Incest मुझे प्यार करो,,, - Page 68 - SexBaba
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Incest मुझे प्यार करो,,,

यात्रियों से बस पूरी तरह से खचाखच भरी हुई थी,,,देर में पहुंचने के कारण सुगंधा और उसके बेटे को बस में बैठने की जगह बिल्कुल भी नहीं मिली थी,,, सुगंधा के भाई के घर सिर्फ यही एक बस जाती थी अगर आज यह बस छोड़ जाती तो आज का प्रोग्राम रद्द करना पड़ता और उन्हें कल फिर से यही बस पकड़नी पड़ती,,, लेकिन गनीमत था कि सुगंधा और उसके बेटे कोबस की टिकट मिल गई थी और बैठने के लिए नहीं बल्कि खड़े रहने की सुविधा तो उन्हें मिल ही गई थी वैसे बस के बीचों बीच खड़े रहने वाले वह दोनों अकेले नहीं थे बहुत से लोग थे जिन्हें बस में सिर्फ खड़े रहने भर की जगह मिली थी।,,,



पान की दुकान पर खड़े होकर पान खा रहा ड्राइवर कंडक्टर के इशारे का इंतजार कर रहा था।गर्मी का महीना होने के नाते बस के अंदर यात्रियों की भीड़ को देखते हुए और ज्यादा गर्मी का एहसास हो रहा था सुगंध बस के पीछे-पिक खड़ी थी और उसके आगे कुछ औरतें खड़ी थी और सुगंधा के ठीक पीछे अंकित खड़ा था। दूसरों की तरह सुगंधा और उसका बेटा भी बस के चलने का इंतजार कर रहे थे। क्योंकि गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही थी और अगर बस चलना शुरू हो जाती तो , हवा लगने लगती और थोड़ी राहत मिल जाती लेकिन किसी को भी नहीं मालूम था कि बस कब चलेगी इसीलिए सब लोग अपने आप से ही हवा लेने की कोशिश कर रहे थे कुछ और से साड़ी के पल्लू से हवा ले रही थी तो कुछ लोग अपने हाथ में किसी भी सामान से हवा लेने की कोशिश कर रहे थे।

अरे यार चलाओ बस को कितनी गर्मी लग रही है,,,।(पीछे बैठे एक बुजुर्ग यात्री ने बस को चलने के लिए कंडक्टर से बोल तो उसकी बात को सुनकर कंडक्टर बोला,,)



अरे हां चाचा जी बस थोड़ी ही देर में बस चलने वाली है,,,।

लेकिन कब चलेगी देख रहे हो गर्मी से हालत खराब है एक तो बस पूरी तरह से भरी हुई है और ऊपर से यह गर्मी और ज्यादा परेशान कर रही है।

अरे चाचा जी हम भी जानते हैं बस थोड़ी देर और रुक जाओ,,,।(उसे बुजुर्ग यात्री के साथ-साथ सभी को समझाते हुए कंडक्टर ने बोला,, तो दोबारा किसी ने बस चलने के लिए उससे बोला ही नहीं क्योंकि सबको मालूम था कि थोड़ी देर में बस चलने वाली है,,,,)

मुझे पता होता मम्मी ईतनी भीड़ होती है बस में तो मैं कभी नहीं आता,,,।

इसलिए तो कह रही थी कि जल्दी से तैयार हो जा लेकिन तुझे तो हीरो बनकर जाना है थोड़ा जल्दी आ गया होता तो बैठने की जगह तो मिल जाती धीरे-धीरे आने की वजह से ही हम लोगों को खड़े होकर जाना पड़ रहा है,,,(सुगंधा ऊपर की रेलिंग को पकड़करअपने बेटे से बोली और उसकी बात सुनकर अंकित कुछ बोल नहीं पाया क्योंकि वह जानता था कि उसकी वजह से ही देर हुई है उसे नहीं मालूम था कि बस में इस तरह कीभीड़ हो जाती है क्योंकि उसके लिए बस का सफर यह पहली बार का था,,,)



अरे मुझे क्या मालूम था कि बस में इतनी भीड़ हो जाती है,,,।

तेरे मामा के वहां बस यही एक बस जाती है अगर और भी बस जाती तो शायद इतनी भीड़ न होती,,, आप कर भी क्या सकते हैं बस इंतजार कर,,, ड्राइवर पता नहीं कहां चला गया है,,,।(ड्राइवर की खाली सीट की तरफ देखते हुए सुगंधा बोली,,,अगर ड्राइवर की सीट पर कोई बैठा होता तो शायद उसे इतनी जान होता कि आप गाड़ी चलने वाली है लेकिन ऐसा नहीं था कुछ देर तक इसी तरह से ड्राइवर की सीट खाली रही,,, अंकित भी बार-बार ड्राइवर की सीट की तरफ ही देख रहा था उससे ही गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। बस में कहीं पर भी थोड़ी सी जगह नहीं रह गई थी बैठने के लिए जहां पर तीन बैठने चाहिए वहां चार बैठे हुए थे। बस की हालत को देखते हुए अंकित समझ गया था कि बैठने की जगह अब मिलने वाली नहीं है,,,।



लेकिन तभी कंडक्टर ड्राइवर को आवाज लगाया और ड्राइवर की पान की दुकान से पान चबाते हुआबस के अंदर प्रवेश किया और ड्राइवर की सीट पर जाकर बैठ गया ड्राइवर की सीट पर ड्राइवर को बैठा हुआ देखकर सुगंध और अंकित के साथ-साथ बस में सभी यात्री के चेहरे पर राहत के भाव नजर आने लगे क्योंकि उन्हें एहसास हो गया कि अब बस चलने वाली है वैसे भी बस में बैठे-बैठे तकरीबन आधा घंटा गुजर गया था।

ड्राइवर को देखते ही बस में एक दूसरे से सभी लोग बोलने लगे कि अब बस चलने वाली है चिंता मत करो। और इस बात को सुगंधा भी दोहराते हुए बोली।



चिंता मत कर अब बस चलने वाली है।

(सुगंधा का इतना कहना था कि ड्राइवर ने बस को स्टार्ट कर दिया और उसकी आवाज से पूरा माहौल खुशी से जो हम उठा क्योंकि इस समय बस के स्टार्ट होने की आवाज ही लोगों के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव ला रही थी क्योंकि काफी देर से सबको इसी का इंतजार था और बस स्टार्ट होते ही ड्राइवर ने गैर बदला और बस का पहिया आगेबढ़ गया लेकिन आगे बढ़ते ही जो लोग सतर्क थे वह तो बच गए लेकिन जो सतर्क नहीं थे वह आगे की तरफ लुढ़क गई और आगे की तरफ अंकित भी लुढ़क गया और सीधा जाकर अपनी मां के बदन से एकदम से सट गया।,,,,

पल भर में हीअंकित को एहसास हो गया कि आगे का सफर कैसा जाने वाला है क्योंकि वह जिस तरह से अपनी मां के बदन से सटा था,,,पूरी तरह से उसके भारी भरकम गोलाकार ने तंबो से उसके आगे वाला अंग एकदम से जाकर चिपक गया था और अपनी मां की गांड से सटते ही पल भर में ही अंकित का लंड जो की पूरी तरह से सुसुप्त अवस्था में था तुरंत ही उसमें रक्त का प्रभाव बड़ी तेजी से होने लगा और वह खड़ा होने लगा,,,, सुगंधा भी आगे की तरफलेकिन आगे भीड़ थी इसलिए अपने आप को वह संभाल ली थी और वैसे भी वह बस के ऊपर की रेलिंग को पकड़े हुए थे इसलिए वहअपने आप को पूरी तरह से नियंत्रित कर दी थी लेकिन अंकित पूरी तरह से नियंत्रण हो गया था तन से भी और अब मन से भी,,,।



पहली बार इस तरह से अंकित का अपने ऊपर सट जाना सुगंधा समझ सकती थी कि बस के चलने की वजह से ऐसा हुआ था लेकिन जब दूसरी बार ड्राइवर ने ब्रेक मारा था तब फिर से अंकित इस तरह से अपनी मां के बदन से चिपक सा गया था और इस बार उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो चुका था और पेट में तंबू बनाया हुआ था और वह सीधा जाकर उसकी मां की भारी भरकम गांड की दरार के बीचों बीच घुस गया था और तब जाकर सुगंधा को इस बात का एहसास हुआ कि उसके बेटे का लंड उसकी गांड में चुभ रहा था,,, और यह एहसास उसके बदन में उत्तेजना की लहर पैदा करने लगा था लेकिन अगले ही पर अंकित अपने आपको फिर से संभाल लिया था,,,,।

बस मुख्य सड़क पर दौड़ रही थी,,, लेकिन बस के साथ-साथ सुगंधा और उसके बेटे का मन भी बड़ी तेजी से दौड़ रहा था,,,अंकित बार-बार अपने पेट की तरफ देख रहा था जिसमें तंबू बना हुआ था और अपनी मां की भारी भरकम उभरी हुई गांड की तरफ देख रहा था जो उसके तंबू से मात्र दो अंगुल की दूरी पर ही था वह जानता था कि बस में हल्का सा भी धक्का लगने पर वह सीधा उसकी मां की गांड से टकरा जाएगाइसीलिए वह अपने आप को संभाले हुए था और बार-बार अपने इधर-उधर देख ले रहा था कि कहीं कोई उसकी तरफ देखा तो नहीं रहा है लेकिन सब अपने में ही मगन थे,,,।



सुगंधा की हीम्मत नहीं हो रही थी कि पीछे मुड़कर अंकित की तरफ देख ले क्योंकि वह जानती थी कि अगर वह मुड़कर अंकित की तरफ देखेगी तो शायद उसके बेटे कोअपनी गलती का एहसास हो जाएगा और वह अपने बेटे को उसकी गलती का एहसास नहीं करना चाहती थी जो कि उस गलती हो नहीं रही थी बल्कि अनजाने में सब कुछ हो जा रहा था और इस अनजाने में हुई गलती का आनंद सुगंध को भी प्राप्त हो रहा था,,,, बस में सभी इधर उधर की बात करके अपना समय व्यतीत कर रहे थेकिसी का भी ध्यान ना तो अंकित की तरफ था और ना ही सुगंधा की तरफ,,, अंकित बार-बार अपनी मां की भारी भरकम गांड की तरफ देख ले रहा था उसे इस समय अपनी मां की गांड पर को भगाने लग रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी मां खुद अपनी गांड उसकी तरफ करके उसे ललचा रही हो,,,।



अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि ऐसा मौका इस दोबारा मिलने वाला नहीं है भले ही वह कुछ ज्यादा ना कर पाए लेकिन बस के अंदर भीड़ भड़का फायदा लेते हुए वह इतना तो कर ही सकता है कि अपने लंड को अपनी मां की गांड से सटाकर उसकी गर्मी को महसूस कर सकता है। अंकित को इस बात का भी एहसास था कि दो बार वह अपनी मां से सट चुका था,,,पहली बार ना सही लेकिन दूसरी बार सताने पर उसे पूरा विश्वास था कि उसके लिए पेट में बना तंबू सीधे उसकी मां की गांड में धंस गया था जिसका एहसास उसकी मां को भी हुआ होगा,,, लेकिन वह कुछ बोली नहीं इसका मतलब साफ था कि वह भी यही चाहती है,,,,।



सुगंधा के मन में यही सब चल रहा था सुगंध भी अपनी गांड के बीचो-बीच अपनी बेटी के लड्डू को महसूस करके पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी उसे पूरा विश्वास था कि उसकी गांड के बीचों-बीच चुभने वाला अंग कोई और चीज नहीं बल्कि उसके बेटे का लंड ही था और वह अपने मन में सोच कर इस बात से गदगद हुए जा रही थी कि जब साड़ी और पेंट में होने के बावजूद भी उसके बेटे का लंड इतने आराम से उसकी गांड के बीचों-बीच चुभ सकता है तो खुला दौर मिल जाने पर वह तो पूरी तरह से हाहाकार मचा देगा।सुगंधा भी बड़ी बेशबरी से इंतजार कर रही थी कि दोबारा उसके बेटे का लंड उसकी गांड से सट जाए,,,लेकिन बस अपनी रफ्तार में आगे बढ़ रही थी ड्राइवर के द्वारा ब्रेक लगाने का कोई अवसर नहीं मिल रहा था इसलिए ना चाहते हुए भी अपनी मनसा को अपनी युक्ति की शक्ल देकरसुगंधा इस बार जान बुझ कर अपनी भारी भरकम गोल-गोल गांड को पीछे की तरफ ठेल दी और अपने बेटे के लंड से सट गई,,,।



अंकित को तो कुछ समझ में नहीं आया अंकित पूरी तरह से आश्चर्य सेमदहोश हुआ जा रहा था क्योंकि उसकी मां ने हरकत ही कुछ ऐसे की थी अंकित अपने दिमाग पर पूरा जोर दे रहा था कि वाकई में ड्राइवर ने ब्रेक लगाया कि नहीं लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था बिना ब्रेक लगा है उसकी मां पीछे की तरफ अपनी गांड को दे मारी थी जिसका मतलब साफ था कि उसकी मां भी यही चाह रही थी जैसा कि वह चाह रहा था अपनी मां की इस तरह की मदहोशी और उसकी उत्तेजना और उसका उतावलापन देखकर अंकित के तन बदन में उत्तेजना की ज्वाला फूटने लगी वह मदहोश होने लगा,,, सुगंधा की हरकत पर एक बार फिर सेअंकित के पेंट में बना तंबू सीधे उसकी मां की गांड से टकरा गया था,,,, और यह टक्कर दोनों के तन बदन में आग लगा रही थी,,, हालांकि सुगंधा की कोशिश पूरी तरह से सफलतापूर्वक पूरी नहीं हुई थी क्योंकि ऐसे में उसके बेटे का लंड सिर्फ उसकी गांड से टकराया भर था उसके अंदर घुस नहीं था।



लेकिन फिर भी सुगंधा के लिए भी इतना काफी था क्योंकि इतने से भी उसकी गुलाबी बुर पानी छोड़ रही थी,,,अंकित तो गहरी गहरी सांस ले रहा था बस की भीलवाड़ा में कोई उन दोनों की तरफ देखा नहीं रहा था और यही मौका भी था दोनों के लिए अपनी मंजिल तक पहुंचने का,,,,। सुगंधा मन ही मन में उत्तेजित भी हो रही थी और मुस्कुरा भी रही थी। और अपने बेटे की तरफ देखे बिना ही अंकित से बोली,,,।

तुझे कोई दिक्कत तो नहीं हो रहा है ना,,,!

नहीं बिल्कुल भी नहीं,,, बस कितना देर लगेगा पहुंचने में,,,।

बस की रफ्तार पर है जितनी जल्दी पहुंचा दे लेकिन फिर भी काफी समय लग जाएगा।

(अपनी मां के मुंह से इतना सुनकर अंकित अपने मन में ही बोला काश यह सफर खत्म ना हो तो कितना मजा आ जाए और अपने मन में सुगंधा भी यही बात को दोहरा रही थी वह भी इस सफ़र से अत्यधिक उत्तेजित और उत्साहित हो रही थी,, वैसे तो घर पर दोनों के बीच काफी कुछ हो चुका था लेकिन इस कदर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था कि दोनों अपनी सीमा को पूरी तरह से लांघ कर एकाकार हो जाए,, लेकिन आज का यह सफर दोनों की उम्मीद की किरण का सफर था ,,,क्योंकि दोनों के बीच इस तरह का मिलन हो रहा था दोनों के अंगों का स्पर्श हो रहा था यह स्पर्श या मिलन दोनों को एक बिस्तर पर ले जाने के लिए काफी था,,,।



सुगंधा अपनी गांड को आगे लेने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं की थी वह तो मन में यही सोच रही थी कि अंकित भी कुछ हरकत करें और आगे बढ़े ताकि उसके पेट में बना तंबू साड़ी को चीरता हुआ उसकी गांड के बीचों बीच धंस जाए,,, लेकिन तभी अचानक ड्राइवर ने ब्रेक मारा और दोनों के मन की बात पूरी होने लगी उसके ब्रेक मारते ही अंकित भी एकदम आगे की तरफलुढ़क गया और इस बार उसके पेंट में बना तंबू सीधे-सीधे उसकी मां की गांड के बीचोबीच धंसता हुआ,,, सीधे जाकर उसके गुलाबी द्वार पर ठोकर मारने लगा,,, जैसे ही सुगंधा कोअपने बेटे का लंड अपने गुलाबी द्वार पर ठोकर मारता हुआ महसूस हुआ वह पूरी तरह से उत्तेजना से गदगद हो गई,,,क्योंकि उसे उम्मीद से दुगना मिला था,, वह कभी सोची नहीं थी कि इस अवस्था में साड़ी पहनी होने के बावजूद भी और उसके बेटे का लंड पेंट में होने के बावजूद भी सीधे उसकी बुर पर ठोकर मारेगा,,,।



इससे ही सुगंधा को एहसास हो गया था कि उसके बेटे का लंड कितना दमदार है,,, बस में ऐकाएक ब्रेक लगी थी बस एक जगह पर रुक गई थी,,,,,, शायद किसी यात्री को लेने के लिए रुकी थी क्योंकि बाहर दो औरतें खड़ी थी,,, सुगंधाबिना अपने आपको अपने बेटे से अलग किए हुए हैं खिड़की से बाहर की तरफ देखने लगी और वाकई में बस उन दोनों के लिए ही रुकी थी जब वह दोनों बस में चढ़ने लगी तो पीछे बैठे बुजुर्ग ने फिर से आवाज लगाई,,,।

अरे यार कंडक्टर बस तो पहले से ही भरी हुई है और तुम फिर से यात्री चढ़ा रहे हो,,,।

तो क्या हो गया चाचा देख नहीं रहे हो इतनी दोपहर में दौड़ते आखिर जाएंगी कहां,,,,।

(इतना कहकर कंडक्टर इन दोनों की भी टिकट काटने लगा और उसके चढ़ते हीअंकित जो कि अपनी मां से थोड़ा अलग होने की सोच ही रहा था लेकिन अब ऐसा करना मुश्किल था क्योंकि बस में दो यात्री और चढ़ जाने की वजह से थोड़ी सी जगह वह भी खत्म हो चुकी थी,,, अब तो अंकित चाहता तो भी पीछे अपने पैर नहीं ले सकता था और इस तरह से वह अपने लंड को भी अपनी मां की गांड से अलग नहीं कर पा रहा था,,,.



सुगंधा भी मदहोश हुए जा रही थी सुगंधा भी बस में दो यात्री के चढ़ जाने की वजह से हालात को समझ रही थी,,, और अपने मन में सोच रही थी कि अच्छा हुआ कि दो औरतों और चढ़ गई बस में अब उसका बेटा चाहेगा भी तो उससे अलग नहीं हो पाएगा,,,इस बात की खुशी सुगंधा के चेहरे पर एकदम साफ दिखाई दे रही थी और उत्तेजना से उसका चेहरा एकदम लाल भी हो चुका था सुगंधा भी तो उधर देख ले रही थी कि कहीं कोई हम दोनों को देखा तो नहीं रहा लेकिन किसी का भी ध्यान में दोनों की तरफ बिल्कुल भी नहीं थी इस समय भी सुगंधा की गांड में उसके बेटे का लंड घुसा हुआ था,,। सुगंधा अपने मन में यही सोच रही थी की काश यह सफर खत्म ना हो तो कितना मजा आ जाए। और अंकित भी यही चाह रहा था।

उन दोनों औरतों को बस में चढ़ते ही बस फिर से आगे की तरफ बढ़ गई लेकिन अब ना तो सुगंधा अपने आप को अपने बेटे से अलग कर सकती थी ना अंकित,,, दोनों बस की भीड़ में एकदम सटे हुए थे,,,, हालांकि गर्मी सेहालत खराब थी लेकिन फिर भी बस के चलने की वजह से हवा लग रही थी जिसे उन दोनों के साथ-साथ सभी को राहत महसूस हो रही थी,, इस सफर का असली मजा तो मां बेटे ही ले रहे थे,,, सुगंधा को अपनी बुर के द्वार पर अपनी बेटे का लंड एकदम सटा हुआ महसूस हो रहा था,,, और इस अवस्था में वह सोच रही थी कि कहां से उसके लंड और उसकी बुर के बीच साड़ी और पेंट ना होता तो,,, दमदार लंड उसकी बुर की गहराई नाप रहा होता,,,।



सुगंधा और उसका बेटा दोनों हालात को अच्छी तरह से समझ रहे थे,,,घर में दोनों के बीच जो कुछ भी होता था आज उससे कहीं ज्यादा दोनों के बीच हो रहा थाक्योंकि दोनों का अंग एक दूसरे के उसे अंग से स्पर्श हो रहा था जिससे संभोग क्रिया की शुरुआत होती है और यही तो दोनों चाहते ही थे दोनों के मन की मुराद पूरी हो रही थी,,,, रह रहकर सुगंधा की सांस ऊपर नीचे हो जा रही थी,वह जानती थी कि जब उसकी हालत खराब हो रही थी उसके बेटे की क्या दशा होती होगी इसलिए वह फिर से अपने बेटे की तरफ देखे बिना ही बोली,,,।

कोई दिक्कत तो नहीं आराम से खड़ा है ना,,,।

हां मम्मी कोई दिक्कत नहीं आराम से खड़ा हूं,,,(इस बात को बोलकर अंकित अपने मन में सोचने लगा की खास इससे ज्यादा बोलने की उसकी हिम्मत होती तो इस समय अपनी मां से बोल देता की और तो खड़ा ही लेकिन उसका लंड भी खड़ा है तुम अपनी साड़ी ऊपर उठा लो तो ज्यादा मजा आए,,, लेकिन ऐसा कहने की उसकी हिम्मत नहीं हुई,,,लेकिन जिस तरह का आनंद उसे मिल रहा था वह बात नहीं सकता था और ना यह बता सकता था कि इस समय क्या हो रहा है क्योंकि वह जानता था कि उसकी मां को भी सब कुछ मालूम है,,,, अगर वह अनजान होती तो शायद मोटे तगड़े लंड की चुभन से अनजान बिल्कुल भी ना होती,,।



अंकित अत्यंत उत्साहित और उत्तेजित हो चुका था मन तो उसका कर रहा था कि दोनों हाथों से अपनी मां की कमर को थाम ले और हल्के हल्के से अपनी कमर को हिलाना शुरू कर ली हालांकि उसे संभोग क्रिया का ज्ञान बिल्कुल भी नहीं था लेकिन इतना तो जानता ही था की चुदाई कैसे होती है क्योंकि वह अपनी आंखों से राहुल और उसकी मां की चुदाई देख चुका था।,, भीड़भाड़ की वजह से अंकित एकदम से अपनी मां से सात गया था वह इस कदर अपनी मां सेचिपका हुआ था कि उसकी मां का पिछवाड़ा पूरी तरह से उसके बेटे के आगे वाले भाग से चपक सा गया था मानो कि जैसे दोनों के बीच संभोग क्रिया हो रही हो,,, और ऐसे हालात में सुगंधा कोअपने बेटे की नाक में से निकलती गहरी सांस अपनी कनपटी पर महसूस हो रही थी जिसकी वजह से हुआ और उत्तेजित हुए जा रही थी और उसकी बर पानी पानी हो रही थी।



हालात पूरी तरह से बेकाबू हुआ जा रहा था अपनी मां की गांड की खुशबू पाकर अंकित का लंड पूरी तरह से लोहे के रोड की तरह कड़क हो चुका था,,, ऐसा लग रहा था कि अगर सुगंध पेंटि ना पहनी होती तो इस समय साड़ी सहित अंकित का लंड उसकी मां की बुर में घुस गया होता,,,वह तो गनीमत था कि सड़क एकदम समतल थी और बड़े आराम से बस चली जा रही थी अगर ऊपर खबर होता तो शायद इस समय जो एहसास दोनों को होता वह पूरी तरह से दोनों का पानी झाड़ने में सहायक हो जाता,,,।

इसी तरह से मां बेटेआधा सफर से ज्यादा तय कर चुके थे काफी समय हो गया था दोनों को खड़ेरहते लेकिन जिस तरह का हालात दोनों के बीच उत्पन्न हुआ था उसे देखते हुए दोनों को बिल्कुल भी थकावट नहीं लग रही थी बल्कि दोनों बेहद उत्साहित थे,,, रह रहकर सुगंधा अपने पिछवाड़े को पीछे की तरफ दे मार रही थी,,,और अपनी मां की हरकत को देखते हुए अंकित भी थोड़ी छूट चाट लेते हुए और हिम्मत दिखाते हुए अपनी कमर को आगे से मार रहा थाऔर सुगंध को भी इस बात का एहसास हो रहा था कि उसके बेटे ने कौन सी हरकत किया है और मन ही मां अपने बेटे की हरकत से उत्साहित हुए जा रही थी।



दोनों के बीच किसी भी प्रकार का वार्तालाप नहीं हो रहा था लेकिन दोनों के अंग बहुत कुछ कह रहे थे,,, एक तरह से दोनों के अंग दोनों की बोलती को बंद किए हुए थे,,, और ऐसे हालात में खामोश रहना हीं सबसे ज्यादा उचित रहता है,,,अंकित अपने मन में सोच रहा था कि काश इस तरह से अपनी मां की चूची पकड़ने का फिर मौका मिल जाता तो और कितना ज्यादा मजा आता ,,,क्योंकि वह ठीक अपनी मां के पीछे खड़ा हुआ था और उसे अपनी मां की चूची दिखाई दे रही थी क्योंकि उसकी लंबाई उसकी मां से थोड़ी सी ज्यादा थी और उसकी मां की चूचियों के बीच की पतली गहरी खाई भी दिखाई दे रही थी जिसमें डूब जाने का उसका मन कर रहा थाबस के ही स्कूलों के साथ-साथ उसकी भारी भरकम खरबूजे जैसी चूचियां भी रबड़ के गेंद की तरह उछल रही थी जिसे देखने में उसे और भी ज्यादा मजा आ रहा था।



तभी अचानक एक बार फिर से ड्राइवर ने ब्रेक मारा और इस बार,, अंकित का हाथ एकदम से उसकी मां की कमर पर आ गया और जिसे अपने आप को संभालने के लिए अंकित ने अपनी मां की कमर को थाम लियाऔर उसका लंड इस पर कुछ ज्यादा ही अंदर घुसता हुआ पेंटी सहित उसकी मां की गुलाबी बुर की दोनों पत्तियों को हल्का सा खोलकर अंदर की तरफ प्रवेश करने लगा और उसी पर अचानक रुक भी गया,,, इस बार सुगंधा अपने आप पर बिल्कुल भी काबू नहीं कर पाई,,,क्योंकि बहुत देर से वह अपनी उत्तेजना को दबाए हुए थे लेकिन इस बार तो उसके बेटे के लंड ने सारी मर्यादा को सारी दीवारों को तोड़ कर आगे बढ़ चुका था,,,वह कभी सोचा भी नहीं थी कि इस तरह से खड़े-खड़े उसके बेटे का लंड उसकी बुर की इतने करीब पहुंच पाएगा हालांकि कुछ देर पहले ठोकर तो मार ही रहा था लेकिन पेंटी सहित अंदर तक घुस आएगा इस बारे में कभी सोच नहीं थी,,,,।



