुए कहा.

"अच्छा ji....is हालत में भी मन में ऐसा ख़याल आ रहा है." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ख़याल बुरा तो नहीं है न.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दक्षिणा खिलखिला कर है पड़ी फिर बोली.

"वैसे यहाँ पर प्यार करने में कोई बुराई नहीं है और न hi कोई प्रॉब्लम हो सकती है. क्यों की पत्तिया तो तुम्हारे हाथ पेअर में लगी हुयी हैं और जिससे काम होना है वो तो सलामत hi है." दक्षिणा ने मानीखेज मुस्कान के साथ ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"तो फिर सोच क्या रही हो.? अगर तुम्हे लगता है की प्यार करना चाहिए तो शुरू हो जाओ. मैं तो अपने से कुछ कर नहीं सकता. सब कुछ तुम्हे hi करना होगा" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"ओह्ह मेरे jaanu...man तो बहुत कर रहा है मगर अपने मन की इस मुराद को इस वक्त मैं पूरी नहीं कर सकती और ये अच्छा भी नहीं लगेगा. मैंने भी प्राण कर लिया है की जब तक तुम पूरी तरह से ठीक हो कर घर नहीं आ जाओगे तब तक तुमसे क्या सविता से भी प्यार नहीं करुँगी मैं." दक्षिणा ने ये कहा तो मैं देखता रह गया उसकी तरफ.

"तुम शायद समझ नहीं सकते की इस हादसे ने अगर तुम्हारे परिवार को हिला कर रख दिया था तो उससे काम हालत मेरी भी नहीं हुयी थी. ज़रा सोचो विकाश की अगर तुम्हे कुछ हो जाता तो हम सबका क्या होता.? मैं भले hi किसी तरह खुद को सम्हाल लेती मगर तुम्हारे परिवार वालो को कौन सम्हालता.? तुमने तो बिना सोचे समझे ऐसा कदम उठा लिया मगर उसके बाद तुम्हारे परिवार वालो का क्या hota...agar इस बात का अहसास करो तो शायद तुम्हारी रूह तक कांप जाएगी." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैंने एक लम्बी सांस ली और थोड़ा गंभीर हो के बोलै.

"मुझे हर बात का अहसास है दक्षिणा. मैं ये भी समझता हु की मैंने जो कदम उठाया उस कदम को उठाने के बारे में मुझे कभी सपने में भी ख़याल नहीं करना चाहिए था मगर ये भी सच है की मैं उस वक्त ऐसी मानसिक अवस्था में hi नहीं था की कुछ और सोच सकू." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"खेर chhodo...magar अब ये अपने मन में ज़रूर संकल्प कर लो की ऐसा करने के बारे में तुम कभी भी नहीं सोचोगे." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अब शायद ऐसे हालात भी नहीं बनेगे डिअर." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"ऐसे हालात बने या न बने मगर तुम किसी भी हालात में ऐसा करने के बारे में नहीं सोचोगे. हर प्रॉब्लम को शान्ति से सुलझाया जा सकता है जैसा की मैंने कुसुम को अपने और तुम्हारे रिश्ते के बारे में उसे समझा कर सुलझाया. हम अक्सर आवेश में आ कर ऐसा कोई काम कर बैठते हैं जिसकी वजह से बहुत कुछ बुरा हो जाता है. इस लिए सिचुएशन चाहे जैसी भी हो उसका सामना ठन्डे दिमाग से करना है." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"जो हुकुम मेरी जान." मैंने ये कहा तो दक्षिणा कुछ पालो तक मुझे देखती रही फिर बोली.

"खेर chhodo....tumhe पता है उस वक्त जब मैं तुम्हारी माँ से बाते कर रही थी उसके पहले मैं ये सोच रही थी की मैं तुम्हारी माँ को क्या कह कर पुकारोगी. वो मुझे बार बार बहन जी बहन जी बोल रही थी और मैं बहुत अजीब सा फील कर रही थी. फिर जब मैंने उनके खाने के लिए टिफिन से निकाल कर खाना सजाया तो मुझे ऐसा अहसास हो रहा था जैसे मैं अपनी सास के लिए खाना सजा रही हु. यकीन मानो जान उस वक्त मेरा दिल कर रहा था की मैं उन्हें अपने हाथो से खाना खिलाओ." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैं बड़े ध्यान से उसकी तरफ देखने लगा.

"काश की मैं तुमसे उम्र में इतनी बड़ी न होती और काश की तुम मुझे बहुत पहले मिले होते. तुम नहीं समझ सकते जान की अपनी उम्र का सोच कर मैं कितना दुखी हो जाती हु. इस उम्र ने मुझे बेबस सा कर दिया है. इस उम्र के चलते मुझ में ये बोलने की हिम्मत नहीं होती की मैं पूरी दुनिया के सामने चीख चीख कह सकू की मैं तुमसे बहुत प्यार करती हु." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने देखा उसकी आँखों से आँशु छलक पड़े थे.

मैं जनता था की वो मुझसे बहुत प्यार करती है मैं ये भी समझ सकता था की वो जो कह रही थी वो सच है. उसकी उम्र ने उसके पैरो में जंजीरे बाँध दी थी.

"मैं तो ये सोच कर अकेले में hi लाज और शर्म से गड जाती हु की क्या सोचेंगी तुम्हारी माँ जब उन्हें ये पता चलेगा की उनकी उम्र की औरत के उनके बेटे के साथ सम्बन्ध हैं.? उनकी नज़र में मेरी क्या इज्जत रह jayegi...kya वो मुझे एक गिरी हुयी औरत समझेंगी.?" दक्षिणा ने सिसकते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"प्रेम करती हो तो मान सम्मान की परवाह क्यों करती हो.? प्रेम में तो बस समर्पित हो जाना होता है न.? प्रेम में इंसान ये कहा देखता है की अगर किसी को उसके बारे में पता चला तो वो क्या सोचेंगे.? वो तो सब कुछ अपने प्रेम पर hi छोड़ देता है न.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने मेरी तरफ देखा. उसकी नील सी झीली आँखों में जैसे ज़माने भर का दर्द आँशु बन कर ठहर गया था.

"किताबी बाते कहने सुनने को बहुत सरल और बहुत अच्छी लगती हैं जान मगर उन पर अमल करना कभी आसान नहीं होता." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"इंसान के अंदर जब समर्पण की भावना आ जाती है और जब वो अपने बारे में कुछ भी नहीं सोचता तब उसके लिए कुछ भी ऐसा नहीं होता जो उसे आसान न लगे." मैंने ये कहा तो दक्षिणा मेरी तरफ एकटक देखती रही.

"तुम्हारा और मेरा तो खून का कोई रिश्ता नहीं है बल्कि सिर्फ प्रेम की वजह से hi हम इतने करीब आये थे मगर सोचो की जिनसे मेरा खून का रिश्ता है और जब वो मुझसे ऐसा प्रेम कर बैठे हैं तो फिर उन्होंने ये क्यों नहीं सोचा की लोग उनके बारे में क्या कहेंगे.? जबकि मुझे लगता है की तुम्हारे और मेरे बीच के रिश्ते से ज़्यादा लोग भाई और बहन के बीच बने ऐसे रिश्ते के बारे में सोचेंगे. तुम्हारे और मेरे बीच के रिश्ते के बारे में लोग एक बार के लिए हमें माफ़ भी कर देंगे मगर क्या लोग भाई बहन के बीच बने ऐसे रिश्ते के लिए हम भाई बहनो को माफ़ karenge...shayad कभी नहीं. इस लिए तुम इस बारे में इतना मत सोचो बल्कि खुद को यही समझाओ की अगर तुम ऐसा कर सकती हो तो दूसरे ने कौन सा सही किया है. इस दुनिया में दूध का धुला कोई नहीं hai...har ब्यक्ति ने किसी न किसी पाप के घड़े में डुबकी लगाई है. फर्क बस ये है की कुछ लोगो के बारे में सबको पता चल गया होता है और कुछ अपने राज़ को छुपाये रखने में सफल रहते हैं." मैंने ये सब कहा तो दक्षिणा ने लम्बी सांस लेते हुए कहा.

"शायद तुम सही कह रहे हो. इस दुनिया में सत्यवादी हरिश्चंद्र कोई नहीं है. जो लोग दुसरो पर ऊँगली उठाते हैं वो खुद भी उतने hi बुरे होते हैं जितना वो सामने वाले को समझते हैं." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"मुझे लगता है की अब तुम्हे अच्छी तरह से मेरी बाते समझ आ गयी हैं." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने भी मुस्कुराते हुए कहा.

"मेरी जान इतना प्यार से समझाए और मुझे समझ न आये. ये तो कुदरत का कहर hi होगा." दक्षिणा ने ये कहा तो मैं धीरे से है पड़ा.

मेरे और दक्षिणा के बीच ऐसी hi बाते होती रही. हमने काफी देर तक अपने और दुनिया जहां के बारे में बाते की. इस बीच दो बार नर्स आयी थी और मुझे कुछ दवाइया खिला कर गयी थी. दक्षिणा के hi कहने पर मैं अब सोने की कोशिश करने लगा था. कमरे में एक कोने में एक और बीएड रखा हुआ जिस पर दक्षिणा लेट गयी थी.

