Incest Porn Kahani Rishta - Page 12 - SexBaba
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Incest Porn Kahani Rishta

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स्टे कनेक्टेड

थैंक्स
 
अपडेट 59

मोहनलाल ने एक बार फिर से रुचिका के होठों को चूमकर और उसकी पीठ को सेहला कर चलने के लिए कहा और खुद भी खड़ा हो गया और फिर दोनों अपने कपडे ठीक करने लगे.

रुचिका ने अपने कपडे ठीक किये और उसके बाद उसने बैग में से किट निकलकर खुद को देखा और फिर लिपिस्टिक और थोड़ा सा टच उप करने लगी तू मोहनलाल छेड़ते हुए 'कितनी बार करोगी, अब तू ये बार बार करना पड़ेगा' तू रुचिका ध्यान न देते हुए जल्दी से टच उप करके कड़ी हो गयी और चलने के लिए कहा तू मोहनलाल ने कहा 'सच्ची में चलें' तू रुचिका ने कहा 'हाँ' और चल दी.

मोहनलाल उसके पीछे जाकर उसके कन्धों पर हाथ रखकर उससे रोकते हुए 'चलने से पहले एक हुग तू बनता है' रुचिका ने मुड़कर मोहनलाल को बांहों में ले लिया तू मोहनलाल ने भी उससे अपनी बांहों ने जोर से कस्ते हुए कहा 'लव यू, जान' तू रुचिका ने भी कहा 'लव यू तू'. मोहनलाल ने ये सुना तू वो नीचे होने लगा तू उसका चेहरा रुचिका के बूब्स के बिलकुल बीच में पंहुच कर मोहनलाल की नाक रुचिका के बूब्स की लाइन पर रगड़ने लगा तू रुचिका के हाथ मोहनलाल के सर के पीछे पंहुच गए. मोहनलाल के इस तरह करने से रुचिका बहुत जयादा उत्तेजित हो गयी और उसने अपने हाथों से मोहनलाल की गर्दन पर अपनी उँगलियों से सहलाना और कुरेदना शुरू कर दिया और उसके मुंह से सिसकारियां भी निकलने लगी. रुचिका सिसकारियां निकलते हुए अपने गलों को मोहनलाल के गलों से रगड़ने लगी. दोनों hi बहुत उत्तेजित हो चुके थे. मोहनलाल अपने हाथों को रुचिका की कमर से उसके नितम्बों पर ले गया और उन्हें सहलाने लगा. मोहनलाल उत्तेजित होते hi उन्हें मसलने लगा. इधर रुचिका ने भी अपने गलों को उत्तेजना में और जयादा जोर से मोहनलाल के गलों पर धावा बोल दिया और जब कुछ कुछ जयादा रगड़ने लगी तू मोहनलाल ने उसके नितम्बों को सहलाने की जगह मसलना शुरू कर दिया और मसलते मसलते अपने हाथो को नितम्बों के नीचे लेजाकर उससे टांगों से पकड़ कर ऊपर हवा में उठा लिया और धीरे धीरे अपने चेहरे को उसके बूब्स पर रगड़ते हुए ऊपर लेजाकर उसके होठों को अपने होठों में भींच लिया जिससे रुचिका की हालत बहुत ख़राब होने लगी और उसके दिल की धड़कन बहुत जयादा बढ़ गयी और उससे लगा की उसका रकत इसके दिल se.hota हुआ नीचे उसकी योनि में जा रहा हो और उसकी योनि में छेङतियाँ जैसे चलने का अनुभव होने लगा.

रुचिका हवा में hi मोहनलाल की बांहों में थी और उसके होठों को मोहनलाल के होठों ने भींचा हुआ था, रुचिका ने उससे नीचे उतरने का इशारा किया तू वो उससे धीरे धीरे नीचे करने लगा तू रुचिका के बूब्स उसकी चाहती पर रगड़ कहते हुए नीचे जाने लगे तू मोहनलाल ने उससे नीचे तू उत्तर दिया लेकिन उसके होठों को नहीं छोड़ा तू रुचिका अपने पंजो पर कड़ी थी और मोहनलाल थोड़ा झुका हुआ था और उसके हाथों ने रुचिका की कमर को जकड़ा हुआ था. जब सांस फूलने लगी तू दोनों के होठों ने एक दूसरे के होठों को आज़ाद कर दिया.

मोहनलाल ने होंठों को तू आज़ाद कर दिया लेकिन अपने हाथों से उसकी कमर को सहलाता रहा और उससे अपने शरीर से चिपकाये हुए था की उसने फिर से उसके होठों पर कब्ज़ा कर लिया. मोहनलाल उसके होठों का रास पीटा रहा और उसकी पीठ सहलाते हुए अपने हाथों को उसके नितम्बों पर लेजाकर उन्हें सहलाने लगा तू रुचिका की हालत ख़राब होने लगी और इधर मोहनलाल का भी हॉल बुरा होने लगा. मोहनलाल का लिंग अपनी औकात में आने लगा और रुचिका ने अपनी उत्तेजना को काम करने के इरादे से अपनी योनि प्रदेश को मोहनलाल के पेट से रगड़ने लगी. अभी उसने ये शुरू किया hi था की तभी उससे मोहनलाल के लिंग का एहसास हुआ तू उसने अपने हाथों को मोहनलाल की गर्दन के पीछे से पकड़कर गर्दन को सहलाने लगी और मोहनलाल के होठों को बहुत जोर जोर से चूमना शुरू कर दिया और मोहनलाल उसके इस तरह करने से पागल हो रहा था और उसने अपने हाथ कमर से नीचे उसके नितम्बों पर लेजाकर उससे अपनी तरफ दबाने लगा तू उसके लिंग ने रुचिका के योनि प्रदेश पर प्रहार किया जिससे रुचिका सीधे चरम पर पंहुच गयी और उसकी योनि ने कॉमर्स छोड़ दिया. रुचिका ने मोहनलाल के होठों को थोड़ी देर और चूसने के बाद छोड़ दिया और लम्बी लम्बी साँसें लेने लगी. फिर मोहनलाल के चेहरे को अपने चुम्बनों से भर दिया और मोहनलाल की बांहों में झूलकर आराम करने वाली मुद्रा में आ गयी. मोहनलाल ने पूछा 'क्या हुआ' तू वो बेचारी क्या बताती उसने कहा ' कुछ नहीं' लेकिन मोहनलाल को कुछ कुछ आभास हो गया था और उसने रुचिका को कहा 'चलें' तू दोनों बांहों में बांहे डेल बहार की तरफ चल दिए. जब बहार निकलने वाले थे तू रुचिका ने कहा 'वाशरूम होकर आती हूँ' और वो मोहनलाल को वंही छोड़ कर चली गयी और जब वापिस आयी तू बहुत खुश नजर आ रही थी.

बहार आकर टैक्सी में बैठे और चुलबानी करते हुए एयरपोर्ट पर पंहुच कर फ्लाइट पकड़ कर अपने शहर पंहुच गए. एयरपोर्ट से बहार आकर कैब ली और घर पंहुचने पर संध्या ने उन्हें डिनर कराया और फिर न चाहते हुए अलग अलग कमरों में सोने चले गए.

अगले दिन सुबह सब दिंनिंग टेबल पर बैठे तू पता चला की उसके अगले दिन रुचिका का इंटरव्यू है और उसके बाद अगले 4 दिन तक लगातार अलग अलग जगहों पर इंटरव्यू हैं तू मोहनलाल ने कहा 'अपने आप चली जाएगी, मुझे काम पर भी जाना पड़ेगा नहीं तू काफी नुक्सान हो जायेगा'

संध्या 'मैं पहले भी कह चुकी हूँ, चाहे कितना भी नुक्सान हो, लेकिन आपको रुचिका के साथ जाना hi पड़ेगा'

मोहनलाल 'तुम समझती क्योँ नहीं हो, रोज रोज एक जगह जाओ, फिर वापिस आओ और अगले दिन दूसरी जगह जाओ और तुम समझती हो की आना जाना फ्री में होता है, बहुत पैसे लगते हैं'

संध्या 'तू ऐसा करो न की एक जगह से दूसरी और फिर तीसरी, ऐसे hi चले जाना जिससे पैसे भी बच जायेंगे और भाग दौड़ भी'

मोहनलाल 'वंहा पर कैसे रहेगे, रहने का खर्चा नहीं होगा क्या'

संध्या 'याद है आप कहा करते थे की दिन में काम करो और रात की ट्रैन पकड़ कर दूसरे शहर, जिससे होटल के पैसे भी बचते हैं और आराम भी मिल जाता है'

मोहनलाल 'अकेले जाने और रुचिका के साथ जाने में फरक है, अकेले तू जंहा मर्जी बैठ जाओ, सो जाओ रिजर्वेशन मिली या नहीं मिली, लेकिन रुचिका के साथ होते हुए ये संभव नहीं है'

संध्या 'मुझे नहीं पता, आपको जो करना है जैसे करना है करो, लेकिन आपको रुचिका के साथ जाना है बस, मैं इसके आगे लुच्च नहीं सुनूंगी'

रुचिका पास बैठे हुए मंद मंद मुस्करा रही थी तू उसकी माँ ने उससे कहा 'तयारी कर लो और ऐसे तयारी करना जैसे तुम 4-5 दिन के लिए जा रही हो, इनको साथ जाना hi पड़ेगा' ये कहकर संध्या किचन में चली गयी और ादिया तू सुबह hi निकल गया था, इसलिए घर पर वो तीनो hi थे और संध्या के किचन में जाने से वे दोनों वंहा रह गए. रुचिका संध्या के जाने के बाद मोहनलाल को ऐसे चिढ़ा रही थी जैसे कह रही हो 'आपकी एक नहीं चलती'

मोहनलाल उठ कर आया और रुचिका से बदला लेने के भाव से उसके गाल को सहलाकर हलके से चिकोटी काट ली और वंहा से जाने लगा तू रुचिका कुछ कहती उसका फ़ोन बज उठा.

फिर ऐसे hi सारा दिन नोक झोंक और छेद चढ़ में बीत गया और अगले दिन सुबह सुबह उन दोनों ने कैब पकड़ी और घर से सीधा एडमिशन के लिए दिल्ली में पंहुच गए क्योँकि फ्लाइट में वक़्त जयादा लगता. यंहा रुचिका का अड्मिशन बहुत अच्छे से हो गया और साडी फॉर्मलिटीज पूरी करते करते 3 बज गए. दोनों को भूख लगी हुई थी तू दोनों वंहा पर एक अच्छे से रेस्टोरेंट में प्राइवेट केबिन में बैठकर लंच करने लगे और आगे क्या करना है इस बारे में बातें कर रहे थे क्योँकि उन दोनों को अलग अलग फ़ोन आ चूका था और कल का एनिवर्सरी के फंक्शन था और उस से पहले भी बहुत सरे फंक्शन थे, जिसमे उन दोनों को खास तौर से बुलाया गया था. वंहा जाना है या नहीं इस बारे में बात कर रहे थे.