इसलिए तो उसके मुंह से हल्की सी सिसकारी फूट पड़ी थी जिसे उसके बेटे ने एकदम साफ तौर पर सुना था और उसकी शिसकारी की आवाज सुनकर उसे राहुल की मां याद आ गई थी जब चुदवाते समय इसी तरह की आवाज उसके मुंह से निकल रही थी,,,, ड्राइवर ने इसलिए तेज ब्रेक लगाया था क्योंकिजब कच्ची सड़क शुरू हो गई थी वह बरखबर ऊपर नीचे होते हुए बस को जाना था और यह हालत इस तरह का अवसर दोनों मां बेटे को कभी मिलने वाला नहीं था क्योंकि जैसे ही आगे बस बढ़ने लगी उसमेंहलचल बढ़ने लगी बस हिलने लगी और उसके हिलने की वजह से दोनों का शरीर भी हीलने लगा और बार-बारअंकित का लंड सुगंधा की बुर पर ठोकर मारने लगा मानो के जैसे उसे चोदने की तैयारी कर रहा हो,,,।

जैसे-जैसे बस आगे बढ़ रही थी वैसे वैसे दोनों की हालत और ज्यादा खराब होती जा रही थी और अब तो बस जिस तरह से कच्ची सड़क पर चल रही थी अब अंकित को अपनी मनमानी करने में कोई दिक्कत नहीं आ रही थी वह इस गति का फायदा उठा रहा था बस की चाल की गति के साथ-साथ अपनी कमर की भी गति से वह खेल रहा था। सुगंधा को साफ एहसास हो रहा था कि उसका बेटा अपनी कमर हिला रहा था मानों जैसे कि उसकी चुदाई कर रहा हो और अपने बेटे की ईस हरकत से वह उत्तेजना से गदगद हुए जा रही थी,,,ऐसा नहीं था कि अंकित मनमानी अपनी कमर हिला रहा था वह मौका देखकर जैसे ही गाड़ी हिचकोले खाती वैसे ही अपनी कमर को दे मरता था अपनी मां की गांड पर और यह उसकी यह हरकत इतनी अद्भुत और मदहोश कर देने वाली थी किसुगंधा की ओर से पानी निकलने लगा था वह एकदम से झड़ने लगी थी और झड़ने समय उसके चेहरे का रंग एकदम से बदलने लगा था वह किसी तरह से अपने चेहरे के हाव-भाव को छुपा कर इस तरह से खड़ी रही लेकिन उसका पानी निकल गया था।



लेकिन इस दौरान भी अंकित ज्यो का त्यों बना हुआ था,,, वह अभी भी बरकरार था लेकिनमंजिल आ चुकी थी बस एक जगह खड़ी हो गई और धीरे-धीरे सभी यात्री नीचे उतरने लगे जैसे तैसे करके अंकित बस से नीचे उतरा क्योंकि उसके पेंट में अभी भी तंबू बना हुआ था और जहां पर बस रुकी हुई थी वहां पर जंगली झाड़ियां थी इसलिए वहसभी से नजर बचाकर तुरंत झाड़ियां के बीच चला गया और वहां पेशाब करने लगा था कि उसके पेट में बना तंबू एकदम शांत हो सके,,,, और जब वाकई में सब शांत हो गया तो वह धीरे से अपनी मां के पास आयाजो कि वही खड़ी थी लेकिन उसकी मां शर्म के मारे अपनी नजर अंकित से नहीं मिल पा रही थी और धीरे से एक मिठाई की दुकान पर जल्दी और मिठाई खरीद कर अपने भाई के घर की तरफ जाने लगी जहां से उसके भाई का घर 10 मिनट की ही दूरी पर था।
 
बस के सफ़र के दौरान जो कुछ भी हुआ वह बेहद रोमांचित कर देने वाला था,,,सुगंधा के लिए भी और उसके बेटे के लिए आज मां बेटे दोनों एक अलग ही अनुभव से गुजरे वैसे तो घर के अंदर दोनों में काफी कुछ हो चुका था केवल शारीरिक संपर्क अभी तक नहीं हुआ था लेकिन बस के अंदर दोनों के बीच केवल दोनों के बदन के वस्त्रही बाधा रूप थे,,, वरना तो आज दोनों का मिलान होना बिल्कुल तय था दोनों ने एक दूसरे के अंगों को बेहद करीब से अनुभव किया था दोनों के अंगों की गर्मी दोनों ने बेहद करीब से महसूस किए थे यह एहसास दोनों के तन बदन में एक अजीब सी ऊर्जा का संचार कर रहा था।



अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचकर दोनों के साथ-साथ बाकी के यात्री भी बस से नीचे उतर गए थे और अपने-अपने मंजिल की ओर आगे बढ़ गए थे,,, कई लोग अभी भी वही खड़े थे कुछ लोग खरीदी कर रहे थे कुछ लोग मिठाइयां खरीद रहे थे,,। तो कुछ लोग सब्जियां खरीद रहे थेअंकित की हालात पूरी तरह से खराब थी जिस तरह के हालात से वह गुजरा था वह उसे एक पल के लिए स्वर्ग का अनुभव कर रहा था वह पूरी तरह से मदहोश हो चुका था आज पहली बार उसनेअपने लंड को अपनी मां की गांड की दरार के पीछे बीच उसकी गुलाबी चाहिए के करीब दस्तक देता हुआ महसूस किया था यह उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थीलेकिन इस उपलब्धि के चलती उसके लंड का तनाव पूरी तरह से बरकरार था बस से नीचे उतरने के बाद भी उसका यह तनाव बना हुआ था।



अंकित बिल्कुल भी नहीं चाहता था कि किसी की भी नजर उसके पेट में बने तंबू पर पड़े या उसकी मां ही उसके पेंट में बने तंबू को देख ले भले ही बस के अंदर उसने इसका अच्छी तरह से अनुभव किया हो लेकिन इस समय वह ऐसा नहीं चाहता था इसलिएबस से नीचे उतरने के साथ ही वह घनी झाड़ियां के पास चला गया था और वहां पर जाकर पेशाब करने लगा था क्योंकि जानता था की पेशाब करने के बादउसके लंड का तनाव काफी हद तक सामान्य हो जाएगा और ऐसा ही हुआ जब उसके लंड का तनाव पूरी तरह से सामान्य हो गया तो वह पेंट की चेन बंद करके वापस उसी जगह पर आ गया जहां पर उसकी मां खड़ी थी और तिरछी नजर से अपने बेटे की तरफ देख ले रही थी उसके मन में भी बहुत कुछ चल रहा था एक तरह से उसके मन में दंद युद्ध चल रहा था।



आज उसने जो कुछ भी मैसेज की थी वह उसे उत्तेजना के साथ भी आसमान पर पहुंचा दिया था वाकई में इतनी उत्तेजना का अनुभव उसने कभी नहीं की थी आज पहली बार उसने अपने बेटे के मर्दाना अंग को अपनी गुलाबी छेद के बेहद करीबउसे पर दस्तक देता हुआ महसूस की थी और अपने बेटे के मर्दाना अंग पर मन ही मन गर्भ अनुभव कर रही थी क्योंकि चीजहालत में दोनों खड़े थे और ऐसी अवस्था में उसके बेटे का लंड बड़े आराम से उसकी गुलाबी चिन्ह तक पहुंच रहा था तो उसे पूरा यकीन था कि उसका बेटा अपने लंड से अगर मौका मिल जाए तो उसकी बुर के धागे खोल देगा जो बरसों से एकदम बंद हो चुके हैं,,,। सुगंधा के लिए अपने बेटे के साथ इस तरह का कल्पना करना अब पूरी तरह से आम बात हो चुकी थी,,,शुरू शुरू में जब सुगंधा का आकर्षण अपने बेटे की तरफ बढ़ने लगा था तब वह अपने मन में इस तरह की कल्पना करके आनंदित हो जाती थी लेकिन उसे पछतावा भी होता था एक गिलानी महसूस होती थी लेकिन अब यह ग्लानी धीरे-धीरे मदहोशी में बदलने लगी थी,,,इस तरह की कल्पना करके वह पूरी तरह से मत हो जाती थी और उसे एक अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती थी,,,।



कुछ देर तक बड़े से पेड़ के नीचे खड़े होकर दोनोंइधर-उधर देख रहे थे जो यात्री बस में उनके साथ थे वह धीरे-धीरे बाजार से अपनी-अपनी दिशा की ओर बढ़ने लगे थे लेकिन अभी तक ऐसा लग रहा था की सुगंधा अपनी मदहोशी से उसे बेहतरीन पल की आगोश से निकल नहीं पा रही थी,,,, वह खड़ी होकर अपने चारों तरफ देख रही थी और कसमसा रही थी क्योंकि उसकी पैंटी पूरी तरह से मदन रस से भीग चुकी थी और उसे इस समय उसके गीलेपन से असहजता महसूस हो रही थी,,, या यूं कह लो की उसकी गुलाबी छेद की गली में पेशाब की तीव्रता महसूस हो रही थी लेकिन किसी तरह से अपने आप को संभाल कर वह बिना कुछ बोले एक मिठाई की दुकान की तरफ जाने लगी,,,।



अंकित भी कुछ बोल नहीं रहा था बस अपनी मां के पीछे-पीछे चलता बना और देखते ही देखते दोनों मिठाई की दुकान पर पहुंच गए,,, सुगंधा अपनी हालत पर इस समयथोड़ा सा महसूस कर रही थी और वह ऐसा नहीं चाहती थी कि उसके बेटे को जरा भी है सांसों की उसकी मां को उसकी हरकत खराब लगी है वरना उसका बेटा जो इतनी हिम्मत दिखा कर यहां तक पहुंचा है वह फिर से अपना दो कदम पीछे ले लेगा और वह ऐसा कभी नहीं चाहती थी इसलिए वह पूरी तरह से सहज बनना चाहती थी,,, वह अपने बेटे को इस बात का जरा भी एहसास नहीं दिलाना चाहती थी,, उसकी हरकत से उसे कैसा महसूस हो रहा है अच्छा लग रहा है या बुरा लग रहा है,,,, इसलिए वह बिल्कुल सहज और सामान्य बने रहने का नाटक करते हुए अपने बेटे से बोली,,,।

चल कुछ थोड़ा खा लेते हैं उसके बाद तेरे मामा के लिए भी मिठाई खरीद लेंगे,,,।



तुम सही कह रही हो मम्मी मुझे भी भूख लग रही है ऐसा करो कि जलेबी और समोसा ले लो,,,।(लकड़ी के रखे हुए पट्टी पर धीरे से बैठते हुए अंकित बोला,,,, उसकी बात सुनकर सुगंधा मुस्कुराते हुए दुकानदार से थोड़ी जलेबी और समोसे देने के लिए बोलकर वह भी अपने बेटे के बगल में बैठ गई,,,,, उसके मन में अजीब सी कसमकस चल रही थी,,,उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि बस में जो कुछ भी हुआ उसे बारे में वह अपने बेटे से बात करें या ना करें उसकी मां इनकार भी कर रहा था और अपने बेटे से इस बारे में बात करने के लिए हामी भी भर रहा था,,, उसका मन एक तरफइनकार कर रहा था और दूसरी तरफ उसे समझा भी रहा था कि आगे बढ़ने का यही सही मौका है इस बारे में अगर वह अपने बेटे से बात करेगी तो दोनों के बीच की झिझक धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी और दोनों अपनी मंजिल तक आराम से पहुंच पाएंगे।



सुगंधा को अपने मन की यह बात बड़ी अच्छी लग रही थी,,क्योंकि इस बात से वह भी सहमत थी वह जानते थे कि अपने बेटे से इस तरह की बातें करने से दोनों के बीच ज्यादा खुलापनमहसूस होने लगेगा और दोनों एक दूसरे की बातें आपस में आराम से कर सकते हैं और धीरे-धीरे आगे भी पढ़ सकते हैंक्योंकि बस के अंदर जो कुछ भी हुआ था वह सामान्य बिल्कुल भी नहीं था एक मर्द और एक औरत के लिए जिस्मानी ताल्लुकात के पहले का वह एक तरह का खेल ही था,,, जिससे आगे बढ़ा जा सकता थाअगर दोनों के बीच मां बेटे का संबंध ना होता तो शायद जिस तरह के हालात और मदहोशी दोनों के बदन में छाई हुई थी सुगंधाएक औरत होने के नाते मर्द का साथ पाने के लिए धीरे से अपनी साड़ी को कमर तक उठा देती और अपनी दोनों टांगों के बीच की गली को एकदम से खोल देती ताकि एक अनजान मर्द उसमें आराम से चहल कदमी कर सके,,,।



अंकित भी खामोश था वह भी कुछ नहीं बोल रहा थावैसे भी बोलने लायक उसके पास कोई शब्द नहीं था जैसा अनुभव उसे प्राप्त हुआ था वह बेहद अद्भुत और अतुल्य था जिसके बारे में उसने कभी कल्पना भी नहीं किया था बस का सफर उसके लिए पहला ही था और यह सफर उसके जीवन का यादगार सफर बन चुका था,,,।वह अपनी मां की तरफ नजर मिलाकर देखा भी नहीं पा रहा था वह बाजार में चारों तरफ नजर घूमाकर अपना समय व्यतीत कर रहा था,,, और वह दुकानदार गरमा गरम जलेबी और समोसे छान रहा था,,, थोड़ी ही देर में वह एक कागज मेंदो-दो समय से और थोड़ी-थोड़ी जलेबियां लेकर दोनों के पास आया और अपना हाथ आगे बढ़ाकर दोनों को थमाने लगा,,, सुगंधा और उसका बेटा दोनों हाथ आगे बढ़ाकर उसे दुकानदार के हाथ से समोसे और जलेबी ले लिए और खाने लगे,,,,,, समोसा और जलेबी दोनों काफी स्वादिष्ट थी,,, वैसे मां बेटे दोनों को जलेबी और समोसे कुछ ज्यादा ही पसंद थे।



जलेबी को हाथ में लेकर तोड़ते हुए उसमें से मीठे रस की चासनी नीचे टपक रही थी जिसे देखकर सुगंधा के चेहरे का रंग सुर्ख लाल हो गया क्योंकि उसे अच्छी तरह से महसूस हो रहा था कि जिस तरह से जलेबी से चांदनी टपक रही है इस तरह से उसकी बुर से उसका मदन रस भी टपक रहा था,,, उसकी बुर और जलेबी में कुछ ज्यादा फर्क नहीं था बस फर्क इतना था की जलेबी का रस वह खुद चाटने वाली थी लेकिन उसकी बुर से निकला मदन रस चाटने वाला अभी कोई नहीं था,,,। बस बार-बार उसका रस निकालने वाला उसके पास में ही बैठा था।जलेबी खाते हुए तिरछी नजर से सुगंध अपने बेटे की तरफ देख रही थी और मन ही मां अपने बेटे पर गुस्सा भी कर रही थी,, क्योंकि जिस तरह के हालात से उसे देखते हुए उसे राहुल याद आ रहा था,,,,, क्योंकि उसे अच्छी तरह से मालूम था कि उसके और उसकी मां के बीच शारीरिक संबंध है,,, क्योंकि वहखुद अपनी आंखों से दोनों की अठखेलियों को बाजार में देख चुकी थी।



सुगंधा खुद चाहती थी कि उसका बेटा भी राहुल की तरह हो जाए लेकिन अभी भी उसके मन में झिझक थी जो की धीरे-धीरेदूर हो रही थी लेकिन पूरी तरह से दूर होने में कितना समय लगेगा इस बारे में वह कुछ बात नहीं सकती थी लेकिन धीरे-धीरे उसकी तड़प पूरी तरह से बढ़ती जा रही थी,,, थोड़ी ही देर में दोनों समोसे और जलेबी खाकर पानी पी रहे थे और सुगंधा ने दुकानदार को जलेबी और समोसे पेक करने के लिए भी बोल दी थी,,, दुकानदार को पैसे देकर और उस समस्या और जलेबी या लेकर दोनों फिर से मुख्य सड़क पर आ चुके थे यह देखकर अंकित बोला,,,।

फिर से गाड़ी करना पड़ेगा क्या,,,?

नहीं नहीं यहां से तेरे मामा का घर ज्यादा दूर नहीं है 10 मिनट का ही रास्ता है,,,। पैदल चलेंगे तो अभी पहुंच जाएंगे,,,, वैसे भी अब ज्यादा धूप नहीं है थोड़ी ही देर में शाम हो जाएगी,,,।



ठीक है लेकिन चलना कौन सी दिशा में है,,,?(जी मुख्य सड़क पर दोनों खड़े थे वहां से तीन तरफ रास्ता जाता था इसलिए अंकित पूछ रहा था उसके सवाल पर सुगंधा मुस्कुराते हुए बोली,,,)

यह सामने वाली कच्ची सड़क है ना यहां से जाना है,,,।

यह सामने वाली यह तो बहुत छोटी सड़क है यहां से तो वाहन भी नहीं जाता होगा,,,। और देखो तो दोनों तरफ कितने पेड़ लगे हैं कितना मस्त नजारा है,,।

तभी तो यहां से पैदल ही जाना है,,, यह थोड़ा गांव जैसा ही है,,,।

ओहहह गांव जैसा ही है तब गांव कितना खूबसूरत होगा,,, मम्मी हम लोग गांव क्यों नहीं जाते,,,!(अंकित अपनी मां से आश्चर्य जताते हुए बोला उसकी मां मुस्कुराते हुए जवाब देते हुए बोली)



जरूर चलेंगे,,,, लेकिन अभी समय है,,,। अब चल जल्दी,,,काफी देर से हम लोग यही खड़े हैं बाकी के सभी लोग जो साथ में बस से उतरे थे अपने-अपने घर पहुंच गए होंगे,,,।

सही कह रही हो सिर्फ बस खड़ी है बाकी के सभी लोग गायब है लेकिन क्या यही बस चल जाएगी,,।

हां यही बस चल जाएगी और हम लोगों को सही समय पर पहुंच जाना है वरना यह बस छुटी तो फिर से तेरे मामा के घर रुकना पड़ेगा।

(बस की तरफ देखते हुए दोनों मां बेटे के मन में बहुत कुछ चल रहा था इस वर्ष में एक अद्भुत एहसास दोनों के बदन में और दोनों के दिलों दिमाग पर एक अमिट छाप छोड़ दी थी जिसका एहसास दोनों को गिला करने के लिए काफी था,,, वैसे तोबस में भीड़भाड़ सुगंध को पसंद नहीं रहती थी लेकिन आज की बात ही कुछ और थी आज की भीड़ भाड़ उसे एक अद्भुत सुख प्रदान किया था,,, जिसका वर्णन वह अपने शब्दों में नहीं कर सकती थी,,,।



देखते ही देखते दोनों कच्ची सड़क पर साथ में चलने लगे थेकस्बा पूरा गांव जैसा होने की वजह से इस समय कोई भी नजर नहीं आ रहा था कच्ची सड़क पर केवल मां बेटे ही आगे आगे चल रहे थे,,, सुगंधा आगे चल रही थी औरउसे एक कदम पीछे अंकित चल रहा था वैसे भी अपनी मां के पीछे चलने में अंकित का अपना एक लालच छुपा हुआ होता था क्योंकि वह अपनी मां के पीछे चलते हुए वह अपनी मां की बनावट को अपनी आंखों से देखकर मस्त हो जाता था और इस समय वह कच्ची सड़क पर चल रही थी जिसकी वजह से कसी हुई साड़ी में है उसकी बड़ी-बड़ी गांड बेहद आकर्षक और उत्तेजक लग रही थी,, जिसे देखकर बड़ी मुश्किल से सहज हुआ उसका लंड एक बार फिर से टनटनाने लगा था,,,अंकित अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड देखकर अपनी मन में यही सोच रहा था कि वाकई में गजब की माल है,,,। और सुगंधा भी बार-बार तिरछी नजर से अपने बेटे की तरफ देख ले रही थी और उसे अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि इस समय उसके बेटे की नजर उसके कौन से अंग पर है,,, इसलिए वह अपनी गांड को कुछ ज्यादा ही मटका कर चल रही थी।



सुगंधा भी अच्छी तरह से जानती थी कि जब एक पक्ष कमजोर हो जाए तो दूसरे पक्ष को हमेशा हावी हो जाना चाहिए,,, हालात भी कुछ यही दर्शा रहे थे,,, वह जानती थी किसका बेटा आगे बढ़ने से थोड़ा कतरा रहा है,,, और ऐसे में उसे ही जिम्मेदारी उठानी होगी वह तो भीड़भाड़ की वजह से उसका बेटाथोड़ी हिम्मत दिखा कर अपनी हरकत को आगे बढ़ा दिया था वरना अगर बस में भीड़ भाड़ ना होती तो वह अपने मन से कभी भी आगे ना बढ़ता,,, सुगंधा को अच्छी तरह से याद आता कि भीड़भाड़ और कच्ची सड़क की ऊपर खबर सड़कों पर ऊंची नीची होती हुई बस के रफ्तार का फायदा उठाते हुएबार-बार उसका बेटा अपनी कमर को हिचकोले खिला रहा था आगे पीछे हिला रहा था मानो के जैसे वह किसी की चुदाई कर रहा हो अगर सबको सामान्य होता तो इतनी हिम्मत उसका बेटा कभी नहीं करता,,, और उसकी इसी हिम्मत को सुगंधा को आगे बढ़ाना था ताकि उसके मर्दाना अंग के उसका मन भी पूरी तरह से मर्दाना हो जाए।



यही सब सोचते हुए सुगंधा धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी,,, अपने मन में आगे की युक्तिके बारे में विचार कर रही थी कि आगे कैसे बढ़ता है ताकि उसका बेटा खुद ही उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए मचल उठे तड़प उठे,,,,यह सब सोते हुए वह आगे पीछे काफी दूर तक देख भी ले रही थी कि कहीं कोई आ तो नहीं रहा है लेकिन जेठ की दुपहरी में किसी का नामोनिशान सड़क पर दिखाई नहीं दे रहा था,,, ऐसे भी मदन रस के बहाव के चलते उसे बड़े जोरों की पेशाब लगने लगी थी,,,और यही सही मौका भी लग रहा था उसे अपने बेटे को पूरी तरह से आकर्षित करने के लिए वैसे तो वह यह हथकंडा काफी बार आजमा चुकी थी लेकिन इसका यही फायदा होता था कि उसका बेटा उसके आकर्षण में पूरी तरह से बंधता चला जा रहा था लेकिन आगे नहीं बढ़ पा रहा था,,, बस देखता भर था,,,ना तो इससे आगे करने की कुछ सोचता था और ना ही उसके ईसारे को समझ पाता था।



लेकिन आज उसके धक्को याद करके सुगंधा समझ गई थी कि उसका बेटा भी चुदाई करने के लिए तड़प रहा हैवरना वह अपनी कमर आगे पीछे करके हिलता नहीं वह भी सुख भोगना चाहता है बस कोई झिझक उसे आगे बढ़ने से रोक रही है,,,, और उसकी यही झिझक को सुगंधा खत्म करना चाहती थी दूर करना चाहती थी,,,, इसलिए कुछ देर और आगे चलते हुएएक बड़े से पेड़ के नीचे एकदम से रुक गई और इधर-उधर देखने लगी उसके साथ में अंकित भी रुक गया था उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां यहां क्यो रुक गई है,,,, फिर उसे लगा कि शायदधूप की वजह से वह पेड़ की छांव के नीचे खड़ी हो गई है लेकिन फिर उसे एहसास हुआ कि पूरे सड़क भर पेड़ ही पेड़ हैं धूप तो है ही नहीं इसलिए वह अपने मन में उठ रहे शंका को दूर करने के लिए बोला।



क्या हुआ मम्मी खड़ी क्यों हो गई,,,?

अब कैसे बताऊं तुझे,,,,(अपनी कमर पर दोनों हाथ रखकर इधर-उधर देखते हुए सुगंधा बोली और चेहरे का थोड़ा सा तंग करते हुए वह अपनी युक्ति को कामयाब करना चाहती थी उसकी बात को सुनकर अंकित बोला)

क्यों क्या हो गया,,,?

