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अंत में मैं दीवानखाने में रूका। यहाँ धीमा प्रकाश फैला था– और दो बोतलें फर्श पर लुढ़की पड़ी थी।
मैं एक दरवाजे की तरफ बढ़ गया। यह लम्बे गलियारे का द्वार था। अभी मैं द्वार पर पहुंचा ही था की एक जोरदार गर्जना सुनाई पड़ी।
“वहीँ रुक जाओ...।”
मैं रुक गया, पलक झपकते ही एक आदमी खम्बे की आड़ से निकला और उसने बन्दूक की नाल मेरे सीने पर टिका दी। पल बीता – बेताल को मेरा संकेत मिला और उस व्यक्ति की बन्दूक हवा में झूलती नजर आई। वह एकदम बौखलाकर मुझपर झपटा – समय गंवाये बिना मैंने खन्जर उसके पेट में घोंप दिया और वह कराहता हुआ फर्श पर गिर पड़ा।
…………………………
अब मैं दरवाजे के भीतर समा गया। मैं एक-एक कमरा झाँक रहा था। एक कमरे के सामने मैं ठिठक गया। उस कमरे में धीमा प्रकाश था और एक पलंग पर कोई स्त्री बेसुध सो रही थी। यह स्त्री अत्यंत सुन्दर और जवान थी, मैं बहुत दिनों से प्यासा था, निश्चय ही यह ठाकुर की सबसे छोटी बीवी थी। मैं निर्भयता के साथ कमरे में दाखिल हो गया और दरवाजा भीतर से बंद कर लिया।
अब मैं उसके सौन्दर्य को निहारने लगा।
ठाकुर को सबक सिखाने का अच्छा मौक़ा था। दरअसल मैं ठाकुर को एकदम नहीं मारना चाहता था। मैं उसे इतना आतंकित करना चाहता था की उसे कहीं भी चैन न मिले।
उस शानदार शयनकक्ष में मैं दबे कदम आगे बढ़ने लगा। उसकी निद्रा में कोई अंतर नहीं आया था। मैं ठीक सिरहाने पर जा पहुंचा और अपने होठ फैलाकर उसके गुलाबी चेहरे पर झुक गया। जैसे ही मेरे होठों ने उसे स्पर्श किया वह एकदम जाग गई और मुझे देखते ही उसके नेत्र भय से फ़ैल गये, उसने चीखना चाहा, पर वह ऐसा न कर सकी। मेरा मजबूत पंजा उसके मुँह पर जा पड़ा।
मैं एक दरवाजे की तरफ बढ़ गया। यह लम्बे गलियारे का द्वार था। अभी मैं द्वार पर पहुंचा ही था की एक जोरदार गर्जना सुनाई पड़ी।
“वहीँ रुक जाओ...।”
मैं रुक गया, पलक झपकते ही एक आदमी खम्बे की आड़ से निकला और उसने बन्दूक की नाल मेरे सीने पर टिका दी। पल बीता – बेताल को मेरा संकेत मिला और उस व्यक्ति की बन्दूक हवा में झूलती नजर आई। वह एकदम बौखलाकर मुझपर झपटा – समय गंवाये बिना मैंने खन्जर उसके पेट में घोंप दिया और वह कराहता हुआ फर्श पर गिर पड़ा।
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अब मैं दरवाजे के भीतर समा गया। मैं एक-एक कमरा झाँक रहा था। एक कमरे के सामने मैं ठिठक गया। उस कमरे में धीमा प्रकाश था और एक पलंग पर कोई स्त्री बेसुध सो रही थी। यह स्त्री अत्यंत सुन्दर और जवान थी, मैं बहुत दिनों से प्यासा था, निश्चय ही यह ठाकुर की सबसे छोटी बीवी थी। मैं निर्भयता के साथ कमरे में दाखिल हो गया और दरवाजा भीतर से बंद कर लिया।
अब मैं उसके सौन्दर्य को निहारने लगा।
ठाकुर को सबक सिखाने का अच्छा मौक़ा था। दरअसल मैं ठाकुर को एकदम नहीं मारना चाहता था। मैं उसे इतना आतंकित करना चाहता था की उसे कहीं भी चैन न मिले।
उस शानदार शयनकक्ष में मैं दबे कदम आगे बढ़ने लगा। उसकी निद्रा में कोई अंतर नहीं आया था। मैं ठीक सिरहाने पर जा पहुंचा और अपने होठ फैलाकर उसके गुलाबी चेहरे पर झुक गया। जैसे ही मेरे होठों ने उसे स्पर्श किया वह एकदम जाग गई और मुझे देखते ही उसके नेत्र भय से फ़ैल गये, उसने चीखना चाहा, पर वह ऐसा न कर सकी। मेरा मजबूत पंजा उसके मुँह पर जा पड़ा।