SAB KUCH JAYAZ HAI... - Page 14 - SexBaba
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SAB KUCH JAYAZ HAI...

कामदेव भय मैं जनता हु की होली तक का टाइम लम्बा हो जायेगा और आप सबको अपडेट के लिए इंतज़ार करना पड़ेगा. इस लिए जब भी जितना टाइम मिला मैंने अपडेट लिखा. हो सकता है की ये अपडेट पिछले उपदटेस की तरह अच्छा न हो मगर हाँ कोशिश तो की मैंने. पर अब शायद होली के बाद hi दे पाउगा नेक्स्ट अपडेट....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 252....

रीड & एन्जॉय....
 
हैप्पी होली भाई लोग....

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सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 57(ा)

विक्की कुसुम & रचना स्पेशल....


"सही कहा तूने. खेर कुसुम आती hi होगी. दक्षिणा जी ने कहा था की वो घर जाते hi उसे सविता के साथ यहाँ भेज देंगी. मैं चाहती हु की तुम दोनों एक दूसरे से खुल कर बाते कर लो." माँ ने उठते हुए ये कहा तो मैंने हाँ में पलके झपका दी. उधर दरवाज़े के पास पहुंच कर माँ रुकी और पलट कर मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"मुझे लगता है की तुझे रचना से भी खुल कर बात कर लेनी चाहिए. मैं नहीं चाहती की उसके साथ किसी भी तरह की na-insaafi हो." माँ ने ये कहा और फिर बाहर चली गयी. जबकि मैं उनकी बातो के बारे में सोचता रहा.

ये सच था की अब तक मैंने रचना से खुल कर इस बारे में कोई बात नहीं की थी. यहाँ आने के बाद जब मैंने सोचा की अब सब कुछ ठीक करू तो मेरे साथ ये हादसा हो गया. मुझे अहसास था की मुझे रचना से बात करनी चाहिए. उससे कहना चाहिए की वो मेरे लिए कोई बोझ नहीं है और न hi वो खुद को ऐसा कुछ समझे. बल्कि यही समझे की उसके लिए मेरे दिल में अगर कुसुम दीदी की तरह चाहत नहीं है तो उनसे काम भी नहीं है. मुझे यकीन है की वो मेरी इस बात से बेहद खुश हो जाएगी.

अब आगे पढ़िए....


"तुम बेवजह इतना घबरा रही हो कुसुम. तुम खुद जानती हो की विक्की के मन में तुम्हारे लिए कभी भी कोई गुस्सा कोई नाराज़गी नहीं हो सकती. हाँ उसे तुम्हारी बेरुखी से तकलीफ हुयी थी मगर इसके बावजूद वो तुमसे नाराज़ नहीं हो सकता. इस लिए तुम ख़ुशी ख़ुशी जाओ और उससे मिलो. उससे बात करो और haan...is बार अपने दिल का hi कहा करना. दिल पर अपने दिमाग को हावी मत होने देना. जो कुछ भी तुम्हारे दिल में है वो सब कुछ उससे बेझिझक हो के कहना और उसे भी कहने देना. उसके बाद तुम खुद महसूस करना की तुम्हे कितनी ख़ुशी मिली है." कुसुम के कमरे में दक्षिणा ने कुसुम के हाथ को अपने हाथ में ले कर ये सब मुस्कुराते हुए कहा तो कुसुम ने नाम आँखों से कहा.

"मैंने हमेशा अपने दिल के जज़्बातो को उससे छुपाया. मैं कभी उससे अपने दिल का हाल नहीं कह पायी. इसे मैं अपनी बदकिस्मती कहु या मेरी बेबसी. सबसे बड़ी होने का भी एक कारण था की मैं उससे कुछ कह नहीं पायी. मुझे हमेशा इस बात का दर लगता था की अगर मैंने ऐसी कोई बात अपने भाई से कह दी तो वो जाने मेरे बारे में क्या सोचेगा. अगर उसने भूल से भी मेरे बारे में ऐसा वैसा सोच लिया तो fir....fir तो मेरे लिए जीने का कोई मतलब hi नहीं रह जाता. मैं अपने उस भाई की नज़रो में गिर कर कैसे जी पाती जिससे मैं दिलो जान से प्यार करती हु और जिसके बिना जीने का सोच भी नहीं सकती.??" कुसुम सांस लेने के लिए रुकी उसके बाद सिसकते हुए बोली.

"मेरा भाई मुझे दुनिया की सबसे सुन्दर और सबसे मासूम दीदी कहता है तो मैं कैसे उसकी इन बातो पर कोई दाग लगाती.? मेरे लिए तो बस वही सबसे बड़ी बात थी की वो मुझे ऐसा समझता था. मुझे दुनिया के हर दुःख दर्द कबूल थे मगर उसकी नज़रो से गिर जाना कबूल नहीं था. हाहाहा कैसी पागल थी main....main समझ रही थी की मैंने अब तक खुद को उसकी नज़रो से गिरने से बचाये रखा है मगर क्या ये सच था.? ारी मैं तो कब का सबकी नज़रो से गिर चुकी थी..? पता नहीं क्या हो गया था मुझे की मैं ये सब समझ hi नहीं पा रही थी.?" कुसुम कहते कहते रोने लगी तो दक्षिणा ने उसे अपने सीने से छुपका लिया.

"तुमने मुझसे वडा किया था कुसुम की तुम अब खुद को कोई तकलीफ नहीं डौगी और न hi अपनी आँखों से आँशु बहाओगी. फिर ये सब क्या है.??" दक्षिणा ने कुसुम को छुपकाये हुए hi ये कहा तो कुसुम ने सिसकते हुए कहा.

"मैं क्या करू..? मेरे बस में नहीं है खुद को रोक पाना.? मैं चाह कर भी उस सबको भुला नहीं पा रही हु जो मेरी वजह से हुआ है. मैं अपनी hi नज़रो में गिर चुकी हु. मुझे खुद से नफरत हो गयी है. ऐसा लगता है की एक पल में खुद को ख़तम कर लू मगर मैं ये भी नहीं कर सकती. क्यों की मेरे ऐसा करने से मेरे भाई को बहुत तकलीफ होगी. मैं उसे कैसे तकलीफ दे सक्तु हु फिर से.?" कुसुम ने ये सब कहा तो दक्षिणा ने उसकी पीठ को सहलाते हुए कहा.

"चुप हो जाओ कुसुम. ये सब सोच सोच कर क्यों खुद को रुला रही हो.? जो गुज़र गया उसे बुरा सपना समझ कर भूल जाओ. गलतिया हर इंसान से होती हैं. इस दुनिया में कोई भी ऐसा इंसान नहीं है जिसने अपनी ज़िन्दगी में कोई गलती न की हो. सब गलतिया करते हैं कुसुम और एक बार नहीं हज़ार बार गलतिया कर बैठते हैं. फिर चाहे वो गलतिया जान बूझ कर की गयी हो या फिर अनजाने में उनसे हो गयी हो. मगर इन गलतियों का होना भी ज़रूरी है क्यों की अगर गलतिया नहीं होंगी तो हमें पता कैसे चलेगा की सही और गलत क्या है और उसकी अहमियत क्या है.? इंसान से गलतिया होती हैं तो इंसान अपनी उन गलतियों से सबक लेता है और कोशिश करता है की दुबारा उससे वैसी गलती न हो. तुम्हे भी वही करना है कुसुम. ज़िन्दगी एक सफर है और इस सफर के हम सब प्राणी जीव मुसाफिर हैं. इस सफर में हम गिरते हैं और ठोकरे कहते हैं मगर फिर से उठते हैं और खुद को सम्हालते हैं और आगे बढ़ने लगते हैं. हर गलती हर ठोकर के बाद हम नए तरीके से आगे बढ़ते हैं. तुम्हे यही करना है और मन में कोई भी बुरा ख़याल नहीं लाना है." दक्षिणा ने कुसुम को समझते हुए ये सब कहा तो कुसुम ने उससे अलग हो कर अपने आंशुओ को पोंछा और फिर कहा.

"मैं कोशिश करुँगी की अब से मैं सब कुछ अच्छा hi करू." कुसुम ने ये कहा तो दक्षिणा उसके सुर्ख पद चुके चेहरे को कुछ पल देखती रही फिर उसने आगे बढ़ कर कुसुम के माथे पर हलके से चूमा. उसके बाद प्यार से बोली.

"अगर विक्की तुम्हे सबसे मासूम और सबसे सुन्दर कहता है तो ज़रा भी गलत नहीं कहता वो. तुम सच में बहुत मासूम और सुन्दर हो. हाय कही तुम्हे मेरी नज़र न लग जाये." दक्षिणा ने ये कहते हुए अपनी आँख से हल्का सा काजल अपनी एक ऊँगली में लिया और कुसुम के कान के नीचे लगा दिया. उसके बाद उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में लेते हुए कहा.

"अब jaao...vicky तुम्हारा hi इंतज़ार कर रहा है. वो चाहता था की घर आते hi सबसे पहले वो तुम्हे देखे और जब तुम उसे नहीं दिखी तो उसके चेहरे पर मायूसी छ गयी थी. इस लिए देर न karo....jaao. अपने दिल और दिमाग से सरे बुरे ख़याल निकाल दो. बस ये सोचो की अब सब कुछ अच्छा hi होगा." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम की आँखों में फिर से आँशु तैरते हुए नज़र आये. ये देख कर दक्षिणा ने उसे अपना सर इंकार में हिलाते हुए इशारा किया की नहीं अब आँशु नहीं बहाना.

दक्षिणा बीएड से उठ कर कड़ी हो गयी तो कुसुम भी धीरे से बीएड से नीचे उतर आयी. इस वक्त उसके दूध जैसे गोर जिसम पर हमेशा की तरह शलवार शूट था जो की येलो कलर का था. सीने में दुपट्टा था जो उसके गले तक के भाग को कवर कर रखा था. कुसुम के खड़े होते hi दक्षिणा उसे उसके कंधे से पकड़ कर कमरे से बाहर की तरफ ले कर चल पड़ी.

कुछ hi देर में वो दोनों ड्रिंग रूम के पास आ गयी जहा पर सविता अपनी बेटी के साथ बैठी हुयी थी. दक्षिणा और कुसुम को देखते hi सविता सोफे से उठ कर कड़ी हो गयी.

"तुम तैयार हो न सविता.?" दक्षिणा ने सविता को देखते हुए ये कहा तो सविता ने हाँ में सर हिलाया.

"ठीक hai...ab कुसुम को ले कर जाओ और फिर वापस आ जाना." दक्षिणा ने ये कहा तो सविता ने फिर से हाँ में सर हिलाया. जबकि दक्षिणा की इस बात पर कुसुम ने दक्षिणा की तरफ देखते हुए कहा.

"मैं चाहती थी की आप मेरे साथ चले." कुसुम ने धीमे स्वर में ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"मैं किसी भी वक्त और कही भी तुम्हारे साथ चलने को तैयार हु कुसुम मगर इस वक्त नहीं. क्यों की इस वक्त ये कदम तुम्हे खुद hi आगे बढ़ाना होगा और वो भी अच्छे मन से और पुरे होशो हवाश में. ये समझो की ये तुम्हारा इम्तिहान है." दक्षिणा ने ये कहा तो कुसुम कुछ न बोली.

उसके बाद दक्षिणा के इशारे पर सविता कुसुम को ले कर घर से बाहर की तरफ चल पड़ी. जबकि दक्षिणा उन दोनों को जाते हुए देखती रही. जब वो दोनों घर से बाहर निकल गयी तो दक्षिणा भी आगे बढ़ कर एक सोफे पर बैठ गयी. उसके सामने वाले सोफे पर सविता की बेटी बैठी हुयी टीवी देख रही थी.

दक्षिणा सोफे पर बैठी कुछ देर तक कुसुम और विक्की के बारे में सोचती रही उसके बाद वो उठी और सविता की बेटी से ये कह कर बाहर निकल गयी की वो किसी ज़रूरी काम से बाहर जा रही है इस लिए सविता के आने तक घर का अच्छे से ख़याल रखे.

अभी वो बाहर वाले दरवाज़े के पास पहुंची hi थी की तभी वो एकदम से रुक गयी. शायद उसे किसी चीज़ का ख़याल आया था. वो पलटी और चलते हुए अपने कमरे में गयी. कमरे में पहुंच कर उसकी नज़र बीएड पर एक साइड पड़े अपने मोबाइल पर पड़ी. उसने मोबाइल उठाया और उसकी स्क्रीन जला कर देखा तो उसमे उसकी बेटी किरण के कई सरे मिस कॉल पड़े थे. ये देख कर उसे याद आया की किरण को उसने वापस आने को कहा था.

उसने किरण को कॉल किया. कुछ hi देर में किरण ने कॉल पिक करते hi कहा की कहा थी माँ कितनी बार कॉल किया आपको.? किरण की इस बात से दक्षिणा ने उससे काम का बहाना बता कर पूछा की वो कहा है तो उसने बताया की वो रास्ते में है और कुछ hi देर में यहाँ पहुंच जाएगी. किरण की इस बात से दक्षिणा खुश हो गयी और फिर ये कह कर कॉल कट कर दिया की वो उसका घर में इंतज़ार कर रही है.

उधर सविता कुसुम को ले कर हमारे घर के दरवाज़े पर पहुंची. दरवाज़े के लेफ्ट साइड दूर बेल्ल का स्विच था. सविता ने बटन दबाया तो अंदर बेल्ल बजी. कुछ hi देर में दरवाज़ा खुला और सामने रचना नज़र आयी. अपने सामने सविता के साथ कुसुम को खड़े देख कर रचना के चेहरे पर ख़ुशी के भाव उभर आये. उसने एक तरफ हैट कर उन दोनों को अंदर आने का रास्ता दिया.

रचना के एक तरफ होते hi कुसुम और सविता अंदर की तरफ दाखिल हो गयी. दोनों के अंदर आते hi रचना ने दरवाज़ा वापस बंद किया और फिर वो भी उन दोनों के पीछे पीछे अंदर की तरफ आ गयी. अंदर ड्रिंग रूम में रखे सोफे पर सिर्फ माँ hi बैठी हुयी थी. सविता के साथ कुसुम को आया देख कर माँ के चेहरे पर भी ख़ुशी की चमक आ गयी. सोफे से उठ कर उन्होंने कुसुम दीदी को अपने सीने से लगा कर उन्हें प्यार दिया.

सविता ने जाने की बात की तो माँ ने उससे चाय पानी का पूछा तो उसने इंकार कर दिया और फिर इजाज़त ले कर चली गयी. सविता के जाने के बाद माँ ने कुसुम दीदी की तरफ देखा और फिर बड़े प्यार से कहा.

"तू इतनी चुप चुप सी क्यों है बेटी.? ऐसा लग रहा है जैसे तू किसी गैर के घर में आयी है. देख मैंने तो सब कुछ भुला दिया जो कुछ भी हुआ था. मैं जानती हु की बीती बातो को ले कर बैठने से कोई फायदा नहीं होगा बल्कि इससे होगा ये की जो शेष बचा है उसका भी नुक्सान हो जायेगा. इस लिए तू भी सब कुछ भूल जा. मैं तुझे इस तरह गुमसुम नहीं देख सकती." माँ ने ये सब कहा तो कुसुम दीदी की आँखे भर आयी और वो एकदम माँ के सीने से जा लगी. माँ ने भी उन्हें सीने से लगा कर उन्हें प्यार और सांत्वना दी.

"चल अब शांत हो जा और खुद को पूरी तरह से इस दुःख दर्द से दूर रख दे. मुझे फिर से मेरी वही बेटी चाहिए जो कभी हसना मुस्कुराना भी जानती थी. तू जानती है न की अपने बच्चो में सबसे ज़्यादा मैं तुझे hi प्यार करती थी और हमेशा करती भी रहूगी." माँ ने ये कहा तो कुसुम दीदी ने सुबकते हुए कहा.

"मेरा भाई कहा है माँ.?" कुसुम दीदी ने सुबकते हुए धीरे से ये कहा तो माँ ने मुस्कुराते हुए कहा.

"क्या अब भी उसे भाई hi कहेगी.?" माँ ने ये कहा तो कुसुम दीदी ने ज़ोर से अपना चेहरा माँ के सीने में ऐसे छुपाया जैसे शर्म से वो किसी को अपना चेहरा न दिखाना चाहती हो. दीदी को इस तरह सिकुड़ते देख माँ की मुस्कान और भी गहरी हो गयी.

"हाय रे इसे मैं अपनी खुश किस्मती समझू या अपनी बदनसीबी की मेरी अपनी hi बेटी मेरी बहु बनेगी. मेरा अपना hi बीटा मेरा दामाद बनेगा." माँ ने ये कहा तो कुसुम दीदी कुछ बोल न सकीय. उन्होंने फिर से माँ के सीने में खुद के चेहरे को झोंका मगर अब इससे ज़्यादा उनका चेहरा छिपने वाला कहा था भला.? माँ जानती थी की उनकी बेटी उनकी इस बात से शर्म से गाड़ी जा रही है. इस लिए उन्होंने भी इस बारे में ज़्यादा और कुछ बोलना उचित नहीं समझा.

"अच्छा चल छोड़ ये सब. तू जा अपने भाई से मिल ले. मैं भी अब ऊपर कमरे में आराम करुँगी." माँ ने कुसुम दीदी को अपने सीने से अलग करते हुए ये कहा तो कुसुम दीदी बस नज़रे झुकाये कड़ी रह गयी. जबकि माँ ने कुछ पालो तक उनकी तरफ देखा और फिर उनके सर पर हाथ फेर कर ऊपर के फ्लोर की तरफ जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ चली गयी.