अरे मुझे बड़े जोरों की पेशाब लगी हैऔर देखना है चारों तरफ झाड़ियां ही झाड़ियां हैं यहां पर तो सांप और बिच्छू का भी डर बना रहता है,,,।

क्या बात कर रही है मम्मी यहां पर सांप बिच्छू भी हैं,,,(सांप बिच्छू का नाम सुनकर एकदम से हैरान होते हुए बोल सांप बिच्छू का नाम सुनकर वह अपनी मां के मुंह से निकले हुए से पेशाब शब्द पर भी ध्यान नहीं दिया था वरना औरत के मुंह से यह सब दे सुनते ही मरते की दोनों टांगों के बीच की बत्ती जलने लगती है,,, इस बात पर उसकी मां भी गौर की थी इसलिए थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए बोली)



अरे बुद्धु मुझे बड़े जोरों के पेशाब लगी और सोच रही हूं कहां करूं इन झाड़ियां में तो कहीं भी कुछ भी निकल सकता है,,,(सुगंधा इस तरह से अपनी कमर पर दोनों हाथ रखकर इधर-उधर देखते हुए बोली,,,, अपनी मां के चेहरे के हाव-भाव को देखकरअंकित को समझ में आने लगा था कि वाकई में उसकी मां को बड़ी जोरों की पेशाब लगी हुई है वह भी इधर-उधर जगह देखने लगा वैसे भी कच्ची सड़क पूरी तरह से खाली थी कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था,,, आदमी तो छोड़ो जानवर का भी नामोनिशान दिखाई नहीं दे रहा था,,, और पेशाब वाली बात पर अब जाकर अंकित का ध्यान गया था और उसके बाद में उत्तेजना की लहर उठने लगी थी और वह भी जगह देखते हुए अपनी मां से बोला,,,,)



, एक काम करो मम्मी बड़े से पेड़ के पीछे चली जाओ वहां आराम से कर लोगी,,,(अंकित उंगली के इशारे से सामने के बड़े पेड़ की तरफ दिखाते हुए बोलाउसे मालूम था कि उसकी मां उसकी आंखों के सामने तो पेशाब करने बैठे कि नहीं इसलिए वह बोल रहा था कि पेड़ के पीछे चली जाओ और इस समय सुगंधा के मन में कुछ और चल रहा था वह पूरी तरह से अपने बेटे के सामने पेशाब करने के लिए बैठना चाहती थी ताकि उसकी बड़ी-बड़ी गोलाकार जवानी उसका बेटा अपनी आंखों से देख सके,,,,इस मौके को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी इसलिए चारों तरफ नजर घूमाकर पूरी तसल्ली कर लेने के बाद वह उसे पेड़ की तरफ जाने लगी और बोली,,,)



मुझे डर लग रहा है पेड़ के पीछे तो मैं जाऊंगी नहीं जंगली झाड़ियां से वैसे भी मुझे यहां डर लगता है,,, मैं पेड़ के पास ही बैठ जाती हूं और हां तो देखते रहना कहीं कोई सांप बिच्छू ना निकल जाए,,,, नहीं तो बहुत परेशानी हो जाएगी,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा अपनी गांड मटकाते हुए बड़े से पेड़ के पास पहुंच गई,,,,अपनी मां की इस तरह की बातों को सुनकर अंकित का दिमाग काम करना बंद कर दिया था उसे तुरंत राहुल की कही गई बात याद आने लगी थी,,, राहुल ने उसे बताया था कि घर की औरतें इसी तरह से अपनी गांड दिखाकर घर के मर्दों को अपना दीवाना बनाती है और उनके साथ चुदवाती है,,, यह बात मन में आते ही अंकित के टांगों के बीच का हथियार खड़ा होने लगाऔर वह धीरे-धीरे कदम आगे बढ़कर बीच सड़क पर खड़ा हो गया जहां से उसकी मां एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,,,।



जिस तरह से उसकी मां ने उसे देखने के लिए हिदायत दे रखी थी उसके चलतेअब उसे चोरी छुपे नहीं बल्कि खुली आंखों से अपनी मां की तरफ देखना था और वह भी पेशाब करते हुए यह एहसास उसके मन में मदहोशी का रस बोल रहा था वह पूरी तरह से मस्त हुआ जा रहा था वह उत्तेजित हुआ जा रहा था,,,, बस उसकी मां के पेशाब करने के लिए बैठने की जरूरत हैअभी भी उसकी मां बड़े से पेड़ के पास खड़ी थी वह पूरी तरह से तसल्ली कर लेना चाहती थी कि कहीं कोई आ तो नहीं रहा है,,,,, लेकिन पूरी तसल्ली कर लेने के बाद सुगंधा अपनी साड़ी को दोनों हाथों से पकड़ ली थी,,,,,और उसे धीरे-धीरे ऊपर उठा रही थी यह एक तरह की मादकता थी जो वह अपने बेटे की जवान नसों में घोलना चाहती थी,,,। और उसकी यह अदा धीरे-धीरे काम भी कर रही थी,,,।



अंकित का दील जोरों से धड़क रहा था,,,, उसके पेट में तंबू बनना शुरू हो चुका थाऔर उसकी मां बार-बार उसे हिदायत भी दे रही थी कि देखते रहना कहीं कोई जानवर आना जाए,,,, और ऐसा कहते हुए धीरे-धीरे अपनी साड़ी को अपनी मोटी मोटी जांघों तक उठा दी थी,,,,अपनी मां की गोरी चिकनी मोटी मोटी केले के तने के समान चिकनी जांघो को देखकर अंकित का मन फिसल रहा था,,,, इस तरह के कुदरत वातावरण के मनोरम दृश्य के साथ-साथ एक खूबसूरत जवान औरत की मादकता भी उसे देखने को मिल रही थी और उसे क्या चाहिए था,,, जिस तरह का एहसास अंकित को हो रहा था वही एहसास सुगंधा को भी हो रहा था सुगंधा की भी बुर पानी छोड़ रही थी,,, सुगंधा को इस बात का डर भी था कि कहीं कोई आ ना जाए,,, भले ही अब तक जेठ की दुपहरी में कोईनजर नहीं आया था लेकिन कोई भरोसा भी नहीं था क्योंकि पास में ही बस्ती शुरू होती थी इसलिए बिल्कुल भी देर ना करते हुए सुगंधा एकदम से अपनी साड़ी को कमर तक उठा दे औरउसके साड़ी उठते ही उसकी बड़ी-बड़ी मदहोश कर देने वाली गांड उसकी पेंटि में नजर आने लगी,,,।



अंकित की तो हालत खराब हो गई उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें वह अपनी नजर को दूसरी तरफ तो घूमा ही नहीं सकता था वैसे अगर उसकी मां नेउससे साफ शब्दों में ना बोली होती देखते रहने को तो वह शायद चोरी छिपे ईस नजारे को देखकर अपनी आंखों को सेंकता,,, लेकिन वह अपनी मां की बात को टाल नहीं सकता था इसलिए अपनी नजर को इधर-उधर ना करके वह सिर्फ अपनी मां को ही देख रहा था और एक बार फिर से उसकी मां अपने शब्दों को दोहराते हुए पीछे मुड़कर अपने बेटे की तरफ देखते हुए बोली,,,)



देखते रहना अंकित मुझे बहुत डर लगता है,,,।(ऐसा कहते हुए वह अपने बेटे की हरकत को देख रही थी और उसकी कामुक हरकत उसकी आंखों में कैद हो चुकी थी वह जब पीछे मुड़कर देखी थी तब अंकित अपनी उतेजना पर काबू नहीं कर पा रहा था और पेंट में बने तंबू को अपने हाथों से दबा रहा था,,, उसके बेटे की यह हरकत देख कर सुगंधा को अपनी युक्ति कामयाब होती हुई नजर आने लगी थी क्योंकि उसकीबेलगाम जवानी का कर उसके बेटे पर बहुत ही बुरा प्रभाव डाल रहा था वह पूरी तरह से उसकी आकर्षण में डूबता चला जा रहा था,,, सुगंधा तुरंत अपनी नजर को फिर से आगे की तरफ कर दी थी क्योंकि वह जताना नहीं चाहती थी कि उसने अपने बेटे की हरकत को देख ली है,,,।



और फिर अपनी पेंटिं को नीचे सरकाने लगी,,,, जिसका बड़ी बेसब्री से अंकित को इंतजार था,,, सुगंधा को भीइस तरह की हरकत तो अपने बेटे के साथ बहुत बार कर चुकी थी उसकी आंखों के सामने कपड़े उतारना कपड़े पहनना अपनी नंगी गांड दिखाना यह सब तो घर में चलता रहता था लेकिन आजखुले में इस तरह से वह अपने बेटे को अपनी जवानी के दर्शन कर रही थी ताकि उसका काम बन सके,,,, पेंटी के नीचे उतरते ही सुगंधा की गोरी गोरी गांड एकदम जवानी से लाल हुई मदहोश कर देने वाली उभारधार गांड उसके बेटे की आंखों के सामने एकदम से उजागर हो गई जिसे देखते ही अंकित की आंखों में वासना के डोरे नजर आने लगे वह पूरी तरह से पागल होने लगा,,,और यह देखकर अपने मन में सोचने लगा कि काश बस के अंदर उसकी मां अपनी साड़ी ऊपर उठा दी होती तो उसका लंड उसकी बुर में घुस गया होता,,,।



पेंटी को जांघों तक नीचे सरकाते हीसुगंधा पेशाब करने के लिए नीचे बैठ गई उसे आज बिल्कुल भी सर में महसूस नहीं हो रही थी अपने बेटे की आंखों के सामने खोलेंगे पेशाब करने में वह तो चाहती थी कि उसका बेटा खुली आंखों से यह सब कुछ देखें और ऐसा हो भी रहा था अंकित सांप बिच्छूपर नजर रखने के बहाने अपनी मां की भरी हुई जवान दे रहा था उसकी बुर से निकलने वाली सिटी की मधुर आवाज उसके कानों में पडते ही वह पूरी तरह से बावला हुआ जा रहा था,,, उसकी सांसे गहरी चल रही थी पेंट में बना तंबू एकदम से अकड़ने लगा था,,,अपनी मां की हरकत को देखकर वह समझ गया था कि राहुल घर की औरतों के बारे में सच ही बोल रहा था,,,,। आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी सुगंधा चुदवाना चाहती थी और उसका बेटा चोदना चाहता था,,,।



सुगंधा पेशाब करने के बादअपने दोनों हथेलियां को अपनी नंगी गांड पर रखकर उसे हल्के हल्के से सहला रही थी,,, एक तरह से अपने बेटे को पागल बना रही थी और फिर एक झटके से अपनी नजर पीछे की तरफ घूमकर अपने बेटे की तरफ देखने लगी और एकदम से मुस्कुरा दी यह मुस्कुराहट अंकित के लिए एक खुला आमंत्रण था एक ही सहारा था आगे बढ़ने का लेकिन अपनी मां की नंगी गांड और उसकी नजर से एकदम से अंकित झेंप सा गया था,,, और अपने तंबू पर से वह एकदम से अपना हाथ हटा दिया था,,, सुगंधा मन ही मन में मुस्कुरा रही थी और फिर धीरे से खड़ी होकर अपनी पेंटि को उपर चढकर अपनी साड़ी को एकदम से नीचे गिरा दी और एक खूबसूरत नाटक पर पर्दा पड़ गया,,,।



बाप रे अब जाकर आराम मिला है,,,(अपने कपड़ों को व्यवस्थित करते हुए अंकित की तरफ आते हुए वह बोली,,,,अंकित तो अपनी मां का खूबसूरत चेहरा देखा ही रह गया था इस समय उसके चेहरे पर भी उत्तेजना के भाव थे और अंकित बावला हुआ जा रहा था अंकित के पेट में तंबू बना हुआ थाएक नजर अपने बेटे के पेंट में बने तंबू पर डालकर,,, सुगंधा चलने लगीऔर अंकित पीछे-पीछे चलने लगा अपनी मां की मटकती गांड को देखकर अंकित अपने मन में ही बोला,,, साली चुदवाने के लिए कितना तड़प रही है और तड़पा रही है,,,, अंकित के पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे लेकिन फिर भी वह बोला,,)

मम्मी तुम्हें सांप और बिच्छू से डर क्यों लगता है,,,?

यह बहुत लंबी कहानी है जब मैं गांव में थी तब मेरे साथ एक हादसा हो गया था तभी से मुझे डर लगता है,,,।



कैसा हादसा,,,!(अंकित आश्चर्य जताते हुए बोला,,,)

फिर कभी बताऊंगी,,,,, आराम से,,,,,।

(थोड़ी ही देर में बस्ती शुरू हो गई थी बस्ती के नाम पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर इक्का दुक्का घर दिखाई दे रहे थे तभी सुगंधा उंगली के ईसारे से एक घर की तरफ इशारा करते हुए बोली,,,)

वह देख वह रहा तेरे मामा का घर,,,,।

वह मम्मी मामा ने तो बहुत अच्छा घर बना रखा है,,,।

तब क्या,,,,?

(घर ज्यादा बड़ा नहीं था तीन कमरों का घर था और छत वाला था,,, घर के पीछे बाथरूम बना हुआ था जहां पर स्नान और सोच किया जाता था,,,, सुगंधा और अंकित दोनों,,, घर पर पहुंच चुके थे,,, घर का दरवाजा खुला हुआ था सुगंधा,, बाहर खड़े होकर आवाज लगाती हुई बोली,,,)



अरे कोई है घर में,,,,।

(आवाज सुनते ही सुगंधा का भाई जल्दी-जल्दी आया वह घर में कोई काम कर रहा था और आते ही एकदम खुश होते हुए बोला,,,)

अरे दीदी तुम,,,, तुम कब आई,,,,।

अरे अभी-अभी आ रही हूं,,,,।

ना कोई खबर ना चिट्ठी,,,!

अरे तेरे घर आने के लिए मुझे खबर देना पड़ेगा,,,।

अरे ऐसी कोई बात नहीं दीदी बस अचानक आ गई इसलिए कह रहा हूं,,,। अंकित तू तो एकदम बड़ा हो गया रे एकदम जवान हो गया है,,,(सुगंधा का भाई अपने भांजे की तरफ देखते हुए बोला तोसुगंधा अपने मन में ही बोली यह तो बड़ा हो गया है लेकिन इसका हथियार भी ज्यादा बड़ा हो गया है,,, और वह अंकित की तरह देखते हुए बोली,,,)



अंकित पैर छुओ मामा के,,,,।

(अंकित एकदम से आगे बढ़ा और अपने मामा के पैर छूने लगा,,,, अभी यह सब चल ही रहा था कि पीछे से एकदम से खुश होते हुए एक खूबसूरत औरत आई वह भी घर में कोई काम कर रही थी और आते ही सुगंधा के पैर छुते हुए बोली,,,)

प्रणाम दीदी,,,, आओ अंदर आओ,,,,

अंकित यह तुम्हारी मामी है पैर छुओ इनके,,,,

(इतना सुनकर अंकित मुस्कुराते हुए आगे बड़ा और अपनी मामी के भी पैर छूने लगा,,,,,, यह देखकर वह तुरंत उसकी बांह पकड़ कर उसे अपने सीने से लगा ली,,,, अंकित अपनी मामी की हरकत पर खुश हो गया था क्योंकि उसके ऐसा करने से उसकी छाती एकदम से उसके सीने से रगड़ खाने लगी थी,,,,,।



थोड़ी देर बाद चाय नाश्ता कर लेने के बाद चारों बैठकर बातें कर रहे थे इधर-उधर की बातें करते हुए सुगंधा बोली,,,।

तुम दोनों के शादी के ईतने वर्ष बीत गई लेकिन अभी तक कोई अच्छी खबर नहीं मिली,,,।

(इस बात को सुनकर अंकित की मामी उदास होते हुए बोली)

क्या करूं दीदी इतनी दवा दवाई तो कर रहे हैं लेकिन कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है कहां नहीं दिखाएं हर जगह दिखाकर थक हार गए हैं,,,, लेकिन कोई परिणाम नहीं मिल रहा है इसलिए अभी इच्छा भी नहीं करती।

धैर्य रखो सब कुछ ठीक हो जाएगा सब कुछ समय से ही होता है एक न एक दिन जरूर तुम्हारी गोद हरि हो जाएगी,,,।



(दोनों की बात को सुनकर अंकित समझ गया था कि उसके मामा मामी के कोई संतान नहीं है,,, अंकित एक नजर अपनी मामी पर डालकर देख ले रहा था ,,, उसकी मम्मी पूरी तरह से जवानी से भरी हुई थी पतला छरहरा बदन,,, बेहद आकर्षक किया थी उसकी मम्मी की और उसकी चुचियों का स्पर्श तो वह अपनी छाती पर महसूस भी कर चुका था,,,, सुगंधा के इस बात पर माहौल थोड़ा गमगीन हो गया था इसलिए माहौल को बदलते हुए सुगंधा बोली,,,)

अपनी जानकारी में अंकित पहली बार तुम दोनों से मिल रहा है क्यों अंकित सच कह रही हूं ना,,,।

बिल्कुल सही मैं तो पहली बार अपने मामा मामी को देख रहा हूं और पहली बार इधर आया भी हूं,,,।

हां सही कह रहे हो अंकित दीदी तुम्हें पहली बार यहां ला रही है,,,।



अब क्या करूं तू तो जानता ही है तेरे जीजा जी के देहांत के बाद से कैसे दिन गुजारी हूं मैं ही जानती हूं,,, अगर टीचर की नौकरी ना होती तो शायद बहुत बुरा हो चुका होता,,,, परीक्षा खत्म हो चुकी थी मेरी भी छुट्टी पड़ चुकी थी इसलिए सोची चलो मामा मामी से ही मिला दुं,,,।

यह तो ठीक किया दीदी लेकिन तृप्ति को क्यों नहीं लाई,,,,(अंकित की मामी एकदम से बोल पड़ी)

क्या करूं उसकी पढ़ाई ही कुछ ऐसी है,,, लेकर तो आना चाहती थी लेकिन उसका लेक्चर उसे आने नहीं दिया,,,,।

तो दीदी शहर में उसे किसके सहारे छोड़ कर आई हो,,,।

पड़ोस में,,, उनके सहारे छोड़कर आई हूं उनकी तृप्ति की उम्र की बेटी है,,, और उन्होंने ही कहा था कि तुम निश्चिंत होकर जो वह संभाल लेगी एक ही दिन की तो बात हैइसलिए तुम्हें कपड़े भी लेकर नहीं आई हूं कल सुबह चली जाऊंगी,,,।



यह क्या दीदी इतने साल बाद आई भी तो सिर्फ एक दिन के लिए,,,।(अंकित की मामी बोली,,)

अरे अब तो आना जाना लगा रहेगा बच्चे भी बड़े हो गए हैं,,,,।

(रात को अंकित की मामी खीर पुरी और सब्जी बनाई,,, जिसे खाने के बाद सोने की तैयारी होने लगी गर्मी का दिन था इसलिए सुगंधा बोली,,,)

हम दोनों का बिस्तर छत पर लगा देना तुम दोनों भी छत पर सोते हो कि नहीं,,,।

नहीं दीदी हम लोग तो कमरे में ही सोते हैं,,,।

गर्मी बहुत है इसलिए हम दोनों का बिस्तर छत पर ही लगा देना हम दोनों को छत पर ही सही रहेगा क्यों अंकित सही है ना,,,।



हां मम्मी यहां पर गर्मी कुछ ज्यादा ही है कमरे में सो नहीं पाएंगे,,,।

चलो ठीक है दीदी तो मैं आप दोनों का बिस्तर छत पर लगा देती हुं,,,,,,,।

(इतना कहकर अंकित की मामी छत पर बिस्तर लगाने लगी और कुछ देर वह लोग बैठकर बातें करते रहे काफी समय बीत जाने के बाद नींद आने लगी तो सुगंधा खुद अंकित की मामी से बोली,,,)

अब मुझे नींद आ रही है तुम दोनों भी जाकर सो जाओ,,,,(इस दौरान बस के सफर के कारण थककर अंकित सो चुका था,,, उसकी तरफ देखते हुए सुगंधा अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) पहली बार बस का सफर किया है इसलिए थक कर सो गया,,,।

ठीक है दीदी अब हम दोनों भी चलते हैं किसी चीज की जरूरत हो तो बता देना,,,।



नहीं अब किसी चीज की जरूरत नहीं है तुम दोनों जाओ आराम करो,,,,।

(थोड़ी ही देर में सुगंधा को भी नींद आ गई,,, लेकिन तकरीबन एक घंटा बीता होगातो उसकी नींद एकदम से खुल गई उसे बड़े जोरों की प्यास लगी थी और बातों ही बातों में उसने पानी रखने के लिए बोलना भूल गई थीइसलिए वह धीरे से हटकर बैठ गई उसकी चूड़ियों की खनक की आवाज सुनकर अंकित की भी नींद खुल गई थी लेकिन वह अपनी आंखों को बंद किए हुए था,,,, वह सोच रहा था कि उसकी मां शायद नींद नहीं आ रही है इसलिए उठकर बैठ गई है कुछ देर बैठने के बादवह धीरे से उठकर खड़ी हुई और छत से चारों तरफ देखने लगी चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा छाया हुआ था केवल इसका दुख का घर में नाइट बल्ब जल रहा था बाकी कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी सुगंधा चलते हुए छठ के कोने की तरफ गई वह शायद पानी केनिकलने का रास्ता देख रही थी और उसे वहीं पर छोटी सी पाइप लगी हुई नजर आई और वह छत से खड़ी होकर दूसरी तरफ देखने लगी तो वह पाइप घर के पीछे खेतों की तरफगई हुई थी जिसमें से पानी नीचे गिरकर खेतों की तरफ चला जाता था।



यह सब अंकित अपनी आंखों से देख रहा था उसकी भी नींद उड़ चुकी थी वह देख रहा था कि उसकी मां कर क्या रही है,,, लेकिन तभीउसकी मां धीरे से अपनी साड़ी पर उठने लगी और देखते ही देखते वह वहीं पर बैठकर पेशाब करने लगी,,, अंकित की आंखों के सामने एक बार फिर से उसकी मां की गदराई गांड दिखाई दे रही थीऔर उसकी गुलाबी बुर से सिटी की आवाज निकल रही थी जो पूरे वातावरण को अपनी मादकता में लपेटे हुए था,,,, यह नजारा देखकर एकदम से अंकित के पेंट में तंबू सा बन गया,,, और वह पीठ के बल लेटा हुआ था,,,इस स्थिति में उसकी मां की नजर उसके तंबू पर पड़ सकती थी लेकिन इस समय न जाने की वह अपने तंबू को छुपाने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं कर रहा था और उसी तरह से लेते हुए ही अपनी मां की रसभरी जवानी का रसपान अपनी आंखों से कर रहा था,,,,थोड़ी देर में सिटी की आवाज आना बंद हो गई तो अंकित समझ गया कि उसकी मां पेशाब कर चुकी है और फिर उसकी मां उठकर खड़ी होगी और पानी डालकर वापस उसी जगह पर आ गई जहां पर अंकित सो रहा था अंकित पर नजर पडते ही,, सुगंधा की आंखों की चमक बढने लगी,,, क्योंकि उसकी नजर उसके बेटे के तंबू पर चली गई थी,,,।



सुगंधा ईस नजारे को देखकर उत्तेजित होने लगी,,, और अपने मन में सोचने लगी की यही तंबू बस के अंदर उसकी गांड में घुसने के लिए बेताब हुआ जा रहा था,,,, यह सोचते हुए वह धीरे से झुकी और अपना हाथ आगे बढ़कर अपने बेटे के पेंट में बने तंबू का स्पर्श करने लगी,,,उसे ऐसा ही लग रहा था कि उसका बेटा गहरी नींद में सो रहा है वह नहीं जानते थे कि उसके बेटे की नींद खुल चुकी है और वह सब कुछ अपनी आंखों से देख रहा था लेकिन इस समय वह अपनी आंखों को बंद करके गहरी नींद में होने का नाटक कर रहा था वह देखना चाहता था कि उसकी मां क्या करती है,,,,हालांकि उसकी सांसों की गति ऊपर नीचे हो रही थी और वह बड़ी मुश्किल से अपनी उत्तेजना पर काबू किए हुए था,,,,।



सुगंधा अपने बेटे की नींद में होने का फायदा उठाते हुएउसके पेट में बना तंबू को छू रही थी स्पर्श कर रही थी जब ईस तरह की हरकत करने पर भी अंकित के बदन में कोई हरकत नहीं हुई तो उसकी हिम्मत बढ़ने लगी और वह एकदम उत्तेजित अवस्था में एक झटके से अपने बेटे के पेंट में बनी तंबू को अपनी मुट्ठी में दबोच ली उसकी ईस हरकत सेअंकित एकदम से मदहोश हो गया उसकी आंख खुलने वाली थी उसकी बदन में हलचल होने वाली थी लेकिन न जाने कैसे वह अपनी उत्तेजना पर एकदम से लगाम लगा दिया था लेकिन अपनी मां की ईस हरकत पर उसका बदन हल्के से कसमसाया जरूर था,,, और अंकित के इस तरह से कसमसाने से सुगंधा एकदम से अपना हाथ पीछे खींच ली,,,, पेंट के ऊपर से ही अपने बेटे के लंड की मोटाई को महसूस करके वह पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी,,,। लेकिन ज्यादा छेड़छाड़करना उसे उचित नहीं लगा क्योंकि वह उसका घर नहीं बल्कि उसके भाई का घर था,,,।

उसे बड़े जोरों की प्यास लगी हुई थी इसलिए हुआ धीरे से सीढ़ियां उतरने लगी और धीरे-धीरे सीढ़ियां उतर कर रसोई घर की तरफ जाने लगी,,,दूसरी तरफ अंकित की हालात पूरी तरह से खराब हो चुकी थी जब उसे एहसास हुआ कि उसकी मां सीढ़ियां उतरकर नीचे जा चुकी है तो वह उठकर बैठ गया था गहरी गहरी सांस लेने लगा था,,,पल भर में ही उसे अद्भुत आनंद की प्राप्ति हुई थी क्योंकि उसकी मां उसके लंड को पहले ही पेट के ऊपर से लेकिन अपनी हथेली में दबोच ली थी यह एहसास उसे पूरी तरह से उत्तेजना से गदगद कर दिया था,,,, कुछ देर तक वह बैठकर अपनी मां के बारे में ही सोचता रहा इतना तो वह समझ गया था कि उसकी मां चुदवाना चाहती है और वह खुद उसे छोड़ना चाहता है लेकिन कैसे आगे बढ़ा जाए बस यही समझ में नहीं आ रहा था,,,तभी अंकित को एहसास हुआ कि उसकी मां काफी देर से नीचे गई है और अभी तक आई नहीं उसे कुछ समझ में नहीं आया कि उसकी मां आखिरकार कर क्या रही है इसलिए वह धीरे से वह भी सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा,,,,।

चारों तरफ अंधेरा थावह कुछ देर खड़ा होकर इधर-उधर देखता रहा लेकिन उसकी मां कहीं नजर नहीं आ रही थी,,, फिर उसे ऐसा लगा कि शायद उसकी मां घर के पीछे टॉयलेट उसे करने के लिए गई हो इसलिए बहुत दिशा में चलने लगा लेकिन तभी उसे एहसास हुआ की खिड़की पर कोई खड़ा है,,,,वह कुछ देर के लिए तो एकदम से घबरा गया क्योंकि अंधेरा था इसलिए उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था,,, और वह डर के मारे आवाज भी नहीं लगा पा रहा था,,,,खिड़की से हल्की-हल्की रोशनी बाहर की तरफ आ रही थी कुछ देर ध्यान से देखने के बाद उसे एहसास समझने लगा की खिड़की पर तो उसकी मां ही खड़ी है लेकिन वह खिड़की में से अंदर क्या देख रही है यह उसके लिए कुतुहल विषय था,, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था,,,,इसलिए वह बिना आवाज के धीरे-धीरे कदम आगे बढ़ते हुए अपनी मां की करीब ठीक उसके पीछे पहुंच गया जहां पर उसकी मां खड़ी थी,,, वह कुछ खिड़की से अंदर की तरफ देख रही थी।

अंकित भी बिना आवाज की खिड़की के अंदर देखने की कोशिश करने लगाउसकी मां खिड़की के अंदर देखने में इतनी तल्लीन हो चुकी थी कि उसे अहसास तक नहीं हुआ कि उसके ठीक पीछे उसका बेटा खड़ा है,,,, और जब उसने खिड़की के अंदर नजर टिकाकर कमरे के दृश्य को देखने की कोशिश किया तो अंदर का नजारा देखकर उसके होश एकदम से उड़ गए,,, कमरे के अंदर उसके मामा मामी की चुदाई कर रहे थे,,,, अंकित के तो एकदम से होश उड़ गए थेइस यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी मां अपने ही भाई और भाभी की चुदाई को तल्लीन होकर देख रही थी,,,,लेकिन तभी अंकित को एहसास हुआ कि उसकी मां भी तो यही चाहती है इसी के लिए तो तड़प रही है वर्षों से,,,।

अंकित भी दूरी बनाकर अंदर की तेरे से को देखने लगा उसे साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी मम्मी उसकी मां के लंड पर चढ़ी हुई थी,,, अंदरनाइट लैंप चल रहा था जिसकी रोशनी में ध्यान से देखने पर सब कुछ साथ दिखाई दे रहा थाउसकी मामी की गांड इस अवस्था में कुछ ज्यादा ही बड़ी लग रही थी और वह अपने पति के लंड के ऊपर जोर-जोर से कुद रही थी,,,,इस दृश्य का असर मां बेटे दोनों पर बेहद कहना पड़ रहा था सुगंधा को तुम बिल्कुल भी आप आज तक नहीं था कि ठीक उसके पीछे खड़ा होकर उसका बेटा भी वही देख रहा है जो वह खुद देख रही थी,,, अंकित और उसकी मां एकदम साफ तौर पर देख रहे थे कि उसके भाई का लंड बड़े आराम से बुर के अंदर बाहर हो रहा था और पूरा कमान अंकित की मामी ने संभाली हुई थी,,,। कमरे के अंदर की सिसकारी की आवाज खिड़की से दोनों के कानों में पड़ रही थी,,, और उस सिसकारी की आवाज को सुनकर सुगंधा की हालत खराब हो रही थी और वह साड़ी को कमर तक उठाकर पेंटी में अपना हाथ डालकर अपनी बुर को मसल रही थी,,,।

उसे पर उत्तेजना का दोहरा असर पड़ा था कुछ देर पहले ही वह पेंट के ऊपर से अपने बेटे के लंड को पकड़ कर आई थी और पानी पीने के लिए रसोई घर की तरफ जा ही रही थी की खिड़की खुली होने से अंदर की रोशनी में अचानक उसकी नजर चली गई थी और अंदर की तेरे को देखकर वह अपने आप को वही रोक दी थी और अंदर के गरमा गरम दृश्य को देखकर वह खुद गर्म होती चली जा रही थी। अंकित के पेट में तंबू बन चुकावह पूरी तरह से मदहोश हुआ जा रहा था इतना तो उसे पता चल गया था कि उसकी मां एकदम चुदवाने के लिए तड़प रही है ऐसे में अगर वह खुद कुछ भी करना चाहे तो शायद उसकी मां इनकार नहीं कर पाएगी,,,,और उसे इस बात का भी एहसास हो रहा था कि उसकी मां अपनी साड़ी को कमर तक उठा दी थी और अपने हथेली को अपनी पेंटि में डालकर अपनी बुर को मसल रही थी,,,, यह एहसास होते ही अंकित से सब्र करना मुश्किल हुआ जा रहा था,,,।

