Antarvasna kahani ड्रेगन हार्ट (लव, सेक्स एण्ड क्राईम) - Page 5 - SexBaba
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Antarvasna kahani ड्रेगन हार्ट (लव, सेक्स एण्ड क्राईम)

Update 032 -

इससे पहले गगन कुछ कहता या समझ पाता, मैंने श्रेया को अपनी तरफ खींचा और उसके गाल पर एक किस कर दिया। जिसे देखकर सभी लोग हैरान रह गए, लेकिन तभी रश्मि मुझे डांटते हुए बोली

रश्मि- ये लड़की क्या बदतमीजी है यह। अभी तुम मेरे बॉयफ्रेंड के साथ छेडछाड कर रही थी और अब मेरी फ्रेंड के साथ

निशा- तुम्हारे साथ तो नहीं की ना। बैसे नाम क्या है इसका। हाय कितनी खूबसूरत है। मेरा तो दिल ही आ गया है इसपर

मेरी बात सुनकर श्रेया थोडा शर्माने की एक्टिंग करते हुए बोली

श्रेया- वो वो श्रेया नाम है

ऱश्मि- अरे अब अपना मोबाईल नम्बर भी बता दे इसे

रश्मि की बात सुनकर श्रेया लापरवाही से अपना मोबाईल नम्बर बोलने लगी

श्रेया- ओह हाँ 8891.....

लेकिन श्रेया की बात पूरी होने से पहले ही रश्मि उसे रोकते हुए बोली

रश्मि- अरे डफर यह क्या कर रही है। मुझे तो पहले ही ये लड़की आधी पागल लग रही थी और अब तुम भी पागलों बाली हरकत करने लगी। किसी अंजान को अपना नाम और नम्बर क्यों बता रही हो।

श्रेया- अरे यार सच में यह कितनी खूबसूरत है ना।

तभी पूजा भी हमारे बीच में अपनी टांग अडाते हुए बोली

पूजा- गाईज आखिर यह सब हो क्या रहा है। तुम लोग क्या लेस्बीयन टाईप हो

निशा- नहीं पर इसके लिए तो मैं लेस्बीयन भी बन जाऊंगी

मेरी बात सुनकर श्रेया भी शर्माते हुए बोली

श्रेया- मैं भी... बैसे तुम्हारा नाम क्या है

निशा- सपना

इतना बोलकर मैंने उसे जोर से हग कर लिया और उसके कान में धीरे से फुसफुसाकर बोली

निशा- पागल…. तू यहाँ क्या कर रही है

श्रेया- जो तू कर रही है। क्यों क्या तूने ही सबकी मदद करने का ठेका ले रखा है।

निशा- अच्छा छोड यह सब, ये सब कुछ ज्यादा ही हो रहा है और यहाँ काफी भीड भी है। इसलिए गगन को यहाँ दूर ले जाना पडेगा।

इतना बोलकर मैं श्रेया से अलग हो गई और बोली

निशा- थैंक्स अपना नम्बर देने के लिए मैं रात में तुम्हें कॉल करूँगी। ओके बॉय गाईज

इतना बोलकर मैं वहाँ से जाने लगी तो गगन ने मेरा हाथ पकड लिया। मुझे इसका अंदाजा पहले से ही था। इसलिए मैं उसे गुस्से में घूरने लगी। इससे पहले कोई कुछ समझ पात मैंने एक जोरदार थप्पड उसके गाल पर जड दिया और बोली

निशा- मुझे झूने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी

मेरी बात सुनकर गगन भी गुस्से से भडकते हुए बोला

गगन- और तुमने जो मेरे साथ किया…. वो क्या था

निशा- ये क्या बकवास कर रहे हो तुम। मैं तुम्हें जानती भी नहीं हूँ। इनफेक्ट में तुम लोगो में से किसी को भी नहीं जानती हूँ।

गगन- तुम झूठ बोल रही हो। उस दिन तुम खुद मेरे साथ मेरे घर गई थी।

निशा- लगता है कि तुम्हारा दिमाग पूरी तरह से खराब हो गया है। अभी कुछ देर पहले तुम इस लड़की को अपनी गर्लफ्रेड बता रहे थे। अब मुझसे कह रह हो कि मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे घर गई थी। तुम किसी अच्छे डॉक्टर से अपना इलाज करवाओ पहले।

इतना बोलकर मैंने झटके से अपना हाथ उससे छुडाया और वहाँ से निकल गई। जैसा कि मुझे उम्मीद थी गगन भी मेरे पीछ पीछे आ रहा था और गगन के पीछे पीछे बाकी लोग भी आ रहे थे। तभी मेरे पास हरीश अंकल का कॉल आया, तो मैंने उन्हें सारी सिचुऐशन बता दी। उन्हें भी मेरा प्लान ठीक लगा। बैसे तो पुलिस वहाँ पहले ही आ चुकी थी और वो हमें देख भी चुके थे। पर ज्यादा भीड होने के कारण वो कोई रिश्क नहीं लेना चाहते थे। इसलिए मैं वहाँ से पैदल पैदल सुनसान जगह की तरफ जाने लगी।

जैसे ही मैं सुनसान जगह पर पहूँची तो मैं एक जगह जाकर रुक गई। गगन भी मेरे पीछे पीछे लगंडाता हुआ आ रहा था। इससे पहले पहले वो मुझ तक पहूँच पाता मुझे उसके पीछे तेजी से आता एक पुलिस ऑफिसर नजर आया, जो मुझे नीचे झुकने का इशारा कर रहा था। इसलिए मैं तुरंत नीचे बैठ गई। जैसे ही मैं नीचे बैठी, ठीक तभी एक गोली सीधी गगने के सर के पार निकल गई और फिर एक के बाद एक 4-5 गोलियाँ उसको जा लगीं। जिसके बाद वो किसी कटे पेड की तरह मेरे एकदम पास नीचे जमीन पर जा गिरा।

ये सब देखकर डर के कारण मेरी हालत खराब हो गई थी। मैंने पहली बाल कोई पुलिस इन्काऊंटर देखा था। अगर थोडी सी भी चूक होती तो वो गोली जो गगन के सर के आर पार निकली है। वो मुझे भी लग सकती थी। मैं गगन को सबक सिखाना तो चाहती थी। पर उसकी जान लेने का फैसला बाकई में बहुत बड़ा था। अभी कुछ ही देर पहले तो वो मेरे साथ खड़ा होकर बातें कर रहा था और अब बेजान होकर मेरे सामने पडा हुआ है। पता नहीं क्यों पर इतने गुनाह करने के बाद भी मैं गगन की मौत पर खुद को दोषी मान रही थी।

मेरा पूरा शरीऱ डर और पश्चाताप के कारण पसीने से भीग गया था। तब तक पुलिस फोर्स और बाकी लोग भी वहाँ आ गए थे। उस पुलिस ऑफीसर ने मुझे सहारा देकर खड़ा किया। पर मुझपर तो सही से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। इसलिए श्रेया मेरे पास आ गई और मुझे सहारा देकर वहां से जा जाने लगी। मेरे बाकी के दोस्त भी मेरे साथ साथ वहाँ से निकल गए। गगन की लाश से दूर आकर अब मुझे कुछ बेहतर महसूस हो रहा था। इसलिए उस इन्काऊँटर बाली जगह से काफी दूर आने के बाद हम सभी एक जगह बैठ गए। कफी देर तक हम सभी के बीच खामोशी छाई रही पर फिर अचानक से रश्मि खुश होते हुए बोली

रश्मि- गाईज आखिरकार हमारा प्लान सक्सेसफुल रहा। वी विन....

रश्मि की बात सुनकर मुझे छोडकर बाकी सभी लोग खुश हो गए थे। पर रवि और श्रेया ने मेरी उदासी देख ली थी। इसलिए श्रेया बोली

श्रेया- सपना तुझे क्या हुआ है। तू मूँह लटकाकर क्यों बैठी है

निशा- पता नहीं यार.... मेरे दिमाग में बहुत सारी बातें एक साथ चल रहीं है। अभी कुछ देर पहले ही तो वो गगन हम लोगों के साथ खड़ा था और अब उसकी लाश वहाँ पडी है। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि हमने उसके साथ सही किया या गलत। मुझे अंदर ही अंदर गिल्टी फील हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी का मर्डर कर दिया हो।

मेरी बात सुनकर रवि मुझे समझाते हुए बोला

रवि- वो इसलिए क्योंकि तुम एक अच्छे और साफ दिल की लड़की हो। तुम तो अपने दुश्मन का भी बुरा नहीं चाहती है, तो फिर गगन से तो तुम्हारी कोई दुशमनी भी नहीं थी। तुमने जो कुछ भी किया वो हम सब के लिए किया है, उन तीन लडकियों के लिए किया है जिन्होने गगन की बजह से आत्महत्या कर ली थी और उन सभी लडकियों के लिए किया है जो आगे चलकर गगन का शिकार बन सकती थी। तुमने कुछ भी गलत नहीं किया है। इसलिए अपने अंदर चल रही सभी बातों को निकाल दो।

श्रेया भी रवि की बात को आगे बडाते हुए बोली

श्रेया- हाँ सपना रवि सही कह रहा है। तुम्ने कुछ भी गलत नहीं किया है। सच कहूँ तो तुम आज हम सबकी नजरों में हीरो बन गई हो। तुमने हमसे कोई रिश्ता ना होने के बाद भी हमारी मदद की है। अभी कितने दिन हुए हैं हमारी दोस्ती को। मुश्किल से 1 हफ्ता, पर तुमने इस 1 हफ्ते की दोस्ती के लिए अपनी जान तक जोखिम में डाल दी थी। तुम्हारी जैसी दोस्त तो 1किस्मत से मिलती है। बैसे एक बात तो है कि रवि सच में डफर है।

श्रेया की बात सुनकर रवि चिढते हुए बोला

रवि- अब मैं कहाँ से बीच में आ गया

श्रेया- तुम्हारी हॉफ गर्लफ्रेंड का मूड ऑफ है और तुम उसका मूड ठीक करने के लिए कुछ खाने पीने का आईटम लाने की जगह यहाँ खडे होकर बकवास कर रहे हो।

श्रेया की बात सुनकर रवि अपना सर खुजलाते हुए बोला

रवि- ओह सॉरी सॉरी मैं अभी लाया

इतना बोलकर रवि वहाँ से चला गया और वाकी लडकियाँ मुझसे बातें करके मेरा मूड ठीक करने की कोशिश करने लगी। जिस कारण जल्द ही मैं भी नॉर्मल हो गई थी। कुछ ही देर में रवि सबके लिए आईसक्रीम लेकर आ गया। आईसक्रीम देखकर पूजा हैरान होते हुए बोली

पूजा- इतनी शर्दी में आईसक्रीम

रवि- तभी तो लाया हूँ। शर्दी के मौसम में आईसक्रीम खाने का मजा ही कुछ और है। आज ट्राय करके देखो। मजा ना आये तो कहना

रवि की बात सुनकर सबने उससे आईसक्रीम ले ली और खाने लगे। हम लोग काफी देर तक वहाँ बैठे आपस में बातें करते रहे। फिर हम सबने एक रेस्टोरेंट जाकर साथ में खाना खाय़ा और अपने अपने घर के लिए निकल गए। मैंने कल आउट ऑफ सिटी जाने का प्लान कैंसिल कर दिया था। क्योंकि कल दोपहर को हम सभी लोग रवि के फार्म हाऊस पर मिलकर पैसे कलेक्ट करके उन तीनों लडकियों के घर देने जाने बाले थे।

इसलिए कल सुबह मैंने लोकल के ही 1-2 काम खत्म करने का प्रोग्राम बनाया था। होटल जाकर मैं बाथरूम में नहाने चली गई। क्योंकि आज सुबह ही असलम का मेरे पास कॉल आ गया था। जिस कारण मुझे आज एक कस्टमर के पास जाना था। नहाकर तैयार होने के बाद मैंने अपने रूम को अच्छी तरह से लॉक किया और रवि को ड्यूटी पर जाने की बात कहकर ऑटो से असलम की बताई लोकेशन के लिए निकल गई।

वो लोकेशन एक 5 स्टार होटल की थी। जिसके एक आलीशान कमरे में मैं इस वक्त मौजूद थी। जहाँ दो आदमी जिनकी उम्र करीब 40-45 वर्ष थी। वो दोनों वहाँ पर मेरा ही इंतजार कर रहे थे। असलम ने मुझे पहले ही बता दिया था कि दो कस्टमर एक साथ डी.पी. करना चाहते हैं। मेरी पहले भी कई बार डी.पी. हो गई थी। इसलिए मुझे इसमें कोई प्राब्लम नहीं थी। जिसके बदले में वो लोग मुझे डबल पेमेंट यानि पूरे 2 लाख रूयये दे रहे थे। उनमें से एक आदमी को देखकर मैं हैरान रह गई।

वो आदमी और कोई नहीं बल्कि रवि के पिता संजय सक्सेना थे। जिनका फोटो मैंने रवि के मोबाईल में पहले भी देखा था। पर जल्द ही मैंने अपने आप को नॉर्मल कर लिया। क्योंकि मैं फिलहाल जो काम कर रही थी उसमें जान पहचान का कोई मतलब नहीं था। मतलब था तो बस अपनी जिस्मानी प्यास बुझाने का और अपनी फैंटसी पूरी करने का। इसलिए मैंने उनसे वे बजह जान पहचान बडाने की जगह अपने काम पर फोकस करना ही ठीक समझा।

बैसे भी आज की घटना के बाद अब मैं किसी के साथ ज्यादा जान पहचान बडाना नहीं चाहती थी। बस अपना काम करना यानि दूसरों मजा देना और खुद भी लेना बस यही मेरा प्लान था। जिस कारण होटल रूम में जाकर मैंने सीधे अपने कपडे उतार दिए और उन लोगों के सामने एक दम नंगी खडी हो गई। वो लोग तो पहले से ही इसी इंतजार में थे। इसलिए बारी बारी से दोनों लोगों ने मेरे साथ जी भऱ कर मजे किए। जिसमें मैंने भी उनका भरपूर साथ दिया था। जिस कारण दोनों ही मेरे काम से काफी खुश थे।

पहला राऊंड खत्म होने के बाद हम तीनों ने कुछ देर रेस्ट किया और फिर दो-दो पैग लगाने के बाद एक बार फिर हम लोग शूरू हो गए। इस बार दोनों आदमी एक साथ मेरे ऊपर टूट पडे थे। मैं पहले से ही इस सब के लिए तैयार थी। जिस कारण मैं भी भरपूर उनका साथ देने के साथ साथ खुद भी मजे ले रही थी। कुझ देर तक एक दूसरे को सहलाने और चूमने के बाद उनमें से एक आदमी पीठ के बल लेट गया। जिसके ऊपर मैं बैठ गई और उसका लण्ड अपनी चूत में घुसा लिया।

इसके बाद दूसरे आदमी ने पीछे से मेरी गाँड में अपना लण्ड घुसा दिया और धक्के मारने शूरू कर दिए। जिसके बाद एक बार फिर मेरी चुदाई शुरू हो गई। कुछ देर इसी पोजीशन में रहने के बाद उन दोनों ने अपनी अपनी पोजीशन चेंज कर ली और फिर से शूरू हो गए। मैं उन दोनों ही आदमियों से काभी इम्प्रेश थी। क्योंकि दोनों काफी जेंटली सेक्स कर रहे थे और खुद मजे लेने के साथ साथ मुझे भी मजा दे रहे थे। साथ साथ वो दोनों हाईजीन का भी पूरा ध्यान रख रहे थे, क्योंकि दोनों ने ही सेक्स के दौरान कंडोम का यूज किया था।

दूसरा राऊंड कुछ ज्यादा ही लम्बा हो गया था। जिस कारण हम तीनों काफी थक गए थे। इसलिए काम खत्म होते ही हम तीनों एक दूसरे की बाहों में सो गए। अगले दिन सुबह करीब 7 बजे मैं उस होटल से निकल कर अपने होटल रूम में जा पहूंची और कपडे चेंज करके आपने ऑफिस का काम खत्म करने के निकल गई। उस दिन मैंने केवल दो लोकेशन पर ही बिजिट किया था। जिसके बाद काम खत्म होते होते दोपहर के 2 बज गए थे। वहाँ से मैं सीधा रवि के फार्म हाऊस पर जा पहूँची, जहाँ बाकी लोग मेरा ही इंतजार कर रहे थे।

कहानी जारी है...........
 
Update 033 -

मेरे आते ही सभी लोगों ने पैसे कंट्रीब्यूट करने शुरू कर दिये। कुल मिलाकर हमारे पास 15 लाख रूपये इकट्ठा हो गए थे। जिन्हें लेकर हम लोग उन तीनों लडकियों के घर बारी बारी से गए और उनके माता पिता को बो पैसे दिए। पहले तो वो लोग हमसे पैसे लेना ही नहीं चाहते थे। पर जब हमने उन्हें इमोशनली ब्लैकमेल किया, तब जाकर वो हमारी हेल्प लेने के लिए तैयार हुए। वो तीनों फैमिली हम सब से मिलकर काफी खुश हुईं थी। उन तीनों फैमिली की हैल्प करके हमें भी अपने अंदर एक सुकून का एहसास हो रहा था।

कल गगन की मौत से मुझे जो गिल्ट फील हो रहा था वो अब पूरी तरह से खत्म हो चुका था। अब हमारे ग्रुप के सभी लोग एक दूसरे के काफी अच्छे दोस्त बन गए थे। जिस कारण हम लोग आपस में काफी घुल मिलकर हँसी मजाक कर रहे थे। हमारे ग्रुप की दो लडकियों के पहले से ही बॉयफ्रेंड थे। वो दोनों लडकियों उन्हें भी अपने साथ लाईं थी। मुझे उन दोनों लडको का नेचर काफी अच्छा लगा। इसलिए हमने उन्हें भी हमारे ग्रुप में सामिल कर लिया था। अब हमारे ग्रुप में 3 लडके और 10 लडकियाँ थी।

रवि भी उन दोनों लडकों के हमारे ग्रुप में सामिल होने से खुश था। क्योंकि वो लोग पहले से ही अच्छे दोस्त थे, इसके अलावा ग्रुप में 2 नए लडके आने से उसे भी कम्पनी मिल गई थी। पर इतने दिनों से अब तक मेरी और रवि की ठीक से बात नहीं हुई थी। हालाँकि वो मुझसे अकेले में मिलकर बात करने की काफी कोशिश कर रहा था। पर मैं ही हर बार उसे टाल देती थी। मैं नहीं चाहती थी कि हम दोनों एक दूसरे के लिए मन में कोई फीलिंग लाऐं। इसलिए एक साथ डिनर करने के बाद मैं वहाँ से अपने होटल के लिए निकल गई थी।

आज फिर मुझे असलम के एक कस्टमर के पास जाना था। इसलिए होटल पहूँच कर मैंने कुछ देर अपने पति अमन से फोन पर बात की। जब से मैंने पहली बार किसी गैर मर्द से संबंध बनऐ थे, उस दिन से मैं लगभग हर रोज ही अमन से कुछ देर बात करती थी। पता नहीं क्यों पर अमन से बात करने के बाद किसी गैर मर्द की बाहों में जाने में मुझे बड़ा मजा आता था। साथ ही साथ मैं नहीं चाहती थी कि फिलहाल अमन मुझपर किसी भी प्रकार का कोई शक करे। खैर जो भी हो पर यह बात तो पक्की थी कि मैं अमन के आने के बाद उससे अलग होने का पूरा मन बना चुकी थी।

अगले कुछ दिनों तक मैं पूरी तरह से अपने ऑफिस के कामों में बिजी रही। सारा दिन ऑफिस के काम को पूरा करती और रात को या तो असलम के बताए क्लाईंट की बाहों में या फिर रघू की बहों में बिताती। मैं अपनी इस लाईफ से काफी खुश और संतुष्ट थी। यानि मैं सारी जिंदगी यह सब करने के लिए तैयार थी। पर मैं यह भी जानती थी कि ऐसा संभव नहीं है। कुछ ही सालों में मेरी जवानी ढलने लगेगी और मुझे कस्टमर मिलने बंद हो जाऐंगे।

जिस कारण मैंने अमन से अलग होकर कुछ और दिनों तक यह सब करने के बाद एक अच्छे इंसान को अपना जीवन साथी बनाने के बारे में भी सोच लिया था। पर फिलहाल इसमें समय था और मेरे पास पहले से ही कई सारे बिकल्प थे। जिनमें से रघु भी एक था। शायद इसीलिए मैंने रघु को अपने इतने पास आने दिया था और उसे हमेशा खुश रखने की कोशिश भी करती थी। रघु एक अच्छा लड़का था। उसने मुझे बताया था कि उसने ग्रेजुऐशन किया हुआ है। पर उसके परिवार की स्थिती अच्छी नहीं थी।

उसके माता पिता की मौत काफी पहले ही एक एक्सीडेंट में हो गई थी। रघू से बडी उसकी एक बहन थी। जिसकी शादि पहले ही तय हो गई। लेकिन उसकी शादी से पहले ही रघु के माता पिता की मौत हो गई थी और रघु के पास अपनी बहन की शादी के लिए पैसे नहीं थे। जिस कारण उसने अपना मकान बेचकर अपनी बडी बहन की शादी की थी। जिसके बाद से वो इसी होटल में काम कर रहा है और यहीं रहता है। मैं उसे एक अच्छी लाईफ देना चाहती थी।