मोहनलाल 'सीधे कल शाम के फंक्शन में पंहुच जायेंगे और कोई बहाना कर देंगे'

रुचिका 'उससे अच्छा है की कोई बहाना करके जाते hi नहीं'

मोहनलाल 'बहाना तू कर सकते हैं, लेकिन क्या ये ठीक होगा, क्योँकि उनसे प्रोफेशनल और पर्सनल दोनों hi तरह के रिश्ते हैं और उन्होंने हमारी वक़्त, वक़्त पक़र बहुत मदद भी की है'

रुचिका 'तू फिर सोचना क्या है, चलते हैं'

मोहनलाल 'समस्या चलने में नहीं है बल्कि बहुत सरे लोगों के सामने हमारे रिश्ते को उजागर करने की है'

रुचिका 'तू क्या फरक पड़ेगा'

मोहनलाल 'क्या ये सही समय है, क्योँकि अभी गलती से भी तुम्हारी माँ को पता चल गया तू क्या होगा'

रुचिका 'एक न एक दिन तू पता लग्न hi है'

मोहनलाल 'मैं छह रहा था की थोड़ा वक़्त लेकर तुम्हारी माँ को कॉन्फिडेंस में लिया जाये और फिर सब को बताये'

रुचिका हंसने लगी और कहने लगी 'आप शायद खवाब देख रहे हैं, जो आप सोच रहे हैं वो कभी संभव नहीं होगा. माँ को पता लगते hi वो जीते जी मर जाएगी, इसलिए उन्हें बताने का या कॉन्फिडेंस में लेने का विचार तू भूल hi जाओ'

मोहनलाल 'तू तुम क्या चाहती हो की तुम्हे पत्नी का दर्जा कभी न मिले'

रुचिका की आँखों में नमी आ गयी एयर कहने लगी 'मुझे पता है की आप मुझसे बहुत प्यार करते हैं और आप मुझे मेरा हक़ भी देना चाहते हैं जो आज के परिवेश में संभव नहीं हैं. मैं आपके इतना कहने से hi बहुत खुश हु और आप बिलकुल चिंता न करें मैं चाहे बहार आपकी पत्नी बनकर जॉन लेकिन माँ के सामने हमरा रिश्ता वही रहेगा'

मोहनलाल 'ये बहुत आसान लगता है, लेकिन है उतना hi मुश्किल, कभी भी अनजाने में कोई ऐसी हरकत हो गयी तू तुम्हारी माँ को सब खबर हो जाएगी'. इतना hi नहीं कभी तुम और तुम्हारी माँ मेरे साथ इक्कठे हुए और किसी ऐसे शक्श ने देख लिया जो हमें पति पत्नी के रूप में जनता हुआ तू जवाब देना बहुत मुश्किल हो जायेगा'

रुचिका ने अपने हाथ मोहनलाल के हाथ पर रखकर कहा 'अब जब हमने आगे बढ़ने का सोच hi लिया है तू परेशानियों से क्या डरना. परेशानियां तो आएंगे, लेकिन अगर कुछ ऐसा हो गया तू भुगतेंगे और सामना करेंगे. माँ और मैं कभी भी आपके साथ इक्कठे नहीं जायेंगे, ये मैंने अच्छी तरह से थान लिया है, बाकि देखा जायेगा और अब दर कर नहीं बल्कि खुल कर जिंदगी जियेंगे'

मोहनलाल 'तू फिर चलने की तयारी करो और जब चलना hi है तू अच्छे से चलेंगे, मेरी बीवी फंक्शन में सबसे अच्छी दिखाई देनी चाहिए'

रुचिका ने शरमाते हुए मोहनलाल के हाथ को दबा दिया और फिर वो दोनों वंहा से निकलकर एक अच्छे से शॉपिंग काम्प्लेक्स में चले गए और सब जरुरी सामान ले लिया और रुचिका ने ब्यूटी पार्लर में अपना मेकओवर भी करवाया. जब वो बहार आयी तू पूरी तरह से दमक रही थी, मोहनलाल तू उससे देखकर अपने होश hi खोने लगा तू रुचिका ने मोहनलाल के बिलकुल पास आकर कहा 'आपकी पत्नी हु, होश खोने की जरुरत नहीं है' तू मोहनलाल ने कहा 'तुम इतनी खूबसूरत बनकर आओगी तू कोई कैसे अपने होश संभल सकता है' तब रुचिका ने रूठते हुए कहा 'हाँ मैं आपको आज hi खूबसूरत लग रही हु, वैसे तू हूँ नहीं न' तब मोहनलाल ने कहा 'जान तुम तू हमेशा से hi खूबसूरत हो, ये पुताई तू टेम्पररी है, लेकिन तुम्हे तू इन् सब की कोई जरुरत नहीं है, वो तू तुम इतनी म्हणत करके आयी हो तू सोचा थोड़ी बधाई कर देता हूँ'

उसकी बात सुनकर रुचिका और बिगड़ गयी और कहने लगी मतलब आप मेरी झूठमूठ की बधाई करते हो, वैसे तू मैं खूबसूरत हु hi नहीं न' मोहनलाल बेचारा बुरा फंसा, हाँ कह तू फंसा और न कहे तू भी फंसा, इसलिए चुप रहना hi बेहतर समझा. रुचिका ने उससे चुप देखकर कहा 'अब बात नहीं बन रही तू चुप हो गए' अब बरचरा क्या करे, यंहा तू चुप रहने पर भी फंसा. इसी तरह नोक झोंक करते हुए वंहा से चल पड़े.

मोहनलाल ने उससे बताया की उन्हें रात 2 बजे की फ्लाइट मिली है जिससे वो सुबह 4 बजे तक बॉम्बे पंहुच जायेंगे और सूरज और दिया के प्रोग्राम में वक़्त से शामिल हो जायेंगे.

इन दोनों के पास अभी 3 घंटे का समय था एयरपोर्ट जाने के लिए तू सबसे पहले वे दोनों एक रेस्टोरेंट में गए जंहा पर बहुत बढ़िया खाना मिलता था और वंहा पर डांस फ्लोर भी था तू रुचिका का मन डांस करने का होने लगा तू मोहनलाल उससे डांस फ्लोर पर ले आया. डांस फ्लोर पर दोनों एक दूसरे की बांहों में थे तू मोहनलाल रुचिका के शरीर की गंध और उस पर लगाए परफ्यूम की गंध को महसूस करके मदहोश होने लगा. इतना hi नहीं डांस करते करते रुचिका का शरीर धीरे धीरे उसके समीप आने लगा जिससे मोहनलाल उत्तेजित होने लगा और उसका हाथ जो रुचिका की कमर पर था उससे वो उसको अपनी तरफ लेन लगा और जिस हाथ में रुचिका का हाथ था वो भी मुड़कर दोनों के नजदीक आने लगा.

रुचिका का एक हाथ तू पहले से hi मोहनलाल के कंधे पर था और अब दूसरा हाथ भी मोहनलाल के हाथ से छूट कर उसके दूसरे कंधे पर पंहुच गया और उसने मोहनलाल के दोनों कन्धों पर दबाव डालती और छोड़ देती. मोहनलाल का दूसरा हाथ जो रुचिका के हाथ से छूटा था वो अब रुचिका की बाजु पर था और उससे धीरे धीरे सेहला रहा था. हलके हलके रोमांटिक म्यूजिक में दोनों डांस करते हुए घूम रहे थे. दोनों के शरीर नजदीक आना चाह रहे थे और इसी प्रक्रिया में दोनों के माथे मिल गए, ये जरूर था की मोहनलाल को झुकना पड़ा था. फिर दोनों की नाक भी मिल गए तू दोनों ने एक दूसरे की नाक को रगड़ना शुरू कर दिया जिससे दोनों उत्तेजित होने लगे. रुचिका अपने हाथों को मोहनलाल के कन्धों के पीछे से जाकर उसकी गर्दन पर अपने हाथ चलने लगी जिससे मोहनलाल भी जोश में आ गया और उसका हाथ जो रुचिका की बाजु पर था ऊपर नीचे होता हुआ जोश में आकर वो भी कमर और पेट की साइड में पंहुच गया. अब एक तरह से मोहनलाल केदोनों हाथ रुचिका की कमर पर hi आ गए थे.

दोनों नजदीक आते जा रहे थे और दोनों का रक्त परवाह बढ़ रहा था और साँसें तेज होने लगी थी. रुचिका और मोहनलाल के गाल आपस में मिलाने लगे और उधर मोहनलाल का एक हाथ रुचिका के बूब के ठीक नीचे पंहुच गया और जैसे hi रुचिका को इसका एहसास हुआ उसने मोहनलाल के गलों पर अपनी जीभ चलते हुए जल्दी से उसके चेहरे को गीला करके एकदम से उससे छोड़ दिया और लम्बी लम्बी सांसें लेती हुई डांस फ्लोर से नीचे आ गयी.

मोहनलाल भी उसको इस तरह करता देखकर डांस फ्लोर से नीचे आ गया और उसने रुचिका को पीछे से कंधे से पकड़ा और पूछा की क्या हुआ तू उसने पलके झुका ली क्योँकि उससे बहुत शर्म आ रही थी तू मोहनलाल ने कहा 'मुझे छेड़ने का मन कर गया था' तू रुचिका ने कुछ नहीं कहा बस चुप रही तू उससे समझ आ गयी की वो बहुत शर्मा गयी है तू फिर मोहनलाल ने उससे जयादा नहीं छेड़ा और खाना खाने टेबल पर आ गए. खाना कहने के बाद टैक्सी पकड़कर एयरपोर्ट पंहुच गए.
 
अपडेट 60

मोहनलाल भी उसको इस तरह करता देखकर डांस फ्लोर से नीचे आ गया और उसने रुचिका को पीछे से कंधे से पकड़ा और पूछा की क्या हुआ तू उसने पलके झुका ली क्योँकि उससे बहुत शर्म आ रही थी तू मोहनलाल ने कहा 'मुझे छेड़ने का मन कर गया था' तू रुचिका ने कुछ नहीं कहा बस चुप रही तू उससे समझ आ गयी की वो बहुत शर्मा गयी है तू फिर मोहनलाल ने उससे ज्यादा नहीं छेड़ा और खाना खाने टेबल पर आ गए. खाना कहने के बाद टैक्सी पकड़कर एयरपोर्ट पंहुच गए

मोहनलाल को उसकी यादों में छोड़कर हम चलते हैं प्रेजेंट में आदित्य और संध्या के पास

अब कहानी प्रेजेंट में

तभी थोड़ा सा शोर मचने लगा जिससे पता चल रहा था की मूवी ख़त्म होने जा रही है और तभी लाइट्स ों हो गयी तू दोनों वंहा से एक नए रिश्ते को जनम देकर बहार आ गए.

बहार आते वक़्त दोनों बहुत खुश थे और सीढ़ियों पर जब आ रहे थे तू दोनों ने हाथ पकडे हुए थे. आदित्य थोड़ा सा आगे था और संध्या पीछे थी और आदित्य को निहार रही थी. तभी संध्या अपनी धुन में थी की उसका बैलेंस बिगाड़ा और वो गिराने को हुई तू आदित्य के उस हाथ को झटका लग जिस हाथ ने संध्या का हाथ पकड़ा हुआ था. आदित्य ने उसको गिराने से बचने के लिए अपना बैलेंस बनाते हुए अपनी तरफ खींच कर पकड़ लिया और अनजाने में उसका दूसरा हाथ संध्या की बांयी चुकी पर पड़ा तू उससे ऐसे लगा जैसे की उसका हाथ रुई के नरम नरम गोले पर पड़ा हो, उससे झटका लगा और वो जैसे hi उससे इस बात का एहसास हुआ तू उसने हाथ हटाना चाहा, लेकिन ऐसा करते hi संध्या फिर से गिराने लगी तू आदित्य ने फिर से उससे पकड़ लिया. संध्या को जब इस बात का एहसास हुआ पहले तू उससे समझ नहीं आया लेकिन उससे करंट लगा, लेकिन जब दुबारा आदित्य ने उससे पकड़ लिया तू संध्या ने कहा 'ये क्या कर रहा है'

आदित्य 'आपको बचा रहा हूँ'

संध्या 'शर्म नहीं आती कोई इस तरह से पकड़ता है'

आदित्य 'मतलब'

संध्या 'मैं तुम्हारी माँ हूँ और कोई अपनी माँ की छाती को इस तरह पकड़ता है क्या?'

आदित्य 'मैंने तू आपको बचने के लिए अनजाने में वंहा पकड़ लिया, कोई जानभूझकर नहीं पकड़ा'

संध्या 'मैं सब समझती हूँ तुमने जानबूझकर मुझे यहाँ पकड़ा है'

आदित्य संध्या को इस तरह देखने लगा की उससे क्या हो गया तू उसने कहा 'अगर आपको बुरा लगा है तू ी ऍम सॉरी लेकिन मैंने आपको जानबूझकर नहीं पकड़ा था' उसके बाद उसने संध्या को अच्छे से पकड़कर उससे सीधा कर दिया और फिर बिना कोई बात किये वंहा से निकलकर पार्किंग में आ गया. संध्या उसके पीछे पीछे पार्किंग में आ गयी थी और आदित्य वंहा उसका वेट कर रहा था.

वो जैसे hi आयी तू उसने आदित्य से कहा 'मुझे छोड़कर अकेले आ गए'

आदित्य उसकी बात को अनसुना करके 'बैठए'

संध्या बाइक पर बैठ गयी और वो आदित्य से चिपक कर बैठने लगी तू आदित्य थोड़ा आगे हो गया तू संध्या को समझ आ गया की आदित्य उससे नाराज हो गया है. उससे आदित्य के नाराज होने से बुरा लगने लगा और उसने सोचा की आदित्य को मानना चाहिए.

संध्या 'मुझसे नाराज हो क्या?'

