अपडेट:-5 (ब्रोकन और नॉट?)
मेरी आँखे खुली तब मैं हॉस्पिटल के एक बीएड पे था और मेरे सामने विवेक बैठा था एक कुर्सी पे उसकी आँखे लाल थी और साइड के सोफे पे मेरे दादा सो रहे थे, विवेक दीवार को घूरे जा रहा था non-stop, मेरी आँख तो खुल गयी पर बस ये नहीं पता था की दिन है या सुबह है क्या है.
मैंने अपने चारो तरफ मुंडी घुमाई लेकिन कोई घडी न थी, फिर सोचा उठके बैठ जाता हु और जैसे hi उठ के बैठने को हुआ मेरी अह्ह्ह्ह निकल गयी जोर से और तब मुझे रीलीज़ हुआ दर्द क्या होता है पूरी बॉडी मैं पैन सा था, मेरी आह्हः सुनके वायरस ने मेरी तरफ देखा और वो भाग के मेरे पास आया और रोने लगा बैठ के.
मैं:- लौड़े रो क्यों रहा है मारा नहीं हु?
उसने एक थप्पड़ दिया मेरे जो तेज़ तो नहीं था पर बस एक को थप्पड़ लेकिन कुछ कर भी नहीं सकता मैं,
मैं:- अब बोलेगा रो क्यों रहा है लुगाई थोड़ी हु तेरी.
वो फिर भी कुछ नहीं बोलै.
मैं:- ाचा दिन है या रात.
विवेक:- रात.
मैं:- फिर ठीक है बे जल्दी hi होश आ गया, अब उनकी माँ छोडूंगा.
विवेक:- 7 दिन बाद होश आया है तुझे.
मैं:- wtf इतने दिन बेहोश क्यों था मैं, भेनचोद वॉर में से थोड़ी आया था दो चार चोट hi तो आयी थी.
विवेक :- चुप लौड़े, 75%रिब्स दंगे थी दोनों घुटने टूट चुके थे, एक कन्धा डिस्लोकाते था सर फुट चूका था और डॉक्टर ने बताया की तेरे सर मैं एक नस भी काट गयी है. एयर छोटी मोती चोट पूछ hi मत पूरी बॉडी भरी पड़ी है.
फ़क! बस इतनी कैसे लग गयी खैर कोई नहीं ठीक हो जाऊंगा फिर देख लूंगा उन्हें.
मैं:- वैसे तूने मनीषा को देखा क्या बस वो रो रही थी tab,mujhe देखने आयी थी क्या वो?
विवेक चुप रहा थोड़ी देर.
मैं:- बोल न छोड़ू.
विवेक:- वो आगरा चली गयी फॅमिली के साथ उसके पापा आर्मी में है तो वह गयी और वैसे भी उसके और तेरे बारे में सब को पता लग गया था उसको तो वैसे भी ले जाते उसके घरवाले.
ये लगा मुझे पहला झटका जिससे मैं 2 सेकंड के अंदर उभर गया.
मैं:- कोई न अपनी माँ छुड़ाए वो लोग, प्यार के बिना भी बहुत काम है करने को.
वायरस:- दादी नहीं रही अब!
ये सुनके ब्लेंक हो गया मैं, बस ये सेकंड झटका लगा मुझे, दादी नहीं रही ये कैसे हो सकता है
मैं:- देख मजाक न कर बहुत मरूंगा.
विवेक:- तेरे इस सन के बाद उन्हें 3रद हार्ट अटैक आ गया और वो चली गयी हमे छोड़ के.
विवेक फिर रोने लगा लेकिन मेरी आँखों में आंशू नहीं आये पर अंदर hi अंदर टूट रहा था मैं, दिल घबरा सा रहा था मेरे साथ hi क्यों ऐसा होता है मेरी दादी hi मेरी माँ थी वो भी छोड़ के चली गयी मुझे, खैर जाने वाले कोण रोक सकता है मैंने खुद को मजबूत किया अंदर से और वायरस को बोलै
मैं:- चुप हो जा रोने से कुछ नहीं होता.
वायरस:- कैसा इंसान है बे तू तकलीफ नहीं होती तेरे को.
मैं:- तकलीफ तो इतनी होती है की पूछ मत दिल कर रहा है खुद की जान दे दू यही लेकिन अभी तो बहुत कुछ करना बाकी है.
वायरस:- चल तू आराम कर.
मैं:- अंजलि दीदी से बात करवा मेरी अभी.
वायरस सुन्न हो गया ये सुनते hi और हड़बड़ा के बोलै
विवेक:- न न रहने दे कल करियो बात.
मैं:- अबे करवा न उनको कुछ बोलना है.