और वह हिम्मत दिखाते हुएएकदम से अपनी मां के बदन से उसके पिछवाड़े से चपक सा गया,,,, उसके पेट में बना था हमको एकदम से उसकी गांड में घुसने के लिए तैयार हो गया,,,, जैसे ही सुगंधा को एहसास हुआ कि उसके पीछे कोई एकदम से उससे सट गया है,,,, तो वह एकदम से कुछ बोलना चाहि वह घबरा गई थी,,,, लेकिन मौके की नजाकत को समझते हुए सुगंधा कुछ बोल पाती से पहले ही अंकित चला कि दिखाता हुआ एकदम से अपने होठों को उसके कान के करीब ले गया और धीरे से बोला,,,,।

अंदर क्या हो रहा है मम्मी तुम यह क्या देख रही हो,,, यह मामी क्या कर रही है,,,,(अंकित जानबूझकर एकदम से अनजान बनता हुआ एकदम भोलेपन से बोल रहा थाजैसे कि उसे कुछ पता ही ना हो लेकिन वह जिस तरह से एकदम से अपनी मां के पिछवाड़े से सटा हुआ था उसका लंड उसकी बुर में जाने के लिए मचल रहा था इस बात का भी एहसास सुगंधा को अच्छी तरह से हो रहा था लेकिन जब उसे पता चला कि उसके पीछे दूसरा कोई नहीं उसका लड़का है तो उसकी जान में जान आई,,,,लेकिन अपने बेटे का सवाल का जवाब हुआ है कैसे देता उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था,,,,अंकित एकदम मदहोश हो चुका था और वह अपने होठों को एकदम अपनी मां के गर्दन पर रख दिया था और गहरी गहरी सांस ले रहा थावह अपनी मां के लाल-लाल होठों का चुंबन करना चाहता था लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी इसलिए केवल अपने होंठों को वह अपनी मां के गर्दन पर रख दिया था लेकिन इतने से ही सुगंधा की बुर भल भला कर झडने लगी,,,,क्योंकि वह दोनों तरफ से मदहोश हो रही थी पीछे से उसका बेटा अपने लंड की रगड़ उसकी गांड पर बढ़ा रहा था और खुद उसकी उंगली की बुर के अंदर बाहर हो रही थी,,।

झड़ते हुए वह गहरी गहरी सांस ले रही थी लेकिन उसे इस बात का डर भी था की कहानी उन दोनों को उसका भाई और उसकी भाभी देख ना ले अगर ऐसा हो गया तो गजब हो जाएगा इसलिए वह ज्यादा कुछ बोली नहीं बस धीरे से बोली,,,।

कुछ नहीं हो रहा है चल इधर,,,,(और इतना कहकर धीरे-धीरे फिर से सीढीओ की तरफ जाने लगी अब अंकित का भी वहां खड़ा रहना उचित नहीं था,,,इसलिए वह भी दबे पांव अपनी मां के पीछे-पीछे चल दिया और थोड़ी देर में दोनों छत पर आकर बैठ गए,,,, अंकित उसी मासूमियत भरे स्वर में बोला,,,।)

मामा मामी क्या कर रहे थे मम्मी,,,, दोनों में झगड़ा तो नहीं हो रहा था,,,।

( अंकित की बात को सुगंधा समझ नहीं पा रही थीवह फैसला नहीं कर पा रही थी कि वाकई में उसका बेटा मासूम और नादान है या सिर्फ मासूम बनने का ढोंग कर रहा है,,,,वह फैसला नहीं कर पा रही थी और अपने बेटे को क्या जवाब दे उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था,,,,, फिर उसे लगने लगा कि वाकई में उसका बेटा अभीमासूम ही है तभी यह सब नहीं समझ पा रहे हैं वरना उसका इशारा पाकर उसकी जगह कोई और होता है तो अब तक तो उसकी चुदाई कर दिया होता,,,, इसलिए वह कुछ सोच समझ कर बोली)

दोनों काफी परेशान है बच्चे को लेकर शादी कितने साल हो गए हैं लेकिन फिर भी अभी दोनों को संतान नहीं है इसलिए दोनों परेशान थे और संतान के लिए कोशिश कर रहे थे,,,, और अब तु ज्यादा सोच मत सो जा ज्यादा देर हो गई है,,,,(इतना कहकर वह खुद बिस्तर पर लैटने लगी,,,,, अंकित की धीरे से पास में सो गयावैसे तो यही मौका था दोनों को आगे बढ़ने का लेकिन न जाने क्यों दोनों आगे बढ़ने से इस समय कतरा रहे थे और कब दोनों की आंख लग गई पता ही नहीं चला सुबह जल्दी से उठकर नहा धोकर नाश्ता करके दोनों तैयार हो चुके थे,,,,वैसे तो दोनों दूसरे कपड़े नहीं लगे थे लेकिन वही कपड़े उतार कर टावल लपेटकर बारी-बारी से दोनों नहा लिए थे,,,।



बाजार तक छोड़ने के लिए सुगंधा का भाई आया था,,, बस में दोनों को बैठने के लिए जगह मिल गई थी क्योंकि अभी भीड़ नहीं थी और जगह मिल जाने की वजह से मां बेटे दोनों के चेहरे पर उदासी सी नजर आ रहे थे उन दोनों को बस में बैठ कर उनका भाई चला गया था और थोड़ी देर में बस भर गई थी ,,,, बस के बहार जाने पर थोड़ी ही देर में बस का ड्राइवर बस चालू करके बस को आगे बढ़ाने लगा,,,,,,,,। दोनों के चेहरे परप्रसन्नता और उदासी दोनों के भाव नजर आ रहे थे क्योंकि एक ही रात में एक ही दिन के सफर में वह दोनों ने बहुत कुछ पाया था और बहुत कुछ पाने का अवसर गंवा दिया था।

एक तरफ मां बेटे के लिए है सफर बेहद यादगार था तो दूसरी तरफ तृप्ति के भी जीवन में एक ही रात में पूरी तरह से बदलाव आ गया था,,,।
 
अपने मामा के घर से अंकित अपनी मां के साथ बस में वापस लौट रहा था वापस लौटते समय अपने मन यही सोच रहा था कि काश बस में पहले की तरह ही भीड़ भाड़ होती और दोनों को खड़े-खड़े ही जाने को मिलता तो कितना मजा आता,,, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था दोनों समय सेपहुंच जाने की वजह से बस में दोनों को अच्छी तरह से बैठने की जगह मिल गई थी,,, दोनों एक दूसरे की तरफ चिंतित मुद्रा में देख रहे थे,, दोनों के चेहरे पर बस में जगह मिल जाने का मलाल साफ दिखाई दे रहा था,,, लेकिन कर क्या सकते थेजगह मिल गई थी तो बैठना ही पड़ता थोड़ी ही देर में बस पूरी तरह से भर चुकी थी ठीक वैसे ही भीड़ थी जैसे आने के समय की यह देखकरअंकित और उसकी मां यही सोच रहे थे कि कुछ देर बाद आती तो कितना मजा आता।



दोनों मां बेटे को यह सफर जिंदगी भर याद कर रहने वाला था क्योंकि जो कुछ भी सफर के दौरान हुआ था इसकी दोनों ने हीं कल्पना नहीं की थी,,, बस के सफर के दौरान दोनों के बीच जिस तरह काआकर्षक और घर्षण हुआ था वह बेहद उन्माद जाकर उत्तेजित कर देने वाला था जिसे याद करके इस समय भी सुगंधा गीली हो जा रही थी,,, और बची कुची कसरघर पर पूरी हो गई थी रात में जब सुगंध पानी पीने के लिए रसोई घर की तरफ जा रही थी और वह रास्ते में ही अपने भाई के कमरे के सामने रुक गई थी क्योंकि खिड़की से वह अपने भाई और बाकी दोनों की चुदाई को देख रही थी उसे नहीं मालूम था कि इस समय उसका बेटा भी वहां आ जाएगा और वह भी ठीक उसके पीछे खड़ा होकर वही दृश्य को देख कर मदहोश हो जाएगा जिसे वह देख रही थी।



खैर जो कुछ भी हुआ वह मां बेटे दोनों के लिए बेहद उनमादक और अतुलनीय था,, जिसे वह दोनों जिंदगी भर नहीं बोलने वाले थे लेकिन इस दौरान तृप्ति के साथ भी उन दोनों से कुछ अलग नहीं हुआ था वह भी इस रात को कभी भूलने वाली नहीं थी,,,वैसे तो सुबह-सुबह अपने भाई के मोटे तगड़े लंड के दर्शन करके वह पूरी तरह से एक स्त्रीत्व का एहसास कर रही थी पहली बार उसे एहसास हो रहा था किएक औरत होकर उसे कितना आनंद प्राप्त होने वाला है,,, अपने भाईके मुसल को देखकर ही वह पूरी तरह से आनंदित हो चुकी थी यह उसके जीवन में दूसरी बार हुआ था जब अपने भाई के लंड को देख रही थी,,, पहली बार तब हुआ था जब वह गहरी नींद में सो रहा था और दूसरी बार तब जब वह पूरी तरह से नंगा होकर अपने कमरे में कपड़ा ढूंढ रहा था,,, अंकित को नहीं मालूम था कि दरवाजे पर उसकी बहन खड़ी है ,, वह तो अपनी ही धुन में नंगा होकर कपड़े ढूंढ रहा था,,,।



लेकिन इस दृश्य को देखकर तृप्ति का शांत मन एकदम से डामाडोल होने लगा था ऐसा लग रहा था कि मानव जैसे शांत तालाब में कोई कंकर फेंक दिया हो,,, बड़ी मुश्किल से तृप्तिइन सब से बाहर निकल पाई थी संदीप के जाने के बाद वह पूरी तरह से टूट गई थी लेकिन जैसे-जैसे हिम्मत करके वहां फिर से अपने आप को मजबूत करके खड़ी हो गई थी जब तक संदीप के साथ थी तो उसे भी ऐसा लगता था कि वह कभी ना कभी अपनी मर्यादा को लांघ जाएगी,,क्योंकि संदीप हमेशा उसके अंगों से छेड़खानी कर देता था और उसकी यह छेड़खानी उसे भी मदहोश कर देती थी एक बार तो अपनी मैडम के बर्थडे में जाने पर उसके घर पर जो कुछ भी हुआ था उसी समय वह संदीप के साथ अपनी मर्यादा को लांघ गई होती,,, लेकिन एन मौके पर किसी के आ जाने की वजह से दोनों अलग हो चुके थे,,,,,उसे समय संदीप के द्वारा उसके तन-बाद में उत्तेजना की मदहोशी का संचार बड़ी तेजी से हो रहा था और वह भी इन तरह की कल्पना में अपने आप को पिरोने लगी थी,लेकिन संदीप के एकाएक चले जाने के बाद वह धीरे-धीरे इन सब बातों से अपने आप को बाहर निकाल देती लेकिन एक बार फिर से अपने ही भाई के मर्दाना अंग को देखकर उसकी पुरानी भावनाएं फिर से जागरूक होने लगी थी,, जिसके चलते हैं उसे अपनी जवानी की आगबुझाने के लिए अपनी उंगली का सहारा लेना पड़ा था और इस खेल में उसे बेहद आनंद की प्राप्ति भी हुई थी।



रात कोखाना खाने के लिए उसे सुषमा आंटी के घर जाना था और रात को वहीं रुकना भी था वैसे तो दिन भर जिस तरह की कल्पना उसके दिलों दिमाग पर छाई हुई थी उसे देखते हुए वह सुषमा आंटी के घर सोने के लिए नहीं जाना चाहती थी क्योंकि वह रात को एक बार फिर से अपनी जवानी की आग को अपनी उंगली से ही बुझाना चाहती थी,,, लेकिन जब सुषमा आंटी के घर गई तो खाना खाने के बाद,,, उन्होंनेबहुत जोर दिया रात को रोकने के लिए और यह भी कहा कि रात को इस तरह से घर पर अकेला रहना ठीक नहीं है तो ना चाहते हुए भी तृप्ति को सुषमा के घर रुकना पड़ा और सोने के लिए उसे सुमन के कमरे में जाना पड़ा वैसे भी सुमन बहुत खुश नजर आ रही थी,,, क्योंकि वह तृप्ति से दोस्ती बढ़ाना चाहती थी,,, और इस दोस्ती से वह अंकित के और करीब पहुंचना चाहती थी वैसे तो सुमन जानते थे कि वैसे भी अंकित पूरी तरह से उसके आकर्षण में कैद हो चुका है जैसा वह कहेंगीवैसा ही अंकित करेगा लेकिन फिर भी ज्यादा मेल जोल के लिए तृप्ति के साथ दोस्ती बढ़ाना उचित था,,।



रात को दोनों इधर-उधर की खूब बातें की हैतृप्ति और सुमन दोनों एक दूसरे में घुल मिल गए थे दोनों को एक दूसरे का साथ बहुत अच्छा लग रहा था बातों ही बातों में सुमन तृप्ति से बोली।

कोई बॉयफ्रेंड बनाई कि नहींवैसे तो इतनी खूबसूरत है मुझे नहीं लगता कि तुझे बनाने की कोई जरूरत होगी खुद ही तेरे पीछे लट्टु बनकर घूमते होंगे मजनू,,,।

(सुमन की यह बात सुनकर उसे पर भर में ही संदीप का ख्याल आने लगा उसके जीवन में केवल संदीप ही था और वह संदीप से बहुत प्यार करती थी लेकिन शायद उसके जीवन में संदीप के साथ आगे बढ़ना नहीं लिखा था लेकिन सुमन की बात सुनकर वह थोड़ा उदास होते हुए बोली,,,)

नहीं यार इन सब के चक्कर में मैं नहीं पड़ी हूं अभी तो पूरा ध्यान पढ़ाई में है,,,।



लेकिन तेरे बदन की बनावट देखकर तो ऐसा ही लगता है कि तू चाहे की ना चाहे 10 15 दीवाने तो होंगे ही,, सही बताना,,,।

अब मैं क्या बताऊं मुझे थोड़ी मालूम है कि मेरे पीछे कौन घूमता है मैं तो अपनी ही धुन में रहती हूं अच्छा छोड़ तू तो जरूर बनाई होगी,,।

क्या करूं नहीं चाहती हूं फिर भी लड़के पीछे पड़ ही जाते हैं,,।

अच्छा कितने बॉयफ्रेंड है तेरे,,,(तृप्ति उत्सुकता दिखाते हुए बोली)

अब तक पांच,,,(मुस्कुराते हुए सुमन बोली)

एकदम सीरियस या टाइम पास,,,।

अब क्या कहूं कुछ समझ में नहीं आता की किसके साथ सीरियस रहूं सच कहूं तो सब मुझे टाइम पास ही लगते हैं क्योंकि जितने भी बॉयफ्रेंड मिलेंगे आखिरकार सबको एक ही चीज चाहिए लड़कियों की,,, तू तो समझ ही गई होगी,,,।



(सुमन की बात सुनकर वह शर्मा गई और शर्मा कर मुस्कुरा दे यह देखकर सुमन अपनी आंखों को नचाते हुए बोली,,,)

चल शुक्र है इतना तो तुझे समझ में आता है मुझे तो लगा कि कुछ भी समझ में नहीं आता होगा,,,।

आप इतना तो समझ में आता ही है इतना भी नादान नहीं है इसलिए तो मैं इन सब चीजों में नहीं पड़ती,, अच्छा यह बात किसी के साथ आगे बड़ी है या,,,(तृप्ति इससे ज्यादा बोल नहीं पाई क्योंकि वह इस तरह की बातें कभी कि नहीं थी वह एकदम से रुक गई थी और उसकी बात का मतलब सुमन अच्छी तरह से समझ रही थी उसकी बात को सुनकर वह मुस्कुराते हुए बोली)

सही कहूं तो अब तक ऐसा कुछ हुआ नहीं है मैं जैसा तुझे पता है कि सभी लड़कों को हम लड़कियों की एक ही चीज चाहिए इसके बाद बोलोरिलेशनशिप तोड़ देते हैं इसीलिए मैं इन सब चीजों में आगे नहीं बढ़ रही हूं एक तो बदनाम होने का डर बना रहता है,,।



सच कह रही है सुमन तू,,एक बार समझ में बदनामी हो गई तो फिर घर से बाहर निकल पाना मुश्किल हो जाएगा और फिर तुम चाहे जैसे भी हो घर के बाहर तो सब तुम्हें दूसरी लड़कियों की तरह ही समझेंगे,,,।

बात एकदम सही है अभी अगले मोहल्ले में मेरी एक सहेली होती है उसके पड़ोस में ही एक लड़की है जो दो-तीन लडको के साथ रिलेशनशिप में थीअब पता नहीं कि उसे लड़की का उन लड़कों के साथ संबंध बना या नहीं लेकिन समाज में तो बात करने लगी और फिर आज तक होगा घर से बाहर निकलना उसके लिए मुश्किल हो गया है,,,।

इसलिए तो कहती हूं की लड़कियों का,, एक-एक कदम आगे बढ़ाना बहुत मुश्किल हो जाता है,,,।

(दोनों की बातें हो ही रही थी कि तभी दरवाजे पर सुषमा आंटी आ गई और वह बोली)

अरे लड़कियों घड़ी में तो देखो कितना बज रहा है 12:00 बजने वाले हैं और तुम दोनों अभी तक बातें कर रही हो चलो अब जल्दी से सो जाओ,,।

ठीक है आंटी मुझे भी नींद आ रही है,,।

वह तो ठीक है लेकिन कपड़े तो बदल लो सलवार कमीज में कैसे नींद आएगी कुछ ढीला ढाला सा पहन लो,,,।



वह तो आंटी में घर पर ही भुल आई हूं,,,।

चलो कोई बात नहीं सुमन का गाउन पहन लो,,,।

(इतना सुनते ही सुमन अपने बिस्तर पर से चहकते हुए नीचे उतर गई और अलमारी की तरफ बढ़ते हुए बोली,)

मैं अभी देती हूं मुझे भी कपड़े बदलना है,,,।

(इतना कहकर वह अलमारी की तरफ आगे बढ़ गई थी और सुषमा यह कहकर वहां से चली गई थी कि कपड़े बदलने के बाद सो जाना,,, सुषमा आंटी से चली गई थी और सुमन अलमारी में से तृप्ति के लिए एक गाउन निकाल रही थी,,, और गाऊन निकालने के बाद उसे तृप्ति की तरफ बढ़ाते हुए बोली,,,)

लो तुम यह पहन लो,,, मैं अपने लिए फ्रॉक ले लेती हूं,,,,(ऐसा कहते हुए अलमारी में से वह अपने लिए एक फ्रॉक निकाल ली और अलमारी को बंद कर दी अभी तक तृप्ति इस तरह से गाउन को हाथ में लेकर बैठी हुई थी और सुमन उसकी आंखों के सामने अपने कपड़े उतार कर केवल ब्रा और पेटी में खड़ी थी यह देखकर तृप्ति के बदन में अजीब सी हलचल होने लगी वह यह देख रही थी कि सुमन उसकी आंखों के सामने बिल्कुल भी शर्म नहीं कर रही है,,, देखते ही देखते वह फ्रॉक को पहन ली थी,,, और सुमन को इस तरह से बिस्तर पर बैठे हुए देखकर वह बोली,,,)



क्या हुआ पहन लो,,,,।

पहनती हूं,,,(ऐसा कहकर वह भी बिस्तर से नीचे उतरने लगी वैसे तो उसने आज तक किसी के भी सामने कपड़े बदली नहीं थी वह या तो बाथरूम में कपड़े बदलती थी या तो अपने कमरे में दरवाजा बंद करके लेकिन सुमन बेझिझक अपने कपड़े बदल ली थीइन सब के बीच तृप्ति की नजर उसकी दोनों चूचियों पर ही थी वह देखकर हैरान थी की सुमन की चुचीया कितनी बड़ी थी,,, उसकी चूचियां अभी भी छोटे से अमरूद की तरह थी,,,तृप्ति इस बात को अच्छी तरह से जानती थी की लड़कियों की खूबसूरती में उसकी चूचियों की गोलाई और उसके उभार ही ज्यादा आकर्षण बढ़ाते हैं,,,इस बात से उसे भी इनकार नहीं था कि वह सुमन से ज्यादा खूबसूरत थी लेकिन बदन की बनावट में इस समय सुमन उससे दो कदम आगे थी,,, यही सब सोचते हुएवह अपनी कमीज पर दोनों हाथ रखकर उसे ऊपर उठने वाली थी कि उसकी आंखों के सामने ही सुमन अपनी पेंटि को भी निकाल कर एक तरफ रख दी थी,,, यह देखकर तृप्ति बोली,,)



अरे तुम तो पेंटी भी उतार दी,,।

सच कहूं तो रात को मुझे बिना कपड़े पहन कर सोने में ही ज्यादा मजा आता है,,, वह तो तुम हो इसलिए ईतना पहन रही हुं नहीं तो नंगी ही सोती हूं,,,

(सुमन कि ईस तरह की बातों को सुनकर तृप्ति थोड़ा हैरान भी थी क्योंकि उसे यकीन नहीं हो रहा था कि सुमन उससे इस तरह से खुलकर बातें कर रही है जबकि वह इस तरह की बातें कभी कि नहीं थी इसलिए सुमन के मुंह से इस तरह की बातें सुनकर उसे हैरानी भी हो रही थी और मजा भी आ रहा था,,, सुमन की बातों को सुनकर वह गहरी सांस लेते हुए बोली,,,)

बाप रे तुम्हारी आदत तो बहुत जानलेवा है,,।

क्यों क्यों,,,?

अरे वह तो अच्छा है किआंटी हैं तुम्हारे कमर में आ जाती होगी तो तुम्हें इस तरह की हालत में देख कर हिरानी नहीं होती होगी अगर सोचो तुम्हारा घर में कोई मर्द होता तो तुम्हारे पापा को छोड़कर समझ लोतुम्हारा कोई भाई होता है और तुम्हें इस तरह की हालत में देख लेता तो क्या होता,,,।

(तृप्ति सुमन से अपने मन की बात बता रही थी जो उसके साथ सुबह में हुआ था,, क्योंकि वह जानती थी कि अचानक से कोई भी कमरे में आ सकता है और उसे इस तरह की हालत में दैखेगा तो क्या सोचेगा,,, लेकिन उसके हैरानी के बीच सुमन मुस्कुरा रही थी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)



यार तब तो मजा नहीं आ जाता सोच घर में अगर अंकित जैसा जवान भाई होता और मुझे इस तरह की हालत में देखता तो उसके मन पर क्या गुजरती,, वह तो मेरी जवानी देखकर पागल ही हो जाता,,,(एकदम से खुश होते हुए सुमन बोली और उसकी बात सुनकर तृप्ति हैरान रह गई और हैरानी जताते हुए बोली)

बाप रे यह क्या बोल रही है अपने ही भाई के बारे में,,, क्या सच में तुझे शर्म नहीं आती,,,!

बिल्कुल भी नहीं आती,,,, वैसे तृप्तितेरे घर में तो जवान लड़का है तेरा भाई क्या तुझे कभी अस्त-व्यस्त हालत में उसने कभी नहीं देखा,,,।

यार यह कैसी बातें कर रही है तू,,,

अरे मैं सच कह रही हूं बताना,,,,।

धत्,,,, मुझे इस तरह की बातें नहीं करनी,,,(ऐसा कहते हुए तृप्ति अपनी कमीज को दोनों हाथों से ऊपर की तरफ ले जाने लगी और अपने मन में सुमन की कही गई बात के बारे में सोच रही थी वैसे तो इस समय सुमन कि ईस तरह की बातें उसे बेहद अच्छी लग रही थी,,, लेकिन वह इस तरह की बातें करना नहीं चाहती थी लेकिन सुमन अपनी जीद पर अड गई थी,,,वह फिर से अपने सवाल को दोहराते हुए बोली,,,)



बताना मुझे कैसी शर्म मैं तो तुझे बता दी हूं,,,।

तू इसलिए बताई है कि तेरे घर में जवान लड़का नहीं है इसलिए अपनी कल्पना को अपने शब्दों में ढाल रही है,,,,(अपनी कमीज को उतार कर बिस्तर पर रखते हुए वह बोली,,,,)

तू तो सच में एकदम बेवकूफ है इस उम्र में भी तुझे यह सब बातें अच्छी नहीं लगती,,, सच कहूं तो सभी घरों में ऐसा होता ही होगा लड़के अपनी बहन को या अपनी मम्मी को ऐसी हालात में देखा ही लेते होंगे जैसे हालात में उन्हें नहीं देखना चाहिए,,,।

तेरी बात मुझे कुछ समझ में नहीं आ रही है कैसे हालात में,,,,।

अरे मेरा मतलब है कपड़े बदलते हुए अब जिस घर में जवान लड़का जवान लड़कीमम्मी पापा रहते होंगे तो उसे घर में कोई ना कोई तो एक दूसरे को देखा ही होगा लड़का अपनी मां को ही अपनी बहन को कपड़े बदलते हुए या बाथरूम में नहाते हुए या फिर पेशाब करते हुए भी देख तो लिया ही होगा और लड़कियां भी अपने भाई को किसी ने किसी हालत में देख लेती होगी या नहाते हुए या नंगा नहाते हुए उनके लंड को,,,,।



(सुमन के मुंह से इस बात को सुनकर तो तृप्ति के तो होश ही उड़ गए खास करके उसके मुंह से लंड शब्द सुनकर उसकी दोनों टांगों के बीच अजीब सी हलचल होने लगी,,,, और पल भर में उसकी आंखों के सामने सुबह वाला दृश्य नजर आने लगा इस समय सुमन की यह बात एकदम सच साबित हो रही थी उसने अपने भाई को नंगा देखी थी उसके लंड को देखी थी,,,, सुमन की बात को सुनकर तृप्ति कुछ बोल नहीं पाई बस जानबूझकरऐसा जताने की कोशिश करने लगी कि उसकी बातें उसे अच्छी नहीं लग रही है इसलिए मुंह बनाने लगी और मुंह बनाते हैं वह अपनी सलवार की डोरी पर हाथ रख दी उसे खोलने के लिए,,, तृप्ति का स्तर का मिजाज देख कर सुमन बोली,,,)

तुझे तो यह सब बकवास लग रहा है पता नहीं जानबूझकर ऐसा कर रही है कि सच में जैसा मैं कह रही हूं वैसा देख चुकी है ऐसा सच में होता है तृप्ति मैंने एक इंग्लिश मूवी में देखी थी,,,।

तो तू इस तरह की फिल्में भी देखती है,,,(हैरान होते हुए तृप्ति बोली)



तो क्या हो गया मेरी सहेलियां भी देखती हैं उन्हीं लोगों ने तो मुझे दिखाई थी,,, एकदम खुला नजारा,,, तुझे पता है उसमे मैंने देखी थी किलड़की अपने भाई को नंगा देख लेती है और उसके मोटे तगड़े लैंड को देखकर उसकी हालत खराब हो जाती है और वह खुद ही अपनी बुर में उंगली डालकर अपनी जवानी की आग बुझाने की कोशिश करती है ऐसा वह दो-तीन बार करती है,,,,(सुमन के मुंह सेऔरत के खूबसूरत अंग का नाम सुनकर तो तृप्ति के होश उड़ गए थे वह अपने मन में सोच रही थी कि वह कभी सपने में भी इस तरह से अपने ही अंगों का नाम उसने खुलकर नहीं ली थी,,,,, लेकिन सुमन थी कि इस तरह की असली शब्दों का प्रयोग हुआ पड़े खुलकर कर रही थी उसके चेहरे पर बिल्कुल भी शर्म का भाव नहीं था वह अपनी बात आगे बढ़ाती हुई बोली,,,)

ऐसा वह तीन-चार बार की लेकिन वह समझ गई थी कैसे उसकी जवानी के पाट्सास बुझने वाली नहीं है क्योंकि उसकी आंखों के सामने बार-बार उसके भाई का मोटा तगड़ा लंड दिखाई देता था जिसे देखकर जिसकी कल्पना करके वह पागल हुए जा रही थी,,,।



फिर उसने क्या की,,,!(एकदम से उत्सुकता दिखाते हुए तृप्ति बोली)

वह समझ गई थी कि अब उसे कुछ ऐसा करना है जिसे देखकर उसका भाई खुद ही उसका दीवाना हो जाए और उसे चोदने के लिए तड़प उठे,,,,।

(सुमन कि ईस तरह की बातेंतृप्ति के होश उड़ा रही थी उसकी दोनों टांगों के बीच की हलचल बढ़ती जा रही थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें सुमन की बातें उसे बेहद लुभावनी लग रही थी जिसे बड़े गौर से वह सुन रही थी,,, गहरी सांस लेते हुए तृप्ति उत्सुकता दिखाते हुए बोली,,,)

फिर उसने क्या की,,,?(इस बार तृप्ति के शब्दों में मदहोशी और मादकता छलक रही थी जिसे अनुभव से भरी हुई सुमन पहचान ली थी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)



फिर क्या था वह लड़की अपने भाई के सामने जानबूझकर कपड़े बदलने लगे उतरने लगी पहनने लगी उसके सामने अश्लील हरकतें करने लगी और ऐसा जताती थी कि जैसे उसे नहीं मालूम है कि वह देख रहा है लेकिन एक दिन वह पूरी तरह से मदहोशी में पागल होने लगी थी और फिर ऐसा कुछ कर दी की उसके मन की इच्छा पूरी हो गई,,,.