आदित्य 'मैं आप से नाराज कैसे हो सकता हूँ'

संध्या 'मुझे फिर से आप बोल रहे हो'

आदित्य 'माँ, आपको आप hi तो बोलूंगा'

संध्या 'मैं माँ नहीं तुम्हारी गर्लफ्रेंड हूँ'

आदित्य 'आप क्या बोल रही है, अभी थोड़ी देर पहले आपने खुद hi तो कहा था की मैं तुम्हारी माँ हूँ'

संध्या 'मैं वह बेख्याली में बोल रही थी, मुझे बाद में रीलीज़ हुआ की मैं गलती से बोल गई हूँ'

आदित्य 'माँ आपने गलती से नहीं बल्कि हकीकत बयान की थी, जो हमारे रिश्ते का प्राकृतिक सच है वह आपकी जुबान पैर आ गया था तू इसमें गलती कान्हा हुई'

संध्या 'लेकिन उस से भी बड़ा सच ये है की मैं तुमसे प्यार करने लगी हु'

आदित्य 'इसमें कोई बड़ी बात नहीं है, हर माँ अपने बेटे से प्यार करती है'

संध्या 'मैं माँ बेटे वाले प्यार की बात नहीं कर रही हु, बल्कि एक मर्द और औरत वाले प्यार की बात कर रही हूँ'

आदित्य 'माँ, आप न बस रहने दीजिये, आप सिर्फ और सिर्फ मुझे बेहला कर मुझे फिर से दुविधा में दाल रही हैं और मैं आपके झांसे में आकर फिर से नहीं फसना चाहता'

संध्या 'मैं तुम्हे कैसे दुविधा में दाल सकती हूँ जबकि अब मुझे सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा hi सहारा है'

आदित्य 'आप मुझे फ़साने की कोशिश न hi करें तू बेहतर होगा. हाँ मैं आपसे पहले भी वादा कर चूका हु की मैं आपको किसी कीमत पर अकेला नहीं छोडूंगा, और मैं अपने वाडे को बहुत अच्छे से निभाना जनता हूँ'

संध्या 'मैं तुमसे बहुत प्यार करने लगी हूँ'

आदित्य 'अगर आप मुझसे इसलिए प्यार करने लगी हैं की मैं आपको छोड़ न दूँ तो आप जान लो की मैं आपको कभी नहीं छोडूंगा चाहे आप मुझे प्यार करें या न करें'

संध्या कुछ कहती उससे पहले वो घर पहुँच चुके थे और आदित्य ने कहा 'माँ आप उतरिये, हम घर पहुँच चुके हैं'

घर के अंदर आकर आदित्य अपने कमरे में जाने लगा तो संध्या ने उसे पीछे से पकड़ कर अपनी बाजुओं को उसकी छाती पैर ले गई और अपने चेहरे को आदित्य के कंधे पर रख कर कहने लगी 'अपनी गर्लफ्रेंड को माफ़ कर दो, आगे से ऐसी गलती नहीं होगी'

आदित्य को अपनी पीठ पैर अपनी माँ की चूचियां महसूस हो रही थी, साथ hi अपनी माँ के शरीर की गर्मी भी फील हो रही थी तू उसका मन डावांडोल होने लगा. उसने एक बार सोचा की अपनी माँ के हाथ को पकड़ कर आगे से खींचे ताकि अच्छे से उसकी चूचियों का अपनी पीठ पर मजा लेले और फिर उसको आगे करके अपनी छाती में बीच ले और उसके होठों पैर अपने होंठ रखकर उसका रसपान करें, लेकिन उससे सिनेमा हॉल से बहार आते वक़्त जो हुआ था यद् आने लगा. उसने अपने मन को पक्का किया और और अपनी माँ को कहने लगा 'माँ प्लीज आप ऐसा न करें, नहीं तू मुझसे कोई गुस्ताखी हो जाएगी, इसलिए बेहतर होगा की आप मुझे जाने दे'

संध्या 'मुझसे नाराज तू नहीं हो न'

आदित्य 'मैं आपसे बिलकुल भी नाराज नहीं हु माँ'

संध्या 'मैं गर्लफ्रेंड हु'

आदित्य 'ठीक है आप माँ भी हो और गर्लफ्रेंड भी'

संध्या 'नहीं सिर्फ गर्लफ्रेंड'

आदित्य 'वो तू हो नहीं सकता क्युओंकी आपके अंदर की माँ कभी भी आपको पूरी तरह से पुरे तरीके से गर्लफ्रेंड बनने नहीं देगी'

संध्या 'मैं बनकर दिखाउंगी'

आदित्य 'ठीक है आप कुछ वक़्त तक माँ hi बने रहिये और जब आपको लगे की आप पूरी तरह से गर्लफ्रेंड बनने के लिए तैयार हैं तब बात करेंगे'

संध्या 'तब तक गर्लफ्रेंड बिलकुल नहीं'

आदित्य 'तब तक माँ छुम गर्लफ्रेंड, ठीक है'

ये बोलकर आदित्य अपने कमरे में आ गया, उसका दिमाग़ भैया हुआ था क्योंकि उसने कोई जानभूझकर तू माँ की चूचियों को पकड़ा नहीं था. अगर पकड़ा भी होता तू क्या हो जाता, एक तरफ तू ये कह रही थी की आजकल की गर्लफ्रेंड बनना है और थोड़ी देर में hi माँ बन जाती है, लेकिन वो कर भी क्या सकता था. वो अपने रिश्ते के बारे में सोचने लगा तू उसका दिमाग बिलकुल भी काम नहीं कर रहा था और बीएड पर लेत गया और सोच सोच कर कब वो नींद के आगोश में चला गया पता hi नहीं चला.

उधर संध्या अपने कमरे में आकर सोचने लगी की शायद उसने गलती कर दी, लेकिन वो क्या करती उसके अंदर की माँ जग गयी थी. वो जाकर अपने कपडे बदल कर एक बिना बाजु की पतले से स्ट्राप वाली निघ्त्य पहनकर आ गयी और बीएड पर लेत कर आदित्य के साथ रिश्ते को लेकर सोचने लगी की आगे क्या करना है. उससे सिनेमा हॉल के दृश्य नज़र आने लगे और उन पालो को याद करके मन hi मन खुश होने लगी, लेकिन फिर उससे आदित्य का नाराज होना भी याद आने लगा तू वो सोचती रही की कैसे आदित्य को मनाएगी और उससे फिर से अपना बॉयफ्रेंड बनाएगी. उसने प्राण किया की चाहे कुछ भी हो आदित्य को वो अपना बॉयफ्रेंड बनाकर hi रहेगी.

रात को संध्या बीएड पर सो रही थी की आदित्य आया और आकर संध्या (जो एक साइड को सी रही थी) को पीछे से हुग करके उसके नंगे कंधे पर अपने होठों का स्पर्श करके बोलै 'क्या जान अकेले अकेले सो गयी' तू संध्या ने कोई जवाब नहीं दिया, तब आदित्य ने अपने होठों को उसके नंगे कंधे पर चलना शुरू कर दिया और बिच बिच में उसकी गर्दन पर भी ले जाने लगा तू संध्या कुनमुनाई और कुनमुनाते हुए कहा 'क्या है सोने दो न' तू आदित्य बोलै 'इतनी ब्यूटीफुल और सेक्सी जान के साथ भी कोई बिना प्यार किया सो सकता है'

संध्या 'क्या बोलै सेक्सी'

आदित्य 'जान आपको क्या मालूम की ऊपर से लेकर नीचे तक आप सेक्स की देवी हो'

संध्या 'फिर से आप बोलै'

आदित्य 'अब इस सब के चाकर में न पदों और आ जाओ प्यार की वादियों में खो जाओ'

संध्या भी उसका पैशन देखकर मचल उठी थी और कहने लगी" ी लव यू आदित्य, मैं भी तुम्हारे प्यार की प्यासी हु और मेरी प्यास बुझा दो"

आदित्य 'ी लव यू तू, आज मैं प्यार करूँगा और आपको आपको प्यार के सागर में लेकर चलता हु, बे रेडी' इतना कहकर उसने संध्या को पलटकर अपनी तरफ कर लिया और उससे निहारने लगा तू संध्या शरमाते हुए कहने लगी 'क्या देख रहे हो'

आदित्य ने अपने हाथों को उसके चेहरे पर रखकर कहा 'ी ऍम लकी तो बे विथ सुच ा ब्यूटीफुल लेडी' संध्या उसकी बात सुनकर और शर्मा गयी और पलके झुका ली तू आदित्य ने अपने होठों को संध्या के होठों की तरफ लाया और बिना कुछ किये उसके होठों के बिलकुल पास लेकर उससे देखता रहा. इतने नजदीक आने से उसकी गरम गरम साँसें संध्या के चेहरे पर हलचल मचा रही थी और उससे बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था. संध्या ने अपनी पलकों को ऊपर किया और आदित्य को देखने लगी तू आदित्य के चेहरे पर मुस्कुरहट आ गयी.

संध्या के होंठ खुद बखुद आदित्य के होठों की तरफ खींचने लगे शायद ये अंदाजा नहीं था की दोनों के होठों के बीच कितनी काम दुरी बची थी. दोनों एक दूसरे की आँखों में अपने लिए उमड़ रहे प्यार को महसूस करने में व्यस्त थे, जब दोनों के होंठ आपस में टकराये तो आँखों के बीच हो रही guft-gu बंद हो गयी. उनके होंठ मिलने के बाद एक दूसरे से ऐसे hi थोड़ी देर सटे रहे. दोनों में से किसी ने उस वक्त कोई हरकत नहीं की.

"सीढ़ी हो जाओ" आदित्य ने सरसराती आवाज में कहा. उसके होंठ अभी भी संध्या के होठो को स्पर्श कर रहे थे.

संध्या होठो को हटाए बिना सीधी होकर लेत गयी.

आदित्य ने अपने हाथ से उसकी कमर में हाथ डालकर उससे अपने ऊपर कर लिए. संध्या ने अपना सर आदित्य के कंधे पर रखकर अपनी आँखे बंद कर ली थी. आदित्य के हाथ संध्या के शरीर को सहलाने लगे. उनके होंठ जो अब तक शिथिल पड़े हुए थे वो एक दूसरे को चूसने लगे.

आदित्य को कुछ खबर नहीं थी की वो क्या कर रहा है. उसके अपने होंठ कहा ख़त्म हुए और कहा से संध्या के होठ शुरू हुए कुछ पता नहीं लग रहा था, शायद दो जिस्म एक जान होना इसे hi कहते है.

आदित्य के हाथ संध्या के पेट को सहलाते हुए उसके मम्मो तक जा पंहुचा जिससे छूटे hi संध्या किश में hi सिहर उठी. आदित्य ने यौवन की उन गोलाईओ को हलके हलके से सराहा.

अब तक संध्या ने अपनी और से कोई पहल नहीं की थी. पर वो भी भावनाओ के गहरे सागर में गोते खाने लगी थी. उसे आदित्य के हाथो और होठों ने मदमस्त कर दिया था. उसके अलावा आदित्य का लिंग जो उसकी टांगों के बीच तना हुआ था. अब उसने भी लाज शर्म टाक पर रखते हुए आदित्य के लिंग पर खुद को आगे पीछे करना शुरू कर दिया था. अब वो छह कर भी नहीं रुक सकती थी. उसकी टांगो के बीच एक अजीब सी खुजली हो रही थी जो आदित्य के लिंग की चुभन से hi लगी थी और शांत भी उसी वजह से हो रही थी.

संध्या की हरकतों से आदित्य को एक सुखद आश्चर्य हुआ. उसने संध्या की हरकत का जवाब उसकी चूचियों को कपड़ो के ऊपर से मसलकर दिया. संध्या तड़प कर रह गयी.

आदित्य अपने हाथ नीचे लेजाकर संध्या की ड्रेस को ऊपर करने लगा. संध्या की तरफ से कोई विरोध न आने पर उसने ड्रेस को उसकी कमर तक चढ़ा दिया. संध्या ने निघ्त्य पहन राखी थी जिसके पीछे से ज़िप थी. आदित्य ने उससे अपने ऊपर कर्क अपने हाथ को पीछे उसकी पीठ पर लेजाकर उसकी ड्रेस की ज़िप को खोल दिया और उसके अंदर हाथ डालकर ब्रा का हुक भी खोल दिया और अब ड्रेस को ऊपर की और करनाने लगा. संध्या ने आदित्य की सहूलियत के लिए अपनी ड्रेस को थोड़ा और ऊपर कर दिया और आदित्य ने उसकी ड्रेस को उसके हाथों को ऊपर करके अलग कर दिया. अब संध्या सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी. ब्रा का हुक तू आदित्य पहले hi खोल चूका था. आदित्य ने अपने हाथों को बढाकर उसकी गर्दन पर ले गया और वंहा से धीरे धीरे ब्रा को संध्या के शरीर से अलग कर दिया तू आदित्य उसकी चूचियों को देखकर पागल होने लगा और वो उन्हें अपने हाथों से मसलने लगा तू संध्या को दर्द होने लगा तू उसने आदित्य को अपनी छथि से भींच लिया जिससे उसके हाथ चूचियों पर न पंहुचे और उसने आदित्य के होठों को अपने होठों में कैद ार लिया.

