Incest मुझे प्यार करो,,, - Page 2 - SexBaba
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Incest मुझे प्यार करो,,,

दूसरे दिन सुबह नाश्ता करके तृप्ति और अंकित दोनों अपने-अपने रास्ते निकल चुके थे,,,,, सुगंधा का भी समय हो रहा था इसलिए वह जल्दी-जल्दी अपना काम खत्म करके कमरे में प्रवेश कर गई और हमेशा की तरह आजम का आने के सामने अपने गाउन को उतारकर एक बार फिर से नंगी हो गई,,,, सुबह-सुबह वह नहाने के बाद गाउन पहन लेती थी क्योंकि उसे खाना बनाना पड़ता था नाश्ता तैयार करना पड़ता था,,,, क्योंकि अगर वह नहाने के तुरंत बाद तैयार हो जाए तो स्कूल जाते-जाते उसे अजीब सा लगने लगता था इसलिए वह सारा काम खत्म करके तैयार होने के बाद स्कूल जाती थी,,,,।

आईने के सामने वह एक बार फिर से नंगी हो चुकी थी उसके बदन पर कपड़े का रेशा तक नहीं था,,,, वैसे तो पति के देहांत के बाद उसके लिए सजना समझना सब कुछ बेकार ही था लेकिन वह स्कूल में पढ़ने का काम करती थी वह टीचर थी स्कूल में और भी टीचर थी जो सज धज कर ही आया करती थी और इसीलिए उसे भी एकदम अप टू डेट होकर ही जाना पड़ता था ऐसा कोई नियम तो नहीं था लेकिन फिर भी सुगंधा अपने मन को मनाने के लिए अपने पति के देहांत के बाद बस थोड़ा सा सज संवर लेती थी,,, जल्दी से उसने अलमारी में से अपने लाल रंग की ब्रा निकाल जो कि उसकी चूचियों की साइज से कम माप की थी,,, वह जानबूझकर अपनी चूचियों के साइज से कम माफ वाली ब्रा पहनती थी ताकि उसकी चूचियां और भी ज्यादा कसी हुई रहे,,,, जल्दी-जल्दी उसे अपनी बाहों में डालकर वहां पीछे से बरा का हक लगने लगी और दोनों कप को अपनी दोनों खरबूजे जैसी चुचियों में समाकर उसे कस ली गोरे बदन पर लाल रंग की ब्रा और भी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी इसी तरह से वह लाल रंग की पहनती भी अलमारी से निकाली,,, और उसे उलट-पुलट कर देखने लगी पेंटिं में हल्का सा छेद था,,,, और उसे छेद को देखते हुए वह अपने मन में सोचने लगी कि इस बार तनख्वाह मिलेगी तो वह अपने लिए जरूर नई पेटी खरीदेगी,,, और ऐसा सोचते हुए वहां अपनी लंबी-लंबी टांगों को उसे पेटी के दोनों छेद में भारी-बड़ी से डालकर उसे ऊपर की तरफ उठाई और कमर टकला कर अपनी खूबसूरत खजाने को उसे लाल रंग की पेंटिं के परदे में छुपा ली,,,, पेटी को पहनते समय उसकी नजर अपनी बर पर गई थी जिस पर हल्के-हल्के बोल फिर से उग आए थे,,,, पति के न होने के बावजूद भी सुगंध अपने बदन की साफ सफाई की बहुत डरकर रखती थी इसलिए समय-समय पर वीट क्रीम लगाकर अपनी बर को साफ करती थी क्योंकि उसे अपनी बुर पर बाल बिल्कुल भी पसंद नहीं थे क्योंकि घने बाल हो जाने की वजह से उन्होंने खुजली होने लगती थी और स्कूल में पढ़ते समय वह खुजाने में शर्म महसूस करती थी,,, वैसे भी अक्सर मर्दों की नजर औरतों की इस तरह की हरकत पर जरूर रहती है कि वह कब अपना हाथ कौन से अंग पर लगती हैं खास करके जब उनकी हथेली उनकी दोनों टांगों के बीच आती है तो मर्द औरत की हरकत को देखकर तुरंत औरतों की दोनों टांगों के बीच की पतली दरार के बारे में कल्पना करने लगते हैं कि इसकी कैसी होगी इसकी बर पर बाल होंगे कि नहीं होंगे चिकनी होगी कैसी होगी गुलाबी होगी फूली हुई होगी इस तरह की कल्पना करके मन ही मन में आनंद लेते हैं,,,,।

