अपडेट:-9 ( ा रीयूनियन एंड रिलैक्स)
मेरी आँख अस उसुअल हॉस्पिटल के बीएड पे खुली और मेरी आँख खुली तो सामने देखा की अभय उस डॉक्टर पे चिल्ला रहा है.
अभय:- लिसेन डॉक्टर अगर इसे कुछ भी हुआ तो छोडूंगा नहीं तुम्हे, तुम इसको इतनी हाई मग की मेडिसिन कैसे दे सकती हो.?
डॉक्टर:- सॉरी पर ये सही है.
मैं:- किसने कहा सही हु मैं.
मेरी आवाज़ सुनके सब मुझे देखने लगे, लेकिन मैंने बोलना जारी रखा,
मैं:- कहा से सही हु मैं, सिगग्रेटे न मिले तो सर में दर्द, दारू न मिले तो सर में दर्द, और ये कल क्या हुआ था मेरे साथ ये ब्लड वगैरह का चक्कर, पागल हो गया हु क्या मैं.
डॉक्टर:- देखो तुम ठीक हो बिलकुल बस तुम्हे उन मेडिसिन का हाई दोसे नहीं लेना चाहिए था अब तुम्हारा मंद ऐसी चीज़ो की डिमांड करेगा और इसका तीन hi सलूशन है, एक ये दवाई कंटिन्यू करो जो की अछि बात नहीं है क्युकी एक टाइम पे ये पागल कर देगी तुम्हे. सेकंड अपनी एडिक्शन पूरी करो या जो तुंहारा मंद तुम्हे बोले वो करो लेकिन ये भी सही नहीं है क्युकी स्लेव बन जाओगे तुम खुदके. तीसरा मोस्ट इम्पोर्टेन्ट ड्रग्स लेने लग जाओ.
विवेक:- व्हाट थे फ़क दो यू मैं डॉक्टर ड्रग्स लेने लग जाओ इसका क्या मतलब है.
डॉक्टर:- बसीकली एक ड्रग है जिसको लेने से इनका दिमाग और तेज़ हो जाएगा और इनका चक्कर आना भी बंद हो जायेगा. जब जब ये ड्रग्स लेंगे इनका खुदके दिमाग पे कण्ट्रोल होगा पूरा. पर इसके कॉन्सीक्वेन्स है थोड़े लिखे इनको गुस्सा जल्दी आने लगेगा फ़्रस्ट्रेशन लेवल बढ़ेगा.
मैं:- तो दो वो ड्रग.
विवेक:- अबे पागल है क्या? जो बोल रहा ड्रग्स दो मुझे.
मैंने अभय की तरफ देखा तो वो विवेक को बहार ले गया, दीपक तो घर जा चूका था वैसे भी, सुबह का टाइम था पूरी रात बेहोश था मैं घर वालो को कोई चिंता नहीं थी बस मरू या जिन्दा राहु.
मैं:- डॉक्टर ी वांट तहत ड्रग.
डॉक्टर:- hello ी ऍम ा डॉक्टर मैं ड्रग्स लेके नहीं घूमती कोई ड्रग डीलर को पकड़ो और उससे लो, लेकिन बहुत महंगा होगा वो.
मैं:- आप बस नाम बताओ, कैसे लेना है मैं देख लूंगा.
Doctor:-LSD!
मैं:- ोककक! चलते है हम, जितने ड्रग्स नहीं मिल जाते उतने एडिक्शन hi पूरी कर लूंगा अपनी.
डॉक्टर:- ोककक!
मैं बहार आया तो विवेक और अभय कुछ बात कर रहे थे, मुझे देखते hi विवेक मेरे पास आके बोलै.
विवेक:- don't तेल्ल में की तू ड्रग्स लेगा.
मैं:- सडली यस.
विवेक:- फ़क यू!
हम तीनो बहार आये हॉस्पिटल से और मैं अभय के साथ बाइक पे बैठा और विवेक अपनी बाइक पे. हम रस्ते में थे शांति से चल रहे थे क्युकी सबके दिमाग में कुछ न कुछ चल रहा था. तभी मेरा फ़ोन बजा मैंने देखा तो वो इंस्पेक्टर किरण का था.
किरण:- एक के तो था पुलिस स्टेशन.
मैं:- ोकक.
मैंने अभय को देखा तो वो समझ गया कहा जाना है, एक्चुअली हमे पता था ये तो होना hi है, हमने विवेक को इशारा किया वो भी हमारे पीछे हो लिया.
