सब कुछ जायज़ है....
अपडेट = 14
फ्लैशबैक रनिंग....
रात में रचना के बारे में सोचते सोचते कब मेरी आँख लग गयी थी मुझे पता hi नहीं चला था. सुबह अलार्म क्लॉक के बजने से hi मेरी आँख खुली. मैं जग तो गया था मगर उठा नहीं. अलार्म क्लॉक बंद करने के बाद दीदी ने मेरी तरफ देखा तो मुझे आँख बंद किये लेता हुआ पाया.
दीदी मुझे कुछ देर देखती रही. उसके बाद मुझे बीएड पर कुछ हलचल महसूस हुयी. मैं समझ गया की दीदी अब कमरे से जा रही हैं. इसके पहले किसी दिन भी ऐसा नहीं हुआ था की अलार्म क्लॉक के बजने पर मैं दीदी के साथ hi उठ न गया हो. मगर आज पता नहीं क्या हुआ था मुझे की मैंने जग जाने के बाद भी अपनी आँखे न खोली थी बल्कि चुप चाप पड़ा hi रह गया था. मैं अपने आप पर हैरान था और सोचे जा रहा था की अब दीदी क्या करेगी.?
अभी मैं सोच hi रहा था की तभी मुझे मेरे राइट चिक पर बहुत hi सॉफ्ट चीज़ महसूस हुयी और महकती गर्म गर्म हवा भी. मुझे पहले तो कुछ समझ न आया मगर जल्द hi पता चल गया.
"गुड मॉर्निंग मेरे प्यारे भाई. मुझे पता है की तू जग गया है. मगर ये नहीं समझ आया की जागने के बाद भी तू अपनी दीदी का सुबह सुबह चेहरा नहीं देख रहा." दीदी ने मेरे गाल को हलके से चूमने के बाद ऐसा कहा तो मैंने फैट से अपनी आँखे खोल दी और फिर अपने चेहरे के एक डैम करीब उनके चेहरे की तरफ देख कर मुस्कुराया.
"अगर मैं भी आपकी तरह जग जाता और बीएड पर उठ कर बैठ जाता तो मुझे ये कैसे पता चल पता की आज की सुबह इतनी खूबसूरत भी होगी." मैंने मुस्कुराते हुए ऐसा कहा तो दीदी मुस्कुरा उठी मगर उनके चेहरे के भाव से लगा जैसे उन्हें मेरी ये बात समझ न आयी हो.
"क्या मतलब है तेरा.?" दीदी ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा तो मैंने कहा.
"सुबह तो आज से पहले भी खूबसूरत होती थी दीदी मगर अब पता चला की उन सुबहो में और आज की सुबह में काफी चेंज था." मैंने कहा तो दीदी हैरानी से मुझे देखने लगी.
"ये तू क्या कह रहा है मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा. साफ़ साफ़ कह न की क्या कह रहा है तू.?" दीदी ने कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
"ारी बड़ी सिंपल सी बात है दीदी. आज से पहले वाली सुबह सुखी टाइप की होती थी मगर आज वाली सुबह सुखी नहीं मीठी थी और बहुत महाकि हुयी भी. आज आप ने जब गुड मॉर्निंग कहा तो आप ने मेरे गाल पर चूमा भी. इस लिए कह रहा हु की आज की सुबह पहले वाली हर सुबह से खूबसूरत थी." मैंने डिटेल में उन्हें बताया तो वो मुस्कुरा कर सीढ़ी बैठ गयी.
"अच्छा aisa...wo तो मैंने ऐसे hi तेरे गाल पर चूम लिया था. तुझे आँखे बंद करके लेता हुआ देखा तो मुझे तुझ पर और तेरी मासूमियत पर प्यार आ गया था. अपने भाई के गाल को चुम लिया तो इससे सुबह कैसे खूबसूरत हो गयी.?" दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने कहा.
"बस हो गयी क्यों की मुझे ऐसा hi महसूस हो रहा है. दुनिया की सबसे सुन्दर और सबसे मासूम मेरी दीदी ने मेरे गाल को चुम कर मुझे गुड मॉर्निंग बोलै तो मेरे लिए आज की सुबह सबसे ज़्यादा खूबसूरत हो गयी." मैंने कहा तो दीदी मुझे बड़े ध्यान से देखने लगी.