माँ को जाते देख कुसुम दीदी ने अपना सर उठाया और माँ की तरफ तब तक देखती रही जब तक माँ ऊपर के फ्लोर पर चली नहीं गयी. जब माँ उनकी नज़रो से ओझल हो गयी तो कुसुम दीदी ने एक गहरी सांस ली और फिर पलट कर उस कमरे की तरफ देखा जिस कमरे में मैं हो सकता था. दिल से दिल मिले हुए थे इस लिए एक दिल दूसरे दिल को अच्छे से महसूस कर सकता था.

कुसुम दीदी ने पहले चारो तरफ देखा और जब हर जगह उन्हें सन्नाटा hi नज़र आया तो वो आहिस्ता से आगे बढ़ी. वो मेरे कमरे की तरफ इस तरह बढ़ रही थी जैसे उनके पाँव में मेहदी लगी हो और उन्हें दर हो की तेज़ तेज़ चलने से उनकी वो मेहदी छूट जाएगी या बिगड़ जाएगी.

इधर कमरे में बीएड पर लेता हुआ मैं दीदी के hi बारे में सोच रहा था. मुझे बाहर की आवाज़ बहुत धीमे सुनाई दे रही थी मगर मैंने उन आवाज़ों से ये अंदाज़ा लगा लिया था की बाहर कौन किस्से बात कर रहा था.?

घर में हर तरफ ख़ामोशी छायी हुयी थी और उस ख़ामोशी में मैं ये महसूस करने रहा था की मेरा दिल अनायास hi तेज़ तेज़ धड़कने लगा है. मुझे ये तो पता चल चूका था की कुसुम दीदी आ चुकी हैं और वो किसी भी वक्त मेरे कमरे में आ जाएँगी. शायद यही सब सोचते रहने की वजह से मेरे दिल की धड़कने तेज़ हो गयी थी. मेरे अंदर एक बेचैनी और घबराहट सी बढ़ने लगी थी.

मैं जनता था की अभी कुछ hi पालो के अंदर मेरे उस कमरे में एक ऐसी शख्सियत आने वाली है जो दुनिया में मेरे लिए सबसे अनमोल है और शायद मैं उसके बिना अब जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता. मैं ये कभी नहीं समझ पाया की दीदी के लिए मेरे अंदर इतनी चाहत कब और कैसे हो गयी थी मगर आज का आलम यही था की मैं अगर किसी को अपनी जान से भी ज़्यादा चाहता था तो वो मेरी कुसुम दीदी थी. मैं पहले भी यही ख्वाहिश किया करता था की भगवन मुझे चाहे साडी दुनिया के दुःख दर्द दे दे मगर उसके बदले मेरी कुसुम दीदी की ज़िन्दगी को ऐसी खुशियों से भर दे जिन खुशियों का कभी कोई अंत hi न हो.

मुझे समझ नहीं आ रहा था की जब दीदी मेरे सामने आएँगी तो मैं उस वक्त कैसे रियेक्ट करुगा.? वो मुझसे क्या कहेंगी और खुद मैं उनसे क्या कहुगा.?? मैं महसूस कर रहा था की आने वाली सिचुएशन मेरे लिए बहुत hi ज़्यादा मुश्किल होने वाली थी. क्या सच में वो पल मेरे लिए मुश्किल होगा या फिर ये सिर्फ मेरा वहां था.??

अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी कमरे का दरवाज़ा हलके से खुला और फिर धीरे धीरे पूरा खुलता चला गया. मेरी नज़रे उस खुलते चले गए दरवाज़े की तरफ गयी. खुल चुके दरवाज़े पर एकदम से कुसुम दीदी नज़र आयी मुझे. दो पल के लिए हम दोनों की नज़रे एक दूसरे से मिली. मेरे लिए तो वक्त जैसे वही पर ठहर गया था मगर दीदी ने दो पालो के बाद अपनी नज़रे झुका ली. शायद उनके अंदर मुझे इस हालत में लेन का अपराध बोझ था इस लिए वो मुझसे नज़र नहीं मिला प् रही थी.

उनकी हालत का शायद मुझे अंदाज़ा न हो मगर मेरी हालत बड़ी अजीब सी हो गयी थी. मेरे हाथ पेअर सही होते तो इस वक्त मैं जाने क्या क्या कर गुज़रता. मेरा दिल कभी तेज़ी से धड़कने लगता तो कभी एकदम से रुक सा जाता. अंदर से कोई चीख चीख के आवाज़े कर रहा था. मैं खुद भी उनसे बहुत कुछ कहना चाहता था मगर मेरे होठ बस थरथरा कर रह जाते थे. मेरा दिल चाहता था की मैं उनसे अपने इस वक्त का हाल कुछ यु बया करू.

वो आये तो वक़्त जैसे ठहरता चला गया.

ज़िन्दगी में हसीं रंग उतरता चला गया.

उनसे नज़र मिली तो फ़क़त ऐसा लगा मुझे,

ज़िन्दगी का हर लम्हा निखरता चला गया.

हर ज़र्रा महक उठा है यु दफ्फतन,

जैसे खुशबु लिए गुल बिखरता चला गया.

हमसे हमारे दिल का आलम न पूछिए,

देख कर उस हसी को आह भरता चला गया.

उसे चाहु उसे पूजू उस पर मर जाओ,

जज़्बात इ दिल हद से गुज़रता चला गया.

काफी देर तक ऐसी hi सिचुएशन बानी रही. ऐसा लगा जैसे किसी ने हम दोनों को पत्थर की मूर्ती में बदल जाने का श्राप दे दिया हो. मगर हकीकत ये थी की इन पत्थर की मूर्तियों में जान आ hi जानी थी और हमें इस सिचुएशन का किसी न किसी तरह से सामना कर hi लेना था.

मैं बिना पालक झपकाए कुसुम दीदी के झुके हुए चेहरे को hi देख रहा था. इसके पहले इस तरह मैंने उन्हें कभी नहीं देखा था. मगर आज देख रहा था और ऐसा शायद इस लिए क्यों की बहुत कुछ बदल चूका था अब. हम दोनों hi जानते थे की अब किसी से कोई भी बात छुपी नहीं है और हर ब्यक्ति उस बात के लिए तैयार है जो हम दोनों चाहते हैं. मगर इसके बावजूद एक सच ये भी था की सब कुछ जानते हुए भी हम दोनों ने इस बारे में खुल कर कभी बात न कर पाए थे. वक्त और हालात आज शायद इसी बात के लिए हम दोनों को एक दूसरे के सामने ला कर खड़ा कर दिया था.

अभी मैं कुसुम दीदी के चेहरे की तरफ देख hi रहा था की तभी कुसुम दीदी ने हल्का सा सर उठाया और मेरी तरफ देखा. उफ्फ्फ्फ़ पालक झपकते hi मैं पुरे होश में आ गया और मेरा दिल तड़प कर रह गया. कुसुम दीदी की आँखों में आँशु थे और जैसे hi उन्होंने मेरी तरफ देखा उनके आँशु जैसे बग़ावत कर बैठे. सुर्ख पद चुके चेहरे पर ज़माने भर की दुःख तकलीफ नुमाया हो गयी. मेरा जी चाहा की मैं एक झटके से बीएड से उठु और भाग कर दीदी के बहते हुए आंशुओ को पि जाओ. उन्हें अपने सीने से लगा लू मगर हाय रे मेरी kismat....kitna बेबस और लाचार था मैं की चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकता था.

"Di....didi." उनकी ये हालत देख कर मुझे रोना आ गया और मैंने कांपते स्वर में ये कहा तो कुसुम दीदी खुद को रोक नहीं पायी. वो बुरी तरह रो पड़ी और भाग कर मेरे पास आयी मुझसे लिपट गयी. एक झटके से वो मुझसे लिपट गयी थी जिससे उनका जिसम मेरे एक हाथ पर तेज़ी से लगा. मुझे तेज़ दर्द तो हुआ मगर मैंने उस दर्द को बर्दास्त कर लिया.

मेरे सीने से छुपकी हुयी दीदी बुरी तरह रोये जा रही थी. मेरी आँखों से खुद भी आँशु बाह रहे थे. मैं इस वक्त उन्हें चुप होने को नहीं कहना चाहता था क्यों की मैं जनता था की उनके अंदर बर्षो का जमा हुआ ये गुबार था जिसका आंशुओ के रूप में निकल जाना ज़रूरी है.

मेरा एक हाथ उनके जिसम के नीचे डाब गया था और मुझे दर्द भी हो रहा था. मगर मैं उन्हें इसके बारे में बता कर उन्हें खुद से अलग नहीं होने देना चाहता था. बल्कि मेरा जो हाथ फ्री था उसे मैंने धीरे से उठाया और दीदी के सर पर रख कर हलके हलके फेरने लगा.

"अगर मुझे पता होता की आप मुझे मेरी इस हालत में hi मिलेंगी तो यकीन मानिये ये एक्सीडेंट मैं पहले hi कर लेता और खुद की ऐसी हालत बना लेता. काम से काम मेरी जान तो मुझे मिल जाती." मैंने रुंधे हुए गले से ये कहा तो दीदी का रोना और तेज़ हो गया और वो रट हुए hi बोली.

"Nahi....aisa मत कह विक्की. मुझसे गलती हो गयी मुझे माफ़ कर दे. मैं तेरी गुनहगार हु. मैंने कितना दिल दुखाया तेरा. मुझे सजा दे मेरे भाई. तू जो भी सजा देगा मैं है के कबूल कर लगी. मगर ऐसी बात मत कर. तू नहीं जानता क्या की अगर तुझे कुछ हो जाता तो क्या मैं ज़िंदा रहती.?" दीदी ने रट हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"मुझे और कुछ भी नहीं पता दीदी. आपने क्या किया या मैंने क्या किया इससे अब मुझे कोई मतलब नहीं है. मैं इस सबको भूल जाना चाहता हु. मैं बस ये जनता हु की चाहे जैसे भी सही आखिर आप मुझे मिल तो गयी. सच कहता हु दीदी मुझे इस बात की बहुत ख़ुशी महसूस हो रही है की मैं इस हालत में हु. अगर इस हालत में नहीं होता तो मुझे मेरी जान इस तरह नहीं मिलती." मैंने ये कहा तो दीदी ने रट हुए कहा.

"तू इतना अच्छा कैसे हो सकता है विक्की.? तू मुझसे इतना प्यार कैसे कर सकता है जबकि मैं तेरे इस प्यार के काबिल भी नहीं हु. मैं तो वो हु जो सिर्फ अपने बारे में सोचती है और अपनी hi ख़ुशी की तमन्ना रखती है. उसे दुसरो की खुशियों की कोई परवाह नहीं है. मैं तो ऐसी हु जो दुसरो की खुशियों से जलती हु और उनका बुरा चाहने लगती हु. तू मुझ जैसी स्वार्थी और मतलबी लड़की से कैसे इतना प्यार कर सकता है.?" कुसुम दीदी ने रट हुए ये कहा तो मैंने उनके सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा.

"ऐसा आपको लगता है की आप स्वार्थी और मतलबी हैं. मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगता और अगर एक पल के लिए मान भी लू की आप ऐसी हैं तब bhi.....tab भी मैं आपसे hi be-intehaa प्यार करुगा और ये प्यार हर जन्म में ऐसे hi रहेगा." मैंने ये कहा तो दीदी कुछ बोल न सकीय बल्कि मेरे सीने से और भी ज़्यादा छुपक गयी. उनकी सिसकिया और भी तेज़ हो गयी थी.

क्या हुआ didi...maine कुछ गलत कह दिया आपसे.?" मैंने दीदी को चुप देख कर ये कहा तो दीदी ने कहा.

"नहीं vicky...tu कभी कुछ गलत नहीं कह सकता." दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.

"तो फिर आप चुप क्यों हो गयी.?" मैंने ये कहा तो दीदी ने कहा.

"मैं सोच रही हु की मैंने सबके साथ इतना बुरा किया मगर इसके बावजूद कोई मुझे सजा क्यों नहीं दे रहा.?" कुसुम दीदी ने सिसकते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ओह्ह तो आप ये सोच रही हैं. फिर तो आपको समझ लेना चाहिए की अगर कोई आपको सजा नहीं दे रहा तो इसका मतलब यही है की कोई भी आपको गुनहगार नहीं मानता बल्कि सब आपसे बहुत प्यार करते हैं." मैंने ये कहा तो दीदी ने मेरे सीने से उठ कर मेरी तरफ देखा. उनका पूरा चेहरा आंशुओ से भीगा हुआ था. गोरा चेहरा एकदम से लाल सुर्ख पद गया था. उन्हें इस हालत में देख कर एक बार फिर से मेरा दिल तड़प उठा.

"सजा तो आप दे रही हैं दीदी और ऐसी सजा जिसे सह लेना मेरे बस में नहीं है." मैंने दीदी की तरफ देखते हुए गंभीरता से ये कहा तो दीदी ने सिसकते हुए कहा.

"मैं क्या सजा दे रही हु तुझे.? मैं तो खुद hi ये चाहती हु की तू मुझे सजा दे." दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.

"आप जानती हैं की मैं आपको इस तरह उदास भी नहीं देख सकता जबकि इस वक्त तो आपने रो रो कर अपनी ये हालत बना ली है. ये सजा hi तो दे रही हैं आप मुझे. आप जितना खुद को तकलीफ देंगी उतना hi मुझे तकलीफ होगी. ये सजा hi तो दे रही हैं आप." मैंने ये कहा तो दीदी फिर से रट हुए मेरे सीने से छुपक गयी.

"ऐसी बाते मत कर विक्की. मुझ में अब इतनी हिम्मत नहीं है की मैं तेरी ऐसी बाते सह सकू. मुझसे इतना प्यार मत कर." दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ये मेरे बस में नहीं है दीदी. मैं चाहु भी तो ऐसा नहीं हो सकता. अब ये आप पर हैकि आप क्या चाहती हैं.? खुद को तकलीफ दे कर मुझे सजा देना या फिर खुद को खुश रख कर मुझे भी खुश रखना.? आप मुझसे सजा चाहती हैं न तो फिर आपकी यही सजा है की अब से आप कभी भी खुद को तकलीफ नहीं देंगी." मैंने ये कहा तो दीदी एक बार फिर से बुरी तरह रो पड़ी.

"Vicky.....main तुझसे बहुत प्यार करती हु और अब मैं चाह कर भी अपने दिल से तेरे लिए ये चाहत नहीं निकाल सकती. मैंने पहले भी बहुत कोशिश की मगर नाकाम hi रही और अब मैं ये चाहती भी नहीं हु की मेरे दिल से ये चाहत जाये. मेरी बस यही चाहत है की मैं हमेशा के लिए तेरी हो जाओ और तू मुझे खूब सारा प्यार करे." कुसुम दीदी ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"वो तो आप न भी कहेंगी तब भी करुगा दीदी और साड़ी ज़िन्दगी करता रहुगा. मैं हमेशा भगवन से यही दुआ करता था की मुझे संसार की कोई भी धन दौलत नहीं चाहिए मगर उसके बदले वो मुझे सिर्फ आपको दे दे और आज शायद मेरी दुआ कबूल हो गयी. भगवन ने मुझे मेरी चाहत दे दी. अब कुछ भी नहीं चाहिए मुझे. आप मिल गयी तो मुझे सब कुछ मिल गया दीदी." मैंने ये कहा तो दीदी ने कहा.

"क्या सच में तू मुझसे इतना प्यार करता है विक्की.?" कुसुम दीदी ने फिर से अपना चेहरा मेरे सीने से उठा कर मेरी तरफ बड़ी मासूमियत से देखते हुए ये कहा तो मैंने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा.

"क्या आपको मुझ पर और मेरी चाहत पर ऐतबार नहीं है.?" मैंने उनकी आँखों में देखते हुए ये कहा तो दीदी ने जल्दी से कहा.

"नहीं vicky....aisi बात नहीं है. तुझ पर ऐतबार नहीं होगा तो फिर दुनिया में मुझे किसी पर भी ऐतबार नहीं होगा. मैं जानती हु की तू मुझे बहुत प्यार करता है. मैं खुश नसीब हु मेरे भाई की दुनिया में एक ऐसा लड़का है जो मुझसे सबसे ज़्यादा प्यार करता है. वो लड़का मेरा भाई भी है और मेरा होने वाला प....." दीदी कहते कहते एकदम से रुक गयी. उनके चेहरे पर एकदम से लाज और शर्म की सुर्खी फ़ैल गयी और उन्होंने जल्दी से अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया.

मैं उनकी बात को अच्छी तरह समझ गया था की वो क्या कहना चाह रही थी और सच तो ये है की मैं ये बात समझ कर अंदर से बहुत hi ज़्यादा खुश हो गया था. मेरे मन में एकदम से शरारत करने का विचार आया तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"क्या हुआ didi...aur क्या कह रही थी आप.? मुझे ठीक से सुनाई नहीं दिया. एक बार फिर से कहिये न." मैंने ये कहा तो दीदी ने मेरे सीने में अपना चेहरा छुपाये हुए hi धीरे से कहा.