इसलिए मैंने हरीश अंकल से उसे पुलिस फोर्स में नौकरी देने की सिफारिस भी की थी। हाँलाकि हरीश अंकल इसके लिए तैयार भी हो गए थे। लेकिन उनकी शर्त थी कि मैं भी पुलिस फोर्स ज्वाईन करूँ। जिसके लिए फिलहाल मैं बिल्कुल भी तैयार नहीं थी। इसलिए मैंने अमन से अलग होकर अपना खुद का बिजनेश करने और रघु को अपने साथ बिजिनेश में सामिल करने का प्लान बनाया था। खैर यह तो भविष्य की बातें थीं। पर फिलहाल आज मैं अपने बॉस के दिए सारे काम खत्म करके बहुत ज्यादा खुश थी।

आज 14 नबंबर था अब बस मुझे केवल एक दिन के लिए इंदौर ब्रांच में बिजिट करना था। उसके बाद अगले 15 दिन मैं पूरी तरह से फ्री थी। मैं अपनी छुट्टियों का पूरा मजा लेना चाहती थी। इसलिए इंदौर का काम खत्म करने के लिए मैंने आज रात की स्लीपर बस से इंदौर जाने का प्लान बना लिया था। जिसकी बुकिंग मैंने पहले ही ऑनलाईन कर ली थी। वो बस मुझे सुबह करीब 4 बजे इंदौर छोड देगी। जिसके बाद मैं किसी होटल में फ्रेस होकर अपनी इंदौर ब्रांच में बिजिट करके उसी रात दूसरी बस से भोपाल बापिस लौट सकती थी।

मेरा पूरा प्लान पहले से ही रेडी था। इसलिए अपने होटल पहूँचकर मैं अपनी पैकिंग करने लगी। मैंने बैग में दो जोडी कपडे, ब्रा-पेंटी सेट, एक कंबल और अपना लेपटॉप बगैरह रख लिया। फिर कुछ देर रेस्ट करने के बाद मैंने अपने लिए लाईट डिनर ऑर्डर कर दिया। डिनर करने के बाद मैंने अपने कपडे चेंज किए। बस में तो मुझे बैसे ही सोना था। इसलिए मैंने एक लॉंग स्कर्ट पहन ली। फिर अपना टॉप और ब्रा निकाल कर एक कैमिसोल पहन लिया और उसके ऊपर मैंने एक शॉल डाल ली थी।

बैसे भी मुझे सोते समय ढीले ढाले कपडे पहनना पसंद है। कपडे चेंज करने के बाद मैंने अपना बैग लिया और रूम को अच्छी तरह लॉक करके ऑटो से बस स्टैंड के लिए निकल गई। मैं बस निकलने से थोडा पहले ही बस स्टैण्ड पहूँच गई थी। मेरी सीट पीछे की तरफ डबल बेड बाली सीट थी। इसलिए मुझे नहीं पता थी कि मेरे बगल में कौन आने बाला है। बैसे भी मुझे इससे कोई फर्क भी नहीं पड रहा था। क्योंकि अगर लड़की होगी तो कोई प्राब्लम नहीं है और यदि कोई लड़का या आदमी भी हुआ तो भी कोई दिक्कत नहीं थी। क्योंकि वो चलती बस में मेरे साथ थोडी बहुत छेडछाड ही कर पाऐया।

बैसे भी पिछले 16-17 दिन से लगातार मैं किसी ना किसी गैर मर्द के साथ ना केवल सो रही थी बल्की उनसे चुदवा भी रही थी। तो फिर बस में किसी गैर मर्द के साथ सोने में भला मुझे क्या दिक्कत होगी। मेरी सीट एक बाक्स की तरह थी जिसमें पतली प्लाईबुड का एक दरवाजा भी लगा हुआ था। जिसे खिसकाकर खोला या बंद किया जा सकता था। मैने अपनी सीट पर पहुँचकर बैग में से कंबल निकाला और बैग को एक कोने में रख कर लेट गई। कुछ देर बाद बस में दूसरी सबारियाँ भी आने लगीं थीं। जिनकी आवाजें मुझे सुनाई दे रहीं थी।

तभी अचानक से मेरी केबिन का दरवाजा ओपन हुआ और एक लड़का उसमें अंदर आ गया। पर मैं चुपचाप लेटकर सोने की कोशिश कर रही थी। उस लडके ने भी मुझे डिस्टर्व नहीं किया और अपना बैग सीट के नीचे सेट करके मेरे बगल में लेट गया। शायद उस लडके को लगा होगा कि मैं सो रही हूँ। इसलिए वो अपनी गर्लफ्रेंड को कॉल करके उससे बातें करने लगा। बैसे तो मुझे हल्की हल्की नींद आनी शुरू हो गई थी। पर उस लडके की बातें सुनकर मुझे मजा आने लगा था।

जिस कारण मेरी नींद पूरी तरह से गायब हो गई और मैं उसकी बातें सुनने लगी। वो लड़का अपनी गर्लफ्रेंड से फोन सेक्स कर रहा था। जिसे सुन कर मैं भी उत्तेजित होने लगी थी। तभी मेरी मन में आया कि क्यों ना थोडा सा इस लडके को परेशान किया जाऐ। इतना सोचते ही मैंने करवट ले ली और अपने कंबल को कुछ इस तरह से खिसकाया कि मेरी कमर से नीचे का हिस्सा कंबल से बाहर हो गया और ऊपर का हिस्सा कंबल के अंदर ही रहा। करवट लेने से मेरी स्कर्ट भी थोडा ऊपर खिसक गई थी जिस कारण मेरे घुटनों से नीचे के गोरे और चिकने पैर साफ साफ दिखाई दे रहे थे।

शायद इतना ही उस लडके के लिए काफी था। क्योंकि जैसे ही उसने मेरे गाँड और चिकने गोरे टाँगों को देखा तो उसे एहसास हो गया कि वो किसी जवान लड़की के बगल में लेटा हुआ है। इसलिए उसने थोडी देर बात करने के बाद फोन कट कर दिया। इसके बाद वो अपने पैर खिसकाकर मेरे पैरों को टच करने की कोशिश करने लगा। लेकिन जब उसकी इस हरकत पर मैंने कोई रियेक्शन नहीं दिया तो उसकी हिम्मत और ज्यादा बड गई, जिसके बाद वो लडका अपने एक पैर से मेरे पैरों को हल्ले हल्के से सहलाने लगा। उस लडके कि इस हरकत से मुझे बड़ा मजा आ रहा था। पर बस अभी भी बस स्टैंड पर खडी थी। जिस कारण मैं कोई रियेक्शन नहीं दे रही थी।

कुछ देर यूँ ही मेरे पैरों को सहलाने के बाद वो लडका धीरे धीरे मेरी स्कर्ट को पीछे से ऊपर की तरफ खिसकाने लगा। पर मैं अब भी चुपचाप लेटी रही। उस लडके ने कुछ ही देर में मेरी पूरी स्कर्ट ऊपर की तरफ कर दी थी। स्कर्ट के अंदर मैंने जी-स्ट्रिंग टाईप पेंटी पहनी हुई थी, जो केवल चूत को ही ढंकने का काम करती है। बाकी का हिस्सा पतली डोरियों की तरह होता है। जिस कारण मेरी करीब पूरी नंगी गाँड उस लडके के सामने थी। मेरी खुली गाँड देखकर तो वो लड़का पागल ही हो गया था।

पता नहीं उसे क्या हुआ जो उसने अचानक से केविन डोर अंदर से लॉक कर लिया और मुझसे सट कर लेट गया। अब उसका खडा लण्ड मेरी गाँड को छू रहा था। उसने मेरी कमर पर हाथ रखा और सोने का नाटक करने लगा। मुझे अपनी गांड पर उस लडके का लण्ड झटके लेता हुआ महसूस हो रहा था। तभी अचानक से बस स्टार्ट हो गई तो उस लडके ने मौके का फायदा उठाकर अपने पेंट की जिप खोल ली और अपना खड़ा लण्ड निकाल कर मेरी गांड से टिका दिया।

उस लडके की इन हरकतों से मुझे भी काफी मजा आ रहा था। पर मैं चुपचाप बिना कोई हरकत किए लेटी हुई थी। अब तक उस लडके की हिम्मत काफी ज्यादा बड गई थी। जिस कराण उसने अपना एक हाथ मेरी कमर से होते हुए मेरे बूब्स पर भी रख दिया था। बैसे तो मैं चाहती तो एक ही झटके में उस लडके की इन सभी हरकतों को बंद करवा सकती थी। पर एक तो मुझे भी मजा आ रहा था और दूसरा मैं जानना चाहती थी कि यह लड़का इस चलती बस में मेरे साथ और क्या कर सकता है। तभी उस लडके ने धीरे धीरे मेरे बूब्स को सहलाना भी शूरू कर दिया था।

कुछ देर मेरे बूब्स सहलाने के बाद उसने अपना हाथ फिर से नीचे कर लिया और जैसे ही वो मेरी पैंटी के अंदर हाथ घुसाने लगा तो मैंने अचानक से उसका हाथ पकड लिया। मेरी इस हरकत से उस लड़की की बुरी तरह से फट गई थी। उसे पक्का यकीन हो गया था कि अब उसके गाल पर एक जोरदर थप्पड पडने बाला है और शोर मचाने के बाद बाकी लोग उसकी जो हालत करेंगे वो अलग। वो लडकी कुछ कर पाता या कुछ समझ पाता उससे पहले ही मैं अचानक से पलट गई।

अभी हम भोपाल सिटी से बाहर नहीं निकले थे। जिस कराण स्ट्रीट लाईट की पर्याप्त रोशनी खिड़की से अंदर आ रही थी। जैसे ही मैंने उस लडके का चेहरा देखा तो मैं बुरी तरह से चौक गई और बो लडका भी मुझे देखकर हैरान रह गया था। यह लड़का कोई और नहीं बल्कि ऋषभ था। जिसकी वर्थडे पार्टी में मैं गई थी और जहाँ करीब करीब 20 लडकों ने रात भर मुझे जी भर कर बजाया था। ऋषभ को अपने सामने देखकर मेरे चेहरे पर स्माईल आ गई और मैंने उसका हाथ छोड दिया और बोली

निशा- ऋषभ तुम... और मैं सोच रही थी कि पता नहीं कौन है जो चलती बस में मेरे साथ ऐसी हरकत कर रहा है।

ऋषभ भी मुझे देखकर अब रिलेक्स हो गया था। इसलिए जैसे ही मैंने उसका हाथ छोडा तो उसने अपना हाथ मेरी पेंटी के अंदर घुसा दिया और मेरी चूत को सहलाते हुए बोला

ऋषभ- जैसे ही तुमने मेरा हाथ पकडा मेरी तो बुरी तरह से फट गई थी। मुझे लगा कि अब मेरा गाल लाल होने बाला है और इज्जत का दिवाला निकलेगा वो अलग

ऋषभ की बात सुनकर मैं मुस्कुराकर बोली

निशा- यह तो तुम्हें कुछ करने से पहले ही सोचना चाहिए था। खैर छोडे यह सब और यह बताओ कि तुम यहाँ क्या कर रहे हो

ऋषभ- अरे यार कल हमारा इंदौर में बॉलीबॉल मैच है। बस उसी के लिए हम लोग इंदौर जा रहे हैं।

निशा- मतलब तुम्हारे साथ इस बर में बाकी के लोग भी हैं

ऋषभ- हाँ ज्यादा नहीं बस हम 8 खिलाडी और एक कोच हैं। मेरे अलाबा बाकी 7 को तो तुम पहले से ही जानती हो। बस कोच सर को नहीं जानती।

निशा- चलो अब यह फालतू की हरकतें बंद करो और चुपचाप सो जाओ।

ऋषभ- अब जब तुम मेरे साथ लेटी हो तो एक राऊंड तो बनता है

निशा- पागल हो क्या... बस में यह सब... किसी को पता चल गया तो.... नहीं नहीं… मैं बस में कुछ नहीं करवाने बाली

ऋषभ- अरे यार चिंता मत करो…. आस पास की सारी सीटें हमारी ही हैं। किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा।

निशा- लेकिन कल मैच भी तो है तुम्हारा.... स्टैमिना बचा कर रखो, कल मैच में काम आयेगा

ऋषभ- उस दिन तुम्हारे साथ सेक्स किया था ना, तो अगले दिन के मैच में क्लीन स्वीप किया था हमने। तुम लकी हो हमारे लिए, कल हमारा फाईनल है, अगर आज फिर तुम्हारे साथ किया तो हम कल इन्टर कॉलेज चैम्पियनशिप पक्का जीत जाऐंगे।

ऋषभ की बात सुनकर मैं हंसते हुए बोली

निशा- ऐसा कुछ नहीं होता

ऋषभ- जो भी हो पर मुझे तो तुम मेरे लिए लकी लगती हो

निशा- पर फिर भी हमारी आवाजों से बाकी लोगों को पता चल ही जाऐगा

ऋषभ- तो क्या…. वो लोग भी बहती गंगा में हाथ साफ कर लेंगे। तुम चिंता मत करो मैं सब मैनेज कर लूँगा और तुम्ही फीस भी तुम्हें मिल जाऐगी। रुको मैं सबसे बात करके आता हूँ और पैसे भी कलेक्ट कर लूँगा।

इतना बोलकर ऋषभ दरवाजा खोलकर केबिन से बाहर निकल गया। हाँलाकि मैं उसे रोकना चाहती थी, क्योंकि मैं चलती बस में यूं चुदवाने के बिलकुल मूड में नहीं थी और ना ही कुई रिस्क लेना चाहती थी। पर मेरे कुछ कहने से पहले ही वो बाहर निकल गया था। उसके जाने के बाद मैंने सोचा चलो आज चलती बस में भी चुदवाने का एक्सपीरियंस ले ही लेती हूँ। पता नहीं फिर कभी यह मौका मिले ना मिले।

कहानी जारी है .....
 
Update 034 -

कुछ देर बाद ऋषभ केबिन में बापिस आ गया और उसने दरवाजा बंद करते हुए कहा

ऋषभ- सब तैयार हैं.. कोच सर भी

ऋषभ की बात सुनकर मैं हैरान होते हुए बोली

निशा- क्या…… कोच सर भी... ऋषभ तुम पक्का आज मुझे मरवाओगे

ऋषभ- अरे नहीं मेरी जान तुम्हें नहीं तुम्हारी चूत और गांड को मरवाऊँगा और मारूँगा भी

इतना बोलकर उसने मेरे होंठो पर एक किस कर लिया। फिर वो मुझे पैसों का एक बंडल देते हुए बोला

ऋषभ- इन्हें रखो। यह तो पता नहीं कितने हैं पर 60-70 हजार से ज्यादा ही होंगे। जिसके पास जितना कैस था वो सारा दे दिया है। हम लोग कल इन्दौर पहुँचकर ए.टी.एम. से अपने लिए पैसे निकाल लेंगे।

मैंने चुपचाप ऋषभ से बो पैसे लेकर अपने हैंड बैग में रख लिए। जिसके बाद ऋषभ मेरे कंबल के अंदर घुस गया और मुझे चूमने और सहलाने लगा। अब तक मैं भी अपने पूरे मूड में आ गई थी। जिस कारण मैं भी उसका पूरा साथ दे रही थी। कुछ देर बाद ऋषभ ने मेरा कैमिसोल ऊपर करके मेरे बूब्स के साथ खेलने लगा। जिस कारण मैं कुछ ज्यादा ही एक्साईडेट हो गई थी और मेरी चूत पानी छोडने लगी थी।

फिर ऋषभ ने अपना पेंट और अंडर बियर भी निकला दिया और मेरी स्कर्ट ऊपर करके अपने एक हाथ से मेरी पैंटी के ऊपर से ही मेरी चूत को मसलने लगा। जिस कारण मैं ज्यादा देर तक अपने ऊपर कंट्रोल नहीं रख पाई और झर गई। मेरे झरते ही मेरी पैंटी पूरी तरह से भीग गई थी। जिसे ऋषभ ने लिकाल लिया और उसे सुंघते हुए बोला

ऋषभ- अब ये मेरी हुई

ऋषभ की बात सुनकर मैं कन्फ्यूज होते हुए बोली

निशा- तुम क्या करोगे इसका

ऋषभ- इसपर तुम्हारा पानी लगा हुआ है। तो जब तुम्हारी याद आऐगी तो मैं इसे सूँघकर और अपने लण्ड पर रगड कर मजे ले लिया करूँगा

ऋषभ की इस अजीब से फैंटसी को सुनकर मुझे हंसी के साथ साथ शर्म भी आ रही थी। पर मैं उसे मना करके उसे दुखी नहीं करना चाहती थी। इसलिए मैं बोली

निशा- ठीक है रख लेना। पर अगर तुम्हारी गर्लफ्रेंड ने कभी इसे देख लिया तो

ऋषभ- तो क्या… मैं बोल दूँगा की मेरी एक्स की है। पर पक्का इसे फेंकूँगा नहीं। चाहे ब्रेकअप हो जाए। तुम्हारे साथ उस दिन मैंने अपनी जिंदगी का पहला सेक्स किया था। तो अपने पहले सेक्स पार्टनर की निशानी को मैं कैसे फैंक सकता हूँ।

ऋषभ की बात सुनकर मैं मुस्कुराकर रह गई। क्योंकि उसकी बात का मेरे पास कोई जबाब नहीं था। बैसे भी मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पडता कि वो मेरी पैंटी के साथ क्या करने बाला है। कुछ देर यूँ ही एक दूसरे को सहलाने से मैं फिर से गर्म हो गई थी। जिसके बाद ऋषभ मेरे ऊपर चड गया और अपना लण्ड मेरी चूत में घुसाकर चुदाई करने लगा। मैं भी अब पूरे जोश में आकर अपनी कमर हिलाकर उसका साथ दे रही थी।

पिछली बार की तुलना में इस बार ऋषभ ने कुछ ज्यादा देर तक मेरी चुदाई की थी और मुझे चुदाई के दौरान झरने पर मजबूर कर दिया था। जिसके बाद उसने भी अपना पानी मेरी चूत में निकाल दिया। ऋषभ की इस बार की चुदाई से मैं पूरी तरह से सैटिस्फाई हो गई थी। बैसे भी एक लड़की यही तो चाहती है कि उसका पार्टनर उसे भी डिस्चार्ज करने में हेल्प करे, ना ही खुद डिस्चार्ज होकर करवट लेकर सो जाए।

जैसे ही ऋषभ का पानी निकल गया तो वो कुछ देर मुझे चुमने के बाद अपने कपडे पहनकर केबिन से बाहर निकल गया। ऋषभ के जाने के कुछ देर बाद एक दूसका लड़का उस केबिन में अंदर आकर मेरी बगल में लेट गया। अंदर आकर उसने केबिन का दरवाजा अंदर से बंद किया और कंबल के अंदर घुस कर मुझे सहलाने लगा। पिछले 16-17 दिनों से एक के बाद एक चुदाई करवाने का मुझे अच्छा खासा एक्सपीरियंस हो गया था और आदत भी हो गई थी।

जिस कारण मैं पहले से ही अपने आपको तैयार कर चुकी थी। बैसे भी चलती बस में यह सब करने के बारे में सोच सोच कर मैं काफी ज्यादा उत्तेजित हो रही थी। कुछ देर मुझे यूँ ही सहालाने के बाद वो लड़की भी मेरे ऊपर चड गया और मेरी चुदाई शुरू कर दी। इस तरह पूरे रास्ते वो लडके एक के बाद एक मेरी केविन में आकर मुझे चोद कर बाहर निकल जाते। आखिर में उनका कोच भी मेरी केबिन के अंदर आ गया। उसकी उम्र करीब 28-30 साल के आस पास थी।

अंदर आते ही वो भी किसी भूखे भेडिये की तरह मुझ पर टूट पडा। अब तक मैं 8 लडको से चुदवा चुकी थी और काफी थक गई थी। हालाँकि ऋषभ को छोडकर बाकी कोई लड़का ज्यादा देर नहीं टिका था। पर ओवर ऑल पिछले 3 घंटे से भी ज्यादा समय से मेरी लगातार चुदाई हो रही थी। जो किसी नॉर्मल सेक्स से बहुत ज्यादा थी। हालाँकि मेरा मन अब और ज्यादा चुदने का नहीं था, पर मैं अब कुछ नहीं कर सकती थी। इसलिए मैं चुपचाप उस कोच का साथ देने लगी। मुझे अच्छे से चूमने और सहलान के बाद वो मेरे ऊपर सवार हो गया और मुझे चोदने लगा।

कोच का लण्ड बाकी लडकों से बड़ा था। जिस कारण मुझे थोडा दर्द भी हो रहा था। पर मैं उस दर्द को बरदास्त करके उसका पूरा साथ दे रही थी। कोच के साथ कुछ देर की ही चुदाई के बाद ही मैं झर गई थी। जिस कारण मेरे झरते ही उसने अपना लण्ड मेरी चूत से निकाल लिया और मुझे करवट लेकर लेटने के लिए कहा। उसकी बात सुनकर मैं समझ गई की ये अब मुझे पीछे से चोदना चाहता है। चूँकि उस केविन की हाईट कम थी। जिस कारण कुतिया बनाकर वो मुझे चोद नहीं सकता था।

इसलिए मैंने चुपचाप करवट ले ली और उसकी तरफ अपनी गाँड कर दी। लेकिन वो कोच तो किसी और ही मूड में था। उसने अपना लण्ड मेरी चूत में घुसाने के स्थान पर मेरी गांड से टिका दिया और अंदर घुसाने लगा। पर अब मैं उसे रोकने की हालत में नहीं थी। उसके लण्ड पर बाकी लडकों का बीर्य लगा हुआ था, जो उन्होंने मेरी चूत में ही छोड दिया था, जिसके साथ मेरी मेरी चूत का पानी भी उसमें मिला हुआ था। जिस कारण मेरी गांड में उस कोच का लण्ड जाने में ज्यादा प्राब्लम नहीं हुई।