हम स्टेशन पहुंचे तो वह बस ब्लैक मेरसेदेज़ कड़ी थी और 2 ब्लैक फोर्टनेर, वह पे गॉर्डस भी खड़े थे बिलकुल suited-booted, हम तीनो अंदर गए तो हवलदार ने केबिन की तरफ इशारा किया, सामने देखा तो गांड फैट गयी मेरी, मेरी नहीं बे हम तीनो की क्युकी सामने 5 बन्दों ने एक साथ गन तान दी हमारे उप्पेर, बस असाल्ट रिफ्फ्ले थी गलती से भी चल जाती तो छेद हो जाते बहुत सारे. खैर तभी पीछे से आवाज़ आयी.
"कूल बॉयज" और उन लोगो ने गन हटाई तब जाके सांस आयी, मैंने किरण को देखा तो उसकी भी फटी हुयी थी तभी मेरी नज़र उस आदमी पे गयी जो चेयर पे बैठा था 40-45 साल का रोबदार आदमी, सकल से बहुत अमीर लग रहा था, इंडिया का भी नहीं लग रहा था ये तो.
आदमी:- बैठो बैठो इधर आके.
हम लोग वह चेयर पे बैठ गए.
आदमी:- तो मेरा नाम है विजय चौधरी, हर्ष चौधरी का भाई और रोहन का फादर.
इतना सुनते hi विवेक खड़ा हो गया लेकिन मैं और अभय बैठे थे, मैं तो इसलिए बैठा था क्युकी मैंने इस बन्दे को पढ़ लिया था अंदर आते hi की ये हर्ष जैसा नहीं है और ये उसे पसंद भी नहीं करता.
विजय:- अरे बैठो बीटा. देखो घुमा फिरके बात नहीं करता मैं तुम लोगो मैं से रोहन को किसने मारा है.
मैं:- मैंने.
मेरी आवाज़ में अभी भी अकड़ थी बेशक गांड फैट रही हो,
वो विजय मुझे देख के मुस्कुराया.
विजय:- ऐटिटूड है निडर हो, अछि बात है. तो तुमने मेरे बेटे को इतना मारा की वो कोमा मैं है, लेकिन तुमने मारा उससे मुझे कोई मतलब नहीं क्युकी यहाँ वो हर्ष के पास रहके बिगड़ hi जाता, लेकिन अब मैं उसे लेके लंदन जा रहा हु. अब एक फ्री की एडवाइस दू.
विवेक:- हां सर दो न.
विजय:- हर्ष से दूर रहो बचो, उसे जरा भी भनक लगी की तुम लोगो ने ऐसा कुछ किया है की उसे तकलीफ हो तो वो तुम्हारे पुरे परिवार को मरवा देगा. तुम बचे हो अभी तुमलोगो के पास न पैसा है न पावर है न नाम है न दर है कुछ नहीं कर पाओगे तुम ऐसे. इसलिए उससे दूर रहो
विवेक:- नहीं होगा सर बिलकुल नहीं होगा ऐसा.
विजय:- तुम्हारे दोस्त ने तो कुछ बोलै hi नहीं.
विवेक:- अरे सर वो पागल है, उसके दिमाग के तार हिले हुए है.
मैंने विवेक को घुरा तो वो चुप हुआ, भेनचोद कितना बोलता है.
मैं:- तो फर्स्ट ऑफ़ आल अंकल, ी don't केयर अबाउट योर बरोथेर वो कुछ भी हो, कितना भी पैसा हो, कितना भी नाम, पावर, दर, रुतबा कुछ भी हो, सब कुछ चीन लूंगा उससे.
विजय:- ये ऐटिटूड फिल्मो में ाचा लगता है बचे.
मैं:- ओह्ह्ह come-on अंकल, लुक ईंटो माय आईज मेरी आँखों में दर दिख रहा है क्या? और ये डीएलओगे नहीं है फ्यूचर है, एक दिन एक किंग होगा यहाँ का.
और इतना बोलके मैं वह से खड़ा हुआ और निकल गया, मेरे पीछे पीछे वो दोनों भी बहार आ गए. दोपहर का टाइम हो गया था तो हम एक ढाबे पे गए और खाना खाया सिगग्रेटे पि.
इन सब चीज़ो में मैं बिलकुल सांत था मेरे दिमाग में विजय की बात घूम रही थी की अगर हर्ष ने फॅमिली को कुछ कर दिया तो लेकिन अगले hi पल ध्यान आया कैसी फॅमिली बे, फ़क फॅमिली फ़क एवरीथिंग मुझे आगे जाना है लोग मरे तो मरे जब मेरे बुरे दिन थे तब कोनसा कोई साथ था मेरे.
हम सब रस्ते में जा hi रहे थे की मैं बोलै.