"Tu....tum समझ तो गए हो न विक्की.? फिर क्यों पूछ रहे हो मुझसे.?" दीदी ने धीमे स्वर में ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"मैं कहा इतना समझदार हु दीदी.? इसी लिए तो पूछ रहा हु आपसे की आप क्या कहते हुए अचानक रुक गयी थी. आखिर क्या कहना चाहती थी आप.?" मैंने ये कहा तो दीदी ने फिर से धीमे स्वर में कहा.

"रहने दो न विक्की. मैं अब नहीं बता सकती. तुम बस समझ जाओ न." दीदी ने ये कहा तो मुझे अंदर से एक अजीब सी गुदगुदी महसूस हुयी. मैं जनता था की दीदी को खुल कर बताने में शर्म आ रही है मगर मैं उनके मुख से साफ़ सुन्ना चाहता था इस लिए बोलै.

"ये तो गलत बात है दीदी. आप ये मुझ पर जुलम कर रही हैं. प्ल्ज़ बताइये न दीदी क्या कहते हुए रुक गयी थी आप.?" मैंने ये कहा तो दीदी कुछ देर तक कुछ न बोली. मैं समझ सकता था की इस वक्त वो खुद में हिम्मत दाल रही थी वो सब कहने के लिए. एक तो वो मुझसे उम्र में बड़ी थी दूसरे मेरी बहन थी और तीसरा हमेशा शांत और गंभीर रहने वाला उनका स्वभाव. खुल कर ऐसी बात बोलने में उनको झिझक तो लगनी hi थी.

"क्या hua...bataiye न दीदी." मैंने उन्हें चुप देख कर फिर से ये कहा तो इस बार दीदी ने धीमे स्वर में कहा.

"और मेरा होने वाला पति bhi....ab सुन लिया न. हाय री ये क्या कहवा रहे हो तुम मुझसे.?" कुसुम दीदी ये कहते हुए एकदम से मेरे सीने में और भी ज़्यादा अपने चेहरे को मानो गाड़ दिया. जबकि उनकी ये बात सुन कर मेरी मुस्कान गहरी हो गयी.

"ओह्ह तो इसका मतलब ये हुआ की मेरी दीदी कुछ टाइम के बाद से मेरी दीदी नहीं रह जाएँगी बल्कि मेरी बीवी बन जाएँगी. उफ्फ्फ्फ़ उसके बाद तो अपनी दीदी को बहुत मिस करुगा मैं." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो दीदी ने धीमे स्वर में कहा.

"चुप हो जाओ विक्की. भगवन के लिए इस बारे में अब कुछ मत बोलो वर्ण मैं यहाँ से चली जाओगी. तुम शायद सोच भी नहीं सकते की मुझे इस बात से कितनी शर्म आ रही है." कुसुम दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाहाहाहा अच्छा ji...aur क्या मुझे शर्म नहीं आ रही होगी.?" मैंने हस्ते हुए ये कहा तो दीदी ने मुझे धीरे से मुक्का मारते हुए कहा.

"हाँ नहीं आ रही. अगर आ रही होती तो ये बात न खुद कहते और न hi मुझसे कहने को कहते." दीदी ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ओह्ह तो इसका मतलब मुझे इन सब बातो से मज़ा आ रहा है. यही कहना चाहती हैं न आप.?" मैंने ये कहा तो दीदी ने कहा.

"हाँ और नहीं तो क्या." कुसुम दीदी ने ये कहा और साथ hi मुझे महसूस हुआ की उन्हें हसी भी आयी थी मगर हसी की आवाज़ को उन्होंने दबा लिया था. बस उनका जिसम hi हिल कर रह गया था.

तो बे कंटिन्यू....

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 57(बी)

विक्की कुसुम & रचना स्पेशल....


"चुप हो जाओ विक्की. भगवन के लिए इस बारे में अब कुछ मत बोलो वर्ण मैं यहाँ से चली जाओगी. तुम शायद सोच भी नहीं सकते की मुझे इस बात से कितनी शर्म आ रही है." कुसुम दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाहाहाहा अच्छा ji...aur क्या मुझे शर्म नहीं आ रही होगी.?" मैंने हस्ते हुए ये कहा तो दीदी ने मुझे धीरे से मुक्का मारते हुए कहा.

"हाँ नहीं आ रही. अगर आ रही होती तो ये बात न खुद कहते और न hi मुझसे कहने को कहते." दीदी ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ओह्ह तो इसका मतलब मुझे इन सब बातो से मज़ा आ रहा है. यही कहना चाहती हैं न आप.?" मैंने ये कहा तो दीदी ने कहा.

"हाँ और नहीं तो क्या." कुसुम दीदी ने ये कहा और साथ hi मुझे महसूस हुआ की उन्हें हसी भी आयी थी मगर हसी की आवाज़ को उन्होंने दबा लिया था. बस उनका जिसम hi हिल कर रह गया था.

तो बे कंटिन्यू....

अब आगे पढ़िए....


मैं और कुसुम दीदी एकदम से खामोश हो गए थे. वो अभी भी मेरे सीने से छुपकी हुयी थी. उनके जिसम का भार एक तरफ से मेरे एक हाथ पर था. मेरा वो हाथ एकदम से सुन्न सा पद गया था. ऐसा लग रहा था जैसे मेरी बॉडी में एक तरफ हाथ है hi नहीं. दर्द और तकलीफ को मैं सह चूका था और अब मुझे दर्द नहीं हो रहा था. बस ऐसा लग रहा था जैसे हाथ है hi नहीं. कुसुम दीदी को इस बात का पता hi नहीं था. मैं जनता था की अगर उन्हें अभी पता चल जाये तो वो तड़प कर रह जाएँगी.

"एक बात कहु दीदी.?" मैंने ख़ामोशी को चीरते हुए धीमे स्वर में ये कहा तो दीदी ने हलके से हम्म्म की आवाज़ की. उनकी इस आवाज़ को सुन कर मैंने कहा.

"मैं चाहता हु की ये वक़्त बस यही पर रुक जाये और आप इसी तरह मुझसे छुपकी रहे. क्या आप भी ऐसा hi चाहती हैं.?" मैंने अपने दिल का हाल कहते हुए उनसे ये पूछा तो दीदी ने कहा.

"मैं तो बस वही चाहती हु विक्की जो तुम चाहते हो. तुम्हारी चाहत से मेरी चाहत जुड़ा कैसे हो जाएगी भला.?" कुसुम दीदी ने ये कहा तो मेरे जिस्म में ख़ुशी की एक आनंद दायक लहार दौड़ती चली गयी. मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"और..???" मैंने ये कहा तो दीदी कुछ पल जाने क्या सोचती रही फिर धीरे से बोली.

"मैं चाहती हु की तुम मुझे मेरे नाम से बुलाओ. तुमने हमेशा मुझे दीदी hi कहा है. मगर अब मैं चाहती हु की तुम मुझे मेरे नाम से पुकारो. मैं तुम्हारे मुख से अपना नाम सुन्ना चाहती हु और ये भी की तुम मुझे 'आप' नहीं 'तुम' कहो. इस 'तुम' में ज़्यादा अपनापन झलकता है." कुसुम दीदी ने ये कहा तो मैं पहले तो हैरान हुआ फिर एकदम से मेरे होठो पर मुस्कान फ़ैल गयी और मैंने कहा.

"मगर मैं आपका नाम कैसे ले सकता हु और आपको 'तुम' भी कैसे कह सकता हु.? आप मुझसे बड़ी हैं इस लिए मैं ये कैसे कर सकूगा.?" मैंने ये कहा तो दीदी ने मेरे सीने से अपना चेहरा उठा कर मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"अब हमारे बीच छोटा बड़ा का सवाल कहा रह गया विक्की.? जब छोटा बड़ा का सवाल था तब हमारा रिश्ता भी अलग था मगर अब हमारा रिश्ता हर रिश्ते से अलग और ख़ास बन गया है. इस लिए अब ये मत सोचो की मैं तुम्हारी दीदी हु और तुमसे बड़ी हु बल्कि ये सोचो की अब मैं तुम्हारी दासी hu....tumhare प्रेम की दासी." ये सब कहते कहते कुसुम दीदी के चेहरे पर शर्म की लाली फ़ैल गयी. मगर इस बार उन्होंने अपनी नज़रे नहीं झुकाई. उनकी इस बात को सुन कर मैंने कहा.

"ऐसा आप समझती हैं जबकि मैं तो हमेशा से hi आपका दास था और मैं चाहता था की आप मेरे लिए सबसे ऊपर रहे. जिसकी मैं पूजा करू और जिसके लिए मैं खुद को कुर्बान कर दू." मैंने ये कहा तो दीदी मुझे बस देखती रही. उनकी समुन्दर से भी गहरी आँखों में नीर उभरते नज़र आये. मैंने महसूस किया की उन्होंने खुद के जज़्बातो को सम्हालने के लिए ज़ोर लगाया था. फिर बोली.

"मैं कुछ नहीं जानती विक्की. मैं तो बस ये चाहती हु की तुम मुझे मेरे नाम से पुकारो और मुझे 'तुम' कहो. क्या मेरी ये चाहत भी नहीं पूरी करोगे.?" दीदी की आवाज़ एकदम से भारी हो गयी तो मैंने एकदम से कहा.

"K..kusum....meri jaan...meri रूह का सुकून. मैं तुम्हारी आँखों में आँशु नहीं देख सकता. मैंने जब से होश सम्हाला है तब से तुम्हे सिर्फ उदास और गंभीर hi देखा है. इस लिए मेरी भी ये ख्वाहिश पूरी करो की अब से तुम हमेशा हस्ती मुस्कुराती रहोगी." मैंने भारी आवाज़ में ये कहा तो दीदी के चेहरे पर चमक आ गयी. ऐसा लगा जैसे उनका चेहरा एकदम से खिल उठा हो. वो एकदम से मुझसे लिपट गयी और साथ hi बोली.

"बस अब से हमेशा हस्ती मुस्कुराती रहूगी. आप नहीं जानते की आपके ऐसा कहने से मैं कितना खुश हो गयी हु." कुसुम दीदी ने ये सब कहा तो मैं खुश तो हुआ मगर उनके मुख से अपने लिए 'आप' सुन कर चौंक भी गया.

"अब ये क्या है..? तुम मुझे 'आप' क्यों कहने लगी कुसुम.? इसके बारे में तो कोई करार नहीं हुआ था न हमारा.?" मैंने हैरानी से ये कहा तो दीदी ने मेरे सीने से छुपके हुए hi कहा.

"इस बारे में किसी करार की ज़रूरत भी नहीं है. अब से मैं आपको आप hi कहुगी और इस बारे में आप मुझे बिलकुल भी मन नहीं करेंगे." दीदी ने ये कहा तो मुझे याद आया की प्रिय पूजा भी मुझे आप hi कह रही थी आज और जब मैंने उनसे इसकी वजह पूछी तो उन्होंने बताया की वो ऐसा इस लिए कह रही हैं क्यों की अब मैं उन दोनों का पति बनने वाला हु और बीविया अपने पति का न तो नाम लेती हैं और न hi उन्हें तू या तुम कहती हैं. मैं इस वक्त यही याद करके मुस्कुरा उठा था. इसका मतलब कुसुम दीदी भी इसी वजह से अब मुझे आप कहने लगी थी. सच कहु तो इस वक्त मैं अपने अंदर बहुत hi ज़्यादा ख़ुशी महसूस कर रहा था.

अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी मेरे कानो में ताली बजने की आवाज़ सुनाई दी और शायद कुसुम दीदी को भी. तभी तो वो एकदम से मेरे सीने से उठ कर दूर कड़ी हो गयी थी. उनके दूर होते hi मेरी नज़र दरवाज़े पर कड़ी प्रिय पूजा पर पड़ी. वो दोनों तालिया बजा रही थी और दोनों के होठो पर जानदार मुस्कान थी.

उन दोनों को देख कर मैं तो बस मुस्कुरा कर hi रह गया मगर कुसुम दीदी का शर्म से बुरा हाल हो गया. उनका चेहरा शर्म से लाल पद गया और नज़रे नीचे झुक गयी थी. तभी वो कमरे से बाहर जाने के लिए तेज़ी से बढ़ी hi थी की मेरी दोनों नटखट बहनो ने रास्ता ब्लॉक कर दिया. फिर पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा.

"कहा भाग रही हैं दीदी.? अब हमसे क्या शर्माना.? अब हम में और आप में कोई अंतर तो रहा नहीं. हम दोनों भी तो आप hi की तरह इनकी बीविया बनने वाली हैं." पूजा ने एक hi सांस में ये सब कहा तो कुसुम दीदी का और भी शर्म से बुरा हाल हो गया. उनसे कुछ बोलते न बना. जबकि पूजा की इस बात के बाद प्रिय ने भी मुस्कुराते हुए कहा.

"दीदी तो आप शुरू से hi हैं हमारी और अब बताइये की आपको अब हम दीदी hi कहे या सौतन.?" प्रिय ने ये कहा तो इस बार दीदी ने नज़र उठा कर दोनों की तरफ देखा. शायद अब तक उन्होंने खुद को सम्हाल लिया था.

"इस सब के बाद भी तुम दोनों नहीं सुधरी. कुछ तो शर्म करने लगो अब." दीदी ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो प्रिय पूजा ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर दोनों तेज़ी से आगे बढ़ी और दीदी से लिपट गयी. कुसुम दीदी ने भी उन दोनों को ज़ोर से अपने से छुपका लिया. उनकी आँखों में ख़ुशी के आँशु भर आये थे. कुछ देर बाद जब दीदी ने दोनों को खुद से अलग किया तो प्रिय ने कहा.

"रचना दीदी भी हमारे साथ hi ऊपर से नीचे यहाँ आयी थी मगर वो कमरे के अंदर नहीं आयी. अगर आप कहे तो उन्हें अंदर बुला लू.?" प्रिय ने ये कहा तो कुसुम दीदी ने कहा.

"नहीं priya...use मैं खुद बुलाओगी. मैं उसकी भी गुनहगार हु. मैंने हमेशा उसके बारे में गलत सोचा और उसके लिए अपने मन में बैर रखा. जबकि उसका दिल तो सबसे ज़्यादा साफ़ और पवित्र था. उसका िस्थान हम सबसे ऊपर है." कुसुम दीदी ने ये कहा और आँखों में आँशु लिए वो कमरे से बाहर निकल गयी.

इधर बीएड पर लेता मैं उन तीनो को hi देख रहा था और सोच रहा था की अब शायद सब कुछ ठीक हो गया है. मेरी होने वाली चारो बीवियों के बीच अब प्रेम हो गया है. अभी मैं ये सोच hi रहा था की तभी कुसुम दीदी रचना को ले कर वापस कमरे में आयी.

"इस दुनिया में सबसे ज़्यादा मैं inse(vicky) प्यार करती हु. इस लिए इनकी hi कसम खा कर कहती हु की मेरे मन में तुम्हारे लिए अब कोई गलत भावना नहीं है. मुझे इस बात का बहुत अफ़सोस और दुःख है की मैंने तुम्हे हमेशा गलत समझा जबकि तुम कभी गलत थी hi नहीं. प्रेम तो मैंने भी इनसे किया मगर मेरे उस प्रेम में स्वार्थ था. मैं चाहती थी की ये सिर्फ मेरे hi रहे मगर तुम्हारा प्रेम तो सबसे अनमोल था मेरी बहन. निःस्वार्थ tha...aur उस प्रेम के लिए तुमने कितना कुछ त्याग भी किया. सच कहु तो तुमसे महान हम में से कोई भी नहीं है. अपनी इस बहन को माफ़ कर दे रचना." कुसुम दीदी ने रट हुए ये कहा तो रचना रट हुए कुसुम दीदी से लिपट गयी और बोली.

"नहीं didi...aap मुझसे किसी बात के लिए माफ़ी मत मांगिये. मैंने कभी आपके बारे में ये नहीं सोचा की आपने किसी के साथ गलत किया है. मैं तो इस बात से hi आज बहुत खुश हो गयी हु की जिस देवी की ये पूजा करते हैं उसने मुझे अपने सीने से लगा लिया है. मैं बस ये चाहती हु की अपनी इस छोटी बहन को भी प्रिय पूजा की तरह अपना स्नेह और प्यार देना." रचना ने ये सब कहा तो कुसुम दीदी ने उसे और भी ज़ोरो से खुद से छुपका लिया. कुछ देर बाद उसे खुद से अलग किया और फिर रचना के माथे पर चूमते हुए कहा.

"तुम भी इनकी तरह महानता की मूरत हो रचना. सच कहु तो मैं अब बहुत खुश हु. हम चारो हमेशा साथ रहेंगे और एक दूसरे का ख़याल रखेंगे." कुसुम दीदी ने ये कहा तो रचना के चेहरे पर ख़ुशी की चमक उभर आयी. प्रिय पूजा और रचना तीनो hi कुसुम दीदी से लिपट गयी.

मैं उन चारो को hi देख रहा था. कितनी खुश दिखाई देने लगी थी वो चारो और उन्हें खुश देख कर मैं भी बहुत खुश हो रहा था. तभी मेरी नज़र दरवाज़े के पास कड़ी माँ पर पड़ी. वो दरवाज़े के उस पार साइड से कड़ी थी. वो छुप के कमरे में मौजूद चारो की बाते सुन रही थी. तभी वो आड़ से हैट कर दरवाज़े के बीचो बीच आयी तो मैंने देखा उनकी आँखों में आँशु थे. जिन्हे उन्होंने अपने साड़ी के आँचल से पोंछा और फिर कमरे के अंदर आ गयी.

