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हॉल के सन्नाटे में अंजलि के सैंडल की आवाज़ गूँज रही थी। "कंचन! आर्यन! कहाँ हो तुम दोनों?" अंजलि ने किचन से लेकर बालकनी तक देख लिया, लेकिन पूरा घर खाली लग रहा था। उसके हाथ में पेनकिलर का पत्ता और क्रीम की ट्यूब थी। जब उसे कोई जवाब नहीं मिला, तो उसका माथा ठनका। तभी उसे बेडरूम की ओर से पानी गिरने की हल्की गूँज सुनाई दी।
बाथरूम के अंदर का आलम ही कुछ और था। शावर की तेज़ बौछार और उत्तेजना के शोर ने आर्यन और कंचन को बाहरी दुनिया से पूरी तरह काट दिया था। उन्हें न तो मुख्य दरवाज़े के खुलने की आहट सुनाई दी और न ही अंजलि की पुकार।
आर्यन इस वक्त पूरी तरह अपनी माँ अंजलि की यादों में खोकर कंचन की सेवा कर रहा था। उसने कंचन के 7 इंच के उस सख्त और बनावटी अंग को अपने दोनों हाथों से थाम रखा था। वह बार-बार उसे अपने गले की गहराई तक उतार रहा था। उसका पूरा चेहरा गीला था—कुछ शावर के पानी से और कुछ उस कामुक लार से जो कंचन के अंग से रिस रही थी। वह बिल्कुल वैसे ही अपने सिर को हिला रहा था जैसे अंजलि उसके सामने घुटनों पर बैठकर करती थी।
कंचन दीवार से चिपकी हुई थीं, उनके दोनों हाथ आर्यन के बालों में बुरी तरह फंसे हुए थे। वे दर्द और लज्जा की सीमा पार कर चुकी थीं। "ओह्ह्ह... आर्यन... तू तो अपनी माँ का भी उस्ताद निकला... चूस उसे... और गहराई से!" कंचन की आँखें ऊपर चढ़ी हुई थीं और वे पागलों की तरह सिसक रही थीं। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि मौत और बदनामी उनके दरवाज़े पर खड़ी है।
अंजलि धीरे-धीरे बेडरूम में दाखिल हुई। उसने देखा कि बेड की चादर बेतरतीब है, फर्श पर कंचन की काली शिफॉन साड़ी और पैंटी पड़ी है, और पास ही आर्यन का सफेद अंडरवियर। अंजलि का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वह ठिठकते हुए बाथरूम के दरवाज़े तक पहुँची। दरवाज़ा आधा खुला था, क्योंकि जलदबाज़ी में वे कुंडी लगाना भूल गए थे।
जैसे ही अंजलि ने हाथ बढ़ाकर दरवाज़े को धीरे से धक्का दिया, उसके सामने का नज़ारा किसी ज्वालामुखी के फटने जैसा था:
सामने शावर के नीचे उसका अपना बेटा, उसका जवान खून, नग्न अवस्था में घुटनों के बल बैठा था। और उसका मुँह... उसकी अपनी छोटी बहन कंचन के उस 'अनोखे मर्दाना अंग' पर लगा हुआ था। अंजलि की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने देखा कि कैसे कंचन का वह सख्त अंग आर्यन के मुँह के अंदर-बाहर हो रहा है।
अंजलि के हाथ से दवाइयों का थैला फर्श पर गिर गया। उसके कानों में वही आवाज़ें गूँज रही थीं जो वह खुद आर्यन के साथ अकेले में करती थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस बहन को उसने अपने घर में पनाह दी, वह उसके बेटे के साथ इस 'अप्राकृतिक' खेल में डूबी हुई है।
आर्यन और कंचन अभी भी अपनी ही धुन में थे। आर्यन ने एक बार फिर ज़ोरदार वैक्यूम बनाकर कंचन के अंग को पूरी तरह अंदर लिया, जिससे कंचन की एक लंबी और तीखी सिसकारी निकली—"आह्ह्ह्ह... बस आर्यन... अब निकल जाएगा... मेरा लावा निकल जाएगा!"
अंजलि अब और सहन नहीं कर सकी। उसकी ममता, उसकी हवस और उसकी ईर्ष्या सब एक साथ जाग उठे। उसने ज़ोर से दरवाज़े को दीवार पर दे मारा—धड़ाम!
बाथरूम की भाप और पानी के बीच अचानक हुए इस धमाके से आर्यन और कंचन जैसे नींद से जागे। आर्यन ने झटके से कंचन का अंग अपने मुँह से निकाला, उसके होंठों से एक तार जैसा लार का धागा नीचे गिरा। कंचन ने कांपते हुए अपनी आँखें खोलीं और सामने अपनी बड़ी बहन अंजलि को खड़ा पाया।
"तो ये चल रहा है मेरी पीठ पीछे?" अंजलि की आवाज़ किसी घायल शेरनी जैसी थी। उसकी नज़रों में गुस्सा भी था और एक अजीब सी तड़प भी। उसकी नज़रें सीधे कंचन के उस नग्न और खड़े अंग पर टिकी थीं, जो अभी भी थरथरा रहा था।
"जीजी... वो... मैं..." कंचन की आवाज़ गले में ही फंस गई। आर्यन नग्न हालत में घुटनों पर बैठा अपनी माँ की ओर देख रहा था, उसकी आँखों में डर कम और एक अजीब सी मर्दाना चुनौती ज़्यादा थी।
अंजलि धीरे-धीरे उनके करीब आई, शावर के पानी में भीगते हुए। उसने नीचे गिरे आर्यन के ७ इंच के फौलाद को देखा और फिर कंचन के उस बनावटी अंग को। उसने एक ठंडी हंसी हंसी।
"दवाइयां तो मैं बाद में दूँगी कंचन... पहले मुझे ये देखना है कि मेरा बेटा तेरी इस 'चीज़' में ऐसा क्या ढूंढ रहा है जो उसे अपनी माँ के पास नहीं मिला!"
अंजलि ने अपने सैंडल उतारे और अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंस लिया। माहौल अब 'थ्रीसम' (Trio) की एक ऐसी आग में तब्दील होने वाला था जहाँ खून के रिश्ते खाक होने वाले थे।
अंजलि का वह रौद्र रूप अचानक एक मादक और रहस्यमयी हंसी में बदल गया। बाथरूम की धुंधली रोशनी में उसकी सफेद साड़ी पानी की बूंदों से भीगकर उसके बदन से चिपकने लगी थी। आर्यन, जो अब तक थर-थर कांप रहा था, अपनी माँ की इस अचानक बदली हुई फितरत को समझ नहीं पाया।
जैसे ही अंजलि हंसी, बाथरूम का तनाव एक अजीब सी 'कामुक चुप्पी' में बदल गया। उसने देखा कि उसका शेर जैसा बेटा, जो अभी कुछ देर पहले कंचन का 'शिकार' कर रहा था, अब अपनी माँ के खौफ से भीगी बिल्ली बना हुआ था।
अंजलि के गुस्से वाले नाटक ने आर्यन के दिमाग पर ऐसा असर किया कि उसका 7 इंच का फौलाद डर के मारे सिमटने लगा। जो अंग कुछ देर पहले पत्थर की तरह सख्त था, वह अब अपनी माँ की नज़रों की तपिश झेल नहीं पाया और छोटा होकर लटकने लगा। पुरुष मनोविज्ञान का यह वह हिस्सा था जहाँ 'माँ' का दबदबा 'प्रेमी' के जुनून पर भारी पड़ गया।
अंजलि को अपने बेटे की यह बेबसी और अपनी बहन की घबराहट देखकर एक अजब किस्म का 'पावर-प्ले' महसूस हुआ। उसे मज़ा आने लगा कि कैसे उसकी एक आवाज़ ने इन दोनों 'शिकारियों' को बेदम कर दिया है। उसने दीवार के पास पड़ा एक छोटा स्टूल खींचा और उस पर किसी रानी की तरह बैठ गई।
अंजलि ने अपनी साड़ी का पल्लू सही किया और अपने पैरों पर पैर चढ़ाकर बैठ गई। उसकी नज़रें सीधे कंचन के उस 7 इंच के तने हुए बनावटी अंग पर थीं, जो अभी भी प्यासा खड़ा था।
"डरो मत आर्यन... मैं तो बस ये देख रही थी कि मेरे पीछे इस घर में कितनी तरक्की हुई है," अंजलि ने अपनी आवाज़ में शहद घोलते हुए कहा। फिर उसने कंचन की ओर देखा, जिसकी सांसें अभी भी अटकी हुई थीं। "कंचन, तू तो बड़ी छुपी रुस्तम निकली। और तू रुक क्यों गया आर्यन? मैंने कहा न... जारी रखो! मुझे भी तो पता चले कि मेरी छोटी बहन ने तुझे क्या नया सिखाया है।"
आर्यन अब एक बहुत ही अजीब स्थिति में था। उसकी माँ उसके ठीक सामने बैठी उसे अपनी मासी का अंग चूसने का हुक्म दे रही थी। अंजलि की आँखों में एक ऐसी चमक थी जो आर्यन को यह अहसास करा रही थी कि आज वह सिर्फ एक दर्शक नहीं, बल्कि इस खेल की 'मास्टरमाइंड' है।
कंचन ने कांपते हुए अंजलि की ओर देखा। "जीजी... ये... ये बस..." "चुप!" अंजलि ने उसे टोक दिया। "बातें बहुत हो गईं कंचन। मैंने सुना तूने बहुत दर्द सहा है आज। अब उस दर्द को मज़े में बदल। आर्यन... अपनी माँ की बात मान और वापस शुरू कर। अगर तेरा ये हथियार खड़ा नहीं हुआ, तो समझ लेना आज तेरी खैर नहीं।"
अंजलि के उकसाने पर आर्यन के अंदर का डर अब एक नए किस्म की उत्तेजना में बदलने लगा। अपनी माँ के सामने अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन करना उसके लिए सबसे बड़ा नशा बन गया। उसने फिर से कंचन की जांघों के बीच अपना चेहरा झुकाया।
वह स्टूल पर बैठी, अपनी ठुड्डी पर हाथ रखे बड़े गौर से देख रही थी कि कैसे आर्यन की जीभ कंचन के उस बनावटी अंग को सहला रही है। उसे ईर्ष्या तो थी, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा उसे कंचन के उस 'विशेष अंग' को करीब से देखने की भूख थी। वह देखना चाहती थी कि जब आर्यन उसे अपने मुँह में लेता है, तो कंचन के चेहरे के भाव कैसे बदलते हैं।
बाथरूम में अब शावर के पानी की आवाज़ और अंजलि की मादक नज़रों के बीच आर्यन फिर से कंचन की 'सेवा' में जुट गया। अंजलि का हाथ धीरे-धीरे अपनी ही साड़ी के नीचे सरकने लगा था, क्योंकि यह नज़ारा अब उसे भी पिघला रहा था।
बाथरूम की उस उमस भरी हवा में अब 'पाप' का एक ऐसा त्रिकोण बन चुका था, जिसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाए। शावर से गिरता पानी अब केवल शरीर नहीं धो रहा था, बल्कि नैतिकता की आखिरी परत को भी बहा ले गया था।