और ऐसा वह खुद अपनी आंखों से देख चुकी थी क्योंकि स्कूल में पढ़ते समय जब एक बार इसी तरह से उसे खुजली हो रही थी तो वह एक हाथ में किताब लेकर दूसरे हाथ से अनजाने में ही अपनी दोनों टांगों के बीच खुजलाने लगी थी और जब उसे इस बात का एहसास हुआ तो उसकी नजर तुरंत सामने की बेंच पर बैठे लड़के पर गई और वह लड़का उसकी यही क्रिया को देखकर अंदर ही अंदर प्रसन्न हो रहा था और सुगंध को तो तब ज्यादा हैरानी हुई जब उसने उसे लड़के के हाथ को अपने पेंट के आगे वाले भाग पर रखा हुआ देखी,,, तब से वह नियमित रूप से अपनी बुर के बाल,,, को बराबर साफ करती थी,,,।,,, अपनी बुर के बारे में सोच कर सुगंधा अपनी हथेली को पेटी के ऊपर से ही अपनी बर पर रखकर उसे हल्के से थपथपा दी मानो कि जैसे उसे शाबाशी दे रही हो,,, और वैसे भी सुगंधा जैसी खूबसूरत हसीन और गदराई जवानी की मालकिन की बुर शाबाशी देने लायक ही थी क्योंकि आज तक पति के देहांत के बाद उसकी बुर ने उसे कभी भी इस कदर मजबूर नहीं की थी कि उसके कदम बहक जाएं या अपने मन में किसी गैर मर्द के बारे में कल्पना करें,,,, वरना जिस तरह के हालात सुगंधा के थे जिस तरह से वह जवानी से भरी हुई थी अगर ऐसी कोई और औरत होती तो अब तक उसके कदम जरूर डगमगा गए होते और वह अपनी जवानी की प्यास बुझाने के लिए किसी गैर मर्द का सहारा ले ली होती लेकिन सुगंधा के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं था,,,। पति के देहांत के बाद ही जैसे कि वह अपने दोनों बच्चों की परवरिश करने हेतु अपनी ख्वाहिश अपनी जवानी को अपने अरमानों को बंदिश का ताला लगा दी थी जिसकी चाबी तो उसके हाथों में थी लेकिन कभी भी उसने उसे चाबी का गलत उपयोग नहीं की थी इसीलिए आज इस उम्र में भी उसकी जवानी बरकरार थी उसके बदन का कसाव भर करार था उसका बदन और भी ज्यादा निखर गया था,,,,।





सुगंधा अलमारी में से पीले रंग की साड़ी निकली जो कि उसके ऊपर और भी ज्यादा खूबसूरत लगती थी,,,, जिसे वह अपनी बिस्तर पर रख दी थी और पीले रंग के ब्लाउज को पहनना शुरू कर दी थी ब्रा की तरह वह ब्लाउज भी अपनी चूचियों से कम माप वाला कप का ही पहनती थी,,, देखते ही देखते सुगंधा अपने आप को आईने में निहारते हुए,,, अपने ब्लाउज का बटन बंद करने लगी और जैसे ही ब्लाउज के सारे बटन बंद हुए उसके दोनों खूबसूरत खरबूजे ब्लाउज में कैद हो गए लेकिन अपनी आभा ब्लाउज के ऊपर बिखेर रहे थे और देखने वालों की हालत खराब करने के लिए तैयार हो चुके थे इसी तरह से वह जल्दी से पेटीकोट भी पहन कर उसे अपनी कमर पर कली और फिर साड़ी पहनने लगी,,,,,।

साड़ी पहनने के बाद वह अपने आप को आईने में देख रही थी एकदम आसमान से उतरी हुई परी लग रही थी बदन भरा हुआ था लेकिन बेहद खूबसूरत चर्बी का कहीं भी ज्यादा जमावड़ा नहीं था जहां भी चर्बी थी अपने हिसाब से थी जिसे देखने पर कोई भी मर्द मदहोश हो जाता था,,,, वह जल्दी से कंघी लेकर अपने बालों को संवारने लगी और तुरंत ही उसका जुड़ा बनाकर पीछे एक बड़ा सा बकल लगा ली जिससे उसके खूबसूरत बाल और भी ज्यादा खूबसूरत नजर आने लगे वह तैयार हो चुकी थी मन में कोई गाना गुनगुनाते हुए वह अपना पर्स उठाई और घर से बाहर आ गई घर में ताला लगा कर वह स्कूल के लिए निकल गई स्कूल आने जाने के लिए उसे बस का सहारा लेना पड़ता था और कभी कभार तो वह पैदल ही आया जाया करती थी जब कभी ज्यादा देर होती थी तो वह बस का उपयोग करती थी,,, लेकिन आज कोई जल्दबाजी नहीं थी इसलिए वह पैदल ही स्कूल के लिए निकल गई थी इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि सड़क पर चलते समय आने जाने वालों की नजर उसे पर ही टिकी रहती थी क्योंकि एक तो उसका खूबसूरत बदन खूबसूरत चेहरा किसी फिल्म की हीरोइन से कम नहीं लगता था ऊपर से पीले रंग की साड़ी उसे पर तो और भी ज्यादा कयामत लगती थी आने जाने वालों की नजर भेज जब उसके ऊपर ही पड़ जाती थी आगे से आने वाला इंसान उसकी गोलाकार चूचियों को देखकर मस्त होता था और पीछे से आने वाला इंसान उसकी गदराई आई हुई मदमस्त कर देने वाली गांड को देखकर पागल हुआ जाता था,,,,, और अपने मन में यही सोचता था कि इसको छोड़ने वाला मर्द कितना खुश नसीब होगा जो रोज इसकी लेता होगा,,,,,,,,,।

Sugandha



शाम को अंकित घर पर पहुंचा तो उसकी मां पहले सही तैयार बैठी थी उसे मार्केट जो जाना था खरीदी करने के लिए क्योंकि घर में राशन खत्म हो रहा था,,,। अंकित जैसे ही घर में प्रवेश किया उसे देखकर उसकी मां बोली,,।