उनके अंदर आते hi कुसुम दीदी की नज़र उन पर पड़ी तो उन्होंने उन तीनो को खुद से अलग किया. तीनो ने भी माँ को देखा. चारो के चेहरे पर सुर्खी छ गयी थी. माँ उन चारो को कुछ पल देखती रही उसके बाद उन्होंने अपने दोनों हाथ फैला दिए. उनके फैले हुए हाथ देख कर वो चारो तेज़ी से आगे बढ़ी और माँ से लिपट गयी. माँ ने बारी बारी से उन चारो के सर पर चूमा.

"मेरा तो किसी को ख़याल hi नहीं है. मुझ पर भी थोड़ा तरस खाओ और मुझे भी प्यार करो." मैंने ये कहा तो माँ ने मेरी तरफ देखा. बाकी चारो भी माँ से अलग हो कर मुझे देखने लगी. चारो के होठो पर शर्मीली मुस्कान थी. जबकि माँ ने मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"चिंता मत कर बीटा. तुझे तो इतना ज़्यादा प्यार मिलने वाला है की तू उस प्यार को सम्हाल hi नहीं पायेगा बल्कि उसमे डूब hi जायेगा." माँ ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैं एकदम से चुप रह गया. जबकि माँ की उस बात से कुसुम और रचना तो बस मुस्कुरायी hi मगर प्रिय पूजा ज़ोरो से खिलखिला कर हसने लगी. फिर जैसे उन दोनों को किसी बात का ख़याल आया तो दोनों एकदम से चुप हो गयी और शर्मा के अपना अपना चेहरा झुका लिया.

उसके बाद माँ ने चारो को एक बार फिर से उनके माथे पर चूम कर प्यार दिया और फिर कमरे से ये कह कर बाहर निकल गयी की चलो अब सब अपना अपना काम करो. माँ के ऐसा कहने पर प्रिय पूजा तो माँ के साथ hi चली गयी. रचना भी जब जाने लगी तो कुसुम दीदी ने उसे रोक लिया और उससे मुस्कुराते हुए कहा की वो इनके यानी की मेरे पास hi रहे. कुसुम दीदी की इस बात से रचना हैरान भी हुयी और शर्मा भी गयी. मगर कुसुम दीदी उसे मेरे पास hi रहने का बोल कर बाहर चली गयी.

कुसुम दीदी के जाने के बाद रचना मेरे कमरे में अकेली रह गयी. मैं समझ गया की दीदी रचना को मेरे कमरे में क्यों रहने का बोल कर चली गयी थी. शायद वो चाहती थी की मैं और रचना आपस में कुछ बात करे. इतना तो वो भी जानती थी की मेरे और रचना के बीच अभी तक कोई बात नहीं हुयी है. इस लिए अब जब सब सही हो गया तो उन्हें लगा की मुझे और रचना को आपस में बाते करना चाहिए.

मैं अपनी जान और अपनी रूह को पा कर बहुत खुश था. अब अगर कोई मुझसे मेरी जान भी मांग लेता तो मैं ख़ुशी ख़ुशी दे देता. खेर मेरी जान यानी की कुसुम तो कमरे से चली गयी थी मगर रचना को कमरे में hi छोड़ गयी थी. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं रचना से क्या और कैसे बाते शुरू करू और शायद यही हाल रचना का भी था. मगर हमें एक दूसरे से कुछ तो कहना hi था और मैं ये भी समझता था की पहल मुझे hi करनी पड़ेगी.

"तुम्हे अगर सहज न लग रहा हो तो कमरे का दरवाज़ा बंद कर दो. वैसे मुझे नहीं लगता की हमारी बाते सुनने के लिए या फिर हमें देखने के लिए यहाँ कोई आएगा." मैंने दरवाज़े की तरफ देखने के बाद रचना से ये कहा तो रचना ने सर उठा कर एक बार मेरी तरफ देखा. उसके बाद वो अपनी जगह से हिली और जा कर कमरे के दरवाज़े को आहिस्ता से बंद कर दिया.

मैं उसी को देख रहा था. मेरे दिल की धड़कने फिर से बढ़ चुकी थी. तभी रचना पलटी और मेरे बीएड के पास थोड़ा करीब आ कर चुप चाप कड़ी हो गयी. उसका सर फिर से झुक गया था. अपने दोनों हाथो को आपस में उलझाए वो चुप चाप कड़ी थी. जैसे मन में उठ रहे जज़्बातो को सम्हालने की कोशिश कर रही हो.

"यु दूर मत कड़ी रहो रचना बल्कि मेरे पास बीएड में आ कर बैठ जाओ. उसके बाद hi हम कोई बात करते हैं." मैंने ये कहा तो रचना ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा और फिर चुप चाप आ कर बीएड के किनारे पर हौले से बैठ गयी.

"तुम्हे याद हम पांच साल पहले एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त हुआ करते थे. हमारे बीच कितना हसी मज़ाक और मस्ती चलती रहती थी. मगर सवाल ये है की क्या आज हमारे बीच वैसा कुछ है.? अगर नहीं है तो क्यों.? जबकि ऐसा होना तो नहीं चाहिए. मैं तो ऐसा था की अपनी बात सही ढंग से तुमसे कहने में भी झिझकता था और तुम ऐसी थी जिसे कोई भी बात करने में झिझक नहीं होती थी. खेर अगर मैं तुमसे ये कहु की मुझे वही रचना अच्छी लगती है जो फूल सी नाज़ुक thi....jiski हसी में खनक thi...aur जिसकी खूबसूरती में मैं खो जाता था तो क्या तुम वैसी बनोगी.? ऐसा नहीं है की आज अगर तुम ऐसी हो तो मुझे तुम अच्छी नहीं लगती या तुम में आज कोई कमी हो गयी है बल्कि कोई कमी नहीं है. मगर मैं चाहता हु की तुम पहले जैसी खिलखिलाती हुयी बन जाओ. यु हर वक्त संजीदा रहना तुम्हे शोभा नहीं देता." मैंने ये सब कहा तो रचना कुछ न बोली. मैं उसके झुके हुए चेहरे की तरफ कुछ देर तक देखता रहा उसके बाद बोलै.

"तुमने हमारे लिए जो कुछ भी किया वो तुम्हारे अलावा कोई नहीं कर सकता था और सच कहु तो मैं तुम्हारी इस खूबी से बहुत ज़्यादा इम्प्रेस्सेड हुआ हु. मैं समझ सकता हु की प्यार का जज़्बा किसी भी इंसान से कुछ भी करवा सकता है. या ये कहु की वो प्यार के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. खेर मैं तुमसे सच्चे दिल से कहना चाहता हु की मेरे दिल में तुम्हारी जगह बहुत ख़ास है रचना. मैं भगवन का शुक्रिया ऐडा करता हु की उसने मेरी किस्मत में तुम्हे लिखा. तुम अपने आपको कभी भी कुसुम दीदी से काम मत समझना. तुम चारो का मुझ पर उतना hi हक़ है जितना की वास्तव में होना चाहिए. अगर तुम्हारे मन में कोई बात हो तो तुम मुझसे बेझिझक कह सकती हो." मैंने ये सब कहा तो रचना ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा. उसकी आँखों में आँशु तैर रहे थे.

"आपने ये कह दिया यही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है. मैं इस बात के लिए तो बहुत खुश थी की मुझे आप से प्यार हुआ मगर इस बात से दुखी भी थी की भगवन ने मेरी किस्मत में आपको नहीं लिखा. मगर मैंने ठान लिया था की मैं आपको अपनी किस्मत बना कर hi रहूगी. भले hi उसके लिए मुझे अपने पिता या अपने परिवार से बग़ावत करना पड़े. मगर जब आप गांव से चले गए और फिर लौट कर नहीं आये तो मैं बहुत रोई. भगवन से बहुत ज़्यादा शिकायत हो गयी थी मुझे. धीरे धीरे मैं इस बात को अच्छे से समझ गयी की जिन्हे हमें हासिल नहीं होना होता वो किसी भी हाल में हासिल नहीं हो सकते. हम साडी दुनिया से लड़ सकते हैं मगर अपने भगवन और अपने नसीब से नहीं लड़ सकते. Bas....is बात को समझने के बाद इस बात की आस hi टूट गयी की आप मुझे कभी मिलेंगे भी. मगर मैंने तो खुद को आपको hi सौंप दिया था. मैंने खुद को आपकी अमानत बना लिया था. आप मुझे मिले या न मिले मगर मेरे तन मन पर आपके शिव किसी दूसरे का हक़ हरगिज़ नहीं हो सकता था." रचना सांस लेने के लिए रुकी उसके बाद उसने फिर कहा.

"आपके जाने के बाद लगा था की मेरे पास जीने का कोई मकसद hi नहीं रहा मगर उसके बाद भी मैंने ज़िंदा रहने का मकसद तलाश किया और फिर जो मकसद मिला उसने मुझे इतना सुकून दिया की मैं ये सोच कर खुश हो गयी की अपने प्यार के लिए खुद को कुर्बान करने का कितना अच्छा मौका मिल गया है. बस उसके बाद मैंने वही किया जो सिर्फ और सिर्फ मेरा दिल चाहता था. मुझे घर में अपने माँ बाप भाई भौजाई किसी से कोई मतलब नहीं रह गया था और न hi किसी बात का दर रह गया था. खेर वक्त गुज़रा और फिर मेरी टूटी हुयी आस को जोड़ने के लिए आप वापस लौट आये. उस दिन अपने घर में आपको देख कर खुश तो बहुत हुयी और दिल ने भी बहुत चाहा की आप से लिपट कर जी भर के रो लू मगर बाद में ये सोच कर अकेले में खूब रोई भी की आपके आ जाने से भी क्या होगा.? बल्कि होगा ये की जब भी आपको देखूँगी तभी एक दर्द मेरी जान लेने पर आमादा हो जायेगा. मगर nahi....bhagwan को शायद मुझ पर तरस आ गया था और उसने आपको मेरी किस्मत में लिख दिया. मैं इतनी खुश हुयी की जी चाह रहा था की साडी दुनिया के सामने चीख चीख कर कहु की मुझे मेरा प्यार मिल गया और अब मुझे किसी से कुछ भी नहीं चाहिए." रचना ये सब बताते हुए इमोशनल हो गयी. उसकी आँखों में जो आँशु तैर रहे थे वो छलक कर उसके गोर गोर रुखसारों को भिगोते चले गए.

उसकी ये साड़ी बाते सुन कर मेरे दिल में उसके लिए बेपनाह प्यार उमड़ पड़ा और मैंने अपना एक हाथ आगे बढ़ा कर उसके एक हाथ को पकड़ कर अपनी तरफ ज़ोर दिया तो रचना ने मेरी तरफ देखा. उसकी भीगी हुयी आँखों में देखते हुए मैंने अपनी पलकों के इशारे से hi उसे कहा की आ जाओ और मेरे सीने से लग जाओ. रचना को जैसे hi मेरा ये इशारा समझ आया वो एकदम से मेरे से आ लगी और बिलख बिलख कर रोने लगी. मैंने उसे कुछ देर रोने दिया और फिर उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोलै.

"मैं बहुत नसीब वाला हु रचना की भगवन ने मुझे तुम जैसे चार चार अनमोल तोहफे दिए. सच कहु तो अब अपने उस भगवन से मुझे भी कोई गिला नहीं है. तुम चारो मेरी जान हो रचना और अब मैं तुम चारो के बिना एक पल भी जीने का नहीं सोच सकता." मैंने ये कहा तो रचना ने सुबकते हुए कहा.

"हम भी आपके बिना नहीं जी पाएंगे. आप हमारी ज़िन्दगी हैं. आपसे hi हमारी हर ख़ुशी है. मैं बहुत खुश हु की आपने मुझे अपने दिल में जगह दी और इस बात से भी बहुत खुश हु की कुसुम दीदी ने मुझे प्यार से गले लगाया. मैं आपसे बस इतना hi चाहती हु की दीदी को कभी उदास और दुखी नहीं होने देना. उन्हें बहुत प्यार करना. उन्होंने ज़िन्दगी में सिर्फ आपको hi जाना है और आपके लिए hi ज़िंदा हैं." रचना ने ये सब कहा तो मुझे उस पर सच में बहुत ज़्यादा प्यार आया. वो इस वक्त भी कुसुम दीदी के लिए hi मुझसे ये सब कह रही थी और अपने लिए कुछ नहीं. ये साबित करता था की उसका दिल और उसका नेचर बहुत अच्छा है.

"तुम भले hi अपनी दीदी की पैरवी करो डिअर मगर मेरे लिए तो तुम चारो बराबर हो. मैं तुम चारो से hi बराबर प्यार करुगा. हो सकता है की मेरे लिए ये हिसाब रखना थोड़ा मुश्किल रहे इस लिए मैं चाहता हु की अगर कभी ऐसा हो जाये की तुम में से किसी के साथ बराबर न्याय न हो पाए तो तुम में से कोई भी उसके लिए कुछ गलत मत सोचना. हमेशा यही याद रखना की मेरे दिल में किसी के लिए भी काम प्यार नहीं है." मैंने ये सब कहा तो रचना ने मेरे सीने से अपना चेहरा उठा कर मेरी तरफ देखा.

जैसा की मैंने बताया था की वो पहले से मोती हो गयी थी मगर उसके बाद भी वो खूबसूरत थी. चेंज ये था की मोती हो जाने की वजह से उसका चेहरा क्यूट दिखने लगा था. भरा भरा चेहरा था. फुले फुले गाल और लाल सुर्ख होंठ. वो मेरे चेहरे के पास hi थी और इस वक्त उसका चेहरा उसके आंशुओ से थोड़ा भीगा हुआ था. मेरा दिल चाहा की मैं उसके थरथराते हुए लाल सुर्ख होठो को मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दू मगर मैंने खुद को शांत किया और बस उसकी खूबसूरती को देखता रहा. मेरे एकटक देखने से उसके चेहरे पर शर्म की लाली छाने लगी और उसने शर्मा कर अपना चेहरा झुका लिया. उसके होठ और भी ज़्यादा कांपने लगे.

"वैसे क्या ख़याल है अगर ख़ुशी के इस मौके पर मुँह मीठा किया जाये.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रचना ने मेरी तरफ देखा और धीरे से कहा.

"फिर तो हम चारो के साथ आपको मुँह मीठा करना पड़ेगा." रचना ने हलकी मुस्कान और हलकी शर्म के साथ ये कहा तो मैंने कहा.

"अब तुम भी मुझे 'आप' कहने लगी. ये तुम चारो को अचानक क्या हो गया है.?" मैंने ये कहा तो रचना ने धीरे से hi कहा.

"वो इस लिए की बीविया अपने पति को इज्जत से आप hi कहती हैं और उनका नाम नहीं लेती." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ये कहा लिखा है.? आज कल बीविया अपने पति से hi खुद को आप कहलवाती हैं. तुम लोग कैसी बीविया हो यार.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रचना ने कहा.

"हम ऐसी hi हैं. हमें बाकी औरतो से क्या मतलब.? हमें तो अपने से मतलब है और अपने शिष्टाचार से." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"खैर छोडो ये सब. हम मुँह मीठा करने की बात कर रहे थे न.?" मैंने ये कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाँ तो मुँह मीठा कीजिये न मगर मेरी ख्वाहिश ये है की मुँह मीठा करने की शुरुआत आप कुसुम दीदी से करे. आखिर आप पर सबसे पहला हक़ उनका hi तो है और खबरदार जो आपने मेरी दीदी के साथ na-insaafi की तो." रचना ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"वाह क्या बात है. अभी तो शिष्टाचार की बाते कर रही थी और अब अपने होने वाले पति को खुले आम धमकी दे रही हो." मैंने ये कहा तो रचना ने जल्दी से मेरे सीने में अपना चेहरा छुपा लिया और फिर बोली.

"ये धमकी नहीं है पति देव बल्कि मेरी आपसे विनती है की सबसे पहले आप दीदी से hi मुँह मीठा करे. हम तीनो तो ऐसा कर चुके हैं मगर दीदी तो आज भी इस एहसास से महरूम हैं." रचना ने ये कहा तो मैं भी सोचने लगा की बात तो सही कह रही है रचना. मगर मैंने कभी भी दीदी के बारे में ऐसा नहीं सोचा और न hi उनसे इस बारे में कुछ कहने की मुझ में हिम्मत थी.

"तो बुलाओ दीदी को.?" रचना ने सर उठा कर मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"तुम्हे क्या लगता है उनके साथ ऐसा करना मेरे लिए इतना आसान है.? मैं उनसे इस बारे में कुछ भी नहीं कह पाउगा और मुझे पता है दीदी भी मुझसे इस बारे में कुछ कह नहीं पाएंगी." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"ऐसा इस लिए क्यों की अभी भी आप दोनों यही सोच रहे हैं की आप दोनों आपस में भाई बहन हैं. जबकि आप दोनों को अब ये बात भुला देनी चाहिए की आप भाई बहन हैं." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं तो खुद को ये बात समझा लगा और पहल करने के लिए भी खुद को तैयार कर लगा मगर क्या दीदी के लिए ये सब आसान होगा.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"लड़की कभी सबसे पहले किसी बात की पहल नहीं करती और ये बात आप भी जानते हैं. इस लिए जब आप किसी बात की पहल करेंगे तो मुझे यकीन है की वो आपको अब रोकेंगी नहीं बल्कि उस पहल में आपका साथ देने की कोशिश hi करेंगी." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"फिर भी यार इस वक्त अचानक से ये सब करने की हिम्मत मुझ में नहीं है. मैंने आज तक कभी भी किसी चीज़ के लिए उन्हें हुकुम नहीं दिया और न hi ऐसा सोचा है. वो हमसे बड़ी थी इस लिए हमने हमेशा उनके hi हुकुम को मन है." मैंने ये कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाँ मैं जानती hu...khair इसमें मैं आपकी मदद करुँगी. दीदी से जा कर कह देती हु की आप मुँह मीठा करना चाहते हैं." रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"ारी नहीं yaar....main उनके साथ अभी ऐसा नहीं कर सकता. मुझे इसके लिए अभी थोड़ा टाइम लगेगा. तब तक मेरी बाकी बीविया हैं न मुँह मीठा करने के लिए." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रचना ने कहा.