(वैसे अंजलि दीदी के बारे में बता दू विवेक की बड़ी बेहेन है कॉलेज मैं है अभी, ये मुझे सबसे ज्यादा प्यार करती है और मैं भी.)
विवेक:- छोड़ न.
और वो मुझसे नज़रिए चुराने लगा
मैं:- सुन भसडक तू मुझसे झूट नहीं बोल सकता इधर आँखों में देख के बता क्या हुआ.
विवेक कुछ नहीं बोलै बस बैठा रहा, मैंने जैसे hi उसका हाथ पकड़ा तो मुझसे लिपट के रोने लगा इतना ज़ोर से की पूछो मत उसके रोने से मैं घबरा सा गया.
मैं:- देख विवेक बात क्या है बता मुझे. मुझपे भरोसा है न सब ठीक कर दूंगा मैं.
विवेक:- भाई अब कुछ ठीक नहीं हो सकता क्युकी कुछ बचा hi नहीं.
मैं:- साफ़ साफ़ बतायेग.
विवेक:- अंजलि दीदी ने सुसडे कर लिया.
ये सुनते hi मैं एक दम चुप हो गया और मेरी आँखों के सामने दीदी के साथ बिताये हुए पल याद आने लगे की कैसे जॉब मेरी घर पे पिटाई होती या मैं उदास होता तो वो कैसे खुस कर देती मुझे, अपने सेज भाई से भी ज्यादा मानती थी मुझे और अब वो भी छोड़ गयी मुझे.
मैंने अपनी आँखे बंद कर ली क्युकी जो दिल में दर्द उठ रहा था वो बॉडी के दर्द से बहुत ज्यादा था मैंने आँखे खोली तो मैं फुल घुसे मैं था. मैं hi मैं सोच लिया था मैंने की छोडूंगा नहीं जिसकी वजह से उन्होंने ये कदम उठाया है.
मैं:- क्या हुआ था उनके साथ कुछ पता चला, कोई लेटर वगैरह.
विवेक ने मेरी तरफ देखा तो उसकी भी फट गयी क्युकी मेरी आवाज़ hi ऐसी हो गयी थी, गुस्सा आँखों मैं साफ़ झलक रहा था.
विवेक:- देख गुस्सा न कर एक अभी तू ठीक नहीं है, और दीदी ने लेटर दिया था आखिरी सास लेते हुए और बोली थी की सबसे पहले ये लेटर टी पढ़े.
उसने अपनी जेब से लेटर निकल के दिया मुझे.
मैंने लेटर खोला और पढ़ना स्टार्ट किया
लेटर:-
- एक जब तुम ये लेटर पढोगे तब तक मैं तुमसे बहुत दूर जा चुकी होउंगी, मुझे पता है मैं बहुत गलत कदम उठा रही हु लेकिन करती भी क्या और कोई रास्ता hi नहीं छोड़ा था उनलोगो ने मेरे लिए. कॉलेज मैं 2 भाई है उनकी नज़र मुझपे थी फ्रेशर पार्टी वाले दिन उन्होंने एक लड़की की हेल्प से मेरे नुदे पिक्स ले लिए ड्रेस चेंज करवाने के बहाने और अब वो फ़ोन करके रोज़ धमकी देते थे की या तो उनकी रखैल बन जाओ या वो लोग मेरा रपे करके मार देंगे. पर मैं अपने दमन पे दाग नहीं लगने दे सकती थी और तुम लोगो के बता के तुमको खतरे मैं नहीं दाल सकती थी, इसलिए मैंने खुद ख़तम करना hi सही समझा. जब तक तू इसे पढ़ेगा मैं बहुत होउंगी इसलिए अपना और विवेक का ख्याल रखना वो तेरे जितना हिम्मतवाला नहीं है. तुम दोनों की प्यारी दीदी- अंजलि.
मैंने लेटर को मुठी में भींच लिया और आँखे बंद कर ली और आँखे बंद होते hi एक बूँद आंसू मेरे गाल से तैरते हुए निचे जा गिरा, लेकिन ये वक़्त रोने का नहीं था इसलिए खुद को मजबूत कर लिए मैंने.
मैं:- पुलिस क्या कर रही है, कुछ पता किया उन्होंने और मुश्किल नहीं है पता करना, बता क्या कहा पुलिस ने.
विवेक:- कुछ नहीं किया है उन्होंने बस ताल देते है हमे कुछ न कुछ बोलके और डरते है की सामने वाले बहुत बड़े लोग है इसलिए दूर रहो नहीं तो फास जाओगे.