चल जल्दी से तैयार हो जा मार्केट जाना है खरीदी करने,,,

मेरे लिए नए जूते भी लोगी ना,,,

अरे बेवकूफ राशन की खरीदी करने जाना है नए जूते तुझे तनख्वाह मिलेगी तब खरीदूंगी बस,,,, आप जल्दी से तैयार हो जाओ वैसे भी बहुत देर हो चुकी है आते-आते शाम ढल जाएगी,,,,

अच्छा रुको बस 2 मिनट में आता हूं,,,,,

(इतना कहकर संजू बाथरूम में चला गया और उसकी मां वही कुर्सी पर बैठकर उसका इंतजार करने लगी और मन में सोचने लगी कि क्या-क्या खरीदना है क्या बाकी रह गया है वैसे तो वह राशन की लिस्ट तैयार कर ली थी लेकिन फिर भी सोच रही थी कि कुछ और लेना हो तो वैसे तो पति के देहांत की बात थोड़ी बहुत दिक्कत घर चलाने में हो रही थी लेकिन फिर भी टीचर होने के नाते उसे इतनी तनख्वा तो मिल ही जाती थी कि वह आराम से अपना घर चला सके,,,, सुगंधा ने बड़े सलीके से अपना घर संभाल‌ ली थी,,,, थोड़ी ही देर में अंकित तैयार होकर आ गया था और उसकी मां कुर्सी पर से उठकर कमरे से बाहर आ गई संजू भी अपनी मां के पीछे-पीछे चल दिया वैसे तो जब कभी भी सुगंधा आगे आगे चलती थी तो हर मर्द की नजर उसकी गोल-गोल गांड पर ही टिकी रहती थी क्योंकि चलते समय उसकी गांड मटती बहुत थी और मटकनी हुई गांड देखकर हर मर्द का लैंड खड़ा हो जाता था लेकिन ऐसा कुछ भी अंकित के साथ नहीं होता था हालांकि उसके नजर अपनी मां की गांड पर जाकर जरूर थी लेकिन वह कभी भी अपनी मां के बारे में गलत भावना पैदा नहीं करता था और नहीं कभी अपने मन में गलत सोचता था,,,, बस उसकी सहज रूप से नजरे उसकी मां की गांड पर चली जाती थी और वह सहज रूप से अपनी नजरों को घुमा भी लेता था उसने कभी सोचा नहीं था कि उसकी मां की गांड दूसरी औरतों की तुलना में छोटी है या बड़ी है ढीली है या कसी हुई है,,,, चलते समय मटकती है कि सामान्य रहती है चुचियों का आकार कैसा है बड़ा है कि छोटा है ब्लाउज का बटन बंद करने पर उसकी दरार दिखती है कि नहीं दिखती है इन सब पर तो उसकी नजर जाती जरूरी थी लेकिन इन सबको देखकर उसके मन में गलत भावना नहीं आती थी इसीलिए वह आज तक दूसरे लड़कों से बिल्कुल अलग था,,,,।

Sugandha apna blouse utarte huye



दोनों बाजार के लिए निकल गए थे बाजार ज्यादा दूर नहीं था केवल 10 मिनट के रास्ते पर ही था इसलिए जल्द ही दोनों बाजार में पहुंच गए और राशन की दुकान पर जाकर खड़े हो गए राशन की दुकान पर थोड़ी बहुत भीड़ थी ज्यादातर औरतें ही खड़ी थी,,,, जो कि अपना राशन खरीद रही थी,,,, अंकित दुकान के एक तरफ खड़ा हो गया था जहां उसके आगे दो-तीन औरतें खड़ी थी और ठीक बगल में उसकी मां भी खड़ी हो गई थी हाथ मे राशन का लिस्ट लिए,,,,

दुकान वाला बारी-बारी से सब की लिस्ट लेकर राशन का सामान निकाल रहा था,,, अभी सुगंधा का नंबर है या नहीं था वह वहीं खड़ी होकर अपने नंबर का इंतजार कर रही थी और दुकान में इधर-उधर देखकर और भी चीजों को देख रही थी दुकान पूरी तरह से राशन से भरी हुई थी दोनों तरफ कांच के कपाट लगे हुए थे जिसमें महंगी महंगी चीज रखी हुई थी,,,, अंकित की नजर बार-बार कंप्लेन के डिब्बे पर चली जा रही थी,,, बहुत दिनों से उसकी मां कंप्लेन पीने का कर रहा था और इस बारे में उसने अपनी मां को भी कई बार कह चुका था लेकिन उसकी मां जानती थी कि वह महंगा आता है इसलिए बार-बार जानकारी देती थी लेकिन इस बार वह भी अपने मन में यही सोच रही थी की तनख्वाह पर अंकित के लिए जरुर कंप्लेन खरीदेगी,,,,।