ऐसा क्या कर दिया उसने,,,?(उत्सुकता दिखाते हुए तृप्ति बोली,,)

उसकी बहन अच्छी तरह से जानती थी कि उसका भाई किस समय बाथरूम में जाता है और वह उसके जाने से पहले ही बाथरूम में घुस गई और पेशाब करने के लिए बैठ गएऔर इस समय उसका भाई भी बाथरुम में घुस गया उसे नहीं मालूम था कि बाथरूम में पहले से ही उसकी बहन है लेकिन जब उसेइस बात का एहसास हुआ कि बाथरूम में उसकी बहन है तब तक क्लियर हो चुकी थी क्योंकि उसकी नजर उसकी बहन की बड़ी-बड़ी नंगी गांड पर पड़ चुकी थी और वह एकदम से उत्तेजित होने लगा था उसकी बहन पीछे नजर घूमर उसकी तरफ देखने लगी और दोनों की नजरे आपस में टकरा गई,,,, उसका भाईअब पीछे मुड़ना उचित नहीं समझ रहा था और वह धीरे से आगे बड़ा और अपनी बहन का हाथ पकड़ कर उसे खड़ी कर दिया और फिर उसे अपनी बाहों में लेकर उसके होठों का रसपान करने लगा और फिर थोड़ी ही देर में उसका लंड उसकी बुर में घुसा हुआ था,,,।



(सुमन के मुंह से गंदी फिल्म की कहानी और अश्लील शब्दों को सुनकर तृप्ति की हालत पूरी तरह से खराब हो गई थी उसके चेहरे का रंग पूरी तरह से बदलने लगा था वह आश्चर्य से मुंह खोले उसकी बातों को सुन रही थी,, और धीरे से बोली,,,)

बाप रे इंग्लिश फिल्म में ऐसा भी होता है,,।

तो क्या यही सब होता है मेरे पास तो एककिताब भी है जिसमें इस तरह की कहानी लीखी हुई है रुक मैं तुझे बताती हूं,,,(ऐसा कहने के साथ ही वह अलमारी खोलकर झुक गई औरउसे किताब को ढूंढने लगी लेकिन झुकने के साथ ही उसकी नंगी गांड एकदम से हवा में लहराने लगी जिसे देखकर तृप्ति की हालत खराब होने लगी वाकई में गांड का घेराव भी उसकी गांड से कुछ ज्यादा ही था और बेहद आकर्षक लग रहा था,,,सुमन की नंगी गांड को देखकर कृति अपने मन में सोचने लगी कि भले ही खूबसूरती में वह सुमन से एक कदम आगे है लेकिन बदन के आकर्षण में वह उससे भी दो कदम आगे हैं,,,, थोड़ी ही देर मेंसुमन उसे किताब को अलमारी से बाहर निकाल कर उसके पन्नों को पलटते हुए तृप्ति के पास आगे बढ़ने लगी,,,, उस किताब में रंगीन पन्ने भी थे जिसमें संभोग के अलग-अलग आसन में दृश्य छपे हुए थे और उन दृश्य को दिखाते हुए सुमन बोली,,,)

देख कितनी सारी तस्वीरें हैं चुदाई की,,,।

(सुमन की बातें सुनकरतृप्ति अपनी नजरों को अन रंगीन पन्नों से हटा नहीं पाई और उनमें छपे रंगीली संभोग दृश्य को देखने लगी जिंदगी में पहली बार तृप्ति इस तरह की किताब को देख रही थी,,, अलग-अलग संभोग की दृश्य बेहद आकर्षक लग रहे थे और तृप्ति के भी होश उड़ा रहे थे तृप्ति बड़े गौर से उन पन्नों को देख रहे थे वाकई में संभोग का दृश्य कितना लुभावना होता है आज पहली बार तृप्ति को इस बात का एहसास हो रहा था,,, ज्यादातर तृप्ति की नजर रंगीन पन्ने में छपे हीरो केमोटे तगड़े लंड पर टिकी रहती थी और उस मोटे तगड़े लंड को देखकर उसे उसके भाई का लंड याद आ रहा था,,, और वह अपने मन में सोच रही थी कि ऐसा तो बिल्कुल उसके भाई के पास भी है देखो तो सही कैसा लड़की की बुर में घुसा हुआ हैऐसा अपने मन में सोचते ही अनायास उसके मन में ख्याल आ गया कि,,,।



अगर उसके भाई का लंड उसकी बुर में घुसेगा तो बिल्कुल ऐसा ही नजर आएगा,,, ऐसा खयाल उसके मन में आते ही उसकी बुर से मदन रस की बूंदे टपकने लगी,,,,वह पूरी तरह से उत्तेजित हुए जा रही थी वह जिस तरह से किताब देखने में रस ले रही थी उसे देखकर सुमन मन ही मन प्रसन्न हो रही थी क्योंकि उसकी युक्ति पूरी तरह से काम कर रही थी,,,, वह धीरे से तृप्ति से बोली,,,।

कैसी लगी,,,,!

(उसकी बात सुनकर तृप्ति कुछ बोल नहीं पाई उसका मुंह आश्चर्य से खुला हुआ था और वह नजर उठाकर सुमन की तरफ देखी लेकिन कुछ बोली नहीं और वापस पन्ने पलट कर दूसरे दृश्य को देखने लगी, जिसमें हीरोहीरोइन को घोड़ी बनाया हुआ था और पीछे से उसकी बुर में लंड डाल रहा थायह सब नजर तृप्ति के लिए पहली बार था लेकिन वह पूरी तरह से इसमें डूबती चली जा रही थी,,,, यह देखकर सुमन बोली,,,)

तू देखती रह मैं बाथरुम जाकर आती हूं,,,,(और इतना कहकर वह दरवाजा खोलकर कमरे से बाहर निकल गई बाथरूम करने के लिए और सुमन की गैर हाजिरी मेंअपनी सलवार को खोले बिना ही वह बिस्तर पर बैठ गई और उस कीताब के पन्नों को खोलकर बड़े चाव से देखने लगी,,।
 
उस गंदी किताब को तृप्ति को देकर सुमन बाथरूम चली गई थी इस दौरान वह प्यासी नजरों से उसे गंदी किताब के रंगीन पन्नों को देख रही थी, उसे पाने में जितने भी चित्र थेवह बेहद कामुकता से भरे हुए थे और तृप्ति इस तरह के दृश्य को इस तरह की किताब को पहली बार देख रही थी इसलिए उसके दिल की धड़कन एकदम से बढ़ने लगी थी उसमें छपे हुए हीरो की तस्वीर को देखकरउसके मोटे तगड़े लंड को देखकर तृप्ति को अपने भाई का मोटा तगड़ा लंड बना रहा था,,, इस बीच उसे संदीप भी याद आ रहा था और इस समय संदीप के याद आने का कारण भी वही मोटा तगड़ा लंड था,,, तृप्ति अच्छी तरह से जानती थी कि संदीप का लंडचित्र के मुताबिक और उसके भाई के लंड के मुताबिक काफी छोटा और पतला था,,,।



और इस समय जिस तरह के हाव-भाव वहचित्र में छपी हीरोइन के चेहरे पर देख रही थी उससे साफ पता चल रहा था कि औरत की बुर में मोटा लंड की क्या अहम भूमिका है,,, तृप्ति के तो दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी वह बार-बार दरवाजे की तरफ देख ले रही थी और गंदी किताब की तरफ,,, देख ले रही थी जल्दी-जल्दी वह पन्ने पलट रही थी,,, लेकिन तभी वह किताब के बीच वाले पन्ने को खोलकरकर उसमें लिखे शब्दों को पढ़ने लगी जिसे पढ़कर तो उसके होश उड़ गए वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि इस तरह की भी किताब होती होगी जिसमें रिश्तो के बीच चुदाई का इस तरह से वर्णन लिखा होता होगा लेकिन जो कुछ भी हो उसकी आंखों के सामने था उससे वह इनकार नहीं कर पा रही थी कि वाकई में इस तरह की भी किताबें होती हैं,,, उसमें लिखा एक-एक शब्द उसके मन मस्तिष्क पर हथौड़े बरसा रहा थाउसके दिल की धड़कन को बढ़ा रहा था एक तरफ उसे थोड़ा अजीब लग रहा था लेकिन दूसरी तरफइन सबको पढ़ने में उसे अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो रही थी,,,।



दीदी अपनी टांगे खोलो मुझे तुम्हारी बुर देखनी है,,।

क्या करेगा मेरी बुर देखकर,,,,

मुझे उसमें अपना लंड डालकर तुझे चोदना है,,,।

क्या तू ऐसा कर पाएगा,,,।

क्यों नहीं आखिरकार तुम्हारी बुर मेरे लंड के लिए तो बनी है दीदी,,,।

तुझे कैसे मालूम कि मेरी बुर तेरे लंड के लिए बनी है,,,।

मैंने देखा हुं मम्मी की बुर में पापा अपना लंड डालते हैं,,, और तुम्हारे पास बुर है और मेरे पास लंड,,,।

बाप रे इतना शैतान हो गया है तु मम्मी पापा की चुदाई देखता है,,।

तो क्या हो गया तुम भी तो देख रही थी तभी तो मैंने देखा,,,।

मे कब देख रही थी,,।

परसों रात कोजब मैं पानी पीने के लिए उठा था तो मैंने देखा कि तुम खिड़की से मम्मी पापा के कमरे में देख रही थी,,,।

मैं तो बड़ी हूं तू छोटा है मैं देख सकती हूं,,,।

लेकिन मेरा लंड तो पापा से भी ज्यादा बड़ा है।

दिखा तो मैं भी देखूं,,,।



बाप रे तू तो सच कह रहा है रे,,, तू तो मुझे पागल कर देगा ला ठीक से देखने दे,,,,ओहहहहह यह तो बहुत गर्म है अगर इस पर घी रख दो तो वह भी पिघल जाए,,,।

तभी तो कह रहा हूं अब मुझे भी अपनी बुर दिखा दो,,,।

अब तो दिखाना ही होगा लेकिन यह सब तु किसी से कहना नहीं,,,।

किसी से नहीं कहूंगा,,,,।

ले देख,,,,,।

आहहहह दीदी यह तो कितनी गुलाबी है,,,

छूकर देख यह भी तेरे लंड की तरह गर्म है,,, इस पर तो घी रखने की भी जरूरत नहीं है क्योंकि अंदर से ही पिघल कर निकलती है,,, चाट कर देखेगा,,,।

इसे,,,।

तो क्या देखा नहीं पापा कैसे मम्मी की बुर चाटते हैं,,,।



ओहहहहह दीदी इसका स्वाद तो बहुत नमकीन है मुझे बहुत मजा आ रहा है,,,ऊममममममम,,,,आहहहहह,,,

जोर-जोर से चाट मुझे बहुत मजा आ रहा है,,, अगर खुश कर देगा तो मैं भी तेरे लंड को इसमें डालने नहीं दूंगी,,,,आहहहहह तू तो पक्का खिलाड़ी निकला,,, अब मेरी बारी है,,,,।

क्या करोगी,,,?

तेरा लंड चूसूंगी,,,।

सच में,,,

तो क्या देखा नहीं था मम्मी को,,,

देखा था,,,।

आहहहहह आहहहहहहह दीदी मुझे कुछ कुछ हो रहा है,,,,,आहहहहहहह,,,,।

हां बिल्कुल भी देर मत कर इसे मेरी बुर में डाल दे,,,,,

लो दीदी गया,,,।

बस अब जोर-जोर से अपनी कमर हिला,,,,।

आहहहह आहहहहहहह आहहहहहहह बहुत मजा आ रहा है जोर-जोर से धक्का लगा,,,।



(अभी तृप्तिदूसरे पेज पर आगे बड़ी ही थी कि कमरे का दरवाजा खुल गया और सुमन कमरे में दाखिल हो गई यह देखकर वह तुरंत किताब को बंद कर दी उसके चेहरे काहाल एकदम पर हाल हो चुका था उसका गोरा चेहरा सुर्ख लाल हो चुका था वह शर्म और उत्तेजना से तमतमा रही थी,,, कमरे में दाखिल होते ही सुमन मुस्कुराते हुए बोली,,,,)

क्या हुआ मजा आया कि नहीं,,,?

बाप रे में तो सोच भी नहीं सकती कि ईस तरह की भी कहानी होती है,,,।

तुझे अभी कुछ नहीं मालूम हैयह सिर्फ कहानी नहीं ऐसा होता भी होगा,,,। लेकिन तूने अभी तक कपड़े नहीं बदली कपड़े तो बदल ले जल्दी से,,,।

(सुमन समझ गई थी की तृप्ति की हालत खराब हो रही है वह पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी है तभी तो उसके चेहरे का रंग लाल हो चुका था,,,, सुमन की बातें सुनकर प्रीति अपनी जगह से उठकर खड़ी हो गई और अपनी सलवार की डोरी खोलकर उसे उतारने लगी इस समय उत्तेजना के मारे उसके चेहरे पर शर्म के भाव तो दिख रहे थे लेकिन शर्म का नामोनिशान नहीं था वह बड़े आराम से अपनी सलवार उतार कर एक तरफ रख दी और गाऊन को पहनने लगी उसका कसा हुआ छरहरा बदन देखकर सुमन के मुंह में पानी आने लगा और वह उसे छेड़ते हुए बोली,,,)



वाह तृप्ति तेरी चुचीयां तो अभी एकदम अमरुद जैसी है,,, लगता है अभी तक किसी का हाथ नहीं पड़ा है,,,।

मेरा ध्यान अभी पूरी तरह से पढ़ाई में है,,,।

तेरा ध्यान पढ़ाई में है ना लेकिन दूसरों का तो नहीं दूसरों का ध्यान तो तेरी चूचियों पर और तेरी गांड पर ही होगा,,।

तू भी ना,,,,(इसे कहते हुए वह गाऊन उठाकर पहनने लगी,,,)

नहीं मैं सच कह रही हूं,,,, तू सच में बहुत खूबसूरत है,,,।

(एक लड़की के मुंह सेअपनी खूबसूरती की तारीफ सुनकर तृप्ति मन ही मन प्रसन्न हो रही थी उसे अच्छा लग रहा था कि उसके ही हम उम्र की लड़की उसकी खूबसूरती की तारीफ कर रही थी फिर भी वह बेमन से बोली,,,)



चल रहने दे,,, सोने का समय हो रहा है,,, काफी समय हो गया,,,।(ऐसा कहते हुए वह बिस्तर पर लेट गई,,, और उसके बगल में सुमन भी लेटते हुए बोली,,)

तू सो जा मुझे अभी नींद नहीं आ रही है मैं थोड़ी देर तक इस कहानी को पढ़ूंगी,,,।

तू ही पढ़ मैं तो सोने जा रही हूं मुझे नींद आ रही है,,,,(ऐसा कहते हुए वह दूसरी तरफ मुंह घूमाकर करवट लेकर सोने की कोशिश करने लगी वैसे उसे गांधी किताब का असर उसके कोमल मन पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ रहा था,,,उसकी आंखों में भी नींद नहीं थी लेकिन वह अब इस तरह से खुलकर उसके सामने उसे किताब को पढ़ नहीं सकती थी,,।

तृप्ति सोने की लाख कोशिश कर रही थी लेकिन उसकी आंखों में नींद बिल्कुल भी नहीं थी दूसरी तरफ सुमन उस गंदी किताब को पढ़कर गर्म हो रही थी,,, किताबको पढ़ते समय बार-बार उसकी नजर तृप्ति पर चली जा रही थी उसके उभारदार नितंबों पर चली जा रही थी,,,, तकरीबन 1 घंटे का समय गुजर गया था लेकिन ना तो सुमन को नींद आ रही थी और ना ही तृप्ति को बस तृप्ति सोने का नाटक कर रही थी और अपने मन में सोच रही थी कि गंदी किताब की गंदी कहानियों को पढ़कर सुमन को मजा आ रहा होगा,,, उस किताब में लिखा है एक शब्द तृप्ति के मन पर हथौड़े बरसा रहा था,,, और दूसरी तरफ सुमन की हालत खराब हो रही थी उससे रहा नहीं जा रहा था,,,। तृप्ति के साथ उसे कुछ करने का मन कर रहा है क्योंकि जो आग उसके गुलाबी छेद में लगी हुई थी उसकी आग बुझाना बेहद जरूरी हो गया था और वैसे भी सुमन के लिए यह कोई नया नहीं था अपनी सहेली के साथ वह इस तरह का खेल खेल चुकी थी और उसे मालूम था कि इसमें भी बहुत मजा आता है,,।



काफी देर तक बात तृप्ति की तरफ देखती रही तृप्ति के बदन में किसी भी प्रकार का हलचल नहीं हो रहा था तो उसे ऐसा ही लगा कि वह गहरी नींद में सो रही है,,, इसलिए हिम्मत दिखाते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाई और उसके गोलाकार नितंबो पर रख दी,,,जैसे ही तृप्ति को सुमन का हाथ अपनी गांड पर महसूस हुआ उसके बदन में अजीब सी हलचल होने लगी वह अपनी नज़रें घूमाकर सुमन की तरफ देखना चाहती थी वह देखना चाहती थी कि वह ऐसा क्यों कर रही है उसकी गांड पर हाथ क्यों रख रही है,,,अभी वह ऐसा सोच ही रही थी कि सुमन हिम्मत दिखाते हुए उत्तेजना के चलते गाउन के ऊपर से ही उसकी गोल-गोल गांड को सहलाना शुरू कर दी,,अब तृप्ति कुछ बोलना भी चाह रही थी तो भी नहीं बोल पा रही थी न जाने क्यों सुमन की हथेली का असर उसे पर छाने लगा था,,,, सुमन का इस तरह से सहलाना उसे अच्छा लगने लगा था,,,उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी थी और वह देखना चाहती थी कि अब इससे ज्यादा बढ़कर सुमन क्या करती है,,,।



गंदी कहानी और अपने बगल में खूबसूरत लड़की की मौजूदगी उसे पूरी तरह से मदहोश कर रही थी,,, गंदी किताब के रंगीन पन्ने उसके जीवन में भी रंग भर रहे थे उसकी कल्पनाओं काघोड़ा बड़ी तेजी से दौड़ रहा था और वह अपनी कल्पना को हकीकत में बदलना चाहती थी जिसकी शुरुआत उसने कर दी थी सुमन एक लड़की के मन को अच्छी तरह से समझती थी और गंदी किताब को देखते समय जिस तरह के हाव-भाव तृप्ति के चेहरे पर बदल रहे थे उसे देखकर सुमन समझ गई थी कि बस उसके पहल करने की देरी है और यह लड़की एकदम से पिघल जाएगी,,, सुमन कुछ देर तक उसके नितंबों को गाउन के ऊपर से ही सहलाती रही इतना तो समझ ही गई थी की तृप्ति पूरी तरह से चिकनी थी,,, और इस क्रिया को करने में सुमन को भी मजा आ रहा था।



जब सुमन ने देखी कि उसकी हरकत के बावजूद भी तृप्ति के बदन में किसी भी प्रकार की हरकत नहीं हो रही है तो उसकी हिम्मत बढ़ने लगी,,, उसे यकीन हो गया था कि वह पूरी तरह से गहरी नींद में सो रही है और वह इसका पूरा फायदा उठाना चाहती थी इसलिए धीरे-धीरे उसके गाऊन को ऊपर की तरफ उठाने लगी,,,ऊपर वाला भाग तो बढ़िया आराम से उसकी कमर तक पहुंच चुका था लेकिन उसके नितंबों के नीचे दबा हुआ उसका गाउन ऊपर की तरफ सरक नहीं पा रहा था,,,लेकिन ऊपर से भी उसकी चिकनी जाने और उसके नितंबों का आकार पूरी तरह से दिखाई दे रहा था जिसे देखकर सुमन के मुंह में पानी आने लगा था और उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में भी मदन रस इकट्ठा हो रहा था,, सुमन गहरी सांस लेते हुए उसकी गोल-गोल गोरी गोरी गांड को सहलाना शुरू कर दी।



इसका प्रभाव तृप्ति के मन पर और उसके बदन पर बहुत ही गहरा पड़ रहा था,,,, उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थीउसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें सुमन की हथेली का जादू उस पर पूरी तरह से छाने लगा था,,, यहां तक की उसकी गुलाबी छेद से मदन रस टपकना शुरू हो गया था,,, तृप्ति का भी मन भटक रहा था वह भी खुलकर मजा लेना चाहती थी,,, लेकिन आगे बढ़ने से डर रही थीक्योंकि वह एक सीधी साधी और संस्कारी लड़की थी इस तरह की हरकत करने के बारे में वह सोच भी नहीं सकती थी लेकिन सुमन ने अपनी हरकतों से उसके बदन में जवानी की उमंग को उछालना शुरू कर दी थी,,, उसकी सांसों की गति के साथ उसके छोटे-छोटे अमरुद भी ऊपर नीचे हो रहे थे उसके छोटे अमरुद भी खुली हवा में सांस लेना चाहते थे ऐसा लग रहा था कि ब्रा की कैद में उन अमरूदों का विकास नहीं हो पाया है,,,। एक तरफ तृप्ति की हालत खराब हो रही थी वहीं दूसरी तरफ सुमनका दिमाग बड़ी तेजी से चल रहा था अब तक उसने किसी भी प्रकार की हलचल को तृप्ति के बदन में महसूस नहीं की थी इसलिए उसकी हरकत और उसकी हिम्मत दोनों बढ़ती चली जा रही थी।

इन सभी हरकतों से उसकी खुद की बरु पानी छोड़ रही थी,,,और इसीलिए वह देखना चाहती थी कि उसके इस हरकत का असर तृप्ति पर कितना पड़ रहा है इसलिए वह उसकी बुर को टटोलना चाहती थी,,,, इसलिए वह अपनी हथेली कोऔर भी ज्यादा हरकत मिलना चाहती थी उसकी गोल-गोल कांड को सहलाते हुए वह धीरे-धीरे अपनी हथेलियां को ऊपर की तरफ ले जाने लगी और जैसे-जैसे उसकी हथेली ऊपर की तरफ बढ़ रही थी वैसे-वैसे तृप्ति की हालत पल-पल खराब होती जा रही थी उसे लग रहा था कि उसकी बुर से मदन रस का लावा फूट पड़ेगा,,, क्योंकि वह जानती थी किस तरह की स्थिति में ऐसा ही होता है,,, उसकी हालत इतनी खराब थी कि वह खुद अपनी बुर को अपनी हथेली में लेकर मसलना चाहती थी,,,,एक तरफ सुमन की हथेली और उंगलियों से उसके बदन में गुदगुदी का एहसास हो रहा था औरदूसरी तरफ मदहोशी से वह पूरी तरह से डूबती चली जा रही थी देखते ही देखते वह गाउन में अपना हाथ डालकर अपनी हथेली को उसके कमर के ऊपरी हिस्से उसके पेट पर लेकर आ चुकी थी,,,।



तृप्ति की सांसों की गति के साथ-साथ उसका पेट भी ऊपर नीचे हो रहा था जिसका एहसास सुमन को अपनी हथेली पर बराबर हो रहा था सुमन अपने मन में सोच रही थी कि यह लड़की कितना सोती है ऐसा लग रहा है कि जैसे घोड़े बेचकर सो रही हो,,, अगर नींद में कोई इसकी चुदाई करके चला जाए तो ईसे पता भी ना चले,,,। यही सब सोचते सोचतेसुमन की हरकत बढ़ने लगी और वह धीरे-धीरे उसकी पेंटि के अंदर अपनी उंगली को सरकाना शुरू कर दी,,, उसकी इस हरकत पर तृप्ति की सांसे थमने लगी,,, उसकी हालत और भी ज्यादा खराब होने लगी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें बस इस पल को अपनी आंखों को बंद करके महसूस कर रही थी। और वैसे भी दिन भर जो कुछ भी हुआ था वह सब बिल्कुल ताजा ही था जिसकी मदहोशी में वह अभी तक थी और उसकी मदहोशी को सुमन और भी ज्यादा बढ़ाने लगी थी,,,

सुमनउस गंदी किताब को एक तरफ रख दी थी और अपना पूरा ध्यान तृप्ति के ऊपर टीकाए हुए थी,,, दिल की धड़कन लगातार बढ़ती जा रही थी बदन में कम से हाथउत्पन्न हो रही थी लेकिन किसी तरह से वह अपने आप को संभाले हुए थी,, लेकिन वह अच्छी तरह से जानती थी कि अब ज्यादा देर तक वह अपने आप को संभाल नहीं पाएगी वह पूरी तरह से बेकाबू होती जा रही थी,, और धीरे-धीरे सुमन की उंगलियां आगे बढ़ती जा रही थी,, जैसे-जैसे सुमन की उंगली उसके बुरे के करीब पहुंच रही थी वैसे-वैसे उसकी दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी और उसका बदन संकुचा जा रहा था। और फिर सुमन की उंगलियां उसके मंजिल तक पहुंच गई,,, पल भर में ही सुमन का एहसास हो गया कि तृप्ति की बुर पूरी तरह से गर्म आ चुकी थी और उसमें से मदन रस भी टपक रहा था जो उसकी हथेली में लग गया था इस बात से वह बेहद खुश थी कि नींद में होने के बावजूद भी उसका अंतर्मन पूरी तरह से काम कर रहा था। और दूसरी तरफ जैसे ही तृप्ति को अपनी बुर पर सुमन के कोमल हथेली का स्पर्श हुआ,, वह पूरी तरह से रोमांचित हो गई,, अब उसे सब्र करना मुश्किल हुआ जा रहा था,,, वह समझ गई थी कि अब शांत रहने में भलाई नहीं है इसलिए वह तुरंत एकदम से नजर घूमाकर सुमन की तरफ देखने लगी और बोली,,,।



यह क्या कर रही है तू,,,?