"Hello...main बोल रहा हु." हलके नीम अँधेरे में किसी आदमी की आवाज़ उभरी. वो किसी से फ़ोन पर बात कर रहा था.

"होने को तो बहुत कुछ हो सकता है अगर इजाज़त हो तो." उस आदमी की आवाज़ दुबारा उभरी. ये आवाज़ ज़्यादा तेज़ नहीं थी बल्कि धीमी hi थी. जैसे वो चाहता हो की उसकी आवाज़ किसी दूसरे के कानो तक न पहुंच पाए.

"नहीं कमरे में उसके अलावा एक और भी है." अँधेरे में से उस आदमी की आवाज़ फिर से आयी. कुछ देर वो चुप रहा उसके बाद ठीक है कह कर उसने कॉल कट कर दी. इसके बाद फिर अँधेरे में से दुबारा कोई आवाज़ नहीं आयी. शायद वो आदमी अँधेरे में hi कही गम हो गया था.

भाई लोग....

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सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 52


"Hello...main बोल रहा हु." हलके नीम अँधेरे में किसी आदमी की आवाज़ उभरी. वो किसी से फ़ोन पर बात कर रहा था.

"होने को तो बहुत कुछ हो सकता है अगर इजाज़त हो तो." उस आदमी की आवाज़ दुबारा उभरी. ये आवाज़ ज़्यादा तेज़ नहीं थी बल्कि धीमी hi थी. जैसे वो चाहता हो की उसकी आवाज़ किसी दूसरे के कानो तक न पहुंच पाए.

"नहीं कमरे में उसके अलावा एक और भी है." अँधेरे में से उस आदमी की आवाज़ फिर से आयी. कुछ देर वो चुप रहा उसके बाद ठीक है कह कर उसने कॉल कट कर दी. इसके बाद फिर अँधेरे में से दुबारा कोई आवाज़ नहीं आयी. शायद वो आदमी अँधेरे में hi कही गम हो गया था.

अब आगे पढ़िए....


सुबह मोबाइल के बजने से दक्षिणा की नींद खुल गयी. उसने मोबाइल की स्क्रीन पर देखा तो पूजा लिखा था. मतलब कॉल पूजा ने किया था. इस वक्त सुबह के साढ़े पांच बजे थे. दक्षिणा को हैरानी हुयी की इतनी सुबह पूजा ने कॉल क्यों किया होगा मगर फिर उसे ध्यान आया की हो सकता है की ये कॉल पूजा की माँ यानी की रेणुका ने लगवाया हो. खेर दक्षिणा ने कॉल पिक करके मोबाइल को कान से लगाया.

"Hello." दक्षिणा ने मोबाइल कान से लगते hi ये कहा तो उसके कान में रेणुका की आवाज़ पड़ी.

"बहन जी मैं विक्की की माँ बोल रही हु." रेणुका ने ये कहा तो दक्षिणा के होठो पर हलकी सी मुस्कान उभर आयी.

"हाँ वो मैं समझ गयी थी की आप hi ने कॉल करवाया होगा पूजा से. कहिये क्या बात है.?" दक्षिणा ने ये कहा तो रेणुका ने कहा.

"वो मैं ये कह रही थी की मैं तैयार हो गयी हु हॉस्पिटल जाने के लिए मगर मैं अकेले हॉस्पिटल नहीं जा सकती इस लिए अगर आप सविता को मेरे साथ भेज दे तो..." रेणुका ने झिझकते हुए ये कहा hi था की दक्षिणा ने कहा.

"हाँ हाँ क्यों नहीं. मैं आपके साथ सविता को भेज दूगी मगर इतनी सुबह सुबह आप क्यों परेशां हो रही हैं.?" दक्षिणा ने ये कहा तो रेणुका ने कहा.

"अपने बेटे के लिए मैं हर परेशानी झेलने को तैयार हु बहन जी. वैसे भी साडी रात मुझे नींद नहीं आयी. बड़ी मुश्किल से रात कटी है मगर अब मैं यहाँ नहीं रुक सकती. मुझे जल्द से जल्द अपने बेटे के पास जाना है." रेणुका ने ये कहा तो दक्षिणा समझ गयी की रेणुका ममता की वजह से ऐसा कह रही थी.

"अच्छा ठीक है जैसा आप कहेगी वैसा hi होगा. अच्छा आपने कुछ खाया पिया है की नहीं या ऐसे hi कल की तरह हॉस्पिटल में बेटे के पास बैठी रहेंगी.?" दक्षिणा ने ये कहा तो रेणुका ने कहा.

"हाँ वो रचना बेटी ने बना दिया था और उसने ज़बरदस्ती खिला भी दिया है." रेणुका ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"चलिए अच्छी बात है. मैं सविता को आपके पास भेजती हु मगर थोड़ा टाइम लग जायेगा उसे आने में. क्यों की वो अभी सो रही है. मैं उसको जगा के आपके पास भेजती हु." दक्षिणा ने ये कहा तो रेणुका ने कहा.

"ठीक है बहन जी. मैं इंतज़ार करुँगी." रेणुका ने ये कहा और फिर उसके बाद कॉल कट गयी. इधर दक्षिणा सोचने लगी की उसे भी अब जल्दी से घर जाना होगा और यहाँ डॉक्टर और नर्स से ये भी कहना होगा की वो रेणुका से इस बारे में कोई ज़िकर न करे की वो रात में यहाँ रुकी थी.

रेणुका से बात करने के बाद दक्षिणा ने सविता को फ़ोन किया. सविता ने तीसरी रिंग पर hi फ़ोन उठाया तो दक्षिणा ने उससे कहा की वो तैयार हो कर कुसुम के घर चली जाये और वह से कुसुम की माँ को ले कर यहाँ हॉस्पिटल आ जाये. सविता को सब कुछ समझा कर दक्षिणा ने कॉल कट किया और हॉस्पिटल के उस बीएड से उठ कर अपनी साड़ी ठीक करते हुए बाथरूम की तरफ चली गयी.

बाथरूम से जब वो आयी तो उसका चेहरा फ्रेश लग रहा था. उसने अपने मिनी पुरष से एक छोटा सा आइए निकला और खुद को थोड़ा टच उप किया. उसके बाद वो विक्की के बीएड के पास आयी और झुक कर उसके चेहरे की तरफ देखने लगी.

मैं गहरी नींद में सोया हुआ था मगर तभी मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे होठो पर कुछ हो रहा है. इस बात से मेरी नींद खुल गयी और मैंने आँखे खोल कर देखने की कोशिश की तो मुझे अपने ऊपर कोई झुका हुआ नज़र आया. मेरे जिसम में हुयी हलचल से वो झुका हुआ ब्यक्ति हैट गया. तब मुझे समझ आया की ये तो दक्षिणा थी जो मेरे होठो को चूम रही थी.

"गुड मॉर्निंग jaan...have ा ग्रेट डे." दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मेरे होठो पर भी मुस्कान उभर आयी और फिर मैंने भी उसे गुड मॉर्निंग कहा.

"अब मुझे यहाँ से जाना पड़ेगा जान. अभी कुछ देर पहले तुम्हारी माँ का फ़ोन आया था मेरे पास. वो सविता के साथ हॉस्पिटल आ रही हैं." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"क्या.?" मैंने ये कहा hi था की दक्षिणा ने कहा.

"हाँ जान. उन्हें अपने बेटे की बहुत फ़िक्र है. वो कह रही थी की उन्हें रात भर नींद नहीं आयी और बड़ी मुश्किल से रात कटी है. और जैसे hi भोर हुयी वो तुम्हारे पास आने के लिए रेडी हो गयी." दक्षिणा ने ये सब बताया तो मैंने कहा.

"हाँ वो मानेंगी नहीं. कल की तरह आज भी वो सारा दिन मेरे पास hi बैठी रहेंगी. मगर मैं चाहता हु की वो इतनी ज़्यादा मेरी फ़िक्र न करे. उन्हें समझना चाहिए की मैं यहाँ ठीक हु." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"इस मामले में तुम एक माँ को नहीं समझा पाओगे डिअर. इस लिए तुम उन्हें ज़्यादा फाॅर्स मत करना किसी बात के लिए और हाँ अभी तो मैं जा रही हु मगर दोपहर तक फिर से ाउगि." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है और हाँ कुसुम दीदी का ख़याल रखना." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"सिर्फ कुसुम दीदी का बाकियो का नहीं.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"बाकियो की हालत उनके जैसी नहीं है. इस लिए उनका ख़याल रखने की बात hi नहीं है. फिर भी अगर तुम्हे लगता है तो वही करना जो तुम्हे सही लगे." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"हाँ वो तो मैं करुँगी hi. अच्छा अब मुझे थोड़ा सा अपनी जान को प्यार कर लेने दो. पता नहीं फिर मौका मिले या न मिले." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए ठीक है कहा तो दक्षिणा मेरे चेहरे पर मुस्कुराते हुए झुकी और मेरे होठो को अपने मुँह में भर कर चूसने लगी.