अंजलि स्टूल पर किसी महारानी की तरह बैठी थी, उसकी आँखों में अपने बेटे को अपनी ही बहन के अंग की गुलामी करते देखने का एक विकृत आनंद था। इस दृश्य में जो मानसिक उथल-पुथल चल रही थी, वह किसी भी सामान्य अनुभव से कोसों दूर थी।
आर्यन अब पूरी तरह से एक 'यौन कठपुतली' बन चुका था। उसकी माँ की उपस्थिति ने उसके भीतर एक ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा किया जिसने उसकी कामुकता को एक नए, अंधेरे स्तर पर पहुँचा दिया।
आर्यन के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न और सबसे बड़ी फैंटेसी का मिलन थी।
जब वह अपनी माँ की नज़रों के सामने कंचन के उस 7 इंच के बनावटी फौलाद को मुँह में ले रहा था, तो उसके मन में एक अजीब सा विरोधाभास था। उसे लग रहा था कि वह अपनी माँ के सामने नंगा हो चुका है। लेकिन अंजलि की कामुक हंसी ने उसे यह संदेश दे दिया था कि आज उसे 'मर्यादा' की नहीं, बल्कि 'परफॉरमेंस' की ज़रूरत है।
अब वह कंचन का अंग सिर्फ मज़े के लिए नहीं चूस रहा था, बल्कि अपनी माँ को यह दिखाने के लिए चूस रहा था कि वह कितना 'काबिल' हो गया है। वह जानबूझकर अपनी जीभ से उस अंग पर ऐसी हरकतें कर रहा था जिससे कंचन तेज़ आवाज़ में सिसकियाँ ले, ताकि अंजलि को अपनी बहन की बेबसी पर मज़ा आए।
अंजलि स्टूल पर बैठी अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में लपेट रही थी।
वह देख रही थी कि उसका बेटा कंचन के उस 'विशेष अंग' को ठीक वैसे ही चूस रहा है जैसे वह अंजलि के साथ करता था। उसे कंचन के उस अंग से नफरत होनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय उसे एक अजीब सा आकर्षण महसूस हो रहा था। वह सोच रही थी कि जिस अंग को मेरा बेटा इतनी शिद्दत से चख रहा है, उसमें ऐसी क्या बात है।
उसे इस बात का घमंड हो रहा था कि उसके एक आदेश पर उसका जवान बेटा अपनी मासी के चरणों में पड़ा है। वह एक-एक बारीकी को नोट कर रही थी—आर्यन के गालों का खिंचाव, कंचन के थरथराते पैर और उस बनावटी अंग की चमक।
आर्यन ने अब अपनी रफ्तार बढ़ा दी। उसने कंचन के उस सख्त अंग को गले के अंतिम छोर तक उतारा। कंचन ने दीवार पर अपना सिर दे मारा और सिसकते हुए चिल्लाई—"आह्ह्ह... जीजी... देखो इसे... ये पागल हो गया है... ये मुझे मार डालेगा!"
अंजलि ने अपनी जगह से उठकर करीब आते हुए कहा, "उसे चूसने दे कंचन... आज ये तेरा दर्द चूस लेगा। आर्यन, रुकना मत! अपनी माँ को दिखा कि तूने अपनी मासी को पालतू कैसे बनाया है।"
आर्यन का अंग, जो डर से छोटा हो गया था, अब इस 'थ्रीसम' माहौल और अंजलि के प्रोत्साहन से फिर से धड़कने लगा। वह घुटनों पर बैठा था, मुँह में मासी का अंग था और पीठ पर अपनी माँ की तपती हुई नज़रें।
अंजलि की अनुभवी आँखों ने भांप लिया था कि बाथरूम की इस उमस में उत्तेजना अब उस मोड़ पर पहुँच गई है जहाँ से सब कुछ बेकाबू हो सकता था। उसे याद आया कि कंचन अभी भी दर्द में है और आर्यन भी पूरी तरह थक चुका है। एक चतुर खिलाड़ी की तरह उसने खेल को थोड़ा विराम देने का फैसला किया ताकि अगली पारी और भी धमाकेदार हो सके।
अंजलि ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर शावर का नल बंद कर दिया। पानी की गिरती आवाज़ बंद होते ही बाथरूम में एक भारी सन्नाटा छा गया, जिसमें सिर्फ उन तीनों की धड़कनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
"अब बस करो तुम दोनों," अंजलि ने अधिकारपूर्ण लहजे में कहा, पर उसकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं बल्कि एक ठहरी हुई शरारत थी। "आर्यन, बाहर निकल और खुद को साफ़ कर। कंचन, तू भी अब बाहर आ... तेरे पिछले घाव को दवा और आराम की ज़रूरत है। पहले शरीर सुखाओ, कुछ खाओ-पियो, फिर देखेंगे कि आगे क्या करना है।"
आर्यन सबसे पहले बाहर निकला। शावर के नीचे की वह आक्रामक मर्दानगी अब शांत थी। उसने एक बड़ा तौलिया अपनी कमर पर लपेटा। अंजलि ने एक दूसरा तौलिया हाथ में लिया और खुद कंचन के बदन को पोंछने लगी।
अंजलि जब कंचन के कंधों और कमर को सुखा रही थी, तो उसकी उंगलियां जानबूझकर कंचन के उस 'विशेष अंग' को छू रही थीं जो अभी भी ढीला नहीं हुआ था। कंचन ने थकावट और दर्द के कारण अपना सिर अंजलि के कंधे पर टिका दिया।
बेडरूम में आकर आर्यन ने कंचन को धीरे से बिस्तर पर लिटाया। अंजलि ने बैग से वह शक्तिशाली पेनकिलर निकाली और पानी के साथ कंचन को दी।
"उल्टी लेट जा," अंजलि ने आदेश दिया। कंचन के उल्टा लेटते ही अंजलि ने वह एंटीसेप्टिक क्रीम अपनी उंगलियों पर ली और बहुत ही धीरे से कंचन के उस सूजे हुए और लाल पड़े पिछले द्वार पर लगाना शुरू किया। आर्यन दूर खड़ा यह देख रहा था। उसे अपनी माँ की कोमलता और कंचन के दर्द के बीच एक अजीब सा जुड़ाव महसूस हुआ। क्रीम की ठंडक से कंचन के मुँह से एक राहत भरी आह निकली।
तीनों ने अब अपने-अपने 'घर के कपड़े' पहनना शुरू किया। यह हिस्सा सबसे अजीब था क्योंकि कुछ देर पहले तक वे एक-दूसरे के नग्न सच से रूबरू थे।
कंचन ने एक ढीली-ढाली सूती मैक्सी पहनी ताकि नीचे के घाव पर दबाव न पड़े। उसका वह 7 इंच का राज अब उस मैक्सी के नीचे सुरक्षित और छुपा हुआ था।
आर्यन ने अपनी टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहन लिए, जबकि अंजलि ने अपनी भीगी हुई साड़ी बदलकर एक दूसरी हल्की शिफॉन की साड़ी लपेटी।
कुछ देर बाद तीनों डाइनिंग टेबल पर थे। अंजलि ने जल्दी से कुछ हल्का नाश्ता और जूस तैयार किया था।
टेबल पर सन्नाटा था, लेकिन मेज़ के नीचे पैरों का खेल शुरू हो चुका था। आर्यन जूस पीते हुए अपनी माँ अंजलि को देख रहा था, जिसने अभी-अभी उसे अपनी बहन के साथ रंगे हाथों पकड़ा था। कंचन दवा के असर से अब थोड़ा बेहतर महसूस कर रही थी, लेकिन उसकी नज़रें अभी भी आर्यन के चेहरे पर टिकी थीं।
अंजलि ने जूस का घूँट लिया और धीरे से बोली, "दवा अपना काम आधे घंटे में शुरू कर देगी कंचन।
पेट भर खाना और कंचन के शरीर में दौड़ रही पेनकिलर की तेज़ खुराक ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। बेडरूम की पीली रोशनी में एक भारी सा और मदहोश कर देने वाला सन्नाटा पसरा था। दोपहर के उस भीषण तूफान के बाद अब बिस्तर पर जो दृश्य था, वह जितना शांत लग रहा था, उसके भीतर उतनी ही गहरी और दबी हुई कामुकता फिर से करवट ले रही थी।
बिस्तर पर आर्यन बीच में लेटा हुआ था। उसके एक तरफ उसकी जन्म देने वाली माँ अंजलि थी और दूसरी तरफ उसकी वो कामुक मासी कंचन, जिसका 'अनोखा राज' आज उसने पूरी तरह चख लिया था।
कंचन के लिए यह पल बहुत अजीब और राहत भरा था। पिछले द्वार का वो तीखा दर्द अब पेनकिलर के असर से सुन्न होने लगा था। पेट भरा होने की वजह से उसका शरीर भारी हो रहा था और ठंडी एसी (AC) की हवा उसे नींद की आगोश में खींच रही थी। उसकी मैक्सी के अंदर उसकी जांघों के बीच वो 7 इंच का बनावटी अंग अब सुस्त पड़ा था, लेकिन उसकी मौजूदगी आर्यन को अभी भी महसूस हो रही थी। कंचन ने अपना एक हाथ आर्यन के सीने पर रखा और उसकी आँखें धीरे-धीरे मुंदने लगीं। वह अब आधे होश और आधी नींद के उस मुकाम पर थी जहाँ सिर्फ सुकून था।
कंचन के विपरीत, अंजलि पूरी तरह से जाग रही थी। उसकी आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। वह कोहनी के बल टिकी हुई आर्यन के चेहरे को देख रही थी। उसके मन में अभी भी बाथरूम वाला वो नज़ारा घूम रहा था जब उसका बेटा अपनी मासी की सेवा में लगा था। अंजलि के लिए यह 'सहनशीलता' का इम्तिहान था। वह देख रही थी कि उसकी छोटी बहन गहरी नींद में जा रही है, जिससे अब रास्ता साफ़ हो रहा था।
आर्यन सीधा लेटा छत को देख रहा था। उसके शरीर में एक अजीब सी ऊर्जा दौड़ रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि उसकी दाईं ओर कंचन की सांसें अब धीमी और गहरी हो गई हैं—वह सो चुकी थी। लेकिन उसकी बाईं ओर अंजलि की तपती हुई नज़रें उसे जला रही थीं।
अंजलि ने चादर के नीचे से धीरे से अपना पैर आर्यन के पैर पर रगड़ा। आर्यन सिहर उठा। अंजलि ने उसके कान के पास झुककर बहुत ही धीमी आवाज़ में फुसफुसाया, "सो गई वो... दवा ने काम कर दिया।"
आर्यन ने अपनी माँ की ओर देखा। अंजलि की आँखों में वही पुरानी हवस फिर से लौट आई थी, लेकिन इस बार उसमें एक 'चुनौती' भी थी। जैसे वह पूछ रही हो कि 'मासी का स्वाद लेने के बाद क्या अपनी माँ को भूल गए?'