मैं:- फ़क पुलिस! कल से उन दोनों लड़को की जनम कुंडली चाहिए मुझे और उस लड़की की भी, मुझे नहीं पता तू कैसे करेगा कब करेगा, लेकिन पता कर वो कोण है क्या करते है, कहा रहते है, कहा जाते सब कुछ. मैं जब अपने पैरो पे खड़ा होऊंगा तो बहुत से लोग अपने घुटनो पे आने वाले है.
विवेक ने कुछ नहीं बोलै और हां में मुंडी हिल्ला दी बस.
मैं:- डॉक्टर को बुला,
विवेक:- अभी
मैं:- ी साइड अभी
विवेक हैरानी से मुझे देखता हुआ बहार निकल गया उसे हैरानी इस बात की थी की मैंने आज तक उससे ऐसे बात नहीं की है, लेकिन वो समझ रहा था की मैं गुस्से में हु.
विवेक जाते hi मैं खुद से बोलै.
मैं:- ी प्रॉमिस यू दी, ी विल किल एच एंड एव्री फूकिंग पर्सन जिसकी वजह से तुम दूर हुयी हो, कुत्तो की मौत मारूंगा सबको यमदूत भी बॉडी देख के घबरा जायेंगे उनकी. दुनिया मेरे कदमो में होगी.
मैंने खुद से ये बोलै hi था की तभी विवेक अंदर आया एक लेडी डॉक्टर के साथ, वैसे अगर मैं नार्मल होता तो लट्टू हो जाता इस डॉक्टर पे लेकिन अभी गुस्सा था मेरे अंदर.
डॉक्टर:- कैसा फील कर रहे हो अब?
मैं:- बाद अस हेलल, काम की बात करे मेरी करंट पोजीशन बताओ बॉडी की और फुल रिकवरी कितनी दिन में हो जाएगी और डिस्चार्ज कब होगा.
डॉक्टर:- वेल तुम्हारी 25% रिब्स अभी भी डैमेज घुटने और कन्धा ठीक हो चूका है लेकिन अभी तुम ज्यादा उसे नहीं कर सकते, मैं दिक्कत है तुम्हारे सर में, उस रोड का नुकीला हिस्से ने तुम्हारी ब्रेन की एक सेल को डिस्ट्रॉय कर दिया है तो ये बहुत ख़राब बात है.
मैं:- कुछ ख़राब नहीं है एक नस से कुछ नहीं होता.
डॉक्टर इस बात पे है दी.
डॉक्टर:- ये कोई मामूली बात नहीं है MR.AK, अब तुम्हारा एडिक्शन लेवल इनक्रीस होगा और अब तुम्हे जिस चीज़ का एडिक्शन होगा अगर वो नहीं मिला तो पागल हो जाओगे, काम मिला तो पागल हो जाओगे, पागल हो जाओगे मतलब डेंजरस हो जाओगे तुम.
ोकक थिस इस बाद, वैरी बाद लेकिन कोई नहीं एक इंजरी नहीं रोक सकती मुझे कुछ करने से.
मैं:- ोकक डिस्चार्ज कब होगा.
डॉक्टर कल हो जायेगा तुम ठीक हो अब बस रिकवर होना है जो घर पे हो जाओगे तुम.
वो डॉक्टर गयी तो देखा मैंने मेरे दादा उठ चुके थे और वो शकल से बहुत ज्यादा उदास लग रहे थे उन्होंने एक बार मेरी तरफ देखा और फिर बहार निकल गए, मतलब बुढऊ गुस्सा है मुझसे और मेरा बाप कहा है वो नहीं आया.
खैर इन सब की आदत पद चुकी थी मुझे.
ये सब सोचते सोचते पता नहीं कब आँख लग गयी मेरी, और जब आँख खुली तो chahl-pehel की आवाज़ आ रही थी मतलब सुबह हो चुकी,
मुझे उठा देखके विवेक मेरे पास आया और मुझे फ्रेश करवाय और व्हील चेयर पे बिठाया डॉक्टर ने कुछ चेकउप किये छोटे मोठे और फिर मुझे रिहा किया इस जेल रुपी हॉस्पिटल से. यहाँ से जाते हुए लग रहा था की बहुत बार आऊंगा यहाँ तो.
खैर मुझे एक कार में बिठाया गया पता नहीं किसकी थी लेकिन मुझे क्या हो किसी की भी कुछ देर की ड्राइविंग के बाद हम घर पहुंचे लेकिन रस्ते भर मैं सोच रहा था की कैसा बाप है आया नहीं मिलने एक बार भी.
खैर हम घर पहुंचे तो मुझे झटका लगा क्युकी हॉल के सोफे पे एक औरत बैठी थी होगी कोई 30 साल की और उसके पास एक लड़का था छोटा, खैर मैंने ध्यान न दिया और अपने रूम में चला गया विवेक के साथ.
तो बे कॉन्टिनोएड ??