अंकित के आगे जो औरत खड़ी थी उसका ब्लाउज पीछे से काफी खुला हुआ था और उसकी नंगी चिकनी पीठ दिख रही थी और वह काफी गोरी भी थी अंकित की जगह अगर कोई और लड़का होता तो अब तक वह उसे औरत को स्पर्श करने की बहुत कोशिश कर चुका होता क्योंकि अक्सर दुकानों पर यही स्थिति होती है या तो वह उसे औरत को स्पर्श करने की कोशिश करता है या तो अपने आगे वाले भागों को उसके नितंबों पर स्पर्श करने की कोशिश करता लेकिन इन सब में अंकित नहीं था वह दूसरों से अलग था उसकी आंखों के सामने भले यह खूबसूरत औरत खड़ी थी खुला ब्लाउज पहनकर लेकिन फिर भी उसकी खूबसूरती पर अंकित की नजर नहीं पड़ रही थी उसका ध्यान जा रहा था तो उसे खूबसूरत औरत के बदन से उठती हुई मादक खुशबू पर उसे औरत ने बहुत ही सुगंधित परफ्यूम लगाई हुई थी जिसकी खुशबू अंकित को बहुत ही अच्छी लग रही थी और वह अपने मन में सोच रहा था कि काश उसके पास भी इस तरह का परफ्यूम होता तो मजा आ जाता वह भी इतना सोच ही रहा था कि वह औरत जो सामान ले रही थी उसके हाथ से हाथ में लिया हुआ साबुन छूट कर नीचे गिर गया और उसे उठाने के चक्कर में वजह से झुकी उसकी गांड एकदम से पीछे हुई और सीधे जाकर अंकित के लंड से टकरा गई,,, उसे औरत की गांड अंकित के लंड के आगे वाले भाग के एकदम बीचो-बीच स्पर्श हुई थी कि ना चाहते हुए भी अंकित के लंड में अजीब सी हलचल होने लगी थी,,, जैसे ही उसे औरत की गांड अंकित के आगे वाले भाग पर स्पर्श हुई अंकित तुरंत अपने आप को संभालने की कोशिश करता हुआ पीछे होने लगा लेकिन तब तक उसे औरत की गांड अपना कमाल दिखा चुकी थी उसे औरत की गर्म जवानी और उसकी मदहोश कर देने वाली गांड का स्पर्श अंकित के तन बदन में अजीब सा हलचल पैदा कर गया था और वह औरत साबुन उठाने के बाद तुरंत खड़ी हुई और पीछे देखकर अंकित की तरफ मुस्कुराई और सॉरी बोल दी अंकित उसे औरत को देखा ही रह गया उसके चेहरे पर मुस्कान देखकर और उसके द्वारा सॉरी कहने पर एक अजीब सी हलचल अंकित ने अपनी तंबदन में महसूस किया और जवाब में अंकित ने भी मुस्कुराते हुए कोई बात नहीं कह कर बात को टाल दिया,,,, बगल में खड़ी सुगंधा उसे औरत की गांड और अपने बेटे के लंड का स्पर्श उसे औरत की गांड पर तो देख नहीं पाई थी लेकिन उसे औरत को सॉरी कहते हुए देख ली थी और जवाब में अपने बेटे का जवाब सुनकर वह सहज रूप से मुस्कुरा दी थी और वापस अपने नंबर का इंतजार करने लगी थी,,,,।

थोड़ी ही देर में वह औरत थैली में अपना सामान लेकर जाने लगी थी संजू ना चाहते हुए भी पीछे मुड़कर उसे औरत की तरफ देखने लगा और पहली बार उसने किसी औरत के नितंबों को बड़े ध्यान से देख रहा था उसका मटकना हो उसे बेहद लुभाने लग रहा था पल भर में उसके मन में अजीब सी हलचल होने लगी थी उसका मन बदल गया था,,, वह तब तक उसे औरत को देखता रहा जब तक कि वह औरत बाजार की भीड़ में गुम नहीं हो गई,,,, थोड़ी ही देर में उसकी मां वजन किया हुआ सामान अपने ठेले में रखना शुरू कर दी सूजी बेसन डाल गरम मसाले मिर्ची हल्दी थोड़ा-थोड़ा करके वह सब सामान थेले में भर चुकी थी,,, तभी उसकी मां नहाने का एक सामान्य साबुन लेने लगी तो अंकित बोला,,,,)

यह वाला नहीं मम्मी लीरील साबुन खरीद लो उसकी खुशबू बहुत अच्छी है,,,,

नहीं संजु यही ठीक है बार-बार साबुन बदल के नहीं लगना चाहिए वरना नुकसान करता है,,,

क्या मम्मी तुम भी,,,,

(साबुन खरीदने की बात टाल दी गई थी दुकान वाला बिल बना रहा था और भी ग्राहक खड़े थे,,, दुकान में काम करने वाला कारीगर बार-बार सुगंधा की तरफ देख रहा था खास करके उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों की तरफ उसकी निगाह जा रही थी पहले तो संजु इस तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता था लेकिन आज पहली बार उसे कम करने वाले की निगाह को देख रहा था जो कि उसकी मां की खूबसूरती और उसकी चूचियों पर घूम रही थी यह देखकर अंकित को गुस्सा आने लगा लेकिन वह कुछ कह नहीं सकता था क्योंकि दुकान पर बहुत से लोग थे अगर इस बारे में वह जरा सा भी कुछ कहता तो जिसकी नजर उसकी मां पर नहीं जा रही है उन लोगों की भी नजर उसकी मां पर पहुंच जाती थी और ऐसा अंकित बिल्कुल भी नहीं चाहता था,,, फिर भी वह अपनी मां से बोला,,)