दक्षिणा के ऐसा करते hi मेरे जिसम में झुरझुरी सी होने लगी. रगो में दौड़ते लहू में एकदम से तेज़ी आ गयी. मैं अपने से कुछ कर नहीं सकता था. मेरे एक हाथ में प्लास्टर चढ़ा हुआ था और दूसरे में भी पत्तिया लगी हुयी थी. यही हाल पैरो का था.

उधर दक्षिणा कुछ देर तक मेरे होठो को ऐसे hi चूमती चुस्ती रही उसके बाद वो मेरे चेहरे से हैट गयी और मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देखने लगी.

"अब जा कर दिल को थोड़ा सुकून मिला है जान. बस तुम जल्दी से ठीक हो जाओ." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"इतना जल्दी कैसे ठीक हो जाउगा डिअर. ये तो तुम भी जानती हो की इसमें अभी महीने भर का टाइम लग जायेगा." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"हाँ ये मैं जानती हु मगर एक या दो हप्ते में इतना तो ठीक हो hi जाओगे की तुम्हे घर ले जा सके. वैसे मैं आज डॉक्टर से बात करुँगी इस बारे में." दक्षिणा ने ये कहा तो मैं बस उसे देखता रहा.

"ऐसे क्या देख रहे हो जान.?" दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए ये पूछा तो मैंने कहा.

"तुम कही से भी मेरी माँ की उम्र की नहीं लगती हो. तुम्हारी पर्सनल्टी से यही लगता है की तुम तीस की उम्र से ज़्यादा नहीं हो." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"लगने से क्या होता है जान.? सच्चाई तो यही है न की मैं तुमसे उम्र में बहुत बड़ी हु और तुम मेरे बेटे जैसे हो." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"दीदी को कैसे बताओगी हमारे बारे में.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"बताना तो पड़ेगा hi जान. फिर चाहे जैसे भी बताना पड़े. ये भी सच है की कुसुम जल्द से जल्द हमारे बारे में जानना चाहती है. उसके मन में शायद चौबीसो घंटे यही बात चल रही होगी की हमारे बीच ऐसा रिश्ता कैसे बन गया होगा.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"फिर तो तुम्हे ये भी बताना पड़ेगा की तुम्हारे अलावा तुम्हारी बेटी किरण से भी मेरे जिस्मानी सम्बन्ध थे. क्या इस बारे में बता सकोगी दीदी को.? तुम तक तो ठीक है मगर जब उन्हें ये पता चलेगा की तुमने अपनी ख़ुशी से अपनी बेटी का भी मुझसे ऐसा रिश्ता करवाया तब वो क्या सोचेंगी तुम्हारे बारे में.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"मैं समझती हु जान. मगर ये तो तुम भी जानते हो की मैंने अगर अपनी बेटी को इसमें शामिल किया था तो इसके पीछे सिर्फ मेरी hi नहीं बल्कि किरण की भी मर्ज़ी थी. वो तुमसे प्यार करती थी और तुम्ही से शादी भी करना चाहती थी. मैं खुद भी इस रिश्ते के लिए तैयार थी मगर ऐसा हो नहीं पाया." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"क्या किरण को मेरी इस हालत के बारे में पता है.? क्या तुमने बताया उसे.?" मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"पहले मुझे लगा था की उसे बता दू मगर फिर ये सोच कर नहीं बताया की तुम्हारे बारे में जान कर किरण ज़रूर भागती हुयी तुम्हे देखने आएगी. ऐसे में कही उसका पति कुछ और न सोच बैठे. वैसे भी उसे इस बात का शक है की किरण और तुम्हारे बीच कुछ है.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"चलो अच्छा किया. मैं भी नहीं चाहता की उसकी हस्ती खेलती ज़िन्दगी में कोई मुसीबत कड़ी हो जाये." मैंने ये कहा तो दक्षिणा कुछ देर कुछ सोचती रही फिर उसने कहा की अब उसे यहाँ से जाना चाहिए. क्यों की सविता मेरी माँ को ले कर यहाँ आती hi होगी.

दक्षिणा की इस बात से मैंने भी उसे जाने के लिए कह दिया तो उसने एक बार फिर से झुक कर मेरे होठो को चूमा और फिर दोपहर में आने का कह कर कमरे से बाहर चली गयी. उसके जाने के बाद मैं उसकी साडी बातो के बारे में सोचने लगा. अभी मैं सोच hi रहा था की दो नर्स कमरे में आयी और मुझे सुबह के काम करने के बारे में कहने लगी.

उधर एक तरफ....

एक बड़ा सा हाल था जिसके बीचो बीच एक लम्बी सी टेबल राखी हुयी थी और उसके चारो तरफ कुर्सियां राखी हुयी थी. उन कुर्सियों में जो फ्रंट पर कुर्सी राखी थी उस पर एक आदमी बैठा हुआ था बाकी सभी कुर्सियां खाली थी. टेबल से कुछ दूरी पर दो हट्टे काटते आदमी खड़े थे. हॉल में कब्रिस्तान की तरह सन्नाटा छाया हुआ था. तभी बाहर से एक आदमी हॉल में आया और आ कर टेबल के इस पार खड़ा हो गया. उस आदमी को देख कर कुर्सी पर बैठा आदमी बोलै.

"तुम यहाँ क्यों आये हो.? मैंने तुम्हे मन किया था न की मेरे पास तभी आना जब मैं तुम्हे आने को कहु." कुर्सी पर बैठे आदमी ने थोड़ा गुस्से से ये कहा तो उस आगंतुक ने कहा.

"माफ़ करना सर मगर आपसे मिलना ज़रूरी था इस लिए आया हु." उस आगंतुक ने ये कहा तो कुर्सी पर बैठे आदमी ने कहा.

"ऐसी कौन सी बात थी जिसके लिए तुम्हे मुझसे मिलना ज़रूरी हो गया था.?" कुर्सी पर बैठे आदमी ने ये कहा तो आगंतुक ने कहा.

"बात ऐसी है जो हमारे हक़ में बिलकुल भी नहीं है सर." आगंतुक ने ये कहा तो कुर्सी पर बैठे आदमी ने कहा.

"पहेलियाँ मत बुझाओ. जो भी बात है साफ़ साफ़ कहो." कुर्सी पर बैठे उस आदमी ने ये कहा तो आगंतुक ने कहा.

"मुझे लगता है की पुलिस को उस एक्सीडेंट के बारे में शक हो गया है. मेरा मतलब है की पुलिस को लगता है की वो एक्सीडेंट हादसा नहीं बल्कि किसी ने जान बुझ कर उसे अंजाम दिया था." आगंतुक ने ये कहा तो कुर्सी पर बैठे आदमी ने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"ये क्या कह रहे हो तुम.? ऐसा कैसे हो सकता है.?" कुर्सी पर बैठे आदमी ने ये कहा तो आगंतुक ने कहा.

"यही तो मुझे भी समझ नहीं आ रहा सर की पुलिस इस बारे में ऐसा कैसे सोच सकती है.?" आगंतुक ने ये कहा तो हॉल में खड़े दो और आदमियों में से एक ने कहा.

"पुलिस का तो काम hi है हर बात को शक की नज़र से देखना. हो सकता है की पुलिस उस एक्सीडेंट पर शक ज़रूर कर रही हो मगर वो शक बेबुनियाद hi हो. यानी उनके पास इस बात का कोई ठोस सबूत hi न हो की वो एक्सीडेंट किसी ने जान बुझ कर करवाया होगा." उस आदमी ने ये कहा तो कुर्सी पर बैठे आदमी ने कहा.

"मन की पुलिस के पास कोई सबूत नहीं होगा मगर इसका मतलब ये नहीं की फ्यूचर में भी उनके पास कोई सबूत नहीं होगा. अगर पुलिस उस एक्सीडेंट को हादसा नहीं बल्कि किसी का किया हुआ समझती है तो ज़रूर उनके पास ऐसा समझने की कोई न कोई वजह भी होगी. इस लिए अगर ऐसा है तो फिर ये हमारे लिए अच्छी बात नहीं है." कुर्सी पर बैठे आदमी ने ये कहा तो आगंतुक ने कहा.

"पुलिस थाने में एक मेरे पहचान का आदमी है सर. मैंने उससे पता किया है. उसने बताया की दरोगा खुद उस एक्सीडेंट के बारे में तहकीकात करने के लिए उस लड़के से पूछताछ करने गया था मगर उसे कुछ पता नहीं चला है अभी. उसने ये भी बताया की उस दरोगा ने लड़के से इस बारे में ज़्यादा कुछ नहीं पूछा जबकि उसे अगर एक्सीडेंट से रिलेटेड कोई शक था तो उसे उस लड़के से उस हिसाब से पूछताछ करना चाहिए था. मगर उसने ऐसा नहीं किया." आगंतुक ने ये कहा तो हॉल में खड़े एक दूसरे आदमी ने कहा.

"ये क्या बात हुयी.? इसका मतलब तो यही हुआ की उस दरोगा को एक्सीडेंट के बारे में कोई शक नहीं है. वो बस औपचारिकता के लिए उस लड़के से मिलने गया रहा होगा." उस दूसरे आदमी ने ये कहा तो कुर्सी पर बैठे आदमी ने कहा.