"तू और तेरी baate...kabhi कभी मेरे पल्ले hi नहीं पड़ती. पता नहीं क्या क्या बोल देता है. अच्छा चल अब मैं जा रही हु. माँ के उठने से पहले मुझे उनके कमरे में चाय ले कर पहुंचना भी है." दीदी ने कहा तो मैंने हाँ में सर हिला दिया. उसके बाद दीदी कमरे से चली गयी.
उनके जाने के बाद मैं मुस्कुराते हुए उनके hi बारे में सोचने लगा. मेरी दीदी सच में बहुत सुन्दर थी. वो मुझसे आगे में बड़ी थी. उनके चेहरे पर हर वक्त मासूमियत और गंभीरता रहती थी. उनकी वौइस् कोयल की तरह थी. वो बहुत तेज़ नहीं बोलती thi...magar जब भी वो कोई बात बोलती तो लगता की कानो में शहद घुल गया हो. मेरी नज़र में मेरी दीदी से अच्छी दुनिया की कोई लड़की नहीं थी और शायद वो भी मेरे बारे में यही समझती थी की मेरे जैसा कोई लड़का न होगा.
दीदी को कमरे से गए 5 मिनट hi हुआ था की तभी मेरे मोबाइल पर मैसेज टोन बजी. मेरा मोबाइल बीएड के सिरहाने पर hi रखा था. मैसेज टोन सुन कर मैंने सोचा इतनी सुबह किसका मैसेज हो सकता है. क्या कंपनी वालो के लिए भी सुबह हो गयी है. ये सोचते हुए मैंने मोबाइल उठा कर देखा तो अननोन no का एक मैसेज शो हो रहा था स्क्रीन पर.
मैंने मोबाइल अनलॉक करके मैसेज बॉक्स को ओपन किया तो उसमे मुझे एक मैसेज लिखा दिखा जो एक शायरी में था. अननोन no से मैसेज देख कर मेरे दिमाग में बस एक hi नाम आया. ये no रचना का hi था शायद. उसी ने सुबह सुबह मैसेज भेजा था शायरी वाला.
चांदनी रात अलविदा कह रही है,
एक ठंडी सी हवा दस्तक दे रही है,
उठ कर देखो दोस्त ज़रा नज़रो को,
एक प्यारी सी सुबह आपको,
“गुड मॉर्निंग” कह रही है.
मैंने रचना के इस शायरी वाले मैसेज को तीन चार बार पढ़ा. उसने शायरी में गुड मॉर्निंग मैसेज के साथ साथ मुझे दोस्त भी कहा था. मतलब वो मुझे दोस्त मानती है. मुझे समझ न आया की मैं उसके इस मैसेज का क्या जवाब दू. मैंने कुछ देर सोचा और फिर बिना कोई जवाब दिए मैंने मोबाइल को एक तरफ रख दिया.
मैं रचना पर भरोसा नहीं कर सकता था. क्यों की मैंने उसके भाई को मारा था और उसी की वजह से पंचायत हुयी थी जिसमे उसके बाप को लाइफ में पहली बार हार का मुँह देखना पड़ा था. भरे गांव के सामने पंचायत ने मेरे पक्ष में फैसला सुनाया था. गांव के इतर कास्ट के लोगो ने उसके सामने पहली बार बोलने की हिम्मत की थी. ये सब बाते ऐसी थी जिससे मुझे लगता था की अपने बाप और भाई की तरह रचना की सोच भी उनकी तरह hi होगी और वो मुझसे दोस्ती कर के कोई काण्ड करना चाहती होगी.
यही सब सोचते हुए मैं नीचे आया और बाथरूम में घुस गया. फ्रेश होने के बाद मैं फिर से अपने कमरे में आ गया और बीएड पर लेट कर दीदी के आने का वेट करने लगा. थोड़ी देर बाद दीदी ट्रे में चाय ले कर आयी तो हम दोनों ने hi साथ बैठ कर चाय पि. मैं उनके सामने खुश hi दिख रहा था. जब दीदी चली गयी तो मैंने दिवार पर बने ाले से एक बुक लिया और उसे पढ़ने लगा.