हाँलाकी मुझे काफी तेज दर्द हो रहा था। पर मैं जानती थी कि यह दर्द कुछ ही देर में खत्म हो जाऐगा। इसलिए अपने दर्द को बरदास्त करने और अपनी आबाज को रोकने के लिए मैंने अपने एक हाथ से अपना मूँह बंद कर रखा था। कुछ देर धीरे धीरे मेरी गांड मारने के बाद उस कोच ने अपनी स्पीड बड़ा दी। अब तक मेरा दर्द भी लगभग खत्म हो चुका था। इसलिए मैं भी उसका साथ देने लगी थी। वो कोच काफी देर तक मेरी गाँड मारता रहा और जब उसका पानी मेरी गाँड में निकलता, तब तक हम लोग इंदौर पहूँच चुके थे।

इसलिए काम खत्म होते ही कोच अपने कपडे पहनकर तुरंत केबिन से बाहर निकल गया। मैं कुछ देर उसी केविन में लेटी खुद को नॉर्मल करने के साथ साथ बाकी लोगों के जाने का इंतजार करने लगी। जब पूरी बस खाली हो गई तो मैं उठी और कंबल को लपेटकर अच्छी तरह से तह करके बैग में रखने लगी। ठीक तभी उस बस का कंडक्टर मेरे पास आया और बोला

कंडक्टर- अरे मैडम कहाँ चली। सारे रास्ते उन बच्चों को मजे दिए हैं तो हममें क्या बुराई है

उस कंडक्टर की बात सुनकर मैं गुस्से में उसे घूरते हुए बोली

निशा- यह क्या बकवास कर रहे हो तुम

कंडक्टर- वकवास नहीं कर रहा मैडम जी, मैंने खुद अपनी आँखों से सारी रात एक के बाद एक लडकों को तुम्हारे केबिन के अंदर जाते और बाहर आते देखा है और खुद तुम्हारी इस केबिन के पास आकर अंदर की आवजें सुनी हैं।

उसकी बात सुनकर मैं समझ गई कि अब इससे अब कुछ भी छिपाने का कोई फायदा नहीं है। बैसे भी ये बाकी लोगों की तरह ही मुझे केवल चोदना चाहता है। अब क्या फर्क पडता है। जब रास्ते में 9 लोगों से चुदवा चुकी हूँ तो 1-2 से और क्या फर्क पडेगा। इसलिए मैं बोली

निशा- देखो मिस्टर ये मेरा काम है और मैं इस काम के पैसे लेती हूँ। फ्री में रबडी नहीं बाटती फिरती। अगर मजे लेने हैं तो पैसे ढीले करने पडेंगे।

कंडक्टर- तो हम कौन सा मना कर रहे हैं। बोला ना क्या रेट है

मैं पहले से ही काफी थकी हुई थी, इसलिए मैं इस वक्त और ज्याद चुदने के बिल्कुल भी मूढ में नहीं थी। जिस कारण मैं उसे टालते हुए बोली

निशा- 10 हजार एक शॉट का

मेरी बात सुनकर कंडक्टर थोडा हैरान होते हुए बोला

कंडक्टर- यह तो बहुत ज्यादा है।

निशा- माल की कीमत होती है कंडक्टर सहाब। अब मैं कोई रोड छाप रण्डी तो हूँ नहीं

मेरी बात सुनकर वो कंडक्टर बारगेनिंग करते हुए बोला

कंडक्टर- देख लो हम दो लोग हैं। मैं और ड्रायबर सहाब

निशा- कोई फर्क नहीं पडता। दो हों या चार

कंडक्टर- दोनों के 10 ले लेना

कंडक्टर की बात सुनकर मैं चिढते हुए बोली

निशा- मुझे देर हो रही है। रास्ता छोडो मेरा

मेरी इस धमकी से वो कंडक्टर लगभग गिडगिडाने लगा और बोला

कंडक्टर- अरे मैडम नाराज क्यों हो रही हो। मैं कसम खाता हूँ कि हमारे पास इतने ही पैसे हैं। बाकी के पैसे गाडी मालिक को देने के लिए रखे हैं। अगर उनमें से दे दिए तो हमारी नौकरी चली जाऐगी और रात भर से हम दोनों यही सोच सोच कर अपना लण्ड खड़ा करके बैठे हैं कि सुबह हमें भी मौका मिलेगा

निशा- देखो मैं काफी थक गई हूँ। उन लोगों ने सारी रात सोने नहीं दिया है। दिन में मुझे बहुत जरूरी काम भी निपटाने हैं। उसके बाद रात को ही बापिस भोपाल भी लौटना है। इसलिए मेरा समय खराब मत करो

मेरी बात सुनकर कंडक्टर मुझे मनाने की कोशिश करते हुए बोला

कंडक्टर- तो फिर रात को तुम हमारी बस से ही बापिस चलना। हम तुमसे किराया भी नहीं लेगे।

निशा- तो फिर रात में ही कर लेना

कंडक्टर- रात में कहाँ कर पाऐंगे। फिर तो कल सुबह भोपाल पहुंचकर ही कर पाऐंगे। तब तक तो सोच सोच कर हमारी हालत ही खराब हो जाऐगी।

निशा- तो इसमें मैं क्या करूँ। देखो मैं पैसे लेकर मजे देती हूँ। हो सकता है कि तुम्हें लगे कि मैं थोडा घमंडी हूँ या लालची हूँ पर ऐसा नहीं है। जिस दिन एक बार मेरी ले लोगे, उस दिन समझ में आ जाऐगा कि मैं इतने पैसे क्यों लेती हूँ।

कंडक्टर- अरे मुझे कुछ नहीं समझना। मैं पहले ही उन लडकों की सारी बातें सुन चुका हूँ। तुम बस हमें एक बार करने दो। देखो हम तुम्हें 10 हजार रुपये तो दे ही रहे हैं। साथ में रात को फ्री में बापिस भी ले जाऐंगे। कहो तो अभी एडवांस में ही टिकिट काट कर दे देता हूँ और रात में बापसी के समय तुम्हारे लिए 4-5 कस्टमर की भी इंतजाम कर लेंगे। तो उनसे कमा लेना पैसे। माँ कसम हमारे साथ एक बार करवाने के बाद तुम घाटे में बिल्कुल भी नहीं रहोगी।

उस कंडक्टर के इतने रिक्वेस्ट करने के बाद मैंने सोचा चलो करवा ही लेती हूँ। बैसे भी मैं रेलवे स्टेशन के यार्ड में 5-5 हजार में पहले भी करवा चुकी हूँ। ऊपर से अगर इसने बाकई में 1-2 कस्टमर रात के लिए बुक कर लिए तो इसमें मेरा ही फायदा है। पैसे और मजे के साथ साथ किराया भी नहीं लगेगा। यह सब सोचकर मैंने उससे कहा।

निशा- चलो ठीक है तुम लोग भी कर लो। पर अपना वादा याद रखना। वर्ना शाम को टिकिट के पैसे माँगने लगो और हाँ बैसे तो मुझे उम्मीद नहीं है कि तुम्हें कोई कस्टमर मिलेगा। पर अगर मिले भी तो उससे पैसों की डीलिंग तुम्हें करनी पडेगी। क्योंकि मैं पैसे तुमसे लूँगी, बस में किसी कस्टमर से पैसे माँगकर मैं कोई तमाशा नहीं करूना चाहती।

मेरी बात सुनकर वो कंडक्टर खुश होते हुए बोला

कंडक्टर- हाँ हाँ ठीक है। हम पैसे ले लेंगे और टिकिट तुम एडवांस में ही अपने साथ ले जाना।

इतना बोलकर उनसे तुरंत अपने छोले से बिल बुक निकाली और मेरे नाम से एक टिकिट काटकर मुझे दे दिया। जिस पर उसी सीट का नम्बर था। जिससे मैं अभी अभी आई थी। फिर उसने अपने बैग में से 10 हजार रूपये निकालकर मुझे दे दिए। जो मैंने तुरंत ही अपने हैण्ड बैग में रख लिए। पैसे लेने के बाद मैं बापिस से अपनी सीट पर लेट गई। मेरे लेटते ही कंडक्टर भी केबिन के अंदर आ गया और केविन को अंदर से बंद करके मेरे ऊपर चड गया। वो पूरी रात से इसी पल का इंतजार कर रहा था।

जिस कारण मेरे ऊपर आते ही उसने अपना लण्ड मेरी चूत में घुसा दिया और मेरी चुदाई शुरू कर दी। मैं भी पूरे मन से उसका साथ दे रही थी। वो कंडक्टर शायद कुछ ज्यादा ही उतावला था। जिस कारण उसकी स्पीड काफी ज्यादा थी। इसलिए मुझे लगा कि वो ज्यादा देर तक टिक नहीं पायेगा। पर वो लगातार 30 मिनट तक फुल स्पीड से मेरी चुदाई करता रहा और फिर आखिर में अपना पानी मेरी चूत में छोड दिया। कंडक्टर के जाने के बाद बस ड्रायबर भी मेरे केबिन में आ गया और एक बार फिर मेरी चूदाई शुरू हो गई। मुझे कंडक्टर की तुलना में ड्रायबर कुछ ज्यादा ही एक्सपीरियंस लगा।

क्योंकि उसे कोई जल्दी नहीं थी। वो आराम से मेरे पूरे मजे ले रहा था और मुझे भी भरपूर मजे दे रहा था। काफी देर चुदाई करने के बाद आखिर कार ड्राबर भी ठण्डा हो गया। ड्रायबर के जाते ही मैंने अपने कपडे ठीक किए और अपना बैग लेकर बस से नीचे उतर कर बस स्टैण्ड से बाहर जाने लगी।

कहानी जारी है ......
 
Update 035 -

सारी रात की चुदाई के कारण मेरी चूत में दर्द हो रहा था। जिस कारण मुझे चलने में काफी दिक्कत हो रही थी। साथ में पेंटी ना पहने के कारण मेरी चूत के अंदर भरा बीर्य भी रिसकर मेरे जाँघों से होता हुआ मेरे पैरों तर आ रहा था। जिससे मुझे काफी गंदा फील हो रहा था।

मैंने मोबाईल में समय देखा तो सुबह के 5 बज रहे थे। मेरा ऑफिस बस स्टेण्ड से ज्यादा दूर नहीं था। जिस कारण मैंने बस स्टेण्ड से बाहर आकर एक ऑटो किया और अपने ऑफिस का ऐड्रेश बता कर उसके आस पास ही किसी लॉज में ले जाने के लिए बोल दिया। ऑटो बाले ने मेरे ऑफिस के एकदम पास में ही एक लॉज के बाहर मुझे छोड दिया। जिसके बाद मैंने उसका पेमेंट करने के बाद अपने लिए एक रूम बुक किया और चाबियाँ लेकर सीधे कमरे में चली गई।

कमरे में आकर मैंने सबसे पहले अपने पर्स से एक पेन किलर निकाल कर खाई। उसके बाद बिना कपडे चेंज किए रूम को अंदर से लॉक करके सो गई। दोपहर करीब 12 बजे मेरी आँख खुली तो मैं तुरंत ही बाथरूम में घुस गई। फ्रेस होने के बाद मैंने अच्छे से नहाया औऱ फिर कपडे पहनने के बाद अपना लैपटॉप बैग लेकर ऑफिस के लिए निकल गई। मैंने इस वक्त टाईट फिटिंग में ब्लैक कलर की फार्मल पैंट और महरून शर्ट पहनी हुई थी साथ में सन ग्लासेस भी लगा रखे थे। देखने में मैं एकदम प्रोफेशनल लेकिन कॉफी ज्यादा सेक्सी लग रही थी। ऑफिस मेरे लॉज के एकदम पास में ही था। इसलिए मैं पैदल ही उस तरफ बड गई।

ऑफिस पहुँचकर मैं पूरे स्टॉफ से मिली। उन लोगों को पहले ही बॉस का फोन आ गया था कि एक सीनियर ऑफिसर ब्रांच बिजिट के लिए कभी भी आ सकता है। जिस कारण वो पहले से ही काफी डरे हुए थे और पूरी तैयारी से बैठे थे। ऑफिस के ज्यादातर मेल स्टॉफ तिरछी नजर से मेरे सेक्सी बदन को निहार रहे थे। जिसे मैं पहले ही नोटिस कर चुकी थी। पर मैंने उनसे कुछ भी नहीं कहा और उनकी इस हरकत को इग्नोर करके सारा काम देखने लगी। मैंने काफी फ्रेंडली होकर उनसे बात की थी और उनके अच्छे कामों की तारीफ के साथ साथ कुछ कमियों को भी उन्हें बताया था।

वो सभी मेरे नेचर से काफी खुश थे। इस दौरान ऑफिस स्टॉफ ने मेरे लिए लंच भी मंगवा लिया था। मैं उस दिन शाम के 7 बजे तक ऑफिस का सारा काम देखती रही। इसके अलावा मैंने ऑफिस की कैश बुक को भी अच्छी तरह से चैक कर लिया था। जिसमें मुझे कुछ गडबड लग रही थी। जिस कारण मैंने सारे बिलस् को भी क्राश चैक करने के बाद सब कुछ अपनी रिपोर्ट में लिख लिंया था। ऑफिस से फ्री होकर मैं बापिस लॉज में चली गई। मैं काफी थक गई थी इसलिए कुछ देर रेस्ट करने के बाद मैं करीब 9 बजे चैक ऑऊट करके लॉज से निकल गई।

सबसे पहले मैंने पास के ही एक रेस्टोरेंट में हल्का फुल्का डिनर लिया और फिर ऑटो लेकर बस स्टैंड जा पहुँची। मेरी बस रात के 10 बजे की थी, हाँलाकि बस ढूँडने में मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पडी। क्योंकि मैं उसी बस से सुबह इंदौर आई थी। बस के बाहर ही मुझे कंडक्टर मिल गया था। उसने मुझे बताया कि उसने मेरे लिए 5 कस्टमर बुक किए हैं। जो बस से भोपाल जा रहे हैं और एक कस्टमर तो अभी से मेरी सीट पर मेरा इंतजार कर रहा है। जिसके बाद कंडक्टर ने मुझे पैसे देते हुए कहा

कंडक्टर- मैडम पूरे 70 हजार हैं। 5 कस्टमर हैं और दो हम। सच कहूँ मैडम मजा आ गया आज तो आपके साथ। हमने इतनी सुंदर लड़की के साथ पहले कभी नहीं किया था और अभी तो आप और भी ज्यादा मस्त लग रही हो। बिल्कुल किसी हीरोईन की तरह।

कंडक्टर की बात सुनकर मैं थोडा हैरान होते हुए बोली

निशा- सुबह तो तुम्हारे पास पूरे पैसे नहीं थे। तो फिर अब कहाँ से इतने पैसे आ गए

मेरी बात सुनकर कंडक्टर बगलें झांकने लगा तो मैं बोली

निशा- सच सच बताओ…. मुझे झूठ बोलने बाले लोग बिल्कुल भी पसंद नहीं है। बैसे भी मैं इस महिने मैं 4-5 बार भोपाल से इंदौर आने बाली हूँ। अगर तुम झूठ बोलोगे तो मैं अगली बार किसी दूसरी बस से आऊंगी।

मेरी बात सुनकर वो कंडक्टर तुरंत बोला

कंडक्टर- अरे नहीं नहीं मैं बताता हूँ ना। असल में मैंने 10 हजार की जगह 15 हजार रुपये में बुकिंग की है तुम्हारी। तो तुम्हारे रेट के हिसाब से पैसे देने के बाद हमने अपने भी पैसे दे दिए, बो भी पूरे। बाकि 5 हजार बचे हैं बो भी आपको बापिस कर देंगे।

उस कंडक्टर की बात सुनकर मैं मुस्कुराते हुए बोली

निशा- नहीं उसकी कोई जरूरत नहीं है। मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि तुमने कितने पैसों में बुकिंग की है। मेरी बात जितने में तुमसे हुई है। मैं केबल उतने ही पैसे लूँगी। पर कई बार ज्यादा पैसे के बाद कस्टमर अलग अलग प्रकार की डिमांड भी करने लगते है। इसलिए तुम उनसे जितने पैसे लो, वो मुझे पहले ही बता दिया करो। ताकि मैं पहले से ही तैयार रहूँ।

मेरी बात सुनकर कंडक्टर खुश होते हुए बोला

कंडक्टर- हाँ हाँ मैं समझ गया। तो क्या वो 5 हजार रूपये अब तुम्हें नहीं चाहिए

निशा- नहीं वो तुम रखो। समझ लेना कि मेरा बस का किराया है।

इतना बोलकर मैंने उस कंडक्टर का मोबाईल नम्बर उससे लिया और फिर अपना नम्बर उसे बताकर मैं बस में चड गई। जब मैं अपनी केबिन में पहुँची तो वहाँ एक 50-55 साल का बूडा आदमी मेरा ही इंतजार कर रहा था। उसे तो उम्मीद ही नहीं थी कि इतनी कम उम्र की जवान और खूबसूरत लड़की आज उसे चोदने के लिए मिलेगी। उसकी हालत देखकर मैं मुस्कुराई और केबिन के अंदर जाकर मैंने केबिन का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। जिसके बाद मैंने अपने बैग से कंबल निकला कर बैग को एक साईड कोने में ऱखा और अपने सारे कपडे उतार दिए और कंबल ओड कर लेट गई। फिर मैं उस बुड्डे से बोली

निशा- कुछ करना भी है या केवल देखना है

मेरी बात सुनकर वो आदमी जैसे होश में आया। अभी बस चलने में काफी देर थी। इसलिए उसे कोई जल्दी नहीं थी। लेकिन मेरे बोलने पर वो थोडा जोश में आ गया था, इसलिए उसने भी जल्दी से अपने कपडे उतार दिए और मेरे साथ कंबल के अंदर आकर मेरे मजे लेने लगा। मैं चुपचाप लेटी उसे अपने जिस्म से खेलने दे रही थी। जब मुझे लगा कि यह आदमी कुछ ज्यादा ही समय ले रहा है। तो मैं कंबल के अंदर से ही नीचे की तरफ खिसक गई और उसका लण्ड मूँह में लेकर चूसने लगी।

उस बुड्डे को मेरी इस हरकत की उम्मीद नहीं थी। जिस कारण वो ज्यादा देर बरदास्त नहीं कर पाया और उसने मेरे मूँह के अंदर ही अपना पानी छोड दिया। जिसे मैं सारा निगल गई और चाट कर उसका लण्ड साफ कर दिया। जिसके बाद मैं बापिस अपनी जगह पर आते हुए बोली

निशा- क्या अंकल तुम तो बडी जल्दी ठण्डे पड गए

मेरी बात सुनकर वो बुड्डा थोडा झेंपते हुए बोला

बुड्डा- वो वो मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम यह सब करोगी। बैसे भी किसी ने पहली बार मेरा अपने मूँह में लेकर चूसा है, तो मैं कुछ ज्यादा ही एक्साईटेड हो गया था। अब दूसरे राउण्ड में देखना तुम, मैं क्या कमाल दिखाता हूँ।

उस बुड्डे की बात सुनकर मैं हंसते हुए बोली

निशा- सॉरी अंकल दूसरे राऊंड का मौका अब नहीं मिलेगा आपको। मेरे दूसरे कस्टमर भी आने बाले होंगे। बैसे भी आपने केबल एक ही राऊंड का पेमेंट किया है।

मेरी बात सुनकर वो बुड्ढा बोला

बुड्डा- अभी बस चलने में काफी देर है। बैसे भी पूरी रात पडी है बाकी कस्टमर के लिए। मैं तो इंदौर निकलते ही बस से उतर जाऊंगा। रही बात पैसों की दो मैं दे रहा हूँ ना दूसरे राऊँड का पैसा।

इतना बोलकर उस बुड्डे ने अपने पर्स से पैसे निकाल कर मुझे दे दिए। जिन्हें मैंने बिना गिने चुपचाप अपने पर्स में रख लिया और बोली

निशा- पर अंकल अभी तो आपको फिर से तैयार होने में समय लगेगा

मेरी बात सुनकर वो बुड्डा बोला

बुड्डा- तुम उसकी फिक्र मत करो। मुझे दुसरे राऊंड के लिए तैयार होने में ज्यादा समय नहीं लगता। बैसे भी वियग्रा खाकर आया हूँ। तो बस 5-10 मिनट में मैं फिर से तैयार हो जाऊँगा।

इतना बोलकर वो बुड्डा फिर से मेरे शरीर से छेडछाड करने लगा, और जैसा उसने कहा था बो सच में ही 5-10 मिनट में फिर से पूरी तरह से तैयार था। इस बार मैंने उसे मनमानी करने की पूरी छूट दे दी थी। जिस कारण जैसे ही बो तैयार हुआ तो मेरे ऊपर चड कर मेरी चुदाई शुरू कर दी। मैं चुपचाप आँखें बंद किये हुए उसका पूरा साथ दे रही थी। इस दौरान बस में बाकी सबारियाँ भी चड गई थी और बस स्टार्ट होकर भोपाल हाईवे की तरफ चल पडी थी। वो बुड्डा बाकई में खिलाडी था। क्योंकि वो काफी देर से मेरी चुदाई कर रहा था। पर इस बार उसने अभी तक अपना पानी नहीं छोडा था।