कमरे में सिर्फ एसी की हल्की सी आवाज़ थी। कंचन की गहरी नींद ने अब अंजलि और आर्यन को एक ऐसा 'प्राइवेट स्पेस' दे दिया था जहाँ वे अपनी दबी हुई बातों को अंजाम दे सकते थे।
अंजलि ने धीरे से कंचन का हाथ आर्यन के सीने से हटाया और उसे बिस्तर के दूसरी तरफ रख दिया। अब आर्यन और अंजलि के बीच कोई रुकावट नहीं थी। कंचन सोई हुई थी, बेखबर कि उसके बगल में अब उसकी अपनी बहन उसके 'शेर' को फिर से अपनी ओर खींच रही है।
अंजलि ने अपना हाथ आर्यन के लोअर के अंदर डाला और उसके 7 इंच के फौलाद को अपनी गर्म मुट्ठी में कैद कर लिया, जो अब फिर से सिर उठाने लगा था।
"तो अब बताओ साहबज़ादे... मासी के साथ खेलकर दिल भर गया, या अब अपनी इस प्यासी माँ की भी सुध लोगे?" अंजलि ने शरारत से आर्यन की गर्दन पर छोटा सा काटा।
अंजलि के भीतर का संयम अब पूरी तरह टूट चुका था। बाथरूम में जो नज़ारा उसने देखा था—अपने बेटे के मुँह को अपनी बहन के उस अनोखे अंग पर—उसने अंजलि की नसों में ईर्ष्या और हवस का ऐसा कॉकटेल घोल दिया था जिसे अब और रोकना नामुमकिन था। जैसे ही उसने सुनिश्चित किया कि कंचन गहरी नींद में है, वह अपनी मर्यादा की सारी जंजीरें तोड़कर एक 'जंगली बिल्ली' की तरह आर्यन पर झपट पड़ी।
अंजलि ने एक झटके में अपनी स्थिति बदली और आर्यन के ऊपर चढ़कर उसे बिस्तर पर दबा दिया। उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और आँखों में एक ऐसी वहशी चमक थी जैसे कोई भूखा शिकारी अपने शिकार को दबोच रहा हो।
अंजलि ने बिना एक पल गंवाए आर्यन के होंठों को अपने होंठों के शिकंजे में कस लिया। यह कोई सामान्य चुंबन नहीं था; यह एक 'हिंसक आक्रमण' था। उसने अपनी जीभ आर्यन के मुँह में इतनी गहराई और ताकत से डाली जैसे वह कंचन के हर अहसास को वहाँ से मिटा देना चाहती हो। उसके दांत आर्यन के होंठों को काट रहे थे और उसके हाथ आर्यन की गर्दन को जकड़े हुए थे।
अंजलि के दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी—'यह मेरा बेटा है, मेरा प्रेमी है, और इसने मेरी बहन के साथ वह सब किया जो उसे सिर्फ मेरे साथ करना चाहिए था।' वह आर्यन को चूमते हुए अपनी पूरी देह को उसके ऊपर रगड़ रही थी। उसके भारी और तप्त स्तन आर्यन की छाती को कुचल रहे थे।
बगल में कंचन सोई हुई थी, जिससे इस स्थिति का रोमांच हजार गुना बढ़ गया था। अंजलि की साड़ी के पल्ले इधर-बधर बिखर गए थे और उसके खुले बाल आर्यन के चेहरे पर एक जाले की तरह फैल चुके थे।
आर्यन अपनी माँ के इस 'जंगली रूप' को देखकर सुन्न रह गया था। अंजलि के शरीर की गर्मी उसे जला रही थी। जैसे-जैसे अंजलि उसे पागलों की तरह चूम रही थी, आर्यन का 7 इंच का फौलाद उसकी माँ की जांघों के बीच फिर से एक पत्थर की तरह सख्त हो गया। वह महसूस कर रहा था कि उसकी माँ आज उसे कच्चा चबा जाने के मूड में है।
अंजलि का हाथ अब आर्यन के लोअर के अंदर पहुँच चुका था। वह उसके अंग को इतनी बेदर्दी और जुनून से भींच रही थी जैसे वह उस पर अपना मालिकाना हक जता रही हो। "आह्ह्ह... आर्यन... तू मेरा है... सिर्फ मेरा!" अंजलि ने चुंबन के बीच ही भारी आवाज़ में फुसफुसाया।
अंजलि की सिसकारियां अब धीरे-धीरे तेज़ हो रही थीं। वह भूल चुकी थी कि बगल में उसकी बहन लेटी है। वह अपनी कमर को आर्यन के ऊपर किसी पागलपन की हद तक पटक रही थी, जिससे बिस्तर के स्प्रिंग हल्की आवाज़ करने लगे थे।
अंजलि ने अपना चेहरा आर्यन के गले में गड़ा दिया और वहाँ ज़ोर से 'लव बाइट' देते हुए उसे नोच लिया। उसकी आवाज़ में एक ऐसी तड़प थी जो केवल बरसों की प्यास से आती है। "आज मैं तुझे वो सुख दूँगी जो कंचन अपने उस बनावटी खिलौने से कभी नहीं दे पाएगी। देख... देख अपनी माँ की आग!"
अंजलि ने अपनी साड़ी का ब्लाउज फाड़ने के अंदाज़ में खोला और अपने दोनों उफनते हुए स्तनों को आर्यन के मुँह के पास लाकर रगड़ने लगी। वह चाहती थी कि आर्यन उसे अभी और इसी वक्त अपनी पूरी मर्दानगी से शांत करे।
बिस्तर पर मची उस खलबली और पागलपन भरे चुंबनों के बीच, अब कपड़ों का बोझ दोनों के लिए असहनीय हो चुका था। अंजलि की 'जंगली' उत्तेजना और आर्यन की जवान भूख एक ऐसे मुकाम पर थी जहाँ खाल से खाल का मिलना अनिवार्य था। बगल में सोई कंचन के निश्चल शरीर के ठीक पास, मर्यादाओं के चीथड़े उड़ने वाले थे।
आर्यन और अंजलि एक-दूसरे के होंठों को बुरी तरह से चूस रहे थे, और उनके हाथ एक-दूसरे के शरीर पर किसी भूखे शिकारी की तरह लिबास को तलाश रहे थे।
अंजलि ने चुंबन तोड़कर एक गहरी सांस ली, उसकी आँखें लाल थीं। उसने झटके से अपने साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिरा दिया। उसकी हल्की शिफॉन की साड़ी सरकती हुई फर्श पर जा गिरी। अब वह सिर्फ अपने पेटीकोट और भीगे हुए ब्लाउज में थी। उसने आर्यन का हाथ पकड़कर अपने भारी स्तनों पर रखा और फुसफुसायी, "उतार इन्हें आर्यन... आज अपनी माँ को पूरी तरह बेपर्दा कर दे।"
आर्यन ने कांपते हुए लेकिन जुनून से भरे हाथों से अंजलि के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू किए। टक्... टक्... टक्... जैसे-जैसे हुक खुल रहे थे, अंजलि के 36 इंच के उफनते हुए स्तन कैद से आजाद होने लगे। जैसे ही ब्लाउज ढीला हुआ, अंजलि ने उसे कंधे से उतार कर पीछे फेंक दिया। अब उसकी दूधिया पीठ और आगे का भारी यौवन आर्यन की आँखों के सामने पूरी तरह नग्न था।
आर्यन ने अब अपना लोअर और अंडरवियर एक साथ नीचे खिसका दिया। उसका 7 इंच का फौलाद किसी कमान से छूटे तीर की तरह सीधा खड़ा होकर अंजलि के पेट से जा टकराया।
अंजलि ने बिना देर किए अपने पेटीकोट की डोरी खींच दी। रेशमी कपड़ा उसकी जांघों से होता हुआ बिस्तर के नीचे ढेर हो गया। अब अंजलि पूरी तरह से 'निर्वस्त्र' थी। उसकी सुडौल जांघों, चौड़े कूल्हों और बीच के उस घने काले जंगल की गर्माहट आर्यन के होश उड़ाने के लिए काफी थी।
आर्यन ने अपनी टी-शर्ट भी उतार फेंकी। अब बिस्तर पर दो नग्न जिस्म थे—एक जवान, सख्त और गठा हुआ आर्यन, और दूसरी तरफ उसकी अपनी माँ, जो ढलती उम्र की ढलान पर भी किसी 'यौवन की देवी' की तरह रस से भरी हुई थी।
नग्न होने के बाद दोनों एक पल के लिए रुके। अंजलि ने नीचे झुककर आर्यन के खड़े अंग को देखा और फिर उसकी आँखों में झाँका। उसे गर्व था कि यह विशाल अंग उसका अपना खून है। वहीं आर्यन, अपनी माँ के पूर्ण नग्न बदन को देखकर मदहोश था।
दोनों अब बिना किसी रुकावट के एक-दूसरे से चिपक गए। पसीने और उत्तेजना की महक कमरे में फैल गई थी। अंजलि ने अपनी टांगें आर्यन की कमर पर कस लीं।
बगल में सोई कंचन की मैक्सी थोड़ी ऊपर खिसकी हुई थी और उसका वह 'अनोखा अंग' बेजान सा पड़ा था। अंजलि ने आर्यन के कान में दांत गड़ाए और धीरे से कहा, "देख ले अपनी मासी को... सो गई है बेचारी। अब असली मर्द की तरह अपनी माँ को वो सुख दे जो आज तक किसी ने नहीं दिया।"