"हो सकता है मगर हम इस बात को इग्नोर नहीं कर सकते. हमें उस दरोगा पर नज़र रखनी होगी की वो इस बारे में आगे क्या करता है.?" कुर्सी पर बैठे आदमी ने ये कहा तो हॉल में खड़े पहले आदमी ने कहा.

"अगर हम ये मान ले की उस दरोगा को सच में उस एक्सीडेंट के बारे में शक है तो फिर हम क्या करेंगे.?" उस आदमी ने ये कहा तो कुर्सी पर बैठे आदमी ने कहा.

"शुक्र मनाओ की वो दरोगा इस बात को हादसा hi समझे वर्ण फिर जो होगा वो तो होगा hi." कुर्सी पर बैठे आदमी ने ये कहा तो कोई कुछ न बोलै.

"तुमने बताया की ठाणे में तुम्हारा कोई पहचान का आदमी है.?" कुर्सी पर बैठे आदमी ने आगंतुक की तरफ देखते हुए ये कहा तो आगंतुक ने जल्दी से कहा.

"यस सर." आगंतुक ने सर हिलाते हुए ये कहा तो कुर्सी पर बैठे आदमी ने कहा.

"क्या तुम्हारा वो पहचान वाला आदमी तुम्हारे कहने पर कुछ भी कर सकता है.?" कुर्सी पर बैठे आदमी ने ये पूछा तो आगंतुक ने कहा.

"बिलकुल सर. वो कुछ भी करेगा बस रिश्वत में उसकी जेब भरनी होगी. क्यों की वो सिर्फ उसी बेस पर कुछ भी करेगा." आगंतुक ने ये कहा तो कुर्सी पर बैठे हुए आदमी ने कहा.

"ठीक है फिर. तुम उसे समझा दो की उस एक्सीडेंट के बारे में जो कुछ भी पुलिस करे उसकी जानकारी वो हमें दे." कुर्सी पर बैठे आदमी ने ये कहा तो आगंतुक ने कहा.

"Ok सर." आगंतुक ने ये कहा और फिर पलट कर वापस हाल से बाहर चला गया.

"अगर एक्सीडेंट में पुलिस ने दिलचस्पी दिखाई तो सच में गड़बड़ हो जाएगी सर." हॉल में खड़े दूसरे आदमी ने ये कहा तो कुर्सी पर बैठे आदमी ने कहा.

"कुछ नहीं होगा. हाँ ये ज़रूर है की हमें फिर एक ख़ास कदम उठाना पद सकता है. खेर छोडो इस बात को. मैंने तुम दोनों को यहाँ इस लिए बुलाया है की तुम दोनों आज रात उस हॉस्पिटल में जाओ और उसे इस तरह वह से ले आओ की किसी को भी कानो कान इसकी भनक तक न लगे." कुर्सी पर बैठे आदमी ने उन दोनों आदमियों की तरफ देखते हुए ये कहा तो उन दोनों में से एक ने कहा.

"किसी को ज़रा सी भी भनक नहीं लगेगी सर मगर ऐसा करने से बात ओपन भी हो जाएगी. मेरा मतलब है की अभी तो पुलिस के दिमाग में शायद एक्सीडेंट के बारे में ऐसी किसी बात का शक न भी हो मगर ऐसा करने से ज़रूर हो जायेगा. हॉस्पिटल से जब हम उसे यहाँ ले आएंगे तो हॉस्पिटल में इस बात का हंगामा भी होगा और ये बात पुलिस तक भी पहुंचेगी. उसके बाद पुलिस को समझने में ज़रा भी टाइम नहीं लगेगा की वो एक्सीडेंट हादसा नहीं था बल्कि उस आदमी को जान से मारने की किसी ने कोशिश की थी और जब उस आदमी की एक्सीडेंट में जान नहीं गयी तो उसको जान से मारने की कोशिश करने वालो ने उसे हॉस्पिटल से गायब कर दिया." हॉल में खड़े उस आदमी ने ये सब कहा तो कुर्सी पर बैठे आदमी के होठो पर बड़ी hi जानदार मुस्कान उभरी.

"उससे हम पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पुलिस के पास इस बात का कोई सबूत नहीं होगा की हॉस्पिटल से उस आदमी को किसने गायब किया.? सबसे पहले तो पुलिस हॉस्पिटल वालो से hi उलझती रहेगी उसके बाद अगर उसने ये सोचा भी की ये काम किसी बाहरी लोगो का है तब भी वो हम तक नहीं पहुंच सकेंगे. इतने बड़े शहर में पुलिस खोजती रह जाएगी की हॉस्पिटल से उस आदमी को गायब करने वाले उसको कहा ले गए हैं.?" कुर्सी पर बैठे उस आदमी ने ये सब कहा तो हॉल में खड़े दूसरे आदमी ने कहा.

"आपने बिलकुल ठीक कहा सर. पुलिस को कोई ख्वाब तो आएगा नहीं की हॉस्पिटल से उस आदमी को गायब करके हम कहा ले गए हैं.? इस लिए पुलिस कुछ समय तक अपना सर खपाती hi रहेगी और हम तब तक उसकी पहुंच से दूर भी हो जायेंगे." उस आदमी ने ये कहा तो कुर्सी पर बैठे आदमी ने कहा.

"तुम दोनों उसे ले कर रात में hi मेरी बतायी हुयी जगह पर रवाना हो जाना. मैं तुम्हे वही मिलुंगा. चलो अब तुम दोनों जाओ मुझे कुछ ज़रूरी काम करने हैं." कुर्सी पर बैठे आदमी ने ये कहा तो उन दोनों आदमियों ने सर हिलाया और फिर वो दोनों हॉल से बाहर चले गए.

उन दोनों के जाने के बाद कुर्सी पर बैठे हुए आदमी के होठो पर रहस्यमयी मुस्कान उभर आयी. उसने अपने कोट की जेब से सिगरेट का पैकेट निकला. पैकेट से एक सिगरेट निकाल कर उसने उसे अपने होठो से लगाया और लाइटर से जला कर उसे पिने लगा.

भाई लोग....

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सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 53


"आपने बिलकुल ठीक कहा सर. पुलिस को कोई ख्वाब तो आएगा नहीं की हॉस्पिटल से उस आदमी को गायब करके हम कहा ले गए हैं.? इस लिए पुलिस कुछ समय तक अपना सर खपाती hi रहेगी और हम तब तक उसकी पहुंच से दूर भी हो जायेंगे." उस आदमी ने ये कहा तो कुर्सी पर बैठे आदमी ने कहा.

"तुम दोनों उसे ले कर रात में hi मेरी बतायी हुयी जगह पर रवाना हो जाना. मैं तुम्हे वही मिलुंगा. चलो अब तुम दोनों जाओ मुझे कुछ ज़रूरी काम करने हैं." कुर्सी पर बैठे आदमी ने ये कहा तो उन दोनों आदमियों ने सर हिलाया और फिर वो दोनों हॉल से बाहर चले गए.

उन दोनों के जाने के बाद कुर्सी पर बैठे हुए आदमी के होठो पर रहस्यमयी मुस्कान उभर आयी. उसने अपने कोट की जेब से सिगरेट का पैकेट निकला. पैकेट से एक सिगरेट निकाल कर उसने उसे अपने होठो से लगाया और लाइटर से जला कर उसे पिने लगा.

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दक्षिणा के जाने के बाद नर्सो ने मुझे फ्रेश किया था और मेरी दवा दारु की थी. उसके करीब पंद्रह मिनट बाद सविता माँ को ले कर आ गयी थी. माँ ने आते hi मेरे चेहरे पर प्यार से चूमना शुरू कर दिया था. उनकी आँखों से आँशु के कतरे बाह चले थे. मैंने उन्हें रट देखा तो थोड़ा नाराज़गी से कहा की अगर आप इस तरह रोयेंगी तो मैं कैसे जल्दी ठीक हो पाउगा. खेर कुछ देर तक माँ मुझे ऐसे hi प्यार करती रही और मेरा हाल चाल पूछती रही.

सविता कुछ देर तक माँ के पास hi रुकी रही उसके बाद माँ के कहने पर वो वापस चली गयी थी. सविता के जाने के एक घंटे बाद कमरे में डॉक्टर के साथ एक पुलिस वाला आया. मैं पुलिस वाले को दुबारा देख कर थोड़ा हैरान हुआ. ये वही पुलिस वाला था जो उस दिन आया था. पुलिस वाले को देख कर माँ भी सोच में पद गयी थी.

डॉक्टर ने माँ को कहा की वो कुछ देर के लिए बाहर जाये क्यों की उनके बेटे से पुलिस वाले को कुछ बाते करनी है. डॉक्टर की इस बात से माँ ने मेरी तरफ देखा तो मैंने अपनी पलके झपका कर उन्हें बाहर जाने का इशारा कर दिया. मेरे इशारे पर माँ कुर्सी से उठ कर बाहर चली गयी. माँ के जाने के बाद डॉक्टर भी बाहर चला गया.