"हाँ हैं तो मगर उनमे से कोई भी तब तक मुँह मीठा नहीं करेंगी जब तक कुसुम दीदी मुँह मीठा नहीं करेंगी." रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"ारी ये क्या बात हुयी यार.? ये तो चीटिंग है." मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए ये कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"ये कोई चीटिंग वेटिंग नहीं है जनाब. बल्कि ये आपकी प्यारी प्यारी और मासूम सी बीवियों की इच्छा और सम्मान की बात है." रचना ने ये कहा तो मैं देखता रह गया उसे. मुझे इस तरह हैरान परेशान होते देख रचना खिलखिला कर हसने लगी.

आज बहुत सालो बाद मैंने उसकी ये हसी देखि थी. ऐसे hi शरारत से हस्ती थी वो और मैं उसकी इस हसी में खो सा जाता था. रचना ने जब मुझे अपनी तरफ एकटक देखते हुए देखा तो उसकी हसी रुक गयी और वो एकदम से शर्माने लगी. मेरा दिल चाहा की उसे खींच कर उसके लाल सुर्ख होंठो को चूम लू मगर मैं खुद कुछ कर पाने की हालत में नहीं था.

"तो क्या सच में मुँह मीठा नहीं होगा.?" मैंने उदास लहजे में ये कहा तो रचना ने कहा.

"माफ़ कर दीजिये पति देव मगर ये हम तीनो बहनो की इच्छा है की अब से आप जो भी करेंगे उसकी शुरुआत आपको सबसे पहले हमारी दीदी से hi करना पड़ेगा. इस बात को आप हमारी धरासत्त नहीं बल्कि दीदी के लिए हमारा प्यार और सम्मान समझिये." रचना ने इस बार गंभीर हो के ये कहा तो उसकी बात एकदम से मेरे दिल को छू गयी. मैं सोचने लगा की कुसुम दीदी के लिए इन तीनो के दिलो में कितना मान सम्मान है. सच कहु तो ये बहुत बड़ी बात थी और मुझे इन तीनो की इस फीलिंग्स की कदर करनी चाहिए थी.

"अच्छी बात है डिअर. मैं वही करुगा जैसा तुम तीनो चाहती हो." मैंने ये कहा तो रचना ने भारी लहजे में कहा.

"आपको बुरा तो नहीं लगा न.? देखिये अगर बुरा लगा हो तो हमें इसके लिए माफ़ कर दीजिये." रचना ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"नहीं डिअर मुझे बिलकुल भी बुरा नहीं लगा बल्कि ये जान कर बहुत अच्छा hi लगा की तुम लोग अपनी दीदी के लिए इतना कुछ सोच रही हो." मैंने ये कहा तो रचना ने फिर से मेरे सीने में अपना सर रख दिया और फिर धीरे से बोली.

"थैंक यू सो मच हमारी फीलिंग्स को समझने के लिए." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"यू मोस्ट वेलकम माय डिअर." मैंने मुस्कुरा कर ये कहा और उसके सर पर हलके हलके हाथ फेरता रहा.

कुछ देर बाद कमरे के बाहर से माँ की आवाज़ आयी तो रचना जल्दी से मेरे सीने से अपना सर उठा कर बीएड से नीचे उतर गयी. उसके बाद वो अपने हुलिए को सही करते हुए कमरे का दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गयी. उसके जाने के बाद मैं उसी की बातो के बारे में सोचता हुआ पड़ा रहा. मैं अंदर से बहुत hi ज़्यादा ख़ुशी महसूस कर रहा था. यहाँ के हालात तो बेहतर हो चुके थे मगर अभी उन हालातो को बेहतर करना बाकी था जो दक्षिणा और उसकी बेटी से जुड़े हुए थे.

(भाई लोग अब से मैं कुसुम दीदी को 'दीदी' नहीं कहुगा बल्कि सिर्फ कुसुम hi कहुगा.)

कुसुम को तो मेरे और दक्षिणा के बारे में पता चल चूका था. हाँ ये ज़रूर था की अभी उन्हें ये नहीं पता था की हमारे बीच ये किस्सा कैसे शुरू हुआ था और कहा तक पंहुचा था. कुसुम दक्षिणा से सब कुछ जानना चाहती थी. खेर आने वाले वक्त में दक्षिणा से उसे सब पता चल hi जायेगा मगर सोचने वाली बात ये थी की माँ को जब ये सब पता चलेगा तो क्या होगा. क्या वो अपने बच्चो के इस रिश्ते की तरह दक्षिणा को भी एक्सेप्ट करेंगी.? या कुछ ऐसा हो जायेगा जिसकी मैं इस वक्त कल्पना भी नहीं कर सकता हु.

भाई लोग....

आज के लिया इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
भाई लोग....

अपडेट दे दिया है. विक्की कुसुम & रचना स्पेशल के ये दो update(A & बी) फिनिश हो गए अब....

मेरी सभी दोस्तों से गुज़ारिश है की कमेंट ज़रूर करो. अपडेट पढ़ने के बाद जो कुछ भी मन में आता हो उसे अपने कमैंट्स के माध्यम से ज़रूर कहो. मुझे भी पता चलता रहेगा की मैं कैसा लिख रहा हु. आप लोगो के कमैंट्स से मुझे idea's मिल जाये हैं जिससे मुझे आगे लिखने में आसानी हो जाती है. सो प्ल्ज़ अपने मन की बात को छुपाओ मत बल्कि उसे यहाँ रखो....

यहाँ दो तीन को छोड़ कर सब वैरी नीस और सुपर अपडेट लिख कर चले जाये हैं. ऐसे में मुझे कैसे कोई आईडिया मिलेगा आप खुद सोचो. सो प्ल्ज़ यारा अपने सुग्गेस्टियन्स और अपनी बात मुझे बताते रहो....

:थैंक्यू:
 
भाई लोग....

कोरोना वायरस की वजह से आज देश का हर नागरिक अपना काम धंधा छोड़ कर बैठा हुआ है. आप सभी को पता है की कोरोना वायरस हमारे लिए कितना खतरनाक है इस लिए जितना हो सके खुद को और अपने चाहने वालो को सुरक्षित रखे....

भाई लोग मैंने ये थ्रेड क्लोज कर दिया था क्यों की तब मेरे पास टाइम नहीं था. आप लोग बेकार में वेटिंग वेटिंग करते और जब अपडेट नहीं आता तो गुस्सा भी होते. मैंने पहले भी सबको बताया था की शादियों की वजह से बिजी हो जाउगा. लोखड़ौन होने से सरे काम भी जैसे रुक hi गए हैं. इस लिए मैंने सोचा तब तक स्टोरी को hi आगे बढ़ाया जाये....

मेरे कुछ भाई लोग लगता है थ्रेड क्लोज होने से मुझसे नाराज़ भी हो गए होंगे. जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए. मैंने तो पहले hi सबसे बताया था. आप लोग पिछले कुछ भी नहीं देखते हैं. जो सामने नज़र आ गया उसी में एक्शन ले लेते हैं. खैर ये भी आप लोगो का प्यार hi है....

नेक्स्ट अपडेट कल तक देने की कोशिश करुगा. क्यों की अभी मुझे खुद पिछले कुछ अपडेट पढ़ने पड़ेगे. उसके बाद hi आगे का सोच कर कुछ लिखुगा. इस लिए वेट कर लेना भाई लोग....


कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ उस....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 58

"नहीं डिअर मुझे बिलकुल भी बुरा नहीं लगा बल्कि ये जान कर बहुत अच्छा hi लगा की तुम लोग अपनी दीदी के लिए इतना कुछ सोच रही हो." मैंने ये कहा तो रचना ने फिर से मेरे सीने में अपना सर रख दिया और फिर धीरे से बोली.

"थैंक यू सो मच हमारी फीलिंग्स को समझने के लिए." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"यू मोस्ट वेलकम माय डिअर." मैंने मुस्कुरा कर ये कहा और उसके सर पर हलके हलके हाथ फेरता रहा.

कुछ देर बाद कमरे के बाहर से माँ की आवाज़ आयी तो रचना जल्दी से मेरे सीने से अपना सर उठा कर बीएड से नीचे उतर गयी. उसके बाद वो अपने हुलिए को सही करते हुए कमरे का दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गयी. उसके जाने के बाद मैं उसी की बातो के बारे में सोचता हुआ पड़ा रहा. मैं अंदर से बहुत hi ज़्यादा ख़ुशी महसूस कर रहा था. यहाँ के हालात तो बेहतर हो चुके थे मगर अभी उन हालातो को बेहतर करना बाकी था जो दक्षिणा और उसकी बेटी से जुड़े हुए थे.

(भाई लोग अब से मैं कुसुम दीदी को 'दीदी' नहीं कहुगा बल्कि सिर्फ कुसुम hi कहुगा.)

कुसुम को तो मेरे और दक्षिणा के बारे में पता चल चूका था. हाँ ये ज़रूर था की अभी उन्हें ये नहीं पता था की हमारे बीच ये किस्सा कैसे शुरू हुआ था और कहा तक पंहुचा था. कुसुम दक्षिणा से सब कुछ जानना चाहती थी. खेर आने वाले वक्त में दक्षिणा से उसे सब पता चल hi जायेगा मगर सोचने वाली बात ये थी की माँ को जब ये सब पता चलेगा तो क्या होगा. क्या वो अपने बच्चो के इस रिश्ते की तरह दक्षिणा को भी एक्सेप्ट करेंगी.? या कुछ ऐसा हो जायेगा जिसकी मैं इस वक्त कल्पना भी नहीं कर सकता हु.

अब आगे पढ़िए....
दक्षिणा ने ऑटो से उतर कर ऑटो वाले को पैसे दिए और फिर एक तरफ को पैदल hi चल पड़ी. उसकी खुद की कार रिपेयरिंग के लिए दी हुयी थी जिसमे विक्की का एक्सीडेंट हुआ था. इस लिए अब उसे जहा भी जाना होता था तो वो ऑटो से hi जाती थी. वैसे वो एक स्कॉटी लेने की सोच रही थी मगर विक्की की हालत ठीक होने के बाद hi वो स्कॉटी लेना चाहती थी. रास्ते में उसकी बेटी किरण का फ़ोन आया था. उसने बताया की वो घर पहुंच गयी है. किरण ने उससे पूछा था की वो कहा गयी हुयी हैं तो उसने बताया था की वो किसी ज़रूरी काम से घर से बाहर आयी हुयी है और एक या डेढ़ घंटे में वापस आ जाएगी.

एक बिल्डिंग के दरवाज़े के बगल से लगी दूर बेल्ल पर दक्षिणा ने ऊँगली राखी तो अंदर कही घंटी बजने की आवाज़ खुद उसे भी सुनाई दी. कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला तो दक्षिणा के सामने एक लड़की नज़र आयी. लड़की निहायत hi सुन्दर थी और उसकी उम्र बीस या बाइस साल के करीब थी. लड़की की नज़र जब दक्षिणा पर पड़ी तो उसके चेहरे के भाव एकदम से बदले और वो एकदम से खुश होती दिखाई देने लगी.

"दक्षिणा आंटी जी आप.???" लड़की ने ख़ुशी से उछालते हुए ये कहा तो दक्षिणा मुस्कुरा उठी और आगे बढ़ कर उसे अपने सीने से लगा कर कहा.

"कैसी हो नीलू बीटा.?" दक्षिणा ने ये पूछा तो नीलू ने दक्षिणा के सीने से अलग हो कर मुस्कुराते हुए कहा.

"मैं बिलकुल ठीक हु आंटी. आइये अंदर आइये न. मैं अम्मी अब्बू को जल्दी से बताती हु की आप आयी हैं." नीलू ये कहते हुए एक तरफ हटी तो दक्षिणा आगे बढ़ते हुए दूरिंग रूम पर आ गयी. उसके पीछे पीछे hi नीलू भी आयी और वो अंदर की तरफ चली गयी. कुछ देर में hi नीलू के साथ उसके अम्मी अब्बू भी ड्रिंग रूम पर आ गए. दक्षिणा पर नज़र पड़ते hi सब बेहद खुश हुए. नीलू की अम्मी और दक्षिणा दोनों hi एक दूसरे से गले मिली. खैर उसके बाद सामने के सोफे पर नीलू के अम्मी अब्बू बैठ गए जबकि नीलू दक्षिणा के साथ hi उसके बगल से बैठ गयी. कुछ देर तक हाल चाल चलता रहा उसके बाद चाय पानी हुआ.

"भाई जान के इंतकाल के बाद तो जैसे तुम हमें भूल hi गयी थी दक्षिणा. एक वक्त था जब अक्सर आना जाना लगा रहता था हमारे घरो में." नीलू की अम्मी ने ये कहा तो दक्षिणा ने गहरी सांस लेते हुए कहा.

"वक्त और हालात हमेशा एक जैसे कहा रहते हैं राबिआ. तुम्हे तो सब पता है न की सब कुछ कैसे हुआ था.?" दक्षिणा ने थोड़ा उदास भाव से ये कहा तो राबिआ कुछ पालो तक चुप रही फिर बोली.

"खैर छोडो ये बताओ किरण कैसी है.? ससुराल में खुश तो है न वो.?" राबिआ ने ये पूछा तो दक्षिणा ने कहा.

"उस बेचारी की भी किस्मत खराब hi है राबिआ. मैं तो उस लड़के के साथ उसकी शादी पहले भी नहीं करना चाहती थी मगर हालात ऐसे थे की मेरी सुनता hi नहीं था कोई." दक्षिणा ने ये कहा तो इस बार नीलू के अब्बू बोल पड़े.

"ऐसा क्यों कह रही हैं आप.? आखिर हुआ क्या है हमारी किरण बेटी के साथ.? क्या उसका हस्बैंड उसे परेशां करता है.? अगर ऐसा है तो आप फ़िक्र मत कीजिये. हम देख लेंगे उसे. हम तो पहले भी इस शादी के खिलाफ थे मगर खैर." नीलू के अब्बू ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"इसी सिलसिले में तो मैं यहाँ आयी हु भाई साहब." दक्षिणा ने ये कहा तो राबिआ ने कहा.

"इसका मतलब नीलू के अब्बू की शंका सही है. खुल कर बताओ दक्षिणा क्या बात है.?" राबिआ ने ये कहा तो दक्षिणा ने शार्ट में साड़ी स्टोरी उन्हें सुना दी किरण और उसके हस्बैंड की. साड़ी कहानी सुनने के बाद राबिआ उसका हस्बैंड और नीलू तीनो hi शॉक रह गए.

"तो क्या तुम सच में अपनी प्रॉपर्टी उस विक्की के नाम नहीं करने वाली हो.?" राबिआ ने थोड़ी देर बाद ये पूछा तो दक्षिणा ने कहा.

"वो मेरी प्रॉपर्टी का केयरटेकर है राबिआ और ये बताने की ज़रूरत नहीं की किरण के पापा के रहते हुए भी वही हमारे कारोबार को सम्हालता था और आज भी उसी की वजह से चल रहा है. तुम्हारे भाई साहब ने जिस लड़के को दामाद बनाया था उसने कभी ये जानने की ज़रूरत भी नहीं समझी की जिस प्रॉपर्टी को वो इस तरह फ्यूचर में पाना चाहेगा उसका हाल कैसा है.? ारी मैं कहती हु की अगर उसे प्रॉपर्टी लेना hi था तो उसकी देख रेख भी करना था न. किरण के डैड के जाने के बाद मैंने जब रवि से इस बारे में बात की तो उसने साफ़ कहा था की उसके पास इसके लिए टाइम नहीं है. मैंने घर जमाई बनने की बात की तो बोलै की उसे किसी के यहाँ कुत्ता बन कर नहीं रहना है. कहने का मतलब ये की उसे सिर्फ प्रॉपर्टी से मतलब था जबकि मेरी बेटी ने साफ़ कह दिया था की उसे मेरी प्रॉपर्टी का एक रूपया भी नहीं चाहिए." दक्षिणा ने ये सब कहा तो कुछ पल के लिए चारो के बीच सन्नाटा छ गया.

"ये बात तो नीलू क अब्बू ने भी भाई साहब से कही थी की वो लड़का किरण के लिए ठीक नहीं है मगर वो इनकी बात मने hi नहीं थे. खैर अब क्या करना है.? मुझे नहीं लगता की सारा राज़ खुल जाने और जेल जाने के बाद भी रवि चुप बैठेगा. वो ज़रूर फिर से कोई न कोई कारनामा करेगा." राबिआ ने ये कहा तो नीलू के अब्बू बोल पड़े.