आदित्य ने किश को जारी रखते हुए अपने दोनों हाथो से उसकी कमर पर अपने हाथों से मसलने लगा और बिच बिच में अपने हाथों को उसके नितम्बों पर भी ले जा रहा था और उन्हें सहलाने और मसलने लगता. इन सबसे संध्या की हालत ख़राब होने लगी और वो सिसकारियां ले रही थी और अपने शरीर को आदित्य के शरीर से रगड़ रही थी और अपनी टैंगो को आदित्य की टांगों पर डालकर अपने योनि प्रदेश को उसके लिंग पर रगड़ने लगी. दोनों से hi बर्दाश्त होना मुश्किल हो रहा था.

आदित्य ने अपने हाथ को संद्य के योनि प्रदेश पर लेजाकर अपनी उंगलिया वंहा जैसे hi चलनी शुरू की तू संध्या की हालत ख़राब होने लगी. आदित्य की एक उंगली ने संध्या के क्लीट पर पैंटी के ऊपर से जैसे hi स्पर्श किया तू वो उछाल पड़ी और उस दाने को रगड़ते hi संध्या बिना पानी की मछली की तरह छटपटाने लगी. अगर वो किश नहीं कर रही होती तो जोर से कराह उठती. जैसे जैसे आदित्य उसके क्लीट पर उंगली फिरने लगा तू संध्या तड़पते हुए आदित्य के होठों को काटने लगी और फिर वो पल आया जब वो झाड़ गयी और लम्बी लम्बी सांसे लेने लगी.

अगले hi पल आदित्य का लिंग उसकी योनि को पैंटी के ऊपर से hi रगड़ रहा था और वो भी अपनी उत्तेजना को काबू में न रख पाया और झड़ने लगा. दोनों एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे. संध्या हलके से मुस्करायी और आदित्य ने उसकी पैंटी में उंगली डालकर उतरनी चाही तू संध्या ने उसके हाथ को पकड़ते हुए जोर से चीखी 'नहीं'
 
थैंक्स फॉर टेकिंग आउट टाइम एंड प्रोवाइडिंग डिटेल्ड रिव्यु.

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थैंक्स
 
अपडेट 61

अगले hi पल आदित्य का लिंग उसकी योनि को पैंटी के ऊपर से hi रगड़ रहा था और वो भी अपनी उत्तेजना को काबू में न रख पाया और झड़ने लगा. दोनों एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे. संध्या हलके से मुस्करायी और आदित्य ने उसकी पैंटी में उंगली डालकर उतरनी चाही तू संध्या ने उसके हाथ को पकड़ते हुए जोर से चीखी 'नहीं'

उस चीख के साथ hi संध्या की नींद खुल गयी और उसने अपने आसपास देखा की आदित्य कान्हा है तू उससे आदित्य कहीं भी दिखाई नहीं दिया और फिर उसने अपने आप को देखा तू उसने कपडे पहने हुए थे. हाँ, जब उसका हाथ उसकी योनि पर गया तू उससे अपनी पैंटी पूरी गीली लगी तू उससे समझ आया की उसने ये सब सपने में देखा है और उस सपने की वजह से hi पेंटी गीली हो गई है.

अभी वह यह सोच hi रही थी की आदित्य ने दूर पर नॉक करते हुए कह रहा था 'क्या हुआ..... क्या हुआ.... दरवाजा खोलो'

संध्या बेचारी सोच में पद गयी की उसको क्या जवाब दूँ, लेकिन उसने जल्दी से बोलै 'अभी खोलती हूँ' उसने दरवाज़ा खोला तू आदित्य ने पूछा क्या हुआ तू संध्या आदित्य के गले लग गयी और कहने लगी 'मैंने बहुत बुरा सपना देखा और दर गयी'

आदित्य 'क्या माँ आप भी न इतनी बड़ी होने पर भी आपको दर लगता है'

संध्या 'दर पर किसी का जोर थोड़ी न चलता है, वैसे भी सपने में कुछ पता hi नहीं चलता की क्या हो गया है'

आदित्य ने खड़े खड़े hi पूछा 'की ऐसा आपने क्या देख लिया जो इतनी जोर से चीखी'

संध्या उससे क्या जवाब देती की उसने क्या देखा है, लेकिन उसने प्रत्यक्ष में कहा 'वो मैंने देखा..... मैंने देखा..... मैंने देखा... '

आदित्य 'क्या देखा'

संध्या 'वो मैंने देखा.... की तुम भी मुझे छोड़ कर चले गए हो और मैं बिलकुल अकेली रह गयी हूँ'. ये कहकर वो सुबकने लगी तू आदित्य अपने हाथ को उसकी पीठ पर ले जाकर उससे सहलाते हुए 'क्या माँ आप भी न, देखो मैं कहीं नहीं गया हूँ, यही पर हूँ और अब आप बिना डरे सो जाइये.

संध्या ने अपने हाथों को आदित्य की कमर पर लेजाकर अपने से कसकर कहने लगी 'नहीं, नहीं मुझे अकेला छोड़ कर न जाओ'

आदित्य 'मैं आपको अकेला छोड़ कर कहीं नहीं जा रहा, मैं सिर्फ अपने कमरे में जा रहा हूँ, आप सो जाइये'

संध्या ने आदित्य को छोड़ा hi नहीं और कहने लगी 'मुझे यंहा अकेले दर लगेगा, तुम भी यही सो जाओ न'

आदित्य 'माँ, ये आप की कह रही हैं' और इतना कहकर आदित्य ने अपने हाथों से उसके होठों को अपनी कमर से हटाया और कहा 'आप सो जाइये, मुझे काम करना है और अगर आपको कोई तकलीफ हो तू मुझे बुला लेना'

संध्या 'तकलीफ में तू मुझे छोड़ कर जा रहे हो और कहते हो की बुला लेना'

आदित्य 'मैं अपने कमरे तक hi तू जा रहा हूँ और अगर आपको कोई तकलीफ है तू मुझे बताओ मैं दूर करने की कोशिश करूँगा'

संध्या 'कह तू रही हूँ की यही सो जाओ'

आदित्य 'ये तकलीफ थोड़ी न है, ये तू आप जबरदस्ती मुझे रोकना छह रही हैं. अगर आप ऐसे करोगी तू न तू मैं कोई काम कर पाउँगा और न hi आप अपनी पढाई पूरी कर पाओगी'

संध्या 'बस इसी तरह बहाना बना कर मुझसे दूर जाने की कोशिश कर रहे हो'

आदित्य 'आप समझती क्योँ नहीं हैं, मुझे काम भी करने हैं. आपको कैसे बताऊँ की सिर्फ तीन घंटे सोकर मैं उठकर उस काम को करने लगा जिसके पैसे एडवांस लिए हैं और आप कह रही है की मैं आपको छोड़ कर जा रहा हूँ. आप बात को समझो और सो जाओ, मुझे अभी बहुत काम करना है'

संध्या 'मुझे दर की वजह से अभी यंहा नींद नहीं आएगी, ऐसा करते हैं की मैं तुम्हारे लिए कॉफ़ी और कुछ स्नैक्स बना लती हूँ, फिर तुम काम करते रहना, मैं तुम्हारे कमरे में बैठ जाउंगी'

आदित्य जब से आया था तू उसने अपनी माँ को ध्यान से नहीं देखा था, उसकी बात सुनकर आदित्य को भी लगा की कॉफ़ी मिल जाये तू अच्छा होगा, उसने अपनी माँ की तरफ ध्यान से देखा की उसने जो निघ्त्य पहनी हुई थी उसमे से संध्या की चूचियों का बड़ा हिस्सा उजागर हो रहा ष्ठा और उससे देखते hi आदित्य के दिल में हलचल मचने लगी और उसने अपनी माँ की बात मानते हुए कहा 'ठीक है जैसा आपको ठीक लगे' और आदित्य अपने कमरे में आ गया.

आदित्य जब अपने कमरे में आया तू उसके दिमाग़ में अपनी माँ की चूचियां आ गयी. वो चूचियां आदित्य को इतनी अच्छी लगती थी की वो उनको देखकर सब भूल जाता था. उससे अपनी माँ पर गुस्सा तू आया हुआ था लेकिन इन चूचियों के दर्शन करके वो गुस्सा माँ की तरह पिघलने लगा था और सोच रहा था की कोई बात नहीं चाहे वो उसकी माँ है लेकिन बनना तू गर्लफ्रेंड hi चाहती है न और धीरे धीरे वो उसके हिसाब से भी चलने लगेगी. उसको अगर थोड़ा वक़्त दिया जाये तू उसके दिमाग़ से माँ हैट जाएगी और गर्लफ्रेंड उस माँ का स्थान ले लेगी. आदित्य तू अपनी माँ का दीवाना हो hi चूका था, इसलिए वो उससे गुस्सा होते हुए भी कुछ नहीं कहता था. अब उसका मन काम पर नहीं लग रहा था. उसके काम करने की ले भांग हो चुकी थी, अब तू उससे अपनी माँ hi माँ दिखाई दे रही थी और उसका मन कर रहा था की सब कुछ छोड़ कर किचन में जाये और माँ को पकड़ ले, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और दिखने के लिए लैपटॉप ों कर के बैठ गया, लेकिन मन में अपनी माँ की चूचियां घूम रही थी और वो ख्यालों में hi उनसे खेल रहा था.

उधर संध्या आदित्य के जाने के बाद बाथरूम में गयी और सबसे पहले अपनी पैंटी उतारकर अच्छे से अपनी योनि को साफ़ किया और नै पैंटी पहन ली. फिर उसने अपने आप को फ्रेश किया और फेस वाश करके अपने आप को थोड़ा ठीक ठाक किया और शीशे में अपने आप को निहारने के बाद वो किचन में चली गयी. किचन में उसने कॉफ़ी बनाने के लिए गैस पर एक बर्नर पर बर्तन रखा और दूसरे बर्नर पर सैंडविच बनाने लगी, लेकिन उसका धयान तू आदित्य में लगा हुआ था. किसी तरह सैंडविच बनाने के बाद उसने जैसे hi कॉफ़ी का बर्तन उठाने लगी तू बेख्याली में उसका हाथ हैंडल की बजाये बर्तन पर लग गया जिससे उसका हाथ जल गया और वो जोर से चीखी.

आदित्य जो अपनी माँ के ख्यालों में खोया हुआ था चीख सुनकर हड़बड़ा गया और किचन की तरफ भगा तू उसने देखा की उसकी माँ ने एक हाथ से दूसरे हाथ को पकड़ रखा है और वो जोर जोर से सिसक रही थी तू आदित्य ने पूछा की क्या हु तू उसने सिसकते हुए बताया की 'जल गया है.'

आदित्य जल्दी से उससे पकड़ कर पानी के नल के पास ले गया और नल चला कर उसके नीचे अपनी माँ का जले हुए हाथ को कर दिया. पानी के नीचे हाथ रखने से संध्या को थोड़ा आराम मिल रहा था. आदित्य संध्या के बिलकुल पीछे खड़ा था जिससे दोनों के शरीर आपस में मिले हुए थे. आदित्य उसके शरीर से उठाने वाली गंध से उत्तेजित होने लगा और उसका लिंग अपनी औकात में आने लगा. उससे लगा की उसके लिंग का एहसास उसकी माँ को न हो जाये इसलिए वो वंहा से थोड़ा पीछे हो गया.

