हाथ को आया मुंह को ना लगा,,,, संदीप की हालात कुछ ऐसी हो गई थी,,,, जिस चीज को पाने के लिए उसने महीनो तक मेहनत किया,,, इतने पापड़ बेले,,, नखरे सहे,,, वह खूबसूरत चीज उसकी आंखों के सामने थी जिसे वह खुद कपड़े निकाल कर उजागर किया था,,,, लेकिन न जाने संदीप की किस्मत में क्या लिखा हुआ था की आंख के सामने बेस कीमती होश ना का दरिया होने के बावजूद भी वह उसमें डुबकी नहीं लगा पाया,,,, संदीप को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे उसकी किस्मत गधे के लंड से लिखी गई थी,,,, उसकी भाषा में कहे तो उसके अरमान लोड़े लग गए थे,,,, वह बहुत हताश हो चुका था निराश हो चुका था इसलिए तृप्ति को वापस लाते समय वहां निराशा के मारे उससे बात तक नहीं कर पा रहा था,,,।
वैसे भी जिस तरह की हालात बने हुए थे उसे देखते हुए किसी को भी उम्मीद न होती की सब कुछ आंखों के सामने होते हुए भी धरा का धरा रह जाएगा,,,, सब कुछ संदीप के पक्ष में था एकांत जगह एकांत कमरा किसी की भी मौजूदगी नहीं थी,,,, ऐसे में एक मर्द चाहे तो औरत के साथ कुछ भी कर सकता है और वही संदीप तृप्ति के साथ कर नहीं जा रहा था जिसमें तृप्ति की पूरी तरह से सहमति थी संदीप ने अपनी हरकत चतुर्थी को पूरी तरह से गर्म कर दिया था वह भी चुदवाने के लिए तैयार हो चुकी थी,, जिसके लिए संदीप ने उसकी सलवार की डोरी खोल कर उसकी पैंटी सहित उसे घुटनों तक खींच दिया था और उसकी दोनों टांगों को मोड़ दिया था ताकि वह उसके गुलाबी छेद में आराम से अपना लंड डाल सके जिसके लिए वह अपना लंड भी बाहर निकाल लिया था बस उसे डालने की देरी थी,,, लेकिन तभी दरवाजे की घंटी बज गई थी उसे समय संदीप को ऐसा ही लग रहा था कि दरवाजे की घंटी नहीं बल्कि कोई उसके दिल पर हथोड़ा मार रहा हो,,, उस समय घंटी की आवाज से वह पूरी तरह से घायल हो चुका था,,,।
घंटों सोच विचार कर बनाया हुआ प्लान फेल हो चुका था,,,,,, वैसे तो तृप्ति के साथ इस तरह की हरकत करने के लिए वह बीच रास्ते में जंगली झाड़ियां के बीच जगह तय कर लिया था लेकिन मैडम के घर पर ही उसे पूरी तरह से अवकाश मिल गया था लेकिन वह अवकाश नहीं था बल्कि उसके अरमानों का दमन था जो उसे दरवाजे की घंटी ने कर दी थी,,,। अनुभव से भरा हुआ संदीप तृप्ति की गुलाबी बुर को देखकर पागल हो गया था,,, वह समझ गया था कि तृप्ति की बुर अनछुई थी अनचुदी थी,,, जिस पर अभी तक किसी दूसरी मर्द का स्पर्श तक नहीं हुआ था ऐसी खूबसूरत गुलाबी छेद को देखकर संदीप के मुंह के साथ-साथ उसके लंड में भी पानी आ गया था वह अपने लंड को उसे गुलाबी छेद में डालकर अपने अरमान को पूरा करना चाहता था,,,। वह खुशी के मारे पागल हो गया था क्योंकि उसे उम्मीद नहीं थी कि इतनी आराम से त्रप्ती की बुर उसे मिल जाएगी,,, वैसे इतने आराम से तो मिले नहीं थी लेकिन फिर भी उसे उम्मीद नहीं थी कि सिर्फ इतनी जल्दी तैयार हो जाएगी चुदवाने के लिए,,, लेकिन सब कुछ बेकार हो चुका था,,,,।