तू बहुत खूबसूरत है तृप्ति,,, तेरी जवानी देखकर मुझसे रहा नहीं जा रहा है,,,(सुमन इस तरह की स्थिति से निपटना अच्छी तरह से जानती थी वह जानती थी किउसे क्या करना है एक लड़की होने के नाते उसे अच्छी तरह से मालूम था कि एक लड़की अपनी खूबसूरती की तारीफ सुनकर एकदम से पिघल जाती है और वही उसने की भी थी जिसका असर तृप्ति के चेहरे पर एकदम साफ दिखाई दे रहा था,,, सुमन की बात सुनकर तृप्ति एकदम सेसुमन की आंखों में देखने लगी और यही मौका था जब दोनों को एक होना था और इस मौके को सुमन अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी,,,सुमन एकदम अपने प्यास होठों को उसके लाल-लाल होठों की तरफ आगे बढ़ाने लगी और अगले ही पल दोनों के होठ आपस में सट गए थे,,,,,।

तृप्ति को तुरंत संदीप याद आ गयाजब वह ट्यूशन से अपने घर की तरफ लौट रही थी और अपने घर के पीछे वाली सड़क पकड़कर,, जहां पर हमेशा अंधेरा ही रहता था शाम के वक्त कोई आता जाता नहीं था और उसी समय वहां पर संदीप खडा होकर उसका इंतजार कर रहा था,,,और उसे देखते ही तुरंत उसके सामने आ गया था तृप्ति कुछ समझ पाती ईससे पहले ही,,वह उसे अपनी बाहों में भरकर उसके लाल-लाल होठों पर अपने होठ रखकर उसके होठों का रसपान करने लगा था,,, जिंदगी में यह तृप्ति का पहला चुंबन थाऔर वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी वह तो सही समय पर वह पूरी तरह से होश में आ गई थी वरना उसी दिन संदीप उसके कौमार्य को भंग कर दिया होता,,,,और वही हरकत आज सुमन उसके साथ कर रही थी लेकिन आज वह पूरी तरह से होशो हवास में थी,,,।



सुमन का यह सुमन पूरी तरह से गहरा होता जा रहा था जिसमें तृप्ति भी उसका सहकार करने लगी थी तृप्ति को भी बेहद आनंद की प्राप्ति हो रही थी जब सुमन ने देखी की तृप्ति पूरी तरह से मदहोश हो रही है तो वह अपनी हथेली को उसकी गुलाबी बर पर जोर-जोर से रगड़ना शुरू कर दी जिसका असर तृप्ति के बदन में बेतहाशा उत्तेजना प्रकट कर रहा था और तृप्ति कसमसा रही थी,,,सुमन की हरकत से तृप्ति पूरी तरह से मदहोश हुए जा रही थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करना है लेकिन सुमन की हरकत का वह पूरा आनंद ले रही थी सुमन एक ही समय में दोनों तरफ से उस पर प्रहार कर रही थी। और इस प्रहार से बचने का तृप्ति के पास कोई रास्ता नहीं था,,,तृप्ति धीरे-धीरे सुमन की हरकत से उत्तेजित हुए जा रही थी वह मदहोश में जा रही थी और धीरे से अपने हाथ कोसुमन की पीठ पर रख दीजिए जिसे सुमन का मनोबल और ज्यादा बढ़ने लगा और देखते ही देखते हो अपनी बीच वाली उंगली को धीरे-धीरे उसकी बुर के अंदर सरकाना शुरू कर दी,,, जब तृप्ति को यह एहसास हुआ तो वह मदहोशी के सागर में डूबने लगी,,,।

लेकिन तृप्तिकी मदहोशी को देखकर सुमन अपनी उंगली को एकदम से रोक दी क्योंकि वह समझ गई थी कि अब खेल में मजा आने वाला है,,,, और पल भर के लिए उसके होठों से अपने होठों को अलग करकेबिस्तर पर बैठे-बैठे ही वह अपनी फ्रॉक को दोनों हाथों से पकड़ कर ऊपर की तरफ खींचने लगी और अगले ही पल अपने बदन से अपनी फ्रॉक को उतार कर नीचे जमीन पर फेंक दी,,,बिस्तर पर वह केवल ब्रा में ही थी जिसमें से उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां एकदम मस्त लग रही थी,, सुमन की हरकत को तृप्ति प्यासी आंखों से देख रही थीतृप्ति भी समझ गई थी कि अब आगे बहुत कुछ होने वाला है जिसे रोक पाना उसके बस में अब बिल्कुल भी नहीं था,,,,मुस्कुराकर तृप्ति की तरफ देखते हुए सुमन अपने दोनों हाथों को पीछे की तरफ लेकर और अपनी ब्रा का हुक खोलते हुए बोली,,,।



अब आएगा असली मजा,,,(और इतना कहने के साथ हीसुमन अपनी ब्रा उतार कर उसे भी बिस्तर के नीचे फेंक दी और पूरी तरह से नंगी हो गई उसके नंगे बदन को देखकर तृप्ति की आंखें फटी की फटी रह गई नंगी होने के बाद सुमन बेहद खूबसूरत और गदराए जिस्म की मालकिन लग रही थी,,,,अपने कपड़े उतार लेने के बाद सामान अपने दोनों हाथ आगे बढ़कर उसके गाउन को पकड़ ली और बोली,,,)

मजा लेने के लिए तुम्हें भी नंगी होना पड़ेगा,,,।

(तृप्ति खुद भी यही चाहती थी इसलिए सुमन को रोक नहीं पाई और सुमन देखते ही देखते उसके गांव को निकाल कर बिस्तर के नीचे फेंक दी लेकिन अभी भी उसके नंगेपन को ढकने के लिए बदन पर ब्रा और पैंटी थी जिसे सुमन अपने हाथों से निकाल कर उसके बदन से अलग कर दी,,, और उसके छोटे संतरों को एक हाथ में पकड़कर मुस्कुराते हुए बोली,,,)

अब देखना मैं तुम्हारी चूचियों को भी अपनी तरह खरबूजा बना दूंगी,,,,।



क्या सच में ऐसा हो जाएगा,,,!

बिल्कुल मेरी रानी,,,(और इतना कहने के साथ ही वहां उसकी चूचियों को हल्के हल्के दबाते हुए अपने लाल-लाल होठों को हल्के से खोली और उसके निप्पल को मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दी,,,,,,,तृप्ति मदहोशी के सागर में पूरी तरह से डूबने लगी थी यह उसके जीवन का पहला अवसर था जब कोई उसकी चूचियों को मुंह में लेकर पी रहा थाऔर वह भी कोई मर्द नहीं बल्कि उसकी हम उम्र एक खूबसूरत लड़की थी जो इस तरह की कलाबाजी में माहिर थी,,,सुमन की हरकत से उसके बदन में मदहोशी छाने लगी थी उसकी आंखें बंद होने लगी थी उसकी आंखों में सुरूर छा रहा था,,, वाकई में इस समय तृप्ति को बहुत मजा आ रहा था,,,, सुमन की हरकतेंनिरंतर आगे बढ़ती जा रही थी वह दोनों चूचियों को हाथ में लेकर हाल-चाल के दबाते हुए बारी-बारी से उसे मुंह में लेकर पी रही थी,,, ।



सहहहह आहहहहहहह ऊममममममम,,, ओहहहहह फफफ,,,,,,ऊमममममममम सुमन,,,,,,आहहबबबबबब मुझे बहुत मजा आ रहा है,,,।

तुझे मजा मिले तभी तो मैं यह कर रही हूं,,,,(धीरे से अपने मुंह में से उसकी चूची को निकाल कर इतना बोलकर फिर से उसे मुंह में लेकर पीना शुरू कर दी,,,,तृप्ति बार-बार अपनी आंखों को खोलकर इस नजारे को देख नहीं रही थी क्योंकि उसे देखने में भी बहुत मजा आ रहा था उसकी आंखों के सामने उसके मुकाबलेज्यादा बड़ी-बड़ी चूचियां सुमन के पास थी जिसे देखकर उसका भी मन लालच रहा था और वह अपने इस लालच को रोक नहीं पाई और अपने दोनों हाथ आगे पकडकर उसकी दोनों चूचियों को अपने हाथों में पकड़ ली और उसे सुमन की तरह ही धीरे-धीरे से दबाना शुरू कर दी,,,तृप्ति के जीवन का यह पहला अवसर था जब वह इस तरह से एक लड़की के साथ आने लग रही थी उसे मजा आ रहा था वाकई में आज उसे एहसास हो रहा था की चूचियां दबाने में कितना मजा आता है,,,, वह भी सुमन की तरह चुचियों का मुंह में लेकर पीना चाहती थी लेकिन अभी इस क्रिया में सुमन लगी हुई थीलेकिन थोड़ी देर बाद जैसे ही वह दोनों चूचियों को छोड़कर गहरी सांस लेने लगी,,, तृप्तिभी उसी की तरह ही अपने प्यास होठों को खोलकर उसकी चूची को मुंह में लेकर पीना शुरू कर दी और इस खेल में उसे आनंद आने लगा वह भी बारी-बारी से दोनों चुचियों का मजा ले रही थी,,,।



रात के 1:30 रहे थे लेकिन दोनों की आंखों में नींद बिल्कुल भी नहीं थीदोनों की बुर से मदन रस टपक रहा था दोनों की चूचियां टमाटर की तरह लाल हो चुकी थी,,,तृप्ति के लिए तो यह पहली बार था इसलिए वह पागलों की तरह उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों से प्यार कर रही थी उससे खेल रही थी,,,तृप्ति की तरह ही सुमन की भी हालत खराब होने लगी और उसके मुंह से भी गरमा गरम शिसकारी की आवाज निकलने लगी उसकी गरमा गरम शिसकारी की आवाज सुनकर तृप्ति मदहोश होने लगी उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी। लेकिन इस बीचसुमन अपनी हथेली को एक बार फिर से उसकी पेंटि में डालकर उसकी गुलाबी बुर को अपनी हथेली में जोर से दबोच ली थी,,,। उसकी सरकार पर एकदम सेतृप्ति की सांस रुक गई थी और पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी लेकिन अब वह किसी भी तरह से सुमन को रोकना नहीं चाहती थी,,, सुमन भीउसे धक्का देकर बिस्तर पर पीठ के बल लेट दे और तुरंत अपने दोनों हाथों से उसकी चड्डी पकड़ कर अपनेहाथों से खींचते हुए उसे उसकी लंबी चिकनी टांगों से बाहर निकाल दी अब वह भी उसकी तरह पूरी तरह से बिस्तर पर नंगी हो चुकी थी



सुमन अपने बिस्तर पर एक नंगी खूबसूरत लड़की को देखकर मदहोश हुए जा रही थी,,, उसकी आंखों में वासना उतर आया था,,,वह अपने दोनों हाथों से उसकी दोनों टांगों को पकड़ कर उसे खोलते हुए घुटनों के बल उसकी दोनों टांगों के बीच आगे बढ़ने लगी,,,, तृप्ति की बुर एकदम चिकनी थी उस पर बाल का नामोनिशान नहीं था,,,जिसे देख कर सुमन के मुंह में पानी आ रहा था और वह अपनी हथेली आगे बढ़ाकर उसकी बुर को अपनी हथेली में रखकर उसे दबाते हुए बोली,,,।

हाय रे तेरी बुर कितनी चिकनी है लगता है अभी-अभी साफ की है,,,।

मुझे सफाई पसंद है 10 15 दिन में मैं एक बार सफाई कर देता हूं क्रीम लगाकर,,,(सुमन की दोनों टांगों के बीच देखते हुए) तेरी बुर भी तो बहुत चिकनी है,,,।



मैंने भी कल ही साफ की हुं क्रीम लगाकर,,, ज्यादा बाल रहते हैं तो खुजली होने लगती है,,,,(ऐसा कहते हुए सुमन बार-बार उसकी बुर को अपनी मुट्ठी में दबा रही थी खोल रही थी ऐसा करने में उसे बहुत मजा आ रहा था क्योंकि उसमें से निकलने वाला मदन रस पूरी तरह से उसकी हथेलियां को भिगो रहा था,,, और उसकी हरकत पर तृप्ति के चेहरे के हाव-भाव पूरी तरह से बदलते जा रहे थे,,,अब बिल्कुल भी देर ना करते हुए सुमन धीरे से अपने प्यासे होठों को उसकी दोनों टांगों के बीच ले जाने लगी और अगले ही पल उसके गुलाबी छेद पर अपने होठ रखकर उसे जीभ से चाटना शुरू कर दी,,,,यह पल तृप्ति के लिए बेहद अद्भुत था जिसे वह कभी जिंदगी में महसूस नहीं की थी इसलिए वह जैसे ही सुमन के होठों को अपनी प्यासी बुरर पर महसूस की वह पूरी तरह से गन गना गई,, उसके बदन में कंपन होने लगा और उसके हाथ खुद-ब-खुद सुमन के सर पर आ गया और वह दोनों हाथों को उसके रेशमी बालों में डाल दी और उसके सर को पकड़ ली,,,।



सुमन भी पूरी तरह से एक अंश हुई तरोताजा बुर की महक को अपने अंदर महसूस करके पागल हो गई और पागलों की तरह जीभ से उसकी बुर को चाटना शुरू कर दी,,,, दोनों पागल हुए जा रहे थे,, तृप्ति कभी सोची नहीं थी कि एक लड़की लड़की की बुर को इस तरह से चाटती होगी,,, इसीलिए तो तृप्ति कोअपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था लेकिन वह जानती थी कि जो कुछ भी हो रहा है वहां हकीकत में हो रहा है यह कोई सपना नहीं कोई कल्पना नहीं है,,, इसलिए वह इस पल को जी लेना चाहती थी,,,बिस्तर पर वह पूरी तरह से उत्तेजना से कसमस आ रही थी और उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ कर सुमन लपा लप उसकी बुर को चाट रही थी,,,इस खेल में वैसे भी वह माहिर थी इस खेल को अच्छी तरह से खेलना जानती थी इसीलिए तो उसका यह खेल रंग ला रहा था,,,।



तृप्ति अपने मन में यही सोच रही थी कि जब उसे इतना मजा आ रहा है तो क्या ऐसा करने में सुमन को मजा आता होगा,,,अपने ही सवाल का जवाब वह खुद देते हुए अपने आप से ही बोली जरूर आता होगा तभी तो वह इतनी मदहोश होकर यह कार्य को कर रही हैऔर सुमन थी की लगातार उसकी बुर को चाट कर उसे पूरी तरह से पागल बना देना चाहती थी क्योंकि वह चाहती थी कि इस क्रिया को वह भी उसके साथ दोहराएं,,,, लेकिन जो कुछ भी करना था उसे ही करना था और सुमन अच्छी तरह से जानती थी कि उसे क्या करना है,,,।



सुमन और तृप्ति दोनों पूरी तरह से नंगी होकर एक ही बिस्तर पर मजे लूट रही थी कमरे में जल रही डिम लाइट की रोशनी में सबको साफ नजर आ रहा था दोनों की जवानी बेलगाम हो चुकी थी,,, सुमन तो इस खेल की पक्की खिलाड़ी थी लेकिन तृप्ति अभी अनाड़ी थी उसका सीखना अभी बाकी था लेकिन सुमन की संगत में वह सब कुछ सीख जाएगी अब ऐसा लगने लगा था।इसलिए तृप्ति अपने मन में सोच रही थी कि अच्छा हुआ कि वह यहां पर सोने के लिए तैयार हो गई वरना इतनी अद्भुत सुख की वह कभी कल्पना भी नहीं कर पाती,,, वह अभी अपने मन में यह सोच ही रही थी कि सुमन अपनी बीच वाली ऊंगली को धीरे से उसके गुलाबी छेद में डालना शुरू कर दी,,,जैसे-जैसे उसकी उंगली अंदर बाहर हो रही थी वैसे-वैसे उसकी मदहोशी बढ़ती जा रही थी उसे मजा आ रहा था और इस दौरान वह लगातार अपनी जीभ से उसकी बुर को चाट भी रही थी,,,और सुमन की यह क्रिया लगातार जारी थी वह पूरी तरह से तृप्ति को पागल बना देना चाहती थी और जब उसे लगने लगा कि उसका किया कार्य काम करने लगा है तो वह धीरे से गहरी सांस लेते हुए उसकी दोनों टांगों के पीछे से अपने चेहरे को ऊपर की तरफ उठाई औरतृप्ति की तरफ देखने लगी दोनों की नजर आपस में टकराई दोनों की आंखों में वासना साफ झलक रही थी,,।



सुमन समझ गई थी कि अब वह जैसा कहेगी तृप्ति वैसा ही करेगी इसलिए धीरे से उठी और,,, 69 की अवस्था में उसके ऊपर लेट गई।पहले तो तृप्ति को कुछ समझ में ही नहीं आया और सुमन अपना कार्य जारी करती थी वह उसकी बुर को चाटना शुरू कर दी थी लेकिन तृप्ति कुछ कर नहीं रही थी बस बेहद करीब से सुमन की बुर को देख रही थी और उसकी मादक खुशबू को अपने अंदर उतार रही थी,और सुमन इशारे से उसे समझा रही थी कि क्या करना है लेकिन बोल कुछ नहीं रही थी वह अपनी कमर को आगे पीछे हिलाते हुए अपनी बुर को उसके होठों से सटा दे रही थी,,, लेकिन तृप्ति कुछ कर नहीं रही थी तो,,, आखिरकार सुमन को बोलना पड़ा,,,।



तू भी जीभ से चाट बहुत मजा आएगा,,,,।

(उसकी बात सुनकरतृप्ति के दिल की धड़कन बढ़ने लगी क्योंकि उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इस क्रिया को वह कैसे कर पाएगी लेकिन वह अच्छी तरह से देख रही थी कि इसी क्रिया को सुमन बड़े आराम से कर रही थी और आनंदित हो रही थी इतना तो वह मालूम था किस क्रिया को करने में मजा बहुत आता है इसलिए वह भी हिम्मत करके धीरे से अपनी जीभ को हल्के से निकाली और उसकी नौक को सुमन की बुर से हल्का सा स्पर्श कराई और एकदम से गनगना गई,, फिर दोबारा उसने कोशिश की और इस बार हुआ पूरी तरह से अपनी जीभ को उसकी गरम बुर से सटा दी,,, ऐसा करने से वह पूरी तरह से आनंदित हो गई और इस दौरानसुमन अपनी बीच वाली उंगली को फिर से उसकी बुर में प्रवेश कर दी और ऐसा होते ही वह उत्तेजना में तुरंत अपने होठों को पूरी तरह से सुमन की बुर से सटा दी और उसे चाटना शुरू कर दी पहले तो उसे थोड़ा अजीब लगा लेकिन थोड़ी ही देर में उसे आनंद आने लगा मजा आने लगा वह अभी सुमन की तरह ही उसकी बुर की चटाई करना शुरू कर दि।



सच पूछो इस क्रिया को करने में उसे बहुत मजा आ रहा था वह पागल हो जा रही थी उसे पहली बार एहसास हो रहा था कि वाकई में इस तरह के खेल खेलने में कितना मजा आता हैवह भी अपनी बीच वाली उंगली को सुमन की तरह ही उसकी खुद की बुर में डालकर अंदर बाहर करने लगे और उसे इस बात का एहसास हुआ कि उसकी बुर अंदर से कितनी गर्म है जैसा कि उसकी खुद की गरम रहती है,,, दोनों कीक्रिया निरंतर बढ़ती जा रही थी दोनों का नितंबों का आकार एकदम गोल था लेकिन सुमन की गांड को ज्यादा बड़ी थी और दोनों गोल-गोल अपनी गांड को एक दूसरे के चेहरे पर घूम रही थी जिससे दोनों की उत्तेजना और ज्यादा बढ़ रही थी।



देखते ही देखते दोनों चरम सुख की तरफ आगे बढ़ रही थी दोनों की उंगली एक दूसरे की बुर में बड़ी तेजी से अंदर बाहर हो रही थी ऐसा लग रहा था कि मैं जैसे दोनों की उंगली ना होकर एक मजबूत लंड हो,,,वासना की आग में दोनों सुलग रही थी दोनों पसीने से तरबतर हो चुकी थी,,,,और देखते ही देखते दोनों एकदम चरम सुख को प्राप्त कर ली दोनों की बुर से मदन रस का फवारा फूट पड़ा जिसे दोनों अपने होठों से जीभ से चाट कर मदहोश होने लगी,,,और यह खेल तकरीबन सुबह 5:00 बजे तक चलता रहा और उसके बाद कब दोनों की आंख लग गई दोनों को पता ही नहीं चला,,,।



सुबह जबसुमन की मां दरवाजे पर दस्तक देने लगी तो दोनों की आंख खुली दोनों बिस्तर पर एकदम नंगी थी और जल्दी-जल्दी दोनों अपने कपड़े समेट कर पहनने लगी,,, इसके बाद एक अद्भुत अनुभव के साथ तृप्ति अपने घर आ गई।
 
तृप्ति के लिए बीती रात बेहद यादगार बन चुकी थी वह कभी सोचा भी नहीं थी कि उसके जीवन में ऐसा भी पल आएगा जब एक लड़की के साथ उसे हम बिस्तर होना पड़ेगा,,, लेकिन यह अनुभव उसे काफी कुछ सीखा गया था, वह पूरी तरह से अपनी जवानी का लुत्फ ले चुकी थी,, लेकिन यह तो अभी शुरुआत थीऔर शुरुआत की इतनी धमाकेदार थी कि वह कभी सोच भी नहीं सकती थी,,,दूसरों के मुंह से तो उसने सुषमा आंटी की लड़की सुमन के बारे में बहुत कुछ सुनी थी,, लेकिन अब उसे उसका अनुभव भी हो चुका था लेकिन सुमन से उसे कोई गिला शिकवा नहीं था क्योंकि एक ही रात में सुमन ने उसे जवानी का मजा चखाई थी,,, भले ही दोनों मर्दाना अंग से आनंद ना लिए हो लेकिन जनाना अंग से भरपूर मजा लूट थे,,,।



एक अद्भुत अनुभव के साथ अपने घर वापस लौट आई थी एक ही रात में वह पूरी तरह से बदल गई थी एक ही रात में उसे लगने लगा था कि वाकई में असली सुख तो इन्हीं सब में है,,, घर वापस लौटने के बावजूद भी उसका बताने में अजीब सी हलचल हो रही थी,,, वह कुछ देर तक कुर्सी पर बैठकरबीते एक दिन के बारे में सोचती रही एक ही दिन में काफी कुछ बदल गया था एक ही दिन में वह पूरी तरह से लड़की से औरत बनने की दिशा में कदम रख चुकी थी,,, वह सुमन के बारे में भी सोच रही थी कि सुमन इतने खुले विचारों वाली है वह कभी सोची नहीं थी,,, और वह अपने मन में इस बात से सबक भी कर रही थी कि भले वह एक औरत के साथ इस तरह का सुख भोग रही थी लेकिन यकीन तौर पर वह संभोग सुख भी पूरी तरह से प्राप्त कर चुकी थी क्योंकि इस तरह से खुले विचारों वाली लड़की ज्यादा देर तक चुदवाए बिना नहीं रह सकती,,,।



सुमन के बारे में सोचते हुए सुमन की बातें उसे याद आने लगी,,, उसके पास तोअश्लील किताब की थी उसमें किस तरह से गंदी कहानी लिखी हुई थी एक भाई और बहन के बीच किस तरह से संबंध स्थापित होता है इसका उल्लेख बड़े अच्छे तरीके से किया हुआ था,,,और इस बात की झिझक सुमन में बिल्कुल भी नहीं थी कि अगर उसका कोई भाई होता तो उसे नग्न अवस्था में देखकर उसके मन पर क्या गुजरती बल्कि उसे तो अच्छा लगता,,, उसके इस तरह के विचार के बारे में सुनकर तो तृप्ति के होश उड़ गए थे,,, वह अपने मन में सोचने लगी कि अगर वाकई में सुमन का कोई भाई होता तो अब तक वह जरूर उसके साथ शारीरिक संबंध बना ली होती उसके साथ जवानी का मजा लूटती ,,, यह सब सोचती हूं उसके मन में इस बात सेएक और शंका थी कि अगर वह ऐसा चाहती तो वह कर सकती थी लेकिन क्या उसका भाई उन सबके लिए तैयार होता क्या एक भाई अपनी बहन के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए तैयार होगा,,,, फिर अपने ही सवाल का जवाब उसके मन मेंउमड़ने लगा और वह अपने आप से ही बोली क्यों नहीं तैयार होगा जब एक तो है ना अपने भाई की मर्दाना अंग को देखकर पिघल सकती है तो क्या एक भाई अपनी बहन की नंगी जवान को देखकर निकल नहीं सकता क्या उसका मन नहींकर करेगा अपनी बहन के साथ शारीर सुख प्राप्त करने के लिए,,,इस बारे में सोचकर वह अपने मन में सोचने लगी कि क्या अगर वह चाहे तो क्या उसका भाई इन सबके लिए तैयार होगा,,।



अपने मन में उठे इस सवाल को लेकर उसे अपने आप पर ही गुस्सा आने लगा वह अपने मन में सोचने लगी कि उसका भाई कितना सीधा ज्यादा है वह अपने भाई के बारे में क्यों इस तरह की बातें सोच रही है,,,वह तो अनजाने में उसके लंड को देखी थी जब वह कमरे में पूरी तरह से नंगा होकर अपने लिए कपड़े ढूंढ रहा था ऐसा तो हर घर में हर एक मर्द करता होगा जब घर में अकेला होता होगा नहाने के बाद वह सारे कपड़े उतार भी देता होगा लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि उसके मन में कुछ चल रहा होगा,,,लेकिन तभी उसके मन में ख्याल आया कि अगर एक मर्द के मन में कोई गलत भावना नहीं होती तो उसका सीधा असर उसके लंड पर पड़ता है और उसमें बिल्कुल भी उत्थान नहीं होतालेकिन जब एक मर्द के बंद में कुछ गंदे विचार चलते हैं तो इसका भी असर सीधे उसकी दोनों टांगों के बीच के अंगों पर होता है और वह तुरंत खड़ा हो जाता है और जब वह अपने भाई को देखी थी तो उसका लंड पूरी तरह से खड़ा था तो क्या उसके मन में भी गंदे विचार चल रहे थेयह बातें सोचकर उसका दिमाग घूमने लगा था फिर अपने मन में सोचने लगी कि उसका भाई भी तो पूरी तरह से जवान हो चुका है गठीला बदन का बांका नौजवान बन चुका है,दूसरे लड़कों की तरह उसका भी आकर्षक औरतों की तरफ और लड़कियों की तरफ बढ़ता ही होगा वह भी दूसरे लड़कों की तरह आती जाती लड़कियों के अंगों के उभार को देखकर मचलता होगा,,, क्या सच में उसके भाई के मन में भी यही सब विचार चलाते होंगे,,,।