आदित्य ने एक बर्तन में पानी भरा और उसमे आइस कुबेस दाल दिए और फिर उसमे संध्या के जले हुए हाथ को दाल दिया. संध्या को इस ठन्डे पानी में जयादा आराम मिलने लगा तू आदित्य उस बर्तन को उठाकर संध्या को साथ लेकर अपने रूम पर ले आया और चेयर पर बैठा दिया और बर्तन को टेबल पर रख दिया जिसमे उसका हाथ था. हाथ को बर्तन में डेल रखने के लिए उससे आगे झुकना पद रहा था जिससे सामने बैठे आदित्य को उसकी चूचियों की पूरी झलक मिल रही थी. चूचियों के बीच की घाटी भी पूरी दिखाई पद रही थी और ऊपर से संध्या ने ब्रा भी नहीं पहनी हुई थी. आदित्य तू इस नज़ारे को देख कर बहुत जयादा उत्तेजित हो रहा था. संध्या अगर थोड़ा सा और झुकती तू आदित्य को उसकी चूचियों के निप्पल भी दिखाई दे जाते. आदित्य जो पहले सी हो उत्तेजित था, इस नज़ारे को देखकर उसकी उत्तेजना बहुत जयादा बढ़ गयी थी और उसका रक्त िकखाथा होकर उसके लिंग की तरफ जाने लगा जिससे उसके लिंग का तनाव काफी जयादा बढ़ गया था. आदित्य ने इस वक़्त एक ट्रॉउज़र पहना हुआ था जिसमे उसके लिंग का तनाव साफ़ साफ़ देखा जा सकता था. उसके लिंग का तनाव इसलिए भी कुछ जयादा नज़र आ रहा था क्योँकि उसने ट्रॉउज़र के नीचे अंडरवियर नहीं पहना हुआ था. सिर्फ गनीमत यह थी की उसका ट्रॉउज़र डार्क कलर का था जिसकी वजह से उस पर नज़र कुछ काम पड़ती है, लेकिन तनाव को छुपाना आसान नहीं था.

आदित्य की नज़र बार बार चाहे अनचाहे अपनी माँ की चूचियों पर चली जाती थी और वो उनकी सुंदरता और सुडौलता में जैसे खो सा जाता था. आदित्य इसमें खोया हुआ था की संध्या ने उसका धयान भंग करते हुए कहा 'किचन में कॉफ़ी और सैंडविच तैयार हैं, प्लीज ले आओ न'

आदित्य उसकी बात सुनकर वंहा से उठा और किचन में आकर कॉफ़ी और सैंडविच को ट्रे में रखने लगा लेकिन रूम में जाने से पहले वो अपने लिंग को नियंत्रण में रखना छह रहा था. लेकिन लिंग कान्हा मैंने वाला था वो तू सब दीवारे तोड़ कर आज़ाद होना छह रहा था. आदित्य थोड़ी देर वंहा रुका रहा, जब उसने देखा की उसका लिंग अभी नहीं मानेगा तू वो ट्रे लेकर कमरे में आ गया और टेबल पर रख दी.

आदित्य ने कॉफ़ी का एक मग संध्या के सामने रख दिया और दूसरा अपने सामने और एक सैंडविच उठाकर संध्या के मुंह के पास ले गया तू वो आदित्य को बड़े प्यार से देखने लगी और सैंडविच में एक बाईट लिया और उसके हाथ से सैंडविच अपने बांये हाथ में लेते हुए संध्या ने कहा 'मैं ले लुंगी' तू आदित्य ने कहा 'मैं खिला देता हूँ'

संध्या 'मुझे प्लीज कफ पीला दो, सैंडविच तू मैं खुद hi खा लुंगी'

आदित्य 'प्लीज की जरुरत नहीं है, मैं कॉफ़ी पीला देता हूँ'

आदित्य ने कॉफ़ी का मग उठाकर अपनी माँ की तरफ किया तू वो थोड़ा आगे हुई तू उसके गले में से चूचियों को और जयादा गहराई तक देखा जा सकता था. आदित्य तू इस नज़ारे को देखकर hi पागल सा होने लगा, लेकिन उसने अपने ऊपर नियंत्रण रखते हुए वंहा से नज़रे हटाई और संध्या को कॉफ़ी देने के लिए मग को उसके होठों की तरफ ले जाने लगा तू उसने देखा की संध्या के बालों की लत उसके चेहरे पर आ गयी है. आदित्य ने मग को वापिस टेबल पर रख दिया और थोड़ा सा खड़ा होकर उसके चेहरे पर आयी बालों की लत को पकड़ कर उसके सर के पीछे कर दिया, लेकिन ऐसा करने में आदित्य की नज़रों ने संध्या के उरोजों को काफी गहराई तक देख लिया और वो उन्हें देखकर पागल हुआ जा रहा था.

आदित्य ने अपने ऊपर नियंत्रण रखते हुए दुबारा मग उठाकर उससे कॉफ़ी देने लगा तू वो फिर से झुकी और उसकी चूचियों का नज़ारा आदित्य को फिर से परेशान करने लगा लेकिन उसने मग को आगे बढ़ाया तू बालों की लत फिर से संध्या के चेहरे पर आ गयी तू आदित्य ने फिर से मग नीचे रखकर उसके चेहरे से बालों की लत हटा दी. इस बार जब आदित्य लत हटा रहा था तू उसका अंगूठा संध्या के होठों को चुकार रगड़ खता हुआ निकल गया, लेकिन आदित्य के अंगूठे के स्पर्श ने संध्या के दिल में घंटिया बजा दी. संध्या जो अभी तक अपने हाथ की वजह से कुछ सोच नहीं पा रही थी, लेकिन जैसे hi उससे हाथ की जलन से थोड़ा आराम मिला तू वो फिर से आदित्य के बारे में सोचकर मन hi मन प्रसन्न हो रही थी और ऊपर से आदित्य के अंगूठे का उसके होठों पर स्पर्श उसकी भावनाओं को फिर से आग दिखा गया. अब संध्या फिर से आदित्य में अपना बॉयफ्रेंड ढूंढने लगी. संध्या आदित्य को ऊपर से नीचे तक निहारने लगी और जैसे hi उसकी नज़र पेट के नीचे गयी तू वंहा काफी बड़ा उभर देखकर उसके दिल में हलचल मच गयी. वो सोचने लगी की ये तू काफी बड़ा है. ये सोचते hi उसकी साँसें तेज़ हो गयी.

आदित्य जब अपनी माँ की लत हटा कर उससे कॉफ़ी का मग उठाकर उससे देने लगा तू उसके मुंह के पास ले जाने लगा तू संध्या का चेहरा ऊपर से नीचे हो रहा था और आदित्य ने कॉफ़ी के मग को पीछे ले लिया और संध्या की नज़र का पीछा करने लगा तू उसने पाया की उसकी माँ की नज़र उसके पाजामे के उभर पर आकर अटक गयी है तू आदित्य को शर्म आने लगी लेकिन साथ hi उससे एक अलग तरह की अनुभूति भी होने लगी.

आदित्य ने अपनी झेंप मिटने के लिए कॉफ़ी का मग लेकर संध्या के पीछे चला गया और पीछे से मग को उसके दांयी तरफ से आगे करके उसके मुंह की तरफ ले गया तू संध्या ने एक सिप लिया लेकिन पीछे से आदित्य के झुकने से उसका लिंग संध्या की कमर पर कुर्सी की लकड़ियों के गैप से टच करने लगा तू उससे बहुत hi अजीब सी फीलिंग होने लगी. वो उस एहसास को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी तू उसने उससे बचने के लिए अपनी कमर को कुर्सी से थोड़ा आगे किया और फिर अपने बांयी तरफ झुक गयी. ऐसा करने से कॉफ़ी के मग को झटका लगा और उसमे से कुछ कॉफ़ी चालक कर संध्या के दांये कंधे और बाजु पर भी गिर गयी तू वो थोड़ा सा चिल्लाई तू आदित्य ने देखा की संध्या अपने बांये हाथ से निघ्त्य के स्ट्राप को दांये कंधे से नीचे खिसका कर उस जगह पर मलने लगी जंहा कॉफ़ी गिरी थी.

आदित्य ने जल्दी से आगे आकर कॉफ़ी का मग को टेबल पर रखा और जल्दी से पानी लेकर उस जगह पर लगाने लगा जंहा कॉफ़ी गिरी थी. कॉफ़ी गरम तो थी लेकिन जयादा गरम नहीं थी, इसलिए वंहा पर स्किन थोड़ी सी लाल हो गयी थी तू ठंडा पानी लगाने से संध्या को आराम मिलाने लगा. आदित्य ने बेख्याली में संध्या के कंधे और बाजु पर पानी तू लगा दिया, लेकिन अब उसकी नज़र सामने का दृश्य देखकर उसको एकदम उत्तेजित कर गयी.

संध्या के निघ्त्य का स्ट्राप कंधे से हटाने की वजह से वो बाजु पर झूल गया और ब्रा न पहनी होने की वजह से संध्या का आधे से जयादा दांयी चुकी नग्न हो चुकी थी और इस दृश्ये को देखकर आदित्य का बुरा हाल होने लगा. वो बार बार अपनी माँ के सुडोल उरोज के दर्शन करता रहा और जिस जगह पर वो पानी लगा राजा था, बेख्याली में वंहा उत्तेजना के वशीभूत होकर दबाने से संध्या के मुंह से हलकी सी चीख भी निकली तू आदित्य चौंक कर संध्या के चेहरे को देखने लगा तू संध्या को शर्म आने लगी और उसने अपने चेहरे को झुका लिया और उसकी नज़र उरोजों पर से हटी हुई निघ्त्य पर पड़ी तू उसकी शर्म और जयादा बढ़ गयी.

संध्या ने अपने बांये हाथ से निघ्त्य को ठीक करना चाहा तू कपडे की छुअन से वंहा जलन होने लगी तू उसके मुंह से एक सिसकी निकल गयी, जिससे सुनकर आदित्य की नज़र संध्या के चेहरे पर पड़ी और दोनों की आँखें चार हुई तू दोनों की आँखों में शर्म उत्तर आयी थी. आदित्य वंहा से उठकर किचन में गया और कुछ आइस कुबेस एक बाउल में डालकर आ गया और एक आइस क्यूब उठाकर उसने अपनी माँ को देते हुए कहा 'इससे आप जलन वाली जगह पर लगा लो तू आराम मिलेगा'

संध्या 'तुम लगा दो न '

आदित्य 'नहीं, आप hi लगा लो, मैं लगाऊंगा तू फिर आप बुरा मान जाओगी'

संध्या 'तुम मेरी हेल्प करोगे तू मैं क्योँ बुरा मानूंगी'

आदित्य 'मेरा हाथ गलती से कहीं इधर उधर लग गया तू आप माँ बनकर मुझसे गुस्सा हो जाओगी'

संध्या 'मैं माँ नहीं, बल्कि गर्लफ्रेंड हूँ'

आदित्य 'Aap.Mom जयादा जो और गर्लफ्रेंड काम'

संध्या 'मैं माँ नहीं, सिर्फ और सिर्फ गर्लफ्रेंड हूँ'

आदित्य 'आप कुछ भी बोल देती हो, लेकिन असल में आप सिर्फ और सिर्फ माँ हो' ये कहकर आदित्य आइस वाला बाउल उसकी तरफ करके वंहा से जाने लगा तू संध्या को झटका लगा और वो कड़ी हो गयी और दौड़कर आदित्य को पीछे से अपने बांये हाथ से पकड़ कर जकड लिया.

आदित्य को अपनी पीठ पर अपनी माँ की चूचियां बहुत अच्छे से फील हो रही थी और चूचियां तो छोडो, उससे अपनी माँ के निप्पल तक भी महसूस हो रहे थे. आदित्य जो पहले से hi उत्तेजित था और उसका लिंग अपनी औकात में आ गया था और अब उसकी माँ का इस तरह उससे पकड़ने से तू उसका उन्माद बढ़ता जा रहा था और उसका लिंग अब झटके मरने लगा था, लेकिन उसने अपने उम्मेद को काबू में रखते हुए बिना पालते 'माँ आप ये क्या कर रही हो, आप प्लीज चेयर पर बैठ जाओ और अपने हाथ को ठन्डे पानी में दाल लो नहीं तू आपके हाथ में जलन बढ़ जाएगी और चले हो जायेंगे'

संध्या ने आदित्य की कमर को छोड़ना तू दूर और जयादा कास लिया और सुबकते हुए 'तुम्हे तू मेरी परवाह hi कान्हा है. तुम्हारी गर्लफ्रेंड का हाथ ख़राब होता है तू हो जाने दो, तुम्हे क्या पड़ी है, तुम्हे तू कोई और गर्लफ्रेंड मिल hi जाएगी और तुम यही तू चाहते हो किसी तरह तुम्हे मुझसे छुटकारा मिल जाये'
 
फैंटास्टिक रिव्यु वन्स अगेन अंडरलाइंग थे मिनट डिटेल्स ऑफ़ थे अपडेट.