आर्यन ने अंजलि के दोनों भारी स्तनों को अपनी हथेलियों में भींच लिया और उन्हें ज़ोर-ज़ोर से मसलने लगा। अंजलि के मुँह से सिसकारी निकली जिसे उसने आर्यन के कंधे में मुँह गड़ाकर दबा लिया।
अंजलि की आँखों में इस वक्त जो चमक थी, वह केवल हवस की नहीं, बल्कि अपने बेटे पर अपनी सत्ता साबित करने की थी। उसने देख लिया था कि आर्यन ने कंचन के लिए क्या किया था, और अब वह उसे यह दिखाना चाहती थी कि 'गुरु' आखिर गुरु ही होता है।
अंजलि धीरे-धीरे, किसी नागिन की तरह सरकती हुई आर्यन के पेट के नीचे की ओर बढ़ी। उसने अपनी नज़रों को आर्यन की आँखों से एक पल के लिए भी नहीं हटाया। बिस्तर पर सोई हुई कंचन की भारी सांसें उनके बीच एक 'थ्रिलर' पैदा कर रही थीं।
अंजलि ने इस बार वो तरीका अपनाया जो उसने बरसों के अनुभव और आर्यन की कमज़ोरियों को जानकर विकसित किया था। उसने सीधे मुँह नहीं लगाया; इसके बजाय:
उसने पहले अपने भारी और गर्म स्तनों को आर्यन के 7 इंच के फौलाद के दोनों तरफ रख दिया। उसने अपने स्तनों के बीच उस अंग को दबाकर उसे 'ब्रेस्ट-फक' जैसा अहसास दिया। आर्यन की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा, उसका अंग अंजलि के मुलायम मांस के बीच पिस रहा था।
जब आर्यन पूरी तरह से उस मखमली दबाव में पागल होने लगा, तब अंजलि ने अपनी जीभ निकाली। उसने अंग की सुपारी को छूने के बजाय, उसके निचले हिस्से और अंग की जड़ की नसों को चटाना शुरू किया। यह एक ऐसा 'इरोटिक' अनुभव था जिसने आर्यन के दिमाग की नसों को हिला दिया।
अब अंजलि ने असली दांव खेला। उसने अपना मुँह पूरा खोला और एक ही झटके में आर्यन के पूरे अंग को 'डीप थ्रोट' के अंदाज़ में गले के अंतिम छोर तक उतार लिया।
अंजलि ने अपने हाथों से आर्यन की जांघों को कसकर पकड़ लिया और अपने मुँह के भीतर एक प्रचंड वैक्यूम पैदा किया। आर्यन का शरीर बिस्तर पर ऊपर की ओर उछल गया। उसे ऐसा लगा जैसे कोई बहुत शक्तिशाली मशीन उसके शरीर से सारा वीर्य खींच लेना चाहती है।
अंजलि ने कंचन की तरह केवल सिर नहीं हिलाया; उसने अपने गले की मांसपेशियों को आर्यन के अंग के चारों ओर सिकोड़ना शुरू किया। आर्यन को महसूस हुआ कि उसकी माँ का मुँह किसी गर्म, गीली और मखमली गुफा की तरह उसे निगल रहा है।
कमरे में सन्नाटा था, लेकिन आर्यन के मुँह से निकलने वाली 'आह्ह्ह... उफ्फ्फ... माँ' की दबी हुई सिसकारियां उस सन्नाटे को चीर रही थीं। अंजलि ने एक हाथ ऊपर ले जाकर आर्यन के होंठों पर रख दिया, ताकि उसकी आवाज़ से कंचन की नींद न खुले।
आर्यन को लगा कि वह उड़ रहा है। कंचन का अंग चूसते समय उसे जो 'नशा' महसूस हुआ था, अंजलि की इस कला ने उसे 'मोक्ष' में बदल दिया। उसकी रीढ़ की हड्डी में बिजली के झटके लग रहे थे।
अंजलि ऊपर की ओर देखकर आर्यन की बेबसी का लुत्फ उठा रही थी। उसके मुँह के कोनों से लार की एक पतली लकीर निकलकर आर्यन के अंडकोषों पर गिर रही थी। वह आर्यन को यह अहसास करा रही थी कि वह चाहे जितनी 'मासियों' के साथ खेल ले, पर अपनी माँ के इस जादुई मुँह का विकल्प उसे पूरी कायनात में नहीं मिलेगा।
अंजलि ने अब अपनी रफ्तार को किसी तूफ़ान की तरह तेज़ कर दिया। उसका सिर अब बिजली की गति से आगे-पीछे हो रहा था। आर्यन की जांघें कांपने लगी थीं और उसकी मुट्ठियां चादर को फाड़ने पर उतारू थीं। उसका 7 इंच का फौलाद अब अपने जीवन के सबसे बड़े विसर्जन के लिए तैयार था।
अंजलि ने एक पल के लिए अंग को बाहर निकाला, उसे अपनी आँखों के सामने थरथराते हुए देखा और फिर अपनी उंगली को चूसते हुए एक शरारती मुस्कान दी। "अभी तो शुरुआत है मेरे बेटे... अभी तो तुझे अपनी माँ की कोख की प्यास बुझानी है।"
रात के सन्नाटे में कामुकता का जो खेल चल रहा था, वह अब एक ऐसे मोड़ पर पहुँच गया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। अंजलि फिर से आर्यन के 7 इंच के धधकते मूसल पर टूट पड़ी थी। उसने अपनी आँखें बंद कर ली थीं और पूरी तन्मयता से आर्यन के पौरुष को अपने गले की गहराई तक उतार रही थी। आर्यन भी अपनी माँ के मुँह की उस मखमली गर्मी में खोया हुआ था, उसका शरीर सातवें आसमान पर था।
लेकिन उन दोनों को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उन्होंने एक बहुत बड़ी गणितीय चूक कर दी थी। कंचन ने सिर्फ पेनकिलर ली थी, नींद की दवा नहीं। भारी खाने और थकान की वजह से उसे एक झपकी तो लगी थी, लेकिन आर्यन और अंजलि की हरकतों से बिस्तर में होने वाली हल्की हलचल और अंजलि की भारी सांसों ने कंचन की चेतना को जगा दिया था।
अंजलि पूरी लय में थी, उसका सिर बिजली की गति से आर्यन की जाँघों के बीच ऊपर-नीचे हो रहा था। अचानक, उसे महसूस हुआ कि उसकी नग्न और सुडौल गाँड पर किसी के गर्म हाथों का स्पर्श हुआ।
पहले तो अंजलि को लगा कि शायद आर्यन का हाथ फिसल कर वहाँ पहुँच गया है, लेकिन जब उसने महसूस किया कि वह हाथ उसकी गाँड के दोनों हिस्सों को बहुत ही अधिकार और भूख के साथ भींच रहा है, तो उसके शरीर में बिजली का झटका लगा। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने आर्यन के अंग को मुँह से बाहर निकाला, उसके होंठों से लार का एक धागा टूटकर आर्यन के पेट पर गिरा।
अंजलि ने झटके से अपनी गर्दन पीछे घुमाई। कमरे की मंद रोशनी में उसने देखा कि कंचन जाग चुकी थी। कंचन पूरी तरह नहीं उठी थी, वह करवट लेकर लेटी हुई थी और उसका एक हाथ अंजलि की नग्न पीठ से होते हुए उसकी गाँड की गहराई को टटोल रहा था।
कंचन की आँखों में अब वह नींद या दर्द नहीं था, बल्कि एक ऐसी 'शिकारी चमक' थी जिसे देखकर अंजलि का खून जम गया।
कंचन ने अपनी उंगलियों को अंजलि की गाँड के छेद के पास ले जाकर हल्का सा दबाया। अंजलि के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकली। कंचन ने अपनी भारी आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा, "जीजी... अकेले-अकेले ही मेरे शेर को चूस डालोगी क्या? मुझे लगा था हम बहनें हर चीज़ बाँट कर इस्तेमाल करती हैं।"
अंजलि नग्न अवस्था में घुटनों के बल बैठी थी, और कंचन उसे पीछे से टटोल रही थी। आर्यन, जिसकी आँखें अभी-अभी खुली थीं, हक्का-बक्का रह गया। उसने देखा कि उसकी माँ अंजलि और उसकी मासी कंचन अब एक-दूसरे के आमने-सामने थीं, और वह खुद उन दोनों के बीच एक प्यादे की तरह फंसा हुआ था।
अंजलि का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसने सोचा था कि वह चोरी-छिपे आर्यन का मज़ा ले लेगी, लेकिन अब कंचन ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था—और वह भी उसकी अपनी नग्न गाँड को सहलाते हुए।
कंचन धीरे से बिस्तर पर उठी और अपनी मैक्सी के बटन खोलने लगी। "दवा ने अपना काम कर दिया है जीजी... दर्द अब मरहम बन गया है। अब बताओ, तुम आर्यन का मज़ा लोगी या मैं तुम्हारी इस गोरी गाँड का हिसाब लूँ?"