"अब वो कुछ नहीं करेगा. अब उसका कार्य क्रम हम देखेंगे. भाभी जी आप मुझे बताइये रवि को पकड़ने वाला वो इंस्पेक्टर कौन था.?" नीलू के अब्बू ने दक्षिणा की तरफ देखते हुए ये पूछा तो दक्षिणा ने इंस्पेक्टर के बारे में बता दिया और ये भी बताया की वो उसकी बेटी से शादी करने की बात कर रहा था. दक्षिणा ने ये भी बताया की जब उसने अपनी बेटी से शादी करने के बारे में उससे पूछा तो उसने अपनी कैसी लव स्टोरी सुनाई थी.

साड़ी बाते सुनने के बाद एक बार फिर से दक्षिणा को छोड़ कर बाकी तीनो हैरान हो गए. नीलू के अब्बू किसी सोच में दुबे नज़र आये तो राबिआ ने पूछ hi लिया.

"क्या सोचने लगे आप.?" राबिआ ने ये पूछा तो नीलू के अब्बू ने कहा.

"एक मिनट हमें उसके बारे में थोड़ा बहुत पता तो है मगर क्यों की मामला उसका किरण से शादी करने की बात का है तो हमें उसके बारे में डिटेल से जानकारी चाहिए. हम अभी पता करते हैं." ये कहते हुए नीलू के अब्बू सोफे से उठ कर अंदर कमरे की तरफ चले गए.

"ये तुमने अच्छा किया दक्षिणा जो यहाँ आ गयी. ये अपने पुलिस डिपार्टमेंट में किसी आदमी से उसके बारे में सब पता कर लेंगे." राबिआ ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"यही तो मैं चाहती हु राबिआ. मैं नहीं चाहती की मेरी बेटी किसी ऐसे इंसान के पास पहुंच जाये जो उसे रवि की तरह hi ट्रीट करे." दक्षिणा ने गंभीरता से ये कहा तो राबिआ ने कहा.

"फिक्र मत करो दक्षिणा. किरण मेरी भी बेटी है. तुम्हे तो पता है की नीलू के अब्बू बचपन से hi उसे कितना लाड प्यार करते थे." राबिआ ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"पहले का वक्त कितना अच्छा था राबिआ. हम पास में hi रहते थे और हमारे बीच कितना लगाव था. उसके बाद भाई साहब यहाँ आ गए. यहाँ आने की वजह का भी मुझे पता है मगर तुम तो जानती हो की हम में से कोई कुछ नहीं कर सकता था. भाई साहब ने कितना समझाया था किरण के पिता को की वो उस लड़के से किरण की शादी न करे और शराब छोड़ दे मगर वो किसी की नहीं सुन रहे थे. बात जब ज़्यादा तो बढ़ गयी तो भाई साहब यहाँ घर बनवा कर रहने लगे." दक्षिणा ने ये सब कहा तो राबिआ ने गहरी सांस लेते हुए कहा.

"ये भी भाई साहब से इसी लिए नाराज़ हो गए थे की वो उनकी लाड़ली भतीजी की उनकी मर्ज़ी के खिलाफ उस लड़के से शादी करने की ज़िद किये हुए थे." राबिआ ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"उस वक्त हर कोई उनके उस बेहेवियर से परेशां था. खैर छोड़िये अब तो जो होना था हो hi गया मगर अब मैं अपनी बेटी को ऐसे किसी भी लड़के के साथ नहीं बांधने दूगी." दक्षिणा ने ये कहा hi था की तभी अंदर से नीलू के अब्बू वापस आ गए और राबिआ के बगल से सोफे पर बैठ गए.

"हमने उस इंस्पेक्टर के बारे में सब कुछ पता करने के लिए अपने एक पुलिस वाले को लगा दिया है. वो जल्द hi हमें उसके बारे में माकूल जानकारी पता कर के देगा." नीलू के अब्बू ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"अब ये आप जानिए भाई साहब. मैं तो बस इतना जानती हु की आपके रहते हुए अब मेरी बेटी पर कोई बात नहीं आएगी." दक्षिणा ने ये कहा तो नीलू के अब्बू ने इस बार मुस्कुराते हुए कहा.

"किरण बेटी पर hi बस क्यों बल्कि हम तो अब आप पर भी कोई आफत नहीं आने देंगे." नीलू के अब्बू ने ये कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"उसके लिए तो मेरी राबिआ बहन hi काफी है भाई साहब. मुझसे बेहतर कौन जनता होगा की ये क्या चीज़ है.?" दक्षिणा ने ये कहा तो सब हसने लगे. जबकि हसने के बाद राबिआ ने कहा.

"मैंने एक बार मॉल से बाहर आते वक्त कुछ लफंगो से इसको क्या बचा लिया ये उस दिन से मुझे शेरनी समझने लगी. जबकि उन लफंगो को देख कर खुद मेरी भी हालत खराब हो गयी थी मगर पता नहीं कैसे मुझसे वो सब हो गया था. जिसका रिजल्ट ये निकला की वो लफंगे दम दबा कर भाग खड़े हुए थे." राबिआ ने ये सब बताया तो नीलू झट से बोल पड़ी.

"ओह्ह अम्मी यू अरे ग्रेट बूत आपने तो ये बात मुझे कभी नहीं बतायी." नीलू ने मुँह फूलते हुए ये कहा तो दक्षिणा ने उसे खुद से छुपकाते हुए कहा.

"ारी मिली प्यारी प्यारी गुड़िया नालाज हो गयी क्या.? वैसे तुम्हे पता है ये बात तो हम दोनों के अलावा आज तक किसी को भी पता नहीं थी." दक्षिणा ने ये कहा तो नीलू मुस्कुराने लगी.

खैर कुछ देर और बात चीत करने के बाद दक्षिणा राबिआ और उसके शौहर यानी द्क्प शरफराज खान से इजाज़त ले कर घर की तरफ चल पड़ी. इस बीच राबिआ और दक्षिणा ने एक दूसरे को अपना अपना मोबाइल नंबर भी दिया. नीलू उर्फ़ नीलोफर को उसने बताया की किरण आ गयी है तो अगर वो उससे मिलना चाहे तो घर आ सकती है. दक्षिणा की इस बात पर राबिआ ने कहा था की वो सब किसी दिन टाइम निकल कर ज़रूर उसके घर आएंगे.

घर पहुंच कर दक्षिणा अपनी बेटी किरण से मिली. किरण अपनी माँ से लिपट कर बुरी तरह रो रही थी. दक्षिणा ने अपनी बेटी को सम्हाला और उसे ढेर सारा प्यार दिया. कुछ देर बाद जब किरण शांत हुयी तो उसने बताया की वो बड़ी मुश्किल से यहाँ आने में कामयाब हुयी है. उसके ससुराल वाले उसे आने नहीं दे रहे थे. फिर जब उसने पुलिस की धमकी दी तब जा के उन्होंने उसे आने दिया था. उसके ससुराल में भी सबको पता चल गया था की उसका पति किस जुर्म में जेल में बंद है. किरण ने बताया की ये सब उसके पति और ससुर का hi किया धरा था.

दक्षिणा ये जान कर हैरान हुयी की किरण का ससुर भी इस जुर्म में शामिल है. उसे तो लगा था की ये सब रवि ने hi किया था. रवि तो जेल में है मगर उसका बाप जेल से बाहर है. मतलब वो अपने bête को आसानी से छुड़ा लेगा. दक्षिणा को लगा की इसके लिए कुछ करना पड़ेगा. उसने द्क्प शरफराज खान से बात करने के लिए राबिआ को फ़ोन किया. राबिआ के फ़ोन उठाने पर दक्षिणा ने उससे कहा की भाई साहब से बात कराये. द्क्प के लाइन पर आने पर दक्षिणा ने उसे बताया की रवि के साथ साथ उसका बाप भी इस खेल में शामिल है. इस लिए उसे भी पुलिस लॉक उप में डालना होगा. दक्षिणा की इस बात पर द्क्प खान ने कहा की फ़िक्र मत कीजिये वो सब देख लेगा.

द्क्प खान से बात करने के बाद दक्षिणा अब खुद को बेफिक्र महसूस करने लगी थी. खैर उसके बाद दोनों माँ बेटी फ्रेश होने के लिए अपने अपने कमरे में चली गयी. सविता और उसकी बेटी किचन में खाना तैयार कर रही थी.

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इधर हर कोई अब खुश था. मेरी बहने बेहद खुश थी और रचना भी. ये चारो अब ख़ुशी ख़ुशी एक hi कमरे में गुप् शूप लगा रही थी. हालांकि कुसुम से खुल कर बात करने में अभी भी बाकी तीनो को थोड़ा संकोच लगता था. सबको खुश देख कर माँ भी खुश थी. कुसुम ने माँ और बाकी सब लोगो को बताया की वो अभी कुछ दिन दक्षिणा के यहाँ hi रहेगी. उसके बाद वो यहाँ रहने लगेगी. वो दिन में यही रहेगी और मेरा ख़याल रखेगी, उसके बाद शाम को वो वापस दक्षिणा के घर चली जाएगी.

कुसुम की इस बात से माँ ने बस यही कहा की जैसा उसे अच्छा लगे वैसा करे. बाकी विक्की का ख़याल रखने के लिए यहाँ सब तो हैं hi. खैर आज का सारा दिन ऐसे hi निकल गया. डॉ के कहने पर एक नर्स दोपहर को आयी थी और मुझे चेक करके चली गयी थी. मैं हर वक्त बीएड पर hi लेता रहता था इस लिए मेरे कमरे में कोई न कोई आता hi रहता था.

शाम को दक्षिणा किरण को ले कर आयी थी. उसने माँ और बाकी सबसे अपनी बेटी किरण का परिचय कराया था. माँ किरण से मिल कर खुश तो हुयी मगर जब उन्हें पता चला की किरण के पति ने प्रॉपर्टी के लालच में किरण को छोड़ दिया है तो माँ को किरण के लिए थोड़ा दुःख भी हुआ. दक्षिणा ने माँ से ये नहीं बताया था की असल मामला क्या था. वो असल बात को बता भी नहीं सकती थी. क्यों की उससे माँ और भी सवाल करने लगती.

दक्षिणा और किरण रात के खाने तक हमारे घर में hi रुकी रही. उसने सविता को फ़ोन करके बता दिया था की वो उसके और किरण के लिए खाना न बनाये. दक्षिणा का ज़्यादातर वक्त माँ के साथ hi गुज़रा जबकि किरण को कुसुम और बाकी सब मेरी होने वाली बीविया अपने साथ hi ऊपर के कमरे में ले गयी थी. कुछ hi टाइम में किरण भी उन सबसे घुल मिल गयी thi.Meri बहनो और रचना को किरण बहुत पसंद आयी थी और सबने उससे दोस्ती कर ली थी.

रात में खाना पीना करने के बाद दक्षिणा और किरण के साथ कुसुम भी उसके घर जाने लगी. मगर उससे पहले वो मेरे कमरे में मुझसे मिलने आयी. मैंने देखा की इस वक्त कुसुम का चेहरा बहुत hi खिला खिला था. मैं समझ सकता था की इसकी वजह क्या हो सकती थी.

"मैं किरण के घर जा रही थी तो सोचा एक बार और आपको अच्छे से देख लू." कुसुम ने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद करने के बाद बीएड के करीब मेरे पास आते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ओह्ह ये अच्छा किया तुमने. असल में मैं भी तुम्हे देखना चाहता था और..." मैंने जान बुझ कर आगे कुछ न बोलै तो कुसुम ने मेरी तरफ देखते हुए धीरे से कहा.

"Aur....aur क्या.?" कुसुम ने धीरे से ये कहा तो मैंने अपनी बढ़ चुकी धड़कनो को सम्हालते हुए और बड़ी हिम्मत करके कहा.

"Aur...aur थोड़ा सा अपनी जान को प्यार भी करना चाहता था." मैंने रूकती हुयी धड़कनो के साथ ये कहा तो कुसुम के चेहरे पर शर्म की लाली फैलती नज़र आयी और एकदम से उसकी नज़रे झुक गयी. उसने अपने कांपते हुए लबो से कहा.

"P..pyaar.???" कुसुम ने नज़रे झुकाये हुए hi ये कहा तो मुझे थोड़ा हिम्मत मिली और मैंने उसी हिम्मत के साथ कहा.

"Haan...pyaar. क्या मैं अपनी जान को प्यार नहीं कर सकता.?" मैंने ये कहा तो कुसुम ने सर उठा कर मेरी तरफ देखा. उसके होठ अभी भी हलके हलके कांप रहे थे. चेहरे पे शर्म की लाली छायी हुयी थी.

"बोलो न कुसुम. क्या मैं अपनी जान को प्यार नहीं कर सकता.?" मैंने धड़कते हुए दिल से ये कहा तो कुसुम के थरथराते हुए लैब खुले.

"बिलकुल कर सकते hain...aur...aur सच कहु तो मेरा भी बहुत दिल करता है की मैं आपसे लिपट कर बस आपके प्यार में hi खोयी राहु. मगर मुझमे इतनी हिम्मत नहीं है aur...aur मुझे ऐसा करने में अंदर से बहुत शर्म भी महसूस होती है." कुसुम ने धीमी आवाज़ में ये सब एक सांस में कहा तो मेरे अंदर ख़ुशी की लहार दौड़ती चली गयी.

"हाँ शुरू शुरू में कोई भी काम हो उसमे थोड़ी बहुत झिझक और अजनबियत का अहसास तो होता hi है मगर इसके बावजूद हमें करना hi होता है. खैर अगर तुम्हे सहज नहीं लग रहा तो कोई बात नहीं. मेरे लिए यही बहुत है की तुम मेरी आँखों के सामने हो. मेरा दिल करता है की साड़ी ज़िन्दगी बस यु hi तुम्हे देखता राहु." मैंने ये सब कहा तो कुसुम पहले तो शर्मायी फिर धीरे से आगे बढ़ कर मेरे और पास आ गयी. पास आ कर वो मेरे पास hi बीएड के किनारे पर बैठ गयी.

मैं कुसुम को hi देख रहा था. मेरी धड़कने अनायास hi तेज़ हो गयी थी. मन में कई तरह के ख़याल आने जाने लगे थे. कुसुम मेरे एकदम पास चुप चाप सी हो कर बैठ गयी थी. वो अपने दोनों हाथ की उंगलियों से दुपट्टे के छोर को पकड़ कर कभी उसे गोल गोल बनती तो कभी फिर से उसे छोड़ देती. शायद उसके मन में किसी तरह की कसमकस चल रही थी.

"क्या hua...koi परेशानी है क्या.? देखो तुम्हे इस तरह किसी बात के लिए परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. तुम जानती हो न की मैं तुम्हे हर पल बस हस्ते मुस्कुराते हुए देखना चाहता हु. इस लिए तुम्हे अगर किसी भी काम के लिए या किसी भी बात के लिए ज़रा सी भी परेशानी हो तो तुम वो काम न करना. ये मत सोचना की मुझे उसके लिए बुरा लगेगा. मुझे तभी अच्छा लगेगा जब तुम्हे अच्छा लगेगा." मैंने ये सब कहा hi था की तभी कुसुम एकदम से मेरी तरफ पलटी और इससे पहले की मैं कुछ समझ पता मेरे होठो पर उसने अपने होठ रख दिए.

मैं कुसुम से इस बात की उम्मीद बिलकुल भी नहीं कर सकता था. मगर उसने ऐसा किया जो की मेरे लिए बहुत hi ज़्यादा हैरान कर देने वाली बात थी. मैं एकदम से ऐसे जाम सा हो गया जैसे किसी ने मुझे रोबोट समझ कर मुझे बटन दबा कर एक जगह जाम कर दिया हो. उधर कुसुम मेरे होठो पर अपने बहुत hi सॉफ्ट होठो को रखे कुछ पल तक ऐसे hi रुकी रही फिर उसने धीरे से मेरे होठो पर तीन चार बार किश किया और फिर एक झटके से मुझसे अलग हो कर सीधा बैठ गयी. उसकी साँसे इतने में hi बढ़ गयी थी और उसका चेहरा सुर्ख पद गया था.

मैं अभी भी शॉक जैसी हालत में वैसे hi अजीब हालत में लेता हुआ था. मुझे होश तब आया जब मेरे कानो में कुसुम के खिलखिला कर हसने की आवाज़ पड़ी. मैंने देखा कुसुम मेरी हालत को देख कर हसे जा रही थी मगर जैसे hi उसने देखा की मैं अब उसे देखने लगा हु तो उसकी हसी एकदम से बंद हो गयी और वो एक बार फिर से शर्मा गयी. सच कहु तो इस वक्त मुझे उस पर बेहद प्यार आ रहा था. मैं कुछ करने की हालत में नहीं था वर्ण मैं उसे दिखता की मैं उससे कितना प्यार करता हु.

"ये क्या था कुसुम.?" मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए ये पूछा तो कुसुम ने नज़रे झुकाये हुए hi कहा.

"Wahi....pyaar. आप इतनी सुन्दर सुन्दर बाते कर रहे थे की मुझे आप पर बहुत ज़्यादा प्यार आ गया था. मैं खुद नहीं जानती की अचानक मुझे क्या हुआ और मैं आपके...." कुसुम बोलते बोलते अचानक hi रुक गयी तो मैंने मुस्कुरा कर कहा.

"कुछ भी कहो. मगर मैं इस बात से हैरान हु की मेरी जान ने ऐसा किया. ये अलग बात है की जब तक मुझे कुछ समझ आता या मुझे कुछ महसूस होता मेरी जान ने शहद जैसी मीठी चीज़ को मेरे होठो से वैसे hi दूर कर दिया जैसे किसी बच्चे के मुख से उसकी मनपसंद चीज़ यानी की लोल्लयपोप कोई छीन लेता है." मैंने ये कहा तो कुसुम शर्मा गयी. मैं देख रहा था की वो नज़रे झुकाये मुस्कुरा रही थी.