वेल योर थॉट्स अरे वैल्युएबल बूत हैवे पेशेंस अस थे स्टोरी इस बिल्डिंग इन ा स्लो मन्नेर. एच थिंग वोउल्ड बे क्लियर. अपार्ट फ्रॉम थिस ी can't प्रॉमिस तहत यू विल बे हैप्पी विथ एवरीथिंग अस एवरीवन है डिफरेंट प्रोस्पेक्टिव फॉर थे शामे सेंटेंस बूत यू वोउल्ड डेफिनिटेली हैवे फन इन टोटैलिटी.

स्टे कनेक्टेड फॉर मोरे फन.
 
अपडेट 62

संध्या ने आदित्य की कमर को छोड़ना तू दूर और जयादा कास लिया और सुबकते हुए 'तुम्हे तू मेरी परवाह hi कान्हा है. तुम्हारी गर्लफ्रेंड का हाथ ख़राब होता है तू हो जाने दो, तुम्हे क्या पड़ी है, तुम्हे तू कोई और गर्लफ्रेंड मिल hi जाएगी और तुम यही तू चाहते हो किसी तरह तुम्हे मुझसे छुटकारा मिल जाये'

आदित्य 'माँ आप ऐसा क्योँ सोच रही हैं, मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकता की आपका हाथ ख़राब हो, अगर आपकी सोच को मंटा तू मैं क्यों कहता की आप अपने हाथ को ठन्डे पानी में दाल लो'

संध्या 'जब तुम वंहा से उठकर आ गए तू मुझे क्योँ नहीं लगेगा की तुम मुझसे छुटकारा चाहते हो'

आदित्य 'आप चलकर बैठो, मैं अभी आता हूँ'

संध्या 'फिर से मुझे अलग काटना छह रहे हो'

आदित्य 'माँ आप चलो तू सही, मैं आ रहा हूँ'

संध्या 'माँ नहीं गर्लफ्रेंड'

आदित्य 'आपको जो समझना है समझिये लेकिन आप अपने हाथ को ठन्डे पानी में दाल लीजिये'

संध्या 'मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड हूँ'

आदित्य ' आप चेयर पर बैठो, मैं आ रहा हूँ' ये कहकर वो वंहा से बाथरूम में चला गया.

बाथरूम में जाते hi उसने जल्दी से अपने ट्रॉउज़र को उतारकर लिंग पर हाथ से आगे पीछे करने लगा. उसने अपनी आँखें बंद की hi थी की उससे अपनी माँ दिखाई देने लगी. माँ को इमेजिन करके वो अपने हाथ लिंग पर ऊपर नीचे करते हुए उसकी चमड़ी को आगे पीछे करने लगा. वो ख्यालों में अपने दूसरे हाथ को अपनी माँ की चूचियों पर ले गया और एक चुकी को पकड़ कर उससे सहलाने लगा. इस एहसास से वो बहुत जयादा उत्तेजित हो गया और अपने हाथ को तेजी से आगे पीछे करने लगा और ख्यालों में अपनी माँ की चुकी को सहलाते सहलाते अब जोर जोर से मसलने लगा तू उससे लगा की उसकी माँ उससे बहुत hi धीमी आवाज़ में कह रही हो 'आदित्य आदित्य... आदित्य'

आदित्य को उसकी आवाज़ ऐसी लगी जैसे उससे इस सब में मजा आ रहा हो और वो उसकी मादक तरीके से कही हुई बात सुनकर अपने लिंग पर अपने हाथ की गति को बढ़ता जा रहा था और उससे लग रहा था की अब वो उत्तेजना के शिखर पर पंहुचने वाला है और उसके लिंग में सरसराहट तेज हो रही थी और लग रहा था की वो अब स्खलित होने वाला है तू उससे फिर से आवाज़ सुनाई दे रही था 'आदित्य... आदित्य.... आदित्य... ' उससे लग रहा था की ये उसके ख्यालों में आवाज़ सुनाई दे रही है. उससे ये भी लग रहा था की वो अपनी माँ की चुकी को जोर जोर से मसलने लगा है इस वजह से उसकी माँ उत्तेजना में उससे पुकार रही है लेकिन संध्या तू हकीकत में उससे बाथरूम के बहार से आवाज़ दे रही थी जो की उससे ख्यालों में आती हुई आवाज़ लग रही थी.

आदित्य को किसी बात का ध्यान नहीं था और फिर वो वक़्त भी आ गया जब वो स्खलित जो गया तू उससे बहुत आराम मिल रहा था और वो गहरी गहरी साँसें लेने लगा. अभी उसकी साँसें सम्भली भी नहीं थी की उससे फिर से अपने नाम की आवाज़ सुनाई दी तू उससे लगा की उसकी माँ को चुकी मसलने से दर्द जयादा होने की वजह से उसका नाम पुकार रही है तू मन में ये सोचकर उससे हंसी आने लगी. थोड़ी देर बाद फिर से उसका नाम पुकारा गया और इस बार आवाज़ के साथ सिसकने की आवाज़ भी आयी तू उससे लगा की हकीकत में hi उससे बुलाया जा रहा है तू उसने जल्दी से अपने लिंग को साफ़ किया और ट्रॉउज़र पहनकर दरवाजा खोला तू वो देखता है की उसकी माँ उससे पुकारे जा रही है और दरवाजा खुलते hi उसकी माँ कह रही थी 'मैं कितनी देर से तुम्हे पुकार रही हूँ और तुम धयान hi नहीं दे रहे' और ये कहकर वो सुबकने लगी.

आदित्य 'आप मुझे क्योँ पुकार रही थी, मैं कह तू रहा था की मैं थोड़ी देर में आ जाऊंगा'

संध्या 'मुझे दर्द हो रहा था और जब दर्द बर्दाश्त से बहार हो रहा था तू मैंने तुम्हे आवाज़ दी लेकिन तुमने सुनी hi नहीं'

आदित्य 'जब दर्द हो रहा था तू आप चेयर से उठकर यंहा क्योँ आयी और अपने हाथ को ठन्डे पानी से निकला कर आप अपने हाथ के दर्द को और बढ़ा देंगी'

संध्या 'मुझे लगा तुमने मेरी आवाज नहीं सुनी तू मैं यंहा आ गयी और पता नहीं तुम्हे कितनी आवाज़े दी लेकिन मुझे लगा की तुमने जान बुझ कर सुनकर अनसुना कर दिया है. अगर तुम्हे लगता है की मैं तुम्हे तंग कर रही हूँ तू ठीक है, तुम आराम से रहो और मैं जा रही हूँ' इतना कहकर वो मुड़ी और चल दी.

आदित्य ने जब देखा की उसकी माँ का रही है तू उसने पुकारा 'माँ कान्हा जा रही हो, आपके हाथ में दर्द हो रहा है, आप न जाओ'

संध्या 'मेरे हाथ में दर्द हो या मेरा हाथ ख़राब हो जाये, अब से मैं तुम्हे कुछ नहीं कहूंगी और न hi कभी किसी काम के लिए कुछ कहूंगी, तुम्हे मेरे लिए बिलकुल परेशान होने की जरुरत नहीं है' और वो ये कहकर उसकी तरफ देखे बिना hi उसके कमरे से बहार हो गयी.

आदित्य तू बिलकुल भोंचका रहा गया की ये क्या हो गया, वो भाग कर कमरे से बहार आकर अपनी माँ के पीछे गया लेकिन तब तक उसकी माँ अपने कमरे में जा चुकी थी. आदित्य अपनी माँ के कमरे में नॉक किया तू उसकी माँ ने बोलै 'दरवाजा खुला है, लेकिन तुम चले जाओ, मैं अपना ख्याल खुद रख लुंगी'

आदित्य ने कमरे के अंदर जाकर कहा 'आप पहले अपने हाथ को ठीक कर लो, फिर आपका जो मन करे कर लेना'

संध्या 'मैं अपना ख्याल खुद रख लुंगी, लेकिन तुमसे कोई मदद नहीं लुंगी'

आदित्य 'मैं आपको इस हाल में अकेला नहीं छोड़ सकता, इसलिए आप से रिक्वेस्ट है की आप अपने हाथ का सही से इलाज करवा ले'

संध्या गुस्सा दिखा कर अपने मुंह को फेरते हुए 'तुम जाओ यंहा से, मुझे तुम्हारी कोई जरुरत नहीं है और मेरा ख्याल करने की भी जरुरत नहीं है, मुझे जो करना होगा, मैं खुद hi कर लुंगी'

आदित्य 'मैंने आपको वादा किया था की मैं आपको अकेले नहीं छोडूंगा तू अब आप को इस हालत में अकेला कैसे छोड़ सकता हूँ, आप यही रुको, मैं ठंढा पानी लेकर आ रहा हूँ'

संध्या 'मुझे किसी चीज़ की जरुरत नहीं है और मैं अब तुम्हारे जाते hi इस कमरे को अंदर से बंद कर लुंगी'

आदित्य ने आव देखा न तव, अपनी माँ को पकड़ कर अपनी मजबूत बाजुओं में उठा लिया और उससे अपने कमरे में ले जाने लगा तू संध्या ने अपने हाथ पांव पटकते हुए कहा 'ये क्या बदतमीज़ी है, मुझे नीचे उतरो'

आदित्य उसकी किसी भी बात का जवाब न देते हुए उससे अपने से अच्छी तरह से चिपकने लगा तू संध्या ने अपने पाँव पटके लेकिन उसकी परवाह न करके अपनी बाजुओं में उसकी टांगों और कमर को कास लिया तू वो अपने बांये हाथ से आदित्य की बाजु पर मुक्के बरसाने लगी. आदित्य को उसके मुक्को का क्या असर होना था, फिर उसने अपने हाथ से आदित्य की कमर पर गुदगुदी शुरू कर दी जिससे आदित्य को थोड़ी परेशानी हो रही थी. उससे लग रहा था की कहीं उसकी माँ गिर न जाये तू उसने उससे अपने से और जयादा चिपका लिया. संध्या को जैसे hi आदित्य ने चिपकाये तू उसकी चूचियां आदित्य के सीने में डाब सी गयी तू संध्या को भी मजा आने लगा लेकिन उसने आदित्य को गुदगुदी करना नहीं छोड़ा, जिससे संध्या कई बार उसकी बांहों में ऊपर नीचे हुई जिससे उसकी चूचियों ने आदित्य के सीने से रगड़ खाई तू दोनों को उत्तेजित होना स्वाभाविक था.

आदित्य आख़िरकार उससे अपने कमरे में ले आया और उससे चेयर पर न बैठा कर खुद hi चेयर पर बैठ गया और उससे अपनी गॉड में बैठकर उसका हाथ पानी वाले बाउल में डालने लगा तू संध्या प्रतिरोध करने लगी, लेकिन आदित्य के सामने उसकी कान्हा चलनी थी. आदित्य ने उसका दांया बाजु अपने दांये हाथ से पकड़ कर पानी के बाउल में दाल दिया तू वो चटपटे हुए हाथ को निकलने की कोशिश करने लगी लेकिन वो कामयाब न हुई तू छीलकर कहने लगी 'छोडो मुझे'

आदित्य ने कहा 'जब तक इस हाथ को आराम नहीं मिल जाता तब तक तू बिलकुल नहीं छोडूंगा' संध्या ये सुनकर ठन्डे पानी में अपने हाथ से पानी में चपके मरने लगी जिससे बाउल में से पानी छलकने लगा तू आदित्य ने कहा 'ये क्या कर रही हो' संध्या के जवाब आने से पहले hi उसके मुंह से चीख निकल गयी तू आदित्य परेशान होते हुए 'क्या हो गया' लेकिन वो जवाब न दे पायी बल्कि उसकी आँखों में आंसू आ गए, असल में जब वो बाउल में पानी से खेलने लगी तू उसने अपनी हथेली को बंद करना छह तू उसकी हथेली में तेज दर्द उठा जिस वजह से उसकी आँखों में आंसू चालक आये

आदित्य ने उसकी बाजु को छोड़ कर अपने हाथ से उसके आंसुओं को पोछने के लिए जैसे hi अपना हाथ अपनी माँ के चेहरे की तरफ बढ़ाया तू संध्या आदित्य की गॉड से उठकर कड़ी होने लगी और जाने लगी तू आदित्य का हाथ उसके चेहरे की बजाये उसके उरोज को स्पर्श करते हुए चला गया जिससे आदित्य को बहुत मजा आया लेकिन शायद संध्या का ध्यान इधर नहीं था.

