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- Dec 5, 2013
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वह मुझसे काफी दूर थी पर चाँद उदय होने पर उसने सीटी बजाकर मुझे सचेत करना था। लगभग आधा घंटे बाद सीटी की धीमी आवाज मेरे कानों में पड़ी और चेहरा सीधा किया – पलके उठाई और मन्त्रों का उच्चारण शुरू कर दिया।
इसी स्थिति में मुझे चार घंटे बिताने पड़े। दूसरी सीटी बजने पर मैंने साधना ख़त्म की। इस बीच सन्नाटे का दम तोडती नदी की धरा कल...कल... करती रही।
कभी-कभी ठंढी हवा मेरे बदन को सिहरन भेज देती।
वापिस लौटते समय मेरा सर भारी हो रहा था। मैंने व्रत तोड़ा और सो गया। सोते- सोते सुबह हो गई अतः मैं दिन चढ़े तक सोता ही रहा।
इस प्रकार दूसरा चरण प्रारंभ हो गया...छः रातें बीतने के बाद मैंने कुछ विचित्रता महसूस की। छठी रात मैंने नगाड़ो का भयानक शोर सुना फिर कोई जोर-जोर से हुंकार भरता रहा... उसके बाद ऐसा लगा जैसे साँपों ने घेर लिया हो... यह सब मुझे छठी रात महसूस हुआ – लेकिन मैं जरा भी भयभीत नहीं हुआ।
सातवीं रात किसी ने मुझे धक्का देना चाहा – पर मैं अडिग रहा फिर मेरे गाल पर जोरदार तमाचा पड़ा। मैं हटने वाला नहीं था, चाहे मेरी मौत वहीं हो जाती।
गनीमत थी मुझे कुछ दिखाई नहीं देता था पर वह सब कुछ मुझे महसूस होता था। सातवीं रात के अंतिम पहर मैंने एक सिर कटे खौफनाक भैंसे को अपनी तरफ खून का फौव्वारा फेंकते अनुभव किया फिर वह मुझे रौंदने के लिए दौड़ पड़ा।
अब मुझे विश्वास हो चला था कि बैतालिक और तंत्र-मंत्र ढोंग या झूठ नहीं। इस दुनिया में हमारी दुनिया के अलावा और भी अदृश्य संसार है। अब मेरा उत्साह काफी बढ़ चुका था।
परन्तु आठवीं रात दुर्भाग्यपूर्ण थी। आसमान पर बादल छा गए और चाँद उसमें छिप गया। इस प्रकार आठवीं रात ही दूसरे चरण की साधना भंग हो गई। मुझे बहुत कोफ्त महसूस हुई। अब मुझे प्रारंभ से यह साधना अगले पक्ष में करनी थी।
लेकिन मैंने धैर्य नहीं छोड़ा।
अगले पक्ष का इंतज़ार करने लगा।
अब मैं यह साधना किसी सूरत में आधी नहीं छोड़ सकता था।
अगला पक्ष प्रारंभ होते ही मैं पुनः तैयार हो गया। उस वक़्त तक मेरे शारीर पर आधा-आधा इंच मैल जम चुका था और बालों ने जटाओं का रूप धारण करना शुरू कर दिया था।
आठवीं तारीख आते ही साधना फिर से शुरू हो गई। इस बार मैं हल्कापन महसूस कर रहा था। छठे दिन वैसी ही क्रियाएं जारी हो गई। विभिन्न प्रकार से मुझे भयभीत किया जाता रहा। सातवीं रात इसने उग्र रूप धारण कर लिया।
आठवीं रात ऐसा लगा जैसे मेरे सर पर आग का गोला झन्नाटे की आवाज पैदा करता चक्कर काट रहा... फिर...