जब मैंने ध्यान दिया तो समझ में आया कि जैसे ही उस बुड्डे का पानी निकलने बाला होता है, वो कुछ देर के लिए रुक जाता है और चूमने और सहलाने के कुछ देर बाद वो दोबारा चुदाई शुरू कर देता है। जिस कारण उसकी टाईमिंग काफी ज्यादा लम्बी हो गई थी। मैं उस बुड्डे की इस टैक्निक से काफी इम्प्रैस थी और दिल्ली जाकर अपने पति अमन पर भी इस टैक्निक को आजमाने का मन ही मन फैसला कर चुकी थी। लेकिन इस बार वो अपने ऊपर कंट्रोल नहीं कर पाया और आखिरकार अपना सारा पानी मेरी चूत में छोड दिया। कुछ देर मेरे ऊपर यूँ पडे रहने के बाद बो मुझसे अलग हुआ और अपने कपडे पहनकर केबिन से बाहर निकल गया।

उस बुड्डे के जाने के कुछ देर बाद ही। एक दूसरा आदमी मेरे केबिन के अंदर आ गया। इस दूसरे आदमी ने ज्यादा समय बर्बाद ना करते हुए सीधे अपने कपडे उतारे और कुछ देर मुझे चूमने और सहलाने के बाद ही मेरी चुदाई शुरू कर दी। इसी तरह एक एक करके सभी लोग मुझे चोद चुके थे। अभी भोपाल आने में समय था। इसलिए उनमें से एक आदमी दूसरे राऊँड के लिए दोबारा मेरे पास आ गया, तो मैंने उससे भी दूसरे राऊँड के अलग से पैसे ले लिए। जिसके बाद उस आदमी ने दूसरे राऊँड में मेरी गाँड मारी।

जब तक बो दूसरे राऊँड में ठण्डा हुआ। तब तक हमारी बस भोपाल पहुँच चुकी थी। जिसके बाद भोपाल बस स्टैंड पर बस खाली होने के बाद कंडक्टर और ड्रायबर ने भी इस बार मेरी जम कर गाँड मारी। उन दोनों को खुश करने के बाद मैंने अपने कपडे पहने और बस से उतर कर ऑटो लेकर अपने होटल जा पहुँची। सुबह के करीब 3 बज रहे थे। इसलिए अपने रूम में पहुँचकर मैंने कपडे चेंज किए और पेन किलर खाकर सो गई।

अगले दिन से पूरा एक हफ्ता मैंने अपने दोस्तों के साथ घूमने फिरने और मस्ती करने में बिता दिऐ थे। भोपाल में अपने से 4-5 साल छोटे नये बने दोस्तों के साथ मैंने बहुत मस्ती की थी। इस दौरान मेरे और रवि के बीच भी सब कुछ नॉर्मल हो गया था। क्योंकि आखिरकार मुझे भी रवि पर दया आ गई थी। मेरे और रवि के बीच सब कुछ नॉर्मल होने के बाद भी मैंने अब तक उसे अपने साथ फिजीकल नहीं हो दिया था। पता नहीं क्यों पर जब से मैंने उसके पिता के साथ रात बिताई थी। उस दिन के बाद से मुझे रवि के साथ सेक्स करना ठीक नहीं लग रहा था।

इसलिए इस पूरे हफ्ते तक मैं सारा दिन दोस्तों के साथ मस्ती करती और रात को या तो असमल के बताए कस्टमर के पास जाती या फिर रघु की बाहों में अपनी रात रंगीन करती। मुझे अपनी यह लाईफ काफी अच्छी लग रही थी। मन कर रहा था कि सारी जिंदगी यूँ ही गुजार दूँ। इन कुछ दिनों में मेरे पास करीब 22 लाख और रूपये इकट्ठे हो गए थे। जिन्हें आज ही मैं अपने नये बैंक अकॉऊंट में जमा करके अपने दोस्तों के पास मस्ती करने चली गई थी।

शाम करीब 7 बजे जब मैं अपने होटल बापिस आई तभी मेरे पास हरीश अंकल का कॉल आया। उन्होंने बताया कि गगन के पिता जेल से भाग गए हैं और उनके समान में मेरा फोटो मिला है। हरीश अंकल की यह बात सुनकर तो मेरी बुरी तरह से फट गई थी। मुझे लगा कि पक्का अब मैं किसी नई मुसीबत में पडने बाली हूँ। इसलिए मैंने तय किया कि कल ही मैं यहाँ से दिल्ली बापिस निकल जाऊँगी। बैसे भी मेरे सारे काम अब खत्म हो चुके थे। रही बात मौज मस्ती की तो वो तो मैं दिल्ली में भी कर सकती थी।

हरीश अंकल का फोन कट होने के बाद मैं इस बारे में अभी सोच ही रही थी कि तभी मेरे पास एक अंजान नम्बर से कॉल आया। जब मैंने कॉल रिसीव की तो दूसरी तरफ से एक अनजान आदमी ने मुझे एक जरूरी इनफोर्मेशन देने के लिए पास के ही एक पार्क में बुलाया। मुझे लगा कि पार्क में इस समय काफी लोग होंगे, इसलिए अगर वो कोई गलत आदमी भी हुआ तो कम से कम इतने सारे लोगों के बीच मुझे कुछ नहीं करेगा। यही सब सोचकर मैंने उस आदमी से मिलने का फैसला कर लिया। इसलिए मैं जल्दी से अपने रूम की तरफ जाने लगी। ताकि अपना सामान वहाँ रखकर पार्क में उस अनजान आदमी से मिलने जा सकूँ।

कहानी जारी है.....
 
Update 036 -

मैं अपने रूम की तरफ जा ही रही थी कि तभी रास्ते में मुझे रघु मिल गया। तो मैं अपना सारा सामान और हैण्ड बैग उसे देकर बोली

निशा- यह मेरा सामना अपने पास रखो। मैं बापिस आकर तुमसे ले लूगी।

अब मेरे पास केवल मेरा मोबाईल और करीब 2 हजार रूपये कैश रह गए थे। जो मैंने अपनी जींस की पॉकेट में रखे हुए थे। मेरा पर्सनल मोबाईल और बाकी का सारा सामन मेरे हैंड बैग में था। जो मैंने रघू को दे दिया था। अपना सामान रघु को देने के बाद मैं होटल से बाहर निकल गई और पैदल ही उस पार्क की तरफ बड गई। करीब 10 मिनट बाद ही मैं उस पार्क के अंदर थी। इस वक्त पार्क पूरी तरह से खाली था। जिसे देखकर मेरी बुरी तरह फट गई थी।

मैं वहां से बापिस जाने ही बाली थी कि तभी अचानक से एक आदमी मेरे पीछे आया और उसने मेरे मूँह पर कपड़ा रख दिया। उस कपडे में से एक अजीब सी महक आ रही थी। इससे पहले मैं कुछ समझ पाती मेरी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा जिसके बाद मैं गहरी नींद में चली गई। जब मेरी आँख खुली तो मैं किसी खण्डहर में बंधी हुई जमीन पर पडी थी। मुझे आस पास कुछ लोगों की आवाजें आ रहीं थी। मैंने धीरे से अपनी आँखें खोली तो देखा वहाँ करीब 10-15 आदमी खडे हुए थे।

जिनमें से 3 लोगों को मैं तुरंत पहचान गई। उनमें से एक एम.पी. गवर्मेंट में मिनिस्टर प्रकाश राज था, दूसरा आदमी भोपाल के ए.पी. महेश वर्मा और तीसरा आदमी भोपाल का एक बड़ा बिजनेश मैन धनराज था। इन सभी के फोटो मैंने न्यूज पेपर में कई बार देखे थे। बाकी के सभी लोग मेरे लिए एकदम अंजान थे। जैसे ही मैं होश में आई तो मैं चीखते हुए बोली

निशा- क् कौन हो तुम लोग और मुझे यहाँ क्यों लाए हो।

मेरे चीखने से उन सभी की नजर मुझपर पडी, तो वे सभी लोग मेरे चारों तरफ खडे हो गए फिर उनमें से एक आदमी हंसते हुए बोला

“अच्छा तो तुम्हें होश आ गया”

इससे पहले बो कुछ और कहता खण्डहर के बाहर से तीन आदमी अंदर आये और बोले

“गनपत भाई इस लड़की के होटल रूम की अच्छी तरह से तलासी ली है। पर कुछ भी नहीं मिला“

गनपत वही आदमी था जो कुछ देर पहले मुझसे बात कर रहा था। उसका नाम सुनकर मैं उसे तुरंत पहचान गई। क्योंकि गगन के पिता का नाम भी गनपत था। इसलिए मुझे यकीन हो गया कि यह गगन के पिता गनपत ही हैं। उस आदमी की बात सुनकर गनपत गुस्से से बोला

गनपत- क्या बकवास कर रहे हो तुम। अगर माल इसके पास नहीं है तो फिर गया कहाँ

गनपत की बात सुनकर उसके पास में ही खड़ा एक दूसरा आदमी बोला

“अरे शांत हो जाओ गनपत, क्यों परेशान होते हो। ये लड़की है ना हमारे पास। यही बताऐगी कि हमारा माल कहाँ छिपा रखा है इसने“

गनपत- ठीक कहा जफर तूने, ये लडकी है ना… अब यही बताऐगी सब कुछ।

इतना बोलकर गनपत ने एक जोरदार लात मेरी गाँड पर मारी, जिस कारण मुझे तेज दर्द हुआ और मेरे मूँह से चीख निकल गई

निशा- आआआआआआहहहहहह

मेरे चीखने और मेरे दर्द की परवाह किए बिना गनपत गुस्से में बोला

गनपत- बता साली राण्ड….. कहाँ छिपा रखा है मेरा माल

गनपत की बात सुनकर मैं डरते हुए बोली

निशा- म माल….. कौन सा माल

गनपत- बही माल साली…. जो तूने मेरे बेटे गगन के घर से चुराया था

गनपत की बात सुनकर मैं अनजान बनने का नाटक करते हुए बोली

निशा- क् कौन गगन…. मैं किसी गगन को नहीं जानती

लेकिन उन लोगों को मेरी किसी भी बात पर यकीन नहीं हो रहा था। इसलिए जफर गुस्से में बोला

जफर- लगता है ये साली बहनचोद ऐसे मूँह नहीं खोलेगी। ऐ एस.पी. जरा दिखा इसे अपनी पुलिस का पॉवर

जफर की बात सुनकर एस.पी. महेश वर्मा मुस्कुराते हुए मेरे पास आए और अपने हाथ में पकडी छडी से एक के बाद एक मेरी गाँड पर मारने लगे। महेश इतनी जोर से मुझे मार रहा था, जिससे मुझे ऐसा लग रहा था कि कोई खौलता हुआ लवा मेरी गांड पर डाल रहा हो। दर्द के कारण मेरी हालत खराब हो गई थी और मेरी आँखों से आँशू भी निकलने लगे थे। मैं लगातार दर्द से चीख रही थी

आआआआआआहहहहहह

आआआआआआहहहहहह

आआआआआआहहहहहह

आआआआहहहह बचाओ

मेरी इस हालत पर उन सभी को हंसी आ रही थी। तभी गनपत बोला

गनपत- हाँ हाँ चीख साली बहनचोद जितना चीखना है चीख, तुझे बचाने ले लिए यहाँ कोई नहीं आने बाला। इस वक्त तम भोपाल से बाहर जंगल में बने एक खण्डहर में हो। यहाँ दूर दूर तक तेरी मदद करने के लिए कोई नहीं है।

तभी एक दूसरा आदमी मेरे पास आकर बोला

“वस अब रुक जाओ महेश वर्ना, ये लडकी कुछ बोलने लायक नहीं रहेगी“

उस आदमी की बात सुनकर ए.पी. महेश बोला

महेश- अरे कुछ नहीं होगा जेलर सहाब। ये साली राण्ड है इसे तो इतना दर्द सहने की आदत होगी

तभी मंत्री प्रकाश राज बोले

प्रकाश राज- योगेश सही कह रहा है महेश, रुक जाओ शायद इतनी मार के बाद यब सब सच बताने के लिए मान जाऐ।

मंत्री जी की बात सुनकर महेश तुरंत रुक गया, जिसके बाद गनपत मेरे पास नीचे जमीन पर बैठते हुए बोला

गनपत- अब तुझे याद आया गगन कौन है

मैं दर्द के कारण रोते हुए बोली

निशा- हाँ हाँ याद आया। एक दो बार दोस्तों के साथ मिली हूँ उससे

गनपत- तू उसके घऱ भी गई थी…. है ना

निशा- हाँ। लेकिन अपनी मर्जी से नहीं गई थी। गगन ने मुझे ड्रिंक में कुछ मिलाकर पिला दिया था। जिसके बाद मुझे कुछ होश नहीं रहा। जब होश आया तो मैं बिना कपडों के उसके साथ सो रही थी। इसलिए मैंने जल्दी से अपने कपडे पहने और वहाँ से भाग गई।

मेरी बात सुनकर गनपत बोला

गनपत- और साथ मैं मेरा माल लेकर भी भाग गई

मेरी हालत पूरी तरह से खराब हो चुकी थी, मेरा दिल कह रहा था कि उन्हें सब कुछ सच सच बता दूँ। पर मैं जानती थी कि सारा सच जानने के बाद वो लोग पक्का मुझे जान से मार देंगे, इसलिए मैं अपने आप को बचाने के लिए एक बार फिर अनजान बनने का नाटक करते हुए बोली

निशा- म माल कैसा माल…. मैं किसी माल के बारे में नहीं जानती

गनपत- झूठ बोल रही है तू। तूने ही मेरे बेटे के घर से बो दो बाक्स चुराए हैं।

निशा- मैं सच कह रही हूँ। मैंने गगन के घर पर कोई बाक्स नहीं देखे हैं

मेरी बात सुनकर गनपत ने एक जोरदार थप्पड मेरे गाल पर मारा, जिस कारण एक बार फिर मेरी चीख निकल गई

आआआआहहहहहह

निशा- मैं सच कह रही हूँ गनपत जी…. मुझे कुछ भी नहीं पता…. प्लीज मुझे जाने दो

गनपत मेरी बात पर ध्यान दिए बिना फिर से बोला

गनपत- कितनी तारीख को गई थी गगन के घर

निशा- त तीन नबम्बर की रात को

मेरी बात सुनकर जफर तुरंत बोला

जफर- उसी दिन तो माल आया था गनपत

जफर की बात सुनने के बाद गनपत गुस्से में मुझे घूरते हुए बोला

गनपत- कितने बजे गई थी उसके साथ

निशा- रात को 8 बजे मैं और गगन एक बियरबॉर में मिले थे। जिसके बाद वो मुझे अपनी कार में ले गया था। उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं है। पर रात करीब 1 बजे के आस पास मुझे होश आया था। उस वक्त गगन मेरे बगल में ही सो रहा था। मैं बहुत डर गई थी। इसलिए मैं बिना उसे कुझ कहे वहां से भाग गई

मेरी बात सुनकर जफर थोडा चौंकते हुए बोला

जफर- तुम सच कह रही हो ना कि रात को 1 बजे तुम और गगन दोनों ही उसके घर पर थे

जफर की बात सुनकर मैं तुरंत बोली

निशा- हाँ मैं सच कह रही हूँ।

मेरा जबाब सुनकर जफर थोडा परेशान होते हुए बोला

जफर- तो फिर वो कौन था जो हमारा माल लेने आया था।

निशा- मुझे नहीं पता और तुम लोग किस माल की बात कर रहे हो। मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है।

मेरी बात सुनकर धनराज गुस्से से पागल होते हुए बोला

धनराज- हमारा करोडों का सोना और हीरों की बात कर रहे हैं हम। मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि हम इस लड़की से इतने प्यार से बात क्यों कर रहे हैं। साली को मारो तब जाकर सच बोलेगी

धनराज की बात सुनकर सभी लोग एक साथ मुझे लातों और डण्डों से मारने लगे। मेरे नाक से और मूँह से खून निकलने लगा था। तभी किसी ने मेरे पेट में एक लात मारी। एक दो दिन में ही मेरे पीरियड शुरू होने बाले थे। लेकिन इतनी पिटाई और दर्द के कारण उसी वक्त मेरे पीरियड शुरू हो गया। जिस कारण मेरी चूत से भी खून रिसने लगा था। मैं लगातार दर्द से चीख रही थी। पर किसी पर कोई फर्क नहीं पड रहा था और ना ही किसी को मुझ पर दया आ रही थी।

कुछ ही देर तक यूँ ही मार खाते खाते दर्द के कारण मैं बेहोश हो गई और जब मुझे दोबारा होश आया तो उस खण्डहर के कमरे में मेरे अलावा गनपत, जफर, मंत्री प्रकाश राज, एस.पी. महेश, जेलर योगेश और विजनेश मैन धनराज मौजूद थे। वो आपस में बातें कर रहे थे। दर्द के कारण मेरा बुरा हाल था। पर मैं अपने दर्द को किसी तरह बरदास्त कर चुपचाप उनकी बातें सुनने की कोशिश करने लगी। क्योंकि मैं जानती थी कि अगर उन्हें पता चल गया कि मुझे होश आ गया है, तो एक बार फिर वो मुझे टार्चर करना शुरू कर देंगे।

मुझे इस वक्त समय का कोई अंदाजा नहीं था पर उस कमरे से बाहर आती रोशनी से मैंने अंदाजा लगाया की शायद दोपहर होने बाली है। इसका मतलब था कि मैं सारी से रात वहाँ बेहोश पडी हुई थी। तभी एस.पी. महेश बोला

महेश- लगता है यह लड़की सच में कुछ नहीं जानती। बर्ना इतनी मार खाने के बाद तो मुर्दे भी बोलने लगते हैं।

जफर- तो फिर हमारा माल आखिर गया कहाँ

प्रकाश राज- शायद हमारा कोई दुशमन ले गया हो

गनपत- इस शहर में हमारा ऐसा कौन सा दुशमन पैदा हो गया जो हमारे माल को उठाने की हिम्मत कर सके

योगेश- क्या पता तुम्हारा ही कोई आदमी हो, बैसे भी माल कब और कहाँ आने बाला है यह बात केवल जफर और तेरा बेटा गगन जानता था

जेलर योगेश की बात सुनकर गनपत गुस्से से चीखता हुआ बोला

गनपत- क्या बकवास कर रहा है जेलर। तेरा मतलब है कि मैं और जफर तुम लोगों से झूठ बोल रहे हैं और हमने ही अपना माल कहीं गायव करवा दिया

प्रकाश राज- अरे गनपत योगेश का कहने का मतलब वो नहीं है। वो तो बस इतना बोल रहा है कि तुम्हारी गैंग में कोई गद्दार भी तो हो सकता है।

गनपत- मेरे सारे आदमी सालों से मेरे बफादार हैं। वो मेरे साथ धोखा नहीं कर सकते

प्रकाश राज- पैसा अच्छे अच्छों का ईमान खराब कर सकता है। बैसे भी तुम इतने सालों से जेल में हो और तेरा बेटा भी तेरी ही तरह अय्याशी में लगा रहता था। क्या पता गैंग के किसी आदमी को नशे की हालत में सब बक दिया हो।

मंत्री प्रकाश राज की बात सुनकर गनपत खामोश रहा। शायद उसे भी मंत्री की बात सही लग रही थी। तभी जफऱ बोला

जफर- अगर हमारे ही किसी आदमी ने गद्दारी की है तो फिर उसका जिंदा रहना हमारे लिए ठीक नहीं है। क्योंकि कोई नहीं जानता की हम सब पाटनर्स हैं। मेरे और गनपत के अलाबा बाकी किसी का कोई भी क्रिमनल रिकार्ड भी नहीं है। महेश और योगेश तो पहले से ही पुलिस डिपार्टमेंट में काम करते हैं। अगर उस गद्दार ने हमारा राज खोल दिया तो फिर सब खत्म समझो

गनपत- शायद तुम सही कह रहे हो। अगर कोई गद्दार है तो हम उसका पता लगा ही लेंगे।

धनराज- हाँ हाँ ठीक है पता करते रहना। पहले यह बताओ कि हमारा बाकी माल कहाँ है। कहीं इस माल की तरह वो भी तो किसी गद्दार के हाथ ना लग गया हो। अगर उसके बारे में किसी को पता चल गया, तो फिर हम सबकी हालत भिखारियों जैसी हो जाऐगी।

धनराज की बात सुनकर गनपत उसे समझाते हुए बोला

गनपत- तुम उसकी चिंता मत करो। हमारा बाकी का सारा माल पूरी तरह से सुरक्षित है।

धनराज- पर वो आखिर है कहाँ

गनपत- वो मैं किसी को नहीं बता सकता। अब मुझे किसी पर भी यकीन नहीं है। बस इतना समझ लो कि बो मेरी नजरों के सामने ही है।

योगेश- देखो गनपत अब हम लोग और लफडे में नहीं पडना चाहते। बैसे भी तुम्हारे जेल से भागने के कारण मुझ पर भी इन्क्वारी चल रही है।

गनपत- जेलर यह तेरी प्राब्लम है। बैसे भी मुझे जेल से भगाकर तूने कोई एहसान नहीं किया है। तू और एस.पी. केवल इसीलिए हमारे पार्टनर है, ताकि पुलिस बगैरह के लफडे से हमें बचा सकें और अगर हम में से कोई पकडा जाऐ तो जेल में हमारा पूरा ध्यान रखा जाऐ। बैसे भी वो सारा माल हमने इकट्ठा किया था।

गनपत की बात सुनकर जेलर योगेश गुस्से से बिफरता हुआ बोला

योगेश- तुम कहना क्या चाहते हो… तुम्हारा मतलब है कि उस माल में मेरा कोई हिस्सा नहीं है।

योगेश की बात सुनकर जफर उसे समझाते हुए बोला

जफर- गनपत का ऐसा कोई मतलब नहीं है

योगेश- तो फिर हमारा हिस्सा हमें दे दो। हम अब और यह सब नहीं कर सकते

गनपत- ओह तो अब तुम्हें अपना हिस्सा याद आने लगा, जेलर मैं तेरा और एस.पी. का प्लान अच्छी तरह समझ रहा हूँ। तुम लोग अपना हिस्सा लेकर मेरा इन्काऊंटर करवाना चाहते हो। पर मैं तुम्हारा प्लान कभी कामयाब नहीं होने दूँगा। अगर मुझे कुछ हुआ तो तुम सबका हिस्सा भी मेरे साथ हमेशा हमेशा के लिए चला जाऐगा। इसलिए अपना हिस्सा माँगने की जगह मुझे इस देश से बाहर निकालने के बारे में सोचो

प्रकाश राज- अरे यार तुम लोग आपस में झगड क्यों रहे हो और गनपत मैं गारंटी लेता हूँ कि कोई तुम्हारा इन्काऊंटर नहीं करेगा।

गनपत- मैं कुछ नहीं जानता। अगर अपना अपना हिस्सा चाहिए तो पहले मेरा विदेश जाने का इंतजाम करो। उसके बाद ही मैं सबको उनका हिस्सा दूँगा

गनपत की बात सुनकर जफर भी उसकी हाँ में हाँ मिलाता हुआ बोला

जफर- गनपत सही कह रहा है। अब हम दोनों को तुम लोगों पर कोई भरोसा नहीं है। बैसे भी दुनिया की नजर में हम दोनों की क्रिमनल हैं। अगर हमें कुछ हो गया तो किसी को कोई फर्क नहीं पडेगा, उल्टा तुम लोगों को इनाम मिलेगा। इसलिए पहले हमारे विदेश जाने के लिए नये नाम और पहचान के साथ बीजा और पासपोर्ट की जुगाड करो। विदेश में सेटल होने के 1 साल बाद हम फिर से इक्ट्ठे होंगे। तब हम सारा माल आपस में बांटकर अपने अपने रास्ते अलग कर लेंगे।

धनराज- हम तुम पर कैसे यकीन कर लें कि विदेश जाने के बाद तुम हमें हमारा हिस्सा दे दोगे

गनपत- बेबकूफ आदमी, माल तो यहीं भोपाल मैं है ना। उसे लेने तो हमें यहाँ आना ही पडेगा। बैसे भी इतना सारा सोना और हीरे हम अपने साथ नहीं ले जा सकते। हमारा जो माल गायब हुआ है, वो तो बस 20 पससेंट है। वाकि का 80 परसेंट माल अब भी हमारे पास सुरक्षित है। बैसे भी तब तक हम अपने बीच छिपे उस गद्दार का पता भी लगा लेंगे।

प्रकाश राज- मुझे लगता है कि जफर और गनपत ठीक कह रहे हैं। धनराज तुम इनके नये नाम और पहचान के लिए डॉक्यूमेंट तैयार करवा दो। मैं इनके बीजा और पासपोर्ट का काम देख लूँगा। रहा यहाँ से सुरक्षित जाने और बापिस आने का मामला तो वो महेश और येगेश देख लेंगे।

मंत्री जी की बात सुनकर वहाँ कुछ देर के लिए खामोशी छा गई।

कहानी जारी है ....
 