ऐसा नहीं था कि इस असफलता से केवल संदीप ही परेशान था,,, तृप्ति भी निराश हो गई थी क्योंकि जिंदगी में पहली बार हुआ इस तरह का बड़ा कदम उठाई थी जिसके लिए वह पूरी तरह से तैयार हो चुकी थी वह देखना चाहती थी कि संभोग में कितना सुख मिलता है वैसे तो वह इतना तो एहसास कर ही चुकी थी कि संभोग के पहले की क्रिया में बहुत मजा आता है इसलिए उसे इतना तो विश्वास था कि संभोग में भी बहुत मजा आता होगा जिसके लिए वह पूरी तरह से तैयार हो चुकी थी लेकिन इन मौके पर उसके भी अरमानों पर पानी फिर गया था,,,,।
वैसे तो उस समय तृप्ति पूरी तरह से शर्म से पानी पानी हो गई थी जब संदीप ने अपने हाथों से उसकी सलवार की डोरी खोलकर सलवार को चड्डी सहित घुटनों तक खींच दिया था ऐसे हालात में उसकी बुर एकदम से साफ नजर आ रही थी,,, और ऐसे में संदीप को अपनी बर दिखने में उसे बेहद शर्म महसूस हो रही थी यहां तक कि वह शर्म से गड़ी जा रही थी लेकिन चुदाई का मजा लूटने की चाहत में वह इनकार नहीं कर पाई थी लेकिन संदीप के लंड को देखकर वह पूरी तरह से आहत हो चुकी थी वह समझ नहीं पा रही थी कि यह सब क्या है पहले तो संदीप के लंड के आकार की कल्पना उसके मन में रहती थी लेकिन जब से उसने अपने छोटे भाई के लंड के दर्शन की थी,,, उसके बाद जैसे ही संदीप के लंड का दीदार उसे हुआ वह पूरी तरह से आहत हो गई,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि मर्द में इतना बड़ा बदलाव कैसे एक का आधे से भी काम और दूसरे का बम पिलाट गधे का जैसा ,,,।
खैर जो भी हो मुंह लटकाए वह घर आ चुकी थी,,, सही समय पर घर पर पहुंचने पर उसकी मां भी बहुत खुश थी क्योंकि वह आजकल की लड़कियों के तेवर को उनकी हरकतों को अच्छी तरह से जानती थी क्योंकि इसी तरह से लड़कियां सहेली के घर जाने का बहाना करके अपने प्रेमी के साथ बाहर गुलछर्रे उड़ाया करती थी लेकिन सुगंधा को अपनी बेटी पर पूरा विश्वास था,,, वह जानती थी कि उसकी बेटी कभी भी दूसरी लड़कियों की तरह हरकत नहीं करेगी ना ही उसके कदम डगमगाएंगे,,,।
दूसरे दिन कॉलेज में संदीप और तृप्ति दोनों एक दूसरे से नजर मिलाने से भी घबरा रहे थे,,, तृप्ति इसलिए नजर नहीं मिल पा रही थी क्योंकि अब तक वह संदीप को इस तरह की हरकत करने से रोकते आ रही थी और नाराज भी थी,,, लेकिन एकाएक उससे अपनी जवानी का दबाव बर्दाश्त नहीं हुआ,,, और वह उसके सामने टांगे खोलें अपनी बुर उसे परोश दी थी,,, और संदीप इसलिए शर्मिंदा था कि जिस चीज के लिए उसने इतना मेहनत किया था वह चीज उसकी आंखों के सामने होते हुए भी उसमें लंड डालने की तो छोड़ो उसने अपनी उंगली भी नहीं डाल पाया था,,,,।
एक दो तीन ऐसे ही गुजर गए,,,, दोनों फिर से आपस में बात करने लगे लेकिन मैडम के घर पर जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में बात करने में दोनों कतरा रहे थे,,,, दोनों में धीरे-धीरे फिर से मामला सहज होने लगा था की तभी एक सप्ताह बीतने के बाद,,, संदीप ने फिर से एक चिट्ठी लिखा और उसे एक नोटबुक में करके उसे थमा दिया,,,, और उसे नोटबुक देते समय बोला,,,।
इस स्थिति में जो कुछ भी लिखा है उसे घर पर जाकर इत्मीनान से पढ़ना,,,,
क्यों अभी भी कुछ कहना बाकी रह गया है क्या जो कहना था वह तो तुम कह दिए हो,,,।