जल्दी करो ना मम्मी बहुत देर हो रही है,,,

बस बेटा हो गया,,,,।

(अंकित बार-बार दुकान में काम करने वाले आदमी को ही देख रहा था उसकी नज़रें उसकी मां के बदन पर घूम रही थी और अंकित को तुरंत उसके दोस्तों की बात याद आ गई,,, जॉकी चाय की दुकान पर बैठकर सड़क पर जाती हुई औरत के बारे में गंदी-गंदी बात कर रहे थे और उसका वह दोस्त जिसके साथ लड़ाई हुई थी उसकी मां के बारे में गंदी बात कर रहा था उसे समझते देर नहीं लगी की सब मर्दों की नजर औरत की खूबसूरती पर ही उसके अंगों पर ही रहती है ,,, थोड़ी ही देर में सुगंधा पैसे देकर हाथ में थैला लेकर चलने लगी तो अंकित खुद अपनी मां के हाथ में से वजनदार थैला को ले लिया और चलने लगा,,,

बाजार के नुक्कड़ पर पानी पुरी का ठेला लगा हुआ था दूसरी औरतों की तरह सुगंधा को भी पानी पुरी बहुत पसंद था इसलिए वह तुरंत उसे ठेले के पास खड़ी हो गई और अपने बेटे के साथ मिलकर पानी पुरी खाने लगी पानी पुरी का चटकारा मसाला उसे बहुत पसंद था,,,,,,, अंकित को भी पानी पुरी अच्छी लगती थी इसलिए वह भी खाने लगा दोनों पानी पुरी खाने के बाद तृप्ति के लिए भी पानी पुरी पैक करवा दिए थे और घर पर पहुंचने के बाद तृप्ति को उसके हिस्से की पानी पुरी दे दिए थे जिसे देखकर वह बहुत खुश हुई थी,,,,।

रास्ते भर और घर पर पहुंचने के बात भी अंकित के मन में उसे औरत की छवि बस गई थी और वह उसे औरत के बारे में सोच रहा था उसके बदन से उठने वाली मादक को खुशबू को महसूस कर रहा था और फिर उसके नितंबों से अपने लंड का टकराना और फिर हाथ में थैला लिए बाजार के भीड़ में गुम हो जाना सब कुछ सोचते हुए उसे अजीब सा महसूस हो रहा था उसके तन बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी लेकिन जैसे-जैसे वह पढ़ने में मन लगने लगा वैसे-वैसे उसके दिमाग से औरत एकदम से खो गई और वह एकदम से सामान्य हो गया,,,।
 
Bahot bahot shukriya isi tarah se comment karte rhiye or is kahani ko bhi support kariye

kya sugandha ko is roop me dekhna chahenge ekdam chudwasi
 
Bahot hot he iski gaand mujhe bahot khubsurat lagi wese kya nam he tumhari bahan ka taaki me is kahani me uska nam add kar saku
 
जैसे तैसे करके सुगंधा के जीवन की गाड़ी आगे बढ़ रही थी वह अपने दोनों बच्चों से बहुत खुश थी,,,,, सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी कि उसका लड़का धार्मिक विचारों वाला और सही रास्ते पर चलने वाला एक अच्छा इंसान हैं,, और इस बात की उसे खुशी भी होती थी क्योंकि आज तक उसे मोहल्ले में से ऐसी किसी भी शिकायत के सुनने का मौका नहीं मिला था जिससे उसका सर शर्मिंदगी से नीचे झुक जाए,,,,, और यही सुख से अपने बेटी तृप्ति के तरफ से भी मिला था वह मोहल्ले में देखी थी कि उसकी बेटी की उम्र की लड़कियां कुछ ज्यादा ही सज-धज कर घर से निकलती थी,,, और बाहर लड़कों के साथ चक्कर चलाती थी क्योंकि यह सब अपने कानों से सुन चुकी थी,,, ऐसा कुछ उसे अपनी बेटी तृप्ति की तरफ से भी सुनने को मिला नहीं था लेकिन वह तृप्ति को रोज समझती थी कि इस तरह के कम कभी मत उठाना जिसे वह समाज में सर उठाकर चल ना सके और उसकी बेटी भी उसे पूरी तसल्ली देती थी कि ऐसा कभी नहीं होगा,,,,,

सुगंधा का खूबसूरत भरा हुआ बदन



लेकिन उसके कदम भी डगमगा चुके थे अपने कॉलेज में अपने सहपाठी संदीप नाम के छोकरे के प्रति वह आकर्षित हो चुकी थी या यू कह लो कि वह मन ही मन में संदीप से प्यार करने लगी थी और संदीप भी उसके पीछे पड़ा हुआ था लेकिन तृप्ति ने अभी तक अपने प्यार का इजहार उसे कि नहीं थी संदीप तो उसे अपने प्यार का इजहार कर चुका था,,,,, इस प्यार व्यार के चक्कर से वह अपने आप को हमेशा से बचाती आ रही थी लेकिन इस तरह के आकर्षण से बचने का भी एक सीमा एक उम्र होती है और जिस उम्र से वह गुजर रही थी वह जवानी से भरा हुआ था आकर्षण से भरा हुआ था इस उम्र में लड़के और लड़कियां अक्सर एक दूसरे से आकर्षित होते ही रहते हैं और किसी आकर्षण से तृप्ति भी बच नहीं पाई थी हालांकि उसने अभी तक संदीप को अपने बदन को छूने नहीं दी थी और ना ही उसे कोई छूट-छाट लेने दी थी जिससे उसकी मां बहकने लगे या इस बारे में किसी को पता चले तो वह बदनाम हो जाए,,,, धीरे-धीरे वह इस खेल में आगे बढ़ती जा रही थी लेकिन बहुत संभाल कर वह नहीं चाहती थी कि इस बारे में किसी को भी कानों कान खबर पड़े,,,,।