Update 037 -

कुछ देर की खमोशी के बाद जेलर योगेश कुछ सोचते हुए बोला

येगेश- ठीक है….. मुझे मंजूर है। लेकिन अब इस लड़की का क्या करें

प्रकाश राज- मार देते हैं साली को। बैसे भी यह हमारे अब किसी काम की नहीं है।

गनपत- नहीं पहले मैं इसके पूरे मजे लूँगा, उसके बाद तुम लोगों को इसके साथ जो करना है करते रहना

गनपत की बात सुनकर धनराज चिढते हुए बोला

धनराज- ये फिर शूरू हो गया

धनराज की बात सुनकर एस.पी. महेश गनपत को समझाते हुए बोला

महेश- गनपत मुझे जानकारी मिली है कि ये लड़की डी.जी.पी. सर के सीधे कॉन्टेक्ट में है। इसलिए हमें कोई रिस्क नहीं लेना चाहिए। कहीं यह कोई सीक्रेट ऐजेंट हुई तो।

गनपत- तो क्या कर लेगी। बैसे भी इसकी हालत तो देखो। यह कुछ भी करने की हालत में है क्या

महेश- तुझे और भी कई लडकियाँ मिल जाऐंगी। उनके साथ जी भरकर मजे कर लेना। बैसे भी इसकी हालत नहीं है तुझे बरदास्त करने की

गनपत- मुझे इससे कोई फर्क नहीं पडता। मेरी नजर में तो यह एक दम टंच माल है। मैं इसे नहीं छोडने बाला, बैसे भी यह लडकी मेरे बेटे गगन के मौत की जिम्मेदार है। तो फिर इसे सजा देना तो बनता है। अब अगर तुम भी इसके साथ मजे करना चाहते हो तो रुको, बर्ना यहाँ से जा सकते हो। मजे लेने के बाद मैं इसे ठिकाने लगा दूँगा

गनपत की बात सुनकर जफर भी अपनी लार टपकाता हुआ बोला

जफर- भाई माल तो है यह लडकी। मैं क्या सोच रहा हूँ कि क्यों ना मैं भी वहती गंगा में हाथ धो लूँ

जफर और गनपत की बातें सुनकर मंत्री जी भी उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए बोले

प्रकाश राज- अरे भई अब जब सबका मन मजे करने का है ही, तो फिर मिलकर मजे करते हैं। देखते हैं कि यह लडकी कब तक हमें बरदास्त कर सकती है।

गनपत- यह भी तुमने ठीक कहा मंत्री जी। आज हम इसे इतना चोदेंगे की ये अपने आप ही मर जाए। बैसे भी यहाँ हम लोगों के अलाबा हमारे कुछ आदमी भी तो हैं यहाँ। वो भी तो मजा लेंगे ना।

गनपत की बात सुनकर सभी लोग जोर जोर से हंसने लगे। इस वक्त उनकी हंसी मुझे बहुत डरावनी लग रही थी। बैसे भी दर्द के कारण मेरा पहले ही बुरा हाल था। क्योंकि इन लोगों ने जानवरों की तरह मुझे मारा था। ऊपर से ये सब मिलकर मेरी इस हालत में भी मेरा रेप भी करना चाहते थे। जिसके बारे में सोचकर ही मेरा पूरा शरीऱ पशीने से भीग गया था। तभी अचानक मेरा मोबाईल रिंग होने लगा।जिसकी आवाज सुनकर सभी लोग मेरी तरफ देखने लगे। सबको यूँ मुझे घूरते देखकर मैं बुरी तरह डर से काँपने लगी।

वो लोग मेरे पास आये और एस.पी. ने मेरे जींस की पॉकेट से मेरा मोबाईल निकालकर देखा तो उसमें हरीश अंकल की कॉल आ रही थी। जिसे देखकर एस.पी. बुरी तरह से डरते हुए बोला

महेश- य ये ये तो ड ड डी.जी.पी. सर की कॉल है। मैंने तो पहले ही कहा था कि ये लड़की सीधे उनके कान्टेक्ट में है। अगर उन्हें शक हो गया और इसका मोबाईल ट्रेक करके वो यहाँ आ गए तो

गनपत- अबे एस.पी. मुझे समझ में नहीं आता कि तू आखिर एस.पी. कैसे बन गया। अबे मोबाईल ट्रेक तो तब होगा ना जब कोई कॉल रिसीब होगी।

इतना बोलकर गनपत ने एस.पी. के हाथ से मेरा मोबाईल लेकर जमीन पर पटक दिया और अपने जूते से मसलने हुए बोला

गनपत- लो हो गया इस लड़की के मोबाईल का खेल खत्म। अब इस लड़की की बारी है

इतना बोलकर वो मुझे खोलने लगा तो मैं डर के कारण चीखते हुए बोली

निशा- न नहींहीहीहीं नहीं छ छोड दो मुझे......... म मैं किसी से कुछ भी नहीं कहूँगी...... प्लीज मुझे जाने दो।

पर किसी पर भी मेरे गिडगिडाने का कोई असर नहीं हो रहा था। जैसे ही गनपत ने मेरे हाथों और पैरों की रस्सियाँ खोली। पता नहीं कहाँ से मुझ में ताकत आ गई और मैं अपना सारा दर्द भूलकर उसे धक्का देकर वहाँ से भागने लगी। मुझे यूँ भगता देखकर मंत्री जी ने मुझे पकडने की कोशिश की, तभी मेरे टॉप का एक हिस्सा उनके हाथों में आ गया था। जिस कारण मेरे भागने की बजह से मेरा टॉप चररररर की आबाज के साथ फट कर उनके हाथ में आ गया।

अब मेरे शरीर के ऊपरी हिस्से पर मात्र ब्रा रह गई थी। टॉप फटने के बजह से मेरे शरीर का काफी ज्यादा हिस्सा दिखाई दे रहा था जो उन लोगों की मार-पीट की बजह से हरा नीला पड गया था। पर मेरे पास अभी अपने शरीर की हालत देखने का बिल्कुल भी समय नहीं था। मैं बस किसी भी तरह उन लोगों से बहुत दूर भाग जाना चाहती थी।

पर यहाँ भी मेरी किस्मत मुझे धोखा दे गई। क्योंकी उस कमरे के बाहर उन लोगों के कई सारे आदमी खडे हुए थे। जिस कारण मैं जैसे ही बाहर की तरफ भागी उन लगों ने रास्ता बंद कर लिया। तब तक गनपत और बाकी लोग भी मरे पास आ गए थे। तभी गनपत ने मेरे बालों को पकडा और मेरे गाल पर एक जोरदार उस थप्पड मारा

चचटटटटाटाटाटाक

उस थप्पड की आबाज काफी तेज थी। थप्पड पडने से मेरे मूँह से खून भी निकल आया था। पर गनपत को मुझ पर बिल्कुल भी दया नहीं आई। वो मेरे बालों को पकडे हुए मुझे खींच कर अंदर ले आया और मुझे धक्का देकर जमीन पर पटक दिया। मैं उसके इरादे अच्छी तरह समझ गई थी, इसलिए मैं उसके सामने गिडगिडाते हुए बोली

निशा- न नहीं प्लीज छोड दो मुझे

लेकिन मेरे गिडगिडाने का उन लोगों पर कोई असर नहीं हुआ। उल्टा बो सभी मुझ पर हंसने लगे थे। तभी गनपत ने अपनी जेव से एक चाकू निकाला और घुटनों के बल मेरे पास बैठकर अपने चाकू को मेरी ब्रा के ऊपर हल्के से चालाने लगा। मैं लगातार चीख रही थी पर उनपर कोई असर नहीं हो रहा था। बो तो सभी लोग मेरे साथ खिलबाड कर रहे थे

निशा- नहीं नहीं छोडो मुझे

गनपत- ऐसे कैसे छोड दें मेरी जान, अभी तो हमने कुछ किया ही नहीं। बैसे तेरे मम्मे बडे मस्त हैं। इन्हें कैद क्यों कर रखा है साली

जफर- तू है ना आजाद करने के लिए। कर दे आजाद…. जरा हम भी तो देखें कैसे हैं इसके मम्मे

जफऱ की बात सुनकर गनपत ने मेरी ब्रा के स्ट्रिप नें चाकू फंसाया और एक झटके में मेरी ब्रा की स्ट्रिप काट दी और फिर अगले ही पल उसने दूसरी स्ट्रिप भी काट दी थी। जिसके बाद वो चाकू को मेरे दोनों बूब्स के बीच में रखकर मेरी ब्रा को काटने लगा। उसका चाकू काफी ज्यादा धारदार था। जिस कारण थोडा सा हिलने पर मेरे दाऐं बूब्स में एक कट लग गया था। जिससे मुझे काफी तेज दर्द हुआ और मैं चीख पडी। मेरे चीखने पर गनपत हंसते हुए बोला

गनपत- देख साली ज्यादा नखऱे कर रही थी ना। अब देख तेरे मम्मे पर कट लग गया ना। अब दूसरे पर भी कट लगाना पडेगा। वर्ना एक साईड अच्छा नहीं लगेगा

गनपत की बात सुनकर तो मेरे होश ही उड गए थे। मैं डर के कारण चीखते हुए बोली

निशा- नहीं नहीं नहीं प्लीज मत करो आआआआहहहहहहहह

गनपत पर मेरे रोने धोने का कोई असर नहीं पडा और उसने मेरे दूसरे बूब्स पर भी कट लगा दिया। जिसके बाद उसने मेरी ब्रा पूरी तरह से काटकर मेरे सीने से अलग कर दी। अब मैं ऊपर से पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी। गनपत बेरहमी से मेरे बूब्स को मसलते हुए बोला

गनपत- बडे मस्त मम्मे हैं इसके। माँ कसम आज तो मजा ही आ गया

प्रकाश राज- अब ज्यादा समय क्यों खराब कर रहा है। जल्दी से इसके बाकी के कपडे भी निकाल। हम भी तो देखें इस साली ने कपडों के अंदर कौन सा खजाना छिपा रखा है।

मंत्री की बात सुनकर गनपत अपने चाकू को मेरे पेट पर फेराते हुए मेरी कमर तक ले आया। जैसे ही वो मेरे जींस का बटन खोलने लगा तो मैंने अपने हाथों से उसे रोकते हुए कहा

निशा- प्लीज मत निकालो इसे। मेरे पीरिय़ड शुरू हो गए हैं।

मेरी बात सुनकर सभी लोग हंसने लगे। क्योंकि वे लोग मेरे जींस पर मेरी गाँड और चूत के पास लगे खून को पहले ही देख चुके थे। कुछ देर हंसने के बाद गनपत बोला

गनपत- साली बहनचोद राण्ड…. तेरे पीरियड से हमें क्या हमें तो तेरी चूत में लण्ड घुसाने से मतलब है।

इतना बोलकर गनपत जबरदस्ती मेरा जींस उतारने लगा। जब मैंने उसे रोकने की कोशिश की तो मंत्री प्रकाश राज और जफर ने मेरे हाथ पकड लिए। जिसके बाद गनपत ने मुझे जबरदस्ती पूरी तरह से नंगा कर दिया। मेरे सारे कपडे उतारने के बाद मंत्री और जफर ने मुझे छोड दिया। पर गनपत मेरी कमर के पास ही बैठा रहा और मेरे पूरे शरीर को बासना भरी नजर से देखने लगा। मैंने अपने हाथों से अपने शरीर को छुपाने की कोशिश की, पर कोई फायदा नहीं था।

हालाँकि में पहले ही कई मर्दों के साथ सेक्स कर चुकी थी और उनके सामने अपने सारे कपडे उतारकर नंगी भी हो चुकी थी। पर वो सब मैंने अपनी मर्जी से किया था। अब तक किसी ने जबरदस्ती मेरे साथ यह सब नहीं किया था। बैसे भी पीरियड के दौरान लडकियाँ कुछ ज्यादा ही सेंसटिव हो जाती हैं और अपने प्रायवेट पार्टस को किसी को दिखाने में उन्हें बहुत ज्यादा शर्म महसूस होती है।

पिछले 20-22 दिनों से मैं एक कॉलगर्ल की जिंदगी जी रही थी। इस दौरान मुझे कभी भी इतनी शर्म महसूस नहीं हूई थी, जितनी आज हो रही थी और ना ही आज तक किसी ने मुझ इस तरह ह्यूमिलेट किया था। मेरे शरीर को वासना भरी नजर से देखने के बाद गनपत ने अपने कपडे उतारने शूरू कर दिए। मैं उसके सामने हाथ जोडकर गिडगिडाती रही पर उसपर कोई असर नहीं हुआ। वो अपने कपडे उतार कर मेरे ऊपर सबार हो गया और बेरहमी से मेरे बुब्स को मसलने लगा।

साथ ही साथ वो मेरे गालों पर और गर्दन पर काट भी रहा था। जिस कारण मुझे बहुत दर्द हो रहा था। मेरे आँखों से आँशू निकल रहे थे। पर मुझे दर्द में तडपते देखकर उन लोगों को मजा आ रहा था। अचानक से गनपत ने मेरे होंठों को चूमना और काटना शूरू कर दिया जिस कराण मेरी आवाज मेरे गले के अंदर ही घुटकर रह गई। ठीक तभी उसने अपना किसी जानबर जैसा बड़ा और मोटा लण्ड मेरी चूत में घुसा दिया।

पीरियड शूरू होने के कारण मेरी चूत में से पहले से ही खून रिश रहा था और उसमें हल्की सी सूजन भी आ गई थी। गनपत के मोटे और बडे लण्ड के अंदर जाने से मेरी चूत अंदर से बुरी तरह फट गई। जिस कारण मुझे अपनी चूत में बहुत तेज दर्द महसूस होने लगा था। पर मैं चीख भी नहीं पा रही थी। मेरी चूत से और भी तेजी से खून निकलने लगा था। मैं उस जनबर के नीचे दर्द के कारण बुरी तरह तडप रही थी और उससे छूटने की कोशिश कर रही थी। पर मेरी सारी कोशिश बेकार जा रहीं थी।

गनपत ने मेरी चूत में अपना लण्ड घुसाते ही मेरी चुदाई शुरू कर दी थी। आज पहली बार मुझे चुदाई करवाने में बिल्कुल भी मजा नहीं आ रहा था। बल्कि मुझे इस सबसे नफरत हो रही थी। पर किसी को भी मेरी इस फीलिंग से कोई फर्क नहीं पड रहा था। गनपत किसी जानबर की तरह मुझे लगातार चोद रहा था और बाकी सब मुझे तडपता हुआ देखकर मेरे मजे ले रहे थे। गनपत काफी देर तक मुझे यूं ही जानबरों की तरह चोदता रहा और फिर वो मेरी चूत में ही ठण्डा हो गया।

गनपत के अलग होते ही जफर भी मुझपर किसी भूखे भेडिए की तरह टूट पडा। मैं रोती गिडगिडाती रही पर किसी पर भी कोई फर्क नहीं पडा और सभी लोग एक एक कर के जानबरों की तरह मुझे नोचते रहे। जब वो सभी लोग मेरा मजा लूट चुके तो मुझे छोड कर अलग हो गए और अपने अपने कपडे पहनने लगे। मेरे पूरे शरीर में तेज दर्द हो रहा था और मुझे अपनी कमर से नीचे का हिस्सा अब बिल्कुल भी महसूस नहीं हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मेरे कमर के नीचे का हिस्सा है ही नहीं।

उनके अलग होते ही मैंने हिम्मत करके खडे होने की कोशिश की, लेकिन दर्द के कारण मैं खडी नहीं हो पा रही थी। वो लोग मुझे ऐसा करते देख हंसने लगे। जिस कारण मुझे उनकी हंसी अब और भी ज्यादा भयानक लग रही थी। जब कई बार कोशिश करने के बाद भी मैं खडी नहीं हो पाई, तो मैं जैसे तैसे घुटनों के बल होकर किसी कुतिया की तरह चलते हुए बाहर जाने की कोशिश करने लगी। मैं बस किसी भी तरह उन सबसे दूर भागना चाहती थी। मुझे यह भी होश नहीं था कि इस वक्त मेरे शरीर पर कपडे का एक रेशा तक मौजूद नहीं है।

मुझे ऐसे बाहर जाते देख एस.पी. बोला

महेश- इस लड़की में अब भी इतनी जान बची है कि ये यहाँ से भागने की कोशिश कर रही है

योगेश- अरे जायेगी कहाँ…. बाहर भी तो हमारे ही आदमी खडे हैं। उन्हें भी मजे करने दो। देखते हैं है ये कब तक और बरदास्त कर पाती है।

अब मुझे उनकी किसी भी बात से कोई मतलब नहीं था और ना ही किसी बात का कोई डर मेरे अंदर रह गया था। इतना दर्द और यातना झेलने के बाद मुझे अपनी मौत अपनी आँखों के सामने दिखने लगी थी। मैं मन ही मन उस दिन को कोश रही थी। जिस दिन मैंने अपना काम खत्म होने के बाद भी यहाँ भोपाल में रुकने का फैसला किया था और उस दिन को भी जिस दिन मैंने गगन से उलझने की भूल की थी।

मैं ना तो यहाँ भोपाल में रुकने का फैसला करती, ना कभी मेरी गगन से मुलाकात होती और ना ही आज मेरी यह हालत होती। पर अब कुछ नहीं हो सकता था। ऐसा नहीं था कि मेरे अंदर पैसों का लालच था, जिस कारण मैंने उस सोने और हीरों के बारे में इन सब को नहीं बताया। बल्कि मैं यह बात अच्छी तरह जानती थी कि अगर मैं सब सच बता भी देती, तो भी ये लोग मेरे साथ यह सब करते।

कहानी जारी है..........
 