सुबह के बाद से रचना का न कोई फ़ोन आया और न hi कोई मैसेज. मैं दिन भर पिता जी के साथ खेतो पर रहा और फिर शाम को घर आ गया. ऐसे hi दो दिन गुज़र गए. इन दो दिनों में रचना ने मुझे कोई फ़ोन नहीं किया था. हाँ उसका मैसेज ज़रूर आता था. गुड मॉर्निंग और गुड नाईट वाले मगर मैंने उसके मैसेज का कोई रिप्लाई नहीं दिया था.
तीसरे दिन सुबह दीदी के जाने के बाद रचना का फिर से गुड मॉर्निंग का मैसेज आया. उसके ये दोनों टाइम वाले मेस्सगेस शायरी में hi होते थे. आज भी उसने शायरी में hi मैसेज भेजा था जिसे मैं पढ़ रहा था.
ताज़ी हवा में फूलो की महक हो,
पहली किरण में चिडियो की चहक हो,
जब भी खोलो तुम अपनी पलके ए दोस्त,
उन पलकों में बस खुशियों की झलक हो.
मुझे समझ न आया की मैं रचना के इस मैसेज का क्या जवाब दू. मैं कुछ देर सोचता रहा इसके बाद मोबाइल को रख कर नीचे आया और बाथरूम में घुस गया.
सारा दिन ऐसे hi गुज़रा मगर जब शाम होती और मैं पिता जी के साथ घर की तरफ चल देता तो मुझे दर सा सताने लगता की कही पिता जी के सामने hi रचना का कॉल न आ जाये. वैसे तो मैंने उससे सोचने के लिए टाइम लिया था मगर तीन दिन गुज़र गए थे और मैंने उसके मेस्सगेस तक का कोई जवाब नहीं दिया था. सो मुझे लगता था की कही वो कॉल hi न कर दे. मैं पिता जी के सामने तीसरी बार उसके कॉल को अफोर्ड नहीं कर सकता था. जाने पिता जी क्या सोचे मेरे बारे में की मेरा फ़ोन उसी वक्त क्यों बजता है जब वो साथ में होते हैं.?
मैंने अपने मोबाइल को वाइब्रेशन में रखा हुआ था. जिससे अगर कॉल ए भी तो मेरे शिव किसी को पता न चले. आज भी रास्ते में सामने से आते हुए कोई मिल गया था पिता जी को जिससे वो बाते करने लगे और मुझे घर जाने को कह दिया था. मैं घर की तरफ चला तो थोड़ी hi देर में मेरे पेंट की पॉकेट में वाइब्रेशन होने लगा. मैंने आस पास देखा और फिर मोबाइल निकल कर देखा तो रचना का hi कॉल था.
रचना का कॉल देख कर मैं टेंशन में आ गया. मैं सोचने लगा की अब इसे क्या जवाब दुगा मैं.? कॉल तो उठाना hi था सो उठाया तो रचना एक डैम से शुरू हो गयी.
"बड़े अजीब आदमी हो तुम. मेरे एक भी मैसेज का जवाब नहीं दिया. अगर रिप्लाई में तुम भी गम या गण कह देते तो क्या हो जाता.? मैं hi पागल हु जो तुमसे दोस्ती करना चाहती हु. सोचा था की एक अच्छे इंसान से दोस्ती हो जाएगी तो उससे कुछ अच्छा अच्छा सीखने को मिलेगा. मगर मेरी तो किस्मत hi ख़राब है न." रचना ने नॉन स्टॉप ये सब कहा तो मैंने कहा.
"वो मुझे समझ hi नहीं आया की मैं तुम्हारे मैसेज का क्या जवाब दू.?" मैंने धीरे से ये कहा तो रचना ने कहा.
"हाय हाय समझ hi नहीं आया. इसमें समझना क्या था विक्की.? गम या गण मैसेज का जवाब तो कोई अनपढ़ भी दे सकता है. तुम ये क्यों नहीं कहते की तुम कोई जवाब देना hi नहीं चाहते थे मुझे. हे भगवन कोई ऐसा भी करता क्या अपनी मासूम सी दोस्त के साथ.?" रचना ने ऐसा कहा तो मुझे जाने क्यों अंदर hi अंदर हसी आयी मगर मैं हँसा नहीं.