अंजलि ने एक गहरी सांस ली। उसका डर अब एक नई तरह की उत्तेजना में बदल गया। उसने देखा कि कंचन की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि शामिल होने की तड़प थी। अंजलि ने अपनी पीठ और चौड़ी की और शरारत से बोली, "अगर जाग ही गई है, तो फिर देर किस बात की?"
बाथरूम के अंदर का आलम ही कुछ और था। शावर की तेज़ बौछार और उत्तेजना के शोर ने आर्यन और कंचन को बाहरी दुनिया से पूरी तरह काट दिया था। उन्हें न तो मुख्य दरवाज़े के खुलने की आहट सुनाई दी और न ही अंजलि की पुकार।
आर्यन इस वक्त पूरी तरह अपनी माँ अंजलि की यादों में खोकर कंचन की सेवा कर रहा था। उसने कंचन के 7 इंच के उस सख्त और बनावटी अंग को अपने दोनों हाथों से थाम रखा था। वह बार-बार उसे अपने गले की गहराई तक उतार रहा था। उसका पूरा चेहरा गीला था—कुछ शावर के पानी से और कुछ उस कामुक लार से जो कंचन के अंग से रिस रही थी। वह बिल्कुल वैसे ही अपने सिर को हिला रहा था जैसे अंजलि उसके सामने घुटनों पर बैठकर करती थी।
कंचन दीवार से चिपकी हुई थीं, उनके दोनों हाथ आर्यन के बालों में बुरी तरह फंसे हुए थे। वे दर्द और लज्जा की सीमा पार कर चुकी थीं। "ओह्ह्ह... आर्यन... तू तो अपनी माँ का भी उस्ताद निकला... चूस उसे... और गहराई से!" कंचन की आँखें ऊपर चढ़ी हुई थीं और वे पागलों की तरह सिसक रही थीं। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि मौत और बदनामी उनके दरवाज़े पर खड़ी है।
अंजलि धीरे-धीरे बेडरूम में दाखिल हुई। उसने देखा कि बेड की चादर बेतरतीब है, फर्श पर कंचन की काली शिफॉन साड़ी और पैंटी पड़ी है, और पास ही आर्यन का सफेद अंडरवियर। अंजलि का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वह ठिठकते हुए बाथरूम के दरवाज़े तक पहुँची। दरवाज़ा आधा खुला था, क्योंकि जलदबाज़ी में वे कुंडी लगाना भूल गए थे।
जैसे ही अंजलि ने हाथ बढ़ाकर दरवाज़े को धीरे से धक्का दिया, उसके सामने का नज़ारा किसी ज्वालामुखी के फटने जैसा था:
सामने शावर के नीचे उसका अपना बेटा, उसका जवान खून, नग्न अवस्था में घुटनों के बल बैठा था। और उसका मुँह... उसकी अपनी छोटी बहन कंचन के उस 'अनोखे मर्दाना अंग' पर लगा हुआ था। अंजलि की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने देखा कि कैसे कंचन का वह सख्त अंग आर्यन के मुँह के अंदर-बाहर हो रहा है।
अंजलि के हाथ से दवाइयों का थैला फर्श पर गिर गया। उसके कानों में वही आवाज़ें गूँज रही थीं जो वह खुद आर्यन के साथ अकेले में करती थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस बहन को उसने अपने घर में पनाह दी, वह उसके बेटे के साथ इस 'अप्राकृतिक' खेल में डूबी हुई है।
आर्यन और कंचन अभी भी अपनी ही धुन में थे। आर्यन ने एक बार फिर ज़ोरदार वैक्यूम बनाकर कंचन के अंग को पूरी तरह अंदर लिया, जिससे कंचन की एक लंबी और तीखी सिसकारी निकली—"आह्ह्ह्ह... बस आर्यन... अब निकल जाएगा... मेरा लावा निकल जाएगा!"
अंजलि अब और सहन नहीं कर सकी। उसकी ममता, उसकी हवस और उसकी ईर्ष्या सब एक साथ जाग उठे। उसने ज़ोर से दरवाज़े को दीवार पर दे मारा—धड़ाम!
बाथरूम की भाप और पानी के बीच अचानक हुए इस धमाके से आर्यन और कंचन जैसे नींद से जागे। आर्यन ने झटके से कंचन का अंग अपने मुँह से निकाला, उसके होंठों से एक तार जैसा लार का धागा नीचे गिरा। कंचन ने कांपते हुए अपनी आँखें खोलीं और सामने अपनी बड़ी बहन अंजलि को खड़ा पाया।
"तो ये चल रहा है मेरी पीठ पीछे?" अंजलि की आवाज़ किसी घायल शेरनी जैसी थी। उसकी नज़रों में गुस्सा भी था और एक अजीब सी तड़प भी। उसकी नज़रें सीधे कंचन के उस नग्न और खड़े अंग पर टिकी थीं, जो अभी भी थरथरा रहा था।
"जीजी... वो... मैं..." कंचन की आवाज़ गले में ही फंस गई। आर्यन नग्न हालत में घुटनों पर बैठा अपनी माँ की ओर देख रहा था, उसकी आँखों में डर कम और एक अजीब सी मर्दाना चुनौती ज़्यादा थी।
अंजलि धीरे-धीरे उनके करीब आई, शावर के पानी में भीगते हुए। उसने नीचे गिरे आर्यन के ७ इंच के फौलाद को देखा और फिर कंचन के उस बनावटी अंग को। उसने एक ठंडी हंसी हंसी।
"दवाइयां तो मैं बाद में दूँगी कंचन... पहले मुझे ये देखना है कि मेरा बेटा तेरी इस 'चीज़' में ऐसा क्या ढूंढ रहा है जो उसे अपनी माँ के पास नहीं मिला!"
अंजलि ने अपने सैंडल उतारे और अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंस लिया। माहौल अब 'थ्रीसम' (Trio) की एक ऐसी आग में तब्दील होने वाला था जहाँ खून के रिश्ते खाक होने वाले थे।
अंजलि का वह रौद्र रूप अचानक एक मादक और रहस्यमयी हंसी में बदल गया। बाथरूम की धुंधली रोशनी में उसकी सफेद साड़ी पानी की बूंदों से भीगकर उसके बदन से चिपकने लगी थी। आर्यन, जो अब तक थर-थर कांप रहा था, अपनी माँ की इस अचानक बदली हुई फितरत को समझ नहीं पाया।
जैसे ही अंजलि हंसी, बाथरूम का तनाव एक अजीब सी 'कामुक चुप्पी' में बदल गया। उसने देखा कि उसका शेर जैसा बेटा, जो अभी कुछ देर पहले कंचन का 'शिकार' कर रहा था, अब अपनी माँ के खौफ से भीगी बिल्ली बना हुआ था।
अंजलि के गुस्से वाले नाटक ने आर्यन के दिमाग पर ऐसा असर किया कि उसका 7 इंच का फौलाद डर के मारे सिमटने लगा। जो अंग कुछ देर पहले पत्थर की तरह सख्त था, वह अब अपनी माँ की नज़रों की तपिश झेल नहीं पाया और छोटा होकर लटकने लगा। पुरुष मनोविज्ञान का यह वह हिस्सा था जहाँ 'माँ' का दबदबा 'प्रेमी' के जुनून पर भारी पड़ गया।
अंजलि को अपने बेटे की यह बेबसी और अपनी बहन की घबराहट देखकर एक अजब किस्म का 'पावर-प्ले' महसूस हुआ। उसे मज़ा आने लगा कि कैसे उसकी एक आवाज़ ने इन दोनों 'शिकारियों' को बेदम कर दिया है। उसने दीवार के पास पड़ा एक छोटा स्टूल खींचा और उस पर किसी रानी की तरह बैठ गई।
अंजलि ने अपनी साड़ी का पल्लू सही किया और अपने पैरों पर पैर चढ़ाकर बैठ गई। उसकी नज़रें सीधे कंचन के उस 7 इंच के तने हुए बनावटी अंग पर थीं, जो अभी भी प्यासा खड़ा था।
"डरो मत आर्यन... मैं तो बस ये देख रही थी कि मेरे पीछे इस घर में कितनी तरक्की हुई है," अंजलि ने अपनी आवाज़ में शहद घोलते हुए कहा। फिर उसने कंचन की ओर देखा, जिसकी सांसें अभी भी अटकी हुई थीं। "कंचन, तू तो बड़ी छुपी रुस्तम निकली। और तू रुक क्यों गया आर्यन? मैंने कहा न... जारी रखो! मुझे भी तो पता चले कि मेरी छोटी बहन ने तुझे क्या नया सिखाया है।"
आर्यन अब एक बहुत ही अजीब स्थिति में था। उसकी माँ उसके ठीक सामने बैठी उसे अपनी मासी का अंग चूसने का हुक्म दे रही थी। अंजलि की आँखों में एक ऐसी चमक थी जो आर्यन को यह अहसास करा रही थी कि आज वह सिर्फ एक दर्शक नहीं, बल्कि इस खेल की 'मास्टरमाइंड' है।
कंचन ने कांपते हुए अंजलि की ओर देखा। "जीजी... ये... ये बस..." "चुप!" अंजलि ने उसे टोक दिया। "बातें बहुत हो गईं कंचन। मैंने सुना तूने बहुत दर्द सहा है आज। अब उस दर्द को मज़े में बदल। आर्यन... अपनी माँ की बात मान और वापस शुरू कर। अगर तेरा ये हथियार खड़ा नहीं हुआ, तो समझ लेना आज तेरी खैर नहीं।"
अंजलि के उकसाने पर आर्यन के अंदर का डर अब एक नए किस्म की उत्तेजना में बदलने लगा। अपनी माँ के सामने अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन करना उसके लिए सबसे बड़ा नशा बन गया। उसने फिर से कंचन की जांघों के बीच अपना चेहरा झुकाया।
वह स्टूल पर बैठी, अपनी ठुड्डी पर हाथ रखे बड़े गौर से देख रही थी कि कैसे आर्यन की जीभ कंचन के उस बनावटी अंग को सहला रही है। उसे ईर्ष्या तो थी, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा उसे कंचन के उस 'विशेष अंग' को करीब से देखने की भूख थी। वह देखना चाहती थी कि जब आर्यन उसे अपने मुँह में लेता है, तो कंचन के चेहरे के भाव कैसे बदलते हैं।
बाथरूम में अब शावर के पानी की आवाज़ और अंजलि की मादक नज़रों के बीच आर्यन फिर से कंचन की 'सेवा' में जुट गया। अंजलि का हाथ धीरे-धीरे अपनी ही साड़ी के नीचे सरकने लगा था, क्योंकि यह नज़ारा अब उसे भी पिघला रहा था।
बाथरूम की उस उमस भरी हवा में अब 'पाप' का एक ऐसा त्रिकोण बन चुका था, जिसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाए। शावर से गिरता पानी अब केवल शरीर नहीं धो रहा था, बल्कि नैतिकता की आखिरी परत को भी बहा ले गया था।
