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“आका - आप बहुत परेशान हैं… जरा धैर्य से काम लीजिए अब आपकी रक्षा करना मेरा ध्येय है। जिस बस्ती से आप बच्चा उठाकर लाए थे, वहां एक बड़ा भारी तांत्रिक भी रहता है… सेठ निरंजन दास ने उसे बुला लिया है ताकि वह बच्चे का पता लगा सके जानते हो आका फिर क्या हुआ…. उसने अपने तंत्र से फौरन पता लगा लिया कि बच्चा अब जीवित नहीं है, किसी ने उसकी हत्या कर दी है। उसने बच्चे की रूह बुलाकर उससे सब पूछ लिया… जब यह बात उसने सेठ और विनीता को बताई तो विनीता पागल हो गई और अपना सर दीवारों पर मारने लगी…. उसका सर लहूलुहान हो गया... उसे एक कमरे में बंद कर दिया गया - कहीं वह कुछ कर ना बैठे… उधर सेठ का भी वही बच्चा आसरा था…. उसने तांत्रिक से पूछा कि कौन है वह जालिम - मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूँगा। फिर तांत्रिक ने बताया कि वह उसका नाम नहीं बता सकता परंतु मूठ छोड़कर उस का सफाया कर सकता है - जो मूठ का शिकार बन जाएगा वही हत्यारा होगा - मूठ उसी रास्ते से चलेगी जिससे बच्चे को ले जाया गया और उसके बाद बच्चे की रूह उसका मार्गदर्शन करेगी।”
“ओह - तो क्या - ?”
“मूठ चल चुकी है… देर सवेर वह यहां तक पहुंच ही जाएगी। मुझे एक बात बताइए आका यदि आपने किसी और की बलि चढ़ाई होती तो क्या आपको इतना दुख होता।”
“नहीं!”
“तो दो मनुष्यों के लिये भेदभाव क्यों - प्राणी तो दोनों ही है।”
“इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं अपने लड़के का कत्ल कर दूँ ….।”
“आप ऐसा कर चुके हैं आका…. यह बच्चा आपके बेटे से अधिक प्यारा तो नहीं है।”
“क्या मतलब ?”
“आप यह क्यों भूल गए कि आपने चंद्रावती को बलि चलाया था, जिसके गर्भ में आपका पुत्र था - उस वक्त आप को दया क्यों नहीं आई - जबकि चंद्रावती आपकी सहायक भी थी - और रिश्ते में आपकी मां भी रह चुकी थी - उस स्त्री पर तो आपको दया नहीं आई जबकि इस पराई स्त्री पर जिससे आपका कोई संबंध नहीं, उस पर दया क्यों….।”
“बेताल….।” मैं चीख पड़ा।
“सच्चाई हमेशा कड़वी होती है - अब आप इस फेर में ना पड़ें, आपके लिये हर इंसान एक जैसा होना चाहिए… तांत्रिक का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता। आपकी नजर में औरत सिर्फ भोग विलास की वस्तु होनी चाहिए।”
मैं पसीने से नहा गया। कितना कड़ुआ सच था। चंद्रावती की याद आते ही रोम रोम कांप उठा।
जिस समय मैं बेताल के कहने पर बाहर निकला, चांद उदय हो गया था। आसमान पर तारागण चमक रहे थे। कुछ समय हम खामोश रहे, फिर बेताल ने मुझे सतर्क किया।
“वह देखिए चमकता बिंदु… वह आ रहा है।”
मैंने निगाह उठाई - बिल्कुल ऐसा लगता था जैसे एक तारा आसमान में रास्ता खोजता हुआ तेजी के साथ दौड़ रहा हो। कुछ समय बाद ही वह निकट आ गया - और निकट - और फिर तेज गूंज के साथ वह मेरे ऊपर घूमने लगा। यह एक काली हांडिया थी, रोशनी इसी से फूट रही थी।
अचानक मैंने अगिया बेताल के शरीर को आग का गोला बनते देखा और वह ऊपर उठता हुआ जोरदार आवाज के साथ हंडिया से टकराया। बिजली सी चमकी फिर हंडिया काफी दूर चली गई। उसके बाद हंडिया बेताल पर झपटी। इस बार भी तेज आवाज पैदा हुई। वह दोनों मुझे गुंड मुंड होते नजर आए। दोनों के इस युद्ध में भयंकर आवाजें उत्पन्न हो रही थी।
अंत में बेताल ने उसे घेर लिया। वह तेजी के साथ हंडिया के चारों तरफ एक वृत्त में घूम रहा था और बार-बार उस पर टक्करें मार रहा था - फिर आग की तेज लपट उठी और मैंने स्पष्ट रुप से किसी की कराहट सुनी। अगले ही पल यह आसमानी युद्ध समाप्त हो गया और बेताल एक राक्षस को लपेट में लिये आ गिरा।
अब उन दोनों का युद्ध प्रारंभ हो गया।
वे दोनों एक दूसरे पर गुप्त शस्त्रों का प्रयोग कर रहे थे परंतु बेताल को पछाड़ पाना उस खौफनाक सूरत वाले राक्षस के बस का रोग नहीं लगता था - बेताल ने उसके मुंह में हाथ डाल दिया और वह भैंसे के समान आवाज निकाल रहा था - बेताल ने उसे अंत में इतनी जोर से झटका दिया कि वह आसमान की तरफ चला गया।
उसका आकार छोटा होता जा रहा था - फिर वह हवा में स्थिर खड़ी हंडिया में घुसता चला गया। बेताल आग बनकर हंडिया के पीछे लपका, हंडिया जिस रास्ते से आई थी, उसी पर दौड़ पड़ी और बेताल बराबर उसका पीछा करता रहा।
अंत में वे मेरी नजरों से ओझल हो गए।
दस मिनट बाद ही बेताल फिर से उपस्थित हुआ।
“आपका शत्रु मर गया…. उसे आपका भेद मालूम हो गया था। उसकी मूठ ने उसी की जान ले ली।”
“ओह - तो क्या - ?”