"छोडो जाने दो. ये बताओ की क्या सोचा है तुमने दोस्ती के लिए.? आज ये तीसरा दिन भी ख़तम हो गया. क्या पूरी ज़िन्दगी सोचने में लगाओगे.?"
"नहीं ऐसी बात नहीं है." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"फिर कैसी बात है विक्की.? तुम न सोचते hi बहुत हो. इतना मत सोचो विक्की. तुम मुझ पर पूरा भरोसा कर सकते हो. अगर तुम ये सोच कर मुझसे दोस्ती के लिए हाँ नहीं कर रहे की मैं तुमसे दोस्ती की आड़ में अपने भाई की मार का बदला लगी तो तुम गलत सोचते हो विक्की. मेरे मन में तुम्हारे लिए ऐसी कोई बुरी नियत नहीं है. सारा गांव जनता है की तुम और तुम्हारे परिवार के सब लोग बहुत अच्छे हैं. तो जो सच है उसे क्या मैं नहीं मानूगी.?" रचना ने ये सब कहा तो मैं हैरान रह गया. मेरे मन में जिस बात का अंदेसा था रचना उसी की बात कर रही थी.
"अच्छा एक काम करो. तुम मुझसे दोस्ती के लिए हाँ कहो. तुम्हे जब भी ऐसा लगे की मैं तुम्हारे साथ दोस्ती की आड़ में कुछ बुरा करना चाहती हु तो तुम उसी वक्त मुझसे दोस्ती ख़तम कर देना और मेरा फ़ोन no भी ब्लॉक कर देना. अब इससे ज़्यादा मैं क्या कह सकती हु विक्की.? मैं तुम्हे भरोसा दिलाने के लिए किसी की भी कसम खा सकती हु और क्या कर सक्तु हु तुम खुद बताओ.?" रचना ने ऐसा कहा तो मैं सोच में पद गया. बात तो वो सच hi कह रही थी.
इंसान भरोसा दिलाने के लिए यही सब तो कर सकता है और इंसान को भरोसा करना hi पड़ता है. मैंने भी सोचा की अगर ये रिष्की भी है तो ये रिष्क ले hi लेता हु. मैंने रचना से दोस्ती करने के लिए हाँ कह देने का फैसला ले लिया. मैं भी अब देखना चाहता था की रचना मुझसे दोस्ती कर के क्या करती है.?
"ठीक है मैंने सोच लिया है." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"क्या सोच लिया है.?" रचना ने कहा तो मैंने कहा.
"ये की मैं तुमसे दोस्ती करुगा मगर मैं इस दोस्ती में किसी भी तरह की बंदिश नहीं चाहता." मैंने ऐसा कहा तो रचना ने ख़ुशी से कहा.
"ये हुयी न बात. तुम्हारी इस रज़ामंदी से मैं बहुत खुश हो गयी हु विक्की. एक अच्छे नेचर का इंसान मेरा दोस्त बन गया है. मैं पूरी कोशिश करुँगी की मेरी वजह से मेरे दोस्त का दिल न दुखे और न hi किसी तरह की कोई प्रॉब्लम हो." रचना ने ये कहा तो मुझे भी अंदर से एक ख़ुशी का अहसास हुआ. मगर मैंने उस ख़ुशी को रचना पर उजागर नहीं किया.
"मेरी भी यही कोशिश रहेगी की मेरी वजह से तुम पर कभी कोई बात न आये." मैंने ऐसा कहा तो रचना ने कहा.
"तुम्हे ये कहने की ज़रूरत नहीं है विक्की. मुझे पता है की तुम बहुत अच्छे नेचर के हो और किसी के भी बारे में बुरा नहीं सोच सकते. तुम्हारी इसी अच्छाई की वजह से तो मैं तुमसे दोस्ती करना चाहती थी." रचना ने ये कहा तो मैं कुछ न बोलै.