इन सब बातों को सोचते हुए उसकी हालत फिर से खराब हो रही थी और उसके बदन में उत्तेजना का संचार होने लगा था,,, जिसका असर सीधे उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार पर पड़ रहा था,,, और उसे रात वाली बात याद करने लगी कि कैसे सुमन बेझिझक बिना शरमाए उसकी बुर को अपने जीभ से चाट रही थी,,,पल भर के लिए तो वह एकदम सच में पड़ गई थी कि एक लड़की एक लड़की के साथ भला ऐसे कैसे कर सकती है,,,लेकिन थोड़ी ही देर में उसके बदन में उत्तेजना की जब हुआ रुकने लगी आने दे कि जो अनुभूति होने लगी उसे महसूस करके वह समझ गई कि वाकई में एक औरत भी औरत को अद्भुत सुख दे सकती हैवह पूरी तरह से मचल गई थी जैसे-जैसे सुमन की जुबान उसके गुलाबी छेद के इर्द गिर्द और अंदर गहराई तक अंदर बाहर हो रहे थे एक अद्भुत सन सनाहट उसके बदन में महसूस हो रही थी जिसका उसे पहले कभी अनुभव नहीं हुआ था,,।



जिस तरह से उसकी हरकतें जारी थी उसे देखते हुए तृप्ति समझ गई थी कि सुमन पूरी तरह से खिलाड़ी बन चुकी थी जिस तरह से वह उसके ऊपर जाकर उसकी दोनों टांगों के बीच मुंह डाल दी थी और बिना कुछ कहेअपनी भारी भरकम गांड को उसके चेहरे पर रखकर अपनी बुर का स्पर्श उसके चेहरे पर कर रही थी उसके होठों पर कर रही थी यह हरकत एक तरह का इशारा था उसके लिए जिसे वह थोड़ी देर बाद समझ गई थी इस समय भी तृप्ति के जेहन में बुर से उठ रही मादक खुशबू बसी हुई थी,,,, यह खुशबू का अनुभव से अपनी बुर से कभी नहीं हुआ था और अगर सुमन एक अद्भुत सुख से प्रधान ना करती तो शायद इस खुशबू से वह अनजान ही रहती,,,सुमन अपनी मन में सोच रही थी कि बुर से निकलने वाले मदन रस का स्वाद कितना कसैला और नमकीन होता है,,, पहले तो उसे खुद को बड़ा अजीब लग रहा था लेकिन धीरे-धीरे उस स्वाद में वह पूरी तरह से खो चुकी थी,,और वह भी सुमन की तरह अपनी जीत के साथ-साथ उंगली को भी उसके गुलाबी छेद में डालकर अंदर बाहर कर रही थी और उसे एहसास हो रहा था कि वाकई में सब की बुर कितनी अंदर से गर्म होती है,,,।



इन सब बातों के बारे में सोच कर त्रप्ति फिर से गर्म होने लगी उसके बदन में उत्तेजना का संचार होने लगा था वह मदहोश होने लगी थी,,, वह अपनी जगह से उठकर खड़ी हो गई और झाड़ू लेकर पूरे घर में झाड़ू लगाना शुरू कर दी,,,,,, और सफाई कर लेने के बाद सीढ़ियां चढ़ते हुए वह छत पर पहुंच गईसुबह का समय था इसलिए छत पर ठंडी हवा बह रही थी और वह गहरी सांस लेते हुए ठंडी हवा को अपने अंदर लेने लगी लेकिन यह ठंडी हवा भी उसकी बदन की गर्मी को शांत करने में नाकामयाब हो रही थी,,,तृप्ति दूर-दूर तक नजर घुमा कर देख रही थी चारों तरफ सुबह की कितनी शांति छाई हुई थी उसके घर के पीछे दूर तक मैदानी मैदान था जिसमें जंगली झाड़ियां उगी हुई थी और एक कच्ची सड़क भी गुजरती थी,,, और यही कच्ची सड़क थी जिस पर चलकर वहां ट्यूशन से घर वापस आ रही थी जब संदीप उसे रास्ते मेंपकड़ लिया था और उसके बदन से छेड़छाड़ कर रहा था उसे समय संदीप की हरकत उसे कुछ अजीब तो लगी थी लेकिन बेहद आनंद दायक भी प्रतीत करा रही थी,,,,।



तृप्ति संदीप के बारे में सोच ही रही थी कि उसकी नजर दूर-दूर झाड़ियों तक पहुंचने लगी जहां पर सुबह के समय औरतें सोच कर रही थी और वही उसे दो लड़के दिखाई दे रही है जो उन औरतों की नंगी गांड को देखकर मत हो रहे थे,,,बड़े लड़कों को देखकर तृप्ति को एहसास हो रहा था कि दुनिया के सारे मर्द एक जैसे ही हैं उन्हें औरतों के खूबसूरत बदन से ही ज्यादा लगाव होता हैवरना एक सो करती औरत को कौन देखना चाहेगा एक औरत तो बिल्कुल भी नहीं देखना चाहेगी लेकिन एक मर्द हमेशा देखना चाहेगा भले ही वह पेशाब कर रही हो यार सोच कर रही हो ऐसी हालात में भी मर्दों को अपनी आंख सेंकने का जुगाड़ मिल जाता है,,,। लड़कों को देखकर तृप्ति अपने भाई के बारे में सोचने लगी,,, उसके मन में ख्याल आने लगा कि उसका भाई भी अगर उसकी आंखों के सामने यह सब चल रहा हो तो जरूर देखेगा क्योंकि आखिरकार वह भी तो एक मर्द है उसका भी आकर्षक औरतों की तरफ जरूर होगा,,,



इन सब के बारे में सोच ही रही थी कि तभी उसे दूर झाड़ी में एक औरत चोरी छिपे आई हुई नजर आने लगी जिसे छत पर खड़ी होकरइतनी बड़ी गौर से देखने लगी वह ऐसे झाड़ियां में जा रही थी जैसे सबसे नजर बचाकर जा रही हो उसके रवैए में तृप्ति को कुछ अजीब लगा अगर वह सहज रूप से सोच करने के लिए जा रही होती तो इस तरह से घबराई हुई ना होती,,, इसलिएबड़े ध्यान से तृप्ति उस औरत को देखने लगी और वह धीरे-धीरे झाड़ियों की तरफ आगे बढ़ रही थी,,,उसके हाथ में डब्बा जरूर था लेकिन तृप्ति को न जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि वह सोच करने नहीं जा रही थी,,, तभी तृप्ति को दूसरी तरफ से एक लड़का उसी तरफ आता हुआ नजर आने लगा उसके हाथ में डब्बा भी नहीं था,,, दूर से भी तृप्ति को एकदम साफ दिखाई दे रहा था,,, उसे औरत की उम्र 40 से 45 साल के बीच रही होगी और जो दूसरी तरफ से जवान लड़का आ रहा था वह उसके भाई के ही उम्र का था,,, त्रप्ति उसे लड़के को उसे औरत की तरफ आता हुआ देखकर सोचने लगी कि उस लड़के को देखकर वह औरत अपना रास्ता बदल देगी लेकिन जैसे ही वह लड़का उस औरत के करीब पहुंचा,,, दोनों एकदम से रुक गए,,,।



तभी तृप्ति के आश्चर्य के बीच वह दोनों एक दूसरे से बात कर रहे थे और देखते ही देखते वह लड़का जो उसे औरत के लड़के के उम्र का था वह एकदम से उसे औरत को अपनी तरफ अपनी बाहों में भर लिया यह सब तृप्ति के आश्चर्य को ओर ज्यादा बढ़ा रहा था,,, तृप्ति को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिरकार वह औरत कुछ बोल क्यों नहीं रही है जबकि उन दोनों की उम्र में मां बेटे की उम्र का ही फर्क था,,, इस तरह की हरकत पर एक औरत जरूर सामने वाले पर एक तमाचा जड़ देती लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं हो रहा था,,, यह सब देखकरतृप्ति की उत्सुकता बढ़ने लगी और वह बड़े गौर से उन दोनों की तरफ देखने लगी,,, तृप्ति के होश तब और उड़ने लगे जब वह लड़काब्लाउज के ऊपर से ही उसकी चुचियों को दबाना शुरू कर दिया यह देखकर तो तृप्ति की खुद की हालत खराब होने लगी पहली बार वह इस तरह का नजारा देख रही थी,,,।



वह औरत मुस्कुरा रही थीउससे बातें कर रही थी जिसे साफ पता चल रहा था कि वह औरत उसे लड़के को जानती थी दोनों में काफी जान पहचान थी वरना एक अनजान लड़के और औरत के बीच इस तरह से बातचीत और हरकत संभव बिल्कुल भी नहीं था,,, तभी तृप्ति कोऔर तेज झटका लगा जब वह औरत खुद पेड़ की तरफ घूम कर झुक गई और अपनी साड़ी को दोनों हाथों से कमर तक उठा दे और उसकी नंगी गांड एकदम से दिखाई देने लगी दूर से भी तृप्ति को सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था,,अब तृप्ति को समझते देर नहीं लगी कि दोनों के बीच किस तरह का रिश्ता है लेकिन उन दोनों के बीच तो उम्र का काफी फर्क था लेकिन फिर भी दोनों एक दूसरे से इतना घुल मिल गए थे शायद जिस की जरूरत ही कुछ ऐसी होती है की उम्र नहीं देखती,,,।



दूर झाड़ियांके बीच का नजारा देखकर तृप्ति की हालत खराब होने लगी थी उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी थी और उसकी दोनों टांगों के बीच हलचल भी बढ़ने लगी थी उसकी नंगी गांड कुछ ज्यादा ही बड़ी-बड़ी थी जिसे वह लड़काजो उसके बेटे के ही उम्र का लग रहा था वह अपने दोनों हाथों से उसे औरत की बड़ी-बड़ी गांड को पकड़ कर उसे दबा रहा था दबोच रहा था और घुटनों के बल बैठकर उस पर चुंबन भी ले रहा था यह सब कुछ तृप्ति के लिए बेहद अजीब और अद्भुत था लेकिन बेहद को भावना था औरत से एक मर्द किस तरह से प्यार करते हैं वह तृप्ति पहली बार अपनी आंखों से देख रही थी,,,, यह सब तृप्ति के होश उड़ा रहा था और उसके जोश में वृद्धि भी कर रहा था,,,वह लड़का घुटनों के पास बैठकर बार-बार उसकी गांड को दोनों हाथों से पकड़ कर गांड की दोनों आंखों पर बारी-बारी से चुंबन कर रहा था और वह औरत पीछे नजर घूमाकर उसे जवान लड़के को देखकर मुस्कुरा रही थी,,,।



लेकिन पल भर में ही उसकी मुस्कुराहट मदहोशी में बदलने लगी थी और वह औरत अपना हाथ पीछे की तरफ लाकर उसके सर पर रखकर उसे और नीचे जाने के लिए इशारा कर रही थीशायद वह लड़का यह क्रिया को पहले भी कर चुका था इसलिए उसके सारे को एकदम से समझ गया था और वह औरत की अपना टांग उठाकर उसके कंधों पर रख दी थी एक टांग नीचे जमीन पर थी और एकदम उसके कंधों पर थी जिससे उसकी दोनों टांगों के बीच का रास्ता थोड़ा सा ज्यादा खुल गया था इतनी दूर से तृप्ति को उसकी बुर तो नजर नहीं आ रही थी,,, लेकिन अगले ही पल उसे समझ में आ गया कि वह लड़कावही कार्य कर रहा है जो रात को सुमन उसकी बुर के साथ कर रही थी वह लड़का घुटनों के बल बैठ कर उस औरत की बुर को चाट रहा था,,,जैसे ही तृप्ति को इस बात का एहसास हुआ उसकी हथेली खुद ब खुद सलवार के ऊपर से ही उसकी बुर तक पहुंच गई और वह सलवार के ऊपर से ही अपनी बुर को मसलना शुरू कर दी,,,उस लड़के की हरकत से वह औरत पूरी तरह से मदहोश में जा रही थी और वह उसके बालों को कस के पकड़े हुए थी,,,,।



तृप्ति इस नजारे को देखते हुएअपने चारों तरफ नजर घुमा कर देख भी ले रही थी कि कहीं कोई उसे इस नजारे को देखते हुए तो नहीं देख रहा है वरना लेने का देने पड़ जाएंगे,,, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था वैसे भी,,, उसके घर के थोड़ी दूर पर सुषमा का घर था और बाकी घर दूर-दूर थे और उसकी खुद की छतदूसरों की छत से ज्यादा बड़ी थी इसलिए किसी के भी देखे जाने कीआशंका बिल्कुल भी नहीं थी इसलिए वह निश्चित हो गई और फिर से अपनी नजरों को और अपने ध्यान को उसी झाड़ियां पर केंद्रित कर दी,,, वह लड़का अभी भी उस औरत की बुर को चाट रहा था,,दोनों के बीच की उम्र के अंदर को देखकर सुमन के होश उड़े जा रहे थे उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह लड़का तो पूरी तरह से जवान था ऐसे में उसका आकर्षण लड़कियों की तरफ बढ़ना चाहिए लेकिन वह पूरी तरह से औरत के आकर्षण में डूबता चला गया थाक्या ऐसा हो सकता है कि एक जवान लड़का अपनी ही मन की उम्र की औरत क्या आकर्षण में बंध जाए और अगर ऐसा होता होगा तो क्यों होता होगा,,,यह सब सोचते कि उसका दिमाग काम करना बंद कर दिया था उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था,,,।



तृप्ति को दूसरी औरतों भी सो करती हुई दिखाई दे रही थी लेकिन उन औरतों सेउसे औरत के बीच की दूरी काफी ज्यादा थी और ऐसा लग रहा था कि यह जगह उन दोनों के लिए बेहद सुरक्षित थी और उसे जगह पर दोनों पहले भी इस तरह का आनंद ले चुके थे क्योंकि उनके इर्द-गिर्द कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था,,और जिस तरह से दोनों आपस में जाकर मिले थे निश्चित था कि दोनों का वहां मिलना चाहिए था पहले से ही तभी तो वह दोनों एक ही जगह पर चलते चले जा रहे थे,,, जो कुछ भी हो लेकिन इस समय तो दोनों जवानी का मजा लूट रहे थे,,,, उसे औरत के चेहरे के बदलते हाव भाव को देखकरतृप्ति इतना तो समझ गई थी कि उसे लड़के की हरकत से वह मदहोश हुए जा रही है उसे मजा आ रहा है,,,,,वह लड़का भी औरत की बुर चाटने में बुरी तरह से माहिर था इसलिए तो अपनी जीभ से उसे पूरी तरह से आनंदित किया जा रहा था जैसा कि सुमन उसे रात में मजा दी थी वैसा ही इस समय वह लड़का उस औरत को मजा दे रहा था। थोड़ी देर तक दोनों इसी तरह से मजा लेते रहे लेकिन तभी वह औरत उसे उठने का इशारा करने लगी और थोड़ी देर में वह उठकर खड़ा हो गया और अपने पेंट का बटन खोलने लगा।



यह देखकर तृप्ति की हालत बहुत ज्यादा खराब होने लगी क्योंकि अब दोनों के बीच चुदाई का खेल शुरू होने वाला था,,, लेकिन तभी वह औरतउसे लड़की की तरह खुद घुटनों के पास बैठ गई और अपने हाथों से उसके पेंट का चैन खोलने लगी और अपने हाथ से उसके लंड को बाहर निकाल कर सीधा उसे मुंह में भर ली,,, यह देख कर तो तृप्ति की सांस अटकने लगी,,, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था जो काम घर की चार दिवारी के अंदर रहकर करते हैं वही काम को या दोनों घर के बाहर खुले मैदान में झाड़ियों के बीच कर रहे थे,,, इतनी दूर से तृप्ति को उस लड़के का लंड नजर नहीं आ रहा थालेकिन इतना दिखाई दे रहा था कि उसे मुंह में लेकर वह औरत एकदम मस्त हुए जा रही थी पर ऐसा लग रहा था कि जैसे वह उस लंड को खा जाएगी,,, उस औरत की मस्ती को देखकर तृप्ति के मन में फिर से शंका पैदा होने लगी कि क्या इस उम्र की औरत अपने बेटे की उम्र के लड़के के अंग के साथ संतुष्ट हो सकती है,,, और शायद हो सकती होगी तभी तो दुनिया की नजरों से बचकर यह औरत मजा लेने के लिए झाड़ियों में आई थी,,।



तृप्तिमदहोश कर देने वाली नजारे को देखकर सलवार के ऊपर से अपनी बुर को अपनी हथेली में जोर-जोर से दबोच रही थी मसल रही थी,,, ऐसा करने में उसे भी मजा आ रहा था,,,कुछ देर तक कुछ औरत इसी तरह से मजा लेती रही और फिर अपने आप ही उठकर खड़ी हो गई और फिर से झाड़ी पकड़ कर घोड़ी बन गई और अपनी बड़ी-बड़ी गांड को ऊपर की तरफ उठा दी हालांकि ऐसा करने में उसकी साड़ी ठीक तरह से हो गई थी और उसकी नंगी गांड साड़ी के अंदर छुपा रही थी लेकिन इस बार उसेलड़के ने अपने हाथों से साड़ी उठाकर उसे उपर उठा दिया था और फिर से उसकी नंगी गांड एक बार फिर से उजागर हो गई थी,,,उसकी नंगी गांड देखकर एक बार फिर उसे लड़के ने उसकी गांड पर बारी-बारी से चपत लगाया,,, और गांड पर चपत लगते ही वह औरत फिर से पीछे मुड़कर देखने लगी,,, और थोड़ा नाराजगी दर्शाते हुए उसे मुख्य कार्य को करने के लिए बोली और तुरंत वह लड़काठीक उसके पीछे खड़ा हो गया और नीचे की तरफ झुक कर उसके गुलाबी छेद में अपना लंड डालकर अपनी कमर हिलाना शुरू कर दिया,,,,।



वैसे तो इतनी दूर से ना तो औरत की बुर दिखाई दे रही थी ना ही उस लड़के का लंड दिखाई दे रहा था लेकिन भी उसकी आगे पीछे होती हुई कमर को देखकर तृप्ति समझ गई थी कि वह लड़का उसकी चुदाई कर रहा है,,, इस समय दोनों की उम्र का फर्क तृप्ति को इस बात से पता चल रहा थाऔर अच्छी तरह से समझ रही थी कि इस उम्र का क्या महत्व होता है इस उम्र में वह औरत अपनी मर्जी से उस लड़के से चुदवा रही थी,,, वह लड़का अपनी तरफ सेऐसा कोई कार्य नहीं कर रहा था जिससे वह नाराज हो जाए और वह लड़का उस औरत के दिशा निर्देश पर ही काम कर रहा था,,,जैसा जैसा वह बोल रही थी वैसा वैसा हुआ लड़का कर रहा था जिससे साफ जाहिर हो रहा था कि इस उम्र में एक जवान लड़के पर औरत का कितना दब दबा बना रहता है,,,,।



यह नजारा तृप्ति को पूरी तरह से मदहोश कर दिया था इस समय उसे भी चुदवाने का बहुत मन कर रहा था हालांकि इस खेल में वह पूरी तरह से अनाड़ी थी कच्ची खिलाड़ी थी उसे नहीं मालूम था कि चुदवाने में कैसा महसूस होता है लेकिन इतना तो समझ गई थी कि परम आनंद की अनुभूति होती है,,,,वह लड़का जोर-जोर से अपनी कमरिया रहा था तकरीबन 10 मिनट बाद वह लड़का उसे औरत से एकदम से अलग हो गया और अपने लंड को पेट में वापस डाल दिया वह औरत की अपनी साड़ी को ठीक करके मुस्कुराते हुए उसकी तरफ अच्छी और शायद फिर से मिलने का वादा करके वहां से चलती बनी और उसके जाते ही तृप्ति का भी वहां खड़े रहना अब ठीक नहीं था क्योंकि उसके बदन में भी उत्तेजना की लहर उठ रही थी और वह सीधा सीढ़ियां उतरकर नीचे आई और सीधा बाथरूम में घुस गई,,,।



बाथरूम में प्रवेश करते ही वह अपने बदन से सारे कपड़े को उतार कर एकदम नंगी हो गई और अपनी बुर की हालत को देखने लगी क्योंकि पूरी तरह से उसके ही मदन रस से चिपचिपी हो गई थी वह अपनी हथेली को अपनी बुर पर रखकर उसे जोर-जोर से मसलने लगी जैसा कि सुमन उसकी बुर को मसल रही थी,,,और देखते ही देखते हैं उसकी आंखें धीरे-धीरे बंद होने लगी और वह धीरे-धीरे अपनी उंगली को अपनी बुर के अंदर प्रवेश कराने लगी,,, और धीरे-धीरे उसे अंदर बाहर करने लगी ऐसा करने में उसे मजा आने लगा ।थोड़ी देर बाद वापस संतुष्ट हो गई और नहा कर वापस बाहर निकल गई लेकिन आज वह अपने कमरे तक जाने में ना तो किसी कपड़े का सहारा ली और ना ही टॉवल अपने बदन पर लपेटी,,,एकदम नंगी ही वह अपने कमरे तक गई क्योंकि घर पर कोई नहीं था इसलिए इस मौके को पूरा फायदा उठा लेना चाहती थी,,,वैसे भी घर में नंगी होकर घूमने में उसे बेहद आनंद की प्राप्ति हो रही थी बहुत हल्का महसूस कर रही थी,,,।



थोड़ी देर बाद वह तैयार हो गई और खाना बनाने लगी क्योंकि वह जानती थी दोपहर तक उसकी मां और उसके भाई दोनों आ जाएंगे,,खाना बनाते हुए अपने मन में सोच रही थी कि अगर एक दिन का समय और मिल जाता तो कितना मजा आता आज भी वह सुमन के घर पर जाकर जवानी का मजा लूटती,,,,।दोपहर तक उसकी मां और उसके भाई भी घर पर आ गए थे वह दोनों भी एक नए अनुभव के साथ वापस लौटे थे।
 
एक ही दिन में मां बेटे के साथ-साथ बेटी को भी एक अलग ही अनुभव प्राप्त हुआ था जिससे तीनों की जिंदगी एक नई राह पकड़ ली थी अब उनकी मंजिल एक ही थी लेकिन मंजिल पर पहले कौन पहुंचता है यह देखना बाकी था,,, लेकिन इतना तो तय था कि मंजिल से ज्यादा सफर मजा देने वाला है,, बस में हुई मां बेटे के बीच घमासान घर्षण का एहसास दोनों के बदन में रह रहकर उत्तेजना की फुहार उठा रहा थाऔर सुमन के साथ जिस तरह का अनुभव तृप्ति ने प्राप्त की थी वह बेहद अद्भुत और अतुलनीय था लेकिन तृप्ति इस बात का अच्छी तरह से जानती थी कि उसकी संतुष्टि में अभी भी कमी थीक्योंकि उसे अभ्यास होने लगा था कि उसे एक मर्द की जरूरत है जो अपने मर्दाना अंग से उसके अंदरूनी अंग से मदन रस को बाहर निकाल दें,,,,, एक तरह से पूरा परिवार वासना की आग में झुलसने लगा था,,,।



शाम को तृप्ति ने हीं खाना बनाई,, क्योंकि बस का सफर करके सुगंधा थक चुकी थी,, लेकिन बदन भले ही थक चुका था पर मन पूरी तरह से प्रफुल्लित था जिस तरह का अनुभव सुगंधा ने अपने भाई के घर और बस के अंदर प्राप्त की थी वह उसके जीवन का बेहद यादगार पल बन चुका था,,,वह कभी सोची भी नहीं थी कि अपने भाई के घर में खिड़की से वह अपने भैया और भाभी की चुदाई देखी थी,,,इस बात का एहसास सुगंधा को अच्छी तरह से हो रहा था कि बरसों के बाद अपनी आंखों के सामने चुदाई का दृश्य देखकर वह खुद बेहद गर्म हो चुकी थी उसे बिल्कुल भी एहसास नहीं था कि वह अपनी आंखों से अपने ही छोटे भाई को अपनी बीवी को चोदते हुए देख रही थी,,, जबकि यह बेहद शर्मनाक बात थी,,, और शायद यहसुगंधा के लिए शर्मनाक बात होती भी अगर वह पहले वाली सुगंधा होती,,।



लेकिन पहले वाली सुगंधाबहुत पहले से पीछे छूट चुकी थी अब सुगंधा के अंदर एक औरत ने जन्म ले लिया था जो अपनी इच्छाओं की पूर्ति करना चाहती थी अपनी मर्जी से जीना चाहती थी अपने सपनों को पूरा करना चाहती थी अपने अधूरे ख्वाब के लिए जीना चाहती थी,, इसलिए अपने भैया भाभी को संभोग मुद्रा में देखकर उसके मन में बिल्कुल भी ग्लानी नहीं थी,,,लेकिन उसके साथ-साथ उसे नजारे को उसके बेटे ने भी अपनी आंखों से देखा था ठीक उसके पीछे खड़े होकर,,, और इसी के बारे में सुगंधा कुर्सी पर बैठे-बैठे सो रही थीउसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था उसका दिमाग काम करना बंद कर दिया था क्योंकि वह अपने बेटे के बारे में निर्णय नहीं ले पा रही थी,,, उसे यहप्रश्न अंदर ही अंदर खाए जा रहा था कि वाकई में उसका बेटा बुद्धू है या बुद्धू बनने का सिर्फ नाटक कर रहा है,,,। क्योंकिरात को जो दृश्य उसने अपनी आंखों से देखी थी , उस दृश्य को उसका बेटा भी अपनी आंखों से ठीक उसके पीछे खड़े होकर देख रहा था लेकिन उस दृश्य के बारे में वह अजीब से सवाल कर रहा था,,,।



सुगंधा उस समय तो परेशानी का कारण बताकर वहां से हट गई थी लेकिन उसे तो आगे बढ़ना थाउसे समझ में नहीं आ रहा था कि अगर इस उम्र में भी उसका बेटा सच में एकदम नादान है तो फिर वह कैसे आगे बढ़ पाएगीऔर अगर सिर्फ वह नाटक कर रहा है तो इस खेल में और भी ज्यादा मजा आने वाला है उसे ही पूरी बागड़ौर संभाल कर आगे बढ़ना होगा,,लेकिन फिर अपने ही सवाल का जवाब उसके मन में अपने आप ही उम्र रहा था कि अगर वह नादान बुद्धू होता तो बस के अंदर उसके बदन से सट जाने की वजह से उसका लंड खड़ा ना हो जाता,, औरत औरउसकी गांड में पूरी तरह से घुसने की कोशिश ना करता अगर वह सच में नादान होता तोइतना तो समझ सकता था कि क्या हो रहा है वह अपने आप को पूरी तरह से हटाने की कोशिश करता लेकिन ऐसा हुआ बिल्कुल भी नहीं कर रहा था ऐसा लग रहा था कि इस खेल में उसे भी बहुत मजा आ रहा है,,,,, यही सब सुगंधा अपने मन में सोच रही थी कि तभी तृप्ति ने आवाज लगाई,,।



मम्मी खाना तैयार हो गया है जल्दी से हाथ मुंह धोकर आओ,,, मैं खाना लगा देती हुं,,,।

ठीक है लेकिन अंकित को जगा दे वह लगता है सो गया है अपने कमरे में,,,।

ठीक है मम्मी,,,।

(इतना कह कर कहा अपने भाई के कमरे में उसे बुलाने के लिए चली गई,,, कमरे में अपने बिस्तर पर बैठकर अंकित किताब के पन्नों को पलट रहा था उसे देख कर तृप्ति बोली,,,)

चल खाना तैयार हो गया है हाथ मुंह धोकर खा ले,,,।

ठीक है दीदी तुम चलो मैं आता हूं,,,

(इतना सुनकर न जाने क्या शरारत सोची तेरी थी एकदम से उसकी आंखों के सामने दरवाजे की तरफ मुंह करके झुक गई और बेवजह अपने पायल को ठीक करने लगी लेकिन ऐसा करने पर उसकी मदमस्त कर देने वाली गोलाई दार गांड उभर कर एकदम अंकित की आंखों के सामने आ गई अंकित की नजर अपने आप अपनी बहन की गांड पर चली गई,,,,, और पल भर में ही अपनी बहन को देखने का नजरिया उसका एकदम से बदल गया अपनी बहन की सुगठित नितंबों को देखकर उसके मन में उत्तेजना की चिंगारी फूटने लगी और वह नजर भर कर उसे देखने लगा।



और तृप्तिबेवजह नाटक करते हुए अपनी पतली सी पायल को ठीक करने का नाटक कर रही थीवह देखना चाहती थी कि उसके भाई क्या करता है कहां देखता हैऔर यही देखने के लिए वह अपनी पायल को ठीक करते हुए पीछे नजर घुमा कर देखी तो उसका दिल धक से करके रह गया,,, उसकी सोच के अनुसार उसका भाई उसकी गांड की तरफ ही देख रहा था,,, यह देख कर उसकी मां उत्तेजना और प्रसन्नता से झूम उठा उसकी युक्ति काम कर गई थी और वह धीरे से उठते हुए बोली,,,।

पायल ढीली हो गई है डर लगता है कि कहीं गिर ना जाए,,,।

(उसकी बातें सुनकरअंकित कुछ बोल नहीं पाया क्योंकि बोलने के लिए उसके पास कोई शब्द नहीं थे क्योंकि वह तो अपनी बहन के नितंबों को देखकर उत्तेजना से मंत्र मुग्ध हो गया था,,, और वह कोई जवाब सुनना भी नहीं चाहती थी इसलिए बिना जवाब का इंतजार किए वह वहां से चलती बनी,,,, उसके जाने के बाद थोड़ी देर तक अंकित अपने कमरे में बैठा रहा और अपनी बहन के बारे में सोचता रहा फिर धीरे से अपनी बिस्तर पर से नीचे उतरा और हाथ मुंह धोकर खाने बैठ गया,,।



बातों ही बातों में सुगंधा तृप्ति से बोली,,,।

कोई दिक्कत तो नहीं हुई ना,,,।

नहीं मम्मी कोई दिक्कत नहीं हुई,,।

रात को सोई कहां थी,,,?