फिर तीसरे तीसरे घंटे एक चमत्कार हुआ।
मैं चौंक पड़ा जब मैंने आग का अलाव अपने सामने नाचते देखा। मुझे विश्वास नहीं हुआ की मैं देख सकता हूँ। मेरा ह्रदय गदगद हो उठा। मैं शमशान का दृश्य स्पष्ट देख रहा था।
पर यह ख़ुशी सिर्फ शमशान के उस दृश्य तक ही सीमित रही। वापसी पर मैं पुनः अंधा था। मैंने इस घटना का कोई जिक्र चन्दा से नहीं किया। यूँ भी मैं वहां घटने वाली किसी घटना का जिक्र नहीं करता था।
पर मुझे विश्वास हो गया था कि जल्दी मेरे नेत्रों की ज्योत वापिस लौट आएगी।
नौवीं रात मुझे एक नहीं कई खौफनाक दृश्य दिखाई पड़े। भयानक चेहरे व बड़े-बड़े दांत... वे सब मुझे नोच रहे थे... तरह-तरह की आवाजें पैदा करते थे। कभी-कभी चारो तरफ आग लग जाती और मुझे ऐसा लगता जैसे कुछ देर और रहा तो जलकर राख हो जाऊंगा।
लेकिन अब मैं पीछे हटने वाला नहीं था।
इसी स्थिति में मुझे चार घंटे बिताने पड़े। दूसरी सीटी बजने पर मैंने साधना ख़त्म की। इस बीच सन्नाटे का दम तोडती नदी की धरा कल...कल... करती रही।
कभी-कभी ठंढी हवा मेरे बदन को सिहरन भेज देती।
वापिस लौटते समय मेरा सर भारी हो रहा था। मैंने व्रत तोड़ा और सो गया। सोते- सोते सुबह हो गई अतः मैं दिन चढ़े तक सोता ही रहा।
इस प्रकार दूसरा चरण प्रारंभ हो गया...छः रातें बीतने के बाद मैंने कुछ विचित्रता महसूस की। छठी रात मैंने नगाड़ो का भयानक शोर सुना फिर कोई जोर-जोर से हुंकार भरता रहा... उसके बाद ऐसा लगा जैसे साँपों ने घेर लिया हो... यह सब मुझे छठी रात महसूस हुआ – लेकिन मैं जरा भी भयभीत नहीं हुआ।
सातवीं रात किसी ने मुझे धक्का देना चाहा – पर मैं अडिग रहा फिर मेरे गाल पर जोरदार तमाचा पड़ा। मैं हटने वाला नहीं था, चाहे मेरी मौत वहीं हो जाती।
गनीमत थी मुझे कुछ दिखाई नहीं देता था पर वह सब कुछ मुझे महसूस होता था। सातवीं रात के अंतिम पहर मैंने एक सिर कटे खौफनाक भैंसे को अपनी तरफ खून का फौव्वारा फेंकते अनुभव किया फिर वह मुझे रौंदने के लिए दौड़ पड़ा।
अब मुझे विश्वास हो चला था कि बैतालिक और तंत्र-मंत्र ढोंग या झूठ नहीं। इस दुनिया में हमारी दुनिया के अलावा और भी अदृश्य संसार है। अब मेरा उत्साह काफी बढ़ चुका था।
परन्तु आठवीं रात दुर्भाग्यपूर्ण थी। आसमान पर बादल छा गए और चाँद उसमें छिप गया। इस प्रकार आठवीं रात ही दूसरे चरण की साधना भंग हो गई। मुझे बहुत कोफ्त महसूस हुई। अब मुझे प्रारंभ से यह साधना अगले पक्ष में करनी थी।
लेकिन मैंने धैर्य नहीं छोड़ा।
अगले पक्ष का इंतज़ार करने लगा।
अब मैं यह साधना किसी सूरत में आधी नहीं छोड़ सकता था।
अगला पक्ष प्रारंभ होते ही मैं पुनः तैयार हो गया। उस वक़्त तक मेरे शारीर पर आधा-आधा इंच मैल जम चुका था और बालों ने जटाओं का रूप धारण करना शुरू कर दिया था।
आठवीं तारीख आते ही साधना फिर से शुरू हो गई। इस बार मैं हल्कापन महसूस कर रहा था। छठे दिन वैसी ही क्रियाएं जारी हो गई। विभिन्न प्रकार से मुझे भयभीत किया जाता रहा। सातवीं रात इसने उग्र रूप धारण कर लिया।
आठवीं रात ऐसा लगा जैसे मेरे सर पर आग का गोला झन्नाटे की आवाज पैदा करता चक्कर काट रहा... फिर...
फिर तीसरे तीसरे घंटे एक चमत्कार हुआ।
मैं चौंक पड़ा जब मैंने आग का अलाव अपने सामने नाचते देखा। मुझे विश्वास नहीं हुआ की मैं देख सकता हूँ। मेरा ह्रदय गदगद हो उठा। मैं शमशान का दृश्य स्पष्ट देख रहा था।
पर यह ख़ुशी सिर्फ शमशान के उस दृश्य तक ही सीमित रही। वापसी पर मैं पुनः अंधा था। मैंने इस घटना का कोई जिक्र चन्दा से नहीं किया। यूँ भी मैं वहां घटने वाली किसी घटना का जिक्र नहीं करता था।
पर मुझे विश्वास हो गया था कि जल्दी मेरे नेत्रों की ज्योत वापिस लौट आएगी।
नौवीं रात मुझे एक नहीं कई खौफनाक दृश्य दिखाई पड़े। भयानक चेहरे व बड़े-बड़े दांत... वे सब मुझे नोच रहे थे... तरह-तरह की आवाजें पैदा करते थे। कभी-कभी चारो तरफ आग लग जाती और मुझे ऐसा लगता जैसे कुछ देर और रहा तो जलकर राख हो जाऊंगा।
लेकिन अब मैं पीछे हटने वाला नहीं था।