हां लेकिन जो मैं नहीं कहना चाहता था वह मुझे इस चिट्ठी में लिखना पड़ रहा है और मुझे पूरा भरोसा है कि तुम इस चिट्ठी को पढ़कर नाराज नहीं होगी बल्कि समझदारी से काम लोगी,,,।
ठीक है,,, लेकिन तुमने चिट्ठी में ऐसा क्या लिख दिया है कि इतना भाषण देना पड़ रहा है,,,।
मैं बात नहीं सकता अगर बता सकता तो तुम्हें चिट्ठी देने की जरूरत नहीं पड़ती ऐसे ही बता देता,,,, ठीक है मैं चलता हूं,,,,(इतना कहकर संदीप वहां से चला गया और तृप्ति उसे जाता हुआ देखते रह गई और सोचती रह गई कि आखिरकार चिट्ठी में ऐसा क्या लिखा है जिसे देते समय उसके चेहरे पर उदासी छा गई थी,,,, कहीं उसे दिन के लिए माफी तो नहीं मांग रहा है,,, लेकिन उसे दिन के लिए तो वह खुद नाराज नहीं है तो माफी किस बात की शेर जो भी हो यह तो चिट्ठी पढ़ने के बाद ही मालूम पड़ेगा कि क्या लिखा है,,,,,।
रात के 10:00 रहे थे और वह सब काम निपटाकर अपने कमरे में चली गई और अपना बैग खोलकर नोटबुक निकाल ली और उसमें रखी हुई चिट्ठी को पढ़ने लगी किसी को पढ़ते पढ़ते उसकी आंखों से आंसू निकलने लगी वह एकदम से परेशान हो गई वह कुछ कर भी नहीं सकती थी किसी को बता भी नहीं सकती थी किसी को भी अपनी हालत बयां नहीं कर सकती थी,,,,, गुस्से में वह चिट्ठी को टुकड़े-टुकड़े करके फाड़ कर उसे कचरे के डिब्बे में डाल दी और तकिया को अपने सीने से लगाए बिस्तर पर लेट कर रोने लगी,,,।
ऐसा क्यों किया संदीप तुमने,,, जब जाना ही था तो मुझे दिल क्यों लगाया क्यों मेरे इतने करीब आए,,,,,(ऐसा कहकर वह रो रही थी,,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,, क्योंकि संदीप ने चिट्ठी में लिखा था कि,,,, आज तुमसे आखिरी मुलाकात है मेरे पापा का तबादला हो गया है दूसरे शहर ना चाहते हुए भी हमें जाना पड़ रहा है तुम तो जानती हो कि मेरे पिताजी सरकारी मूलाजीम है,,, जहां तबादला होता है वहां जाना ही पड़ता है,,,, तृप्ति मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं जिंदगी भर करता रहूंगा अगर किस्मत में लिखा रहेगा तो फिर मिलेंगे लेकिन मेरे जाने से तुम उदास मत होना तुम बहुत अच्छी लड़की हो,,,, तुम्हारा संदीप,,,,,।
तृप्ति,, कभी सोची भी नहीं थी कि संदीप इस तरह से उसे छोड़कर चला जाएगा वह तो अपने मन में जिंदगी भर का साथ का सपना देखने लगी थी जहां तक कि वह संदीप के साथ विवाहित जीवन का भी सपना देखने लगी थी लेकिन जल्द ही उसका सपना टूट गया संदीप उसे रोता हुआ छोड़ गया था,,,,, लेकिन तभी उसके मन में ख्याल आया कि अच्छा हुआ मैडम के घर पर कुछ हुआ नहीं अगर कुछ हो गया होता तो वह जिंदगी भर अपने आप को माफ नहीं कर पाती,, क्योंकि अगर उसे बारे में किसी को पता चल जाता तो वह बदनाम हो जाती उसकी इज्जत चली जाती है और वह फिर कभी भी समझ में सर उठाकर जी नहीं पाती,,,,।
एक तरफ जहां वह इस तरह के ख्याल से अपने मन को मनाने की कोशिश कर रही थी वहीं दूसरी तरफ वह संदीप के जाने से बहुत दुखी थी संदीप से वह आखरी बार मिल भी नहीं सकती थी क्योंकि वह लिखा था कि जब तक तुम यह चिट्ठी पड़ोगी तब तक मैं दूसरे शहर के लिए निकल गया होऊंगा,,,।