अंजलि स्टूल पर किसी महारानी की तरह बैठी थी, उसकी आँखों में अपने बेटे को अपनी ही बहन के अंग की गुलामी करते देखने का एक विकृत आनंद था। इस दृश्य में जो मानसिक उथल-पुथल चल रही थी, वह किसी भी सामान्य अनुभव से कोसों दूर थी।
आर्यन अब पूरी तरह से एक 'यौन कठपुतली' बन चुका था। उसकी माँ की उपस्थिति ने उसके भीतर एक ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा किया जिसने उसकी कामुकता को एक नए, अंधेरे स्तर पर पहुँचा दिया।
आर्यन के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न और सबसे बड़ी फैंटेसी का मिलन थी।
जब वह अपनी माँ की नज़रों के सामने कंचन के उस 7 इंच के बनावटी फौलाद को मुँह में ले रहा था, तो उसके मन में एक अजीब सा विरोधाभास था। उसे लग रहा था कि वह अपनी माँ के सामने नंगा हो चुका है। लेकिन अंजलि की कामुक हंसी ने उसे यह संदेश दे दिया था कि आज उसे 'मर्यादा' की नहीं, बल्कि 'परफॉरमेंस' की ज़रूरत है।
अब वह कंचन का अंग सिर्फ मज़े के लिए नहीं चूस रहा था, बल्कि अपनी माँ को यह दिखाने के लिए चूस रहा था कि वह कितना 'काबिल' हो गया है। वह जानबूझकर अपनी जीभ से उस अंग पर ऐसी हरकतें कर रहा था जिससे कंचन तेज़ आवाज़ में सिसकियाँ ले, ताकि अंजलि को अपनी बहन की बेबसी पर मज़ा आए।
अंजलि स्टूल पर बैठी अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में लपेट रही थी।
वह देख रही थी कि उसका बेटा कंचन के उस 'विशेष अंग' को ठीक वैसे ही चूस रहा है जैसे वह अंजलि के साथ करता था। उसे कंचन के उस अंग से नफरत होनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय उसे एक अजीब सा आकर्षण महसूस हो रहा था। वह सोच रही थी कि जिस अंग को मेरा बेटा इतनी शिद्दत से चख रहा है, उसमें ऐसी क्या बात है।
उसे इस बात का घमंड हो रहा था कि उसके एक आदेश पर उसका जवान बेटा अपनी मासी के चरणों में पड़ा है। वह एक-एक बारीकी को नोट कर रही थी—आर्यन के गालों का खिंचाव, कंचन के थरथराते पैर और उस बनावटी अंग की चमक।
आर्यन ने अब अपनी रफ्तार बढ़ा दी। उसने कंचन के उस सख्त अंग को गले के अंतिम छोर तक उतारा। कंचन ने दीवार पर अपना सिर दे मारा और सिसकते हुए चिल्लाई—"आह्ह्ह... जीजी... देखो इसे... ये पागल हो गया है... ये मुझे मार डालेगा!"
अंजलि ने अपनी जगह से उठकर करीब आते हुए कहा, "उसे चूसने दे कंचन... आज ये तेरा दर्द चूस लेगा। आर्यन, रुकना मत! अपनी माँ को दिखा कि तूने अपनी मासी को पालतू कैसे बनाया है।"
आर्यन का अंग, जो डर से छोटा हो गया था, अब इस 'थ्रीसम' माहौल और अंजलि के प्रोत्साहन से फिर से धड़कने लगा। वह घुटनों पर बैठा था, मुँह में मासी का अंग था और पीठ पर अपनी माँ की तपती हुई नज़रें।
अंजलि की अनुभवी आँखों ने भांप लिया था कि बाथरूम की इस उमस में उत्तेजना अब उस मोड़ पर पहुँच गई है जहाँ से सब कुछ बेकाबू हो सकता था। उसे याद आया कि कंचन अभी भी दर्द में है और आर्यन भी पूरी तरह थक चुका है। एक चतुर खिलाड़ी की तरह उसने खेल को थोड़ा विराम देने का फैसला किया ताकि अगली पारी और भी धमाकेदार हो सके।
अंजलि ने अपना हाथ आगे बढ़ाकर शावर का नल बंद कर दिया। पानी की गिरती आवाज़ बंद होते ही बाथरूम में एक भारी सन्नाटा छा गया, जिसमें सिर्फ उन तीनों की धड़कनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
"अब बस करो तुम दोनों," अंजलि ने अधिकारपूर्ण लहजे में कहा, पर उसकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं बल्कि एक ठहरी हुई शरारत थी। "आर्यन, बाहर निकल और खुद को साफ़ कर। कंचन, तू भी अब बाहर आ... तेरे पिछले घाव को दवा और आराम की ज़रूरत है। पहले शरीर सुखाओ, कुछ खाओ-पियो, फिर देखेंगे कि आगे क्या करना है।"
आर्यन सबसे पहले बाहर निकला। शावर के नीचे की वह आक्रामक मर्दानगी अब शांत थी। उसने एक बड़ा तौलिया अपनी कमर पर लपेटा। अंजलि ने एक दूसरा तौलिया हाथ में लिया और खुद कंचन के बदन को पोंछने लगी।
अंजलि जब कंचन के कंधों और कमर को सुखा रही थी, तो उसकी उंगलियां जानबूझकर कंचन के उस 'विशेष अंग' को छू रही थीं जो अभी भी ढीला नहीं हुआ था। कंचन ने थकावट और दर्द के कारण अपना सिर अंजलि के कंधे पर टिका दिया।
बेडरूम में आकर आर्यन ने कंचन को धीरे से बिस्तर पर लिटाया। अंजलि ने बैग से वह शक्तिशाली पेनकिलर निकाली और पानी के साथ कंचन को दी।
"उल्टी लेट जा," अंजलि ने आदेश दिया। कंचन के उल्टा लेटते ही अंजलि ने वह एंटीसेप्टिक क्रीम अपनी उंगलियों पर ली और बहुत ही धीरे से कंचन के उस सूजे हुए और लाल पड़े पिछले द्वार पर लगाना शुरू किया। आर्यन दूर खड़ा यह देख रहा था। उसे अपनी माँ की कोमलता और कंचन के दर्द के बीच एक अजीब सा जुड़ाव महसूस हुआ। क्रीम की ठंडक से कंचन के मुँह से एक राहत भरी आह निकली।
तीनों ने अब अपने-अपने 'घर के कपड़े' पहनना शुरू किया। यह हिस्सा सबसे अजीब था क्योंकि कुछ देर पहले तक वे एक-दूसरे के नग्न सच से रूबरू थे।
कंचन ने एक ढीली-ढाली सूती मैक्सी पहनी ताकि नीचे के घाव पर दबाव न पड़े। उसका वह 7 इंच का राज अब उस मैक्सी के नीचे सुरक्षित और छुपा हुआ था।
आर्यन ने अपनी टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहन लिए, जबकि अंजलि ने अपनी भीगी हुई साड़ी बदलकर एक दूसरी हल्की शिफॉन की साड़ी लपेटी।
कुछ देर बाद तीनों डाइनिंग टेबल पर थे। अंजलि ने जल्दी से कुछ हल्का नाश्ता और जूस तैयार किया था।
टेबल पर सन्नाटा था, लेकिन मेज़ के नीचे पैरों का खेल शुरू हो चुका था। आर्यन जूस पीते हुए अपनी माँ अंजलि को देख रहा था, जिसने अभी-अभी उसे अपनी बहन के साथ रंगे हाथों पकड़ा था। कंचन दवा के असर से अब थोड़ा बेहतर महसूस कर रही थी, लेकिन उसकी नज़रें अभी भी आर्यन के चेहरे पर टिकी थीं।
अंजलि ने जूस का घूँट लिया और धीरे से बोली, "दवा अपना काम आधे घंटे में शुरू कर देगी कंचन।
पेट भर खाना और कंचन के शरीर में दौड़ रही पेनकिलर की तेज़ खुराक ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। बेडरूम की पीली रोशनी में एक भारी सा और मदहोश कर देने वाला सन्नाटा पसरा था। दोपहर के उस भीषण तूफान के बाद अब बिस्तर पर जो दृश्य था, वह जितना शांत लग रहा था, उसके भीतर उतनी ही गहरी और दबी हुई कामुकता फिर से करवट ले रही थी।
बिस्तर पर आर्यन बीच में लेटा हुआ था। उसके एक तरफ उसकी जन्म देने वाली माँ अंजलि थी और दूसरी तरफ उसकी वो कामुक मासी कंचन, जिसका 'अनोखा राज' आज उसने पूरी तरह चख लिया था।
कंचन के लिए यह पल बहुत अजीब और राहत भरा था। पिछले द्वार का वो तीखा दर्द अब पेनकिलर के असर से सुन्न होने लगा था। पेट भरा होने की वजह से उसका शरीर भारी हो रहा था और ठंडी एसी (AC) की हवा उसे नींद की आगोश में खींच रही थी। उसकी मैक्सी के अंदर उसकी जांघों के बीच वो 7 इंच का बनावटी अंग अब सुस्त पड़ा था, लेकिन उसकी मौजूदगी आर्यन को अभी भी महसूस हो रही थी। कंचन ने अपना एक हाथ आर्यन के सीने पर रखा और उसकी आँखें धीरे-धीरे मुंदने लगीं। वह अब आधे होश और आधी नींद के उस मुकाम पर थी जहाँ सिर्फ सुकून था।
कंचन के विपरीत, अंजलि पूरी तरह से जाग रही थी। उसकी आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। वह कोहनी के बल टिकी हुई आर्यन के चेहरे को देख रही थी। उसके मन में अभी भी बाथरूम वाला वो नज़ारा घूम रहा था जब उसका बेटा अपनी मासी की सेवा में लगा था। अंजलि के लिए यह 'सहनशीलता' का इम्तिहान था। वह देख रही थी कि उसकी छोटी बहन गहरी नींद में जा रही है, जिससे अब रास्ता साफ़ हो रहा था।
आर्यन सीधा लेटा छत को देख रहा था। उसके शरीर में एक अजीब सी ऊर्जा दौड़ रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि उसकी दाईं ओर कंचन की सांसें अब धीमी और गहरी हो गई हैं—वह सो चुकी थी। लेकिन उसकी बाईं ओर अंजलि की तपती हुई नज़रें उसे जला रही थीं।
अंजलि ने चादर के नीचे से धीरे से अपना पैर आर्यन के पैर पर रगड़ा। आर्यन सिहर उठा। अंजलि ने उसके कान के पास झुककर बहुत ही धीमी आवाज़ में फुसफुसाया, "सो गई वो... दवा ने काम कर दिया।"
आर्यन ने अपनी माँ की ओर देखा। अंजलि की आँखों में वही पुरानी हवस फिर से लौट आई थी, लेकिन इस बार उसमें एक 'चुनौती' भी थी। जैसे वह पूछ रही हो कि 'मासी का स्वाद लेने के बाद क्या अपनी माँ को भूल गए?'