रौनक और सूरज दोनों की कल्पना में अंकित की मां



जिस दिन से अंकित का झगड़ा हुआ था उसे दिन से वहां अभी तक क्रिकेट खेलने के लिए नहीं गया था,,, क्योंकि ऐसे दोस्तों के साथ रहना उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं था जो उसकी मां के बारे में या किसी भी औरत के बारे में गंदी बातें करते हो और गंदी नजर रखते हो,,,, लेकिन रविवार को उसकी कुछ दोस्त घर पर आ गए उसे लेने के लिए क्योंकि आज फिर से क्रिकेट का मैच था,,,,।

सूरज और रौनक दोनों अंकित को लेने के लिए उसके घर आए थे अंकित रौनक को देखते ही अंदर ही अंदर क्रोधित होने लगा लेकिन वह अपने गुस्से को अपने चेहरे पर नहीं लाया क्योंकि वह अपने घर में था और उसकी मां रसोई घर में खाना बना रही थी,,,,,,,, सूरज जो कि अंकित का दोस्त था वह उसे समझाते हुए बोला,,,।

यार अंकित भूल जा जो कुछ भी हुआ रौनक तुझसे माफी भी मांग रहा है,,,।

हां यार अंकित माफ कर दे जो कुछ भी हो गुस्से में हुआ था और वैसे भी जो टीम हार जाती है वह थोड़ा बहुत तो गुस्से में रहती ही है,,, और तू खामखा बात का बतंगड़ बना रहा है,,,(रौनक अंकित से माफी मांगते हुए बोला)

अंकित के दोस्त उसकी मां के बारे में इस तरह की कल्पना कर रहे थे



मैं बात का बतंगड़ बना रहा हूं रौनक,,, तुझे सोच समझ कर बोलना चाहिए था आखिर खेल में हार जीत तो चलता रहता है लेकिन तू किसी की मां बहन की गाली देगा तो क्या हुआ उसे सहन कर पाएगा,,,,

चल जाने दे अंकित चल तू हम लोगों के साथ आज दूसरे मोहल्ले वाले के साथ क्रिकेट मैच है,,, और हमें यह मैच जीतना है क्योंकि वह लोग चैलेंज किए हैं कि तुम लोग कभी भी जीत नहीं पाओगे,,,,।

(दरवाजे पर हो रही शोरगुल की आवाज सुनकर तब तक सुगंध रसोई बनाते हुए हाथ में बेलन लिए रसोई घर से बाहर आ गई,,,, और देखी की दरवाजे पर अंकित और उसके दोस्त खड़े हैं,,,, वह उन्हें देखकर खुश हो गई और एक हाथ में बेलन लिए हुए ही साड़ी के एक छेड़ को आगे से ही अपनी साड़ी में अंदर की तरफ खोंसते हुए बोली,,,)

खयालों में अंकित की मां की साड़ी उतारते हुए उसके दोनों दोस्त



अरे बेटा तुम दोनों बाहर क्यों खड़े हो अंदर आओ चाय गरम है आकर चाय तो पी लो,,,,,

नहीं नहीं आंटी चलेगा,,,,,( सूरज और रौनक दोनों औपचारिक रूप से बोले लेकिन उनकी नजर सुगंधा की हरकत पर थी वह जिस तरह से अपनी साड़ी के किनारी को अपनी नाभि के बगल साड़ी के अंदर डाली थी ऐसी हालत में उन दोनों की नजर सुगंधा की गहरी नाभि पर थी और गड़रे बदन पर थी वह दोनों का लंड सुगंधा की हरकत पर नृत्य करने लगा था,,, वैसे भी औरतों की यह हरकत मर्दों के बदन में मदहोशी भर देती है उन्हें जोश से भर देती है और उनके मन को चुदवासा बना देती है ,,,, वह दोनों पूरी तरह से उत्तेजित हो गए थे और सुगंधा उन दोनों की बात सुनकर बोली,,,)

बिस्तर में अंकित की मां के साथ कल्पना



नहीं नहीं ऐसा कैसे चलेगा आखिरकार तुम दोनों अंकित के दोस्त हो इसलिए आज से तुम दोनों भी मेरे बेटे जैसे ही है आओ आप जल्दी से चाय पी लेना फिर उसके बाद जहां जाना हो चले जाना,,,,(और ऐसा कहते हुए सुगंधा वापस रसोई घर में चली गई लेकिन जाते समय उसके पिछवाड़े को देखकर रौनक और सूरज दोनों के तन बदन में उत्तेजना की लहर जोड़ने लगी उन दोनों के बदन में आग लगने लगी वह दोनों छुपी नजरों से सुगंधा के गदराए जिसमें को देखकर अंदर ही अंदर उत्तेजित हुए जा रहे थे,,,,। इस समय अंकित दोनों की नजरों से अनजान था,,,, उसे नहीं मालूम था कि क्रिकेट मैच खेलने के लिए उसे बुलाने के लिए आए हुए उसके दोनों दोस्त उसकी मां के भरे हुए बदन को देख कर ललचाई नजरों से उसे देख रहे हैं,,,, और मन ही मन में उसकी मां को लेकर कल्पना भी करने लगे हैं,,,, वैसे तो अंकित का मन बिल्कुल भी नहीं था उन दोनों को चाय पिलाने का लेकिन अपनी मां की बात को टाल नहीं सकता था इसलिए वह भी उन दोनों को अंदर आने के लिए बोला और जो कुर्सी निकाल कर दोनों को बैठने के लिए दे भी दिया और अंकित जैसे ही उन दोनों के लिए अंदर पानी लेने के लिए गया तो सूरज ही रौनक के कान में धीरे से बोला,,,)