Update 038 -

इतना सब होने के बाद भी मैं जीना चाहती थी। इसलिए मैं जैसे तैसे उस कमरे से बाहर निकली। कमरे के बाहर खण्डहर के आँगन में करीब 15-16 आदमी खडे हुए थे। मुझे इस हालत में देखते ही वो मेरे चारों तरफ इकट्ठा हो गए। तभी अंदर से बाकी लोग भी बाहर आ गए। बाहर खडे सभी लोग बासना भरी नजर से मुझे घूरे जा रहे थे। पर मैं उन सबकी परवाह किये बिना किसी कुतिया की तरह चलती हुई उस खण्डहर से बाहर की तरफ जा रही थी तभी मुझे गनपत की आवाज सुनाई दी

गनपत- अरे तमाशा क्या देख रहे हो। ये कुतिया तुम सबके सामने है मजे करो

गनपत की आवाज सुनते ही वो लोग कुत्तों की तरह मुझे चोदने के लिए आपस में झगडने लगे। इसी बीच एक आदमी ने मेरी पीठ पर अपना एक पैर रख दिया। मुझमें अब इतनी भी ताकत नहीं थी कि मैं उसके पैर को हटा सकूँ और आगे बड सकूं। तभी एक दूसरा आदमी मेरे ठीक पीछे आकर घुठनो के बल बैठ गया और फिर उसने अपना पैंट खोलकर अपना लण्ड मेरी चूत में घुसा दिया। जैसे ही उसका लण्ड मेरी चूत में गया तो मेरे मूँह से चीख निकल गई।

आआआआहहहहहहह

पर मेरी चीख से किसी को कोई फर्क नहीं पडा। उल्टे बाकी के लोग अपस में लडना छोडकर मुझपर हंसने लगे। जो आदमी मेरी चुदाई कर रहा था उसने मजबूती के साथ मेरी कमर को अपने दोनों हाथों से पकडा हुआ था। कुछ देर चुदाई करने के बाद वो अपने हाथों से मेरी गाँड पर थप्पड मारने लगा। जिस कारण लगातार मेरी चीखें निकलने लगी। मेरी दर्द भरी चीखें सुनकर उन सबको सुकून मिल रहा था।

उस आदमी के हटने ही दूसरा शूरू हो गया। मैं समझ गई कि ये सभी अब मुझे यूँ ही छोडने बाले नहीं हैं। धीरे धीरे मेरी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा था और मुझे अपनी मौत साफ साफ नजर आ रही थी। दर्द थकान और कमजोरी के कारण मेरे हाथ पैर बुरी तरह से काँप रहे थे। जिस कराण मैंने अपने हालातों से समझोता करते हुए अपने दोनों हाथ जमीन पर रख दिए और उनके ऊपर अपना सिर रख कर अपनी धीमी लेकिन दर्दनाक मौत का इंतजार करने लगी।

एक के बाद एक आदमी मेरे पीछे आकर मुझे चोदते रहे। कोई मेरी चूत मारता तो कोई मेरी गांड में अपना लण्ड घुसा कर मजे लेता। इस बीच दर्द के कारण मैं बेहोश हो गई। पर मेरे बेहोश होने के बाद भी वो लोग नहीं रुके। जब मुझे होश आया तो रात हो चुकी थी। मुझे नहीं पता कि अब तक कितने लोग मुझे चोद चुके थे और कितने बाकी थे और ना ही समय का अब मुझे कोई अंदाजा था। मैं अब बस इस सबसे छुटकारा चाहती थी।

जब सभी लोगों का मन मुझसे भर गया तो वो मुझे छोडकर अलग हो गए। मैं वहां जमीन पर किसी बेजान लाश की तरह पडी रही। कुछ देर बाद वहाँ गनपत और बाकी लोग भी आ गए। शायद वो लोग मुझे अपने आदमियों के हवाले करके किसी दूसरे काम के लिए चले गए थे। जब वो बापिस आये तो मैं जमीन पर किसी मुर्दे की तरह पडी हुई थी। उन्हें लगा कि शायद मैं मर गई हूँ। इसलिए जफऱ बोला

जफर- अरे मूर्खों इस लाश को ठिकाने क्यों नहीं लगाया अब तक

जफऱ की बात सुनकर उन लोगों में से एक बोला

“बॉस ये लड़की अभी जिंदा है”

उस आदमी की बात सुनकर गनपत हैरान होते हुए बोला

गनपत- क्या अभी तक जिंदा है। कमाल है… यह लडकी तुम सबको भी झेल गई। बडी सख्त जान है यह तो…..

महेश- गनपत अब और कोई तमाशा मत करो और जल्दी से इसे ठिकाने लगा दो

गनपत- ऐसे कैसे ठिकाने लगा दूँ। तुमने देखा नहीं कि इतनी मार खाने और हम सबको बरदास्त करने के बाद भी यह जिंदा है। मतलब कि ये जीना चाहती है। कम से कम इसे जीने का एक मौका तो मिलना ही चाहिए। क्यों दोस्तों क्या कहते हो

गनपत की बात सुनकर जफर बोला

जफर- हाँ सही कहा गनपत तूने

इतना बोलकर जफर मेरे आया और मेरी गाँड पर एक जोरदार लात मारते हुए बोला

जफर- सुन वे बहनचोद राण्ड… जा तू आजाद है। तेरे पास पूरे 10 मिनट हैं। इस खण्डहर से बाहर जाने के लिए, अगर 10 मिनट के अंदर तू इस खण्डहर से बाहर निकल गई तो फिर हम तुम्हें कुछ भी नहीं करें। लेकिन अगर तू 10 मिनट के अंदर इस खण्डहर से बाहर नहीं निकल पाई, तो तेरी मौत पक्की

जफर की बात सुनकर जैसे मेरे अंदर जान आ गई थी। मुझे जिंदा बचने की एक उम्मीद दिखने लगी थी। इसलिए मैं अपनी बची कुची ताकत इकट्ठा करके उठने की कोशिश करने लगी, पर मेरा पूरा शरीऱ बेजान हो गया था। मैं चाहकर भी खडी नहीं हो पा रही थी। मुझे बार बार उठने की कोशिश करता देख ,वहाँ खड़ा हर एक इंसान मुझपर हंस रहा था। पर किसी को मुझ पर दया नहीं आई और ना ही किसी ने मेरी मदद की। दर्द के कारण मेरी आँखों से आँशू निकल रहे थे। पर किसी को इस्से कोई फर्क नहीं पड रहा था। आखिरकार मैंने हार मान ली और कोशिश करना बंद कर दिया। तो मंत्री मेरे पास आकर बोला

प्रकाश राज- ये कौन सी बात हुई जफर, तुम्हें दिख नहीं रहा कि इसकी हालत कितनी खराब है, कम से कम इसे सहारा देख खड़ा तो कर दो

इतना बोलकर मंत्री जी ने मुझे सहारा देकर खड़ा किया। पर अगले ही पल मुझे छोडकर दूर हट गए। जिस कारण मैं किसी कटे पेड़ की तरह नीचे जमीन पर जा गिरी। जिससे मुझे काफी तेज दर्द हुआ। पर उस दर्द ने मेरे लिए दवा का काम किया। क्योंकि इतने तेज दर्द के कारण मुझे अपने शरीर का बाकी हिस्सा महसूस होने लगा था। मैं अपना सारा दर्द भूल गई और बस किसी भी तरह जिंदा बचने के लिए किसी घायल सांप की तरह सरकते हुए खण्डहर के बाहर जाने की कोशिश करने लगी।

कुछ दूर सरकने के बाद मैं एक दीवार के पास जा पहूंची। जिसके बाद मैं उस दीवार का सहारा लेकर खडे होने की कोशिश करने लगी। करीब 2-3 बार कोशिश करने के बाद मैं जैसे तैसे खडी हो गई थी और फिर मैं उस दीवार का सहारा लेकर चलने की कोशिश करने लगी। मैं धीरे धीरे चलते हुए उन सभी लोगों से दूर जा रही थी। शायद यह मेरे जिंदा बच निकलने का आखिरी प्रयास था। पर तभी अचानक से जफर मेरे पास आ गया और एक शैतानी हंसी हंसते हुए बोला बोला

जफर- हा हा हा…. सॉरी मेरी जान तुम्हारे 10 मिनट तो कब के खत्म हो गए हैं। अब तुम यहाँ से जिंदा बाहर नहीं जा सकती

इससे पहले मैं कुछ समझ पाती जफर ने अपनी जेव से एक चाकू निकाला और मेरी दोनों जाँघों पर कट लगा दिऐ। घाव काफी गहरे थे। जिस कराण मुझे बहुत दर्द हो रहा था और खून भी काफी ज्यादा निकल रहा था। इसलिए मैं खडी ना रह सकी और धडाम से नीचे जमीन पर जा गिरी। मेरे नीचे गिरते ही जफर मेरे बालों को पकडकर मुझे घसीटते हुआ आंगन के बीचों बीच ले आया, जहाँ जमीन पर एक काले रंग का बड़ा सा पत्थर पडा हुआ था। शायद वो कभी इसी खण्डहर का हिस्सा रहा था।

कुछ देर पहले ही मैं उसी पत्थर के पास किसी कुतिया की तरह खडी होकर चुद रही थी। जफर ने मुझे घसीटते हुए उसी पत्थर पर ले जाकर पटक दिया। जिस कारण मेरा आधा शरीर उस बडे से पत्थर पर और आधा जमीन पर पडा हुआ था। मुझे उस पत्थर पर किसी लाश की तरह पटकने के बाद वो सभी 6 पार्टनर्स एक एक करके मुझ पर चाकूओं से हमला करने लगे, मुझे नहीं पता कि किसने मुझ पर कितने बार किये थे और मेरे शरीर के किस हिस्से पर किसने बार किया था। मेरे शरीर पर होने बाला प्रत्यके बार मुझे मौत और ज्यादा करीब ले जा रहा था। मेरे मूँह से अब खून की उल्टियाँ होने लगी थीं, साथ ही साथ मुझे अब किसी भी प्रकार को कोई दर्द महसूस नहीं हो रहा था।

असल में मुझे इस वक्त अपना शरीर ही महसूस नहीं हो रहा था। बस किसी तरह मेरी सांसे चल रही थी और मेरे चारों तरफ मुझे इंसानी भेष में खडे जानबर दिखाई दे रहे थे। जो अपने शिकार को तडपा तडपा कर मार रहे थे। तभी अचानक से मौसम बदलने लगा। देखते ही देखते आसमान में काले बादल छा गए। किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है। क्योंकि कुछ देर पहले तो आसमान एकदम साफ था। फिर ये बादल कैसे आ गए। तभी अचानक तेज हावा चलने लगी और बादल गरजने लगे। यह सब देखकर मंत्री बोला

प्रकाश राज- लगता है मौसम खराब हो रहा है और कभी भी आँधी तूफान आ सकता है। इसलिए हमें यहाँ से जल्दी से निकल जाना चाहिए, वर्ना आँधी तूफान में जंगल से निकलना मुश्किल हो जाऐगा

योगेश- मंत्री जी सही कह रहे हैं गनपत, चलो निकलते हैं यहाँ से। बैसे भी अब ये लड़की बचने बाली नहीं है। जंगल के इस इलाके में बैसे भी कोई इंशान आता जाता नहीं है। इसलिए एक दो दिन में ही जंगली जानवर इसे नोच कर खा जाऐंगे।

पर गनपत तो कुछ और ही सोच रहा था। उसने आस पास देखा तो उसे पास ही जमीन पर पडी एक लोहे की बडी सी रॉड दिखाई दी। उन लोगों ने अब तक मेरे साथ जो कुछ किया था, वो शायद गनपत के लिए काफी नहीं था, जिस कारण गनपत ने उस रॉड को उठा लिया और उसका नुकीला सिरा मेरी तरफ करके एक ही झटके में वो रॉड मेरे सीने के आर पार कर दी। गनपत ने वह बार इतना जोरदार और ताकत के साथ किया गया था कि वो रॉड मेरे सीने को चीरती हुई नीचे जमीन में जा धंसी थी। जिस कारण मेरे सीने से खून की तेज धार निकलने लगी और ठीक तभी आकाश में बिजली चमकने लगी और अचानक से तेज बारिस भी होने लगी।

मौसम में अचानक आऐ इस परिवर्तन से वो लोग बुरी तरह से हैरान थे और अब वो इस जगह पर रुकने खतरा नहीं उठाना चाहते थे। जिस कारण वो सभी लोग उस खण्डहर से तुरंत बाहर निकल गए। मुझे उस आँधी और बारिस में भी गाडियों के वहाँ से जाने की आवाजें साफ साफ सुनाई दे रही थी। कुछ ही देर में वहाँ सन्नाटा झा गया। अब उस सुनसान खण्डहर में मैं अकेली थी। जंगल से जानबरों के चिल्लाने की अजीब अजीब आवाजें आ रहीं थीं। जो उस आंधी और तूफान में भी साफ साफ सुनाई दे रही थी। आंधी तूफान और बिजली कडकने के कारण माहौल एक दम भयानक और डरावना हो गया था।

मैंने जिंदगी में कभी भी ऐसे मंजर का सामना नहीं किया था। पर आज जब मैं अपनी आखिरी सांसे ले रही थी तो जिंदगी मुझे प्रकृति का यह भयानक रूप भी दिखा रही थी। मेरे सोचने समझने की शक्ति अब पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी और मैं जिंदगी और मौत के इस संघर्ष में बुरी तरह से हार चुकी थी। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरा अंत इतना भयानक होगा। बस कुछ पलों की बात थी और मेरी जिंदगी समाप्त होने बाली थी। अब तक मेरे सारे एहसास पूरी तरह से खत्म हो गए थे।

मुझे अब कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था। ना दर्द का कोई एहसास था और ना ही कोई गम था। मुझे अपनी जिंदगी के इन अंतिम झणों में अपनी सारी जिंदगी की झलक दिखाई दे रही थी। वो समय जब मैं काफी दुखी थी, वो समय जब मैं बहुत खुश थी, मेरी शादी का दिन, मेरी माँ की मौत का दिन, मेरा स्कूल का समय और मेरे ग्रेजुऐशन का समय, नौकरी करते हुए संघर्ष करने का समय, पति के द्वारा उपेक्षा का समय, अपनी मेहनत और लगन से प्रमोशन पाने का समय और भोपाल आने के बाद बिताया अपना हर एक पल मेरी आँखों के सामने था।

मैं अपनी पूरी जिंदगी अगर सबसे ज्यादा खुश रही थी तो वो बस वही 20-22 दिन थे जो मैंने भोपाल में बिताऐ थे और अब मैं यहीँ पर अपनी अंतिम सांसे भी ले रही थी। भोपाल में बिताए अपनी आजादी के उन दिनों को याद करके पता नहीं कैसे पर मेरे चेहरे पर एक मुस्कान आ गई थी। अब मुझे अपने मरने का कोई दुख नहीं था। इस वक्त मेरे चेहरे पर एक सुकून दिखाई दे रहा था। भोपाल में इन 20-22 दिनों में ही मैंने अपनी सारी जिंदगी जी ली थी। तभी मेरे मन में दबी हुई आखरी इच्छा जाग उठी। काश मैं इन 20-22 दिनों की तरह ही अपनी सारी जिंदगी बिता पाती।

यह सोचते ही मेरे चेहरे की मुस्कान और भी ज्यादा बडी हो गई ठीक थी। मेेरे शरीर पर हुए अनगिनत घाव से लगातार खून बहने के कारण मेरा शरीर हर पल बेजान हो रहा था और मेरी आंखों के सामने धीरे धीरे अंधेरा छा रहा था। ठीक तभी एक तेज गडगडाहट के साथ आकाश में चमकती बिजली मेरे सीने में धंसे उस लोहे के रॉड पर आ गिरी। उस पल मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने मुझे खौलते हुए लावा में फेंक दिया हो। मेरा पूरा शरीर बुरी तरह चल रहा था और एक तेज रोशनी मेरी आँखों के सामने झा गई थी। लेकिन अगले ही पल मेरी आंखों के सामने एक बार फिर अंधेरा छाने और मैं एक गहरी नींद में चली गई। शायद यही मेरा अंत था

कहानी जारी है.........
 
Update 039 -

जब मेरी आँख खुली तो सुबह हो चुकी थी। चारों तरफ रोशनी फैल चुकी थी। मुझे अब भी अपने शरीर का कोई अंग महसूस नहीं हो रहा था। पर मैं यह सोचकर हैरान थी कि मैं अब तक जिंदा कैसे हूँ। मैंने जैसे तैसे कोशिश करके अपने सिर को थोडा ऊपर उठाया तो देखा मेरा पूरा शरीर जल कर काला हो गया है और आस पास की मिट्टी भी पूरी तरह से काली पड चुकी है। लेकिन अब आसमान में बादलों का दूर दूर तक कोई नामो निशान नहीं था। मैं वहाँ किसी मुर्दे की तरह पडी हुई बस यही सोच रही थी कि क्या मैं सच में जिंदा हूँ या यह मेरी आत्मा है जो मुझे यह सव दिखा रही है।

मुझे अब कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। इसलिए मैंने फिर से अपनी आँखें बंद कर लीं और फिर से एक गहरी नींद में चली गई। दोपहर के समय एक बार फिर मेरी आँख खुली। तो मैंने दोबारा अपने आप को उसी हालत में पाया। तब जाकर मुझे यकीन हुआ कि मैं अब तक जिंदा हूँ। पर कैसे इसका मेरे पास कोई जबाब नहीं था। क्योंकि किसी इंशान के पूरे शरीर पर चाकुओं के इतने सारे बार होने और एक लोहे की मोटी रॉड उसके सीने के आर पार होने के बाद, उस इंशान के जिंदा बचने की कोई संभावना हो ही नहीं सकती। ऊपर से मेरे ऊपर आकाशीय बिजली भी गिरी थी।

जो बडी से बडी इमारतों को भी नष्ट कर देती है, अच्छे खासे हरे भरे पेड़ को जला कर राख कर देती है, तो फिर इन सबके बाद मैं अब तक जिंदा कैसे और क्यूँ हूँ। मेरे पास मेरे इन सबालों का कोई जबाब नहीं था। पर अब जब मेरे पास अपने आप को जिंदा रखने और अपना बदला लेने का एक और मौका था, जिसे मैं किसी भी कीमत पर गंबाना नहीं चाहती थी। इसलिए मैं अपने हाथ पैर हिलाने की कोशिश करने लगी। काफी देर तक कोशिश करने के बाद, आखिरकार मैं अपने शरीर को हिलाने डुलाने में कामयाब रही। हाँलाकि मेरा पूरा शरीर चल चुका था, जिसे देखकर मुझे काफी बुरा लग रहा था।

ठीक तभी मैंने अचानक से अपने सिर पर हाथ लगाया तो मेरी आँखों से आँशू निकलने लगे। क्योंकि उस हादशे में मेरे बाल भी पूरी तरह से जल चुके हैं। पर फिलहाल इसमें मैं कुछ भी नहीं कर सकती थी। इसलिए मैंने उठने की कोशिश की, लेकिन मेरे पेट में धंसी लोहे की रॉड जो अब भी जमीन में गडी हुई थी। उसके कारण मैं उठ नहीं पा रह थी। क्योंकि बिजली गिरने के कारण वो रॉड पिघल कर किसी मोटे खूँटे की तरह गडी हुई थी। मैंने उसे अपने सीने से निकालने के लिए जैसे ही हाथ लगाया तो वो मुझे अब भी काफी गर्म महसूस हो रही थी। लेकिन अब मुझे दर्द और जलन से कोई फर्क नहीं पड रहा था।

उस रॉड को अपने सीने से निकालने की काफी कोशिश की, पर मैं उस रॉ़ड को हिला तक नहीं पाई। लेकिन मैंने कोशिश करना बंद नहीं की और अपनी बची कुची ताकत इकट्ठा कर उस रॉड को अपने सीने से निकालने के लिए जोर लगाने लगी। आखिरकार बार बार कोशिश करने पर मेरी मेहनत रंग लाई और वही रॉड धीरे धीरे बाहर आने लगी। रॉड बाहर आते ही मेरे सीने से काले रंग का गाडा खून बाहर निकलने लगा। शायद बिजली गिरने से मेरा खून भी जलकर काला पड गया था।

उस रॉड को अपने सीने से बाहर निकालने के लिए मुझे अपनी पूरी ताकत लगानी पडी थी। इसलिए उस रॉड को वहीं जमीन पर रखकर मैं थोडा रेस्ट करने लगी। कुछ देर रेस्ट करने के बाद मैं एक बार फिर उठने की कोशिश करने लगी, लेकिन अब मेरे अंदर उठकर खडे होने की बिल्कुल भी ताकत नहीं बची थी। इसलिए में थोडा थोडा करके सरकते हुए दीवार के पास जाने लगी। जैसे ही मैं दीवार के पास पहूँची, तो मैं एक बार फिर उसके सहारे से खडे होने की कोशिश करने लगी।

कुछ देर यूँ ही मेहनत करने के बाद आखिरकार मैं खडी होने में कामयाब रही। जिसके बाद मैं उसी दीवार का सहारा लेकर धीरे धीरे चलते हुए बापिस उस कमरे की तरफ बड गई जहाँ पर मुझे बाँधकर रखा गया था। मेरा पूरा शरीर बिजली गिरने से जल चुका था। जिस कारण मेरे शरीर पर धूप पडने से मुझे काफी तेज जलन महसूस हो रही थी। उस कमरे में जाकर मैं धूप से बच सकती थी। साथ ही साथ उस कमरे में मेरे फटे हुए कपडे भी पडे हुए थे। जिनसे मैं अपने घाव को बांध सकती थी। कमरे के अंदर जाने से पहले मैंने एकबार पलटकर उस जगह को ध्यान से देखा, जहाँ मैं कुछ देर पहले पडी हुई थी।

तो मेरी नजर उस पत्थर बडे से पत्थर पर गई, जिसपर कुछ देर पहले मेरे शरीर का ऊपरी हिस्सा पडा हुआ था। वो पत्थर अब छोटे छोटे टुकडों में टूट चुका था। जिसका केवल एक ही मतलब की मेरे ऊपर जो बिजली गिरी थी वो वहूत ज्यादा पावरफुल थी। तभी वो पत्थर इस तरह से टूट गया था। खैर यह सब सोचने का फिलहाल मेरे पास कोई समय नहीं था। इसलिए मैं उस कमरे के अंदर चली गई और वहाँ नीचे जमीन पर पडा मेरा फटा हुआ टॉप उठाकर, उस कमरे के अंदर एक कोने में दीवाल के साहारे बैठ गई। जिसके बाद मैं अपने टॉप को फाटकर अपनी चोटों पर बाँधने लगी।

