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Episode No 50
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किन्ज़ा एपीआई शर्म में भीगी आवाज़ के साथ मेरे सर को सहलाती हुई बोली
किन्ज़ा -- तुझे शर्म नहीं आती बाबू. निकाह शुदा बहन के साथ ऐसी बेशर्मी करते हुए
मई -- बहुत आ रही है. सोच रहा हों. आज जितना आप के साथ किया.. तौबा कर लून. कान पकड़ कर सॉरी बोल दूँ. आइंदा ऐसी गलती करने से गुरेज़ करूँ. ऐसा सोच रहा हों. अपनी एपीआई का दिल नहीं दुख सकता था मैं
किन्ज़ा एपीआई का मोह खुल गया था मेरी बात सुनकर. मई नॉटी स्माइल से उन्हें देखने लगा
वो बुरी तरह से शर्म गई.
मई उनके होंठ चुम गया
किन्ज़ा एपीआई ने भरी सांस छोड़ी. फिर बोली -- बाबू ज़िन्दगी एक दम से कैसे इतनी हसीं हो गई है मेरी
मई -- सिर्फ आप की
किन्ज़ा -- हाँ मेरा
मई - पर यहाँ तो सब ऐसे hi कह रहे हाँ
किन्ज़ा -- मई बस अपनी बात करुँगी. मई समझती हों. मुझसे बढ़ कर कोई खुश नहीं है. मेरे अंदर बहार ठंडी मीठी हवाएं चलने लगी हाँ. हर चीज़ गुनगुनाती हुई महसूस होती है. हवा सकें भी हो तो लगता है. मेरे कानों में सरगोशियां करती हुई अटखेलियां करती हुई गुज़र रही हाँ. गुनगुनाती हुई लगने लगी हाँ जब से तुम लौट कर आये हो बाबू.. बाबू मुझे अब की ये ज़िन्दगी हमेशा की मिली ज़िन्दगी से बढ़कर हसीं और पायरी लगने लगी है. ऐसा मुझे ज़िन्दगी से कभी प्यार नहीं हुआ था बाबू
मई -- और भी तो किसी से आप बहुत प्यार करती हो न
कीज़्ना एपीआई मुझे मीठी निगाह से देख चूमती हुई बोली -- हाँ तुमसे बहुत प्यार करने लगी हों मई
मई - एक और भी है. जिससे आप मुझसे भी ज़यादा प्यार करने लगी हाँ
कीज़्ना एपीआई बड़े यकीन के साथ बोली -- ऐसा कोई नहीं है. बाबू की जगह कोई नहीं ले सकता
मई -- कहा न. एक है.. जो मेरी जगह ले चूका है
किन्ज़ा -- कह तो दिए बाबू.. कोई नहीं है. फिर भी बताव. कोण है वह
मई ऊपर हुआ और किन्ज़ा एपीआई के एक मुम्मे पकड़ कर दबा गया. किन्ज़ा एपीआई की सांस अटक गई थी.
मई -- किन्ज़ा एपीआई का जिस्म ऐसा है. जिसे मेरी किन्ज़ा एपीआई मुझसे भी ज़यादा प्यार करती हाँ.. क्यों मई गलत बोलै
और किन्ज़ा एपीआई अपने मोह पर हाथ रख गई थी. शर्माने लगी थी
ऐसे hi बोली थी -- तेरे लिए बाबू.. तेरे लिए मई अपने जिस्म से प्यार करने पर मजबूर होइ हों
मई मधुर लहजे में बोलै -- क्यों
किन्ज़ा एपीआई कनपटी हुई बोली -- क्यों कह मेरा ये जिस्म मेरे बाबू का है
मई -- वह तो आप के शोहर का है
किन्ज़ा -- मज़बूरी है.. वर्ण मई उसे तो क्या किसी को भी न देती अपना ये जिस्म. तुम कहो तो अब भी उसे इंकार कर देती हों
मई -- नहीं.. ज़माने की रीत को भी समझना पड़ता है. उसपर चलना पड़ता है
कीज़्ना -- बास यही बड़ा दुःख है. अब मुझे कोई और हाथ भी लगाए न सिवाए तुम्हारे.. दिल अभी से सोच सोच कर दुखी होने लगा है. काश मई सिर्फ तुम्हारी hi रह सकती.
मई - हाँ ऐसा होना मुमकिन नहीं है. पर क्या ग़म है आप दिल से तो मेरी hi रहेंगी न
किन्ज़ा -- बास इसी बात पर तो दिल को चैन है. वर्ण दिल हमेशा बेक़रार रहता
मई फिरसे किश करने लगा
मेरा लुंड किन्ज़ा एपीआई की फुद्दी को चूमने लगा. किश में जोश बढ़ा तो किन्ज़ा एपीआई मेरे चेहरे को थाम कर जोश के साथ किश करने लगी. कभी ऑंखें खोलती कभी बंद कर लेती.
ऐसे hi देर तक हम किश करते रहे. बातें करते रहे. मज़े करते रहे
फिर मई और किन्ज़ा एपीआई अलग हो गए
किन्ज़ा एपीआई -- यही बात तुम्हारे अंदर बहुत खास है बाबू. तुम जोश में भी होश नहीं खोते हो. तुम प्यार करते हाँ. अपना मतलब नहीं निकलते हो.
मई शरारत से बोलै -- मई कुछ समझा नहीं
मुझे घूर से देखती हुई शर्मा गई. फिर सर झुका कर बोली -- एक लगाओगी बाबू के बच्चे.. मुझे तंग मत करो
मई -- तंग नहीं करूँगा तो तंग जगह खुली कैसे हो गई
उनकी सांस शर्म से फूल गई. पीठ कर गई मेरी ऑर्डर
मई पीछे से hi हुग करता हुआ उनकी गर्दन चूमने लगा. वह कसमसाने लगी
मई -- ी लव यू एपीआई
किन्ज़ा -- ी लव यू तू बाबू
एक किश और चली. फिर मई वहां से सुल्ताना फुफु की तरह चल पड़ा
फुफु की गांड भी बड़ी मस्त थी. अब उनका भी नंबर लगाना hi होगा. वह भी अब मेरे लिए बेचैन रहने लगी थी. एक बार कहा था. उनकी गांड मारनी है मुझे.. उन्हों ने सोचने का टाइम मांग लिए था. फिर हालात ऐसे बदले.. मई दूर हो गया. वह गांड देने की सोचती hi रह गई.
अब लौट कर आया था तो पागल हो उठी थी मेरे लिए. और मैं उनसे दूर दूर रही रहता था. उन्हें खूब परेशां कर रहा था. लुत्फ़ उठा था उनके..
वो बास मुझे घूरती hi रहती थी. अब तो उनकी गांड फटनी थी. घूरना खुद hi भूलने लगती.