अंकित की मां के साथ कल्पना करते हुए उसके दोस्त



बाप रे रौनक अंकित की मां तो एकदम धमाल है कितनी मस्त माल है,,,

हां यार तू सच कह रहा है इतने नजदीक से कभी उसे देखा नहीं था बस दूर से ही देखा था और आज तो मेरी हालत खराब हो गई है देख ले जरा,,,(अपने पेट के आगे वाले भाग को दिखाते हुए जो की पूरी तरह से उत्तेजना से फूल गया था) इसकी तो हालत ही खराब हो गई,,,.

मेरी भी हालत तेरी जैसी ही है कसम से अगर ऐसी औरत बिस्तर पर होना तो जिंदगी का मजा ही कुछ और है,,,,,

चुप चुप अंकित आ रहा है,,,।

(अंकित दोनों के लिए पानी लेकर आया और तभी उसकी मां चाय गरम करके प्लेट में दो कप और दो पराठे लेकर आई,,,, अंकीत चाय पी चुका था,,, इसलिए उसके लिए नहीं लेकर नहीं आई थी,,,, अंकित जल्दी से उन दोनों के सामने एक छोटा सा टेबल रख दिया था और सुगंधा चाय का प्लेट और परांठा लेकर उन दोनों के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई और धीरे से छुपाकर दोनों के सामने एक-एक चाय का कप और एक-एक पराठा रखने लगी लेकिन उसके झुकाने की वजह से उन दोनों की आंखों के सामने सुगंधा की बदमाशी कर देने वाली दोनों चूचियां नजर आने लगी जो झुकाने की वजह से आगे से ज्यादा तो बाहर निकली हुई थी और वह दोनों सुगंधा की मदमस्त कर देने वाली खरबूजे जैसी चुचियों का उभार देखकर एकदम मस्त हो गए उनके तन बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी और वह सुगंधा को चोदने के लिए लालायित होने लगे,,, वह दोनों कुछ बोल नहीं पाए बस इतना ही बोले,,,)

सुगंध को चोदने की कल्पना करता अंकित का दोस्त



इसकी क्या जरूरत थी आंटी,,,,

अरे खाओ बेटा मैं भी तुम्हारी मां की जैसी हूं।(इतना कहते सुगंधा मुस्कुराते हुए वापस रसोई घर में चली गई और वह दोनों तिरछी नजर से उसे जाते हुए देख रहे थे उसे जाते हुए नहीं बल्कि उसकी मटकती हुई बड़ी-बड़ी गांड को देख रहे थे जो कि कसी हुई साड़ी मैं और भी ज्यादा ऊभरी हुई और बड़ी-बड़ी लग रही थी,,,, दोनों गहरी सांस लेते हुए चाय और नाश्ता करने लगे और अपने मन में सुगंधा के साथ बिस्तर पर कबड्डी खेलने लगे वह दोनों अपने मन में कल्पनाओं के घोड़े दौड़ने लगे थे एक तरफ वह औपचारिक रूप से चाय और पराठा का आनंद भी ले रहे थे और दूसरी तरफ अपने दिल को दिमाग में सुगंधा को लेकर बिस्तर पर मजे लेने की कल्पना भी कर रहे थे रौनक तो अपने दिमाग में यही सोच रहा था कि वह अंकित की मां की साड़ी कोड अपने हाथों से उतर रहा है उसके बदन पर से हर एक कपड़ों को वह अपने हाथों से दूर करके उसे नंगी कर रहा है और नंगी कर लेने के बाद उसे अपनी गोद में उठाकर नरम-नरम बिस्तर पर पटक दे रहा है और फिर वह कल्पना में भी अपने आप पर काबू नहीं कर पा रहा है और तुरंत सुगंधा की दोनों टांगों के बीच आकर अपने लंड को उसकी गुलाबी छेद में डालकर उसे चोदना शुरू कर दे रहा है कल्पनाओं का घोड़ा इतना जबरदस्त था कि वह दोनों पूरी तरह से मस्त हुए जा रहे थे कल्पना में भी उन्हें हकीकत महसूस हो रहा था,,,,