मुझे समझ नहीं आ रहा था की ये पुलिस वाला दुबारा मेरे पास क्यों आया है. खेर डॉक्टर के जाने के बाद उस पुलिस वाले ने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और फिर पलट कर मेरे पास राखी उसी कुर्सी पर बैठ गया जिस पर अभी कुछ देर पहले माँ बैठी हुयी थी. कुर्सी पर बैठने के बाद वो पुलिस वाला कुछ देर तक मेरी तरफ देखता रहा. उसके इस तरह देखने से मुझे बड़ा अजीब सा फील होने लगा था.

"कैसे हो भाई.? मुझे लगता है की पहले से अब काफी बेहतर हो तुम." पुलिस वाले ने हलकी मुस्कान के साथ ये कहा तो मैंने कहा.

"जी पहले से अच्छा फील कर रहा हु मैं." मैंने ये कहा तो पुलिस वाले ने कहा.

"वैरी गुड. धीरे धीरे पूरी तरह अच्छा फील करने लगोगे. एनीवे तुम सोच रहे होंगे की मैं यहाँ किस लिए आया hu...hai न.?" पुलिस वाले ने ये कहा तो मैंने बस हाँ में हलके से अपना सर हिलाया. जिसके जवाब में उसने कहा.

"असल में मैं तुम्हारे उस दिन के एक्सीडेंट के बारे में कुछ पूछतांछ करने आया हु. पता नहीं क्यों पर मुझे ऐसा लगता है की तुम्हारा वो एक्सीडेंट एक हादसा नहीं था." पुलिस वाले ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"क्या मतलब है आपका.?" मैंने हैरानी से ये कहा तो उस पुलिस वाले ने कहा.

"मतलब ये की मुझे लगता है की तुम्हारा एक्सीडेंट किसी के द्वारा इस तरह से अंजाम दिया गया था की सबको यही लगे की वो एक्सीडेंट एक हादसा था. यानी की तुम तेज़ रफ़्तार में चल रही कार को कण्ट्रोल नहीं कर पाए जिसकी वजह से तुम्हारा एक्सीडेंट हो गया." उस पुलिस वाले ने ये कहा तो मैं हैरान रह गया. मुझे समझ न आया की ये पुलिस वाला क्या बक रहा है.?

"मुझे भी सबकी तरह यही लगा था की एक्सीडेंट एक नार्मल हादसा hi था. मगर क्यों की हम पुलिस वालो को किसी भी वारदात की बारीकी से जांच पड़ताल करने की आदत होती है इस लिए जिस जगह एक्सीडेंट हुआ था उस जगह मैंने ये जांचने की कोशिश की तुम्हारा एक्सीडेंट किसी की सोची समझी चाल का नतीजा तो नहीं था.? पहले तो मुझे ऐसा कोई सबूत नज़र नहीं आया जो ये साबित करे की तुम्हारे एक्सीडेंट में किसी दूसरे का हाथ हो सकता है मगर बाद में आखिर हमें एक सबूत मिल hi गया जिसने हमें ये बता दिया की तुम्हारा एक्सीडेंट तुम्हारी गलती से नहीं बल्कि किसी दूसरे की वजह से हुआ था." पुलिस वाले ने ये सब कहा तो मेरे दिमाग का फ्यूज hi उड़ गया.

मैं सोच भी नहीं सकता था की ऐसा कुछ हो सकता था. मैं तो यही समझ रहा था की उस दिन मेरी मानसिक हालत बहुत ज़्यादा खराब हो गयी थी जिसकी वजह से मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. दिल और दिमाग में बस दीदी की वो बाते hi गूँज रही थी. जिनसे दुखी हो कर मैं खुद को ख़तम कर देने पर उतारू हो गया था. मगर इस पुलिस वाले की ये बाते सुन कर तो मेरे दिमाग की बत्तिया hi गुल हो गयी थी.

मैं सोचने पर मजबूर हो गया की ऐसा कैसे हो सकता है.? क्या सच में किसी ने मुझे उस दिन जान से मार देने की कोशिश की थी.? उसने मेरी मानसिक हालत का फायदा उठाया और मेरा इस तरह से एक्सीडेंट करवा दिया की सबको यही लगे की वो सब मेरी गलती से हुआ था. मगर मैं ये नहीं समझ प् रहा था की कोई ऐसा क्यों करेगा मेरे साथ.? यहाँ मेरा ऐसा कौन सा दुश्मन पैदा हो गया जो मुझे इस तरह मार देना चाहता था.? मैं इस बारे में जितना सोचता गया उतना hi उलझता चला गया मगर मुझे कुछ भी समझ न आया.

"तुम्हारे चेहरे पर उभर रहे भाव ये साफ़ साफ़ बता रहे हैं की मेरी इस बात से तुम्हे शॉक लगा है और तुम ये सोचने की कोशिश में लग गए हो की अगर मेरी बात सच है तो ऐसा किसने किया होगा तुम्हारे साथ.? मैं खुद भी तुमसे इसी सिलसिले में बात करने आया हु." पुलिस वाले ने ये कहा तो मैंने मूर्खो की तरह उसकी तरफ देखा. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था की मैं उसे क्या जवाब दू.?

"तुम इस बात को अच्छी तरह समझ लो की ये बात कोई साधारण बात नहीं है. किसी ने तुम्हे जान से मारने की कोशिश की है. अब अगर वो अपनी कोशिश में सफल नहीं रहा है तो इसका मतलब ये भी नहीं है की वो दुबारा ऐसी कोई कोशिश नहीं करेगा. उसे भी पता चल hi गया होगा की तुम बच गए हो इस लिए वो तुम्हे फिर जान से मारने की कोशिश करेंगे. हमारे हाथ जो सबूत लगा था उससे हम कुछ कर नहीं सकते. क्यों की कक्तव कमरे में हमने देखा की जिस कार से बचने के लिए तुमने अपनी कार को ऐन वक्त पर मोड़ा था उस कार में कोई नंबर प्लेट नहीं लगी थी. इसका मतलब साफ़ है की उस कार में hi वो ब्यक्ति था या थे जिसने अपनी कार को उसी वक्त ऐसे एंजेल पर ला दिया था की तुम्हे जल्दी से उससे बचने के लिए अपनी कार को मोड़ना पड़ा. जिसका नतीजा ये हुआ की तुम्हारी कार सामने दिख रहे फ्लाईओवर के रेलिंग से भीड़ गयी और फिर रेलिंग को तोड़ती हुयी सीधे इस तरफ सड़क पर पलटिया खाती चली गयी थी. कक्तव में ये सन क्लियर दिख रहा है. दूसरी कार में कोई नंबर प्लाट नहीं लगी थी और न hi ये दिख रहा था की उसमे बैठा कौन है. क्यों की कार में ब्लैकफिल्म चढ़े शीशे लगे हुए थे जो की बंद थे. उस कार वाले ने इतनी सफाई से वो सब किया था की सबको यही लगे की वो नेचुरल बात थी. मुझे भी यही लगा था मगर जब मेरी नज़र कार की नंबर प्लेट वाली जगह पर पड़ी तो मैं चौंक गया. क्यों की कार की नंबर प्लेट गायब थी. इसका तो एक hi मतलब हुआ की बिना नंबर प्लेट की कार वाले ऐसे ब्यक्ति थे जो ये नहीं चाहते थे की कोई उन्हें पकड़ पाए." पुलिस वाले ने ये सब कहा तो मैं कुछ बोल hi न सका. मैं तो कुछ बोलने की हालत में hi नहीं था. मेरा तो यही सोच सोच कर दिमाग फटा जा रहा था की किसी ने मुझे जान से मारने की कोशिश की थी और अब दुबारा भी करेगा.

"हमने उस कार को खोजने की कोशिश की थी और बिना नंबर प्लेट वाली वो कार उस दिन मिली भी मगर लावारिश हालत में. मतलब साफ़ है की एक्सीडेंट को अंजाम देने के बाद कार में बैठे लोग फरार हो गए और फिर सुनसान जगह पर उस कार को रोका और किसी दूसरे वाहन से रफूचक्कर हो गए. ये सब बाते साबित करती हैं की तुम्हारा एक्सीडेंट कोई स्वाभाविक हादसा नहीं था बल्कि किसी ने जान बुझ कर तुम्हारा एक्सीडेंट करवाया. उनका मकसद यही था की तुम उस एक्सीडेंट में जान से मारे जाओ और सबको यही लगे की तुमने अपनी गलतियों की वजह से खुद की जान ले ली." पुलिस वाले ने ये कहा तो मैं इस बार भी कुछ न बोल सका.

"मैं यहाँ तुमसे ये पूछने आया हु की इस बारे में तुम्हारा क्या कहना है.? क्या तुम बता सकते हो की ऐसा कौन है जो तुम्हारी जान लेना चाहता है.?" पुलिस वाले ने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं इस बारे में आपसे क्या कहु.? मुझे तो कुछ समझ में hi नहीं आ रहा. मैं तो यही सोच सोच कर हैरान हो रहा हु की उस दिन मेरा एक्सीडेंट कोई हादसा नहीं था बल्कि किसी ने जान बुझ कर मेरा एक्सीडेंट कराया था. मगर अब मैं ये नहीं समझ प् रहा हु की ऐसा कौन कर सकता है मेरे साथ.? यहाँ तो किसी से मेरी कोई दुश्मनी भी नहीं है और न hi मैंने कभी किसी के साथ कुछ बुरा किया है.?" मैंने ये कहा तो पुलिस वाला मेरी तरफ कुछ पालो तक देखता रहा उसके बाद बोलै.