जब आदित्य ने देखा की उसकी माँ जा रही है तू उसने जल्दी से उसकी कमर को पकड़ कर फिर से अपनी गॉड में बैठा लिया तू संध्या कहने लगी 'मुझे जाना है और इलाज नहीं करवाना'

आदित्य ने अपने बांये हाथ को कमर से लेजाकर उसके पेट को पकड़ कर उससे अपनी गॉड में इस तरह बैठा लिया की उसकी पीठ आदित्य के सीने और पेट से लगी हुई थी. उसने अपने दांये हाथ से उसकी दांयी बाजु को पकड़ कर अपनी माँ के दांये हाथ को ठन्डे पानी के बाउल में दाल कर ऐसे पकड़ लिया की वो न तू उठ सके और न hi बाउल से अपने हाथ को निकल सके'

संध्या 'ये क्या जबरदस्ती है'

आदित्य 'अब जो समझना है समझिये लेकिन अब मैं आपको किसी कीमत पर जाने नहीं दूंगा'

जिस तरह से वो दोनों बैठे हुए थे उनके शरीरों से निकलने वाली गर्मी एक दूसरे को उत्तेजित कर रही थी, लेकिन संध्या तू गुस्से में थी, इसलिए उसने आदित्य से कहा 'जब ख्याल hi रखना है तू पूरा रखो, ये क्या है, हाथ की जलन तू दिखाई दे रही है लेकिन मेरे कंधे और बाजु पर जो जलन है वो न तू दिखाई दे रही है और न hi तुम महसूस कर पा रहे हो'

आदित्य ने उसका दांया हाथ छोड़कर अपने दांये हाथ से बर्फ का एक टुकड़ा बाउल में से उठाने के लिए आगे झुककर उससे बाउल में से निकलकर उससे अपनी माँ के कंधे पर रखा तू उसके मुंह से सिसकी निकली. आदित्य जब आगे को झुका तू संध्या को भी आगे को झुकना पड़ा और इसमें उसका बांयी चुकी आदित्य के उस हाथ को जो पेट पर था दबने लगी, जिससे आदित्य को ऐसे आनंद की अनुभूति हुई, जिससे शब्दों में बयान करना आसान नहीं है. आदित्य ने बड़े प्यार से कहा 'दर्द हो रहा है' तू उसने गर्दन हिला कर हाँ में जवाब दिया. आदित्य ने बर्फ के टुकड़े को धीरे धीरे कंधे और बाजु पर मलने लगा तू संध्या ने कहा 'स्ट्राप से जलन हो रही है' तू आदित्य ने कहा 'हटा दो'.

संध्या ने कहा 'ख्याल रखना है तू पूरा रखो और खुद hi हटा दो' आदित्य ने जयादा बहस नहीं की और खुद hi बर्फ को वापिस बाउल में डालने के लिए फिर से झुका तू उसके साथ संध्या को भी फिर से झुकना पड़ा और उसके बांये हाथ पर फिर से संध्या की चुकी आ गयी. आदित्य उस स्पर्श का मजा लेते हुए बर्फ को बाउल में रख कर झुके झुके hi उसने संध्या के स्ट्राप को उसके कंधे से हटा दिया तू स्ट्राप बाजु पर झूल गया.

स्ट्राप के हटने से उसकी चूचियों का नज़ारा फिर से कुछ जयादा hi उजागर हो गया और इस बार तू संध्या आदित्य की गॉड में बैठी हुई थी. इस वजह से संध्या की चूचियां आदित्य को कुछ जयादा hi दिखाई देने लगी. इतनी नजदीक से अपनी माँ की चूचियां देखकर और बांयी चुकी का उसके बांये हाथ पर दबने का एहसास आदित्य की भावनाएं न भड़के ये हो नहीं सकता था. उसने बर्फ का टुकड़ा लिया और सीधा हो गया तू संध्या भी साधी हो गयी. आदित्य ने बर्फ के टुकड़े को उसके कंधे पर रखकर धीरे धीरे आगे पीछे करने लगा जिससे संध्या के मुंह से सिसकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी. आदित्य को लगा की बर्फ की ठंडक की वजह से ये सिसकारियां निकल रही हैं.

आदित्य बीच बीच में बर्फ लगाकर अपने मुंह से फूंक भी मार रहा था, जिससे उसकी माँ को एक नशा सा चने लगा था और वो भी जान बुझ कर अब अपने शरीर के भर को आदित्य पर दाल रही थी और मुंह से सिसकारियां निकल रही थी, लेकिन आदित्य का ध्यान तू अपनी माँ की चूचियां देखने में था और नग्न हो चुकी चूचियों की सुंदरता से लगातार उत्तेजित होता जा रहा था और धीरे धीरे उसका लिंग भी तनाव में आता जा रहा था और एक वक़्त ऐसा आया की उसके लिंग ने संध्या के नितम्बों पर प्रहार किया.
 
आपका' विश्लेषण बहुत hi उच्च दर्जे का है. आपने कहानी को बहुत hi तन्मयता के साथ पढ़कर उसमे मौजूद हर चरित्र का बारीकी से चित्रण किया है.

मैं अभी आपकी व्याख्या पर जयादा कुछ टिपण्णी नहीं करुँगी अन्यथा आपका आने वाले अंको से प्राप्त होने वाला आनंद समाप्त हो जायेगा.

आपपको इस तरह के विश्लेषण के लिए जितनी म्हणत की है उसके लिए मेरा शाट सेहत अभिनन्दन

धन्यवाद
 
फर्स्ट ऑफ़ आल थैंक्स फॉर आल थे सपोर्ट.

वेल, योर कंसर्न इस क्वाइट राइट तहत it's फन प्लेस एंड फंतासी शुड बे गिवेन इम्पोर्टेंस राथेर थान लॉजिक.

होवेवेर यू वोउल्ड फंड आल सोर्ट्स ऑफ़ रीडर्स एंड वे शुड रेस्पेक्ट एव्री one's सेंटीमेंट्स.

थिस पर्टिकुलर स्टोरी विल बे फुल ऑफ़ फन अस वेल अस लॉजिक फॉर एवरीथिंग, बूत प्लीज हैवे पेशेंस.

ी वोउल्ड रिक्वेस्ट एवरीवन तो शेयर योर थॉट्स एंड कंसर्नस एंड वोउल्ड लिखे तो इंकॉर्पोरते थे शामे.

थैंक्स सो मच वन्स अगेन
 
अपडेट 63

आदित्य बीच बीच में बर्फ लगाकर अपने मुंह से फूंक भी मार रहा था, जिससे उसकी माँ को एक नशा सा चने लगा था और वो भी जान बुझ कर अब अपने शरीर के भर को आदित्य पर दाल रही थी और मुंह से सिसकारियां निकल रही थी, लेकिन आदित्य का ध्यान तू अपनी माँ की चूचियां देखने में था और नग्न हो चुकी चूचियों की सुंदरता से लगातार उत्तेजित होता जा रहा था और धीरे धीरे उसका लिंग भी तनाव में आता जा रहा था और एक वक़्त ऐसा आया की उसके लिंग ने संध्या के नितम्बों पर प्रहार किया.

अभी आदित्य और संध्या को अपने रिश्ते के मायने समझने के लिए यही छोड़ते हैं और हम चलते हैं मोहनलाल की यादों में

अब कहानी फ्लैशबैक में

मोहनलाल भी उसको इस तरह करता देखकर डांस फ्लोर से नीचे आ गया और उसने रुचिका को पीछे से कंधे से पकड़ा और पूछा की क्या हुआ तू उसने पलके झुका ली क्योँकि उससे बहुत शर्म आ रही थी तू मोहनलाल ने कहा 'मुझे छेड़ने का मन कर गया था' तू रुचिका ने कुछ नहीं कहा बस चुप रही तू उससे समझ आ गयी की वो बहुत शर्मा गयी है तू फिर मोहनलाल ने उससे जयादा नहीं छेड़ा और खाना खाने टेबल पर आ गए. खाना कहने के बाद टैक्सी पकड़कर एयरपोर्ट पंहुच गए.

दोनों एयरपोर्ट पहुँच कर मुंबई की फ्लाइट में आ गए और फ्लाइट के अंदर छुअलबाजी करते हुए मुंबई पहुँच गए.

मुंबई में सूरज ने उन दोनों को लाने के लिए गाड़ी भेजी हुई थी तो वह दोनों गाड़ी में बैठकर सूरज और दिया के घर पहुँच गए जहाँ पैर दीपक और अवनि पहले से hi मौजूद थे.

वो सब वहां पैर बहुत गर्म जोशी से मिले और फिर पता चला की उन सब को को एक खास पूजा के लिए जाना है तो सब एक सुव में बैठकर गेटवे ऑफ़ इंडिया पहुँच गए और वहां से एक बोट में बैठ कर एक टापू और चले गए जहाँ पैर बहुत पुराण मंदिर था. उस मंदिर का पुजारी सूरज का कुलगुरु था जिन्होंने इस खास पूजा का नियोजन किया था.

कुलगुरु ने उनको सबसे पहले स्नान करने के लिए कहा और सब को एक एक धोती दे दी और हिदायत दी इसके आलावा कुछ भी नहीं पहनना. उनकी बात सुनकर महिलाओं को बहुत अजीब लगने लगा तू कुलगुरु ने उन्हें कहा 'पुत्रियोँ, चिंता न करें, आप सब की धोती बहुत बड़ी है. ये इसलिए जरुरी है क्योंकि इस पूजा में कोई भी सिला हुआ कपडा नहीं पहन सकते' कुलगुरु की बात सुनकर रुचिका ने कहा 'गुरूजी, अगर आप बुरा न मने तू हम तीनो की साथ में कोई छोटा कपड़ा या चुन्नी और दे देते जिससे हमें थोड़ा आराम रहता' गुरूजी मुस्कुरा दिए और उन तीनों को एक एक छोटा सफ़ेद विस्तार भी दे दिया गया.

फिर पूजा स्थान पर सब तैयार होकर आ गए. पुरुषों ने धोती बंधी हुई थी और उनका ऊपरी भाग नंगा था. महिलाओं ने अपने उरोजों पर वो छोटा कपड़ा बंधा हुआ था और धोती से अपने आप को ढाका हुआ था. इस वक़्त तीनों hi महिलाएं बहुत hi सुन्दर और कामुक लग रही थी. गुरूजी ने पूजा का प्रबंध किया हुआ था. उन्होंने बीच में सूरज और उसके बांयी तरफ दिया को बैठाया. फिर गुरूजी ने कहा 'इस जोड़ी के दोनों तरफ एक एक जोड़ी बैठ जाये' तू सूरज वाली साइड में दीपक और अवनि बैठ गए और दिया वाली साइड में मोहनलाल और रुचिका बैठ गए.

पूजा शुरू हुई, हवं और मंत्रोच्चार हुआ और फिर पूजा की समाप्ति पर सब जोड़ियों को वंहा पर एक प्राचीन शिवलिंग पर दूध चढ़ाने के लिए कहा गया, तू वैसा hi किया और उसके बाद सबने गुरूजी से आशीर्वाद लिया और फिर गुरूजी ने कहा 'देखो बचो ये पूजा ऐसी थी की अबसे तुम तीन अलग अलग जोड़ियां न होकर बल्कि सब एक सुतार में बांध कर एक हो गए हो. अब से तुम सब का सुख दुःख अब एक हो गया है मतलब अगर कोई दुःख आएगा तू वो बांटकर अपना प्रभाव काम कर देगा. तुम तीनों कभी भी कैसी भी परिस्थिति हो आपस में न झगड़ना नहीं तू तुम सबका विनाश हो जायेगा. अगर तुम सब मिलजुलकर रहोगे तू ये जान लो की कैसी भी मुसीबत आये तुम उसका मुक़ाबला करके विजय प्राप्त कर लोगे. बस यही समझना की आज से तुम सब एक परिवार हो' फिर सब वंहा से निकलकर अपने वस्त्रो को बदलकर वापिस आ गए. सब यही सोच में लगे हुए थे की गुरूजी की बात का क्या मतलब हो सकता है.