सुमन के घर पर वैसे तो मैं वहां सोना नहीं चाहती थी लेकिन आंटी बहुत जिद करने लगी तो मुझे जाना पड़ा,,,।

चलो अच्छा है कि तुम वहां जाकर सो गई,,,।खाना खाई थी,,,।

हां खाई थी सुबह तो बना हुआ ही था,रात को सुषमा आंटी खुद बुला कर ले गई थी खाना खिलाने के लिए वैसे सुषमा आंटी बहुत अच्छी है,,,।



(तृप्ति के मुंह से सुषमा आंटी बहुत अच्छी है सुनकर अंकित की आंखों के सामने सुषमा आंटी का नंगा बदन दिखाई देने लगा,,, बिल्कुल वही मुद्रा में जी मुद्रा में अंकित ने सुषमा आंटी को देखा था यह खांसी अपनी चूचियों को छुपाते हुए और दूसरी हाथ की हथेली से अपनी बुर को छुपाते हुए,,, इस दृश्य के बारे में सोचकर अंकित मन ही मन में मुस्कुराने लगा और तृप्ति की बात सुनकर सुगंधा बोली,,,)

अच्छी तो है इतने अच्छे से एक दिन के लिए तुम्हारी जिम्मेदारी जो उठा ली,,,, लेकिन तृप्ति अगर तुम भी चलती तो मजा आ जाता,,,। लेकिन तुम्हारी पढ़ाई,,,(इतना कहकर सुगंधा निवाला मुंह में डालकर खाने लगी और अपने मन में ही सोचने लगी कि अच्छा हुआ कि नहीं चली अगर चली होती तो शायद बस के सफर का आनंद वह पूरी तरह से नहीं उठा पाती,,,पर अपनी मां की बात सुनकर अंकित भी अपने मन में यही सोच रहा था कि अगर सच में उसकी दीदी भी साथ में गई होती तो शायद इतना अच्छा अनुभव और एहसास उसे कभी प्राप्त नहीं होता,,,,,फिर भी अपनी मां की बात रखने के लिए अपनी मां के सुर में सुर मिलाते हुए अंकित बोला,,,)



सच में दीदी तुम होती तो और मजा आता मामा मामी के घर बहुत मजा आया क्यों मम्मी सच कह रहा हूं ना,,,,।

हां बहुत मजा आया दो-तीन दिन और रुकना चाहिए था लेकिन ना तो कपड़े लेकर गए थे और नहीं पहले से बोल कर गए थे,,,।

(अंकित अपने मन में सोचने लगा कि अगर सच में दो-तीन दिन और रुकने का मौका मिलता तो शायद मामा के घर पर ही अपनी मां की चुदाई करने का मौका मिल जाता,,,,क्योंकि वह समझ गया था कि उसकी मां बहुत प्यासी है तभी तो अपने भाई को संभोग मुद्रा में देख रही थी,,, अगर इस समय वह कोई हरकत करता तो शायद उसकी मां बिल्कुल भी विरोध नहीं करती क्योंकि वह खुद खिड़की से झांक कर अंदर का दृश्य देखकर एकदम गरम हो गई थी,,,। अपनी मां की बात सुनकर वह बोला,,,)



अगली बार चलेंगे तो चार-पांच दिनों के लिए चलेंगे और दीदी को साथ में लेकर चलेंगे वहां कितना अच्छा लगता है कितनी अच्छी हवा चलती है एकदम ठंडक रहती है चारों तरफ खेत ही खेत,,,।

सच कह रहा है अंकित तूऔर छत पर सोने में कितना अच्छा लग रहा था एकदम ठंडी हवा बह रही थी,,,।

हां मम्मी एक झटके में नींद आ गई थी,,,,।

(इतना कहकर अंकित अपने मन में सोचने लगा कि एक झटके में उसकी मां ने पूरी नींद उड़ा दी थी उसकी आंखों के सामने ही छत पर कोने में बैठकर अपनी साड़ी कमर तक उठाकर अपनी बड़ी-बड़ी गांड दिखाते हुए पेशाब कर रही थी उसकी मां को नहीं मालूम था कि अंकित अपनी आंखों से सब कुछ देख चुका है,,, उस नजारे के बारे में याद करके तो इस समय भी उसका लंड खड़ा होने लगा था,, दोनों की बातों को सुनकर तृप्ति भी खाना खाते हुए बोली,,,)





तुम दोनों अगर इतनी तारीफ कर रहे हो तो सच में अगली बार में भी चलूंगी क्योंकि मुझे भी गांव पसंद है,,,।

अरे तृप्ति वह तो तेरे मामा का घर है,,,,जो दादा से अलग रहते हैं लेकिन अगर तू अपने दादा के घर जाएगी तो तेरा इधर आने का मन ही नहीं करेगा,,,।

ऐसा क्यों मम्मी,,,?

अरे पूछो गांव की अाबो हवा है ही ऐसी,,, चारों तरफ लहराते हुए खेत हरियाली छोटे-छोटे तालाब बड़ी-बड़ी नदियां हर तरह के फल का बगीचा बड़े-बड़े पेड़ ऊंची नीची कच्ची सड़क और गांव मेंघास फूस की बनी झोपड़ी सच में बहुत मजा आ जाता है नहाने के लिए हेड पंप या कु्ए पर जाना पड़ता है उन सबका अपना अलग ही मजा है,,,।

क्या बात करती हो मम्मी क्या गांव में सच में यह सब होता है,,,(अंकित एकदम आश्चर्य जताते हुए बोला)

तो क्या गांव में बहुत मजा आता है,,,।

तब तो मम्मी हम लोगों को गांव चलना चाहिए,,,।(तृप्ति उत्सुकता दिखाते हुई बोली)

चलना तो चाहिए लेकिन बिना काम के चलने में पैसे बहुत खर्च हो जाते हैं,।



तो क्या हुआ मम्मी एक बार हम लोगों को गांव घूमाना तो चाहिए तुम्हें,,,।

अच्छा कोई बात नहीं समय आएगा तो हम सब चलेंगे गांव,,,,।

(इतना कह कर फिर से तीनों खाना खाने लग गए थोड़ी देर में खाना खा लेने के बाद,,, तृप्ति और सुगंधा दोनों बर्तन साफ करने लगे तृप्ति तो अपनी मां को रोक रही थी बर्तन साफ करने से लेकिन वह मानी नहीं और साथ में बैठ गई,,,बर्तन साफ करने के बाद तीनों कुछ देर तक टीवी देखते रहे और फिर अपने अपने कमरे में चले गए लेकिन तीनों की आंखों में नींद बिल्कुल भी नहीं थी जिसका कारण था कि तीनों की आंखों में वासना की चमक पूरी तरह से अपना असर दिखा रही थी,,, बस में हुए घमासान घर्षण को याद करके अंकित अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा हो गया था अपने हाथ से अपने लंड को हिला कर अपने आप को शांत करने की कोशिश कर रहा था,,,।



सुगंधा अपनी साड़ी को कमर तक उठाकर अपनी पैंटी को अपने हाथों से निकाल कर अपनी गरमा गरम बुर को अपनी हथेली से जोर-जोर से रगड़ रही थी मसला रही थीऔर यह क्रिया करते हुए अपने आप को खुश रही थी क्योंकि उसे अब लग रहा था कि उसके पास वही अच्छा मौका था जब खिड़की से देखते हुए उसके बेटे ने भी वही दृश्य को देखा था जिसे देखकर वह गर्म हो रही थीइस समय वह अपने बेटे को सब कुछ सही-सही बता देती तो शायद छत के ऊपर दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हो जाता,,।



और तृप्ति सुमन को याद करके अपने सारे कपड़े उतार कर नंगी होकर अपनी चूची को एक हाथ से पकड़ कर दबाते हुए दूसरे हाथ की हथेली से अपनी गरमा गरम बुर को रगड़ रही थी और अपने भाई के लंड के बारे में सोच रही थी,,वह अपनी मन में सोच रही थी कि अगर उंगली से उसे इतना आनंद मिला है तो अगर उसके भाई का मोटा तगड़ा लंड उसकी बुर में जाकर अंदर बाहर करेगा तो कितना मजा आएगा यही सब सोचते हुए वह भी अपनी जवानी की गर्मी को शांत करने में लगी हुई थी,,,।

तकरीबन10 12 दिन का समय गुजर चुका था लेकिन इन दिनों में सुगंधा अपने बेटे से उस दृश्य के बारे में चर्चा नहीं कर पाई थी और ना ही बस के सफर के दौरान जो कुछ भी हुआ था उसे बारे में कोई बात कर पाई थी,,,और मन तो दुखी उसका इस बात से ताकि इस बारे में उसके बेटे ने भी उससे कुछ भी नहीं पूछा था क्योंकि सुगंधा को लग रहा था कि बातचीत आगे बढ़ाने का यही अच्छा मुद्दा है,,, लेकिन फिर भी थी तो वह एक मा ही अगर मन की जगह एक औरत होती तो शायद वह कब से आगे बढ़ गई होती और वह औरत उसके अंदर बार-बार जन्म भी ले रहा था लेकिन वह अपने आप को आगे नहीं बढ़ा पा रही थी,,, इस बात का मलाल उसे अच्छी तरह से हो रहा था,,,।



एक दिन सुगंधाअपने बेटे अंकित और अपनी बेटी प्रीति के साथ बाजार सामान खरीदने गई थी,,, लेकिनएक दिन जब वह बाजार सब्जी लेने गई थी अपने बेटे के साथ तब फुटपाथ पर कुछ लड़के उसके खूबसूरत बदन उसकी जवानी पर फब्तियां कस रहे थे,,और उन लड़कों के कहने का मतलब बिल्कुल साफ था कि वह लड़के उसे चोदना चाहते थे उसकी बड़ी-बड़ी गांड देखकर उत्तेजित में जा रहे थे उसकी बड़ी-बड़ी चूची उनके बीच आकर्षण का केंद्र था और वह लोग खुलकर उसके साथ-साथ अपनी मां बहन के बारे में भी गंदी बातें कर रहे थे,,, उसे दिन से लेकर आज तक सुगंधा जब भी बाजार सब्जी लेने जाती थी तब फुटपाथ पर खड़े आवारा लड़कों से दूरी बनाकर ही चलती थी,,, बहुत दिनों बाद सुगंधा अपने बेटे के साथ-साथ अपनी बेटी को भी लेकर आई थी क्योंकि अक्सर कोचिंग के सिलसिले से त्रप्ति घर पर मौजूद नहीं होती थी,, और ऐसे में सुगंधा को अंकित के साथ ही बाजार जाना पड़ता था,,,।



सुगंधा घर का सामान और सब्जियां खरीद चुकी थी और अंकित और तृप्ति को समोसा चाट के साथ-साथ पानी पुरी भी खिला रही थी और खुद भी खा रही थी,,,और उन दोनों के साथ नाश्ता करने के बाद वह बाजार के मुख्य सड़क पर आ गई थी जहां से उन लोगों को वापस घर की तरफ आना था,,, लेकिन सुगंधा ने देखी की तृप्ति बार-बार बाजार की तरफ ही देख रही थी इसलिए वह तृप्ति से बोली,,,।।

क्या हुआ बार-बार वहां क्या देख रही है,,।

मुझे और पानी पुरी खाना है,,,।

अभी तो तुम खाई ना,,,।

तो क्या हो गया मन थोड़ी ना भरा है मेरा मन और कर रहा है खाने को,,,।



हे भगवान कैसी लड़की है इसका पेट ही नहीं करता अभी घर पर जाएगी तो कहेगी कि भूख नहीं लगा है,,, और इसके हिस्से का खाना बेकार हो जाएगा,,,,(ऐसा कहते हुए बटुआ में से 10 का नोट निकालते हुए वह तृप्ति की तरफ आगे बढ़ाते हुए बोली,,,)

ले जाकर खा ले और जल्दी से खाना,,,(उसे रुपया थमाने के बाद वह अंकित की तरफ देखने लगी और बोली,,) तुझे भी और खाना है,,,.

नहीं नहीं मेरा तो हो गया मैं नहीं खाऊंगा,,,।

ठीक है तू ही जा जल्दी से आना,,,,



ठीक है अभी जल्दी से आती हुं उसने बराबर तीखा नहीं डाला था इसलिए मजा नहीं आया,,,(इतना कहकर तृप्तिजल्दी-जल्दी उसे ठेले वाले के पास जाने लगी और मां बेटे दोनों वही बड़े से पेड़ के पास फुटपाथ के किनारे खड़े होकर जहां पर एक 5 फीट की दीवार भी जाती थी और आगे से थोड़ी टूटी हुई थी,,,यह वह जगह नहीं थी जहां पर पहले सुगंध जानबूझकर पेशाब करते हुए अपनी गांड अपनी बेटी को दिखा रही थी यह जगह उससे पहले ही थी बाजार की शुरुआत में,,, यहां पर भी लोगों का आना-जाना अच्छा खासा बना रहता था क्योंकि यहीं से बाजार भी शुरुआत भी होती थी,,,।

कुछ देर खड़े रहने के बाद सुगंधा को वाकई में पेशाब लगने लगी,,, वह इधर-उधर देखने लगी वह जानती थी कि यह उचित जगह नहीं थी पेशाब करने कीक्योंकि यहां पर लोगों का आना-जाना काफी था इसलिए वह अपने आप को रोक रह गई थी अपने आप पर काबू किए हुए थी,,,लेकिन फिर भी रह कर उसके पेशाब की तीव्रता बढ़ती जा रही थी उससे अब काबू नहीं हो रहा था उसे ऐसा लग रहा था कि अगर वह कुछ देर तक ऐसे ही खड़ी रही तो अपने आप ही उसकी पेशाब छूट जाएगी,,, इन सबसे अनजान अंकित अपनी ही धुन में खड़ा होकर इधर-उधर देख रहा था,,, सुगंधा को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,,पहले तो ऐसे हालात में वहां किसी भी तरह से किसी न किसी बहाने से अपनी नंगी गांड को अपने बेटे को दिखाने की कोशिश करती थी लेकिन इस समय का हालात कुछ और था यहां पर ऐसा कुछ भी नहीं था कि जानबूझकर अपने बेटे को अपना खूबसूरत अंग दिखाएं क्योंकि ऐसे में दूसरे के भी देखे जाने की अाशंका बढ़ जाती थी। इसलिए वह इस समय दीवार की दूसरी तरफ जाकर पेशाब करने से कतरा रही थी वह तृप्ति का इंतजार कर रही थी कि जल्दी से वह आए तो घर की तरफ जाए,,,,इसलिए वह बार-बार इस दिशा में देख रही थी लेकिन दूर-दूर तक तृप्ति का कोई ठिकाना नहीं था,,,।



लेकिन पेशाब की तीव्रता अब असहनीय होने लगी उसे लगने लगा कि अब छोड़ जाएगा इसलिए वह जल्दी से थैले को अंकित के हाथों में पकडाते हुए बोली,,,,।

अंकित तु थैला पकड़,, मैं अभी आती हूं,,,,।

(अंकित थैला पकड़ने से पहले ही बोला,)

लेकिन तुम कहां जा रही हो मम्मी,,,,?

ज्यादा सवाल मत पूछ मैं अभी आती हूं ले जल्दी से पकड़ ले,,,।

(इतना कहने के साथ ही वह थैले को अंकित के हाथ में पकड़ा दिया और अंकित भी बिना कुछ आगे पुछे थैले को हाथ में ले लिया,,, और देखने लगा कि उसकी मां क्या करती है,,,, सुगंधा को तो बड़े जोरों की पेशाब लगी हुई इसलिए वह अपने आप को बिल्कुल भी रोक सकने की स्थिति में नहीं थी इसलिए वह तुरंत फुटपाथ से लगी दीवार जो थोड़ी सी टुटी हुई थी उसमें से प्रवेश करके दूसरी तरफ जाने लगी, यह देखकर अंकित भी समझ गया कि उसकी मां कहां जा रही है इसलिए कुछ बोला नहीं वैसे तो ऐसी स्थिति में उसका बहुत मन करता था अपनी मां को पेशाब करते हुए देखने के लिए लेकिन यहां पर ऐसा करना मुनासिब नहीं था क्योंकि यह जगह लोगों के आने जाने के लिए थी और बिल्कुल भी सुनसान नहीं था इसलिए अगर ऐसी स्थिति में वह देखने की कोशिश करता है तो किसी के भी नजर में आ जाएगा,, और ऐसे में शर्मनाक स्थिति पैदा हो सकती है इसलिए वह अपने आप को अपनी मां को पेशाब करते हुए देखने से रोकने लगा,,,



सुगंधा जल्दबाजी दिखाते हुए पीछे की तरफ पहुंच चुकी थी और इधर-उधर देख भी नहीं वह अपनी साड़ी को दोनों हाथों से पकड़ कर एकदम से कमर तक उठाकर वहीं पर पेशाब करने के लिए बैठ गई थी,,, जैसे ही उसके गुलाबी छेद में से पेशाब का फवारा फुटा उसे राहत महसूस होने लगी और उसे इस बात का एहसास भी होने लगा था कि अगर वह जरा सी देरी लगती तो शायद साड़ी में ही उसका पेशाब छूट जाता तब शर्मनाक स्थिति पैदा हो जाती,,,,, पेशाब की तीव्रता इतनी थी कि बैठने के बावजूद भी तकरीबन डेढ़ मीटर तक उसकी बुर से पेशाब की धार निकल कर जा रही थी,, बाहर दीवार के पीछे खड़े अंकित का मन बहुत मचल रहा था लेकिन वह किसी तरह से अपने आप को रोके हुए था और बाजार की तरफ देख रहा था जहां पर तृप्ति पानीपुरी खाने के लिए गई थी,,,, जहां पर वह खड़ा था वहां लगातार लोगों का आना-जाना बना हुआ था इसलिए वह छुपकर भी उस नजारे को देख नहीं सकता था,,,।



धीरे-धीरे सुगंधा के पेशाब की तीव्रता कम होने लगी लेकिन फिर भी उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके पास में ही कुछ पानी जैसा गिर रहा है वह एकदम हैरान हो गई थी इधर-उधर देखने लगी उसे कहीं कुछ दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन तभी उसे ऐसा लगा कि पेड़ के पास से ही वह आवाज आ रही है और वह बड़े गौर से देखी तो एकदम से हैरान हो गई उसकी सांस एकदम से अटक गई,,, अपनी स्थिति पर उसे शर्म महसूस होने लगी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें अभी भी उसकी बुर से पेशाब की धार निकल रही थी भले ही कमजोर पड़ गई थी लेकिन धार बराबर निकल रही थी लेकिन जो उसकी आंखों के सामने पेड़ के पास था वह उसे एकदम शर्मिंदगी का एहसास करने के लिए काफी था,,, अगर उसकी जगह कोई और औरत होती तो शायद उसकी भी यही स्थिति होती,,,।



बड़ी गौर से देखने के बाद चित्र स्पष्ट हो गया था पेड़ के पीछे कोई आदमी खड़ा था जो अपना लंड बाहर निकाल कर पेशाब कर रहा था,,, इस नजारे को देखकर सुगंधा एकदम से ठीठक गई,,, उसकी तो पेशाब एकदम से रुक गई थी वह कुछ पल के लिए उस नजारे को देखते ही रह गई,,, सामान्य अवस्था में वह पेशाब नहीं कर रहा था इतना तो तय था क्योंकि उसका लंड पूरी तरह से उत्तेजित था एकदम खड़ा था वह उत्तेजित अवस्था में पेशाब कर रहा था,,,, सुगंधा को क्या करना है उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था वह तो बस एक टक उसकी तरफ देखती ही जा रही थी,, पहली बार किसी गैर मर्द को अपनी इतनी करीब खड़ा होकर पेशाब करते हुए देख रही थी,, इससे पहले केवल उसके पास खड़े होकर उसका बेटा ही पेशाब किया था क्योंकि ऐसा वह चाहती थी वरना उसके बेटे की भी हिम्मत नहीं थी कि उसके पास में खड़ा होकर पेशाब कर सकें,,,।



सुगंधा का मन विचलित हुआ जा रहा था क्योंकि वह आदमी अपनी लंड को अपनी मुट्ठी में पकड़ कर उसे आगे पीछे करके हिलाते हुए पेशाब कर रहा था, यह नजारा देखकर वह इतना तो समझ ही गई थी कि सामान्य रूप से वह पेशाब नहीं कर रहा था बल्कि इसकी कोई खास वजह थी उसके अंदर गंदी भावना पैदा हो रही थी और जल्द ही उसे इस बात का पता भी चल गया क्योंकि जिस तरह से सुगंधा उसकी तरफ देख रही थी उसे आदमी को लगने लगा कि वह भी रुचि रख रही है इसलिए वहां अपने लंड को हिलाते हुए ही बोला,,,।



मैडम तुम्हारी गांड बहुत मस्त है तुम्हारी नंगी गांड देखकर करी मेरा लंड खड़ा हो गया है,,,, अगर तुम्हें एतराज ना हो तो यही झुका कर तुम्हारी ले लुं,,,,।

(उसे अनजान आदमी की इस तरह की गंदी बातें सुनकर तो ऐसा लग रहा था की सुगंधा के कानों में हथौड़े बरस रहे हो सुगंध को उम्मीद नहीं थी कि कोई आदमी इस तरह से उसे बदतमीजी करेगा इस तरह से उससे गंदी फरमाइश करेगा,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें वैसे इस समय आप गलती उसकी भी थी उसे आदमी को देखकर भी वहां तुरंत उठकर खड़ी होकर सामान्य स्थिति में नहीं हो पा रही थी अब अभी वह उसे ही देखते हुए इस तरह से बैठी हुई थी साड़ी कमर तक उठे उसकी नंगी गांड एकदम साफ दिखाई दे रही थी और यही वजह थी कि वह अनजान आदमी पूरी तरह से मदहोश और उत्तेजित हो गया था और मदहोशी में इस तरह की फरमाइश कर रहा था,,,,,, सुगंधा को वह सहज होते हुए ना देखकर उसकी हिम्मत बढ़ने लगी और उसकी दोनों टांगों के बीच देखते हुए वह अपने लंड को हिलाते हुए बोला,,,)



क्यों मैडम कैसा लगा मेरा लंड बोलो तो अभी तुम्हारी बुर में डाल दुं,,,,,(ऐसा कहते हुए वह एकदम से पेड़ के पीछे से बाहर आ गया और यह देखकर सुगंधा एकदम से घबरा गई,,, और वह अपने कदम को आगे बढ़ा रहा था यह देखकर तो उसकी हालत और खराब होने लगी वह तुरंत उठकर खड़ी हो गई तो अपनी साड़ी को व्यवस्थित कर दी वह उसे कुछ बोल नहीं पाई बस गुस्से में इतना ही बोली,,,)

बदतमीज कहीं का अपनी मां बहन के पास चले जा,,।

(और इतना कहकर वह तुरंत टूटी हुई दीवार से फिर से फुटपाथ पर आ गई,,,,,, अपनी मम्मी को देख कर अंकित बोला)

कितनी देर लगादी मम्मी,,,,।



चल कोई बात नहीं,,,, तृप्ति आई कि नहीं,,,,!(तिरछी नजर से दीवार के पीछे की तरफ देखते हुए गोरी वह आदमी अभी भी वहीं खड़ा होकर मुस्कुराता हुआ अपने लंड को हिला रहा था वह अपने मन में बोली कितना बेशर्म है,,,, हरामजादा अपनी मां की बात सुनकर अंकित बोला)

वह देखो आ रही है दीदी,,,, वह भी बहुत समय लगा दी,,,,।

(इसके बाद रास्ते पर सुगंधा उसे आदमी के बारे में सोचती रही कि कैसा बदतमीज और बेशर्म इंसान है,,, सीधे-सीधे उसे चोदने की बात करने लगा,,, फिर अपने मन में सोचने लगी की इसमें उसकी ही गलती है वह ज्यादा देर तक उसे आदमी के सामने भी बैठकर पेशाब करती रही ऐसे में उसकी नंगी गांड और टांगों के बीच की गाली देकर उसकी हिम्मत बढ़ गई थी अगर सच में उसकी जगह कोई और होता तो वह उठकर खड़ी हो जाती है और अपने कपड़े को ठीक कर लेती उसका देर तक बैठे रहना ही उसे आदमी की हिम्मत को बढ़ा रहा था और उसकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि सीधे-सीधे उसे अपने मन की फरमाइश करने लगा,,,।



इस बात को सोचते हुए वह अपने बेटे के बारे में सोचने लगी कि उस आदमी और उसके बेटे में कितना फर्क है तू जरा सी देर हो जाने पर सीधा मुद्दे की बात पर आ गया था और उसका बेटा उसकी आंखों के सामने जानबूझकर अंग प्रदर्शन करने के साथ-साथ ऐसी तमाम हरकत करने के बावजूद भी उसका बेटा अभी तक उसके इशारे को पूरी तरह से समझ नहीं पाया था और अपने मन की बात को कह नहीं पाया था,,, यही सब सोचते हुए सुगंधा घर पहुंच गई थी।
 
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