"देखो लड़के, बिना वजह कोई किसी की जान नहीं लेना चाहता. इसके पीछे कोई न कोई वजह ज़रूर होती है. वर्ण वो लोग क्या अपने शौक के लिए तुम्हारी जान लेना चाहते थे.?" पुलिस वाले ने थोड़ा शख्त लहजे से ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं सच कह रहा हु आपसे. यहाँ किसी से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है." मैंने ये कहा तो पुलिस वाले ने कहा.

"यहाँ नहीं है का क्या मतलब है.? ओह्ह मतलब तुम ये कहना चाहते हो की यहाँ यानी दिल्ली में तुम्हारी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है, इसका मतलब यहाँ के अलावा कही और किसी से तुम्हारी दुश्मनी ज़रूर hai...right.?" पुलिस वाले ने ये कहा तो मैं बुरी तरह अंदर hi अंदर शॉक रह गया.

"मुझे अपने बारे में साड़ी जानकारी डिटेल में बताओ." पुलिस वाले ने ये कहा तो मैं सोच में पद गया. साला अब ये क्या लफड़ा होने वाला है.? तभी एकदम से मेरे दिमाग की बत्ती जाली. Omg कही ये एक्सीडेंट रचना के बाप ने तो नहीं करवाया होगा.? मगर वो यहाँ आ कर ऐसा कैसे कर सकता है.? किसी दूसरी जगह पर वो भी इतने बड़े शहर में उसके लिए ऐसा करना बिलकुल भी संभव नहीं हो सकता था. मगर एक सवाल ये भी था की उसके अलावा कोई दूसरा मेरा दुश्मन भी तो नहीं है. अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी पुलिस वाले की आवाज़ से मेरा ध्यान टूटा.

"कहा खो गए भाई.? मैंने तुमसे कुछ कहा hai....mujhe अपने बारे में साड़ी जानकारी दो. तभी ये समझ आ सकता है की तुम्हारे साथ ऐसा करने वाला कौन हो सकता है.?" पुलिस वाले ने ये कहा तो मैंने सोचा क्या इस पुलिस वाले को अपने बारे में सब कुछ सच सच बताना सही रहेगा.? कही ऐसा तो नहीं की मेरी फॅमिली पर किसी बात का खतरा पैदा हो जाये. पुलिस वालो का क्या भरोसा.? मेरे घर में वैसे भी औरतो की भीड़ जमा है.

मगर खतरा तो इस बात से भी बना hi था की कोई मुझे जान से मारना चाहता है. इस सिचुएशन में मेरे लिए सबसे ज़्यादा खराब बात ये थी की मैं कुछ करने की हालत में नहीं था. पुलिस वाला इस मामले में मेरी क्या मदद कर सकता था ये अच्छे से नहीं जानता था मैं. ऐसा भी हो सकता था की ये पुलिस वाला खुद उन लोगो से मिला हुआ हो जिन लोगो ने मुझे जान से मारने की कोशिश की थी.

मैं समझ नहीं पा रहा था की मैं अब क्या करू.? मगर पुलिस वाले को अपने बारे में कुछ तो बताना hi था. इस लिए मैंने हालात से समझौता करते हुए ये फैसला किया की पुलिस वाले को उतना hi बताउगा जितना ज़रूरी हो.

"ारी भाई किस सोच में गम हो भाई.? अपने बारे में बताने में भी इतना सोचना पड़ता है क्या.? कही ऐसा तो नहीं की तुम सच में hi कोई ऐसे इंसान हो जिनका सम्बन्ध उन लोगो से है जिन्होंने तुम्हे जान से मारने की कोशिश की थी.?" पुलिस वाले की ये बात मेरे कानो में पड़ी तो मैं चौंक गया. मुझे एकदम से ख़याल आया की मेरे इस तरह चुप रहने से ये पुलिस वाला मेरे बारे में जाने क्या क्या सोचने लगेगा. इस लिए मैंने खुद को सम्हालते हुए कहा.

"नहीं सर ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो बस ये सोच रहा हु की आखिर ऐसा कौन हो सकता है जो मुझे जान से मारना चाहता होगा.? यहाँ क्या मेरी तो कही भी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है." मैंने ये सब कहते हुए उस पुलिस वाले को अपने बारे में बताना शुरू कर दिया.

मैंने उस पुलिस वाले को अपने बारे में यही बताया की मैं फैला गांव का रहने वाला हु और मेरे परिवार में कौन कौन हैं. मैंने उसे ये नहीं बताया की गांव में एक सरपंच है जिससे मेरी अच्छी खासी दुश्मनी हो गयी है. मैंने उसे ये भी नहीं बताया की मैं यहाँ पर हमेशा के लिए गांव की ज़मीन जायदाद और घर बेच कर रहने आ गया हु. पता नहीं क्यों मगर मैं ये सब बाते जान बुझ कर पुलिस वाले से नहीं बताना चाहता था. मैं नहीं चाहता था की इन सब बातो को जान्ने के बाद ये पुलिस वाला मेरे पीछे hi पद जाये और हज़ारो सवाल जवाब करने लगे. उधर मेरी साड़ी बाते सुनने के बाद पुलिस वाला कुछ देर सोचता रहा उसके बाद बोलै.

"तुम्हारी इन साड़ी बातो से तो यही लगता है की तुम्हारी गांव में भी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. मगर बरखुरदार ऐसा कैसे हो सकता है की बिना वजह कोई तुम्हारी जान का दुश्मन बन जाये.? कुछ तो ऐसा ज़रूर है जिसकी वजह से उन लोगो ने तुम्हे जान से मारने की कोशिश की थी और ये भी मैं पक्के दावे के साथ कह सकता हु की वो लोग दुबारा भी ऐसी कोशिश करेंगे. मैं ये बिलकुल भी नहीं मान सकता की कोई बिना वजह तुम्हे जान से मारना चाहेगा. मतलब साफ़ है की तुम कुछ न कुछ मुझसे छुपा रहे हो." पुलिस वाले ने ये कहा तो मैं देखता रह गया उसे. फिर खुद को सम्हालते हुए बोलै.

"मैं आपको कैसे यकीन दिलाओ सर की मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है जिसकी वजह से कोई मुझे जान से मारना चाहे. मैं तो खुद इस बात से हैरान हु और अब चिंतित भी हो गया हु की कोई मुझे जान से मारना चाहता है. आप खुद सोचिये की मैं भला आपसे ऐसी कोई बात क्यों छुपाओगे जबकि मुझे पता है की छुपाने से मेरा hi नुक्सान है या ये कहिये की मेरी hi जान का खतरा है.?" मैंने ये कहा तो पुलिस वाला मेरे चेहरे की तरफ बड़े ध्यान से देखता रहा और उसके इस तरह देखने से मेरे दिल की धड़कने बढ़ती रही.

"चलो ठीक है भाई. मैंने मान लिया की तुम्हारी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. मगर ये तो सच है की कोई तुम्हे अपना दुश्मन ज़रूर समझता है और इसी लिए उसने तुम्हारी जान लेने की कोशिश की. कभी कभी ऐसा होता है की हम किसी के साथ अनजाने में बहुत बुरा कर जाते हैं जिसका हमें अहसास नहीं होता और हम कभी उसके बारे में सोचते भी नहीं हैं मगर जिसके साथ बुरा हुआ होता है वो बुरा करने वाले को अपना दुश्मन बना बैठता है. हो सकता है तुम्हारे साथ भी ऐसा hi कोई केस हुआ हो. खेर मैं फिलहाल चलता हु और तुम्हारी सिक्योरिटी के लिए सादे कपड़ो में कुछ पुलिस वालो को भी यहाँ हॉस्पिटल में रखवा देता हु." पुलिस वाला ये सब कहने के साथ hi कुर्सी से उठा और खड़े होने के बाद फिर से बोलै.

"मेरी जगह कोई दूसरा पुलिस वाला होता तो वो तुम्हारे लिए इतना कुछ कभी नहीं करता बल्कि इस मामले को यही छोड़ कर चला जाता. मगर मेरी फितरत ज़रा जुड़ा है भाई. मैं हर उस बात में इंटरेस्ट ले लेता हु जो बिना मतलब की होती है. खेर अपना ख़याल रखना और हाँ इस बारे में सोचना ज़रूर. अगर कुछ याद आये तो मुझे सूचित कर देना." पुलिस वाले ने ये सब कहा और सर पर लगी कैप को दुरुस्त करते हुए कमरे से बाहर निकल गया.

पुलिस वाले के जाने के बाद मैं चुप चाप ख़ामोशी से इन साड़ी बातो के बारे में सोचता पड़ा रहा. सच तो ये था की मैं खुद बहुत ज़्यादा उलझ गया था इन सब बातो से. मेरे लिए सोचने वाला सबसे बड़ा सवाल यही था की किसने मुझे जान से मारने की कोशिश की होगी.? मेरे दिमाग में इस सवाल के जवाब में सबसे पहले सरपंच का hi ख़याल आया था मगर मैं इस बात को मानने को तैयार नहीं था की सरपंच यहाँ आ कर मेरी जान लेने की कोशिश कर सकता है. मतलब साफ़ है की कोई दूसरा hi ऐसा हो सकता है जो मेरी जान लेना चाहता hai....magar सवाल था की कौन.??