"काश मुझे पहले से पता होता की मेरे साथ आज इस तरह का धोखा होने वाला है तो मैं पहले से hi सतर्क रहता और जैसे hi मेरे साथ इस तरह का कोई धोखा होता तो मैं उसी वक्त धोखा करने वाले से वो शहद जैसी मीठी चीज़ वापस ले कर अपने मुँह में दाल लेता. मगर हाय रे मेरी किस्मत.." मैंने ये सब कहा तो कुसुम एक बार फिर से खिलखिला कर है पड़ी. आज बर्षो बाद उसे इस तरह खिलखिला कर हस्ते हुए देख रहा था मैं. कितनी सुन्दर लगती थी कुसुम हस्ते हुए. उसके मोतियों जैसे चमकते हुए दांत और ताज़े खिले गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठ थे. मेरा जी चाहा की बस उसे यु hi देखता राहु.

"तुम ऐसे hi हस्ती मुस्कुराती रहा करो कुसुम. यकीन मानो तुम्हे इस तरह हस्ते मुस्कुराते देख कर मेरी रूह को बड़ा सुकून मिलता है." मैंने ये कहा तो कुसुम ने मेरी तरफ ध्यान से देखा फिर आहिस्ता से मेरे सीने में आ कर छुपक गयी. ये तो सोने पर सुहागा वाली बात थी. दुनिया में सबसे ज़्यादा जिसे मैं प्यार करता हु वो मेरे सीने से लगी हुयी थी. इससे बड़ी ख़ुशी और क्या हो सकती थी मेरे लिए.?

तभी बाहर से किसी ने कमरे के दरवाज़े को हलके से खटखटाया तो कुसुम जल्दी से मेरे सीने से उठी और अपना हुलिया सही करते हुए दरवाज़े की तरफ जाने लगी तो मैंने पीछे से उसे हलकी आवाज़ दे कर कहा.

"ारी ये क्या बात हुयी.? काम से काम अच्छे से मेरा मुँह तो मीठा कर दो." मैंने ये कहा तो कुसुम एकदम से पलटी और मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा उसके बाद उसने अजीब हरकत की. वो मुझे जीभ दिखा कर वापस पलट गयी और फिर दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गयी. मैं उसकी इस हरकत से पहले तो हैरान हुआ उसके बाद मुस्कुरा कर रह गया.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 59

"तुम ऐसे hi हस्ती मुस्कुराती रहा करो कुसुम. यकीन मानो तुम्हे इस तरह हस्ते मुस्कुराते देख कर मेरी रूह को बड़ा सुकून मिलता है." मैंने ये कहा तो कुसुम ने मेरी तरफ ध्यान से देखा फिर आहिस्ता से मेरे सीने में आ कर छुपक गयी. ये तो सोने पर सुहागा वाली बात थी. दुनिया में सबसे ज़्यादा जिसे मैं प्यार करता हु वो मेरे सीने से लगी हुयी थी. इससे बड़ी ख़ुशी और क्या हो सकती थी मेरे लिए.?

तभी बाहर से किसी ने कमरे के दरवाज़े को हलके से खटखटाया तो कुसुम जल्दी से मेरे सीने से उठी और अपना हुलिया सही करते हुए दरवाज़े की तरफ जाने लगी तो मैंने पीछे से उसे हलकी आवाज़ दे कर कहा.

"ारी ये क्या बात हुयी.? काम से काम अच्छे से मेरा मुँह तो मीठा कर दो." मैंने ये कहा तो कुसुम एकदम से पलटी और मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा उसके बाद उसने अजीब हरकत की. वो मुझे जीभ दिखा कर वापस पलट गयी और फिर दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गयी. मैं उसकी इस हरकत से पहले तो हैरान हुआ उसके बाद मुस्कुरा कर रह गया.


अब आगे पढ़िए....
कसम के जाने के बाद मैं अभी भी इस बात से हैरान था की कुसुम ने ऐसा किया था मेरे साथ, यानी की उसने अचानक hi उसके होठो पर किश कर दिया था. ये बात सोच कर मैं अंदर से खुश भी हो रहा था की कुसुम ने इस सिलसिले में कदम बढ़ा दिया है. मैं तो इसके लिए खुद हिम्मत hi नहीं जूता सकता था.

कमरे में बीएड पर लेता मैं यही सब सोच रहा था और मन hi मन ख़ुशी से मुस्कुराये भी जा रहा था. अभी मैं मुस्कुरा hi रहा था की तभी कमरे में माँ आ गयी. उनके पीछे प्रिय पूजा और रचना भी थी. मैंने देखा माँ के हाथो में थाली थी. मैं समझ गया की माँ मेरे लिए खाना ले कर आयी हैं.

"क्या बात है बीटा.? क्या सोच कर इतना मुस्कुरा रहा है तू.?" माँ ने ये कहा तो मैं एकदम से हड़बड़ा गया और फिर खुद को सम्हालते हुए बोलै.

"नहीं to...kuch भी तो नहीं माँ. मैं कहा मुस्कुरा रहा हु.?" मैंने हड़बड़ाते हुए ये कहा तो माँ ने मुस्कुराते हुए कहा.

"ज़्यादा मत सोच बीटा. अब चल तू भी कुछ खा ले. उसके बाद हम लोग भी खायेगे." माँ ने ये कहा तो मैंने हैरानी से कहा.

"क्या आप लोगो ने खाना नहीं खाया अभी.?" मैंने ये कहा तो माँ ने कहा.

"मैंने तो इस लिए नहीं खाया क्यों की मेरा बीटा इस हालत में भूखा लेता हुआ था. जबकि मैंने इन लोगो से कहा भी की ये लोग दक्षिणा बहन किरण और कुसुम के साथ hi बैठ कर खा ले मगर इन लोगो ने भी तुम्हारी वजह से hi नहीं खाया. खैर छोड़ अब चल खा ले." माँ ने ये सब कहा और फिर मुझे अपने हाथो से खिलने लगी.

मेरी दोनों बहने और रचना मेरे पास hi कड़ी थी. उन तीनो के चेहरे खिले हुए थे. प्रिय पूजा की नज़र जब भी मुझसे टकराती तो वो हलके से मुस्कुरा देती थी जबकि रचना चुप चाप hi कड़ी थी. खैर खाना खिलने के बाद माँ ने थाली को पूजा के हाथ में पकड़ा दिया जिसे ले कर वो कमरे से बाहर चली गयी. इधर माँ ने मुझे पानी पिलाया उसके बाद मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"बीटा मैंने तो सोचा था की रात में मैं तेरे पास hi कमरे में रहूगी ताकि तेरा ख़याल रख सकू. मगर रचना ने कहा की वो खुद तुम्हारे साथ कमरे में रह जाएगी और तुम्हारा ख़याल रखेगी." माँ ने ये कहा तो मैंने हैरानी से रचना की तरफ देखा तो उसने हलके से मुस्कुरा कर अपनी नज़रे झुका ली. तभी मेरी नज़र प्रिय पूजा पर पड़ी तो वो मुझे ऐसे मुस्कुराती नज़र आयी जैसे मुझसे आँखों के इशारो से पूछ रही हो की अब तो आपके मज़े हो गए जी.

मुझे समझ नहीं आया की रचना ने इसके लिए माँ से कैसे कहा होगा और माँ ने भी उसे कैसे हाँ कह दिया होगा. खैर जो भी हो मगर मैं तो मन hi मन इस बात से बेहद खुश हो गया था. मेरे अंदर ये सोच कर hi रोमांच भर गया था की आज रात रचना मेरे साथ hi रहेगी. हम दोनों अकेले एक कमरे में एक hi बीएड पर सोयेंगे. तभी मेरे मन में ख़याल आया की मुझे अपने चेहरे के भावो को दबा लेना चाहिए वर्ण माँ गलत सोच बैठेंगी.

"रचना तुझे दवा खिला देगी उसके बाद तू आराम से जाना. ये नहीं की रात भर तू इस बेचारी को बाते कर कर के परेशां करता रह जाये." माँ ने ये कहा तो मैंने बड़ी मासूम सी शकल बना कर हलके से हाँ में अपना सर हिला दिया. उसके बाद माँ सबको ले कर कमरे से बाहर चली गयी. उनके जाने के बाद मैं यही सोचने लगा की रचना आज रात मेरे पास hi रहेगी तो क्या हमारे बीच कुछ ऐसा वैसा हो सकता है या फिर माँ के कहे अनुसार मुझे दवा खा कर सो जाना पड़ेगा.? खैर देखते हैं क्या होता है. मैं रचना के आने का बेसब्री से इंतज़ार करने लगा था.

=====

उधर दक्षिणा किरण और कुसुम एक hi कमरे में बीएड पर बैठी बाते कर रही थी. इस बीच किरण को भी ये पता चल गया था की विक्की की शादी रचना के साथ साथ उसकी खुद की बहनो से भी होनी है. किरण ये बात जान कर बहुत ज़्यादा हैरान हुयी थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था की ऐसा भी हो सकता है. दक्षिणा ने उसे प्यार से और बड़े तरीके से सब कुछ बताया और समझाया भी था. सब कुछ जान्ने समझने के बाद किरण को भी कुसुम के रिश्ते और उसकी अपने hi भाई के साथ शादी होने की बात अच्छी भी लगी.

कुसुम ने मौका देख कर दक्षिणा से कहा की वो उसे अपने और विक्की के बारे में वो सब कुछ बताये जो बताने के लिए उसने वडा किया था. कुसुम की इस बात से दक्षिणा ने उससे कहा की वो उसे ज़रूर बताएगी लेकिन
आज नहीं. आज उसे थकान की वजह से नींद आ रही है. वो उसे कल से सब कुछ थोड़ा थोड़ा करके बताना शुरू करेगी. दक्षिणा की इस बात से कुसुम ने कहा ठीक है. उसके बाद कुसुम एक अलग कमरे में सोने चली गयी. जबकि किरण अपनी माँ के साथ hi उसके कमरे में रही.



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मुझे ज़्यादा देर इंतज़ार नहीं करना पड़ा. रचना जल्द hi खाना खा कर मेरे कमरे में आ गयी. उसके हाथ में पानी से भरा एक मग था जिसे उसने कमरे में रखे एक छोटे से टेबल पर रख दिया. उसके बाद उसने मुझे दवा दी जिसे मैंने चुप चाप खा ली. कमरे में एक hi बीएड था. बीएड लम्बा चौड़ा था. जिसमे दो क्या तीन लोग भी बड़े आराम से लेट सकते थे. मैंने सोचा की एक ऐसा बीएड बनवाना पड़ेगा जिसमे पांच लोग आराम से लेट सके. आखिर शादी के बाद मेरी चारो बीविया भी तो मेरे साथ hi बीएड पर लेतेंगी. :हहै:

दवा खा के जैसे hi मैं फुर्सत हुआ तो कमरे में माँ और प्रिय पूजा फिर से आ गयी. माँ ने रचना से पूछा की उसने मुझे दवा खिला दी की नहीं तो उसने बताया की हाँ अभी अभी वो मुझे दवा दे के फुर्सत हुयी है. रचना की बात सुन कर माँ ने एक बार फिर मुझे आराम से सो जाने की हिदायत दी और फिर प्रिय पूजा को ले के कमरे से बाहर चली गयी. उनके जाने के बाद रचना ने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया.

मेरे दिल की धड़कने फिर से बढ़ने लगी थी ये सोच कर की अब कमरे में मैं और रचना अकेले hi हैं. मेरे मन में कई सरे ख़याल आने लगे थे. मैं सोचने लगा की क्या सच में हमारे बिच कुछ हो सकता है या फिर माँ की हिदायत के अनुसार हमें सो जाना होगा. उधर दरवाज़ा बंद करने के बाद रचना पलटी और मेरी तरफ देखने लगी. उसके चेहरे पर शर्म की हलकी सी सुर्खी दिखी मुझे. शायद उसके मन में भी मेरी तरह कुछ ऐसे hi ख़याल उभरे होंगे. खैर जब मैंने देखा की वो चुप चाप मुझे hi देख रही है तो मैंने कहा.

"क्या हुआ सोना नहीं है क्या तुम्हे.? तुमने सुना नहीं क्या माँ क्या कह कर गयी हैं हमें.?" मैंने ये कहा तो रचना के होठो पर मुस्कान फ़ैल गयी और वो धीरे धीरे चल कर बीएड के दूसरी तरफ आयी और आहिस्ता से बीएड के किनारे पर बैठ गयी.

"आपको पता है जीवन में पहली बार मैं किसी मर्द के साथ कमरे में इस तरह अकेली रात भर रहने वाली हु." रचना ने मेरी तरफ देख कर हलके से शरमाते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ मैं समझ सकता हु मगर जीवन में हर काम पहली बार से hi शुरू होता है और वैसे भी मैं कोई गैर मर्द तो हु नहीं. तुम्हारा होने वाला पति hi हु. इस लिए मेरे साथ यहाँ पर तुम्हे कोई प्रॉब्लम नहीं होगी." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"हाँ मैं जानती हु मगर होने वाले पति के साथ भी तो शादी के पहले इस तरह कोई होने वाली बीवी नहीं रहती न." रचना ने मुस्कुरा कर ये कहा तो मैं भी मुस्कुराते और फिर बोलै.

"आज कल सब चलता यार और ये तो अच्छी बात है न की शादी के पहले hi हमें एक दूसरे के साथ सोने का मौका मिल रहा है. अब हम जो चाहे वो कर सकते हैं." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रचना की आँखे फ़ैल गयी. फिर वो मुस्कुराते हुए बोली.

"जो चाहे वो कर सकते हैं से क्या मतलब है आपका.?" रचना ने हैरानी से ये पूछा तो मैंने कहा.

"ारी मेरा मतलब है की हम एक दूसरे से जैसी चाहे वैसी बात कर सकते हैं. सबके रहते हम कहा कोई बात कर प् रहे थे.?" मैंने बात को सम्हालते हुए ये कहा तो रचना ने कहा.

"अच्छा Ji...baate बनाना कोई आपसे सीखे. मैं सब समझती हु आपकी बाते. मुझे आप उल्लू मत समझिये." रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने हस्ते हुए कहा.

"चलो फिर तो ये अच्छी बात hi है की तुम सब समझती हो. अब काम से काम मुझे कोई बात तुम्हे समझनी तो नहीं पड़ेगी." मैंने ये कहा तो रचना शर्मा के बोली.

"ज़्यादा बाते न बनाइये और चुप चाप सो जाइये. सुना है न आपने माँ ने क्या कहा था.?" रचना ने ये कहा तो मैंने आह सी भरते हुए कहा.

"हाँ सुना है यार. मगर अब भला होने वाली बीवी के साथ एक hi बीएड पर नींद कैसे आ जाएगी मुझे.? मेरे मन में तो बड़े बड़े और मीठे मीठे लड्डू फुट रहे हैं. पता नहीं कितनी देर लगेगी उन्हें खाने में." मैंने ये कहा तो रचना खिलखिला कर हसने लगी, फिर बोली.

"मन के लड्डू मन में hi खा लीजिये जनाब. आप ये मत भूलिए की अभी हमारी शादी नहीं हुयी है और ये भी
भूलिए की हम तीनो बहनो की इच्छा क्या है." रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने कहा.



"यार ये तो मुझ मासूम पर अत्याचार करने वाली बात हो गयी." मैंने बुरा सा मुँह बनाते हुए ये कहा तो रचना ने कहा.

"ऐसा नहीं है पति देव. बस वक्त का इंतज़ार कीजिये. उसके बाद जितने चाहे उतने लड्डू सच मच में खा लीजियेगा." रचना ने ये कहा तो मैं कुछ देर उसकी तरफ देखता रहा फिर बोलै.

"शादी के बाद जो होता है उसकी बात नहीं कर रहा हु मैं, बल्कि मैं तो मुँह मीठा करने वाले लड्डू की बात कर रहा हु. तुमने कहा था की जब तक मैं कुसुम से मुँह मीठा नहीं करुगा तब तक तुम में से कोई शुरुआत नहीं करेगा. इस लिए मैंने आज कुसुम से मुँह मीठा कर लिया है. हाँ ये अलग बात है की उसमे मेरा अपना कोई हाथ नहीं था बल्कि वैसा कुसुम ने hi किया था, वो भी अचानक से. मुझे तो कुछ समझ hi नहीं आया था की ये एक hi पल में क्या हो गया है." मैंने ये सब कहा तो रचना ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा.

"क्या सच कह रहे हैं आप.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"और क्या मैं झूठ बोल रहा हु.?" मैंने ये कहा तो रचना कुछ पल मुझे देखती रही फिर मुस्कुराते हुए बोली.

"मतलब दीदी ने खुद किया था ऐसा.?" रचना को शायद अभी भी यकीन नहीं हो रहा था.