यह सब काम करते करते वक्त मुझे बहुत ज्यादा कमजोरी और थकान महसूस हो रही थी। क्योंकि पिछले 2 दिनों से मैंने ना तो कुछ खाया था और ना ही कुछ पिया था। जिस कारण मुझे बहुत तेज प्यास भी लग रही थी। तभी मेरी नजर कमरे में मुझेसे थोडी दूर पर पडी एक पानी की बॉटल पर पडी। जिसमें अब भी थोडा पानी बचा हुआ था। उस बॉटल को वहाँ देखते ही मैं अपनी पूरी ताकत लगाकर जैसे तैसे उस बॉटल के पास पहुँची और एक ही घूँट में सारा पानी पी गई। हालाँकि उस थोडे से पानी से मेरी प्यास नहीं बुझी थी। पर फिर भी मुझे काफी राहत महसूस हो रही थी।

इसके बाद मैं वापिस उस दीवार के पास जाकर नीचे फर्स पर लेट गई। इस वक्त मुझे कुछ भी समझ नहीं का आ रहा था कि अब मैं क्या करूँ और कैसे इस जगह से बाहर निकलूँ। लेकिन इससे भी बड़ा सबाल मेरे दिमाग में चल रहा था और वो था कि आखिर मैं अब तक जिंदा कैसे हूँ। यह सब सोचते सोचते एक बार फिर मैं गहरी नींद में चली गई। जब मेरी आँख खुली तो मैंने देखा की दरवाजे आती रोशनी अब बहुत कम हो रही है। जिससे मैंने अंदाजा लगाया कि दिन ढलना शुरू हो गया है। मैं अब भी वहीं उस खण्डहर के कमरे में नीचे फर्स पर लेटकर अपनी मौत का इंतजार कर रही थी।

क्योंकि यह तो तय था कि अगर किस्मत से मैं इतने सारे गहरे घाव और उस आसमानी बिजली से बच भी गई हूँ, तो भी भूख प्यास से पक्का मेरी मौत जाऐगी। ऊपर से मेरे घाव से रिशते खून की खूशवू को सूँघकर जंगली जानवर कभी भी यहाँ आ सकते थे। जो मुझे नोंच नोंच कर खा जाऐंगे। फिलहाल मेरे अंदर उनसे बचने और यहाँ से बापिस शहर तक जाने की बिल्कुल भी ताकत नहीं थी। तभी मेरा हाथ किसी छोटी सी चीज से टकराया। जैसे ही मैंने उसे टटोलकर देखा तो मैं समझ गई कि यह एक लाईटर है, जिसे उन लोगों में से ही कोई यहाँ गलती से छोड गया है। मैंने तुरंत उस लाईटर को अपनी मुट्ठी में भींच लिया।

क्योंकि यह लाईटर मुझे जंगली जानबरों से बचने और अंधेरे में देखने के बहुत काम आ सकता था। तभी अचानक से मुझे बाहर से कुछ आदमियों की आवाजें सुनाई देने लगीं। जिन्हें सुनकर मैं समझ गई की गनपत और बाकी के लोग यहाँ बापिस आ गए हैं। अगर उन लगों ने मुझे इस हालत में भी जिंदा देख लिया तो पक्का वो मेरे टुकडे टुकडे करके जानबरों को खिला देंगे। अपनी इतनी बुरी हालत होने के बाद भी पता नहीं क्यों मेरे अंदर अब भी जीने की इच्छा बाकी थी। इसलिए मैं उन लोगों से छिपने के लिए उस कमरे में इधर उधर देखने लगी।

वो कमरा एकदम खाली था और वहाँ छिपने की कोई भी जगह नहीं थी। तभी मेरा पैर उस कमरे के एक कोने में रखी पत्थर की मूर्ती से टकराया। मेरे पैर के टकराने से वो मूर्ती थोडी सी हिल गई थी। ठीक तभी मुझे अपने पास की दीवार सरकने की हल्कि सी आवाज सुनाई दी। जब किसी इंसान को अपनी मौत नजर आती है, तो उसके सभी सेंस तेजी से काम करने लगते हैं। शायद यही सब मेरे साथ भी हो रहा था। इसलिए मैंने दीवार सरकने की उस हल्कि सी आवाज को भी सुन लिया था। जिसे कंफर्म करने के लिए मैंने एक बार फिर से उस मूर्ती में लात मारी।

जैसा की मुझे उम्मीद थी, इस बार फिर से मूर्ती के हिलने पर दीवार में से हल्कि सी आवाज हुई और मुझे दीवार के कोने में हल्की सी दरार भी दिखाई दी। जिसे देखकर मैं तुरंत समझ गई कि यहाँ जरूर कोई कोई सीक्रेट कमरा है। उन लोगों से छिपने के लिए यह सीक्रेट कमरा मेरे काफी काम आ सकता था। इसलिए मैं उस मूर्ती के पास जाकर उसे हिला डुला कर देखने लगी। जल्दी ही मैं समझ गई कि उस मूर्ती को क्लॉक बाईज घुमाने से उस सीक्रेट कमरे का रास्ता ओपन होता है। इसलिए मैंने तुरंत ही उस मूर्ती को क्लॉक बाईज घुमाना शूरू कर दिया। कुछ ही देर में उस दीवार में से एक छोटा सा दरवाजा खुल गया। उस दरवाजे के खुलते ही मैं बिना देर किए सरकते हुए उस दरवाजे के अंदर चली गई।

दरवाजे के अंदर जाकर मैंने देखा कि बाहर की तरह ही अंदर भी दरवाजे पास एक पत्थर की मूर्ती रखी हुई है। जिसे मैंने जैसे ही एण्टी क्लॉक बाईज घुमाया तो रास्ता बंद हो गया। ठीक तभी गनपत और जफर उस कमरे के अंदर आ गए, जहाँ कुछ देर पहले मैं मौजूद थी। सीक्रेट कमरे के अंदर पहुँचकर मैं दीवार से कान लगाकर उनकी बातें सुन्ने की कोशिश करने लगी। गनपत और जफऱ के अचानक वहाँ आने के कारण मैं उस दरवाजे को पूरी तरह से बंद नहीं कर पाई थी। जिस कारण कोने में एक पतली सी दरार रह गई थी। इसलिए मुझे उनकी आवाज साफ साफ सुनाई दे रही थी। तभी मुझे जफर की आवाज सुनाई दी

जफर- गनपत यार मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा कि आखिर वो लड़की गई कहां।

गनपत- अरे यार जफर उसे कहीं जाने लायक हमने छोडा ही कहाँ था। वो तो अब यमराज के यहाँ अपनी हाजरी लगा रही होगी

जफर- तो फिर उसकी लाश तो होनी चाहिए थी यहाँ पर

जफर की बात सुनकर गनपत ने हंसते हुए कहा

गनपत- अरे यार तूने बाहर नहीं देखा क्या… आंगन में जलने के निशान है। यानि रात में यहाँ पक्का बिजली गिरी थी। वो पत्थर भी तो पूरी तरह से चकनाचूर हो गया है। जिसपर वो लड़की पडी हुई थी और वो रॉड जो मैंने उसके पेट में घुसाई थी। उसका हाल भी तो तू देख चुका है। तो फिर उस लड़की का जिंदा बचना नामुमकिन है। ऐसी बिजली गिरने से तो उसकी हड्डियाँ भी जलकर राख हो गईं होंगी। अगर कुछ बचा भी होगा तो वो जंगली जानबर खा गए होंगे।

गनपत की बात सुनकर जफऱ उसकी हाँ में हाँ मिलाता हुआ बोला

जफर- शायद तू सही कह रहा है। मैं ही वे बजह यह सब सोच रहा था।

गनपत- चल कोई बात नहीं। अब तो तेरी तसल्ली हो गई ना।

जफर- हाँ हो गई

गनपत- तो फिर बता अब आगे क्या करना है।

जफर- मेरी धनराज से आज सुबह ही बात हुई थी। उसने कहा है कि हमारे बीजा और पासपोर्ट में 1 महिने का समय लगेगा। इसलिए तब तक हमें कहीं छिपना होगा

जफर की बात सुनकर गनपत गुस्से से बिफरते हुए बोला

गनपत- अबे पागल है क्या। मैं यहाँ जंगल के बीचों बीच नहीं रह सकता

जफर- अरे यार तुझे यहाँ रुकने के लिए कौन बोल रहा है। हम आज रात ही दिल्ली निकल रहे हैं। वहाँ मंत्री जी का एक सीक्रेट बंगला है। मेरी उनसे पहले ही बात हो गई है। वहाँ किसी चीज की कोई कमी नहीं होगी और वहाँ हमें पहचानने बाला भी कोई नहीं होगा। इसलिए वह जगह हमारे लिए सबसे बेस्ट है।

गनपत- तो फिर हम यहाँ क्यों आये हैं

जफर- पहला तो मैं उस लड़की की लाश देख कर कंफर्म करना चाहता था कि वो मरी या नहीं। पर बाहर की हालत देखकर मुझे यकीन हो गया है कि उसका बचना नामुमकिन है और दूसरा मैं एक बार अपने माल पर नजर डालना चाहता था कि वो सुरक्षित है या नहीं। क्योंकि आज के बाद पता नहीं हमारा कब यहाँ आना हो।

गनपत- अबे तो पहले बोलना चाहिए था ना, चल देखते हैं।

मैं उस सीक्रेट कमरे के अंदर से ही उनकी सारी बातें सुन रही थी। उन लोगों की बातें सुनकर मैं समझ गई कि उन्हें मेरी मौत का यकीन हो गया है। पर उनका माल यहाँ पर कहाँ रखा होगा। यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी। मैं इस वक्त जिस कमरे में थी। उसके पूरी तरह से बंद होने के कारण वहाँ एकदम अंधेरा छा गया था। जिस बजह से मैंने अब तक उस कमरे को अच्छी तरह से चैक भी नहीं किया था। मैं अभी अस बारे में सोच ही रही थी कि तभी उस कमरे में हरे रंग की रोशनी फैल गई।

कहानी जारी है......
 
Update 040 -

मैं यह देखकर बुरी तरह से हैरान थी कि वो रोशनी मेरे गले के पास से निकल रही है। मैंने जैसे ही हाथ लगाकर चैक किया तो मुझे पता चला कि मेरे गले में सुनहरे रंग के मोटे से धागे में पिरोया गया हरे रंग एक छोटा सा मोती डला हुआ है। जिसमें से यह रोशनी निकल रही है। मैंने आज से पहले उस मोती को कभी नहीं देखा था। इसलिए मैं उसे अपने गले में देखकर बुरी तरह से हैरान थी साथ ही साथ मुझे डर भी लग रहा था। पर फिलहाल यह समय इन सब बातों के बारे में सोचने का नहीं था। इसलिए मैंने उस हरी रोशनी में उस कमरे को अच्छी तरह से चैक करना शूरू कर दिया। वो कमरा बाहर बाले कमरे से से काफी बड़ा था। जो लगभग पूरा खाली था।

लेकिन उस कमरे के एक साईड कोने में मुझे कुछ सामान रखा हुआ दिखाई दिया। इसलिए मैं सरकते हुए जब उसके पास गई तो मुझे वहाँ एक के ऊपर एक रखे कई सारे प्लास्टिक के बॉक्स दिखाई दिए। जिन्हें देखकर मैं तुरंत समझ गई कि उन लोगों ने अपना सारा माल यहीँ इसी कमरे में छिपा कर रखा है। पर अब मेरे सामने एक नई मुशीवत खडी हो गई थी। क्योंकि वो लोग अब अपना माल चैक करने इस कमरे में आने बाले थे। जिसका मतलब था की वो मुझे भी यहाँ देख सकते थे। इसलिए मैं उस कमरे में छिपने की जगह देखने लगी। पर बो कमरा पूरी तरह से खाली था।

उसमें छिपने की कोई भी जगह नहीं थी। हाँलाकि उन प्लास्टिक बॉक्स के पीछे छिपने की पर्याप्त जगह मौजूद थी। लेकिन मेरे गले में चमकते मोती के कारण मैं तुरंत ही पकडी जा सकती थी। मैं अभी इस बारे में सोच ही रही थी कि तभी मुझे सीक्रेट दरवाजे के खुलने की आवाज सुनाई दी, ठीक उसी पल मेरे गले में डला मोती भी चमकना बंद हो गया था। जिस कारण उस कमरे में एक बार फिर से अंधेरा छा गया। अब मेरे पास कुछ भी सोचने समझने का बिल्कुल भी समय नहीं था। इसलिए मैं उन प्लास्टिक बॉक्स के पीछे जाकर छिप गई।

अगले ही पल मुझे उस सीक्रेट कमरे का दरवाजा खुलने के साथ साथ जफर और गनपत के अंदर आने आवाजें सुनाई दीं। उन दोनोें ने आगे की तरफ रखे एक दो बॉक्स खोलकर चैक किए और फिर उस कमरे से बाहर निकल गए। कुछ देर बाद मुझे जब मुझे सीक्रेट दरवजा बंद होने की आवाज सुनाई दी तो मैं उन बॉक्स के पीछे से बाहर निकल आई और सरकते हुए एक बार फिर दरवाजे के पास जाकर दीबार से टिक कर बैठ गई। ताकि बाहर होती हलचल सुन सकूँ।

गनपत उस दरवाजे को पूरी तरह से बंद कर गया था। इसलिए मैंने फिर से अंदर बाली मूर्ती को थोडा घुमाकर दीवार के बीच छोटी सी दरार बना ली थी। जिससे ताजी हवा अंदर आ सके। जब काफी देर तक मुझे बाहर से कोई आवाज सुनाई नहीं दी तो मैं समझ गई कि जफर और गनपत अब वहाँ से जा चुके हैं। चूँकि गनपत और जफर जब वहाँ आऐ थो तो उस वक्त शाम हो चुकी थी। इसलिए मैंने अंदाजा लगाया कि अब तक रात हो चुकी होगी। फिलहाल मैं इस सीक्रेट कमरे में गनपत और जफर को छोडकर बाकी सभी लोगों और जंगली जानवरों से सुरक्षित थी।

क्योंकि गनपत और जफर के अलावा उस सीक्रेट कमरे के बारे में कोई भी नहीं जानता था। इतनी सारी भागदौड करने के कारण मैं काफी थकान महसूस कर रही थी। जिस कारण मैं वहीं जमीन पर लेट गई और जल्द ही थकान और कमजोरी के कारण मुझे नींद आ गई। अचानक आधी रात के करीब मुझे अपने पूरे शरीर में अजीब सी ऐंठन और दर्द महसूस होने लगा। जिस कराण मेरी आँख खुल गई। मैंने देखा कि मेरे गले में डला वह मोती एक बार फिर से ग्लो कर रहा है। यह सब देखकर मैं बहुत ज्यादा डर गई थी। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर यह हो क्या रहा है।

इसलिए मैं उस मोती को अपने गले से निकालने की कोशिश करने लगी। पर पता नहीं कैसे उसका धागा अपने आप सिकुडकर मेरे गले से लगभग चिपक गया था। जिस कारण मैं उसे निकाल ही नहीं पा रही थी। काफी देर तक कोशिश करने के बाद भी जब मैं ना तो उस धागे को तोड पाई और ना ही उसे गले से निकला पाई तो मैंने कोशिश करना बंद कर दिया। जैसे ही मैंने उस धागे को अपने गले से निकालने की कोशिश बंद की तो वो फिर से नार्मल साईज का हो गया। जिसे देखकर मैं हैरान रह गई। पर तभी मुझे आईडिया आया कि क्यों ना मैं इस धागे को जला दूँ।

यह सोचते ही मैंने अपना लाईटर जलाया। लेकिन जैसे ही मैंने लाईटर जलाया तो वो मोती ग्लो होना बंद हो गया और वो एक नॉर्मल हरे रंग मोती बन गया। लेकिन मैंने उसपर को ध्यान नहीं दिया और उस धागे को पकडकर उसे लाईटर की फ्लेम से जलाने की कोशिश करने लगी। लेकिन काफी देर तक कोशिश करने के बाद भी जब वो धागा नहीं जला तो मैंने अपना लाईटर बंद कर दिया। लेकिन लाईटर के बंद होते ही वो मोती एक बार फिर से ग्लो करने लगा। यह सब मुझे बड़ा अजीब लग रहा था, साथ ही साथ डर के कारण मेरी गांड भी फट रही थी।

मुझे लग रहा थी कि जरूर यहाँ कोई भूत है। तभी अचानक से मुझे याद आया कि मैंने सुबह आंगन में एक चाकू डला देखा था जो शायद उन गुण्डों में से किसी का था। चाकू के बारे में याद आते ही मैं तुरंत उस सीक्रेट कमरे का दरवाजे को खोलकर बाहर निकल गई और आंगन में उस चाकू को तलाश करने लगी। चांदनी रात होने के कारण मुझे उस चाकू को ढूँडने में मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पडी थी। जैसे ही मुझे बो चाकू मिला तो मैं उससे अपने गले का धागा काटने की कोशिश करने लगी, लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ।

काफी देर तक कोशिश करने के बाद भी जब वो धागा नहीं कटा। तो मैंने कोशिश करना बंद कर दिया। अब मैं यह सोचकर हैरान थी कि आखिर यह धागा किस चीज से बना है। क्योंक ना तो ये टूट रहा था, ना ही जल रहा था और ना ही कट रहा था। हाँलाकि देखने में तो वह किसी सोने की चैन की तरह दिखाई देता है, पर उसकी साफ्टनेश और लचीलेपन को देखते हुए कोई भी यह कह सकता था वो किसी भी धातू से नहीं बना है। सबसे हैरत की बात तो यह थी कि उस धागे में कोई ज्वाईंट या गाँठ बगैरह नहीं थी। जिससे उसे खोला जा सके।

आखिरकार थक हार कर मैं बापिस उस सीक्रेट रूम के अंदर जाकर लेट गई और सोने की कोशिश करने लगी। कुछ ही देर बाद मुझे एक बार फिर अपने पूरे शरीर में तेज दर्द और ऐंठन महसूस होने लगी। पर फिलहाल इससे छुटकारा पाने का मेरे पास कोई उपाय नहीं था। इसलिए सारी रात मैं यूँ ही दर्द से तडपती और कराहती रही। मेरा पूरा शरीर पशीने से भीग चुका था और मेरी सांसे भी काफी तेज चल रहीं थी। आखिरकार मैं यह दर्द ज्यादा देर तक बरदास्त नहीं कर पाई और बेहोश हो गई।

अगले दिन जब मेरी आँख खुली तो मैं काफी अच्छा महसूस कर रही थी। मेरे शरीर का दर्द भी अब लगभग खत्म हो चुका था और मैं अब अपने अंदर पहले से काफी ज्यादा एनर्जी महसूस कर रही थी। ठीक तभी अंजाने में मैंने जैसे ही अपने सिर पर हाथ फेरा तो मैं हैरान रह गई। क्योंकि मेरे बाल फिर से उग आऐ थे और एक ही रात में मेरी गर्दन तक बडे हो गए थे। जिसे देखकर मैं काफी खुश थी। बैसे भी लडकियाँ अपने बालों को लेकर कुछ ज्यादा ही सेंसटिव होती हैं।

कुछ देर बाद मैं उस सीक्रेट रूम से बाहर आ गई और उस खण्डहर से बाहर जाने का का रास्ता तलाश करने लगी। इस बार थोडी सी कोशिश करने के बाद ही मैं आसानी से खडी हो गई थी और धीरे धीरे चलते हुए खण्डहर से बाहर जा रही थी। जल्द ही मैं खण्डहर के बाहर खडी हुई थी। वो खण्डहर जंगल के एकदम बीचों बीच था और उससे बाहर जाने के लिए एक कच्चा भी रास्ता बना हुआ था। चूँकि वह खण्डहर काफी ऊँचाई पर था जिस कारण मुझे काफी दूर तक साफ साफ दिखाई दे रहा था। लेकिन दूर दूर तक मुझे केवल घना जंगल ही नजर आ रहा था।

कुछ देर बाद मैं उस खण्डहर के चारों तरफ चक्कर लगाकर देखने लगी कि आस पास कोई कुँआ या तलाब बगैरह है या नहीं। क्योंकि मुझे काफी तेज प्यास लग रह थी। तभी मेरी नजर थोडी दूर बने एक छोटे से तालाब पर पडी। हाँलाकि मैं वहाँ अभी तुरंत ही जाना चाहती थी। लेकिन तभी मुझे याद आया कि मेरा पूरा शरीऱ जला हुआ है और मैं इस वक्त बिना कपडों के एक दम नंगी खडी हुई हूँ। चूँकि दिन निकल आया था, जिस कारण जंगल के उस इलाके में किसी भी फारेस्ट ऑफिसर या आस पास के गाँव वाले के मिलने की संभावना थी। इसलिए फिलहाल मैंने उस तालाब पर जाने का प्लान कैंशिल कर दिया और खण्डहर के अंदर बापिस आ गई।

खण्डहर के अंदर आंगन में आते ही मेरी नजर उस टूटे फूटे पत्थर पर पडी। जिसपर एक दिन पहले मैं किसी बेजान लाश की तरह पडी होकर अपनी आखरी सांसे गिन रही थी और अपनी मौत का इंतजार कर रही थी। ठीक तभी बिजली गिरने से मैं पूरी तरह से जल गई और वो पत्थर टूट कर चकनाचूर हो गया था। पर मैं कैसे बच गई इसका जबाब अब भी मेरे पास नहीं था। तभी मुझे अपनी चोटों की याद आई जिनमें अब मुझे बिल्कुल भी दर्द महसूस नहीं हो रहा था। सिवाय सीने के घाव के, जो लोहे की मोटी रॉड घुसने के कारण हुआ था। इसलिए मैंने एक एक करके अपनी सारी पट्टियाँ खोल दीं।