"क्या बात है बीटा.? वो पुलिस वाला तुझसे मिलने क्यों आया था.?" मेरे कानो में माँ की ये आवाज़ पड़ी तो मैं हकीकत की दुनिया में आया और माँ की तरफ देखते हुए कहा.

"ऐसे hi माँ. बस हाल चाल पूछने आया था." मैंने माँ को कुछ भी बताना उचित नहीं समझा. मैं जानता था की अगर माँ को इस बारे में पता चला तो वो बहुत ज़्यादा चिंतित और परेशान हो जाएँगी इस लिए ऐसा बोलै तो माँ ने कहा.

"उसे तुझसे तेरा हाल चाल hi पूछना था तो हम सबके सामने hi पूछ लेता. फिर मुझे इस कमरे से बाहर क्यों भेज दिया था उसने.?" माँ ने ये कहा तो मैंने माँ की तरफ देखते हुए मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा.

"अब ये तो मैं भी नहीं जानता माँ. शायद पुलिस वालो का यही तरीका होता हो किसी से उसका हाल चाल पूछने का. आपको बाहर भेजने के बाद उसने मुझसे मेरा हाल चाल hi पूछा था और हाँ ये भी कहा की आइंदा मैं जब भी कार चलाऊ तो होश में रह कर चलाऊ. ऐसा न हो की मैं फिर से एक्सीडेंट कर बैठु." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"हाँ तो क्या गलत कहा उसने.? मैं तो अब तुझे गाडी चलने hi नहीं दूगी और हाँ तू कार लेने को बोल रहा था न तो अब तुझे कार भी नहीं लेने दूगी. हम बिना कार के hi रह लेंगे. तू अपनी नौकरी पर बस से या ऑटो से चले जाया करना." माँ ने ये सब कहा तो मैं मुस्कुरा पड़ा और फिर बोलै.

"आप ऐसा इस लिए कह रही हैं माँ क्यों की इस वक्त मैं इस हालत में पड़ा हु. जब की आपको सोचना चाहिए की उस दिन मैं मानसिक रूप से बहुत ज़्यादा दुखी था इस लिए मेरा एक्सीडेंट हो गया था. वर्ण क्या मैंने पहली बार कार चलायी थी.? पांच सालो से चला रहा हु. इसके पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था मेरे साथ. खेर अब आप फ़िक्र मत कीजिये क्यों की अब से ऐसा कुछ नहीं होगा." मैंने ये कहा तो माँ ने मेरे चेहरे को सहलाते हुए कहा.

"मैं जानती हु की तू अपने मन का hi करेगा मगर तू ये मत भूल की तेरे शिव हमारा कोई नहीं है इस दुनिया में. हम गांव में भले hi चाहे जैसा जीवन जी रहे थे मगर काम से काम ये तो रहता की हम अपने खेतो पर म्हणत करके दो वक्त की रोटी खा लेते मगर यहाँ हम क्या कर सकते थे बीटा.?" माँ ने दुखी हो के ये कहा तो मैंने कहा.

"ऐसी बात नहीं है माँ. भगवान् सबका बेडा पार करता है. उस पर भरोसा रखिये और अब तो मुझे ऐसा महसूस हो रहा है की हमारी जो भी मुश्किलें थी उनका खात्मा हो गया है. अब हम सब एक साथ हसी ख़ुशी से रहेंगे." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"तू जब तक इस हालत में है तब तक हम में से कोई खुश कैसे रह सकता है बीटा.? मैंने भगवान् से कभी ज़्यादा कुछ नहीं मांगा बस यही मांगा है की मेरे बच्चे खुश रहे. हमें बहुत बड़ा बनने की ख्वाहिश नहीं है बल्कि हम तो थोड़े से में hi खुश रहना चाहते हैं." माँ ने ये कहा तो मैं कुछ देर सोचता रहा फिर बोलै.

"घर में सब कैसे हैं माँ.?" मैंने कुछ सोचते हुए ये पूछा तो माँ ने कहा.

"अगर तू उस कलमुही के बारे में जानने की कोशिश कर रहा है तो मैं तुझे पहले hi बता चुकी हु की मेरे सामने अब कभी उसका ज़िकर भी नहीं करना. उसी की वजह से आज तेरी ये हालत हुयी है.?" माँ ने एकदम से गुस्से में आ कर ये कहा तो मैंने कहा.

"आप दीदी के लिए ऐसा कैसे कह सटी हैं माँ.? हम सब जानते हैं की आप अपने बच्चो में सबसे ज़्यादा दीदी को प्यार करती हैं और उनका ख़याल रखती हैं." मैंने ये कहा hi था की माँ ने कहा.

"मैंने कहा न की उसके बारे में कोई बात न कर मुझसे." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं आपको समझने के लायक तो नहीं हु माँ क्यों की आपको मुझसे ज़्यादा जीवन का अनुभव है. फिर भी बस यही कहना चाहता हु की इस दुनिया में सब कुछ उसी की मर्ज़ी से होता है जिसे हम इंसान भगवान् कहते हैं और उसकी पूजा करते हैं. बुजुर्ग लोग हमेशा यही कहते हैं न की जो भी होता है अच्छे के लिए hi होता है तो शायद ये जो कुछ भी मेरे साथ हुआ है ये किसी अच्छे के लिए hi हुआ होगा." मैंने ये सब कहा तो माँ मेरी तरफ देखती रही जबकि मैंने कहना जारी रखा.

"ये तो आप भी मानती हैं न की दीदी को समझाना किसी के भी बस की बात नहीं थी और न hi वो किसी की बात सुन्ना चाहती थी. उनके दिमाग में तो बस एक hi बात बैठ गयी थी की आपने या मैंने उनके साथ अच्छा नहीं किया. बल्कि वो जिस पर सिर्फ और सिर्फ अपना हक़ समझती थी उसे उनसे छीन कर दुसरो में बात दिया गया. उस दिन दीदी ने जो कुछ मुझसे कहा और उसका जो भी नतीजा निकला उससे काम से काम इतना तो हो hi गया की आज दीदी को सही गलत का अहसास हो चूका है. आज वो सबकी बात सुन सकती हैं और सबकी बात समझ सकती हैं. क्या वो ये चाहती रही होंगी की उनकी बातो से दुखी हो कर मैं अपनी जान दे दू.? नहीं maa...aap जानती हैं की वो मुझसे कितना प्यार करती हैं. भले hi मुझे सब पर बात दिया गया मगर उन्होंने एक बार भी मुझसे इस बात की शिकायत नहीं की. उन्होंने किसी से भी इस बात की शिकायत नहीं की बल्कि उन्होंने सबसे किनारा करके सिर्फ खुद को hi तकलीफ दी. अब अगर यहाँ पर हम उन बुजुर्गो की इस बात के बारे में सोचे की जो भी होता है अच्छे के लिए hi होता है तो ज़ाहिर है ये जो कुछ भी हुआ है अच्छे के लिए hi हुआ है. दीदी को समझ में आने के लिए शायद ये ज़रूरी हो गया था की मैं इस हाल में पहुंच जाओ. खेर उनसे गुस्सा होने की कोई ज़रूरत नहीं है माँ. उन्होंने कभी ये नहीं जाना की ख़ुशी क्या होती है और नहीं ये जाना की मुस्कुराना क्या होता है. उन्हें बस प्यार चाहिए maa...aisa प्यार जिससे वो खुश हो सके और मुस्कुराना जान सके." मैंने ये सब कहा तो माँ मेरी ततफ देखती रह गयी. उनकी आँखों में आँशु तैरते हुए दिखे और फिर एकदम से वो आँशु उनकी आँखों से छलक कर बाह चले.

"मेरा बीटा इतनी बड़ी बड़ी बाते करने लगा है. क्या तू सच में इतना बड़ा हो गया है की तू अब अपनी माँ को hi जीवन का पढ़ समझने लगे.?" माँ ने ये कहा और झुक कर मेरे पाते पर चूम लिया.

"सच कहा तूने मेरे लाल. उसने कभी सुख नहीं देखा. तेरे पिता जी को भी इसी बात का अहसास था तभी तो जब उन्हें ये पता चला की उनकी बेटी अपने hi भाई से प्रेम करती है और उसे अपना सब कुछ मानती है तो उन्होंने मुझसे साफ़ साफ़ कह दिया की अगर उनकी दुखियारी बेटी की इसी में ख़ुशी है तो उसे ये ख़ुशी दे दो. मगर इस गांव में रह कर ये संभव नहीं हो सकता. इसके लिए तो कही दूर जाना पड़ेगा. उनकी इस बात से मैं हैरान थी की वो भला ऐसा कैसे कह सकते हैं. क्या कोई बाप ऐसा कह सकता है की वो अपनी बेटी की ख़ुशी के लिए उसके hi सेज भाई को उसका पति बना दे. मैंने जब उनसे कुछ कहना चाहा तो उन्होंने मुझे रोक दिया और मुझे कसम दी की जब हमारा बीटा वापस आये तो मैं यही करू." माँ ने ये सब कहा तो मैं कुछ न बोलै बल्कि पिता जी के बारे में सोचता रहा.