"अच्छा chhodo....ye बताओ अभी क्या कर रहे हो तुम. वैसे हमारी दोस्ती की शुरुआत के लिए तुम कुछ नहीं करोगे.?" रचना ने ऐसा कहा तो मैं हैरान हुआ. मुझे समझ न आया की उसके ये कहने का क्या मतलब था.
"क्या matlab...kya करू मैं.?" मैंने पूछा तो रचना ने हस्ते हुए कहा.
"कुछ ऐसा जिससे लगे की हाँ अब हम दोस्त बन गए हैं." रचना ने कहा तो मैंने कहा.
"ओह्ह मगर अभी हम पूरी तरह से दोस्त नहीं बने." मैंने ऐसा कहा तो रचना बोल पड़ी.
"ये क्या कह रहे हो तुम. दोस्त नहीं बने हैं तो फिर ये क्या है.?" रचना को शायद समझ नहीं आया था इस लिए उसने जब ऐसा कहा तो मैंने कहा.
"मेरा मतलब है की अभी तो हम एक दूसरे को अच्छी तरह से जानते भी नहीं हैं. जब अच्छे से जान लेंगे तब ये कहा जायेगा की अब हम पक्के दोस्त बन गए हैं." मैंने ऐसा कहा तो रचना फिर हसी और बोली.
"ओह्ह ऐसा kya....magar मैं तो तुम्हारे बारे में जानती हु की तुम कितने अच्छे हो. क्या तुम नहीं जानते मेरे बारे में.?" रचना ने ऐसा कहा तो मैंने कहा.
"मैं बस इतना hi जनता हु की तुम सरपंच काका की बेटी हो बस. उससे ज़्यादा मुझे तुम्हारे बारे में कुछ नहीं पता." मैंने ऐसा कहा तो रचना ने कहा.
"अच्छा ठीक hai...tum मुझसे मेरे बारे में जो चाहो पूछ लो. मैं सब कुछ बता दूगी. उसके बाद तुम भी मेरे बारे में जान्ने लगोगे और फिर हम पक्के वाले दोस्त बन जायेगे." रचना ने इतने इजी तरीके से कहा जैसे ये कोई आसान बात हो.
मैं समझ नहीं प् रहा था की गांव की एक आम सी लड़की किसी अजनबी लड़के से इतना इजी फील करते हुए कैसे बेबाकी से बात कर सकती है.? मैं एक लड़का था मगर मुझे किसी भी लड़की से बात करने में बहुत ज़्यादा झिझक लगती है.
"तो बोलो vicky....kya जानना चाहते हो मेरे बारे में. तुम्हे जो भी पूछना हो तुम पूछो. मैं तुम्हे सच सच बता दूगी." रचना ने मुझसे ये कहा तो मुझे समझ न आया की मैं उससे क्या पुछु.?
"मुझे खुद नहीं पता की मैं तुमसे क्या पुछु. तुम्हे जो कुछ बताना हो तुम खुद hi बता दो." मैंने कहा तो रचना फिर से खिलखिला कर हसने लगी फिर बोली.
"तुम सच में अजीब हो मगर फिर भी बहुत अच्छे हो. तुम मुझसे मेरे बारे में पूछने में हिचकिचा रहे हो. तभी तो ऐसा कह रहे हो. वर्ण तुम्हे बेझिझक पूछना चाहिए था मुझसे. अब तो हम दोस्त बन गए हैं इस लिए अब किसी बात के लिए झिझकने का क्या मतलब.?" रचना ने ये सब कहा तो मैं सोचने लगा की ये लड़की तो सच में बहुत ज़्यादा ओपन माइंडेड है.
"अच्छा अब मैं फ़ोन रखता हु. अभी खेत से आया था और अब घर पहुंच गया हु." मैंने ये कहा तो रचना बोली.
"तुम खेत में क्या करते हो विक्की. तुम तो पढ़े लिखे हो तो कही शहर में कोई अच्छी सी नौकरी क्यों नहीं करते. यहाँ खेतो में सभी अनपढ़ो की तरह काम क्यों करते हो.?" रचना ने ऐसा कहा तो मैंने कहा.