इस चिट्ठी को पढ़कर तृप्ति, पूरी तरह से टूट गई,, क्योंकि उसे संभालने वाला कोई नहीं था अपने प्यार की बात वह किसी से कह भी नहीं सकती थी,,, इसलिए इस दुख को अकेले झेल रही थी दूसरी तरफ संदीप को त्रप्ती से अलग होने का मलाल बस इतना था कि वह तृप्ति को चोद नहीं पाया था उसकी गुलाबी बुर का स्वाद नहीं चख पाया था,, तृप्ति से उसे बिल्कुल भी लगाव नहीं था उसे लगाव था तो सिर्फ तृप्ति के खूबसूरत बदन से,, और यही बात त्रप्ती समझ नहीं पा रही थी,,, उसे ऐसा ही लग रहा था की संदीप भी उससे दिलो जान से प्यार करता है,,,।
संदीप का काम उसे इतना सता रहा था कि दो-तीन दिन तक तो वह कॉलेज नहीं जा पाई,,, यहां तक कि उसे बुखार आ गया उसकी तबीयत खराब हो गई,,,,, उसकी मां ने उसे दवा दिलाई तब जाकर उसे आराम हुआ,,, लेकिन फिर भी वह संदीप के गम से बाहर निकल नहीं पाई थी,,, मोहब्बत का दर्द होता ही इतना गहरा है कि जिसमें से निकलने में बहुत वक्त लगता है,,,,, तृप्ति का कॉलेज आना जाना तो शुरू हो गया था लेकिन वह उदास रहने लगी थी,,, उसकी उदासी का कारण हमेशा सुगंध जानने की कोशिश करती थी और वह परीक्षा का तनाव बढ़कर बात को टाल जाती थी सुगंधा भी नहीं समझ पाती थी कि आखिरकार उसके बेटी को हुआ क्या है,,,।
जैसे तैसे करके महीना गुजर गया,,,, पिछले कुछ दिनों से सुगंधा और उसके बेटे में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिससे दोनों केतन बदन में उत्तेजना की लहर उठे,,,,,,,,।
दो-चार दिनों से अंकित देख रहा था कि उसकी मां कुछ सुस्त नजर आ रही थी,,,, दो-चार बार वह पूछ भी की क्या हुआ है लेकिन वह ठीक से बता नहीं पाई,,, कि उसे क्या हुआ है उसे ऐसा ही लग रहा था कि जैसे बदन में आलस है जिसकी वजह से वह सुस्त नजर आ रही थी,,,,। दोपहर में जब अंकित घर पर पहुंचा तो देखा उसकी मां अपने कमरे में ही है कमरे का दरवाजा खुला हुआ था और बिस्तर पर उसकी मां सो रही थी दरवाजे पर खड़े होकर वह अपनी मां की तरफ देख रहा था तो उसे केवल अपनी मां की उठती बैठती हुई चूचियां नजर आ रही थी जिसके चलते उसके बाद में उत्तेजना की लहर उठ रही थी,,, और वह धीरे-धीरे अपनी मां के करीब पहुंच गया उसकी मां सो तो नहीं रही थी लेकिन कुछ परेशान नजर आ रही थी अंकित को थोड़ा अजीब लगा तो वह अपनी मां के सर पर हाथ रख कर देखने लगा तो वह एकदम से चौंक गया क्योंकि उसका माथा एकदम गरम था उसे बहुत बुखार था,,,।
मम्मी तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है दवाई नहीं ली क्या,,,,?
नहीं रे कुछ दिनों से ऐसा लग रहा था की तबीयत खराब है लेकिन आज कुछ ज्यादा ही तबीयत खराब लगने लगी चक्कर आया तो में सोने की कोशिश कर रही हूं लेकिन नींद नहीं आ रही है,,,,।
तुम्हें तो दवा दिलाना पड़ेगा चलो जल्दी से मैं तुम्हें दवा खाने ले चलता हूं,,,,,।
रहने दे मेडिकल पर से बुखार की गोली ले आ उससे आराम हो जाएगा,,,
मेडिकल से नहीं तुम्हें दवा खाने से दवा दिलाना पड़ेगा चलो मैं लेकर चलता हूं,,,।