खयालों में अंकित की मां की चुदाई करता उसका दोस्त



‌ सूरज तो रौनक से खत्म आगे था वह अंकित का एकदम खास दोस्त था लेकिन फिर भी उसकी मां की जवानी देख कर वह दोस्ती को एक तरफ रख कर अपने मन में अंकित की मां के लिए बहुत ही गंदी-गंदी ख्याल लता था वह अपने मन में चाय और पराठा का लुफ्त उठाते हुए अपने मन में सोच रहा था कि वह अपने दोस्त अंकित की मां को अपने कमरे में लेकर जा रहा है और उसकी मां तुरंत अपने हाथों से अपने सारे कपड़े उतार कर एकदम नंगी हो गई है और वह खुद सूरज के कंधों को अपने हाथ से पकड़ कर उसे नीचे की तरफ ले जाते हुए उसके मुंह को अपनी बु्र पर लगाकर उसे बुर चाटने के लिए मजबूर कर रही है और वह भी अंकित की मां की बुर पर अपने होंठ लगाकर उसे बड़ी लिज्जत के साथ चाट रहा है,,,, सुगंधा सूरज की हरकत पर पूरी तरह से पागल हुए जा रही है और अपनी कमर को आगे पीछे करके उसके मुंह को ही चोद रही है,,,, और कुछ देर बाद सूरज अपनी कल्पनाओं का घोड़ा और तेज दौड़ते हुए खुद खड़ा हो गया और उसकी मां को कंधों का सहारा लेकर नीचे की तरफ झुकते हुए अपने खड़े लंड को उसके मुंह में डालकर उसे चुसवा रहा है,,, और इसके बाद उसकी मां खड़ी होकर सूरज को धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दी और खुद अपनी नंगी बड़ी-बड़ी गांड उसके खड़े लंड पर रखकर पटकना शुरू कर दी दोनों की कल्पना इतनी जबरदस्ती की दोनों को हकीकत का आभास हो रहा था दोनों के पेट में तंबू बना हुआ था और दोनों चाय पराठा भी खा रहे थे इस बात से अनजान अंकित दोनों के चाय पी लेने का इंतजार कर रहा था क्योंकि वह भी क्रिकेट का शौकीन था और उसे भी क्रिकेट खेलने था बस गुस्से की वजह से वह घर में ही बैठा था लेकिन रौनक के माफी मांगने से वह मान गया था लेकिन उसे क्या मालूम था कि घर में बैठने के बावजूद भी वह दोनों उसकी मां के बारे में गंदी गंदी कल्पना कर रहे थे,,,,।

अंकित की मां के साथ कल्पना करता उसका दोस्त





थोड़ी ही देर में दोनों चाय खत्म करके अंकित के साथ घर से निकल गए अंकित की मां तो दोनों को प्रेम भाव से चाय पराठा खिला रही थी क्योंकि वह दोनों अंकित के दोस्त भी थे और मोहल्ले के ही लड़के थे,,, इसलिए वह इस बात से अनजान थी कि उसके लड़के के हम उम्र होने के बावजूद भी और उसके लड़के के दोस्त होने के बावजूद भी उन दोनों के मन में उसके लिए इतनी गंदी-गंदी भावनाएं थी अगर वह जान जाती तो शायद उन दोनों को अपने घर में कभी प्रवेश करने ही ना देती और अंकित को भी उन दोनों के साथ रहने नहीं देती लेकिन अंकित और उसकी मां बिल्कुल अनजान थे अंकित तो फिर भी थोड़ा-थोड़ा समझता था क्योंकि उसका एक बार झगड़ा भी हो चुका था इसी बात को लेकर लेकिन रोनक के द्वारा माफी मांग लेने पर वह सब कुछ भूल गया था,,,।

अंकित क्रिकेट खेलने के लिए जा चुका था और तृप्ति भी ट्यूशन के लिए जा चुकी थी घर में केवल सुगंधा ही रह गई थी रविवार का दिन था खाना खाकर और घर की साफ सफाई करके वह बैठी थी कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई वह धीरे से उठकर दरवाजा खोली तो दरवाजे पर सुषमा खड़ी थी वह मुस्कुराते हुए बोली,,,।

क्या कर रही हो सुगंधा,,,

कुछ भी नहीं ऐसे ही बैठी थी रविवार का दिन था तो घर पर कोई है नहीं अंकित क्रिकेट खेलने गया है और तृप्ति ट्यूशन के लिए गई है और वैसे भी रविवार का दिन बहुत बड़ा लगने लगता है,,,,।

चल कोई बात नहीं मेरे घर पर भी कोई नहीं है मेरा भी समय नहीं बीत रहा था तो मैं सोची कि चल तुझे बुला लूं,,,

किस लिए,,,,

अरे किस लिए क्या चल मेरे घर में कोई फिल्म देखते हैं,,,,

हां हां यह ठीक रहेगा,,,(सुगंधा भी मुस्कुराते हुए बोली,, और वह जल्दी से दरवाजा बंद करके सुषमा के साथ उसके

घर पर जाने लगी,,,, पूरे मोहल्ले में केवल सुषमा के पास ही

बड़ा सा कैसे वाला सिस्टम था जो की 90 के दशक में लोग किराए पर लाकर मोहल्ले में देखा करते थे उसके पास अच्छा खासा फिल्म का कलेक्शन भी था सुगंधा कमरे में एक कुर्सी पर बैठ गई थी सुषमा ने दरवाजा बंद कर दी थी और वह कपाट में से एक अच्छी सी कैसेट ढूंढ रही थी,,,)

कोई अच्छी सी फिल्म लगाना मिथुन वाली,,,,।(कुर्सी पर बैठे-बैठे सुगंधा बोली)

अरे हां वही तो ढूंढ रही हुं,,,,,।
 
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