"क्या पढ़े लिखे लोगो को खेतो में काम नहीं करना चाहिए.? शायद तुम्हे पता न हो मगर पढ़े लिखे लोग भी कृषि का काम बहुत अच्छे से करते हैं. मुझे अच्छा लगता है अपने पिता जी के साथ काम में उनका हाथ बताना. शहर में नौकरी करके अपनी फॅमिली से दूर नहीं जाना चाहता. मेरे पिता जी मुझसे ये नहीं कहते की तुम खेतो में काम करो मगर मैं खुद hi करता रहता हु." मैंने ये सब कहा तो रचना ने कहा.
"अच्छी बात है विक्की. अपने परिवार के साथ मिल जल के रहना और उनके कामो में उनकी मदद करना अच्छी बात है. मगर जो लोग पढ़ाई लिखाई करते हैं वो खुद और उनके घर वालो के दिल में ये अरमान तो रहता hi होगा की पढ़ लिख कर हमें कोई अच्छी सी नौकरी करनी चाहिए. जिससे घर परिवार का नाम रोशन हो सके." रचना के मुँह से इतनी बड़ी बात सुन कर मैं हैरान रह गया. लग hi नहीं रहा था की वो इतना एडवांस हो सकती है.
"हाँ ये तो है. मगर मैंने अभी इस बारे में कुछ नहीं सोचा है. बाद में देखूगा की क्या करना है. अच्छा अब मैं रखता हु फ़ोन. मैं घर के सामने आ गया हु." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.
"ठीक है रख do...magar ये तो बताओ की अब फिर से कब बात होगी हमारी.? क्या मैं तुम्हे किसी भी वक्त फ़ोन लगा सकती हु.?" रचना ने पूछा तो मैंने कहा.
"दिन भर तो मैं पिता जी के साथ खेतो पर रहता हु. उसके बाद घर में. इस लिए मैं तुम्हे ये नहीं कह सकता की तुम कभी भी फ़ोन कर सकती हो. अगर किसी को पता चल गया तो पन्गा हो जायेगा." मैंने कहा तो रचना ने कहा.
"तो तुम hi बताओ किस वक्त मैं तुमसे बात कर सकती हु. बाकी टाइम तो मेरे पास मेरी दीदी या मेरी छोटी बहने hi रहती हैं. वैसे भी घर में रहते हुए मैं बात नहीं कर सकता." मैंने उसे बताया तो रचना ने कहा.
"अच्छा ये बताओ की तुम्हारे पास कौन सा मोबाइल है. टच स्क्रीन वाला है या बटन वाला.?" रचना ने पूछा तो मैंने उसे बता दिया की मेरे पास कीपैड वाला नार्मल मोबाइल hi है. उसने कहा की उसके पास टच स्क्रीन वाला है जो उसकी दीदी के दिए पैसो से उसने ख़रीदा है.
रचना ने मुझसे कहा की मैं भी एक टच स्क्रीन मोबाइल ले लू. मगर मैंने ये कह कर इसके लिए इंकार कर दिया की मैं घर वालो से क्या बोलूगा की मुझे किस लिए टच स्क्रीन मोबाइल लेना है. मेरे पास तो आलरेडी एक मोबाइल है. उसके बाद मैंने रचना को फ़ोन रखने का कह कर फ़ोन रख दिया और घर के अंदर आ गया.
मेरे दिमाग में रचना से हुयी बाते चल रही थी. मैं सोच सोच कर हैरान था की रचना कितनी बेबाकी से मुझसे बाते कर रही थी. उसे जो भी बोलना होता था वो पुरे कॉन्फिडेंस के साथ बोलती थी और मेरा कॉन्फिडेंस एक डैम से hi जीरो पर था.
रात में खाना पीना करके मैं अपने कमरे में आ गया था. रात 11:30 बजे दीदी आयी तो हम दोनों ने कुछ देर इधर उधर की बाते की उसके बाद दीदी गण बोल कर सो गयी. मगर मैं जगता रहा. मुझे नींद नहीं आ रही थी. मेरा ध्यान बार बार रचना की तरफ जा रहा था. मैंने मोबाइल उठा कर देखा तो उसमे रचना का गण मैसेज पड़ा था जो शायरी में hi था.