"तुम भी हद करती हो डिअर. अगर यकीन नहीं है तो कल खुद hi अपनी दीदी से पूछ लेना." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"दीदी तो बड़ी तेज़ निकली. वैसे मैंने तो आपसे पहले hi कहा था की वो अब कुछ नहीं कहेंगी. अगर आप पहल करेंगे तो वो विरोध नहीं बल्कि आपका साथ hi देंगी." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अब बाते बंद करो और जल्दी से मेरा मुँह मीठा कराओ. हाय बहुत वक्त हो गया तुम्हारे होठो का शहद चखे हुए. मैं उस अहसास को फिर से तारो ताज़ा करना चाहता हु मेरी जान. मैं देखना चाहता हु की क्या आज भी तुम्हारे होठो में वही शहद जैसी मिठास है या वक्त के साथ उसमे और भी ज़्यादा मीठापन आ गया है.?" मैंने ये कहा तो रचना बुरी तरह शर्मा गयी. शर्म से उसके कान तक लाल पद गए.

"ये मेरी बेबसी है की मैं खुद कुछ कर नहीं सकता वर्ण अगर मैं सही सलामत होता तो इस वक्त तुम्हे अपनी बाहो में ले चूका होता." मैंने ये कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"अच्छा Ji...bade उतावले हो रहे हैं आप." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"जिसकी इतनी सुन्दर सुन्दर और मीठी मीठी बीविया हो वो साला उतावला कैसे न होगा. अब छोडो भी ये बाते और अब आ जाओ न." मैंने ये कहा तो रचना शर्म से लाल चेहरा लिए देखती रही मेरी तरफ.

मैं सच में अब बहुत ज़्यादा उतावला हो रहा था. अगर मेरे हाथ पेअर सही सलामत होते तो इस वक्त मैं रचना को अपने नीचे लेता चूका होता और उसे प्यार कर रहा होता. खैर मैंने देखा की रचना मुझे कुछ देर तक ऐसे hi देखती रही और फिर जब मैंने फिर से उसे अपनी तरफ आने को कहा तो वो सबसे पहले बीएड पर ठीक से आयी और शरमाते हुए मेरी तरफ खिसकने लगी.

मेरी धड़कने बढ़ चली थी. मैं चाह रहा था की रचना जल्दी से मेरे करीब आ जाये और अपने होठो को मेरे होठो से सत्ता दे. आखिर कुछ hi पालो में वो मेरे एकदम पास आ गयी. मैं उसी की तरफ देख रहा था. इस वक्त उसके चेहरे पर गजब का नूर था जो शर्म की हलकी चादर से डूबता जा रहा था.

"अच्छा एक बात बताइये. दीदी ने कैसे किया था.?" रचना ने शरमाते हुए धीरे से ये पूछा तो मैंने कहा.

"बताया तो था तुम्हे की मुझे कुछ समझ hi नहीं आया था. उसने अचानक से hi किया था और जब तक मुझे कुछ समझ आता वो दूर हो गयी थी." मैंने ये कहा तो रचना मुस्कुरा पड़ी.

"तो फिर ठीक है. मैं भी वैसा hi करुँगी." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"यार तुम क्या अब मेरी जान लेने पर टूल गयी हो.? कैसी बीवी हो यार जो अपने होने वाले पति को इतना तड़पा रही हो." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"आपने तो इतने पर hi गिला कर दिया जबकि सोचिये मैं तो पिछले पांच सालो से आपके लिए तड़प रही थी. मुझे तो कोई उम्मीद hi नहीं रह गयी थी की आप मुझे मिलोगे कभी." रचना ने सहसा गंभीर होक ये कहा तो मैंने प्यार से कहा.

"हाँ मैं समझता हु डिअर मगर इसमें मेरा भी तो कोई दोष नहीं है. मुझे भला कहा पता था की मेरे लिए तुम्हारे मन में क्या हो सकता है. खैर अब तो हम मिल
गए हैं न तो पिछली सब बुरी यादे भुला दो और एक नए सिरे से नया इतिहास खुद अपने हाथ से लिखो." मैंने ये कहा तो रचना मेरी तरफ देखती रही.



मैं खुद भी उसकी गहरी आँखों में देख रहा था. तभी वो मेरे चेहरे की तरफ झुकने लगी. मैं समझ गया की अब मुँह मीठा करने का वक्त आने वाला है. थोड़ी hi देर में रचना ने अपने रसीले होठो को मेरे होठो पर आहिस्ता से रख दिया. हम दोनों के hi जिस्मो में एक मीठी सी झुरझुरी दौड़ती चली गयी.

रचना के ऐसा करते hi मेरी आँखे मज़े के अहसास से बंद हो गयी थी. तभी रचना ने मेरे होठो पर किश किया और फिर मेरे निचले होठ को अपने होठो में दबा लिया. मेरी रंगो में दौड़ते हुए लहू में एकदम से उबाल आने लगा. मेरे पुरे जिसम में रोमांच की लहार दौड़ने लगी. रचना को अपनी आगोश में लेने के लिए मेरे दोनों हाथ फड़क उठे मगर दोनों में प्लास्टर चढ़ा हुआ था इस लिए मैं कुछ कर नहीं सकता था. मेरा हाथ ऊपर तो उठ जाता मगर मैं उसे अपनी बाहो में जकड नहीं सकता था.

उधर रचना धीरे धीरे मेरे निचले होठ को अपने होठो में दबाये उसे चूसने लगी थी. उसकी नाक से निकलती गर्म गर्म साँसे मेरे मुँह और नाक के साथ साथ चेहरे पर भी गर्मी का अहसास करा रही थी. मुझसे बर्दास्त न हुआ तो मैंने भी मुँह खोल कर रचना के निचले होठ को अपने होठो में दबा लिया और उसे चूसने लगा. मेरे जिसम में दौड़ती हुयी मज़े की लहार सनसनाती हुयी सीधा मेरे नीचे मेरे लुंड और अंडकोषों पर पहुंच गयी. मेरे निचले भाग में बड़ी तेज़ी से झुरझुरी होने लगी और फिर कुछ hi पालो में छोटे नवाब अपने असल रूप में आ गए.

मैं तो लेता हुआ था मगर रचना मेरे ऊपर झुकी हुयी थी इस लिए उसकी साँसे जल्द hi भारी हो गयी. तेज़ तेज़ आती गर्म साँसे मेरे चेहरे से टकरा रही थी. मैं पूरी शिद्दत से रचना के निचले होठ को चूस रहा था. मेरा दिल चाहता था की मैं उसे इससे भी अच्छे तरीके से प्यार करू मगर मैं और कुछ कर नहीं सकता था.

कुछ hi देर में रचना की साँसे जब उखाड़ने लगी तो वो आहिस्ता से मेरे ऊपर से हैट कर थोड़ा दूर हो गयी और तेज़ तेज़ साँसे लेने लगी. उसका चेहरा एकदम से लाल सुर्ख पद गया था. जैसे hi हम दोनों की नज़रे एक दूसरे से मिली तो रचना ने शर्मा कर अपनी नज़रे झुका ली. मुझे उस पर बहुत प्यार आ रहा था मगर मैं खुद कुछ कर पाने में असमर्थ था.

"सच में डिअर. तुम्हारे होठ तो पहले से भी ज़्यादा मीठे हो गए हैं. ऐसा लगता है जैसे बस चुस्त hi राहु." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रचना ने शरमाते हुए कहा.

"आपके होठ भी तो पहले से ज़्यादा मीठे हो गए हैं." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"बस एक hi बात का मलाल है डिअर की मेरे हाथ कुछ कर सकने में असमर्थ हैं." मैंने ये कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"क्यों आपको हाथो से अब क्या काम करना है.?" रचना ने ये पूछा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"वही जो इस सिचुएशन में सब करते हैं. क्या तुम्हे पता नहीं है.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रचना ने शरमाते हुए कहा.

"सच में यहाँ रह कर बहुत बिगड़ गए हैं आप." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"यहाँ रहने से hi तो सुधरा हु यार. वर्ण तुम्हे तो पता है की मैं खुद कुछ करने या कुछ कहने की पहल करने से बहुत शर्माता था पहले." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"तो इसका मतलब यहाँ कुछ ऐसा हुआ है जिसकी वजह से आप पहले जैसे शर्मीले नहीं रहे.?" रचना ने ये कहा तो मेरी आँखों के सामने एकदम से दक्षिणा और किरण का चेहरा नाच गया. इतनी hi नहीं उन दोनों के साथ बिताया हुआ सब कुछ नाच गया. इधर मुझे सोचो में गम होते देख रचना ने कहा.

"क्या हुआ कहा खो गए आप.? क्या सच में यहाँ ऐसा कुछ हुआ है.?" रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"और अगर मैं ये कहु की हाँ हुआ है तो क्या कहोगी तुम.?" मैंने ये कहा तो रचना मुझे कुछ पालो तक देखती रही उसके बाद बोली.

"मैं यही कहुगी की मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता." रचना ने सपाट लहजे में ये कहा तो मैंने हैरानी से कहा.

"क्या सच में.? मगर क्यों डिअर.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"क्या आपको लगता है दूसरी कोई भी बात इससे भी बड़ी हो सकती है की आपकी शादी आपकी hi सगी बहनो के साथ होनी है.? इस लिए अगर आपने यहाँ पर पिछले पांच सालो में किसी के साथ
कुछ ऐसा वैसा किया भी है तो काम से काम मुझे आपकी इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए. मैं तो बस इसी बात से बेहद खुश हु की जिसे मैंने टूट कर चाहा और जिसके मिलने की मुझे ज़रा भी उम्मीद नहीं रह गयी थी वो मुझे हमेशा के लिए मिल गया है. आज मेरे पास आप हैं दीदी hain..meri दो प्यारी प्यारी बहने हैं और सबसे बड़ी बात माँ हैं जो मुझे अपनी hi बेटियों की तरह प्यार करती हैं. इतना कुछ मेरे पास होने के बाद भी अगर मुझे किसी बात से फर्क पद जाये तो ये मेरे लिए मूर्खता वाली बात होगी न पति देव.?" रचना ने ये सब कहा तो मैं उसकी तरफ आश्चर्य से देखता रह गया.



मैं हैरान था की रचना इतना कुछ सोचती है और किसी भी दूसरी बड़ी बात को वो इतनी आसानी से जज़्ब करने की कूवत रखती है. ये उसकी समझदारी थी या उसका सच्चा प्रेम.? मेरे मन में सवाल उभरा की क्या मुझे रचना से दक्षिणा और उसकी बेटी के साथ अपने रिश्ते के बारे में बता देना चाहिए.? इस बारे में पता चलने से जिससे मुझे सबसे ज़्यादा दर था उसे भी अब पता है और दक्षिणा उसे आज या कल में सब कुछ बताने भी वाली है.

रचना एक समझदारी लड़की है और जिस तरह से उसने अभी ये सब कहा तो उससे मुझे यही उचित लगा की उसे अपने किसी भी राज़ से महरूम नहीं रखना चाहिए. आखिर वो मेरी होने वाली बीवी है. पति पत्नी के बीच किसी ऐसे राज़ को राज़ नहीं रहना चाहिए जिसके बारे में बाद में पता चलने पर रिश्तो में खतरनाक रूप से दरार आ जाये. हालांकि इस बारे में माँ को पता चलना भी ज़रूरी है मगर माँ से इस बारे में बताने की किसी में भी हिम्मत नहीं हो सकती. अभी मैं ये सब सोच hi रहा था की तभी रचना की आवाज़ मेरे कानो से टकराई तो मैं हकीकत की दुनिया में आ गया.

"खैर जाने दीजिये. अच्छा आपसे एक बात करनी है." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ कहो." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"हम यहाँ जब से आये हैं तब से मैंने एक hi बार फ़ोन पर अपनी माँ से बात की है. पता नहीं अब वो कैसी होंगी.? पिता जी कैसे होंगे.? भैया भाभी कैसे होंगे.? उस बार माँ ने बस यही कहा था की पिता जी हॉस्पिटल में हैं और गांव में उनके बारे में कई तरह की लोग बाते करते हैं. मगर अब तो शायद पिता जी घर आ गए होंगे. मुझे इस बात की चिंता है की जब उन्हें मेरे बारे में ये पता चला होगा की मैं घर छोड़ कर आपके साथ कही चली गयी हु तो उन्होंने क्या किया होगा.? मुझे यकीन है की उन्होंने मेरे साथ साथ आप सबकी खोज में अपने आदमियों को लगा दिया होगा. और अगर उन्हें कही से ये पता चल गया होगा की मुझे घर से निकाल कर आपके साथ भेजने में माँ का हाथ था तो वो जाने माँ के साथ कैसा बर्ताव किये होंगे.? मैं दो तीन दिन से यही सब सच सोच कर परेशान हो रही हु. पहले भी सोचा था मगर आपकी हालत ऐसी होने की वजह से मैंने इस बारे में आपसे या माँ से बात करना उचित नहीं समझा था." रचना ने ये सब कहा तो मुझे भी गांव में सबका ध्यान आया.

"तुम भी हद करती हो डिअर. तुम्हे अपनी माँ से बात कर लेना चाहिए था. इसके लिए तुम्हे किसी से पूछने की या इजाज़त लेने की ज़रूरत hi नहीं है. चलो अभी माँ जी को फ़ोन लगाओ और उनसे बात करो." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"अब तो रात के ग्यारह से भी ऊपर का टाइम हो गया है. आप तो जानते हैं गांव में सब लोग आठ नौ बजे तक खा पि कर सोने लग जाते हैं. अब कल दिन में hi किसी वक्त माँ से बात करुँगी." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है मगर बात ज़रूर कर लेना. खैर अब आगे का क्या इरादा है.?" मैंने हलके से मुस्कुरा कर ये कहा तो रचना ने कहा.

"मतलब.?" रचना को शायद समझ नहीं आया तो मैंने कहा.

"ारी भाई अभी और मुँह मीठा करना है या चुप चाप सो जाना है.?" मैंने ये कहा तो रचना ने शर्म से मुस्कुराते हुए कहा.

"आज के लिए क्या इतना काफी नहीं है.? वैसे भी इस हालत में न आपको अच्छे से मज़ा आएगा और न hi...." रचना बोलते बोलते रुक गयी तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ओह्ह ये तो सही कहा यार तुमने. इसके लिए ज़रूरी है की मेरे दोनों हाथ सही सलामत हो." मैंने ये कहा तो रचना है पड़ी.

खैर उसके बाद हमने एक बार फिर से एक दूसरे के होठो को चूमा चूसा और फिर सोने लगे. रचना मेरे से सात कर hi लेती हुयी थी. उसके होठो पर मुस्कान खिली हुयी थी. शायद वो कमरे
में अकेले मेरे साथ एक hi बीएड पर लेटने से ख़ुशी महूस कर रही थी.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....


रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
भाई लोग....

मैं दिल से चाहता था की अपनी इस स्टोरी को कम्पलीट करू और इसके लिए मैंने कोशिश भी की मगर मैं ये अच्छी तरह समझ गया हु की यहाँ पर रीडर्स राइटर को मेंटली टार्चर करते हैं और एक दिन ऐसा आ जाता है जब राइटर स्टोरी को बिच में hi छोड़ कर चला जाता है....

ये सच है की राइटर बिना लिखे नहीं रह सकता. उसका दिल ो दिमाग और उसके हाथ मचलने लगते हैं लिखते के लिए. हम म्हणत करते हैं मगर उसका उचित रूप से फल नहीं मिलता. धैर्य साहस का पथ पढ़ना बहुत आसान होता है. खैर कोई बात नहीं....

कामदेव भाई, इस बार आप कुछ नहीं कहेगे मुझे. क्यों की इस बार ऐसा कुछ हुआ है जिससे मुझे आपकी बात समझ में नहीं आएगी. गुस्सा सबको आता है चाहे रीडर हो या राइटर बस वही बात है....

मैंने ये दूसरी ईद बना कर यहाँ एक नयी स्टोरी इस लिए स्टार्ट की थी की शायद इस बार हालात अच्छे होंगे और रीडर्स वरिटेरस की म्हणत का उचित फल देंगे मगर मेरा ये सोचना शायद गलत था. कुछ लिखने के लिए हाथ मचलते थे और दिलो दिमाग बग़ावत करने लगता था. इस लिए दूसरे नाम से आया. मगर हर बार की तरह इस बार भी वही हाल देखने को मिला....

मैं अपने दोस्त भाइयो से सिर्फ यही कहना चाहता हु की कब समझोगे भय. कब अहसास होगा आप लोगो को. आप तो अपना रोना दिखा देते हैं मगर हम किसे दिखाए और उसे कौन समझे.??? मैं मानता हु की यहाँ वरिटेरस और स्टोरीज की कमी नहीं है मगर दोस्तों न्याय अन्याय की भी कोई चीज़ होती है....

अब कभी भी किसी भी ईद या नाम से स्टोरी लिखने नहीं आउगा यहाँ. आपको जो अच्छा लगे वो कीजिये. मेरे दिल ने जो कहा वो मैं कर रहा हु. गाली देना हो तो वो भी दे देना. मगर अब बस अलविदा....!! :केओ:

भय, सॉरी आपको फिर से तकलीफ दे रहा हु मगर ये आपकी मर्ज़ी पर है. थ्रेड चाहे तो क्लोज कर दीजिये या रहने दीजिये. योर चॉइस.... :डेड:
 
देखते हैं भय....

अभी तो भय भय की स्टोरी पढ़ना है मुझे. भय ने मेरी स्टोरी को रेगुलर पढ़ा और रिव्यु भी दिया था. सो अब मैं भी उनकी स्टोरी पढ़ लू. उसके बाद तरय करुगा की अपनी स्टोरी में अपडेट दे सकू. यहाँ साइलेंट रीडर्स ज्यादा हैं जो स्टोरी पढ़ कर चुप चाप निकल जाते हैं. भय ऐसे में मजा नहीं आता....
 
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