मैं यह देखकर हैरान रह गई कि मेरे सारे घाव अब लगभग ठीक हो चुके हैं और मेरे सीने का घाव भी काफी हद तक भऱ चुका है। पर यह सब कैसे संभव है…. क्योंकि इतनी गहरी चोटों का कुछ ही घंटों मेें ठीक होना लगभग असम्भव बात है। जब मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया तो मैंने इस सबके बारे में सोचना बंद कर दिया और अपने सीने के घाव पर फिर से पट्टी बांध ली। फिलहाल मेरे पास करने के लिए कुछ भी नहीं था। इसलिए मैंने उस सीक्रेट रूम के अंदर जाकर फिर से रेस्ट करने का फैसला किया।

लेकिन तभी मुझे खण्डहर के बाहर से कुछ हलचल सुनाई दी। जिसे सुनकर मैं समझ गई कि कुछ लोग उस खण्डहर के अंदर आ रहे हैं। उन लोगों की आवाजों से मैंने अंदाजा लगाया कि मेरे पास सीक्रेट कमरे के अंदर जाने बिल्कुल भी समय नहीं है। इसलिए मैं आंगन के बीचों बीच खडी होकर चारों तरफ देखने लगी। लभी मेरी नजर आंगन के एक कोने में खडी घनी झाडियों पर पडी। जो फिलहाल मेरे छिपने के लिए सबसे अच्छी जगह हो सकती थी। इसलिए मैं बिना किसी बात की परवाह किए तेजी से उन झाडियों की तरफ बड गई और उनके पीछे जाकर छिप गई।

उस वक्त मैंने यह भी नहीं सोचा कि वहाँ कोई खतरनाक जंगली जानवर या साँब बगैरह भी छिपा हो सकता है। पर किस्मत से वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था। जैसे ही मैं उन झाडियों के पीछे गई तो मुझे उस खण्डहर के अंदर आते कुछ लोग दिखाई दिए। वो लोग शायद वहीँ आस पास के किसी गाँव के रहने बाले थे। जिनके हाथों में पूजा बगैरह का सामान था। उन लोगों के साथ एक बूडा आदमी भी था जो किसी पण्डित की तरह दिखाई दे रहा था। खण्डहर के अंदर आकर जैसे ही उन लोगों की नजर आंगन के बीचों बीच पडे उस पत्थर पर पडी जो अब बिजली गिरने के कारण पूरी तरह से चकनाचूर हो गया था। तो उनमें से एक आदमी बोला

“हे भगवान… पण्डित जी देखो तो सही ऐ क्या अनर्थ हो गया, किसी ने अमर शिला खण्डित कर दिया है”

उस आदमी की बात सुनकर पण्डित जी ने अपने हाथ में पकडा पूजा का सामान एक सुरक्षित स्थान पर ऱखते हुए कहा

पण्डित- नहीं प्रताप यह असंभव है… अमर शिला इतनी मजबूत है कि उसे खण्डित नहीं किया जा सकता है।

पण्डित जी की बात सुनकर प्रताप नाम का वो व्यक्ति फिर से बोला

प्रताप- तो क्या यह अमर शिला अपने आप खण्डित हो गई है

पण्डित- कुछ कह नहीं सकते, हो सकता है कि दो दिन पहले जो आँधी तूफान के साथ बारिस हुई थी, उसी दिन आकाशीय बिजली गिहने से यह अमर शिला खण्डित हो गई हो। ध्यान से देखा ,आस पास की मिट्टी भी जलकर काली हो गई है।

पण्डित जी की बात सुनकर प्रताप ने फिर से कहा

प्रताप- तो क्या अब हम इस अमर शिला की पूजा नहीं कर सकते।

पण्डित- अब जब हम यहाँ तक आ ही गए हैं तो फिर आखिरी बार पूजा करके ही जाऐंगे। लेकिन आज के बाद दोबारा यहाँ आने का अब कोई फायदा नहीं है।

प्रताप- बैसे पण्डित जी इस अमर शिला की आखिर क्या कहानी है और हम लोग क्यों प्रतिवर्ष इस शिला की पूजा करने यहाँ इस घने जंगल में आते हैं।

पण्डित- तो तुम इस अमर शिला की कहानी जानना चाहते हो

पण्डित जी की बात सुनकर एक दूसरा आदमी बोला

आदमी- हाँ पण्डित जी हम सभी लोग इस अमर शिला की कहानी जानना चाहते हैं। हाँलाकि हम सभी लोग प्रतिवर्ष आपके साथ यहाँ पूजा करने कई वर्षों से आते रहे हैं। लेकिन इस अमर शिला की कहानी हम लोगों पता नहीं है। हम लोगों ने कई बार सोचा की आपसे इस बारे में बात करें लेकिन किसी की हिम्मत ही नहीं हुई। अब हमारे गाँव में सबसे बुजुर्ग व्यक्ति आप ही हो। इसलिए आप ही हमें इसके बारे में बता सकते हैं।

पण्डित- तो फिर ठीक है… एक काम करो पहले सभी के बैठने के लिए आसन लगा तो। जिसके बाद मैं सबसे पहले तुम सबको इस अमर शिला की कहानी सुनाऊँगा और उसके बाद हम सब आखिरी बार इस अमर शिला की पूजा करें।

पण्डित जी की बात सुनकर प्रताप और उस दूसरे आदमी ने सभी लोगों के बैठने के लिए नीचे जमीन पर एक चादर बिछा दी और पण्डित जी के लिए एक अलग से आसन लगा दिया।

कहानी जारी है.....
 
Update 041 -

सभी लोगों के बैठने के बाद पण्डित जी ने कहना शुरू किया

पण्डित- करीब करीब 1000 वर्प पहले यहाँ पर भोजपुर नाम का एक राज्य हुआ करता था। जिसके राजा विश्वजीत की के यहाँ सैकडों वर्षों में एक बार आने बाले दिव्य अमृत योग में एक पुत्री का जन्म हुआ था। जिस कारण उनका नाम अमृता रखा गया। जन्म से ही राजकुमारी अमृता के अंदर कुछ दिव्य शक्तियाँ थीं और वो बहुत होनहार एवं मृदूभाषी थी। उनके अंदर दया, ममता जैसे कई गुण थे और वो हमेशा दूसरों की सहायता किया करती थी। जिस कारण राज्य की पूरी जनता उन्हें बहुत प्यार सम्मान देती थी। युवा होते होते राजकुमारी अमृता सभी कलाओं में पारंगत हो गई थीं। जिस कारण वो उस समय की सबसे सुंदर और प्रतिभावान राजकुमारी के रूप में मैं विख्यात हो चुकी थी। लेकिन उनकी यह सुंदरता ही उनकी सबसे बडी शत्रु बन गई थी।

पण्डित जी की बात सुनकर एक आदमी ने सबाल किया

आदमी- पण्डित जी आखिर किसी की सुंदरता उसकी शत्रू कैसे हो सकती है

उस आदमी की बात सुनकर पण्डित जी मुस्कुराकर बोले

पण्डित- क्यों नहीं हो सकती है… अगर किसी की सुंदरता दिव्य हो तो उसे सभी लोग पाना चाहेंगे। असल में राजकुमारी अमृता के पास शक्ति बीज था। जिसने उनकी सुंदरता को और भी ज्यादा निखार कर दिव्य बना दिया था।

इससे पहले पण्डित जी अपनी बात पूरी कर पाते प्रताप ने उन्हें टोकते हुए कहा

प्रताप- पण्डित जी यह शक्ति बीज क्या और वो राजकुमारी अमृता को आखिर कैसे प्राप्त हुआ था।

पण्डित- ऐसा कहा जाता है कि अपने दयालू और दूसरे की सहायता करने बाले स्वभाव के कारण राजकुमारी अमृता ने एक बार अनजाने में ही किसी सिद्ध ऋषी की सहायता की थी। जिस कारण उन्होंने राजकुमारी अमृता को एक दिव्य मोती यानि शक्तिबीज प्रदान किया था। लेकिन कुछ लोगों का यह भी मानना है कि वो शक्ति बीज राजकुमारी अमृता के पास उनके जन्म के समय से ही था। सच क्या है यह कोई नहीं जनाता। लेकिन उस शक्ति बीज की दिव्य शक्तियों के कारण राजकुमारी अमृता की आयू बडने के बाद भी वो हमेशा युवा बनी रही और उनकी आयू भी सामान्य मनुष्य की अपेक्षा कई गुना ज्यादा लम्बी हो गई थी। जिस कारण कई लोग यह मानने लगे थे की राजकुमारी अमृता तो चिरयौबन और अंतहीन जीवन का बरदान प्राप्त है।

पण्डित जी के चुप होते ही प्रताप ने अगल सबाल किया

प्रताप- फिर क्या हुआ पण्डित जी.. आखिर राजकुमारी अमृता की सुंदरता उनकी शत्रू कैसे बन गई थी और यह अमर शिला कहाँ से आई।

पण्डित- असल में राजा विश्वजीत की दूसरी पत्नि और राजकुमारी अमृता की सौतेली माँ एक क्रूर और लालची महिला थी। इसलिए वो राजकुमारी अमृता से शक्ति बीज हासिल करने के लिए उन पर दबाब बनाने लगी। लेकिन जब राजकुमारी अमृता ने उन्हें शक्ति बीज देने से मना कर दिया। उसी दौरान राजकुमारी अमृता को पाने के लिए दूसरे राज्य के राजाओं ने भोजपुर पर हमला कर दिया था, इसके साथ साथ इस राज्य के कई बडे मंत्री और दूसरे शक्तिशाली पुरूष भी राजकुमारी अमृता को पाने के लिए षडयंत्र करने लगे थे। जिस कारण राज्य के अंदर भी गृह युद्ध जैस हालत बन गए थे। जिसका लाभ उठाकर राजकुमारी अमृता की सौतेली माँ ने एक ऐसा चक्रव्यू रचा जिसमें उलझकर राजकुमारी अमृता को नगरबधू यानि बैश्या बनाना पडा। ताकि उन्हें पाने की चाह रखने बाले सभी पुरूष वासना मिटा सकें और भोजपुर राज्य फिर से सुरक्षित हो सके।

इतना बोलकर जब पण्डित जी खामोश हो गए तो एक दूसरे व्यक्ति ने सबाल किया

आदमी- फिर क्या हुआ पण्डित जी

पण्डित- राजकुमारी अमृता के नगर बधू बनने के बाद भी जब जनता का उनके प्रति प्यार और सम्मान कम नहीं हुआ तो उनकी सौतेली माँ ने राजकुमारी अमृता को उनकी माता और भाई बहनों की हत्या करवाने की धमकी देकर वो शक्ति बीज हासिल करने की कोशिश की। तब जाकर राजकुमारी अमृता को इस बात का एहसास हुआ कि शक्ति बीज की दिव्य वास्तव में एक श्राप है। लेकिन वो उस शक्ति बीज को अपनी सौतेली माँ या फिर किसी दूसरे गलत इंशान के हाथों नहीं लगने देना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने उस शक्ति बीज को इस पत्थर के अंदर छिपा दिया और इसी पत्थर पर बैठकर आत्मदाह कर अपने श्रापित जीवन को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। शक्ति बीज के प्रभाव के कारण ही यह पत्थऱ इतना कठोर हो गया कि उसे टोडकर शक्ति बीज हासिल करना असंभव था। इसलिए लोगों ने इस पत्थऱ को अमर शिला का नाम दे दिया तथा लम्बी आयू एवं स्वस्थ जीवन के लिए इसकी पूजा करने लगे। समय के साथ साथ यह स्थान बीरान होता चला गया और यहाँ घना जंगल उग गया। इसलिए धीरे धीरे लोग इस अमर शिला के महत्व को भूल गए। अब बस कुछ गिने चुने लोग ही बचे हैं जो अब भी इस अमर शिला की पूजा करने यहाँ आते हैं।

पण्डित जी के खामोश होते ही प्रताप ने सबाल किया

प्रताप- तो क्या शक्ति बीज अब भी इस अमर शिला में मौजूद है या फिर कोई दूसरा इंसान उसे अपने साथ ले गया है।

पण्डित- फिलहाल इसके बारे कोई भी अंदाजा लगाना जल्दवाजी होगी। लेकिन जहाँ तक मेरी समझ कहती है, उसके हिसाब से दो दिन पहले, जिस दिन आँधी तूफान के साथ बारिस हुई थी, उस दिन काल गणना के अनुसार रात के समय कुछ पलों के लिए अमृत योग बना था। शायद उसी समय इस अमर शिला पर बिजली भी गिरी हो। जिस कारण तेज आंधी तूफान के समय इस अमर शिला पर पंच तत्वों यानि भूमि, जल, बायू, आकाश एवं अग्नि का एक अदभुद संयोग बना होगा। जिस कारण अमर शिला के खण्डित होने से शक्ति बीज स्वतः ही बाहर आ गया होगा और शायद अब तक उसने अपना उत्तराधिकारी भी चुन लिया होगा। लेकिन वो कौन है, इसके बारे में सही समय आने पर ही पता चल सकता है।

इतना बोलकर पण्डित जी खामोश हो गए। अब किसी के भी पास कोई सबाल नहीं बचा था। इसलिए वो सभी लोग उस खण्डित हो चुकी अमर शिला की पूजा करने में व्यस्त हो गए। करीब एक घण्टे तक विधि विधान से उस अमर शिला की पूजा करने के बाद वो लोग इस खण्डहर से बाहर निकल गए। उन लोगों के उस खण्डहर से बाहर जाते ही मैं झाडियों से बाहर निकल आई और उस पत्थऱ के पास जा पहुँची, जहाँ वो लोग प्रसाद के रूप में कुछ फल और एक छोटे से घडे में थोडा सा पानी छोड गए थे। पिछले दो दिनों से भूखे प्यासे होने के कारण मैंने जल्दी से प्रसाद के रूप में चढाऐ गए उन फलों को उठाकर खाना शुरू कर दिया और मन ही मन सोचने लगी

“यह सब क्या बकवास है... आज के जमाने में कौन इन सब बातों पर यकीन करता है। पता नहीं लोग कैसे अंधविश्वास में आकर गलत रास्ता अपना लेते हैं......”

तभी मेरे मन में एक दूसरा ख्याल आया

“एक मिनट कहीं ये सब सच तो नहीं। क्योंकि पण्डित जी के अनुसार इस पत्थर के अंदर एक दिव्य मोती यानि शक्ति बीज छिपा हुआ था, जो शायद अब बाहर आ चुका है। और इस वक्त मेरे गले में भी एक मोती डला हुआ है, जो मैंने आज से पहले कभी नहीं देखा और ना ही ऐसा कोई मोती अपने गले में डाला था, तो फिर यर मोती आखिर मेरे गले में कैसे आया, और सबसे बडी बात कि मैं उसे अपने गले से निकाल भी नहीं पा रही हूँ, इसके अलावा पता नहीं कैसे यह अपने आप ही ग्लो भी करने लगता, आखिरि यह मोती है क्या जी, कहीँ यही तो शक्ति बीज नहीं… ”

तभी मेरे मन में एक दूसरा ख्याल आया

“नहीं नहीं ऐ मैं क्या सोच रही हूँ…. यह साधारण सा मोती आखिर शक्ति बीज कैसे हो सकता है”

अगले ही पल मेरे मन में मेरे पहले सबाल का जबाब देते हुए कहा

“क्यों नहीं हो सकता…. क्या मैंने पहले कभी शक्ति बीज देखा है… नहीं ना… तो फिर मुझे कैसे पता होगा कि शक्ति बीज कैसा दिखता है, हो सकता है कि यही शक्ति बीज हो, क्योंकि दो दिन पहले मेरी जो हालत थी, उसके हिबास से मेरा जिंदा बचना पूरी तरह से असंभव बात है, लेकिन मैं अब भी जिंदा हूँ, और मेरे घाव किसी आम इंशान की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से ठीक भी हो रहे हैं, यहाँ तक कि एक ही रात में ना केवल मेरे सिर के बाल निकल आऐ, बल्कि वो मेरी गर्दन तक बडे भी हो गए हैं, जिससे यह साबित होता है कि मेरे गले में डला यह मोती जरूर चमत्कारी है”

लेकिन तभी मेरे मन में एक नया बिचार आया

“लेकिन यह भी तो हो सकता है कि, मेरे ऊपर बिजली गिरने के काराण, मेरे शरीर में कुछ ऐसा कैमिकल रिऐक्शन हुआ हो, जिससे मेरे डी.एन.ए. में कुछ परिवर्तन हुआ हो, और जिसने मुझे उस स्थिती में जिंदा बचने में मेरी मदद की हो, साथ ही साथ डी.एन.ए. में परिवर्तन होने के कारण ही मेरे घाव भी इतनी जल्दी ठीक हो रहे हों”

यह सोचने के साथ ही मेरे मन में एक और विचार आया

“हाँ यह हो सकता है। लेकिन फिर मेरे गले में डला यह मोती। इसका क्या.... यह मेरे गले में कैसे आया और आखिर मैं इसे अपने आप से दूर क्यों नहीं कर पा रही हूँ, बैसे भी इस मोती के कुछ चमत्कार तो मैं कल रात को ही देख चुकी हूँ… उफ्फ यार यह सब बहुत कन्फ्यूजिंग है…. मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा कि आखिर मेरे साथ यह सब क्या हो रहा है। क्या सच है और क्या गलत इसका कुछ पता ही नहीं चल रहा है”

तभी मेरे मन में एक और नए विचार ने जन्म लिया

“तुझे कुछ भी समझने की जरूरत नहीं है। बस यह सोच की तू इतना सब सहने के बाद भी जिंदा है। तुझे एक नई जिंदगी मिली है जीने के लिए। इसलिए अब केवल वही कर जिसमें तुझे खुशी मिलती है। तू इस मोती की बजह से जिंदा है, या बिजली गिरने के बाद डी.एन.ए. चेंजिंग से या फिर किस्मत से। इसका फैसला तो आने वाला वक्त ही करेगा। पर फिलहाल तुझे जो दूसरा मौका मिला है उसके बारे में सोच। सबसे पहले तुझे यहाँ से निकलना है और फिर उन सभी कमीनों से चुन चुन कर अपना बदला भी तो लेना है।”

तभी मेरे मन ने मेरे पहले विचार का समर्थन करते हुए कहा

“हाँ शायद यही ठीक होगा… मुझे अब इस बारे में सोचने की कोई जरूरत नहीं है कि मैं जिंदा कैसे बच गई और मेरे गले में यह मोती कैसे आया। मुझे बस किसी भी तरह से इस जंगल से बाहर निकलना है और अपना बदला लेना है”

यह सब सोचते सोचते मैंने सारे फल खत्म कर दिए, जिसके बाद मैं मटकी में रखा सारा पानी पी गई, हाँलाकि इससे मेरी ना तो भूख मिटी थी और ना ही प्यास, पर अभी जो कुछ भी मिल रहा था, वो मेरे जिंदा बचे रहने के लिए पर्याप्त था। इसके बाद मैं कमरे के अंदर चली गई। क्योंकि दिन चडने लगा था, जिस कारण वहाँ खण्डहर में कोई दूसरा व्यक्ति कभी भी वहाँ आ सकता था। लेकिन कमरे के अंदर जाने से पहले मैंने एक बार अच्छी तरह से पूरे आंगन देखा कि कहीं वहाँ मेरे आने का कोई सबूत तो मौजूद नहीं है। जब मुझे वहाँ कुछ भी नहीं मिला तो मैंने उस कमरे की भी अच्छी तरह से तलाशी लेनी शुरू कर दी। जहाँ मेरे कटे फटे कपडे और मेरा टूटा फुटा मोबाईल डला हुआ था।

जब मैंने अपना मोबाईल उठाकर अच्छी तरह से चैक किया। वो पूरी तरह से डैमेज हो चुका था। जिसे अब किसी भी तरह से रिपेयर किया जाना लगभग असंभव था। लेकिन उसमें डला सिमकार्ड और मैमोरी कार्ड अब भी सही सलामत थे, जिन्हें मैंने तुरंत निकाल लिया। उसके बाद मैं अपने कपडों को अच्छी तरह से चैक करने लगी। उन कमीनों ने मेरे कपडों को चाकू की सहायता से इतनी बुरी तरह से फाडा था कि वो मेरे अब किसी भी काम के नहीं रह गए थे। लेकिन मुझे अपने जींस की पॉकेट से कुछ पैसे जरूर मिल गए थे। जो मैंने पार्क में जाने से पहले अपने हैंड बैग से निकाल लिए थे।

मैं इस वक्त बिना कपडों के थी और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं सिमकार्ड और मैमोरी कार्ड के साथ साथ उन पैसों को कहाँ रखूं, तभी मुझे एक आईडिया आया। मैंने कल रात आंगन में से जो चाकू उठाया था। उसे सीक्रेट कमरे से लेकर आई और अपने जींस के हिप पाकेट बाले हिस्से मैं से एक पाकेट काट लिया और उसके दोनों कार्नर पर चाकू की सहायता से दो छेद करने के बाद मैंने जींस में से एक रिवन के आकार का लम्बा टुकडा काटकर उस पाकेट के दोनों कार्नर पर किसी डोरी की तरह बांध दिया। अब बो पॉकेट एक काम चलाऊ हैंड बैग की तरह हो गया था। जिसे मैंने अपने कंधे पर डाल लिया। फिर मैंने उस पॉकेट के अंदर अपने पैसे और सिमकार्ड बगैरह भी रख दिए।

कहानी जारी है.....
 
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