यही कभी सपनो से दिल लगाया करो,
किसी के ख्वाबो में आया जाया करो,
जब भी दिल करे की कोई तुम्हे भी
सुबह जगाये,
बस हमें याद करके पहले सो तो
जाया करो…
गुड नाईट....
मैंने रचना के इस मैसेज को पढ़ा और फिर सोचने लगा. मैं सोच रहा था की मुझे उसके इस मैसेज का रिप्लाई देना चाहिए या नहीं. उसने मुझसे शिकायत भी की थी की मैंने उसके मेस्सगेस का कोई रिप्लाई नहीं दिया था. सो मैंने सोचा की कुछ तो रिप्लाई देना hi चाहिए वर्ण वो फिर मुझसे इस बात की शिकायत करेगी.
मैंने रचना के मैसेज का रिप्लाई गुड नाईट का मैसेज करके दिया. रात आधे से ज़्यादा गुज़र चुकी थी. रचना को मैसेज करने के बाद मैंने मोबाइल को सिरहाने रख दिया था. मगर मेरी उम्मीद के विपरीत मेरे मोबाइल पर फिर से मैसेज टोन के लिए वाइब्रेशन हुआ. मैंने मोबाइल उठा कर देखा तो उसमे रचना का मैसेज आया हुआ था. उसने थैंक्स माय स्वीट फ्रेंड लिख कर भेजा था.
मैं हैरान था की रचना इस टाइम भी जग रही थी. वो इस टाइम क्यों जग रही थी इस बारे में मुझे कुछ भी समझ न आया. वैसे मैंने सोचा तो की शायद वो मेरे रिप्लाई का वेट करती रही होगी. सोचते सोचते hi मेरे दिमाग में एक और बात आयी. ये भी तो हो सकता है की रचना मेरे मैसेज के लिए नहीं बल्कि किसी और वजह से इतने टाइम जग रही हो. वो वजह ये भी हो सकती की उसका किसी दूसरे लड़के से चक्कर हो और वो देर रात तक उससे मेस्सगेस में बाते करती हो या कॉल पर भी बाते करती हो.
रचना का बिंदास और कॉन्फिडेंस से भरा करैक्टर देख कर मुझे यही रीज़न समझ में आ रहा था और मुझे ये सच भी लग रहा था. उसके बाद मुझे कब नींद आ गयी थी मुझे पता hi नहीं चला.
सुबह अलार्म क्लॉक के बजने से hi नींद खुली. दीदी ने मुझे गम कहा उसके बाद वो चली गयी. ऐसे hi 15 दिन गुज़र गए. मेरी सुबह दीदी के साथ होती और रात भी. दिन भर पिता जी के साथ खेतो पर काम और उसके बाद घर. रचना मुझे डेली फ़ोन करती थी. वो तभी फ़ोन करती थी जब मैं खेतो पर रहता था. उसका फ़ोन फिक्स टाइम पर hi आता था. मैं भी उस फिक्स टाइम पर खेतो में सबसे अलग हो जाता था जिससे किसी को पता न चल सके की मैं किसी से फ़ोन पर बात कर रहा हु.
इन 15 दिनों में मैं काफी खुल चूका था रचना से. पहले मुझे उससे बात करने में झिझक होती थी मगर अब ऐसा नहीं था. अब मैं भी उससे थोड़ा कॉन्फिडेंस के साथ hi बात करने लगा था. वो मुझसे खूब है है कर बात करती थी और कभी कभी मज़ाक में मुझे छेड़ती भी थी. मैं एक लिमिट तक hi उससे बात करता था. वो हर बार मुझसे यही कहती की ज़िन्दगी में इतना डाब के और इतना कमज़ोर बन के नहीं रहना चाहिए. चार दिन की ज़िन्दगी को हसी ख़ुशी और बिंदास हो कर जीना चाहिए.
मैं रचना की इन बातो का बस हाँ या न में जवाब दे देता था. एक दिन उसने मुझसे मिलने के लिए कहा तो मैंने साफ़ मन कर दिया. मेरे मन कर देने पर वो मुझसे कहने लगी की मिलने में क्या प्रॉब्लम है. हम दोस्त हैं तो कभी न कभी तो मिलना भी चाहिए हमें एक दूसरे से. उसकी इस बात से मैंने उसे बताया की ये पॉसिबल नहीं है क्यों की मैं दिन भर पिता जी के साथ खेतो पर hi रहता हु.