"आखिर तेरे पिता जी के कहने पर मैंने वही किया जिसमे तेरी बहन की ख़ुशी थी मगर उसे भी तो समझना चाहिए था की बाकियो का क्या.? रचना ने भी तो तुझसे प्रेम किया और उसने उसी प्रेम की वजह से हमारे लिए इतना कुछ किया. अगर तू कभी वापस भी न आता तो वो बेचारी साड़ी ज़िन्दगी वही करती रहती. इस लिए क्या उसके लिए हमारा कोई फ़र्ज़ नहीं होना चाहिए था.? मुझे भी पता है की कुसुम क्या चाहती थी मगर प्रेम किसी एक का hi कैसे हो सकता है.? उसे सबके बारे में सोचना चाहिए था. उसे रचना का शुक्र गुज़ार होना चाहिए था की उसने उसके भाई से प्रेम किया और उसी प्रेम की वजह से उसने हमारे परिवार की अपने बाप से रक्षा की." माँ ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"फ़िक्र मत कीजिये माँ. अब दीदी को सब कुछ समझ आ चूका है. अब वो सबके बारे में सोचने लगी हैं." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"अगर ऐसा है तो क्या वो एक बार भी तुझे देखने के लिए आयी तेरे पास.?" माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"वो आना चाहती थी मगर उन्हें दक्षिणा जी ने आने से मन कर दिया था. क्यों की दीदी के यहाँ आने से आप उन पर गुस्सा करती और उन्हें बुरा भला कहती." मैंने ये कहा तो माँ ने हैरानी से मेरी तरफ देखा और फिर बोली.

"तुझे ये सब कैसे पता है.?" माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मुझे दक्षिणा जी ने बताया था. उन्होंने hi बताया की वो दीदी को अपने घर ले गयी थी उस दिन और तब से वो उनके hi घर पर हैं." मैंने ये कहा तो माँ ने कुछ सोचते हुए कहा.

"क्या दक्षिणा जी को ये भी पता है की तेरा तेरी बहन के साथ क्या रिश्ता होने वाला है.?" माँ ने ये पूछा तो मैं एक बार के लिए तो चुप रह गया मगर फिर बोलै.

"उन्हें सिर्फ इतना पता है की मेरी शादी रचना से होने वाली है." मैंने ये कहा तो माँ ने बड़े ध्यान से मेरी तरफ देखा.

"दक्षिणा के परिवार में उनके अलावा और कौन कौन है.?" माँ ने ये पूछा तो मैंने धड़कते दिल से कहा.

"कुछ साल पहले उनके पति की मौत हो गयी थी. एक बेटी है जिसकी शादी हो चुकी है और वो अपने ससुराल में है." मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"ओह्ह मतलब अब वो अकेली hi है." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ, मगर उनकी देख भाल के लिए सविता नाम की एक नौकरानी है जो उनके साथ hi रहती है अपनी बेटी के साथ. उस नौकरानी का भी कोई नहीं था इस लिए दक्षिणा जी ने उसे हमेशा के लिए अपने साथ hi रख लिया." मैंने ये बताया तो माँ ने कहा.

"भगवान् ने उन्हें एक बीटा दिया होता तो उनका भी एक सहारा होता. क्या अपने दामाद को उन्होंने घर जमाई नहीं बनाया.?" माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"वो बनाना तो चाहती थी मगर दामाद इसके लिए राज़ी नहीं था." मैंने माँ से इस बारे में झूठ कहा तो माँ ने कहा.

"तो फिर उनके बाद उनके कारोबार और उनकी धन संपत्ति का क्या होगा.? या फिर शायद वो अपनी बेटी को hi देंगी." माँ ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ और भला किसे देंगी. बेटी के शिव दूसरा कौन है उनका.?" मैंने ये कहा तो माँ ने हाँ में सर हिलाया.

ऐसे hi माँ से मेरी बाते होती रही. इन साड़ी बातो में एक बात ये अच्छी हुयी की वो अब कुसुम दीदी से नाराज़ नहीं थी. यानी दीदी के प्रति उनकी नाराज़गी ख़त्म हो गयी थी. उन्होंने मुझसे कहा भी की वो दीदी से मिलेंगी और उन्हें घर ले जाएँगी.

दोपहर को दक्षिणा आयी. अब क्यों की दक्षिणा के बारे में थोड़ा बहुत माँ को मुझसे पता चल गया था इस लिए माँ उनसे बाते करती रही. वैसे भी दक्षिणा के प्रति माँ के मन में सम्मान की hi भावना थी क्यों की उसने ऐसे हालात में हमारी बहुत मदद की थी. मैंने देखा की माँ और दक्षिणा के बीच अच्छा ताल मेल हो गया था.

ऐसे hi सारा दिन गुज़र गया. दक्षिणा ने डॉक्टर से बात की थी. उसने बताया की एक दो दिन में मुझे हॉस्पिटल से घर ले जाया जा सकता है मगर शर्त ये है की मुझे टाइम टाइम से नियम के अनुसार दवा देना पड़ेगा और मेरा ख़याल रखना होगा. डॉक्टर की इस बात से दक्षिणा खुश हो गयी थी. उसने माँ को भी इस बारे में बताया तो माँ भी खुश हो गयी थी.

शाम होने से पहले hi डकहीना ने माँ से घर जाने के लिए कहा तो माँ ने कहा की वो घर जा कर क्या करेंगी. बल्कि उन्हें उनके बेटे के पास hi रहने से अच्छा लगता है. मगर जब मैंने भी ज़ोर दिया तो माँ को जाने के लिए राजी होना hi पड़ा. माँ ने दक्षिणा से कहा की वो कुसुम दीदी को आज अपने साथ hi घर ले जाएगी तो उनकी इस बात से दक्षिणा ने कहा की कुसुम को कुछ दिन उनके पास hi रहने दे. आखिर वो भी तो उसकी बेटी जैसी hi है. दक्षिणा की इस बात को माँ ने ख़ुशी ख़ुशी मान लिया.

दक्षिणा ने सविता को बुला लिया था इस लिए सविता माँ को ले कर घर जाने लगी तो माँ ने दक्षिणा से भी चलने के लिए कहा तो दक्षिणा ने कहा की उसे एक बार फैक्ट्री का चक्कर लगाना पड़ता है. इसके पहले सब कुछ विक्की hi देखता था. अब क्यों की विक्की इस हालत में हॉस्पिटल में है तो ये काम उसे hi करना पड़ता है. दक्षिणा की इस बात से माँ ने उस पर सहानुभूति दिखाई और फिर सविता के साथ चली गयी. माँ के जाने के बाद दक्षिणा मेरे पास आयी और माँ वाली कुर्सी पर बैठ गयी. उसके चेहरे से hi लग रहा था की वो आज खुश है.

"क्या बात है आज बड़ा खुश नज़र आ रही हो.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"ख़ुशी की तो बात hi है जान. आज तुम्हारी माँ से मैं काफी घुल मिल गयी हु. ऐसा लगा hi नहीं की मैं उनके लिए कोई गैर हु." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ये तो अच्छी बात है न और अभी तो ये शुरुआत है. धीरे धीरे शायद ऐसा भी वक्त आ जाये की तुम मेरे परिवार का हिस्सा बन जाओ." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"काश ऐसा जल्दी हो जाये जान. मैं उस दिन बहुत खुश होगी जिस दिन ऐसा होगा. वैसे मुझे तो यकीन hi नहीं होता की मैं कभी तुम्हारी माँ को सासु माँ कह सकुंगी." दक्षिणा ने उदास लहजे में ये कहा तो मैंने कहा.

"मतलब तुमने पूरा मन बना लिया है की तुम मेरी बीवी बनोगी. उफ्फ्फ्फ़ यार, सब क्या सोचेंगे हमारे बारे में.? एक माँ जैसी उम्र की औरत का बेटे जैसी उम्र का लड़का उसका पति बन गया hai...aur बात यही पर ख़तम नहीं hoti...agar ऐसा होता है और जब हमारे बच्चे होंगे तो वो तुम्हे क्या kahege....maa या दादी.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दक्षिणा ने एकदम से अपना मुँह फुला लिया.

"तुम मेरा मज़ाक उदा रहे हो.???" दक्षिणा ने मुँह फूलते हुए ये कहा तो मैंने हस्ते हुए कहा.

"यार मैं मज़ाक नहीं उदा रहा हु बल्कि मैं तो वही कह रहा हु जो ऐसा होने पर लगेगा." मैंने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"तुम न रहने दो अब. जब देखो तब मेरी उम्र का तना मारने लगते हो तुम." दक्षिणा ने रूठते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"ारी यार, मैंने कब इस तरह का तना मारा.?" मैंने हैरानी से ये कहा तो दक्षिणा अभी कुछ कहने hi वाली थी की तभी उसके पर्श में पड़ा उसका मोबाइल बजा. जिसकी वजह से उसने मुझसे कुछ न कहा बल्कि पर्श से अपना मोबाइल निकालने लगी.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
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