मैं:- ठेके पे लेले दारू पिएंगे आज अभय के आने की खुसी में.
हम तीनो ठेके पे गए वह से अभय 2 िब की बोतल लेके आया और हम पहुंचे एक नए अड्डे पे, ये एक कुटिया (हूत) टाइप कमरा था हमारे खेतो में, यहाँ कोई नहीं आता था बस कोई नहीं क्युकी बहुत दूर था ये गांव से और यहाँ पे लूट वगैरह की वारदात भी होती रहती थी.
खैर हम उसके कमरे में बैठे फैन ों किया, वैसे कमरे में साफ़ सैफई थी पूरी एक बीएड था चेयर थी, फैन था और क्या चाहिए, बसीकली ये कमरा मैं और विवेक रंग रलिया मानाने के लिए उसे करते थे, लेकिन कुछ दिनों से लाइफ अलग रूट पे जा रही है.
4 पेग बने, ऑब्वियस्ली आरव को कैसे भूल सकते है..
अभय:- दिल्ली कब आ रहा है, उस हर्ष के लिए तो आना पड़ेगा अभी सही मौका है आजा हॉस्टल में.
मैं:- नाना अभी तो मला की माँ छोडूंगा और फिर आऊंगा दिल्ली.
विवेक:- आऊंगा नहीं आएंगे.
मैं:- ना तू यही रहेगा मला के काण्ड तक, हर्ष बचा नहीं है कोई, इसलिए तू नहीं आएगा.
विवेक:- आऊंगा बस देखता हु कोण रोकता है.
मैं:- देख तेरे और दीपक के पीछे फॅमिली है और मैं, अभय है बिलकुल फ्री कोई न है हमारे पीछे और हम तुझे खतरे में न दाल सकते.
विवेक:- चुप भसडक, ज्यादा ज्ञान न पेल मैं भी दिल्ली आऊंगा दोनों भाई साथ मरेंगे.
अभय:- अबे लौड़े दोनों नहीं तीनो.
मैंने अभय को घुरा तो उसने मुझे इशारा किया विवेक की तरफ और मैंने उसकी तरफ देखा तो समझ गया की लोदु फुल सेट है अब.
मैं:- हां विवेक भी चलेगा हमारे sath.(lawda चलेगा ऐसा निकलूंगा यहाँ से की कानो कान खबर नहीं होगी और विवेक को रोकने का प्लान था मेरे पास)
विवेक:- माँ की छूट दुनिया की, दुनिया मादरचोद है भें की लौड़ी, रुक अभी उस हर्ष को थोक के आता हु भड़वे को.
विवेक का मिछ चालू हो चूका था अभय ने उसे बीएड पे लिटाया और हम दोनों दूसरी बोतल खोल के पिने लगे..
अभय:- प्लान है तेरे पास.
मैं:- बीटा सब प्लान है मेरे पास.
अभय:- ड्रग का जुगाड़ कैसे करेगा.
मैं:- अरे वो राजेश नाम के बन्दे को उठाएंगे तो ले लेंगे उससे.
अभय:- सही है लेकिन उसके लिए बहुत दिन है अभी.
मैं:- कहा बे तीन दिन बाद तो सप्लाई आएगी दिल्ली से तब hi उठा लेंगे.
अभय:- लोदु तीन दिन बाद तो उस लड़के और लड़की को उठाना है न.
मैं:- हां बे, दिमाग काम न कर रहा.
अभय:- दिल्ली के बाद क्या प्लान है?
मैं:- मुंबई, अंडरवर्ल्ड.
अभय:- ी ऍम विथ यू बेबी.
मैं:- वो तो तू होगा hi बस, नहीं होगा तो जबरदस्ती रख लूंगा साथ.
हम दोनों ने ऐसे hi आगे के प्लान डिसकस करते रहे( जो की अभी नहीं बता सकता)
हम दोनों ने बोतल खली की और खड़े हुए तो बस पता चला की भारी चढ़ चुकी है और हम काम से काम 4 5 घंटे से बैठे थे तो पेअर अकड़ गए थे. खैर हम दोनों फ्रेश हुए और खाना खाया जो पैक करा के लाये थे, विवेक को देखा तो वो सो गया था लेकिन भसदक़ा अभी भी गाली दे रहा था किसी को.
हम दोनों भी पद गए उसके बगल में और कब नींद आयी पता hi न चला, लेकिन आधी रात को विवेक भाई साहब निचे गिर गए और वही सो गए. ( सही हुआ साले के साथ अब हम खुल के सोयेंगे)
तो बे कॉन्टिनोएड ??