रचना ने कहा की अगर मुझे गांव में मिलने से कोई प्रॉब्लम है तो हम शहर में मिल सकते हैं. उसकी शहर में मिलने की बात से मैं हैरान रह गया था. उसने खुद hi बताया की वो हप्ते में संडे के दिन हमेशा शहर जाती है बस से. कभी अकेली तो कभी किसी सहेली के साथ वो शहर ज़रूर जाती है. उसके घर वालो को भी पता है. वो अपने बाप की लाड़ली बेटी है इस लिए उसका बाप उसके कही आने जाने पर कोई पाबंदी नहीं लगता.
रचना ने मुझसे कहा की इस बार जब वो संडे को शहर जाएगी तो मैं भी उस दिन शहर चालू. वो बस से जाएगी और मैं अपनी मोटर सिक्ले पर. शहर पहुंच कर हम एक दूसरे से मिलेंगे. रचना ने पूरा प्लान बता दिया था मुझे और मुझे चलने के लिए फाॅर्स भी किया. मैं मन करता रह गया मगर वो न मानी थी. सो फाइनल यही हुआ की दो दिन बाद संडे को मुझे शहर जाना hi पड़ेगा.
फ़ोन पर बाते करना या मैसेज में बाते करना तक तो ठीक था मगर मिलने मिलाने वाली बात से मैं कम्फर्टेबले फील नहीं कर रहा था. मगर रचना की रिक्वेस्ट पर और उसके समझने पर मुझे उससे मिलने शहर जाना hi पद रहा था. मेरा दिल और दिमाग दोनों hi इसके लिए रेडी नहीं थे. बार बार ऐसा लग रहा था जैसे इससे कुछ गड़बड़ हो जाएगी.
सैटरडे की रात मुझे नींद नहीं आ रही थी. कल संडे था और मुझे रचना से मिलने शहर जाना था. मुझे समझ नहीं आ रहा था की शहर जाने से कैसे बच्चू. रचना ने साफ़ कह दिया था की कोई बहाना नहीं चलेगा. अगर मैंने ऐसा किया तो वो मुझसे नाराज़ हो जाएगी. मैंने भी सोचा था की मिलने में क्या जाता है. एक बार मिल कर देख लेने में क्या है. आखिर पता तो चले की मिलने से क्या होता है.
कुसुम दीदी को मैंने रचना के बारे में अभी कुछ भी नहीं बताया था. मुझे गिल्ट फील हो रही थी की मैंने दीदी से इस बात को अब तक छुपा कर रखा हुआ है. जबकि मैं उनसे अपनी कोई भी बात नहीं छुपता था. उनके सामने मेरी ज़िन्दगी की किताब का हर पेज ओपन था. मैंने इस बारे में दीदी से इस लिए भी नहीं बताया था की पता नहीं वो मेरे बारे में क्या सोचेंगी. उनको ये बात पसंद आएगी की नहीं की मैंने उस सरपंच की बेटी से दोस्ती का रिश्ता बना रखा है जिसके बेटे को मैंने उस टाइम मारा था.
सैटरडे की रात बड़ी मुश्किल से गुज़री थी. मैंने सैटरडे को hi माँ से बता दिया था की मुझे कल शहर जाना है किसी काम से. माँ ने शहर जाने की इजाजत दे दी थी. रात में शायद उन्होंने पिता जी को भी बता दिया था. सुबह जब मैं जाने के लिए रेडी हुआ तो पिता जी ने मुझे कुछ पैसे दिए थे खर्चे के लिए. उन्होंने मुझसे एक बार भी नहीं पूछा था की मैं शहर किस लिए जा रहा हु. शायद वो मुझ पर हद से ज़्यादा भरोसा करते थे और जानते थे की मैं बेवजह शहर नहीं जा रहा हु.
भाई लोग....
आज के लिए इतना hi....
रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....
कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
:थैंक्यू: