Doctor Maa ke Sath Sambandh - Page 5 - SexBaba
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Doctor Maa ke Sath Sambandh

हॉल के सन्नाटे में अंजलि के सैंडल की आवाज़ गूँज रही थी। "कंचन! आर्यन! कहाँ हो तुम दोनों?" अंजलि ने किचन से लेकर बालकनी तक देख लिया, लेकिन पूरा घर खाली लग रहा था। उसके हाथ में पेनकिलर का पत्ता और क्रीम की ट्यूब थी। जब उसे कोई जवाब नहीं मिला, तो उसका माथा ठनका। तभी उसे बेडरूम की ओर से पानी गिरने की हल्की गूँज सुनाई दी।

बाथरूम के अंदर का आलम ही कुछ और था। शावर की तेज़ बौछार और उत्तेजना के शोर ने आर्यन और कंचन को बाहरी दुनिया से पूरी तरह काट दिया था। उन्हें न तो मुख्य दरवाज़े के खुलने की आहट सुनाई दी और न ही अंजलि की पुकार।

आर्यन इस वक्त पूरी तरह अपनी माँ अंजलि की यादों में खोकर कंचन की सेवा कर रहा था। उसने कंचन के 7 इंच के उस सख्त और बनावटी अंग को अपने दोनों हाथों से थाम रखा था। वह बार-बार उसे अपने गले की गहराई तक उतार रहा था। उसका पूरा चेहरा गीला था—कुछ शावर के पानी से और कुछ उस कामुक लार से जो कंचन के अंग से रिस रही थी। वह बिल्कुल वैसे ही अपने सिर को हिला रहा था जैसे अंजलि उसके सामने घुटनों पर बैठकर करती थी।

कंचन दीवार से चिपकी हुई थीं, उनके दोनों हाथ आर्यन के बालों में बुरी तरह फंसे हुए थे। वे दर्द और लज्जा की सीमा पार कर चुकी थीं। "ओह्ह्ह... आर्यन... तू तो अपनी माँ का भी उस्ताद निकला... चूस उसे... और गहराई से!" कंचन की आँखें ऊपर चढ़ी हुई थीं और वे पागलों की तरह सिसक रही थीं। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि मौत और बदनामी उनके दरवाज़े पर खड़ी है।

अंजलि धीरे-धीरे बेडरूम में दाखिल हुई। उसने देखा कि बेड की चादर बेतरतीब है, फर्श पर कंचन की काली शिफॉन साड़ी और पैंटी पड़ी है, और पास ही आर्यन का सफेद अंडरवियर। अंजलि का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वह ठिठकते हुए बाथरूम के दरवाज़े तक पहुँची। दरवाज़ा आधा खुला था, क्योंकि जलदबाज़ी में वे कुंडी लगाना भूल गए थे।

जैसे ही अंजलि ने हाथ बढ़ाकर दरवाज़े को धीरे से धक्का दिया, उसके सामने का नज़ारा किसी ज्वालामुखी के फटने जैसा था:

सामने शावर के नीचे उसका अपना बेटा, उसका जवान खून, नग्न अवस्था में घुटनों के बल बैठा था। और उसका मुँह... उसकी अपनी छोटी बहन कंचन के उस 'अनोखे मर्दाना अंग' पर लगा हुआ था। अंजलि की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने देखा कि कैसे कंचन का वह सख्त अंग आर्यन के मुँह के अंदर-बाहर हो रहा है।

अंजलि के हाथ से दवाइयों का थैला फर्श पर गिर गया। उसके कानों में वही आवाज़ें गूँज रही थीं जो वह खुद आर्यन के साथ अकेले में करती थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस बहन को उसने अपने घर में पनाह दी, वह उसके बेटे के साथ इस 'अप्राकृतिक' खेल में डूबी हुई है।

आर्यन और कंचन अभी भी अपनी ही धुन में थे। आर्यन ने एक बार फिर ज़ोरदार वैक्यूम बनाकर कंचन के अंग को पूरी तरह अंदर लिया, जिससे कंचन की एक लंबी और तीखी सिसकारी निकली—"आह्ह्ह्ह... बस आर्यन... अब निकल जाएगा... मेरा लावा निकल जाएगा!"

अंजलि अब और सहन नहीं कर सकी। उसकी ममता, उसकी हवस और उसकी ईर्ष्या सब एक साथ जाग उठे। उसने ज़ोर से दरवाज़े को दीवार पर दे मारा—धड़ाम!

बाथरूम की भाप और पानी के बीच अचानक हुए इस धमाके से आर्यन और कंचन जैसे नींद से जागे। आर्यन ने झटके से कंचन का अंग अपने मुँह से निकाला, उसके होंठों से एक तार जैसा लार का धागा नीचे गिरा। कंचन ने कांपते हुए अपनी आँखें खोलीं और सामने अपनी बड़ी बहन अंजलि को खड़ा पाया।

"तो ये चल रहा है मेरी पीठ पीछे?" अंजलि की आवाज़ किसी घायल शेरनी जैसी थी। उसकी नज़रों में गुस्सा भी था और एक अजीब सी तड़प भी। उसकी नज़रें सीधे कंचन के उस नग्न और खड़े अंग पर टिकी थीं, जो अभी भी थरथरा रहा था।

"जीजी... वो... मैं..." कंचन की आवाज़ गले में ही फंस गई। आर्यन नग्न हालत में घुटनों पर बैठा अपनी माँ की ओर देख रहा था, उसकी आँखों में डर कम और एक अजीब सी मर्दाना चुनौती ज़्यादा थी।

अंजलि धीरे-धीरे उनके करीब आई, शावर के पानी में भीगते हुए। उसने नीचे गिरे आर्यन के ७ इंच के फौलाद को देखा और फिर कंचन के उस बनावटी अंग को। उसने एक ठंडी हंसी हंसी।

"दवाइयां तो मैं बाद में दूँगी कंचन... पहले मुझे ये देखना है कि मेरा बेटा तेरी इस 'चीज़' में ऐसा क्या ढूंढ रहा है जो उसे अपनी माँ के पास नहीं मिला!"

अंजलि ने अपने सैंडल उतारे और अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंस लिया। माहौल अब 'थ्रीसम' (Trio) की एक ऐसी आग में तब्दील होने वाला था जहाँ खून के रिश्ते खाक होने वाले थे।

अंजलि का वह रौद्र रूप अचानक एक मादक और रहस्यमयी हंसी में बदल गया। बाथरूम की धुंधली रोशनी में उसकी सफेद साड़ी पानी की बूंदों से भीगकर उसके बदन से चिपकने लगी थी। आर्यन, जो अब तक थर-थर कांप रहा था, अपनी माँ की इस अचानक बदली हुई फितरत को समझ नहीं पाया।

जैसे ही अंजलि हंसी, बाथरूम का तनाव एक अजीब सी 'कामुक चुप्पी' में बदल गया। उसने देखा कि उसका शेर जैसा बेटा, जो अभी कुछ देर पहले कंचन का 'शिकार' कर रहा था, अब अपनी माँ के खौफ से भीगी बिल्ली बना हुआ था।

अंजलि के गुस्से वाले नाटक ने आर्यन के दिमाग पर ऐसा असर किया कि उसका 7 इंच का फौलाद डर के मारे सिमटने लगा। जो अंग कुछ देर पहले पत्थर की तरह सख्त था, वह अब अपनी माँ की नज़रों की तपिश झेल नहीं पाया और छोटा होकर लटकने लगा। पुरुष मनोविज्ञान का यह वह हिस्सा था जहाँ 'माँ' का दबदबा 'प्रेमी' के जुनून पर भारी पड़ गया।

अंजलि को अपने बेटे की यह बेबसी और अपनी बहन की घबराहट देखकर एक अजब किस्म का 'पावर-प्ले' महसूस हुआ। उसे मज़ा आने लगा कि कैसे उसकी एक आवाज़ ने इन दोनों 'शिकारियों' को बेदम कर दिया है। उसने दीवार के पास पड़ा एक छोटा स्टूल खींचा और उस पर किसी रानी की तरह बैठ गई।

अंजलि ने अपनी साड़ी का पल्लू सही किया और अपने पैरों पर पैर चढ़ाकर बैठ गई। उसकी नज़रें सीधे कंचन के उस 7 इंच के तने हुए बनावटी अंग पर थीं, जो अभी भी प्यासा खड़ा था।

"डरो मत आर्यन... मैं तो बस ये देख रही थी कि मेरे पीछे इस घर में कितनी तरक्की हुई है," अंजलि ने अपनी आवाज़ में शहद घोलते हुए कहा। फिर उसने कंचन की ओर देखा, जिसकी सांसें अभी भी अटकी हुई थीं। "कंचन, तू तो बड़ी छुपी रुस्तम निकली। और तू रुक क्यों गया आर्यन? मैंने कहा न... जारी रखो! मुझे भी तो पता चले कि मेरी छोटी बहन ने तुझे क्या नया सिखाया है।"

आर्यन अब एक बहुत ही अजीब स्थिति में था। उसकी माँ उसके ठीक सामने बैठी उसे अपनी मासी का अंग चूसने का हुक्म दे रही थी। अंजलि की आँखों में एक ऐसी चमक थी जो आर्यन को यह अहसास करा रही थी कि आज वह सिर्फ एक दर्शक नहीं, बल्कि इस खेल की 'मास्टरमाइंड' है।

कंचन ने कांपते हुए अंजलि की ओर देखा। "जीजी... ये... ये बस..." "चुप!" अंजलि ने उसे टोक दिया। "बातें बहुत हो गईं कंचन। मैंने सुना तूने बहुत दर्द सहा है आज। अब उस दर्द को मज़े में बदल। आर्यन... अपनी माँ की बात मान और वापस शुरू कर। अगर तेरा ये हथियार खड़ा नहीं हुआ, तो समझ लेना आज तेरी खैर नहीं।"

अंजलि के उकसाने पर आर्यन के अंदर का डर अब एक नए किस्म की उत्तेजना में बदलने लगा। अपनी माँ के सामने अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन करना उसके लिए सबसे बड़ा नशा बन गया। उसने फिर से कंचन की जांघों के बीच अपना चेहरा झुकाया।

वह स्टूल पर बैठी, अपनी ठुड्डी पर हाथ रखे बड़े गौर से देख रही थी कि कैसे आर्यन की जीभ कंचन के उस बनावटी अंग को सहला रही है। उसे ईर्ष्या तो थी, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा उसे कंचन के उस 'विशेष अंग' को करीब से देखने की भूख थी। वह देखना चाहती थी कि जब आर्यन उसे अपने मुँह में लेता है, तो कंचन के चेहरे के भाव कैसे बदलते हैं।

बाथरूम में अब शावर के पानी की आवाज़ और अंजलि की मादक नज़रों के बीच आर्यन फिर से कंचन की 'सेवा' में जुट गया। अंजलि का हाथ धीरे-धीरे अपनी ही साड़ी के नीचे सरकने लगा था, क्योंकि यह नज़ारा अब उसे भी पिघला रहा था।

बाथरूम की उस उमस भरी हवा में अब 'पाप' का एक ऐसा त्रिकोण बन चुका था, जिसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाए। शावर से गिरता पानी अब केवल शरीर नहीं धो रहा था, बल्कि नैतिकता की आखिरी परत को भी बहा ले गया था।

अंजलि स्टूल पर किसी महारानी की तरह बैठी थी, उसकी आँखों में अपने बेटे को अपनी ही बहन के अंग की गुलामी करते देखने का एक विकृत आनंद था। इस दृश्य में जो मानसिक उथल-पुथल चल रही थी, वह किसी भी सामान्य अनुभव से कोसों दूर थी।

आर्यन अब पूरी तरह से एक 'यौन कठपुतली' बन चुका था। उसकी माँ की उपस्थिति ने उसके भीतर एक ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा किया जिसने उसकी कामुकता को एक नए, अंधेरे स्तर पर पहुँचा दिया।

आर्यन के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न और सबसे बड़ी फैंटेसी का मिलन थी।

जब वह अपनी माँ की नज़रों के सामने कंचन के उस 7 इंच के बनावटी फौलाद को मुँह में ले रहा था, तो उसके मन में एक अजीब सा विरोधाभास था। उसे लग रहा था कि वह अपनी माँ के सामने नंगा हो चुका है। लेकिन अंजलि की कामुक हंसी ने उसे यह संदेश दे दिया था कि आज उसे 'मर्यादा' की नहीं, बल्कि 'परफॉरमेंस' की ज़रूरत है।

अब वह कंचन का अंग सिर्फ मज़े के लिए नहीं चूस रहा था, बल्कि अपनी माँ को यह दिखाने के लिए चूस रहा था कि वह कितना 'काबिल' हो गया है। वह जानबूझकर अपनी जीभ से उस अंग पर ऐसी हरकतें कर रहा था जिससे कंचन तेज़ आवाज़ में सिसकियाँ ले, ताकि अंजलि को अपनी बहन की बेबसी पर मज़ा आए।

अंजलि स्टूल पर बैठी अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में लपेट रही थी।

वह देख रही थी कि उसका बेटा कंचन के उस 'विशेष अंग' को ठीक वैसे ही चूस रहा है जैसे वह अंजलि के साथ करता था। उसे कंचन के उस अंग से नफरत होनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय उसे एक अजीब सा आकर्षण महसूस हो रहा था। वह सोच रही थी कि जिस अंग को मेरा बेटा इतनी शिद्दत से चख रहा है, उसमें ऐसी क्या बात है।

उसे इस बात का घमंड हो रहा था कि उसके एक आदेश पर उसका जवान बेटा अपनी मासी के चरणों में पड़ा है। वह एक-एक बारीकी को नोट कर रही थी—आर्यन के गालों का खिंचाव, कंचन के थरथराते पैर और उस बनावटी अंग की चमक।

आर्यन ने अब अपनी रफ्तार बढ़ा दी। उसने कंचन के उस सख्त अंग को गले के अंतिम छोर तक उतारा। कंचन ने दीवार पर अपना सिर दे मारा और सिसकते हुए चिल्लाई—"आह्ह्ह... जीजी... देखो इसे... ये पागल हो गया है... ये मुझे मार डालेगा!"

अंजलि ने अपनी जगह से उठकर करीब आते हुए कहा, "उसे चूसने दे कंचन... आज ये तेरा दर्द चूस लेगा। आर्यन, रुकना मत! अपनी माँ को दिखा कि तूने अपनी मासी को पालतू कैसे बनाया है।"

आर्यन का अंग, जो डर से छोटा हो गया था, अब इस 'थ्रीसम' माहौल और अंजलि के प्रोत्साहन से फिर से धड़कने लगा। वह घुटनों पर बैठा था, मुँह में मासी का अंग था और पीठ पर अपनी माँ की तपती हुई नज़रें।

अंजलि की अनुभवी आँखों ने भांप लिया था कि बाथरूम की इस उमस में उत्तेजना अब उस मोड़ पर पहुँच गई है जहाँ से सब कुछ बेकाबू हो सकता था। उसे याद आया कि कंचन अभी भी दर्द में है और आर्यन भी पूरी तरह थक चुका है। एक चतुर खिलाड़ी की तरह उसने खेल को थोड़ा विराम देने का फैसला किया ताकि अगली पारी और भी धमाकेदार हो सके।

अंजलि ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर शावर का नल बंद कर दिया। पानी की गिरती आवाज़ बंद होते ही बाथरूम में एक भारी सन्नाटा छा गया, जिसमें सिर्फ उन तीनों की धड़कनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

"अब बस करो तुम दोनों," अंजलि ने अधिकारपूर्ण लहजे में कहा, पर उसकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं बल्कि एक ठहरी हुई शरारत थी। "आर्यन, बाहर निकल और खुद को साफ़ कर। कंचन, तू भी अब बाहर आ... तेरे पिछले घाव को दवा और आराम की ज़रूरत है। पहले शरीर सुखाओ, कुछ खाओ-पियो, फिर देखेंगे कि आगे क्या करना है।"

आर्यन सबसे पहले बाहर निकला। शावर के नीचे की वह आक्रामक मर्दानगी अब शांत थी। उसने एक बड़ा तौलिया अपनी कमर पर लपेटा। अंजलि ने एक दूसरा तौलिया हाथ में लिया और खुद कंचन के बदन को पोंछने लगी।

अंजलि जब कंचन के कंधों और कमर को सुखा रही थी, तो उसकी उंगलियां जानबूझकर कंचन के उस 'विशेष अंग' को छू रही थीं जो अभी भी ढीला नहीं हुआ था। कंचन ने थकावट और दर्द के कारण अपना सिर अंजलि के कंधे पर टिका दिया।

बेडरूम में आकर आर्यन ने कंचन को धीरे से बिस्तर पर लिटाया। अंजलि ने बैग से वह शक्तिशाली पेनकिलर निकाली और पानी के साथ कंचन को दी।

"उल्टी लेट जा," अंजलि ने आदेश दिया। कंचन के उल्टा लेटते ही अंजलि ने वह एंटीसेप्टिक क्रीम अपनी उंगलियों पर ली और बहुत ही धीरे से कंचन के उस सूजे हुए और लाल पड़े पिछले द्वार पर लगाना शुरू किया। आर्यन दूर खड़ा यह देख रहा था। उसे अपनी माँ की कोमलता और कंचन के दर्द के बीच एक अजीब सा जुड़ाव महसूस हुआ। क्रीम की ठंडक से कंचन के मुँह से एक राहत भरी आह निकली।

तीनों ने अब अपने-अपने 'घर के कपड़े' पहनना शुरू किया। यह हिस्सा सबसे अजीब था क्योंकि कुछ देर पहले तक वे एक-दूसरे के नग्न सच से रूबरू थे।

कंचन ने एक ढीली-ढाली सूती मैक्सी पहनी ताकि नीचे के घाव पर दबाव न पड़े। उसका वह 7 इंच का राज अब उस मैक्सी के नीचे सुरक्षित और छुपा हुआ था।

आर्यन ने अपनी टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहन लिए, जबकि अंजलि ने अपनी भीगी हुई साड़ी बदलकर एक दूसरी हल्की शिफॉन की साड़ी लपेटी।

कुछ देर बाद तीनों डाइनिंग टेबल पर थे। अंजलि ने जल्दी से कुछ हल्का नाश्ता और जूस तैयार किया था।

टेबल पर सन्नाटा था, लेकिन मेज़ के नीचे पैरों का खेल शुरू हो चुका था। आर्यन जूस पीते हुए अपनी माँ अंजलि को देख रहा था, जिसने अभी-अभी उसे अपनी बहन के साथ रंगे हाथों पकड़ा था। कंचन दवा के असर से अब थोड़ा बेहतर महसूस कर रही थी, लेकिन उसकी नज़रें अभी भी आर्यन के चेहरे पर टिकी थीं।

अंजलि ने जूस का घूँट लिया और धीरे से बोली, "दवा अपना काम आधे घंटे में शुरू कर देगी कंचन।

पेट भर खाना और कंचन के शरीर में दौड़ रही पेनकिलर की तेज़ खुराक ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। बेडरूम की पीली रोशनी में एक भारी सा और मदहोश कर देने वाला सन्नाटा पसरा था। दोपहर के उस भीषण तूफान के बाद अब बिस्तर पर जो दृश्य था, वह जितना शांत लग रहा था, उसके भीतर उतनी ही गहरी और दबी हुई कामुकता फिर से करवट ले रही थी।

बिस्तर पर आर्यन बीच में लेटा हुआ था। उसके एक तरफ उसकी जन्म देने वाली माँ अंजलि थी और दूसरी तरफ उसकी वो कामुक मासी कंचन, जिसका 'अनोखा राज' आज उसने पूरी तरह चख लिया था।

कंचन के लिए यह पल बहुत अजीब और राहत भरा था। पिछले द्वार का वो तीखा दर्द अब पेनकिलर के असर से सुन्न होने लगा था। पेट भरा होने की वजह से उसका शरीर भारी हो रहा था और ठंडी एसी (AC) की हवा उसे नींद की आगोश में खींच रही थी। उसकी मैक्सी के अंदर उसकी जांघों के बीच वो 7 इंच का बनावटी अंग अब सुस्त पड़ा था, लेकिन उसकी मौजूदगी आर्यन को अभी भी महसूस हो रही थी। कंचन ने अपना एक हाथ आर्यन के सीने पर रखा और उसकी आँखें धीरे-धीरे मुंदने लगीं। वह अब आधे होश और आधी नींद के उस मुकाम पर थी जहाँ सिर्फ सुकून था।

कंचन के विपरीत, अंजलि पूरी तरह से जाग रही थी। उसकी आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। वह कोहनी के बल टिकी हुई आर्यन के चेहरे को देख रही थी। उसके मन में अभी भी बाथरूम वाला वो नज़ारा घूम रहा था जब उसका बेटा अपनी मासी की सेवा में लगा था। अंजलि के लिए यह 'सहनशीलता' का इम्तिहान था। वह देख रही थी कि उसकी छोटी बहन गहरी नींद में जा रही है, जिससे अब रास्ता साफ़ हो रहा था।

आर्यन सीधा लेटा छत को देख रहा था। उसके शरीर में एक अजीब सी ऊर्जा दौड़ रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि उसकी दाईं ओर कंचन की सांसें अब धीमी और गहरी हो गई हैं—वह सो चुकी थी। लेकिन उसकी बाईं ओर अंजलि की तपती हुई नज़रें उसे जला रही थीं।

अंजलि ने चादर के नीचे से धीरे से अपना पैर आर्यन के पैर पर रगड़ा। आर्यन सिहर उठा। अंजलि ने उसके कान के पास झुककर बहुत ही धीमी आवाज़ में फुसफुसाया, "सो गई वो... दवा ने काम कर दिया।"

आर्यन ने अपनी माँ की ओर देखा। अंजलि की आँखों में वही पुरानी हवस फिर से लौट आई थी, लेकिन इस बार उसमें एक 'चुनौती' भी थी। जैसे वह पूछ रही हो कि 'मासी का स्वाद लेने के बाद क्या अपनी माँ को भूल गए?'

कमरे में सिर्फ एसी की हल्की सी आवाज़ थी। कंचन की गहरी नींद ने अब अंजलि और आर्यन को एक ऐसा 'प्राइवेट स्पेस' दे दिया था जहाँ वे अपनी दबी हुई बातों को अंजाम दे सकते थे।

अंजलि ने धीरे से कंचन का हाथ आर्यन के सीने से हटाया और उसे बिस्तर के दूसरी तरफ रख दिया। अब आर्यन और अंजलि के बीच कोई रुकावट नहीं थी। कंचन सोई हुई थी, बेखबर कि उसके बगल में अब उसकी अपनी बहन उसके 'शेर' को फिर से अपनी ओर खींच रही है।

अंजलि ने अपना हाथ आर्यन के लोअर के अंदर डाला और उसके 7 इंच के फौलाद को अपनी गर्म मुट्ठी में कैद कर लिया, जो अब फिर से सिर उठाने लगा था।

"तो अब बताओ साहबज़ादे... मासी के साथ खेलकर दिल भर गया, या अब अपनी इस प्यासी माँ की भी सुध लोगे?" अंजलि ने शरारत से आर्यन की गर्दन पर छोटा सा काटा।

अंजलि के भीतर का संयम अब पूरी तरह टूट चुका था। बाथरूम में जो नज़ारा उसने देखा था—अपने बेटे के मुँह को अपनी बहन के उस अनोखे अंग पर—उसने अंजलि की नसों में ईर्ष्या और हवस का ऐसा कॉकटेल घोल दिया था जिसे अब और रोकना नामुमकिन था। जैसे ही उसने सुनिश्चित किया कि कंचन गहरी नींद में है, वह अपनी मर्यादा की सारी जंजीरें तोड़कर एक 'जंगली बिल्ली' की तरह आर्यन पर झपट पड़ी।

अंजलि ने एक झटके में अपनी स्थिति बदली और आर्यन के ऊपर चढ़कर उसे बिस्तर पर दबा दिया। उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और आँखों में एक ऐसी वहशी चमक थी जैसे कोई भूखा शिकारी अपने शिकार को दबोच रहा हो।

अंजलि ने बिना एक पल गंवाए आर्यन के होंठों को अपने होंठों के शिकंजे में कस लिया। यह कोई सामान्य चुंबन नहीं था; यह एक 'हिंसक आक्रमण' था। उसने अपनी जीभ आर्यन के मुँह में इतनी गहराई और ताकत से डाली जैसे वह कंचन के हर अहसास को वहाँ से मिटा देना चाहती हो। उसके दांत आर्यन के होंठों को काट रहे थे और उसके हाथ आर्यन की गर्दन को जकड़े हुए थे।

अंजलि के दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी—'यह मेरा बेटा है, मेरा प्रेमी है, और इसने मेरी बहन के साथ वह सब किया जो उसे सिर्फ मेरे साथ करना चाहिए था।' वह आर्यन को चूमते हुए अपनी पूरी देह को उसके ऊपर रगड़ रही थी। उसके भारी और तप्त स्तन आर्यन की छाती को कुचल रहे थे।

बगल में कंचन सोई हुई थी, जिससे इस स्थिति का रोमांच हजार गुना बढ़ गया था। अंजलि की साड़ी के पल्ले इधर-बधर बिखर गए थे और उसके खुले बाल आर्यन के चेहरे पर एक जाले की तरह फैल चुके थे।

आर्यन अपनी माँ के इस 'जंगली रूप' को देखकर सुन्न रह गया था। अंजलि के शरीर की गर्मी उसे जला रही थी। जैसे-जैसे अंजलि उसे पागलों की तरह चूम रही थी, आर्यन का 7 इंच का फौलाद उसकी माँ की जांघों के बीच फिर से एक पत्थर की तरह सख्त हो गया। वह महसूस कर रहा था कि उसकी माँ आज उसे कच्चा चबा जाने के मूड में है।

अंजलि का हाथ अब आर्यन के लोअर के अंदर पहुँच चुका था। वह उसके अंग को इतनी बेदर्दी और जुनून से भींच रही थी जैसे वह उस पर अपना मालिकाना हक जता रही हो। "आह्ह्ह... आर्यन... तू मेरा है... सिर्फ मेरा!" अंजलि ने चुंबन के बीच ही भारी आवाज़ में फुसफुसाया।

अंजलि की सिसकारियां अब धीरे-धीरे तेज़ हो रही थीं। वह भूल चुकी थी कि बगल में उसकी बहन लेटी है। वह अपनी कमर को आर्यन के ऊपर किसी पागलपन की हद तक पटक रही थी, जिससे बिस्तर के स्प्रिंग हल्की आवाज़ करने लगे थे।

अंजलि ने अपना चेहरा आर्यन के गले में गड़ा दिया और वहाँ ज़ोर से 'लव बाइट' देते हुए उसे नोच लिया। उसकी आवाज़ में एक ऐसी तड़प थी जो केवल बरसों की प्यास से आती है। "आज मैं तुझे वो सुख दूँगी जो कंचन अपने उस बनावटी खिलौने से कभी नहीं दे पाएगी। देख... देख अपनी माँ की आग!"

अंजलि ने अपनी साड़ी का ब्लाउज फाड़ने के अंदाज़ में खोला और अपने दोनों उफनते हुए स्तनों को आर्यन के मुँह के पास लाकर रगड़ने लगी। वह चाहती थी कि आर्यन उसे अभी और इसी वक्त अपनी पूरी मर्दानगी से शांत करे।

बिस्तर पर मची उस खलबली और पागलपन भरे चुंबनों के बीच, अब कपड़ों का बोझ दोनों के लिए असहनीय हो चुका था। अंजलि की 'जंगली' उत्तेजना और आर्यन की जवान भूख एक ऐसे मुकाम पर थी जहाँ खाल से खाल का मिलना अनिवार्य था। बगल में सोई कंचन के निश्चल शरीर के ठीक पास, मर्यादाओं के चीथड़े उड़ने वाले थे।

आर्यन और अंजलि एक-दूसरे के होंठों को बुरी तरह से चूस रहे थे, और उनके हाथ एक-दूसरे के शरीर पर किसी भूखे शिकारी की तरह लिबास को तलाश रहे थे।

अंजलि ने चुंबन तोड़कर एक गहरी सांस ली, उसकी आँखें लाल थीं। उसने झटके से अपने साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिरा दिया। उसकी हल्की शिफॉन की साड़ी सरकती हुई फर्श पर जा गिरी। अब वह सिर्फ अपने पेटीकोट और भीगे हुए ब्लाउज में थी। उसने आर्यन का हाथ पकड़कर अपने भारी स्तनों पर रखा और फुसफुसायी, "उतार इन्हें आर्यन... आज अपनी माँ को पूरी तरह बेपर्दा कर दे।"

आर्यन ने कांपते हुए लेकिन जुनून से भरे हाथों से अंजलि के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू किए। टक्... टक्... टक्... जैसे-जैसे हुक खुल रहे थे, अंजलि के 36 इंच के उफनते हुए स्तन कैद से आजाद होने लगे। जैसे ही ब्लाउज ढीला हुआ, अंजलि ने उसे कंधे से उतार कर पीछे फेंक दिया। अब उसकी दूधिया पीठ और आगे का भारी यौवन आर्यन की आँखों के सामने पूरी तरह नग्न था।

आर्यन ने अब अपना लोअर और अंडरवियर एक साथ नीचे खिसका दिया। उसका 7 इंच का फौलाद किसी कमान से छूटे तीर की तरह सीधा खड़ा होकर अंजलि के पेट से जा टकराया।

अंजलि ने बिना देर किए अपने पेटीकोट की डोरी खींच दी। रेशमी कपड़ा उसकी जांघों से होता हुआ बिस्तर के नीचे ढेर हो गया। अब अंजलि पूरी तरह से 'निर्वस्त्र' थी। उसकी सुडौल जांघों, चौड़े कूल्हों और बीच के उस घने काले जंगल की गर्माहट आर्यन के होश उड़ाने के लिए काफी थी।

आर्यन ने अपनी टी-शर्ट भी उतार फेंकी। अब बिस्तर पर दो नग्न जिस्म थे—एक जवान, सख्त और गठा हुआ आर्यन, और दूसरी तरफ उसकी अपनी माँ, जो ढलती उम्र की ढलान पर भी किसी 'यौवन की देवी' की तरह रस से भरी हुई थी।

नग्न होने के बाद दोनों एक पल के लिए रुके। अंजलि ने नीचे झुककर आर्यन के खड़े अंग को देखा और फिर उसकी आँखों में झाँका। उसे गर्व था कि यह विशाल अंग उसका अपना खून है। वहीं आर्यन, अपनी माँ के पूर्ण नग्न बदन को देखकर मदहोश था।

दोनों अब बिना किसी रुकावट के एक-दूसरे से चिपक गए। पसीने और उत्तेजना की महक कमरे में फैल गई थी। अंजलि ने अपनी टांगें आर्यन की कमर पर कस लीं।

बगल में सोई कंचन की मैक्सी थोड़ी ऊपर खिसकी हुई थी और उसका वह 'अनोखा अंग' बेजान सा पड़ा था। अंजलि ने आर्यन के कान में दांत गड़ाए और धीरे से कहा, "देख ले अपनी मासी को... सो गई है बेचारी। अब असली मर्द की तरह अपनी माँ को वो सुख दे जो आज तक किसी ने नहीं दिया।"

आर्यन ने अंजलि के दोनों भारी स्तनों को अपनी हथेलियों में भींच लिया और उन्हें ज़ोर-ज़ोर से मसलने लगा। अंजलि के मुँह से सिसकारी निकली जिसे उसने आर्यन के कंधे में मुँह गड़ाकर दबा लिया।

अंजलि की आँखों में इस वक्त जो चमक थी, वह केवल हवस की नहीं, बल्कि अपने बेटे पर अपनी सत्ता साबित करने की थी। उसने देख लिया था कि आर्यन ने कंचन के लिए क्या किया था, और अब वह उसे यह दिखाना चाहती थी कि 'गुरु' आखिर गुरु ही होता है।

अंजलि धीरे-धीरे, किसी नागिन की तरह सरकती हुई आर्यन के पेट के नीचे की ओर बढ़ी। उसने अपनी नज़रों को आर्यन की आँखों से एक पल के लिए भी नहीं हटाया। बिस्तर पर सोई हुई कंचन की भारी सांसें उनके बीच एक 'थ्रिलर' पैदा कर रही थीं।

अंजलि ने इस बार वो तरीका अपनाया जो उसने बरसों के अनुभव और आर्यन की कमज़ोरियों को जानकर विकसित किया था। उसने सीधे मुँह नहीं लगाया; इसके बजाय:

उसने पहले अपने भारी और गर्म स्तनों को आर्यन के 7 इंच के फौलाद के दोनों तरफ रख दिया। उसने अपने स्तनों के बीच उस अंग को दबाकर उसे 'ब्रेस्ट-फक' जैसा अहसास दिया। आर्यन की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा, उसका अंग अंजलि के मुलायम मांस के बीच पिस रहा था।

जब आर्यन पूरी तरह से उस मखमली दबाव में पागल होने लगा, तब अंजलि ने अपनी जीभ निकाली। उसने अंग की सुपारी को छूने के बजाय, उसके निचले हिस्से और अंग की जड़ की नसों को चटाना शुरू किया। यह एक ऐसा 'इरोटिक' अनुभव था जिसने आर्यन के दिमाग की नसों को हिला दिया।

अब अंजलि ने असली दांव खेला। उसने अपना मुँह पूरा खोला और एक ही झटके में आर्यन के पूरे अंग को 'डीप थ्रोट' के अंदाज़ में गले के अंतिम छोर तक उतार लिया।

अंजलि ने अपने हाथों से आर्यन की जांघों को कसकर पकड़ लिया और अपने मुँह के भीतर एक प्रचंड वैक्यूम पैदा किया। आर्यन का शरीर बिस्तर पर ऊपर की ओर उछल गया। उसे ऐसा लगा जैसे कोई बहुत शक्तिशाली मशीन उसके शरीर से सारा वीर्य खींच लेना चाहती है।

अंजलि ने कंचन की तरह केवल सिर नहीं हिलाया; उसने अपने गले की मांसपेशियों को आर्यन के अंग के चारों ओर सिकोड़ना शुरू किया। आर्यन को महसूस हुआ कि उसकी माँ का मुँह किसी गर्म, गीली और मखमली गुफा की तरह उसे निगल रहा है।

कमरे में सन्नाटा था, लेकिन आर्यन के मुँह से निकलने वाली 'आह्ह्ह... उफ्फ्फ... माँ' की दबी हुई सिसकारियां उस सन्नाटे को चीर रही थीं। अंजलि ने एक हाथ ऊपर ले जाकर आर्यन के होंठों पर रख दिया, ताकि उसकी आवाज़ से कंचन की नींद न खुले।

आर्यन को लगा कि वह उड़ रहा है। कंचन का अंग चूसते समय उसे जो 'नशा' महसूस हुआ था, अंजलि की इस कला ने उसे 'मोक्ष' में बदल दिया। उसकी रीढ़ की हड्डी में बिजली के झटके लग रहे थे।

अंजलि ऊपर की ओर देखकर आर्यन की बेबसी का लुत्फ उठा रही थी। उसके मुँह के कोनों से लार की एक पतली लकीर निकलकर आर्यन के अंडकोषों पर गिर रही थी। वह आर्यन को यह अहसास करा रही थी कि वह चाहे जितनी 'मासियों' के साथ खेल ले, पर अपनी माँ के इस जादुई मुँह का विकल्प उसे पूरी कायनात में नहीं मिलेगा।

अंजलि ने अब अपनी रफ्तार को किसी तूफ़ान की तरह तेज़ कर दिया। उसका सिर अब बिजली की गति से आगे-पीछे हो रहा था। आर्यन की जांघें कांपने लगी थीं और उसकी मुट्ठियां चादर को फाड़ने पर उतारू थीं। उसका 7 इंच का फौलाद अब अपने जीवन के सबसे बड़े विसर्जन के लिए तैयार था।

अंजलि ने एक पल के लिए अंग को बाहर निकाला, उसे अपनी आँखों के सामने थरथराते हुए देखा और फिर अपनी उंगली को चूसते हुए एक शरारती मुस्कान दी। "अभी तो शुरुआत है मेरे बेटे... अभी तो तुझे अपनी माँ की कोख की प्यास बुझानी है।"

रात के सन्नाटे में कामुकता का जो खेल चल रहा था, वह अब एक ऐसे मोड़ पर पहुँच गया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। अंजलि फिर से आर्यन के 7 इंच के धधकते मूसल पर टूट पड़ी थी। उसने अपनी आँखें बंद कर ली थीं और पूरी तन्मयता से आर्यन के पौरुष को अपने गले की गहराई तक उतार रही थी। आर्यन भी अपनी माँ के मुँह की उस मखमली गर्मी में खोया हुआ था, उसका शरीर सातवें आसमान पर था।

लेकिन उन दोनों को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उन्होंने एक बहुत बड़ी गणितीय चूक कर दी थी। कंचन ने सिर्फ पेनकिलर ली थी, नींद की दवा नहीं। भारी खाने और थकान की वजह से उसे एक झपकी तो लगी थी, लेकिन आर्यन और अंजलि की हरकतों से बिस्तर में होने वाली हल्की हलचल और अंजलि की भारी सांसों ने कंचन की चेतना को जगा दिया था।

अंजलि पूरी लय में थी, उसका सिर बिजली की गति से आर्यन की जाँघों के बीच ऊपर-नीचे हो रहा था। अचानक, उसे महसूस हुआ कि उसकी नग्न और सुडौल गाँड पर किसी के गर्म हाथों का स्पर्श हुआ।

पहले तो अंजलि को लगा कि शायद आर्यन का हाथ फिसल कर वहाँ पहुँच गया है, लेकिन जब उसने महसूस किया कि वह हाथ उसकी गाँड के दोनों हिस्सों को बहुत ही अधिकार और भूख के साथ भींच रहा है, तो उसके शरीर में बिजली का झटका लगा। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने आर्यन के अंग को मुँह से बाहर निकाला, उसके होंठों से लार का एक धागा टूटकर आर्यन के पेट पर गिरा।

अंजलि ने झटके से अपनी गर्दन पीछे घुमाई। कमरे की मंद रोशनी में उसने देखा कि कंचन जाग चुकी थी। कंचन पूरी तरह नहीं उठी थी, वह करवट लेकर लेटी हुई थी और उसका एक हाथ अंजलि की नग्न पीठ से होते हुए उसकी गाँड की गहराई को टटोल रहा था।

कंचन की आँखों में अब वह नींद या दर्द नहीं था, बल्कि एक ऐसी 'शिकारी चमक' थी जिसे देखकर अंजलि का खून जम गया।

कंचन ने अपनी उंगलियों को अंजलि की गाँड के छेद के पास ले जाकर हल्का सा दबाया। अंजलि के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकली। कंचन ने अपनी भारी आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा, "जीजी... अकेले-अकेले ही मेरे शेर को चूस डालोगी क्या? मुझे लगा था हम बहनें हर चीज़ बाँट कर इस्तेमाल करती हैं।"

अंजलि नग्न अवस्था में घुटनों के बल बैठी थी, और कंचन उसे पीछे से टटोल रही थी। आर्यन, जिसकी आँखें अभी-अभी खुली थीं, हक्का-बक्का रह गया। उसने देखा कि उसकी माँ अंजलि और उसकी मासी कंचन अब एक-दूसरे के आमने-सामने थीं, और वह खुद उन दोनों के बीच एक प्यादे की तरह फंसा हुआ था।

अंजलि का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसने सोचा था कि वह चोरी-छिपे आर्यन का मज़ा ले लेगी, लेकिन अब कंचन ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था—और वह भी उसकी अपनी नग्न गाँड को सहलाते हुए।

कंचन धीरे से बिस्तर पर उठी और अपनी मैक्सी के बटन खोलने लगी। "दवा ने अपना काम कर दिया है जीजी... दर्द अब मरहम बन गया है। अब बताओ, तुम आर्यन का मज़ा लोगी या मैं तुम्हारी इस गोरी गाँड का हिसाब लूँ?"

अंजलि ने एक गहरी सांस ली। उसका डर अब एक नई तरह की उत्तेजना में बदल गया। उसने देखा कि कंचन की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि शामिल होने की तड़प थी। अंजलि ने अपनी पीठ और चौड़ी की और शरारत से बोली, "अगर जाग ही गई है, तो फिर देर किस बात की?"
 
शहर के एक पॉश इलाके में एक छोटा लेकिन बहुत ही सलीके से सजा हुआ प्राइवेट क्लिनिक है। बाहर बोर्ड पर लिखा है— "डॉ. अंजलि, एम.डी. (General Physician)"।

अंजलि की उम्र 42 साल है, लेकिन उसे देखकर कोई कह नहीं सकता। योग और अनुशासन ने उसके शरीर को एक तराशा हुआ रूप दिया है। उसकी त्वचा अभी भी मखमली है, और जब वह सफेद एप्रन पहनती है, तो उसकी शख्सियत में एक अजीब सा आकर्षण और अधिकार (Authority) झलकता है। वह एक डॉक्टर होने के साथ-साथ एक माँ भी है, जो अपने घर और करियर को अकेले संभाल रही है।

उसका पति, जो विदेश में एक बड़ा कॉन्ट्रैक्टर है, साल में मुश्किल से एक या दो बार ही घर आता है। पैसों की कोई कमी नहीं है, लेकिन अंजलि के बिस्तर में पिछले कई सालों से एक ठंडी खामोशी पसरी हुई है। एक जवान और खूबसूरत औरत के शरीर की ज़रूरतें अक्सर उसके डॉक्टर वाले एप्रन के नीचे दबी रह जाती हैं।

उसका बेटा, आर्यन, अब 19 साल का हो चुका है। वह कॉलेज में है और दिखने में बिल्कुल अपने पिता जैसा गठीला और लंबा है। आर्यन अक्सर अपनी माँ के क्लिनिक पर हाथ बटाने या बस वक्त बिताने चला आता है।

दोपहर के दो बज रहे हैं। क्लिनिक में आखिरी मरीज जा चुका है। बाहर धूप तेज़ है और क्लिनिक के अंदर एसी की ठंडी हवा एक अजीब सा सुकून दे रही है। अंजलि अपनी केबिन में बैठी कुछ फाइल्स देख रही है। सफेद शर्ट के ऊपर डॉक्टर का कोट है, और उसने अपने बालों को एक जूड़े में बांध रखा है जिससे उसकी लंबी और गोरी गर्दन साफ चमक रही है।

तभी केबिन का दरवाज़ा धीरे से खुलता है और आर्यन अंदर कदम रखता है। क्लिनिक अब पूरी तरह खाली है, सिर्फ माँ और बेटा इस ठंडे और शांत माहौल में अकेले हैं।

आर्यन केबिन के अंदर आता है और अपनी माँ के सामने वाली कुर्सी पर आराम से धंस जाता है। अंजलि अपनी फाइलें एक तरफ रखती है और चश्मा उतारकर अपनी मेज पर रख देती है। उसकी आँखों में थकावट तो है, लेकिन बेटे को देखकर एक सुकून भरी चमक आ जाती है।

"बड़ी देर कर दी आज? कॉलेज में कोई एक्स्ट्रा क्लास थी या फिर दोस्तों के साथ कहीं निकल गया था?" अंजलि ने अपनी कुर्सी के पीछे टेक लगाते हुए पूछा।

आर्यन मुस्कुराया, "नहीं माँ, बस वो प्रोजेक्ट सबमिट करना था। और वैसे भी, बाहर इतनी गर्मी है कि कहीं जाने का मन ही नहीं हुआ। सोचा आपके साथ ही घर चलूँगा।"

अंजलि ने घंटी बजाकर अपने अटेंडेंट को दो कप चाय लाने का इशारा किया। अगले कुछ मिनटों तक उनके बीच कॉलेज के प्रोफेसरों, असाइनमेंट के बोझ और आर्यन के दोस्तों की शरारतों पर बातें होती रहीं। अंजलि एक माँ की तरह उसकी बातें सुन रही थी, बीच-बीच में उसे टोकती और कभी-कभी उसकी किसी बात पर खिलखिलाकर हँस पड़ती।

बातों-बातों में ज़िक्र विदेश में बैठे आर्यन के पिता का चल पड़ा।

"आज पापा का फोन आया था सुबह," अंजलि ने चाय का कप उठाते हुए कहा। "कह रहे थे कि इस बार कॉन्ट्रैक्ट कुछ ज़्यादा ही बड़ा मिल गया है। शायद दिवाली पर भी उनका आना मुश्किल हो।"

आर्यन के चेहरे पर थोड़ी मायूसी आई। "पापा हमेशा काम में ही उलझे रहते हैं। आपको नहीं लगता माँ कि उन्हें अब वापस आ जाना चाहिए? आखिर कब तक हम ऐसे अलग-अलग रहेंगे? आपको उनकी कमी महसूस नहीं होती?"

अंजलि चाय की चुस्की लेते हुए कुछ पल के लिए खामोश हो गई। उसकी नज़रें खिड़की से बाहर की धूप पर टिकी थीं। "बेटा, ज़िम्मेदारियाँ इंसान को बहुत दूर ले जाती हैं। कमी तो खलती है, पर अब आदत सी हो गई है। खैर, तू बता... शाम के खाने में क्या बनवाना है? आज तेरा मनपसंद मलाई कोफ्ता बनवाऊँ?"

आर्यन अपनी माँ के चेहरे को गौर से देख रहा था। उसे महसूस हुआ कि माँ की इस सादगी और मुस्कुराहट के पीछे एक अकेलापन है जिसे वो कभी ज़ाहिर नहीं होने देतीं। वे दोनों काफी देर तक खाने के मेनू, घर की साफ-सफाई और आने वाले संडे के प्लान्स पर चर्चा करते रहे।

पूरे क्लिनिक में सिर्फ उन दोनों की आवाज़ें गूँज रही थीं। कोई हड़बड़ी नहीं थी, बस एक लंबा और गहरा संवाद था जो माँ-बेटे के बीच के उस मज़बूत धागे को दिखा रहा था,

केबिन की खिड़की से बाहर का आसमान अब गहरा नारंगी होने लगा था। दिन भर की तपिश अब हल्की ठंडी हवा में बदल रही थी। अंजलि ने अपनी मेज पर रखी आखिरी फाइल बंद की और उसे दराज में रख दिया। उसने अपनी कलाई घड़ी देखी—साढ़े छह बज चुके थे।

"चलो आर्यन, अब निकलना चाहिए। आज वैसे भी क्लिनिक में काफी देर हो गई," अंजलि ने उठते हुए कहा। उसने अपना सफेद डॉक्टर वाला एप्रन उतारा और उसे पीछे टंगे हैंगर पर बड़े करीने से टांग दिया। एप्रन हटने के बाद उसकी नीली रेशमी कुर्ती और सफेद ट्राउज़र उसके व्यक्तित्व को एक अलग ही कोमलता दे रहे थे।

आर्यन भी कुर्सी से उठा और अपना बैग कंधे पर लटका लिया। "हाँ माँ, चलिए। मुझे भी भूख लगने लगी है।"

अंजलि ने अपना हैंडबैग उठाया और एक बार कमरे का मुआयना किया कि कहीं कोई लाइट या एसी खुला तो नहीं रह गया। वह अपनी चीज़ों को लेकर हमेशा बहुत अनुशासित रहती थी। जब वे केबिन से बाहर निकले, तो गलियारे में हल्की छाया थी। अटेंडेंट पहले ही जा चुका था, इसलिए पूरा क्लिनिक अब सिर्फ उन दोनों के कदमों की आवाज़ से गूँज रहा था।

"आज तुम ड्राइव करोगे या मैं करूँ?" अंजलि ने क्लिनिक के मुख्य दरवाजे का ताला लगाते हुए पूछा। चाबियों का गुच्छा उसके हाथ में खनका, जिसकी आवाज़ उस शांत शाम में साफ सुनाई दी।

"मैं ही करूँगा माँ, आप थक गई होंगी दिन भर पेशेंट्स देख-देख कर," आर्यन ने चाबियाँ अपनी ओर बढ़ाने का इशारा किया। अंजलि ने मुस्कुराते हुए चाबियाँ उसे थमा दीं।

वे दोनों सीढ़ियों से नीचे उतरकर पार्किंग की ओर बढ़े। पार्किंग लॉट में अब सिर्फ अंजलि की सफेद सेडान खड़ी थी। शाम की हल्की रोशनी कार के कांच पर चमक रही थी। आसपास के पेड़ों से पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ें आ रही थीं।

गाड़ी के पास पहुँचकर आर्यन ने रिमोट से लॉक खोला। बीप-बीप की आवाज़ हुई। अंजलि पैसेंजर सीट की तरफ गई और अपना बैग पीछे वाली सीट पर रखा। गाड़ी के अंदर बैठने से पहले उसने एक बार गहरी सांस ली और ढलते सूरज को देखा।

"आज की शाम कितनी शांत है न, आर्यन?" उसने धीरे से कहा।

आर्यन ने ड्राइवर सीट पर बैठते हुए जवाब दिया, "हाँ माँ, बहुत। बस अब जल्दी घर पहुँचकर हाथ-मुँह धोकर चाय पीते हैं।"

अंजलि कार में बैठी और दरवाजा बंद किया। वह भारी दरवाजा बंद होने की आवाज़ उस खामोश पार्किंग में एक अंत की तरह गूँजी—जैसे आज का कामकाजी दिन खत्म हो गया हो। आर्यन ने इंजन स्टार्ट किया, हेडलाइट्स जलाईं और गाड़ी धीरे-धीरे क्लिनिक के गेट से बाहर निकलकर मुख्य सड़क की ओर बढ़ चली।

गाड़ी अब शहर की मुख्य सड़क पर थी, जहाँ शाम के ट्रैफिक की पीली लाइटें और शोर-शराबा शुरू हो गया था। केबिन के अंदर एक तरफ इंजन की दबी हुई आवाज़ थी और दूसरी तरफ एसी की हल्की सी सरसराहट। आर्यन का पूरा ध्यान सड़क पर था, और अंजलि बगल वाली सीट पर आराम से सिर टिकाए बाहर भागती रोशनी को देख रही थी।

"आर्यन..." अंजलि ने धीमे से चुप्पी तोड़ी, "मलाई कोफ्ता का तो तूने दोपहर में कहा था, पर मुझे लग रहा है कि साथ में कुछ ताज़ा सब्जियाँ भी होनी चाहिए। फ्रिज में तो बस वही दो-चार सूखी हुई भिंडियाँ पड़ी हैं।"

आर्यन ने गियर बदलते हुए हल्का सा सिर हिलाया, "माँ, आप जैसा कहो। वैसे भी बाहर का खाना खा-खा कर मैं बोर हो गया हूँ। आपके हाथ का बना सादा खाना ही बेस्ट होता है।"

अंजलि मुस्कुराई, "चापलूसी करना तो कोई तुझसे सीखे। अच्छा सुन, यहाँ से जो अगला मोड़ है, वहाँ से गाड़ी मार्केट की तरफ घुमा ले। पास ही में वो जो नया 'मार्ट' खुला है ना, वहीं चलते हैं। वहां सब्जियाँ एकदम फ्रेश मिल जाती हैं और थोड़ा घर का दूसरा राशन भी देखना है।"

आर्यन ने इंडिकेटर दिया और गाड़ी को मार्केट वाली लेन में डाल दिया। शाम का वक्त था, इसलिए बाज़ार में काफी चहल-पहल थी। लोग अपने थैले लिए इधर-उधर घूम रहे थे।

"माँ, आपको नहीं लगता कि आप दिन भर क्लिनिक में थकने के बाद ये सब काम खुद करके अपनी थकावट बढ़ा लेती हो?" आर्यन ने चिंता जताते हुए कहा, "आप मुझे लिस्ट दे दिया करो, मैं कॉलेज से आते वक्त ले आया करूँगा।"

अंजलि ने प्यार से आर्यन की तरफ देखा, "अरे बुद्धू, ये गृहस्थी के काम थकावट नहीं, बल्कि मन को सुकून देते हैं। दिन भर मरीज़ों की बीमारी और उनकी परेशानियों को सुनने के बाद, शाम को ताज़ा टमाटर और पालक चुनना मेरे लिए एक तरह की थेरेपी जैसा है। और फिर, तेरे साथ इसी बहाने थोड़ी और बातें भी तो हो जाती हैं।"

गाड़ी अब मार्ट की पार्किंग में पहुँच चुकी थी। आर्यन ने एक खाली जगह देखकर गाड़ी वहां सलीके से खड़ी कर दी। इंजन बंद होते ही एक पल के लिए केबिन में गहरा सन्नाटा छा गया।

"अच्छा चल, तू यहीं गाड़ी में बैठना चाहेगा या अंदर चलेगा मेरे साथ?" अंजलि ने अपना पर्स संभालते हुए पूछा।

आर्यन ने मुस्कुराकर दरवाजा खोला, "अकेले आपको इतने सारे थैले थोड़े ही उठाने दूँगा। चलिए, आज आपकी पसंद की सब्जियाँ मैं उठवाता हूँ।"

अंजलि अपनी सीट से उतरी और गाड़ी का दरवाज़ा बंद करते हुए बोली, "ठीक है, फिर जल्दी चल। वरना अच्छी सब्जियाँ तो लोग छाँट कर ले जाएँगे, हमारे हिस्से में बस डंठल ही बचेंगे।"

शाम की हल्की ढलती रोशनी में माँ-बेटा उस जगमगाते हुए मार्ट की ओर बढ़ गए। क्लिनिक की थकान अब धीरे-धीरे एक आम घरेलू शाम की व्यस्तता में बदल रही थी।

मार्ट के अंदर दाखिल होते ही ठंडी हवा और हल्की रोशनी ने उनका स्वागत किया। आर्यन ने बाहर से ही एक ट्रॉली खींच ली और अपनी माँ के पीछे-पीहार हो लिया। शाम का वक्त था, इसलिए मार्ट में काफी चहल-पहल थी, लेकिन अंजलि को इन सब की आदत थी। वह बहुत ही सलीके से गलियारों के बीच से रास्ता बनाते हुए सीधे 'प्रोड्यूस सेक्शन' (सब्जी विभाग) की ओर बढ़ी।

"आर्यन, तू वो बास्केट देख, और मैं जरा टमाटर चेक करती हूँ," अंजलि ने कहा। वह एक-एक टमाटर को हाथ में उठाकर बड़े गौर से देख रही थी। एक डॉक्टर होने के नाते, साफ-सफाई और क्वालिटी को लेकर वह बहुत ज्यादा चूजी थी।

आर्यन ट्रॉली पकड़े खड़ा अपनी माँ को देख रहा था। अंजलि ने बड़े ध्यान से लाल और कड़क टमाटर छाँटकर एक थैली में डाले, फिर वह खीरे और ताजी हरी मिर्च की तरफ मुड़ गई। "देख, ये खीरे बिल्कुल ताजे हैं। सलाद के लिए अच्छे रहेंगे," उसने एक खीरा आर्यन की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

आर्यन ने मुस्कुराकर उसे ट्रॉली में रख दिया। "माँ, आप तो जैसे लैब में रिसर्च कर रही हों, वैसे सब्जियाँ चुनती हो।"

अंजलि खिलखिलाकर हँस पड़ी, "बेटा, अच्छी सेहत अच्छी रसोई से ही शुरू होती है। अगर सामान ही बासी होगा, तो खाने में वो स्वाद कहाँ आएगा?"

वे धीरे-धीरे आगे बढ़े। अंजलि ने कुछ ताजी पालक की गड्डियां उठाईं और फिर अदरक-लहसुन के सेक्शन की ओर चली गई। आर्यन बीच-बीच में अपनी पसंद की कुछ चीजें, जैसे डार्क चॉकलेट का एक पैकेट और कुछ नट्स, चुपके से ट्रॉली में डाल देता, जिस पर अंजलि उसे तिरछी नज़र से देखकर मुस्कुरा देती।

"और कुछ रह गया माँ?" आर्यन ने पूछा जब वे राशन वाले गलियारे (Aisle) में पहुँचे।

"हाँ, थोड़ा आटा लेना है और शायद चायपत्ती खत्म होने वाली है," अंजलि ने जवाब दिया। उन्होंने अगले पंद्रह-बीस मिनट बड़े ही इत्मीनान से घर की छोटी-मोटी जरूरतों का सामान इकट्ठा करने में बिताए। उनके बीच दालों के भाव, साबुन की खुशबू और घर के स्टॉक को लेकर काफी लंबी बातें हुईं। अंजलि को अच्छा लग रहा था कि उसका बेटा इन सब छोटे कामों में इतनी दिलचस्पी ले रहा है।

बिलिंग काउंटर पर काफी भीड़ थी, इसलिए उन्हें करीब दस मिनट इंतज़ार करना पड़ा। अंजलि ने अपना कार्ड निकाला, लेकिन आर्यन ने पहले ही अपना फोन निकाल लिया था। "माँ, आज ये मेरी तरफ से। पापा ने पिछले हफ्ते जो पैसे भेजे थे, वो अभी वैसे ही रखे हैं।"

अंजलि ने पहले तो मना करना चाहा, पर बेटे के चेहरे पर गर्व देखकर वह मान गई। "ठीक है, बड़े साहब। आज आपकी कमाई से ही घर चलेगा।"

सामान पैक होने के बाद, आर्यन ने दोनों भारी थैले अपने हाथों में उठा लिए। वे मार्ट के ऑटोमैटिक दरवाजों से बाहर निकले, जहाँ अब रात की ठंडक और स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी फैल चुकी थी। पार्किंग तक का रास्ता छोटा था, लेकिन आर्यन बड़े ध्यान से अपनी माँ के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा था ताकि उसे कोई धक्का न लगे।

गाड़ी के पास पहुँचकर आर्यन ने डिक्की (Boot) खोली और सामान को सलीके से अंदर रखा। अंजलि ने राहत की सांस ली और अपनी सीट की तरफ बढ़ी। "चलो, अब जल्दी घर चलते हैं। काम काफी हो गया आज," उसने सीट बेल्ट लगाते हुए कहा।

आर्यन ने भी गाड़ी स्टार्ट की। मार्ट की भीड़ को पीछे छोड़ते हुए, उनकी सफेद सेडान अब रात के सन्नाटे में घर की ओर बढ़ने लगी।

गाड़ी मार्ट की पार्किंग से निकलकर मुख्य सड़क की ढलती हुई रोशनी में शामिल हो चुकी थी। रात का वक्त था और शहर की स्ट्रीट लाइट्स कार के डैशबोर्ड पर बारी-बारी से परछाइयां बना रही थीं। केबिन के अंदर एक बहुत ही आरामदायक और घरेलू सा माहौल था।

अंजलि ने सीट से थोड़ा पीछे झुककर अपनी आँखें मूंद लीं। दिन भर की थकान अब धीरे-धीरे शरीर पर भारी पड़ रही थी। आर्यन ने देखा कि माँ थोड़ी शांत हैं, तो उसने रेडियो की आवाज़ थोड़ी और कम कर दी।

"आज काफी सामान हो गया, है ना माँ?" आर्यन ने ट्रैफिक पर नज़र रखते हुए चुप्पी तोड़ी।

अंजलि ने आँखें खोलीं और उसकी तरफ देखकर मुस्कुराई। "हाँ, और शुक्र है कि तुम साथ थे। वरना अकेले इतने भारी थैले उठाना और फिर गाड़ी चलाना... काफी मुश्किल हो जाता। सच कहूँ तो, अब मुझे महसूस होता है कि तुम वाकई बड़े हो गए हो।"

आर्यन थोड़ा शरमा गया। "बड़ा तो होना ही था माँ। आखिर कब तक आप सब कुछ अकेले संभालती रहेंगी? वैसे भी, पापा के बिना ये घर और क्लिनिक संभालना कोई छोटी बात नहीं है। मैं तो बस आपकी थोड़ी सी मदद कर देता हूँ।"

अंजलि कुछ पल के लिए खामोश रही, फिर उसने खिड़की के बाहर भागते हुए पेड़ों और दुकानों को देखते हुए कहा, "तुम्हारे पापा भी बहुत मेहनत कर रहे हैं वहां। कल फोन पर कह रहे थे कि वहां का प्रोजेक्ट अब अंतिम चरण में है। उन्हें अपनी मेहनत का फल मिल रहा है, लेकिन मुझे कभी-कभी लगता है कि इस चक्कर में उन्होंने घर का बहुत सारा समय खो दिया है। तुम्हारी पूरी किशोरावस्था (Teenage) उन्होंने वीडियो कॉल पर ही देख ली।"

आर्यन ने गियर बदलते हुए जवाब दिया, "मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है माँ। मुझे पता है वो हमारे भविष्य के लिए ही वहां हैं। लेकिन हाँ, आपकी कमी को वो कभी पूरा नहीं कर पाए। घर में जो आपकी अहमियत है, वो किसी और की नहीं हो सकती।"

अंजलि ने प्यार से आर्यन के हाथ पर अपना हाथ रखा। "और मेरी हिम्मत तुम हो, आर्यन। जब तुम कॉलेज से लौटकर क्लिनिक आ जाते हो, तो मेरी आधी थकान तो वहीं मिट जाती है। अच्छा ये बताओ, अगले हफ्ते तुम्हारे कुछ एग्जाम्स भी तो थे ना? उनकी तैयारी कैसी चल रही है?"

बातों का सिलसिला अब आर्यन की पढ़ाई, उसके कॉलेज के नए दोस्तों और आने वाले सेमेस्टर की चुनौतियों की ओर मुड़ गया। अंजलि एक अनुभवी गाइड की तरह उसे सलाह दे रही थी—कभी करियर को लेकर, तो कभी जीवन के अनुशासन को लेकर।

"माँ, आप कभी-कभी बिल्कुल अपनी प्रोफेसर वाली टोन में आ जाती हैं," आर्यन ने हँसते हुए कहा।

"क्या करूँ? डॉक्टर होने के साथ-साथ एक माँ भी तो हूँ। और एक माँ का काम कभी खत्म नहीं होता," अंजलि ने चुटकी लेते हुए जवाब दिया।

वे इसी तरह छोटी-छोटी बातों में उलझे रहे—कभी खाने के मसालों पर चर्चा, तो कभी पुरानी यादों का ज़िक्र। गाड़ी अब उनकी कॉलोनी के गेट के अंदर दाखिल हो चुकी थी। सड़कों पर अब सन्नाटा था और सिर्फ उनके घर की खिड़कियों से आती मद्धम रोशनी दिखाई दे रही थी।

गाड़ी धीरे-धीरे उनके घर के पोर्टिको में आकर रुकी। इंजन बंद होते ही एक अजीब सी शांति छा गई, जिसमें सिर्फ उन दोनों की साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
बढ़िया शुरुआत..............
 
सुबह की उस कच्ची धूप में कमरे का माहौल अब किसी 'पवित्र' रिश्ते का नहीं, बल्कि एक भूखी मादा और उसके वर्चस्वशाली नर के बीच के आदिम खेल का अखाड़ा बन चुका था। आर्यन बिस्तर पर शान से लेटा हुआ था, उसका ७ इंच का फौलाद उसकी जांघों के बीच एक खंभे की तरह तना हुआ था, जिस पर अंजलि की योनि का रस और पसीना चमक रहा था।

आर्यन ने अपनी ठंडी और हुक्म भरी आवाज़ में कहा, "बहुत तड़प रही है ना माँ? तो अब एक काम कर... नीचे झुक और अपने इस जवान बेटे के लंड को अपने मुँह में भर ले। और हाँ, अपनी उस गीली गुफा का स्वाद खुद चख, जो अभी-अभी इस पर लगा है। आज देखूँ तो सही, तू मेरी कितनी वफादार रांड है!"

आर्यन के मुँह से ये शब्द निकलते ही अंजलि के दिमाग का आखिरी बचा हुआ 'सभ्यता' का तार भी टूट गया। वह किसी जंगली बिल्ली की तरह झपटकर आर्यन के पैरों के बीच पहुँच गई।

एक औरत जब कामुकता के उस चरम बिंदु पर पहुँचकर अधूरी छोड़ दी जाती है, तो उसके लिए दुनिया का कोई रिश्ता, कोई संस्कार और कोई शर्म मायने नहीं रखती। अंजलि की इस वक्त की मानसिकता एक 'नशेड़ी' जैसी थी, जिसे अपनी अगली खुराक के लिए कुछ भी करना मंज़ूर था। उसने बिना एक पल सोचे आर्यन के उस ७ इंच के मूसल को अपने दोनों हाथों में भरा और उसे पागलों की तरह चूमने लगी।

जब उसने उस अंग को मुँह में लिया, तो उसे अपनी ही योनि की तीखी और कामुक गंध महसूस हुई। एक आम औरत के लिए यह घिनौना हो सकता है, लेकिन हवस के इस स्तर पर अंजलि को इसमें एक रूहानी सुख मिल रहा था। वह उसे ऐसे चाट रही थी जैसे दुनिया की सबसे कीमती मिठाई हो। उसकी आँखें बंद थीं और वह पूरी तरह से आर्यन की 'गुलाम' बन चुकी थी।

इस अवस्था में एक औरत का दिमाग पूरी तरह से खुल जाता है। वह वो बातें भी कह जाती है जो उसने कभी खुद से भी नहीं कही होतीं। अंजलि ने चूसते-चूसते रुककर आर्यन की आँखों में देखा और हांफते हुए फुसफुसाया, "आर्यन... तूने मुझे पागल कर दिया है। जानते हो? मैं मंदिर में बैठकर भी इसी ७ इंच के बारे में सोचती थी। कि काश... काश ये तेरा फौलाद मेरे अंदर हो और तू मुझे ऐसे ही गालियां दे।"

"मुझे अब फर्क नहीं पड़ता कि तू मेरा बेटा है। तू मेरा मालिक है... मेरा खुदा है। तू अगर अभी कहेगा कि मैं नग्न होकर बालकनी में खड़ी हो जाऊँ, तो मैं वो भी करूँगी। बस मुझे वो सुख दे दे... मुझे अधूरा मत छोड़!"

अंजलि अब आर्यन के लंड को अपने हलक तक उतारने की कोशिश कर रही थी। उसकी सिसकारियां और उसके मुँह से निकलने वाली 'गप-गप' की आवाज़ें साफ़ बता रही थीं कि वह अब किसी भी हद को पार कर चुकी है। एक माँ की ममता अब पूरी तरह से एक प्रेमिका की वहशी हवस में तब्दील हो चुकी थी। वह आर्यन के अंडकोशों को सहला रही थी और उसकी आँखों में वह 'जानवर' साफ़ दिख रहा था जो सिर्फ और सिर्फ अपने नर को तृप्त करना चाहता था।

"चूस इसे और गहराई से माँ... आज तुझे अपनी इस औकात से प्यार हो जाएगा," आर्यन ने उसके बालों को मुट्ठी में भींचते हुए कहा।

सुबह की उस सुनहरी रोशनी में आर्यन ने एक पल के लिए भी अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी। जैसे ही अंजलि ने उसके लंड को चूसना शुरू किया और अपनी वफादारी का सबूत दिया, आर्यन ने एक क्रूर झटके के साथ उसे अपने से दूर धक्का दिया। अंजलि अभी उस स्वाद में खोई ही थी कि वह वापस बिस्तर पर औंधे मुँह पेट के बल जा गिरी।

अंजलि अभी संभल भी नहीं पाई थी कि आर्यन एक भूखे भेड़िये की तरह दोबारा उसके ऊपर चढ़ गया। उसने अंजलि के कूल्हों को दोनों हाथों से जकड़ा और उन्हें ऊपर की ओर उठा दिया।

आर्यन ने बिना किसी भूमिका के, अपने थूक और अंजलि के रस से सने हुए उस ७ इंच के कड़क फौलाद को एक ही झटके में दोबारा अंजलि की गुफा में उतार दिया। वह प्रवेश इतना चिकना और गहरा था कि अंजलि की रूह तक कांप गई। "आह्ह्ह्ह्ह... आर्यन! हाँ... यही... यही चाहिए था मुझे!" अंजलि के मुँह से निकली वह चीख अब दर्द की नहीं, बल्कि असीम आनंद की थी।

अंजलि का शरीर जो पिछले ५ मिनट से अधूरेपन की आग में जल रहा था, उसे जैसे ही वह गर्म लोहा दोबारा अपनी गहराई में महसूस हुआ, उसकी हर नस में बिजली दौड़ गई। आर्यन ने अब अपनी रफ्तार को किसी बेकाबू इंजन की तरह तेज़ कर दिया। 'चप-चप-चप' की आवाज़ अब और भी तेज़ हो गई थी, और अंजलि की भारी गांड़ आर्यन की जांघों से टकराकर लाल होने लगी थी।

आर्यन ने अपनी पकड़ और भी मज़बूत कर ली और अंजलि के बालों को पीछे से खींचकर उसकी गर्दन को फिर से चूमना और काटना शुरू किया। "बता माँ... अब कैसा लग रहा है? मिल गया अपने बेटे का ये ७ इंच का जवाब?" अंजलि का दिमाग अब सुन्न हो चुका था। उसे महसूस हो रहा था कि वह हवा में तैर रही है। हर धक्का उसे स्वर्ग और नरक के बीच का सफर करा रहा था।

आर्यन अब रुकने वाला नहीं था। उसने अपनी कमर को पागलों की तरह चलाना शुरू किया। वह ७ इंच का अंग अंजलि की कोख को बार-बार चोट पहुँचा रहा था, जिससे अंजलि की योनि की दीवारें ज़ोर-ज़ोर से फड़कने लगीं। वह अब पूरी तरह से 'डिस्चार्ज' होने की कगार पर थी। उसकी आँखें पलट चुकी थीं और वह बस एक ही बात रट रही थी, "और ज़ोर से... और ज़ोर से आर्यन... मार डाल अपनी इस रांड को... आज मुझे पूरी तरह भर दे!"

अंजलि का पूरा बदन पसीने से नहा चुका था। आर्यन के हर धक्के के साथ अंजलि की सिसकारी एक लंबी आह में बदल रही थी। उसे लग रहा था कि आज की सुबह उसकी ज़िंदगी की सबसे कामुक और सबसे 'पूर्ण' सुबह है। वह ७ इंच का शैतान अब अपनी मंज़िल के बेहद करीब था।

"तैयार हो जा माँ... अब वो सैलाब आने वाला है जो तुझे पूरी तरह भिगो देगा!" आर्यन ने दहाड़ते हुए अपनी आखिरी और सबसे भीषण पारी शुरू कर दी।

सुबह की उस मदहोश रोशनी में आर्यन अब केवल एक प्रेमी या बेटा नहीं रह गया था, वह एक क्रूर मनोवैज्ञानिक शिकारी बन चुका था। अंजलि चरम सुख के उस बिंदु पर थी जहाँ उसका शरीर फटने को तैयार था, उसकी चूत की दीवारें पागलों की तरह आर्यन के ७ इंच के फौलाद को जकड़ रही थीं।

लेकिन तभी, आर्यन ने अपना सबसे घातक दांव चला।

आर्यन ने अचानक अपनी कमर की गति रोकी। उसने अंजलि के दोनों हाथों को बिस्तर के सिरहाने पर लोहे की जंजीर की तरह जकड़ लिया और अपनी मज़बूत जांघों से अंजलि की टांगों को पूरी तरह 'लॉक' कर दिया। अंजलि हिल भी नहीं सकती थी। और फिर, एक झटके में उसने अपना ७ इंच का नंगा और तपता हुआ लंड अंजलि की गहराई से बाहर खींच लिया।

वह अचानक आया 'खालीपन' अंजलि के लिए किसी शारीरिक घाव से भी गहरा था। उसकी चूत की नसें अब भी हवा में फड़क रही थीं, जो उस ७ इंच के दबाव के लिए रो रही थीं। "आ... आर्यन... फिर से? क्यों? डाल ना... प्लीज... मैं मर रही हूँ!" अंजलि की आवाज़ में एक अजीब सी दरिंदगी और बेबसी थी।

आर्यन ने अपना चेहरा अंजलि के कान के पास सटाया। उसकी गर्म सांसें अंजलि की गर्दन को जला रही थीं। उसने भारी और कड़क आवाज़ में पूछा, "बता... आज सच उगल दे! पापा के अलावा और किस-किस के सामने नंगी हुई है तू? किस-किस मर्द ने तेरे इन दूधिया जिस्म को अपनी उंगलियों से रौंदा है? बोल!"

अंजलि के दिमाग में धमाके होने लगे। एक तरफ उसके शरीर की वो आग थी जो उसे पागल कर रही थी, और दूसरी तरफ उसके अतीत के वो राज़ जिन्हें उसने अपनी रूह की सबसे निचली तह में दफन कर रखा था। वह समझ नहीं पा रही थी कि यह सच है या कोई बुरा सपना। उसका दिमाग सुन्न हो गया था।

अंजलि ने रोते हुए अपना सिर तकिए में दे मारा। "नहीं... आर्यन... प्लीज... ये मत पूछ! मैं... मैं ये नहीं बता सकती... मुझसे ये मत बुलवा! मुझे माफ़ कर दे... पर मुझे ये सुख दे दे... मैं तेरे पैर पड़ती हूँ!" अंजलि की सिसकारियां अब हिचकियों में बदल गई थीं। वह अपनी सच्चाई बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, पर उस ७ इंच के बिना उसका वजूद भी खत्म हो रहा था।

आर्यन ने अपनी पकड़ और भी मज़बूत कर ली। "अगर नहीं बताएगी, तो ये ७ इंच आज प्यासा ही बाहर रहेगा। बोल... कौन था वो? तेरे ऑफिस का कोई सहकर्मी? या पड़ोस का वो अंकल?"

अंजलि अब पूरी तरह टूट चुकी थी। उसकी कामुकता और उसकी लज्जा के बीच एक भीषण युद्ध चल रहा था। उसका शरीर पसीने से नहाया हुआ था और वह बिस्तर पर किसी तड़पती हुई मछली की तरह फड़फड़ा रही थी। उसे लग रहा था कि अगर उसने सच नहीं बोला, तो वह इस अधूरेपन की आग में भस्म हो जाएगी।

सुबह की उस कच्ची रोशनी में कमरा अब किसी मनोवैज्ञानिक युद्ध का मैदान बन चुका था। आर्यन ने अपनी चाल को और भी घातक बना दिया। उसने एक बार फिर अपना ७ इंच का दहकता हुआ फौलाद अंजलि की गहराई में उतारा, पर केवल एक इंच... और फिर झटके से बाहर खींच लिया।

यह 'टीजिंग' अंजलि के लिए किसी कोड़े की मार से भी बदतर थी।

जब एक औरत कामुकता के उस शिखर पर होती है जहाँ उसका शरीर पूरी तरह से सक्रिय हो, तो उसकी मानसिकता किसी आदिम 'मादा' जैसी हो जाती है। यहाँ 'मर्यादा', 'लोक-लाज' और 'रिश्ते' धुंधले पड़ जाते हैं।

इस अवस्था में एक औरत का दिमाग केवल एक ही चीज़ माँगता है—तृप्ति । जब उसे बार-बार उस सुख के मुहाने पर लाकर छोड़ दिया जाता है, तो उसके अंदर का 'ईगो' मर जाता है। वह अपनी गरिमा को पैरों तले कुचलने के लिए तैयार हो जाती है। अंजलि की हालत उस प्यासे जैसी थी जो रेगिस्तान में पानी की एक बूंद के लिए अपना ईमान बेचने को तैयार हो जाए।

आर्यन का वह बार-बार अंदर-बाहर करना अंजलि की नसों को पागल कर रहा था। उसकी योनि की दीवारें प्यास से फड़क रही थीं। उसके लिए अब 'सच' बोलना आसान था, लेकिन उस 'अधूरेपन' को सहना असंभव। एक औरत इस मोड़ पर अपनी सबसे गंदी सच्चाई भी उगल सकती है, क्योंकि उसका शरीर उसके विवेक पर हावी हो चुका होता है।

अंजलि का पसीना, उसकी कांपती जांघें और उसकी बेबस सिसकारियां गवाह थीं कि वह अब पूरी तरह से 'शिकार' बन चुकी है। उसे लग रहा था कि अगर आर्यन ने अभी उसे पूरा नहीं भरा, तो उसका दिल धड़कना बंद कर देगा।

अंजलि ने अपना चेहरा तकिए से उठाया। उसकी आँखें लाल थीं और वह बुरी तरह हांफ रही थी। आर्यन का हाथ अब भी उसकी गर्दन पर था और ७ इंच का मूसल उसकी जांघों के पास तांडव कर रहा था।

"बोल... कौन था वो?" आर्यन ने दहाड़ते हुए उसकी कमर पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ा।

अंजलि अब और नहीं सह सकी। वह टूट गई। उसने सिसकते हुए, आँखों से आँसू बहाते हुए चिल्लाकर कहा:

"मासी... तेरी मासी के सामने... मेरी छोटी बहन, कंचन के सामने!"

आर्यन के हाथ एक पल के लिए ठिठक गए। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी सगी मासी, जो दिखने में इतनी सीधी-सादी थी, इस 'गंदे खेल' का हिस्सा रही होगी।

अंजलि ने आगे बोलना शुरू किया, जैसे कोई बाँध टूट गया हो। "हाँ आर्यन! कंचन और मैं... हम दोनों साथ में नंगी होती थीं। हम दोनों ने एक ही मर्द के साथ... तेरे पापा के साथ वक्त बिताया है। हम बहनों के बीच कोई पर्दा नहीं रहा। उसने मुझे देखा है, मैंने उसे देखा है। हम दोनों की हवस की आग एक जैसी है।"

अंजलि ने रोते हुए आर्यन का हाथ अपने सीने पर रखा। "अब बोल दिया मैंने... सब बता दिया! अब मुझे मत तड़पा... डाल दे अपना ये ज़हर मेरे अंदर! फाड़ दे मुझे... पर मुझे ये सुख दे दे!"

आर्यन दंग रह गया। उसकी माँ और उसकी मासी के बीच का यह 'लेस्बियन' और 'शेयरिंग' वाला राज़ उसकी सोच से परे था। लेकिन इस सच ने अंजलि को और भी ज़्यादा 'कामुक' बना दिया था।

आर्यन के कानों में जब अपनी सगी मासी का नाम पड़ा, तो उसके दिमाग की नसें जैसे फटने को तैयार हो गईं। अपनी सगी माँ और मासी का एक साथ नग्न होना और एक ही मर्द के साथ बिस्तर साझा करना—यह एक ऐसा सच था जिसने आर्यन के अंदर के 'बेटे' को पूरी तरह खत्म कर दिया और एक दरिंदे को जन्म दे दिया।

उसकी उत्तेजना अब अपनी चरम सीमा को पार कर चुकी थी। ७ इंच का वह फौलाद अब किसी अंगारे की तरह दहक रहा था।

आर्यन ने अब कोई रहम नहीं दिखाया। उसने अंजलि के बालों को इतनी ज़ोर से पीछे खींचा कि अंजलि का चेहरा ऊपर की ओर तन गया और उसकी आँखें फटने लगीं।

आर्यन ने अपनी पूरी ताकत अपनी कमर में समेटी और एक ही खौफनाक झटके के साथ अपना पूरा ७ इंच का मूसल अंजलि की गहराई में जड़ तक उतार दिया। 'धपाक' की एक भारी आवाज़ आई और अंजलि की चीख उसके हलक में ही दब गई। यह प्रहार इतना गहरा था कि अंजलि को अपनी कोख में एक असहनीय और मीठा धमाका महसूस हुआ।

अब आर्यन एक मशीन बन चुका था। उसने 'चप-चप' की आवाज़ों को एक निरंतर संगीत में बदल दिया। वह अंजलि की कमर को दोनों हाथों से जकड़कर उसे अपनी ओर खींचता और फिर पूरे ज़ोर से अपना लोहा उसके अंदर दे मारता। अंजलि का गोरा बदन बिस्तर पर किसी चाबुक की तरह लहरा रहा था। "आह्ह्ह... आर्यन... हाँ... यही सज़ा दे मुझे... अपनी इस गंदी माँ को फाड़ दे!"

अंजलि के लिए यह सुख किसी 'वरदान' से कम नहीं था। उसने अपना सबसे गंदा राज़ उगल दिया था और बदले में उसे वो ७ इंच का फौलादी सुख मिल रहा था जिसकी वह प्यासी थी। उसे महसूस हो रहा था कि आर्यन उसे नहीं, बल्कि उसके उन 'पापों' को कुचल रहा है जो उसने अपनी बहन के साथ मिलकर किए थे।

अंजलि की चूत अब आग उगल रही थी। आर्यन की गालियां और उसके झटके अंजलि को होश और बेहोशी के बीच के उस धुंधलके में ले जा रहे थे जहाँ सिर्फ और सिर्फ 'हवस' का राज था। वह पागलों की तरह अपनी गर्दन हिला रही थी, उसके पसीने की बूंदें आर्यन के सीने पर गिर रही थीं।

आर्यन की सांसें अब भारी हो गई थीं। उसे महसूस हो रहा था कि उसकी मर्दानगी का बांध अब टूटने वाला है। उसने अंजलि के कूल्हों पर एक आखिरी और ज़ोरदार तमाचा जड़ा और अपनी जांघों को अंजलि की जांघों से पूरी तरह चिपका लिया।

"तो मासी भी ऐसी ही रांड है... तैयार रह माँ, अब तेरा ये सारा ज़हर मैं इसी ७ इंच से निकालूँगा!" आर्यन ने दहाड़ते हुए अपनी रफ्तार को नामुमकिन हद तक तेज़ कर दिया।

सुबह की वह पहली किरण अब कमरे की दीवारों पर अपनी गवाह छोड़ रही थी। कमरे में जिस्मों के टकराने की गूँज और भारी साँसों का शोर अपने चरम पर था। आर्यन एक जंगली दरिंदे की तरह अंजलि के ऊपर सवार था, और उसका ७ इंच का फौलाद अंजलि की कोमल गुफा के भीतर किसी गरम आरी की तरह धंस रहा था।

अंजलि अब अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। आर्यन की गालियां, मासी वाला वो खौफनाक सच और पीछे से पड़ते ७ इंच के वो बेदर्दी धक्के—इन सबने मिलकर अंजलि के अंदर एक ऐसा ज्वालामुखी फोड़ दिया जो पिछले कई बरसों से शांत था।

अचानक अंजलि का पूरा शरीर पत्थर की तरह सख्त हो गया। उसकी आँखों की पुतलियाँ ऊपर की ओर चढ़ गईं और उसके हाथ बिस्तर की चादर को फाड़ने की हद तक भिंच गए। उसकी चूत की नसें पागलों की तरह आर्यन के उस कड़क अंग को अंदर की ओर खींचने लगीं। "आह्ह्ह्ह्ह... आर्यन... मैं... मैं मर गई! उफ़्फ़... ये क्या... मेरा... मेरा सब निकल रहा है... आह्ह्ह!" अंजलि के मुँह से एक लंबी और तीखी चीख निकली जो किसी संगीत की तरह कमरे में गूँज उठी।

अंजलि का शरीर अब थर-थर कांप रहा था। उसकी जांघों के बीच से कामुक रस का एक सैलाब बह निकला, जिसने आर्यन के ७ इंच के फौलाद को और भी ज़्यादा चिकना बना दिया। वह लगातार सिसक रही थी, उसकी आवाज़ अब भारी और टूटी हुई थी। वह 'जड़' चुकी थी, उसका शरीर पसीने और उस मीठे दर्द से नहाया हुआ था जिसने उसे पूरी तरह खाली कर दिया था।

लेकिन जहाँ अंजलि ढेर हो चुकी थी, वहीं आर्यन अभी भी अपनी पूरी ताकत में था। उसका ७ इंच का मूसल अभी भी पत्थर की तरह सख्त और गर्म था। उसने अपनी रफ्तार ज़रा भी कम नहीं की। अंजलि के 'जड़ने' के बाद उसकी चूत जो और भी ज़्यादा संवेदनशील और गीली हो चुकी थी, आर्यन अब उसे और भी गहराई से कूटना शुरू कर चुका था।

अंजलि के लिए अब यह सब असहनीय होता जा रहा था। "आर्यन... बस कर... मेरा... मेरा दम निकल जाएगा... मैं अब और नहीं सह सकती!" वह अधमरी हालत में फुसफुसा रही थी, पर आर्यन के लिए यह सिर्फ शुरुआत थी। वह अपनी माँ की उस थकी हुई और तृप्त देह को और भी बेरहमी से मसल रहा था, जैसे वह आज ही उसके अंदर का सारा 'ज़हर' निकाल देना चाहता हो।

आर्यन ने अंजलि के कांपते हुए कूल्हों को अपनी मज़बूत पकड़ में लिया और एक और ज़बरदस्त धक्का मारा। अंजलि की आँखें बंद थीं और वह बस एक बेजान गुड़िया की तरह उसके नीचे हिल रही थी। आर्यन की मर्दानगी अभी भी अपनी मंज़िल की तलाश में थी, और अंजलि का वो 'तोहफा' (सच) उसे और भी ज़्यादा उकसा रहा था।

"तू तो अभी ही ढेर हो गई माँ... अभी तो मुझे तेरा ये सारा गुमान तोड़ना है!" आर्यन ने दहाड़ते हुए अपनी कमर को और भी तेज़ी से चलाना शुरू कर दिया।

सुबह की उस सुनहरी रोशनी ने अब कमरे के हर कोने को रोशन कर दिया था, जहाँ मर्यादाओं की राख पर हवस का एक वीभत्स और नंगा साम्राज्य खड़ा था। अंजलि, जो कुछ देर पहले तक सिसक रही थी, अब पूरी तरह निढाल हो चुकी थी। उसके शरीर में जैसे अब उंगली हिलाने की भी शक्ति नहीं बची थी।

आर्यन ने महसूस किया कि अंजलि का शरीर अब किसी बेजान गुड़िया की तरह उसके धक्कों के साथ बस हिल रहा है। उसकी साँसें उखड़ी हुई थीं और उसकी आँखें छत की ओर जमी थीं, जैसे वह होश और बेहोशी के किसी बीच के लोक में पहुँच गई हो।

आर्यन ने एक आखिरी और गहरा धक्का मारा, जिससे अंजलि के हलक से एक धीमी सी 'आह' निकली, और फिर उसने झटके से अपना ७ इंच का नसों से भरा मूसल अंजलि की गहराई से बाहर खींच लिया। बाहर आते ही वह अंग हवा में अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन कर रहा था, जिस पर अंजलि के जिस्म का रस और पसीना चमक रहा था।

अंजलि अब पीठ के बल लेट गई थी। उसके गोरे हाथ बिस्तर पर फैले हुए थे और उसकी भारी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति और थकावट थी, जैसे वह इस 'युद्ध' में अपनी हार स्वीकार कर चुकी हो। उसकी टांगें अब भी अधखुली थीं, जो उस ७ इंच के आतंक की गवाह दे रही थीं।

आर्यन घुटनों के बल रेंगता हुआ अंजलि के सिर के पास आया। उसने अपनी मज़बूत उंगलियों से अपने उस तपते हुए अंग को थाम लिया। वह अपनी माँ के चेहरे को गौर से देख रहा था—वही चेहरा जिसे उसने बरसों से पूजनीय माना था, आज वह उसकी हवस की ज़मीन बन चुका था। आर्यन ने तेज़ी से अपने हाथ चलाना शुरू किया और जैसे ही उसके अंदर का लावा फटने को तैयार हुआ, उसने उसका मुँह सीधे अंजलि के सूखे और प्यासे होंठों पर टिका दिया।

आर्यन की मर्दानगी का वो गाढ़ा, सफ़ेद और गर्म सैलाब एक झटके के साथ अंजलि के मुँह के अंदर भर गया। वह गरम 'वीर्य' अंजलि के गले की गहराई तक पहुँच रहा था। अंजलि ने अपनी आँखें नहीं खोलीं, बल्कि एक आज्ञाकारी दासी की तरह अपने बेटे के उस अंतिम उपहार को स्वीकार किया। उसने एक-एक बूंद को अपनी ज़ुबान से समेटा और उसे गप-गप करके पूरा पी गई। उसके चेहरे और होंठों के कोनों पर सफ़ेद निशान रह गए थे, जो इस घिनौने लेकिन कामुक खेल की मुहर थे।

आर्यन ने अपनी माँ की उस अवस्था को देखा—उसके मुँह से बहती हुई उसकी अपनी मर्दानगी की बूंदें और उसकी बंद आँखें। उसे एक असीम संतुष्टि मिली। उसे लगा कि आज उसने अपनी माँ को न केवल शारीरिक रूप से जीता है, बल्कि उसके वजूद को अपनी मुट्ठी में कर लिया है।

वह चुपचाप अंजलि के बगल में ढह गया। दोनों के जिस्म पसीने से चिपके हुए थे। आर्यन ने अपना एक हाथ अंजलि के गले पर रखा और अंजलि ने अनजाने में ही उसके सीने से अपना सिर सटा लिया। बाहर सुबह का शोर शुरू हो चुका था, पर कमरे के अंदर दो रूहें इस घिनौने सुख की आगोश में गहरी नींद में सो गईं।
 
सूरज की किरणें अब खिड़की के पर्दों को चीरकर कमरे के अंदर तक फैल चुकी थीं। घड़ी की सुइयाँ 10 बजा रही थीं। घर के बाहर की चहल-पहल शुरू हो चुकी थी, लेकिन इस कमरे के अंदर वक्त जैसे थम सा गया था।

आर्यन और अंजलि, दोनों ही उस गहरी और थका देने वाली नींद से जागे, जो जिस्मानी और मानसिक युद्ध के बाद आती है। आर्यन का कॉलेज छूट चुका था और अंजलि ने अपनी क्लिनिक न जाने का मन बना लिया था। उसने कांपते हाथों से अपने असिस्टेंट को मैसेज कर दिया था कि उसकी 'तबीयत खराब' है—और एक तरह से यह सच भी था, क्योंकि उसका बदन और रूह दोनों ही बुरी तरह टूटे हुए थे।

बिस्तर पर बिखरी हुई चादरें और कमरे की हवा में फैली वो महक रात और सुबह के उस 'तांडव' की गवाह थीं। आर्यन ने आँखें खोलीं और अंजलि की ओर हाथ बढ़ाया, लेकिन अंजलि ने झटके से अपनी पीठ उसकी ओर कर ली।

अंजलि के चेहरे पर आज वो 'तृप्ति' नहीं थी जो अमूमन ऐसे पलों के बाद होती है। उसकी आँखों में एक अजीब सी चुभन और गुस्सा था। वह इस बात से बेहद आहत थी कि आर्यन ने उसके 'चरम सुख' की बेबसी का फायदा उठाकर उससे उसकी छोटी बहन (कंचन मासी) वाला वो काला सच उगलवा लिया था। उसे लग रहा था कि आर्यन ने उसकी रूह को नंगा कर दिया है।

अंजलि मन ही मन खुद को कोस रही थी कि उसने उस ७ इंच के दबाव में आकर अपने और अपनी बहन के उस राज़ को क्यों खोल दिया। "तूने अच्छा नहीं किया आर्यन..." अंजलि ने भारी और दबी हुई आवाज़ में कहा, उसकी पीठ अब भी आर्यन की तरफ थी। "तूने मुझे मजबूर किया। तू जानता था कि मैं उस वक्त होश में नहीं थी।"

आर्यन बिस्तर पर उठकर बैठ गया। उसके चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था, बल्कि एक विजयी मुस्कान थी। उसने अपनी माँ की नग्न और गोरी पीठ को गौर से देखा, जिस पर अब भी उसकी उंगलियों और दांतों के निशान थे। "माँ, सच कड़वा होता है, पर वो बाहर आ ही जाता है। अब मुझे पता है कि मेरी 'सीधी-सादी' मासी के अंदर भी वही आग है जो आपमें है।"

अंजलि ने चादर को अपने सीने तक खींच लिया। उसे अब आर्यन की नज़रों से डर लग रहा था। उसे अहसास हो गया था कि अब आर्यन उसे और उसकी बहन, दोनों को अपनी उंगलियों पर नचाएगा। "अब तू क्या चाहता है? क्या तू कंचन को भी इसी आग में झोंकेगा?" अंजलि की आवाज़ में डर और गुस्सा मिला हुआ था।

कमरे में सन्नाटा छा गया। अंजलि की नाराज़गी ज़ाहिर थी, लेकिन उसकी साँसें अब भी आर्यन की मौजूदगी से तेज़ हो रही थीं। वह नाराज़ थी, पर वह यह भी जानती थी कि अब वह इस 'लत' से कभी बाहर नहीं निकल पाएगी। आर्यन ने झुककर उसकी गर्दन पर एक छोटा सा चुंबन लिया, जिससे अंजलि का पूरा शरीर एक बार फिर सिहर उठा।

"नाराज़ मत हो माँ... अब तो खेल और भी दिलचस्प होगा," आर्यन ने फुसफुसाते हुए कहा।

सूरज की तेज़ धूप अब खिड़की के पर्दों से छनकर अंजलि के चेहरे पर पड़ रही थी, लेकिन उसके मन में छाया अंधेरा और कड़वाहट कम होने का नाम नहीं ले रही थी। आर्यन ने महसूस किया कि इस बार मामला सिर्फ जिस्मानी नहीं, बल्कि भावनाओं के गहरे घाव का है।

आर्यन धीरे से खिसककर अंजलि के करीब आया। उसने अपने मज़बूत हाथ अंजलि की नग्न और कोमल कमर पर रखे। अंजलि का शरीर आर्यन के स्पर्श से एक पल के लिए सिहरा, पर उसने तुरंत अपनी मांसपेशियों को सख्त कर लिया।

आर्यन ने अपना चेहरा अंजलि के कंधे के पास झुकाया और बहुत ही मद्धम, रेशमी आवाज़ में कहा, "माँ... अभी भी गुस्सा हो? मैंने जो कुछ भी पूछा या कहा, वो सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं आपको पूरी तरह जानना चाहता था। आपके और मेरे बीच अब कोई पर्दा नहीं रहना चाहिए। कंचन मासी वाली बात सुनकर मैं आपसे दूर नहीं हुआ, बल्कि मुझे लगा कि हम एक-दूसरे के और करीब आ गए हैं।"

आर्यन ने अंजलि को पीछे से अपनी बाहों के घेरे में लेने की कोशिश की। उसने चाहा कि अंजलि मुड़े और उसके सीने से लग जाए। उसने अंजलि की गर्दन के उस संवेदनशील हिस्से पर अपने होंठ टिका दिए जहाँ सुबह उसने गहरे निशान छोड़े थे। "चलो ना माँ, गुस्सा छोड़ो... देखो आज हम दोनों घर पर अकेले हैं। कॉलेज और क्लिनिक दोनों की छुट्टी है। आज का पूरा दिन सिर्फ आपका और मेरा है।"

लेकिन अंजलि इस बार पिघलने के मूड में नहीं थी। उसने आर्यन के हाथों को अपनी कमर से झटक दिया और बिस्तर पर थोड़ा और दूर खिसक गई। "नहीं आर्यन, बस बहुत हुआ! तूने आज वो सीमा पार की है जिसे मैं कभी खुद को माफ नहीं कर पा पाऊँगी। तूने मेरी बेबसी का फायदा उठाया। तूने मुझे उस हाल में मजबूर किया जब मैं 'ना' कहने की स्थिति में नहीं थी।"

अंजलि अब उठकर बैठ गई, उसने चादर को अपने जिस्म पर लपेटा और घुटनों में सिर देकर सुबकने लगी। "तूने मुझे अपनी 'रांड' बना दिया, मुझे गालियां दीं, और फिर मेरे परिवार के सबसे बड़े राज़ को छीन लिया। मुझे अब खुद से घिन आ रही है। जा यहाँ से... मुझे अकेला छोड़ दे।"

आर्यन शांत होकर उसे देखता रहा। उसने समझ लिया था कि अंजलि की नाराज़गी ऊपरी नहीं है; उसे इस बात का डर सता रहा है कि अब आर्यन के पास उसकी बहन कंचन का भी 'कंट्रोल' आ गया है। अंजलि का स्वाभिमान और उसकी ममता इस वक्त उसके अंदर की हवस से लड़ रहे थे।

आर्यन ने एक गहरी सांस ली। वह जानता था कि अंजलि को मनाना इतना आसान नहीं होगा, लेकिन वह यह भी जानता था कि अंजलि के जिस्म की आग अभी पूरी तरह बुझी नहीं है।

आर्यन समझ गया था कि इस वक्त ज़ोर-ज़बर्दस्ती या कामुक बातें आग में घी का काम करेंगी। अंजलि की रूह जख्मी थी और उसे मरहम की ज़रूरत थी, न कि और ज़्यादा हवस की। उसने एक गहरी सांस ली और बिना कुछ बोले बिस्तर से उठ गया। उसने अपना नेकर पहना और कमरे से बाहर निकल गया।

करीब आधे घंटे बाद, जब अंजलि अभी भी चादर में लिपटी अपनी किस्मत और शर्मिंदगी पर आँसू बहा रही थी, कमरे के दरवाज़े पर एक हल्की दस्तक हुई। आर्यन हाथ में एक ट्रे लिए अंदर आया।

ट्रे में गरमा-गरम कॉफी के दो मग, मक्खन में डूबे हुए टोस्ट और अंजलि के पसंदीदा कटे हुए फल थे। आर्यन ने कोई आवाज़ नहीं की। उसने चुपचाप ट्रे को साइड टेबल पर रखा और अंजलि के पैरों के पास बेड पर बैठ गया। वह अब एक 'वहशी प्रेमी' नहीं, बल्कि वही 'छोटा आर्यन' लग रहा था जो माँ की ज़रा सी तकलीफ पर बेचैन हो जाता था।

आर्यन ने धीरे से अंजलि के कांपते हुए पैर को सहलाया। इस बार उसकी छुअन में हवस नहीं, बल्कि एक अजीब सी शांति और माफी थी। "माँ... मैं जानता हूँ मैंने आज सुबह अपनी सीमाएं लांघीं। मेरा मकसद आपको नीचा दिखाना नहीं था, बस उस पागलपन में मैं भूल गया कि आप मेरी माँ भी हो। प्लीज, कुछ खा लो... सुबह से आपने सिर्फ आँसू पिए हैं।"

कॉफी की सोंधी महक और आर्यन के नरम शब्दों ने अंजलि के गुस्से की दीवार में एक दरार कर दी। उसने अपनी भीगी आँखों से आर्यन की ओर देखा। आर्यन की आँखों में इस वक्त वही मासूमियत थी जो बचपन में हुआ करती थी। अंजलि का ममतामयी दिल, जो कुछ देर पहले नफरत से भरा था, अब धीरे-धीरे पसीने लगा। एक माँ चाहे कितनी भी नाराज़ क्यों न हो, अपने बेटे की सेवा और उसकी झुकी हुई नज़रों के आगे हार ही जाती है।

अंजलि ने धीरे से हाथ बढ़ाकर कॉफी का मग उठा लिया। उसने एक छोटा सा घूँट भरा और अपनी नज़रें झुका लीं। "तू बहुत शातिर है आर्यन... पहले मुझे बर्बाद करता है और फिर ऐसे प्यार दिखाता है जैसे कुछ हुआ ही न हो।" उसकी आवाज़ अब सख्त नहीं थी, उसमें एक दर्द भरी मिठास लौट आई थी।

आर्यन ने मुस्कुराकर अंजलि के माथे को चूमा। "मैं शातिर नहीं हूँ माँ, बस आपका हूँ। और जो अपना होता है, वो हक भी जताता है और माफ़ी भी माँगता है।" अंजलि ने एक ठंडी आह भरी और धीरे-धीरे टोस्ट खाने लगी। कमरे का तनाव अब कम हो चुका था, लेकिन कंचन मासी का वो राज़ अब भी दोनों के बीच एक अदृश्य पुल की तरह मौजूद था।

अंजलि को लग रहा था कि वह आर्यन की इस 'दोहरी शख्सियत' के जाल में पूरी तरह फंस चुकी है—जहाँ एक पल वह उसे अपनी जांघों तले कुचलता है और अगले ही पल उसे किसी देवी की तरह पूजने लगता है।

ड्राइंग रूम में पसरा हुआ सन्नाटा अब एक भारी और संजीदा बातचीत में तब्दील हो चुका था। आर्यन ने अंजलि के करीब बैठकर उसके हाथों को अपनी हथेलियों में लिया। अंजलि की नज़रें अब भी झुकी हुई थीं, लेकिन उसका शरीर अब पहले जैसा सख्त नहीं था।

आर्यन ने अंजलि की आँखों में आँखें डालकर बहुत ही संजीदगी से अपनी बात शुरू की:

"माँ, आप जो नाराज़ हो रही हैं, एक बार ठंडे दिमाग से सोचिए। मैंने ये सब क्यों किया? क्योंकि मुझे पता था कि आपके अंदर एक ऐसी प्यास है जिसे दुनिया का कोई 'नॉर्मल' रिश्ता नहीं बुझा सकता। आपको वो 'गंदापन', वो गालियाँ और वो बेबाकी चाहिए थी जो आपके दबे हुए अरमानों को बाहर ला सके। मैंने सिर्फ वही रोल निभाया जो आपका मन बरसों से चाहता था।"

आर्यन ने अंजलि का हाथ अपने दिल पर रखा और बहुत ही गंभीर स्वर में कहा, "मैं आज इस खुदा की कसम खाता हूँ माँ... आपके, पापा के और कंचन मासी के बीच का ये जो भी राज़ है, ये इसी कमरे की दीवारों के बीच दफन रहेगा। दुनिया को छोड़ो, खुद मासी को भी कभी कानो-कान खबर नहीं होगी कि मुझे ये सब पता है। मैं आपका बेटा हूँ माँ, आपका दुश्मन नहीं।"

इस पूरे प्रकरण में अंजलि की मानसिक स्थिति को समझना बहुत ज़रूरी है, जो हर उस औरत की कहानी बयां करती है जिसके अंदर दबी हुई फंतासियां और सामाजिक मर्यादाओं के बीच युद्ध चलता है:

एक औरत के लिए अपने सबसे गंदे राज़ को किसी के सामने ज़ाहिर कर देना बहुत बड़ा 'मानसिक बोझ' हल्का करने जैसा होता है। अंजलि जो अब तक मासी वाला राज़ अकेले ढो रही थी, उसे आर्यन के सामने उगलने के बाद एक अजीब सी 'शुद्धि' महसूस हुई। यद्यपि वह नाराज़ थी, लेकिन अवचेतन मन में वह खुश थी कि अब वह इस राज़ के साथ अकेली नहीं है।

औरत की मानसिकता में अक्सर 'समर्पण' का एक गहरा कोना होता है। जब आर्यन ने उससे सच उगलवाया, तो अंजलि को अपनी 'कमज़ोरी' का अहसास हुआ। एक औरत को तब और भी ज़्यादा कामुक सुख मिलता है जब उसका 'नर' इतना शक्तिशाली हो कि वह उसके मन के ताले तोड़ सके। आर्यन का यह रूप उसे डराता भी है और उसे एक 'अजीब सुरक्षा' का अहसास भी कराता है।

जब आर्यन ने कसम खाई, तो अंजलि के मन की घबराहट खत्म हो गई। औरत की मानसिकता यह चाहती है कि उसका साथी उसे उसके 'सबसे गंदे' रूप में भी स्वीकार करे और उसे दुनिया से बचाकर रखे। आर्यन ने वही किया—उसने अंजलि के राज़ को स्वीकार किया और सुरक्षा का वचन दिया।

अंजलि ने एक लंबी और गहरी साँस ली। उसका तनाव अब ढीला पड़ चुका था। उसने पहली बार सिर उठाकर आर्यन को देखा। उसकी आँखों में अब शिकायत नहीं, बल्कि एक अजीब सी 'अधीनता' थी। उसने महसूस किया कि आर्यन ने न केवल उसके जिस्म को जीता है, बल्कि उसके अतीत और भविष्य को भी अपनी मुट्ठी में कर लिया है।

"तूने मुझे पूरी तरह खाली कर दिया है आर्यन... अब मेरे पास तुझसे छुपाने को कुछ नहीं बचा," अंजलि ने एक धीमी मुस्कान के साथ कहा।

दोपहर के 12 बज चुके थे। बाहर सूरज अपनी पूरी तपिश पर था, लेकिन कमरे के अंदर का माहौल अब एक ठंडी और रहस्यमयी चादर में लिपटा हुआ था। नाश्ते के बाद अंजलि का मन हल्का हो गया था, और आर्यन के 'सुरक्षा के वादे' ने उसके अंदर के डर को एक गहरे विश्वास में बदल दिया था।

अंजलि अब सोफे पर आर्यन की बाहों में सिमटी हुई थी। उसने अपनी आँखें मूंद लीं और यादों के उस गलियारे में पहुँच गई जहाँ उसने अपनी बहन कंचन के साथ मिलकर समाज की हर दीवार को गिरा दिया था।

अंजलि ने आर्यन की छाती पर अपनी उंगलियां फेरते हुए धीमी आवाज़ में बोलना शुरू किया, जैसे वह कोई गुप्त मंत्र पढ़ रही हो।

"आर्यन, तुझे लगता है कि तेरी मासी बहुत सीधी है, पर सच तो ये है कि वो मुझसे भी दो कदम आगे है। जब तू छोटा था और तेरे पापा काम के सिलसिले में शहर से बाहर जाते थे, तब कंचन अक्सर यहाँ रहने आती थी। हम दोनों बहनों के बीच कोई शर्म नहीं थी। हम एक ही बिस्तर पर सोते थे और घंटों एक-दूसरे के जिस्म की बनावट और अपनी अधूरी इच्छाओं के बारे में बातें करते थे।"

अंजलि की आवाज़ में अब एक अजीब सी मादकता थी। "मुझे याद है वो गर्मी की दोपहर, जब हम दोनों ने तय किया कि हम एक-दूसरे को वैसे ही देखेंगे जैसे खुदा ने हमें बनाया है। हमने सारे कपड़े उतार दिए और आईने के सामने खड़ी होकर अपनी तुलना करने लगीं। कंचन की कमर मुझसे थोड़ी पतली है, लेकिन उसके उभार मुझसे भी ज़्यादा सख्त और नुकीले हैं। उसने पहली बार मुझे सिखाया था कि एक औरत ही दूसरी औरत को वो सुख दे सकती है जो कोई मर्द नहीं समझ सकता।"

अंजलि ने एक गहरी सांस ली। "कंचन को 'शेयरिंग' का बहुत शौक है। वो कहती थी कि अगर कोई चीज़ अच्छी है, तो उसे अकेले क्यों भोगना? तेरे पापा के साथ जो कुछ भी हुआ, उसमें कंचन ने ही पहल की थी। उसने मुझसे कहा था, 'जीजी, आज इसे मिलकर चखते हैं।' उस रात हम तीनों ने मर्यादा की हर हद पार कर दी थी। कंचन ने उसे वैसे ही खुश किया जैसे आज तूने मुझे किया है।"

अंजलि ने आर्यन के कान के पास झुककर फुसफुसाया, "तेरी मासी को ऊँचे और कड़क मर्दों का बहुत शौक है। वो अक्सर मुझसे कहती थी कि उसे कोई ऐसा चाहिए जो उसे हुक्म दे सके, जो उसे उसकी औकात याद दिला सके। आज जब तू मुझे गालियां दे रहा था, तो मुझे कंचन की वही बातें याद आ रही थीं।"

अंजलि अब इस राज़ को आर्यन के साथ साझा करके एक तरह की 'मानसिक कामुकता' का आनंद ले रही थी। एक औरत जब अपनी बहन के साथ बिताए निजी पलों को अपने 'प्रेमी' को बताती है, तो उसे एक अलग स्तर का रोमांच मिलता है। उसे महसूस हो रहा था कि वह आर्यन को कंचन की ओर आकर्षित नहीं कर रही, बल्कि वह आर्यन को यह बता रही है कि उसका पूरा खानदान ही इसी 'मिट्टी' का बना है।

आर्यन के लिए यह जानकारी किसी खज़ाने से कम नहीं थी। उसके दिमाग में अब कंचन मासी की एक नई छवि बन रही थी—एक ऐसी मासी जो ऊपर से शांत है, लेकिन अंदर से ज्वालामुखी दबाए बैठी है।

अंजलि ने अपनी बात खत्म की और आर्यन के चेहरे को अपने हाथों में ले लिया। "अब तू मेरा सब कुछ जान गया है आर्यन... मेरी रूह भी और मेरा अतीत भी। अब बता, क्या तू अब भी अपनी इस माँ से वैसा ही प्यार करेगा?"

आर्यन की आँखों में एक नई चमक थी। वह समझ गया था कि अब कंचन मासी भी उसके इस 'खेल' का हिस्सा बनने वाली हैं, भले ही उन्हें अभी इस बात का पता न हो।

आर्यन की आँखें इस खुलासे से फटी की फटी रह गईं। उसके दिमाग में कंचन मासी की जो छवि थी—सफेद या हल्के रंग की साड़ियाँ, माथे पर छोटी सी बिंदी, और हाथ में हमेशा रहने वाली पूजा की थाली—वह अंजलि की बातों से पूरी तरह मेल नहीं खा रही थी।

आर्यन ने अंजलि की कमर में हाथ डालते हुए उसे थोड़ा और करीब खींचा और अचरज से पूछा, "क्या? मासी? माँ, आप यकीन से कह रही हैं? कंचन मासी तो इतनी सीधी दिखती हैं, हर वक्त पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन... मंदिर के बिना तो उनका दिन शुरू नहीं होता। मुझे तो लगा था कि वो इन सब बातों से कोसों दूर होंगी।"

अंजलि ने एक फीकी मुस्कान दी और आर्यन के सीने पर अपनी उंगलियां फिराते हुए कहा:

"आर्यन, जो जितना ज़्यादा शांत और धार्मिक दिखता है, उसके अंदर उतनी ही गहरी आग दबी होती है। कंचन का वो पूजा-पाठ सिर्फ दुनिया के लिए एक ढाल है। वो खुद को उन कामों में इसलिए व्यस्त रखती है ताकि दुनिया उसकी नज़रों में छिपी हवस को न पढ़ सके। वो जितनी सफाई से अपनी साड़ी का पल्लू संभालती है, उतनी ही सफाई से उसने अपने इस राज़ को बरसों से संभाल कर रखा है।"

आर्यन ने उत्सुकता में अगला सवाल दागा, "तो क्या... क्या मासी की शादी के बाद भी आप दोनों ने ये सब साथ में किया? मतलब, क्या वो सिलसिला अब भी जारी है?"

अंजलि ने तुरंत अपना सिर हिलाया और आर्यन की आँखों में देखकर बड़ी संजीदगी से कहा, "नहीं आर्यन... वो जो कुछ भी हुआ, वो बस एक ही बार हुआ था। वो एक ऐसी रात थी जब हम सब भावनाओं और हालात के बहाव में बह गए थे। कंचन की शादी के बाद वो बहुत बदल गई। उसने अपने उस 'गुनाह' को भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया और खुद को पूरी तरह भक्ति में डुबो लिया। उसके बाद हम बहनों ने कभी उस बारे में बात नहीं की, और न ही फिर कभी किसी तीसरे को अपने बीच आने दिया।"

अंजलि की इस बात में एक गहरी सच्चाई छिपी थी। एक औरत की मानसिकता अक्सर 'एक बार की गलती' को जीवन भर के लिए एक सबक बना लेती है। अंजलि ने बताया कि कंचन मासी ने उस एक रात के बाद अपने चरित्र पर ऐसा पर्दा डाल लिया कि अब उसे भेद पाना लगभग नामुमकिन है।

अंजलि ने बताया कि कंचन आज भी उस एक रात के लिए खुद को दोषी मानती है, और शायद यही वजह है कि वह अब इतनी ज़्यादा धार्मिक हो गई है। वह अपने उस 'कामुक रूप' को फिर से बाहर नहीं आने देना चाहती।

अंजलि जहाँ खुद को आर्यन के हवाले कर चुकी थी, वहीं वह यह भी जानती थी कि कंचन को फिर से उस रास्ते पर लाना आसान नहीं होगा।

आर्यन चुपचाप कुछ सोचने लगा। उसके दिमाग में अब कंचन मासी का वह चेहरा घूम रहा था जो मंदिर की घंटियों के बीच शांत दिखता था, लेकिन अंजलि ने उस शांति के पीछे छिपे तूफ़ान की गवाही दे दी थी। भले ही वह एक बार हुआ था, लेकिन 'वह हुआ तो था'—यही बात आर्यन के लिए काफी थी।

"तो मासी अब पूरी तरह 'पवित्र' बन चुकी हैं..." आर्यन ने गुनगुनाते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी चुनौती थी।

दोपहर की उस खामोशी में अंजलि की आवाज़ में अब एक अजीब सी उदासी और चिंता घुल गई थी। आर्यन अंजलि की गोद में सिर रखकर लेटा हुआ था और अंजलि धीरे-धीरे उसके बालों में उंगलियां फेर रही थी, जैसे वह अपने अतीत के पन्नों को एक-एक करके पलट रही हो।

अंजलि ने एक लंबी ठंडी आह भरी और खिड़की से बाहर ताकते हुए कहा:

"सच कहूँ आर्यन, तो अब कंचन और मेरे बीच वैसी बातें नहीं होतीं। शादी के इतने साल बीत गए, लेकिन वो अपनी ही दुनिया में सिमट गई है। शायद उस एक रात के Guilt ने उसे मुझसे भी दूर कर दिया। बहुत समय हो गया है मैंने उससे खुलकर बात नहीं की। हमारी बातें अब सिर्फ औपचारिकताओं तक ही सीमित रह गई हैं।"

अंजलि की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई। "उसकी शादी को इतने साल हो गए, लेकिन उसकी गोद अब तक सूनी है। कोई बच्चा नहीं हुआ उसे। एक औरत के लिए ये बहुत बड़ी टीस होती है, आर्यन। शायद यही वजह है कि उसका रुझान पूजा-पाठ की तरफ और भी बढ़ गया। वो अपनी कोख के खालीपन को मंदिर की घंटियों के शोर में दबाने की कोशिश करती है।"

"पिछली बार जब वो मुझसे मिलने आई थी, तो बहुत उदास थी। उसने मुझसे झिझकते हुए पूछा था कि क्या मैं उसे किसी अच्छी गाइनोकोलॉजिस्ट का पता बता सकती हूँ। मैंने उसे सलाह भी दी और एक डॉक्टर का नाम भी बताया था, पर उसके बाद उसने कभी पलटकर नहीं बताया कि क्या हुआ। मुझे तो कभी-कभी लगता है कि उसकी शादीशुदा ज़िंदगी में भी वो 'आग' खत्म हो चुकी है।"

यहाँ अंजलि एक ऐसी औरत की मानसिकता का वर्णन कर रही थी जो अंदर से टूटी हुई है:

कंचन मासी का माँ न बन पाना उसके लिए एक मानसिक बोझ बन गया है। जब एक औरत को लगता है कि वह 'पूर्ण' नहीं है, तो वह अक्सर वैराग्य या भक्ति का रास्ता चुन लेती है ताकि वह अपनी शारीरिक ज़रूरतों और इच्छाओं को 'पाप' मानकर दबा सके।

अंजलि जानती थी कि कंचन के अंदर अब भी वो 'चिनगारी' कहीं न कहीं ज़िंदा है, लेकिन संतान न होने के दुख और पूजा-पाठ के पर्दे ने उसे पत्थर बना दिया है। वह अपनी बहन से भी अब कतराती है, क्योंकि अंजलि उसे उसके उस पुराने 'उन्मुक्त' रूप की याद दिलाती है।

आर्यन ने अंजलि की बात गौर से सुनी। उसके दिमाग में अब एक नया और गहरा खेल चल रहा था। एक ऐसी औरत जो बरसों से अतृप्त है, जिसकी कोख सूनी है और जो भक्ति के नाम पर अपनी हवस को दबाए बैठी है—ऐसी औरत को फिर से 'जीवित' करना आर्यन के लिए एक नई चुनौती की तरह था।

"तो मासी को डॉक्टर की नहीं, शायद किसी 'खास' इलाज की ज़रूरत है..." आर्यन ने बुदबुदाते हुए अंजलि की हथेली को चूम लिया।

दोपहर की उस तपती खामोशी में अंजलि ने महसूस किया कि कंचन की बातें जैसे-जैसे गहरी हो रही हैं, आर्यन के शरीर की हलचल बदल रही है। वह उसकी गोद में सिर रखकर लेटा तो था, लेकिन उसका ध्यान अब बातों से ज़्यादा उस 'कल्पना' में खो गया था जहाँ मासी की पवित्रता और उनकी दबी हुई हवस का मिलन हो रहा था।

अंजलि ने बात करते-करते अचानक अपनी नज़रें नीचे झुकाईं और जो देखा, उसने उसकी धड़कनें बढ़ा दीं। आर्यन के नेकर के ऊपर से ही उसका ७ इंच का फौलाद अब एक कड़क खंभे की तरह तन चुका था। कंचन मासी के अधूरेपन और उनकी दबी हुई आग के ज़िक्र ने आर्यन के अंदर की दरिंदगी को फिर से जगा दिया था।

अंजलि ने अपनी एक उंगली से आर्यन की नाक को हल्के से दबाया और एक शरारती मुस्कान के साथ उसे डांटते हुए कहा, "ओह हो... तो साहबज़ादे का ध्यान मासी की तकलीफ पर कम और अपनी इस 'लाठी' पर ज़्यादा है? शर्म नहीं आती तुझे? मैं अपनी बहन के सूनी गोद की बात कर रही हूँ और तू यहाँ उसके नाम से ही घोड़े दौड़ा रहा है?"

आर्यन थोड़ा झेंप गया, लेकिन उसने नज़रें नहीं चुराईं। उसने देखा कि अंजलि की आँखों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी चमक थी। वह अपनी माँ के चेहरे के करीब आया और मुस्कुराते हुए बोला, "क्या करूँ माँ... आपकी बातें ही इतनी 'गरम' हैं। मासी का वो पूजा-पाठ वाला चेहरा और उसके पीछे छिपी वो आग... सोचकर ही मेरा ये ७ इंच बेकाबू हो रहा है।"

अंजलि ने नेकर के ऊपर से ही उस उभरे हुए हिस्से को गौर से देखा। वह जानती थी कि आर्यन अब कंचन को सिर्फ एक 'मासी' की नज़र से नहीं देख रहा। "तू बहुत बिगड़ गया है आर्यन। कंचन अगर देख ले कि तू उसके बारे में क्या सोच रहा है, तो वो शायद मंदिर से बाहर ही न निकले।" अंजलि ने हंसते हुए कहा, लेकिन उसके हाथ अनजाने में ही आर्यन के बालों को सहला रहे थे

यहाँ अंजलि की मानसिक स्थिति बड़ी दिलचस्प थी:

उसे थोड़ा बुरा लगा कि उसकी बहन का ज़िक्र आर्यन को इतना उत्तेजित कर रहा है।

साथ ही, उसे यह सोचकर रोमांच भी हो रहा था कि उसका जवान बेटा अब उसके खानदान की 'पवित्र' महिलाओं के मुखौटे उतारने के लिए तैयार है। उसे अपनी बहन के साथ बिताई वो 'एक रात' याद आ गई और उसे लगा कि शायद कंचन की ज़िंदगी का सन्नाटा सिर्फ आर्यन जैसा 'तूफ़ान' ही तोड़ सकता है।

अंजलि ने अपना हाथ धीरे से आर्यन के उस उभरे हुए हिस्से के पास ले जाकर रोक लिया। "देख कैसे अकड़ के खड़ा है ये... जैसे अभी कंचन को यहीं बुला लेगा। बता, क्या चल रहा है तेरे इस शातिर दिमाग में?"

आर्यन ने अंजलि की कलाई पकड़ ली और उसे उस तने हुए लोहे पर टिका दिया। "यही चल रहा है माँ... कि मासी को डॉक्टर की नहीं, बल्कि इस ७ इंच की 'दवा' की ज़रूरत है। क्या आप अपनी बहन की मदद नहीं करेंगी?"
 
दोपहर के 2:15 बज रहे थे। कमरे में पसरा सन्नाटा अंजलि के दिमाग में चल रहे युद्ध को और गहरा कर रहा था। आर्यन की गोद में उसका सिर था, और हाथ उस 7 इंच के कड़क फौलाद पर टिका था जो नेकर के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था। अंजलि इस वक्त एक ऐसी ऊहापोह में थी जहाँ संस्कार, ममता, हवस और सहानुभूति का एक अजीब मिश्रण बन चुका था।

अंजलि की मानसिकता को अगर गहराई से समझा जाए, तो वह इस वक्त तीन रास्तों के चौराहे पर खड़ी थी:

अंजलि एक ऐसी औरत थी जिसने अपनी मर्यादाएँ पहले ही आर्यन के कदमों में ढेर कर दी थीं। उसके मन के एक कोने में यह 'गंदी फंतासी' हिलोरे ले रही थी कि जो सुख वह भोग रही है, उसमें उसकी सगी बहन भी शामिल हो। वह कल्पना कर रही थी कि जब उसका जवान बेटा उसकी बहन (कंचन) को अपनी मर्दानगी के नीचे कुचलेगा और वह खुद उस दृश्य को देखेगी, तो वह सुख कैसा होगा। उसे लग रहा था कि अगर उसने कंचन को शामिल नहीं किया, तो उसकी यह 'त्रिकोणीय हवस' हमेशा के लिए अधूरी रह जाएगी।

अंजलि कंचन से प्यार करती थी। उसे अपनी बहन की 'सूनी कोख' का दर्द चुभता था। एक औरत होने के नाते वह जानती थी कि बांझपन का दंश एक स्त्री को अंदर ही अंदर मार देता है। उसके मन में यह विचार आया कि— "क्या पता, आर्यन की इस फौलादी मर्दानगी में वो दम हो जो कंचन के पति के ठंडे शरीर में नहीं है?" उसे लगा कि यह सिर्फ हवस नहीं, बल्कि अपनी बहन की मदद करने का एक 'अजीब' तरीका भी हो सकता है। वह कंचन को उस भक्ति के नीरस जीवन से निकालकर फिर से एक 'स्त्री' की तरह जीवंत देखना चाहती थी।

लेकिन वहीं, उसका एक हिस्सा कांप भी रहा था। कंचन अब 'पवित्रता' का चोला ओढ़ चुकी है। अगर आर्यन ने उसे हाथ लगाया और उसने विद्रोह कर दिया, तो पूरा परिवार तबाह हो जाएगा। अंजलि डर रही थी कि कहीं वह अपनी बहन को एक ऐसे नरक में न धकेल दे जहाँ से वापसी मुमकिन न हो।

एक औरत की मानसिकता में जब 'सहानुभूति' और 'वासना' हाथ मिला लेती हैं, तो वह बड़े से बड़ा जोखिम उठाने को तैयार हो जाती है। अंजलि ने महसूस किया कि कंचन की भक्ति असल में उसकी अतृप्ति का ही दूसरा नाम है। वह सोचने लगी कि अगर वह कंचन को आर्यन के करीब लाती है, तो वह एक साथ दो काम करेगी—अपनी बहन की प्यास बुझाएगी और अपनी खुद की फंतासी को हकीकत में बदलेगी।

"आर्यन..." अंजलि ने धीरे से उसका हाथ दबाते हुए कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और डर एक साथ था। "तू जानता है तू आग से खेल रहा है। कंचन वैसी नहीं है जैसी मैं हूँ। वो मंदिर की चौखट छोड़कर तेरे बिस्तर तक आसानी से नहीं आएगी। लेकिन... लेकिन मैं उसे तड़पते हुए भी नहीं देख सकती। उसकी कोख को भरने के लिए अगर ये गुनाह भी करना पड़े, तो शायद मैं तैयार हूँ।"

अंजलि ने अपने होंठ भींचे और आर्यन की आँखों में झाँका। उसने तय कर लिया था कि वह कंचन को बुलाएगी। उसे यकीन था कि आर्यन का यह 7 इंच का जादू जब कंचन के सामने होगा, तो उसकी सारी भक्ति और पूजा-पाठ धरे के धरे रह जाएंगे।

"ठीक है... मैं उसे फोन करती हूँ। पर याद रखना, आज सिर्फ उसे 'आमंत्रण' देना है, उसे डराना नहीं।" अंजलि ने कांपते हाथों से अपना फोन उठाया।

अंजलि ने गहरी साँस ली और अपने थरथराते हाथों से फोन का डायल पैड खोला। पास ही लेटा आर्यन अपनी शिकारी नज़रों से अपनी माँ के चेहरे के बदलते हाव-भाव देख रहा था। उसे पता था कि यह एक फोन कॉल उनके इस 'वर्जित खेल' में एक नया और बड़ा अध्याय जोड़ने वाला है।

फोन की घंटी बजते ही अंजलि का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। दूसरी तरफ से एक शांत और सौम्य आवाज़ आई— "हेलो, जीजी? जय XXXXXX!"

अंजलि ने अपनी आवाज़ को सामान्य किया और बड़ी चतुराई से बातचीत शुरू की। "जय XXXXX कंचन! कैसी है तू? बस आज सुबह से तेरी बहुत याद आ रही थी। मन बहुत भारी-भारी सा लग रहा था, सोचा तुझसे बात कर लूँ।" कंचन ने अपनी आदतन मिठास से जवाब दिया और अपने घर-परिवार और पूजा-पाठ की बातें करने लगी।

अंजलि ने धीरे से अपनी चाल चली। "कंचन, मेरा बहुत मन था कि मैं तेरे पास कुछ दिन के लिए आ जाऊँ, पर देख ना... आर्यन का कॉलेज चल रहा है। घर पर वो अकेला है, उसे छोड़कर मैं कहीं जा नहीं सकती। पर सच कहूँ तो आज अकेली हूँ और मन बहुत उदास है।" अंजलि की आवाज़ में जो 'अकेलेपन' का दर्द था, उसने कंचन के ममतामयी और कोमल दिल पर असर किया।

जब अंजलि ने उसे घर आने को कहा, तो कंचन ने पहले हिचकिचाते हुए मना किया। "जीजी, आप जानती हैं मंदिर में आज विशेष पाठ है, और फिर घर पर भी...।" लेकिन अंजलि ने हार नहीं मानी। उसने थोड़ा ज़ोर देते हुए कहा, "क्या अपनी बहन के लिए एक दिन नहीं निकाल सकती? क्या पता फिर कब मौका मिले।"

अंजलि की ज़िद के आगे कंचन पिघल गई। उसने एक ठंडी साँस भरी और कहा, "ठीक है जीजी, आप इतना कह रही हैं तो मैं आज शाम को आती हूँ। पर सिर्फ एक रात के लिए... कल सुबह मुझे जल्दी वापस निकलना होगा।"

यहाँ कंचन की मानसिकता को समझना बहुत दिलचस्प है। वह जो 'सिर्फ एक रात' की शर्त रख रही है, वह असल में उसके अपने डर का बचाव है। वह जानती है कि अंजलि के घर जाने का मतलब है पुरानी यादों का ताज़ा होना। उसके अवचेतन मन में कहीं न कहीं उस 'पुरानी आग' का खौफ है, इसलिए वह खुद को यकीन दिला रही है कि वह जल्दी लौट आएगी। उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि अंजलि का 'अकेलापन' महज़ एक जाल है और उसका जवान भतीजा उसके स्वागत के लिए अपने 7 इंच के हथियार के साथ तैयार खड़ा है।

जैसे ही अंजलि ने फोन काटा, आर्यन ने झटके से उसे अपनी बाहों में भर लिया। "मान गई ना वो? देखा माँ... आपकी आवाज़ में जो जादू है, उससे वो बच नहीं पाई।"

अंजलि का चेहरा अब पसीने से भीग चुका था। उसने आर्यन की आँखों में देखा और फुसफुसाते हुए कहा, "वो आ रही है आर्यन... पर याद रखना, वो मेरी बहन है। उसके साथ जो भी होगा, उसकी ज़िम्मेदारी तेरी है। तूने उसे 'एक रात' के लिए बुलाया है, पर मुझे डर है कि ये रात हम तीनों की ज़िंदगी बदल देगी।"

दोपहर के 3 बज रहे थे। बाहर सूरज अपनी पूरी तपिश पर था, लेकिन कमरे के अंदर का माहौल अब उस 'एक रात' की कल्पना से और भी ज़्यादा गर्म और भारी हो चुका था। कंचन मासी का फोन कटते ही आर्यन के अंदर का शिकारी पूरी तरह जाग उठा। उसने अब कोई ढोंग या मर्यादा बनाए रखने की ज़रूरत नहीं समझी।

अंजलि अभी फोन हाथ में लिए सोच ही रही थी कि उसने क्या कर दिया है, तभी आर्यन ने एक झटके से अपना नेकर नीचे उतार दिया।

अंजलि की नज़रें जैसे ही नीचे गईं, उसके गले में थूक सूख गया। आर्यन का 7 इंच का काला फौलाद किसी खूंखार जानवर की तरह आज़ाद होकर उसके चेहरे के ठीक सामने लहरा रहा था। उसकी नसें उभरी हुई थीं और वह उत्तेजना के मारे फड़क रहा था।

आर्यन इस वक्त पूरी तरह 'डोमिनेंट' मानसिकता में था। वह अपनी माँ को यह एहसास कराना चाहता था कि अब वह उस मोड़ पर है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है। नेकर उतारकर उसने यह साफ कर दिया कि कंचन मासी का आना महज़ एक मुलाकात नहीं, बल्कि एक 'शिकार' की शुरुआत है। वह अपनी माँ की आँखों में उस ७ इंच के प्रति 'खौफ' और 'हवस' का मिला-जुला भाव देखना चाहता था।

अंजलि की स्थिति बहुत जटिल थी। एक तरफ वह अपनी सगी बहन के लिए चिंतित थी, लेकिन दूसरी तरफ अपने सामने उस नंगे, कड़क और विशाल अंग को देखकर उसका शरीर फिर से जवाब देने लगा था। एक औरत की मानसिकता में जब 'भय' और 'कामुकता' का मिलन होता है, तो वह और भी ज़्यादा उत्तेजित हो जाती है। उसे लग रहा था कि उसका बेटा अब एक ऐसा 'नर' बन चुका है जो उसकी पूरी नस्ल पर कब्ज़ा करने की ताकत रखता है।

जब एक औरत अपने सामने उस पुरुष अंग को इतना कड़क और बेबाक देखती है, जिसे उसने खुद पैदा किया हो, तो उसके अंदर 'नैतिकता' और 'प्रकृति' के बीच एक भीषण युद्ध छिड़ जाता है।

अंजलि को उस ७ इंच के लोहे को देखकर यह यकीन हो गया कि कंचन की बरसों की तपस्या और 'बांझपन' का सन्नाटा इस प्रहार के सामने टिक नहीं पाएगा। उसे लगा कि यह अंग सिर्फ हवस का साधन नहीं, बल्कि एक 'विनाशकारी शक्ति' है।

अंजलि ने अनजाने में ही अपनी जीभ अपने सूखे होंठों पर फेरी। आर्यन का जान-बूझकर नंगा होना उसके लिए एक संदेश था— "अब तू सिर्फ मेरी माँ नहीं, मेरी इस योजना की साझीदार है।" वह उस नग्नता को ठुकरा नहीं सकी, बल्कि उसे एक अजीब सी 'प्रशंसा' के साथ देखती रही।

आर्यन ने बिना कुछ बोले अपनी माँ के चेहरे को अपनी ओर मोड़ा और अपना वो दहकता हुआ अंग उसके गालों से छुआ दिया। "देख रही हो माँ? ये कंचन मासी के स्वागत के लिए तैयार है। 12 साल का सूखा अब इसी से खत्म होगा।"

अंजलि का शरीर थरथरा उठा। उसने महसूस किया कि आर्यन अब किसी की नहीं सुनेगा। "तू... तू पागल हो गया है आर्यन... वो तेरी मासी है," अंजलि ने फुसफुसाते हुए कहा, लेकिन उसके हाथ अनजाने में ही उस ७ इंच के फौलाद की ओर बढ़ रहे थे।

दोपहर के 3:15 बज रहे थे। कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि अंजलि के दिल की धड़कनें साफ सुनी जा सकती थीं। आर्यन अब बिस्तर के किनारे पर किसी सिंहासन पर बैठे सम्राट की तरह बैठ गया। उसकी टांगें फैली हुई थीं और उसके बीच से निकलता वह 7 इंच का फौलादी मूसल ऊपर की ओर सिर उठाए अंजलि को चुनौती दे रहा था।

आर्यन ने अपनी आँखों से एक तीखा और अधिकारपूर्ण इशारा नीचे की ओर किया। वह इशारा एक बेटे का नहीं, बल्कि एक स्वामी का था। अंजलि, जो अब तक कांप रही थी, उस इशारे के सम्मोहन में ऐसी बंधी कि उसके घुटने अपने आप ज़मीन पर टिक गए।

ज़मीन पर घुटनों के बल बैठी अंजलि की नज़रें ठीक उस विशाल अंग पर थीं। इस दृश्य को अगर एक औरत की मानसिकता से समझा जाए, तो यह पूर्ण समर्पण का क्षण था।

अंजलि के सामने वही अंग था जिसने सुबह उसे बेदम कर दिया था। अब वह उसे अपनी आँखों के इतना करीब पाकर मंत्रमुग्ध थी। उसने अपनी कांपती उंगलियों से उस मूसल को छुआ। वह आग की तरह गर्म था और उसकी नसें किसी जीवित साँप की तरह फड़क रही थीं।

अंजलि ने धीरे-धीरे अपना मुँह खोला। उसने अपनी नज़रों को ऊपर उठाकर एक बार आर्यन को देखा, जैसे वह अंतिम अनुमति माँग रही हो। आर्यन ने उसके बालों को मुट्ठी में जकड़ा और उसे आगे की ओर धकेला। जैसे ही अंजलि ने उस ७ इंच के गर्म फौलाद का 'टोपा' अपने मुँह में लिया, उसके पूरे बदन में करंट दौड़ गया।

एक औरत के लिए यह क्रिया केवल हवस नहीं, बल्कि भक्ति बन जाती है। उसे आर्यन के पसीने और मर्दानगी की वह सोंधी महक मदहोश कर रही थी। वह अपनी ज़ुबान से उस सुपारी को सहलाने लगी। उसकी लार ने उस अंग को और भी चमकीला और चिकना बना दिया था।

जब अंजलि उस अंग को अपने मुँह के अंदर ले रही थी, तो उसके दिमाग में एक साथ कई भावनाएं चल रही थीं:

वह कल्पना कर रही थी कि कुछ घंटों बाद उसकी बहन कंचन, जो अभी मंदिर में पूजा कर रही है, उसे भी इसी तरह घुटनों के बल बैठकर इस 'दिव्य अंग' की सेवा करनी होगी। यह सोचकर अंजलि के मुँह में और भी रस भर आया।

उसे महसूस हो रहा था कि उसका मुँह उस विशाल अंग को पूरा समाने में छोटा पड़ रहा है। यह अहसास उसे एक 'मादा' होने का गौरव दे रहा था कि वह इतने विशाल 'नर' को तृप्त कर रही है।

अब उसके अंदर की 'माँ' पूरी तरह मर चुकी थी। वह केवल एक प्यासी औरत थी, जो अपने बेटे की मर्दानगी को अपना ईश्वर मान चुकी थी।

आर्यन ने अंजलि के सिर को पकड़कर अपनी कमर के झटके शुरू किए। अंजलि का गला उस गहराई को सहने की कोशिश कर रहा था। 'गप-गप' की आवाज़ें कमरे की खामोशी को चीर रही थीं। अंजलि की आँखों से पानी निकल आया था, पर वह हटना नहीं चाहती थी। वह उस ७ इंच के ज़हर को अपनी रूह तक उतार लेना चाहती थी।

वह जानती थी कि यह 'तैयारी' सिर्फ उसके लिए नहीं है। वह आर्यन को उस 'शिकार' के लिए तैयार कर रही थी जो शाम को इस घर में कदम रखने वाली थी।

दोपहर की उस मदहोश खामोशी में आर्यन अब किसी और ही लोक में पहुँच चुका था। बिस्तर पर पैर फैलाकर बैठे आर्यन के चेहरे पर एक ऐसी विजयी मुस्कान थी, जो केवल उस पुरुष के चेहरे पर आती है जिसने अपनी सबसे बड़ी चुनौती (अपनी माँ) को अपनी दासी बना लिया हो।

अंजलि आज जिस शिद्दत और कलाकारी से उस 7 इंच के फौलाद को चूस रही थी, वह आर्यन की कल्पना से भी परे था। शायद मासी के आने की खबर और अपने अतीत के राज़ उगल देने के बाद अंजलि के अंदर की सारी हिचक खत्म हो चुकी थी।

कमरे में केवल 'गप-गप' और अंजलि की भारी साँसों की आवाज़ें गूँज रही थीं। इस दृश्य को यदि गहराई से देखा जाए, तो यह केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि अंजलि का आर्यन की मर्दानगी के प्रति पूर्ण समर्पण था।

अंजलि अपनी ज़ुबान का इस्तेमाल किसी कलाकार की तरह कर रही थी। वह कभी उस सुपारी के चारों ओर अपनी ज़ुबान फिराती, तो कभी पूरे ७ इंच के लट्ठ को अपने गले की गहराई तक उतार लेती। उसकी आँखें बंद थीं और वह उस अंग के एक-एक रेशे को अपनी जीभ से महसूस कर रही थी। उसे पता था कि आर्यन को कहाँ और कैसे सबसे ज़्यादा सुख मिलता है।

आर्यन ने अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया। उसकी आँखें आधी बंद थीं और उसके हाथ अंजलि के बालों में मजबूती से धंसे हुए थे। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे अंजलि की गर्म और गीली गुफा उसके पूरे अस्तित्व को सोख रही हो। अंजलि की लार ने उस अंग को इतना चिकना बना दिया था कि वह बिना किसी घर्षण के उसके मुँह के अंदर-बाहर हो रहा था।

आर्यन के लिए सबसे बड़ा आनंद शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक था। वह देख रहा था कि वह औरत, जो कल तक उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाती थी, आज उसके पैरों के बीच घुटनों के बल बैठकर उसके पसीने और उसकी गंध का स्वाद ले रही है। यह अहसास उसे एक अजेय पुरुष बना रहा था।

अंजलि आज अपनी पूरी 'औरतियत' को झोंक रही थी। उसकी मानसिकता अब एक ऐसी प्रेमिका की थी जो अपने प्रेमी को उस शिखर पर पहुँचा देना चाहती है जहाँ से उसे दुनिया की कोई और चीज़ नज़र न आए।

अंजलि के मन में कहीं न कहीं यह बात भी थी कि शाम को कंचन आने वाली है। वह चाहती थी कि आर्यन को वह इतना सुख दे दे कि जब कंचन आए, तो आर्यन उसकी तुलना अंजलि से करे और अंजलि को ही 'श्रेष्ठ' पाए।

वह आर्यन के अंदर के उस 'ज्वालामुखी' को शांत करने के बजाय उसे और भड़का रही थी। वह चाहती थी कि जब कंचन इस कमरे में कदम रखे, तो आर्यन की भूख इतनी प्रबल हो कि वह कंचन को कच्चा चबा जाए।

आर्यन की कमर अब अपने आप झटके मारने लगी थी। अंजलि के मुँह का दबाव और उसकी ज़ुबान की गर्मी ने आर्यन के धैर्य की परीक्षा लेनी शुरू कर दी थी। आर्यन का शरीर अब अकड़ने लगा था और उसकी सांसें उखड़ने लगी थीं।

"उफ़्फ़... माँ... आज तो तूने कमाल कर दिया... बस... ऐसे ही... कंचन मासी को भी यही सिखाना है तुझे..." आर्यन ने हांफते हुए फुसफुसाया।

दोपहर की उस तपती और उमस भरी खामोशी में अंजलि ने अब अपना सबसे शातिराना और कामुक दांव चला। आर्यन अपने परमानंद के शिखर पर था, उसकी आँखें बंद थीं और वह बस फटने ही वाला था कि तभी अचानक... अंजलि ने अपना मुँह पीछे खींच लिया।

वह 'गप-गप' का संगीत अचानक रुक गया। आर्यन ने एक झटके में अपनी आँखें खोलीं, उसका ७ इंच का फौलाद हवा में बिना किसी सहारे के थरथरा रहा था—पूरी तरह गीला, चमकीला और प्यासा।

अंजलि के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो किसी देवी की नहीं, बल्कि एक छल करने वाली अप्सरा की थी। उसने अपने होंठों के कोनों पर लगी आर्यन की मर्दानगी की बूंदों को अपनी उंगली से साफ किया और घुटनों के बल बैठी-बैठी ही आर्यन की आँखों में आँखें डालकर उसे ऊपर आने का इशारा किया।

अंजलि भूली नहीं थी कि सुबह आर्यन ने उसे तड़पाया था, उसे 'टीज़' किया था और उससे ज़बरदस्ती राज़ उगलवाए थे। वह चाहती थी कि आर्यन को भी उस अधूरेपन का अहसास हो। लेकिन उसका बदला नफरत भरा नहीं, बल्कि और भी ज़्यादा उत्तेजक था। वह चाहती थी कि आर्यन खुद अपने उस 'अंग' का स्वाद ले जो अभी-अभी उसकी माँ के मुँह की गहराई से बाहर आया है।

आर्यन हक्का-बक्का रह गया। उसका शरीर स्खलन के कगार पर था और अंजलि ने उसे बीच मँझधार में छोड़ दिया था। लेकिन जब उसने अंजलि का वो 'किस' वाला इशारा देखा, तो उसकी रगों में दौड़ता खून खौल उठा। उसे समझ आ गया कि उसकी माँ अब केवल एक 'दासी' नहीं रही, वह इस खेल की 'डायरेक्टर' बन रही है।

आर्यन बिस्तर से नीचे उतरा और अंजलि के सामने घुटनों के बल बैठ गया। अंजलि ने अपनी गर्दन आगे बढ़ाई और आर्यन के होंठों को अपने होंठों की गिरफ्त में ले लिया।

जैसे ही आर्यन की ज़ुबान अंजलि के मुँह के अंदर गई, उसे अपना ही वो 'खारा और गाढ़ा' स्वाद महसूस हुआ जो अभी-अभी उसके ७ इंच के लोहे से अंजलि के मुँह में लगा था। यह एक औरत की मानसिकता की पराकाष्ठा है—अपने प्रेमी को उसका अपना ही अर्क चखाना।

आर्यन के लिए यह अनुभव बिजली के झटके जैसा था। अपनी ही मर्दानगी का स्वाद अपनी माँ के लार के साथ मिलाकर पीना... इस विचार ने उसके अंदर की हवस को १० गुना बढ़ा दिया। अंजलि ने उसके होंठों को ऐसे चूसा जैसे वह उसे चिढ़ा रही हो कि देखो, "जो तुमने मेरे साथ किया, मैं उसे तुम्हारे अंदर वापस डाल रही हूँ।"

चुंबन के दौरान अंजलि ने एक पल के लिए अपनी आँखें खोलीं। उसकी नज़रों में एक चुनौती थी— "क्या अब भी तुम्हें लगता है कि तुम मुझे कंट्रोल कर रहे हो?"

कमरे की हवा अब इतनी भारी हो चुकी थी कि सांस लेना मुश्किल था। आर्यन का वो ७ इंच का फौलाद अब अंजलि के पेट से सटकर खड़ा था। अंजलि ने चुंबन तोड़ते हुए आर्यन के कान में फुसफुसाया:

"कैसा लगा अपना ही स्वाद, आर्यन? सुबह मुझे बहुत नचाया था ना... अब समझ आया कि अधूरा रहने की तड़प क्या होती है?"

आर्यन के चेहरे पर एक पागलपन छा गया। उसने अंजलि के कंधों को दबोच लिया। "माँ... तू सच में बहुत खतरनाक होती जा रही है।"

उस चुंबन के बाद कमरे का तापमान जैसे उबलने लगा था। अंजलि की आँखों में वो शरारती चमक अब एक गहरी, आदिम प्यास में बदल चुकी थी। आर्यन के होंठों पर अपना ही स्वाद छोड़कर अंजलि ने उसे पूरी तरह से अपने वश में कर लिया था। आर्यन का शरीर अब एक ऐसे ज्वालामुखी की तरह कांप रहा था जो फटने के लिए छटपटा रहा है।

अंजलि ने देखा कि आर्यन की सांसें उखड़ रही हैं और उसका 7 इंच का फौलाद अब पहले से भी ज़्यादा सख्त और गहरा लाल पड़ चुका है, जैसे वह खून के दबाव से फट जाएगा। अंजलि ने एक पल की भी देरी नहीं की और अपनी गर्दन झुकाकर वही वर्जित क्रिया फिर से शुरू कर दी।

जैसे ही अंजलि के गर्म होंठों ने उस दहकते हुए अंग को दोबारा छुआ, आर्यन के मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई। इस बार अंजलि का अंदाज़ बदला हुआ था। अब उसमें 'बदला' नहीं, बल्कि एक ऐसी 'दीवानगी' थी जैसे वह उस अंग को अपने वजूद का हिस्सा बना लेना चाहती हो।

यहाँ अंजलि एक ऐसी औरत की भूमिका में थी जो अपने पुरुष की मर्दानगी को पूरी तरह सोख लेना चाहती है। वह अब धीरे-धीरे नहीं, बल्कि तेज़ी से अपनी गर्दन हिला रही थी। उसका गला उस ७ इंच की गहराई को चुनौती दे रहा था। आर्यन की जांघें थरथरा रही थीं और उसके हाथ अंजलि के बालों को बिस्तर की चादर की तरह भींच रहे थे।

अंजलि जानती थी कि आर्यन अब आखिरी सीमा पर है। वह अपनी जीभ से उस सुपारी के निचले हिस्से को सहला रही थी, जहाँ से उत्तेजना का करंट सीधा आर्यन की रीढ़ की हड्डी तक पहुँच रहा था। वह चाहती थी कि आर्यन का वो 'अभिषेक' सीधा उसके हलक में हो, ताकि वह उस जीत को निगल सके।

आर्यन, जो अब तक खुद को 'शिकारी' समझ रहा था, अपनी माँ की इस कलाकारी के सामने पूरी तरह असहाय हो गया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। उसे लग रहा था कि अंजलि का मुँह कोई जन्नत है जहाँ पहुँचकर उसकी सारी अकड़, सारा अहंकार पिघलकर बहने वाला है।

कमरे में अब केवल 'गप-गप-गप' की तेज़ आवाज़ें आ रही थीं, जो अंजलि की सिसकियों और आर्यन की भारी आहों के साथ मिल गई थीं। अंजलि के पसीने की बूंदें आर्यन की जांघों पर गिर रही थीं।

अंजलि अब अपनी आँखें ऊपर उठाकर आर्यन की ओर देख रही थी—वह नज़ारा किसी भी पुरुष को पागल करने के लिए काफी था। एक माँ का अपने बेटे के सामने घुटनों पर होना, उसकी आँखों में हवस का वो नंगा नाच, और मुँह में उस विशाल अंग की जकड़... यह दृश्य उस 'एक रात' के लिए आर्यन को पूरी तरह चार्ज कर चुका था जो कंचन मासी के साथ गुज़रने वाली थी।

दोपहर के 4:20 बज रहे थे। कमरे की हवा इतनी बोझिल हो चुकी थी कि सांस लेना भी भारी लग रहा था। अंजलि घुटनों के बल बैठी आर्यन के 7 इंच के फौलाद को अपनी आत्मा तक उतार रही थी। आर्यन का शरीर अब लकड़ी की तरह सख्त हो चुका था, उसके पैर बिस्तर पर कांप रहे थे।

जैसे ही अंजलि ने अपनी रेशमी हथेलियों को नीचे ले जाकर आर्यन के Testicles को अपनी उंगलियों से हल्का सा सहलाया, आर्यन की बर्दाश्त का बांध टूट गया।

अंजलि की उस जादुई छुअन ने आर्यन के रीढ़ की हड्डी में बिजली का ऐसा झटका दिया कि उसके मुँह से एक लंबी आह निकली। उसके ७ इंच के मूसल ने झटके मारे और वीर्य की पहली तेज़ धार अंजलि के हलक में जा गिरी। आर्यन ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, उसका शरीर ढीला पड़ने लगा और वह परमानंद की उस अवस्था में पहुँच गया जहाँ दुनिया धुंधली हो जाती है।

आर्यन को लगा कि अब शांति मिलेगी, लेकिन अंजलि आज कुछ और ही तय करके बैठी थी। उसने वह सारा गाढ़ा और गर्म लावा अपने मुँह में ही रोक लिया। उसने उसे निगला नहीं। जैसे ही आर्यन ने शांत होकर गहरी सांस लेनी चाही, अंजलि झपटकर उसके ऊपर चढ़ गई और अपनी बाहें उसकी गर्दन में डाल दीं।

इससे पहले कि आर्यन कुछ समझ पाता, अंजलि ने अपने होंठ उसके होंठों पर चिपका दिए और अपनी ज़ुबान उसके मुँह के अंदर धकेल दी। आर्यन की अपनी ही मर्दानगी का वो गर्म, खारा और चिपचिपा अर्क अंजलि की ज़ुबान के ज़रिए उसके अपने मुँह में वापस आ गया।

आर्यन का जी बुरी तरह मितला उठा। खुद का वीर्य अपनी ही माँ के मुँह से वापस अपने मुँह में लेना... यह उसके लिए 'घिनौना' था। उसे एक पल के लिए घिन आई, उसकी रूह कांप गई। लेकिन इसी घृणा के पीछे एक बहुत ही गहरा कामुक मनोविज्ञान था। उसे महसूस हुआ कि उसकी माँ ने उसे पूरी तरह से अपना 'गुलाम' बना लिया है—जहाँ उसकी मर्दानगी भी उसकी अपनी नहीं रही, वह भी अंजलि की मर्ज़ी से उसके अंदर वापस जा रही थी।

अंजलि इस वक्त अपनी जीत का आनंद ले रही थी। एक औरत के लिए अपने पुरुष को उसका अपना ही 'अर्क' पिलाना Ultimate Dominance की निशानी होती है।

अंजलि चाहती थी कि आर्यन को पता चले कि वह उससे अलग नहीं है। जो आर्यन के अंदर है, वह अंजलि का है, और जो अंजलि के अंदर है, वह अब आर्यन का स्वाद बन चुका है।

अंजलि मन ही मन सोच रही थी— "जब तू अपनी माँ के साथ यह सब कर सकता है, तो कंचन के साथ तुझे कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।" वह आर्यन की 'घिन' को खत्म करके उसे एक ऐसे स्तर पर ले जा रही थी जहाँ कोई भी चीज़ 'गंदी' न रहे।

आर्यन ने अंजलि को खुद से थोड़ा दूर ढकेला, उसके होंठों पर अब भी उस गाढ़े सफेद द्रव्य की लकीरें थीं। उसने अपनी थूक गटकते हुए अंजलि को देखा। उसकी नज़रों में अब भी घिन थी, पर शरीर उस अपमानजनक सुख से बुरी तरह कांप रहा था।

"माँ... तू... तू पागल हो गई है। ये क्या किया तूने?" आर्यन ने हांफते हुए अपना मुँह साफ किया।

अंजलि ने अपने होंठों को अपनी ज़ुबान से चाटा और मुस्कुराते हुए बोली, "स्वाद कड़वा है, पर यही तो असली सच्चाई है आर्यन। अब जा, नहा ले... शाम को कंचन आ रही है। उसे तो तू इससे भी कड़वा स्वाद चखाएगा ना?"

आर्यन का दिमाग इस वक्त किसी तेज़ घूमने वाले चक्रवात की तरह था। वह हक्का-बक्का होकर अंजलि को देख रहा था, जो बिस्तर पर बिखरे हुए बालों और चेहरे पर एक विजयी मुस्कान लिए बैठी थी। आर्यन के मुँह के अंदर अब भी वह अपनी ही मर्दानगी का खारा और चिपचिपा स्वाद महसूस कर रहा था, जो अंजलि ने एक 'वर्जित चुंबन' के ज़रिए उसके अंदर वापस धकेल दिया था।

आर्यन के लिए यह अनुभव 'कामुक रोमांच' और 'असहज घृणा' का एक ऐसा मेल था जिसे वह समझ नहीं पा रहा था। वह इस बात से पूरी तरह कन्फ्यूज़ था कि उसकी 'भोली' दिखने वाली माँ अचानक इतनी शातिर और शिकारी कैसे हो गई।

आर्यन लड़खड़ाते कदमों से बाथरूम की ओर भागा। उसने बेसिन का नल पूरी रफ्तार से खोल दिया और अंजलि के उस 'गंदे प्यार' को मुँह से बाहर निकालने के लिए कुल्ला करने लगा।

आर्यन जब बार-बार कुल्ला कर रहा था, तो उसे महसूस हुआ कि यह सिर्फ मुँह साफ करना नहीं था, बल्कि वह उस 'अधीनता' को धोने की कोशिश कर रहा था जो अंजलि ने उस पर थोप दी थी। अब तक आर्यन खुद को इस खेल का खिलाड़ी समझ रहा था, लेकिन आज अंजलि ने साबित कर दिया कि वह सिर्फ एक मोहरा नहीं है—वह शतरंज की बिसात बिछाने वाली असली 'क्वीन' है।

बाथरूम के बाहर बिस्तर पर बैठी अंजलि आर्यन की हरकतों को सुन रही थी। वह जानती थी कि आर्यन को घिन आ रही है, और यही उसका असली 'मास्टरस्ट्रोक' था। वह चाहती थी कि आर्यन का अहंकार थोड़ा टूटे, ताकि वह कंचन मासी के आने पर और भी ज़्यादा सावधानी और शिद्दत से काम करे।

अंजलि धीरे से उठी और बाथरूम के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई। उसने देखा कि आर्यन आईने में खुद को देख रहा है, उसके होंठ कुल्ला करने के कारण लाल हो चुके थे।

अंजलि ने महसूस किया कि अब आर्यन उसकी मुट्ठी में है। जब एक औरत अपने पुरुष को उसके अपने ही 'अर्क' का स्वाद चखा देती है, तो वह उस पुरुष के मन से हर तरह की झिझक खत्म कर देती है।

वह आर्यन के पास गई और उसके पीछे खड़ी होकर आईने में उसकी आँखों से आँखें मिलाईं। "क्यों? बहुत घिन आ रही है? आर्यन, अगर तू अपनी ही चीज़ से घिन करेगा, तो दुनिया को कैसे फतह करेगा? याद रख, शाम को जब कंचन यहाँ होगी, तो तुझे उसे भी इसी स्वाद तक पहुँचाना है।"

आर्यन ने तौलिए से अपना मुँह पोंछा और पलटकर अंजलि को देखा। उसकी कन्फ्यूजन अब धीरे-धीरे एक ठंडे इरादे में बदल रही थी। अंजलि की इस 'घिनौनी' हरकत ने उसे मानसिक रूप से और भी पत्थर बना दिया था।

"माँ... आपने जो किया, वो मैं कभी नहीं भूलूँगा। पर अब मुझे समझ आ गया कि आप क्या चाहती हैं। आप चाहती हैं कि मैं पूरी तरह से एक जानवर बन जाऊँ। ठीक है... तो शाम को कंचन मासी का स्वागत एक जानवर ही करेगा।"
 
बाथरूम की उस ठंडी दीवार के सहारे आर्यन खड़ा था, मुँह में अब भी उस कड़वेपन का अहसास बाकी था, लेकिन अंजलि आज अपनी 'महारानी' वाली भूमिका को अंतिम पड़ाव तक ले जाने पर आमादा थी। जैसे ही आर्यन ने तौलिए से अपना मुँह पोंछा, अंजलि ने बिजली की फुर्ती से उसे फिर से दीवार से सटा दिया।

अंजलि की आँखों में इस वक्त एक ऐसी चमक थी जो आर्यन ने पहले कभी नहीं देखी थी। यह एक 'अल्फा फीमेल' की चमक थी, जिसने अपने शेर को घुटनों पर ला दिया था।

अंजलि ने बिना किसी चेतावनी के अपने होंठ आर्यन के होंठों पर फिर से जड़ दिए। वही वीर्य का खारा और गाढ़ा स्वाद, जो अब अंजलि की लार के साथ मिलकर और भी तीव्र हो चुका था, फिर से आर्यन के मुँह के अंदर घुसने लगा। आर्यन ने झटके से अपना सिर पीछे हटाना चाहा, उसके हाथ अंजलि के कंधों को दूर धकेलने की कोशिश करने लगे। "नहीं माँ... प्लीज़... अभी नहीं..." वह बुदबुदाया, उसका चेहरा घिन के मारे सिकुड़ रहा था।

लेकिन अंजलि हार मानने वालों में से नहीं थी। उसने अपनी चाल चली—उसने अपना दाहिना हाथ नीचे ले जाकर आर्यन के ढीले पड़ते हुए Testicles को अपनी मुट्ठी में भर लिया। उसने उन्हें इतनी ज़ोर से और इतनी चतुराई से दबाया कि आर्यन के शरीर में दर्द और एक अजीब सी 'मजबूरी वाली उत्तेजना' का करंट दौड़ गया।

जैसे ही अंजलि ने नीचे से दबाव बनाया, आर्यन की गर्दन अपने आप झुक गई और उसका मुँह खुल गया। अंजलि ने अपनी पूरी ज़ुबान उसके हलक तक डाल दी। अब आर्यन चाहकर भी पीछे नहीं हट सकता था। उसे अपनी ही मर्दानगी का वो अर्क, जो उसकी माँ के मुँह में 'पवित्र' हो चुका था, वापस पीना ही पड़ा।

इस पल में दोनों की मानसिकता कामुकता के एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर थी जहाँ से आम इंसान का सोचना बंद हो जाता है:

आर्यन को घिन तो आ रही थी, लेकिन जैसे-जैसे अंजलि की उंगलियाँ उसके अंडकोषों से खेल रही थीं, उसका शरीर फिर से प्रतिक्रिया देने लगा। उसे अपनी ही 'गंदगी' का स्वाद अब एक 'नशे' की तरह लगने लगा। एक पुरुष की मानसिकता में जब उसे किसी ऐसी चीज़ को करने पर मजबूर किया जाता है जिससे उसे घृणा हो, तो वह 'अपमान' उसे और भी भयानक तरीके से उत्तेजित कर देता है। उसे लगा कि वह अब अपनी माँ का बेटा नहीं, उसका खिलौना बन चुका है।

अंजलि का मकसद केवल बदला लेना नहीं था। वह आर्यन के दिमाग से 'घिन' का शब्द ही मिटा देना चाहती थी। वह चाहती थी कि शाम को जब कंचन मासी यहाँ हो, तो आर्यन के अंदर कोई झिझक न रहे। उसे पता था कि जब कोई पुरुष अपनी माँ का वीर्य युक्त चुंबन ले सकता है, तो वह दुनिया का कोई भी 'पाप' बेहिचक कर सकता है। वह आर्यन को 'परम-कामुक' बना रही थी।

अंजलि ने आखिरकार उसके होंठ छोड़े। आर्यन हाँफ रहा था, उसके होंठों पर लार और वीर्य की एक गीली परत जमी थी। अंजलि ने अपनी उंगली से उसके होंठ साफ किए और उसे चखते हुए बड़ी बेबाकी से बोली:

"अब कैसा लगा? अब तो घिन नहीं आ रही ना? याद रख आर्यन, कंचन के सामने तुझे इससे भी ज़्यादा निडर होना होगा। वो पूजा करने वाली औरत है, उसे तुझे अपनी इस 'गंदी' दुनिया का स्वाद चखाना है।"

आर्यन ने एक गहरी सांस ली। उसकी नज़रों में अब घिन की जगह एक 'ठंडा पागलपन' आ चुका था। वह समझ गया था कि अंजलि ने उसे एक ऐसी आग में झोंक दिया है जहाँ अब सिर्फ तबाही और चरम सुख है।

शावर से गिरती ठंडी पानी की बौछारें आर्यन के शरीर पर पड़ रही थीं, लेकिन उसके दिमाग के अंदर की आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी। आर्यन इस वक्त एक ऐसी 'सुन्न अवस्था' में था जहाँ उसे होश और मदहोशी के बीच का अंतर समझ नहीं आ रहा था।

अंजलि के उस वीर्य युक्त 'फ्रेंच किस' ने आर्यन की मर्दानगी के अहंकार को भीतर तक झकझोर दिया था। उसे लग रहा था कि वह एक शिकारी से सिमटकर एक 'शिकार' बन गया है। लेकिन इसी टूटन में उसे एक ऐसा आनंद मिल रहा था जो उसने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था—अपनी ही माँ के हाथों पूरी तरह 'बर्बाद' होने का आनंद।

शावर के नीचे दोनों के नग्न शरीर पानी में भीग रहे थे। पानी की बूंदें अंजलि के गोरे और भरे हुए बदन से फिसलकर नीचे गिर रही थीं। आर्यन अभी भी थोड़ा खोया-खोया सा था, अंजलि की उस हरकत का असर उसके दिमाग पर गहरा था।

आर्यन को महसूस हो रहा था कि अंजलि ने उसके होंठों और मुँह के ज़रिए उसके पूरे वजूद पर अपना कब्ज़ा कर लिया है। एक पुरुष की मानसिकता में उसका 'वीर्य' उसकी शक्ति का प्रतीक होता है, और अंजलि ने उसी शक्ति को उसे 'वापस' पिलाकर यह साबित कर दिया कि आर्यन अब पूरी तरह उसके प्रभाव में है। इस अहसास ने आर्यन को थोड़ा कमज़ोर, लेकिन बहुत ज़्यादा कामुक बना दिया था।

नहाते वक्त अंजलि ने बड़े प्यार से आर्यन के जिस्म पर साबुन लगाया। उसने आर्यन के चेहरे को सहलाया जैसे वह उसे चखने के बाद अब उसे सहला रही हो। "घबरा मत मेरे शेर... ये तो बस शुरुआत थी। मैंने तुझे बस उस 'मर्यादा' के बोझ से आज़ाद किया है जो तुझे रोक रही थी। अब तू कंचन के सामने एक नया आर्यन होगा।"

दोनों ने एक-दूसरे को अच्छे से नहलाया। शावर के नीचे आर्यन की कन्फ्यूजन धीरे-धीरे शांत हुई और उसकी जगह एक 'ठंडे और हिंसक आत्मविश्वास' ने ले ली। उसने समझ लिया कि अगर वह अपनी माँ के साथ इस हद तक जा सकता है, तो कंचन मासी का 'पवित्र' किला ढहाना उसके लिए बच्चों का खेल होगा।

बाथरूम से बाहर निकलकर दोनों ने खुद को सुखाया। कमरे में अब इत्र और लोशन की खुशबू फैल चुकी थी।

अंजलि ने अपनी अलमारी से एक ऐसी साड़ी निकाली जो दिखने में तो सोबर थी, लेकिन उसका कपड़ा इतना बारीक था कि रोशनी पड़ते ही उसके शरीर की बनावट साफ झलकती थी। उसने गहरा सिंदूर लगाया और अपनी आँखों में वही चमक बरक़रार रखी।

आर्यन ने एक फिटिंग वाली शर्ट और ट्राउजर पहना। वह अब पहले से कहीं ज़्यादा शांत और खतरनाक दिख रहा था। उसकी आँखों में अब वह 'घिन' नहीं थी, बल्कि एक ऐसी भूख थी जो सिर्फ कंचन मासी के आने पर ही शांत होने वाली थी।

ड्राइंग रूम की लाइटें थोड़ी मद्धम कर दी गईं। अंजलि ने किचन में चाय और नाश्ते की तैयारी शुरू की, जबकि आर्यन सोफे पर बैठकर दरवाज़े की तरफ देखने लगा। उसके मुँह में अब भी अंजलि के उस चुंबन की हल्की सी कड़वाहट और खुशबू बाकी थी, जो उसे याद दिला रही थी कि वह अब किसी भी हद को पार करने के लिए तैयार है।

"जीजी... मैं पहुँच गई हूँ, बस ऑटो से उतर रही हूँ।"

अंजलि के फोन पर कंचन मासी का मैसेज फ्लैश हुआ।

ड्राइंग रूम में मद्धम रोशनी और इत्र की खुशबू के बीच अंजलि ने आर्यन को अपने करीब बुलाया। उसकी आवाज़ में अब एक 'मास्टरमाइंड' की गंभीरता थी। वह जानती थी कि कंचन जैसी 'पवित्र' महिला को सीधे रास्ते पर लाना मुमकिन नहीं है, इसके लिए शतरंज की चालें बहुत ही सफाई से चलनी होंगी।

अंजलि ने आर्यन की शर्ट के कॉलर ठीक किए और उसकी आँखों में झाँकते हुए धीरे से फुसफुसाया:

"आर्यन, ध्यान से सुन। जैसे ही कंचन अंदर आएगी, तू उसे नमस्ते करके थोड़ी देर बैठेगा, और फिर बहाना बनाकर मार्केट निकल जाएगा। उसे ये नहीं लगना चाहिए कि तू यहाँ ताक-झांक कर रहा है। उसे सहज महसूस कराना मेरा काम है। जब तक तू बाहर रहेगा, मैं उसकी ज़मीन तैयार करूँगी।"

अंजलि ने अपनी आवाज़ और धीमी कर ली। "मार्केट से कुछ घर का राशन ले आना ताकि शक न हो, लेकिन सबसे ज़रूरी चीज़— कॉन्डम के पैकेट और लुब्रिकेशन लाना मत भूलना। कंचन सालों से 'सूखी' पड़ी है, उसका शरीर इस वक्त पत्थर जैसा होगा। उसे इस ७ इंच को बर्दाश्त करने के लिए 'मदद' की ज़रूरत पड़ेगी।"

"सामान लाकर तू चुपचाप किचन में रख देना और बिना किसी शोर के अपने कमरे में चला जाना। मैं उसे बातों में फंसाकर उस मानसिक स्थिति में ले आऊँगी जहाँ वो अपनी 'मर्यादा' और 'भक्ति' को भूलने लगेगी। जब मैं तुझे इशारा करूँगी, तभी तू बाहर आना।"

यहाँ अंजलि एक ऐसी 'प्रॉक्सी शिकारी' की तरह व्यवहार कर रही है जो अपने शिकार को पहले चारा डालती है और फिर उसे अपने जाल में फंसाती है।

अंजलि जानती है कि कंचन अपनी बड़ी बहन पर आँख बंद करके भरोसा करती है। वह पहले एक 'दुखी और सहानुभूति रखने वाली बहन' बनकर कंचन के दिल की गहराई में छिपे राज़ और उसकी अधूरी कोख की टीस को कुरेदेगी।

आर्यन को कॉन्डम और लुब्रिकेंट लाने भेजना यह दर्शाता है कि अंजलि इस खेल को लेकर कितनी गंभीर और योजनाबद्ध है। वह चाहती है कि जब 'क्रिया' शुरू हो, तो कोई रुकावट न आए। उसे पता है कि कंचन का शरीर डर और बांझपन के कारण शुरू में विरोध करेगा, इसलिए वह लुब्रिकेंट जैसी चीज़ों को पहले से तैयार रखना चाहती है।

आर्यन ने सिर हिलाकर अपनी सहमति दी। उसके दिमाग में अब मार्केट का सामान नहीं, बल्कि वो 'पैकेट' घूम रहे थे जो रात को कंचन मासी के 'पवित्र' मंदिर में पहली आहुति देने वाले थे।

तभी... घर की डोरबेल बजी। 'टिंग-टोंग'।

दरवाज़े के बाहर कंचन मासी खड़ी थीं—हाथ में पूजा का प्रसाद, माथे पर तिलक और चेहरे पर वही सादगी भरा मुखौटा। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि अंदर उसका भतीजा अपने मुँह में अपनी माँ के वीर्य का स्वाद लिए बैठा है और उसकी माँ ने उसके लिए 'चिकनाई' का इंतज़ार कर रखा है।

शाम के 7:00 बज रहे थे। बाहर ढलते सूरज की नारंगी रोशनी अब अंधेरे में तब्दील हो रही थी और घर के अंदर एक बहुत ही शांत और पारिवारिक माहौल था। अंजलि की योजना के अनुसार, सब कुछ बिल्कुल सामान्य दिख रहा था—इतना सामान्य कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि कुछ घंटों पहले इसी कमरे में क्या हुआ था।

कंचन मासी सोफे पर बैठी थीं। उनके चेहरे पर वही चिर-परिचित सौम्यता और शांति थी। उन्होंने हल्के पीले रंग की सूती साड़ी पहनी थी, माथे पर एक छोटा सा लाल तिलक था और हाथों में कांच की चूड़ियां जो उनकी हर हरकत पर हल्की सी खनक पैदा कर रही थीं।

अंजलि और कंचन सोफे पर बैठकर पुराने रिश्तेदारों की बातें कर रही थीं। बातचीत का विषय बहुत ही साधारण था— "शादी-ब्याह में कौन आया, किसकी तबीयत खराब है, और मंदिर के उत्सव में इस बार कितनी भीड़ थी।" कंचन अपनी बातों में इतनी खोई हुई थी कि उसे अपनी बड़ी बहन की आँखों में छिपा वह शातिराना रोमांच नज़र नहीं आ रहा था।

आर्यन पास ही की कुर्सी पर बैठा बड़े ध्यान से मासी की बातें सुन रहा था। वह बीच-बीच में मुस्कुरा देता या किसी बात पर हामी भर देता। अंजलि के सिखाए अनुसार, उसने अपनी आँखों की उस 'भूख' को पलकों के पीछे छिपा लिया था। वह एक आदर्श भतीजे की तरह व्यवहार कर रहा था।

अंजलि ने उठकर किचन से गरमा-गरम चाय और पकौड़े परोसे। "ले कंचन, तेरे हाथ की बनी चाय तो मुझे बहुत याद आती है, पर आज तू मेरे हाथ की पी।" अंजलि ने बहुत ही सहजता से कहा। बातों-बातों में कंचन ने आर्यन के करियर और उसकी पढ़ाई के बारे में पूछा, जिसका आर्यन ने बहुत ही सलीके से जवाब दिया।

कंचन को डर था कि शायद यहाँ का माहौल उसे असहज करेगा, लेकिन अंजलि और आर्यन के सामान्य व्यवहार ने उसका बचाव तंत्र ढीला कर दिया। वह अब खुद को सुरक्षित महसूस कर रही थी।

आर्यन के लिए यह एक परीक्षा की तरह था। उसे पता था कि उसे थोड़ी देर में निकलना है। वह मासी की सादगी को देख रहा था और मन ही मन उस लुब्रिकेंट और कॉन्डम के बारे में सोच रहा था जो उसे थोड़ी देर में लाने थे। वह देख रहा था कि मासी कितनी 'सीधी' दिखती हैं और यही सादगी उसे अंदर ही अंदर उत्तेजित कर रही थी।

चाय खत्म होते ही आर्यन ने घड़ी देखी और बहुत ही स्वाभाविक अंदाज़ में खड़ा हुआ।

"माँ, मुझे याद आया... किचन का कुछ सामान खत्म हो गया है और मुझे अपनी एक प्रोजेक्ट फाइल के लिए कुछ स्टेशनरी भी लेनी है। मैं अभी मार्केट होकर आता हूँ, आधे-पौन घंटे में लौट आऊँगा।"

अंजलि ने कंचन की ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ बेटा, जा ले आ। कंचन, तू बैठ... तब तक हम थोड़ी और बातें करते हैं।"

कंचन ने मुस्कुराकर आर्यन को देखा, "आराम से जाना बेटा।" उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि आर्यन बाज़ार से 'राशन' के साथ-साथ उसकी 'पवित्रता' को भंग करने का सामान भी लाने जा रहा है।

ड्राइंग रूम में अब शाम की शांति के साथ-साथ एक अपनापन सा छा गया था। आर्यन के मार्केट निकलते ही अंजलि ने अपनी योजना के अगले हिस्से पर काम शुरू कर दिया। वह जानती थी कि अगर कंचन को किचन के कामों में उलझा दिया गया, तो वह गहरा संवाद नहीं हो पाएगा जिसकी उसे ज़रूरत थी।

अंजलि ने सोफे पर कंचन के थोड़ा और करीब सरकते हुए अपना फोन निकाला और बड़े लाड़ से बोली:

"देख कंचन, तू बहुत दिनों बाद आई है। मैं नहीं चाहती कि आज की ये शाम चूल्हे-चौके में बिताए। हम दोनों बहनें आज जी भरकर बातें करेंगे, इसलिए खाना आज मैं बाहर से ही मँगा रही हूँ।"

कंचन ने थोड़ा संकोच करते हुए मना करना चाहा, "नहीं जीजी, क्या ज़रूरत है... मैं अभी कुछ बना देती हूँ।" लेकिन अंजलि ने उसकी एक न सुनी। "चुप कर! मुझे पता है तुझे पनीर लबाबदार और दाल मखनी कितनी पसंद है। आज तेरा वही फेवरेट खाना आएगा।"

अंजलि ने फोन पर शहर के सबसे बेहतरीन रेस्टोरेंट से कंचन की पसंद का शाही खाना ऑर्डर कर दिया। यह महज़ खाना नहीं था, बल्कि कंचन को 'स्पेशल' महसूस कराने का एक तरीका था। जब कोई आपको आपकी पसंद की चीज़ें बिना माँगे देता है, तो आप अनजाने में ही उस व्यक्ति के प्रति अपनी मानसिक दीवारें गिरा देते हैं।

अच्छी मेहमाननवाज़ी और बाहर का लजीज़ खाना कंचन को एक मानसिक 'कंफर्ट ज़ोन' में ले जा रहा था। उसे लग रहा था कि उसकी बहन उससे कितना प्यार करती है और उसका कितना ख्याल रखती है।

किचन की ज़िम्मेदारी खत्म होते ही अब दोनों बहनों के पास घंटों का समय था। अंजलि जानती थी कि पेट भरा होने पर और मन शांत होने पर इंसान अपने सबसे गहरे राज़ उगलने लगता है। वह कंचन को भावनात्मक रूप से 'नग्न' करने की तैयारी कर रही थी।

खाना ऑर्डर करने के बाद अंजलि ने फोन मेज़ पर रख दिया। कमरे में अब केवल पंखे की हल्की आवाज़ थी। अंजलि ने कंचन के चेहरे को गौर से देखा—वही सादगी, लेकिन आँखों के नीचे हलके काले घेरे जो उसके अकेलेपन और रातों की बेचेनी की गवाही दे रहे थे।

"कंचन..." अंजलि ने धीरे से उसका हाथ अपने हाथ में लिया, "ऊपर-ऊपर से तो तू बहुत शांत दिखती है, और पूजा-पाठ में मन भी लगा लेती है... पर सच बता, क्या तू वाकई खुश है? तेरी शादीशुदा ज़िंदगी में वो 'सुकून' है जिसकी तूने उम्मीद की थी?"

कंचन की मुस्कुराहट अचानक फीकी पड़ गई। उसने अपनी नज़रें झुका लीं और अपनी उंगलियों से साड़ी का पल्लू मरोड़ने लगी। अंजलि ने सही नब्ज़ पर हाथ रख दिया था।

ड्राइंग रूम का माहौल अचानक भारी हो गया। अंजलि ने जब कंचन के जख्मों को कुरेदने की कोशिश की, तो उसे लगा था कि कंचन रोने लगेगी या अपनी सिसकियाँ दबाएगी। लेकिन कंचन ने अपनी झुकी हुई पलकें उठाईं और अंजलि की आँखों में सीधे देखते हुए कुछ ऐसा कह दिया कि अंजलि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

अंजलि, जो अब तक इस खेल की 'मास्टरमाइंड' बनी हुई थी, कंचन की उस एक बात से जैसे पथरा सी गई। उसके पास कोई जवाब नहीं था, कोई दलील नहीं थी। वह बस फटी आँखों से अपनी छोटी बहन को देखती रह गई, जिसे वह 'सीधी-सादी' समझ रही थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह सुनाई दे रही थी।

तभी दरवाजे की बेल बजी और उस भारी सन्नाटे को चीर दिया। आर्यन वापस आ चुका था।

आर्यन के हाथों में सामान के दो बड़े थैले थे। ऊपर से देखने पर उसमें ब्रेड, दूध और किचन का कुछ राशन दिख रहा था, लेकिन उन पैकेटों की गहराई में कॉन्डम और लुब्रिकेंट की वो डिब्बियाँ छिपी थीं, जो आज रात कंचन मासी के 'पवित्र' शरीर पर इस्तेमाल होने वाली थीं।

आर्यन जैसे ही अंदर आया, उसने महसूस किया कि कमरे की हवा बदली हुई है। उसकी माँ (अंजलि) का चेहरा सफेद पड़ा था और वह किसी गहरी सोच में डूबी थी, जबकि कंचन मासी के चेहरे पर एक अजीब सी, रहस्यमयी शांति थी—जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा बोझ अंजलि के कंधों पर डाल दिया हो।

ठीक उसी वक्त रेस्टोरेंट का डिलीवरी बॉय भी खाना लेकर आ गया। आर्यन ने सारा सामान किचन में रखा और अपनी माँ को एक 'इशारा' किया कि काम हो गया है। लेकिन अंजलि ने उसकी तरफ देखा तक नहीं, वह अब भी कंचन की उस बात के असर में थी।

तीनों डाइनिंग टेबल पर बैठ गए। पनीर लबाबदार और दाल मखनी की खुशबू पूरे कमरे में फैली थी, लेकिन भूख जैसे मर चुकी थी।

वह बार-बार कंचन को देख रही थी। कंचन बड़े आराम से निवाला तोड़ रही थी, जैसे उसने कुछ कहा ही न हो। अंजलि का दिमाग दौड़ रहा था, अंजलि को पहली बार लगा कि वह अपनी बहन को ज़रा भी नहीं जानती।

आर्यन अपनी जगह पर बैठा चुपचाप खाना खा रहा था, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार मेज़ के नीचे कंचन मासी के पैरों की ओर जा रही थीं। वह देख रहा था कि मासी कितनी शिष्टता से बैठी हैं, जबकि उसके बैग में रखा लुब्रिकेंट बस कुछ ही देर में उस शिष्टता की धज्जियाँ उड़ाने वाला था।

खाना खत्म हुआ। कंचन ने उठकर बर्तन समेटने में अंजलि की मदद की। अंजलि अभी भी सामान्य होने की कोशिश कर रही थी। आर्यन अपने कमरे की ओर बढ़ा, पर रुककर उसने कंचन को देखा।

"मासी, आप आज रात माँ के कमरे में सोएंगी या मेरे वाले कमरे में? मतलब, मेरा कमरा काफी हवादार है..." आर्यन ने बहुत ही सलीके से जाल फेंका।

कंचन ने मुड़कर आर्यन को देखा और एक ऐसी मुस्कान दी जिसमें ममता कम और गहराई ज़्यादा थी। "देखते हैं आर्यन"

आर्यन अपने कमरे में पहुँचा ही था कि उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी। उसने उम्मीद की थी कि अंजलि उसे 'ग्रीन सिग्नल' देगी, लेकिन जो मैसेज उसने पढ़ा, उसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी।

अंजलि का मैसेज: "बेटा, आज चाहे कुछ भी हो जाए, तू नीचे मत आना। भूलकर भी कमरे से बाहर मत निकलना। जो मैंने सोचा था, स्थिति उससे कहीं ज़्यादा गंभीर है।"

आर्यन का दिमाग चकरा गया। उसने अभी-अभी कॉन्डम और लुब्रिकेंट का इंतज़ाम किया था, उसका शरीर कंचन मासी की कल्पना से दहक रहा था, और अब उसकी माँ उसे पीछे हटने को कह रही थी?

वह बिस्तर पर बैठ गया, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कंचन मासी ने खाने से पहले अंजलि के कान में ऐसा क्या कह दिया कि अंजलि इतनी डर गई। क्या मासी को उनके और अंजलि के रिश्ते का पता चल गया? या मासी का अपना कोई ऐसा काला सच है जिसने अंजलि जैसी शातिर औरत के पसीने छुड़ा दिए?

अंजलि, जो कुछ देर पहले तक कंचन को 'शिकार' बनाने की योजना बना रही थी, अब अचानक 'डिफेंसिव' मोड में आ गई थी। उसका मैसेज महज़ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक तरह की 'गुहार' थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह आर्यन को किसी बड़े खतरे या किसी ऐसे खुलासे से बचाना चाहती है जो आर्यन बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।

नीचे के ड्राइंग रूम से हल्की-हल्की फुसफुसाहट की आवाज़ें आ रही थीं। आर्यन ने अपने कमरे का दरवाज़ा थोड़ा सा खोला और गलियारे की ओर कान लगाए।

उसे कंचन मासी के रोने की नहीं, बल्कि बहुत ही सपाट और ठंडी आवाज़ सुनाई दे रही थी। वह आवाज़ उस 'सीधी-सादी' मासी की लग ही नहीं रही थी जो शाम को मंदिर का प्रसाद लेकर आई थीं।

बीच-बीच में अंजलि के टूटे हुए शब्द सुनाई दे रहे थे— "नहीं कंचन... ऐसा नहीं हो सकता... तूने इतने सालों तक ये बात छुपाई कैसे?"

आर्यन के पास दो रास्ते थे। या तो वह अपनी माँ की बात मानकर कमरे में दुबका रहे, या फिर वह चुपके से नीचे जाए और उस सस्पेंस का पता लगाए जिसने उनकी पूरी योजना को तहस-नहस कर दिया था।

उसने हाथ में वही लुब्रिकेंट की डिब्बी उठाई और उसे कसकर भींच लिया। उसकी मर्दानगी अब उस राज़ को जानने के लिए तड़प रही थी। उसे लगा कि शायद कंचन मासी कोई 'सीधी' औरत नहीं, बल्कि अंजलि से भी बड़ी 'खिलाड़ी' निकली हैं।

रात के 11:00 बज रहे थे। घर का कोना-कोना खामोशी की चादर ओढ़े हुए था, लेकिन आर्यन के दिमाग में शोर थमता नहीं था। अंजलि का वह मैसेज—"नीचे मत आना"—आर्यन के सीने में किसी कील की तरह चुभ रहा था। उसकी मर्दानगी और उसकी उत्सुकता के बीच एक युद्ध चल रहा था।

आखिरकार, वह खुद को रोक नहीं पाया।

आर्यन ने अपने कमरे का दरवाज़ा रत्ती भर आवाज़ किए बिना खोला। वह दबे पाँव, बिल्ली की तरह सीढ़ियाँ उतरकर नीचे पहुँचा। दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे डर था कहीं मासी उसे सुन न लें।

वह अंजलि के कमरे के बाहर खड़ा हो गया। उसने अपना कान लकड़ी के ठंडे दरवाज़े पर टिका दिया। वह उम्मीद कर रहा था कि उसे कोई चीख, कोई रोना या कम से कम कोई बड़ा खुलासा सुनने को मिलेगा।

लेकिन अंदर से जो सुनाई दिया, उसने उसे और भी ज़्यादा कंफ्यूज कर दिया। उसे किसी के बात करने का लहज़ा तो सुनाई दे रहा था, पर शब्द समझ नहीं आ रहे थे। वह बस एक 'फुसफुसाहट' थी—जैसे दो लोग किसी बहुत ही गहरे और पुराने राज़ को एक-दूसरे के कान में डाल रहे हों।

उसे बीच-बीच में अंजलि की आवाज़ सुनाई देती, जो डरी हुई और दबी हुई थी। कंचन की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। ऐसा लग रहा था जैसे कंचन आज अपनी बहन को वह आईना दिखा रही है जिसे अंजलि ने सालों से नहीं देखा था।

5 मिनट तक वहाँ सांस रोककर खड़े रहने के बाद, जब उसे कुछ हाथ नहीं लगा, तो आर्यन झेंप गया। उसे लगा कि वह यहाँ एक जासूस की तरह खड़ा है और अंदर उसकी माँ और मासी शायद किसी ऐसी चीज़ में उलझी हैं जो उसकी समझ से बाहर है।

वह वापस अपने कमरे की ओर मुड़ा। उसके हाथ में अब भी वह लुब्रिकेंट और पैकेट का ख्याल था, जो अब उसे बेमानी लग रहे थे। जिस 'शिकार' को वह आज रात फतह करने वाला था, वह शिकार अब खुद एक रहस्यमयी शिकारी बन चुका था।

वापस अपने कमरे में पहुँचकर उसने झटके से दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर गिर गया। अंजलि का वो मैसेज अब उसे और भी डरावना लग रहा था। "स्थिति गंभीर है"—इन शब्दों का मतलब क्या था?

आर्यन छत के पंखे को घूमते देख रहा था। उसे अपनी माँ पर गुस्सा भी आ रहा था और चिंता भी हो रही थी। तभी... उसके कमरे के हैंडल के घूमने की हल्की सी आवाज़ आई।

दरवाज़ा धीरे से खुला और एक साया अंदर दाखिल हुआ। वह अंजलि थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखों में एक अजीब सी दहशत थी और वह कांप रही थी।

उसने आते ही आर्यन को गले लगा लिया और सिसकते हुए फुसफुसायी, "आर्यन... वो... वो वैसी नहीं है जैसा हमने सोचा था।"

अंजलि की सांसें तेज़ चल रही थीं और उसके चेहरे पर छाई वो घबराहट आर्यन को अंदर तक हिला गई। उसने आर्यन के कंधे को कसकर भींचा और कांपती आवाज़ में बस इतना ही कहा:

"आर्यन... अभी मैं तुझे कुछ नहीं बता सकती। स्थिति हमारे हाथ से निकल चुकी है। मैं बस नीचे पानी पीने के बहाने आई हूँ, वो मेरा इंतज़ार कर रही है। तू बस... तू बस अपना दरवाज़ा अंदर से बंद कर ले और सो जा।"

इतना कहकर अंजलि मुड़ी और अंधेरे गलियारे में गायब हो गई। उसके कदमों की आहट इतनी तेज़ थी जैसे वह किसी खौफनाक साये से बचकर भाग रही हो।

आर्यन वहीं खड़ा रह गया, उसका हाथ कमरे के हैंडल पर ही था। जो उत्साह, जो हवस और जो योजना उसने दोपहर से बना रखी थी, वह अब ताश के पत्तों की तरह ढह चुकी थी।

आर्यन को इस वक्त अपनी मर्दानगी पर थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था। वह ७ इंच का फौलाद, जो कुछ देर पहले तक कंचन मासी के वजूद को चीरने के लिए बेताब था, अब एक ठंडी खामोशी में सिमट गया था। अंजलि के डर ने आर्यन के अंदर की कामुकता को 'असुरक्षा' में बदल दिया था।

वह बिस्तर पर लेट गया, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। कंचन मासी की वो शांत मुस्कान अब उसके दिमाग में किसी डरावनी फिल्म के सीन की तरह घूम रही थी। उसने सोचा— "आखिर एक औरत ऐसा क्या कह सकती है कि अंजलि जैसी खिलाड़ी माँ, जिसने खुद अपने बेटे के साथ सारे रिश्ते तोड़ दिए, वो इतनी सहम जाए?"

आर्यन ने खिड़की से बाहर देखा। पूरा मोहल्ला सो चुका था, लेकिन उसके घर की नीचे वाली मंजिल पर एक ऐसा राज़ सांस ले रहा था जो सुबह होते-होते सब कुछ बदलने वाला था।

आखिरकार, आर्यन ने हार मान ली। उसने अपनी दराज से वो कॉन्डम के पैकेट और लुब्रिकेंट निकाला और उन्हें वापस गहराई में छुपा दिया। उसे अहसास हुआ कि आज की रात 'शिकार' की नहीं, बल्कि 'बचाव' की रात है।

उसने अपनी आँखें बंद कीं, पर नीचे से आने वाली हर हल्की आवाज़—पंखे की सरसराहट या पानी गिरने की आवाज़—उसे चौंका रही थी। उसने तकिए को अपने कान पर रख लिया और खुद को यह समझाने की कोशिश की कि सुबह सब ठीक हो जाएगा।

धीरे-धीरे थकान उसके दिमाग पर हावी होने लगी। आर्यन एक ऐसी नींद में उतरने लगा जहाँ सपने भी धुंधले और डरावने थे। उसे पता नहीं था कि जब वह सुबह आँख खोलेगा, तो उसके सामने कंचन मासी का वही पुराना चेहरा होगा या कोई ऐसा चेहरा जिसे देखकर वह खुद को भी भूल जाएगा।

घर में अब पूरी तरह सन्नाटा था... पर यह वो सन्नाटा था जो किसी बड़े धमाके से पहले होता है।
 
रात के 3:00 बज रहे थे। पूरे घर में सन्नाटे का पहरा था, लेकिन आर्यन की नींद अचानक टूटी। उसे ऐसा लगा जैसे हवा में कोई बहुत ही बारीक और मादक संगीत तैर रहा हो। पहले उसे लगा कि यह उसका वहम है, लेकिन जैसे-जैसे वह सचेत हुआ, आवाज़ें साफ़ होने लगीं।

वह आवाज़ें अंजलि के बेडरूम से आ रही थीं।

आर्यन बिस्तर पर उठकर बैठ गया। सन्नाटे को चीरती हुई वे आवाज़ें महज़ बातचीत नहीं थीं। वे सकसाहटों और सिसकारियों का एक ऐसा संगम थीं जो सिर्फ चरम सुख के क्षणों में पैदा होती हैं।

आर्यन ने गौर किया कि वे आवाज़ें एक नहीं, बल्कि दो औरतों की थीं। अंजलि की भारी और मदहोश कर देने वाली आवाज़, और उसके साथ मिली हुई कंचन मासी की वह तीखी और कंपकंपाती हुई सिसकारी। वे दोनों एक-दूसरे के इतने करीब थीं कि उनके बीच की दीवारें गिर चुकी थीं।

आर्यन के सीने में जलन और गुस्से की एक लहर उठी। "धोखा!" उसके दिमाग ने चिल्लाकर कहा। दोपहर भर उसे तैयार किया गया, उसे ७ इंच की मर्दानगी का अहसास दिलाया गया, और अब जब असली खेल शुरू हुआ, तो उसकी अपनी माँ ने उसे 'स्थित गंभीर है' का डर दिखाकर कमरे में कैद कर दिया और खुद मासी के साथ मजे ले रही है?

उसे लगा कि अंजलि ने उसे जानबूझकर बाहर रखा ताकि वह कंचन को पूरी तरह अकेले 'हैंडल' कर सके। या शायद कंचन ने अंजलि के सामने कोई ऐसी शर्त रखी थी जिसमें आर्यन के लिए कोई जगह नहीं थी।

आर्यन का मन किया कि वह अभी नीचे जाए, दरवाज़ा लात मारकर खोल दे और पूछे कि यह 'गंभीर स्थिति' क्या यही थी? लेकिन तभी उसे अंजलि का वह चेहरा याद आया जब वह पानी पीने के बहाने ऊपर आई थी—वह डर असली था।

आर्यन सोचने लगा कि क्या अंजलि और कंचन ने मिलकर उसे बेवकूफ बनाया है? या फिर कंचन के पास कोई ऐसा जादू या राज़ है जिसने अंजलि को भी अपना गुलाम बना लिया है?

गुस्से और उत्तेजना के बीच आर्यन इतना थक चुका था कि उसने दोबारा तकिया अपने सिर पर रख लिया। उसे लगा कि अगर वह अभी नीचे गया, तो शायद वह खेल बिगड़ जाएगा जो उसकी माँ बनाने की कोशिश कर रही है। उसने खुद को सांत्वना दी— "अगर वो दोनों साथ हैं, तो सुबह मेरे लिए रास्ता और भी आसान होगा।"

आर्यन ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। नीचे से आती उन सिसकारियों की गूँज उसके कानों में गरम पिघले हुए लोहे की तरह उतर रही थी। वह ७ इंच का फौलाद, जो अब भी शांत नहीं हुआ था, चादर के नीचे अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था।

अंततः, वह गुस्से और थकान के मिले-जुले अहसास में दोबारा सो गया। लेकिन यह नींद नहीं, बल्कि एक 'बेहोशी' थी

सुबह के 7:30 बज रहे थे। रात भर की उन रहस्यमयी सिसकारियों और अंजलि के खौफनाक मैसेज के बाद आर्यन का दिमाग भारी था। वह भारी मन और अधूरी नींद के साथ सीढ़ियों से नीचे उतरा। उसे लगा था कि नीचे घर का माहौल बिखरा हुआ होगा, या शायद अंजलि और कंचन किसी गहरी चर्चा में होंगी।

लेकिन नीचे का नज़ारा देखकर आर्यन के होश उड़ गए।

ड्राइंग रूम में अगरबत्ती की भीनी-भीनी खुशबू फैली थी। सामने मंदिर के पास कंचन मासी खड़ी थीं। उन्होंने एक शुद्ध सफेद और लाल बॉर्डर वाली सूती साड़ी पहनी थी, बाल अभी भी गीले थे जो उनके कंधों पर बिखरे हुए थे। उनके हाथ में पूजा की थाली थी और वह पूरी तन्मयता से आरती गा रही थीं।

ऐसा लग रहा था जैसे रात को 3 बजे की वो मादक आवाज़ें महज़ आर्यन का कोई सपना थीं। कंचन के चेहरे पर वही पुरानी सौम्यता, वही पवित्रता और वही 'मासी' वाली ममता थी। रात के उस 'शिकारी' या 'रहस्यमयी' रूप का कहीं कोई नामो-निशान नहीं था।

अंजलि किचन में चाय बना रही थी। वह भी पूरी तरह नहा-धोकर तैयार थी। आर्यन ने जब उसकी आँखों में झाँकने की कोशिश की, तो अंजलि ने नज़रें चुरा लीं। वह रात वाली दहशत अब एक पथरीली खामोशी में बदल चुकी थी।

"उठ गया आर्यन? जल्दी तैयार हो जा, कॉलेज के लिए देर हो जाएगी," अंजलि ने बहुत ही सपाट आवाज़ में कहा। कंचन ने आरती खत्म की और आर्यन के पास आकर उसके माथे पर चंदन का टीका लगाया। "ये ले बेटा, भगवान का आशीर्वाद ले। आज तेरा मन पढ़ाई में खूब लगेगा।"

आर्यन तिलक लगवाते समय कंचन की आँखों में देख रहा था। वह ढूंढ रहा था—हवस की कोई लकीर, कोई थकान, या कोई ऐसा इशारा जो रात की उन सिसकारियों की पुष्टि करे। पर वहाँ कुछ नहीं था। कंचन की आँखें झील की तरह शांत और शीतल थीं।

आर्यन ने बिना कुछ पूछे नाश्ता किया। मेज़ पर बातचीत बहुत ही साधारण रही। कंचन ने आर्यन को कॉलेज के लिए शुभकामनाएं दीं और अंजलि ने उसे दोपहर का लंच बॉक्स पकड़ाया। कोई 'अडल्ट्री' नहीं, कोई गंदा इशारा नहीं, यहाँ तक कि अंजलि ने एक बार भी उस ७ इंच के लोहे का ज़िक्र अपनी आँखों से नहीं किया।

आर्यन अपनी बाइक स्टार्ट करके कॉलेज की ओर निकल पड़ा। रास्ते भर उसके दिमाग में सिर्फ एक ही सवाल घूम रहा था— "क्या रात को वाकई कुछ हुआ था? या मेरी माँ और मासी इतनी बड़ी अदाकारा हैं कि पूरी रात तबाही मचाने के बाद सुबह सती-सावित्री बन गई हैं?"

कॉलेज पहुँचकर भी आर्यन का मन पढ़ाई में नहीं लगा। वह लेक्चर्स के बीच में बैठा खिड़की से बाहर देखता रहा। उसके पास वो लुब्रिकेंट और कॉन्डम के पैकेट अब भी उसके बैग की एक गुप्त ज़िप में रखे थे। उसे लगा कि वह एक बहुत बड़े और गहरे दलदल में फँस गया है जहाँ सच और झूठ के बीच का अंतर मिट चुका है।

दोपहर के 2:00 बज चुके थे। आर्यन की छुट्टी होने वाली थी। उसे डर भी लग रहा था और उत्सुकता भी थी कि जब वह घर लौटेगा, तो क्या वहाँ फिर से वही 'नॉर्मल' नाटक चल रहा होगा या फिर अंजलि उसे अकेले में वो 'सच' बताएगी जिसने उस रात को बदल दिया था?

दोपहर के 3:00 बज रहे थे। जब आर्यन ने घर के अंदर कदम रखा, तो उसे उम्मीद थी कि वही रहस्यमयी भारीपन महसूस होगा, लेकिन घर के अंदर सन्नाटा पसरा हुआ था। कंचन मासी का सामान वहां नहीं था—वह जा चुकी थीं। अंजलि भी घर पर नहीं थी, शायद वह क्लीनिक निकल गई थी ताकि इस अजीबोगरीब स्थिति से थोड़ा ब्रेक ले सके।

आर्यन के शरीर और दिमाग पर पिछले 48 घंटों का बोझ इतना ज़्यादा था कि उसकी हिम्मत जवाब दे गई थी। वह ७ इंच का फौलाद, जो कल तक आग उगल रहा था, अब थकान के मारे सुस्त पड़ चुका था।

आर्यन ने किचन में रखा खाना बेमन से खाया। उसका दिमाग अभी भी उन आवाज़ों, उस वीर्य युक्त चुंबन और सुबह की उस 'पवित्र' आरती के बीच उलझा हुआ था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह जीते जी किसी स्वर्ग में था या किसी खूबसूरत नर्क में।

दो दिनों तक लगातार उत्तेजना, घृणा, और ऊँचे दर्जे की 'कामुक राजनीति' ने उसकी नसों को ढीला कर दिया था। उसने तय किया कि वह अपने कमरे में नहीं जाएगा। वह नीचे अपनी माँ के कमरे में ही चला गया।

अंजलि के बिस्तर पर वही इत्र और उसकी देह की खुशबू रची-बसी थी। आर्यन उसी तकिए पर सिर रखकर लेट गया जहाँ कुछ घंटों पहले उसकी माँ और मासी साथ थीं। उसे लगा कि शायद यहाँ सोने से उसे उन सिसकारियों का कोई सुराग मिल जाए, लेकिन थकान इतनी गहरी थी कि लेटते ही उसकी आँखें मुँदने लगीं।

जैसे ही उसने करवट ली, उसे अंजलि के बिस्तर की चादर पर एक अजीब सी सिलवट और हल्की सी नमी महसूस हुई, लेकिन उसका दिमाग अब और विश्लेषण करने की स्थिति में नहीं था। वह एक ऐसी गहरी नींद में डूब गया जहाँ न कोई हवस थी, न कोई सवाल।

आर्यन करीब 3 घंटे तक घोड़े बेचकर सोता रहा। बाहर सूरज ढल चुका था और कमरे में अंधेरा छाने लगा था। तभी उसे अहसास हुआ कि कोई उसके बालों को बहुत सहला रहा है।

वह नींद और होश के बीच झूल रहा था। उसे लगा कि अंजलि क्लीनिक से वापस आ गई है। लेकिन जब उसने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने देखा कि बिस्तर के किनारे कोई बैठा है, और वह अंजलि नहीं थी।

उस साये ने झुककर आर्यन के माथे को चूमा। "सो गए मेरे शेर? बहुत थक गए थे ना?" वह आवाज़ अंजलि की थी, पर उसके लहज़े में एक ऐसी 'महारानी' वाली खनक थी जो आर्यन ने पहले कभी नहीं सुनी थी।

शाम के 6:15 बज रहे थे। कमरे में पसरे धुंधलके को चीरते हुए अंजलि की आवाज़ आर्यन के कानों में मिश्री की तरह घुली। उसने बड़े प्यार से आर्यन का कंधा थपथपाकर उसे जगाया। "उठ जा आर्यन... बहुत सो लिया। बाहर आ, मैंने चाय बनाई है।"

आर्यन ने अंगड़ाई ली। उसके शरीर की थकान तो मिट चुकी थी, लेकिन मन का कौतूहल अभी भी बरकरार था। वह मुँह हाथ धोकर बाहर बालकनी से सटे छोटे से डाइनिंग एरिया में पहुँचा, जहाँ अंजलि दो कप अदरक वाली चाय और बिस्किट लिए उसका इंतज़ार कर रही थी।

अंजलि आज बहुत शांत लग रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी गहराई थी जो बता रही थी कि वह अब कुछ भी छिपाने के मूड में नहीं है। दोनों ने खामोशी से चाय के पहले कुछ घूंट भरे। बाहर शाम का आसमान गहरा नीला हो रहा था।

अंजलि ने चाय का कप मेज पर रखा और सीधे आर्यन की आँखों में देखा। "तू कल रात से बहुत कन्फ्यूज है न? और तेरा गुस्सा भी जायज है। तुझे लगा होगा कि मैंने तुझे डराकर ऊपर भेज दिया और खुद यहाँ मजे लिए।"

अंजलि ने एक ठंडी सांस ली। "आर्यन, कंचन वैसी नहीं है जैसी हम उसे समझते आए थे। कल जब तू बाहर गया था, उसने मुझसे जो कहा, उसने मेरे होश उड़ा दिए। उसने मुझसे कहा— 'जीजी, आप आर्यन को मेरे पास भेजने की जो प्लानिंग कर रही हैं, उसे बंद कर दीजिए... क्योंकि मुझे आर्यन में नहीं, बल्कि आपमें दिलचस्पी है।'"

आर्यन के हाथ में पकड़ा बिस्किट चाय में ही गलकर गिर गया। उसे उम्मीद थी कि कंचन मासी का कोई 'अतीत' होगा या कोई 'बॉयफ्रेंड' होगा, लेकिन यह खुलासा उसकी कल्पना से परे था।

आर्यन को समझ आया कि रात को जो सिसकारियां उसने सुनी थीं, वे किसी पुरुष और स्त्री की नहीं, बल्कि दो सगी बहनों की थीं। कंचन मासी अपनी 'पवित्रता' के पीछे एक ऐसी औरत को छिपाए बैठी थीं जो अपनी ही बहन के शरीर की प्यासी थी।

आर्यन ने महसूस किया कि अंजलि की आवाज़ में अब कोई शर्म नहीं थी। "उसने मुझे मजबूर कर दिया आर्यन"

"इसीलिए मैंने तुझे मना किया था," अंजलि ने चाय का घूंट भरते हुए आगे कहा। "मैं नहीं चाहती थी कि तू इस सब में फंसे। लेकिन रात को 3 बजे... जब वो मेरे पास आई... तो मुझे अहसास हुआ कि वो भी मेरी ही तरह बरसों की प्यासी है। हम दोनों बहनें पूरी रात एक-दूसरे के जिस्म से अपना-अपना अकेलापन मिटाते रहे।"

आर्यन अवाक होकर सुन रहा था। उसकी माँ, जिसने उसे 'मर्दानगी' का पाठ पढ़ाया था

"अब वो जा चुकी है," अंजलि ने आर्यन के हाथ पर अपना हाथ रखा। "वो अपनी प्यास बुझाकर गई है”

आर्यन ने चाय का कप मेज पर पटक दिया, उसकी आंखों में हताशा और जिज्ञासा का मिला-जुला भाव था। "माँ, मुझे इन पहेलियों और इशारों में कुछ समझ नहीं आ रहा है। आप साफ़-साफ़ बताइए कि उस रात क्या हुआ और मासी ने ऐसा क्या कहा कि आप इतनी सहम गईं?"

अंजलि ने एक लंबी और बोझिल सांस ली। उसने अपनी नज़रें झुका लीं, जैसे उस राज़ को दोबारा ज़ुबान पर लाना उसके लिए भी भारी पड़ रहा हो। उसने चाय की आखिरी चुस्की ली और बोलना शुरू किया।

अंजलि की आवाज़ अब धीमी और गंभीर हो गई थी, जैसे वह किसी पुरानी कब्र को खोद रही हो।

"आर्यन, तू अपनी मासी को एक सुखी शादीशुदा औरत समझता रहा है न? लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। शादी के महज़ दो महीने बाद ही कंचन को पता चल गया था कि उसका पति 'गे' (Gay) है। उसे औरतों में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं थी। वह शादी सिर्फ समाज को दिखाने के लिए की गई थी।"

आर्यन यह सुनकर चौंक गया, उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। अंजलि ने आगे कहा, "कंचन फिर भी हार नहीं मानी। वह एक पुराने ख्यालात की औरत है, उसने सोचा कि वह अपनी सेवा और प्यार से अपने पति को बदल देगी। वह सालों तक इस उम्मीद में जलती रही कि शायद कभी उसे भी एक औरत होने का सुख मिलेगा। वह उस 'ठंडे' मर्द के साथ सिर्फ इसलिए रही ताकि वह इस नरक को झेलते हुए भी एक 'घर' बचा सके।"

"उसका आखिरी सहारा एक बच्चा था," अंजलि की आवाज़ थोड़ी कांपने लगी। "वो सोचती थी कि अगर किसी तरह उसे एक औलाद मिल जाए, तो वह अपनी पूरी ज़िंदगी उस बच्चे को पालने में बिजी कर देगी और अपनी जिस्मानी प्यास को भूल जाएगी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। जब सालों बाद भी कुछ नहीं हुआ, तो उन्होंने डॉक्टर को दिखाया... और रिपोर्ट्स में जो आया, उसने कंचन को पूरी तरह तोड़ दिया।"

अंजलि ने आर्यन की आँखों में झाँका। "डॉक्टर ने साफ़ कह दिया कि कंचन कभी माँ नहीं बन सकती (Infertility)। सोच आर्यन, एक औरत जिसके पास न शौहर का प्यार हो और न ही माँ बनने का सुख... वह अंदर से कितनी बंजर हो चुकी होगी। वह दोनों तरफ से हार गई—जिस्मानी तौर पर भी और रूहानी तौर पर भी।"

आर्यन सन्न बैठा था। जिस मासी को वह कल तक सिर्फ एक 'शिकार' समझ रहा था, वह अब उसे इस दुनिया की सबसे बदनसीब औरत लग रही थी।

उसे अपनी उस ७ इंच की मर्दानगी पर थोड़ा अफ़सोस होने लगा। वह उसे 'अपवित्र' करने की सोच रहा था, जबकि वह औरत पहले से ही किस्मत की मारी हुई थी।

अब उसे समझ आया कि रात को अंजलि क्यों डरी हुई थी। कंचन मासी का वो रूप जो रात को निकला था, वह बरसों की कुंठा, अकेलेपन और उस खालीपन का नतीजा था जिसे वह अब और नहीं ढो सकती थी।

आर्यन के हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा। उसका दिमाग चकरा गया। उसने अपनी ज़िंदगी में कई अजीब कहानियाँ सुनी थीं, लेकिन यह हकीकत उसकी सोच की सीमाओं के पार थी। वह स्तब्ध होकर अपनी माँ को देख रहा था, जिसे खुद यह सब बताते हुए एक अजीब सी बेचैनी हो रही थी।

अंजलि ने मेज पर झुकते हुए आवाज़ को और भी धीमा कर लिया, जैसे वह डर रही हो कि दीवारें भी यह राज़ न सुन लें।

"आर्यन, कंचन ने जो किया वह किसी के लिए भी सोचना नामुमकिन है। जब उसे समझ आ गया कि उसका पति कभी उसे औरत होने का सुख नहीं दे पाएगा और वह खुद कभी माँ नहीं बन पाएगी, तो उसने हार मानने के बजाय कुदरत से ही जंग लड़ ली। उसके पास पैसों की कोई कमी नहीं थी, उसके पति का बिजनेस बहुत बड़ा था। उन दोनों ने मिलकर एक ऐसा रास्ता निकाला जिससे समाज की नज़रों में उनकी शादी बची रहे और उनकी निजी ज़रूरतें भी पूरी हो सकें।"

अंजलि की आवाज़ कांपी। "उसने अपने पति की रज़ामंदी से विदेशों में अपनी कई सर्जरी करवाईं। ऊपर से वह आज भी वही खूबसूरत, सादगी भरी कंचन दिखती है—वही साड़ी, वही बिंदी, वही ममतामयी चेहरा। लेकिन नीचे से... नीचे से उसने अपनी पहचान बदल ली है। उसने 'जेंडर रीअसाइनमेंट' सर्जरी के ज़रिए पुरुष अंग लगवा लिया है। वह अब एक ऐसी हकीकत बन चुकी है जो दुनिया के लिए औरत है, लेकिन बिस्तर पर एक मर्द की ताकत रखती है।"

"अब समझ आया आर्यन? कल रात जो तूने सुना, वह सिर्फ दो बहनों का प्यार नहीं था। वह कंचन का वह रूप था जो उसने सालों की घुटन के बाद हासिल किया है। वह अब अपनी जीजी (मुझ) पर अपना हक जता रही थी। वह मुझे यह अहसास करा रही थी कि उसे अब किसी मर्द की ज़रूरत नहीं है, वह खुद एक मुकम्मल मर्द बन चुकी है अपनी मर्ज़ी से।"

आर्यन के लिए यह जानकारी किसी बम धमाके से कम नहीं थी। वह ७ इंच का फौलाद, जो कल तक कंचन को फतह करने के सपने देख रहा था, अब एक अनजाने डर से सुस्त पड़ गया।

आर्यन को यह सोचकर ही पसीना आ गया कि जिस मासी के पैर उसने सुबह छुए थे, उनके पास भी वही 'हथियार' है जो उसके पास है। एक औरत के लिबास में छिपा हुआ वह पुरुष अंग आर्यन की मर्दानगी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया था।

उसे अब समझ आया कि अंजलि कल रात क्यों कांप रही थी। अंजलि ने अपनी बहन के उस नए और 'कृत्रिम' अंग का अनुभव किया था। अंजलि को डराया गया था, उसे मजबूर किया गया था।

अंजलि ने अपनी ठंडी चाय का आखिरी घूंट भरा। "आर्यन, कंचन ने जाते-जाते जो मुझसे कहा है, वह सुनकर तेरे रोंगटे खड़े हो जाएंगे। उसने कहा है कि उसे अपनी इस नई 'शक्ति' का असली टेस्ट करना है... और वह टेस्ट वह किसी और पर नहीं, बल्कि तुझ पर करना चाहती है।"

आर्यन का गला सूख गया। "मुझ पर? मतलब?"

अंजलि ने उसकी आँखों में देखा, जिसमें अब एक साज़िश की झलक थी। "वह चाहती है कि अगली बार जब वह आए, तो वह यह देखे कि उसकी 'बनावटी मर्दानगी' और तेरी 'कुदरती मर्दानगी' में से कौन जीतता है”

आर्यन के चेहरे का रंग उड़ गया था। उसकी आँखों के सामने कल रात का वह सारा मंजर एक डरावनी फिल्म की तरह घूमने लगा। अब उसे समझ आया कि अंजलि के उस मैसेज—"बेटा, आज चाहे कुछ भी हो जाए नीचे मत आना"—का असली मतलब क्या था। वह अपनी माँ की घबराहट को महसूस कर पा रहा था। उसे लगा कि कल रात वह सिर्फ एक 'राज' से नहीं बचा था, बल्कि एक ऐसी स्थिति से बचा था जो उसकी पूरी पुरुषवाचक पहचान को हिला कर रख देती।

रात के 9:00 बज चुके थे। घर में अब वही दो लोग थे—माँ और बेटा—लेकिन उनके बीच अब एक तीसरा साया हमेशा के लिए बैठ गया था, जो भले ही वहां मौजूद नहीं था, पर उसकी चर्चा ने हवा को भारी कर दिया था।

अंजलि ने बहुत ही सादा डिनर तैयार किया था। दोनों डाइनिंग टेबल पर आमने-सामने बैठे थे। आर्यन की नज़रें बार-बार अपनी थाली में जमी रहतीं, जबकि अंजलि बीच-बीच में उसे कनखियों से देख लेती। वह ७ इंच का फौलाद, जो कल तक अपनी धमक महसूस करा रहा था, आज आर्यन की पतलून के अंदर जैसे दुबक कर बैठ गया था।

आर्यन ने माहौल के तनाव को कम करने के लिए बहुत ही सामान्य बात छेड़ी। "माँ, ये सब्जी अच्छी बनी है।" अंजलि ने एक फीकी मुस्कान दी, "शुक्रिया बेटा। कल से वैसे भी हमें थोड़ा रूटीन पर ध्यान देना होगा, तुम्हारी पढ़ाई और मेरा क्लीनिक।"

बातें बहुत ही सतही थीं—कॉलेज की अटेंडेंस, शहर का मौसम और आने वाले कुछ बिल। लेकिन उन बातों के पीछे दोनों का दिमाग उसी एक बिंदु पर अटका था: कंचन का वो बदला हुआ रूप।

डिनर करते समय आर्यन के मन में कई ख्याल आ रहे थे:

आर्यन को पहली बार अपनी माँ के प्रति एक अलग तरह की सहानुभूति महसूस हुई। उसे लगा कि अंजलि ने कल रात वह सब अकेले झेला ताकि आर्यन को उस 'अनोखे' अनुभव से बचा सके। वह अपनी माँ को अब सिर्फ एक कामुक संगिनी के रूप में नहीं, बल्कि एक रक्षक के रूप में देख रहा था।

भले ही वह थोड़ा डरा हुआ था, लेकिन उसके अंदर के Male Ego ने धीरे-धीरे सिर उठाना शुरू किया। उसे लगा कि क्या वाकई कोई 'बनावटी' चीज़ उसकी कुदरती ताकत का मुकाबला कर सकती है?

डिनर के बाद दोनों ने मिलकर बर्तन समेटे। अंजलि जब किचन का काउंटर साफ कर रही थी, आर्यन उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया। उसने कुछ कहा नहीं, बस अंजलि के कंधे पर हाथ रखा। अंजलि ठिठक गई, उसने पलटकर आर्यन को देखा। उसकी आँखों में अब डर नहीं, बल्कि एक तरह का 'समर्पण' था।

"माँ... जो भी हो, मैं आपको अब और अकेला नहीं छोड़ूँगा," आर्यन ने धीमी आवाज़ में कहा।

अंजलि ने उसके गाल को सहलाया। "मैं जानती हूँ आर्यन। लेकिन याद रखना, कंचन अब वो नहीं रही जो हम समझते थे। वो अब एक जिद्दी 'शिकारी' बन चुकी है।"

रात के 11:30 बज रहे थे। कमरे की मद्धम रोशनी में हवा के अंदर एक अजीब सी भारीपन और गर्मी महसूस हो रही थी। अंजलि आज अपनी मर्यादा के सारे बंधन तोड़कर केवल गहरे नीले रंग की ब्रा और पैंटी में थी, उसका दूधिया बदन उस कम रोशनी में चमक रहा था। आर्यन भी केवल एक पतले से नेकर में था।

दोनों बिस्तर पर लेटे थे। आर्यन ने पीछे से अंजलि को अपनी बाहों में भर लिया था। उसका 7 इंच का फौलाद नेकर के अंदर पूरी तरह से तन चुका था और अंजलि की भारी और मुलायम गांड के बीच के खांचे में पूरी ताकत से दबा हुआ था। लेकिन आज उस दबाव में केवल हवस नहीं थी, बल्कि एक 'जलन' और 'अधिकार' की आग थी।

आर्यन का मेल ईगो Male Ego बुरी तरह चोट खाया हुआ था। उसे यह बात अंदर ही अंदर खाए जा रही थी कि उसकी मौजूदगी में, उसी के घर में, उसकी माँ ने किसी और के अंग को अपनी देह में जगह दी—चाहे वह कंचन मासी का 'बनावटी' अंग ही क्यों न हो।

आर्यन ने अपनी पकड़ और मज़बूत की और अपना चेहरा अंजलि की गर्दन के पास ले जाकर भारी आवाज़ में फुसफुसाया, "माँ... एक बात सच-सच बताओ। क्या कल रात आप दोनों ने वाकई सेक्स किया था? क्या आपने उसका वह 'बनावटी औज़ार' अपनी चूत के अंदर लिया था?"

अंजलि की सांसें तेज़ हो गईं। आर्यन ने जारी रखा, "मेरे होते हुए... मेरे इस 7 इंच के लोहे के होते हुए, आपको किसी और की ज़रूरत कैसे पड़ गई? क्या उसने आपको मुझसे ज़्यादा सुख दिया?"

आर्यन का हाथ अंजलि के पेट पर कस गया। उसे यह सोचकर घिन और गुस्सा दोनों आ रहे थे कि उसकी माँ की उस 'पवित्र' जगह पर, जिसे वह अपना साम्राज्य समझता था, कल रात किसी और की घुसपैठ हुई थी।

अंजलि ने महसूस किया कि उसका बेटा आज एक प्रेमी या बेटे की तरह नहीं, बल्कि एक जलन से भरे मर्द की तरह व्यवहार कर रहा है। उसे आर्यन का यह रूप अंदर तक रोमांचित कर गया। वह धीरे से पलटी और आर्यन की आँखों में आँखें डालकर लेटी।

"आर्यन... तू पागल हो गया है क्या?" अंजलि ने उसके चेहरे को सहलाते हुए कहा। "सुख? सुख तो केवल तूने मुझे दिया है। कल रात जो हुआ, वो 'सेक्स' नहीं था... वो एक मजबूरी थी, एक डर था। उसने मुझे अपनी ताकत से दबाया था। उसने वह चीज़ मेरे अंदर डाली ज़रूर, पर मुझे सिर्फ दर्द और अजीब सा अहसास हुआ। उसमें वो जान कहाँ, जो तेरे इस फौलाद में है।"

आर्यन का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था। उसने झटके से अंजलि की टांगों के बीच अपना घुटना अड़ा दिया। "मुझे नहीं पता माँ, पर मुझे आज बहुत गुस्सा आ रहा है। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने मेरी सबसे कीमती चीज़ चुरा ली हो। मुझे अभी, इसी वक्त अहसास दिलाओ कि तुम्हारी ये देह सिर्फ मेरी है।"

अंजलि ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए अपनी ब्रा की हुक ढीली की और आर्यन को अपनी ओर खींच लिया। "तो फिर देर किस बात की है? मिटा दे अपनी ये जलन... और अपनी इस माँ को फिर से अपना बना ले।"
 
रात की खामोशी में अंजलि की सांसों की आवाज़ और आर्यन के पुरुष अहंकार की तपन मिलकर कमरे के तापमान को बढ़ा रही थी। अंजलि जानती थी कि आज आर्यन को सिर्फ जिस्म नहीं चाहिए, उसे अपनी 'सत्ता' की वापसी चाहिए। वह आर्यन की जलन को शांत करने के लिए खुद को पूरी तरह एक 'शिकार' की तरह पेश करने का फैसला करती है।

अंजलि धीरे से बिस्तर पर घुटनों के बल खड़ी हुई और फिर आगे झुकते हुए अपनी हथेलियों को गद्दे पर टिका दिया। उसने अपनी कमर को नीचे की ओर झुकाया और अपने भारी कूल्हों को हवा में आर्यन की ओर उभार दिया। यह 'डॉगगी स्टाइल' की वह चरम मुद्रा थी जहाँ एक औरत खुद को पूरी तरह असुरक्षित और समर्पित कर देती है।

आर्यन के सामने इस वक्त दुनिया का सबसे कामुक नज़ारा था। अंजलि की नीली पैंटी उसके चौड़े और मांसल कूलों के बीच फंसी हुई थी। ऊपर नीली ब्रा के स्ट्रैप्स उसकी गोरी पीठ पर कस रहे थे।

जब उसने अंजलि को इस जानवर जैसी मुद्रा में देखा, तो उसका 'मेल ईगो' तृप्त होने लगा। उसे लगा कि कल रात भले ही कंचन ने उसकी माँ पर कब्ज़ा किया हो, लेकिन आज वह अपनी माँ को एक जानवर की तरह हांकने वाला है।

आर्यन ने बिना देर किए घुटनों के बल उसके पीछे आकर अपनी जगह बनाई। उसने अपनी दोनों हथेलियों से अंजलि के भारी कूलों को जकड़ लिया और अपने 7 इंच के धधकते मूसल को उसकी जांघों के बीच रगड़ना शुरू किया। "माँ... आज मैं कंचन का हर निशान मिटा दूँगा," उसने दहाड़ते हुए कहा।

अंजलि इस वक्त अपनी हथेलियों पर शरीर का भार टिकाए हाँफ रही थी। जब उसे पीछे से आर्यन के उस ७ इंच के लोहे का गर्म स्पर्श अपने मांसल हिस्से पर महसूस हुआ, तो उसके शरीर में बिजली दौड़ गई।

कल रात कंचन का वह 'बनावटी अंग' सख्त तो था, लेकिन उसमें यह 'जान' और 'धड़कन' नहीं थी। आर्यन का अंग उसे एक सजीव ज्वालामुखी की तरह लग रहा था।

उसे अच्छा लग रहा था कि उसका बेटा आज उस पर हुक्म चला रहा है। उसने अपना चेहरा तकिए में धंसा लिया और अपनी कमर को और भी नीचे लचकाया ताकि आर्यन को प्रवेश करने का सही कोण मिल सके। "आर्यन... फाड़ दे मुझे... बता दे कि ये जिस्म सिर्फ तेरा है," उसने सिसकते हुए उकसाया।

आर्यन ने एक हाथ से अंजलि के बालों को पीछे से मुट्ठी में भरा और उसका सिर पीछे की ओर खींचकर उसकी गर्दन को उजागर कर दिया। दूसरे हाथ से उसने अपनी पतलून के अंदर से उस उफनते हुए फौलाद को बाहर निकाला और अंजलि के गीले द्वार पर सेट किया।

एक ज़ोरदार झटके के साथ आर्यन ने अपना पूरा वजूद अंजलि के अंदर उतार दिया। "आह्ह्ह्ह... माँ!" आर्यन के मुँह से एक चीख निकली, जबकि अंजलि का पूरा शरीर उस झटके से आगे की ओर लचक गया।

डोग्गी स्टाइल में हर धक्का अंजलि की कोख की गहराई तक टकरा रहा था। थप-थप की आवाज़ कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी। आर्यन की जांघें जब अंजलि के कूलों से टकरातीं, तो एक मादक शोर पैदा होता।

हर प्रहार के साथ आर्यन को लग रहा था कि वह कंचन मासी के उस 'बनावटी सच' को अंजलि के शरीर से बाहर धकेल रहा है। वह अंजलि का मालिक था, और यह मुद्रा उसे उस मालिकाना हक का चरम अहसास करा रही थी।

अंजलि के मुँह से निकलने वाली सिसकारियां अब तेज़ चीखों में बदल रही थीं। वह अपनी आँखें बंद किए उस 'असली मर्द' के वजन और ताकत को महसूस कर रही थी, जो उसे कंचन के उस डरावने अनुभव से दूर ले जा रहा था।

कमरे में थप-थप की आवाज़ें और आर्यन की भारी सांसें एक युद्ध का संगीत रच रही थीं। अंजलि का शरीर आर्यन के हर प्रहार पर आगे-पीछे झूल रहा था। तभी, चरम सुख की दहलीज पर खड़ी अंजलि ने अपना पसीने से तरबतर चेहरा तकिए से उठाया और पीछे मुड़कर अपनी मदहोश आँखों से आर्यन को देखा।

अंजलि ने सिसकते हुए आर्यन के हाथ को, जो उसकी कमर पर कसा था, और ज़ोर से दबाया और हाँफते हुए बोली:

"आर्यन... आह... रुकना मत... तुझे पता है कल रात जाते-जाते कंचन ने मेरे कान में क्या फुसफुसाया था? उसने कहा था— 'जीजी, आपका बेटा दिखने में तो शेर है, पर क्या इसमें इतनी मर्दानगी है कि ये मेरे इस नए अवतार को झेल सके? अगली बार जब मैं आऊँगी, तब देखूँगी कि असली फौलाद किसके पास है...'!"

जैसे ही आर्यन ने कंचन मासी का वह 'चैलेंज' सुना, उसका खून खौल उठा। मासी ने उसकी मर्दानगी को ललकारा था? उसने उसे एक 'बनावटी औज़ार' के सामने कमतर आँका था?

जलन और गुस्से की एक लहर आर्यन के दिमाग में बिजली बनकर दौड़ी। उसका 7 इंच का अंग अब पत्थर से भी ज़्यादा सख्त हो चुका था।

उसने अंजलि के बालों को और भी बेदर्दी से मुट्ठी में भींचा और उसके सिर को पीछे खींचकर उसकी गर्दन पर अपने दांत गड़ा दिए। अब उसके धक्के 'डॉगगी स्टाइल' में और भी गहरे, तेज़ और हिंसक हो गए थे। "उसने ऐसा कहा माँ? उसकी इतनी हिम्मत? अगली बार उसे आने दो... मैं उसे दिखाऊँगा कि कुदरत की दी हुई ताकत क्या होती है!"

अंजलि को पता था कि आर्यन को यह बात बताकर वह आग में घी डाल रही है। उसे आर्यन के इस हिंसक रूप में एक अलग ही सुरक्षा महसूस हो रही थी।

जब आर्यन ने उस 'चैलेंज' के गुस्से में अपनी पूरी ताकत झोंक दी, तो अंजलि को लगा जैसे उसका शरीर फट जाएगा। हर धक्का उसकी कोख की आखिरी दीवार को छू रहा था।

वह अपनी आँखें चढ़ाकर केवल सिसकारियाँ भर पा रही थी। आर्यन का गुस्सा उसे वह सुख दे रहा था जो कंचन की बनावटी मर्दानगी कभी नहीं दे सकती थी। "हाँ आर्यन... मार मुझे... सोच कि तू कंचन को कुचल रहा है... आह्ह्ह! तू ही मेरा इकलौता मर्द है!"

कमरे में सन्नाटा अब खत्म हो चुका था, सिर्फ जिस्मों के टकराने की आवाज़ थी। आर्यन की आँखों के सामने कंचन मासी का वो चुनौती भरा चेहरा था और हाथ में अंजलि का यह कांपता हुआ बदन।

उसने अंजलि के कूलों को इतनी ज़ोर से भींचा कि उसकी उंगलियों के निशान गोरे मांस पर उभर आए। अपनी पूरी ताकत को एक आखिरी झटके में समेटकर आर्यन ने अंजलि के अंदर गहरा गोता लगाया और अपना सारा गरम लावा किसी ज्वालामुखी की तरह उसकी गहराई में खाली कर दिया।

अंजलि एक लंबी चीख के साथ बिस्तर पर ढह गई, और आर्यन हाँफते हुए उसके ऊपर ही गिर पड़ा। पसीने से लथपथ दोनों शरीर एक-दूसरे में गुंथे हुए थे।

बिस्तर पर पसीने से लथपथ लेटे हुए, आर्यन की सांसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। अंजलि का शरीर अभी भी उन मीठी लहरों से कांप रहा था जो आर्यन के प्रचंड वेग ने उसके अंदर छोड़ी थीं। कमरे में छाई शांति में एक अजीब सा सुकून था—एक ऐसी 'असीम शांति' जिसका अनुभव आर्यन ने आज से पहले कभी नहीं किया था।

उसने करवट ली और अंजलि को अपनी बाहों में समेट लिया। उसका सिर अंजलि की नग्न और मुलायम छाती पर था।

आर्यन ने एक लंबी और गहरी सांस ली और अपनी माँ की आँखों में देखते हुए अपने मन की बात साझा करना शुरू किया।

"माँ... आज मुझे जो महसूस हुआ है, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। मैंने सोचा था कि कंचन मासी का वो राज सुनकर मैं टूट जाऊँगा या हम दोनों के बीच दूरियां आ जाएंगी। लेकिन आज... आज मुझे एक अजीब सी शांति मिली है।"

आर्यन ने अंजलि की कमर पर अपनी उंगलियां फिराते हुए कहा, "आज मुझे समझ आया कि 'रियल फैंटेसी' क्या होती है। जब हम दोनों अकेले होते थे, तो सब कुछ बहुत प्यारा था... लेकिन आज जब हमारे बीच उस 'तीसरे' का ज़िक्र हुआ, जब उसकी चुनौती की बात आई, तो मेरे अंदर का मर्द एक अलग ही स्तर पर जाग गया। उसकी मौजूदगी ने, भले ही वह यहाँ नहीं थी, हमारे मिलन में एक ऐसी आग भर दी जो पहले कभी नहीं थी।"

"वो जलन, वो गुस्सा कि कोई और आपको छू सकता है... और फिर उस गुस्से को आपके अंदर उतार देना... माँ, यह अनुभव रूहानी है। मुझे लग रहा है जैसे मैं अब सिर्फ एक बेटा या प्रेमी नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा योद्धा बन गया हूँ जिसे अपनी सल्तनत किसी भी कीमत पर बचाना है।"

अंजलि ने आर्यन के बालों में अपनी उंगलियां फंसाईं और उसे अपने और करीब खींच लिया। वह समझ रही थी कि आर्यन किस मनोवैज्ञानिक बदलाव से गुजर रहा है।

"मैं समझ रही हूँ बेटा," अंजलि ने बहुत ही कोमलता से कहा। "इसे ही Triangle का आकर्षण कहते हैं। जब दो लोगों के बीच कोई तीसरा आता है—चाहे वो दुश्मन बनकर आए या चुनौती बनकर—तो वो उन दोनों को एक-दूसरे के और करीब ला देता है। कंचन के उस राज ने तुझे आज सिर्फ मेरा बेटा नहीं, मेरा 'रक्षक' बना दिया है।"

आर्यन अब पूरी तरह से बदल चुका था। कंचन मासी का डर अब उसके लिए एक 'नशा' बन गया था। वह उस दिन का इंतज़ार करने लगा था जब वह 'बनावटी मर्दानगी' उसके सामने होगी और वह उसे धूल चटाएगा।

आर्यन की आँखों में अब डर का नामो-न निशान नहीं था। उसकी जगह एक शातिराना चमक और गजब का आत्मविश्वास आ चुका था। उसने अंजलि की गर्दन पर एक हल्का सा दाँत गड़ाया और मुस्कुराते हुए अपनी योजना साफ़ कर दी।

आर्यन ने अंजलि के चेहरे को अपने हाथों के बीच लिया और पूरे अधिकार के साथ बोला:

"माँ, अब कोई लुका-छिपी नहीं। आप अगली बार जब मासी से बात करें, तो उन्हें साफ़ कह देना कि आर्यन 'तैयार' है। उन्हें बता देना कि उनका ये भतीजा अब उस 'बनावटी' और 'कुदरती' मर्दानगी के अंतर को करीब से देखना चाहता है।"

"अब मुझे भी इस खेल में मज़ा आने लगा है। वह जो 'तीसरे' की बात थी न, उसने मेरे दिमाग के बंद दरवाजे खोल दिए हैं। हम तीनों एक साथ... एक ही बिस्तर पर। आप, मैं और वो अपनी आधी औरत-आधा मर्द वाली पहचान के साथ। सोचिए माँ, वो नज़ारा कितना पागल कर देने वाला होगा जब हम तीनों एक-दूसरे की प्यास बुझाएंगे।"

"अब हम उनके खिलाफ नहीं, उनके 'साथ' खेलेंगे। मैं देखना चाहता हूँ कि वो अपनी उस नई शक्ति से आपको कैसे रिझाती हैं, और मैं कैसे आप दोनों को एक साथ संभालता हूँ।"

अंजलि पहले तो आर्यन की इस हिम्मत को देखकर दंग रह गई, लेकिन फिर उसके अंदर की 'खिलाड़ी' औरत भी जाग गई। उसे लगा कि अगर वह कंचन को दुश्मन बनाएगी, तो राज खुलने का डर रहेगा, लेकिन अगर वे तीनों एक Threesome बन जाएँ, तो यह उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और सबसे गंदी फैंटेसी बन सकती है।

अंजलि ने आर्यन के होंठों को चूम लिया। "तू तो बहुत आगे निकल गया आर्यन। मुझे लगा था तू डर जाएगा, पर तूने तो इसे ही अपना हथियार बना लिया। ठीक है, मैं उसे बोल दूँगी कि मैदान सज चुका है।"

"सोच बेटा, जब वो आएगी और हम तीनों एक साथ होंगे... तू उसे अपने वश में करना और मैं... मैं तुम दोनों के बीच उस आग को और भड़काऊँगी।"

अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण कमरे में आई, तो माहौल पूरी तरह बदल चुका था। अब कोई बोझ नहीं था, कोई ग्लानी नहीं थी। अंजलि और आर्यन अब एक 'मिशन' पर थे। कंचन मासी का आना अब किसी आपदा की तरह नहीं, बल्कि एक 'त्योहार' की तरह इंतज़ार किया जाने वाला था।

आर्यन ने कॉलेज जाने से पहले आईने में खुद को देखा। उसने अपनी बाजू की मांसपेशियों को कड़ा किया और अपने नेकर के अंदर हाथ डालकर उस 7 इंच के लोहे को सहलाया।

दोपहर के 2:30 बज रहे थे। कॉलेज की कैंटीन में बैठे आर्यन के फोन पर अंजलि का मैसेज फ्लैश हुआ:

"बेटा, आज दोपहर घर जल्दी आ जाना। तुम्हारे लिए एक बहुत बड़ा सरप्राइज इंतज़ार कर रहा है। मिस मत करना!"

आर्यन का दिल धड़कने लगा। उसे अंदाज़ा तो था कि कुछ होने वाला है, पर उसे यह नहीं पता था कि अंजलि ने कंचन मासी से इतनी जल्दी 'डील' फाइनल कर ली है। अंजलि चाहती थी कि आर्यन और कंचन के बीच की वो पहली झिझक खत्म हो जाए, इसलिए उसने खुद को सीन से हटाकर उन दोनों के लिए मैदान साफ कर दिया था।

आर्यन ने अपनी बाइक तेज़ी से दौड़ाई और घर के सामने आकर रुका। घर का मुख्य दरवाज़ा बंद था, लेकिन कुंडी नहीं लगी थी। वह दबे पाँव अंदर घुसा। पूरे घर में वही पुरानी अगरबत्ती की खुशबू और सन्नाटा था, लेकिन हवा में एक अजीब सी उत्तेजना महसूस हो रही थी।

जैसे ही वह ड्राइंग रूम को पार करके अंदर के हॉल में पहुँचा, वह हक्का-बक्का रह गया।

सामने सोफे पर कंचन मासी बैठी थीं, लेकिन यह वह मासी नहीं थीं जो मंदिर जाती थीं। उन्होंने एक पारदर्शी काली शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जिसके नीचे उनकी सफेद त्वचा और सुडौल बदन साफ़ झलक रहा था। उनके बाल खुले थे और आँखों में वो ममता नहीं, बल्कि एक शिकारी की 'भूख' थी।

वह सोफे पर पैर पर पैर चढ़ाकर बिल्कुल एक मर्द के अंदाज़ में बैठी थीं। उनके हाथ में एक गिलास था और उनके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो आर्यन को चुनौती दे रही थी। साड़ी के पल्लू से उनके उभार तो दिख रहे थे, लेकिन उनकी बैठने की मुद्रा उनके उस 'गुप्त राज' की मौजूदगी का अहसास करा रही थी।

अंजलि कहीं नज़र नहीं आ रही थी। पूरा घर खाली था। कंचन ने धीरे से अपना गिलास मेज़ पर रखा और खड़ी हो गईं। उनकी लंबाई और उनकी बॉडी लैंग्वेज आज बिल्कुल बदली हुई थी।

कंचन मासी धीरे-धीरे आर्यन की ओर बढ़ीं। उनके चलने के अंदाज़ में एक मर्दाना भारीपन था, जो उनकी रेशमी साड़ी के साथ बहुत ही अजीब और कामुक विरोधाभास पैदा कर रहा था।

"तेरी माँ ने कहा था कि तू 'तैयार' है," कंचन ने आर्यन के बिल्कुल पास आकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा। उनकी आवाज़ में एक नई गहराई थी। "पर मुझे लगा नहीं था कि तू इतनी जल्दी आ जाएगा। देख... आज यहाँ कोई नहीं है। न तेरी माँ, न समाज की कोई दीवार।"

आर्यन सन्न खड़ा था। उसके सामने वही औरत थी जिसे वह 'मासी' कहता था, पर आज उस साड़ी के नीचे छिपे 'मर्दाना सच' का खौफ और आकर्षण उसे सुन्न कर रहा था। उसका 7 इंच का फौलाद नेकर के अंदर अपने आप अपनी जगह बनाने लगा था।

कंचन ने अपना हाथ बढ़ाया और बहुत ही बेबाकी से आर्यन की ठुड्डी को ऊपर उठाया। "क्या हुआ? अपनी मासी का रूप देखकर बोलती बंद हो गई? या ये सोच रहा है कि आज मुकाबला बराबरी का होगा या नहीं?"

उन्होंने धीरे से आर्यन के कान के पास झुककर फुसफुसाया, "तेरी माँ ने मुझे सब बता दिया है कि तू कितना 'बड़ा' हो गया है। पर आज मैं तुझे बताऊँगी कि विज्ञान और कुदरत जब मिलते हैं, तो कैसा धमाका होता है।"

आर्यन की स्थिति उस वक्त ऐसी थी जैसे कोई शिकारी खुद शिकार के पिंजरे में घुस गया हो। मन में फैंटेसी और जोश तो बहुत था, लेकिन जब वह हकीकत में कंचन मासी के उस बदले हुए और प्रभावी व्यक्तित्व के सामने खड़ा हुआ, तो उसके कदम डगमगा गए। वह चाहकर भी वह पहला कदम नहीं उठा पा रहा था जो एक 'मर्द' को उठाना चाहिए।

वह थोड़ा हिचकिचाते हुए पीछे हटा और अपनी नज़रें झुका लीं। उसके लिए यह सब बहुत नया था—एक ऐसी औरत को अपनी 'प्रेमिका' या 'साथी' के रूप में देखना जो आधी औरत और आधा मर्द बन चुकी थी।

कंचन मासी, जो अब एक अनुभवी खिलाड़ी की तरह व्यवहार कर रही थीं, आर्यन की इस बेचैनी को तुरंत भांप गईं। उन्हें पता था कि आर्यन को 'सहज' करना ज़रूरी है, वरना यह खेल शुरू होने से पहले ही ठंडा पड़ जाएगा।

कंचन ने एक मंद मुस्कान दी और बहुत ही कोमलता से आर्यन की ओर कदम बढ़ाए। उन्होंने कोई जल्दबाज़ी नहीं की। "आर्यन... तू डर रहा है? या ये सोच रहा है कि तेरी ये मासी अब बदल गई है?" उनकी आवाज़ में अब वही पुरानी सौम्यता लौट आई थी, जिसने आर्यन के डर को थोड़ा कम किया।

कंचन ने आगे बढ़कर अपने दोनों हाथ आर्यन के कंधों पर रखे और उसे धीरे से अपनी ओर खींच लिया। उन्होंने आर्यन को एक गहरा और सुकून देने वाला गले लगाया। यह महज़ एक आलिंगन नहीं था; यह आर्यन के दिमाग को शांत करने की एक सोची-समझी कोशिश थी।

जैसे ही आर्यन का सीना कंचन मासी की रेशमी काली साड़ी और उनके नरम जिस्म से टकराया, उसकी धड़कनें और तेज़ हो गईं।

आर्यन को अपनी छाती पर कंचन के भारी और मुलायम उरोजों का दबाव महसूस हुआ। उनकी खुशबू—वही मोगरे का इत्र और पसीने की हल्की सी मादक महक—आर्यन के नथुनों में भर गई। उसे लगा कि वह अपनी वही पुरानी मासी की बाहों में है।

लेकिन जैसे ही कंचन ने उसे थोड़ा और कसकर भींचा, आर्यन को अपनी जांघों के पास उस 'बदले हुए सच' का हल्का सा स्पर्श महसूस हुआ। वह स्पर्श किसी औरत जैसा नहीं था; वह सख्त और भारी था। इस विरोधाभास ने आर्यन के शरीर में एक करंट सा दौड़ा दिया।

कंचन ने आर्यन के कान के पास अपना चेहरा टिकाया और बहुत ही धीमे से कहा, "डर मत बेटा। मैं वही कंचन हूँ जिसने तुझे बचपन में गोद में खिलाया है। बस अब मैं थोड़ी 'ज़्यादा' काबिल हो गई हूँ। तू बस रिलैक्स कर... आज हम कोई मुकाबला नहीं कर रहे, आज हम बस एक-दूसरे को जान रहे हैं।"

उन्होंने आर्यन की पीठ को सहलाया, जिससे आर्यन की मांसपेशियों का तनाव धीरे-धीरे कम होने लगा। उसका 7 इंच का फौलाद जो डर के मारे सुस्त हो रहा था, अब उस आलिंगन की गर्मी पाकर फिर से सिर उठाने लगा था।

आर्यन ने भी धीरे से अपने हाथ कंचन की कमर पर रखे। रेशमी साड़ी के नीचे उनकी त्वचा गरम और मखमली थी। उसे लगा कि हाँ, अब वह इस खेल के लिए तैयार हो रहा है।

हिचकिचाहट की बर्फ अब पिघलने लगी थी। कंचन मासी ने बड़ी नजाकत से आर्यन का हाथ अपने हाथ में लिया। उनके स्पर्श में एक अजीब सा आत्मविश्वास था। आर्यन, जो अब तक थोड़ा डरा हुआ था, उनकी आंखों में छुपी उस 'स्त्री-सुलभ' कोमलता को देखकर सहज महसूस करने लगा। उसे लगा कि भले ही उनके पास एक 'मर्दाना राज' है, लेकिन उनका दिल और उनकी अदाएं अब भी वही सुकोमल कंचन मासी वाली हैं।

वे दोनों धीरे-धीरे बेडरूम की ओर बढ़े। कमरे में दोपहर की मद्धम रोशनी खिड़की के पर्दों से छनकर आ रही थी, जिससे वहां एक मादक धुंधलका छाया हुआ था। जैसे ही वे कमरे के अंदर पहुंचे, कंचन ने आर्यन को अपनी ओर घुमाया।

आर्यन ने महसूस किया कि अब पहल करने की बारी मासी की है। कंचन ने अपनी उंगलियां आर्यन के बालों में फंसाईं और धीरे से उसे अपनी ओर खींचा।

कंचन ने अपनी पलकें झुकाईं और अपने गुलाब की पंखुड़ी जैसे होंठ आर्यन के होंठों पर रख दिए। आर्यन को लगा था कि शायद यह कुछ अलग होगा, लेकिन जैसे ही उनके होंठ आपस में मिले, उसे एक सुखद झटका लगा। यह बिल्कुल लड़कियों जैसा स्वाभाविक और कोमल चुंबन था।

कंचन के होंठों से वही मोगरे और पान की हल्की सी खुशबू आ रही थी। शुरुआत बहुत धीमी थी, जैसे वे आर्यन की अनुमति मांग रही हों। लेकिन जब आर्यन ने भी Respond देना शुरू किया, तो चुंबन गहरा होता गया। कंचन की ज़ुबान ने धीरे से आर्यन के होंठों को सहलाया और फिर उसके मुँह के अंदर प्रवेश किया।

यह एक 'डीप स्मूच' था। आर्यन को महसूस हुआ कि कंचन की चूमने की तकनीक बहुत ही परिपक्व थी। उनकी लार का स्वाद और उनकी सांसों की गरमाहट आर्यन के रगों में दौड़ने लगी। इस चुंबन में कहीं भी वह मर्दाना खुरदरापन नहीं था जिसका आर्यन को डर था; यह पूरी तरह से एक प्यासी औरत का अपने प्रेमी के लिए समर्पण था।

चुंबन के दौरान आर्यन की आँखें बंद थीं। उसे महसूस हो रहा था कि उसकी मासी का ऊपरी बदन—उनके नरम उरोज जो उसके सीने से दबे थे और उनके रेशमी बाल—सब कुछ एक मुकम्मल औरत का था। इस चुंबन ने आर्यन के मन से उस 'मर्दाना राज' के खौफ को पूरी तरह मिटा दिया। उसे लगा कि वह अपनी सबसे खूबसूरत और अनुभवी मासी के साथ प्यार के समुद्र में डूब रहा है।

कंचन ने चुंबन तोड़ते हुए थोड़ा पीछे हटकर आर्यन की आँखों में देखा। उनके होंठ गीले थे और गालों पर सुर्खी छा गई थी। "कैसा लगा आर्यन? क्या अब भी मैं तुझे कोई डरावनी चीज़ लग रही हूँ?" उन्होंने शरारत भरी मुस्कान के साथ पूछा।

आर्यन की सांसें अब तेज़ हो चुकी थीं। उस चुंबन ने उसके अंदर के 7 इंच के फौलाद को पूरी तरह से जागृत कर दिया था। उसने कंचन की पतली कमर को अपने हाथों में भर लिया। अब वह सिर्फ 'सहज' नहीं था, बल्कि वह कंचन को पूरी तरह से उघाड़ने के लिए बेताब था।

कंचन ने धीरे से अपनी साड़ी का पल्लू अपने कंधे से सरका दिया। "अभी तो सिर्फ शुरुआत है बेटा... असली सरप्राइज तो इस रेशम के नीचे छिपा है।"

चुंबन की गहराई ने आर्यन के मन से सारा डर निकाल फेंका था। अब उसकी आँखों में सिर्फ और सिर्फ हवस और जिज्ञासा थी। जैसे ही कंचन मासी के कंधे से काली शिफॉन की साड़ी का पल्लू नीचे गिरा, आर्यन की नज़रें उनके ब्लाउज के अंदर कैद उन उभारों पर टिक गईं जो किसी चुनौती की तरह तनकर बाहर आने को बेताब थे।

आर्यन ने धीरे से कंचन के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। जैसे ही आखिरी हुक खुला, ब्लाउज के साथ-साथ ब्रा की कैद से भी वे गोरे और मांसल अंग आजाद हो गए। आर्यन उन्हें देखकर दंग रह गया।

आर्यन ने अपनी माँ अंजली के स्तनों को कई बार महसूस किया था; वे बड़े, भारी और थोड़े ढीले थे, जिनमें एक मातृत्व वाली कोमलता थी। लेकिन कंचन मासी के स्तन बिल्कुल अलग थे। वे साइज में बड़े होने के बावजूद पत्थर की तरह कठोर और सुडौल थे। शायद जिम, योग या उनकी उस विशेष सर्जरी के हार्मोनल बदलावों ने उनके वजूद के इस हिस्से को एक 20 साल की जवान लड़की जैसी सख्ती दे दी थी।

उन पर गुलाबी रंग की बड़ी-बड़ी निप्पलें किसी मुकुट की तरह सजी थीं। उनकी कठोरता देख आर्यन का 7 इंच का फौलाद नेकर को फाड़कर बाहर आने के लिए मचलने लगा। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि एक उम्रदराज औरत के स्तन इतने टाइट और 'अपराइट' कैसे हो सकते हैं।

आर्यन अब खुद पर काबू नहीं रख सका। उसने अपनी हथेलियों में उन दोनों गोलों को भरा। उनका स्पर्श इतना गर्म और सख्त था कि आर्यन के मुँह से एक आह निकल गई। उसने कंचन को अपनी ओर थोड़ा और खींचा और अपना पूरा मुँह खोलकर एक तरफ के स्तन को अंदर भर लिया।

आर्यन ने जब अपनी ज़ुबान से उस सख्त निप्पल को सहलाया, तो कंचन के शरीर में एक करंट दौड़ गया। उसने अपनी जीभ को गोल-गोल घुमाते हुए उस कठोर मांस को चूसना शुरू किया। जैसे कोई प्यासा बच्चा अपनी माँ का दूध पी रहा हो, लेकिन इसमें ममता नहीं, बल्कि एक कामुक भूख थी।

"आह्ह्ह... आर्यन... धीरे बेटा... तू तो बहुत भूखा निकला," कंचन ने सिसकते हुए कहा। उन्होंने अपने दोनों हाथ आर्यन के सिर पर रख दिए और उसके चेहरे को अपने स्तनों में और भी गहराई से धंसा दिया। उन्हें अच्छा लग रहा था कि उनका यह 'बदला हुआ' शरीर आर्यन को इतना पागल कर रहा है।

आर्यन अब बारी-बारी से दोनों तरफ हमला कर रहा था। वह कभी उन्हें अपने हाथों से दबाता , तो कभी अपने दांतों से हल्की सी काट भरता। हर बार जब वह ज़ोर से वैक्यूम बनाकर चूसता, तो कंचन की कमर ऊपर की ओर लचक जाती।

आर्यन को महसूस हो रहा था कि कंचन का ऊपरी शरीर पूरी तरह से एक महारानी जैसा है। उनकी त्वचा मखमली थी, पर अंदर का मांस फौलाद जैसा सख्त। वह जितना उन्हें चूस रहा था, उसकी उत्तेजना उतनी ही बढ़ती जा रही थी। उसे अब और इंतज़ार नहीं हो रहा था कि वह नीचे के उस रहस्य तक पहुँचे जिसने उनकी पूरी पहचान बदल दी थी।

कमरे की गर्मी अब चरम पर थी। आर्यन कंचन के उन संगमरमर जैसे कठोर और सुडौल स्तनों के मोहपाश में ऐसा फँसा कि उसे समय और स्थान का होश ही नहीं रहा। वह किसी मदहोश भँवरे की तरह कभी दाएँ तो कभी बाएँ स्तन पर अपनी ज़ुबान का जादू चला रहा था।

आर्यन के हाथों की फुर्ती और उसके मुँह की भूख ने देखते ही देखते कंचन को ऊपर से पूरी तरह नग्न कर दिया। साड़ी और ब्लाउज अब फर्श पर बेतरतीब पड़े थे।

कंचन अब केवल नीचे एक विशेष प्रकार की काले रंग की सिल्क पैंटी में थीं। यह कोई साधारण पैंटी नहीं थी; इसे खास तौर पर उनके 'बदले हुए शरीर' के लिए डिज़ाइन किया गया था। यह आगे से थोड़ी उभरी हुई और खिंचावदार थी, ताकि उनका वह 'नया मर्दाना अंग' उसमें सुरक्षित और छिपा रहे, पर उसकी बनावट साफ़ तौर पर एक उभार के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही थी।

कंचन ने भी देरी नहीं की। उन्होंने अपनी मखमली उंगलियों से आर्यन की टी-शर्ट और फिर उसकी जींस को उतार फेंका। अब आर्यन भी केवल अपने सफेद अंडरवियर में था। उसके नेकर के अंदर उसका 7 इंच का फौलाद किसी ज़िद्दी सिपाही की तरह तन चुका था, जो साफ़ तौर पर अपनी पूरी लंबाई और मोटाई दिखा रहा था।

दोनों अब बिस्तर के बीचों-बीच थे। कंचन चित लेटी थीं और आर्यन उनके ऊपर झुककर अभी भी उनके स्तनों का रसपान कर रहा था।

आर्यन इस वक्त एक अलग ही दुनिया में था। उसके दिमाग में एक तरफ उसकी माँ अंजलि का वह कोमल चेहरा था और दूसरी तरफ कंचन मासी का यह 'हाइब्रिड' और शक्तिशाली शरीर। वह सोच रहा था कि कुदरत ने क्या खेल रचा है—ऊपर से इतनी कोमल और रसीली औरत, जिसके स्तन छूने पर बिजली का करंट देते हैं, और नीचे वह राज जिसे छूने के लिए उसका हाथ अब तड़प रहा था।

जैसे-जैसे आर्यन चूस रहा था, उसकी जांघें कंचन की जांघों से रगड़ खा रही थीं। उसे बार-बार कंचन की उस विशेष पैंटी के सख्त उभार का स्पर्श अपनी त्वचा पर महसूस हो रहा था। यह अहसास उसे डरा नहीं रहा था, बल्कि उसकी उत्तेजना को कई गुना बढ़ा रहा था। उसे लग रहा था कि वह किसी 'सुपरह्यूमन' के साथ बिस्तर साझा कर रहा है।

कंचन ने अपनी टांगें आर्यन की कमर के गिर्द लपेट लीं। "आह्ह्ह... आर्यन... तू तो मेरी जान निकाल लेगा।"

आर्यन ने एक आखिरी ज़ोरदार चूसन ली और अपना चेहरा कंचन के स्तनों के बीच से ऊपर उठाया। उसकी आँखों में हवस का लाल रंग था और होंठ कंचन की निप्पलों की लाली से रंगे थे।

उसने अपना एक हाथ नीचे की ओर बढ़ाया और कंचन की उस काली सिल्क की पैंटी के सख्त उभार पर रख दिया। जैसे ही उसकी हथेली उस 'चीज़' से टकराई, आर्यन के पूरे शरीर में एक झनझनाहट हुई। वह चीज़ पत्थर की तरह सख्त थी और साफ़ तौर पर धड़क रही थी।

कंचन ने आर्यन की आँखों में झाँका। "यही है वो राज़ आर्यन... जो अब तेरा होने वाला है। क्या मैं इसे खोल दूँ?"
 
आर्यन की मानसिक स्थिति इस वक्त एक ऐसे दोराहे पर थी जहाँ एक तरफ असीम जिज्ञासा थी और दूसरी तरफ वर्षों से चली आ रही सामाजिक और प्राकृतिक समझ का डर। जैसे ही उसने उत्तेजना में अपना हाथ नीचे बढ़ाया और उस 'सख्त उभार' को छुआ, उसे वह अहसास हुआ जिसकी उसने कल्पना नहीं की थी। वह स्पर्श किसी कोमल स्त्री-अंग का नहीं, बल्कि एक ठोस और अप्राकृतिक मर्दानगी का था।

जैसे ही आर्यन की उंगलियों ने उस विशेष पैंटी के नीचे दबे उस 'औज़ार' को महसूस किया, उसके शरीर में बिजली के झटके जैसी सिहरन दौड़ गई। उसके दिमाग ने तुरंत एक 'अलार्म' बजाया।

आर्यन अचानक असहज हो गया। उसे लगा जैसे उसने किसी ऐसी चीज़ को छू लिया है जिसे छूने की उसे अनुमति नहीं थी, या जो 'नॉर्मल' नहीं थी। उसका Male Ego और उसकी वर्षों की कंडीशनिंग उसे पीछे धकेलने लगी। वह थोड़ा पीछे हटा, उसके चेहरे पर एक अजीब सी झेंप और घबराहट थी। उसे लगा कि शायद वह यह सब नहीं कर पाएगा। वह बिस्तर पर थोड़ा दूर होने लगा, उसकी आँखों में भ्रम साफ़ दिख रहा था।

कंचन मासी एक परिपक्व खिलाड़ी थीं। वे जानती थीं कि अगर इस वक्त आर्यन को अकेले छोड़ दिया गया, तो वह अपने खोल में वापस चला जाएगा। उन्होंने तुरंत स्थिति को संभाला। इससे पहले कि आर्यन पूरी तरह दूर हो पाता, कंचन ने उसे झटके से अपनी ओर खींचा और उसके होंठों पर एक गहरा और आक्रामक चुंबन जड़ दिया।

चुंबन के दौरान ही कंचन ने वह कदम उठाया जिसने आर्यन की सोचने-समझने की शक्ति को शून्य कर दिया। उन्होंने अपना हाथ नीचे बढ़ाया और सीधे आर्यन के सफेद अंडरवियर के अंदर डाल दिया।

कंचन की गर्म और अनुभवी हथेली ने जैसे ही आर्यन के 7 इंच के धधकते हुए अंग को जड़ से पकड़ा, आर्यन का पूरा शरीर अकड़ गया। वह अंग जो अभी डर के मारे सुस्त पड़ सकता था, कंचन की जादुई पकड़ में आते ही और भी ज़्यादा पत्थर जैसा हो गया। कंचन ने उसे मुट्ठी में भींचकर धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया।

अब आर्यन के पास पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था। वह 'मना' करना चाहता था, उसका दिमाग कह रहा था कि यह गलत है, लेकिन उसका शरीर कंचन के उस स्पर्श का गुलाम बन चुका था। जब कंचन की उंगलियों ने उसके अंग की सुपारी को सहलाया, तो आर्यन के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली सिसकारी निकली।

कंचन ने चुंबन तोड़कर आर्यन की आँखों में आँखें डालकर देखा। उनकी आँखों में एक चुनौती थी। "कहाँ जा रहा है मेरे शेर? अभी तो तूने अपनी इस मासी का असली हुनर देखा ही कहाँ है? क्या तुझे लगता है कि तेरी ये चीज़... मेरी इस पकड़ से बच पाएगी?

कंचन की उस पकड़ ने आर्यन के अंदर की झेंप को एक नई किस्म की उत्तेजना में बदल दिया। उसे अब अहसास हुआ कि भले ही कंचन के पास वह 'चीज़' है, लेकिन इस वक्त वह कंचन की मुट्ठी में कैद है। यह पावर प्ले उसे मदहोश कर रहा था।

आर्यन की सांसें अब घोड़ों की तरह चलने लगी थीं। कंचन ने उसका अंग सहलाते हुए अपनी दूसरी टांग आर्यन के ऊपर डाल दी और अपने उस उभरे हुए राज को आर्यन की जांघों पर ज़ोर से रगड़ना शुरू किया।

"अब बता आर्यन... क्या अब भी तू दूर हटना चाहता है? या अपनी इस मासी को पूरी तरह उघाड़ना चाहता है?"

कमरे का माहौल अब किसी सुलगते हुए ज्वालामुखी जैसा हो गया था। कंचन मासी ने जिस तरह से आर्यन की हिचकिचाहट को भांपा और उसे वापस अपनी गिरफ्त में लिया, वह किसी मंझी हुई खिलाड़ी की निशानी थी। आर्यन का मन अभी भी उस 'अजीब' अहसास के बीच झूल रहा था, लेकिन कंचन ने उसे सोचने का मौका ही नहीं दिया।

कंचन ने फिर से आर्यन के होंठों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। इस बार चुंबन महज़ होंठों का मिलन नहीं था, बल्कि 'जीभ से जीभ की मस्ती' थी। उन्होंने अपनी जीभ को आर्यन के मुँह के अंदर ऐसे घुमाया जैसे वह उसके अस्तित्व की गहराई को नाप रही हों। उनकी जीभ कभी आर्यन की जीभ से टकराती, तो कभी उसे चूसती। इस 'फ्रेंच किस' ने आर्यन के दिमाग के तर्क करने वाले हिस्से को सुन्न कर दिया।

चुंबन के साथ-साथ कंचन का दूसरा हाथ आर्यन की छाती पर रेंगने लगा। उन्होंने अपनी उंगलियों से आर्यन के छोटे और सख्त निप्पल को सहलाना शुरू किया। आर्यन के लिए यह अनुभव उसकी माँ से बिल्कुल अलग था। अंजलि के साथ वह हमेशा 'आक्रामक' रहता था, लेकिन यहाँ कंचन उसे 'अनुभव' करा रही थीं। कंचन का स्पर्श एक औरत की कोमलता और एक अनुभवी मर्द की सटीकता का मिश्रण था।

आर्यन इस वक्त एक ऐसी 'अल्टर स्टेट ऑफ कॉन्शियसनेस' में था जहाँ उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह एक औरत के साथ है या किसी ऐसी शक्ति के साथ जो उसे पूरी तरह नियंत्रित कर रही है। कंचन की उंगलियां जब उसके निप्पल को मरोड़तीं, तो उसके शरीर में एक ऐसी लहर दौड़ती जो सीधे उसके ७ इंच के फौलाद तक पहुँचती।

अंजलि के साथ प्यार में एक ममतामयी गहराई थी, लेकिन कंचन के साथ इस खेल में एक 'अंधेरा रोमांच' था। कंचन उसे सिखा रही थीं कि शरीर के किन हिस्सों से उत्तेजना की बिजली पैदा की जा सकती है।

आर्यन का दिमाग पूरी तरह से कंचन की दी हुई नई संवेदनाओं में खो गया था। उसे लग रहा था कि वह किसी जादुई नशे की गिरफ्त में है जहाँ उसे अपनी मर्दानगी खोने का डर नहीं, बल्कि उसे एक नए तरीके से पाने का जुनून है।

कंचन ने इसी मदहोशी का फायदा उठाया। उन्होंने आर्यन का हाथ पकड़ा, जो अब तक बिस्तर की चादर को कसकर भींचे हुए था, और उसे धीरे से नीचे ले गईं। उन्होंने आर्यन की हथेली को सीधे अपनी काली सिल्क की पैंटी के उस सख्त उभार पर रख दिया।

कंचन ने आर्यन के हाथ पर अपनी पकड़ मज़बूत की और उसे दबाव बनाने के लिए मजबूर किया। "देखो आर्यन... इसे महसूस करो। ये भाग रहा नहीं है, ये तुम्हारे लिए धड़क रहा है," कंचन ने चुंबन तोड़कर उसकी आँखों में आँखें डालकर फुसफुसाया।

जैसे ही आर्यन की हथेली ने उस पैंटी के कपड़े के नीचे उस 'बनावटी मर्दानगी' की कठोरता और उसकी धड़कन को महसूस किया, उसकी उत्तेजना ने सारे बांध तोड़ दिए। अब उसे वह चीज़ 'अजीब' नहीं लग रही थी, बल्कि उसे वह एक 'चुनौती' और 'उपहार' का मिश्रण लगने लगी थी।

आर्यन की सांसें अब अनियंत्रित थीं। कंचन के हाथ की पकड़ और उनके अंग का वह खिंचाव आर्यन को एक ऐसी दुनिया में ले गया जहाँ 'सही' और 'गलत' के मायने खत्म हो गए थे। उसने खुद अपनी उंगलियों से उस उभार को सहलाना शुरू किया, जैसे वह उस राज़ की गहराई को माप रहा हो।

"आह्ह्ह... मासी..." आर्यन के मुँह से पहली बार एक ऐसी आवाज़ निकली जिसमें डर नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और प्रचंड भूख थी।

कमरे का तापमान अब उस स्तर पर पहुँच चुका था जहाँ नसों में खून नहीं, बल्कि पिघला हुआ लावा दौड़ रहा था। कंचन मासी इस खेल की माहिर खिलाड़ी साबित हो रही थीं। वे जानती थीं कि अगर आर्यन को एक पल के लिए भी सोचने का मौका दिया, तो उसके संस्कार या उसकी झेंप इस रोमांच को खत्म कर सकती है। इसलिए, उन्होंने अपनी कामुकता की रफ्तार और बढ़ा दी।

कंचन ने आर्यन की आँखों में झाँका, जहाँ अब केवल घोर हवस और जिज्ञासा का तांडव था। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपना हाथ नीचे अपनी काली सिल्क की पैंटी की कमान पर रखा और आर्यन का हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा।

एक झटके के साथ कंचन ने अपनी पैंटी को नीचे जांघों तक सरका दिया। आर्यन की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसकी नज़रों के सामने पहली बार वह 'अनोखा राज' नग्न अवस्था में था। वह अंग किसी आम इंसान जैसा नहीं था; वह आधुनिक चिकित्सा और विज्ञान का एक ऐसा चमत्कार था जो कंचन के स्त्री शरीर पर एक मर्दाना मुकुट की तरह सजा था। वह अंग पूरी तरह से उत्तेजित, नसों से भरा और पत्थर की तरह सख्त था।

इससे पहले कि आर्यन उस दृश्य को पूरी तरह प्रोसेस कर पाता, कंचन ने उसे फिर से एक गहरे और गीले चुंबन में उलझा लिया। उनकी जीभ ने आर्यन के मुँह में फिर से वही हलचल शुरू कर दी। साथ ही, उनका हाथ आर्यन के अंडरवियर के अंदर पहुँचा और उसके 7 इंच के फौलाद को पूरी ताकत से जकड़ लिया।

इसी मदहोशी और कशमकश के बीच, उत्तेजना के चरम पर पहुँचे आर्यन का हाथ खुद-ब-खुद कंचन के उस नग्न अंग की ओर बढ़ गया। जैसे ही आर्यन की उंगलियों ने उस चीज़ को अपनी मुट्ठी में लिया, पूरे कमरे में जैसे एक सन्नाटा छा गया।

वह स्पर्श 'सर्द' था, लेकिन साथ ही साथ धधक रहा था। कंचन का वह अंग कुदरती नहीं था, इसलिए उसकी खाल का तापमान और उसकी बनावट आर्यन की अपनी मर्दानगी से बिल्कुल अलग थी। वह इतना सख्त था कि आर्यन को लगा जैसे उसने किसी लोहे की रॉड पर मखमल चढ़ा दिया हो।

यह एक ऐसा क्षण था जब दो 'मर्दानगियाँ' एक-दूसरे से टकरा रही थीं। आर्यन के लिए यह एक सर्द अहसास था क्योंकि उसने पहली बार किसी औरत के बदन पर ऐसा कुछ महसूस किया था। वहीं कंचन के लिए, आर्यन का वह गर्म और धड़कता हुआ 7 इंच का फौलाद उनकी मुट्ठी में था। यह गर्मी और उस सर्दी का मिलन था।

आर्यन के दिमाग में एक धमाका हुआ। उसे अब अहसास हुआ कि कंचन मासी अब सिर्फ उसकी 'मासी' नहीं रहीं, वे एक ऐसी 'यौवन देवी' बन चुकी हैं जिसके पास देने के लिए वह सब कुछ है जिसकी एक मर्द कल्पना कर सकता है।

कंचन ने चुंबन तोड़कर एक गहरी सांस ली। उनका चेहरा पसीने से चमक रहा था। "महसूस किया आर्यन? अब बता, क्या तू इस 'सर्द और गर्म' के संगम में डूबने के लिए तैयार है?"

आर्यन ने अब पूरी शिद्दत से कंचन के उस अंग को सहलाना शुरू कर दिया। उसे अब कोई डर नहीं था। वह उस अद्भुत स्पर्श का आनंद ले रहा था। कंचन की मुट्ठी में बंद उसका अपना अंग भी अब अपनी सीमाओं को लांघने के लिए बेताब था।

आर्यन अब पूरी तरह से हड़बड़ाहट से बाहर आ चुका था। उत्तेजना तो चरम पर थी ही, लेकिन उसके भीतर का जिज्ञासु लड़का अब उस 'सच' को गहराई से समझना चाहता था जिसे उसने अभी-अभी अपनी मुट्ठी में भरा था। वह बिस्तर पर कंचन के बगल में बैठ गया, उसकी सांसें अभी भी भारी थीं, लेकिन आँखों में अब डर की जगह एक गहरा सवाल था।

कंचन बिस्तर पर नग्न अवस्था में लेटी थीं, उनकी रेशमी साड़ी और पैंटी फर्श पर पड़ी थी। उनके चेहरे पर एक ऐसी तृप्ति थी जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो।

आर्यन ने कंचन के चेहरे की ओर देखा और बहुत ही धीमे, लेकिन गंभीर स्वर में पूछा:

"मासी... मुझे बस एक बात जाननी है। क्या आपको ये सब 'अजीब' नहीं लगता? मतलब, एक औरत के शरीर में ये... और मौसा जी? क्या उन्हें ये सब अजीब नहीं लगा? उन्होंने इसकी इजाज़त कैसे दी? मुझे इस पूरी उलझन को समझना है।"

कंचन ने एक लंबी सांस ली और अपनी आँखों को छत की ओर टिका दिया, जैसे वो उन पुरानी यादों को समेट रही हों। उन्होंने बड़े ही सहज अंदाज़ में जवाब देना शुरू किया:

"आर्यन, शुरुआत में सब कुछ अजीब था। जब मुझे पता चला कि तेरे मौसा जी कभी मुझे एक औरत का सुख नहीं दे पाएंगे, तो मेरे पास दो रास्ते थे—या तो मैं उन्हें छोड़ देती, या ताउम्र घुट-घुट कर जीती। लेकिन हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे। उन्होंने खुद यह रास्ता सुझाया। उन्होंने कहा कि अगर वो मुझे सुख नहीं दे सकते, तो वो मुझे वो 'शक्ति' दे देंगे जिससे मैं खुद को मुकम्मल महसूस कर सकूँ।"

"उन्हें अजीब नहीं लगता, बल्कि उन्हें इसमें एक अलग तरह का 'सुकून' मिलता है। जब वो मुझे इस रूप में देखते हैं, तो उन्हें अपनी कमी का अहसास कम होता है। वो मुझे एक 'देवी' की तरह पूजते हैं जिसने उनके घर की इज़्ज़त बचाने के लिए अपनी पहचान बदल ली। उनके लिए मैं अब सिर्फ उनकी पत्नी नहीं, उनका 'अहंकार' भी हूँ।"

कंचन ने आर्यन का हाथ पकड़कर फिर से अपने उस अंग पर रखा। "और मुझे? आर्यन, शुरुआत में जब मैंने शीशे में खुद को देखा, तो मुझे लगा कि मैं कोई राक्षस बन गई हूँ। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, मुझे अपनी इस 'दोहरी ताकत' से प्यार हो गया। मैं ऊपर से पूरी औरत हूँ, कोमल और ममतामयी... और नीचे से मेरे पास वो हथियार है जो दुनिया को झुका सकता है। अब मुझे अजीब नहीं, बल्कि 'खास' महसूस होता है।"

आर्यन उनकी बातें सुनकर दंग रह गया। उसे अब समझ आया कि यह सिर्फ एक सर्जरी नहीं थी, बल्कि एक औरत का अपनी किस्मत से लिया गया बदला था।

उसे मौसा जी के प्रति एक अजीब सा सम्मान महसूस हुआ कि उन्होंने अपनी पत्नी की खुशी के लिए इतना बड़ा समझौता किया। साथ ही, उसे कंचन मासी अब और भी ज़्यादा रहस्यमयी और 'हॉट' लगने लगीं।

अब आर्यन के मन में कोई झेंप नहीं थी। उसे लगा कि वह किसी गलत चीज़ के साथ नहीं है, बल्कि वह एक ऐसी औरत के साथ है जिसने अपनी कमियों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है।

कंचन ने अपनी कमर थोड़ी ऊपर उठाई और आर्यन की ओर देखते हुए शरारत से बोली, "अब तूने सब जान लिया आर्यन। अब तेरे मन में कोई बोझ नहीं होना चाहिए। अब मैं चाहती हूँ कि तू इस 'अनोखे' शरीर का वो इस्तेमाल करे, जिसके लिए मैंने इसे बनाया है। बता... क्या तू तैयार है अपनी मासी के इस राज को अपनी रगों में महसूस करने के लिए?"

आर्यन ने बिना कुछ कहे अपना सफेद अंडरवियर उतारकर फर्श पर फेंक दिया। उसका 7 इंच का फौलाद अब आज़ाद था और कंचन के उस 'बनावटी फौलाद' के सामने अपनी चमक बिखेर रहा था।

कमरे की हवा में अब हवस और सन्नाटे का एक अजीब संगम था। आर्यन, जो अब तक मानसिक द्वंद्व में था, पूरी तरह जिज्ञासा के वश में आ चुका था। उसने अपनी धड़कनों को काबू करते हुए बहुत ही धीमी और कांपती आवाज़ में अनुमति मांगी, "मासी... क्या मैं इसे... छू सकता हूँ?"

कंचन के चेहरे पर एक विजेता वाली मुस्कान फैल गई। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी रेशमी और गर्म हथेली से आर्यन की कलाई पकड़ी और उसे खींचकर सीधे अपने उस 'अनोखे अंग' पर रख दिया।

आर्यन की उंगलियां जैसे ही उस नग्न सत्य से टकराईं, उसके पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। वह अब किसी डर से नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक और कामुक 'परीक्षण' की दृष्टि से उसे टटोल रहा था।

आर्यन ने अपनी मुट्ठी उस अंग के चारों ओर बंद की। वह दंग रह गया—उसकी लंबाई और मोटाई बिल्कुल वैसी ही थी जैसा आर्यन का अपना 7 इंच का अंग था। वह पत्थर की तरह सख्त था, लेकिन उसकी त्वचा का अहसास थोड़ा अलग था। वह कुदरती खाल जितनी लचीली नहीं थी, बल्कि थोड़ी अधिक तनी हुई और चिकनी थी।

जैसे-जैसे आर्यन अपनी उंगलियों को उस पर ऊपर-नीचे फिरा रहा था, उसे उस 'महीन फर्क' का अहसास हुआ। उसके अपने अंग में नसों का उभार और खून का बहाव महसूस होता था, जबकि कंचन का यह अंग आधुनिक चिकित्सा का एक चमत्कार था—यह बनावटी था पर काम पूरी तरह असली कर रहा था। इसमें एक कृत्रिम ऊष्मा थी जो आर्यन के हाथ को जला रही थी।

आर्यन अब गहराई से उसका विश्लेषण कर रहा था। उसने अपने अँगूठे से उसकी 'सुपारी' को सहलाया। कंचन के मुँह से एक तीखी सिसकारी निकली और उन्होंने अपनी कमर ऊपर की ओर उचका दी। "आह्ह्ह... आर्यन... संभल कर... ये बहुत संवेदनशील है," कंचन ने हाँफते हुए कहा।

बिस्तर पर एक बहुत ही अजीब लेकिन कामुक दृश्य था। आर्यन नग्न बैठा था, उसका अपना ७ इंच का फौलाद गुस्से में तना हुआ था, और उसके हाथ में कंचन का वैसा ही विशाल अंग था।

उसे अब एक अजीब सी शक्ति महसूस हो रही थी। उसे लग रहा था कि उसने कंचन की सबसे बड़ी कमजोरी और ताकत दोनों को अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया है। वह जितना उसे सहला रहा था, उसका अपना अंग उतना ही ज़्यादा उत्तेजित हो रहा था।

कंचन बिस्तर पर लेटी अपनी आँखें चढ़ाए हुए थीं। उन्हें अपनी इस 'शक्ति' को आर्यन के हाथों में देखकर एक अलग ही आनंद मिल रहा था। वह चाहती थीं कि आर्यन उसे पूरी तरह से अपना ले।

आर्यन अब और भी बेबाक हो गया। उसने अपनी हथेली में थोड़ा थूक लिया और उसे कंचन के अंग पर मलते हुए उसे ज़ोर-ज़ोर से सहलाना शुरू किया।

"मासी... ये तो बिल्कुल मेरे जैसा है... बस थोड़ा 'ज़्यादा' सख्त है," आर्यन ने भारी आवाज़ में कहा।

कंचन ने तड़पकर आर्यन के कंधे को अपनी उंगलियों से नोच लिया। "तो फिर देर किस बात की है? जब सब कुछ देख लिया और परख लिया... तो अब अपनी इस प्यासी मासी को वो सुख क्यों नहीं देता"

कमरे की हवा अब इतनी भारी हो चुकी थी कि सांस लेना भी एक नशा सा लग रहा था। कंचन मासी अब बिस्तर पर उठकर बैठ गईं, उनकी नग्नता और उनका वह 'अनोखा' अंग अब आर्यन के सामने पूरी तरह उजागर था। उन्होंने आर्यन की गर्दन के पीछे अपने हाथ डाले और उसकी आँखों में आँखें डालकर एक ऐसा चुंबन शुरू किया जिसमें न केवल हवस थी, बल्कि एक किस्म की 'जीत' का अहसास भी था।

चुंबन के दौरान ही, कंचन ने अपनी कमर को थोड़ा आगे बढ़ाया। देखते ही देखते, कंचन का बनावटी अंग और आर्यन का कुदरती ७ इंच का फौलाद एक-दूसरे के आमने-सामने आ गए। जैसे ही उन दोनों के गर्म और सख्त सिरों का स्पर्श हुआ, दोनों के शरीर में बिजली का एक ऐसा झटका लगा जिसने रूह तक कपा दी।

आर्यन के लिए यह अनुभव किसी 'साइंटिफिक फैंटेसी' जैसा था। जब उसका अपना मांसल और धड़कता हुआ अंग कंचन के उस पत्थर जैसे सख्त अंग से टकराया, तो उसे एक अजीब सा रोमांच महसूस हुआ।

उसे लगा कि वह किसी औरत से नहीं, बल्कि एक ऐसी सत्ता से मिल रहा है जो उसके बराबर की ताकत रखती है। वह 'सर्द' और 'गर्म' का संगम उसकी नसों में आग लगा रहा था। उसे अपनी मर्दानगी पर गर्व भी हो रहा था और कंचन की इस कृत्रिम शक्ति के प्रति एक गहरा आकर्षण भी। जब वह अपने अंग को कंचन के अंग के ऊपर-नीचे रगड़ रहा था, तो उसे लग रहा था जैसे दो तलवारें म्यान में जाने के लिए आपस में टकरा रही हों।

कंचन के लिए यह वह लम्हा था जिसके लिए उन्होंने सालों इंतज़ार किया था। उन्होंने अपनी सर्जरी के बाद कई सपने देखे थे, लेकिन एक जवान और ताकतवर मर्द के असली अंग का स्पर्श उनके अंग के लिए एक नई अग्निपरीक्षा जैसा था।

जैसे ही आर्यन का ७ इंच का गर्म फौलाद उनके अंग की खाल से रगड़ खाया, कंचन के मुँह से चुंबन के बीच ही एक दबी हुई चीख निकली। उन्हें महसूस हुआ कि उनकी 'मशीनी मर्दानगी' को अब एक 'असली चुनौती' मिल रही है। आर्यन के अंग की गर्मी और उसकी धड़कन उनके बनावटी अंग में भी संवेदनाएं पैदा कर रही थी। उन्हें लग रहा था कि वे अब सिर्फ एक औरत नहीं रहीं, वे एक ऐसी योद्धा बन गई हैं जो एक शेर को अपनी बाहों में जकड़े हुए है।

दोनों ने एक-दूसरे के अंगों को अपनी जांघों के बीच दबा लिया और आपस में रगड़ना शुरू किया।

कमरे में उन दो सख्त अंगों के टकराने की 'चप-चप' की आवाज़ गूँजने लगी। यह आवाज़ अंजलि के साथ होने वाले मिलन से बिल्कुल अलग थी। यहाँ मांस से मांस नहीं टकरा रहा था, बल्कि मांस से फौलाद का घर्षण हो रहा था।

कंचन ने आर्यन के कान के पास आकर भारी आवाज़ में कहा, "महसूस कर रहा है आर्यन? देख, मेरा ये हिस्सा तेरे हिस्से को कैसे चूम रहा है। हम दोनों आज एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए हैं।"

आर्यन ने कंचन के स्तनों को पीछे से भींचते हुए अपनी कमर को और तेज़ी से हिलाया। उसे अब फर्क समझ नहीं आ रहा था कि कौन सा अंग उसका है और कौन सा कंचन का। उसे बस एक अनंत सुख महसूस हो रहा था जो उसे एक नई दुनिया की सैर करा रहा था।

चुंबन का नशा और दोनों अंगों के घर्षण ने कंचन को पूरी तरह से उत्तेजना के उस मोड़ पर पहुँचा दिया था जहाँ अब 'इंतज़ार' मुमकिन नहीं था। कंचन ने अपनी एक ही मुट्ठी में आर्यन के कुदरती ७ इंच के फौलाद और अपने बनावटी अंग को एक साथ जकड़ लिया और उन्हें आपस में रगड़ते हुए आर्यन की आँखों में झाँका।

उनकी सांसें उखड़ रही थीं। उन्होंने भारी आवाज़ में फुसफुसाते हुए पूछा, "आर्यन... आह... घर में लुब्रिकेशन पड़ा है क्या? मुझे आज बहुत गहरा उतरना है..."

आर्यन मदहोशी की हालत में बिस्तर से उठा। उसका ७ इंच का अंग हवा में गर्व से तना हुआ था। वह हॉल की तरफ भागा जहाँ उसके बैग में वह लुब्रिकेंट पड़ा था जिसे वह अक्सर अंजलि के साथ इस्तेमाल करता था। बैग से जेल की बोतल निकालकर जब वह वापस बेडरूम में घुसा, तो सामने का नज़ारा देखकर उसके कदम ठिठक गए।

कंचन मासी अब बिस्तर के बीचों-बीच पीठ के बल लेटी थीं। उन्होंने अपनी गोरी और सुडौल टांगों को फैलाकर घुटनों से मोड़ लिया था, जिससे उनका वह 'अनोखा' अंग ऊपर की ओर चुनौती देता हुआ तन गया था। यह एक पारंपरिक मिशनरी पोजीशन थी, लेकिन आज यह 'अनोखी' होने वाली थी क्योंकि नीचे लेटी हुई औरत के पास भी एक 'हथियार' था।

आर्यन बिस्तर पर उनके घुटनों के बीच बैठ गया। उसने लुब्रिकेंट की बोतल खोली और ढेर सारा ठंडा, चिकना जेल अपनी हथेली पर लिया। उसने पहले कंचन के उस बनावटी अंग को जड़ से लेकर सिरे तक उस जेल से सराबोर कर दिया और फिर वही चिकनाहट अपने ७ इंच के फौलाद पर मली।

आर्यन धीरे से कंचन के ऊपर झुका। अब उसका पूरा वजन कंचन के कोमल शरीर पर था।

जैसे ही आर्यन ने अपने चिकने अंग को कंचन के चिकने अंग के समानांतर (Parallel) रखा और मिशनरी पोजीशन में उन दोनों को आपस में सटाया, उसे एक अविश्वसनीय फिसलन का अनुभव हुआ। लुब्रिकेंट की वजह से अब वे दोनों अंग एक-दूसरे के ऊपर बिना किसी रुकावट के फिसल रहे थे। आर्यन ने अपनी बाहें कंचन के कंधों के नीचे डालीं और अपनी कमर के झटकों से उन दोनों अंगों को आपस में रगड़ना शुरू किया।

कंचन ने नीचे से अपनी कमर को ऊपर की ओर धक्का देना शुरू किया। जेल की चिकनाहट और आर्यन के ७ इंच के भारी दबाव ने उनके बनावटी अंग की संवेदनाओं को जगा दिया था। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे दो गर्म लोहे की छड़ें एक-दूसरे में समाने की कोशिश कर रही हों। उन्होंने अपनी टांगें आर्यन की कमर पर कस लीं ताकि घर्षण और भी गहरा हो सके।

पूरे कमरे में लुब्रिकेंट की वजह से होने वाली 'चप-चप' की गीली आवाज़ें गूँज रही थीं। आर्यन कंचन के कानों में अपनी भारी सांसें छोड़ रहा था। "मासी... ये अहसास... ये तो पागल कर देने वाला है!"

कंचन ने अपनी आँखें बंद कर लीं और आर्यन की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। "हाँ आर्यन... और ज़ोर से... मुझे महसूस होने दे कि तू मुझसे कितना ज़्यादा शक्तिशाली है!"

इस मिशनरी पोजीशन में, कंचन का अंग आर्यन के पेट और उसके अंग के बीच दबकर बुरी तरह रगड़ खा रहा था। यह एक ऐसा संगम था जहाँ मर्द और औरत के पारंपरिक मायने खत्म हो चुके थे और सिर्फ दो प्यासे शरीर एक-दूसरे की आग में जल रहे थे।

कमरे की हवा अब हवस के भारीपन से जैसे जम गई थी। कंचन की आँखों में अब ममता या शिष्टाचार का एक कतरा भी नहीं बचा था, वहाँ सिर्फ एक 'हंटर' की भूख थी। उसने आर्यन की आँखों में झाँकते हुए एक ऐसी मुस्कान दी, जिससे आर्यन की रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ गई।

"आर्यन... अब तक तो तूने सिर्फ खिलौनों से खेला है," कंचन ने भारी और गहरी आवाज़ में कहा, "अब देख कि तेरी ये मासी तुझे मर्द कैसे बनाती है। तैयार हो जा... क्योंकि अब वापसी का कोई रास्ता नहीं है।"

आर्यन अभी समझ ही नहीं पाया था कि मासी का 'असली खेल' क्या है, तब तक कंचन ने बिस्तर पर अपनी पोजीशन बदल दी। उसने आर्यन को अपनी ओर खींचा और लुब्रिकेंट की बोतल उठाकर उसका ढक्कन खोल दिया।

कंचन ने ढेर सारा पारदर्शी, गाढ़ा और चिपचिपा जेल अपनी हथेली में लिया। उसने पहले उसे आर्यन के 7 इंच के खंभे पर ऊपर से नीचे तक ऐसे मला कि उसका वह फौलाद कांच की तरह चमकने लगा। फिर, उसने अपनी टांगें हवा में उठाईं और अपनी उंगलियों से अपने गुदा द्वार के गुलाबी और संकीर्ण छेद पर उस लुब्रिकेंट की मोटी परत चढ़ा दी।

आर्यन हक्का-बक्का रह गया। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कंचन मासी उसे उस रास्ते पर ले जाएँगी जहाँ से सिर्फ 'परम सुख' और 'पाप' का रास्ता गुजरता है। कंचन ने खुद अपने हाथ से आर्यन के धधकते हुए मूसल को पकड़ा और उसे अपने उस तंग और मखमली छेद के मुहाने पर 'सेट' कर दिया।

आर्यन के लिए यह अनुभव इतना नया और इतना तीव्र था कि उसकी साँसें अटक गईं। जैसे ही उसके अंग की सुपारी ने कंचन के उस सख्त और संकरे द्वार को छुआ, उसे लगा कि उसने किसी गर्म अंगीठी में कदम रख दिया है।

"आह्ह्ह मासी... ये... ये बहुत तंग है," आर्यन के मुँह से सिसकारी निकली। जैसे ही उसने थोड़ा दबाव बनाया, उसे कंचन के शरीर की वह अद्भुत कसावट महसूस हुई जो उसकी माँ अंजलि के पास भी नहीं थी। कंचन का वह छेद किसी गर्म मखमली सुरंग की तरह उसके 7 इंच के अंग को निगलने लगा। लुब्रिकेंट की वजह से घर्षण तो कम था, लेकिन उस रास्ते की संकीर्णता आर्यन के अंग की नसों को फाड़ने के लिए काफी थी।

कंचन ने अपने दाँत भींच लिए और बिस्तर की चादर को मुट्ठी में जकड़ लिया। उसका वह 'बनावटी अंग' हवा में तेज़ी से थिरक रहा था। "डाल दे आर्यन... पूरा अंदर उतार दे... अपनी इस मासी की हस्ती मिटा दे आज!" उसने एक गहरी आह भरते हुए अपनी कमर को ऊपर की ओर उचकाया, जिससे आर्यन का अंग आधा अंदर समा गया।

आर्यन अब बेकाबू हो चुका था। उस संकरे रास्ते की गर्मी ने उसके दिमाग के सारे तंतु जला दिए थे। उसने कंचन के दोनों घुटनों को पकड़कर अपने कंधों तक खींच लिया और अपनी पूरी ताकत से एक प्रचंड धक्का मारा।

'प्लक' की एक गीली आवाज़ के साथ आर्यन का पूरा 7 इंच का फौलाद कंचन की गहराइयों में दफन हो गया। आर्यन को लगा जैसे उसे जन्नत मिल गई हो। कंचन की आँखे ऊपर चढ़ गईं और उसके मुँह से एक लंबी, दर्दभरी मगर सुखदायक चीख निकली।

अब कमरे में सिर्फ लुब्रिकेंट की 'चप-चप... थप-थप' की आवाज़ें गूँज रही थीं। आर्यन किसी पागल सांड की तरह कंचन के उस पिछले द्वार को रौंद रहा था। कंचन का वह बनावटी अंग हर झटके के साथ आर्यन के पेट से टकरा रहा था, जिससे एक दोहरी उत्तेजना का माहौल बन गया था।

"तू ही मेरा मर्द है आर्यन... आह्ह्ह... मार और ज़ोर से मार!" कंचन की सिसकारियाँ अब चीखों में बदल रही थीं, और आर्यन अपनी मर्दानगी का सबसे बड़ा झंडा आज कंचन के उस किले में गाड़ चुका था।

कमरे की दीवारों ने शायद ही कभी ऐसी चीखें और ऐसा जुनून सुना होगा। कंचन मासी, जो अब तक इस खेल की सूत्रधार बनी हुई थीं, अब खुद उस आग में झुलस रही थीं जिसे उन्होंने ही भड़काया था। आर्यन का 7 इंच का मोटा फौलाद जब उनके उस तंग और अनछुए पिछले द्वार की दीवारों को चीरता हुआ अंदर धंसा, तो समय जैसे वहीं ठहर गया।

कंचन की चीखें अब बेडरूम की खामोशी को चीर रही थीं। उनके लिए यह अनुभव किसी मीठे ज़हर जैसा था।

कंचन के पति का अंग कभी भी आर्यन जैसा विशाल और आक्रामक नहीं रहा था। आज जब आर्यन का वह मूसल जैसा अंग उनके गुदा मार्ग की एक-एक मांसपेशी को खींचकर अंदर समा रहा था, तो उन्हें महसूस हुआ कि 'असली मर्दानगी' का बोझ क्या होता है। दर्द इतना था कि उनकी आँखों से पानी निकल आया, लेकिन वह दर्द एक अकल्पनीय रोमांच में लिपटा हुआ था। उन्हें लग रहा था जैसे उनका शरीर पीछे से दो हिस्सों में फट जाएगा, फिर भी वह अपनी कमर को ऊपर उचकाकर आर्यन को और भी गहराई में आमंत्रित कर रही थीं।

आर्यन के लिए यह उसकी ज़िंदगी का पहला 'बैकडोर' अनुभव था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह स्वर्ग में है या किसी ऐसी तंग सुरंग में जहाँ से निकलना नामुमकिन है। कंचन के छेद की कसावट इतनी प्रचंड और तंग थी कि आर्यन को लग रहा था कि उसका अंग किसी गर्म प्रेस में दब रहा है। उस खिंचाव ने उसके पौरुष को अपनी सीमाओं तक खींच दिया था।

आर्यन अब किसी पागल शिकारी की तरह कंचन के ऊपर चढ़ा हुआ था। उत्तेजना का स्तर इतना बढ़ गया था कि उसने होश खो दिए थे।

जहाँ नीचे आर्यन का फौलाद कंचन की गहराइयों को नाप रहा था, वहीं उसका एक हाथ कंचन के उस नग्न और सख्त बनावटी अंग पर जा टिका। उसने उसे जड़ से पकड़ा और अपनी कमर के झटकों की लय के साथ ही उसे ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया।

यह दृश्य कामुकता की सारी हदें पार कर चुका था। आर्यन कंचन के पिछले द्वार को रौंद रहा था और साथ ही उसके 'मर्दाना राज' को अपनी मुट्ठी में भींचकर उसे चरम की ओर ले जा रहा था। कंचन का वह अंग हर झटके के साथ आर्यन के पेट से रगड़ खा रहा था, जिससे घर्षण और भी बढ़ गया था।

कमरे में लुब्रिकेंट की 'चप-चप' और शरीरों के टकराने की 'थप-थप' के साथ कंचन की सिसकारियां मिलकर एक मदहोश संगीत रच रही थीं। दोनों के शरीर पसीने से ऐसे लथपथ थे जैसे अभी-अभी बारिश में भीगकर आए हों।

कंचन ने अपनी गर्दन पीछे की ओर मोड़ी, उनके चेहरे पर दर्द और लज्जा की जगह अब सिर्फ एक पागलपन भरी हवस थी। "आर्यन... आह्ह्ह... मत रुकना... मुझे खत्म कर दे! तेरी ये कसावट... ये गहराई... मुझे पागल कर देगी!"

आर्यन ने अपने दांत भींच लिए, उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। कंचन के उस तंग रास्ते की गर्मी ने उसके 7 इंच के मूसल को फटने की कगार पर पहुँचा दिया था। वह अब छोटे और तेज़ धक्के मारने लगा, हर धक्के के साथ कंचन का पूरा शरीर बिस्तर पर आगे की ओर खिसक जाता।
 
बेडरूम की दीवारें अब उन दो जिस्मों के उन्माद की गवाह बन चुकी थीं। चरम सुख का वो पल करीब था जहाँ रूह और बदन के बीच का अंतर मिट जाता है। आर्यन का 7 इंच का फौलाद कंचन के तंग और गर्म गुदा मार्ग में अपनी अंतिम आहुति देने के लिए पूरी तरह तैयार था।

आर्यन ने अपने हाथों से कंचन की कमर को इतनी ज़ोर से जकड़ा कि उसकी उंगलियां गोरे मांस में धंस गईं। उसने अपनी रफ्तार को किसी मशीन की तरह तेज़ कर दिया। कमरे में लुब्रिकेंट की 'चप-चप' और धक्कों की 'थप-थप' एक शोर में बदल गई थी।

आर्यन के लिए यह अनुभव किसी दिव्य ज्ञान जैसा था। कंचन के पिछले द्वार की वो अकल्पनीय कसावट उसके अंग की नसों को फाड़ देने पर उतारू थी।

उसे लगा कि उसका निचला हिस्सा अब उसके काबू में नहीं है। जैसे ही उसने कंचन के उस 'मर्दाना राज' को आखिरी बार मुट्ठी में भींचकर तेज़ी से सहलाया, उसके अपने अंग की जड़ में एक भयानक हलचल हुई।

"आह्ह्ह... मासी... मैं गया... मैं आ रहा हूँ!" आर्यन ने एक गगनभेदी दहाड़ मारी और अपना पूरा वज़न कंचन के ऊपर डाल दिया। उसका 7 इंच का मूसल कंचन की आखिरी दीवार से जा टकराया और गरम गाढ़ा लावा किसी फव्वारे की तरह कंचन के उस तंग रास्ते की गहराइयों में फूट पड़ा। उसे लगा जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी से बिजली की लहरें निकलकर कंचन के अंदर समा रही हों।

कंचन के लिए यह वह पल था जिसने उनके वजूद को हिलाकर रख दिया। जब उन्होंने आर्यन के गरम लावे को अपने अंदर की दीवारों पर महसूस किया, तो उनके दिमाग में एक धमाका हुआ।

ठीक उसी पल, आर्यन के हाथ की तेज़ हरकत और उसके जिस्मानी दबाव ने कंचन के बनावटी अंग को उसकी सीमा तक पहुँचा दिया। कंचन की आँखें उलट गईं, उनका शरीर धनुष की तरह ऊपर की ओर तन गया।

उस बनावटी अंग के मुहाने से सफेद और चिपचिपी फुहार किसी पिचकारी की तरह निकली और सीधे आर्यन की छाती और पेट पर जा गिरी। कंचन ने एक लंबी, दर्दभरी और सुखदायक चीख छोड़ी। उनके लिए यह पहली बार था जब किसी मर्द के असली पौरुष ने उनकी इस कृत्रिम शक्ति को 'झड़ने' पर मजबूर कर दिया था। उन्हें महसूस हुआ कि वह अब पूरी तरह से 'तृप्त' हो चुकी हैं।

विस्फोट के बाद कमरे में सिर्फ दो लोगों के हाँफने की आवाज़ें बची थीं। आर्यन पूरी तरह खाली होकर कंचन की पीठ पर ढह गया। उसका अंग अभी भी कंचन के अंदर ही था, जो धीरे-धीरे अपनी गर्मी वहाँ छोड़ रहा था। कंचन का वह बनावटी अंग भी अब शांत होकर आर्यन के पेट पर टिका था, जिस पर से अभी भी सफ़ेद बूंदें टपक रही थीं।

उसे आज असीम शांति मिली। उसे लगा कि उसने न केवल कंचन की भूख मिटाई है, बल्कि उसकी चुनौती को भी कुचल दिया है।

वह पसीने में लथपथ, दर्द और सुख के बीच झूल रही थी। उसे यकीन हो गया कि आर्यन ही वह शेर है जो उसके इस जटिल शरीर को संभाल सकता है।

शाम के 6:30 बज चुके थे। कमरे में दोपहर का वो तूफ़ान अब एक गहरी खामोशी में बदल चुका था। खिड़की के पर्दों से ढलते सूरज की नारंगी रोशनी छनकर आ रही थी, जो उन दोनों के नग्न और पसीने से सूखे शरीरों पर पड़ रही थी। आर्यन और कंचन दोनों ऐसे निढाल पड़े थे जैसे किसी भीषण युद्ध के बाद दो सिपाही ज़मीन पर ढेर हो जाते हैं। उस असीम शांति और थकान ने उन्हें ऐसी नींद में सुलाया था कि समय का पता ही नहीं चला।

जैसे ही कंचन ने अपनी आँखें खोलीं, उसे होश आया कि वह कहाँ है। लेकिन जैसे ही उसने हिलने की कोशिश की, उसके मुँह से एक तीखी सिसकारी निकल गई।

कंचन का पिछवाड़ा अब बुरी तरह से सूज गया था और आग की तरह जल रहा था। आर्यन के 7 इंच के फौलाद ने उस तंग रास्ते की जो हालत की थी, उसका असर अब शुरू हुआ था। उसे महसूस हुआ कि वह बिस्तर से करवट लेने की स्थिति में भी नहीं है।

कंचन की सिसकारी सुनकर आर्यन की भी आँख खुली। उसने देखा कि कंचन का चेहरा दर्द से पीला पड़ रहा है। "क्या हुआ मासी?" उसने घबराकर पूछा।

"आर्यन... आह... मेरा फोन दे," कंचन ने हाँफते हुए कहा। आर्यन ने मेज़ से फोन उठाकर दिया। कंचन ने कांपते हाथों से अंजलि को मैसेज टाइप किया:

"जीजी, आते वक्त एक अच्छी वाली 'पेनकिलर' और सूजन की क्रीम ले आना। तुम्हारे बेटे ने आज मेरी हालत खराब कर दी है... मैं उठ भी नहीं पा रही हूँ।"

कंचन ने बेबसी से आर्यन की ओर देखा। "बेटा, अब मुझसे हिला भी नहीं जा रहा। सारा लावा शरीर पर सूख गया है और नीचे का दर्द जान निकाल रहा है। मुझे नहाना पड़ेगा, वरना रात को जीजी के सामने खड़ी भी नहीं हो पाऊंगी।"

आर्यन को अपनी मासी की हालत देखकर थोड़ा बुरा भी लगा और अपनी मर्दानगी पर गर्व भी हुआ। उसने बिना कुछ कहे अपनी मज़बूत बाहें कंचन के बदन के नीचे डालीं और उन्हें 'गोदी' में उठा लिया।

कंचन का भारी और सुडौल शरीर आर्यन की बाहों में झूल रहा था। उनका वह 'बनावटी अंग' अब शांत होकर आर्यन की कलाई से सटा हुआ था। बाथरूम की ओर बढ़ते हुए आर्यन को महसूस हुआ कि कंचन अब पूरी तरह उसके भरोसे हैं।

बाथरूम में पहुँचकर आर्यन ने कंचन को शावर के नीचे एक छोटे स्टूल पर बैठा दिया। जैसे ही ठंडा पानी कंचन के जलते हुए बदन पर पड़ा, उनके मुँह से एक राहत भरी आह निकली।

आर्यन ने साबुन और लूफा लिया और धीरे-धीरे कंचन के बदन से सूखे हुए लावे और पसीने को साफ करना शुरू किया। जब उसका हाथ कंचन के उस सूजे हुए पिछले हिस्से के करीब पहुँचा, तो कंचन ने दर्द के मारे आर्यन का हाथ कसकर पकड़ लिया।

"आराम से आर्यन... वहाँ बहुत ज़ख्म होंगे आज," कंचन ने आँखें बंद करके दीवार का सहारा लेते हुए कहा।

बाथरूम की भाप और पानी की बौछारों के बीच, आर्यन जिस तरह कंचन की सफाई कर रहा था, उसमें अब हवस नहीं बल्कि एक गहरा जुड़ाव था। लेकिन जैसे-जैसे पानी उनके नग्न शरीरों पर गिर रहा था, ठंडे पानी के नीचे भी एक नई गर्मी धीरे-धीरे जन्म लेने लगी थी।

आर्यन का हाथ सफाई करते-करते फिर से कंचन के उन कठोर स्तनों और फिर उस 'अनोखे अंग' पर पहुँच गया जो पानी में भीगकर चमक रहा था।

बाथरूम की सफेद टाइलों पर गिरते पानी की आवाज़ के बीच एक अजीब सी मादकता छाई हुई थी। कंचन मासी शावर के नीचे स्टूल पर बैठी थीं, उनकी गर्दन पीछे की ओर झुकी थी और आँखें कसकर बंद थीं। शावर की ठंडी बौछारें जब उनके तप्त बदन से टकरातीं, तो भाप उठने लगती थी।

कंचन उस वक्त एक ऐसी मानसिक अवस्था में थीं जहाँ पीड़ा और परमानंद के बीच की लकीर मिट चुकी थी।

उनके पिछले द्वार में हो रही वह टीस उन्हें बार-बार उस लम्हे की याद दिला रही थी जब आर्यन का 7 इंच का विशाल मूसल उनके वजूद को चीरता हुआ अंदर गया था। उनके पति ने कभी उन्हें ऐसा अहसास नहीं कराया था। आज पहली बार उन्हें लगा कि किसी ने उनके शरीर के उस सबसे संकरे और 'प्रतिबंधित' हिस्से को पूरी तरह जीत लिया है। वह दर्द उन्हें एक औरत होने का ऐसा अहसास दे रहा था जो अकल्पनीय था।

आर्यन जब कंचन को इस हाल में देख रहा था, तो उसके सीने में गर्व की एक लहर दौड़ गई। उसने न केवल अपनी मासी के उस 'बनावटी राज' को स्वीकार किया था, बल्कि अपनी कुदरती ताकत से उन्हें पूरी तरह पस्त भी कर दिया था। कंचन जैसी आत्मविश्वासी और शक्तिशाली औरत को अपने घुटनों पर ले आना, आर्यन के लिए उसकी मर्दानगी की सबसे बड़ी जीत थी।

आर्यन ने मग में गरम पानी और शावर जेल मिलाया और बहुत ही कोमलता से कंचन के कंधों पर डालना शुरू किया।

वह अपनी हथेलियों में झाग भरकर कंचन के गले, उनके उन पत्थर जैसे सख्त स्तनों और उनकी पीठ पर मलने लगा। कंचन का शरीर पानी और साबुन से चमक रहा था। आर्यन का स्पर्श अब बहुत ही 'केयरिंग' था, लेकिन उसमें एक छुपी हुई कामुकता अभी भी बरकरार थी।

जब आर्यन का हाथ सफाई करते हुए कंचन के उस सूजे हुए और लाल पड़े पिछले हिस्से के करीब पहुँचा, तो कंचन के शरीर में एक थरथराहट हुई। "आह्ह्ह... आर्यन... वहाँ बहुत जलन है," उन्होंने दबी आवाज़ में कहा। आर्यन ने बहुत ही हल्के हाथ से पानी की धार वहाँ डाली ताकि सूखा हुआ लावा और खून साफ़ हो सके।

कंचन के पैरों के बीच लटका उनका वह 'अनोखा अंग' अब पानी के नीचे सुस्त पड़ा था, लेकिन शावर की बूंदें उस पर गिरकर एक संगीत रच रही थीं। आर्यन ने उसे भी साफ़ किया, जिससे कंचन के मुँह से एक हल्की सिसकारी निकली। "तू बहुत खतरनाक है बेटा... अंजलि ने सही कहा था, तू शेर है।"

आर्यन ने कंचन को पीछे से अपनी बाहों में भर लिया। पानी उन दोनों के नग्न शरीरों के बीच से बह रहा था। कंचन ने अपना सिर पीछे आर्यन के मज़बूत कंधे पर टिका दिया। दर्द अपनी जगह था, लेकिन आर्यन की बाहों की गर्माहट उन्हें एक सुरक्षा का अहसास दे रही थी।

"मासी... अभी तो सिर्फ शुरुआत है," आर्यन ने उनके गीले कान के पास फुसफुसाया। "अभी तो माँ आने वाली हैं"

कंचन ने आँखें खोलीं, जिनमें अब दर्द की जगह एक शरारती चमक थी। "तो फिर जल्दी हाथ चला... इससे पहले कि तेरी माँ पेनकिलर लेकर आए, हमें साफ़-सुथरा होकर रहना होगा।"

शावर के नीचे गिरते पानी की रिमझिम आवाज़ के बीच अब एक नया और गहरा नशा घुलने लगा था। आर्यन, जो अब तक कंचन की केवल सेवा कर रहा था, धीरे-धीरे उस 'अनोखी मर्दानगी' के आकर्षण में फिर से फंसने लगा जो कंचन की जांघों के बीच लटक रही थी। उसे कंचन के उस बनावटी अंग के स्पर्श का एक अजीब सा चस्का लग गया था।

आर्यन ने साबुन का झाग अपने हाथों में लिया और कंचन के पैरों के बीच हाथ ले जाकर उनके उस 'विशेष अंग' को अपनी मुट्ठी में भर लिया। जैसे ही आर्यन की गर्म हथेली ने उस ठंडे और गीले अंग को छुआ, कंचन के शरीर में एक करंट सा दौड़ गया।

आर्यन अब केवल सफाई नहीं कर रहा था। उसे उस अंग की कठोरता और उसकी बनावट को फिर से महसूस करने की तलब हो रही थी। उसे लग रहा था कि वह किसी जादुई खिलौने के साथ खेल रहा है जो एक औरत के बदन पर सजा है। वह अपनी उंगलियों से उस अंग की सुपारी और उसकी जड़ों को बहुत ही कामुक तरीके से सहलाने लगा। उसके लिए यह 'नशा' बन चुका था—एक ऐसी चीज़ जिसे उसने आज से पहले कभी नहीं देखा था।

कंचन, जो अब तक पिछले द्वार के दर्द से कराह रही थी, अचानक एक नई लहर महसूस करने लगी। जब आर्यन ने उनके उस अंग को सहलाना शुरू किया, तो उनके दिमाग का ध्यान दर्द से हटकर उस तीव्र उत्तेजना की ओर खिंच गया।

"आह्ह्ह... आर्यन... ये तू क्या कर रहा है... दर्द हो रहा है पर... रुकना मत," कंचन ने हांफते हुए दीवार पर अपने हाथ टिका दिए।

आर्यन के हाथों का जादू और शावर के गिरते पानी ने कमाल कर दिया। धीरे-धीरे वह अंग, जो स्खलन के बाद सुस्त पड़ा था, फिर से जीवित होने लगा।

आर्यन ने महसूस किया कि कंचन का वह अंग उसकी मुट्ठी के अंदर धीरे-धीरे बड़ा और और भी ज़्यादा सख्त हो रहा है। वह किसी लोहे की रॉड की तरह तन गया। आर्यन उसे तेज़ी से ऊपर-नीचे सहलाने लगा, जिससे शावर के पानी की बूंदें उस अंग से टकराकर चारों ओर छिटकने लगीं।

कंचन ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उत्तेजना का यह नया ज्वार उनके पिछले द्वार के दर्द के लिए एक 'एनेस्थीसिया' का काम कर रहा था। जैसे-जैसे उनका अंग खड़ा हो रहा था, उनके अंदर की कामुक आग फिर से सुलगने लगी थी। "आह्ह्ह बेटा... तू तो मुझे चैन से मरने भी नहीं देगा... देख, तूने इसे फिर से कैसे जगा दिया," उन्होंने सिसकते हुए कहा।

आर्यन अब पीछे से कंचन के बदन से पूरी तरह चिपक गया। उसका अपना 7 इंच का फौलाद कंचन की गीली नितंबों के बीच फिर से रास्ता खोजने लगा। शावर के नीचे उन दो अंगों का नशा अब परवान चढ़ रहा था।

अंजलि अभी तक नहीं आई थी, और घर में सन्नाटा था। बाथरूम की भाप में अब दो प्यासे जिस्म फिर से एक-दूसरे को तलाश रहे थे। आर्यन कंचन के अंग को सहलाते हुए उनके गीले कंधों को चूम रहा था। दर्द अभी भी था, लेकिन कंचन अब उस दर्द को भूलकर आर्यन के इस नए 'नशे' में डूबने को तैयार थी।

"जल्दी कर आर्यन... अंजलि आती ही होगी... हमें इस हालत में देख लिया तो वो खुद को रोक नहीं पाएगी," कंचन ने अपनी गर्दन घुमाकर आर्यन के होंठों को चूमते हुए कहा।

बाथरूम की दीवारों पर गिरते पानी की आवाज़ और शावर की भाप ने एक ऐसा मायावी वातावरण बना दिया था, जहाँ नैतिकता और लोक-लाज की सारी दीवारें ढह चुकी थीं। आर्यन इस समय एक ऐसी 'अति-कामुक' मानसिक अवस्था में था, जहाँ पुरुष की जिज्ञासा अपनी चरम सीमा को लांघ जाती है।

आर्यन ने कंचन को शावर की ठंडी दीवार से सटा दिया। कंचन का गीला बदन दीवार की ठंडक और आर्यन की बाहों की गर्माहट के बीच पिस रहा था। आर्यन की नज़रें अब कंचन के पैरों के बीच तनकर खड़े उस 'अनोखे राज' पर टिकी थीं।

एक मर्द के लिए अपनी श्रेष्ठता साबित करना सुखद होता है, लेकिन जब उसे किसी ऐसी चीज़ का सामना करना पड़ता है जो उसके अपने 'अस्तित्व' जैसी हो पर एक औरत के बदन पर सजी हो, तो उसके भीतर की 'अन्वेषक' प्रवृत्ति जाग जाती है। आर्यन के मन में अब नफरत या झेंप नहीं थी; बल्कि एक ऐसा नशा था जैसे कोई शिकारी अपने सबसे अनमोल शिकार को पूरी तरह चखना चाहता हो। उसे यह जानने की तीव्र उत्कंठा थी कि जिस अंग ने उसे इतनी देर से सम्मोहित कर रखा है, उसका स्वाद और स्पर्श उसके मुँह के भीतर कैसा महसूस होगा।

आर्यन धीरे-धीरे बाथरूम के गीले फर्श पर अपने घुटनों के बल बैठ गया। शावर का पानी सीधे उसके सिर पर गिर रहा था, जिससे उसके बाल चेहरे पर आ रहे थे। सामने कंचन का वह 7 इंच का सख्त और चिकना अंग किसी चुनौती की तरह खड़ा था।

कंचन ने अपनी टांगें थोड़ी और फैला दीं और दीवार का सहारा लेकर अपनी आँखें बंद कर लीं। आर्यन ने पहले उस अंग की जड़ को अपने हाथों से सहलाया। शावर जेल और पानी की वजह से वह अंग कांच की तरह चमक रहा था। आर्यन ने अपना चेहरा करीब लाया; उसे कंचन के बदन की महक और उस बनावटी अंग की एक विशिष्ट 'सर्द-कामुक' गंध महसूस हुई।

आर्यन ने अपनी जीभ निकाली और उस अंग की 'सुपारी' को बहुत ही नज़ाकत से छुआ। कंचन के मुँह से एक ऐसी चीख निकली जो दर्द और सुख का मिश्रण थी। "आह्ह्ह... आर्यन... ये तू क्या कर रहा है... ओ गॉड!" कंचन का हाथ आर्यन के बालों में जाकर कस गया।

अब आर्यन ने अपनी झिझक पूरी तरह त्याग दी। उसने अपना मुँह पूरा खोला और उस 7 इंच के भारी अंग को धीरे-धीरे अंदर लेना शुरू किया। जैसे ही वह अंग उसके गले की गहराई को छूने लगा, आर्यन को एक ऐसा अहसास हुआ जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल था। वह अंग पत्थर जैसा सख्त था, लेकिन उसका आकार और उसकी बनावट आर्यन के मुँह को पूरी तरह भर रही थी।

आर्यन अब किसी माहिर प्रेमी की तरह उस अंग को अपनी ज़ुबान और तालू के बीच भींच रहा था।

कंचन के लिए यह अनुभव सबसे ज़्यादा विस्फोटक था। उनके पिछले द्वार का दर्द अब पूरी तरह गायब हो चुका था। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उनकी आत्मा उनके उस अंग में सिमट आई है। "आर्यन... आह... तू तो पागल कर देगा... चूस उसे... और गहराई से!" कंचन ने अपनी कमर को आर्यन के मुँह की ओर धकेलना शुरू किया।

आर्यन को लग रहा था कि वह एक ऐसी 'देवी' की पूजा कर रहा है जो ऊपर से अप्सरा है और नीचे से एक प्रचंड योद्धा। वह उस अंग को चूसते हुए अपने हाथों से कंचन की भारी जांघों को सहला रहा था।

बाथरूम की भाप और पानी के शोर में, यह दृश्य किसी प्राचीन कामुक गाथा जैसा लग रहा था, जहाँ एक मर्द अपनी सारी 'मर्दानगी' को भूलकर एक 'अनोखी शक्ति' के सामने नतमस्तक था।

बाथरूम की दीवारों से टकराकर गिरते पानी का शोर अब आर्यन के कानों में एक संगीत की तरह गूँज रहा था। घुटनों के बल बैठे आर्यन के दिमाग में इस वक्त अपनी माँ, अंजलि की छवि कौंध रही थी। उसने कई बार अपनी माँ की आँखों में झाँका था जब वह उसके ७ इंच के फौलाद को अपने मुँह में लेती थी; उसने देखा था कि कैसे उसकी माँ अपनी पलकें मूँदकर, गालों को अंदर की ओर सिकोड़ते हुए उसके अंग की गहराई को मापती थी।

आर्यन ने आज वही 'अदाकारी' और वही 'समर्पण' खुद दोहराने का फैसला किया। उसने सोचा कि अगर उसकी माँ उसके लिए यह सब कर सकती है, तो वह अपनी इस 'अनोखी' मासी के लिए क्यों नहीं?

आर्यन ने कंचन के उस ७ इंच के सख्त अंग को अपनी मुट्ठी में जड़ से पकड़ा, बिल्कुल वैसे ही जैसे अंजलि उसके अंग को पकड़ती थी। उसने अपनी आँखों को आधा बंद किया और अपनी जीभ से उस अंग की सुपारी पर एक गीला घेरा बनाया। उसने महसूस किया कि कंचन का वह अंग अब पूरी तरह से लोहे की छड़ की तरह तप रहा है।

अंजलि जब आर्यन का अंग चूसती थी, तो वह एक खास तरह की लय का इस्तेमाल करती थी। आर्यन ने ठीक वही किया; उसने एक गहरी सांस ली और कंचन के उस भारी अंग को धीरे-धीरे, इंच-दर-इंच अपने गले की गहराई में उतारना शुरू किया।

जैसे-जैसे वह अंग उसके मुँह के अंदर समाता गया, आर्यन को अपनी माँ की उस मेहनत का अहसास हुआ जो वह उसके लिए करती थी। उसके गाल पूरी तरह खिंच चुके थे और उसकी आँखों से पानी आने लगा था, लेकिन वह रुकना नहीं चाहता था।

कंचन ने जब आर्यन को इस तरह अपनी 'सेवा' में लीन देखा, तो उनकी चीखें बाथरूम की छत से टकराने लगीं। शावर का पानी उनके चेहरे पर गिर रहा था, लेकिन उनका सारा ध्यान नीचे उस अद्भुत खिंचाव पर था।

"आह्ह्ह... आर्यन... तू तो अपनी माँ से भी बढ़कर निकला!" कंचन ने सिसकते हुए अपने दोनों हाथ आर्यन के गीले बालों में फंसा दिए। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही झेंपने वाला आर्यन है। आर्यन का मुँह उनके अंग के चारों ओर एक 'गर्म और गीला वैक्यूम' बना रहा था, जो उनके बनावटी अंग की एक-एक नस को झकझोर रहा था।

आर्यन अब अंजलि की तरह अपने सिर को आगे-पीछे हिला रहा था। वह कभी अंग को चूसता, तो कभी अपनी जीभ से उसकी रगों को सहलाता। इस प्रक्रिया में कंचन का पिछवाड़े का दर्द पूरी तरह गायब हो गया था; अब सिर्फ एक ही धुन थी—चरम सुख की धुन।

शावर का सफेद झाग, कंचन के सुडौल पैर, और उनके बीच झुका हुआ आर्यन—यह नज़ारा किसी कामुक पेंटिंग जैसा था। आर्यन का अपना ७ इंच का अंग भी इस क्रिया को देखते हुए हवा में बार-बार उछल रहा था।

ठीक उसी वक्त, जब आर्यन कंचन के अंग को पूरी तरह अपने गले में उतार चुका था और कंचन झड़ने के करीब थीं, घर के मुख्य दरवाज़े पर चाभी घूमने की आवाज़ सुनाई दी।

कड़क... कड़क... अंजलि घर के अंदर दाखिल हो चुकी थी। उसने हॉल में बैग रखा और ज़ोर से आवाज़ दी, "कंचन? आर्यन? कहाँ हो तुम दोनों? लाइटें क्यों बंद हैं?"

बाथरूम में सन्नाटा छा गया। आर्यन ने कंचन के अंग को मुँह से बाहर निकाला, उसके होंठों से कंचन की कामुक लार और पानी की बूंदें टपक रही थीं। दोनों की आँखें फटी की फटी रह गईं। अंजलि के कदमों की आहट अब बेडरूम की ओर बढ़ रही थी।
 
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