वापिस सूरज के घर पर बैठे हुए नाश्ता कर रहे थे और चुहुलबाजी चल रही थी की दीपक ने पूछा 'क्योँ भाई साहब उस आर्डर का क्या किया' तू मोहनलाल ने कहा 'अरे यार वो तू मैंने सोचा hi नहीं, क्योँकि उस आर्डर के लिए कोई एक करोड़ जमा करने पड़ते हैं उसका इंतज़ाम मेरे पास नहीं है'

सूरज 'क्या भाई साहब, आप भी कैसी बात करते हैं, मैं दे देता हूँ'

मोहनलाल 'नहीं नहीं, मैं नहीं लूंगा'

दीपक 'भाई साहेब आप शायद भूल गया हो लेकिन अगर एक महीने के अंदर आपने अपनी कंपनी के पेपर्स जमा नहीं किये तू आपको इनाम के दस लाख भी वापस करने पड़ेंगे और वह इनाम सेकंड आने वाली पार्टी को मिल जाएगा और कॉन्ट्रैक्ट भी उसी को मिलेगा'

मोहनलाल 'मैं यह पहले से hi सोच कर बैठा हूँ और वह इनाम वापस कर दूंगा'

सूरज 'भाई साहब आप भी क्या बात कर रहे हैं, हम इनाम वापस क्यों करेंगे, एक नै कंपनी खोल लेते हैं और आप इनिशियल अमाउंट की चिंता बिलकुल न करें'

मोहनलाल 'लेकिन....'

सूरज 'लेकिन वेकिन कुछ नहीं, भाई साहब अगर आप हमें अपना समझते हैं तब ये कंपनी खोल लीजिये'

मोहनलाल 'ठीक है मैं आपकी बात मन लेता हूँ लेकिन मेरी भी एक शर्त है की उस कंपनी में हम सब बराबर के पार्टनर्स होंगे और जो इनिशियल अमाउंट आप लगाएंगे वह मुझे मेरे हिस्से का उधर देंगे और मैं उसका ब्याज देता रहूँगा जब तक मैं उसे चूका न दूँ'

सूरज 'भाई साहब जब हम अब एक फॅमिली हैं यह बात ठीक तू नहीं है लेकिन आपकी इज्जत के लिए हमें यह भी मंजूर है और मैं यह भी चाहूंगा की आज के मुबारक मौके पैर hi इस कंपनी की नीव राखी जाये' बाकि सब ने भी इस का समर्थन किया.

दीपक 'आज कैसे हो सकता है, इस कंपनी के लिए शर्त ये थी की हस्बैंड और वाइफ दोनों hi कंपनी के डायरेक्टर या पार्टनर होने चाहिए'

सूरज 'क्यों नहीं हो सकता, यह बात तो हमें पहले से hi मालूम थी और संयोग की बात यह है की हम तीनों जोड़ियां एक साथ आज इक्क्ठे हैं'

दीपक 'वह सब तो ठीक है लेकिन जो सबसे ज्यादा जरुरी चीज है वह है मैरिज सर्टिफिकेट मेरे पास तो है नहीं बाकि आप दोनों का मुझे पता नहीं और उसके बगैर इस कंपनी का कोई मतलब नहीं'

मोहनलाल 'मैरिज सर्टिफिकेट तो मेरे पास भी नहीं है'

दीपक 'भाई साहेब मेरे पास मैरिज सर्टिफिकेट हो या न हो लेकिन आपके पास होना तो बहुत जरुरी है क्युओंकी इनाम आपने जीता था और आपका उस कंपनी में होना बहुत आवश्यक है अन्यथा शर्त पूरी नहीं होगी'

सूरज 'इसमें क्या मुश्किल है मैं अभी पता करता हूँ की कैसे जल्दी से जल्दी मैरिज सर्टिफिकेट मिल सकता है'

यह कह कर सूरज फ़ोन पैर किसी से बात करने लगा और बात करके उसने बताया 'मैरिज सर्टिफिकेट की कोई चिंता नहीं है जल्दी मिल जायेगा, उसके दो तरीके हैं पहला एप्लीकेशन देकर कोर्ट मैरिज का सर्टिफिकेट लिया जाए या शादी को पहले का बता कर मैरिज को रजिस्टर करवाया जाए'

दीपक 'इसका मतलब यह हुआ हमें शादी के पुराने फोटो दे कर उसको कोर्ट से रजिस्टर करना पड़ेगा क्यूंकि हमें ये प्रोवे करना पड़ेगा की जिस वक़्त यह इनाम लिया था उस वक़्त हम शादीशुदा थे'

मोहनलाल ये बात सुनकर चौंक गया लेकिन बात को सँभालते हुए कहने लगा 'हमारी शादी तो बहुत साधारण ढंग से हुई थी और कोई फोटो वगैरा नहीं हुई थी. हम तो कोई परमं दे नहीं पाएंगे, इसलिए अच्छा ये है की हम इनाम की राशि वापस कर दें और इस झमेले को छोड़ दे'

सूरज 'क्या भाई साहब आप भी न जब देखो पैसे वापस करने की सोचते हो, घर आयी लक्ष्मी को वापस करना उसका अपमान होता है. आप दोनों की शादी की फोटो hi तो चाहिए तो उसमे क्या मुश्किल है. ऐसा करते हैं आपकी शादी दोबारा से करवा देते हैं और फोटो क्या वीडियो भी बनवा लेंगे'

मोहनलाल 'लेकिन वो शादी तो आज की होगी हमें तो शादी पहले की चाहिए'

सूरज 'क्या भाई साहब आप भी बात करते हो फोटो पर डेट थोड़ी न लिखी होती है और जो पंडित शादी करेगा वह यही कहेगा की शादी आज नहीं बल्कि एक साल पहले हुई थी. आपकी शादी आज hi दोबारा करवा देते हैं, क्योँ ठीक है न' सबने एक सुर में कहा बिलकुल ठीक है, लेकिन इस शादी की बात सुनकर रुचिका बहुत शर्माने लगी तू तो दिया और अवनि उसे छेड़ने लगी और कहने लगी 'तुम तो ऐसे शर्मा रही हो जैसे आअज पहली बार शादी कर रही हो, जयादा शर्माने की जरुरत नहीं है'

अब उन बेचारों को क्या पता की रुचिका की शादी सच्ची में पहली बार हो रही है. उन सब में डीडे हुआ की यह शादी आज hi होगी और उस सब का प्रबंध सूरज जी करेंगे.

दिया मोहनलाल को बहुत प्यार से देखते हुए 'अब आपकी दुल्हन शादी के बाद मिलेगी'

मोहनलाल 'इतना ज़ुल्म मत करो मुझे उस से एक बार बात तो करने दो'

दिया 'अब सीधे शादी के बाद बात करना, उससे पहले बिलकुल भी नहीं' और यह कहकर वो रुचिका को अंदर ले गयी और मोहनलाल सोच में पद गया की क्या ये जो हो रहा है ठीक है या गलत.

दोपहर 3 बजे शादी के लिए जिस मंदिर में इंतज़ाम किया गया था वहां पैर सब पहुँच गए और रुचिका दुल्हन के वेश में पुरे साजो शार्घर के साथ बहुत hi खूबसूरत लग रही तह. पंडित जी ने उन दोनों के लिए मंत्रोच्चार करते हुएके साथ फेरे कारवाई और उन्हें सात वचन भी दिलवाये और कन्यादान सूरज ने किया. उसके बाद सूरज के द्वारा लाया गया मंगलसूत्र मोहनलाल ने रुचिका को पहनाया और उसकी मांग में सिंदूर भी डाला. पंडित जी ने कहा की विवाह पुराण हुआ. इस सब की वीडियोग्राफी और बहुत सरे फोटो भी खींचे गए. अब रुचिका पूरी तरह से मोहनलाल की बीवी बन गयी. सब उन्हें मुबारकबाद देने लगे. फिर सब वंहा से होटल में आ गए जंहा पर एनिवर्सरी का फंक्शन था और वंहा कमरे भी बुक थे जिनमे से एक कमरा मोहनलाल और रुचिका के लिए भी था.

वंहा होटल की लॉबी में सूरज ने मैरिज रजिस्ट्रार को बुलाया हुआ था और उससे सब कुछ बता दिया और उसने जो जो पेपर्स चाहिए थे वो बता दिए, लेकिन जो मैं एप्लीकेशन थी उस में से एक पर दीपक और रिया और दूसरे पर मोहनलाल और रुचिका के सिग्न ले लिए लेकिन मोहनलाल ने जब सिग्न किये तू उसने नाम लिखा राजमोहन तू सूरज ने इशारे से पूछा तू मोहनलाल ने उससे रजिस्ट्रार के सामने चुप रहने के लिए कहा और उसके जाने के बाद उसने बताया की उसका पूरा नामलेकिन सब उससे मोहनलाल के नाम से जानते हैं. रुचिका को भी ये सुनकर एक अजीब सी अनुभूति हो रही थी.

रजिस्ट्रार के जाने के बाद सूरज ने का को बुलाया हुआ था आउट नै कंपनी के पेपर्स पर उन सब के सिग्न करवाए और वो चला गया. उसके बाद वो तीनों जोड़ियां कुछ खाने पीने के लिए उस होटल के रेस्टोरेंट में बैठे हुए थे और सब एक दूसरे को मुबारकबाद दे रहे थे. उधर दिया और अवनि रुचिका को छेड़ रहे थे की आज तू उन्हें दुबारा से सुहागरात माननी है, अब उन दोनों को क्या पता की अभी तू पहली बार वाली सुहागरात भी नहीं मणि है. रुचिका उनके छेड़ने से दुखी होने की बजाये मन hi मन मंद मंद मुस्कुरा रही थी.

फिर काफी छुअलबाजी करने के बाद ये तय हुआ की कुछ देर अपने अपने कमरों में जाकर आराम करेंगे क्योँकि एनिवर्सरी फंक्शन शुरू होने में अभी 2 से 3 घंटे का वक़्त था. मोहनलाल और रुचिका अपने कमरे के अंदर चले गए.

कमरे के अंदर आकर मोहनलाल कमरे को अंदर से बंद करके जैसे hi पलटा तू रुचिका ने झुककर उसके पाँव छू लिए तू मोहनलाल ने उससे कन्धों से पकड़ते हुए कहा "यह क्या कर रही हो'

रुचिका 'अब मैं शास्त्रों के अनुसार भी आपकी पत्नी बन गयी हूँ तो मैं अपना पत्नी धर्म निभा रही हूँ'

मोहनलाल 'देखो आज जो भी हुआ वो अचानक हुआ और हो सकता है की उसमे तुम्हारी इच्छा शामिल न हो, इसलिए मेरी तरफ से कोई जबरदस्ती नहीं है की जो हुआ उससे मनो. इस सब को कंपनी की शुरुआत के लिए जरुरी समझ कर भूल जाओ'

रुचिका 'अभी तक तू आप और मैं पति पत्नी का शायद नाटक कर रहे हो, लेकिन अब तन और मन दोनों से आपकी पत्नी हूँ, आप चाहे मुझे स्वीकार करें या न करें लेकिन अब मुझे आपकी पत्नी मैंने से भगवन भी मन नहीं कर सकते'

मोहनलाल ने उससे पकड़ कर अपने गले लगते हुए 'कोई मुर्ख hi होगा जो कुदरत के बनाये हुई इस सुंदरता की देवी को असवीकार करेगा. तुम तू पहले से hi मेरे दिल की धड़कन हो'

रुचिका का इतना सुन्न्ना था की उसने मोहनलाल को जोर से हुग कर लिया. उसके बूब्स जैसे hi मोहनलाल की चेस्ट पर दबी तो उसके अंदर एक अजीब सा करंट डूअड़ गया, वो रुचिका के बूब्स को अचे से फील कर सकता था.

मोहनलाल ने भी रुचिका को अपनी बाहों में भर लिया और अपनी छाती से जोर से दबा लिया, उससे आज बहुत hi ाचा लग रहा था और वो रुचिका के बूब्स को महसूस करने में लग गया और उसके आनद में खोये खोये अपने हाथों से उसकी पीठ को सहलाते हुए उसके शरीर की गर्मी को फील करने लगा.

उस्सको बाँहों में जकड़े हुए hi मोहनलाल उस से कहा, “मैंने सोचा भी नहीं था की इस तरह हमारी शादी हो जाएगी और तुम ऐसे दुलहन के लिबास में नज़र होगी'

रुचिका ने मोहनलाल की बाहों में hi रहते हुए कहा, “मैंने भी ऐसा कान्हा सोचा था की आप से इस तरह मेरी शादी हो जाएगी'
 
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