कमरे में सिर्फ एसी की हल्की सी आवाज़ थी। कंचन की गहरी नींद ने अब अंजलि और आर्यन को एक ऐसा 'प्राइवेट स्पेस' दे दिया था जहाँ वे अपनी दबी हुई बातों को अंजाम दे सकते थे।
अंजलि ने धीरे से कंचन का हाथ आर्यन के सीने से हटाया और उसे बिस्तर के दूसरी तरफ रख दिया। अब आर्यन और अंजलि के बीच कोई रुकावट नहीं थी। कंचन सोई हुई थी, बेखबर कि उसके बगल में अब उसकी अपनी बहन उसके 'शेर' को फिर से अपनी ओर खींच रही है।
अंजलि ने अपना हाथ आर्यन के लोअर के अंदर डाला और उसके 7 इंच के फौलाद को अपनी गर्म मुट्ठी में कैद कर लिया, जो अब फिर से सिर उठाने लगा था।
"तो अब बताओ साहबज़ादे... मासी के साथ खेलकर दिल भर गया, या अब अपनी इस प्यासी माँ की भी सुध लोगे?" अंजलि ने शरारत से आर्यन की गर्दन पर छोटा सा काटा।
अंजलि के भीतर का संयम अब पूरी तरह टूट चुका था। बाथरूम में जो नज़ारा उसने देखा था—अपने बेटे के मुँह को अपनी बहन के उस अनोखे अंग पर—उसने अंजलि की नसों में ईर्ष्या और हवस का ऐसा कॉकटेल घोल दिया था जिसे अब और रोकना नामुमकिन था। जैसे ही उसने सुनिश्चित किया कि कंचन गहरी नींद में है, वह अपनी मर्यादा की सारी जंजीरें तोड़कर एक 'जंगली बिल्ली' की तरह आर्यन पर झपट पड़ी।
अंजलि ने एक झटके में अपनी स्थिति बदली और आर्यन के ऊपर चढ़कर उसे बिस्तर पर दबा दिया। उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और आँखों में एक ऐसी वहशी चमक थी जैसे कोई भूखा शिकारी अपने शिकार को दबोच रहा हो।
अंजलि ने बिना एक पल गंवाए आर्यन के होंठों को अपने होंठों के शिकंजे में कस लिया। यह कोई सामान्य चुंबन नहीं था; यह एक 'हिंसक आक्रमण' था। उसने अपनी जीभ आर्यन के मुँह में इतनी गहराई और ताकत से डाली जैसे वह कंचन के हर अहसास को वहाँ से मिटा देना चाहती हो। उसके दांत आर्यन के होंठों को काट रहे थे और उसके हाथ आर्यन की गर्दन को जकड़े हुए थे।
अंजलि के दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी—'यह मेरा बेटा है, मेरा प्रेमी है, और इसने मेरी बहन के साथ वह सब किया जो उसे सिर्फ मेरे साथ करना चाहिए था।' वह आर्यन को चूमते हुए अपनी पूरी देह को उसके ऊपर रगड़ रही थी। उसके भारी और तप्त स्तन आर्यन की छाती को कुचल रहे थे।
बगल में कंचन सोई हुई थी, जिससे इस स्थिति का रोमांच हजार गुना बढ़ गया था। अंजलि की साड़ी के पल्ले इधर-बधर बिखर गए थे और उसके खुले बाल आर्यन के चेहरे पर एक जाले की तरह फैल चुके थे।
आर्यन अपनी माँ के इस 'जंगली रूप' को देखकर सुन्न रह गया था। अंजलि के शरीर की गर्मी उसे जला रही थी। जैसे-जैसे अंजलि उसे पागलों की तरह चूम रही थी, आर्यन का 7 इंच का फौलाद उसकी माँ की जांघों के बीच फिर से एक पत्थर की तरह सख्त हो गया। वह महसूस कर रहा था कि उसकी माँ आज उसे कच्चा चबा जाने के मूड में है।
अंजलि का हाथ अब आर्यन के लोअर के अंदर पहुँच चुका था। वह उसके अंग को इतनी बेदर्दी और जुनून से भींच रही थी जैसे वह उस पर अपना मालिकाना हक जता रही हो। "आह्ह्ह... आर्यन... तू मेरा है... सिर्फ मेरा!" अंजलि ने चुंबन के बीच ही भारी आवाज़ में फुसफुसाया।
अंजलि की सिसकारियां अब धीरे-धीरे तेज़ हो रही थीं। वह भूल चुकी थी कि बगल में उसकी बहन लेटी है। वह अपनी कमर को आर्यन के ऊपर किसी पागलपन की हद तक पटक रही थी, जिससे बिस्तर के स्प्रिंग हल्की आवाज़ करने लगे थे।
अंजलि ने अपना चेहरा आर्यन के गले में गड़ा दिया और वहाँ ज़ोर से 'लव बाइट' देते हुए उसे नोच लिया। उसकी आवाज़ में एक ऐसी तड़प थी जो केवल बरसों की प्यास से आती है। "आज मैं तुझे वो सुख दूँगी जो कंचन अपने उस बनावटी खिलौने से कभी नहीं दे पाएगी। देख... देख अपनी माँ की आग!"
अंजलि ने अपनी साड़ी का ब्लाउज फाड़ने के अंदाज़ में खोला और अपने दोनों उफनते हुए स्तनों को आर्यन के मुँह के पास लाकर रगड़ने लगी। वह चाहती थी कि आर्यन उसे अभी और इसी वक्त अपनी पूरी मर्दानगी से शांत करे।
बिस्तर पर मची उस खलबली और पागलपन भरे चुंबनों के बीच, अब कपड़ों का बोझ दोनों के लिए असहनीय हो चुका था। अंजलि की 'जंगली' उत्तेजना और आर्यन की जवान भूख एक ऐसे मुकाम पर थी जहाँ खाल से खाल का मिलना अनिवार्य था। बगल में सोई कंचन के निश्चल शरीर के ठीक पास, मर्यादाओं के चीथड़े उड़ने वाले थे।
आर्यन और अंजलि एक-दूसरे के होंठों को बुरी तरह से चूस रहे थे, और उनके हाथ एक-दूसरे के शरीर पर किसी भूखे शिकारी की तरह लिबास को तलाश रहे थे।
अंजलि ने चुंबन तोड़कर एक गहरी सांस ली, उसकी आँखें लाल थीं। उसने झटके से अपने साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिरा दिया। उसकी हल्की शिफॉन की साड़ी सरकती हुई फर्श पर जा गिरी। अब वह सिर्फ अपने पेटीकोट और भीगे हुए ब्लाउज में थी। उसने आर्यन का हाथ पकड़कर अपने भारी स्तनों पर रखा और फुसफुसायी, "उतार इन्हें आर्यन... आज अपनी माँ को पूरी तरह बेपर्दा कर दे।"
आर्यन ने कांपते हुए लेकिन जुनून से भरे हाथों से अंजलि के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू किए। टक्... टक्... टक्... जैसे-जैसे हुक खुल रहे थे, अंजलि के 36 इंच के उफनते हुए स्तन कैद से आजाद होने लगे। जैसे ही ब्लाउज ढीला हुआ, अंजलि ने उसे कंधे से उतार कर पीछे फेंक दिया। अब उसकी दूधिया पीठ और आगे का भारी यौवन आर्यन की आँखों के सामने पूरी तरह नग्न था।
आर्यन ने अब अपना लोअर और अंडरवियर एक साथ नीचे खिसका दिया। उसका 7 इंच का फौलाद किसी कमान से छूटे तीर की तरह सीधा खड़ा होकर अंजलि के पेट से जा टकराया।
अंजलि ने बिना देर किए अपने पेटीकोट की डोरी खींच दी। रेशमी कपड़ा उसकी जांघों से होता हुआ बिस्तर के नीचे ढेर हो गया। अब अंजलि पूरी तरह से 'निर्वस्त्र' थी। उसकी सुडौल जांघों, चौड़े कूल्हों और बीच के उस घने काले जंगल की गर्माहट आर्यन के होश उड़ाने के लिए काफी थी।
आर्यन ने अपनी टी-शर्ट भी उतार फेंकी। अब बिस्तर पर दो नग्न जिस्म थे—एक जवान, सख्त और गठा हुआ आर्यन, और दूसरी तरफ उसकी अपनी माँ, जो ढलती उम्र की ढलान पर भी किसी 'यौवन की देवी' की तरह रस से भरी हुई थी।
नग्न होने के बाद दोनों एक पल के लिए रुके। अंजलि ने नीचे झुककर आर्यन के खड़े अंग को देखा और फिर उसकी आँखों में झाँका। उसे गर्व था कि यह विशाल अंग उसका अपना खून है। वहीं आर्यन, अपनी माँ के पूर्ण नग्न बदन को देखकर मदहोश था।
दोनों अब बिना किसी रुकावट के एक-दूसरे से चिपक गए। पसीने और उत्तेजना की महक कमरे में फैल गई थी। अंजलि ने अपनी टांगें आर्यन की कमर पर कस लीं।
बगल में सोई कंचन की मैक्सी थोड़ी ऊपर खिसकी हुई थी और उसका वह 'अनोखा अंग' बेजान सा पड़ा था। अंजलि ने आर्यन के कान में दांत गड़ाए और धीरे से कहा, "देख ले अपनी मासी को... सो गई है बेचारी। अब असली मर्द की तरह अपनी माँ को वो सुख दे जो आज तक किसी ने नहीं दिया।"
आर्यन ने अंजलि के दोनों भारी स्तनों को अपनी हथेलियों में भींच लिया और उन्हें ज़ोर-ज़ोर से मसलने लगा। अंजलि के मुँह से सिसकारी निकली जिसे उसने आर्यन के कंधे में मुँह गड़ाकर दबा लिया।