“मूठ चल चुकी है… देर सवेर वह यहां तक पहुंच ही जाएगी। मुझे एक बात बताइए आका यदि आपने किसी और की बलि चढ़ाई होती तो क्या आपको इतना दुख होता।”
“नहीं!”
“तो दो मनुष्यों के लिये भेदभाव क्यों - प्राणी तो दोनों ही है।”
“इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं अपने लड़के का कत्ल कर दूँ ….।”
“आप ऐसा कर चुके हैं आका…. यह बच्चा आपके बेटे से अधिक प्यारा तो नहीं है।”
“क्या मतलब ?”
“आप यह क्यों भूल गए कि आपने चंद्रावती को बलि चलाया था, जिसके गर्भ में आपका पुत्र था - उस वक्त आप को दया क्यों नहीं आई - जबकि चंद्रावती आपकी सहायक भी थी - और रिश्ते में आपकी मां भी रह चुकी थी - उस स्त्री पर तो आपको दया नहीं आई जबकि इस पराई स्त्री पर जिससे आपका कोई संबंध नहीं, उस पर दया क्यों….।”
“बेताल….।” मैं चीख पड़ा।
“सच्चाई हमेशा कड़वी होती है - अब आप इस फेर में ना पड़ें, आपके लिये हर इंसान एक जैसा होना चाहिए… तांत्रिक का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता। आपकी नजर में औरत सिर्फ भोग विलास की वस्तु होनी चाहिए।”
मैं पसीने से नहा गया। कितना कड़ुआ सच था। चंद्रावती की याद आते ही रोम रोम कांप उठा।
जिस समय मैं बेताल के कहने पर बाहर निकला, चांद उदय हो गया था। आसमान पर तारागण चमक रहे थे। कुछ समय हम खामोश रहे, फिर बेताल ने मुझे सतर्क किया।
“वह देखिए चमकता बिंदु… वह आ रहा है।”
मैंने निगाह उठाई - बिल्कुल ऐसा लगता था जैसे एक तारा आसमान में रास्ता खोजता हुआ तेजी के साथ दौड़ रहा हो। कुछ समय बाद ही वह निकट आ गया - और निकट - और फिर तेज गूंज के साथ वह मेरे ऊपर घूमने लगा। यह एक काली हांडिया थी, रोशनी इसी से फूट रही थी।
अचानक मैंने अगिया बेताल के शरीर को आग का गोला बनते देखा और वह ऊपर उठता हुआ जोरदार आवाज के साथ हंडिया से टकराया। बिजली सी चमकी फिर हंडिया काफी दूर चली गई। उसके बाद हंडिया बेताल पर झपटी। इस बार भी तेज आवाज पैदा हुई। वह दोनों मुझे गुंड मुंड होते नजर आए। दोनों के इस युद्ध में भयंकर आवाजें उत्पन्न हो रही थी।
अंत में बेताल ने उसे घेर लिया। वह तेजी के साथ हंडिया के चारों तरफ एक वृत्त में घूम रहा था और बार-बार उस पर टक्करें मार रहा था - फिर आग की तेज लपट उठी और मैंने स्पष्ट रुप से किसी की कराहट सुनी। अगले ही पल यह आसमानी युद्ध समाप्त हो गया और बेताल एक राक्षस को लपेट में लिये आ गिरा।
अब उन दोनों का युद्ध प्रारंभ हो गया।
वे दोनों एक दूसरे पर गुप्त शस्त्रों का प्रयोग कर रहे थे परंतु बेताल को पछाड़ पाना उस खौफनाक सूरत वाले राक्षस के बस का रोग नहीं लगता था - बेताल ने उसके मुंह में हाथ डाल दिया और वह भैंसे के समान आवाज निकाल रहा था - बेताल ने उसे अंत में इतनी जोर से झटका दिया कि वह आसमान की तरफ चला गया।
उसका आकार छोटा होता जा रहा था - फिर वह हवा में स्थिर खड़ी हंडिया में घुसता चला गया। बेताल आग बनकर हंडिया के पीछे लपका, हंडिया जिस रास्ते से आई थी, उसी पर दौड़ पड़ी और बेताल बराबर उसका पीछा करता रहा।
अंत में वे मेरी नजरों से ओझल हो गए।
दस मिनट बाद ही बेताल फिर से उपस्थित हुआ।
“आपका शत्रु मर गया…. उसे आपका भेद मालूम हो गया था। उसकी मूठ ने उसी की जान ले ली।”