अंजलि की आँखों में इस वक्त जो चमक थी, वह केवल हवस की नहीं, बल्कि अपने बेटे पर अपनी सत्ता साबित करने की थी। उसने देख लिया था कि आर्यन ने कंचन के लिए क्या किया था, और अब वह उसे यह दिखाना चाहती थी कि 'गुरु' आखिर गुरु ही होता है।
अंजलि धीरे-धीरे, किसी नागिन की तरह सरकती हुई आर्यन के पेट के नीचे की ओर बढ़ी। उसने अपनी नज़रों को आर्यन की आँखों से एक पल के लिए भी नहीं हटाया। बिस्तर पर सोई हुई कंचन की भारी सांसें उनके बीच एक 'थ्रिलर' पैदा कर रही थीं।
अंजलि ने इस बार वो तरीका अपनाया जो उसने बरसों के अनुभव और आर्यन की कमज़ोरियों को जानकर विकसित किया था। उसने सीधे मुँह नहीं लगाया; इसके बजाय:
उसने पहले अपने भारी और गर्म स्तनों को आर्यन के 7 इंच के फौलाद के दोनों तरफ रख दिया। उसने अपने स्तनों के बीच उस अंग को दबाकर उसे 'ब्रेस्ट-फक' जैसा अहसास दिया। आर्यन की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा, उसका अंग अंजलि के मुलायम मांस के बीच पिस रहा था।
जब आर्यन पूरी तरह से उस मखमली दबाव में पागल होने लगा, तब अंजलि ने अपनी जीभ निकाली। उसने अंग की सुपारी को छूने के बजाय, उसके निचले हिस्से और अंग की जड़ की नसों को चटाना शुरू किया। यह एक ऐसा 'इरोटिक' अनुभव था जिसने आर्यन के दिमाग की नसों को हिला दिया।
अब अंजलि ने असली दांव खेला। उसने अपना मुँह पूरा खोला और एक ही झटके में आर्यन के पूरे अंग को 'डीप थ्रोट' के अंदाज़ में गले के अंतिम छोर तक उतार लिया।
अंजलि ने अपने हाथों से आर्यन की जांघों को कसकर पकड़ लिया और अपने मुँह के भीतर एक प्रचंड वैक्यूम पैदा किया। आर्यन का शरीर बिस्तर पर ऊपर की ओर उछल गया। उसे ऐसा लगा जैसे कोई बहुत शक्तिशाली मशीन उसके शरीर से सारा वीर्य खींच लेना चाहती है।
अंजलि ने कंचन की तरह केवल सिर नहीं हिलाया; उसने अपने गले की मांसपेशियों को आर्यन के अंग के चारों ओर सिकोड़ना शुरू किया। आर्यन को महसूस हुआ कि उसकी माँ का मुँह किसी गर्म, गीली और मखमली गुफा की तरह उसे निगल रहा है।
कमरे में सन्नाटा था, लेकिन आर्यन के मुँह से निकलने वाली 'आह्ह्ह... उफ्फ्फ... माँ' की दबी हुई सिसकारियां उस सन्नाटे को चीर रही थीं। अंजलि ने एक हाथ ऊपर ले जाकर आर्यन के होंठों पर रख दिया, ताकि उसकी आवाज़ से कंचन की नींद न खुले।
आर्यन को लगा कि वह उड़ रहा है। कंचन का अंग चूसते समय उसे जो 'नशा' महसूस हुआ था, अंजलि की इस कला ने उसे 'मोक्ष' में बदल दिया। उसकी रीढ़ की हड्डी में बिजली के झटके लग रहे थे।
अंजलि ऊपर की ओर देखकर आर्यन की बेबसी का लुत्फ उठा रही थी। उसके मुँह के कोनों से लार की एक पतली लकीर निकलकर आर्यन के अंडकोषों पर गिर रही थी। वह आर्यन को यह अहसास करा रही थी कि वह चाहे जितनी 'मासियों' के साथ खेल ले, पर अपनी माँ के इस जादुई मुँह का विकल्प उसे पूरी कायनात में नहीं मिलेगा।
अंजलि ने अब अपनी रफ्तार को किसी तूफ़ान की तरह तेज़ कर दिया। उसका सिर अब बिजली की गति से आगे-पीछे हो रहा था। आर्यन की जांघें कांपने लगी थीं और उसकी मुट्ठियां चादर को फाड़ने पर उतारू थीं। उसका 7 इंच का फौलाद अब अपने जीवन के सबसे बड़े विसर्जन के लिए तैयार था।
अंजलि ने एक पल के लिए अंग को बाहर निकाला, उसे अपनी आँखों के सामने थरथराते हुए देखा और फिर अपनी उंगली को चूसते हुए एक शरारती मुस्कान दी। "अभी तो शुरुआत है मेरे बेटे... अभी तो तुझे अपनी माँ की कोख की प्यास बुझानी है।"
रात के सन्नाटे में कामुकता का जो खेल चल रहा था, वह अब एक ऐसे मोड़ पर पहुँच गया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। अंजलि फिर से आर्यन के 7 इंच के धधकते मूसल पर टूट पड़ी थी। उसने अपनी आँखें बंद कर ली थीं और पूरी तन्मयता से आर्यन के पौरुष को अपने गले की गहराई तक उतार रही थी। आर्यन भी अपनी माँ के मुँह की उस मखमली गर्मी में खोया हुआ था, उसका शरीर सातवें आसमान पर था।
लेकिन उन दोनों को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उन्होंने एक बहुत बड़ी गणितीय चूक कर दी थी। कंचन ने सिर्फ पेनकिलर ली थी, नींद की दवा नहीं। भारी खाने और थकान की वजह से उसे एक झपकी तो लगी थी, लेकिन आर्यन और अंजलि की हरकतों से बिस्तर में होने वाली हल्की हलचल और अंजलि की भारी सांसों ने कंचन की चेतना को जगा दिया था।
अंजलि पूरी लय में थी, उसका सिर बिजली की गति से आर्यन की जाँघों के बीच ऊपर-नीचे हो रहा था। अचानक, उसे महसूस हुआ कि उसकी नग्न और सुडौल गाँड पर किसी के गर्म हाथों का स्पर्श हुआ।
पहले तो अंजलि को लगा कि शायद आर्यन का हाथ फिसल कर वहाँ पहुँच गया है, लेकिन जब उसने महसूस किया कि वह हाथ उसकी गाँड के दोनों हिस्सों को बहुत ही अधिकार और भूख के साथ भींच रहा है, तो उसके शरीर में बिजली का झटका लगा। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने आर्यन के अंग को मुँह से बाहर निकाला, उसके होंठों से लार का एक धागा टूटकर आर्यन के पेट पर गिरा।
अंजलि ने झटके से अपनी गर्दन पीछे घुमाई। कमरे की मंद रोशनी में उसने देखा कि कंचन जाग चुकी थी। कंचन पूरी तरह नहीं उठी थी, वह करवट लेकर लेटी हुई थी और उसका एक हाथ अंजलि की नग्न पीठ से होते हुए उसकी गाँड की गहराई को टटोल रहा था।
कंचन की आँखों में अब वह नींद या दर्द नहीं था, बल्कि एक ऐसी 'शिकारी चमक' थी जिसे देखकर अंजलि का खून जम गया।
कंचन ने अपनी उंगलियों को अंजलि की गाँड के छेद के पास ले जाकर हल्का सा दबाया। अंजलि के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकली। कंचन ने अपनी भारी आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा, "जीजी... अकेले-अकेले ही मेरे शेर को चूस डालोगी क्या? मुझे लगा था हम बहनें हर चीज़ बाँट कर इस्तेमाल करती हैं।"
अंजलि नग्न अवस्था में घुटनों के बल बैठी थी, और कंचन उसे पीछे से टटोल रही थी। आर्यन, जिसकी आँखें अभी-अभी खुली थीं, हक्का-बक्का रह गया। उसने देखा कि उसकी माँ अंजलि और उसकी मासी कंचन अब एक-दूसरे के आमने-सामने थीं, और वह खुद उन दोनों के बीच एक प्यादे की तरह फंसा हुआ था।
अंजलि का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसने सोचा था कि वह चोरी-छिपे आर्यन का मज़ा ले लेगी, लेकिन अब कंचन ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था—और वह भी उसकी अपनी नग्न गाँड को सहलाते हुए।
कंचन धीरे से बिस्तर पर उठी और अपनी मैक्सी के बटन खोलने लगी। "दवा ने अपना काम कर दिया है जीजी... दर्द अब मरहम बन गया है। अब बताओ, तुम आर्यन का मज़ा लोगी या मैं तुम्हारी इस गोरी गाँड का हिसाब लूँ?"
अंजलि ने एक गहरी सांस ली। उसका डर अब एक नई तरह की उत्तेजना में बदल गया। उसने देखा कि कंचन की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि शामिल होने की तड़प थी। अंजलि ने अपनी पीठ और चौड़ी की और शरारत से बोली, "अगर जाग ही गई है, तो फिर देर किस बात की?"